আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
3621 - أخبرنا أبو زكريا العَنبَري، حدثنا محمد بن عبد السلام، حدثنا إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا أبو معاوية، حدثنا الأعمش، عن المِنهال بن عمرو، عن سعيد بن جُبَير، عن ابن عبَّاس في قوله عز وجل: {لَا تَكُونُوا كَالَّذِينَ آذَوْا مُوسَى} الآية [الأحزاب: 69]، قال له قومُه: به أُدْرةٌ، فخرج ذاتَ يوم يغتسلُ، فوَضَعَ ثيابَه على صخرة، فخرجت الصخرةُ تشتدُّ بثيابه، فخرج موسى يَتبَعُها عُريانًا حتَّى انتهَتْ إلى مجالسِ بني إسرائيل، فرأَوْهُ وليس بآدَرَ، فذلك قولُه عز وجل: {فَبَرَّأَهُ اللَّهُ مِمَّا قَالُوا وَكَانَ عِنْدَ اللَّهِ وَجِيهًا} [الأحزاب: 69] [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بهذه السِّياقة.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ্ তা'আলার এই বাণী সম্পর্কে তিনি বলেন: "তোমরা তাদের মতো হয়ো না, যারা মূসাকে কষ্ট দিয়েছিল..." [সূরা আহযাব: ৬৯]। তাঁর সম্প্রদায় তাঁকে বলেছিল: তাঁর অণ্ডকোষে স্ফীতি (রোগ) আছে। একদিন তিনি গোসল করার জন্য বের হলেন এবং তাঁর কাপড় একটি পাথরের উপর রাখলেন। তখন পাথরটি তাঁর কাপড় নিয়ে দ্রুত দৌড়াতে শুরু করলো। মূসা (আঃ) সেটির পিছু ধাওয়া করে নগ্ন অবস্থায় বের হলেন, যতক্ষণ না পাথরটি বনী ইসরাঈলের মজলিসের কাছে গিয়ে পৌঁছালো। তখন তারা তাঁকে দেখল এবং বুঝতে পারল যে তাঁর কোনো স্ফীতি নেই। এটাই আল্লাহ্ তা'আলার বাণী: "অতঃপর আল্লাহ্ তাকে তারা যা বলেছিল তা থেকে মুক্ত করলেন। আর সে ছিল আল্লাহ্র নিকট সম্মানিত।" [সূরা আহযাব: ৬৯]
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. إسحاق بن إبراهيم: هو ابن راهويه، وأبو معاوية: هو محمد بن خازم الضرير، والأعمش: هو سليمان بن مهران.وأخرجه ابن أبي شيبة 19/ 190، والطبري في "تفسيره" 22/ 51 من طريق أبي معاوية، بهذا الإسناد - وقرن أبو السائب سلم بن جنادة عن أبي معاوية عند الطبري بسعيد بن جبير عبدَ الله بنَ الحارث الأنصاري.وأخرجه الطبري أيضًا 22/ 51 من طريق عطية العوفي، عن ابن عبَّاس.وروي هذا الخبر مرفوعًا إلى النبي صلى الله عليه وسلم في حديث أبي هريرة عند أحمد (10678)، والبخاري (278) و (3404) ومسلم (339)، وبعض رواة حديث أبي هريرة يذكر عيبًا بالجلد.والأُدرة: نفخة في الخُصية. مذعور، وثقه ابن حبان والدارقطني، وانظر ترجمته في "تاريخ بغداد" 4/ 219، وقد توبع، وخالد بن الحارث: هو الهجيمي أبو عثمان البصري، وأبو بشر: هو جعفر بن أبي وحشية.وأخرجه الطبري (22/ 54) من طريق محمد بن جعفر، عن شعبة، بهذا الإسناد.وسيأتي آخره بنحوه برقم (4037) من طريق عمار البجلي عن سعيد بن جبير.
3622 - أخبرني محمد بن موسى الفقيه، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا محمد بن عمرو بن أبي مَذْعُور، حدثنا خالد بن الحارث، حدثنا شُعبة، عن أبي بِشْر، عن سعيد بن جُبير، عن ابن عبَّاس قال: {إِنَّا عَرَضْنَا الْأَمَانَةَ عَلَى السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَالْجِبَالِ فَأَبَيْنَ أَنْ يَحْمِلْنَهَا وَأَشْفَقْنَ مِنْهَا} [الأحزاب: 72]، قال: قيل لآدم: أتأخذُها بما فيها، فإن أطعتَ غَفَرتُ، وإن عصيتَ حذَّرتُك؟ قال: قَبِلتُ، قال: فما كان إلَّا كما بينَ صلاةِ العصر إلى أن غَرَبَت الشمسُ حتَّى أصابَ الذَّنْبَ [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: (আল্লাহর বাণী:) {নিশ্চয়ই আমি আকাশ, পৃথিবী ও পর্বতমালার উপর আমানত পেশ করেছিলাম, অতঃপর তারা তা বহন করতে অস্বীকার করল এবং তারা তাতে ভীত হল।} [সূরা আহযাব: ৭২]। তিনি (ইবনু আব্বাস) বলেন: আদমকে বলা হলো, তুমি কি এতে যা আছে তার বিনিময়ে তা গ্রহণ করবে? যদি তুমি আনুগত্য করো, আমি ক্ষমা করে দেব; আর যদি তুমি অবাধ্য হও, আমি তোমাকে সতর্ক করব। তিনি বললেন: আমি গ্রহণ করলাম। তিনি (ইবনু আব্বাস) বলেন: এরপর আসরের সালাতের সময় থেকে সূর্য ডুবে যাওয়া পর্যন্ত সময়ের বেশি অতিবাহিত হয়নি, এর মধ্যেই তিনি পাপ করে ফেললেন।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. محمد بن عمرو بن أبي مذعور: هو محمد بن عمرو بن سليمان بن أبي مذعور، وثقه ابن حبان والدارقطني، وانظر ترجمته في "تاريخ بغداد" 4/ 219، وقد توبع، وخالد بن الحارث: هو الهجيمي أبو عثمان البصري، وأبو بشر: هو جعفر بن أبي وحشية.وأخرجه الطبري (22/ 54) من طريق محمد بن جعفر، عن شعبة، بهذا الإسناد.وسيأتي آخره بنحوه برقم (4037) من طريق عمار البجلي عن سعيد بن جبير.
3623 - حدثنا أبو العبَّاس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا حفص بن غِيَاث، عن الأعمش، عن مسروق، عن أُبيِّ بن كعب، قوله عز وجل: {إِنَّا عَرَضْنَا الْأَمَانَةَ عَلَى السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَالْجِبَالِ} [الأحزاب: 72]، قال: من الأمانةِ أنَّ المرأة ائتُمِنَت على فَرْجِها [1].بسم الله الرحمن الرحيم 34 - ومن تفسير سورة سبأ
উবাই ইবনু কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মহান আল্লাহ্ তা‘আলার বাণী: {নিশ্চয়ই আমি আমানতকে আসমান, যমীন ও পর্বতমালার উপর পেশ করেছিলাম} [সূরা আল-আহযাব: ৭২] সম্পর্কে তিনি বলেন: আমানতের অন্তর্ভুক্ত হলো, নারীকে তার লজ্জাস্থানের ব্যাপারে আমানতদার করা হয়েছে।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد منقطع بين الأعمش ومسروق، فإنَّ الأعمش لم يلقه فيما قاله علي بن المديني، والغالب أنَّ الذي أخطأ فيه هو أحمد بن عبد الجبار، فإنه ليس بذاك المتقن، وقد خالفه من هو أوثق منه بمفاوز فوصلوه بينهما بذكر أبي الضحى مسلم بن صُبيح، فصحَّ الإسناد.فقد أخرجه أبو بكر بن أبي شيبة في "مصنفه" 5/ 282 عن حفص بن غياث، عن الأعمش، عن أبي الضحى، عن مسروق، عن أُبي بن كعب.وتابع أبا بكرٍ أبو سعيد بن الأشج عند ابن أبي حاتم في "تفسيره" 3/ 986 فرواه عن حفص بن غياث بذكر أبي الضحى فيه.وأخرجه كذلك عبد الرزاق في "تفسيره" 2/ 125، وسعيد بن منصور في "سننه" (1312)، وابن أبي شيبة 5/ 282، والمروزي في "تعظيم قدر الصلاة" (513) و (514)، والطبري 22/ 55، والبيهقي 7/ 371 و 418 من طرق عن الأعمش، به.
3624 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا إسحاق بن الحسن بن ميمون، حدثنا عفَّان، حدثنا حمّاد بن سَلَمة، أخبرنا ثابت، عن أنس، قولَه عز وجل: {وَأَلَنَّا لَهُ الْحَدِيدَ (10) أَنِ اعْمَلْ سَابِغَاتٍ}، قال أنس: إنَّ لُقمانَ كان عند داود وهو يَسرُدُ الدِّرْعَ، فجعل يَفتِلُه هكذا بيده، فجعل لقمانُ يَتعجَّبُ ويريدُ أن يسألَه، ويَمنعُه حُكْمُه أن يسأله، فلما فَرَغَ منها صَبَّها على نفسه، وقال: نِعمَ دِرعُ الحربِ هذه، فقال لقمانُ: الصمتُ من الحُكْم وقليلٌ فاعلُه، كنت أردتُ أن أسألَك فسكتُّ حتى كَفَيْتَني [1].صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ্ তা'আলার এই বাণী সম্পর্কে: "আর আমি তার জন্য লোহাকে নরম করে দিলাম, [এবং নির্দেশ দিলাম] তুমি প্রশস্ত বর্ম তৈরি করো" (সূরা সাবা: ১০-১১)। আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: নিশ্চয়ই লুকমান (আঃ) দাউদ (আঃ)-এর কাছে ছিলেন, যখন তিনি বর্ম তৈরি করছিলেন। তিনি তখন তা হাত দিয়ে এভাবে পেঁচিয়ে নিচ্ছিলেন (বা গাঁথছিলেন)। লুকমান (আঃ) অবাক হচ্ছিলেন এবং তাকে জিজ্ঞাসা করতে চাইছিলেন, কিন্তু তার প্রজ্ঞা তাকে প্রশ্ন করা থেকে বিরত রাখছিল। যখন তিনি তা বানানো শেষ করলেন, তখন তিনি বর্মটি নিজের গায়ে চাপালেন এবং বললেন: যুদ্ধের জন্য এটি কতই না উত্তম বর্ম! তখন লুকমান (আঃ) বললেন: নীরবতাও প্রজ্ঞার অংশ, কিন্তু এর অনুশীলনকারী কম। আমি আপনাকে প্রশ্ন করতে চেয়েছিলাম, কিন্তু আমি নীরব থাকলাম, যতক্ষণ না আপনিই আমার প্রয়োজন মিটিয়ে দিলেন।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح موقوف، والغالب أنه مما تُلقِّف من أهل الكتاب.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (4671) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الخرائطي في "مكارم الأخلاق" (441) من طريق حجاج بن منهال، عن حماد بن سلمة، به. وسقط من مطبوعه حماد، وهو ثابت في طبعة الرشد ص 787.وأخرجه مختصرًا بقول لقمان: "الصمت من الحكم وقليل فاعله": ابن حبان في "روضة العقلاء" ص 41 من طريق عبد الأعلى بن حماد، عن حماد بن سلمة، به.وروي هذا القول - دون ذكر لقمان - مرفوعًا من حديث أنس عن النبي صلى الله عليه وسلم عند القضاعي في "مسند الشهاب" (240) من طريق قتادة، وعند ابن عدي في "الكامل" 5/ 169 - ومن طريقه البيهقي في "الشعب" (4672) - من طريق عثمان بن سعد الكاتب، كلاهما عن أنس. والإسنادان ضعيفان، وذكر الثاني منهما ابن القطان الفاسي في "بيان الوهم والإيهام" 3/ 604 وضعَّفه بعثمان الكاتب، وقال البيهقي: غلط في هذا عثمان بن سعد هذا، والصحيح رواية ثابت. قلنا: وأما طريق قتادة فالإسناد إليه فيه لِين.وروي مرفوعًا أيضًا من حديث ابن عمر، أخرجه أبو منصور الديلمي في "مسند الفردوس" كما في "الغرائب الملتقطة" للحافظ ابن حجر (2017)، وإسناده ضعيف، وضعَّفه الحافظ العراقي في "تخريج الإحياء" 3/ 108.والحُكْم: الحِكمة. فرواه عن مجاهد من قوله.
3625 - حدثنا أبو محمد المُزَني، أخبرنا أحمد بن نَجْدةَ القرشي، حدثنا سعيد بن منصور، حدثنا عبد الرزاق، أخبرني عبد الوهاب بن مجاهد، عن أبيه، عن ابن عبَّاس في قوله عز وجل: {وَقَدِّرْ فِي السَّرْدِ} [سبأ: 11]، قال: لا تُدِقَّ المساميرَ وتُوسِّعْ فتَسلَسَ، ولا تُغلظِ المساميرَ وتُضيِّقِ الحَلَقَ فتَنفصِمَ، واجعله قَدْرًا [1]. هذا حرفٌ غريبٌ في التفسير، وعبد الوهاب ممَّن لم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মহান আল্লাহ্র বাণী, "এবং বর্মে সংযোজনার ক্ষেত্রে সঠিক পরিমাপ রক্ষা করো" {সূরা সাবা: ১১}-এর ব্যাখ্যায় তিনি বলেন: তুমি পেরেকগুলো অতিরিক্ত চিকন করে ছিদ্রগুলোকে চওড়া করবে না, যাতে তা দুর্বল হয়ে আলগা হয়ে যায়। আর না তুমি পেরেকগুলো মোটা করে দেবে এবং কড়া (রিং) গুলোকে সংকীর্ণ করবে, যাতে তা ছিঁড়ে যায় (বা ভেঙে যায়)। বরং এটিকে সঠিক পরিমাপে তৈরি করবে।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف جدًا من أجل عبد الوهاب بن مجاهد، فإنه متَّفَق على ضعفه، وبه أعلَّه الذهبي في "تلخيصه"، وقد خالفه عبد الله بن أبي نجيح الثقة عند الطبري في "تفسيره" 22/ 68 فرواه عن مجاهد من قوله.
3626 - حدثني أبو عمرو إسماعيل بن نُجَيد السُّلَمي، حدثنا محمد بن أيوب، أخبرنا أبو غسّان محمد بن عَمْرو الطَّيَالِسي، حدثنا جَرِير، عن عطاء بن السائب، عن سعيد بن جُبير، عن ابن عبَّاس قال: مات سليمانُ بن داود عليه السلام وهو قائمٌ يصلِّي ولم تَعلَم الشياطينُ بذلك حتى أكَلَت الأَرَضةُ عصاه فخَرَّ، وكان إذا نَبَتَت شجرةٌ سألها: لأيِّ داءٍ أنتِ؟ قال: فتُخبره، كما أخبر الله عز وجل: {وَلِسُلَيْمَانَ الرِّيحَ غُدُوُّهَا شَهْرٌ وَرَوَاحُهَا شَهْرٌ وَأَسَلْنَا لَهُ عَيْنَ الْقِطْرِ} الآياتِ كلِّها [سبأ: 12]، فلما نَبَتَت الخُرنُوبُ سألها لأيِّ شيء نَبَتَت، فقالت: لخرابِ هذا المسجد، فقال: إنَّ خرابَ هذا المسجد لا يكون إلَّا عند موتي، فقام يُصلِّي [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: সুলায়মান ইবনু দাউদ (আঃ) সালাত আদায়ের জন্য দাঁড়িয়ে থাকা অবস্থায় মৃত্যুবরণ করেন। শয়তানরা তাঁর এই মৃত্যু সম্পর্কে অবগত হতে পারেনি, যতক্ষণ না উইপোকা তাঁর লাঠিটি খেয়ে ফেলল এবং তিনি (মাটিতে) পড়ে গেলেন। তাঁর এমন নিয়ম ছিল যে, যখন কোনো বৃক্ষ জন্ম নিত, তখন তিনি সেটিকে জিজ্ঞাসা করতেন: তুমি কোন রোগের জন্য (প্রতিষেধক হিসেবে) জন্মেছো? তিনি বলেন, তখন বৃক্ষটি তাঁকে তা জানিয়ে দিত। যেমন আল্লাহ্ তা'আলা তাঁকে জানিয়েছিলেন: “আর আমি সুলায়মানের অধীন করে দিয়েছিলাম বায়ুকে; তার সকালের সফর ছিল এক মাসের পথ এবং সন্ধ্যার সফর ছিল এক মাসের পথ। আর আমি তার জন্য গলিত তামার একটি ঝর্ণা প্রবাহিত করেছিলাম…” [সূরা সাবা: ১২] সমস্ত আয়াতগুলো পর্যন্ত। যখন খুরনুব বৃক্ষ জন্মাল, তিনি তাকে জিজ্ঞাসা করলেন, তুমি কিসের জন্য জন্মেছো? সেটি বলল: এই মসজিদের ধ্বংসের জন্য। তখন তিনি বললেন: এই মসজিদের ধ্বংস কেবল আমার মৃত্যুর সময়েই হবে। অতঃপর তিনি সালাত আদায়ের জন্য দাঁড়িয়ে গেলেন।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح، جرير - وهو ابن عبد الحميد - روى عن عطاء بن السائب بعد اختلاطه، لكن تابعه من روى عنه قبل الاختلاط، وهو سفيان بن عيينة عند البزار في "مسنده" (5061) والمروزي في "تعظيم قدر الصلاة" (207)، فصحَّ الإسناد إن شاء الله.وتابع عطاءً عليه سلمةُ بنُ كهيل عن سعيد بن جبير فيما سيأتي عند المصنف برقم (7617).وخالف إبراهيم بن طهمان عن عطاء بن السائب فيما سيأتي برقم (7616) و (8426) فرفعه إلى النبي صلى الله عليه وسلم، وهذا وهمٌ من ابن طهمان، والصحيح أنه موقوف على ابن عبَّاس. وانظر تمام تخريجه عند (7616).
3627 - حدثنا محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا أبو عبد الله محمد بن أحمد بن أنس القرشي، حدثنا عبد الله بن يزيد المقرئ حدثنا عبد الله بن عيّاش، عن عبد الله بن هُبيرة السَّبَئي، عن عبد الرحمن بن وَعْلةَ قال: سمعت ابن عبّاس يقول: إنَّ رجلًا سأل النبيَّ صلى الله عليه وسلم عن سَبَإٍ ما هو: رجلٌ أو امرأةٌ أو أرضٌ؟ فقال: "هو رجلٌ وَلَدَ عشرةً من الولد، ستةً من ولده باليمن، وأربعةً بالشام، فأما اليمانيُّون: فمَذحِجٌ، وكِنْدةُ، والأزْدُ، والأشعريُّون، وأنْمارٌ، وحِميَرٌ خيرُها كلّها، وأما الشاميّةُ: فلَخْمٌ، وجُذامٌ، وعاملةُ، وغسَّانُ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وشاهدُه حديث فَرْوة بن مُسَيْك:
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমি তাঁকে বলতে শুনেছি যে, এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে 'সাবা' সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করেছিল: এটা কি কোনো পুরুষ, মহিলা, নাকি কোনো স্থান (জমিন)? তিনি বললেন: "তিনি (সাবা) একজন পুরুষ, যার দশটি সন্তান ছিল। তাদের ছয়জন ইয়ামানে এবং চারজন শামে (সিরিয়ায়) বসবাস করত। যারা ইয়ামানের, তারা হলো: মাযহিজ, কিনদাহ, আযদ, আশআরিয়্যুন, আনমার, এবং হিমইয়ার—এদের মধ্যে হিমইয়ার সর্বোত্তম। আর যারা শামের, তারা হলো: লাখম, জুযাম, আমিলাহ এবং গাছসান।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد فيه لِينٌ، وقد أخطأ مَن دون عبد الله بن يزيد المقرئ في تسمية شيخه، فسمّاه عبد الله بن عياش وعبد الله هذا ليس بذاك القوي وإنما يعتبر به في المتابعات والشواهد، لكن المحفوظ أنه من رواية المقرئ عن عبد الله بن لهيعة ولا يُعرَف هذا الحديث إلّا به، وابن لهيعة وإن كان متكلَّمًا فيه من جهة سوء حفظه فإنَّ رواية عبد الله بن يزيد المقرئ عنه صالحة، وقد رواه عن المقرئ على الصواب أحمد في "مسنده" (5/ 2898) و"فضائل الصحابة" (1616) فقال: عن عبد الله بن لهيعة، عن عبد الله بن هبيرة، به.ثم إنَّ عبد الله بن يزيد المقرئ قد خولف في تسمية الراوي عن ابن عبَّاس، فقد رواه عبد الله بن وهب - وهو من أثبت الناس في ابن لهيعة - في "جامعه" (21) ومن طريقه ابنُ عدي في "الكامل" 4/ 152، وأبو عمرو عثمان بن سعيد بن كثير عند ابن أبي خيثمة في السفر الثاني من "تاريخه" (3164)، وأسدُ بن موسى عند الطحاوي في "مشكل الآثار" (3378)، وعمرو بنُ خالد الحرّاني عند الطبراني في "الكبير" (12992)، أربعتهم عن ابن لهيعة، عن عبد الله بن هبيرة، عن علقمة بن وعلة السبئي، عن ابن عبَّاسِ. وعلقمة هذا لم نقف له على ترجمة ولم نتبيّن حاله، فلعلَّ ابن لهيعة قد أخطأ في تسميته، وأنَّ الصواب فيه عبد الرحمن بن وعلة كما في رواية عبد الله بن يزيد المقرئ، فإن عبد الرحمن هذا هو المعروف بالرواية عن ابن عبَّاس في الكتب الستة وغيرها، وهو من الثقات.ويشهد له حديث فروة بن مُسيك التالي عند المصنف.وآخر من حديث يزيد بن حصين عن النبي صلى الله عليه وسلم عند الطبراني في "الكبير" (22/ 639)، وأبي نعيم في "معرفة الصحابة" (6633)، ولا يُعرف في الصحابة من اسمه يزيد بن حصين، فالظاهر أنه مرسل.قوله: "وحِميرٌ خيرها كلها" هكذا وقع في أصولنا الخطية من "المستدرك"، وفي بعض نسخ "مسند أحمد" و"فضائل الصحابة": غير ما كلها، وفي نسخ أخرى من "المسند": عرباء كلها! ولم يرد هذا الحرف في الروايات الأخرى.
3628 - حدَّثَناه أبو بكر بن إسحاق وعلي بن حَمْشاذَ قالا: أخبرنا بِشْر بن موسى، حدثنا الحُميدي، حدثنا فَرَجُ بن سعيد بن عَلقَمة بن سعيد بن أبيَضَ بن حِمَالَ المَأْرِبيّ، حدثني عمِّي ثابت بن سعيد بن أبيَض، عن أبيه، أنَّ فَرْوةَ بن مُسَيك المُرادي حدَّثه: أنه سأل رسولَ الله صلى الله عليه وسلم عن سَبَأ، فقال: يا رسول الله، سبأٌ رجلٌ أم جبلٌ أم وادٍ؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "بل رجلٌ وَلَدَ عشرةً، فتشاءَمَ أربعةٌ، وتيامنَ ستةٌ، فتشاءمَ لَخْمٌ، وجُذَامٌ، وعاملةُ، وغسَّانُ، وتيامنَ حِميَرٌ، ومَذحِجٌ، والأزدُ، وكِندةُ، والأشعريُّون، والأنمارُ، التي منها بَجِيلةُ" [1].
ফরওয়াহ ইবনে মুসায়িক আল-মুরাদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সাবা' (Saba') সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করেছিলেন। তিনি বললেন, “ইয়া রাসূলাল্লাহ! সাবা' কি কোনো পুরুষ, নাকি কোনো পাহাড়, নাকি কোনো উপত্যকা?” রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “বরং সে একজন পুরুষ, যে দশটি সন্তানের জন্ম দিয়েছিল। তাদের মধ্যে চারটি [গোত্র] শামের দিকে (উত্তর দিকে) চলে গেল এবং ছয়টি [গোত্র] ইয়ামানের দিকে (দক্ষিণ দিকে) চলে গেল। যারা শামের দিকে গিয়েছিল তারা হলো: লাখম, জুযাম, আমিলাহ এবং গাসসান। আর যারা ইয়ামানের দিকে গিয়েছিল তারা হলো: হিমইয়ার, মাযহিজ, আল-আযদ, কিনদাহ, আল-আশআরীয়্যূন এবং আনমার, যাদের থেকে বাজীলাহ এসেছে।”
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث حسن، وهذا إسناد ضعيف لجهالة في ثابت بن سعيد وأبيه، وقد توبعا. الحميدي: هو عبد الله بن الزبير الأسدي المكي.وأخرجه البخاري في "تاريخه" 7/ 126 معلَّقًا عن الحميدي، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (1700) و (2469)، والطبراني في "الكبير" (18/ 838) من طريق محمد بن أبي عمر العدني، عن فرج بن سعيد، به.وأخرجه أحمد 39/ (24009/ 87)، وأبو داود (3988)، والترمذي (3222) من طريق الحسن بن الحكم النخعي، عن أبي سبرة عبد الله بن عابس النخعي، عن فروة بن مسيك. وهذا إسناد حسن من أجل أبي سبرة وحسَّنه الترمذي، وجوَّد إسناده الحافظ ابن كثير في "تفسيره" 6/ 492.وأخرجه أحمد أيضًا (24009/ 88) من طريق أبي جناب الكلبي، عن يحيى بن هانئ، عن فروة. وأبو جناب ضعيف.
3629 - حدثنا أبو بكر أحمد بن كامل بن خَلَف القاضي، حدثنا محمد بن جَرِير الفقيه، حدثنا أبو كُريب: سمعتُ أبا أسامة وسُئِلَ عن قول الله عز وجل: {وَمَا أَرْسَلْنَاكَ إِلَّا كَافَّةً لِلنَّاسِ بَشِيرًا وَنَذِيرًا} [سبأ: 28]، فقال: حدثنا الأعمش، عن مجاهد، عن عُبيد بن عُمَير، عن أبي ذرٍّ قال: طلبتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم ليلةً فوجدتُه قائمًا يصلِّي، فأطال الصلاةَ، ثم قال: "أُوتِيتُ الليلةَ خمسًا لم يُؤتَها نبيٌّ قبلي: أُرسِلتُ إلى الأحمرِ والأسود - قال مجاهد: الإِنسِ والجنّ - ونُصِرتُ بالرُّعب، فيُرعَبُ العدوُّ وهو على مَسِيرة شهر، وجُعِلَت ليَ الأرضُ مسجدًا وطَهُورًا، وأُحِلَّت ليَ الغنائمُ، ولم تَحِلَّ لأحدٍ قبلي، وقيل لي: سَلْ تُعطَهْ، فاختبأتُها شفاعةً لأمَّتي، فهي نائلةٌ من لم يُشرِكْ بالله شيئًا" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بهذه السِّياقة، إنما أخرجا ألفاظًا من الحديث متفرِّقة [2].
আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি এক রাতে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে খুঁজছিলাম। অতঃপর আমি তাঁকে পেলাম, তিনি দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করছিলেন। তিনি সালাতকে দীর্ঘ করলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "আজ রাতে আমাকে পাঁচটি জিনিস দেওয়া হয়েছে, যা আমার পূর্বে আর কোনো নবীকে দেওয়া হয়নি: (১) আমাকে লাল ও কালোর প্রতি প্রেরণ করা হয়েছে— মুজাহিদ বলেন: অর্থাৎ মানব ও জিনের প্রতি— (২) আমাকে ভয়ভীতির মাধ্যমে সাহায্য করা হয়েছে। আমার শত্রুকে এক মাসের দূরত্বে থাকতেই ভীতসন্ত্রস্ত করে দেওয়া হয়। (৩) আমার জন্য যমীনকে সিজদার স্থান ও পবিত্রকারী (পবিত্রতার উপকরণ) বানানো হয়েছে। (৪) আমার জন্য গনীমতের মাল হালাল করা হয়েছে, যা আমার পূর্বে আর কারো জন্য হালাল ছিল না। (৫) আর আমাকে বলা হয়েছে: তুমি চাও, তোমাকে দেওয়া হবে। কিন্তু আমি তা আমার উম্মতের জন্য শাফাআত হিসেবে গোপন করে রেখেছি। এটা সেই ব্যক্তিকে পৌঁছাবে, যে আল্লাহর সাথে কোনো কিছুকে শরীক করেনি।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح إن شاء الله، فإنَّ الأعمش - وهو سليمان بن مهران - قد عُرف بالتدليس، وذكر غير واحد من أهل العلم أنَّ عامَّة ما يرويه عن مجاهد مدلَّس، على أنه قد ثبت سماعه منه في غير ما حديثٍ في "الصحيحين" وغيرهما، إلّا أنه قليل السماع منه كما قال أبو حاتم الرازي في "علل الحديث" لابنه (2119)، وقد ذكر الدارقطني في "علله" (1115) في هذا الحديث رواية لقُطْبة بن عبد العزيز عن الأعمش أدخل فيها بينه وبين مجاهدٍ إبراهيمَ بنَ مهاجر، وإبراهيم ليس بذاك القوي، إلّا أننا لم نقف على رواية قطبة هذه مسندةً فيما بين أيدينا من المصادر، ومهما يكن من أمرٍ فإنَّ الأعمش قد توبع كما سيأتي.محمد بن جرير الفقيه: هو الطبري صاحب "التفسير"، وأبو كريب: هو محمد بن العلاء، وأبو أسامة: هو حماد بن أسامة.وأخرجه أحمد (35/ 21299) و (21314)، وأبو داود (489)، وابن حبان (6462) من طرق عن الأعمش، بهذا الإسناد - واقتصر أبو داود منه على قوله: "جعلت لي الأرض طهورًا ومسجدًا".وتابع الأعمشَ عبدُ الكريم الجزري - وهو ثقة - عن مجاهد به بنحو رواية الأعمش. ذكره الدارقطني في "العلل"، ولم نقف على رواية عبد الكريم هذه مسندةً.وتابعه أيضًا واصل بن حيان عن مجاهد عند أحمد (21435)، إلّا أنه جعله من رواية مجاهد عن أبي ذر بإسقاط عبيد بن عمير. قال الدارقطني: والمحفوظ قول من قال: عن مجاهد عن عبيد بن عمير عن أبي ذر.ويشهد لحديث أبي ذر هذا غيرُ ما حديث، انظرها عند حديث عبد الله بن عمرو في "مسند أحمد" (11/ 7068).
[2] أخرجاها من حديث جابر بن عبد الله عند البخاري برقم (335) و (438) ومسلم برقم (521) من حديث جابر بن عبد الله، وعند مسلم برقم (523) من حديث أبي هريرة.
3630 - أخبرنا أبو بكر محمد بن عبد الله الشافعي، حدثنا إسحاق بن الحسن، حدثنا أبو حُذيفة، حدثنا سفيان، عن أبي إسحاق، عن التميمي، عن ابن عبَّاس في قوله عز وجل: {وَأَنَّى لَهُمُ التَّنَاوُشُ مِنْ مَكَانٍ بَعِيدٍ} [سبأ: 52]، قال: يَسألون الردَّ، وليس بحينِ ردٍّ [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.بسم الله الرحمن الرحيم 35 - ومن سورة الملائكة
ইব্ন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ্ তাআলার বাণী— {আর এতদুরে অবস্থান হতে তাদের পক্ষে (ঈমান) লাভ করা কেমন করে সম্ভব হবে?} [সূরা সাবা: ৫২]— এই প্রসঙ্গে তিনি বলেন, তারা (দুনিয়াতে) ফিরে আসার জন্য প্রার্থনা করবে, কিন্তু (এটা) ফিরে আসার সময় নয়।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده محتمل للتحسين من أجل التميمي: واسمه أَربِدَة، وقد سلف بيان حاله عند الحديث (925). أبو حذيفة: هو موسى بن مسعود النهدي، وسفيان: هو الثوري، وأبو إسحاق: هو عمرو بن عبد الله السبيعي.وهو في "تفسير أبي حذيفة" برقم (785).وأخرجه ابن أبي الدنيا في "الأحوال" (111) من طريق وكيع، عن سفيان، بهذا الإسناد.وأخرجه يحيى بن سلام في "تفسيره" 2/ 771، وابن أبي الدنيا (110) و (111)، وأبو حاتم الرازي في "الزهد" (36)، والطبري في "تفسيره" 22/ 110 من طرق عن أبي إسحاق، به. "ثقاته"، ومخارق مختلف في صحبته.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (616) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه مسدَّد في "مسنده" كما في "المطالب العالية" (3406) عن يحيى بن سعيد القطان، والطبري 22/ 120، والبيهقي في "الأسماء والصفات" (667) من طريق جعفر بن عون، والطبراني (9144) من طريق أبي نعيم، ثلاثتهم عن المسعودي، به. ويحيى القطان ممّن سمع من المسعودي قبل اختلاطه.وأخرجه بنحوه - لكن دون ذكر الآية - أبو نعيم الأصبهاني في "الحلية" 4/ 268 من طريق الليث بن سعد، عن ابن عجلان، عن عون بن عبد الله بن عتبة، عن أبيه، عن ابن مسعود.وسأل ابن أبي حاتم الرازي أباه عن حديث ابن عجلان هذا كما في "العلل" (2033)، وذكر أنه رواه أيضًا المسعودي عن عون عن الأسود بن يزيد عن ابن مسعود، فقال لأبيه أبي حاتم: أيهما أصح؟ فقال: المسعودي أفهم بحديث عون، وهو أشبه. قلنا: وهذه الطريق التي أشار إليها ابن أبي حاتم لم نقف عليها عند غيره.
3631 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا حامد بن أبي حامد المقرئ، حدثنا إسحاق بن سليمان، أخبرنا عبد الرحمن بن عبد الله المسعودي، عن عبد الله بن المُخارِق بن سُلَيم، عن أبيه، عن عبد الله بن مسعود قال: إذا حدَّثناكم بحديثٍ أَتيناكم بتصديق ذلك في كتاب الله، إنَّ العبد إذا قال: سبحانَ الله، والحمدُ لله، ولا إلهَ إلَّا الله، واللهُ أكبر، وتباركَ الله، قَبَضَ عليهنَّ ملكٌ فضمَّهنَّ تحت جناحه وصَعَدَ بهنَّ، لا يمرُّ بهنَّ على جَمْع من الملائكة إِلَّا استَغفَروا لقائلهنَّ، حتى يُحيَّا [1] بهنَّ وجهُ الرَّحمن. ثم تلا عبدُ الله: {إِلَيْهِ يَصْعَدُ الْكَلِمُ الطَّيِّبُ وَالْعَمَلُ الصَّالِحُ يَرْفَعُهُ} [فاطر: 10] [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমরা যখন তোমাদের কাছে কোনো হাদীস বর্ণনা করি, তখন আমরা আল্লাহ্র কিতাবে (কুরআনে) তার সত্যায়ন নিয়ে আসি। নিশ্চয়ই বান্দা যখন বলে: ‘সুবহানাল্লাহ, ওয়ালহামদুলিল্লাহ, ওয়া লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ, আল্লাহু আকবার, ওয়া তাবারাকাল্লাহ’ (আল্লাহ পবিত্র, সমস্ত প্রশংসা আল্লাহ্র জন্য, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই, আল্লাহ মহান, এবং আল্লাহ বরকতময়), তখন একজন ফেরেশতা সেগুলো গ্রহণ করে নিজের ডানার নিচে জড়ো করেন এবং তা নিয়ে উপরে আরোহণ করেন। তিনি এগুলো নিয়ে যখনই কোনো ফেরেশতা দলের পাশ দিয়ে অতিক্রম করেন, তারা এর পাঠকারীর জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করতে থাকে, যতক্ষণ না তিনি এগুলো নিয়ে রহমানের (আল্লাহ্র) সমীপে পৌঁছান। এরপর আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এই আয়াতটি তিলাওয়াত করলেন: "তাঁরই (আল্লাহ্র) দিকে পবিত্র বাক্যসমূহ আরোহণ করে এবং সৎকর্ম সেগুলোকে ঊর্ধ্বে তুলে নেয়।" (সূরা ফাতির: ১০)।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] في المطبوع: يجيء، والمثبت من أصولنا الخطية. وقال الحافظ المنذري في "الترغيب والترهيب" بعدما خرَّجه من الحاكم: كذا في نسختي: يحيّا، بالحاء المهملة وتشديد المثنّاة تحت، ورواه الطبراني فقال: حتَّى يجيء، بالجيم ولعلَّه الصواب. "ثقاته"، ومخارق مختلف في صحبته.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (616) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه مسدَّد في "مسنده" كما في "المطالب العالية" (3406) عن يحيى بن سعيد القطان، والطبري 22/ 120، والبيهقي في "الأسماء والصفات" (667) من طريق جعفر بن عون، والطبراني (9144) من طريق أبي نعيم، ثلاثتهم عن المسعودي، به. ويحيى القطان ممّن سمع من المسعودي قبل اختلاطه.وأخرجه بنحوه - لكن دون ذكر الآية - أبو نعيم الأصبهاني في "الحلية" 4/ 268 من طريق الليث بن سعد، عن ابن عجلان، عن عون بن عبد الله بن عتبة، عن أبيه، عن ابن مسعود.وسأل ابن أبي حاتم الرازي أباه عن حديث ابن عجلان هذا كما في "العلل" (2033)، وذكر أنه رواه أيضًا المسعودي عن عون عن الأسود بن يزيد عن ابن مسعود، فقال لأبيه أبي حاتم: أيهما أصح؟ فقال: المسعودي أفهم بحديث عون، وهو أشبه. قلنا: وهذه الطريق التي أشار إليها ابن أبي حاتم لم نقف عليها عند غيره.
[2] إسناده محتمل للتحسين من أجل عبد الله بن المخارق وأبيه، وقد ذكرهما ابن حبان في "ثقاته"، ومخارق مختلف في صحبته.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (616) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه مسدَّد في "مسنده" كما في "المطالب العالية" (3406) عن يحيى بن سعيد القطان، والطبري 22/ 120، والبيهقي في "الأسماء والصفات" (667) من طريق جعفر بن عون، والطبراني (9144) من طريق أبي نعيم، ثلاثتهم عن المسعودي، به. ويحيى القطان ممّن سمع من المسعودي قبل اختلاطه.وأخرجه بنحوه - لكن دون ذكر الآية - أبو نعيم الأصبهاني في "الحلية" 4/ 268 من طريق الليث بن سعد، عن ابن عجلان، عن عون بن عبد الله بن عتبة، عن أبيه، عن ابن مسعود.وسأل ابن أبي حاتم الرازي أباه عن حديث ابن عجلان هذا كما في "العلل" (2033)، وذكر أنه رواه أيضًا المسعودي عن عون عن الأسود بن يزيد عن ابن مسعود، فقال لأبيه أبي حاتم: أيهما أصح؟ فقال: المسعودي أفهم بحديث عون، وهو أشبه. قلنا: وهذه الطريق التي أشار إليها ابن أبي حاتم لم نقف عليها عند غيره.
3632 - حدثنا علي بن حَمْشاذَ، حدثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدثنا أبو الوليد، حدثنا عبيد الله بن إياد بن لَقِيط، حدثني إياد بن لَقِيط، عن أبي رِمْثةَ قال: انطلقتُ مع أَبي نحوَ رسول الله صلى الله عليه وسلم فَسَلَّمَ عليه أَبي، وجلسنا ساعةً فتحدَّثنا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم لأَبي: "ابنُكَ هذا؟ " قال: إي وربِّ الكعبة، قال: "حقًّا؟ " قال: أَشْهَدُ به، قال: فتبسَّمَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم ضاحكًا من ثَبَتِ شَبَهي بأبي ومن حَلِفِ أَبي على ذلك، قال: ثم قال: "أمَا إنَّ ابنَك هذا لا يَجْني عليك ولا تَجْني عليه"، قال: وقرأ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: {وَلَا [1] تَزِرُ وَازِرَةٌ وِزْرَ أُخْرَى} إلى قوله: {هَذَا نَذِيرٌ مِنَ النُّذُرِ الْأُولَى} [2]. صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবূ রিমসাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আমার পিতার সাথে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দিকে গেলাম। আমার পিতা তাঁকে সালাম দিলেন এবং আমরা কিছুক্ষণ বসে কথাবার্তা বললাম। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার পিতাকে জিজ্ঞাসা করলেন: "এ কি তোমার ছেলে?" তিনি (আমার পিতা) বললেন: হ্যাঁ, কাবার রবের কসম! তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সত্যি?" তিনি বললেন: আমি এর সাক্ষ্য দিচ্ছি। বর্ণনাকারী বলেন, আমার পিতার সাথে আমার চেহারার মিল এবং আমার পিতার শপথ করার কারণে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হেসে দিলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "শোনো! তোমার এই পুত্র তোমার ওপর কোনো অপরাধের বোঝা বহন করবে না এবং তুমিও তার ওপর কোনো অপরাধের বোঝা বহন করবে না।" বর্ণনাকারী বলেন, আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তিলাওয়াত করলেন: "একজনের বোঝা অন্য কেউ বহন করবে না" থেকে শুরু করে "...এগুলো হলো প্রাচীন সতর্ককারীগণের পক্ষ থেকে সতর্কবাণী" পর্যন্ত [সূরা আন-নাজম: ৩৮, ৫৬]।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] هكذا في أصولنا الخطية، وهذه الآية في الأنعام والإسراء وفاطر والزمر، وهكذا هي في المصادر التي خرَّجت الحديث، وليس في شيء منها ذكر بقيّته وهي: "إلى قوله: {هَذَا نَذِيرٌ مِنَ النُّذُرِ الْأُولَى} " فإنَّ هذه الآيات في سورة النجم (38 - 56)، والآية فيها بلفظ: {أَلَّا تَزِرُ … }، وهكذا رواه البيهقي في "السنن" 8/ 345 عن الحاكم. هنا. وقرن بهشامٍ عفانَ بنَ مسلم.وأخرجه ابن حبان (5995) عن الفضل بن الحباب الجُمحي، عن أبي الوليد الطيالسي، به.وأخرجه أبو داود (4495) عن أحمد بن يونس، عن عبيد الله بن إياد، به.وأخرجه أحمد (7106) و (7107)، وأبو داود (4208)، والنسائي (7007) من طريقين عن إياد بن لقيط، به مختصرًا.وأخرجه أحمد (7108) من طريق عاصم بن أبي النجود، عن أبي رمثة. مختصرًا أيضًا.وفي باب لا يجني أحدٌ على أحدٍ غيرُ ما حديثٍ، انظرها عند حديث عمرو بن الأحوص من "مسند أحمد" (25/ 16064).قوله: "أَشهَدُ به" على صيغة المتكلِّم، أي: أقرُّ وأعترف بذلك، أو على صيغة الأمر: اشهَدْ به، أي: كن شاهدًا على اعترافي بأنه ابني.وقوله: "لا يجني عليك ولا تجني عليه" أي: لا يُؤاخَذ بذنبك ولا تُؤاخَذ بذنبه، وكان من عادة الجاهلية ضمانُ الجنايات بينهما، فردَّه النبي صلى الله عليه وسلم بقوله هذا. والجناية: الذَّنْب، أو ما يفعله الإنسان مما يوجب عليه العقابَ أو القِصاص.
[2] إسناده صحيح. أبو الوليد: هو هشام بن عبد الملك الطَّيالسي.وأخرجه أحمد (11/ 7109) عن هشام بن عبد الملك الطيالسي، بهذا الإسناد - بأطول ممّا هنا. وقرن بهشامٍ عفانَ بنَ مسلم.وأخرجه ابن حبان (5995) عن الفضل بن الحباب الجُمحي، عن أبي الوليد الطيالسي، به.وأخرجه أبو داود (4495) عن أحمد بن يونس، عن عبيد الله بن إياد، به.وأخرجه أحمد (7106) و (7107)، وأبو داود (4208)، والنسائي (7007) من طريقين عن إياد بن لقيط، به مختصرًا.وأخرجه أحمد (7108) من طريق عاصم بن أبي النجود، عن أبي رمثة. مختصرًا أيضًا.وفي باب لا يجني أحدٌ على أحدٍ غيرُ ما حديثٍ، انظرها عند حديث عمرو بن الأحوص من "مسند أحمد" (25/ 16064).قوله: "أَشهَدُ به" على صيغة المتكلِّم، أي: أقرُّ وأعترف بذلك، أو على صيغة الأمر: اشهَدْ به، أي: كن شاهدًا على اعترافي بأنه ابني.وقوله: "لا يجني عليك ولا تجني عليه" أي: لا يُؤاخَذ بذنبك ولا تُؤاخَذ بذنبه، وكان من عادة الجاهلية ضمانُ الجنايات بينهما، فردَّه النبي صلى الله عليه وسلم بقوله هذا. والجناية: الذَّنْب، أو ما يفعله الإنسان مما يوجب عليه العقابَ أو القِصاص.
3633 - حدثنا أبو أحمد الحسين بن علي التميمي، حدثنا أبو بكر محمد بن إسحاق بن خُزَيمة، حدثنا نَصْر بن علي، حدثنا المعتمِر بن سليمان، عن أبيه، عن عطاء بن السائب، عن عِكْرمة، عن ابن عبّاس قال: لما نَزَلَت {سَبِّحِ اسْمَ رَبِّكَ الْأَعْلَى}، قال: "كلُّها في صُحُف إبراهيم" فلما نزلت: {وَالنَّجْمِ إِذَا هَوَى} فَبلغ {وَإِبْرَاهِيمَ الَّذِي وَفَّى} [النجم: 1 - 37]، قال: "وَفَّى"، {أَلَّا تَزِرُ وَازِرَةٌ وِزْرَ أُخْرَى} إلى قوله: {هَذَا نَذِيرٌ مِنَ النُّذُرِ الْأُولَى} [النجم: 38 - 56] [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন (আল্লাহর বাণী) নাযিল হলো: {سَبِّحِ اسْمَ رَبِّكَ الْأَعْلَى} (তোমার প্রতিপালক মহান সত্তার নামের পবিত্রতা বর্ণনা করো) [সূরা আল-আ’লা], তখন তিনি বললেন: "এর পুরোটাই ইবরাহীম (আঃ)-এর সহীফাসমূহে রয়েছে।" অতঃপর যখন নাযিল হলো: {وَالنَّجْمِ إِذَا هَوَى} (শপথ নক্ষত্রের, যখন তা অস্তমিত হয়) [সূরা আন-নাজম], এবং তিনি [পড়তে পড়তে] যখন {وَإِبْرَاهِيمَ الَّذِي وَفَّى} (আর ইবরাহীম, যিনি স্বীয় দায়িত্ব পুরোপুরি পালন করেছিলেন) [আন-নাজম: ১-৩৭] পর্যন্ত পৌঁছালেন, তখন তিনি বললেন: "তিনি (ইবরাহীম) পুরোপুরি পালন করেছিলেন (ওয়াফ্ফা)!" [এবং এরপর যখন নাযিল হলো] {أَلَّا تَزِرُ وَازِرَةٌ وِزْرَ أُخْرَى} (যেন কেউ কারও বোঝা বহন করবে না) থেকে শুরু করে আল্লাহ্র বাণী {هَذَا نَذِيرٌ مِنَ النُّذُرِ الْأُولَى} (এটি প্রাচীন সতর্ককারীগণের পক্ষ থেকে একটি সতর্কবাণী) [আন-নাজম: ৩৮-৫৬] পর্যন্ত।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. وقد سلف برقم (2967).
3634 - أخبرنا أبو زكريا يحيى بن محمد العَنبري، حدثنا محمد بن عبد السلام، حدثنا إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا جَرير، حدثني الأعمش، عن رجل قد سمَّاه، عن أبي الدرداء قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول في قوله عز وجل: {فَمِنْهُمْ ظَالِمٌ لِنَفْسِهِ وَمِنْهُمْ مُقْتَصِدٌ وَمِنْهُمْ سَابِقٌ بِالْخَيْرَاتِ} [فاطر: 32]، قال: "السابقُ والمقتصدُ يَدخُلان الجنةَ بغير حساب، والظالمُ لنفسه يُحاسَب حسابًا يسيرًا ثم يَدخُلُ الجنةَ" [1].وقد اختَلَفت الرواياتُ عن الأعمش في إسناد هذا الحديث، فرُوِيَ عن الثَّوْري عن الأعمش قال: ذكر أبو ثابت عن أبي الدرداء، وقيل: عن الثَّوري عن الأعمش عن أبي ثابت عن أبي الدرداء، وقيل: عن شُعْبة عن الأعمش عن رجل من ثَقِيف عن أبي الدرداء، وإذا كَثُرَت الرواياتُ في الحديث ظَهَرَ أنَّ للحديث أصلًا [2].
আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে আল্লাহ তা'আলার এই বাণী সম্পর্কে বলতে শুনেছি: "অতঃপর তাদের মধ্যে কেউ কেউ নিজের প্রতি জুলুমকারী, কেউ মধ্যমপন্হী এবং কেউ কেউ আল্লাহর ইচ্ছায় কল্যাণকর কাজে অগ্রগামী।" [সূরা ফাতির: ৩২] তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, "কল্যাণকর কাজে অগ্রগামী (সাবিক) এবং মধ্যমপন্হী (মুকতাসিদ) - এরা দু'জন বিনা হিসাবে জান্নাতে প্রবেশ করবে। আর নিজের প্রতি জুলুমকারীকে (যালিমুন লিনাফসিহি) সহজ হিসাবের সম্মুখীন করা হবে, এরপর সে জান্নাতে প্রবেশ করবে।"
এই হাদীসের সনদ (বর্ণনা পরম্পরা) সম্পর্কে আ'মাশ থেকে বিভিন্ন বর্ণনা পাওয়া যায়। সাওরী থেকে আ'মাশ সূত্রে বর্ণিত আছে যে, তিনি বলেন: আবু সাবিত, আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এটি উল্লেখ করেছেন। আবার কারো কারো মতে, সাওরী, আ'মাশ, আবু সাবিত, আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে। আবার কারো কারো মতে, শু'বাহ, আ'মাশ, সাকীফ গোত্রের এক ব্যক্তি, আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে। যখন কোনো হাদীসের বর্ণনার সংখ্যা বৃদ্ধি পায়, তখন প্রতীয়মান হয় যে, এর অবশ্যই কোনো ভিত্তি (আসল) আছে।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف لإبهام شيخ الأعمش، وقد اضطُرب فيه كما سيشير المصنف وكما بينّاه في التعليق على الحديث في "مسند أحمد"، فقد أخرجه فيه (36/ 21697) و (45/ 27505) عن وكيع، عن سفيان الثوري، عن الأعمش، عن ثابت أو عن أبي ثابت، عن أبي الدرداء. وثابت هذا أو أبو ثابت لم يُعرَف.وأخرج أحمد أيضًا (36/ 21727) نحوه من وجه آخر ضعيف. هذا. أبو المثنى: هو معاذ بن المثنى بن معاذ العنبري.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (6094) من طريق علي بن الحسين الدرهمي، عن معتمر بن سليمان، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو داود الطيالسي في "مسنده" (1592) عن الصلت بن دينار، به.
[2] هذا إذا تعدّدت المخارج وكانت سويّة، أما حديثه هذا فالمخرج هنا واحد وهو الأعمش، وقد اختُلف عليه فيه، فهذا دليل اضطراب وضعف. هذا. أبو المثنى: هو معاذ بن المثنى بن معاذ العنبري.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (6094) من طريق علي بن الحسين الدرهمي، عن معتمر بن سليمان، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو داود الطيالسي في "مسنده" (1592) عن الصلت بن دينار، به.
3635 - فأخبرنا الشيخ أبو بكر بن إسحاق في "مسند مسدَّد بن مُسرهَد": أخبرنا أبو المثنَّى، حدثنا مسدَّد، حدثنا المعتمِر بن سليمان، حدثني أبو شعيب الصَّلْت بن عبد الرحمن، حدثني عُقْبة بن صُهْبان الحُدَّاني [1] قال: قلت لعائشة: يا أُمَّ المؤمنين، أرأيتِ قولَ الله عز وجل: {ثُمَّ أَوْرَثْنَا الْكِتَابَ الَّذِينَ اصْطَفَيْنَا مِنْ عِبَادِنَا فَمِنْهُمْ ظَالِمٌ لِنَفْسِهِ وَمِنْهُمْ مُقْتَصِدٌ وَمِنْهُمْ سَابِقٌ بِالْخَيْرَاتِ بِإِذْنِ اللَّهِ ذَلِكَ هُوَ الْفَضْلُ الْكَبِيرُ} [فاطر: 32]؟ فقالت عائشة: أما السابقُ: فمَن مَضَى في حياة رسول الله صلى الله عليه وسلم فَشَهِدَ له بالحياة والرِّزق، وأما المقتصِدُ: فمن اتَّبع آثارَهم فعَمِلَ بأعمالهم حتى يَلحَقَ بهم، وأما الظالمُ لنفسه: فمِثْلي ومِثلُك ومَن اتَّبَعَنا، وكلٌّ في الجنة [2]. صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। উক্ববাহ ইবনু সুহবান আল-হুদ্দানি বলেন, আমি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললাম: হে উম্মুল মু'মিনীন! আল্লাহ তা'আলার এই বাণী সম্পর্কে আপনার কী ধারণা: "এরপর আমি কিতাবের অধিকারী করলাম আমার বান্দাদের মধ্যে তাদেরকে, যাদেরকে আমি মনোনীত করেছি। অতঃপর তাদের কতক নিজেদের প্রতি অত্যাচারী, কতক মধ্যপন্থী এবং কতক আল্লাহর ইচ্ছায় কল্যাণের পথে অগ্রগামী। এটাই মহা অনুগ্রহ।" (সূরা ফাতির: ৩২)? জবাবে আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: অগ্রগামী (সাবেক) তারা, যারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জীবদ্দশায় অতিবাহিত হয়েছেন এবং তিনি তাদের জন্য জীবন ও রিযিকের সাক্ষ্য দিয়েছেন। আর মধ্যপন্থী (মুকতাহিদ) তারা, যারা তাদের (সাবেকীনদের) পদাঙ্ক অনুসরণ করেছে এবং তাদের আমল করেছে, যেন তারা তাদের সাথে মিলিত হতে পারে। আর যারা নিজেদের প্রতি অত্যাচারী (যালিম লি-নাফসিহি) তারা হলো আমার মতো এবং তোমার মতো এবং যারা আমাদের অনুসরণ করেছে। আর এরা সকলেই জান্নাতে প্রবেশ করবে।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: الحراني، بالراء، والتصويب من مصادر ترجمته. هذا. أبو المثنى: هو معاذ بن المثنى بن معاذ العنبري.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (6094) من طريق علي بن الحسين الدرهمي، عن معتمر بن سليمان، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو داود الطيالسي في "مسنده" (1592) عن الصلت بن دينار، به.
[2] إسناده ضعيف جدًّا من أجل أبي شعيب، واسمه الصلت بن دينار وليس الصلت بن عبد الرحمن كما وقع عند المصنف. وقد أشار الذهبي في "تلخيصه" إلى ضعف أبي شعيب هذا. أبو المثنى: هو معاذ بن المثنى بن معاذ العنبري.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (6094) من طريق علي بن الحسين الدرهمي، عن معتمر بن سليمان، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو داود الطيالسي في "مسنده" (1592) عن الصلت بن دينار، به.
3636 - حدثني أبو علي الحسن بن علي بن داود المطرِّز المِصري بمكة، حدثنا العبَّاس بن محمد بن العبَّاس المِصري، حدثنا عمرو بن سَوّاد السَّرْحي، حدثنا عبد الله بن وَهْب، أخبرني عمرو بن الحارث، عن أبي السَّمْح، عن أبي الهيثم، عن أبي سعيد الخُدْري: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم تَلَا قولَ الله عز وجل: {جَنَّاتُ عَدْنٍ يَدْخُلُونَهَا يُحَلَّوْنَ فِيهَا مِنْ أَسَاوِرَ مِنْ ذَهَبٍ} [فاطر: 33] فقال: "إنَّ عليهم التِّيجانَ، إِنَّ أَدنى لؤلؤةٍ فيها لَتُضيءُ ما بين المشرقِ والمغربِ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، كما حدَّثَناه أبو العبَّاس عن الدُّوري عن يحيى بن مَعِين أنه قال: أصحُّ إسناد المِصريّين عمرٌو عن درَّاج عن أبي الهيثم عن أبي سعيد [2].
আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আল্লাহ তাআলার এই বাণী পাঠ করলেন: "চিরস্থায়ী জান্নাত, তারা সেখানে প্রবেশ করবে। সেখানে তাদেরকে সোনার চুড়ি দ্বারা অলংকৃত করা হবে।" (সূরা ফাতির: ৩৩)। অতঃপর তিনি বললেন: "নিশ্চয় তাদের (জান্নাতবাসীদের) উপর মুকুট থাকবে। নিশ্চয় এর মধ্যেকার (সেই মুকুটের) নিম্নতম একটি মুক্তাও পূর্ব ও পশ্চিমের মধ্যবর্তী স্থানকে আলোকিত করে দেবে।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف لضعف رواية أبي السَّمح - وهو درَّاج - عن أبي الهيثم: وهو سليمان بن عمرو العُتْواري.وأخرجه ابن حبان (7397) من طريق حرملة بن يحيى، عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد - بأطول ممّا هنا ودون ذكر الآية.وأخرجه الترمذي (2562/ 2) من طريق رشدين بن سعد، عن عمرو بن الحارث، به.وأخرجه أحمد (18/ 11715) من طريق عبد الله بن لهيعة، عن درّاج أبي السمح، به مطولًا.وانظر ما سيأتي برقم (3816).
[2] هذا من تساهل يحيى بن معين رحمه الله، بل أثبت أسانيد المصريين وأصحها: الليث بن سعد عن يزيد بن أبي حبيب عن أبي الخير عن عقبة بن عامر، كما قال الحاكم نفسه في كتابه "معرفة علوم الحديث" ص 56، وعليه مشى جمهور من اعتنى وصنف في هذا الفن.
3637 - حدثني أبو سعيد أحمد بن يعقوب الثَّقَفي، حدثنا الحسن بن المثنَّى ابن معاذ بن معاذ العَنبَري، حدثني أَبي، حدثنا معاذ بن هشام، عن أبيه، عن عمرو بن مالك، عن أبي الجَوْزاء، عن ابن عبَّاس: {الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي أَذْهَبَ عَنَّا الْحَزَنَ} [فاطر: 34]، قال: حَزَنُ النار [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ তা‘আলার বাণী: {সকল প্রশংসা আল্লাহর, যিনি আমাদের থেকে দুঃখ দূর করেছেন} (সূরা ফাতির: ৩৪) সম্পর্কে তিনি বলেন, এর দ্বারা উদ্দেশ্য হলো, জাহান্নামের দুঃখ।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده حسن من أجل عمرو بن مالك: وهو النُّكْري. أبو الجوزاء: هو أوس بن عبد الله الرَّبَعي.وأخرجه البيهقي في "البعث والنشور" (245) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي الدنيا في "الهم والحزن" (25) عن المثنى بن معاذ العنبري، به.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 22/ 138 عن قتادة بن سعيد بن قتادة، عن معاذ بن هشام، به.
3638 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصَّفّار، حدثنا أحمد بن مِهْران، حدثنا أبو نُعيم، حدثنا سفيان، عن عبد الله بن عثمان بن خُثَيم، عن مجاهد، عن ابن عبَّاس في قوله عز وجل: {أَوَلَمْ نُعَمِّرْكُمْ مَا يَتَذَكَّرُ فِيهِ مَنْ تَذَكَّرَ} [فاطر: 37]، قال: ستّين سنةً [1].صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আল্লাহ্ তা'আলার বাণী: {তোমরা কি স্মরণ করার উপযুক্ত সময় পাওনি, যাতে স্মরণ করার কেউ থাকলে স্মরণ করতে পারতো?} [সূরা ফাতির: ৩৭] সম্পর্কে বলেন: (এর দ্বারা) ষাট বছর বয়সকে বুঝানো হয়েছে।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده حسن من أجل أحمد بن مهران - وهو ابن خالد الأصبهاني - وقد توبع، وعبد الله بن عثمان بن خثيم صدوق لا بأس به، وبقية رجاله ثقات. أبو نعيم: هو الفضل بن دُكين، وسفيان: هو الثوري.وأخرجه البيهقي في "السنن" 3/ 370 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه عبد الرزاق في "تفسيره" 2/ 138 عن معمر وسفيان الثوري، به.وأخرجه من طريق عبد الرزاق عن الثوري وحده ابنُ منده في "التوحيد" (102).وأخرجه الطبري 22/ 141 من طريق عبد الرحمن بن مهدي، عن سفيان، به.وأخرجه الطبري أيضًا من طريق عبد الله بن إدريس، وابن منده (102) من طريق وهيب بن خالد، كلاهما عن ابن خثيم، به.وخالف بشرُ بن المفضل عند الطبري فرواه عن ابن خثيم فقال فيه: أربعون سنة. وبشر ثقة لكن روايته هذه شاذَّة.
3639 - أخبرني أبو الحسن أحمد بن محمد العَنَزي [1]، حدثنا عثمان بن سعيد الدارِمي، حدثنا عبد الله بن صالح، حدثنا الليث بن سعد، عن سعيد المَقبُري، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إذا بَلَغَ الرجلُ من أمَّتي ستين سنةً، فقد أعذَرَ اللهُ إليه في العُمرِ" [2].صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه [3].
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন আমার উম্মতের কোনো ব্যক্তি ষাট বছর বয়সে উপনীত হয়, তখন আল্লাহ তাআলা তার জীবনের ব্যাপারে তাকে (সতর্কতা ও অনুশোচনার) সুযোগ দান করেছেন।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: العنبري. وقد تكرر مجيئه عند المصنف في عدة مواضع على الصواب.
[2] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل عبد الله بن صالح كاتب الليث.وأخرجه أحمد (14/ 8262) من طريق محمد بن عجلان، و (15/ 9251) من طريق أبي معشر نجيح السندي، كلاهما عن سعيد المقبري، به.وأخرجه أحمد (15/ 9394)، وابن حبان (2979) من طريق يعقوب بن عبد الرحمن الإسكندراني، عن أبي حازم - وهو سلمة بن دينار - عن سعيد المقبري، به.وأخرجه عن أبي حازم كذلك ابنُه عبد العزيز عند الرامهرمزي في "أمثال الحديث" (28)، والقضاعي في "مسند الشهاب" (424)، والبيهقي في "السنن" 3/ 370.ورواه حماد بن زيد عن أبي حازم كما سيأتي عند المصنف برقم (3643) فجعله من روايته عن سهل بن سعد الساعدي. قال الدارقطني في "العلل" 8/ 133 (1455): فوهمَ فيه، وكان قليل الوهم.وانظر ما سيأتي برقم (3641) و (3642)قوله: "أعذر اللهُ إليه" قال الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 20/ 25: الإعذار: إزالة العُذْر، والمعنى: أنه (أي: الإنسان) لم يبق له اعتذار، كأن يقول: لو مُدَّ لي في الأجل لفعلتُ ما أُمرت به، يقال: أعذَرَ إليه: إذا بلَّغه أقصى الغاية في العذر ومكَّنه منه.
3639 [3] - بل أخرجه البخاري كما سيأتي عند الحديث (3642)، فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.
3640 - حدثنا أبو الحسن علي بن الفضل السامَرِّيُّ ببغداد، حدثنا أبو علي الحَسَن بن عَرَفة العَبْدي، حدثنا عبد الرحمن بن محمد المُحارِبي، عن محمد بن عمرو، عن أبي سَلَمة، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أعمارُ أمَّتي ما بين الستينَ إلى السبعين، وأقلُّهم مَن يَجُوزُ ذلك" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার উম্মতের বয়সকাল ষাট থেকে সত্তর (বছরের) মধ্যে। আর তাদের মধ্যে কম সংখ্যক লোকই তা অতিক্রম করে।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن. محمد بن عمرو: هو ابن علقمة الليثي، وأبو سلمة: هو ابن عبد الرحمن بن عوف.وأخرجه ابن ماجه (4236)، والترمذي (3550)، وابن حبان (2980) من طريق الحسن بن عرفة، بهذا الإسناد. وحسّنه الترمذي والحافظ ابن حجر في "الفتح" 20/ 26.وأخرجه الترمذي (2331) من طريق كامل أبي العلاء، عن أبي صالح، عن أبي هريرة - ولم يقل فيه: "وأقلهم من يجوز ذلك"، وإسناده حسن، وحسّنه الترمذي. مصرَّحًا به في رواية البخاري وغيره. إسحاق بن إبراهيم: هو الدَّبَري.وأخرجه أحمد (13/ 7713) عن عبد الرزاق، بهذا الإسناد.وأخرجه البخاري (6419) من طريق عمر بن علي المقدَّمي، عن معن بن محمد الغفاري، عن سعيد المقبري، به.