আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
4619 - حَدَّثَنَا علي بن حَمْشاذ، حَدَّثَنَا محمد بن مَنْدهْ الأصبهانيُّ، حَدَّثَنَا بكر بن بكّار، حَدَّثَنَا عيسى بن المسيّب البَجَلي، حَدَّثَنَا أبو زُرعة، عن أبي هريرة، قال: اشترى عثمانُ بن عفّان الجنةَ من النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم مرتَين بيع الخَلَقِ [1]: حيث حَفَر النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم بئرَ مَعُونة [2]، وحيث جهَّز جيشَ العُسْرة [3]. صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, উসমান ইবন আফ্ফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জীর্ণ বস্ত্রের বিক্রয় মূল্যের মতো দু'বার রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে জান্নাত ক্রয় করেছিলেন: যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মা'উনার কূপ খনন করিয়েছিলেন এবং যখন তিনি (উসমান) জাইশুল উসরাহকে (কষ্টের বাহিনীকে) প্রস্তুত করে দিয়েছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في "لسان العرب" و "تاج العروس": حكى ابن الأعرابي: باعه بيعَ الخَلَقِ، ولم يفسِّره. عن أبي إسحاق السبيعي، عن أبي عبد الرحمن السُّلَمي، عن عثمان أنه قال حيث حوصر: أنشدكم الله ولا أنشد إلّا أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم ألستم تعلمون أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "من حفر رُومةَ فله الجنة" فحفرتها؟ ألستم تعلمون أنه قال: "من جهز جيش العسرة فله الجنة" فجهزته؟ قال: فصدَّقوه بما قال.ففي هذه الطريق عن عثمان ما يوافق رواية المصنِّف هنا من ذكر الحفر دون الشراء، فردّ الحافظ على ابن بطال بروايةٍ عند أبي القاسم البغوي جاء فيها ذكر "عين" بدل "بئر" قال الحافظ ردًّا على ابن بطال: لا يتعيَّن الوهم، وإذا كانت أولًا عينًا فلا مانع أن يحفر فيها عثمان بئرًا، ولعلَّ العين كانت تجري إلى بئر فوسّعها وطَواها فنُسب حفرُها إليه.
[2] كذا جاء في أصول "المستدرك": بئر معونة، وهو وهمٌ الغالب أنه من جهة محمد بن مَنْدهْ الأصبهاني، فقد تُكلِّم فيه، ورواه الثقات عن بكر، فقالوا: بئر رومة، وهو الصحيح. عن أبي إسحاق السبيعي، عن أبي عبد الرحمن السُّلَمي، عن عثمان أنه قال حيث حوصر: أنشدكم الله ولا أنشد إلّا أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم ألستم تعلمون أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "من حفر رُومةَ فله الجنة" فحفرتها؟ ألستم تعلمون أنه قال: "من جهز جيش العسرة فله الجنة" فجهزته؟ قال: فصدَّقوه بما قال.ففي هذه الطريق عن عثمان ما يوافق رواية المصنِّف هنا من ذكر الحفر دون الشراء، فردّ الحافظ على ابن بطال بروايةٍ عند أبي القاسم البغوي جاء فيها ذكر "عين" بدل "بئر" قال الحافظ ردًّا على ابن بطال: لا يتعيَّن الوهم، وإذا كانت أولًا عينًا فلا مانع أن يحفر فيها عثمان بئرًا، ولعلَّ العين كانت تجري إلى بئر فوسّعها وطَواها فنُسب حفرُها إليه.
4619 [3] - إسناده ضعيف، قال ابن أبي حاتم: محمد بن مَنْده الأصبهاني لم يكن عندي بصدوق … أخرج عن بكر بن بكار والحسين بن حفص، ولم يكن سنُّه سِنَّ من يلحقهما قلنا: غير أنه لم ينفرد به، فقد تابعه جمع من الثقات، لكن بكر بن بكار وعيسى بن المسيب البجلي مختلف فيهما، وهما إلى الضعف أقرب، ولا يحتمل تفرّد مثلهما، وقد انفردا بهذا الخبر كما قال ابن عدي.أبو زرعة: هو ابن عمرو بن جَرير بن عبد الله البجلي.وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 2/ 31، ومن طريقه ابن عساكر 39/ 72 من طريق الحسن بن علي الحُلواني، وأبو نُعيم الأصبهاني في "الحلية" 1/ 58 من طريق إبراهيم بن سعدان، وابن عساكر 39/ 73 من طريق محمد بن عبد الملك الدقيقي، ثلاثتهم عن بكر بن بكار، بهذا الإسناد.والمشهور عن عثمان شراؤه بئر رومة لا حفرها كما في حديث عثمان بن عفان نفسه عند الترمذي (3703)، وعبد الله بن أحمد في زياداته على "المسند" لأبيه 1 / (555)، والنسائي (6402) و (6403)، وابن حبان (6919). وقال ابن بطال في "شرح البخاري" 8/ 204: هذا الذي نقله أهل الخبر والسير.قال ذلك ابن بطال تعليقًا على رواية البخاري التي علَّقها عن شيخه عبدان عن أبيه، عن شعبة، عن أبي إسحاق السبيعي، عن أبي عبد الرحمن السُّلَمي، عن عثمان أنه قال حيث حوصر: أنشدكم الله ولا أنشد إلّا أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم ألستم تعلمون أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "من حفر رُومةَ فله الجنة" فحفرتها؟ ألستم تعلمون أنه قال: "من جهز جيش العسرة فله الجنة" فجهزته؟ قال: فصدَّقوه بما قال.ففي هذه الطريق عن عثمان ما يوافق رواية المصنِّف هنا من ذكر الحفر دون الشراء، فردّ الحافظ على ابن بطال بروايةٍ عند أبي القاسم البغوي جاء فيها ذكر "عين" بدل "بئر" قال الحافظ ردًّا على ابن بطال: لا يتعيَّن الوهم، وإذا كانت أولًا عينًا فلا مانع أن يحفر فيها عثمان بئرًا، ولعلَّ العين كانت تجري إلى بئر فوسّعها وطَواها فنُسب حفرُها إليه.
4620 - حَدَّثَنَا أبو العباس، حَدَّثَنَا أحمد بن عبد الجبار، حَدَّثَنَا عبد الله بن إدريس، عن الحسن بن فُرات القَزّاز، عن أبيه، عن عُمير بن سعيد، قال: أراد عليّ أن يَسيرَ إلى الشام إلى صِفِّين، اجتمعتِ النَّخَعُ حتَّى دخَلُوا على الأشتَر بيتَه، فقال: هل في البيت إلَّا نَخَعيٌّ؟ قالوا: لا، قال: إِنَّ هذه الأمةَ عَمَدَت إلى خيرِ أهلِها فقتَلُوه - يعني عثمانَ - وإنَّا قاتلْنا أهلَ البصرةِ ببيعةٍ تأوّلْنا عَينَه [1]، وإنكم تَسِيرون إلى قومٍ ليس لنا عليهم بيعةٌ، فلينظُر امرؤٌ أين يضعُ سيفَه [2].هذا حديثٌ وإن لم يكن له سندٌ فإنه مَعقِدٌ، صحيح الإسناد، في هذا المَوضِع. ومن مناقب أمير المؤمنين علي بن أبي طالب رضي الله عنه ممّا لم يُخرجاه
উমাইর ইবনে সাঈদ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন সিফফীনের উদ্দেশ্যে শামের দিকে যাত্রা করার ইচ্ছা করলেন, তখন নাখা' গোত্রের লোকেরা একত্রিত হলো এবং তারা আল-আশতারের বাড়িতে প্রবেশ করল। অতঃপর সে (আল-আশতার) জিজ্ঞেস করল: এই ঘরে কি নাখা' গোত্রের লোক ছাড়া আর কেউ আছে? তারা বলল: না। সে বলল: এই উম্মত ইচ্ছাকৃতভাবে তাদের মধ্যেকার শ্রেষ্ঠ ব্যক্তিকে হত্যা করেছে – অর্থাৎ উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে। আর আমরা বাসরাবাসীদের সাথে এমন এক বাইআতের ভিত্তিতে যুদ্ধ করেছি যার মূলভাবকে আমরা ব্যাখ্যা করেছি। কিন্তু তোমরা এমন এক কওমের দিকে যাচ্ছ যাদের সাথে আমাদের কোনো বাইআত নেই। অতএব, প্রত্যেক ব্যক্তি যেন ভালোভাবে দেখে নেয় যে সে তার তলোয়ার কোথায় ব্যবহার করছে।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] الظاهر أنَّ معناه: تأولنا عين ذلك القتال، فلا تتجاوزوه إلى غيره.
[2] خبر صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل أحمد بن عبد الجبار - وهو العُطاردي. وقد توبع.وأخرجه ابن أبي شيبة 11/ 112 و 15/ 265، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 56/ 386 من طريق عبد الله بن إدريس، بهذا الإسناد.
4621 - سمعت القاضيَ أبا الحسن علي بن الحسن الجَرَّاحي وأبا الحسين محمد بن المُظفَّر الحافظ، يقولان: سمعنا أبا حامد محمد بن هارون الحَضْرمي يقول: سمعت محمد بن منصور الطُّوسِي يقول: سمعت أحمدَ بن حنبل يقول: ما جاء لأحدٍ من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم من الفضائل ما جاء لِعليّ بن أبي طالب رضي الله عنه [1].
আহমদ বিন হাম্বল থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণের মধ্যে অন্য কারও জন্য এত ফযীলত আসেনি, যা আলী ইবনে আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জন্য এসেছে।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح.وأخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 42/ 418 وأبو إسحاق الثعلبي في "تفسيره" 4/ 81، وابن الجزري في "مناقب الأسد الغالب علي بن أبي طالب" (1) من طريق أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.قال البيهقي فيما نقله عنه ابن عساكر: هذا لأنَّ أمير المؤمنين عليًّا عاش بعد سائر الخلفاء حتَّى ظهر له مخالفون وخرج عليه خارجون، فاحتاج من بقي من الصحابة إلى رواية ما سمعوه في فضائله ومراتبه ومناقبه ومحاسنه، ليَردُّوا بذلك عنه ما لا يليق به من القول والفعل، وهو أهل كل فضيلة ومنقَبِة، ومستحقٌّ لكل سابقة ومرتبة، ولم يكن أحدٌ في وقته أحقَّ بالخلافة منه، وكان في قُعوده عن الطلب قبله مُحقًّا، وفي طلبه في وقته مستحقًّا.
4622 - سمعت أبا العباس محمد بن يعقوب يقول: سمعتُ العباس بن محمد الدُّوري يقول: سمعت يحيى بن مَعِين يقول: اسمُ أبي طالب عبدُ مناف [1].قال الحاكم: وهكذا ذكره زيادٌ عن [2] محمد بن إسحاق، وقد تواترت الأخبار بأنَّ أبا طالب كنيته اسمه، والله أعلم [3].
৪৬২২ - আমি আবুল আব্বাস মুহাম্মাদ বিন ইয়াকুবকে বলতে শুনেছি: তিনি আব্বাস বিন মুহাম্মাদ আদ-দূরীকে বলতে শুনেছেন: তিনি ইয়াহইয়া বিন মাঈনকে বলতে শুনেছেন: আবু তালিবের নাম হলো আব্দে মানাফ।
আল-হাকিম (রাহ.) বলেন: মুহাম্মাদ বিন ইসহাক থেকে যিয়াদও এভাবে এটি উল্লেখ করেছেন। তবে, একাধিক সূত্রে (তাওয়াতুর) খবর এসেছে যে আবু তালিবের উপনামই (কুনিয়াত) তাঁর আসল নাম ছিল। আল্লাহই সর্বাধিক অবগত।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وهو في "تاريخ ابن مَعِين" رواية العباس الدوري (83).
[2] تحرَّفت في (ص) و (ب) إلى: بن وفي (ز) و (م): زياد محمد بن إسحاق، بحذف حرف "عن" بين زياد وبين محمد! وزياد: هو ابن عبد الله البكّائي، أحد رواة السيرة عن ابن إسحاق.
4622 [3] - وعبارة الحاكم في "علوم الحديث" ص 184: وهكذا ذكره أحمد بن حنبل عن الشافعي، وأكثر المتقدمين على أن اسمه كنيته، فالله أعلم.
4623 - سمعت أبا العباس يقول: سمعت العباس بن محمد يقول: سمعت يحيى بن مَعِين يقول: أمُّ علي بن أبي طالب فاطمةُ بنتُ أسَد بن هاشم [1].
ইয়াহইয়া ইবনু মাঈন থেকে বর্ণিত, আলী ইবনু আবী তালিবের মাতা হলেন ফাতিমা বিনত আসাদ ইবনু হাশিম।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وهو في "تاريخ ابن مَعِين" برواية العباس الدُّوري (103).
4624 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حَدَّثَنَا إبراهيم بن إسحاق الحَرْبي، حَدَّثَنَا مصعب بن عبد الله الزُّبيري، قال: كانت فاطمةُ بنت أسَد بن هاشم أولَ هاشمية وَلَدَت من هاشمي، وكانت بمحلٍّ عظيمٍ من الإيمان في عهدِ رسول الله صلى الله عليه وسلم، وتُوفِّيت في حياة رسول الله صلى الله عليه وسلم، وصلّى عليها، وكان اسمَ عليٍّ أسدٌ، ولذلك يقول:أنا الذي سَمَّتْني أمي حَيدَرهْ [1]
মুসআব ইবনু আবদুল্লাহ আয-যুবাইরী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: ফাতেমা বিনতে আসাদ ইবনু হাশিমই ছিলেন প্রথম হাশেমী নারী, যিনি একজন হাশেমীর সন্তান জন্ম দিয়েছিলেন। তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে ঈমানের ক্ষেত্রে এক মহান মর্যাদার অধিকারী ছিলেন। তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জীবদ্দশাতেই মৃত্যুবরণ করেন এবং তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর জানাযার সালাত আদায় করেন। আর আলীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) (আসলে) নাম ছিল আসাদ। আর একারণেই তিনি বলেন: "আমিই সেই, যাকে আমার মা 'হায়দারা' নামে ডেকেছিলেন।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وأخرجه ابن أبي خيثمة في السفر الثاني من "تاريخه" (1276)، ومن طريقه أبو الحسن بن المغازلي في "مناقب علي" (2) عن مصعب الزبيري. دون ذكر وفاتها والصلاة عليها، ودون ذكر تسمية علي أسدًا. وقد رُوي نحو قصة وفاة فاطمة بنت أسد والصلاة عليها وتكفينها ودفنها من حديث أنس بن مالك عند الطبراني في "الكبير" 24/ (871)، و "الأوسط" (189)، وأبي نعيم في "حلية الأولياء" 3/ 121، وابن الجوزي في "العلل المتناهية" (433)، وفي إسناده روح بن صلاح وثقه الحاكم وذكره ابن حبان في "الثقات"، وضعفه ابن عدي والدارقطني وغيرهما فالأقرب ضعفه، وقد تفرد بهذا الحديث عن أنس كما قال الطبراني وأبو نُعيم. وقد ذُكر فيه التكبير على فاطمة أربعًا لا سبعين تكبيرة.ورويت قصة فاطمة أيضًا مختصرة من حديث عبد الله بن عبّاس عند أبي الفرج الأصبهاني في "مقاتل الطالبيين" ص 28، والطبراني في "الأوسط" (6935)، وأبي نعيم في "معرفة الصحابة" (289) و (7782)، وأبي القاسم الأصبهاني في "الحجة في بيان المحجة" (287). وفي إسناده سعدان بن الوليد بيّاع السابِرِيّ، وهو مجهول لا يُعرف، وانفرد به عن عطاء بن أبي رباح عن ابن عبّاس.ورويت قصة دفنها أيضًا من حديث جابر بن عبد الله عند عمر بن شبة في "تاريخ المدينة" 1/ 124 بسندٍ فيه متروكان.
4625 - حدثني بُكير بن محمد الحَدّاد الصُّوفي بمكة، حَدَّثَنَا الحسن بن علي بن شَبيب المَعمَري، حَدَّثَنَا عبد الرحمن بن عمرو بن جَبَلة الباهلي، حَدَّثَنَا أبي، عن الزُّبير بن سعيد القرشي، قال: كنا جلوسًا عند سعيد بن المسيّب، فمرَّ بنا علي بن الحُسين، ولم أرَ هاشِميًّا قط كان أعبدَ للهِ منه، فقام إليه سعيدُ بن المسيّب وقُمنا معه، فسلَّمْنا عليه، فردّ علينا، فقال له سعيد: يا أبا محمد، أخبرنا عن فاطمةَ بنت أسد بن هاشم أمِّ علي بن أبي طالب قال: نعم، حدثني أبي، قال: سمعتُ أمير المؤمنين علي بن أبي طالب يقول: لما ماتت فاطمةُ بنت أسد بن هاشم كفّنها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في قميصِه، وصلَّى عليها، وكبَّر عليها سبعين تكبيرةً، ونزل في قبرها، فجعل يُومِي في نواحي القبر كأنه يُوسعُه ويُسوِّي عليها، وخرج من قبرها وعيناهُ تَذرِفان، وحَثَا في قبرها، فلما ذهب قال له عمرُ بن الخطّاب: يا رسول الله، رأيتُك فعلتَ على هذه المرأة شيئًا لم تفعلْه على أحدٍ، فقال: "يا عمرُ، إِنَّ هذه المرأةَ كانت أمّي بعد أُمّي التي وَلَدَتني، إنَّ أبا طالبٍ كان يصنع الصَّنيعَ، وتكون له المأدُبةُ، وكان يَجْمَعُنا على طعامِه، فكانت هذه المرأةُ تَفصِلُ منه كلَّه نَصِيبَنا فأعودُ فيه، وإنَّ جبريل عليه السلام أخبرني عن ربِّي عز وجل أنها من أهل الجنة، وأخبرني جبريلُ عليه السلام: أنَّ الله تبارك وتعالى أمَرَ سبعين ألفًا من الملائكة يُصلُّون عليها" [1].
আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন ফাতিমা বিনতে আসাদ বিন হাশিম (আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মাতা) মারা গেলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে তাঁর নিজের জামা দিয়ে কাফন দিলেন, তাঁর জানাযার সালাত আদায় করলেন এবং সত্তরবার তাকবীর বললেন। তিনি তাঁর কবরে নামলেন এবং কবরের চারপাশের দিকে ইশারা করছিলেন, যেন তিনি কবরটি প্রশস্ত করছেন ও তা ঠিক করছেন। এরপর তিনি কবর থেকে বের হলেন, আর তাঁর চোখদ্বয় অশ্রুসিক্ত ছিল। তিনি কবরের উপর মাটি দিলেন। যখন তিনি (কবর থেকে) চলে গেলেন, তখন উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি দেখলাম আপনি এই মহিলার জন্য এমন কিছু করলেন, যা অন্য কারো জন্য করেননি।" তিনি বললেন: "হে উমার! এই মহিলা আমার জন্মদাত্রী মায়ের পর আমার মা ছিলেন। আবূ তালিব কোনো ভালো কাজ করলে এবং তাঁর জন্য ভোজের আয়োজন করা হলে, তিনি আমাদের সকলকে তাঁর খাবারের জন্য একত্রিত করতেন। তখন এই মহিলা ঐ খাবার থেকে আমাদের অংশটুকু পৃথক করে দিতেন, যা আমি খেতাম। আর জিবরীল (আঃ) আমাকে আমার প্রতিপালক আযযা ওয়া জাল্লা-র পক্ষ থেকে খবর দিয়েছেন যে, তিনি জান্নাতবাসী। জিবরীল (আঃ) আমাকে আরও খবর দিয়েছেন যে, আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তাআলা সত্তর হাজার ফেরেশতাকে তাঁর উপর সালাত (জানাযা) আদায় করার আদেশ করেছেন।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده تالف، عبد الرحمن بن عمرو بن جَبَلة كذّبه أبو حاتم الرازي والدارقطني، وأبوه مجهول لا يُعرف. وقد رُوي نحو قصة وفاة فاطمة بنت أسد والصلاة عليها وتكفينها ودفنها من حديث أنس بن مالك عند الطبراني في "الكبير" 24/ (871)، و "الأوسط" (189)، وأبي نعيم في "حلية الأولياء" 3/ 121، وابن الجوزي في "العلل المتناهية" (433)، وفي إسناده روح بن صلاح وثقه الحاكم وذكره ابن حبان في "الثقات"، وضعفه ابن عدي والدارقطني وغيرهما فالأقرب ضعفه، وقد تفرد بهذا الحديث عن أنس كما قال الطبراني وأبو نُعيم. وقد ذُكر فيه التكبير على فاطمة أربعًا لا سبعين تكبيرة.ورويت قصة فاطمة أيضًا مختصرة من حديث عبد الله بن عبّاس عند أبي الفرج الأصبهاني في "مقاتل الطالبيين" ص 28، والطبراني في "الأوسط" (6935)، وأبي نعيم في "معرفة الصحابة" (289) و (7782)، وأبي القاسم الأصبهاني في "الحجة في بيان المحجة" (287). وفي إسناده سعدان بن الوليد بيّاع السابِرِيّ، وهو مجهول لا يُعرف، وانفرد به عن عطاء بن أبي رباح عن ابن عبّاس.ورويت قصة دفنها أيضًا من حديث جابر بن عبد الله عند عمر بن شبة في "تاريخ المدينة" 1/ 124 بسندٍ فيه متروكان.
4626 - حَدَّثَنَا أبو العباس محمد بن يعقوب، حَدَّثَنَا محمد بن سِنان القَزّاز، حَدَّثَنَا عُبيد الله بن عبد المجيد الحَنَفي.وأخبرني أحمد بن جعفر القَطِيعي، حَدَّثَنَا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حَدَّثَنَا أبو بكر الحَنَفي، حَدَّثَنَا بُكير بن مِسمار قال: سمعت عامر بن سعد يقول: قال معاوية لسعد بن أبي وقّاص: ما يَمنعُك أن تَسُبَّ ابن أبي طالب؟ قال: فقال: لا أسبُّه ما ذكرتُ ثلاثًا قالهن له رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، لأن تكونَ لى واحدةٌ منهن أحبُّ إليَّ من حُمْر النَّعَم، قال له معاوية: ما هُنّ يا أبا إسحاق، قال: لا أسبُّه ما ذكرتُ حين نزل عليه الوحيُ فأخذ عليًّا وابنَيه وفاطمةَ فأدخلَهم تحت ثوبِه، ثم قال: "ربِّ إِنَّ هؤلاء أهلُ بيتي"، ولا أسبُّه حين خَلَّفه في غزوة تَبوك، غزاها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فقال له عليٌّ: خَلَّفْتَني مع الصبيان والنساء، قال: "ألا تَرضَى أن تكون مني بمَنزلةِ هارونَ من موسى، إلَّا أنه لا نُبوّةَ بعدي"، ولا أسبُّه ما ذكرتُ يومَ خيبر، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لأُعطِيَنَّ هذه الرايةَ رجلًا يحبُّ الله ورسولَه، ويفتحُ الله على يديه"، فتطاوَلْنا لرسولِ الله صلى الله عليه وسلم، فقال: "أين عليٌّ؟ " فقالوا: هو أرمَدُ، فقال: "ادعُوه" فدعَوه، فَبَصَقَ في عَينيه [1]، ثم أعطاه الرايةَ، ففتحَ الله عليه. قال: فلا واللهِ ما ذَكَره معاويةُ بحرفٍ حتَّى خرجَ من المدينة [2]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بهذه السِّياقة، وقد اتفقا جميعًا على إخراج حديثِ المؤاخاة [3]، وحديث الراية [4].
সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে (সা'দকে) বললেন: ইবনু আবী তালিবকে (আলীকে) গালি দিতে তোমাকে কিসে বাধা দেয়?
তিনি (সা'দ) বললেন: আমি তাঁকে গালি দেব না যতক্ষণ আমার সেই তিনটি কথা মনে থাকবে যা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে (আলীকে) বলেছিলেন। যদি সেগুলোর মধ্যে একটিও আমার জন্য হতো, তবে তা আমার কাছে লাল রঙের উটের (সর্বোত্তম সম্পদ) চেয়েও অধিক প্রিয় হতো।
মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: হে আবূ ইসহাক, সেগুলো কী?
তিনি (সা'দ) বললেন: আমি তাঁকে গালি দেব না যতক্ষণ আমার মনে থাকবে যখন তাঁর (রাসূলের) উপর ওহী নাযিল হয়েছিল, তখন তিনি আলী, তাঁর দুই পুত্র (হাসান ও হুসাইন) এবং ফাতিমাকে নিলেন এবং তাঁদেরকে তাঁর কাপড়ের নিচে প্রবেশ করালেন। অতঃপর তিনি বললেন: "হে আমার রব! নিশ্চয়ই এরা আমার আহলে বাইত (পরিবার)।"
আর আমি তাঁকে গালি দেব না যতক্ষণ আমার মনে থাকবে যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাবুক যুদ্ধ অভিযানে বের হয়েছিলেন এবং তাঁকে (আলীকে) মদীনায় রেখে গিয়েছিলেন। তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বলেছিলেন: আপনি কি আমাকে শিশু ও নারীদের সাথে রেখে যাচ্ছেন? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি কি এতে সন্তুষ্ট নও যে, মূসার নিকট হারুনের যে মর্যাদা ছিল, আমার নিকট তোমারও সেই মর্যাদা থাকবে? তবে আমার পরে কোনো নবুওয়াত নেই।"
আর আমি তাঁকে গালি দেব না যতক্ষণ আমার মনে থাকবে খায়বারের দিনের ঘটনা। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছিলেন: "আমি অবশ্যই এমন এক ব্যক্তিকে এই পতাকা দেব, যে আল্লাহ ও তাঁর রাসূলকে ভালোবাসে এবং আল্লাহ যার হাতে বিজয় দান করবেন।" আমরা (সাহাবীগণ) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর (কাছ থেকে পতাকা নিতে) মাথা উঁচু করে দাঁড়ালাম। অতঃপর তিনি বললেন: "আলী কোথায়?" তারা বলল: তিনি চক্ষু রোগে ভুগছেন (আরমাদ)। তিনি বললেন: "তাকে ডেকে আনো।" তারা তাঁকে ডেকে আনল। অতঃপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর দুই চোখে থুতু দিলেন, তারপর তাঁকে পতাকা দিলেন। ফলে আল্লাহ তাঁর হাতে বিজয় দান করলেন।
(সা'দ) বললেন: আল্লাহর কসম, এরপর মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মদীনা থেকে চলে না যাওয়া পর্যন্ত একটি অক্ষরও তাঁর (আলী সম্পর্কে) উল্লেখ করেননি।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] المثبت من (ص) و (م)، وفي (ز) و (ب): في وجهه. وفي (ز) وحدها: فبسق، بالسين بدلٌ الصاد وكلاهما مستعمل في اللغة. وستأتي القصة الأُولى مفردةً عند المصنّف برقم (4759) من طريق علي بن ثابت الجزري، وبرقم (4770) من طريق حاتم بن إسماعيل، كلاهما عن بكير بن مسمار.وسيأتي بسياق آخر برقم (4651) من طريق خيثمة بن عبد الرحمن عن سعد.وأخرج النسائي (8423) من طريق أبي بكر بن خالد بن عُرفطة، قال: رأيت سعد بن مالك (وهو ابن أبي وقاص) بالمدينة، فقال: ذكر أنكم تسبُّون عليًا، قلتُ: قد فعلنا، قال: لعلك سببتَه؟ قلت: معاذ الله، قال: لا تسبَّه، فإن وُضع المنشار على مفرقي على أن أسبّ عليًا ما سببتُه بعدما سمعتُ من رسول الله صلى الله عليه وسلم ما سمعتُ. وقوّى إسنادَه الحافظ في "فتح الباري" 11/ 144.ويشهد للقصص الثلاث المذكورة في رواية المصنّف حديثُ ابن عبّاس الآتي برقم (4702)، وانظر شواهدها هناك.والمراد بالسبِّ في رواية بكير بن مسمار النَّيلُ من علي بن أبي طالب وتنقُّصُه، وليس الشتم، كما توضحه رواية ابن سابِطٍ المذكورة.
[2] حديث صحيح، وهذا إسناد جيد، من جهة أبي بكر الحنفي - واسمه عبد الكبير بن عبد المجيد، وهو أخو عبيد الله - وذلك من أجل بُكير بن مسمار فهو صدوق لا بأس به. ومحمد بن سنان القَزَّاز في الإسناد الآخَر - وإن تُكلِّم فيه - متابع. وقد رُوي نحوه من وجوه أخر عن سعد بن أبي وقاص، ولفضائل علي المذكورة فيه شواهد أيضًا.وأخرجه النسائي (8385) عن محمد بن المثنى، عن أبي بكر الحنفي، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 3/ (1608)، ومسلم (2404) (32)، والترمذي (3724)، والنسائي (8342) من طريق حاتم بن إسماعيل، عن بكير بن مسمار، به. وجاء في روايتهم غير النسائي أن قصة تجليل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم لعليٍّ وفاطمة وابنيهما بالثوب بعد نزول آية المُباهَلة. وعند النسائي: أنها بعد نزول آية الأحزاب: {إِنَّمَا يُرِيدُ اللَّهُ لِيُذْهِبَ عَنكُمُ الرَّجْسَ أَهْلَ الْبَيْتِ وَيُطَهِّرَكُمْ تَطْهِيرًا}؛ وهو الموافق لروايات الصحابة الذين رووا نحو هذه القصة، وسيأتي ذكرها عند حديث ابن عبّاس برقم (4702).وأخرجه بنحوه النسائي (8458) من طريق أبي نَجيح المكيّ: أنَّ معاوية ذكر عليَّ بن أبي طالب، فقال سعد بن أبي وقاص … فذكر نحوه، غير أنه ذكر بدلٌ القصة الأُولى قول سعد: ولأن أكون كنت صهره على ابنته، لي منها من الولد ما له، أحب إليَّ من أن يكون لي ما طلعت عليه الشمس. ورجاله لا بأس بهم، لكنه مرسل كما هو ظاهر.وأخرجه بنحوه أيضًا ابن ماجه (121)، والنسائي (8343) من طريق عبد الرحمن بن سابِطٍ، عن سعد بن أبي وقاص. ورجاله ثقات، لكن جزم ابن مَعِين بأنَّ ابن سابط لم يسمع من سعدٍ. وقد جاء في رواية ابن سابطٍ هذه بدلٌ القصة الأُولى قول النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم لعليٍّ: "من كنتُ مولاه فعليٌّ مولاه". وجاء في أولها أنَّ معاوية نال من عليٍّ، فرد عليه سعد بذكر فضائل عليٍّ تلك.وأخرج حديث المؤاخاة مفردًا أحمد 3/ (1463) و (1490) و (1505) و (1583) و (1600)، والبخاري (3706) و (4416)، ومسلم (2404)، وابن ماجه (115)، والترمذي (3731)، والنسائي (8082 - 8086) و (8375 - 8384) و (8386 - 8392) من طرق عن سعد بن أبي وقاص. وستأتي القصة الأُولى مفردةً عند المصنّف برقم (4759) من طريق علي بن ثابت الجزري، وبرقم (4770) من طريق حاتم بن إسماعيل، كلاهما عن بكير بن مسمار.وسيأتي بسياق آخر برقم (4651) من طريق خيثمة بن عبد الرحمن عن سعد.وأخرج النسائي (8423) من طريق أبي بكر بن خالد بن عُرفطة، قال: رأيت سعد بن مالك (وهو ابن أبي وقاص) بالمدينة، فقال: ذكر أنكم تسبُّون عليًا، قلتُ: قد فعلنا، قال: لعلك سببتَه؟ قلت: معاذ الله، قال: لا تسبَّه، فإن وُضع المنشار على مفرقي على أن أسبّ عليًا ما سببتُه بعدما سمعتُ من رسول الله صلى الله عليه وسلم ما سمعتُ. وقوّى إسنادَه الحافظ في "فتح الباري" 11/ 144.ويشهد للقصص الثلاث المذكورة في رواية المصنّف حديثُ ابن عبّاس الآتي برقم (4702)، وانظر شواهدها هناك.والمراد بالسبِّ في رواية بكير بن مسمار النَّيلُ من علي بن أبي طالب وتنقُّصُه، وليس الشتم، كما توضحه رواية ابن سابِطٍ المذكورة.
4626 [3] - يعني قول النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم لعليّ: "ألا ترضى أن تكون مني بمنزلة هارون من موسى".
4626 [4] - حديث الراية اتفقا عليه من حديث سهل بن سعد وسلمة بن الأكوع، فقد أخرجه البخاري (2942) ومسلم (2406) من حديث سهل بن سعد، وأخرجه البخاري (2975) ومسلم (2407) من حديث سلمة بن الأكوع.
4627 - حَدَّثَنَا أبو الحسين محمد بن أحمد بن تميم الحَنْظَلي ببغداد، حَدَّثَنَا أبو قِلابة عبد الملك بن محمد الرَّقاشي، حَدَّثَنَا يحيى بن حمّاد.وحدثني أبو بكر محمد بن بالَوَيهِ وأبو بكر أحمد بن جعفر البزّار، قالا: حَدَّثَنَا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حَدَّثَنَا يحيى بن حمّاد.وحدثنا أبو نصر أحمد بن سهل الفقيه ببُخارى، حَدَّثَنَا صالح بن محمد الحافظ البغدادي، حَدَّثَنَا خَلَف بن سالم المُخرِّمي، حَدَّثَنَا يحيى بن حماد، حَدَّثَنَا أبو عَوَانة، عن سُليمان الأعمَش، قال: حَدَّثَنَا حبيب بن أبي ثابت، عن أبي الطُّفَيل، عن زيد بن أرقَمَ قال: لما رجعَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم من حجّة الوَداع، ونزل غَديرَ خُمٍّ، أَمَرَ بدَوحاتٍ فَقُمِمْنَ، قال: "كأني قد دُعِيتُ فأجبتُ، إني قد تركتُ فيكم الثَّقَلين، أحدُهما أكبرُ من الآخَر: كتابَ الله تعالى، وعِتْرَتي، فانظُروا كيف تَخلُفوني فيهما، فإنهما لن يتفرّقا حتَّى يَرِدا عليَّ الحوضَ". ثم قال: "إنَّ الله عز وجل مولاي، وأنا وليُّ كلّ مُؤمِن"، ثم أخذ بيد عليٍّ فقال: "مَن كنتُ وليَّه فهذا وَليُّه، اللهمَّ والِ [من والاهُ، وعادِ مَن عادَاه] [1] " وذكر الحديث بطُوله [2]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بطُوله.شاهدُه حديث سلمة بن كُهيل عن أبي الطُّفيل أيضًا صحيح على شرطهما:
যায়েদ ইবনে আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বিদায় হজ (হাজ্জাতুল বিদা) থেকে ফিরছিলেন এবং গাদীর খুম নামক স্থানে অবতরণ করলেন, তখন তিনি কিছু গাছের নিচে পরিষ্কার করার নির্দেশ দিলেন। তিনি বললেন: "মনে হচ্ছে আমাকে ডাকা হয়েছে এবং আমি সেই ডাকে সাড়া দিয়েছি। আমি তোমাদের মাঝে দুটি ভারী জিনিস (আস-সাকালাইন) রেখে যাচ্ছি, যার একটি অপরটি থেকে বৃহৎ: আল্লাহর কিতাব এবং আমার বংশধরগণ (ইতরাতি)। তোমরা দেখবে যে তোমরা আমার পরে এই দুটির সাথে কেমন ব্যবহার করো। কেননা এই দুটি কখনোই বিচ্ছিন্ন হবে না, যতক্ষণ না তারা হাউযের (হাউয কাউসার) নিকট আমার সাথে মিলিত হয়।" এরপর তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ আযযা ওয়া জাল আমার অভিভাবক (মাওলা), এবং আমি প্রত্যেক মুমিনের অভিভাবক (ওয়ালী)।" এরপর তিনি আলীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হাত ধরলেন এবং বললেন: "আমি যার ওয়ালী (অভিভাবক), এ (আলী)-ও তার ওয়ালী (অভিভাবক)। হে আল্লাহ! যে তাকে ভালোবাসে, তুমিও তাকে ভালোবাসো, আর যে তার সাথে শত্রুতা পোষণ করে, তুমিও তার সাথে শত্রুতা পোষণ করো।" তিনি সম্পূর্ণ হাদীসটি উল্লেখ করলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] ما بين المعقوفين لم يرد في أصولنا الخطيّة، ومكانه في (ز) و (ص) بياض، وهو ثابت في رواية يحيى بن حماد عن أبي عوانة عند النسائي (8092) و (8410) وغيره، ورواه أيضًا شريك النخعي عن الأعمش عند عبد الله بن أحمد بن حنبل في زياداته على "المسند" 2/ (951)، والبزار (4300) وغيرهما. وبه يكون اللفظ أوضح، فلذلك أثبتناه. وسيأتي الخبر بعده بشطريه من طريق محمد بن سلمة بن كهيل، عن أبيه، عن أبي الطفيل.وسيأتي أيضًا برقم (6403) من طريق كامل أبي العلاء، عن حبيب بن أبي ثابت، عن يحيى بن جعدة، عن زيد بن أرقم.وأخرجه كذلك أحمد 32 / (19279) من طريق عطية العوفي، و (19325) و (19328) من طريق ميمون أبي عبد الله، و 38 / (23143) من طريق أبي سليمان يزيد بن عبد الله مؤذن الحجاج، ثلاثتهم عن زيد بن أرقم.وقال الذهبي في "سير أعلام النبلاء" في ترجمة محمد بن جَرير الطبري 14/ 277: جمعَ الطبريُّ طرقَ حديث غدير خُمٍّ في أربعة أجزاء، رأيت شطره، فبهرني سعةُ رواياته، وجزمتُ بوقوع ذلك.وقد صنَّف الذهبي جزءًا في طرق هذا الحديث، حكم فيه على تلك الطرق واحدًا واحدًا.ويشهد لقوله: "اللهم والِ من والاه وعادِ مَن عاداه" حديث علي بن أبي طالب عند عبد الله بن أحمد بن حنبل في زياداته على "المسند" 2/ (950)، والنسائي (8419)، وإسناده حسن. وله طريق أخرى لا بأس بها عند الطبري أشار إليها الذهبي في جزئه المذكور (38).وحديث سعد بن أبي وقاص عند النسائي (8425) و (8427)، وإسناده حسن كذلك، وسيأتي عند المصنّف برقم (4651) من طريق أخرى.وقال الذهبي فيما نقله عنه ابن كثير في "البداية والنهاية" 7/ 681: قوله: "اللهم والِ مَن والاه" فزيادة قويّة الإسناد.وغدير خُمّ: موضع يقع شرق الجُحفة على ثمانية أكيال، يعرف اليوم باسم الغربة.والدَّوْحات: جمع دَوْحة، وهي الشجرة العظيمة.وقُممن؛ أي: كُنِس ما تحتهن من القمامة.وقوله صلى الله عليه وسلم في حق كتاب الله وعترته أهل بيته: "أحدُهما أكبرُ من الآخَر"، قال الطِّيبيُّ في "شرح المشكاة" 12/ 3909: معنى كون أحدهما أعظمَ من الآخَر: أن القرآن هو أسوةٌ للعِترة، وعليهم الاقتداءُ به، وهم أَولى الناس بالعمل بما فيه.وقوله: "لن يتفرّقا حتَّى يَرِدا عليَّ الحَوضَ"، أشار الطِّيبيُّ إلى أنه كمثل قوله صلى الله عليه وسلم في حق سورتي البقرة وآل عمران: "يُحاجّان عن صاحبهما"، يعني يتجسّمان.
[2] إسناده صحيح، وصحَّحه الذهبي كما في "البداية والنهاية" لابن كثير 4/ 416. أبو عوانة: هو الوضاح بن عبد الله اليشكري، وأبو الطفيل: هو عامر بن واثلة.وأخرجه النسائي (8092) و (8410) عن محمد بن المثنى، عن يحيى بن حماد، بهذا الإسناد.وأخرج شطره الأول في ذكر الثَّقَلين الترمذيُّ (3788) من طريق محمد بن فضيل، عن الأعمش، به. وقال: حديث حسن غريب.وأخرجه كذلك أحمد 32 / (19265)، ومسلم (2408)، والنسائي (8119) من طريق يزيد بن حيان التيمي، عن زيد بن أرقم.وسيأتي هذا الشطر مفردًا برقم (4762) من طريق أبي الضُّحى مسلم بن صُبَيح عن زيد بن أرقم.وأخرج مسلم (2408)، وابن حيان (123) من طريق يزيد بن حيان، عن زيد بن أرقم بلفظ: "إني تارك فيكم ثقلين، أحدهما كتاب الله عز وجل، هو حَبْل الله، من اتبعه كان على الهُدى، ومن تركه كان على ضلالة".وأخرج أحمد (19313) من طريق علي بن ربيعة، قال: لقيتُ زيد بن أرقم وهو داخل على المختار أو خارج من عنده، قلتُ له: أسمعت رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: "إني تارك فيكم الثقلين"؟ قال: نعم.وأخرج شطره الثاني في ذكر فضل عليٍّ رضي الله عنه أحمدُ (19302)، والنسائي (8424)، وابن حبان (6931) من طريق فطر بن خليفة، عن أبي الطفيل، عن علي بن أبي طالب وزيد بن أرقم. وسيأتي الخبر بعده بشطريه من طريق محمد بن سلمة بن كهيل، عن أبيه، عن أبي الطفيل.وسيأتي أيضًا برقم (6403) من طريق كامل أبي العلاء، عن حبيب بن أبي ثابت، عن يحيى بن جعدة، عن زيد بن أرقم.وأخرجه كذلك أحمد 32 / (19279) من طريق عطية العوفي، و (19325) و (19328) من طريق ميمون أبي عبد الله، و 38 / (23143) من طريق أبي سليمان يزيد بن عبد الله مؤذن الحجاج، ثلاثتهم عن زيد بن أرقم.وقال الذهبي في "سير أعلام النبلاء" في ترجمة محمد بن جَرير الطبري 14/ 277: جمعَ الطبريُّ طرقَ حديث غدير خُمٍّ في أربعة أجزاء، رأيت شطره، فبهرني سعةُ رواياته، وجزمتُ بوقوع ذلك.وقد صنَّف الذهبي جزءًا في طرق هذا الحديث، حكم فيه على تلك الطرق واحدًا واحدًا.ويشهد لقوله: "اللهم والِ من والاه وعادِ مَن عاداه" حديث علي بن أبي طالب عند عبد الله بن أحمد بن حنبل في زياداته على "المسند" 2/ (950)، والنسائي (8419)، وإسناده حسن. وله طريق أخرى لا بأس بها عند الطبري أشار إليها الذهبي في جزئه المذكور (38).وحديث سعد بن أبي وقاص عند النسائي (8425) و (8427)، وإسناده حسن كذلك، وسيأتي عند المصنّف برقم (4651) من طريق أخرى.وقال الذهبي فيما نقله عنه ابن كثير في "البداية والنهاية" 7/ 681: قوله: "اللهم والِ مَن والاه" فزيادة قويّة الإسناد.وغدير خُمّ: موضع يقع شرق الجُحفة على ثمانية أكيال، يعرف اليوم باسم الغربة.والدَّوْحات: جمع دَوْحة، وهي الشجرة العظيمة.وقُممن؛ أي: كُنِس ما تحتهن من القمامة.وقوله صلى الله عليه وسلم في حق كتاب الله وعترته أهل بيته: "أحدُهما أكبرُ من الآخَر"، قال الطِّيبيُّ في "شرح المشكاة" 12/ 3909: معنى كون أحدهما أعظمَ من الآخَر: أن القرآن هو أسوةٌ للعِترة، وعليهم الاقتداءُ به، وهم أَولى الناس بالعمل بما فيه.وقوله: "لن يتفرّقا حتَّى يَرِدا عليَّ الحَوضَ"، أشار الطِّيبيُّ إلى أنه كمثل قوله صلى الله عليه وسلم في حق سورتي البقرة وآل عمران: "يُحاجّان عن صاحبهما"، يعني يتجسّمان.
4628 - حدثَناه أبو بكر بن إسحاق ودَعْلَج بن أحمد السِّجْزِي، قالا: أخبرنا محمد بن أيوب، حدثنا الأزرق بن علي، حدثنا حسان بن إبراهيم الكِرْماني، حدثنا محمد بن سلمة بن كُهيل، عن أبيه، عن أبي الطُّفيل عامر بن واثلة [1]، أنه سمع زيد ابن أرقَمَ يقول: نزلَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بين مكة والمدينة عند سَمُراتٍ خمس دَوحاتٍ عِظامٍ، فكَنَسَ الناسُ ما تحت السَّمُرات، ثم راح رسول الله صلى الله عليه وسلم عشيّةً فصلّى، ثم قام خطيبًا، فحَمِدَ الله وأثنى عليه، وذكّر ووَعَظ فقال ما شاء الله أن يقول، ثم قال: "أيُّها الناسُ، إني تاركٌ فيكم أمريَن لن تَضِلُّوا إن اتبعتُمُوهما: كتابَ اللهِ وأهلَ بيتي عِتْرَتي" ثم قال: "أتعلمُون أني أَولى بالمؤمنين من أنفسِهم؟ " ثلاث مرات، قالوا: نعم، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن كنتُ مَولاهُ فعليّ مَولاهُ" [2].وحديث بُريدة الأسلمي صحيح على شرط الشيخين:
যায়েদ ইবনে আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মক্কা ও মদীনার মধ্যবর্তী স্থানে পাঁচটি বিশাল ডালপালাবিশিষ্ট বাবলা গাছের নিচে অবতরণ করলেন। অতঃপর লোকেরা ওই বাবলা গাছগুলোর নিচের স্থান পরিষ্করণ করল। এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সন্ধ্যায় সেখানে গেলেন এবং সালাত আদায় করলেন। এরপর তিনি খতীব হিসেবে দাঁড়ালেন, অতঃপর আল্লাহর প্রশংসা ও গুণগান করলেন, স্মরণ করিয়ে দিলেন এবং উপদেশ দিলেন। আল্লাহ যা চাইলেন, তিনি তাই বললেন। এরপর তিনি বললেন: "হে লোক সকল! আমি তোমাদের মধ্যে দুটি জিনিস রেখে যাচ্ছি। যদি তোমরা সে দুটিকে আঁকড়ে ধরো, তবে তোমরা কখনো পথভ্রষ্ট হবে না: আল্লাহর কিতাব এবং আমার আহলে বাইত (পরিবার-পরিজন) অর্থাৎ আমার বংশধর।" এরপর তিনি বললেন: "তোমরা কি জানো না যে আমি মুমিনদের কাছে তাদের নিজেদের প্রাণের চেয়েও বেশি অধিকার রাখি?" তিনি এ কথা তিনবার বললেন। তারা বলল: "হ্যাঁ।" তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "আমি যার মাওলা, আলীও তার মাওলা।" আর বুরাইদাহ আল-আসলামীর হাদীসটি শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্তানুযায়ী সহীহ।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ص) و (م): عن عامر، وفي (ز) و (ب): عن ابن واثلة، وكلاهما خطأ، فلفظة "عن" مقحمة، لأنَّ اسم أبي الطفيل عامر بن واثلة.
[2] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لضعف محمد بن سلمة بن كُهيل كما أشار إليه الذهبي في "تلخيصه"، لكنه لم ينفرد به فقد رواه حبيب بن أبي ثابت وفطر بن خليفة عن أبي الطفيل عامر بن واثلة، كما عند الرواية السابقة.وأخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 42/ 216 من طريق أبي يعلى الموصلي، عن الأزرق بن علي، بهذا الإسناد.وأخرج آخره الترمذيُّ (3713) من طريق شعبة، عن سلمة بن كهيل، عن أبي الطُّفيل، عن أبي سَريحة أو زيد بن أرقم - شك شعبة - وقال الترمذي: حديث حسن غريب. وأبو سَريحة هو حذيفة بن أَسيد.
4629 - حدثنا محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا أحمد بن نصر.وأخبرنا محمد بن علي الشيباني بالكوفة، حدثنا أحمد بن حازم الغِفاري.وأخبرنا محمد بن عبد الله العُمري، حدثنا محمد بن إسحاق، حدثنا محمد بن يحيى وأحمد بن يوسف، قالوا: حدثنا أبو نُعيم، حدثنا ابن أبي غَنِيّة، عن الحَكَم، عن سعيد بن جُبَير، عن ابن عبّاس، عن بُريدة الأسلمي، قال: غزوتُ مع عليٍّ إلى اليمن، فرأيتُ منه جَفْوةً، فقدمتُ على رسول الله صلى الله عليه وسلم، فذكرتُ عليًّا فتنقَّصْتُه، فرأيت وجهَ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، يَتغيّر، فقال: "يا بُريدةُ، ألستُ أَولى بالمؤمنين من أنفُسهم؟ " قلت: بلى يا رسول الله، فقال: "من كنت مَولاهُ، فعليٌّ مَولاهُ" وذكر الحديثَ [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
বুরাইদাহ আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আলীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাথে ইয়েমেনে যুদ্ধে গিয়েছিলাম। আমি তার কাছ থেকে কিছু রূঢ় আচরণ লক্ষ্য করেছিলাম। অতঃপর আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আগমন করলাম এবং আলীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সম্পর্কে উল্লেখ করে তার নিন্দা করলাম। তখন আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চেহারা পরিবর্তিত হতে দেখলাম। তিনি বললেন: "হে বুরাইদাহ! আমি কি মুমিনদের নিকট তাদের নিজেদের জীবন অপেক্ষাও অধিক প্রিয় নই?" আমি বললাম: হ্যাঁ, হে আল্লাহর রাসূল। তখন তিনি বললেন: "আমি যার মাওলা (অভিভাবক/বন্ধু), আলীও তার মাওলা।" এবং তিনি সম্পূর্ণ হাদীসটি উল্লেখ করেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. أبو نُعيم: هو الفضل بن دُكين، وابن أبي غَنيّة: هو عبد الملك بن حميد الخُزاعي، والحكم: هو ابن عُتيبة.وأخرجه أحمد 38/ (22945)، والنسائي (8089) و (8413) من طريق أبي نُعيم، بهذا الإسناد.وقد تقدَّم بنحوه برقم (2621) و (2622) من طريق عبد الله بن بُريدة عن أبيه. الذهبيُّ في جزء "من كنت مولاه فعليٌّ مولاه" (104) حيث وافق الحاكم على تصحيحه قائلًا: وصدق الحاكم. قلنا: وحسَّنه الترمذي وصحَّحه ابن حبان. يزيد الرِّشك: هو ابن أبي يزيد، ومُطرِّف: هو ابن عبد الله بن الشِّخِّير.وأخرجه أحمد 33 / (19928)، والترمذي (3712)، والنسائي (8090) و (8399) و (8420)، وابن حبان (6929) من طرق عن جعفر بن سليمان الضُّبَعي بهذا الإسناد.ويشهد للقصة حديث بريدة الأسلمي الذي قبله. وللمرفوع منه رواية الأجلح بن عبد الله الكِنْدي، عن عبد الله بن بريدة، عن أبيه، عند أحمد 38/ (23012) والنسائي (8421).والجارية التي أصابها عليٌّ إنما جاز له أخذها لأنها من نصيبه في الخُمس، كما تدل عليه روايةٌ لحديث بُريدة عند أحمد 38/ (23036)، والبخاري (4350) بلفظ: "لا تُبغضه، فإنَّ له في الخُمس أكثر من ذلك".
4630 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثني أَبي ومحمد بن نُعيم، قالا: حدثنا قُتَيبة بن سعيد، حدثنا جعفر بن سليمان الضُّبَعي، عن يزيد الرِّشْك، عن مُطرِّف، عن عِمران بن حُصين قال: بعثَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم سريةً واستعملَ عليهم عليَّ بن أبي طالب، فمضى عليٌّ في السَّرِيّة فأصابَ جاريةً، فأنكَروا ذلك عليه، فتعاقدَ أربعةٌ من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا لَقِينا رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، أخبرناه بما صنعَ عليٌّ، قال: عِمران: وكان المسلمون إذا قدموا من سفر بدؤوا برسولِ الله صلى الله عليه وسلم، فنظروا إليه وسلَّموا عليه، ثم ينصرفون إلى رِحالِهم، فلمَّا قَدِمَتِ السريّةُ سلَّمُوا على رسول الله صلى الله عليه وسلم فقام أحدُ الأربعة، فقال: يا رسول الله، ألم ترَ عليًّا صنعَ كذا وكذا، فأعرض عنه، ثم قام الثاني، فقال مثلَ ذلك، فأعرض عنه، ثم قام الثالث فقال مثلَ ذلك، فأعرض عنه، ثم قام الرابع، فقال: يا رسول الله، ألم ترَ عليًّا صنعَ كذا وكذا، فأقبلَ عليه رسول الله صلى الله عليه وسلم و الغضبُ في وجهه، فقال: "ما تُريدون من عليٍّ، إنَّ عليًّا مني وأنا منه، ووليُّ كلِّ مُؤمنٍ" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه. ذكر إسلام أمير المؤمنين عليّ رضي الله عنه -
ইমরান ইবনু হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি সামরিক অভিযান (সারিয়্যা) প্রেরণ করলেন এবং তাদের উপর আলী ইবনু আবী তালিবকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নেতা নিযুক্ত করলেন। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেই অভিযানের পথে (কোনো এক পরিস্থিতিতে) একটি দাসী লাভ করলেন। ফলে তারা (অভিযানের লোকেরা) তাঁর এই কাজটিকে অপছন্দ করল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চারজন সাহাবী এই মর্মে প্রতিজ্ঞা করল যে, যখনই আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সাক্ষাৎ করব, তখনই আলীর কৃতকর্ম সম্পর্কে তাঁকে জানাব। ইমরান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: যখন মুসলিমগণ সফর থেকে ফিরে আসতেন, তখন তারা প্রথমে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসতেন, তাঁকে দেখতেন এবং তাঁকে সালাম করতেন, অতঃপর তারা তাদের সামগ্রীর দিকে মনোনিবেশ করতেন।
যখন অভিযান দলটি (সারিয়্যা) ফিরে এলো, তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সালাম জানালো। তখন চারজনের মধ্যে একজন দাঁড়িয়ে বলল, "হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কি দেখেননি আলী এমন এমন কাজ করেছেন?" তিনি (নবী) তার দিক থেকে মুখ ফিরিয়ে নিলেন। অতঃপর দ্বিতীয় ব্যক্তি দাঁড়ালো এবং অনুরূপ বলল, তিনি তার দিক থেকেও মুখ ফিরিয়ে নিলেন। এরপর তৃতীয় ব্যক্তি দাঁড়ালো এবং অনুরূপ বলল, তিনি তার দিক থেকেও মুখ ফিরিয়ে নিলেন। এরপর চতুর্থ ব্যক্তি দাঁড়ালো এবং বলল, "হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কি দেখেননি আলী এমন এমন কাজ করেছেন?"
তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার দিকে ফিরলেন, তখন তাঁর চেহারায় রাগের ছাপ ছিল। তিনি বললেন, "আলীর কাছ থেকে তোমরা কী চাও? নিশ্চয়ই আলী আমার থেকে এবং আমি আলী থেকে। আর সে হচ্ছে সকল মুমিনের অভিভাবক (বা বন্ধু)।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده جيد من أجل جعفر بن سليمان، فهو صدوق لا بأس به، وقد صحَّح هذا الخبرَ الذهبيُّ في جزء "من كنت مولاه فعليٌّ مولاه" (104) حيث وافق الحاكم على تصحيحه قائلًا: وصدق الحاكم. قلنا: وحسَّنه الترمذي وصحَّحه ابن حبان. يزيد الرِّشك: هو ابن أبي يزيد، ومُطرِّف: هو ابن عبد الله بن الشِّخِّير.وأخرجه أحمد 33 / (19928)، والترمذي (3712)، والنسائي (8090) و (8399) و (8420)، وابن حبان (6929) من طرق عن جعفر بن سليمان الضُّبَعي بهذا الإسناد.ويشهد للقصة حديث بريدة الأسلمي الذي قبله. وللمرفوع منه رواية الأجلح بن عبد الله الكِنْدي، عن عبد الله بن بريدة، عن أبيه، عند أحمد 38/ (23012) والنسائي (8421).والجارية التي أصابها عليٌّ إنما جاز له أخذها لأنها من نصيبه في الخُمس، كما تدل عليه روايةٌ لحديث بُريدة عند أحمد 38/ (23036)، والبخاري (4350) بلفظ: "لا تُبغضه، فإنَّ له في الخُمس أكثر من ذلك".
4631 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا يونس بن بُكير، عن محمد بن إسحاق: أنَّ عليّ بن أبي طالب أسلمَ، وهو ابن عَشر سِنين [1].
মুহাম্মদ ইবনে ইসহাক থেকে বর্ণিত, আলী ইবনে আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইসলাম গ্রহণ করেন, যখন তাঁর বয়স ছিল দশ বছর।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وهو في "سيرة ابن هشام" 1/ 245، و "معرفة الصحابة" لأبي نعيم (310)، والبيهقي في "السنن الكبرى" 6/ 206، وفي "دلائل النبوة" 2/ 165 من طريقين عن ابن إسحاق.
4632 - أخبرني أبو إسحاق المزكِّي وأبو الحُسين الحافظ، قالا: حدثنا محمد بن إسحاق الثَّقَفي، حدثنا محمد بن منصور، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا مَعمر، عن قَتَادة، عن الحسن، قال: أسلمَ عليٌّ وهو ابن خمسَ عشرةَ أو ابن ستَّ عشرةَ سنة [1].هذا الإسناد أَولى من الأول، وإنما قدّمتُ ذلك لأني عَلَوتُ فيه.
হাসান থেকে বর্ণিত, আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইসলাম গ্রহণ করেছিলেন যখন তাঁর বয়স ছিল পনেরো কিংবা ষোলো বছর।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وهو في "جامع معمر" (20391)، و"معجم الصحابة" لأبي القاسم البغوي بإثر (1810)، والبيهقي في "السنن الكبرى" 6/ 206، وابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 524.
4633 - حدثنا أبو عُمر محمد بن عبد الواحد الزاهد صاحب ثَعْلب إملاءً ببغداد، حدثنا محمد بن عثمان بن أبي شَيْبة، حدثنا زكريا بن يحيى المصري، حدثني المُفضَّل بن فَضَالة، حدثني سِماك بن حَرْب، عن عِكْرمة، عن ابن عبّاس، قال: لِعليٍّ أربعُ خِصالٍ ليست الأربعَ [1]: هو أول عَربيٍّ وأعجميٍّ صلَّى مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، وهو الذي كان لِواؤه معه في كل زَحْفٍ، وهو الذي تصبَّر معه يوم المِهراسِ، وهو الذي غسّله وأدخلَه قبرَه [2]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আলীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) চারটি বৈশিষ্ট্য রয়েছে, যা অন্য কারো চারটি বৈশিষ্ট্য নয়: তিনিই প্রথম আরব ও অনারব, যিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সাথে সালাত আদায় করেছেন। তিনিই সেই ব্যক্তি, যার পতাকা প্রত্যেক অভিযানে রাসূলের (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাথে ছিল। তিনিই সেই ব্যক্তি, যিনি মিহরাসের দিন ধৈর্য ধারণ করেছিলেন এবং তিনিই সেই ব্যক্তি, যিনি তাঁকে (রাসূলুল্লাহকে) গোসল করিয়ে তাঁর কবরে প্রবেশ করিয়েছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] كذلك جاء في أصولنا الخطية، ومعناه نفي استغراق العدد المذكور لخصال عليٍّ، فإنَّ له خصالًا غيرها مائلةً في شخصه، وإنما ذكر هذه الخصال الأربع دون غيرها لكونها أعظم خصاله. أحمد 5/ (3542)، والترمذي (3734) من طريق عمرو بن ميمون، عن ابن عبّاس. وسيأتي هذا الوجه عند المصنف برقم (4702) ضمن حديث مطوَّل، لكن بلفظ: أول من أسلم. وفي إسناده مقال كما سيأتي بيانه. وانظر شواهده هناك.وأما لواء النبي صلى الله عليه وسلم فقد جاء عن ابن عبّاس من وجه آخر: أنَّ راية النبي صلى الله عليه وسلم كانت تكون مع عليٍّ، وراية الأنصار مع سعد بن عبادة، كما أخرجه أحمد 5/ (3486) وغيره، كما سيأتي في تفصيله في الطريق التي بعده.وفي حديث سعد بن أبي وقاص كما سيأتي عند المصنف برقم (6241): أنَّ عليًّا كان صاحب راية رسول الله صلى الله عليه وسلم في غزواته.وثبت ذلك أيضًا من مرسل معبدٍ الجهني عند ابن سعد 3/ 23، وانظر ما سيأتي برقم (4716).وهذا مُطلق كرواية المصنِّف، لكن لا بد من تقييده كما في رواية مقسم عن ابن عبّاس بأنَّ عليًا كان صاحب راية رسول الله صلى الله عليه وسلم، يعني راية المهاجرين، وصاحب راية الأنصار هو سعد بن عبادة، ويؤيد ذلك ما ورد في حديث فتح مكة المطوّل الذي أخرجه ابن أبي شيبة 14/ 476 من مرسل أبي سلمة بن عبد الرحمن بن عوف ويحيى بن عبد الرحمن بن حاطِب أنَّ اللواء كان مع سعد بن عبادة، ثم دفعه النبي صلى الله عليه وسلم لابنه قيس بن سعد لما قال سعد قولته المشهورة في توعُّده قريشًا، وإسناده حسن مرسلًا. ورُوي من طرق أخرى، وانظر كلام الحافظ في "فتح الباري" 12/ 505 - 506.ويؤيده ما في "صحيح البخاري" (2974) عن ثعلبة بن أبي مالك القُرَظي: أنَّ قيس بن سعد كان صاحب لواء رسول الله صلى الله عليه وسلم. قال الحافظ في "فتح الباري" 9/ 233: أي: اللواء الذي يختص بالخزرج من الأنصار، وكان النبي صلى الله عليه وسلم يدفع إلى رأس كل قبيلة لواءً يقاتلون تحته.وسيأتي بعده أنَّ عليًا كانت معه الراية يوم بدر، وقُيِّد في بعض طرقه بأنه كانت معه راية المهاجرين.وأما تغسيل عليٍّ للنبي صلى الله عليه وسلم فثابت صحيح كما تقدم برقم (1355)، وقد أورده ابن سعد في "طبقاته الكبرى"2/ 241 - 245 من طرق.وكذلك إدخال عليٍّ للنبي صلى الله عليه وسلم في القبر صحيح ثابت، كما تقدم برقم (1355) لكن لم يكن عليّ وحده مَن أدخل النبيَّ صلى الله عليه وسلم قبره، بل دلّت تلك الرواية المتقدمة أنه كان معه العباسُ وابنُه الفضل بن العباس.وأما يوم المِهراس فالمراد به يومُ أُحَدٍ، كما دلَّ على ذلك حديثُ ابن عبّاس الذي تقدم برقم (3201) بسند حسن. وقد صحَّ أنَّ عليًّا كان أحد الذين ثبتوا ذلك اليوم مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، إذ جاء النبيَّ صلى الله عليه وسلم بماء من المِهراس في دَرَقته ليشرب النبي صلى الله عليه وسلم منه، كما دلّ عليه حديث الزبير بن العوام عند ابن حبان (6979)، بسند حسن.والمِهراس: ماء بجبل أُحد في أقصى شِعب أحد، يجتمع من المطر في نُقَر كبار وصغار، والمهراس اسم لتلك النقر.
[2] إسناده ضعيف، وما جاء في هذا الإسناد من نسبة زكريا بن يحيى مصريًا، وكذلك من تقييد شيخه بالمُفضّل بن فَضَالة، فهو مما لم يرد عند غير المصنف، ولا نظنه إلّا وهمًا، فإنَّ محمد بن عثمان بن أبي شيبة إنما يُعرف بالرواية عن زكريا بن يحيى الكسائي الكوفي، ولأنَّ هذا الخبر قد رواه أبو جعفر محمد بن إسماعيل بن سمرة الكوفي عند ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 42/ 72 و 73 عن المفضل بن صالح الكوفي، فالصحيح ذكر المفضل بن صالح بدل المفضل بن فَضَالة، ومما يؤيد ذلك أنَّ الذي يُعرف بروايته عن سماك بن حرب الكوفي، وإنما هو المفضّل بن صالح لا ابن فَضَالة، فهم ثلاثةٌ كوفيون في نَسَقٍ: زكريا بن يحيى الكسائي والمفضّل بن صالح وسماك بن حرب.ومنشأ الوهم فيما نظنُّ أنَّ لزكريا بن يحيى المصري - وهو ابن صالح - روايةً عن المفضّل بن فَضَالة عند مسلم وغيره، فلما أن قُيِّد زكريا بن يحيى بالمصري خطأً استَدْعى ذلك أن يكون شيخُه المفضلَ بنَ فَضَالة، فأُصلح من ابن صالح إلى ابن فَضَالة، أو أنه سُلِك فيه الجادّةُ أصلًا، والله تعالى أعلم.وإذا ثبت ذلك فزكريا بن يحيى الكسائي وشيخه المفضل بن صالح ضعيفان، وما جزم به الذهبي في "تلخيصه" من كون زكريا بن يحيى المذكور هو الوقّار المصري فلا ندري ما حُجّته، والله ولي التوفيق.وإنما اقتضى التنبيه على ذلك، لأنَّ ظاهر ما وقع في إسناد المصنف يقتضي ثقة رجاله عن آخرهم، فاستدعى ذلك ضرورة البيان، والله المستعان.وقد روي عن ابن عبّاس من وجه آخر: أنَّ عليًا أول من صلَّى مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، كما أخرجه أحمد 5/ (3542)، والترمذي (3734) من طريق عمرو بن ميمون، عن ابن عبّاس. وسيأتي هذا الوجه عند المصنف برقم (4702) ضمن حديث مطوَّل، لكن بلفظ: أول من أسلم. وفي إسناده مقال كما سيأتي بيانه. وانظر شواهده هناك.وأما لواء النبي صلى الله عليه وسلم فقد جاء عن ابن عبّاس من وجه آخر: أنَّ راية النبي صلى الله عليه وسلم كانت تكون مع عليٍّ، وراية الأنصار مع سعد بن عبادة، كما أخرجه أحمد 5/ (3486) وغيره، كما سيأتي في تفصيله في الطريق التي بعده.وفي حديث سعد بن أبي وقاص كما سيأتي عند المصنف برقم (6241): أنَّ عليًّا كان صاحب راية رسول الله صلى الله عليه وسلم في غزواته.وثبت ذلك أيضًا من مرسل معبدٍ الجهني عند ابن سعد 3/ 23، وانظر ما سيأتي برقم (4716).وهذا مُطلق كرواية المصنِّف، لكن لا بد من تقييده كما في رواية مقسم عن ابن عبّاس بأنَّ عليًا كان صاحب راية رسول الله صلى الله عليه وسلم، يعني راية المهاجرين، وصاحب راية الأنصار هو سعد بن عبادة، ويؤيد ذلك ما ورد في حديث فتح مكة المطوّل الذي أخرجه ابن أبي شيبة 14/ 476 من مرسل أبي سلمة بن عبد الرحمن بن عوف ويحيى بن عبد الرحمن بن حاطِب أنَّ اللواء كان مع سعد بن عبادة، ثم دفعه النبي صلى الله عليه وسلم لابنه قيس بن سعد لما قال سعد قولته المشهورة في توعُّده قريشًا، وإسناده حسن مرسلًا. ورُوي من طرق أخرى، وانظر كلام الحافظ في "فتح الباري" 12/ 505 - 506.ويؤيده ما في "صحيح البخاري" (2974) عن ثعلبة بن أبي مالك القُرَظي: أنَّ قيس بن سعد كان صاحب لواء رسول الله صلى الله عليه وسلم. قال الحافظ في "فتح الباري" 9/ 233: أي: اللواء الذي يختص بالخزرج من الأنصار، وكان النبي صلى الله عليه وسلم يدفع إلى رأس كل قبيلة لواءً يقاتلون تحته.وسيأتي بعده أنَّ عليًا كانت معه الراية يوم بدر، وقُيِّد في بعض طرقه بأنه كانت معه راية المهاجرين.وأما تغسيل عليٍّ للنبي صلى الله عليه وسلم فثابت صحيح كما تقدم برقم (1355)، وقد أورده ابن سعد في "طبقاته الكبرى"2/ 241 - 245 من طرق.وكذلك إدخال عليٍّ للنبي صلى الله عليه وسلم في القبر صحيح ثابت، كما تقدم برقم (1355) لكن لم يكن عليّ وحده مَن أدخل النبيَّ صلى الله عليه وسلم قبره، بل دلّت تلك الرواية المتقدمة أنه كان معه العباسُ وابنُه الفضل بن العباس.وأما يوم المِهراس فالمراد به يومُ أُحَدٍ، كما دلَّ على ذلك حديثُ ابن عبّاس الذي تقدم برقم (3201) بسند حسن. وقد صحَّ أنَّ عليًّا كان أحد الذين ثبتوا ذلك اليوم مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، إذ جاء النبيَّ صلى الله عليه وسلم بماء من المِهراس في دَرَقته ليشرب النبي صلى الله عليه وسلم منه، كما دلّ عليه حديث الزبير بن العوام عند ابن حبان (6979)، بسند حسن.والمِهراس: ماء بجبل أُحد في أقصى شِعب أحد، يجتمع من المطر في نُقَر كبار وصغار، والمهراس اسم لتلك النقر.
4634 - حدثنا علي بن حَمْشاذَ، حدثنا محمد بن المغيرة السُّكَّري، حدثنا القاسم بن الحَكَم العُرَني، حدثنا مِسعَر، عن الحَكم بن عُتيبة، عن مِقسَم، عن ابن عبّاس: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم دفَعَ الرايةَ إلى عليٍّ يومَ بدرٍ، وهو ابن عشرينَ سنة [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বদরের যুদ্ধের দিন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাতে পতাকা অর্পণ করেছিলেন, যখন তাঁর বয়স ছিল বিশ বছর।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح، لكن بتقييده براية المهاجرين كما سيأتي، وهذا إسناد حسن من أجل محمد بن المغيرة السكري - وهو ابن سنان - فقد قال صالح بن محمد: صدوق، وتكلم فيه السليماني، فقال: فيه نظر، قال الذهبي في "السير" 13/ 384: يُشير إلى أنه صاحب رأي، وقد جزم بذلك قبل الذهبيِّ الخليليُّ في "الإرشاد" 2/ 652، فقال: كان يرى رأي الكوفيين فانحرف عنه أهل هَمَذان. قلنا: ولا يُعدُّ هذا قادحًا. مقسم: هو ابن بُجرة مولى ابن عبّاس، ومسعر: هو ابن كِدام.وأخرجه البيهقي في 6/ 207، ومن طريقه ابن عساكر 42/ 71 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (167)، وأبو طاهر المخلِّص في "المخلِّصيات" (1579)، وابن المغازلي في "مناقب علي" (413)، وابن عساكر 42/ 71 - 72 من طريق قيس بن الربيع، عن الحجاج بن أرطاة، عن الحكم بن عُتيبة، به. وهو حسن أيضًا.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (12083) من طريق حفص بن غياث، والطبري في "تاريخه" 2/ 431، والطبراني (12084)، وابن عدي في "الكامل" 5/ 142، وابن عساكر 20/ 249 من طريق أبي مالك الجنبي، والبزار (1783 - كشف الأستار)، وابن عساكر 20/ 249 من طريق إبراهيم بن الزبرقان، ثلاثتهم عن الحجاج بن أرطاة، عن الحكم بن عتيبة، به. بلفظ: كان صاحب راية المهاجرين علي بن أبي طالب، وصاحب راية الأنصار سعد بن عُبادة. يعني في بدر. وهذا مقيِّد لرواية المُصنَّف التي هنا، ولرواية قيس بن الربيع عن الحجاج المطلقتَين.وأخرجه كذلك الطبراني في "الكبير" (5356) و (12101)، وفي "الأوسط" (5202)، وأبو الشيخ في "أخلاق النبي صلى الله عليه وسلم " (430)، وأبو نثعيم الأصبهاني في "معرفة الصحابة" (3119)، وابن عساكر 42/ 72 من طريق أبي شيبة إبراهيم بن عثمان العبسي مولاهم، عن الحكم بن عتيبة، به. بلفظ: أنَّ عليًّا كان صاحب راية رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم بدر وفي المواطن كلها كان صاحب راية المهاجرين عليًا، وصاحب راية الأنصار سعد بن عبادة. زاد بعضهم: في المواقف كلها يوم بدر ويوم أحد ويوم حنين ويوم الأحزاب ويوم فتح مكة. وأبو شيبة العبسي متروك الحديث.وأخرج أحمد 5 / (3486)، والبخاري في تاريخه الكبير معلقًا 6/ 258 من طريق عثمان الجَزَري، عن مقسم، عن ابن عبّاس: أن راية النبي صلى الله عليه وسلم كانت تكون مع علي رضي الله عنه، وراية الأنصار مع سعد بن عبادة رضي الله عنه، وكان النبي صلى الله عليه وسلم مما يكون تحت راية الأنصار. كذا عند البخاري، وعند أحمد: عن مقسم قال: لا أعلمه إلّا عن ابن عبّاس. وعثمان الجزري فيه ضعف.
4635 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الحسن بن علي بن عفّان العامري.وحدثنا أبو بكر بن أبي دارِم، الحافظ، حدثنا إبراهيم بن عبد الله العَبْسي؛ قالا: حدثنا عُبيد الله بن موسى، حدثنا إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن المِنْهال بن عمرو، عن عَبّاد بن عبد الله الأسدي، عن علي، قال: إني عبدُ الله وأخو رسولِه، وأنا الصِّدِّيق الأكبر لا يقولُها بعدي إلَّا كاذبٌ، صلَّيتُ قبلَ الناسِ بسبع سنين [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه، وشاهدُه:
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, ‘নিশ্চয় আমি আল্লাহর বান্দা ও তাঁর রাসূলের ভাই, আর আমিই আস-সিদ্দীক আল-আকবর (শ্রেষ্ঠ সত্যায়নকারী)। আমার পরে যে কেউ এই দাবি করবে, সে মিথ্যাবাদী হবে। আমি অন্যদের সাত বছর পূর্বে সালাত (নামায) আদায় করেছি।’
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف ومتنه منكر، عبَّاد بن عبد الله الأسدي، تفرَّد بالرواية عنه المنهال، وقال عنه عليُّ بن المديني: ضعيف الحديث، وقال البخاري: فيه نظر. قلنا: قد تابعه عليه من هو مثلُه في الضعف أو دونه، وقال الخلّال في "علله" كما في منتخبه لابن قدامة (114): سألت أبا عبد الله (يعني أحمد بن حنبل) عن حديث علي: أنا عبد الله وأخو رسوله، وأنا الصديق الأكبر، فقال: اضرب عليه، فإنه حديث منكر.وقال ابن الجوزي في "الموضوعات" 1/ 341: هذا موضوع، والمتهم به عبادُ بن عبد الله.وقال الذهبي في "تلخيصه" ردًّا على تصحيح الحاكم: ما هو على شرط واحد من الشيخين، بل ولا هو بصحيح، بل حديث باطل، فتدبَّره. وجزم في "الميزان" في ترجمة عبّاد بأنَّ هذا كذبٌ على عليٍّ.قال ابن كثير في "البداية والنهاية" 4/ 67: هذا الحديث منكر بكل حالٍ.وقول عليٍّ فيه: أنا عبد الله وأخو رسوله، مرويٌّ عنه من غير وجهٍ كما قال ابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 526، لكن لا يصح إسناد شيء منها، ويغني عن هذا كله ما صحَّ عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال لعلي: "أنت مني بمنزلة هارون من موسى"، وسلف عند المصنف برقم (4626). وهذا القدر منه مخرَّج في "الصحيحين". إسرائيل: هو ابن يونس بن أبي إسحاق عمرو بن عبد الله السَّبيعي، وأبو إسحاق جدُّه.وأخرجه ابن ماجه (120) عن محمد بن إسماعيل الرازي، والنسائي (8338) عن أحمد بن سليمان، كلاهما عن عُبيد الله بن موسى، عن العلاء بن صالح، عن المنهال بن عمرو، به بتمامه.وأخرج القسم الأول النسائي (8398) من طريق الحارث بن حَصيرة، عن أبي سليمان زيد بن وهب الجهني، عن علي بن أبي طالب قال: أنا عبد الله وأخو رسوله صلى الله عليه وسلم، لا يقولها إلّا كذّاب مُفتَرٍ، فقال رجل: أنا عبد الله وأخو رسوله، فخُنق فحُمل والحارث بن حصيرة فيه ضعفٌ، ومع ضعفه فهو من المحترفين بالكوفة في التشيع.والقسم الثاني وهو قوله: أنا الصديق الأكبر، قد روي من وجه آخر عن عليٍّ، فقد أخرجه البخاري في "تاريخه الكبير" 4/ 23، وابن أبي خيثمة في السفر الثالث من "تاريخه الكبير" (382)، والبلاذري في "أنساب الأشراف" 2/ 379، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (186) و (187)، والدولابي في "الكنى" (1587)، والعُقيلي في "الضعفاء" 2/ 147، وابن عدي في "الكامل" 3/ 274، والجُورقاني في "الأباطيل" (34)، وابن عساكر 42/ 33، وابن الجوزي في "العلل المتناهية" (1573) من طريق سليمان بن عبد الله أبي فاطمة، عن معاذة العدوية، عن عليٍّ. وسليمان هذا ليِّن الحديث كما قال الحافظ ابن حجر، وقال البخاري: لا يتابع سليمان عليه ولا يُعرف سماعه من معاذة.وأخرج عبد الله بن أحمد في زوائده على "فضائل الصحابة" لأبيه (165) و (166)، والخطيب في "تلخيص المتشابه" 1/ 554، وابن عساكر 42/ 33 من طريق جابر بن زيد الجُعفي، عن عبد الله بن نُجيّ، عن علي، قال: صليتُ مع النبي صلى الله عليه وسلم ثلاث سنين قبل أن يصلي معه أحد. وجابر الجعفي ضعيف وترك حديثه غير واحد من أصحاب الحديث، وابن نجي مختلف فيه، وجزم ابن مَعِين بأنه لم يسمع من عليّ.وقال الذهبي في "تلخيصه": هذا باطل، لأنَّ النبي صلى الله عليه وسلم من أول ما أُوحي إليه آمن به خديجة وأبو بكر وبلال وزيد بن علي قبله بساعات أو بعده بساعات، وعبدوا الله مع نبيّه، فأين السبع سنين؟ ولعلَّ السمع أخطأ، فيكون أمير المؤمنين قال: عبدتُ الله مع رسول الله ولي سبع سنين، ولم يضبط الراوي ما سمع.ونحوه قول ابن القيم في "أحكام أهل الذمة" 5/ 13: لعلَّ لفظه: صليت قبل الناس لسبع سنين، فقصرت اللام، فأسقطها الكاتب، فصارت سبع سنين، فهذا محتمل، وهو أقرب ما يحمل عليه الحديث إن صح.وللقسم الأخير منه انظر الحديث التالي. وأخرج الطبراني في (الكبير) (952)، وأبو الحسن الخِلَعي في "الخِلَعيّات" (675)، وابن عساكر 42/ 28 من طريق محمد بن عبيد الله بن أبي رافع، عن أبيه، عن جده أبي رافع، قال: صلَّى النبي صلى الله عليه وسلم غداة الاثنين، وصلَّت خديجة يوم الاثنين من آخر النهار، وصلَّى عليٌّ يوم الثلاثاء، فمكث عليٌّ يصلي مستخفيًا قبل أن يصلي مع النبي صلى الله عليه وسلم أحدٌ سبع سنين وأشهرًا. ومحمد بن عُبيد الله بن أبي رافع متروك.
4636 - حدَّثَناه أبو عُمر الزاهد، حدثنا محمد بن هشام المَروَزي، حدثنا أبو إبراهيم التَّرجُماني، حدثنا شُعيب بن صفوان، عن الأجلَح، عن سَلَمة بن كُهيل، عن حَبّة بن جُوَين، عن عليٍّ، قال: عبدتُ الله مع رسول الله صلى الله عليه وسلم سبعَ سنين قبل أن يَعبُدَه أحدٌ من هذه الأُمّة [1].
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আল্লাহর রাসূলের (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সাত বছর আল্লাহর ইবাদত করেছি, এর আগে এই উম্মতের আর কেউ আল্লাহর ইবাদত করেনি।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف جدًّا، ومتنُه منكر، حبَّة بن جُوَين - وهو العُرَني - ضعيف ليس بشيء، وهو شيعي جبل كما قال الذهبي في "تلخيصه"، وذكر أيضًا أنَّ شعيب بن صفوان والأجلح - وهو ابن عبد الله بن حُجيّة الكِنْدي - متكلَّم فيهما، وقد روي هذا الخبر من وجهين آخرين عن سلمة بن كُهيل، غير أنهما أضعف من طريق الأجلح هذه، فلا يُعتدُّ بهما البتّة.وأخرجه أبو محمد عبد الله بن إبراهيم بن ماسي في "فوائده" (33)، ومن طريقه ابن عساكر 30/ 42، وابن الجوزي في "الموضوعات" (638) عن أبي عبد الله أحمد بن عبد الرحمن بن مرزوق بن أبي عوف، عن أبي إبراهيم التَّرجُماني إسماعيل بن إبراهيم بن بسّام، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو يعلى (147)، ومن طريقه ابن عساكر 42/ 30 عن أبي هشام الرفاعي محمد بن يزيد، عن محمد بن فضيل، عن الأجلح، به. وأبو هشام الرفاعي الجمهور على تضعيفه.وخالف عليُّ بن المنذر عند النسائي (8339)، فرواه عن محمد بن فُضيل، عن الأجلح، عن عبد الله بن أبي الهُذيل، عن عليٍّ. فذكر عبدَ الله بنَ أبي الهُذيل، بدل حبَّةَ بن جُوين، ولم يذكر سلمة بن كُهيل أيضًا، وللأجلح روايةٌ معروفةٌ عن عبد الله بن أبي الهُذيل روى عنه غير ما خبر، وكثير منها يرويه عن الأجلح محمدُ بن فضيل، فلعلَّ محمد بن فُضيل هنا سلك فيه الجادة هو أو الراوي عنه علي بن المنذر الطريقي، فالمحفوظ فيه: سلمة بن كهيل عن حبة، فهكذا روى نحوه شعبة عن سلمة بن كهيل عن حبَّة عن علي قال: أنا أول من صلى مع النبي صلى الله عليه وسلم، أخرجه ابن أبي شيبة 13/ 50. وأخرجه أحمد 2 / (776) من طريق يحيى بن سلمة بن كُهيل، وعبد الله بن أحمد في زياداته على "فضائل الصحابة" (164) من طريق محمد بن سلمة بن كهيل، كلاهما عن أبيهما، به. ويحيى بن سلمة وأخوه محمد متروكان.
4637 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا يونس بن بُكير، عن يوسف بن صهيب، عن عبد الله بن بُريدة، عن أبيه، قال: انطلق أبو ذرِّ ونُعيمٌ ابن عم أبي ذر وأنا معهم نطلُبُ رسول الله صلى الله عليه وسلم، وهو بالجبل مُكتَتِم، فقال أبو ذر: يا محمد، أتيناك نسمعُ ما تقول وإلى ما تدعو، فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "أقولُ: لا إله إلَّا الله، وإني رسولُ الله"، فآمنَ به أبو ذرٍّ وصاحبُه وآمنتُ به، وكان عليٌّ في حاجةٍ لرسول الله صلى الله عليه وسلم أرسلَه فيها، وأُوحيَ إلى رسولِ الله صلى الله عليه وسلم يومَ الاثنين وصلَّى عليٌّ يوم الثلاثاء [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
বুরাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর চাচাতো ভাই নুআইম এবং আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে খুঁজতে বের হলাম। তিনি তখন পাহাড়ে লুকিয়ে ছিলেন। অতঃপর আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, হে মুহাম্মাদ! আমরা আপনার কাছে এসেছি, আপনি যা বলেন এবং যার প্রতি আহ্বান করেন, তা শুনতে। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন, "আমি বলি, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং আমি আল্লাহর রাসূল।" তখন আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), তাঁর সঙ্গী এবং আমি তাঁর প্রতি ঈমান আনলাম। আর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর একটি প্রয়োজনে ছিলেন, যার জন্য তিনি তাঁকে পাঠিয়েছিলেন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর প্রতি সোমবার ওহী নাযিল হয় এবং আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মঙ্গলবার সালাত আদায় করেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] خبر منكر، وهذا إسناد قد اختُلف في وصله وإرساله، فقد جاء هذا الخبر في الجزء المطبوع من "سيرة ابن إسحاق" برواية أحمد بن عبد الجبار - وهو العُطاردي - عن يونس بن بكير، عن ابن إسحاق برقم (180) مرسلًا، ليس فيه ذكر بريدة، وإنما يَحكي فيه عبد الله بن بريدة قصة أبيه مع أبي ذر وابن عمه بصيغة الغائب، وليس فيه كلام لبريدة بصيغة المتكلم كما وقع في رواية المصنف هنا، بما يدل على أنَّ الرواية التي في جزء "السيرة" ذاك مرسلة، ويؤيد ذلك أنه وقع الخبر مختصرًا مرة أخرى في ذلك الجزء بذكر الثلاثة الذين أسلموا بعد علي بن أبي طالب برقم (176) عن يوسف بن صهيب عن عبد الله بن بريدة، قال: أول الناس إسلامًا علي بن أبي طالب، ثم الرهط الثلاثة أبو ذر وبريدة وابن عم أبي ذر.وفيه اختلاف آخر في متنه أيضًا، وهو أنَّ الزيادة التي هنا في آخر الخبر وهي قوله: وأُوحي إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم الاثنين، وصلى عليٌّ يوم الثلاثاء، لم ترد في جزء "السيرة" الذي بأيدينا، مع أنه من رواية أحمد بن عبد الجبار العُطاردي عن يونس بن بكير، فهذه الزيادة مدرجة في هذا الخبر.وفي رواية يونس بن بكير هذه أيضًا اختلاف ونكارة، فقد روى علي بن غُراب عند ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (177)، والطبراني في "الكبير" 22/ (1102) عن يوسف بن صهيب عن عبد الله بن بريدة عن أبيه، أنه قال: خديجة أول من أسلم مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، وعلي بن أبي طالب. ففي هذه الرواية مخالفة لرواية يونس بن بكير، حيث ذكر فيها خديجة مقرونة بعليِّ بن أبي طالب بأنهما أول الناس إسلامًا، وليس فيه تعرُّض لذكر أبي ذر ولا صاحبيه المذكورَين، فهذه علة أخرى.على أنه قد رُوي في إسلام بريدة روايةٌ أخرى عند الواقدي في "مغازيه" 2/ 782 أنَّ بريدة أسلم هو وجماعة من قومه لما كان رسول الله صلى الله عليه وسلم في طريق الهجرة، وهو بغدير الأشطاط، وزاد الواقدي في رواية أخرى ذكرها ابن سعد في "طبقاته" 4/ 228 عنه عن هاشم بن عاصم الأسلمي عن أبيه، قال: لما هاجر رسول الله صلى الله عليه وسلم من مكة إلى المدينة فانتهى إلى الغميم، أتاه بريدة بن الحصيب، فدعاه رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى الإسلام، فأسلم هو ومن معه وكانوا زهاء ثمانين بيتًا، فصلَّى بهم رسول الله صلى الله عليه وسلم العشاء فصلوا خلفه.فكان إسلام بريدة إذًا على مقتضى رواية الواقدي لما كان رسول الله صلى الله عليه وسلم في طريق هجرته، ويؤيده رواية أخرى لبريدة نفسه من طريق أوس بن عبد الله بن بريدة عن الحسين بن واقد وعن أخيه سهل بن عبد الله بن بريدة، كلاهما عن عبد الله بن بريدة عن أبيه: أنه التقى رسولَ الله صلى الله عليه وسلم في سبعين راكبًا من أهل بيته من بني سهم لما توجَّه النبي صلى الله عليه وسلم من مكة إلى المدينة، وكانت قريش جعلت مئةً من الإبل فيمن يأخذُ نبيَّ الله صلى الله عليه وسلم فيردُّه عليهم.فباجتماع هذه الروايات يتضح أن بريدة كان إسلامه إذ كان النبيُّ صلى الله عليه وسلم في طريق هجرته من مكة إلى المدينة، وهذا ينافي كونه كان أحدَ الأربعة السابقين إلى الإسلام كما تفيده رواية يونس بن بكير، فهذه علة ثالثة في روايته.وأما إسلام أبي ذرٍّ فقصته المشهورة في إسلامه التي أخرجها مسلم (2473) وغيره، تُنافي قصته التي رواها يونس بن بكير أيضًا، ففي رواية مسلم وغيره ما يشعر بأنَّ إسلامَ أبي ذرِّ كان قبل الهجرة، لقول النبي صلى الله عليه وسلم ولأبي ذر: "إنه قد وُجِّهتْ لي أرضٌ ذاتُ نخل، لا أُراها إلّا يثرب، فهل أنت مبلغٌ عني قومك عسى الله أن ينفعهم بك ويأجرك فيهم"، وفيها أيضًا أنَّ أبا ذرٍّ أسلم هو وأخوه أُنيس وأمهما أيضًا، ففي ذلك دليل على أنَّ إسلام أبي ذرٍّ كان سابقًا لإسلام بريدة، وأنَّ أبا ذرٍّ إنما أسلم هو وأخوه وأمهما معًا، وليس هو وابن عمه وبريدة كما في رواية يونس بن بكير، وإذا كان إسلامهم قبيل الهجرة فلا يكون أبو ذرٍّ أحد الأربعة السابقين إلى الإسلام كما في حديث يونس بن بكير، لما هو معلومٌ من إسلام جماعةٍ من الصحابة قبل ذلك الحين.فحصل من ذلك تعارضُ ظاهرٌ بين رواية مسلم وغيره في قصة إسلام أبي ذر وبين رواية يونسبن بكير في قصة إسلامه، فهذه أوجهٌ متعددة تظهر نكارة رواية يونس بن بكير وأنها مخالفة للمشهورفي إسلام بريدة، ومخالفة للصحيح أيضًا في إسلام أبي ذر.وقوله في آخر الخير بأنه أُوحي إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم الاثنين، وأن عليًا صلَّى يوم الثلاثاء، قد روي من غير حديث بريدة، فقد رُوي عن أنس بن مالك كما في الرواية التالية عند المصنف، لكنه ضعيف جدًّا واهٍ.وروي أيضًا من حديث جابر بن عبد الله عند الطبري في "تاريخه" 2/ 310، وهو واهٍ أيضًا، ففي إسناده عبد الحميد بن بحر، قال عنه ابن حبان وابن عدي: كان يسرق الحديث.ورُوي كذلك من حديث أبي رافع مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم، كما سيأتي عند المصنف برقم (4901) وفي إسناده محمد بن عبيد الله بن أبي رافع، وهو متروك.وانظر ما سلف برقم (4633).
4638 - حدثني أبو سعيد أحمد بن عمرو الأحمَسي، حدثنا الحسين بن حُميد بن الربيع، حدثني عبد الرحمن بن دُبَيس المُلائي، حدثني علي بن عابِس، عن مُسلم المُلائي، عن أنس، قال: نُبِّئ النبيُّ صلى الله عليه وسلم يومَ الاثنين، وأسلمَ عليٌّ يومَ الثلاثاء [1].
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সোমবার নবুওয়াত প্রদান করা হয় (বা তিনি নবী হিসেবে প্রেরিত হন), আর আলী মঙ্গলবার ইসলাম গ্রহণ করেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده واهٍ بمَرَّة، مسلم المُلائي وعلي بن عابس متفق على ضعفهما، ومسلم أشدهما ضعفًا، بل متروك، والحسين بن حميد فيه لين.وقد أخرجه الترمذي في "جامعه" (3728) عن إسماعيل بن موسى الفَزَاري، عن علي بن عابس، به.وأخرجه أبو يعلى (446)، ومن طريقه ابن عساكر 42/ 30 من طريق سليمان بن قَرْم، عن مُسلم المُلائي، عن حَبَّة بن جُوَين، عن عليّ بن أبي طالب. وسليمان بن قَرْم ضعيف أيضًا وكذلك حَبَّة بن جُوين.