হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4699)


4699 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا بِشر بن موسى، حدثنا محمد بن سعيد بن الأصبهاني، حدثنا شَريك.وأخبرنا أحمد بن جعفر القطيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا الأسود بن عامر وعبد الله بن نُمير، قالا: حدثنا شَريك، عن أبي رَبيعة الإيادي، عن ابن بُريدة، عن أبيه، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إنَّ الله أمرني بحُبِّ أربعةٍ من أصحابي، وأخبرَني أنه يُحِبُّهم"، قال: قلنا: من هم يا رسول الله؟ وكلنا نُحبُّ أن نكون منهم، فقال: "ألا إنَّ عليًّا منهم" ثم سكتَ، ثم قال: "ما إنَّ عليًّا منهم"، ثم سكتَ [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




বুরাইদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ আমাকে আমার চারজন সাহাবীকে ভালোবাসার আদেশ দিয়েছেন এবং আমাকে জানিয়ে দিয়েছেন যে তিনি তাদের ভালোবাসেন।" (রাবী) বলেন, আমরা বললাম, "হে আল্লাহর রাসূল! তারা কারা? আমরা সবাই চাই যে আমরা যেন তাদের অন্তর্ভুক্ত হই।" তিনি বললেন: "সাবধান! নিশ্চয় আলী তাদের অন্তর্ভুক্ত।" এরপর তিনি নীরব থাকলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "নিশ্চয় আলী তাদের অন্তর্ভুক্ত।" এরপর তিনি নীরব থাকলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف، تفرَّد به أبو ربيعة الإيادي - واسمه عمر بن ربيعة - وهذا إنما يقبل حديثه في المتابعات والشواهد، وكذلك الراوي عنه شريك - وهو ابن عبد الله النخعي القاضي - ففي حفظه سوءٌ، ومع ذلك فقد حسّنه الترمذي وابن حجر في "الإصابة" 6/ 203. ابن بُريدة: هو عبد الله.وهو في "مسند أحمد" 38/ (22968) عن عبد الله بن نُمير، و (23014) عن أسود بن عامر. ووقع فيه تسمية الثلاثة الآخرين، وهم أبو ذر وسلمان والمقداد الكندي.وأخرجه كذلك ابن ماجه (149)، والترمذي (3718) من طريقين عن شريك النخعي بهذا الإسناد. وقال الترمذي حديث حسن غريب.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4700)


4700 - حدثني أبو علي الحافظ، أخبرنا أبو عبد الله محمد بن أحمد بن أيوب الصَّفّار وحُميد بن يونس بن يعقوب الزيّات، قالا: حدثنا محمد بن أحمد بن عِيَاض بن أبي طَيْبة [حدثنا أبي] [1] حدثنا يحيى بن حسّان، عن سليمان بن بلال، عن يحيى بن سعيد، عن أنس بن مالك، قال: كنت أَخدُم رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقُدِّم لرسولِ الله صلى الله عليه وسلم فَرْخٌ مَشْوِيّ، فقال: "اللهم ائتني بأحبِّ خَلْقِكَ إِليك يأكلْ معي من هذا الطَّير"، قال: فقلتُ: اللهمَّ اجعلْه رجلًا من الأنصار، فجاء عليٌّ، فقلت: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم على حاجةٍ، ثم جاء فقلتُ: إنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم على حاجةٍ، ثم جاء، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "افتحْ"، فدخلَ، فقال: "ما حَبَسك علَيَّ؟ " فقال: إِنَّ هذه آخرُ ثلاثِ كَرّاتٍ يَردُّني أنسٌ، يَزْعُم أَنك على حاجةٍ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما حَمَلك على ما صنعتَ؟ " فقلت: يا رسول الله، سمعتُ دعاءَك، فأحببتُ أن يكون رجلًا من قومي، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إِنَّ الرجل قد يُحبُّ قومَه" [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه [3]. وقد رواه عن أنسٍ جماعةً من أصحابه، زيادةٌ على ثلاثين نَفْسًا.ثم صحّتِ الرواية عن عليٍّ وأبي سعيد الخُدْري وسَفِينةَ [4].وفي حديث ثابت البُناني عن أنس زيادةُ ألفاظٍ:




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর খিদমত করতাম। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট একটি ভুনা পাখি পেশ করা হলো। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে আল্লাহ! আপনার সৃষ্টির মাঝে আপনার নিকট সবচেয়ে প্রিয় ব্যক্তিকে আমার কাছে নিয়ে আসুন, যেন সে আমার সাথে এই পাখিটি থেকে খেতে পারে।" তিনি (আনাস) বলেন, তখন আমি মনে মনে বললাম: "হে আল্লাহ! তাকে আনসারদের মধ্য থেকে একজন বানিয়ে দিন।" অতঃপর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আসলেন। আমি বললাম: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এখন জরুরি কাজে আছেন। এরপর তিনি আবার আসলেন, তখনও আমি বললাম: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এখন জরুরি কাজে আছেন। এরপর তিনি (তৃতীয়বার) আসলেন। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "দরজা খুলে দাও।" তিনি (আলী) প্রবেশ করলেন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম জিজ্ঞেস করলেন: "কোন জিনিস তোমাকে আমার কাছে আসতে বিলম্ব করাল?" তিনি বললেন: এই নিয়ে তৃতীয়বার আনাস আমাকে ফিরিয়ে দিল। সে দাবি করছিল যে আপনি কোনো জরুরি কাজে আছেন। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "তুমি এমনটি কেন করলে?" আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আমি আপনার দু'আ শুনেছিলাম, তাই আমি চাইলাম যেন লোকটি আমার গোত্রের (আনসারদের) মধ্য থেকে হয়। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "নিশ্চয়ই মানুষ তার গোত্রকে ভালোবাসতে পারে।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] سقط ذكر والد محمد بن أحمد بن عياض من أصولنا الخطية، وسقط كذلك من "تلخيصه" ومن "إتحاف المهرة"، وأثبتناه من "موضوعات المستدرك" للذهبي (16)، ويؤيده أنه جاء ذكره في ميزان الاعتدال للذهبي أيضًا 3/ 465، وفي "النقد الصحيح لما اعتُرض عليه من أحاديث المصابيح" للعلائي ص 50، وفي "البداية والنهاية" لابن كثير 11/ 76، حيث أوردوا رواية الحاكم هذه، فذكروا والد محمد بن أحمد بن عياض.



[2] إسناده ضعيف، محمد بن أحمد بن عياض تفرّد عن أبيه بمناكير كما قال الذهبي في "تاريخ الإسلام" 6/ 1008، وهذا منها، ومحمد وأبوه - وإن روى عنهما جمع - لم يؤثر توثيقهما في باب الرواية عن أحد من أهل الجرح والتعديل، ولهما علم بالفرائض. وقد تفرد أحمد بن عياض عن يحيى بن حسان بهذا الحديث، فلم يروه عن يحيى أحدٌ من ثقات أصحابه المصريين كيونس بن عبد الأعلى الصدفي وأحمد بن صالح المصري!وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (6561) عن محمد بن أحمد بن عياض، عن أبيه، بهذا الإسناد. قلنا: وكل ما جاء في هذا الخبر من طرق - كما سيشير المصنف بإثره - فهي إما تالفة واهية أو ضعيفة بسبب جهالة راوٍ أو ضعفه مع تشيُّع أو رفض فيه، وقد أحسن الأستاذ الفاضل أحمد ميرين البلوشي في تحقيقه كتاب "خصائص علي رضي الله عنه" للنسائي ص 29 - 36، فأورد هذه الطرق ونبَّه على ضعفها طريقًا طريقًا، فأجاد وأفاد، ثم أشار إلى خلاف أهل العلم في توهين الخبر وتحسينه، فارجع إليه إن شئت.ومن طرقه عن أنس ما أخرجه مختصرًا الترمذيُّ (3721)، والنسائي (8341)، وأبو يعلى (4052)، وابن عدي في "الكامل" 6/ 457 وغيرهم من طريقين فيهما لِينٌ عن عيسى بن عمر القارئ، عن السُّدِّي، عن أنس. وهذا من أجود طرقه، وقد استغربه الترمذي من حديث السُّدِّي: وهو إسماعيل بن عبد الرحمن، وحكى في العلل "الكبير" (698) عن شيخه البخاري أنه لم يعرفه من حديث السُّدِّي عن أنس، وأنكره وجعل يتعجَّب منه. قلنا: والسدي مختلف فيه، وفيه لِينٌ مع تشيُّع.قال الحافظ ابن كثير في "البداية والنهاية" 11/ 83: وقد جمع الناس في هذا الحديث مصنَّفات مفردةً، منهم أبو بكر بن مردويه والحافظ أبو طاهر محمد بن أحمد بن حمدان فيما رواه شيخنا أبو عبد الله الذهبي، ورأيت فيه مجلدًا في جمع طرقه وألفاظه لأبي جعفر بن جرير الطبري المفسِّر صاحب "التاريخ"، ثم وقفتُ على مجلد كبير في ردِّه وتضعيفه سندًا ومتنًا للقاضي أبي بكر الباقلّاني المتكلِّم، وبالجملة ففي القلب من صحة هذا الحديث نظرٌ وإن كَثُرَت طرقُه، والله أعلم. التي فيه، فإذا حديث الطير بالنسبة إليها سماء.



4700 [3] - قال الذهبي في "تلخيصه": ابن عياض لا أعرفه، ولقد كنت زمانًا طويلًا أظن أن حديث الطير لم يجسر الحاكم أن يودعه في "مستدركه"، فلما علَّقت هذا الكتاب، رأيت الهولَ من الموضوعات التي فيه، فإذا حديث الطير بالنسبة إليها سماء.



4700 [4] - حديث سفينة أخرجه البزار (3841)، وأبو يعلى في "مسنده الكبير" كما في "المطالب" (3936)، والطبراني في "الكبير" (6437)، وأبو بكر القطيعي في زياداته على "فضائل الصحابة" لأحمد (945)، من طريقين ضعيفين بمرّة.وأما حديث عليٍّ فأخرجه ابن عساكر 42/ 245 - 246، وذكره ابن كثير في "البداية والنهاية" 11/ 82، وذكر طرفًا من إسناده، وفيه رجل متروك الحديث.وأما حديث أبي سعيد الخُدْري فأشار إليه ابن كثير أيضًا، وقال: صحَّحه الحاكم ولكن إسناده مظلم، وفيه ضعفاء. والظاهر أنَّ ابن كثير ينقل كل ذلك عن مصنَّف شيخه الذهبي، حيث أشار إليه في بداية كلامه عن حديث الطير وبيان طرقه 11/ 75 - 83.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4701)


4701 - كما حدثنا به الثقةُ المأمونُ أبو القاسم الحسن بن محمد بن الحَسَن [1] ابن إسماعيل بن محمد بن الفضل بن عُقبة [2] بن خالد السَّكُوني بالكوفة من أصل كتابه، حدثنا عُبيد بن كَثير العامري، حدثنا عبد الرحمن بن دُبَيس.وحدثنا أبو القاسم، حدثنا محمد بن عبد الله بن سليمان الحضرمي، حدثنا عبد الله بن عمر بن أبان بن صالح؛ قالا: حدثنا إبراهيم بن ثابت البصري القَصّار، حدثنا ثابت البُناني: أنَّ أنس بن مالك كان شاكيًا، فأتاهُ محمد بن الحجّاج يعودُه في أصحاب له، فجرى الحديثُ حتى ذكَروا عليًّا، فتنقَّصَه محمدُ بن الحجاج، فقال أنسٌ: مَن هذا؟ أقعِدُوني، فأقعدُوه، فقال: يا ابنَ الحجّاج، ألا أراكَ تَنَقَّصُ عليَّ بن أبي طالب، والذي بعث محمدًا صلى الله عليه وسلم بالحقِّ، لقد كنتُ خادمَ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم بين يدَيه، وكان كلَّ يومٍ يَخدُم بين يدَي رسولِ الله صلى الله عليه وسلم غُلامٌ من أبناء الأنصار، فكان ذلك اليومُ يومي، فجاءت أمُّ أيمنَ مولاةُ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم بطَيرٍ، فوضعتْه بين يَدَي رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "يا أمَّ أيمنَ، ما هذا الطائرُ؟ " قالت هذا الطائرُ أصبتُه فصنعتُه لك، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "اللهمَّ جِئْني بأحبِّ خَلقِكَ إليكَ وإليّ يأكلْ معي من هذا الطائر"، وضُربَ البابُ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يا أنسُ، انظُرْ مَن على البابِ"، فقلتُ: اللهمَّ اجعلْه رجلًا من الأنصار، فذهبتُ فإذا عليٌّ بالباب قلت: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم على حاجةٍ، فجئتُ حتى قُمتُ مَقامي، فلم ألبَثْ أن ضُرِب البابُ، فقال: "يا أنسُ، انظُرْ مَن على البابِ"، فقلتُ: اللهمَّ اجعلْه رجلًا من الأنصار، فذهبتُ فإذا عليٌّ بالباب، قلت: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم على حاجةٍ، فجئتُ حتى قُمتُ مَقامي، فلم ألبَثْ أن ضُرِبَ البابُ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يا أنسُ، اذهَبْ فأدخِلْه، فلستَ بأولِ رجلٍ أحبَّ قومَه، ليس هو من الأنصار" فذهبتُ فأدخلتُه، فقال: "يا أنسُ قَرِّبْ إليه الطيرَ" قال: فوَضَعتُه بين يدَي رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأكلا جميعًا.قال محمد بن الحجّاج: يا أنسُ، كان هذا بمَحضَرٍ منك؟ قال: نعم، قال: أُعطي باللهِ عهدًا ألّا أنتقِصَ عليًّا بعد مَقامي هذا، ولا أَسمع أحدًا يَنتقِصُه إلَّا أشَنْتُ له وَجْهَهُ [3].




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি অসুস্থ ছিলেন। তখন মুহাম্মাদ ইবনুল হাজ্জাজ তার সাথীসহ তাকে দেখতে আসলেন। কথোপকথনের এক পর্যায়ে তারা আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর আলোচনা করলেন। তখন মুহাম্মাদ ইবনুল হাজ্জাজ তার সমালোচনা করলেন। আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, 'এ কে? আমাকে বসাও।' অতঃপর তারা তাকে বসালো। তিনি বললেন, 'হে ইবনুল হাজ্জাজ! আমি কি দেখছি তুমি আলী ইবনে আবি তালিবের সমালোচনা করছো? যার হাতে মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জীবন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সম্মুখে তার খাদেম ছিলাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সম্মুখে প্রতিদিন আনসার সন্তানদের মধ্য থেকে একজন যুবক খেদমত করত। সেদিন ছিল আমার পালা। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আযাদকৃত দাসী উম্মু আইমান একটি পাখি নিয়ে আসলেন এবং তা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সামনে রাখলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "হে উম্মু আইমান! এটি কেমন পাখি?" তিনি বললেন, "আমি এই পাখিটি ধরে আপনার জন্য প্রস্তুত করেছি।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "হে আল্লাহ! আপনার এবং আমার কাছে আপনার সর্বাধিক প্রিয় ব্যক্তিকে নিয়ে আসুন, যাতে সে আমার সাথে এই পাখিটি ভক্ষণ করতে পারে।" এরপর দরজায় আঘাত পড়ল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "হে আনাস! দেখ তো দরজায় কে?" আমি মনে মনে বললাম: "হে আল্লাহ! তাকে আনসারদের মধ্য থেকে একজন বানাও।" আমি গেলাম এবং দেখলাম দরজায় আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। আমি বললাম, "রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বর্তমানে ব্যস্ত আছেন।" আমি ফিরে এসে আমার জায়গায় দাঁড়ালাম। সামান্য বিরতির পর আবার দরজায় আঘাত পড়ল। তিনি বললেন, "হে আনাস! দেখ তো দরজায় কে?" আমি মনে মনে বললাম: "হে আল্লাহ! তাকে আনসারদের মধ্য থেকে একজন বানাও।" আমি গেলাম এবং দেখলাম দরজায় আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। আমি বললাম, "রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বর্তমানে ব্যস্ত আছেন।" আমি ফিরে এসে আমার জায়গায় দাঁড়ালাম। সামান্য বিরতির পর আবার দরজায় আঘাত পড়ল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "হে আনাস! যাও, তাকে ভেতরে নিয়ে এসো। তুমি প্রথম ব্যক্তি নও, যে নিজের গোত্রকে ভালোবাসে। সে আনসারদের মধ্য থেকে নয়।" অতঃপর আমি গেলাম এবং তাকে ভেতরে নিয়ে আসলাম। তিনি বললেন, "হে আনাস! তার দিকে পাখিটি এগিয়ে দাও।" আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমি তা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সামনে রাখলাম এবং তারা উভয়ে একসাথে খেলেন। মুহাম্মাদ ইবনুল হাজ্জাজ বললেন, "হে আনাস! এটা কি আপনার উপস্থিতিতে হয়েছিল?" তিনি বললেন, "হ্যাঁ।" সে বলল, "আমি আল্লাহর নামে এই ওয়াদা করছি যে, আজকের এই অবস্থান থেকে আমি আর কখনও আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সমালোচনা করব না এবং আমি যদি কাউকে তার সমালোচনা করতে শুনি, তবে আমি অবশ্যই তার মুখমণ্ডলকে কালো করে দেব (বা অপমানিত করব)।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في (ز) و (ص) و (ب) إلى: الحسين، وجاء على الصواب في (م).



[2] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: علية.



4701 [3] - إسناده ضعيف جدًّا، إبراهيم بن ثابت القصّار - وبعضهم سمّى أباه بابًا بدل ثابت - قال عنه الذهبي في "الميزان": ما ذا بعُمدةٍ ولا أعرف حاله جيدًا. وقال في "تلخيص المستدرك": ساقطٌ.وأخرجه العقيلي في "الضعفاء" (41) عن موسى بن إسحاق الأنصاري، عن عبد الله بن عمر بن أبان، بهذا الإسناد.ثم قال: ليس لهذا الحديث من حديث ثابتٍ أصلٌ، وقد تابع هذا الشيخَ مُعلَّى بنُ عبد الرحمن، فرواه عن حماد بن سلمة عن ثابت عن أنس؛ حدَّثَناه الصائغ، عن الحسن بن علي الحُلواني، عنه. ومُعلَّى عندهم يكذب، ولم يأتِ به ثقة عن حماد بن سلمة، ولا عن ثقة عن ثابت.ثم قال: وهذا الباب الروايةُ فيه فيها لِينٌ وضعفٌ، لا أعلم فيه شيء ثابت، وهكذا قال البخاري.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4702)


4702 - أخبرنا أبو بكر أحمد بن جعفر بن حمدان القَطِيعي ببغداد من أصل كتابه، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا يحيى بن حماد، حدثنا أبو عَوَانة، حدثنا أبو بَلْج، حدثنا عمرو بن ميمون قال إني لَجالِسٌ إلى ابن عبّاس، إذ أتاه تسعةُ رَهْط، فقالوا: يا أبا عبّاس، إما أن تقومَ معنا، وإما أن تَخلُوَ بنا من بين هؤلاء، قال: فقال ابن عبّاس: بل أنا أقومُ معكم، قال: وهو يومئذٍ صحيحٌ قبل أن يَعْمَى، قال: فابتدَؤوا فتحدّثُوا، فلا ندري ما قالوا، قال: فجاء يَنفُضُ ثوبَه، ويقول: أُفٍّ وتُفٍّ، وَقَعُوا في رجل له بضعَ عشر فضائلَ ليست لأحدٍ غيرِه، وقَعُوا في رجل قال له النبيُّ صلى الله عليه وسلم: "لأبعثَنَّ رجلًا لا يُخزيه الله أبدًا، يُحبُّ الله ورسوله، ويحبُّه اللهُ ورسولُه" فاستشرف لها مُستشرِفٌ، فقال: "أين عليٌّ؟ فقالوا: إنه في الرَّحَى يَطحَنُ، قال: وما كان أحدُهم ليَطحَنَ، قال: فجاء وهو أرمَدُ لا يكادُ أن يُبصِر، قال: فنَفَثَ فِي عَينَيه، ثم هَزَّ الرايةَ ثلاثًا فأعطاها إياه، فجاء عليٌّ بصفيّةَ بنت حُيَيّ.قال ابن عبّاس: ثم بعث رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فلانًا بسُورة التوبة، فبعث عليًّا خَلْفه، فأخذها منه، وقال: "لا يذهبُ بها إلَّا رجلٌ هو مني وأنا منه".فقال ابن عبّاس: وقال النبي صلى الله عليه وسلم لبني عَمِّه: "أَيُّكُم يُوالِيني في الدنيا والآخرة؟ " قال: وعليٌّ جالسٌ معهم، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم وأقبلَ على رجلٍ رجلٍ منهم، فقال: "أيُّكم يُوالِيني في الدنيا والآخِرة؟ " فأبَوْا، فقال لعليٍّ: "أنت وَليّي في الدنيا والآخرة".قال ابن عبّاس: وكان عليٌّ أولَ مَن آمن مِن الناس بعد خديجةَ.قال: وأخذ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم ثوبَه فوضعَه على عليٍّ وفاطمةَ وحَسنٍ وحُسينٍ، وقال: {إِنَّمَا يُرِيدُ اللَّهُ لِيُذْهِبَ عَنْكُمُ الرِّجْسَ أَهْلَ الْبَيْتِ وَيُطَهِّرَكُمْ تَطْهِيرًا}.قال ابن عبّاس: وشَرَى عليٌّ نفسه فلَبِسَ ثوبَ النبي صلى الله عليه وسلم ثم نامَ مكانَه، قال ابن عبّاس: وكان المشركون يَرْمُون رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، فجاء أبو بكر وعليٌّ نائم، قال: وأبو بكر يَحسَبُ أنه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، قال: فقال: يا نبيَّ الله، فقال له عليٌّ: إِنَّ نبي الله صلى الله عليه وسلم قد انطلَقَ نحو بئر مَيمونٍ، فأدْرِكْه، قال: فانطلَقَ أبو بكر فدخَلَ معه الغارَ، قال: وجعلَ عليٌّ يُرمَى بالحجارةِ كما كان يُرمَى نبيُّ الله صلى الله عليه وسلم وهو يَتَضوَّر وقد لفَّ رأسَه في الثوبِ لا يُخرِجُه حتى أصبحَ، ثم كَشفَ عن رأسِه، فقالوا: إنك لَلَئيم، وكان صاحبُك لا يَتضوَّرُ ونحن نَرميه، وأنت تتضَوَّر، وقد استَنكَرْنا ذلك.قال ابن عبّاس: وخرج رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في غزوة تبوكَ وخرج بالناس معه، قال: فقال له عليٌّ: أخرجُ معك؟ قال: فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم "لا" فبكى عليّ، فقال له: "أمَا تَرضَى أن تكون مني بمنزلةِ هارون من موسى، إلَّا أنه ليس بعدي نبيٌّ، إنه لا ينبغي أن أذهَبَ إِلَّا وأنت خَلِيفتي".قال ابن عبّاس: وقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أنت وليُّ كلِّ مؤمنٍ بَعدي ومُؤمنةٍ".قال ابن عبّاس: وسدَّ رسولُ صلى الله عليه وسلم أبوابَ المسجد غيرَ بابِ عليٍّ، فكان يَدخُل المسجدَ جُنُبًا وهو طريقُه، ليس له طريقٌ غيره.قال ابن عبّاس: وقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن كنتُ مَولاهُ فَإِنَّ مَولاهُ عليٌّ".قال ابن عبّاس: وقد أخبرَنا اللهُ عز وجل في القرآن أنه رَضِيَ عن أصحاب الشجرة، فعَلِمَ ما في قُلوبهم، فهل أخبرَنا أنه سَخِطَ عليهم بعدَ ذلك؟!قال ابن عبّاس: وقال نبيُّ الله صلى الله عليه وسلم لِعُمر حين قال: ائذَنْ لي فاضربَ عُنقَه، قال: "وكنتَ فاعلًا؟ وما يُدريكَ لعلَّ الله قد اطَّلع على أهلِ بدرٍ فقال: اعمَلُوا ما شِئتُم" [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه بهذه السِّياقة.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, [রাবী] আমর ইবনু মায়মূন (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আমি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে বসা ছিলাম। এমন সময় নয় জনের একটি দল তাঁর কাছে এলো। তারা বলল: হে আবূ আব্বাস! হয় আপনি আমাদের সাথে উঠুন, না হয় এদের থেকে আলাদা হয়ে শুধু আমাদের সাথে কথা বলুন। ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: বরং আমি তোমাদের সাথে যাবো। (আমর ইবনু মায়মূন বলেন) ঐ সময় তাঁর দৃষ্টিশক্তি ঠিক ছিল, অন্ধ হওয়ার আগের ঘটনা এটা। তারা আলোচনা শুরু করল, কিন্তু তারা কী বলল আমরা জানতে পারিনি। (আলোচনা শেষে) তিনি তাঁর কাপড় ঝাড়তে ঝাড়তে ফিরে এসে বললেন: উফ! তারা এমন একজন মানুষের সমালোচনা করছে, যার জন্য এমন দশটিরও বেশি ফযীলত রয়েছে যা অন্য কারও জন্য নেই।

তারা এমন একজনের সমালোচনা করছে, যাকে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “আমি অবশ্যই এমন একজন ব্যক্তিকে প্রেরণ করব, যাকে আল্লাহ কক্ষনো অপমানিত করবেন না। তিনি আল্লাহ ও তাঁর রাসূলকে ভালোবাসেন এবং আল্লাহ ও তাঁর রাসূলও তাঁকে ভালোবাসেন।” লোকেরা মাথা উঁচু করে দেখতে চাইল। তিনি বললেন: “আলী কোথায়?” তারা বলল: তিনি যাঁতা নিয়ে আটা পিষছেন। (বর্ণনাকারী বলেন) তাদের মধ্যে আর কেউ যাঁতা পিষার মতো ছিল না। তিনি এলেন, তখন তিনি চোখ ওঠা রোগী, তিনি চোখ খুলতে পারছিলেন না। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর দু’চোখে ফুঁ দিলেন। অতঃপর তিনবার পতাকা নাড়িয়ে তাঁকে দিলেন। তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাফিয়্যাহ বিনত হুয়াই (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে নিয়ে এলেন।

ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সূরা তাওবা দিয়ে অমুক ব্যক্তিকে পাঠালেন। এরপর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে তাঁর পিছনে পাঠালেন। তিনি তার কাছ থেকে তা (সূরাটি) নিয়ে নিলেন এবং বললেন: “সে ব্যক্তি ছাড়া আর কেউ এটি বহন করে নিয়ে যাবে না, যে আমার থেকে এবং আমি তার থেকে।”

ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর চাচাতো ভাইদের বললেন: “তোমাদের মধ্যে কে দুনিয়া ও আখিরাতে আমার বন্ধু (ওয়ালী) হবে?” আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের সাথে বসা ছিলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের একজনের পর আরেকজনের দিকে এগিয়ে গেলেন এবং বললেন: “তোমাদের মধ্যে কে দুনিয়া ও আখিরাতে আমার বন্ধু হবে?” তারা অস্বীকার করল। অতঃপর তিনি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: “তুমিই দুনিয়া ও আখিরাতে আমার বন্ধু (ওয়ালী)।”

ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: খাদীজা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পরে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন প্রথম ব্যক্তি যিনি মানুষের মধ্যে ঈমান এনেছিলেন।

ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর চাদর নিলেন এবং তা আলী, ফাতিমা, হাসান ও হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উপর রাখলেন এবং বললেন: “হে আহলে বাইত! আল্লাহ কেবল চান তোমাদের থেকে অপবিত্রতা দূর করতে এবং তোমাদেরকে পূর্ণরূপে পবিত্র করতে।”

ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিজের জীবনকে বিক্রি করে দিয়েছিলেন। তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পোশাক পরে তাঁর বিছানায় ঘুমিয়েছিলেন। ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: মুশরিকরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দিকে পাথর ছুঁড়ছিল। আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এলেন যখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ঘুমাচ্ছিলেন। আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ধারণা করেছিলেন যে তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)। তিনি বললেন: হে আল্লাহর নবী! তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মায়মূনের কূপের দিকে চলে গেছেন, আপনি তাঁর সাথে মিলিত হোন। আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) চলে গেলেন এবং তাঁর সাথে গুহায় প্রবেশ করলেন। ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: মুশরিকরা আলীর দিকে পাথর ছুঁড়তে লাগল, যেমন তারা আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দিকে ছুঁড়ত। তিনি (আলী) কষ্ট পাচ্ছিলেন এবং তাঁর মাথা কাপড়ে জড়ানো ছিল। তিনি সকাল না হওয়া পর্যন্ত মাথা বের করেননি। এরপর তিনি মাথা খুললেন। তখন তারা বলল: তুমি তো নিকৃষ্ট! তোমার সাথীকে আমরা পাথর নিক্ষেপ করলেও তিনি কষ্ট পেতেন না, কিন্তু তুমি কষ্ট পাচ্ছো। আমরা এ আচরণে সন্দেহ করেছিলাম।

ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাবূকের যুদ্ধের উদ্দেশ্যে বের হলেন এবং তাঁর সাথে লোকেদেরও বের করলেন। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: আমি কি আপনার সাথে বের হব? নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “না।” এতে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কেঁদে ফেললেন। তখন তিনি তাঁকে বললেন: “তুমি কি এতে সন্তুষ্ট নও যে, তুমি আমার কাছে মূসার কাছে হারূনের অবস্থানে থাকবে, তবে আমার পরে কোনো নবী নেই? আমার যাওয়া উচিত নয়, অথচ তুমি আমার স্থলাভিষিক্ত (খলীফা) নও।”

ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: “তুমি আমার পরে প্রত্যেক মুমিন পুরুষ ও মুমিন নারীর বন্ধু (ওয়ালী)।”

ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মসজিদের সকল দরজা বন্ধ করে দিলেন, কেবল আলীর দরজা ছাড়া। আর তিনি অপবিত্র অবস্থায় মসজিদে প্রবেশ করতেন; কারণ এটিই ছিল তাঁর পথ, তাঁর অন্য কোনো পথ ছিল না।

ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “আমি যার মাওলা, আলীও তার মাওলা।”

ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আল্লাহ তাআলা কুরআনে আমাদের জানিয়ে দিয়েছেন যে, তিনি ‘আসহাবুস শাজারা’ (বৃক্ষের নিচে বাইয়াত গ্রহণকারী সাহাবী)-দের প্রতি সন্তুষ্ট ছিলেন এবং তাদের অন্তরে কী ছিল সে সম্পর্কে তিনি অবগত ছিলেন। এরপর কি তিনি আমাদের জানিয়ে দিয়েছেন যে, তিনি তাদের উপর অসন্তুষ্ট হয়েছেন?!

ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: যখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমাকে অনুমতি দিন, আমি তার গর্দান উড়িয়ে দেই, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উমারকে বললেন: “তুমি কি তা করতে? তুমি কীভাবে জানলে? সম্ভবত আল্লাহ বদরের যোদ্ধাদের প্রতি দৃষ্টি দিয়েছেন এবং বলেছেন: তোমরা যা ইচ্ছা করো।”




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] ضعيف بهذه السياقة وفي بعض حروفه مناكير، تفرد به أبو بلج - واسمه يحيى بن سليم، أو ابن أبي سليم - وهو وإن قوّى أمرَه غيرُ واحد قد قال فيه البخاري: فيه نظر، وأعدل الأقوال فيه أنه يقبل حديثه فيما لا ينفرد به كما قال ابن حبان في "المجروحين"، واستنكر له الإمام أحمد هذا الحديث، فقد نقل عنه ابن الجوزي في "الموضوعات" 2/ 134 أنه قال: روى أبو بلج حديثًا منكرًا "سدوا الأبواب". وزعم الحافظ عبد الغني بن سعيد الأزدي في "إيضاح الإشكال" - فيما نقله الحافظ ابن حجر في ترجمة ميمون أبي عبد الله من "التهذيب" - أنَّ أبا بلج روى هذا الحديث عن ميمون أبي عبد الله الكندي البصري فقال: عن عمرو بن ميمون، غلط فيه. وميمون هذا ضعيفٌ أحاديثه مناكير، لكن لم يتابع أحدٌ الحافظ عبد الغني في مقالته هذه.قال شيخ الإسلام ابن تيمية في "منهاج السنة" 5/ 34 - 36 بعد أن ساق الحديث: وفيه ألفاظ هي كذب على رسول الله صلى الله عليه وسلم، كقوله: "أما ترضى أن تكون مني بمنزلة هارون من موسى، غير أنك لست بنبي، لا ينبغي أن أذهب إلَّا وأنت خليفتي" فإنَّ النبي صلى الله عليه وسلم ذهب غير مرة وخليفته على المدينة غير علي، كما اعتمر عمرة الحديبية، وعلى معه وخليفته غيره، وغزا بعد ذلك خيبر ومعه علي وخليفته بالمدينة غيره، وغزا غزوة الفتح وعلي معه وخليفته في المدينة غيره، وغزا حنينًا والطائف وعلي معه وخليفته في المدينة غيره، وحجَّ حجة الوداع وعلي معه وخليفته بالمدينة غيره، وغزا غزوة بدر ومعه علي وخليفته بالمدينة غيره.وكل هذا معلوم بالأسانيد الصحيحة وباتفاق أهل العلم بالحديث، وكان علي معه في غالب الغزوات وإن لم يكن فيها قتال.فإن قيل: استخلافه يدل على أنه لا يستخلف إلَّا الأفضل لزم أن يكون عليٌّ مفضولًا في عامة الغزوات، وفي عمرته وحجته، لا سيما وكل مرة كان يكون الاستخلاف على رجال مؤمنين، وعام تبوك ما كان الاستخلاف إلَّا على النساء والصبيان ومَن عَذَرَ الله، وعلى الثلاثة الذين خلفوا، أو متهم بالنفاق، وكانت المدينة آمنة لا يُخاف على أهلها، ولا يحتاج المستخلف إلى جهاد كما يحتاج في أكثر الاستخلافات.وكذلك قوله: "وسدوا الأبواب كلها إلا باب علي" فإن هذا مما وضعته الشيعة على طريق المقابلة، فإنَّ الذي في "الصحيح" عن أبي سعيد عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال في مرضه الذي مات فيه: "إن أمنَّ الناس عليّ في ماله وصحبته أبو بكر، ولو كنت متخذًا خليلًا غير ربي لاتخذت أبا بكر خليلًا، ولكن أخوّة الإسلام ومودته، لا يبقين في المسجد خوخةٌ إِلَّا سُدَّت إلَّا خوخة أبي بكر"، ورواه ابن عباس أيضًا في "الصحيحين".ومثل قوله: "أنت وليّي في كل مؤمن بعدي" فإنَّ هذا موضوع باتفاق أهل المعرفة بالحديث، والذي فيه من الصحيح ليس هو من خصائص الأئمة، بل ولا من خصائص علي، بل قد شاركه فيه غيره، مثل كونه يحب الله ورسوله ويحبه الله ورسوله، ومثل استخلافه وكونه منه بمنزلة هارون من موسى، ومثل كون علي مولى مَن النبي صلى الله عليه وسلم، مولاه فإن كل مؤمن موالٍ الله ورسوله، ومثل كون (براءة) لا يبلِّغها إلَّا رجل من بني هاشم، فإنَّ هذا يشترك فيه جميع الهاشميين، لما روي أن العادة كانت جارية بأن لا ينقض العهود ويحلّها إلا رجل من قبيلة المطاع.قلنا: ومع ذلك فقد صحَّحَ ابن عبد البر إسنادَ هذا الحديث في "الاستيعاب" ص 523، وأورد منه كون عليٍّ أولَ مَن أسلم بعد خديجة، وجوَّد إسنادَه الحافظُ ابن حجر في أجوبته عن أحاديث "المصابيح" المطبوعة بإثر "مشكاة المصابيح" ص 1790.والحديث بطوله في "مسند أحمد" 5/ (3061).وأخرجه كذلك النسائي (8355) عن محمد بن المثنى، عن يحيى بن حماد، بهذا الإسناد. وأخرج منه الفِقرة الرابعة في كون عليٍّ أول من آمن: أحمد 5/ (3542) عن سليمان بن داود الطيالسي، عن أبي عوانة، به. لكن بلفظ: أول من صلّى مع النبي صلى الله عليه وسلم بعد خديجة عليٌّ. وقال مرّةً: أسلم.وأخرجها أيضًا الترمذي (3734) من طريق شعبة، عن أبي بلج، لكن بلفظ: أول من صلَّى عليٌّ.والفقرة الثالثة منه، وهي قوله صلى الله عليه وسلم لبني عمّه: "أيكم يُواليني في الدنيا والآخرة" إلى آخره، وأنَّ عليًّا استجاب لذلك وحدَه، ستأتي مفردة برقم (4706) من طريق كثير بن يحيى عن أبي عوانة.وتقدمت الفقرة السادسة منه في قصة نوم علي بن أبي طالب مكانَ النبي صلى الله عليه وسلم في فراشه لما أجمع المشركون على قتله، برقم (4309) من طريق كثير بن يحيى صاحب البصري عن أبي عوانة.وأخرج منه الفقرة التاسعة في الأمر بسدِّ الأبواب إلّا باب عليٍّ: النسائي (8374) عن محمد بن المثنى، عن يحيى بن حماد، به.وأخرجها كذلك الترمذي، (3732) والنسائي (8373) من طريقين عن شعبة بن الحجاج، عن أبي بلج، به.ويشهد للفِقرة الأولى في قصة إعطائه صلى الله عليه وسلم الرايةَ يوم خيبر: حديثُ سلمة بن الأكوع عند أحمد 27/ (16538)، والبخاري (2975) و (3702)، ومسلم (1807) و (2407).وحديث سهل بن سعد عند أحمد 37/ (22821)، والبخاري (2942)، ومسلم (2406).وحديث أبي هريرة عند أحمد 14/ (8990)، ومسلم (2405).وحديث علي بن أبي طالب نفسه عند أحمد (2 (778)، وابن ماجه (117)، والنسائي (8345).وحديث عمران بن حصين عند النسائي (8094)وحديث الحسن بن علي سبط النبي صلى الله عليه وسلم عند النسائي (8354).وحديث سعد بن أبي وقاص، وقد سلف برقم (4626).وحديث جابر بن عبد الله، وقد سلف برقم (4390)وحديث بُريدة الأسلمي، وسيأتي برقم (5956).وأما الفقرة الثانية في قصة إرساله صلى الله عليه وسلم عليًا بسورة التوبة، فقد سلفت برقم (4423) من طريق مقسم عن ابن عبّاس.ويشهد لها حديثُ علي بن أبي طالب نفسه كما تقدم برقم (4424).وحديثُ أبي هريرة الذي تقدم برقم (3314).وحديث جابر بن عبد الله عند ابن حبان (6645)، وغيره. ورجاله ثقات. وحديث أنس عند أحمد 20 / (13214)، والترمذي (3090) وحسّنه.ولقوله صلى الله عليه وسلم: "لا يذهب بها إلّا رجلٌ مني وأنا منه" شاهدٌ من حديث حُبْشي بن جُنادة عند أحمد 29/ (17505) و (17506) وغيره، ولفظه: "عليٌّ مني وأنا منه، ولا يؤدِّي عني إلّا أنا أو عليّ"، وفي سنده مقال كما هو مبيّن في "مسند أحمد".قال الواحديُّ في "تفسيره الوسيط" 2/ 478: ذكر الزَّجّاجُ السببَ في تولية عليٍّ تلاوةَ براءة، قال: إِنَّ العرب جرت عادتُها في عقد عهودها ونقضها أن يتولى ذلك عن القبيلة رجلٌ منها، وكان جائزًا أن يقول العرب إذا تلا عليها نقضَ العهد من الرسول مَن هو من غير رَهْطه: هذا خلاف ما نعرف فينا في نقض العهود، فأزاحَ النبي صلى الله عليه وسلم العلة في ذلك.ثم نَقَل عن الجاحظ الأديب قولَه: هذا ليس بتفضيل منه لعليٍّ على غيره، ولكن عامل العربَ على مثل ما كان بعضهم يتعارفه من بعضٍ كعادتهم في عقد الحِلْف وحلّ العَقْد كان لا يتولى ذاك إلّا السيد منهم أو رجل من رهطه، كأخٍ أو عمٍّ، فلذلك قال النبي صلى الله عليه وسلم هذا القول.قلنا: ويؤيده التعبيرُ بما يدل على خصوص سورة التوبة في هذا الحديث، حيث قال فيه: "لا يذهب بها" وكذلك جاء في حديث أنس الذي تقدم ذكره في الشواهد، حيث جاء فيه: "لا ينبغي لأحدٍ أن يبلغ هذا إلّا رجل من أهلي". قال الحافظ ابن حجر في "الفتح" 13/ 328: يُعرف منه أنَّ المراد خصوص القصة المذكورة لا مطلق التبليغ.ويشهد للفقرة الرابعة منه في قصة كون عليّ بن أبي طالب أولَ من أسلم، حديث زيد بن أرقم الآتي برقم (4714)، وإسناده حسن إن شاء الله، وبعض رواياته بلفظ: أول من صلَّى.وروي بلفظ: أول من صلّى من حديث علي بن أبي طالب نفسه عند أحمد 2/ (1191)، والنسائي (8332) وغيرهما. وفي إسناده ضعفٌ.ومن حديث سعد بن أبي وقاص كما سيأتي عند المصنف برقم (6241) بلفظ: ألم يكن أولَ من أسلم، ألم يكن أولَ من صلّى مع رسول الله صلى الله عليه وسلم. فجمعهما. وإسناده ليّن.وانظر حديث ابن عبّاس المتقدم برقم (4633).وسلف عن عمرو بن عَبَسَة (4467) و (4468) أنه سأل النبي صلى الله عليه وسلم عمَّن تَبِعه، فقال له النبي صلى الله عليه وسلم: "حرٌّ وعبدٌ: أبو بكر وبلال"، وإسناده صحيح.وروي عن أبي بكر - بسند رجاله ثقات إلا أنه اختلف في وصله وإرساله - أنه قال: ألست أحقَّ الناس بها؟ ألست أولَ من أسلم؟ أخرجه الترمذي (3667)، وابن حبان (6863).ولذلك اختلف أهل العلم في هذا - كما قال الترمذي في "جامعه" (3734) - فقال بعضهم: أول من أسلم أبو بكر الصديق، وقال بعضهم: أول من أسلم عليّ، وقال بعض أهل العلم: أول من أسلم من الرجال أبو بكر، وأسلم عليٌّ وهو غلام ابن ثمان سنين، وأول من أسلم من النساء خديجة.وقال ابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 524: والصحيح في أمر أبي بكر أنه أول من أظهر إسلامه، كذلك قال مجاهد وغيره، وقالوا: ومَنَعَه قومه، وقال ابن شهاب وعبد الله بن محمد بن عقيل وقتادة وأبو إسحاق: أول من أسلم من الرجال عليّ. ثم أسند ابن عبد البر عن محمد بن كعب القُرَظي مثلَ ذلك.ويشهد للفِقرة الخامسة في قصة أخذ رسول الله صلى الله عليه وسلم ثوبه ووضعه له عليّ علي وفاطمة وحسن وحسين … إلخ، حديثُ وائلة بن الأسقع عند أحمد 28 / (16988)، وابن حبان (6976)، وتقدم برقم (3601).وحديثُ عائشة عند مسلم (2424)، وسيأتي برقم (4758).وحديث أم سلمة عند أحمد 44/ (26508)، وتقدم برقم (3600).وحديث سعد بن أبي وقاص عند أحمد 3 / (1608)، ومسلم (2404)، وغيرهما، وتقدم برقم (4626). غير أن في بعض طرقه: أن هذا الصنيع منه صلى الله عليه وسلم كان بعد نزول آية المباهلة.ويشهد للفقرة السابعة في قصة تخلُّف عليٍّ عن غزوة تبوك، وما قاله له النبيُّ صلى الله عليه وسلم، دون قوله: "إنه لا ينبغي أن أذهبَ إِلَّا وأنت خَليفتي" حديثُ سعد بن أبي وقاص عند البخاري (4416)، ومسلم (2404)، وقد تقدّم برقم (4626).ولقوله في هذه القصة: "أما ترضى أن تكون مني بمنزلة هارون من موسى إلا أنه لا نبي بعدي" فقط شاهدٌ من حديث أسماء بنت عُمَيس عند أحمد 45 / (27081)، والنسائي (8087)، وإسناده صحيح.ومن حديث جابر بن عبد الله عن أحمد 23/ (14638)، والترمذي (3730)، وحسّنه الترمذي.قال أبو نُعيم في "الإمامة والردِّ على الرافضة" ص 221: إنما خرج هذا القولُ من النبي صلى الله عليه وسلم عام تبوك إذ خلَّفه بالمدينة، فذكر المنافقون أنه مَلَّهُ وكره صحبتَه، فلحق بالرسول صلى الله عليه وسلم، فذكر له قولهم، فقال صلى الله عليه وسلم: بل خلّفتك كما خَلّف موسى هارونَ.وقال ابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 526: رواه جماعة من الصحابة، وهو من أثبت الآثار وأصحها.وقوله في الفقرة الثامنة: "أنت وليي في كل مؤمن بعدي"، روي نحوه في حديث عمران بن حصين عند أحمد 33 / (19928)، والترمذي، (3712)، والنسائي (8090)، وغيرهم، وفيه: "وهو ولي كل مؤمن بعدي"، وفي إسناده جعفر بن سليمان الضبعي وهذا مختلف فيه وفيه ضعف وتشيُّع، كما روي نحوه من حديث أجلح بن عبد الله الكِنْدي عن عبد الله بن بريدة عن أبيه، عند أحمد 38 / (23012) والنسائي (8421)، وفيه: "وهو وليُّكم بعدي"، وأجلح أيضًا فيه ضعف وتشيُّع، والمحفوظ فيه حديث سعد بن عبيدة عن عبد الله بن بريدة المتقدم برقم (2621) بلفظ: "من كنتُ وليَّه فإنَّ عليًّا وليُّه"، وحديث ابن عباس عن بريدة المتقدم برقم (4629) بلفظ: "من كنت مولاه فعليٌّ مولاه".ويشهد له بلفظ: "من كنت مَولاه فعليٌّ مَولاه" حديث زيد بن أرقم عند أحمد 32 / (19302) والنسائي (8092) و (8410) و (8424)، وابن حبان (6931)، وتقدَّم برقم (4627). وإسناده صحيح.وانظر حديث سعد بن أبي وقاص المتقدم برقم (4651).وحديث سعيد بن وهب عن جماعة من الصحابة عند أحمد 38 / (23107)، والنسائي (8417)، وإسناده صحيح.وأما لفظ: "وليّ كل مؤمن بعدي" فقال شيخ الإسلام ابن تيمية في "منهاج السنة" 7/ 391 - 392: هذا كذب على رسول الله صلى الله عليه وسلم، بل هو في حياته وبعد مماته وليُّ كل مؤمن، وكل مؤمن وليُّه في المحيا والممات، فالولاية التي هي ضد العداوة لا تختص بزمان، وأما الولاية التي هي الإمارة، فيقال فيها: والي كلِّ مؤمن بعدي، كما يقال في صلاة الجنازة: إذا اجتمع الولي والوالي قُدّم الوالي في قول الأكثر. فقول القائل: "علي ولي كل مؤمن بعدي" كلام يمتنع نسبته إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فإنه إن أراد الموالاة لم يحتج أن يقول: "بعدي"، وإن أراد الإمارة كان ينبغي أن يقول: والٍ على كل مؤمن.وأما الفِقرة التاسعة في قصة سدّ أبواب المسجد إلّا باب عليٍّ، فقد روي ما يشهد لها من حديث ابن عمر عند أحمد 8/ ((4797)، وإسناده فيه ضعفٌ.وحديث زيد بن أرقم عند أحمد 32 / (19287)، والنسائي (8369)، وتقدم عند المصنف برقم (4681)، وإسناده ضعيف جدًّا.وحديث سعد بن أبي وقاص عند أحمد 3/ (1511)، والنسائي (8372)، وإسناده ضعيف كما تقدم بيانه برقم (4651).وجاء في رواية من حديث ابن عمر عند الطحاوي في "شرح المشكل" (3558)، والطبراني في "الكبير" (13760)، وغيرهما، قال: سدّ أبوابنا في المسجد وأقرَّ بابه. وهو لفظ رواية زيد بن أبي أُنيسة عن أبي إسحاق، وانفرد بزيادتها زيد بن أبي أُنيسة، وهي رواية شاذّة، ورواية الباقين أبي إسحاق عن النسائي (8435 - 8437) وغيره بدونها أصحُّ.وهذا معارَض بأحاديث صحيحة في الأمر بسدِّ الأبواب إلا باب أبي بكر، كما في حديث ابن عبّاس عند البخاري (467)، وحديث أبي سعيد الخُدْري عند البخاري (466) ومسلم (2382)، وحديث عائشة عند الترمذي (3678) وابن حبان (6857).وقد ذهب إلى الجمع بين القصتين الطحاوي في "شرح المشكل" بإثر الحديث (3561)، والكلاباذي في "معاني الأخبار" ص 106، وابن الجزري في "مناقب الأسد الغالب علي بن أبي طالب" بإثر الخبر (20)، وابن حجر في "القول المسدَّد" ص 22. فانظر كلامهم في ذلك.وأما دخول عليٍّ المسجدَ وهو جنب، فقد روي فيه حديث أبي سعيد الخُدْري عند الترمذي (3727)، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لعليّ: "يا عليُّ، لا يحل لأحدٍ يُجنب في هذا المسجد غيري وغيرك"، وإسناده ضعيف.وفي مرسل المطّلب بن عبد الله بن حَنْطَب عند القاضي إسماعيل في "أحكام القرآن" (138): أن النبي صلى الله عليه وسلم لم يكن أَذن لأحدٍ أن يمُرَّ في المسجد ولا يجلس فيه وهو جنب إلّا علي بن أبي طالب، فإنه كان يدخله جنبًا ويمُرُّ فيه، لأنَّ بيته كان في المسجد. قال ابن حجر في "القول المسدَّد" ص 21: هذا مرسل قويّ. قلنا: بل فيه كثير بن زيد الأسلمي وهو ليّن الحديث.وأما الفقرة الحادية عشرة ففيها الإشارة إلي قول الله عز وجل في سورة الفتح الآية (18): {لَقَدْ رَضِيَ اللهُ عَنِ الْمُؤْمِنِينَ إِذْ يُبَايِعُونَكَ تَحْتَ الشَّجَرَةِ فَعَلِمَ مَا فِي قُلُوبِهِمْ فَأَنزَلَ السَّكِينَةَ عَلَيْهِمْ وَأَثابَهُمْ فَتْحًا قَرِيبًا … }.وأخرج أحمد 45 / (27362)، ومسلم (2496) وغيرهما من حديث جابر قال: حدثتني أم مبشّر أنها سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم عند حفصة يقول: "لا يدخل النارَ - إن شاء الله - من أصحاب الشجرة أحدٌ؛ الذين بايعوا تحتها" فقالت: بلى يا رسول الله فانتهرها، فقالت حفصة: {وَإِن مِنكُمْ إِلَّا وَارِدُهَا} [مريم: 71]، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "قد قال الله عز وجل: {ثُمَّ نُنَجَّي الَّذِينَ اتَّقَوا وَنَذَرُ الظَّالِمِينَ فِيهَا جِثِيًّا} [مريم: 72] ".ويشهد لآخره في فضيلة أهل بدر، حديثُ علي بن أبي طالب عند البخاري (3007) ومسلم (2494).وحديثُ عمر بن الخطاب الآتي عند المصنِّف برقم (7142)، وهو من رواية ابن عبّاس عنه.وحديثُ أبي هريرة الآتي كذلك برقم (7144).وقوله في الخبر: "أُفٍّ وتُفِّ"، الأُفُّ: وَسَخُ الأُذُن، والتُّفُّ: وَسَحُ الظُّفُر، فكان ذلك يُقال عند الشيء يُستقذَر، ثم كثُر حتى صاروا يستعملونه عند كل ما يَتأذَّون به.وقوله: "شَرَى عليّ نفسَه": أي: باعها في سبيل الله.وبئر ميمون: بأعلى مكة، وهي بئر حفرها ميمون أخو العلاء بن الحضرمي والي البحرين عندها قبر أبي جعفر المنصور، فيما يُسمَّى اليوم بحَيّ الجعفرية بين أَذاخِر والحَجُون.ويَتضوَّر، أي: يتقلّب ظَهْرًا لِبَطن.



4703 - Null









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4703)


4703 - وقد حدثنا السيد الأوحد أبو يعلى حمزة بن محمد الزَّيدي، حدثنا أبو الحسن علي بن محمد بن مَهْرُوَيهِ القَزْويني القَطّان، قال: سمعت أبا حاتم الرازي يقول: كان يُعجِبُهم أن يَجِدُوا الفضائلَ من رواية أحمد بن حَنبَل.




আবূ হাতিম আর-রাযী বলেন: আহমাদ ইবনু হাম্বল (রাহিমাহুল্লাহ)-এর বর্ণনার মাধ্যমে ফাদাইল (ফযীলত সংক্রান্ত বিষয়) পাওয়া তাদের কাছে পছন্দনীয় ছিল।









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4704)


4704 - حدثنا الحسن بن يعقوب العدل، حدثنا محمد بن عبد الوهاب، حدثنا جعفر بن عَون، عن مِسعَر، عن أبي عَون، عن أبي صالح، عن علي، قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يومَ بدرٍ لي ولأبي بكر: "عن يمينِ أحدِكُما جبريلُ، والآخَرِ ميكائيلُ، وإسرافيلُ مَلَكٌ عظيمٌ يشهدُ القتالَ ويكونُ في الصفِّ" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বদর যুদ্ধের দিন আমাকে ও আবূ বকরকে বললেন: "তোমাদের দুজনের একজনের ডান দিকে আছেন জিবরাঈল (আঃ), আর অপরজনের ডান দিকে আছেন মিকাঈল (আঃ)। আর ইসরাফীল একজন মহান ফিরিশতা, যিনি যুদ্ধ প্রত্যক্ষ করছেন এবং তিনি সারির মধ্যে আছেন।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح، وأبو صالح: هو الحَنَفي كما تقدم مقيّدًا في الرواية السالفة برقم (4479). - وهي بنت كعب بن عُجْرة - روى عنها ابنا أخَويها سليمان بن محمد وسعد بن إسحاق، وهما ثقتان، وذكرها ابن حبان في "الثقات" وصحَّح حديثها، واحتجَّ بها مالكٌ والشافعيُّ، كما صحَّح حديثَها الترمذيُّ والذهليُّ وابنُ القطان والذهبيُّ وغيرهم.وهو في "مسند أحمد" 18/ (11817).قوله: "لأُخيشن في ذات الله"، أي: فيه خشونة في الله، لا يُراعي فيه أحدًا، وهذا لا يوجب الشكِّاية منه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4705)


4705 - أخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا يعقوب بن إبراهيم بن سعد، حدثنا أبي، عن ابن إسحاق، قال: حدثني عبد الله بن عبد الرحمن بن مَعْمَر أبو طُوَالة الأنصاري، عن سليمان بن محمد بن كعب بن عُجْرة، عن زينب بنت [كعب، وكانت عند] [1] أبي سعيد، عن أبي سعيد الخُدْري، قال: شَكى عليَّ بن أبي طالب الناسُ إلى رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، فقام فينا خَطيبًا، فسمعتُه يقول: "أيها الناسُ، لا تَشكُوا عليًّا، فوالله إنه لأُخَيشِنُ في ذاتِ الله وفي سبيلِ الله" [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يثخرجاه.




আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: লোকেরা আলী ইবনু আবী তালিবের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বিরুদ্ধে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছে অভিযোগ করেছিল। তখন তিনি আমাদের মাঝে দাঁড়িয়ে খুতবা দিলেন এবং আমি তাঁকে বলতে শুনলাম: "হে লোক সকল, তোমরা আলীর বিরুদ্ধে অভিযোগ করো না। আল্লাহর কসম! নিশ্চয়ই সে আল্লাহ্‌র জন্য এবং আল্লাহ্‌র পথে অত্যন্ত দৃঢ়চেতা (বা কঠোর প্রকৃতির)।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] ما بين المعقوفين سقط من النسخ الخطية ولا بُدَّ منه، واستدركناه من "مسند أحمد"، وقد رواه البيهقي أيضًا بنحوه في "دلائل النبوة" 5/ 398 من طريق سعد بن إسحاق بن كعب بن عجرة، عن عمته زينب بنت كعب بن عجرة، عن أبي سعيد الخُدْري ضمن قصة مطولة ممّا في إرسال عليٍّ إلى اليمن مع جمع من الصحابة. - وهي بنت كعب بن عُجْرة - روى عنها ابنا أخَويها سليمان بن محمد وسعد بن إسحاق، وهما ثقتان، وذكرها ابن حبان في "الثقات" وصحَّح حديثها، واحتجَّ بها مالكٌ والشافعيُّ، كما صحَّح حديثَها الترمذيُّ والذهليُّ وابنُ القطان والذهبيُّ وغيرهم.وهو في "مسند أحمد" 18/ (11817).قوله: "لأُخيشن في ذات الله"، أي: فيه خشونة في الله، لا يُراعي فيه أحدًا، وهذا لا يوجب الشكِّاية منه.



[2] إسناده حسن من أجل ابنِ إسحاق: وهو محمد بن إسحاق بن يسار، وزينب بنت كعب - وهي بنت كعب بن عُجْرة - روى عنها ابنا أخَويها سليمان بن محمد وسعد بن إسحاق، وهما ثقتان، وذكرها ابن حبان في "الثقات" وصحَّح حديثها، واحتجَّ بها مالكٌ والشافعيُّ، كما صحَّح حديثَها الترمذيُّ والذهليُّ وابنُ القطان والذهبيُّ وغيرهم.وهو في "مسند أحمد" 18/ (11817).قوله: "لأُخيشن في ذات الله"، أي: فيه خشونة في الله، لا يُراعي فيه أحدًا، وهذا لا يوجب الشكِّاية منه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4706)


4706 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا زياد بن الخليل التُّستري، حدثنا كَثير بن يحيى، حدثنا أبو عَوَانة، عن أبي بَلْجٍ، عن عَمرو بن مَيمون، عن ابن عبّاس، أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "أيُّكم يَتولّاني في الدنيا والآخرة؟ " فقال لكلِّ رجلٍ منهم: "أتَتَولّاني في الدُّنيا والآخرة"؟ فقال: لا، حتى مَرَّ على أكثرهم، فقال عليٌّ: أنا أتَولّاك في الدُّنيا والآخرةِ، فقال: "أنت وَلِيّي في الدُّنيا والآخرة" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "তোমাদের মধ্যে কে দুনিয়া ও আখিরাতে আমার বন্ধু হবে?" তিনি তাদের প্রত্যেকের কাছে গিয়ে জিজ্ঞাসা করলেন: "তুমি কি দুনিয়া ও আখিরাতে আমার বন্ধু হবে?" তারা বললো: "না।" এভাবে তিনি তাদের অধিকাংশের পাশ দিয়ে গেলেন। তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "আমি দুনিয়া ও আখিরাতে আপনার বন্ধু হব।" অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমিই দুনিয়া ও আখিরাতে আমার বন্ধু।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده فيه مقال كما تقدَّم. عند الحديث رقم (4702)، إذ تقدَّم هناك ضمن خبر مطوَّل في مناقب علي رضي الله عنه من طريق يحيى بن حماد عن أبي عوانة. (1616)، وأبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" 4/ 361، وابن بَطَّة العُكبَري في "الإبانة" 8/ 287، وابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 529، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 22/ 404 و 405 من طرق عن شعبة، بهذا الإسناد. وقد تحرَّفت "أقضى" في مطبوع البزار إلى "أفضل".وأخرجه الحسن بن علي الحلواني كما في "الاستيعاب" لابن عبد البر ص 530، ومحمد بن خلف المعروف بوكيع في "أخبار القضاة" 1/ 89، وابن عساكر 42/ 404 من طريق زكريا بن أبي زائدة، عن أبي إسحاق السَّبيعي، عن أبي ميسرة عمرو بن شرحبيل الهَمْداني، عن عبد الله بن مسعود. وأبو ميسرة ثقة، والإسناد إليه صحيح.وأخرج الحسن الحُلْواني كما في "الاستيعاب" ص 530، ومحمد بن 530، ومحمد بن خلف وكيع 1/ 89، وابن عساكر 42/ 405 من طريقين عن أبي إسحاق السَّبيعي، عن سعيد بن وهب، عن ابن مسعود، قال: أعلم أهل المدينة بالفرائض علي بن أبي طالب. وسعيد بن وهب ثقة كذلك، والإسناد إليه صحيح.وأخرج ابن عساكر 42/ 405 من طريق عبد الجبار بن العباس الهَمْداني، عن أبي إسحاق السَّبيعي، عن أبي الأحوص عوف بن مالك الأشجعي، عن ابن مسعود قال: أفْرَضُ أهل المدينة وأقضاها علي بن أبي طالب. وأبو الأحوص ثقة، والإسناد إليه حسنٌ.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4707)


4707 - أخبرني عبد الرحمن بن الحسن القاضي بهَمَذان، حدثنا إبراهيم بن الحسين، حدثنا آدم بن أبي إياس، حدثنا شُعْبة، عن أبي إسحاق، عن عبد الرحمن بن يزيد، عن عَلقَمة، عن عبد الله، قال: كنا نَتحدَّث أنَّ أقضى أهلِ المدينة عليُّ بن أبي طالب [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা আলোচনা করতাম যে, মদীনার অধিবাসীদের মধ্যে আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন শ্রেষ্ঠ বিচারক।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] خبر صحيح، وعبد الرحمن بن الحسن القاضي - وإن كان ضعيفًا - متابع. أبو إسحاق: هو عمرو بن عبد الله السَّبيعي، وعبد الرحمن بن يزيد: هو ابن قيس النخعي، وشيخه علقمة هو عمُّه، وعبد الله: هو ابن مسعود. وقد سمع أبو إسحاق السَّبيعي هذا الخبر من جماعة من أصحاب ابن مسعود عنه.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات الكبرى" 2/ 292، وأحمد بن منيع في "مسنده" كما في "المطالب العالية" لابن حجر (3924/ 1)، والبلاذري في "أنساب الأشراف" 2/ 350، والبزار في "مسنده" (1616)، وأبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" 4/ 361، وابن بَطَّة العُكبَري في "الإبانة" 8/ 287، وابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 529، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 22/ 404 و 405 من طرق عن شعبة، بهذا الإسناد. وقد تحرَّفت "أقضى" في مطبوع البزار إلى "أفضل".وأخرجه الحسن بن علي الحلواني كما في "الاستيعاب" لابن عبد البر ص 530، ومحمد بن خلف المعروف بوكيع في "أخبار القضاة" 1/ 89، وابن عساكر 42/ 404 من طريق زكريا بن أبي زائدة، عن أبي إسحاق السَّبيعي، عن أبي ميسرة عمرو بن شرحبيل الهَمْداني، عن عبد الله بن مسعود. وأبو ميسرة ثقة، والإسناد إليه صحيح.وأخرج الحسن الحُلْواني كما في "الاستيعاب" ص 530، ومحمد بن 530، ومحمد بن خلف وكيع 1/ 89، وابن عساكر 42/ 405 من طريقين عن أبي إسحاق السَّبيعي، عن سعيد بن وهب، عن ابن مسعود، قال: أعلم أهل المدينة بالفرائض علي بن أبي طالب. وسعيد بن وهب ثقة كذلك، والإسناد إليه صحيح.وأخرج ابن عساكر 42/ 405 من طريق عبد الجبار بن العباس الهَمْداني، عن أبي إسحاق السَّبيعي، عن أبي الأحوص عوف بن مالك الأشجعي، عن ابن مسعود قال: أفْرَضُ أهل المدينة وأقضاها علي بن أبي طالب. وأبو الأحوص ثقة، والإسناد إليه حسنٌ.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4708)


4708 - أخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حَنْبل، حدثني أبي، حدثنا سعيد بن محمد الوَرّاق، عن علي بن حَزَوَّر قال: سمعت أبا مريم الثَّقَفي يقول: سمعتُ عمار بن ياسر يقول: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقولُ لعليٍّ: "يا عليُّ، طُوبَى لمن أَحبَّك وصَدَق فيكَ، ووَيلٌ لمن أبغضَك وكَذَب فيكَ" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আম্মার ইবনে ইয়াসির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমি রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি: “হে আলী! সে ব্যক্তির জন্য সুসংবাদ (তূবা) যে তোমাকে ভালোবাসে এবং তোমার ব্যাপারে সত্য বলে। আর সে ব্যক্তির জন্য দুর্ভোগ (ওয়াইল) যে তোমাকে ঘৃণা করে এবং তোমার ব্যাপারে মিথ্যা বলে।”




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده واهٍ بمرة، فإنَّ سعيد بن محمد الورّاق وشيخه علي بن حَزوَّر متروكان كما قال الذهبي في "تلخيصه".وهو في "فضائل الصحابة" لأحمد بن حنبل (1162)، ومن طريقه أخرجه الخطيب في "تاريخ بغداد" 10/ 102.وأخرجه أبو يعلى في "مسنده" (1602)، وابن عدي في "الكامل" 5/ 186، والخطيب في "موضح أوهام الجمع والتفريق" 2/ 273، وأبو القاسم الأصبهاني في "الترغيب والترهيب" (2342)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 12/ 280 - 281، وابن الطيوري في "الطيوريات" (820)، وابن الجوزي في "العلل المتناهية" (391) من طريق الحسن بن عرفة، عن سعيد بن محمد الوراق، به.وأخرجه ابن عساكر 42/ 281 - 282 من طريق يحيى بن هاشم الغسّاني، عن علي بن حزوَّر، به. بزيادة ألفاظ، ويحيى بن هاشم هذا متهم بالكذب.وانظر حديث ابن عبّاس المتقدم برقم (4690).وروي من حديث علي بن أبي طالب نفسه عند مسلم (78) وغيره، قال: والذي فلق الحبّة وبَرأ النَّسَمةَ إنه لَعَهْدُ النبي الأميّ صلى الله عليه وسلم إليَّ: أن لا يُحبني إلّا مؤمن، ولا يبغضني إلّا منافق.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4709)


4709 - حدثني علي بن حَمْشاذ، حدثنا العباس بن الفضل الأسفاطي، حدثنا أحمد بن يونس، حدثنا أبو بكر بن عيّاش، عن الأعمش، عن عمرو بن مُرّة، عن أبي البَخْتَري، قال: قال عليٌّ: بعثَني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إلى اليمن، قال: فقلتُ: يا رسول الله، إني رجلٌ شابٌّ، وإنه يَرِدُ عليَّ من القضاء ما لا عِلمَ لي به، قال: فوضع يدَه على صدري وقال: "اللهم ثبِّت لسانَه واهدِ قلبَه"، فما شَكَكتُ في القَضاء - أو في قَضاءٍ - بعدُ [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাকে ইয়েমেনে প্রেরণ করলেন। আমি বললাম, "ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমি একজন যুবক মানুষ, আর আমার উপর এমন বিচার ফয়সালার ভার আসবে যে সম্পর্কে আমার কোনো জ্ঞান নেই।" তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর হাত আমার বুকের উপর রাখলেন এবং বললেন: "হে আল্লাহ! তার জিহ্বাকে স্থির করো এবং তার অন্তরকে হিদায়াত দাও।" এরপর আমি কোনো বিচার ফয়সালাতেই আর সন্দেহ করিনি।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات لكنه منقطع، لأنَّ أبا البَختري - واسمه سعيد بن فيروز - لم يسمع من علي شيئًا، وقد روى عنه هذا الخبر بواسطة رجل مبهم لم يُصرِّح باسمه كما رواه شعبة عن عمرو بن مُرَّة، فتأكد الانقطاع. لكن رُوي هذا الخبر من وجوه أخرى عن عليّ بعضُها صحيح متصل.وأخرجه أحمد 2 / (636)، والنسائي (8363) من طريق يحيى بن سعيد القطان، وابن ماجه (2310)، والنسائي (8365) من طريق أبي معاوية محمد بن خازم الضرير، وابن ماجه (2310) من طريق يعلى بن عبيد الطنافسي، والنسائي (8364) من طريق عيسى بن يونس بن أبي إسحاق السَّبيعي، أربعتهم عن الأعمش، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (1145) من طريق شعبة بن الحجاج، عن الأعمش، عن أبي البختري، قال: أخبرني من سمع عليًا يقول، فذكره.وأخرجه أحمد (666) و (1342)، والنسائي (8367) من طريق حارثة بن مُضرِّب، وأحمد (882)، وأبو داود (3582)، والنسائي (8366) من طريق شريك النخعي، عن سماك بن حرب، عن حَنَش بن المعتمر، والنسائي (8368) من طريق عمرو بن حبشي، ثلاثتهم عن علي بن أبي طالب. وإسناد رواية حارثة بن مُضرِّب صحيح، وإسناد الروايتين الأخريين حسن في المتابعات، وقال الترمذي: حديث حسن.وانظر حديث ابن عباس عن علي عند ابن حبان (5065).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4710)


4710 - أخبرني عبد الله بن محمد بن موسى العَدْل، حدثنا محمد بن أيوب، أخبرنا إبراهيم بن موسى، حدثنا عيسى بن يونس، حدثنا الأجلحُ، عن الشَّعْبي، عن عبد الله بن الخليل، عن زيد بن أرقَم، قال: بينا أنا عند رسول الله صلى الله عليه وسلم إذ جاءه رجلٌ من أهل اليمن، فجعل يُحدِّث النبيَّ صلى الله عليه وسلم، ويُخبرُه، فقال: يا رسول الله، أتى عليًّا ثلاثةُ نَفَرٍ يَختَصِمُون في ولدٍ وَقَعُوا على امرأةٍ في طُهْرٍ واحدٍ، فقال لاثنين: طِيبَا نَفْسًا بهذا الولد، ثم قال: أنتم شُركاءُ مُتشاكِسُون، إني مُقرعٌ بينكم، فمن قَرَعَ له فله الولدُ وعليه ثُلثا الديةِ لصاحِبَيه، فأقرَعَ بينهم، فقَرَعَ أحدُهم، فدَفَع إليه الولدَ، فضحك النبيُّ صلى الله عليه وسلم حتى بَدَتْ نَواجِدُه، أو قال: أضراسُه [1].




যায়দ ইবনে আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ছিলাম, এমন সময় ইয়ামেনের এক ব্যক্তি তাঁর কাছে এসে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কিছু কথা বলতে ও জানাতে লাগল। অতঃপর সে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! তিনজন লোক আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসেছিল। তারা একই 'তুহুর'-এ (পবিত্রতার সময়কালে) এক মহিলার সাথে মিলিত হয়েছিল এবং সেই কারণে একটি সন্তানের ব্যাপারে তারা ঝগড়া করছিল। তখন (আলী) তাদের দুজনকে বললেন: তোমরা এই সন্তানের আশা ত্যাগ করো। অতঃপর তিনি বললেন: তোমরা ঝগড়াকারী অংশীদার। আমি তোমাদের মধ্যে লটারি করব। যার লটারি উঠবে, সন্তানটি তার হবে এবং তার অপর দুই সঙ্গীর জন্য তাকে দিয়াতের (রক্তপণ) দুই-তৃতীয়াংশ দিতে হবে। অতঃপর তিনি তাদের মধ্যে লটারি করলেন এবং তাদের একজনের লটারি উঠল। তখন তিনি সন্তানটিকে তার হাতে তুলে দিলেন। (এ কথা শুনে) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হেসে উঠলেন, এমনকি তাঁর মাড়ির দাঁত দেখা গেল। অথবা (বর্ণনাকারী) বলেছেন: তাঁর পেছনের দাঁত দেখা গেল।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لاضطرابه كما هو مبيّن في "مسند أحمد" 32 / (19329) لكن صحَّحه بعض الأئمة بترجيح بعض طرقه كما مضى بيانه برقم (2865). وانظر ما بعده. الواسطي، ومحمد بن خلف في "أخبار القضاة" 1/ 93 من طريق أبي إسحاق الفزاري، كلاهما عن أبي إسحاق الشيباني، به. غير أنَّ خالدًا الواسطي أبهم ذكر أبي الخليل عبد الله بن الخليل، فقال: عن رجل من حضرموت.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4711)


4711 - حدَّثَناهُ علي بن حَمْشاذَ، حدثنا بِشر بن موسى، حدثنا الحُمَيدي، حدثنا سفيان، حدثنا الأجْلَح، بهذا وزاد فيه فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم: "ما أعلمُ فيها إلَّا ما قال عليٌّ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه. وقد زاد الحديثُ تأكيدًا برواية ابن عُيَينة، وقد تابعَ أبو إسحاق السَّبِيعيُّ [2] الأجلحَ في روايتِه.




আল-আজলাহ থেকে বর্ণিত, তিনি তাতে অতিরিক্ত যোগ করে বলেন, অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি এ সম্পর্কে আর কিছুই জানি না, তবে যা আলী বলেছেন তাই (জানি)।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف إسناد سابقه، سفيان: هو ابن عُيينة. الواسطي، ومحمد بن خلف في "أخبار القضاة" 1/ 93 من طريق أبي إسحاق الفزاري، كلاهما عن أبي إسحاق الشيباني، به. غير أنَّ خالدًا الواسطي أبهم ذكر أبي الخليل عبد الله بن الخليل، فقال: عن رجل من حضرموت.



[2] كذا وقع في نسخ "المستدرك"، ولا نظنّه إلا وهمًا، فإنَّ الذي روى هذا الخبر عن الشَّعْبي إنما هو أبو إسحاق الشيباني - وهو سليمان بن أبي سليمان - وليس السَّبيعي، فقد أخرجه من طريقه النسائي (5655) و (5994)، والطبراني في "الكبير" (4989) من طريق خالد بن عبد الله الواسطي، ومحمد بن خلف في "أخبار القضاة" 1/ 93 من طريق أبي إسحاق الفزاري، كلاهما عن أبي إسحاق الشيباني، به. غير أنَّ خالدًا الواسطي أبهم ذكر أبي الخليل عبد الله بن الخليل، فقال: عن رجل من حضرموت.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4712)


4712 - حدثنا أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيه حدثنا محمد بن أحمد بن النضر الأزدي، قال: حدثني جدِّي معاوية بن عمرو، حدثنا زائدة، حدثنا عبد الله بن محمد بن عَقِيل، عن جابر بن عبد الله، قال: مَشَيتُ مع النبي صلى الله عليه وسلم إلى امرأةٍ، فَذَبَحَت لنا شاةً، فقال رسولٌ الله صلى الله عليه وسلم: "لَيدخُلَنَّ رجلٌ من أهل الجنة"، فدخل أبو بكر، ثم قال: "ليدخُلَنّ رجلٌ من أهل الجنة" فدخل عُمر، ثم قال: "ليدخُلَنّ رجلٌ من أهل الجنة، اللهم إن شئتَ فاجعله عليًّا" قال: فدخل عليُّ بن أبي طالب [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (জাবির) বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে এক মহিলার বাড়িতে গেলাম। সে আমাদের জন্য একটি বকরী যবেহ করল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "অবশ্যই জান্নাতবাসীদের মধ্য থেকে একজন লোক প্রবেশ করবে।" তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) প্রবেশ করলেন। এরপর তিনি বললেন, "অবশ্যই জান্নাতবাসীদের মধ্য থেকে একজন লোক প্রবেশ করবে।" তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) প্রবেশ করলেন। এরপর তিনি বললেন, "অবশ্যই জান্নাতবাসীদের মধ্য থেকে একজন লোক প্রবেশ করবে। হে আল্লাহ, যদি আপনি চান, তবে তাকে আলী বানান।" বর্ণনাকারী বলেন, তখন আলী ইবনে আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) প্রবেশ করলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث حسن كما قال الذهبي في "سير أعلام النبلاء" 10/ 445، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل عبد الله بن عَقيل، وقد روي مثله من وجه آخر عن جابر حسن في المتابعات والشواهد كذلك.وأخرجه أحمد 23 / (15162) عن أبي سعيد مولى بني هاشم، عن زائدة، به.وأخرجه أحمد 22 / (14550) و 23/ (14838) و (15065) من طرق عن عبد الله بن محمد بن عَقيل، به.وله طريق أخرى عند ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 42/ 244 - 245 من طريق أبي صالح عبد الله بن صالح كاتب الليث، عن عبد الله بن لَهيعة، عن محمد بن المنكدر، عن جابر بن عبد الله. وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل عبد الله بن صالح وشيخه ابن لهيعة، فهما ليسا بذاك، لكن تقوى روايتُهما برواية ابن عَقيل، وتتقوى رواية ابن عقيل بروايتهما.ويشهد لبعضه في ذكر أبي بكر وحده ما سلف من حديث ابن مسعود برقم (4492)، وفي إسناده ضعفٌ.وقد صحَّ في بِشارة أبي بكر وعمر وعلي رضي الله عنهم بدخول الجنة غيرُ ما حديث على الاجتماع والافتراق، ومن ذلك حديث سعيد بن زيد عند أحمد 3 / (1664)، والنسائي (8134)، وابن حبان (6996)، وذكر معهم عثمان بن عفان وطلحة بن عُبيد الله والزبير بن العوام وعبد الرحمن بن عوف وسعد بن أبي وقاص.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4713)


4713 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا عُبيد بن حاتم الحافظ، حدثنا محمد بن حاتم المُؤدِّب، حدثنا سَيف بن محمد، حدثنا سفيان الثَّوْري، عن سلمة بن كُهَيل، عن أبي صادِق، عن الأغرّ، عن سلمان، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أَوَّلُكم وارِدًا عليَّ الحوضَ أوَّلُكم إسلامًا، عليُّ بن أبي طالب" [1].




সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের মধ্যে যে সবার আগে আমার হাউজে (কাওসারে) পৌঁছাবে, সে হল তোমাদের মধ্যে প্রথম ইসলাম গ্রহণকারী, অর্থাৎ আলী ইবনু আবী তালিব।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده تالف من أجل سيف بن محمد - وهو الثوري - فهو متروك بل متّهم بالكذب ووضع الحديث، وقد خالفه عبد الرزاق الصنعاني عند ابن أبي عاصم في "الأوائل" (67)، والطبراني في "الكبير" (6174)، وفي "الأوائل" (51) فرواه عن سفيان الثوري، عن سلمة بن كُهيل، عن أبي صادق، عن عُلَيم الكِنْدي، عن سلمان موقوفًا، فذكر عُلَيمًا الكندي بدل الأغر، ووقفه على سلمان، لكن رفعه عن عبد الرزاق أبو الصلت عبدُ السلام بن صالح عند ابن أبي خيثمة في السفر الثالث من "تاريخه" (379)، وابن الأعرابي في "معجمه" (1298)، وابن المغازلي في "مناقب عليٍّ" (22)، ومن وَقَفَه على سلمان من أصحاب عبد الرزاق أوثق وأجلُّ من عبد السلام بن صالح، وقد وافقهم يحيى بن يمان عند ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 42/ 40 فرواه عن سفيان الثوري، بذكر عُليم وبالوقف، وكذلك رواه قيس بن الربيع عند ابن أبي شيبة 76/ 12 و 14/ 121، وشُعيب بن خالد الرازي عند عبد الغني بن سعيد المصري في "إيضاح الإشكال" كما في "اللآلئ المصنوعة" للسيوطي 1/ 300، فروياه عن سلمة بن كهيل، بذكر عُليم الكندي، وبالوقف.وخالفهم جميعًا يحيى بن هاشم بن كثير الغسّاني عند الحارث بن أبي أسامة كما في "بغية الباحث" للهيثمي (980) وابن عبد البر في "الاستيعاب"، ص 523، وفي التمهيد 2/ 305، فرواه عن سفيان الثوري، عن سلمة بن كهيل، عن أبي صادق، عن حنش بن المعتمر، عن عُليم الكندي، عن سلمان، ورفعه. ولكن يحيى بن هاشم هذا متهم بالكذب. لكنه لم ينفرد به كذلك بل رواه أيضًا الفضل بن الفضل أبو عبيدة البصري عند أبي الفتح الأزدي في "من وافق اسمه اسم أبيه" (70)، ولكن الفضل بن الفضل هذا ليِّن الحديث.فالأشبه إذًا من ذلك كله رواية من رواه عن سلمة بن كهيل، عن أبي صادق، عن عُليم الكندي، عن سلمان موقوفًا، وعُلَيم هذا فيه جهالة، وانفرد به فلا يصحُّ، ولا محلّ حينئذٍ لقول ابن عبد البر في "الاستيعاب" وقول السيوطي في "الآلئ" بأنه على وقفه له حكم الرفع، لانه لا يُدرك بالرأي، فهذا محلُّه عند صحة الإسناد، وليس هو هنا كذلك، والله تعالى أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4714)


4714 - أخبرنا أحمد بن جعفر القَطيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا محمد بن جعفر، حدثنا شُعْبة، عن عمرو بن مُرّة، عن أبي حَمْزة، عن زيد بن أرقمَ، قال: أولُ من أسلمَ مع رسولِ الله صلى الله عليه وسلم عليُّ بن أبي طالب [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وإنما الخلافُ في هذا الحرف أن أبا بكر الصِّدِّيق رضي الله عنه كان أولَ الرجالِ البالغين إسلامًا، وعليُّ بن أبي طالب تقدَّم إسلامُه قبلَ البُلوغ [2].




যায়দ ইবনে আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সর্বপ্রথম যিনি ইসলাম গ্রহণ করেছিলেন, তিনি হলেন আলী ইবনে আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)।

(হাকিম নিশাপুরী বলেন:) এটি সহীহ ইসনাদযুক্ত হাদীস, কিন্তু শায়খাইন (বুখারী ও মুসলিম) এটি উদ্ধৃত করেননি। এই বক্তব্যের মধ্যে পার্থক্যটি এই যে, প্রাপ্তবয়স্ক পুরুষদের মধ্যে সর্বপ্রথম ইসলাম গ্রহণকারী ছিলেন আবূ বাকর আস-সিদ্দিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), আর আলী ইবনে আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ইসলাম গ্রহণ হয়েছিল প্রাপ্তবয়স্ক হওয়ার পূর্বে।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن من أجل أبي حمزة: وهو طلحة بن يزيد الأنصاري، وقد سلف الكلام عليه عند الحديث رقم (259).وهو في "مسند أحمد" 32/ (19306).وأخرجه الترمذي (3735)، والنسائي (8334) من طريقين عن محمد بن جعفر، بهذا الإسناد.وقال الترمذي: حديث حسن صحيح.وأخرجه أحمد (19281) عن وكيع بن الجراح، والنسائي (8335) من طريق عبد الله بن إدريس، كلاهما عن شعبة بن الحجاج، به.وأخرجه أحمد (19284) عن يزيد بن هارون، و (19303)، والنسائي (8081) و (8336) من طريق خالد بن الحارث، و (8333) من طريق عبد الرحمن بن مهدي، ثلاثتهم عن شعبة، به. بلفظ: أول من صلَّى مع رسول الله صلى الله عليه وسلم. غير أنَّ النسائي قال في رواية خالد بن الحارث: وقال في موضع آخر: أول من أسلم.وكذلك وقع مثل هذا الاختلاف في غير حديث زيد بن أرقم كما تقدم بيانه برقم (4633).



[2] قال ابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 524: الصحيح في أمر أبي بكر أنه أولُ من أظهر إسلامه، ونقل عن محمد بن كعب القُرظي قوله: عليٌّ أولهما إسلامًا، وإنما شبّه على الناس لأنَّ عليًا أخفى إسلامه من أبي طالب، وأسلم أبو بكر فأَظهر إسلامه، ولا شكَّ أنَّ عليًا عندنا أولهما إسلامًا!









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4715)


4715 - أخبرني أبو بكر إسماعيل بن محمد بن إسماعيل الفقيه بالرَّيّ، حدثنا أبو حاتم محمد بن إدريس، حدثنا كثير بن يحيى، حدثنا أبو عَوَانة، حدثنا داود بن أبي عوف، عن عبد الرحمن بن أبي زياد، أنه سمع عبد الله بن الحارث بن نَوفَل يقول: حدثنا أبو سعيد الخُدْري: أنَّ النبيّ صلى الله عليه وسلم دخل على فاطمةَ، فقال: "إني وإياكِ وهذا النائمَ - يعني عليًّا - وهُما يعني الحَسن والحسين - لفي مكانٍ واحدٍ يومَ القيامة" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করলেন, অতঃপর তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই আমি, তুমি, এবং এই ঘুমন্ত ব্যক্তি—অর্থাৎ আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)—এবং তারা দুজন—অর্থাৎ হাসান ও হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)—আমরা কিয়ামতের দিন একই স্থানে থাকব।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسنٌ إن شاء الله من أجل كثير بن يحيى - وهو المعروف بصاحب البصري - ومن أجل عبد الرحمن بن أبي زياد - ويقال فيه أيضًا: بن زياد -: وهو مولى بني هاشم.وهو عند المصنف في "فضائل فاطمة الزهراء" (202)، ومن طريقه أخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 13/ 224 عن محمد بن صالح بن هانئٍ، عن الفضل بن محمد الشَّعراني، عن كثير بن يحيى، بهذا الإسناد. وقرن بأبي عوانة سعيدَ بنَ عبد الكريم بن سليط.وأخرجه الطبراني في (الكبير) 22 / (1016) عن محمد بن حيان المازني، عن كثير بن يحيى، به. وقرن أيضًا في روايته بأبي عوانة سعيد بن عبد الكريم.وأخرجه ابن عساكر 14/ 164 من طريق علي بن عابس، عن أبي الجَحَّاف داود بن أبي عوف، به. وعلي بن عابس هذا ضعفه الأئمةُ، لكن قال ابن عدي: مع ضعفهِ يُكتَبُ حديثُه، وقال الدارقطني: يُعتبر به.وفي الباب عن علي بن أبي طالب بلفظه عند أحمد 2 / (792) وغيره، وإسناده ضعيف. أحمد بن جعفر القَطِيعي أيضًا عن عبد الله أحمد بن بن حنبل عن أبيه، يعني بمثل إسناد المصنف هنا تمامًا، وكذلك جاء في رواية صالح بن أحمد بن حنبل عن أبيه، بإسناده المذكور هذا، كما في "مسائله" لأبيه (870)، وعن صالح بن أحمد رواه أيضًا الخرائطي في "مكارم الأخلاق" (547). فظهر بذلك خطأ ما جاء عند المصنف هنا، وقد يكون الوهم فيه من جهة الحاكم نفسه رحمه الله لما أملاهُ من حفظه، والله أعلم.وقد تبيَّن من رواية أخرى عن مالك بن دينار عند ابن سعد 3/ 23 أحسن من رواية أحمد بن حنبل وأقوى رجالًا: أنَّ الذي أخبر مالك بن دينار بذلك هو معبدٌ الجُهني، حيث جاء فيها ما نصُّه: فقال لي معبدٌ الجهني: أنا أُخبِرك، كان يحملها في المسير ابن ميسرة العَبْسي، فإذا كان القتالُ أخذها علي بن أبي طالب. ومعبدٌ الجُهني تابعيّ وهو أول من تكلَّم في القدر زمن الصحابة، وهو قويٌّ في الرواية، فخبره هذا مرسَلٌ لا بأس به.ولكن لا بدّ من تقييد ذلك بأنَّ عليًّا إنما كان حامل راية المهاجرين دون غيرهم كما تقدم بيانه مفصلًا برقم (4633) و (4634).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4716)


4716 - أخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا سيّار بن حاتم، حدثنا جعفر بن سليمان، حدثنا مالك بن دينار، قال: سألتُ سعيد بن جُبَير، فقلتُ: يا أبا عبد الله، مَن كان حاملَ رايةِ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم؟ قال: فنظر إليَّ وقال: كأنك رَخِيُّ البالِ، فغضبتُ وشكَوتُه إلى إخوانِه من القُرّاء، فقلت: ألا تَعجَبون من سعيد، إني سألتُه مَن كان حاملَ رايةِ رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ فنظر إليَّ وقال: إنك لَرخِيُّ البالِ، قالوا: إنك سألتَه وهو خائفٌ من الحَجّاج، وقد لاذَ بالبيت، فسَلْه الآن، فسألته، فقال: كان حاملها عليّ، هكذا سمعته من عبد الله بن عبّاس [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.ولهذا الحديثِ شاهدٌ من حديث زَنْفَل العَرَفي، وفيه طُولٌ فلم أُخرّجه [2].




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মালেক ইবনে দীনার (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমি সাঈদ ইবনে জুবাইরকে জিজ্ঞেস করলাম, "হে আবু আব্দুল্লাহ, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পতাকাবাহক কে ছিলেন?" তখন তিনি আমার দিকে তাকিয়ে বললেন, "মনে হচ্ছে তুমি যেন নিশ্চিন্ত ও নির্ভার।" এতে আমি ক্রুদ্ধ হয়ে গেলাম এবং ক্বারী ভাইদের কাছে তাঁর অভিযোগ করলাম। আমি বললাম: "আপনারা কি সাঈদের ঘটনায় আশ্চর্য হচ্ছেন না? আমি তাকে জিজ্ঞেস করলাম রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পতাকাবাহক কে ছিলেন, আর তিনি আমার দিকে তাকিয়ে বললেন: তোমার মনটা খুব নিশ্চিন্ত!" তারা বললেন, "তুমি তাঁকে এমন সময় জিজ্ঞেস করেছো যখন তিনি হাজ্জাজ-এর ভয়ে ভীত ছিলেন এবং বাইতুল্লাহতে আশ্রয় নিয়েছিলেন। এখন তাঁকে জিজ্ঞেস করো।" অতঃপর আমি তাঁকে পুনরায় জিজ্ঞেস করলাম। তখন তিনি বললেন: "পতাকাবাহক ছিলেন আলী। আমি আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এভাবেই শুনেছি।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجال هذا الإسناد لا بأس بهم، لكن وقع فيه هنا عند المصنف خطأ، إذ جعل الخبر من رواية سعيد بن جبير عن ابن عباس متصلًا، وإنما هو من رواية مالك بن دينار عن إخوان سعيد الذين لم يسمِّ، كذلك جاء في "فضائل الصحابة" لأحمد بن حنبل (1163)، وهو من رواية أحمد بن جعفر القَطِيعي أيضًا عن عبد الله أحمد بن بن حنبل عن أبيه، يعني بمثل إسناد المصنف هنا تمامًا، وكذلك جاء في رواية صالح بن أحمد بن حنبل عن أبيه، بإسناده المذكور هذا، كما في "مسائله" لأبيه (870)، وعن صالح بن أحمد رواه أيضًا الخرائطي في "مكارم الأخلاق" (547). فظهر بذلك خطأ ما جاء عند المصنف هنا، وقد يكون الوهم فيه من جهة الحاكم نفسه رحمه الله لما أملاهُ من حفظه، والله أعلم.وقد تبيَّن من رواية أخرى عن مالك بن دينار عند ابن سعد 3/ 23 أحسن من رواية أحمد بن حنبل وأقوى رجالًا: أنَّ الذي أخبر مالك بن دينار بذلك هو معبدٌ الجُهني، حيث جاء فيها ما نصُّه: فقال لي معبدٌ الجهني: أنا أُخبِرك، كان يحملها في المسير ابن ميسرة العَبْسي، فإذا كان القتالُ أخذها علي بن أبي طالب. ومعبدٌ الجُهني تابعيّ وهو أول من تكلَّم في القدر زمن الصحابة، وهو قويٌّ في الرواية، فخبره هذا مرسَلٌ لا بأس به.ولكن لا بدّ من تقييد ذلك بأنَّ عليًّا إنما كان حامل راية المهاجرين دون غيرهم كما تقدم بيانه مفصلًا برقم (4633) و (4634).



[2] لم نقف عليه فيما بأيدينا من مصادر الرواية، على أنَّ زَنْفَلًا هذا من تبع الأتباع، وهو ضعيف الحديث. وابن عساكر 60/ 176 وغيرهم من طريقين عن عمران بن وهب الطائي، عن أنس. لكنه قال في هذه الرواية: إلى أربعة، فزاد معهم المقداد، وذكر بحشل بدلًا منه بلالًا. وعمران الطائي هذا ذكره ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 6/ 306 ونقل عن أبيه أنه قال فيه: ضعيف الحديث .... وحدَّث عن أنس أحاديث معضَلة تشبه أحاديث أبان بن أبي عياش، ولا أحسبه سمع من أنس شيئًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4717)


4717 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا محمد بن عيسى بن السَّكَن الواسِطي، حدثنا شِهاب بن عَبّاد، حدثنا محمد بن بِشْر، حدثنا الحسن بن حَيٍّ، عن أبي رَبيعة الإيادي عن الحسن، عن أنس، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "اشتاقَتِ الجنةُ إلى ثلاثةٍ: عليٍّ وعمارٍ وسلمانَ" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, "জান্নাত তিনজনের জন্য লালায়িত: আলী, আম্মার এবং সালমান।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف من أجل أبي ربيعة الإيادي - وهو عمر بن ربيعة - فإنه إنما يقبل حديثه في الاعتبار، وقد روي حديثه هذا من طريق آخر عن أنس لكن لا يصح كما سيأتي.وأخرجه الترمذي (3797) من طريق وكيع بن الجراح عن الحسن بن صالح بن حيٍّ، بهذا الإسناد. وقال: حديث حسن غريب.وله طريق أخرى عن أنس عند بحشل في "تاريخ واسط" ص 69، والطبراني في "الكبير" (6045)، وأبي نعيم في "الحلية" 1/ 142 و 190، وفي "صفة الجنة" (84)، وفي "معرفة الصحابة" (3346)، وابن عساكر 60/ 176 وغيرهم من طريقين عن عمران بن وهب الطائي، عن أنس. لكنه قال في هذه الرواية: إلى أربعة، فزاد معهم المقداد، وذكر بحشل بدلًا منه بلالًا. وعمران الطائي هذا ذكره ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 6/ 306 ونقل عن أبيه أنه قال فيه: ضعيف الحديث .... وحدَّث عن أنس أحاديث معضَلة تشبه أحاديث أبان بن أبي عياش، ولا أحسبه سمع من أنس شيئًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4718)


4718 - حدثنا أبو محمد أحمد بن عبد الله المُزني بنَيسابور، حدثنا أبو جعفر محمد بن عبد الله الحضرمي، حدثنا عُقبة بن قَبيصة، حدثني أبي، حدثنا عمار بن سَيف، عن إسماعيل بن أبي خالد، عن ابن أبي أوفَى قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "سألتُ ربّي عز وجل أن لا أُزوِّجَ أحدًا من أمتي ولا أتزوّجَ، إلَّا كان معي في الجنة، فأعطاني" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনু আবী আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি আমার পরাক্রমশালী রবের কাছে প্রার্থনা করেছিলাম যে, আমার উম্মতের কাউকে যেন আমি বিবাহ বন্ধনে আবদ্ধ না করি এবং আমিও যেন বিবাহ না করি, তবে সে যেন জান্নাতে আমার সাথেই থাকে। অতঃপর তিনি আমাকে তা দান করেছেন।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف جدًّا، عمار بن سيف منكر الحديث ليس بشيء. قبيصة: هو ابن عُقبة السُّوائي.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (5762)، ومن طريقه ابن الفاخر في "موجبات الجنة" (401) عن محمد بن عبد الله الحضرمي، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو نُعيم الأصبهاني في "معرفة الصحابة" (4014) عن أبي بكر الطلحي، عن محمد بن عبد الله الحضرمي، به.وأخرجه ابن الأعرابي في "معجمه" (842)، ومن طريقه ابن عساكر 67/ 20 عن أبي بكر أحمد بن إبراهيم بن يوسف، عن عقبة بن قبيصة، به.وخالف قبيصةَ بن عُقبة فيه جماعةٌ، فرووه عن عمار بن سيف بسند آخر:فقد أخرجه الحارث بن أبي أسامة كما في "بغية الباحث" للهيثمي (1008) عن إسحاق بن بشر الكاهلي، والآجُرّي في "الشريعة" (1933)، وابن عساكر 67/ 21 من طريق أبي عبد الله محمد بن إبراهيم الشامي، والطبراني في "الأوسط" (3844) من طريق زيد بن الكُميت، ثلاثتهم عن عمار بن سيف، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عبد الله بن عمرو. وهؤلاء الثلاثة الرواة عن عمار متروكون.وفي الباب عن أبي عبد الله بن مرزوق - أو رزق - عند الحارث بن أبي أسامة كما في "بغية الباحث" للهيثمي (1009)، وإسناده ضعيف جدًّا فيه مجاهيل.وانظر حديث عمر بن الخطاب الآتي برقم (4735)، بلفظ: "كل نَسَبٍ وسَببٍ ينقطع يوم القيامة إلّا ما كان من سَبَبي ونَسَبي".