আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
4599 - أخبرني أبو جعفر محمد بن علي بن دُحَيم الشَّيباني بالكوفة، حَدَّثَنَا أحمد بن حازم بن أبي غَرَزَة، حَدَّثَنَا أبو نُعيم، حَدَّثَنَا شَريك، عن منصور، عن رِبْعيّ بن حِراش، عن البراء بن ناجِيةَ، قال: قال عبد الله: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إِنَّ رَحَى الإسلام ستدُور بعد خمسٍ وثلاثين أو ستٍّ وثلاثين أو سبعٍ وثلاثين سنةً، فإن يَهْلِكُوا فَسَبيلُ مَن هَلَك، وإن بقيَ لهم دينُهم يَقُمْ سبعين" قال عمر: يا نبي الله، بما مضى أو بما بقي؟ قال: "لا، بل بما بَقِي" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، وفيه البيانُ الواضحُ لمقتل عثمانَ كما قدمتُ ذكرَه من تاريخ المقتل سنة خمسٍ وثلاثين.
আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "নিশ্চয় ইসলামের যাঁতা পঁয়ত্রিশ, অথবা ছত্রিশ, অথবা সাইঁত্রিশ বছর পর ঘুরতে শুরু করবে। যদি তারা ধ্বংস হয়ে যায়, তবে যারা ধ্বংস হয়েছে তাদের পথেই যাবে। আর যদি তাদের ধর্ম টিকে থাকে, তবে তা সত্তর (বছর) পর্যন্ত বহাল থাকবে।" উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, হে আল্লাহর নবী! যা অতীত হয়ে গেছে তা দিয়ে, নাকি যা বাকি আছে তা দিয়ে (এই সত্তর বছর হিসাব হবে)? তিনি বললেন, "না, বরং যা বাকি আছে তা দিয়ে।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد محتمل للتحسين من أجل البراء بن ناجية، فهو تابعيّ كبير، وروى عنه تابعيّ كبير، ووثقه العجلي، وذكره ابن حبان في "الثقات"، ووثقه الحافظ ابن حجر في "التقريب"، وذكره البلاذُري في "أنساب الأشراف" 11/ 203، وأنه روى عن علي، وقد رُوي هذا الخبر من وجه آخر عن عبد الله: وهو ابن مسعود. شريك: هو ابن عبد الله النخعي، ومنصور: هو ابن المعتمر، وأبو نُعيم: هو الفضل بن دُكين.وسيأتي عند المصنّف برقم (4644) من طريق سفيان الثوري، وبرقم (8802) من طريق شيبان بن عبد الرحمن، كلاهما عن منصور بن المعتمر.وأخرجه أحمد 6/ (3707)، وابن حبان (6664) من طريق القاسم بن عبد الرحمن بن عبد الله بن مسعود، عن أبيه، عن جده. وقد اختُلف في سماع عبد الرحمن من أبيه، والراجح سماعه منه، وقال في روايته: "على رأس خمس وثلاثين" دون شك أو تردد، ولم يذكر قول عمر في آخره.وقد عدَّ الإمامُ أحمد هذا الحديث من أثبت ما رُوي عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في خلافة عليّ، فيما نقله عنه أبو بكر الخلّال في "السنة" (649)، وأنَّ ابتداء الحساب يكون من وفاة رسول الله صلى الله عليه وسلم، فبذلك تدخل خلافة علي بن أبي طالب في المدة المذكورة.وللخبر طريق ثالثة عند إسحاق بن راهويه كما في "المطالب العالية" للحافظ (4335)، والبزار (1942)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (1612)، والطبراني (10311)، من طرق عن شريك بن عبد الله النخعي، عن مجالد بن سعيد، عن الشَّعبي، عن مسروق، عن ابن مسعود.وإسناده ليس بالقوي من أجل مجالد، لكنه يصلح للمتابعة. ولفظه عند الطحاوي وهو أتمهم روايةً: "إنَّ رحى الإسلام ستزول بعد خمس وثلاثين، فإن يصطلحوا فيما بينهم على غير قتال يأكلوا الدنيا سبعين عامًا رغدًا، وإن يقتتلوا يركبوا سَنَنَ من كان قبلهم".وله طريق رابعة عند الطبراني (9159) عن أبي الأحوص، عن عبد الله بن مسعود، موقوفًا عليه بسند صحيح، وهو وإن كان موقوفًا تدل الروايات الأخرى على رفعه، ولأنَّ مثله لا يجوز أن يقال من قِبل الرأي أصلًا، ولفظه: تدور رحى الإسلام على رأس خمس وثلاثين ثم يحدث حدثٌ عظيم، فإن كان فيه هَلَكتُهم فبالحرِيّ، وإلّا تراخى عليهم سبعين سنة، فمن أدرك ذلك رأى ما يُنكره.
4600 - حَدَّثَنَا أبو بكر بن بالَوَيهِ، حَدَّثَنَا إبراهيم بن إسحاق الحَرْبي، حَدَّثَنَا مصعب بن عبد الله الزُّبيري قال: الوليد بن عُقبة بن أبي مُعَيط بن عمرو بن أُمية بن عبد شَمس، وكان أخا عثمانَ لأمِّه، وأمُّهما أَروى بنت كُريز بن ربيعة بن عبد شمس، وأمُّها أمُّ حَكيم البيضاءُ بنت عبد المطلب بن عبد مَناف عمةُ رسول الله صلى الله عليه وسلم، قَتَل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم عُقبة بن أبي مُعَيط في رجوعه، وكان الوليد في زمن رسول الله صلى الله عليه وسلم رجلًا، وكان يُكنى أبا وَهْبٍ [1].
মুসআব ইবনু আব্দুল্লাহ আয-যুবাইরী থেকে বর্ণিত, আল-ওয়ালীদ ইবনু উকবাহ ইবনু আবী মুআইত ইবনু আমর ইবনু উমাইয়াহ ইবনু আবদু শামস। আর তিনি ছিলেন উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বৈমাত্রেয় ভাই (মায়ের দিক থেকে)। তাদের দুজনের মায়ের নাম ছিল আরওয়া বিনত কুরাইয ইবনু রাবী'আহ ইবনু আবদু শামস। আর তার (আরওয়ার) মা ছিলেন উম্মু হাকীম আল-বাইদা বিনত আব্দুল মুত্তালিব ইবনু আবদু মানাফ, যিনি ছিলেন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ফুফু। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রত্যাবর্তনের সময় উকবাহ ইবনু আবী মুআইতকে হত্যা করেছিলেন। আর আল-ওয়ালীদ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে প্রাপ্তবয়স্ক ছিলেন এবং তাঁর কুনিয়াত ছিল আবূ ওয়াহব।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] انظر "تاريخ دمشق" لابن عساكر 63/ 219 و 223. لأبان من الولد عُمرَ وعَمرًا، وانظر "جمهرة أنساب العرب" لابن حزم ص 85، وقد ذكره البخاريّ في "تاريخه الكبير" 6/ 315 فيمن اسمه عَمرو، وكذا ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 6/ 220.
4601 - حَدَّثَنَا أبو النَّضر الفقيه وأبو الحسن العَنَزي، قالا: حَدَّثَنَا عثمان بن سعيد الدارمي، حَدَّثَنَا يزيد بن عبد ربّه [1] الجِرْجِسيّ [2]، حَدَّثَنَا محمد بن حرب، عن الزُّبيدي، عن الزُّهْري، عن عمرو بن أبان بن عثمان، عن جابر بن عبد الله، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أُريَ الليلةَ رجلٌ صالحٌ أنَّ أبا بكر نِيطَ برسُول الله، ونِيطَ عمرٌ بأبي بكرٍ، ونِيطُ عثمانُ بعمرَ"، فلما قُمْنا من عند رسول الله صلى الله عليه وسلم قلنا: أما الرجلُ الصالحُ فرَسولُ الله صلى الله عليه وسلم، وأما ما ذَكر من نَوْط بعضِهم ببعض، فهُم وُلاةُ هذا الأمرِ الذي بعثَ اللهُ به نبيَّه صلى الله عليه وسلم [3].قال الدارمي: فسمعتُ يحيى بن مَعِين يقول: محمد بن حَرْب يُسنِد هذا الحديثَ، والناسُ يُحدّثون به عن الزُّهْري مرسلًا [4]، إنما هو عُمر بن أبانَ، ولم يكن لأبان بن عثمان ابنٌ يقال له: عَمرو [5].
জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "গত রাতে একজন সৎ ব্যক্তিকে দেখানো হয়েছে যে, আবূ বকরকে রাসূলুল্লাহর সাথে যুক্ত করা হয়েছে, উমরকে আবূ বকরের সাথে যুক্ত করা হয়েছে এবং উসমানকে উমরের সাথে যুক্ত করা হয়েছে।"
যখন আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে উঠে গেলাম, তখন আমরা বললাম: সৎ ব্যক্তিটি হলেন স্বয়ং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)। আর তাদের একজনকে অন্যের সাথে যুক্ত করার যে কথা তিনি বলেছেন, তারা হলেন সেই কাজের দায়িত্বশীল বা শাসক (উলাত) যার সাথে আল্লাহ তাঁর নবীকে (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রেরণ করেছেন।
দারিমী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমি ইয়াহইয়া ইবনু মা‘ঈনকে বলতে শুনেছি: মুহাম্মাদ ইবনু হারব এই হাদীসটিকে মুসনাদ (সনদযুক্ত) করেছেন, অথচ লোকেরা এটিকে যুহরী (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে মুরসাল (বিচ্ছিন্ন সনদ) হিসেবে বর্ণনা করে থাকে। এটি মূলত ‘উমার ইবনু আবান-এর সূত্রে বর্ণিত, আর আবান ইবনু উসমানের এমন কোনো পুত্র ছিল না যার নাম ‘আমর।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: عبد الله، وضُبِّب فوقها في (ز)، وصوَّبناه من مصادر ترجمة المذكور، وقد تقدَّم اسمه على الصواب في إسناد حديث آخر عند المصنّف برقم (3423). لأبان من الولد عُمرَ وعَمرًا، وانظر "جمهرة أنساب العرب" لابن حزم ص 85، وقد ذكره البخاريّ في "تاريخه الكبير" 6/ 315 فيمن اسمه عَمرو، وكذا ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 6/ 220.
[2] كذلك وقعت هذه النسبة بكسر الجيمين في أصل "سير أعلام النبلاء" في ترجمة يزيد بن عبد ربِّه 10/ 667 وفي "أنساب السمعاني" وما تفرع عنه، منصوصًا عليه بضم الجيمين، والذي في أصل "السير" هو الأصح فيما يغلب على الظن، لأنَّ النسبة إلى كنيسة كانت بحمص وكان يزيد بن عبد ربه يسكن بقربها فنسب إليها، والظاهر أنَّ هذه الكنيسة سميت على اسم النَّبِيّ الذي كان يُعرف بجِرجِيس، كما ضُبط في "القاموس" وشرحه، بكسر الجيمين. لأبان من الولد عُمرَ وعَمرًا، وانظر "جمهرة أنساب العرب" لابن حزم ص 85، وقد ذكره البخاريّ في "تاريخه الكبير" 6/ 315 فيمن اسمه عَمرو، وكذا ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 6/ 220.
4601 [3] - إسناده محتمل للتحسين كما تقدم بيانه برقم (4488) إذ تقدَّم الحديث ثمة من طريق موسى بن هارون البُردي عن محمد بن حرب.وأخرجه أحمد 23 / (14821) عن يزيد بن عبد ربّه، بهذا الإسناد. لأبان من الولد عُمرَ وعَمرًا، وانظر "جمهرة أنساب العرب" لابن حزم ص 85، وقد ذكره البخاريّ في "تاريخه الكبير" 6/ 315 فيمن اسمه عَمرو، وكذا ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 6/ 220.
4601 [4] - تقدم الكلام على الاختلاف في إسناده برقم (4488)، وأنَّ الدارقطني رجَّح المتصل. لأبان من الولد عُمرَ وعَمرًا، وانظر "جمهرة أنساب العرب" لابن حزم ص 85، وقد ذكره البخاريّ في "تاريخه الكبير" 6/ 315 فيمن اسمه عَمرو، وكذا ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 6/ 220.
4601 [5] - كذا جزم ابن مَعِين بأنه ليس لأبان ولد يقال له: عمرو، مع أنه مذكور في كتب الأنساب أنَّ لأبان من الولد عُمرَ وعَمرًا، وانظر "جمهرة أنساب العرب" لابن حزم ص 85، وقد ذكره البخاريّ في "تاريخه الكبير" 6/ 315 فيمن اسمه عَمرو، وكذا ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 6/ 220.
4602 - حدثني محمد بن صالح بن هانئ، حَدَّثَنَا الحسين بن الفضل البَجَلي، حَدَّثَنَا عفان، حَدَّثَنَا وُهَيب، حَدَّثَنَا أيوب، عن أبي قِلابَة، عن أبي الأَشْعَث، عن مُرّة بن كعب قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يذكر فتنةً فقرَّبَها، فمرَّ به رجلٌ مُقنَّع فِي ثَوبٍ، فقال: "هذا يومئذٍ على الهُدى" فقمتُ إليه فإذا هو عثمانُ بن عفّان، فأقبلتُ إليه بوجهِه، فقلت: هو هذا؟ قال: "نعم" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه.
মুররাহ ইবনু কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে একটি ফিতনা (বিপর্যয়) সম্পর্কে আলোচনা করতে শুনলাম এবং তিনি এর (আগমনের সময়কে/প্রকৃতিকে) নিকটবর্তী করে দিলেন। অতঃপর একজন লোক কাপড়ে আবৃত অবস্থায় তাঁর পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "এই ব্যক্তি সেদিন সঠিক পথের উপর থাকবে।" অতঃপর আমি তাঁর দিকে এগিয়ে গেলাম, দেখলাম তিনি হলেন উসমান ইবনু আফ্ফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। আমি তাঁর (নবীজীর) দিকে মুখ ফেরালাম এবং জিজ্ঞাসা করলাম, ইনিই কি সেই ব্যক্তি? তিনি বললেন, "হ্যাঁ।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. عفان: هو ابن مسلم الصَّفّار، ووُهَيب: هو ابن خالد، وأبو قلابة: هو عبد الله بن زيد الجَرْمي، وأبو الأشعث: هو شراحيل بن آده.وأخرجه أحمد 29/ (18068) عن محمد بن بكر البُرساني، عن وُهَيب بن خالد، بهذا الإسناد.وأخرجه الترمذي (3704) من طريق عبد الوهاب الثقفي، عن أيوب، به. وقال الترمذي: حديث حسن صحيح.وأخرجه أحمد (18060) عن إسماعيل ابن عُليَّة، عن أيوب، عن أبي قلابة، مرسلًا.وأخرجه أحمد (18067) من طريق جُبير بن نفير، عن كعب بن مرة البَهْزي. كذا سماه! وإسناده صحيح أيضًا.وسيأتي عند المصنّف برقم (8539) من طريق عبد الله بن شقيق العُقيلي عن مرة البَهزي. أجل عبد الله بن القاسم الراوي عنه.وأخرجه أحمد 34/ (20630) عن هارون بن معروف، والترمذي (3701) من طريق الحسن بن واقع الرَّمْلي، كلاهما عن ضمرة بن ربيعة بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حسن غريب.وله شواهد أحسنها مرسل الحسن عند أحمد في "فضائل الصحابة" (787)، ورجاله ثقات.وهذا أصح ممّا أخرجه الترمذي (3700) من طريق أبي داود الطيالسي، وعبد الله بن أحمد في زياداته على "المسند" لأبيه 27/ (16696) من طريق عبد الصمد بن عبد الوارث، كلاهما عن السكن بن المغيرة، عن الوليد بن أبي هشام، عن فرقد أبي طلحة، عن عبد الرحمن بن خبّاب، قال: شهدت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وهو يحث على جيش العُسرة، فقام عثمان بن عفان فقال: يا رسول الله، عليَّ مئة بعير بأحلاسها وأقتابها في سبيل الله، ثم حضَّ على الجيش، فقام عثمان بن عفان فقال: يا رسول الله، عليَّ مئتا بعير بأحلاسها وأقتابها في سبيل الله، ثم حضَّ على الجيش، فقام عثمان بن عفان فقال: يا رسول الله، عليّ ثلاث مئة بعيرٍ بأحلاسها وأقتابها في سبيل الله، فأنا رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم ينزل عن المنبر وهو يقول: "ما على عثمان ما عمل بعد هذه ما على عثمان ما عمل بعد هذه". قال الترمذي: هذا حديث غريب من هذا الوجه. قلنا: وفرقد أبو طلحة مجهول لم يرو عنه غير الوليد، وقال علي بن المديني: لا أعرفه.
4603 - حَدَّثَنَا أبو العباس محمد بن يعقوب، حَدَّثَنَا الرَّبيع بن سليمان، حَدَّثَنَا أَسد بن موسى، حَدَّثَنَا ضَمْرة بن ربيعة، عن ابن شَوذَب، عن عبد الله بن القاسم، عن كَثيرٍ مولى عبد الرحمن بن سَمُرة، عن عبد الرحمن بن سَمُرة، قال: جاء عثمانُ إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بألفِ دينارٍ حين جَهَّزَ جيشَ العُسْرة، ففرَّغها عثمانُ في حِجْر النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، قال: فجعلَ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يُقلِّبها ويقول: "ما ضَرَّ عثمانَ ما عَمِلَ بعدَ هذا اليومِ" قالها مِرارًا [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আব্দুর রহমান ইবনে সামুরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জায়শুল উসরাহ (কষ্টের সেনাবাহিনী/তাবুকের যুদ্ধের সেনাবাহিনী) প্রস্তুত করছিলেন, তখন উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এক হাজার দিনার নিয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন এবং উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কোলে ঢেলে দিলেন। বর্ণনাকারী বলেন, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দিনারগুলো ওলট-পালট করতে লাগলেন এবং বললেন: "আজকের পর উসমান যা-ই করবে, তা তাকে ক্ষতি করবে না।" তিনি কথাটি কয়েকবার বললেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن من أجل كثير مولى عبد الرحمن بن سمُرة - وهو كثير بن أبي كثير - ومن أجل عبد الله بن القاسم الراوي عنه.وأخرجه أحمد 34/ (20630) عن هارون بن معروف، والترمذي (3701) من طريق الحسن بن واقع الرَّمْلي، كلاهما عن ضمرة بن ربيعة بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حسن غريب.وله شواهد أحسنها مرسل الحسن عند أحمد في "فضائل الصحابة" (787)، ورجاله ثقات.وهذا أصح ممّا أخرجه الترمذي (3700) من طريق أبي داود الطيالسي، وعبد الله بن أحمد في زياداته على "المسند" لأبيه 27/ (16696) من طريق عبد الصمد بن عبد الوارث، كلاهما عن السكن بن المغيرة، عن الوليد بن أبي هشام، عن فرقد أبي طلحة، عن عبد الرحمن بن خبّاب، قال: شهدت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وهو يحث على جيش العُسرة، فقام عثمان بن عفان فقال: يا رسول الله، عليَّ مئة بعير بأحلاسها وأقتابها في سبيل الله، ثم حضَّ على الجيش، فقام عثمان بن عفان فقال: يا رسول الله، عليَّ مئتا بعير بأحلاسها وأقتابها في سبيل الله، ثم حضَّ على الجيش، فقام عثمان بن عفان فقال: يا رسول الله، عليّ ثلاث مئة بعيرٍ بأحلاسها وأقتابها في سبيل الله، فأنا رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم ينزل عن المنبر وهو يقول: "ما على عثمان ما عمل بعد هذه ما على عثمان ما عمل بعد هذه". قال الترمذي: هذا حديث غريب من هذا الوجه. قلنا: وفرقد أبو طلحة مجهول لم يرو عنه غير الوليد، وقال علي بن المديني: لا أعرفه.
4604 - أخبرنا عبد الرحمن بن حَمْدان الجلّاب بهَمَذان، حَدَّثَنَا إسحاق بن أحمد بن مِهْران الرازي، حَدَّثَنَا إسحاق بن سليمان، حَدَّثَنَا أبو جعفر الرازي، عن أيوب، عن نافع، عن ابن عمر: أنَّ عثمان أصبحَ فحدَّثَ فقال: إني رأيتُ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في المنام الليلةَ، فقال: "يا عثمانُ، أفطِرْ عندنا". فأصبح عثمانُ صائمًا، فقُتل من يومِه رضي الله عنه [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সকালে উঠে বর্ণনা করলেন: আমি গত রাতে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে স্বপ্নে দেখেছি। তিনি বললেন, "হে উসমান, তুমি আমাদের সাথে ইফতার করো।" অতঃপর উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রোযা অবস্থায় সকালে উঠলেন এবং ঐ দিনই তিনি শহীদ হলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، هذا إسناد رجاله لا بأس بهم لكن انفرد بهذه الطريق الموصولة أبو جعفر الرازي - وهو عيسى بن ماهان - وهو وإن كان حديثه يحتمل التحسين فإنَّ له أفرادًا، وقد خالف يعلى بن حُكيم فرواه عن نافع مرسلًا لم يذكر فيه ابن عمر كما سيأتي، لكن رُوي هذا الخبر من وجوه متعددة يُقضى بمجموعها عليه بالصحة.وأخرجه ابن أبي شيبة 11/ 76 و 14/ 591، والبزار (347)، وأبو يعلى في "مسنده الكبير" كما في "المطالب العالية" للحافظ ابن حجر (4385/ 1)، والآجُريّ في "الشريعة" (1431)، وأبو الشيخ الأصبهاني في "طبقات المحدثين بأصبهان" 2/ 298 - 299، واللالكائي في "شرح أصول الاعتقاد" (2577)، وأبو نُعيم في "تاريخ أصبهان" 1/ 231، وأبو القاسم الأصبهاني في "سير السلف الصالحين" ص 171، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 39/ 384 و 385 من طرق عن إسحاق بن سليمان - وهو الرازي - بهذا الإسناد.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات الكبرى" 3/ 71، والبلاذُري في "أنساب الأشراف" 6/ 202، والبيهقي في "دلائل النبوة" 7/ 48، وابن عساكر 39/ 384 من طريق يعلى بن حكيم، عن نافع مرسلًا. فقد قال أبو زرعة الرازي: نافع مولى ابن عمر عن عثمان مرسل.وأخرجه إسحاق بن راهويه في "مسنده" كما في "المطالب العالية" (4372)، وعبد الله بن أحمد بن حنبل في زياداته على "فضائل الصحابة" لأبيه (765)، والطبري في "تاريخه" 4/ 383، وابن حبان (6919) من طريق أبي نضرة العَبْدي، عن أبي سعيد مولى أبي أُسَيد. وقال الحافظ في "المطالب": رجاله ثقات سمع بعضهم من بعض.وأخرجه عبد الله بن أحمد في زياداته على "المسند" لأبيه 1/ (526)، وفي زياداته على "فضائل الصحابة" (809)، ومن طريقه ابن عساكر 39/ 387، وابن الجوزي في "الثبات عند الممات" ص 101، وابن الأثير في "أسد الغابة" 3/ 490 من طريق يونس بن أبي يعفور العبدي، عن أبيه، عن مسلم أبي سعيد مولى عثمان بن عفان. وإسناده محتمل للتحسين في المتابعات والشواهد من أجل يونس بن أبي يعقوب، فهو مختلفٌ فيه.وأخرجه ابن سعد 3/ 71، وابن أبي شيبة 11/ 76 و 1/ 49، وعبد الله بن أحمد في زياداته على "المسند" (536) وفي زياداته على "فضائل الصحابة" أيضًا (811)، وعمر بن شبَّة في "تاريخ المدينة" 4/ 1227، وابن عساكر 39/ 387 من طريق زياد بن عبد الله، عن أم هلال بنت وكيع، عن امرأة عثمان نائلة بنت الفُرافِصة. وإسناده ضعيف لجهالة زياد بن عبد الله وأم هلال.وأخرجه أحمد بن منيع كما في "المطالب العالية" (1378) وابن أبي عاصم في "السنة" (1302)، والخطيب في "تلخيص المتشابه" 1/ 96، وابن عساكر 39/ 388 و 389 من طريق يحيى بن أبي راشد - ويقال يحيى بن راشد - مولي عمرو بن حريث، عن عُقبة بن أَسيد ومحمد بن عبد الرحمن الحَرَشي، كلاهما عن النعمان بن بشير، عن نائلة بنت الفرافصة. وإسناده ضعيف لجهالة يحيى بن أبي راشد وعقبة ومحمد بن عبد الرحمن.وأخرجه سعيد بن منصور (2946)، وأحمد بن حنبل في "فضائل الصحابة" (792)، والبلاذُري في "أنساب الأشراف" 6/ 201، وابن أبي الدنيا في "المنامات" (109)، وابن عساكر 39/ 386 و 389 من طريق فرج بن فضالة، عن مروان بن أبي أمية، عن عبد الله بن سلَام. وإسناده ضعيف لضعف فرج بن فضالة وجهالة مروان بن أبي أميّة. ولقتل عثمان وهو صائم شاهد عن أبي ليلى الكِنْدي بإسناد صحيح، عند عمر بن شبَّة في "تاريخ المدينة" 4/ 1189، والدولابي في "الكنى" (1647)، وابن الأعرابي في "معجمه" (1416)، وابن عساكر 39/ 349.وآخر عن عبد الله بن الزبير عند ابن سعد 3/ 67، وابن أبي شيبة 14/ 591 و 15/ 204، وأحمد في "الزهد" (687)، وفي "فضائل الصحابة" (772)، والبلاذُري 5/ 564، وابن عساكر 39/ 394 - 395، وإسناده صحيح أيضًا.
4605 - حَدَّثَنَا أحمد بن كامل القاضي، حَدَّثَنَا أحمد بن محمد بن عبد الحميد الجُعْفي، حَدَّثَنَا الفضل بن جُبَير الورّاق، حَدَّثَنَا خالد بن عبد الله الطحّان المُزَني، عن عطاء بن السائب، عن سعيد بن جُبَير، عن ابن عبّاس، قال: كنت قاعدًا عند النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم إذ أقبلَ عثمانُ بن عفّان، فلما دنا منه قال: "يا عثمانُ، تُقتَلُ وأنتَ تقرأ سورةَ البقرة، فتقَعُ قطرةٌ من دمِك على {فَسَيَكْفِيكَهُمُ اللَّهُ} [البقرة: 137]، يَغبِطُك أهلُ المَشرقِ وأهل المَغربِ، وتَشفَعُ في عَددِ ربيعةَ ومُضَر، وتُبعَثُ يوم القيامة أميرًا على كل مَخذُول" [1]. قال الحاكم: قد ذكرتُ الأخبارَ المَسانيد في هذا الباب في كتاب "مقتل عثمان" فلم أَستحسِن ذِكْرها عن آخرها في هذا الموضع فإنَّ في هذا القدر كفاية، فأمّا الذي ادّعتْه المُبتدِعةُ من مَعُونة أميرِ المؤمنين عليّ بن أبي طالب على قَتْله، فإنه كَذِبٌ وزُورٌ، فقد تواترت الأخبارُ بخِلافه:
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উপবিষ্ট ছিলাম, এমন সময় উসমান ইবনু আফ্ফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আগমন করলেন। যখন তিনি (উসমান) তাঁর (নবীর) নিকটবর্তী হলেন, তখন তিনি (নবী) বললেন: "হে উসমান, তুমি এমন অবস্থায় নিহত হবে যখন তুমি সূরাহ আল-বাক্বারাহ তিলাওয়াতরত থাকবে। তোমার রক্তের একটি ফোঁটা {فَسَيَكْفِيكَهُمُ اللَّهُ} (অতএব, শীঘ্রই আল্লাহই তোমার জন্য তাদের বিরুদ্ধে যথেষ্ট হবেন) [সূরাহ আল-বাক্বারাহ: ১৩৭] আয়াতটির উপর পড়বে। পূর্ব ও পশ্চিমের অধিবাসীরা তোমার প্রতি ঈর্ষা পোষণ করবে এবং তুমি রাবি'আহ ও মুদার গোত্রের সদস্য সংখ্যার সমান সংখ্যক মানুষের জন্য শাফায়াত করবে এবং কিয়ামতের দিন তোমাকে প্রত্যেক হতভাগ্য ব্যক্তির উপর নেতা (আমীর) হিসেবে প্রেরণ করা হবে।" [আল-হাকিম বলেন:] আমি "মাকতাল উসমান" নামক কিতাবে এ অধ্যায়ের সনদযুক্ত রেওয়ায়াতগুলো উল্লেখ করেছি। কিন্তু এ স্থানে সেগুলোর সবগুলো উল্লেখ করা আমি সঙ্গত মনে করিনি। কেননা, এতটুকু পরিমাণই যথেষ্ট। আর বিদ'আতিরা আমীরুল মু'মিনীন আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হত্যাকাণ্ডে সহায়তার যে দাবি করে, তা মিথ্যা ও বানোয়াট। কেননা এর বিপরীত খবরগুলো মুতাওয়াতির (সুনিশ্চিত সূত্রে) বর্ণিত হয়েছে।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] موضوع، والمتهم به الفضل بن جُبَير الورّاق، قال عنه العقيلي في "الضعفاء" 3/ 444: لا يُتابع على حديثه. قلنا: وقد حكم الذهبي في "تلخيص المستدرك" على هذا الخبر بالكذب، مُتَّهِمًا فيه أحمد بن محمد بن عبد الحميد الجُعفي. ولا يُسلّم له رحمه الله ذلك، لأنَّ أحمد بن محمد المذكور وثقه الخطيب ونقل عن الدارقطني قوله فيه: صالح الحديث. على أنه لم ينفرد به، بل تابعه على بعضه محمد بن غالب تمتام كما سيأتي، فالصحيح أنَّ العلَّة فيه من جهة الفضل بن جُبَير الورَّاق، على أنه روي من وجوه متعددة أنَّ عثمان رضي الله عنه لما قُتِلَ قطر من دمه على الآية المذكورة كما سيأتي، فلعلَّ هذا هو أصل الخبر، والله أعلم.وأخرجه ابن الأثير في "أسد الغابة" 3/ 490 من طريق محمد بن غالب تمتام، عن الفضل بن جُبَير الوراق، بهذا الإسناد، بلفظ: أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال لعثمان: "تُقتل وأنت مظلوم، وتقطر قطرة من دمك على {فَسَيَكْفِيكَهُمُ اللهُ} " قال ابن عبّاس: فإنها إلى الساعة لفي المصحف.وقد روى أبو سعيد مولى أبي أَسيد قصة قتل أمير المؤمنين عثمان ذي النورين بطولها وذكر فيها أنه ضُربت يده رضي الله عنه فانتضح الدم على هذه الآية {فَسَيَكْفِيكَهُمُ الله وَهُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ}. أخرجه ابن أبي شيبة 15/ 215 - 220، وأحمد في "فضائل الصحابة" (766)، وابن حبان (6919)، وغيرهم بإسناد صحيح، قال الحافظ ابن حجر في "المطالب العالية" (4372): رجاله ثقات سمع بعضهم من بعضٍ.وروي أيضًا أنَّ دمه قطر على الآية المذكورة في خبر لعمرة بنت قيس العدوية عند عبد الله بن أحمد في زياداته على "فضائل الصحابة" (817)، وزياداته على "الزهد" لأبيه (677)، بسند لا بأس به.
4606 - حَدَّثَنَا أبو القاسم علي بن المؤمَّل بن الحَسن بن عيسى، حَدَّثَنَا محمد بن يونس القُرشي، حَدَّثَنَا هارون بن إسماعيل الخَزّاز، حَدَّثَنَا قُرة بن خالد السَّدُوسي، سمع الحسنَ، عن قيس بن عُبَاد، قال: شهدتُ عليًا يوم الجمَل يقولُ: اللهم إني أبرأُ إليكَ من دمِ عثمانَ، ولقد طاشَ عَقْلي يوم قُتل عثمانُ وأنكرتُ نفسي، وأرادُوني على البَيعة، فقلت: والله إني لأستحْيي من الله أن أبايعَ قومًا قتلوا رجلًا قال له رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ألا أستحْيي ممَّن تَستحْيي منه الملائكةُ"، وإني لأستحْيي من الله أن أبايع وعثمانُ قتيلُ الأرض لم يُدفَن بعدُ، فانصرفوا فلما دُفن رجعَ الناسُ إليَّ فسألوني البيعة، فكأنما صُدِع عن قلبي، فقلتُ: اللهم خُذْ مني لعثمانَ حتَّى تَرْضى [1].
কাইস ইবনে উবাদ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি জামালের (উটের) যুদ্ধের দিন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি: হে আল্লাহ! আমি উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর রক্ত থেকে আপনার কাছে দায়মুক্ততা ঘোষণা করছি। উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যেদিন নিহত হলেন, সেদিন আমার বুদ্ধি লোপ পেয়েছিল এবং আমি নিজেকে অস্বীকার করছিলাম (বিভ্রান্ত হয়ে পড়েছিলাম)। তারা আমাকে বাইয়াত (আনুগত্যের শপথ) দিতে চেয়েছিল, তখন আমি বললাম: আল্লাহর শপথ! আমি আল্লাহর কাছে লজ্জিত যে, আমি এমন লোকদের বাইয়াত দেব, যারা এমন একজন ব্যক্তিকে হত্যা করেছে, যাঁকে রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছিলেন: "যার ব্যাপারে ফেরেশতারাও লজ্জা করে, আমি কি তার ব্যাপারে লজ্জা করব না?" আর আমি আল্লাহর কাছে লজ্জিত যে, আমি বাইয়াত গ্রহণ করব অথচ উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ভূপৃষ্ঠে নিহত অবস্থায় রয়েছেন এবং এখনো তাকে দাফন করা হয়নি। তাই তারা চলে গেল। যখন তাঁকে দাফন করা হলো, তখন লোকেরা আমার কাছে ফিরে এলো এবং আমাকে বাইয়াত দিতে অনুরোধ করল। তখন যেন আমার হৃদয়ের (ভার) দূর হয়ে গেল। অতঃপর আমি বললাম: হে আল্লাহ! আপনি সন্তুষ্ট না হওয়া পর্যন্ত উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর (হকের) জন্য আমার পক্ষ থেকে গ্রহণ করে নিন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] هذا الإسناد فيه محمد بن يونس القرشي - وهو الكُديمي - وهو ضعيف جدًّا، لكن تقدم الخبر برقم (4577) من رواية محمد بن أحمد بن يزيد الرِّيَاحي، وهو صدوق، عن هارون بن إسماعيل الخزاز، فالخبر حسن بذلك الإسناد.وأخرجه أبو بكر الكلاباذي في "معاني الأخبار" ص 272، وأبو نُعيم في "تثبيت الإمامة" (137) وفي "معرفة الصحابة" (279)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 39/ 450 من طرق عن محمد بن يونس الكُديمي، بهذا الإسناد.
4607 - حَدَّثَنَا عبد الله بن إسحاق بن إبراهيم العَدْل، حَدَّثَنَا يحيى بن أبي طالب، حَدَّثَنَا بشار بن موسى الخَفّاف، حَدَّثَنَا الحاطِبي عبد الرحمن بن محمد، عن أبيه، عن جده، قال: لما كان يومُ الجَمَل خرجتُ أنظُرُ في القَتْلى، قال: فقام عليٌّ والحسن بن علي وعمار بن ياسر ومحمد بن أبي بكر وزيد بن صُوحان يَدُورون في القَتْلى، قال: فأبصرَ الحسنُ بن عليٍّ قتيلًا مكبوبًا على وجهِه، فقلَبَه على قَفاهُ ثم صرخَ، ثم قال: إنا لله وإنا إليه راجعون فَرْخُ قريش واللهِ، فقال له أبوه: مَن هو يا بُنيّ؟ قال: محمد بن طلحة بن عُبيد الله، فقال: إنا لله وإنا إليه راجعون، أما والله لقد كان شابًا صالحًا، ثم قعد كئيبًا حزينًا، فقال له الحسن: يا أبتِ، قد كنتُ أنهاكَ عن هذا المَسيرِ، فغَلَبَك على رأيك فلانٌ وفلانٌ، قال: قد كان ذاك يا بُنيّ، ولوَدِدتُ لو أني متُّ قبل هذا بعشرين سنةً.قال محمد بن حاطب: فقمتُ، فقلت: يا أميرَ المؤمنين، إنا قادِمُون المدينةَ والناسُ سائلونا عن عثمان، فماذا نقول فيه؟ قال: فتكلَّم [1] عمارُ بن ياسر ومحمد بن أبي بكر، فقالا وقالا، فقال لهما عليٌّ: يا عمار، ويا محمد، تقولان: إنَّ عثمانَ استأثر وأساءَ الإمرةَ، وعاقبتُم واللهِ فأسأتُم العُقوبةَ، وستَقدَمُون على حَكَمٍ عَدْلٍ يَحكُم بينكم، ثم قال: يا محمدَ بنَ حاطبٍ، إذا قدمتَ المدينة وسُئلتَ عن عثمان، فقل: كان واللهِ من الذين آمنوا، ثم اتقَوْا وآمَنُوا، ثم اتقَوْا وأحسَنُوا، والله يُحبُّ المحسنين، وعلى الله فليتوكَّل المؤمنون [2]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .
মুহাম্মদ ইবনে হাতিব থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন জামালের যুদ্ধ সংঘটিত হলো, তখন আমি নিহতদের দেখতে বের হলাম। বর্ণনাকারী বললেন: তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), হাসান ইবনে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), আম্মার ইবনে ইয়াসির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), মুহাম্মাদ ইবনে আবি বকর এবং যায়েদ ইবনে সুওহান নিহতদের মাঝে ঘুরে বেড়াচ্ছিলেন।
তিনি বললেন: তখন হাসান ইবনে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দেখলেন একজন নিহত ব্যক্তি উপুড় হয়ে পড়ে আছে। তিনি তাকে চিৎ করে দিলেন এবং চিৎকার করে উঠলেন। অতঃপর বললেন: 'ইন্না লিল্লা-হি ওয়া ইন্না ইলাইহি রাজিঊন'। আল্লাহর কসম, ইনি কুরাইশের শাবক! তখন তাঁর পিতা (আলী) তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন: হে আমার বৎস, সে কে? তিনি বললেন: মুহাম্মাদ ইবনে তালহা ইবনে উবাইদুল্লাহ।
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: 'ইন্না লিল্লা-হি ওয়া ইন্না ইলাইহি রাজিঊন'। আল্লাহর কসম, সে তো নেককার যুবক ছিল। এরপর তিনি বিষণ্ণ ও শোকাহত অবস্থায় বসে পড়লেন। তখন হাসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর পিতাকে বললেন: হে আমার পিতা! আমি তো আপনাকে এই অভিযানে (যাওয়া থেকে) বারণ করেছিলাম, কিন্তু অমুক এবং অমুক আপনার মতের ওপর প্রাধান্য পেল। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হ্যাঁ, বৎস, তা-ই হয়েছে। আমি পছন্দ করতাম, যদি আমি এই ঘটনার বিশ বছর আগেই মারা যেতাম।
মুহাম্মাদ ইবনে হাতিব বলেন: তখন আমি দাঁড়ালাম এবং বললাম: হে আমীরুল মু'মিনীন! আমরা মদীনায় যাচ্ছি। লোকেরা আমাদের কাছে উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সম্পর্কে জানতে চাইবে। আমরা তার সম্পর্কে কী বলব?
বর্ণনাকারী বললেন: তখন আম্মার ইবনে ইয়াসির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং মুহাম্মাদ ইবনে আবি বকর কথা বললেন এবং তারা বিভিন্ন কথা বললেন। তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁদের উভয়কে বললেন: হে আম্মার এবং হে মুহাম্মাদ! তোমরা বলছো যে উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) (সম্পদ) নিজের জন্য বিশেষিত করেছিলেন এবং শাসনকার্য পরিচালনা খারাপ করেছেন। আর আল্লাহর কসম, তোমরা শাস্তি দিয়েছিলে, কিন্তু তোমরা শাস্তি দিতে বাড়াবাড়ি করেছো (বা খারাপভাবে শাস্তি দিয়েছো)। তোমরা শীঘ্রই এক ন্যায়বিচারক শাসকের সামনে উপস্থিত হবে, যিনি তোমাদের মাঝে বিচার করবেন।
অতঃপর তিনি বললেন: হে মুহাম্মাদ ইবনে হাতিব! যখন তুমি মদীনায় পৌঁছবে এবং উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সম্পর্কে জিজ্ঞাসিত হবে, তখন তুমি বলবে: আল্লাহর কসম, তিনি তাদের অন্তর্ভুক্ত ছিলেন, যারা ঈমান এনেছে, অতঃপর তাকওয়া অবলম্বন করেছে ও ঈমান এনেছে, অতঃপর তাকওয়া অবলম্বন করেছে এবং সৎকর্ম করেছে। আর আল্লাহ সৎকর্মশীলদের ভালোবাসেন। আর মু'মিনগণ যেন আল্লাহর উপরই ভরসা করে।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] قوله: "فتكلم" من "تلخيص المستدرك" للذهبي، وتحرَّف في (ز) و (ب) إلى: فاغتم، وبيَّض مكانها في (ص) و (م). محمد بن حاطب، ولباقيه شواهد صحيحة.وأخرج قصة محمد بن حاطب في سؤاله لعليٍّ عن قوله في عثمان: ابن عساكر 39/ 464 من طريق أسود بن عامر، عن عبد الرحمن بن عثمان الحاطبي، بهذا الإسناد.وأخرجها أيضًا أحمد بن حنبل في "فضائل الصحابة" (770)، والآجُرِّي في "الشريعة" (1448) و (1826)، وابن عساكر 39/ 465 و 465 - 466 من طريق أبي عون محمد بن عُبيد الله الثقفي، والحسين بن إسماعيل المَحاملي في "أماليه" برواية ابن يحيى البيّع (196)، وابن عساكر 39/ 467 من طريق عبد الملك بن سفيان الثقفي، كلاهما عن محمد بن حاطب. وإسناد رواية أبي عون صحيح.ويشهد له خبر كُليب بن شهاب عند ابن أبي شيبة 15/ 248، وابن عساكر 39/ 466 من طريق عاصم بن كليب عن أبيه. وإسناده قوي.وقد رُوي عن محمد بن حاطب أنَّ عليًا أجاب في عثمان بقول غير هذا، كما أخرجه ابن أبي الدنيا في "الإشراف في منازل الأشراف" (293)، وابن عساكر 39/ 467 و 468 من طريق يوسف بن سعد مولى عثمان بن مظعون، أنَّ محمد بن حاطب قال له: لو شهدتَ اليوم شهدتَ عجبًا، اجتمع عليّ وعمار ومالك الأشتر وصعصعة بن صُوحان في هذه الدار، يعني دار نافع، فتكلم عمار فذكر عثمان، فجعل عليٌّ يتغيّر وجهه، قال: ثم تكلم مالك حذاء عمار، قال: ثم إنَّ صعصعة تكلم، فقال: يا أبا اليقظان، ما كل ما يزعم الناسُ أن عثمان أتى أتى، أو قال قائل: أول من ولي فاستأثر، وأول من تفرقت عنه الأمة، ثم إنَّ عليًا تكلم، فقال: إنا والله على الأثر الذي أتى عثمانُ، لقد سبقت له سوابق لا يعذبه الله بعدها أبدًا. وإسناده صحيح، ولا يمتنع أن يكون عليٌّ قال في ذلك اليوم عند ذلك الاجتماع كلا القولين، أحدهما أجاب فيه محمدَ بنَ حاطب، والآخر أجاب فيه أولئك النفر المذكورين.ويشهد لقصة الحسن بن علي بن أبي طالب فيما قاله لأبيه وجواب أبيه له: خبرُ قيس بن عُباد عند عبد الله بن أحمد في "السنة" (1326) و (1397)، وأبي بكر الخلال في "السنة" (748)، والطبراني في "الكبير" (203)، وابن عساكر 42/ 458. وإسناده صحيح.ويشهد لها أيضًا خبر سليمان بن صُرَد عن الحسن بن علي بن أبي طالب عند ابن أبي شيبة 15/ 285 و 288، والبلاذُري في "أنساب الأشراف" 3/ 63، وابن أبي الدنيا في "المتمنين" (97) و (155)، والحارث بن أبي أسامة في "مسنده" كما في "بغية الباحث" للهيثمي (757)، والدارقطني في "المؤتلف والمختلف" 2/ 861، والخطيب البغدادي في "موضح أوهام الجمع والتفريق" 1/ 103 - 104 من طرق صحاح عن سليمان بن صُرَد. وانظر ما سيأتي برقم (5696) و (5697). وأما قصة قتل محمد بن طلحة بن عُبيد الله يوم الجمل فمشهورة، وممَّن ذكرها أبو جَمِيلة ميسرة بن يعقوب الطُّهَوي صاحب راية عليّ يوم الجمل، أخرج ذلك عنه البخاري في "تاريخه الأوسط" (295). وإسناده صحيح.وستأتي هذه القصة مرة أخرى عند المصنّف برقم (5708) عن الحسن بن يعقوب العدل عن يحيى بن أبي طالب.
[2] خبر صحيح، وهذا إسناد ضعيف، بشار بن موسى الخَفَّاف اختُلف فيه وهو إلى الضعف أقرب، وعبد الرحمن بن محمد الحاطبي - وهو عبد الرحمن بن عثمان بن إبراهيم بن محمد بن حاطب، نسب هنا إلى جدِّ أبيه - ضعفه أبو حاتم الرازي، وذكره ابن حبان في "الثقات"، فالأقرب ضعفه، لكن رويت قصة محمد بن حاطب في سؤاله لعليٍّ عن قوله في عثمان من وجوه أخرى عن محمد بن حاطب، ولباقيه شواهد صحيحة.وأخرج قصة محمد بن حاطب في سؤاله لعليٍّ عن قوله في عثمان: ابن عساكر 39/ 464 من طريق أسود بن عامر، عن عبد الرحمن بن عثمان الحاطبي، بهذا الإسناد.وأخرجها أيضًا أحمد بن حنبل في "فضائل الصحابة" (770)، والآجُرِّي في "الشريعة" (1448) و (1826)، وابن عساكر 39/ 465 و 465 - 466 من طريق أبي عون محمد بن عُبيد الله الثقفي، والحسين بن إسماعيل المَحاملي في "أماليه" برواية ابن يحيى البيّع (196)، وابن عساكر 39/ 467 من طريق عبد الملك بن سفيان الثقفي، كلاهما عن محمد بن حاطب. وإسناد رواية أبي عون صحيح.ويشهد له خبر كُليب بن شهاب عند ابن أبي شيبة 15/ 248، وابن عساكر 39/ 466 من طريق عاصم بن كليب عن أبيه. وإسناده قوي.وقد رُوي عن محمد بن حاطب أنَّ عليًا أجاب في عثمان بقول غير هذا، كما أخرجه ابن أبي الدنيا في "الإشراف في منازل الأشراف" (293)، وابن عساكر 39/ 467 و 468 من طريق يوسف بن سعد مولى عثمان بن مظعون، أنَّ محمد بن حاطب قال له: لو شهدتَ اليوم شهدتَ عجبًا، اجتمع عليّ وعمار ومالك الأشتر وصعصعة بن صُوحان في هذه الدار، يعني دار نافع، فتكلم عمار فذكر عثمان، فجعل عليٌّ يتغيّر وجهه، قال: ثم تكلم مالك حذاء عمار، قال: ثم إنَّ صعصعة تكلم، فقال: يا أبا اليقظان، ما كل ما يزعم الناسُ أن عثمان أتى أتى، أو قال قائل: أول من ولي فاستأثر، وأول من تفرقت عنه الأمة، ثم إنَّ عليًا تكلم، فقال: إنا والله على الأثر الذي أتى عثمانُ، لقد سبقت له سوابق لا يعذبه الله بعدها أبدًا. وإسناده صحيح، ولا يمتنع أن يكون عليٌّ قال في ذلك اليوم عند ذلك الاجتماع كلا القولين، أحدهما أجاب فيه محمدَ بنَ حاطب، والآخر أجاب فيه أولئك النفر المذكورين.ويشهد لقصة الحسن بن علي بن أبي طالب فيما قاله لأبيه وجواب أبيه له: خبرُ قيس بن عُباد عند عبد الله بن أحمد في "السنة" (1326) و (1397)، وأبي بكر الخلال في "السنة" (748)، والطبراني في "الكبير" (203)، وابن عساكر 42/ 458. وإسناده صحيح.ويشهد لها أيضًا خبر سليمان بن صُرَد عن الحسن بن علي بن أبي طالب عند ابن أبي شيبة 15/ 285 و 288، والبلاذُري في "أنساب الأشراف" 3/ 63، وابن أبي الدنيا في "المتمنين" (97) و (155)، والحارث بن أبي أسامة في "مسنده" كما في "بغية الباحث" للهيثمي (757)، والدارقطني في "المؤتلف والمختلف" 2/ 861، والخطيب البغدادي في "موضح أوهام الجمع والتفريق" 1/ 103 - 104 من طرق صحاح عن سليمان بن صُرَد. وانظر ما سيأتي برقم (5696) و (5697). وأما قصة قتل محمد بن طلحة بن عُبيد الله يوم الجمل فمشهورة، وممَّن ذكرها أبو جَمِيلة ميسرة بن يعقوب الطُّهَوي صاحب راية عليّ يوم الجمل، أخرج ذلك عنه البخاري في "تاريخه الأوسط" (295). وإسناده صحيح.وستأتي هذه القصة مرة أخرى عند المصنّف برقم (5708) عن الحسن بن يعقوب العدل عن يحيى بن أبي طالب.
4608 - حَدَّثَنَا أبو عبد الله محمد بن الخليل الأصبهاني، حَدَّثَنَا موسى بن إسحاق الخَطْمي القاضي بالرّي، حَدَّثَنَا المُسيّب بن عبد الملك، حَدَّثَنَا مروان بن معاوية، عن سَوّار، عن عمرو بن سفيان قال: خطبنا عليٌّ يوم الجَمَل، فقال: أين مَرَّ وَحِيُّ القوم؟ قال: قلنا: هم صَرْعى حول الجَمَل، قال: فقال: أما بعدُ، فإنَّ هذه الإمارةَ لم يَعهَدْ إلينا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فيها عهدًا يُتّبعُ أثرُه، ولكنا رأيناها تلقاءَ أنفُسِنا، استُخلِفَ أبو بكر فأقامَ واستقام، ثم استُخلِفَ عمرُ فأقام واستقام، ثم ضَرَبَ الدهرُ بجِرانِه [1].
আমর ইবনে সুফিয়ান থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জঙ্গে জামাল-এর দিন আমাদের উদ্দেশে ভাষণ দিলেন এবং বললেন: কওমের প্রধান কেন্দ্রটি কোথায় গেল? বর্ণনাকারী বলেন, আমরা বললাম: তারা উটটির চারপাশে নিহত অবস্থায় পড়ে আছে। তিনি বললেন: অতঃপর (আম্মা বা'দু), এই শাসনভার বা নেতৃত্বের ব্যাপারে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিকট এমন কোনো প্রতিশ্রুতি বা অঙ্গীকার করে যাননি যার অনুসরণ করা আবশ্যক। কিন্তু আমরা তা আমাদের নিজেদের পক্ষ থেকে বিবেচনা করে দেখলাম। প্রথমে আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে খলীফা বানানো হলো, অতঃপর তিনি তা প্রতিষ্ঠা করলেন এবং সুপ্রতিষ্ঠিত থাকলেন। এরপর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে খলীফা বানানো হলো, অতঃপর তিনিও তা প্রতিষ্ঠা করলেন এবং সুপ্রতিষ্ঠিত থাকলেন। এরপর কাল (সময়) তার বুক চাপিয়ে দিল।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف جدًّا من أجل سوّار - وهو ابن مصعب الهَمْداني - فهو متروك الحديث، لكن روى هذا الخبر سفيانُ الثوري عن الأسود بن قيس عن عمرو بن سفيان: أن عليًا خطب … وذكره الذهبي في "تاريخ الإسلام" 1/ 834 وحسّن إسناده. كذلك رواه عن الثوري جماعةٌ.فقد أخرجه عبد الله بن أحمد في "السنة" (1334)، والدراقطني في "العلل" (442)، والخطيب البغدادي في "تاريخ بغداد" 4/ 276 - 277 من طريق عصام بن النعمان بن أبي خالد، والبيهقي في "دلائل النبوة" 7/ 223، وفي "الاعتقاد" ص 357، وابن عساكر 30/ 292 من طريق أبي داود الحَفَري، وابن عساكر 30/ 291 من طريق الحسين بن الوليد النيسابوري، ثلاثتهم عن سفيان الثوري، عن الأسود بن قيس، عن عمرو بن سفيان، قال: لما ظهر عليٌّ على الناس يوم الجمل قال … فذكره على صورة الإرسال.وأخرجه نعيم بن حماد في "الفتن" (197)، وأحمد في "المسند" 2/ (921)، وفي "فضائل الصحابة" (477)، وعبد الله بن أحمد في "السنة" (1327)، والدارقطني في "العلل" (442)، وابن عساكر 30/ 292 من طريق عبد الرزاق بن همّام، وعبد الله بن أحمد في "السنة" (1333) من طريق زيد بن الحُباب، والدارقطني في "العلل" (442) من طريق أبي يحيى عبد الحميد بن عبد الرحمن الحِمّاني، كلهم عن سفيان الثوري، عن الأسود بن قيس، عن رجل، عن علي. فأبهم هؤلاء في روايتهم عن سفيان اسم التابعي. وكذلك رواه عن سفيان أيضًا قبيصة بن عقبة فيما قاله ابن أبي حاتم في "العلل" (2638)، والخطيب، ومحمد بن يوسف الفريابي فيما قاله الخطيب في "موضح الأوهام" 1/ 209، لكن تبيَّن هذا المبهم في رواية غيرهم عن سفيان الثوري كما تقدم، فالمصير إليه.وخالف هؤلاء جميعًا في إسناده أبو عاصم الضحاك بن مخلد، فرواه عن سفيان الثوري، عن الأسود بن قيس، عن سعيد بن عمرو بن سفيان، عن أبيه. أخرجه من طريقه ابن أبي عاصم في "السنة" (127)، وعبد الله بن أحمد في "السنة" (1336)، والعقيلي في "الضعفاء" (255)، والدارقطني في "العلل" (442)، واللالكائي في "شرح أصول الاعتقاد" (2527)، وابنُ عساكر 42/ 1438 و 48/ 52، وضياء الدين المقدسي في "الأحاديث المختارة" (471). وقال أبو زرعة الرازي فيما نقله عنه ابن أبي حاتم في "العلل" (2638): ما أرى أبو عاصم صنع شيئًا فيما زاد في إسناده ابن عمرو بن سفيان.وقد روى شريك النخعيّ عند أحمد 2/ (1256) نحو الشطر الثاني من هذا الخبر في ذكر استخلاف أبي بكر وعمر، فصرَّح باسم التابعي، وهو عمرو بن سفيان.وأخرج في نفي عليٍّ عهدَ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم باستخلاف أحدٍ: أحمد بن حنبل في "المسند" 2/ (993)، وأبو داود (4530) وغيرهما، من طرق عن الحسن البصري، عن قيس بن عُباد، قال: انطلقت أنا والأشتر إلى عليّ، فقلنا: هل عهد إليك نبيّ الله صلى الله عليه وسلم عهدًا لم يعهده إلى الناس عامّة؟ قال: لا، إلّا ما في كتابي هذا، قال: وكتاب في قراب سيفه، فإذا فيه المؤمنون تَكافَأُ دماؤهم … إلخ، وإسناده صحيح.وأخرج قول عليٍّ في استخلاف أبي بكر وبعده عمر واستقامتهما في الحكم: ابن أبي شيبة 14/ 570، وعبد الله بن أحمد في زياداته على "المسند" 2/ (1055) و (1059) وفي زياداته على "فضائل الصحابة" لأبيه (72) و (427)، والآجُرّي في "الشريعة" (1804)، وابن عساكر 30/ 292 و 44/ 259، والضياء في "المختارة" (670) و (671) من طريق عبد الملك بن سَلْع، عن عبد خير الهَمْداني، عن علي قال: قُبض رسولُ الله صلى الله عليه وسلم واستُخلف أبو بكر، فعمل بعمله وسار بسيرته، حتَّى قبضه الله عز وجل على ذلك، ثم استُخلِف عمر، فعمل بعملهما وسار بسيرتهما، حتَّى قبضه الله عز وجل على ذلك. وإسناده جيد.وقد تقدَّم نحوه برقم (4475)، بإسنادٍ حسن.قوله: "ضرب الدهر بجِرانِه": أي قَرَّ قَرارُه واستقام، والجِران: باطن عنق البعير.
4609 - حَدَّثَنَا أبو العباس محمد بن يعقوب، حَدَّثَنَا الخَضِر بن أبان الهاشمي، حَدَّثَنَا علي بن قادِم، حَدَّثَنَا أبو إسرائيل، عن الحَكَم، قال: شَهِدَ مع عليٍّ صِفِّينَ ثمانون بدريًا، وخمسون ومئتان ممَّن بايَعَ تحت الشجرة [1].
আল-হাকাম থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে সিফফীনের যুদ্ধে আশি জন বদরী সাহাবী এবং গাছতলায় বাইয়াত গ্রহণকারী সাহাবীদের মধ্য হতে আড়াইশো জন উপস্থিত ছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف الخضر بن أبان الهاشمي، لكنه قد توبع، غير أنَّ هذه المتابعة لا تنفع لأنَّ أبا إسرائيل - وهو إسماعيل بن خليفة - فيه ضعفٌ أيضًا، ثم إنه اختُلف فيه على الحكم - وهو ابن عُتيبة - سندًا ومتنًا كما سيأتي بيانه.وأخرجه الخطيب في "تالي تلخيص المتشابه" 2/ 503 من طريق محمد بن عميرة النخعي، وأبو القاسم الرافعي في "التدوين في أخبار قزوين" 1/ 193 من طريق أسباط ومالك بن إسماعيل، ثلاثتهم عن أبي إسرائيل، عن الحكم.وأخرج أحمد بن حنبل في "العلل" برواية ابنه عبد الله (462)، ومن طريقه أخرجه أبو بكر الخلّال في "السنة" (726)، والعقيلي في "الضعفاء" 1/ 201، وابن عدي في "الكامل" 1/ 239، والخطيب في "تاريخ بغداد" 7/ 24 عن أمية بن خالد قال: قلت لشعبة: إنَّ أبا شيبة حَدَّثَنَا عن الحكم عن عبد الرحمن بن أبي ليلى أنه قال: شهد صفِّين من أهل بدر سبعون رجلًا، فقال: كذب والله، لقد ذاكرتُ الحكم ذاك وذكرناه في بيته، فما وجدنا شهد صفِّين أحدٌ من أهل بدر غير خُزَيمة بن ثابت. وقال الذهبي في "الميزان" بعد أن أورد هذه الرواية: سبحان الله!! أما شهدها عليّ، أما شهدها عمار؟وقد ذكر غير واحد من أهل السير والتاريخ أنه روي عن حبَّة بن جوين العُربي - وهو ضعيف غالٍ في التشيُّع - أنه حدَّث أنه كان مع عليّ يوم صفين ثمانون بدريًا، وقال الذهبي في "الميزان" في ترجمة حبَّة: هذا مُحالٌ.ونقل مُغلَطاي عن الساجي قوله: ويُبيِّن ضعفَ حبَّة العُرني أنه قال: كان مع علي ثمانون بدريًا، وهم معروفون محصور عددهم مذكور في كتب السير. قلنا: ولا نستبعد أن يكون الحكم أخذه عن حبّة العربي، فإنَّ له روايةً عنه، والله أعلم.وقال شيخُ الإسلام ابن تيمية في "منهاج السنة" 6/ 236: قيل: إنه حضرها سهل بن حُنيف وأبو أيوب. يعني من البدريين.وروي عن محمد بن سِيرِين بإسناد صحيح إليه قال: هاجت الفتنة وأصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم عشرة آلاف، فما حضر فيها مئة، بل لم يبلغوا ثلاثين. أخرجه عنه أحمد في "العلل" (4787)، ومن طريقه أبو بكر الخلال في "السنة" (728) عن إسماعيل ابن عُليَّة، عن أيوب، عن ابن سِيرِين. وسيأتي برقم (8562) من طريق معمر بن راشد، عن أيوب، عن ابن سِيرِين بلفظ: لم يَخِفَّ فيها منهم أربعون رجلًا. قال ابن تيمية في "منهاج السنة" 6/ 236: هذا الإسناد من أصحِّ إسنادٍ على وجه الأرض، ومحمد بن سِيرِين من أورع الناس في منطقه، ومراسيله من أصح المراسيل، وكلامه مقارب فما يكاد يُذكر مئة واحدٍ.
4610 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الشَّيباني، حَدَّثَنَا حامد بن أبي حامد المقرئ، حَدَّثَنَا إسحاق بن سليمان الرازي، سمعت كثيرًا أبا النضر يقول: سمعتُ رِبعيَّ بنَ حِراشٍ يقول: انطلقتُ إلى حذيفةَ بالمدائن لياليَ سارَ الناسُ إلى عثمان، فقال: يا بُنيّ، ما فعل قومُك؟ قال: عن أي حالِهم تسألُ؟ قال: مَن خرج منهم إلى هذا الرجل؟ فسمَّيتُ له رجلًا ممن خرج فقال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "من فارقَ الجماعةَ واستذلَّ الإمارةَ، لقيَ الله ولا حُجّة لَه عندَه" [1].
হুযাইফাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রিব'ঈ ইবনু খিরাশ বলেন: যখন লোকেরা উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দিকে (বিদ্রোহ করতে) রওনা হয়েছিল, তখন আমি মাদায়েনে হুযাইফাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট গেলাম। তিনি বললেন, "হে বৎস, তোমার কওম কী করেছে?" আমি বললাম, "আপনি তাদের কোন অবস্থা সম্পর্কে জানতে চাইছেন?" তিনি বললেন, "তাদের মধ্যে কে এই লোকটির দিকে বেরিয়ে গেছে?" তখন আমি তার নাম উল্লেখ করলাম যে বেরিয়ে গিয়েছিল। হুযাইফাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি জামাআত থেকে বিচ্ছিন্ন হলো এবং শাসককে তুচ্ছ জ্ঞান করল, সে আল্লাহর সাথে এমন অবস্থায় সাক্ষাৎ করবে যে, তার কাছে (আল্লাহর সামনে) তার কোনো প্রমাণ (বা অজুহাত) থাকবে না।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن، وهو مكرر ما تقدَّم برقم (414).
4611 - حَدَّثَنَا أبو علي الحافظ، أخبرنا عبد الله بن قَحْطبة الصِّلْحي، حَدَّثَنَا محمد بن الصَّباح، حَدَّثَنَا الوليد بن مسلم، عن الأوزاعي، سمعتُ ميمون بن مِهْران يَذكُر أنَّ علي بن أبي طالب قال: ما يَسُرُّني أن أخذتُ سيفي في قتلِ عثمانَ، وأنَّ ليَ الدنيا وما فيها [1].
আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন: উসমানকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হত্যার কাজে আমি যদি আমার তরবারি ব্যবহার করতাম, আর এর বিনিময়ে আমাকে দুনিয়া ও এর মধ্যে যা কিছু আছে, তা সবই দেওয়া হতো, তবুও আমি আনন্দিত হতাম না।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات، لكن ميمون بن مهران ولد سنة توفي علي بن أبي طالب، فخبره مرسل.وأخرجه أبو نُعيم بن حماد في "الفتن" (428)، وعمر بن شبَّة في "تاريخ المدينة" 4/ 1268 من طريق الوليد بن مسلم، بهذا الإسناد.وأخرجه عمر بن شبة 4/ 1268 من طريق عمرو بن أبي سلمة، عن الأوزاعي، به.على أنه صحَّ عن عليٍّ أنه تبرأ من دم عثمان ولم يرضَ بقتله، كما تقدَّم برقم (4577) بسند حسن، وصحَّ ذلك عنه من وجوه عدَّة.
4612 - حَدَّثَنَا أبو محمد المُزَني، حَدَّثَنَا أحمد بن نَجْدة القرشي، حَدَّثَنَا يحيى [1] بن عبد الحميد، حَدَّثَنَا يعقوب بن عبد الله القُمِّي، عن هارون بن عَنْترة، عن أبيه، قال: رأيت عليًّا بالخَوَرْنَق وهو على سرير، وعنده أبانُ بن عثمان، فقال: إني لأرجو أن أكونَ أنا وأبوكَ من الذين قال الله عز وجل: {وَنَزَعْنَا مَا فِي صُدُورِهِمْ مِنْ غِلٍّ إِخْوَانًا عَلَى سُرُرٍ مُتَقَابِلِينَ} [الحجر: 47] [2].
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আল-খাওয়ারনাক নামক স্থানে একটি সিংহাসনের উপর আসীন ছিলেন। তাঁর কাছে আবান ইবনু উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উপস্থিত ছিলেন। তখন তিনি বললেন: আমি আশা করি যে, আমিও তোমার পিতা (উসমান) সেই সকল লোকের অন্তর্ভুক্ত হব, যাদের সম্পর্কে আল্লাহ আযযা ওয়া জাল বলেছেন: "আর আমি তাদের অন্তর থেকে বিদ্বেষ দূর করে দেব; তারা পরস্পর ভাই ভাই হয়ে মুখোমুখি আসনে সমাসীন থাকবে।" (সূরা হিজর: ৪৭)
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: علي، وقد جاء عند المصنّف عدة أحاديث من رواية أحمد بن نجدة القرشي - وهو ابن العُريان الهَرَوي - عن يحيى بن عبد الحميد - وهو الحِمَّاني - فمن ثَمّ صوبنا الاسم هنا.
[2] خبر صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل يحيى بن عبد الحميد - وهو الحِمّاني - فهو ضعيف يُعتبر به، ورُوي ما يشهد لروايته هذه لكن دون ذكر أبان بن عثمان، بل ذكر في بعضها بنات عثمان، كما سيأتي بيانه.ومن ذلك ما أخرجه أحمد في "فضائل الصحابة" (729)، وفي "العلل" برواية ابنه عبد الله (4725)، وأبو بكر الخلّال في "السنة" (556)، وأبو بكر القَطِيعي في زياداته على "فضائل الصحابة" لأحمد (698) و (851)، والخطيب في "تاريخ بغداد" 16/ 618، وابنُ عساكر في "تاريخ دمشق" 39/ 458 من طريق أم عمر بنت حسان بن زيد، عن أبيها أبي الغُصن حسان بن زيد، عن علي. وإسناده حسن في المتابعات والشواهد.وأخرجه ابن عساكر 39/ 464 من طريق عبد الرحمن بن عثمان بن محمد بن حاطب، عن أبيه، عن جده، عن علي. وإسناده حسن في المتابعات والشواهد أيضًا.وأخرجه أحمد في "فضائل الصحابة" (758)، وأبو بكر الخلّال في "السنة" (555)، وابن الأعرابي في "معجمه" (1774)، واللالكائي في "أصول الاعتقاد" (2573)، وابن عساكر 39/ 459 من طريق عبد الرحمن بن الشَّرود - وقيل: الشَّريد - عن عليّ. وعبد الرحمن المذكور مجهول لم نتبينه.وأخرجه أبو بكر القَطِيعي في زياداته على "فضائل الصحابة" (1057)، وابن عساكر 25/ 117 - 118 - من طريق الأشعث بن عبد الملك الحُمْراني، عن محمد بن سِيرِين، عن أبي صالح، عن عليّ. ورجاله ثقات لكن أبا صالح - وهو ذكوان السمان - روايته عن علي مرسلة.وأخرجه نُعيم بن حماد في "الفتن" (194) و (374) من طريق أيوب السِّختياني، والبلاذري في "أنساب الأشراف" 6/ 111، والطبري في "تفسيره" 14/ 37 من طريق عوف الأعرابي، ومن طريق هشام بن حسان، ثلاثتهم عن محمد بن سِيرِين أن عليًا قال … فلم يذكروا أبا صالح، ورجاله ثقات، وهذا أشبه مما قبله.وأخرجه البيهقي في "الاعتقاد" ص 373 من طريق أبي جعفر محمد بن علي الباقر، قال: قال علي بن أبي طالب. ورجاله ثقات لكنه مرسل أيضًا لأنَّ محمد بن علي لم يدرك جدَّ أبيه عليًا.وأخرجه عبد الرزاق في "تفسيره" 1/ 229، والطبري في "تفسيره" 8/ 183 من طريق قتادة، قال: قال علي. ورجاله ثقات لكنه مرسل أيضًا، لأنَّ قتادة لم يدرك عليًا.وأخرجه ابن عساكر 39/ 464 - 465 من طريق عاصم بن أبي النَّجود بلفظ: دخلت إحدى بنات عثمان على عليّ فقال … ورجاله لا بأس بهم لكنه مرسل كذلك.وبمجموع ذلك يصح الخبر، والله تعالى أعلم.وقد روي مثله من قول علي بن أبي طالب رضوان الله عنه في حق طلحة بن عُبيد الله كما تقدّم برقم (3388)، وكما سيأتي برقم (5713).والخَوَرْنَق: قصر بالحيرة، وهي مدينة قرب الكوفة، كانت عاصمة لملوك اللَّخْميين قبل الفتح.
4613 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله بن أحمد بن أُمية بن مسلم القرشي بالسّاوَة، حدثني أبي، عن أبيه، عن عبد الرحمن بن مَغْراء، سمعتُ محمد بن إسحاق بن يسار يَذكُر عن شيوخه: أنَّ أم حَبيبة بنت أبي سُفيان زوجةَ رسول الله صلى الله عليه وسلم وَجَّهَتْ رسولًا إلى عبد الله بن أبي ربيعة - أخو عيّاش بن أبي ربيعة - رسولًا يخبره بقتل عثمان ووجّهَت إليه بقميصِه الذي قُتل فيه، وأثوابِه مُضرَّجاتٍ بدمِه، فلما وَرَدَ عليه الرسولُ، خرجَ إلى الناس وصَعِدَ المنبرَ وأخبرهم بقَتْله، ونَشَر قميصَه على المِنبَر، وبكى وبكي الناسُ معه، وأنشأ يقول:أتانيَ أمرٌ فيه للناسِ غُمَّةٌ … وفيه بُكاءٌ للعُيونِ طويلٌوفيه مَتاعٌ للحياةِ بذِلَّةٍ … وفيه اجتِداعٌ للأنُوفِ أصيلُمُصابُ أميرِ المؤمنينَ وهَدّةٌ … تكادُ لها [1] شُمُّ الجِبال تَزُولُتَداعَتْ عليه بالمدينةِ عُصْبةٌ … فريقانِ: منهم قاتِلٌ وخَذُولُ سأَنْعَى أبا عمرٍو بكلِّ مُهنَّدٍ … وبِيضٍ لها في الدّارِعِينَ صَليلُ [2]ولا نَومَ حتَّى يُشجَرَ [3] القومُ بالقَنَا … ويُشفى من القومِ الغُواةِ غَليلُولستُ مُقِيمًا ما حَيِيتُ ببلدةٍ … أجُرُّ بها ذَيلًا وأنت قَتيلُقال: فخرج لنُصرته بمن كان مَعَه، فلما قَرُبَ من مكةَ سَقَطَ عن راحلتِه فماتَ [4].
উম্মে হাবিবাহ বিনতে আবি সুফিয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সহধর্মিণী, থেকে বর্ণিত... তিনি আব্দুল্লাহ ইবনে আবি রাবিআহ — যিনি ছিলেন আইয়াশ ইবনে আবি রাবিআর ভাই — তার কাছে একজন দূত পাঠালেন। দূত তাকে উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর শাহাদাতের খবর দিলেন এবং এর সাথে ঐ জামাটিও পাঠালেন, যা পরিহিত অবস্থায় তিনি নিহত হয়েছিলেন, আর তাঁর রক্তে রঞ্জিত কিছু কাপড়ও পাঠালেন।
যখন দূত তার কাছে পৌঁছল, তখন তিনি জনগণের কাছে বেরিয়ে এলেন, মিম্বরে আরোহণ করলেন এবং তাদের উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিহত হওয়ার খবর দিলেন। তিনি মিম্বরের ওপর তাঁর জামাটি মেলে ধরলেন। তিনি কাঁদলেন এবং তাঁর সাথে লোকেরাও কাঁদতে লাগল। এরপর তিনি কবিতা আবৃত্তি করে বললেন:
আমার কাছে এমন এক সংবাদ এসেছে যা মানুষের জন্য চরম দুঃখের কারণ,
যাতে চোখের জন্য দীর্ঘ অশ্রুপাত রয়েছে।
তাতে রয়েছে হীনতার সাথে জীবন ধারণের সুযোগ,
এবং তাতে স্থায়ীভাবে নাক কেটে ফেলার (অপমানের) অবকাশ রয়েছে।
আমীরুল মুমিনীন-এর এই শাহাদাত এক মহাবিপর্যয়,
যার কারণে সুউচ্চ পর্বতমালাও প্রায় স্থানচ্যুত হওয়ার উপক্রম।
মদীনার একদল লোক তার ওপর চড়াও হয়েছিল;
তারা ছিল দুই ভাগে বিভক্ত: তাদের কেউ হত্যাকারী আর কেউ সাহায্য পরিত্যাগকারী।
আমি প্রত্যেক ভারতীয় (তলোয়ার) দ্বারা আবু আমর-এর হত্যার শোক জানাবো,
এবং উজ্জ্বল তলোয়ার দ্বারা, যা বর্মধারীদের মাঝে শব্দ করে।
ততক্ষণ পর্যন্ত আমি ঘুমাবো না, যতক্ষণ না বর্শা দ্বারা লোকদের আঘাত করা হয়,
আর পথভ্রষ্ট লোকদের থেকে (বদলা নিয়ে) আমার ক্ষোভ মিটানো হয়।
আমি জীবনে বেঁচে থাকতে এমন কোনো শহরে অবস্থান করব না,
যেখানে আমি (শান্তিতে) দাম্ভিকতার সাথে কাপড় টেনে চলবো, অথচ আপনি নিহত!
বর্ণনাকারী বলেন: এরপর তিনি যারা তাঁর (আব্দুল্লাহ বিন আবি রাবিআর) সাথে ছিল, তাদের নিয়ে উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে সাহায্য করার উদ্দেশ্যে বেরিয়ে পড়লেন। যখন তিনি মক্কার কাছাকাছি পৌঁছলেন, তখন তিনি তার সওয়ারি থেকে পড়ে গেলেন এবং মারা গেলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرّفت في (ز) إلى: بعادٌ لها، وفي (ص) والمطبوع إلى: يعادلها، غير أنها لم تُعجم في (ص)، وفي (م) تحرَّفت إلى: معارلها، بالراء بدلٌ الدَّال المهملة، وكل ذلك خطأ صوَّبناه من بعض كتب الأدب التي ذكرت هذه الأبيات مَعزوَّة إلى معاوية بن أبي سفيان، ومن ذلك "وقعة صفين" لنصر بن مزاحم ص 79، و"معجم الشعراء" للمرزباني ص 394، و "الجليس الصالح الكافي والأنيس الناصح الشافي "لأبي الفرج المعافى بن زكريا النَّهرواني ص 414.
[2] تحرَّفت في أصولنا الخطية إلى: هليل، بالهاء، والتصويب من "وقعة صفين" لنصر بن مزاحم ص 79، وغيره، والبِيض: جمع الأبيض، وهو السَّيف. والمعنى: بسيوف لها في الدارِعين (أي: الذين يلبسون الدروع) صليل: وهو صوت وقع السيوف في الحديد.
4613 [3] - أي: يُطعَن بالرُّمح.
4613 [4] - إسناده معضَل لم يبين فيه ابن إسحاق رواته، ولم يرو عنه إلَّا بهذا الإسناد، وفي الرواة إليه من هو مجهول الحال.
4614 - حَدَّثَنَا أبو بكر بن أبي دارِم، حَدَّثَنَا الحسين بن أبي الأحوص الثَّقَفي، حَدَّثَنَا محمد بن إسحاق البَلْخي، حَدَّثَنَا عبد الرحمن بن مَغْراء، عن مُجالِد، عن الشَّعْبِي، قال: ما سمعتُ من مَراثي عثمان شيئًا أحسنَ من قول كعب بن مالك:فكَفَّ يدَيه ثم أغلَقَ بابَهُ … وأيقَنَ أنَّ الله ليس بغَافلِوقال لأهل الدار: لا تَقتُلوهُمُ … عفا اللهُ عن كلِّ امرئ لم يُقاتِلِفكيف رأيتَ الله صَبَّ عليهمُ ال … عَداوةَ والبغضاءَ بعد التَّواصُلِوكيفَ رأيتَ الخيرَ أدبرَ بعدَه … عن الناسِ إدْبارَ الرِّياحِ الحوافِلِ [1]
শা'বি থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর প্রশংসামূলক কবিতাগুলোর (মারাসি) মধ্যে কা’ব ইবনু মালিকের এই উক্তিটির চেয়ে চমৎকার আর কিছু আমি শুনিনি:
তিনি তাঁর হাত দুটিকে গুটিয়ে নিলেন, তারপর তাঁর দরজা বন্ধ করলেন... এবং দৃঢ়ভাবে বিশ্বাস করলেন যে আল্লাহ উদাসীন নন।
আর তিনি ঘরের লোকদের বললেন: তোমরা তাদের হত্যা করো না... যে ব্যক্তি যুদ্ধ করেনি আল্লাহ তাকে ক্ষমা করুন।
তুমি কী দেখনি যে আল্লাহ কীভাবে তাদের ওপর ঢেলে দিয়েছেন... ভালোবাসা ও ঐক্যের পরে শত্রুতা ও বিদ্বেষ?
আর তুমি কী দেখোনি যে তাঁর (উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর) পরে কীভাবে কল্যাণ মানুষের থেকে মুখ ফিরিয়ে নিয়েছে... যেন প্রবল বাতাস দ্রুত মুখ ফিরিয়ে নিয়েছে?
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف جدًّا، محمد بن إسحاق البَلْخي مُتهم بالكذب مع وصفه بالحفظ، وابنُ أبي دارم على وصفه بالحفظ أيضًا ليس بعمدة، فقد قال عنه المصنّف نفسه: غير ثقة، لكن ينفرد به ابن أبي دارم، بل توبع، فيبقى الشأنُ في محمد بن إسحاق البَلْخي، ومُجالدٌ - وهو ابن سعيد - ليس بالقوي. وقد نُسبت الأبيات المذكورة لحسان بن ثابت أيضًا، وبعضهم نسبها للمغيرة بن الأخنس، وقيل: للوليد بن عُقبة بن أبي مُعيط.وأخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 39/ 537 من طريق القاسم بن محمد الدلال، عن محمد بن إسحاق البَلْخي، بهذا الإسناد.
4615 - حَدَّثَنَا أبو عبد الله محمد بن أحمد بن بُطّة، حَدَّثَنَا محمد بن عبد الله بن رُسْتَهْ الأصبهاني، حَدَّثَنَا سليمان بن داود الشاذَكُوني، حَدَّثَنَا عيسى بن يونس، عن هشام بن عُرْوة، عن أبيه، عن ابن عبّاس: أنه سُئل عن عثمانَ: ما كان على فَصِّ خاتِمِه؟ قال: كان على فَصِّ خاتِمِه من صِدق نِيَّته: اللهم أحْيِني سعيدًا، وأمِتْني شهيدًا، فوالله لقد عاشَ سعيدًا، ومات شهيدًا [1].
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে তাঁকে (ইবনে আব্বাসকে) উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল: তাঁর আংটির পাথরে কী খোদাই করা ছিল? তিনি বললেন: তাঁর আন্তরিক নিয়তের কারণে তাঁর আংটির পাথরে খোদাই করা ছিল: 'হে আল্লাহ! আমাকে সুখী জীবন দান করুন এবং শহীদ হিসেবে মৃত্যু দিন।' আল্লাহর কসম! তিনি অবশ্যই সুখী জীবন যাপন করেছেন এবং শহীদ হিসেবে মৃত্যুবরণ করেছেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف جدًّا من أجل سليمان بن داود الشاذَكُوني، فهو متروك الحديث، واتهمه بعضهم.والصحيح أن عثمان رضي الله عنه كان معه كان معه خاتم النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وكان منقوشًا عليه "محمد رسول الله" ولبسه قبله أبو بكر ثم عمر، ثم سقط منه في بئر، فاتخذ خاتمًا آخر ونقش فيه أيضًا "محمد رسول الله". أخرجه أبو داود (4220)، والنسائي (9478) من طريق المغيرة بن زياد الموصلي، عن نافع، عن ابن عمر وإسناده حسن، وأصله في "الصحيحين" لكن دون ذكر اتخاذ عثمان خاتمًا آخر، من غير طريق المغيرة بن زياد.وأخرج ابن عساكر 39/ 209 بسند لا بأس به، عن عمرو بن عثمان بن عفان، قال: كان نقش خاتم عثمان: آمنت بالذي خلق فسوَّى. وقد جزم ابن رجب في "أحكام الخواتم" ص 100 بأنَّ هذا كان نقش خاتم عثمان الجديد الذي اتخذه بعد أن سقط منه الخاتم النبوي في البئر. (307)، والخطيب البغدادي في "المتفق والمفترق" (410)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 39/ 454 - 455 من طريق يحيى بن عبد الملك بن أبي غَنيّة، عن إسماعيل بن أبي خالد، به.وأخرجه ابن أبي شيبة 15/ 208 عن محمد بن بشر، وعمر بن شَبّة في "تاريخ المدينة" 4/ 1262 عن يزيد بن هارون، وابن عساكر 39/ 454 من طريق أبي حمزة السكّري، ثلاثتهم عن إسماعيل بن أبي خالد، عن حُصين بن عبد الرحمن الحارثي، عن سرية بنت زيد بن أرقم، قالت: جاء عليٌّ يعود زيد بن أرقم …ويشهد له خبر قيس بن عُباد عن علي الذي تقدَّم برقم (4577) بسند حسن.وصحَّ عن عليٍّ من وجوه متعددة أنه تبرأ من دم عثمان كما نبَّه عليه ابن كثير وغيره.
4616 - حدثني أبو الحسن أحمد بن محمد بن إسماعيل بن مِهْران، حدثني أبي، حَدَّثَنَا هارون بن إسحاق الهَمْداني، حَدَّثَنَا عَبْدة بن سليمان، عن إسماعيل بن أبي خالد، عن حُصَين الحارثي، قال: جاء عليُّ بن أبي طالب إلى زيد بن أرقَمَ يعودُه وعندَه قومٌ، فقال عليٌّ: اسكُنوا واسكُتُوا فوالله لا تسألوني عن شيء إلَّا أخبرتُكم، فقال زيدٌ: أنشُدُكَ الله، أنت قتلتَ عثمانَ؟ فأطرَقَ عليٌّ ساعةً، ثم قال: والذي فَلَقَ الحبّةَ وبَرَأ النَّسمة، ما قَتلْتُه، ولا أمرتُ بقتلِه [1]. 4616 م - قال هارون: وحدثنا أبو أسامة، عن زهير، عن كِنانة [2]، قال: رأيت الحسنَ بن علي أُخرج من دار عثمان جَرِيحًا [3].
যায়দ ইবনু আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে দেখতে এলেন, যখন তাঁর কাছে কিছু লোক উপস্থিত ছিল। তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তোমরা স্থির হও এবং চুপ করো। আল্লাহর কসম! তোমরা আমাকে এমন কোনো বিষয় জিজ্ঞেস করবে না যার উত্তর আমি তোমাদেরকে দেব না। তখন যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি আপনাকে আল্লাহর নামে জিজ্ঞাসা করছি, আপনি কি উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে হত্যা করেছেন? আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কিছুক্ষণ মাথা নিচু করে থাকলেন, তারপর বললেন: যিনি শস্যদানা বিদীর্ণ করেছেন এবং মানবসত্তা সৃষ্টি করেছেন, তাঁর কসম! আমি তাঁকে হত্যা করিনি এবং হত্যার নির্দেশও দেইনি। কিনানাহ বলেন: আমি হাসান ইবনু আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর গৃহ থেকে আহত অবস্থায় বের হতে দেখেছি।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] خبر حسن، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم لكن حُصَينًا الحارثي - وهو ابن عبد الرحمن - لم يسمعه من عليّ بن أبي طالب، إنما حدّثَتْه بالقصة سرية بنت زيد بن أرقم، كما رواه غير واحدٍ عن إسماعيل بن أبي خالد.وأخرجه نُعيم بن حماد في "الفتن" (392)، وأحمد بن حنبل في "العلل" برواية ابنه عبد الله (307)، والخطيب البغدادي في "المتفق والمفترق" (410)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 39/ 454 - 455 من طريق يحيى بن عبد الملك بن أبي غَنيّة، عن إسماعيل بن أبي خالد، به.وأخرجه ابن أبي شيبة 15/ 208 عن محمد بن بشر، وعمر بن شَبّة في "تاريخ المدينة" 4/ 1262 عن يزيد بن هارون، وابن عساكر 39/ 454 من طريق أبي حمزة السكّري، ثلاثتهم عن إسماعيل بن أبي خالد، عن حُصين بن عبد الرحمن الحارثي، عن سرية بنت زيد بن أرقم، قالت: جاء عليٌّ يعود زيد بن أرقم …ويشهد له خبر قيس بن عُباد عن علي الذي تقدَّم برقم (4577) بسند حسن.وصحَّ عن عليٍّ من وجوه متعددة أنه تبرأ من دم عثمان كما نبَّه عليه ابن كثير وغيره.
[2] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: قتادة، وإنما هو كنانة مولى صفية بنت حُيَيّ، كما جاء في مصادر تخريج الخبر، ولأنَّ قتادة يصغُر عن إدراك عثمان ويوم الدار. وأخرجه ضمن قصة قتل عثمان المطوَّلة عمر بن شبة 4/ 1303 - 1304، والبلاذري في "أنساب الأشراف" 6/ 183 - 187، وابن عساكر 39/ 415 - 419 من طريق سعيد بن المسيب. وإسناده حسن.
4616 [3] - خبر صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل كنانة مولى صفية - يعني بنت حُييّ أم المؤمنين - فقد روى عنه جمعٌ ووثَّقه العجلي وذكره ابن حبان في "الثقات". أبو أسامة: هو حماد بن أسامة، وزهير: هو ابن معاوية.وأخرجه عمر بن شَبَّة في "تاريخ المدينة" 4/ 1275، وأبو القاسم البغوي في "الجعديات" (2665)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 39/ 392 والذهبي في "سير أعلام النبلاء" 8/ 182 من طريق علي بن الجعد، وعمر بن شبة 4/ 1275 عن الأصمعي، والبخاري في "تاريخه الكبير" 7/ 237 تعليقًا عن أحمد بن عبد الله بن يونس، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (130) من طريق خلف ابن تميم، أربعتهم عن زهير بن معاوية، به.وأخرجه إسحاق بن راهويه في "مسنده" (2088)، وعمر بن شَبَّة 4/ 1298 من طريق محمد بن طلحة بن مُصرِّف، عن كنانة، بلفظ: أُخرج من الدار أربعةُ نفر من قريش مضروبين محمولين، كانوا يدرؤون عن عثمان، فذكر الحسن بن علي وعبد الله بن الزبير ومحمد بن حاطب ومروان بن الحكم.وأخرجه عمر بن شبة 3/ 1131 و 4/ 1275، والبلاذري في "أنساب الأشراف" 6/ 217 من طريق سعدان بن بشر، عن أبي محمد الأنصاري. كلفظ زهير بن معاوية عن كنانة، والظاهر أنَّ أبا محمد الأنصاري هذا هو كنانة نفسُه، والله أعلم. وأخرجه ضمن قصة قتل عثمان المطوَّلة عمر بن شبة 4/ 1303 - 1304، والبلاذري في "أنساب الأشراف" 6/ 183 - 187، وابن عساكر 39/ 415 - 419 من طريق سعيد بن المسيب. وإسناده حسن.
4617 - أخبرنا عبد الله بن إسحاق الخُراساني، حَدَّثَنَا عبد الله بن رَوْح المَدَائني، حَدَّثَنَا شَبَابة بن سَوّار، حَدَّثَنَا محمد بن طلحة، حَدَّثَنَا كِنانة العَدَوي [1]، قال: كنتُ فيمن حاصَرَ عثمانَ، قال: قلت: محمدُ بن أبي بكر قتلَه؟ قال: لا، قتلَه جَبَلة بن الأَيْهَم رجلٌ من أهل مِصر [2].قال: وقيل: قتله قُتَيرة [3] السَّكُوني، فقُتل في الوقت، وقيل: قتلَه كِنانةُ بن بِشْر التُّجِيبي، ولعلهم اشتركُوا في قتله لعنهم الله.وقال الوليد بن عُقبة: ألا إنَّ خيرَ الناسِ بعدَ نبيِّهِ … قَتِيلُ التُّجِيبيّ الذي جاء مِن مصرِيعني بالتُّجيبي قاتلَ عثمان.
কিনানাহ আল-আদাওয়ী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি তাদের মধ্যে ছিলাম যারা উসমানকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) অবরোধ করেছিল। তিনি বলেন, আমি বললাম: মুহাম্মাদ ইবনু আবি বকর কি তাঁকে হত্যা করেছে? তিনি বললেন: না, তাঁকে হত্যা করেছে জাবালাহ ইবনুল আইহাম, যে মিশরের অধিবাসী ছিল। তিনি বলেন, এবং বলা হয়েছে: তাঁকে হত্যা করেছে কুতাইরাহ আস-সাকুনী, কিন্তু সে তখনই নিহত হয়েছিল। এবং বলা হয়েছে: তাঁকে হত্যা করেছে কিনানাহ ইবনু বিশর আত-তুজীবী। সম্ভবত তারা সকলেই তাঁকে হত্যার কাজে শরীক হয়েছিল। আল্লাহ তাদের অভিশাপ দিন। আর ওয়ালীদ ইবনু উকবাহ বলেছেন:
"সাবধান! নবীর পরে মানুষের মধ্যে শ্রেষ্ঠ হলেন... সেই তুজীবী কর্তৃক নিহত ব্যক্তি, যে মিশর থেকে এসেছিল।"
(এর দ্বারা) তিনি তুজীবী দ্বারা উসমানের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হত্যাকারীকে বুঝিয়েছেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] كذا نُسب كنانة في هذه الرواية عَدَويًّا، مع أنَّ جميع من روى هذا الخبر سمَّوه كنانة مولى صفية لم يزيدوا، ولم يذكروا نسبته.
[2] إسناده حسن كسابقه. وكنانة: هو مولى صفية، ومحمد بن طلحة: هو ابن مُصرِّف.وأخرجه ابن راهويه في "مسنده" (2088) عن أبي عامر العَقَدي، وعمر بن شبة في "تاريخ المدينة" 4/ 1298، وأبو نُعيم الأصبهاني في "معرفة الصحابة" (257)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 39/ 407 من طريق أسد بن موسى، وأبو نُعيم (254) من طريق محمد بن بكار بن الريّان، وأبو نُعيم (257)، وابن عساكر 39/ 407 من طريق محمد بن الحسن بن الزبير الأسدي، أربعتهم عن محمد بن طلحة، عن كنانة.وأخرجه ابن سعد 3/ 79، والبخاري في "تاريخه الكبير" تعليقًا 7/ 237 عن أحمد بن عبد الله بن يونس، عن زهير بن معاوية، عن كنانة، فقال في اسمه: جبلة، هكذا مطلقًا دون ذكر أبيه.وأخرجه خليفة بن خياط في "تاريخه" ص 175، ومن طريقه ابن عساكر 39/ 408 عن أبي داود الطيالسي، عن محمد بن طلحة بن مصرِّف، عن كنانة، فسماه حمارًا، وهذه رواية شاذّة، أو ربما لُقِّب جَبَلَةُ بذلك.
4617 [3] - تحرَّف في النسخ الخطية إلى: كبيرة، وهو خطأ صوَّبناه من "المؤتلف والمختلف" للدارقطني 4/ 1912.
4618 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصَّفّار، حَدَّثَنَا أحمد بن مِهْران الأصبهاني، حَدَّثَنَا عبيد الله بن موسى، حدثني أبو سِيْدان عُبيد [1] بن طُفيل: حدثني رِبْعيّ بن حِراش، عن عُثمان بن عفّان: أنه خَطَبَ إلى عمرَ ابنتَه، فردَّه، فبلغ ذلك النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، فلما أن راحَ إليه عمرُ قال: "يا عُمرُ، أدلُّك على خَتَنٍ خيرٍ لك من عُثمان، وأدلُّ عُثمانَ على خَتَنٍ [2] خيرٍ له مِنكَ" قال: نعم يا رسول الله، قال: "زَوِّجْني ابنتَك، وأُزوِّجُ عثمانَ ابنتي" [3]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
উসমান ইবনে আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে তাঁর কন্যাকে বিবাহ করার প্রস্তাব দিলেন, কিন্তু তিনি (উমর) তা প্রত্যাখ্যান করলেন। বিষয়টি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে পৌঁছাল। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন তাঁর নিকট গেলেন, তখন তিনি (নবী) বললেন: "হে উমর, আমি কি তোমাকে উসমানের চেয়ে উত্তম একজন জামাতা/শ্বশুরের সন্ধান দেব? আর আমি কি উসমানকে তোমার চেয়ে উত্তম একজন জামাতা/শ্বশুরের সন্ধান দেব?" তিনি (উমর) বললেন: "হ্যাঁ, ইয়া রাসূলাল্লাহ।" তিনি (নবী) বললেন: "তুমি তোমার কন্যাকে আমার সাথে বিবাহ দাও, আর আমি উসমানের সাথে আমার কন্যার বিবাহ দেব।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: لبيد، باللام. التي لا غضاضة فيها على عثمان في ردّ عمر له، ثم لمَّا ارتفع السبب بادر عمر فعرضها على عثمان رعاية لخاطره لما في حديث الباب، ولعلَّ عثمان بلغه ما بلغ أبا بكر مِن ذكر النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم لها، فصنع كما صنع من ترك إفشاء ذلك وردّ على عمر بجميل.
[2] لفظة "ختن" من (ص) وحدها، وهي ثابتة في رواية البيهقي في "دلائل النبوة" 3/ 159 عن أبي عبد الله الحاكم. التي لا غضاضة فيها على عثمان في ردّ عمر له، ثم لمَّا ارتفع السبب بادر عمر فعرضها على عثمان رعاية لخاطره لما في حديث الباب، ولعلَّ عثمان بلغه ما بلغ أبا بكر مِن ذكر النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم لها، فصنع كما صنع من ترك إفشاء ذلك وردّ على عمر بجميل.
4618 [3] - إسناده حسن من أجل أحمد بن مهران الأصبهاني وأبي سيدان عُبيد بن طُفيل، فهما صدوقان حسنا الحديث. وقد صحَّح هذا الخبر الطبريُّ فيما نقله عنه الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 15/ 351، وقال الضياء المقدسي في "الأحاديث المختارة" 1/ (337): إسناده لا بأس به.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 3/ 159 ومن طريقه ابن عساكر 39/ 36 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه محمد بن عبد الباقي قاضي المارستان في "مشيخته" (181)، وابن عساكر 39/ 36، والضياء المقدسي في "المختارة" (337) من طرق عن عبيد الله بن موسى، به.وقد جاء في "صحيح البخاري" (4005) عن عبد الله بن عمر: أنَّ عمر بن الخطاب هو الذي عرض حفصة على عثمان، لا كما وقع في رواية ربعي بن حراش أنَّ عثمان طلبها فردّه عمر بن الخطاب، لكن قال البيهقي في "الدلائل" 3/ 159: يحتمل أن يكون خطبها عثمانُ على ما في هذه الرواية فردّه عمرُ، ثم بدا له فعرضها عليه، فقال: سأنظر في أمري، ثم حين أحسّ بما يريد رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أن يفعل قال ما قال، والله أعلم.ونحوه قول الحافظ في "فتح الباري" 15/ 351 - 352، وزاد: وسبب ردّه يحتمل أن يكون من جهتها وهي أنها لم ترغب في التزوج عن قرب من وفاة زوجها، ويحتمل غير ذلك من الأسباب التي لا غضاضة فيها على عثمان في ردّ عمر له، ثم لمَّا ارتفع السبب بادر عمر فعرضها على عثمان رعاية لخاطره لما في حديث الباب، ولعلَّ عثمان بلغه ما بلغ أبا بكر مِن ذكر النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم لها، فصنع كما صنع من ترك إفشاء ذلك وردّ على عمر بجميل.