আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
3701 - فحدَّثَناه أبو العبَّاس أحمد بن هارون الفقيه، حَدَّثَنَا علي بن عبد العزيز، حَدَّثَنَا عمرو بن عَوْن، حَدَّثَنَا هُشَيم، أخبرنا داود، عن الشَّعْبي، قال: أكثَرَ الناسُ علينا في هذه الآية: {قُلْ لَا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ أَجْرًا إِلَّا الْمَوَدَّةَ فِي الْقُرْبَى} [الشورى: 23]، فكَتبْنا إلى ابن عبَّاس نسألُه عن ذلك، فكتب ابن عبَّاس: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان أوسطَ البيت [1] في قريش، ليس بطنٌ من بطونهم إلَّا قد وَلَدَه، فقال الله عز وجل: {قُل لا أَسْئَلُكُمْ عَلَيْهِ أَجْرًا إِلَّا} ما أدعُوكم إليه إلَّا أن تَودُّوني بقَرَابتي منكم وتَحفَظوني بها [2].قال هُشَيم: وأخبرني حُصَين، عن عِكْرمة، عن ابن عبَّاس بنحوٍ من ذلك [3].هذا حديث لم يُخرجاه بهذه الزِّيادة، وهو صحيحٌ على شرطهما، فإنَّ حديث عِكْرمة صحيح على شرط البخاري، وحديث داود بن أبي هند صحيح على شرط مسلم.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আশ-শা’বি (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: সূরা আশ-শূরা'র এই আয়াত, {বলো, আমি এর (তাবলিগের) বিনিময়ে তোমাদের কাছে কোনো পারিশ্রমিক চাই না, কেবল নিকটাত্মীয়দের প্রতি ভালোবাসা ছাড়া} (সূরা ৪২:২৩) সম্পর্কে লোকেরা আমাদের কাছে খুব বেশি প্রশ্ন করত। তাই আমরা এ বিষয়ে তাঁকে জিজ্ঞেস করে ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে চিঠি লিখলাম। জবাবে ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) লিখলেন: নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুরাইশদের মধ্যে গোত্র হিসেবে সর্বোচ্চ মর্যাদার অধিকারী ছিলেন। তাদের এমন কোনো গোত্র ছিল না, যার সাথে তাঁর আত্মীয়তার বন্ধন ছিল না। তখন আল্লাহ তাআলা বলেন: {বলো, আমি এর বিনিময়ে তোমাদের কাছে কোনো পারিশ্রমিক চাই না,} অর্থাৎ, আমি তোমাদেরকে যেদিকে আহ্বান করি, তার বিনিময়ে কেবল এইটুকুই চাই যে, তোমরা আমার সাথে তোমাদের আত্মীয়তার কারণে আমাকে ভালোবাসবে এবং আমার সাথে আত্মীয়তার হক্ব রক্ষা করবে।
হুশাইম (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: এবং হুসাইন (রাহিমাহুল্লাহ) আমাকে ইকরিমা (রাহিমাহুল্লাহ)-এর সূত্রে ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এর কাছাকাছি বর্ণনা করেছেন।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] كذا في النسخ الخطية: البيت، ووقع عند البيهقي في "الدلائل" وأحمد بن منيع في "مسنده": النسب، وهو أوجه.
[2] إسناده صحيح. علي بن عبد العزيز: هو أبو الحسن البغوي، وداود: هو ابن أبي هند، والشعبي: هو عامر بن شراحيل.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 1/ 185 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد بن منيع في "مسنده" كما في "المطالب العالية" (3707) عن هشيم، به. في "تاريخ دمشق" 22/ 74 من طرق عن الأعمش، بهذا الإسناد.وأخرج أوله - وهو قوله: أنتم المؤمنون، وأنتم أهل الجنة - ابن أبي شيبة 11/ 30 عن عبد الله بن إدريس، عن الأعمش، به.قوله: "تصيبون … " أي تصيبونهم في حروبكم وتأخذونهم سَبْيًا فيسلمون عندكم فيستجيب الله تعالى دعاءَكم لهم.
3701 [3] - إسناده صحيح أيضًا، وحصين: هو ابن عبد الرحمن السلمي.وأخرجه بنحوه الطبراني في "الأوسط" (2018)، و "الصغير" (205) من طريق أبي سعد البقَّال، وفي "الأوسط" (6904) من طريق عبد الأعلى بن عامر الثعلبي، كلاهما عن عكرمة، به. وفي الإسنادين ضعف. في "تاريخ دمشق" 22/ 74 من طرق عن الأعمش، بهذا الإسناد.وأخرج أوله - وهو قوله: أنتم المؤمنون، وأنتم أهل الجنة - ابن أبي شيبة 11/ 30 عن عبد الله بن إدريس، عن الأعمش، به.قوله: "تصيبون … " أي تصيبونهم في حروبكم وتأخذونهم سَبْيًا فيسلمون عندكم فيستجيب الله تعالى دعاءَكم لهم.
3702 - حدثني علي بن عيسى الحِيرِي، حَدَّثَنَا مُسدَّد بن قَطَن، حَدَّثَنَا عثمان بن أبي شَيْبة، حَدَّثَنَا جرير وعبد الله بن إدريس، عن الأعمش، عن شَقِيق بن سَلَمة، عن سَلَمة بن سَبْرة قال: خَطَبَنا معاذُ بن جَبَل فقال: أنتم المؤمنون وأنتم أهلُ الجنة، والله إني لأطمعُ أن يكون عامَّةُ مَن تُصِيبون بفارسَ والرُّومِ في الجنة، فإنَّ أحدَهم يعمل الخيرَ فتقول: أحسنتَ بارك الله فيك، أحسنتَ رَحِمَك الله، واللهُ يقول: {وَيَسْتَجِيبُ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ وَيَزِيدُهُم مَّن فَضْلِهِ} [الشورى: 26] [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.
মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (এক ভাষণে) বললেন: তোমরা মুমিন এবং তোমরাই জান্নাতের অধিবাসী। আল্লাহর কসম! আমি আশা করি যে, পারস্য (ফারিস) ও রোমের (রূম) মধ্যে যাদের সাথে তোমাদের সাক্ষাত হবে (যুদ্ধে), তাদের অধিকাংশই জান্নাতে যাবে। কারণ, তাদের কেউ যখন কোনো ভালো কাজ করে, তখন তোমরা বলো: "তুমি ভালো করেছ, আল্লাহ তোমাকে বরকত দিন," "তুমি ভালো করেছ, আল্লাহ তোমার প্রতি রহম করুন।" আর আল্লাহ তা‘আলা বলেন: “আর যারা ঈমান আনে ও সৎকর্ম করে, তিনি তাদের ডাকে সাড়া দেন এবং নিজ অনুগ্রহে তাদের (প্রতিদান) আরো বাড়িয়ে দেন।” (সূরা শুরা: ২৬)
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده محتمل للتحسين من أجل سلمة بن سبرة، وهو - وإن تفرَّد بالرواية عنه أبو وائل شقيق بن سلمة - تابعيّ كبير، ووثقه العجلي وابن حبان. جرير: هو ابن الحميد.وأخرجه مسدد بن مسرهد في "مسنده" كما في "المطالب العالية" (3706)، والطبري في "تفسيره" 25/ 29، وفي مسند ابن عبَّاس من "تهذيب الآثار" 2/ 666، وأبو القاسم البغوي في "الجعديات" (2693)، والثعلبي في "تفسيره" 8/ 317، والبيهقي في "شعب الإيمان" (72)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 22/ 74 من طرق عن الأعمش، بهذا الإسناد.وأخرج أوله - وهو قوله: أنتم المؤمنون، وأنتم أهل الجنة - ابن أبي شيبة 11/ 30 عن عبد الله بن إدريس، عن الأعمش، به.قوله: "تصيبون … " أي تصيبونهم في حروبكم وتأخذونهم سَبْيًا فيسلمون عندكم فيستجيب الله تعالى دعاءَكم لهم.
3703 - أخبرنا أبو الحسين أحمد عثمان بن يحيى المقرئ ببغداد، حَدَّثَنَا أبو قلابة الرَّقَاشي، حَدَّثَنَا عبد الصمد بن عبد الوارث، حَدَّثَنَا هشام بن أبي عبد الله، حَدَّثَنَا قَتَادة، وتلا قول الله عز وجل: {وَلَوْ بَسَطَ اللَّهُ الرَّزْقَ لِعِبَادِهِ لَبَغَوْا فِي الْأَرْضِ وَلَكِن يُنَزَّلُ بِقَدَرٍ مَا يَشَاءُ} [الشورى: 27]، فقال: حَدَّثَنَا خُلَيد بن عبد الله العَصَري، عن أبي الدَّرداء، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، قال: "ما طَلَعَت شمسٌ قطُّ إِلَّا بُعِثَ بِجَنَبَتيها مَلَكان، إنهما ليُسمِعانِ أهلَ الأرض إلَّا الثَّقَلَين: يا أيها الناسُ، هَلُمُّوا إلى ربِّكم، فإنَّ ما قلَّ وكفى خيرٌ مما كَثُرَ وأَلهى، ولا غَرَبَت شمسٌ قطُّ إِلَّا وبجَنَبَتيها مَلَكانِ يناديان: اللهمَّ عجَّلْ لمُنفِقٍ خَلَفًا، وعَجَّلْ لمُمسِكَ تَلَفًا" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখনই সূর্য উদিত হয়, তখনই তার দুই পাশে দু’জন ফেরেশতাকে প্রেরণ করা হয়। তারা জ্বিন ও মানুষ ব্যতীত পৃথিবীর সকল অধিবাসীকে শোনাতে থাকে: 'হে মানব সকল! তোমাদের রবের দিকে দ্রুত ধাবিত হও। কারণ যা অল্প এবং যথেষ্ট, তা সেই জিনিস থেকে উত্তম যা প্রচুর কিন্তু গাফেল করে।' আর যখনই সূর্য অস্ত যায়, তখনই তার দুই পাশে দু’জন ফেরেশতা ঘোষণা করতে থাকে: 'হে আল্লাহ! যারা দান করে, তাদের জন্য প্রতিদান দ্রুত দান করো, আর যারা কৃপণতা করে (সঞ্চয় করে রাখে), তাদের জন্য দ্রুত ধ্বংস দাও।'"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده حسن من أجل خليد العصري، وأبو قلابة الرقاشي - وهو عبد الملك بن محمد البصري - لا بأس به قوي الحديث.وأخرجه أحمد 36/ (21721)، وابن حبان (686) و (3329) من طرق عن قتادة بهذا الإسناد - ولم يذكروا فيه التلاوة، وهي مما انفرد به عبد الصمد عن هشام بن أبي عبد الله الدَّستوائي، فقد رواه عن هشام أبو داود الطيالسي في "مسنده" (1072)، وابنه معاذ الدستوائي عند الطبري في "تهذيب الآثار - مسند ابن عبّاس" 1/ 267 و 269 وابن السُّني في "القناعة" (32)، فلم يذكرا في حديثه التلاوة.ويشهد لآخره في الدعاء للمنفق والممسك حديث أبي هريرة عند البخاري (1442) ومسلم (1010)، لكن بذكر الإصباح مكان الغروب.الجَنَبَة: الجانب والناحية. والثَّقلان: الإنس والجن.
3704 - حدثني عبد الله بن سعد الحافظ، حَدَّثَنَا إبراهيم بن أبي طالب، حَدَّثَنَا أبو كُرَيب، حَدَّثَنَا أبو معاوية، عن الأعمش، عن مجاهد، عن عبد الله بن سَخْبَرة، عن علي قال: ما أصبحَ بالكوفة أحدٌ إِلَّا ناعمٌ، إنَّ أدناهم منزلةً يشرب من ماء الفُرَات، ويجلس في الظِّل، ويأكل من البُرِّ، وإنما أُنزِلَت هذه الآية في أصحاب الصُّفَّة: {وَلَوْ بَسَطَ اللَّهُ الرَّزْقَ لِعِبَادِهِ لَبَغَوْا فِي الْأَرْضِ وَلَكِن يُنَزَّلُ بِقَدَرٍ مَا يَشَاءُ}، وذلك أنهم قالوا: لو أنَّ لنا؛ فتَمَنَّوُا الدنيا [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: কুফাতে এমন কোনো ব্যক্তি ভোর করে না যে সুখে নেই। তাদের মধ্যে নিম্নতম মর্যাদার ব্যক্তিটিও ফুরাতের পানি পান করে, ছায়ায় বসে এবং গম খায়। এই আয়াতটি আসহাবুস্ সুফ্ফার ব্যাপারে নাযিল হয়েছে: "আল্লাহ্ যদি তাঁর বান্দাদের জন্য রিয্ক প্রশস্ত করে দিতেন, তবে তারা পৃথিবীতে বিদ্রোহ সৃষ্টি করত। বরং তিনি যা ইচ্ছা করেন, সঠিক পরিমাণে (পরিমিতভাবে) নাযিল করেন।" কারণ তারা বলেছিল: 'যদি আমাদেরও (সম্পদ) থাকত,'—এভাবে তারা দুনিয়ার আকাঙ্ক্ষা করেছিল।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] ضعيف، وإن كان ظاهر إسناده الصحة، فإنَّ أبا كريب - وهو محمد بن العلاء الهَمْداني - قد سَلَكَ فيه الجادّة فرواه عن أبي معاوية - وهو محمد بن خازم الضرير - عن الأعمش، وخالفه ثلاثة من الثقات الجِبال، وهم ابن أبي شيبة في "مصنفه" 13/ 285، وأحمد بن حنبل في "فضائل الصحابة" (883)، وهنّاد بن السَّري في "الزهد" (699)، فروَوه عن أبي معاوية عن ليث بن أبي سليم عن مجاهد عن ابن سخبرة عن علي، وليث سيئ الحفظ ضعيف في التفرد.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (9848) عن أبي عبد الله الحاكم، بإسناده ومتنه.
3705 - حدثني أبو بكر إسماعيل بن محمد بن إسماعيل الفقيه بالرَّيّ، حَدَّثَنَا محمد بن الفَرَج، حَدَّثَنَا حجَّاج بن محمد، حَدَّثَنَا يونس بن أبي إسحاق، حَدَّثَنَا أبو إسحاق، عن أبي جُحَيفة، عن علي قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن أصاب ذنبًا، في الدنيا، فعُوقِبَ به، فالله أعدلُ من أن يُثنِّيَ عقوبتَه على عبدِه، ومَن أذنب ذنبًا، فَسَتَرَ اللهُ عليه وعَفَا عنه، فاللهُ أكرمُ من أن يعودَ في شيءٍ عَفَا عنه" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.وإنما أخرجه إسحاقُ بن إبراهيم [2] عند قوله عز وجل: {وَمَا أَصَابَكُم مَّن مُّصِيبَةٍ فَبِمَا كَسَبَتْ أَيْدِيكُمْ} [الشورى: 30].
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি দুনিয়াতে কোনো গুনাহ করে এবং এর কারণে সে শাস্তি ভোগ করে, আল্লাহ এর চেয়েও অধিক ন্যায়পরায়ণ যে তিনি তাঁর বান্দার উপর সেই শাস্তি দ্বিতীয়বার আরোপ করবেন। আর যে ব্যক্তি কোনো গুনাহ করে, অতঃপর আল্লাহ তা গোপন রাখেন এবং তাকে ক্ষমা করে দেন, আল্লাহ এর চেয়েও অধিক সম্মানিত (ও দয়ালু) যে তিনি ক্ষমা করে দেওয়া কোনো বিষয়ে পুনরায় ফিরে আসবেন (অর্থাৎ শাস্তি দেবেন)।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده حسن من أجل يونس بن أبي إسحاق ومحمد بن الفرج - وهو أبو بكر الأزرق - وهذا الأخير قد توبع فيما سلف عند المصنّف برقم (13). وسيأتي مكررًا برقم (7871) و (8364).
[2] يعني في "تفسيره"، وإسحاق بن إبراهيم هذا: هو الإمام المعروف بابن راهويه.
3706 - أخبرني أحمد بن سهل الفقيه ببُخارَى، حَدَّثَنَا صالح بن محمد بن حَبيب الحافظ، حَدَّثَنَا يعقوب بن إبراهيم وأحمد بن مَنِيع وزياد بن أيوب قالوا: حَدَّثَنَا هُشَيم، أخبرنا منصور بن زاذانَ، عن الحسن، عن عِمران بن حُصَين؛ قال [1]: دَخَلَ عليه بعضُ أصحابه وقد ابتُلِيَ في جسده، فقال له بعضهم: إنا لَنَبْتَئِسُ لك لِما نَرَى فيك، قال: فلا تَبتئِسْ لما تَرى، فإنَّ ما تَرى بذنبٍ، وما يَعفُو اللهُ عنه أكثرُ، قال: ثم تلا عِمرانُ هذه الآية: {وَمَا أَصَابَكُمْ مِنْ مُصِيبَةٍ فَبِمَا كَسَبَتْ أَيْدِيكُمْ وَيَعْفُو عَنْ كَثِيرٍ} إلى آخر الآية [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর কিছু সাথী তাঁর কাছে প্রবেশ করলেন যখন তিনি তাঁর শরীরে (শারীরিক) কষ্টে আক্রান্ত ছিলেন। তখন তাঁদের কেউ কেউ তাঁকে বললেন: আমরা আপনার জন্য দুঃখিত যা আমরা আপনার মধ্যে দেখছি (অর্থাৎ আপনার কষ্ট)। তিনি বললেন: তোমরা দুঃখিত হয়ো না, যা তোমরা দেখছ তার জন্য। কেননা যা তোমরা দেখছ তা কোনো গুনাহের ফলস্বরূপ, আর আল্লাহ যা ক্ষমা করে দেন, তা এর চেয়ে অনেক বেশি। তিনি বললেন, অতঃপর ইমরান এই আয়াতটি তিলাওয়াত করলেন: "তোমাদের উপর যে বিপদই আসুক না কেন, তা তোমাদের হাতের কামাই করা ফলস্বরূপ, আর তিনি অনেক কিছু ক্ষমা করে দেন" আয়াতের শেষ পর্যন্ত।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] القائل هو الحسن: وهو ابن أبي الحسن البصري.
[2] رجاله عن آخرهم ثقات، في سماع الحسن البصري من عمران خلاف والجمهور على أنه لم يسمع منه، أما المصنّف فقد جزم في غير موضع من كتابه بسماعه منه. يعقوب بن إبراهيم: هو الدَّورقي الحافظ.وأخرجه بنحوه ابن أبي الدنيا في "المرض والكفارات" (249)، ومن طريقه البيهقي في "شعب الإيمان" (9356) عن فضيل بن عبد الوهاب، عن هشيم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي الدنيا أيضًا في "الرضا عن الله بقضائه" (61) من طريق يونس بن عبيد، والبيهقي في "الشعب" (9500) من طريق المبارك بن فضالة، كلاهما عن الحسن، به - إلّا أنَّ المبارك قال في حديثه عن الحسن: دخلنا على عمران والمبارك ليس بذاك القوي وكان معروفًا بالتدليس، وقد ذكر الإمام أحمد أنه كان ينفرد من بين أصحاب الحسن فيذكر صيغ التحديث والإخبار بينه وبين عمران في بعض ما يرويه عنه.
3707 - حَدَّثَنَا أبو زكريا العَنبَري، حَدَّثَنَا محمد بن عبد السلام، حَدَّثَنَا إسحاق، أخبرنا جَرِير، عن الأعمش، عن أبي ظَبْيان قال: كنا نَعْرِضُ المصاحفَ عند عَلْقمة، فقرأ هذه الآية: (إنَّ في ذلك لآياتٍ للمُوقِنينَ) [1] فقال: قال عبد الله: اليقينُ الإيمانُ كلُّه، وقرأ هذه الآية: {إِنَّ فِي ذَلِكَ لَآيَاتٍ لِكُلِّ صَبَّارٍ شَكُورٍ} [الشورى: 33]، قال: فقال عبد الله: الصبرُ نصفُ الإيمان [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু যাবইয়ান (Abu Ẓabyān) বলেন: আমরা আলক্বামার (Alqamah) কাছে কুরআন শরীফের কপিগুলো (মুসহাফ) প্রদর্শন করতাম। তখন তিনি এই আয়াতটি পাঠ করলেন: (নিশ্চয় এতে নিদর্শনাবলী রয়েছে নিশ্চিত বিশ্বাসীদের জন্য)। এরপর তিনি বললেন: আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন, ‘ইয়াকীন’ (নিশ্চিত বিশ্বাস) হলো সম্পূর্ণ ঈমান। আর তিনি এই আয়াতটি পাঠ করলেন: (নিশ্চয় এতে নিদর্শনাবলী রয়েছে প্রত্যেক পরম ধৈর্যশীল, পরম কৃতজ্ঞের জন্য) [সূরা আশ-শূরা: ৩৩]। তিনি (আব্দুল্লাহ) বললেন: ধৈর্য (সবর) হলো ঈমানের অর্ধেক।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] ليست هذه في التلاوة، وقد جاء قوله: (إنَّ في ذلك لآيات) في عدة آيات ليس فيها (للموقنين)، أما قوله: (للموقنين) فهو في الآية (20) من سورة الذاريات: {وَفِي الْأَرْضِ آيَاتٌ لِلْمُوقِنِينَ}.
[2] إسناده صحيح. إسحاق: هو ابن راهويه، وجرير: هو ابن عبد الحميد، وأبو ظبيان: هو حُصين بن جُندب الجَنْبي، وعلقمة: هو ابن قيس النَّخَعي، وعبد الله: هو ابن مسعود.وأخرجه - دون ذكر التلاوة فيه - وكيع في "الزهد" (203)، وعبد الله بن أحمد في "السنة" (817)، والخلّال في "السنة" (1509)، والطبراني في "الكبير" (8544)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (47) و (9266) من طرق عن الأعمش، بهذا الإسناد عن عبد الله بن مسعود قال: الصبر نصف الإيمان، واليقين الإيمان كله. وعلَّق الشطر الثاني منه البخاري في "صحيحه" في أول كتاب الإيمان عن ابن مسعود بلا إسناد.وروي هذا مرفوعًا ولا يصح، فقد أخرجه ابن الأعرابي في "معجمه" (592)، وابن شاهين في "الترغيب في فضائل الأعمال" (270)، وتمام الرازي في "فوائده" (1083)، واللالكائي في "أصول الاعتقاد" (1682)، وأبو نعيم في "الحلية" 5/ 34، والقضاعي في "مسند الشهاب" (158)، والبيهقي في "الشعب" (9265)، والخطيب البغدادي في "تاريخه" 15/ 302، وقوام السنة في "الترغيب والترهيب" (1609)، وابن الجوزي في "العلل المتناهية" (1364)، وابن حجر في "تغليق التعليق" 2/ 22 - 23 من طريق يعقوب بن حميد بن كاسب، عن محمد بن خالد المخزومي، عن سفيان الثوري، عن زبيد الياميّ، عن أبي وائل شقيق بن سلمة، عن ابن مسعود، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم.وهذا إسناد لا يثبت كما قال الحافظ ابن حجر، فقد تفرَّد به محمد بن خالد المخزومي، وهو مجهول انفرد بالرواية عنه يعقوب بن كاسب، وذكره ابن حبان في "ثقاته" 9/ 59 وقال: ربما رفع وأسند، وقال ابن الجوزي: مجروح. ويعقوب بن حميد بن كاسب ضعيف عند التفرُّد، وقال الحافظ أبو علي النيسابوري - كما في "تغليق التعليق" -: هذا حديث منكر لا أصل له من حديث زبيد ولا من حديث الثوري.
3708 - أخبرنا أبو زكريا العنبري، حَدَّثَنَا محمد بن عبد السلام، حَدَّثَنَا إسحاق ابن إبراهيم، أخبرنا الفضل بن موسى، حَدَّثَنَا عيسى بن عُبيد، عن الرَّبيع بن أنس، عن أبي العاليَةِ، قال: حدثني أُبيُّ بن كعب قال: لما كان يومُ أُحدٍ أُصيبَ من الأنصار أربعةٌ وستون، ومنهم ستةٌ فيهم حمزةُ، فمَثَّلوا بهم، فقالت الأنصار: لئِن أَصَبْنا منهم يومًا مثل هذا لنُربِيَنَّ عليهم، فلما كان يومُ فتح مكةَ أَنزل الله: {وَإِنْ عَاقَبْتُمْ فَعَاقِبُوا بِمِثْلِ مَا عُوقِبْتُمْ بِهِ وَلَئِنْ صَبَرْتُمْ لَهُوَ خَيْرٌ لِلصَّابِرِينَ} [النحل: 126] [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
উবাই ইবনু কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন উহুদের দিন এলো, আনসারদের মধ্য থেকে চৌষট্টি জন শহীদ হন, আর তাদের (শহীদদের) মধ্যে ছয়জন ছিলেন, যাদের মধ্যে হামযাও ছিলেন। এরপর শত্রুরা তাদের (শহীদদের) অঙ্গ-প্রত্যঙ্গ বিকৃত করে ফেলে। তখন আনসারগণ বললেন: যদি কোনো একদিন আমরা তাদের উপর (শত্রুদের উপর) এইরকম আঘাত হানার সুযোগ পাই, তবে আমরা অবশ্যই এর চেয়েও বেশি প্রতিশোধ নেব। এরপর যখন মক্কা বিজয়ের দিন এলো, আল্লাহ্ তা‘আলা তখন এই আয়াত নাযিল করলেন: "আর যদি তোমরা প্রতিশোধ গ্রহণ করো, তবে ঠিক ততটুকু প্রতিশোধ নাও, যতটুকু তোমাদের প্রতি করা হয়েছে। কিন্তু যদি তোমরা সবর করো, তবে তা সবরকারীদের জন্য উত্তম।" (সূরা নাহল: ১২৬)
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده حسن من أجل عيسى بن عبيد. وهو مكرر (3408). وذكر هذا الحديث هنا لا وجه له.
3709 - حَدَّثَنَا أبو العبَّاس محمد بن يعقوب، حَدَّثَنَا الحسن بن علي بن عفَّان العامِري، حَدَّثَنَا يحيى بن فَصِيل، حَدَّثَنَا الحسن بن صالح بن حيٍّ، عن عبد الله بن محمد بن عَقِيل، عن جابر بن عبد الله: {وَإِنَّكَ لَتَهْدِى إِلَى صِرَاطٍ مُّسْتَقِيمٍ} [الشورى: 52]، قال: الصراطُ المستقيم هو الإسلامُ، وهو أوسعُ ما بينَ السماءِ والأرضِ [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
জাবির ইবনু আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: (আল্লাহর বাণী) "{وَإِنَّكَ لَتَهْدِى إِلَى صِرَاطٍ مُّسْتَقِيمٍ}" [সূরা শুরা: ৫২] অর্থাৎ, 'আর আপনি অবশ্যই সরল পথের দিকে পথপ্রদর্শন করেন।' তিনি বলেন, সরল পথ হলো ইসলাম, আর তা আকাশ ও পৃথিবীর মধ্যবর্তী স্থানের চেয়েও প্রশস্ত।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده محتمل للتحسين من أجل عبد الله بن محمد بن عقيل.وقد سلف برقم (3061) من طريق أبي نعيم عن الحسن بن صالح.
3710 - أخبرنا أبو بكر الشافعي، حَدَّثَنَا إسحاق بن الحسن، حَدَّثَنَا أبو حُذيفة، حَدَّثَنَا سفيان، عن منصور، عن أبي وائل، عن عبد الله في قوله عز وجل: {وَإِنَّكَ لَتَهْدِى إلَى صِرَاطٍ مُسْتَقِيمٍ}، قال: كتابُ الله عز وجل [1]. 43 - ومن تفسير سورة الزخرفبسم الله الرحمن الرحيمحَدَّثَنَا الحاكم أبو عبد الله محمد بن عبد الله الحافظ إملاءً في شوّال سنة أربع مئة:
আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে আল্লাহ্ তা‘আলার এই বাণী: {وَإِنَّكَ لَتَهْدِى إلَى صِرَاطٍ مُسْتَقِيمٍ} (আর নিশ্চয়ই আপনি সরল পথের দিকেই পথপ্রদর্শন করে থাকেন) সম্পর্কে বর্ণিত। তিনি বলেন: (তা হলো) আল্লাহ্ তা‘আলার কিতাব। ৪৩ - এবং সূরা আয-যুখরুফের তাফসীর থেকে। বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহীম। চারশত হিজরীর শওয়াল মাসে আল-হাকিম আবু আবদুল্লাহ মুহাম্মাদ ইবন আবদুল্লাহ আল-হাফিজ আমাদেরকে তা ইমলা (শ্রুতিলেখনের মাধ্যমে) করিয়েছেন।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل أبي حذيفة - وهو موسى بن مسعود النهدي - وقد توبع فيما سلف برقم (3060).
3711 - أخبرنا أبو عَوْن محمد بن أحمد الجزّار بمكة، حَدَّثَنَا محمد بن علي بن زيد، حَدَّثَنَا سعيد بن منصور، حَدَّثَنَا أبو عَوَانة، عن أبي بِشْر، عن سعيد بن جُبير قال: قلت لابن عباس: {وَجَعَلُوا الْمَلَائِكَةَ الَّذِينَ هُمْ عِبَادُ الرَّحْمَنِ} [الزخرف: 19] أو (عندَ الرَّحمنِ)؟ فقال: عِبادُ الرَّحمن، قلت: هو في مُصحَفي: (عندَ الرَّحمنِ)! قال: فامحُها واكتُبْ: عِبادُ الرَّحمن [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সাঈদ ইবনে জুবাইর (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমি ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞাসা করলাম, (সূরা যুখরুফের ১৯ নং আয়াতে) "আর তারা ফেরেশতাদেরকে স্থির করেছে, যারা দয়াময়ের বান্দা..." এই আয়াতটি কি {عِبَادُ الرَّحْمَنِ} (ইবাদুর রাহমান/দয়াময়ের বান্দা) নাকি {عِنْدَ الرَّحْمَنِ} (ইনদ আর-রাহমান/দয়াময়ের নিকট)? তিনি বললেন: {عِبَادُ الرَّحْمَنِ} (ইবাদুর রাহমান)। আমি বললাম: আমার মুসহাফে তো {عِنْدَ الرَّحْمَنِ} (ইনদ আর-রাহমান) লেখা আছে! তিনি বললেন: তাহলে ওটা মুছে দাও এবং {عِبَادُ الرَّحْمَنِ} (ইবাদুর রাহমান) লেখো।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. أبو عوانة: هو وضاح اليشكري، وأبو بشر: هو جعفر بن أبي وحشية.وقراءة (عند الرَّحمن) بالنون قرأ بها من السبعة ابن كثير ونافع وابن عامر. انظر "السبعة في القراءات" لابن مجاهد ص 585.
3712 - حَدَّثَنَا أبو عبد الله محمد بن يعقوب، حَدَّثَنَا محمد بن عبد الوهاب، حَدَّثَنَا يعلى بن عُبيد، حَدَّثَنَا ابن إسحاق، عن الصَّبّاح بن محمد، عن مُرَّةَ، عن عبد الله: {أَهُمْ يَقْسِمُونَ رَحْمَتَ رَبِّكَ نَحْنُ قَسَمْنَا بَيْنَهُم} الآية [الزخرف: 32]، فقال عبد الله: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "إنَّ الله قَسَمَ بينكم أخلاقَكم كما قَسَمَ بينكم أرزاقَكم، وإِنَّ الله يُغطي الدنيا مَن أحبَّ ومن لا يُحِبُّ، ولا يُعطي الدِّينَ إِلَّا من يحبُّ، فمن أعطاه الدِّينَ فقد أحبَّه" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (তিনি সূরা যুখরুফের ৩২ নং আয়াত উল্লেখ করে বলেন): {তারাই কি আপনার রবের করুণা বণ্টন করে? আমিই তাদের মাঝে বণ্টন করে দিয়েছি...}। এরপর আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: “নিশ্চয়ই আল্লাহ তোমাদের মধ্যে তোমাদের চরিত্রসমূহ বণ্টন করে দিয়েছেন, যেভাবে তিনি তোমাদের মধ্যে তোমাদের জীবিকা (রিযিক) বণ্টন করেছেন। আর নিশ্চয়ই আল্লাহ দুনিয়া দান করেন যাকে তিনি ভালোবাসেন এবং যাকে তিনি ভালোবাসেন না। কিন্তু তিনি দীন (ধর্ম) দান করেন না, শুধুমাত্র যাকে তিনি ভালোবাসেন তাকে ছাড়া। সুতরাং, যাকে তিনি দীন দান করেছেন, তাকে তিনি অবশ্যই ভালোবেসেছেন।”
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] صحيح موقوفًا كما سلف بيانه برقم (94)، وهذا إسناد ضعيف لضعف الصباح بن محمد: وهو ابن أبي حازم البجلي. ابن إسحاق: هو أبان بن إسحاق الأسدي الهمداني، ومُرَّة: هو ابن شراحيل، وعبد الله: هو ابن مسعود.وأخرجه أحمد 6/ (3672) عن محمد بن عبيد الطنافسي أخي يعلى، عن أبان بن إسحاق، بهذا الإسناد بأطول ممّا هنا.وسيأتي برقم (7488) من طريق إبراهيم بن إسحاق الزهري عن يعلى ومحمد ابني عبيد.
3713 - أخبرنا الشيخ أبو بكر بن إسحاق، حَدَّثَنَا الحسن بن علي بن زياد، حَدَّثَنَا محمد بن عبيد بن حِسَاب، حَدَّثَنَا محمد بن ثَوْر، عن مَعمَر، عن قَتَادة: أنه تلا هذه الآية: {فَإِمَّا نَذْهَبَنَّ بِكَ فَإِنَّا مِنْهُمْ مُنْتَقِمُونَ} [الزخرف: 41] فقال: قال أنس: ذَهَبَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وَبِقَيت النِّقمةُ، ولم يُرِ اللهُ نبيَّه صلى الله عليه وسلم في أمَّته شيئًا يكرهُه حتَّى مَضَى، ولم يكن نبيٌّ إلَّا قد رأى العقوبةَ في أمَّته إلَّا نبيَّكم صلى الله عليه وسلم [1].صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি এই আয়াতটি তিলাওয়াত করলেন: {যদি আমি আপনাকে নিয়ে যাই, তবুও আমি তাদের থেকে প্রতিশোধ গ্রহণ করবই} [সুরা যুখরুফ: ৪১]। অতঃপর তিনি (আনাস) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তেকাল করেছেন এবং প্রতিশোধ বাকি রয়ে গেছে। আল্লাহ তাঁর নবীকে (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর উম্মতের মধ্যে এমন কিছু দেখতে দেননি যা তিনি অপছন্দ করতেন, যতক্ষণ না তিনি চলে গেছেন। এমন কোনো নবী ছিলেন না, যিনি তাঁর উম্মতের মধ্যে শাস্তি দেখেননি, কেবল তোমাদের নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ব্যতীত।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] خبر صحيح لكن من قول قتادة، وذكرُ أنس فيه وهمٌ لعلّه من محمد بن عبيد بن حساب أو ممّن دونه، فقد رواه يونس بن عبد الأعلى عن محمد بن ثور عند الطبري في "تفسيره" 25/ 75 فلم يجاوز به قتادة، وكذلك رواه عبد الرزاق في "تفسيره" 2/ 197 عن معمر عن قتادة لم يجاوزه.وأما إسناد المصنّف فحسن إن شاء الله، رجاله ثقات غير الحسن بن علي بن زياد السُّرّي، فقد روى عنه جمع ولم يؤثر فيه جرح أو تعديل، وهو في الغالب متابع فيما يرويه.
3714 - حدثني علي بن عيسى الحِيرِي، حَدَّثَنَا مسدَّد بن قَطَن، حَدَّثَنَا عثمان بن أبي شَيْبة، حَدَّثَنَا معاوية بن هشام، حَدَّثَنَا سفيان، حَدَّثَنَا المُغيرة بن النُّعمان، عن سعيد بن جُبير، عن ابن عبَّاس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يُؤْخَذُ بناسٍ من أصحابي ذاتَ الشِّمال فأقول: أصحابي أصحابي! فيقال: إنَّهم لم يزالوا مُرتدِّين على أعقابهم بعدَك، فأقولُ كما قال العبدُ الصالحُ عيسى ابن مريمَ: {وَكُنْتُ عَلَيْهِمْ شَهِيدًا مَا دُمْتُ فِيهِمْ فَلَمَّا تَوَفَّيْتَنِي كُنْتَ أَنْتَ الرَّقِيبَ عَلَيْهِمْ} [المائدة: 117] " [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه!
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার কতিপয় সাহাবীকে বাম দিকে (জাহান্নামের দিকে) টেনে নেওয়া হবে। তখন আমি বলব: হে আমার সাহাবীগণ! হে আমার সাহাবীগণ! তখন বলা হবে: নিশ্চয়ই তারা আপনার পরে (মৃত্যুর পর) পেছনে ফিরে গিয়ে মুরতাদ হয়ে গিয়েছিল। তখন আমি সেই সৎ বান্দা ঈসা ইবনে মারইয়াম (আঃ)-এর মতো বলব: 'আমি তাদের উপর সাক্ষী ছিলাম যতক্ষণ আমি তাদের মধ্যে ছিলাম। অতঃপর যখন আপনি আমাকে তুলে নিলেন, আপনিই ছিলেন তাদের উপর পর্যবেক্ষক।' (সূরা মায়েদা: ১১৭)"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل معاوية بن هشام، وقد توبع. سفيان: هو الثوري.وأخرجه البخاري (3349) و (3447) و (4626)، والترمذي (2423)، والنسائي (11095) من طرق عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد - مجموعًا إليه الحديث السالف برقم (3032). وأخرجه كذلك أحمد 4 / (2096) و (2281)، والبخاري (4625) و (4740) و (6526)، ومسلم (2860) (58)، والترمذي (2423) و (3167)، والنسائي (2225) و (11274)، وابن حبان (7347) من طريق شعبة، عن المغيرة بن النعمان، به فاستدراك الحاكم له ذهول منه.
3715 - أخبرنا الحسن بن يعقوب العَدْل، حَدَّثَنَا محمد بن عبد الوهاب الفرَّاء، حَدَّثَنَا جعفر بن عَوْن، أخبرنا الحجَّاج بن دينار، عن أبي غالب، عن أبي أُمامة قال: قال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم: "ما ضَلَّ قومٌ بعد هدًى إلَّا أُوتُوا الجَدَل"، ثم قرأَ رسول الله صلى الله عليه وسلم: {مَا ضَرَبُوهُ لَكَ إِلَّا جَدَلًا بَلْ هُمْ قَوْمٌ خَصِمُونَ} [الزخرف: 58] [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবূ উমামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে জাতিই হেদায়াত (সঠিক পথ) লাভ করার পর পথভ্রষ্ট হয়েছে, তারা কেবল বিতর্কেই লিপ্ত হয়েছে।" এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তিলাওয়াত করলেন: "তারা তোমার কাছে কেবল বিতর্কের জন্যই তা পেশ করেছে। বস্তুত তারা হলো ঝগড়াটে জাতি।" [সূরা আয-যুখরুফ: ৫৮]
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده حسن في المتابعات والشواهد من أجل أبي غالب - وهو البصري نزيل أصبهان - فإنه ليس بذاك القوي، وقد توبع، ومن دونه لا بأس بهم.وأخرجه أحمد 36/ (22164) و (22204) و (22205)، وابن ماجه (48)، والترمذي (3253) من طرق عن حجاج بن دينار، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن صحيح.وأخرجه ابن أبي حاتم في "تفسيره" - كما في "تفسير ابن كثير" 7/ 222 - وابن بطة في "الإبانة الكبرى" 2/ 485 من طريق مؤمّل بن إسماعيل، عن حماد بن زيد، عن أبي مخزوم، عن القاسم بن عبد الرحمن الشامي، عن أبي أمامة، قال حماد: لا أدري رفعه أم لا. وهذا إسناد يصلح للاعتبار إن شاء الله على جهالة في أبي مخزوم - واسمه حماد كما قال ابن صاعد شيخ ابن بطة فيه - ومؤمّل بن إسماعيل في حفظه كلام.
3716 - حَدَّثَنَا محمد بن صالح بن هانئ، حَدَّثَنَا الحسين بن الفَضْل، حَدَّثَنَا محمد بن سابق، حَدَّثَنَا إسرائيل، عن سِمَاك بن حَرْب، عن عِكْرمة، عن ابن عبَّاس في قوله عز وجل: {وإنَّه لَعَلَمٌ لِلسَّاعةِ} [الزخرف: 61]، قال: خروجُ عيسى ابن مريمَ [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه [2].
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ্ আযযা ওয়া জাল্লার বাণী: "এবং নিশ্চয়ই সে (ঈসা) হলো কিয়ামতের নিদর্শন" [সূরা যুখরুফ: ৬১] সম্পর্কে তিনি বলেন: (এর দ্বারা উদ্দেশ্য) ঈসা ইবনে মারইয়াম (আঃ)-এর আগমন।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل سماك بن حرب، وقد توبع.فقد أخرجه بنحوه عبد الرزاق في "تفسيره" 2/ 198 - 199، وأبو عمرو الداني في "السنن الواردة في الفتن" (591) من طريق سفيان بن عيينة، عن عمرو بن دينار، عن عكرمة به. وانظر ما سلف برقم (3040).
[2] رُمِّج هذا الحكم في (ز)، وهو ثابت في بقية النسخ الخطية.
3717 - حَدَّثَنَا أبو القاسم الحسن بن محمد السَّكُوني بالكوفة، حَدَّثَنَا عُبيد بن كَثير العامري، حَدَّثَنَا يحيى بن محمد بن عبد الله الدارِمي، حَدَّثَنَا عبد الرزاق، أخبرنا ابن عُيَينة [عن محمد بن سُوقَة] [1] عن محمد بن المُنكدِر، عن جابر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: {وَإِنَّهُ لَعِلْمٌ لِلسَّاعَةِ}، فقال: "النجومُ أمانٌ لأهل السماء، فإذا ذهبتْ أتاها ما يُوعَدون، وأنا أمانٌ لأصحابي ما كنتُ، فإذا ذهبتُ أتاهم ما يُوعَدون، وأهلُ بيتي أمانٌ لأمَّتي، فإذا ذهب أهلُ بيتي أتاهم ما يُوعَدون" [2]. صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: {এবং নিশ্চয়ই তা (ঈসা আঃ-এর আগমন) কিয়ামতের নিদর্শন} – এরপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তারকারাজি আসমানবাসীর জন্য নিরাপত্তা। যখন তা (তারকারাজি) বিলুপ্ত হয়ে যাবে, তখন তাদের ওপর সেই মহাবিপদ এসে পড়বে যার প্রতিশ্রুতি তাদের দেওয়া হয়েছে। আর আমি যতদিন তাদের মাঝে আছি, আমি হলাম আমার সাহাবীগণের জন্য নিরাপত্তা। যখন আমি চলে যাব, তখন তাদের ওপর সেই মহাবিপদ এসে পড়বে যার প্রতিশ্রুতি তাদের দেওয়া হয়েছে। আর আমার আহলে বাইত (পরিবার-পরিজন) হলো আমার উম্মতের জন্য নিরাপত্তা। যখন আমার আহলে বাইত চলে যাবে, তখন তাদের ওপর সেই মহাবিপদ এসে পড়বে যার প্রতিশ্রুতি তাদের দেওয়া হয়েছে।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] ما بين المعقوفين سقط من نسخنا الخطية، واستدركناه من "التلخيص" و "إتحاف المهرة" (3739).
[2] إسناده ضعيف جدًّا من أجل عبيد بن كثير فإنه متروك الحديث، وبه أعلّه الذهبي في "تلخيصه" فقال: أظنه موضوعًا وعبيد متروك والآفة منه. قلنا: وشيخه يحيى بن محمد لم نقف له على ترجمة، ومن فوقه ثقات إلَّا أنه مضطرب فيه علة محمد بن سوقة.فهذا الخبر في "تفسير عبد الرزاق" 2/ 199 عن سفيان بن عيينة، عن محمد بن سوقة وسهيل بن أبي صالح، عن محمد بن المنكدر، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم مرسلًا - إلّا أنه قال في آخره مكان "أهل بيتي": "أصحابي"، وهو المحفوظ.ورواه عبد الله بن عمرو بن مرة عن محمد بن سوقة فيما سيأتي برقم (6039)، فجعله من رواية محمد بن المنكدر عن أبيه عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، وذكر فيه أهل البيت مكان الأصحاب. وفي هذا السند مقالٌ على ما يأتي.ورواه الصبّاح بن محارب عند الطبراني في "الأوسط" (4074)، والقاسم بن غصن عنده أيضًا (6687)، كلاهما عن محمد بن سوقة، عن علي بن أبي طلحة عن ابن عبَّاس، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وذكرا فيه الأصحابَ مكان أهل البيت. والقاسم ضعيف والصباح صدوق.وقد خالفهما عبد الله بن المبارك - وهو إمام حُجّة - فرواه في "الزهد" (569) عن محمد بن سوقة، عن علي بن أبي طلحة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم مرسلًا. وذكر فيه الأصحاب.فهذا الخبر من طريق محمد بن سوقة مضطرب كما ترى.وفي الباب عن سلمة بن الأكوع فيما أخرجه الروياني في "مسنده" (1152) و (1164) و (1165)، وابن الأعرابي في "معجمه" (2079)، والطبراني في "الكبير" (2260) وغيرهم من طريق موسى بن عبيدة الرَّبَذي، عن إياس بن سلمة، عن أبيه سلمة بن الأكوع مرفوعًا مختصرًا بلفظ: "النجوم أمان لأهل السماء، وأهل بيتي أمان لأهل الأرض". وموسى بن عبيدة متفق على ضعفه منكر الحديث.وبنحوه عن علي بن أبي طالب مرفوعًا فيما أخرجه عبد الله بن أحمد في "فضائل الصحابة" (1145) من طريق عبد الملك بن هارون بن عنترة، عن أبيه، عن جده، عن علي بن أبي طالب. وعبد الملك بن هارون متهم بالكذب والوضع.وكذلك أخرجه عبد الخالق بن أسد في "معجمه" (435) بإسناد مسلسل بالخلفاء العبَّاسيين إلى ابن عبَّاس عن علي بن أبي طالب مرفوعًا. وفيه الحسين بن عبيد الله الأبزاري، وهو متهم بالكذب أيضًا.ويغني عن هذه الأحاديث حديثُ أبي موسى الأشعري: أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم رفع رأسه إلى السماء، وكان كثيرًا ممّا يرفع رأسَه إلى السماء، فقال: "النجوم أمَنةٌ للسماء، فإذا ذهبت النجوم أتى السماءَ ما توعد، وأنا أمَنةٌ لأصحابي، فإذا ذهبتُ أتى أصحابي ما يوعدون، وأصحابي أمَنةٌ لأمتي، فإذا ذهب أصحابي أتى أمتي ما يوعدون"، أخرجه أحمد 32/ (19566)، ومسلم (2531)، وابن حبان (7249) وغيرهم. وهو أصح حديث في الباب، وذكر فيه قصة انتظارهم صلاة العشاء بنحو ما سيأتي في رواية محمد بن المنكدر عن أبيه.وأخرجه بنحو حديث أبي موسى: الطبراني في "الكبير" (11023)، وفي "مسند الشاميين" (1895) من طريق عيسى بن يزيد الشامي، عن طاووس، عن ابن عبَّاس مرفوعًا. وإسناده ضعيف، فيه ضعفاء ومجاهيل.
3718 - أخبرنا أبو الحسين علي بن عبد الرحمن السَّبِيعي، حَدَّثَنَا الحسين بن الحَكَم الحِبَري، حَدَّثَنَا قَبِيصة بن عُقبة، حَدَّثَنَا سفيان، عن عطاء بن السائب، عن عِكْرمة، عن ابن عبَّاس؛ في قوله عز وجل: {وَنَادَوْا يَامَالِكُ لِيَقْضِ عَلَيْنَا رَبُّكَ}، قال: مَكَثَ عنهم ألفَ سنة ثم قال: {إِنَّكُم ماكِثُونَ} [الزخرف: 77] [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه. 44 - ومن تفسير سورة (حم) الدخانبسم الله الرحمن الرحيم
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ্ আযযা ওয়া জাল্লা-এর বাণী: {তারা আহ্বান করে বলবে, 'হে মালিক! আপনার রব যেন আমাদেরকে মেরে ফেলেন!'} প্রসঙ্গে তিনি বলেন, তিনি (মালেক) তাদের থেকে এক হাজার বছর নীরব রইলেন। এরপর বললেন: {নিশ্চয়ই তোমরা এখানে থাকবে।} [সূরা যুখরুফ: ৭৭]
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد وهمَ فيه قبيصة بن عقبة على سفيان الثوري فسمَّى الراوي عن ابن عبَّاس عكرمةَ، والمحفوظ أنه أبو الحسن هلال بن يِساف هكذا رواه جمهور أصحاب سفيان عنه، وقبيصة - على ثقته - له أغاليط في أحاديثه عن سفيان، ورواية سفيان الثوري عن عطاء بن السائب قبل اختلاطه، فهي صحيحة.وأخرجه البيهقي في "البعث والنشور" (588) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو حذيفة النهدي في "تفسير سفيان" (886)، وعبد الرزاق في "التفسير" 2/ 202، كلاهما عن سفيان الثوري، عن عطاء بن السائب، عن أبي الحسن - وهو هلال بن يساف - عن ابن عبَّاس.وأخرجه كذلك أسد بن موسى في "الزهد" (4)، وابن أبي الدنيا في "صفة النار" (85)، والدولابي في "الكنى والأسماء" (822)، والطبري في "تفسيره" 25/ 99 من طرق أخرى عن سفيان الثوري، به - وذكر الدولابي عن شيخه أبي حفص عمرو بن علي الفلّاس أنَّ أبا الحسن هذا هو هلال بن يساف.وانظر خبر عبد الله بن عمرو السالف برقم (3534).
3719 - حدثني محمد بن صالح بن هانئ، حَدَّثَنَا الحسين بن محمد بن زياد القبَّاني، حدثني أبو عثمان سعيد بن يحيى بن سعيد الأُمَوي، حدثني أَبي، حَدَّثَنَا عثمان بن حَكيم، عن سعيد بن جُبير، عن ابن عبَّاس قال: إنك لَتَرى الرجلَ يمشي في الأسواق وقد وقع اسمُه في الموتى؛ ثم قرأَ {إِنَّا أَنْزَلْنَاهُ فِي لَيْلَةٍ مُبَارَكَةٍ إِنَّا كُنَّا مُنْذِرِينَ (3) فِيهَا يُفْرَقُ كُلُّ أَمْرٍ حَكِيمٍ} [الدخان: 3 - 4]، يعني ليلةَ القَدْر قال: ففي تلك الليلة يُفرَقُ أمرُ الدنيا إلى مثلِها من قابلٍ [1].صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তুমি এমন লোককে বাজারে হাঁটতে দেখো, যার নাম মৃতদের তালিকায় অন্তর্ভুক্ত হয়ে গেছে। এরপর তিনি পাঠ করলেন: "নিশ্চয় আমি উহা (কুরআন) এক বরকতময় রাতে অবতীর্ণ করেছি। নিশ্চয় আমি সতর্ককারী। এই রাতে প্রত্যেক প্রজ্ঞাপূর্ণ বিষয় স্থির করা হয়।" (সূরা দুখান: ৩-৪)। অর্থাৎ কদরের রাত। তিনি বলেন: ওই রাতে পরবর্তী বছর পর্যন্ত দুনিয়ার সমস্ত বিষয় স্থির করা হয়।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (3388)، و "فضائل الأوقات" (82) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه عبد الرزاق في "مصنفه" (7926)، وعبد الله بن أحمد في "السنة" (887) من طريق هشيم، والطبري في "تفسيره" 25/ 109 من طريق عبد الواحد بن زياد، كلاهما عن عثمان بن حكيم، به - رواية هشيم مختصرة، ذكر أوله إلى قوله: "في الموتى" دون باقيه. فقد أخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (3020) من طريق سفيان الثوري، عن عبد الله بن أبي نجيح، عن مجاهد، عن ابن عبَّاس - ولم يذكر فيه التلاوة. وهذا إسناد صحيح.ولسفيان فيه شيخ آخر وهو أبو يحيى القتّات عن مجاهد أخرجه وكيع في "الزهد" (83)، وكذا ابن المبارك (338)، وابن أبي شيبة في "مصنفه" 13/ 373، والطبري في "تفسيره" 25/ 125. وهو في المواعظ من "السنن الكبرى" للنسائي كما في "تحفة الأشراف" (6433). وأبو يحيى القتات فيه لِينٌ.ورواه سفيان أيضًا عند الطبري 25/ 125 عن منصور بن المعتمر عن مجاهد قال: كان يقال: تبكي الأرض …
3720 - أخبرنا أبو زكريا العَنبَري، حَدَّثَنَا محمد بن عبد السلام، حَدَّثَنَا إسحاق، أخبرنا جَرير، عن عطاء بن السائب، عن سعيد بن جُبير، عن ابن عبَّاس في قوله عز وجل: {فَمَا بَكَتْ عَلَيْهِمُ السَّمَاءُ وَالْأَرْضُ} [الدخان: 29]، قال: بفَقْدِ المؤمنِ أربعين صباحًا [1]. صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মহান আল্লাহর বাণী, "তাদের জন্য আসমান ও যমিন ক্রন্দন করেনি" [সূরা দুখান: ২৯] সম্পর্কে তিনি বলেন: মু’মিন ব্যক্তির বিয়োগের কারণে চল্লিশ সকাল পর্যন্ত (আসমান ও যমিন ক্রন্দন করে)।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح إن شاء الله، جرير - وهو ابن عبد الحميد - وإن كانت روايته عن عطاء بن السائب بعد اختلاطه، قد جاء هذا الخبر عن ابن عبَّاس من وجه آخر يقوّيه. فقد أخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (3020) من طريق سفيان الثوري، عن عبد الله بن أبي نجيح، عن مجاهد، عن ابن عبَّاس - ولم يذكر فيه التلاوة. وهذا إسناد صحيح.ولسفيان فيه شيخ آخر وهو أبو يحيى القتّات عن مجاهد أخرجه وكيع في "الزهد" (83)، وكذا ابن المبارك (338)، وابن أبي شيبة في "مصنفه" 13/ 373، والطبري في "تفسيره" 25/ 125. وهو في المواعظ من "السنن الكبرى" للنسائي كما في "تحفة الأشراف" (6433). وأبو يحيى القتات فيه لِينٌ.ورواه سفيان أيضًا عند الطبري 25/ 125 عن منصور بن المعتمر عن مجاهد قال: كان يقال: تبكي الأرض …