হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5019)


5019 - أخبرنا أبو الطَّيِّب محمد بن أحمد الزاهد، حَدَّثَنَا سَهْل بن عمّار العَتَكي، حَدَّثَنَا محمد بن عُبيد الطَّنَافِسي، حَدَّثَنَا وائل بن داود، سمعت البَهِيَّ يُحدِّث: أَنَّ عائشةَ كانت تقول: ما بَعَثَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم زيدَ بنَ حارثة في جيشٍ إلَّا أمَّرَه، ولو بقيَ بعدَه لاستَخْلفَه [1]. صحيحُ الإسناد، ولم يُخرجاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলতেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যায়দ ইবনু হারিসাকে কোনো সেনাদলে পাঠাননি, যেখানে তাকে (সেই সেনাদলের) নেতা নিযুক্ত করেননি। আর যদি তিনি (যায়দ) রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পরে জীবিত থাকতেন, তবে তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অবশ্যই তাকে (নিজের) স্থলাভিষিক্ত বানাতেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حسنٌ إن صحَّ سماع البهيِّ من عائشة، وهذا إسناد ضعيف من أجل سهل بن عمار العَتَكي، فهو مختلفٌ في عدالته كما قال الحاكم، لكنه متابع، وفي ثبوت سماع البهيّ - واسمه عبد الله - من عائشة خلاف، وقد وقع تصريحه بسماعه منها في حديث رواه عنها، ولهذا جزم البخاريُّ فيما نقله عنه الترمذي في آخر "العلل الكبير" بأنه سمع من عائشة، وروى مسلم حديثًا (2536) من روايته عنها، وأنكر أحمد سماعه منها، ونقل عن عبد الرحمن بن مهدي أنه كان يُنكره أيضًا، واعترض الدارقطني في "التتبع" على مسلم إخراج حديث البهيّ عن عائشة، فردَّ عليه القاضي عياض في "إكمال المُعلِم" بقوله: قد صحَّحوا روايته عن عائشة وفاطمة بنت قيس. قلنا: وجوَّد ابن كثير في "البداية والنهاية" 6/ 449 إسنادَ هذا الحديث وقال: وهو غريب جدًّا.وأخرجه أحمد 43/ (25898) و (26174)، وكذلك النسائي (8126) عن أحمد بن سليمان الرُّهاوي، كلاهما (أحمد بن حنبل وأحمد بن سُليمان) عن محمد بن عبيد، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد (26410) عن سعد بن محمد الورّاق، عن وائل بن داود، به.وسيأتي عند المصنّف لكن دون ذكر الاستخلاف برقم (5028) من طريق مسروق عن عائشة بإسناد صحيح.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5020)


5020 - حدثني علي بن عيسى، حَدَّثَنَا إبراهيم بن أبي طالب، حَدَّثَنَا ابن أبي عُمر، حَدَّثَنَا سفيان، عن إسماعيل بن أبي خالد، عن قيس بن أبي حازم، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا تَلُومُونا على حُبِّ زَيدٍ"؛ يعني: ابنَ حارثةَ [1].5020 م - قال إسماعيلُ: وسمعتُ الشعبي يقول: ما بَعَثَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم سَريّةً قَطُّ وفيهم زيدُ بنُ حارثة إِلَّا أَمَّرَه عليهم [2].




কায়স ইবনু আবী হাযিম থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা যায়িদকে (অর্থাৎ ইবনু হারিসাকে) ভালোবাসার জন্য আমাদেরকে দোষারোপ করো না।"

ইসমাঈল (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আমি শা'বী (রাহিমাহুল্লাহ)-কে বলতে শুনেছি: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যায়িদ ইবনু হারিসাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে অন্তর্ভুক্ত রেখে এমন কোনো সেনাদল (সারিয়্যাহ) কখনো প্রেরণ করেননি, যার উপর তিনি তাঁকে আমীর নিযুক্ত করেননি।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده مرسلٌ صحيحٌ، وقيس بن أبي حازم تابعيّ كبير مخضرم.



[2] خبر صحيح وهذا إسناد رجاله ثقات، لكن اختُلف فيه على سفيان - وهو ابن عُيينة - في وصله، وإرساله فرواه ابن أبي عُمر - وهو محمد بن يحيى بن أبي عمر العَدَني - هنا عند المصنّف، وأحمدُ بنُ حنبل في "فضائل الصحابة" (1534) كلاهما عن سفيان بن عيينة، عن ابن أبي خالد، عن الشعبي، مرسلًا.وخالفهما الحُميدي فرواه في "مسنده" (269) عن سفيان بن عيينة، عن إسماعيل بن أبي خالد، عن الشعبي، عن عائشة. فوصله بذكر عائشة، لكن رواية الشعبي - وهو عامر بن شَراحيل الهَمْداني - عن عائشة مرسلة، كما نصَّ عليه غير واحدٍ من أهل العلم. وذكر أبو حاتم أنَّ الشعبي إنما سمع أحاديث عائشة من مَسروق بن الأجدع.وقد ظهر مصداق ذلك في هذا الخبر كما سيأتي عند المصنّف برقم (5028) حيث رواه حامد بن يحيى البَلْخي - وهو حافظٌ ثقةٌ - عن سفيان بن عُيينة، عن إسماعيل بن أبي خالد، عن الشعبي، عن مسروق، عن عائشة. فاتصل الإسناد، وحامد بن يحيى وصفه ابن حبان بأنه كان ممَّن أفنى عمره بمجالسة ابن عُيينة، وأنه كان أعلم أهل زمانه بحديثه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5021)


5021 - حَدَّثَنَا محمد بن أحمد بن بُطّة، حَدَّثَنَا الحسن، حَدَّثَنَا الحسين بن الفَرَج، حَدَّثَنَا محمد بن عمر، حدثني عائذُ بن يحيى، عن أبي الحُوَيرِث، عن محمد بن جُبير بن مُطعِم، عن أبيه، قال: قال رسول الله: "خيرُ أمراءِ السَّرايا زيدُ بنُ حارثة، أقسَمُهم بالسَّوِيّة، وأعدَلُهم في الرَّعِيّة" [1].




জুবাইর ইবন মুত'ইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সাফল্য লাভকারী বাহিনীগুলোর মধ্যে শ্রেষ্ঠ সেনাপতি হলেন যায়িদ ইবনু হারিসা। তিনি তাদের মধ্যে বণ্টনের ক্ষেত্রে সবচেয়ে বেশি সমতাকারী এবং প্রজাদের মধ্যে সবচেয়ে বেশি ন্যায়পরায়ণ।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف جدًّا، تفرَّد به محمد بن عمر - وهو الواقدي - وفيه مقال معروف، ولا يعتدُّ بما يتفرَّد به، وشيخه عائذ بن يحيى قد أكثر عنه الواقدي، ولكنه مجهول لا يُدرى من هو، وأبو الحويرث - واسمه عبد الرحمن بن معاوية الزُّرَقي - مختلفٌ فيه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5022)


5022 - حَدَّثَنَا أبو العباس محمد بن يعقوب من أصل كتابه، حَدَّثَنَا الحسن بن علي بن عَفّان، حَدَّثَنَا أبو أسامة، حَدَّثَنَا محمد بن عمرو، عن أبي سلمة ويحيى بن عبد الرحمن بن حاطِب، عن أسامة بن زيد، عن زيد بن حارثة، قال: خَرَجَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وهو مُردِفي إلى نُصُب من الأنصاب، فذبَحْنا له شاةً ووضعْناها في التَّنُّور، حتَّى إذا نَضِجَت استَخْرجناها فجعلْناها في سُفْرتِنا، ثم أقبَلَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يَسيرُ وهو مُردِفي في أيام الحَرِّ من أيام مكة، حتَّى إذا كُنا بأعلى الوادي لقي فيه زيدَ بنَ عمرو بن نُفَيل، فحيّا أحدُهما الآخَرَ بتحيّةِ الجاهلية، فقال له رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "ما لي أَرى قومَك قد شَنِفُوك؟ [1] "قال: أما والله إنَّ ذلك مني لبغير نائرةٍ [2] كانت مني إليهم، ولكني أَراهُم على ضَلالةٍ، قال: فخرجتُ أبتغي هذا الدِّينَ حتَّى قَدِمتُ على أحبارِ يَثرِبَ، فوجدتُهم يعبدون الله ويُشركون به، فقلتُ: ما هذا بالدِّين الذي أبتغي، فخرجتُ حتَّى أقدَمَ على أحبار خيبر، فوجدتهم يعبدون الله ويُشرِكون به، فقلت: ما هذا بالدين الذي أبتغي، فخرجتُ حتَّى أقدَمَ على أحبارِ أَيْلةَ، فوجدتُهم يعبدون الله ويُشركون به، فقلتُ: ما هذا بالدِّين الذي أبتغي، فقال لي حَبْرٌ من أحبارِ الشام: إنك تَسألُ عن دِينٍ ما نعلمُ أحدًا يَعبُد الله بغيره [3] إلَّا شيخًا بالجزيرة، فخرجتُ حتَّى قَدِمتُ إليه، فأخبرتُه الذي خرجتُ له، فقال: إن كل مَن رأيتَه في ضلالةٍ، إنك تسألُ عن دِين هو دِينُ الله، ودِينُ ملائكتِه، وقد خَرَج في أرضِك نبيٌّ أو هو خارجٌ يدعُو إليه، ارجِعْ إليه وصدِّقه واتبِعْه وآمِنْ بما جاء به، فرجعتُ فلم أَخبُرْ [4] شيئًا بعدُ، فأناخَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم البَعيرَ الذي كان تحتَه، ثم قَدّمنا إليه السُّفْرةَ التي كان فيها الشِّواءُ، فقال: ما هذا؟ فقلنا: هذه شاةٌ ذَبَحْناها لنُصُبِ كذا وكذا، فقال: إني لا آكُلُ ما ذُبح لِغيرِ الله.وكان صنمٌ [5] من نُحاس، يقال له: إسافٌ ونائلةُ [6]، يَتمسَّحُ به المشركون إذا طافُوا، فطافَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وطُفْتُ معه، فلما مَررتُ مَسَحتُ به [-4]، فقال رسولُ الله: "لا تَمسَّهُ" قال زيدٌ: فطُفْنا، فقلتُ في نفسي: لأمسَّنَّه حتَّى أنظُرَ ما يقولُ، فَمَسَحَتُه، فقال رسولُ الله: "ألم تُنْه؟ ". قال زيدٌ: فوالذي أكرمَه وأَنزلَ عليه الكتابَ، ما استَلَمتُ صنمًا حتَّى أكرمَه الله بالذي أكرمَه، وأَنزلَ عليه الكتابَ.ومات زيدُ بن عَمرو بن نُفَيل قبل أن يُبعَثَ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يأتي يومَ القيامة أمّةً وحدَهُ" [-4]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه، ومن تأمَّل هذا الحديثَ عَرَف فضلَ زيدٍ وتَقدُّمه في الإسلام قبلَ الدَّعوة.




যায়িদ ইবনু হারিসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমন অবস্থায় বের হলেন যে তিনি আমাকে তাঁর পিছনে বসিয়ে নিয়েছিলেন একটি মূর্তির বেদীর দিকে। আমরা তার জন্য একটি বকরী যবেহ করলাম এবং তা তন্দুরে রাখলাম। যখন তা ভালোভাবে রান্না হলো, আমরা তা বের করে আমাদের দস্তরখানে রাখলাম। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কার গরমের দিনগুলোতে এমন অবস্থায় চলতে লাগলেন যে তিনি আমাকে তাঁর পিছনে বসিয়ে নিয়েছিলেন, যতক্ষণ না আমরা উপত্যকার উচ্চস্থানে পৌঁছলাম। সেখানে তিনি যায়িদ ইবনু আমর ইবনু নুফাইল-এর সাথে দেখা করলেন। তাদের একজন আরেকজনকে জাহিলিয়াতের অভিবাদন দ্বারা সালাম করলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "আমার কী হলো যে আমি দেখছি তোমার কওম তোমাকে ঘৃণা করে?" তিনি (যায়িদ ইবনু আমর) বললেন: "আল্লাহর কসম! আমার পক্ষ থেকে তাদের প্রতি কোনো বিদ্বেষ থাকা সত্ত্বেও তারা এমনটি করে না। কিন্তু আমি দেখি তারা গোমরাহীর উপর আছে।" তিনি (যায়িদ ইবনু আমর) বললেন: "এরপর আমি এই দ্বীন অন্বেষণ করতে বের হলাম, এমনকি আমি ইয়াসরিবের ইহুদি পণ্ডিতদের কাছে পৌঁছলাম। আমি দেখলাম তারা আল্লাহর ইবাদত করে, কিন্তু তাঁর সাথে শিরকও করে। আমি বললাম: আমি যে দ্বীন খুঁজছি, এটা তা নয়। এরপর আমি খায়বারের ইহুদি পণ্ডিতদের কাছে পৌঁছলাম। আমি দেখলাম তারা আল্লাহর ইবাদত করে, কিন্তু তাঁর সাথে শিরকও করে। আমি বললাম: আমি যে দ্বীন খুঁজছি, এটা তা নয়। এরপর আমি আইলার ইহুদি পণ্ডিতদের কাছে পৌঁছলাম। আমি দেখলাম তারা আল্লাহর ইবাদত করে, কিন্তু তাঁর সাথে শিরকও করে। আমি বললাম: আমি যে দ্বীন খুঁজছি, এটা তা নয়।" সিরিয়ার একজন পণ্ডিত আমাকে বললেন: "তুমি এমন এক দ্বীন সম্পর্কে জিজ্ঞেস করছ যে আমরা জানি না একজন বৃদ্ধ ব্যতীত আর কেউ আল্লাহর ইবাদত করে না।" (তিনি আল-জাজিরার একজন শায়খের প্রতি ইঙ্গিত করলেন)। "তখন আমি তার কাছে গেলাম এবং আমি যে উদ্দেশ্যে বের হয়েছি, তা তাকে জানালাম। তিনি বললেন: 'তুমি যাদের দেখেছ, তারা সবাই গোমরাহীর উপর আছে। তুমি এমন এক দ্বীন সম্পর্কে জিজ্ঞেস করছ, যা আল্লাহর দ্বীন এবং তাঁর ফেরেশতাদের দ্বীন। তোমার এলাকায় একজন নবী আবির্ভূত হয়েছেন অথবা হতে চলেছেন, যিনি এর দিকেই দাওয়াত দেবেন। তুমি তার কাছে ফিরে যাও, তাকে বিশ্বাস করো, তাকে অনুসরণ করো এবং তিনি যা নিয়ে এসেছেন তার প্রতি ঈমান আনো।" যায়িদ ইবনু হারিসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি ফিরে আসলাম কিন্তু এরপর কিছুই (নবুওয়াতের বিষয়ে) জানতে পারলাম না। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর নিচে থাকা উটটিকে বসালেন। এরপর আমরা তাঁর সামনে দস্তরখান পেশ করলাম, যাতে ছিল ভুনা গোশত। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: 'এটা কী?' আমরা বললাম: 'এটা একটি বকরী যা আমরা অমুক অমুক মূর্তির জন্য যবেহ করেছি।' তখন তিনি বললেন: "আমি এমন কিছু খাব না যা আল্লাহ ছাড়া অন্যের জন্য যবেহ করা হয়েছে।"

একটি পিতলের মূর্তি ছিল, যাকে ইসাফ ও নায়িলাহ বলা হতো। মুশরিকরা যখন তাওয়াফ করত, তখন তারা এটি স্পর্শ করত। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাওয়াফ করলেন এবং আমিও তাঁর সাথে তাওয়াফ করলাম। যখন আমি এটির পাশ দিয়ে গেলাম, আমি এটি স্পর্শ করলাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এটা স্পর্শ করো না।" যায়িদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমরা তাওয়াফ করলাম। আমি মনে মনে বললাম: আমি অবশ্যই এটা স্পর্শ করব, দেখি তিনি কী বলেন। আমি সেটি স্পর্শ করলাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমাকে কি নিষেধ করা হয়নি?" যায়িদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: সেই সত্তার কসম, যিনি তাঁকে সম্মানিত করেছেন এবং তাঁর উপর কিতাব নাযিল করেছেন, আল্লাহ তাঁকে সম্মানিত করার পর এবং তাঁর উপর কিতাব নাযিল করার পর আমি আর কখনো কোনো মূর্তিকে সালাম করিনি।

যায়িদ ইবনু আমর ইবনু নুফাইল নবুওয়াত শুরুর আগেই ইন্তেকাল করেছিলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তিনি কিয়ামতের দিন এককভাবে এক উম্মত হিসাবে আগমন করবেন।"

এটি মুসলিমের শর্তানুযায়ী সহীহ, কিন্তু তারা (বুখারী ও মুসলিম) এটি বর্ণনা করেননি। যে ব্যক্তি এই হাদীস নিয়ে গভীরভাবে চিন্তা করবে, সে অবশ্যই যায়িদ-এর মর্যাদা এবং দাওয়াত শুরুর পূর্বেই ইসলামের প্রতি তাঁর অগ্রগামিতা উপলব্ধি করতে পারবে।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] أي: أبغَضُوك.



[2] الناثرة: العداوة والشَّحناء.



5022 [3] - المثبت من (ز) و (ب)، و"تلخيص المستدرك" للذهبي، ومن إحدى نسخ "الدلائل" للبيهقي 2/ 125 حيث رواه البيهقي عن المصنّف بإسناده هذا، والتَّقديرُ: لا نعلم أحدًا يعبد الله بدينٍ غيره، وفي (ص) و (ع): تعالى، بدل: بغيره، وهي غير واضحة في (م). وفي المطبوع: به، بدل: بغيره، وكذلك جاء في سائر مصادر تخريج الخبر، والمعنى فيها واضح.



5022 [4] - المثبت من (ز)، وفي (ص) و (ع): أحسن، وكأنها في (م) كذلك، وأظنها تحريفًا عن أخبرُ، أو عن أُحِسّ، فقد كُتب في هامش (ز): أُحِسّ، وكذلك جاء في "تلخيص المستدرك" للذهبي: أُحِسّ، والمعنى قريبٌ من أخبرُ، يقال: أحسَّ الخَبَرَ، وخَبَرَ الخَبَر: إذا علمه. في "سير أعلام النبلاء" 1/ 222. يعني قوله في أول الحديث: إلى نُصُب من الأنصاب، فذبحنا له شاةً، إلى أن قال: فجعلناها في سُفرتنا.وأخرجه النسائي (8132) عن موسى بن حزام، عن أبي أسامة حماد بن أسامة، بهذا الإسناد.ويشهد للقصة الأُولى قصة زيد بن عمرو بن نُفيل دون ذكر الذبح للنُّصُب حديثُ عبد الله بن عُمر بن الخطاب عند البخاري (3826) و (3827) وغيره، غير أنه جاء في قصة السُّفرة: أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قدَّم لزيد بن عمر و سُفرةً فيها لحمٌ فأبى أن يأكل منها، وقال: إني لستُ آكلُ مما تذبحون على أنصابكم، ولا آكل إلّا ما ذُكر اسمُ اللهِ عليه.ويشهد للقصة أيضًا حديثُ سعيد بن زيد بن عمر بن نفيل عند أحمد 3/ (1648) وغيره، غير أنه جاء في قصة السُّفرة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان هو وزيد بن حارثة بمكة، فمرَّ بهما زيد بن عمرو بن نفيل، فدعواه إلى سفرة لهما، فقال: يا ابن أخي، إني لا آكل مما ذُبح على النُّصُب، قال: فما رُئِيَ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بعد ذلك أكل شيئًا مما ذُبح على النُّصب.قال إبراهيم بن إسحاق الحربيّ بعد أن خرَّج حديث زيد بن حارثة في "غريب الحديث" 2/ 791: قوله: ذبحنا شاةً لنُصُب من الأنصاب، لذلك وجهان إما أن يكون زيدٌ فعله من غير أمر رسول الله صلى الله عليه وسلم ولا رضاهُ، إلا أنه كان معه فنسب ذلك إليه، لأنَّ زيدًا لم يكن معه من العصمة والتوفيق ما كان اللهُ أعطاه نبيَّه صلى الله عليه وسلم، ومنعه مما لا يحلُّ من أمر الجاهلية، وكيف يجوز ذلك وهو قد مَنَعَ زيدًا في حديثه هذا أن يمسّ صنمًا، وما مسَّه النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قبل نبوته ولا بعدُ، فهو ينهى زيدًا عن مسِّه ويَرضى أن يَذبح له، هذا محالٌ.والوجه الثاني: أن يكون ذَبح لزاده في خروجه، فاتفق ذلك عند صنمٍ كانوا يذبحون عنده، فكان الذبح منهم للصنم، والذبح منه الله تعالى، إلّا أنَّ الموضع جَمَعَ بين الذَّبْحين، فأما ظاهر ما جاء به الحديث فمَعاذَ الله.قال الذهبي في "السير" 1/ 135 بعد أن نقل كلام الحربي هذا: هذا حسنٌ، فإنما الأعمال بالنية. أما زيد فأخذَ بالظاهر، وكان الباطن الله، وربما سكت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم عن الإفصاح خوف الشرّ، فإنا مع علمنا بكراهيته للأوثان نعلم أيضًا أنه ما كان قبل النبوة مجاهرًا بذمها بين قريش، ولا معلنًا لمَقْتها قبل المبعث.ثم قال الحربي معلقًا على حديثي ابن عمر وسعيد بن زيد: ليس فيهما بيانُ أنه صلى الله عليه وسلم ذَبَحَ أو أَمَرَ بذلك، ولعلَّ زيدًا ظنَّ أنَّ ذلك اللحم مما كانت قريش تذبحه لأنصابها، فامتنع لذلك، ولم يكن الأمر كما ظن، فإن كان ذلك فُعل فبغير أمره ولا رضاه. وعلَّق الذهبي في "السير" 1/ 130 على ما ورد في حديث سعيد بن زيد من قوله: فما رُئي النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم بعد ذلك أكل شيئًا مما ذُبح على النُّصُب، فقال: وقد رواه إبراهيم الحربي قال: حَدَّثَنَا إبراهيم بن محمد، حَدَّثَنَا أبو قَطَن، عن المسعودي، عن نُفيل، عن أبيه، عن جده، قال: مر زيد برسول الله صلى الله عليه وسلم وبابن حارثة وهما يأكلان في سفرةٍ، فدعواه، فقال: إني لا آكلُ مما ذُبح على النُّصُب، قال: وما رئي رسول الله صلى الله عليه وسلم أكلًا مما ذُبح على النُّصُب. قال الذهبي: فهذا اللفظ مليحٌ يفسِّر ما قبله، وما زال المصطفى محفوظًا محروسًا قبل الوحي وبعده، ولو احتمل جواز ذلك فبالضرورة ندري أنه كان يأكل من ذبائح قريش قبل الوحي، وكان ذلك على الإباحة، وإنما تُوصف ذبائحهم بالتحريم بعد نزول الآية، كما أنَّ الخمر كانت على الإباحة إلى أن نزل تحريمها بالمدينة بعد يوم أُحُدٍ. والذي لا ريب فيه أنه كان معصومًا قبل الوحي وبعده وقبل التشريع من الزنى قطعًا، ومن الخيانة والغدر والكذب والسكر والسجود لوثن، والاستقسام بالأزلام، ومن الرذائل والسَّفَه وبَذاءِ اللسان وكشف العورة، فلم يكن يطوف عُريانًا، ولا كان يقف يوم عرفة مع قومه بمزدلفة، بل كان يقف بعرفة. وبكل حالٍ لو بدا منه شيء من ذلك لما كان عليه تبعةٌ، لأنَّهُ كان لا يعرف، ولكن رتبة الكمال تأبى وقوع ذلك منه صلى الله عليه وسلم تسليمًا.قلنا: هذا الحرف الأخير الذي ذكر الذهبي أنه عند إبراهيم الحربي؛ يعني قوله: وما رُئي النَّبِيّ، إلى آخره، سقط من مطبوع "غريب الحديث" الذي بأيدينا، فيُستدرك من "السير".وقوله في آخره: "يأتي يوم القيامة وحده" سيأتي من حديث سعيد بن زيد برقم (5968)، وهو صحيح بمجموع شواهده، وانظرها هناك.



5022 [5] - جاء في نسخنا الخطية: صنمًا، بالنَّصب. والمثبت بالرفع من "تلخيص المستدرك" للذهبي، وهو كذلك في "دلائل النبوة" للبيهقي 2/ 34 حيث روى هذا الخبر الثاني بعينه عن أبي عبد الله الحاكم بإسناده هذا، وهو الجادّة، لأنَّ "كان" هنا تامّة، فلفظة "صنم" فاعلُها. في "سير أعلام النبلاء" 1/ 222. يعني قوله في أول الحديث: إلى نُصُب من الأنصاب، فذبحنا له شاةً، إلى أن قال: فجعلناها في سُفرتنا.وأخرجه النسائي (8132) عن موسى بن حزام، عن أبي أسامة حماد بن أسامة، بهذا الإسناد.ويشهد للقصة الأُولى قصة زيد بن عمرو بن نُفيل دون ذكر الذبح للنُّصُب حديثُ عبد الله بن عُمر بن الخطاب عند البخاري (3826) و (3827) وغيره، غير أنه جاء في قصة السُّفرة: أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قدَّم لزيد بن عمر و سُفرةً فيها لحمٌ فأبى أن يأكل منها، وقال: إني لستُ آكلُ مما تذبحون على أنصابكم، ولا آكل إلّا ما ذُكر اسمُ اللهِ عليه.ويشهد للقصة أيضًا حديثُ سعيد بن زيد بن عمر بن نفيل عند أحمد 3/ (1648) وغيره، غير أنه جاء في قصة السُّفرة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان هو وزيد بن حارثة بمكة، فمرَّ بهما زيد بن عمرو بن نفيل، فدعواه إلى سفرة لهما، فقال: يا ابن أخي، إني لا آكل مما ذُبح على النُّصُب، قال: فما رُئِيَ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بعد ذلك أكل شيئًا مما ذُبح على النُّصب.قال إبراهيم بن إسحاق الحربيّ بعد أن خرَّج حديث زيد بن حارثة في "غريب الحديث" 2/ 791: قوله: ذبحنا شاةً لنُصُب من الأنصاب، لذلك وجهان إما أن يكون زيدٌ فعله من غير أمر رسول الله صلى الله عليه وسلم ولا رضاهُ، إلا أنه كان معه فنسب ذلك إليه، لأنَّ زيدًا لم يكن معه من العصمة والتوفيق ما كان اللهُ أعطاه نبيَّه صلى الله عليه وسلم، ومنعه مما لا يحلُّ من أمر الجاهلية، وكيف يجوز ذلك وهو قد مَنَعَ زيدًا في حديثه هذا أن يمسّ صنمًا، وما مسَّه النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قبل نبوته ولا بعدُ، فهو ينهى زيدًا عن مسِّه ويَرضى أن يَذبح له، هذا محالٌ.والوجه الثاني: أن يكون ذَبح لزاده في خروجه، فاتفق ذلك عند صنمٍ كانوا يذبحون عنده، فكان الذبح منهم للصنم، والذبح منه الله تعالى، إلّا أنَّ الموضع جَمَعَ بين الذَّبْحين، فأما ظاهر ما جاء به الحديث فمَعاذَ الله.قال الذهبي في "السير" 1/ 135 بعد أن نقل كلام الحربي هذا: هذا حسنٌ، فإنما الأعمال بالنية. أما زيد فأخذَ بالظاهر، وكان الباطن الله، وربما سكت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم عن الإفصاح خوف الشرّ، فإنا مع علمنا بكراهيته للأوثان نعلم أيضًا أنه ما كان قبل النبوة مجاهرًا بذمها بين قريش، ولا معلنًا لمَقْتها قبل المبعث.ثم قال الحربي معلقًا على حديثي ابن عمر وسعيد بن زيد: ليس فيهما بيانُ أنه صلى الله عليه وسلم ذَبَحَ أو أَمَرَ بذلك، ولعلَّ زيدًا ظنَّ أنَّ ذلك اللحم مما كانت قريش تذبحه لأنصابها، فامتنع لذلك، ولم يكن الأمر كما ظن، فإن كان ذلك فُعل فبغير أمره ولا رضاه. وعلَّق الذهبي في "السير" 1/ 130 على ما ورد في حديث سعيد بن زيد من قوله: فما رُئي النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم بعد ذلك أكل شيئًا مما ذُبح على النُّصُب، فقال: وقد رواه إبراهيم الحربي قال: حَدَّثَنَا إبراهيم بن محمد، حَدَّثَنَا أبو قَطَن، عن المسعودي، عن نُفيل، عن أبيه، عن جده، قال: مر زيد برسول الله صلى الله عليه وسلم وبابن حارثة وهما يأكلان في سفرةٍ، فدعواه، فقال: إني لا آكلُ مما ذُبح على النُّصُب، قال: وما رئي رسول الله صلى الله عليه وسلم أكلًا مما ذُبح على النُّصُب. قال الذهبي: فهذا اللفظ مليحٌ يفسِّر ما قبله، وما زال المصطفى محفوظًا محروسًا قبل الوحي وبعده، ولو احتمل جواز ذلك فبالضرورة ندري أنه كان يأكل من ذبائح قريش قبل الوحي، وكان ذلك على الإباحة، وإنما تُوصف ذبائحهم بالتحريم بعد نزول الآية، كما أنَّ الخمر كانت على الإباحة إلى أن نزل تحريمها بالمدينة بعد يوم أُحُدٍ. والذي لا ريب فيه أنه كان معصومًا قبل الوحي وبعده وقبل التشريع من الزنى قطعًا، ومن الخيانة والغدر والكذب والسكر والسجود لوثن، والاستقسام بالأزلام، ومن الرذائل والسَّفَه وبَذاءِ اللسان وكشف العورة، فلم يكن يطوف عُريانًا، ولا كان يقف يوم عرفة مع قومه بمزدلفة، بل كان يقف بعرفة. وبكل حالٍ لو بدا منه شيء من ذلك لما كان عليه تبعةٌ، لأنَّهُ كان لا يعرف، ولكن رتبة الكمال تأبى وقوع ذلك منه صلى الله عليه وسلم تسليمًا.قلنا: هذا الحرف الأخير الذي ذكر الذهبي أنه عند إبراهيم الحربي؛ يعني قوله: وما رُئي النَّبِيّ، إلى آخره، سقط من مطبوع "غريب الحديث" الذي بأيدينا، فيُستدرك من "السير".وقوله في آخره: "يأتي يوم القيامة وحده" سيأتي من حديث سعيد بن زيد برقم (5968)، وهو صحيح بمجموع شواهده، وانظرها هناك.



5022 [6] - هكذا في النسخ الخطية، وفي "الدلائل": إساف أو نائلة، وهو أوجه، فالضمائر التالية كلها بالإفراد. في "سير أعلام النبلاء" 1/ 222. يعني قوله في أول الحديث: إلى نُصُب من الأنصاب، فذبحنا له شاةً، إلى أن قال: فجعلناها في سُفرتنا.وأخرجه النسائي (8132) عن موسى بن حزام، عن أبي أسامة حماد بن أسامة، بهذا الإسناد.ويشهد للقصة الأُولى قصة زيد بن عمرو بن نُفيل دون ذكر الذبح للنُّصُب حديثُ عبد الله بن عُمر بن الخطاب عند البخاري (3826) و (3827) وغيره، غير أنه جاء في قصة السُّفرة: أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قدَّم لزيد بن عمر و سُفرةً فيها لحمٌ فأبى أن يأكل منها، وقال: إني لستُ آكلُ مما تذبحون على أنصابكم، ولا آكل إلّا ما ذُكر اسمُ اللهِ عليه.ويشهد للقصة أيضًا حديثُ سعيد بن زيد بن عمر بن نفيل عند أحمد 3/ (1648) وغيره، غير أنه جاء في قصة السُّفرة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان هو وزيد بن حارثة بمكة، فمرَّ بهما زيد بن عمرو بن نفيل، فدعواه إلى سفرة لهما، فقال: يا ابن أخي، إني لا آكل مما ذُبح على النُّصُب، قال: فما رُئِيَ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بعد ذلك أكل شيئًا مما ذُبح على النُّصب.قال إبراهيم بن إسحاق الحربيّ بعد أن خرَّج حديث زيد بن حارثة في "غريب الحديث" 2/ 791: قوله: ذبحنا شاةً لنُصُب من الأنصاب، لذلك وجهان إما أن يكون زيدٌ فعله من غير أمر رسول الله صلى الله عليه وسلم ولا رضاهُ، إلا أنه كان معه فنسب ذلك إليه، لأنَّ زيدًا لم يكن معه من العصمة والتوفيق ما كان اللهُ أعطاه نبيَّه صلى الله عليه وسلم، ومنعه مما لا يحلُّ من أمر الجاهلية، وكيف يجوز ذلك وهو قد مَنَعَ زيدًا في حديثه هذا أن يمسّ صنمًا، وما مسَّه النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قبل نبوته ولا بعدُ، فهو ينهى زيدًا عن مسِّه ويَرضى أن يَذبح له، هذا محالٌ.والوجه الثاني: أن يكون ذَبح لزاده في خروجه، فاتفق ذلك عند صنمٍ كانوا يذبحون عنده، فكان الذبح منهم للصنم، والذبح منه الله تعالى، إلّا أنَّ الموضع جَمَعَ بين الذَّبْحين، فأما ظاهر ما جاء به الحديث فمَعاذَ الله.قال الذهبي في "السير" 1/ 135 بعد أن نقل كلام الحربي هذا: هذا حسنٌ، فإنما الأعمال بالنية. أما زيد فأخذَ بالظاهر، وكان الباطن الله، وربما سكت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم عن الإفصاح خوف الشرّ، فإنا مع علمنا بكراهيته للأوثان نعلم أيضًا أنه ما كان قبل النبوة مجاهرًا بذمها بين قريش، ولا معلنًا لمَقْتها قبل المبعث.ثم قال الحربي معلقًا على حديثي ابن عمر وسعيد بن زيد: ليس فيهما بيانُ أنه صلى الله عليه وسلم ذَبَحَ أو أَمَرَ بذلك، ولعلَّ زيدًا ظنَّ أنَّ ذلك اللحم مما كانت قريش تذبحه لأنصابها، فامتنع لذلك، ولم يكن الأمر كما ظن، فإن كان ذلك فُعل فبغير أمره ولا رضاه. وعلَّق الذهبي في "السير" 1/ 130 على ما ورد في حديث سعيد بن زيد من قوله: فما رُئي النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم بعد ذلك أكل شيئًا مما ذُبح على النُّصُب، فقال: وقد رواه إبراهيم الحربي قال: حَدَّثَنَا إبراهيم بن محمد، حَدَّثَنَا أبو قَطَن، عن المسعودي، عن نُفيل، عن أبيه، عن جده، قال: مر زيد برسول الله صلى الله عليه وسلم وبابن حارثة وهما يأكلان في سفرةٍ، فدعواه، فقال: إني لا آكلُ مما ذُبح على النُّصُب، قال: وما رئي رسول الله صلى الله عليه وسلم أكلًا مما ذُبح على النُّصُب. قال الذهبي: فهذا اللفظ مليحٌ يفسِّر ما قبله، وما زال المصطفى محفوظًا محروسًا قبل الوحي وبعده، ولو احتمل جواز ذلك فبالضرورة ندري أنه كان يأكل من ذبائح قريش قبل الوحي، وكان ذلك على الإباحة، وإنما تُوصف ذبائحهم بالتحريم بعد نزول الآية، كما أنَّ الخمر كانت على الإباحة إلى أن نزل تحريمها بالمدينة بعد يوم أُحُدٍ. والذي لا ريب فيه أنه كان معصومًا قبل الوحي وبعده وقبل التشريع من الزنى قطعًا، ومن الخيانة والغدر والكذب والسكر والسجود لوثن، والاستقسام بالأزلام، ومن الرذائل والسَّفَه وبَذاءِ اللسان وكشف العورة، فلم يكن يطوف عُريانًا، ولا كان يقف يوم عرفة مع قومه بمزدلفة، بل كان يقف بعرفة. وبكل حالٍ لو بدا منه شيء من ذلك لما كان عليه تبعةٌ، لأنَّهُ كان لا يعرف، ولكن رتبة الكمال تأبى وقوع ذلك منه صلى الله عليه وسلم تسليمًا.قلنا: هذا الحرف الأخير الذي ذكر الذهبي أنه عند إبراهيم الحربي؛ يعني قوله: وما رُئي النَّبِيّ، إلى آخره، سقط من مطبوع "غريب الحديث" الذي بأيدينا، فيُستدرك من "السير".وقوله في آخره: "يأتي يوم القيامة وحده" سيأتي من حديث سعيد بن زيد برقم (5968)، وهو صحيح بمجموع شواهده، وانظرها هناك.



5022 [-4] - في (ز) و (م) و"تلخيص المستدرك": بها. في "سير أعلام النبلاء" 1/ 222. يعني قوله في أول الحديث: إلى نُصُب من الأنصاب، فذبحنا له شاةً، إلى أن قال: فجعلناها في سُفرتنا.وأخرجه النسائي (8132) عن موسى بن حزام، عن أبي أسامة حماد بن أسامة، بهذا الإسناد.ويشهد للقصة الأُولى قصة زيد بن عمرو بن نُفيل دون ذكر الذبح للنُّصُب حديثُ عبد الله بن عُمر بن الخطاب عند البخاري (3826) و (3827) وغيره، غير أنه جاء في قصة السُّفرة: أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قدَّم لزيد بن عمر و سُفرةً فيها لحمٌ فأبى أن يأكل منها، وقال: إني لستُ آكلُ مما تذبحون على أنصابكم، ولا آكل إلّا ما ذُكر اسمُ اللهِ عليه.ويشهد للقصة أيضًا حديثُ سعيد بن زيد بن عمر بن نفيل عند أحمد 3/ (1648) وغيره، غير أنه جاء في قصة السُّفرة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان هو وزيد بن حارثة بمكة، فمرَّ بهما زيد بن عمرو بن نفيل، فدعواه إلى سفرة لهما، فقال: يا ابن أخي، إني لا آكل مما ذُبح على النُّصُب، قال: فما رُئِيَ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بعد ذلك أكل شيئًا مما ذُبح على النُّصب.قال إبراهيم بن إسحاق الحربيّ بعد أن خرَّج حديث زيد بن حارثة في "غريب الحديث" 2/ 791: قوله: ذبحنا شاةً لنُصُب من الأنصاب، لذلك وجهان إما أن يكون زيدٌ فعله من غير أمر رسول الله صلى الله عليه وسلم ولا رضاهُ، إلا أنه كان معه فنسب ذلك إليه، لأنَّ زيدًا لم يكن معه من العصمة والتوفيق ما كان اللهُ أعطاه نبيَّه صلى الله عليه وسلم، ومنعه مما لا يحلُّ من أمر الجاهلية، وكيف يجوز ذلك وهو قد مَنَعَ زيدًا في حديثه هذا أن يمسّ صنمًا، وما مسَّه النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قبل نبوته ولا بعدُ، فهو ينهى زيدًا عن مسِّه ويَرضى أن يَذبح له، هذا محالٌ.والوجه الثاني: أن يكون ذَبح لزاده في خروجه، فاتفق ذلك عند صنمٍ كانوا يذبحون عنده، فكان الذبح منهم للصنم، والذبح منه الله تعالى، إلّا أنَّ الموضع جَمَعَ بين الذَّبْحين، فأما ظاهر ما جاء به الحديث فمَعاذَ الله.قال الذهبي في "السير" 1/ 135 بعد أن نقل كلام الحربي هذا: هذا حسنٌ، فإنما الأعمال بالنية. أما زيد فأخذَ بالظاهر، وكان الباطن الله، وربما سكت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم عن الإفصاح خوف الشرّ، فإنا مع علمنا بكراهيته للأوثان نعلم أيضًا أنه ما كان قبل النبوة مجاهرًا بذمها بين قريش، ولا معلنًا لمَقْتها قبل المبعث.ثم قال الحربي معلقًا على حديثي ابن عمر وسعيد بن زيد: ليس فيهما بيانُ أنه صلى الله عليه وسلم ذَبَحَ أو أَمَرَ بذلك، ولعلَّ زيدًا ظنَّ أنَّ ذلك اللحم مما كانت قريش تذبحه لأنصابها، فامتنع لذلك، ولم يكن الأمر كما ظن، فإن كان ذلك فُعل فبغير أمره ولا رضاه. وعلَّق الذهبي في "السير" 1/ 130 على ما ورد في حديث سعيد بن زيد من قوله: فما رُئي النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم بعد ذلك أكل شيئًا مما ذُبح على النُّصُب، فقال: وقد رواه إبراهيم الحربي قال: حَدَّثَنَا إبراهيم بن محمد، حَدَّثَنَا أبو قَطَن، عن المسعودي، عن نُفيل، عن أبيه، عن جده، قال: مر زيد برسول الله صلى الله عليه وسلم وبابن حارثة وهما يأكلان في سفرةٍ، فدعواه، فقال: إني لا آكلُ مما ذُبح على النُّصُب، قال: وما رئي رسول الله صلى الله عليه وسلم أكلًا مما ذُبح على النُّصُب. قال الذهبي: فهذا اللفظ مليحٌ يفسِّر ما قبله، وما زال المصطفى محفوظًا محروسًا قبل الوحي وبعده، ولو احتمل جواز ذلك فبالضرورة ندري أنه كان يأكل من ذبائح قريش قبل الوحي، وكان ذلك على الإباحة، وإنما تُوصف ذبائحهم بالتحريم بعد نزول الآية، كما أنَّ الخمر كانت على الإباحة إلى أن نزل تحريمها بالمدينة بعد يوم أُحُدٍ. والذي لا ريب فيه أنه كان معصومًا قبل الوحي وبعده وقبل التشريع من الزنى قطعًا، ومن الخيانة والغدر والكذب والسكر والسجود لوثن، والاستقسام بالأزلام، ومن الرذائل والسَّفَه وبَذاءِ اللسان وكشف العورة، فلم يكن يطوف عُريانًا، ولا كان يقف يوم عرفة مع قومه بمزدلفة، بل كان يقف بعرفة. وبكل حالٍ لو بدا منه شيء من ذلك لما كان عليه تبعةٌ، لأنَّهُ كان لا يعرف، ولكن رتبة الكمال تأبى وقوع ذلك منه صلى الله عليه وسلم تسليمًا.قلنا: هذا الحرف الأخير الذي ذكر الذهبي أنه عند إبراهيم الحربي؛ يعني قوله: وما رُئي النَّبِيّ، إلى آخره، سقط من مطبوع "غريب الحديث" الذي بأيدينا، فيُستدرك من "السير".وقوله في آخره: "يأتي يوم القيامة وحده" سيأتي من حديث سعيد بن زيد برقم (5968)، وهو صحيح بمجموع شواهده، وانظرها هناك.



5022 [-4] - إسناده حسن من أجل محمد بن عمرو - وهو ابن علقمة الليثي - فهو صدوق لكن كانت له أوهامٌ كما قال الحافظُ ابن حجر في "التقريب"، وفي بعض حديثه هذا نكارة بيِّنة كما قال الذهبي في "سير أعلام النبلاء" 1/ 222. يعني قوله في أول الحديث: إلى نُصُب من الأنصاب، فذبحنا له شاةً، إلى أن قال: فجعلناها في سُفرتنا.وأخرجه النسائي (8132) عن موسى بن حزام، عن أبي أسامة حماد بن أسامة، بهذا الإسناد.ويشهد للقصة الأُولى قصة زيد بن عمرو بن نُفيل دون ذكر الذبح للنُّصُب حديثُ عبد الله بن عُمر بن الخطاب عند البخاري (3826) و (3827) وغيره، غير أنه جاء في قصة السُّفرة: أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قدَّم لزيد بن عمر و سُفرةً فيها لحمٌ فأبى أن يأكل منها، وقال: إني لستُ آكلُ مما تذبحون على أنصابكم، ولا آكل إلّا ما ذُكر اسمُ اللهِ عليه.ويشهد للقصة أيضًا حديثُ سعيد بن زيد بن عمر بن نفيل عند أحمد 3/ (1648) وغيره، غير أنه جاء في قصة السُّفرة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان هو وزيد بن حارثة بمكة، فمرَّ بهما زيد بن عمرو بن نفيل، فدعواه إلى سفرة لهما، فقال: يا ابن أخي، إني لا آكل مما ذُبح على النُّصُب، قال: فما رُئِيَ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بعد ذلك أكل شيئًا مما ذُبح على النُّصب.قال إبراهيم بن إسحاق الحربيّ بعد أن خرَّج حديث زيد بن حارثة في "غريب الحديث" 2/ 791: قوله: ذبحنا شاةً لنُصُب من الأنصاب، لذلك وجهان إما أن يكون زيدٌ فعله من غير أمر رسول الله صلى الله عليه وسلم ولا رضاهُ، إلا أنه كان معه فنسب ذلك إليه، لأنَّ زيدًا لم يكن معه من العصمة والتوفيق ما كان اللهُ أعطاه نبيَّه صلى الله عليه وسلم، ومنعه مما لا يحلُّ من أمر الجاهلية، وكيف يجوز ذلك وهو قد مَنَعَ زيدًا في حديثه هذا أن يمسّ صنمًا، وما مسَّه النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قبل نبوته ولا بعدُ، فهو ينهى زيدًا عن مسِّه ويَرضى أن يَذبح له، هذا محالٌ.والوجه الثاني: أن يكون ذَبح لزاده في خروجه، فاتفق ذلك عند صنمٍ كانوا يذبحون عنده، فكان الذبح منهم للصنم، والذبح منه الله تعالى، إلّا أنَّ الموضع جَمَعَ بين الذَّبْحين، فأما ظاهر ما جاء به الحديث فمَعاذَ الله.قال الذهبي في "السير" 1/ 135 بعد أن نقل كلام الحربي هذا: هذا حسنٌ، فإنما الأعمال بالنية. أما زيد فأخذَ بالظاهر، وكان الباطن الله، وربما سكت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم عن الإفصاح خوف الشرّ، فإنا مع علمنا بكراهيته للأوثان نعلم أيضًا أنه ما كان قبل النبوة مجاهرًا بذمها بين قريش، ولا معلنًا لمَقْتها قبل المبعث.ثم قال الحربي معلقًا على حديثي ابن عمر وسعيد بن زيد: ليس فيهما بيانُ أنه صلى الله عليه وسلم ذَبَحَ أو أَمَرَ بذلك، ولعلَّ زيدًا ظنَّ أنَّ ذلك اللحم مما كانت قريش تذبحه لأنصابها، فامتنع لذلك، ولم يكن الأمر كما ظن، فإن كان ذلك فُعل فبغير أمره ولا رضاه. وعلَّق الذهبي في "السير" 1/ 130 على ما ورد في حديث سعيد بن زيد من قوله: فما رُئي النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم بعد ذلك أكل شيئًا مما ذُبح على النُّصُب، فقال: وقد رواه إبراهيم الحربي قال: حَدَّثَنَا إبراهيم بن محمد، حَدَّثَنَا أبو قَطَن، عن المسعودي، عن نُفيل، عن أبيه، عن جده، قال: مر زيد برسول الله صلى الله عليه وسلم وبابن حارثة وهما يأكلان في سفرةٍ، فدعواه، فقال: إني لا آكلُ مما ذُبح على النُّصُب، قال: وما رئي رسول الله صلى الله عليه وسلم أكلًا مما ذُبح على النُّصُب. قال الذهبي: فهذا اللفظ مليحٌ يفسِّر ما قبله، وما زال المصطفى محفوظًا محروسًا قبل الوحي وبعده، ولو احتمل جواز ذلك فبالضرورة ندري أنه كان يأكل من ذبائح قريش قبل الوحي، وكان ذلك على الإباحة، وإنما تُوصف ذبائحهم بالتحريم بعد نزول الآية، كما أنَّ الخمر كانت على الإباحة إلى أن نزل تحريمها بالمدينة بعد يوم أُحُدٍ. والذي لا ريب فيه أنه كان معصومًا قبل الوحي وبعده وقبل التشريع من الزنى قطعًا، ومن الخيانة والغدر والكذب والسكر والسجود لوثن، والاستقسام بالأزلام، ومن الرذائل والسَّفَه وبَذاءِ اللسان وكشف العورة، فلم يكن يطوف عُريانًا، ولا كان يقف يوم عرفة مع قومه بمزدلفة، بل كان يقف بعرفة. وبكل حالٍ لو بدا منه شيء من ذلك لما كان عليه تبعةٌ، لأنَّهُ كان لا يعرف، ولكن رتبة الكمال تأبى وقوع ذلك منه صلى الله عليه وسلم تسليمًا.قلنا: هذا الحرف الأخير الذي ذكر الذهبي أنه عند إبراهيم الحربي؛ يعني قوله: وما رُئي النَّبِيّ، إلى آخره، سقط من مطبوع "غريب الحديث" الذي بأيدينا، فيُستدرك من "السير".وقوله في آخره: "يأتي يوم القيامة وحده" سيأتي من حديث سعيد بن زيد برقم (5968)، وهو صحيح بمجموع شواهده، وانظرها هناك.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5023)


5023 - حَدَّثَنَا جعفر بن محمد بن نُصير إملاءً، حَدَّثَنَا علي بن سعيد بن بَشير الرازي بمصر، حَدَّثَنَا إسماعيل بن عُبيد بن أبي كريمة الحَرَّاني، حَدَّثَنَا محمد بن سَلَمة، حَدَّثَنَا محمد بن إسحاق، عن يزيد بن عبد الله بن قُسَيط، عن محمد بن أسامة بن زيد، عن أبيه أسامة بن زيد، قال: اجتمع جعفرٌ وعليٌّ وزيدُ بنُ حارثة، فقال جعفرٌ: أنا أحَبُّكم إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، وقال عليٌّ: أنا أحَبُّكم إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، وقال زيد: أنا أحَبُّكم إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: فانطلِقُوا بنا إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: فخرجتُ ثم رجعتُ، فقلتُ: هذا جعفرٌ وعليٌّ وزيدُ بنُ حارثة يستأذنون، فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "ائذَنْ لهم"، فدخلوا، فقالوا: يا رسول الله، جئناك نسألُكَ مَن أحبُّ الناسِ إليكَ؟ قال: "فاطمةُ" قالوا: نسألُك عن الرِّجالِ، قال: "أما أنتَ يا جعفرُ فيُشبِه خَلْقُكَ خَلْقي، ويُشبِه خُلُقُك خُلُقي، وأنت إليَّ ومن شَجَرَتي، وأما أنت يا عليُّ فأخي وأبو ولَدِي، ومنّي وإليَّ، وأما أنتَ يا زيدُ فمَولايَ، ومنّي وإليَّ، وأحبُّ القومِ إليَّ" [1].حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




উসামা ইবনে যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: জা'ফর, আলী এবং যায়েদ ইবনে হারিসা একত্রিত হলেন। জা'ফর বললেন: আমিই তোমাদের মধ্যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট সবচেয়ে প্রিয়। আলী বললেন: আমিই তোমাদের মধ্যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট সবচেয়ে প্রিয়। আর যায়েদ বললেন: আমিই তোমাদের মধ্যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট সবচেয়ে প্রিয়।

উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর তারা বললেন, চলো আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে যাই। তিনি বলেন: অতঃপর আমি বের হলাম এবং (ফিরে এসে) বললাম: এই যে জা'ফর, আলী এবং যায়েদ ইবনে হারিসা প্রবেশের অনুমতি চাইছেন। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "তাদের অনুমতি দাও।" অতঃপর তারা প্রবেশ করলেন।

তারা বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমরা আপনার নিকট এসেছি আপনাকে জিজ্ঞেস করার জন্য—মানুষের মধ্যে আপনার নিকট সবচেয়ে প্রিয় কে? তিনি বললেন: "ফাতেমা।"

তারা বললেন: আমরা আপনাকে পুরুষদের বিষয়ে জিজ্ঞেস করছি। তিনি বললেন: "হে জা'ফর! তোমার দৈহিক গঠন আমার গঠনের অনুরূপ, আর তোমার চরিত্র আমার চরিত্রের অনুরূপ। তুমি আমারই নিকটজন এবং তুমি আমার বংশের অংশ। আর হে আলী! তুমি আমার ভাই এবং আমার সন্তানের পিতা। তুমি আমার থেকে এবং আমারই নিকটজন। আর হে যায়েদ! তুমি আমার মাওলা (মুক্ত করা দাস), তুমি আমার থেকে এবং আমারই নিকটজন। আর (এই তিনজন) লোকদের মধ্যে আমার নিকট সবচেয়ে প্রিয় হলে তুমি।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف، محمد بن إسحاق مدلِّس وقد عنعن.وأخرجه أحمد 36/ (21777) عن أحمد بن عبد الملك، والنسائي (8470) عن أحمد بن بكار الحراني، كلاهما عن محمد بن سَلَمة، بهذا الإسناد. ورواية النسائي مختصرة.وأخرج الترمذي (3819) وحسّنه من طريق عمر بن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبيه، عن أسامة بن زيد، قال: كنت جالسًا إذ جاء عليّ والعبّاس يستأذنان، فقالا: يا أسامة، استأذن لنا على رسول الله صلى الله عليه وسلم، وفيه فقالا: يا رسول الله جئناك نسألُك أيُّ أهلك أحبُّ إليك؟ قال: "فاطمة بنت محمد" فقالا: ما جئناك نسألك عن أهلك، قال: "أحبُّ أهلي إليَّ من قد أنعم الله عليه وأنعمتُ عليه أسامة بن زيد" قالا: ثم مَن؟ قال: "ثم علي بن أبي طالب" … وهذا إسناد ضعيف، عمر بن أبي سلمة ضعيفٌ عند التفرد أو المخالفة، وقد خولف.والصحيح في تنازع هؤلاء الثلاثة أنه إنما كان في كفالة بنت حمزة كما سلف برقم (4664) و (5003) من حديث علي بن أبي طالب، وأصله عند البخاري (2669) و (4251) من حديث البراء بن عازب. عثمان بن صالح شيخ شيخ المصنّف، وكذلك هو في سائر مصادر تخريج الخبر.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5024)


5024 - أخبرنا أبو جعفر محمد بن عبد الله التاجِر، حَدَّثَنَا يحيى [1] بن عثمان بن صالح، حَدَّثَنَا أبي عثمانُ بنُ صالح، حَدَّثَنَا ابن لَهِيعة، عن عُقَيل، أنَّ ابنَ شِهَابٍ حَدَّثه عن عُروة، عن أسامة، عن [2] زيد بن حارثة، عن نبي الله صلى الله عليه وسلم: أنه أتاه [3] في أول ما أُوحِيَ إليه، فأراهُ الوضوءَ والصلاةَ وعلّمه الإسلامَ [4].




যায়দ ইবনু হারিসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী কারীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর উপর যখন প্রথম ওহী নাযিল হয়, তখন তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর (যায়দ-এর) কাছে এলেন, অতঃপর তাঁকে (যায়দকে) ওযূ ও সালাত দেখালেন এবং তাঁকে ইসলাম শিক্ষা দিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرّف في (ز) و (ب) إلى: علي. عثمان بن صالح شيخ شيخ المصنّف، وكذلك هو في سائر مصادر تخريج الخبر.



[2] في النسخ الخطية: بن فصار الخبر من مسند أسامة بن زيد بن حارثة، وليس من مسند أبيه، وهو خطأ صوَّبناه من رواية الطبراني في "الأوائل" (18) حيث روى هذا الخبر عن يحيى بن عثمان بن صالح شيخ شيخ المصنّف، وكذلك هو في سائر مصادر تخريج الخبر.



5024 [3] - كذا جاء الحديث عند المصنّف بعَوْد الضمير في هذه اللفظة على زيد بن حارثة، فأفهم ذلك أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وهو من أتى زيدًا فأراه الوضوء … ولذلك ذكره المصنّف في مناقب زيد بن حارثة، وإنما جاء الحديث عند جميع من خرَّجه بذكر جبريل أنه هو الذي أتى النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فأراه الوضوء … وكذلك جاء في رواية الطبراني في "الأوائل" (18) عن يحيى بن عثمان بن صالح، بإسناده هذا. فالظاهر أنه سقط من أصول المصنّف ذِكرُ جبريل.



5024 [4] - إسناده ضعيف لضعف عبد الله بن لَهِيعة وسوء حفظه، ولاضطراب إسناد هذا الحديث ومتنه كما هو مبيَّن في التعليق على "مسند أحمد" (17480). وقد ذهب أبو حاتم الرازي فيما نقله عنه ابنه في "العلل" (10) إلى بطلان هذا الحديث وتكذيبه.وأخرجه أحمد 29/ (17480) عن الحسن بن موسى الأشيب، وابن ماجه (462) من طريق حَسَّان بن عبد الله، كلاهما عن ابن لَهِيعة بهذا الإسناد. وفيه أن جبريل هو مَن علّم النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم ذلك. ولم يذكرا في روايتهما قوله: وعلّمه الإسلام. ولم يذكر ابن ماجه في روايته الصلاة أيضًا. وزادا ذكرَ نضح الفرج بالماء بعد الوضوء.وأخرجه أحمد 36/ (21771) من طريق رشدين بن سعد، عن عُقيل بن خالد، عن ابن شهاب، عن عروة بن الزبير، عن أسامة بن زيد - لم يجاوزه - عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم: أنَّ جبريل لما نزل على النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فعلَّمه الوضوءَ، فلما فرغ من وضوئه أخذ حفنة من ماء فرشَّ بها نحو الفرج، قال: فكان النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يرُشُّ بعد وضوئه. ورشدين بن سعد ضعيف وهو أسوأُ حالًا من ابن لَهِيعة، وبعضهم ترك حديثه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5025)


5025 - حَدَّثَنَا أبو العباس محمد بن يعقوب، حَدَّثَنَا أحمد بن عبد الجبار، حَدَّثَنَا يونس بن بُكَير، عن ابن إسحاق، حدثني عبد الله بن أبي بكر بن حَزْم وصالح بن أبي أُمامة بن سَهْل، عن أبيه [1]، قال: لما فَرَغَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم مِن بَدْرٍ بَعَثَ بَشِيرَينِ إلى أهل المدينة: بعثَ زيدَ بنَ حارثة إلى أهل السافِلةِ، وبعثَ عبدَ الله بن رَوَاحة إلى أهل العاليَةِ يُبشِّرونهم بفَتْح الله على نَبيّه صلى الله عليه وسلم، فوافق زيدُ بنَ حارثة ابنَه أسامة حين سَوَّى [2] على رُقيّةَ بنتِ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، فقيل له: ذاك أبوك حين قَدِمَ، قال أسامةُ: فجئتُ وهو واقفٌ للناس يقول: قُتِل عُتبةُ بن رَبيعة، وشَيْبة بن رَبيعة، وأبو جهل بن هشام، ونُبَيهٌ ومُنبِّهٌ وأُميّةُ بن خَلَف، فقلت: يا أَبَهْ، أَحقٌّ؟ قال: نَعَمْ والله يا بُنيَّ [3].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




উসামা ইবনু যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বদর যুদ্ধ সমাপ্ত করলেন, তখন তিনি মদীনাবাসীর নিকট দু’জন সুসংবাদবাহককে প্রেরণ করলেন। তিনি যায়দ ইবনু হারিসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে সাফিলাহ এলাকার অধিবাসীদের কাছে এবং আব্দুল্লাহ ইবনু রাওয়াহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে আলিয়াহ এলাকার অধিবাসীদের কাছে আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর প্রতি আল্লাহর প্রদত্ত বিজয়ের সুসংবাদ দেওয়ার জন্য পাঠালেন। যায়দ ইবনু হারিসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর ছেলে উসামার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাথে এমন সময় সাক্ষাৎ করলেন যখন উসামা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা রুকাইয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর (কবরে মাটি) সমান করছিলেন। তখন তাঁকে (উসামাকে) বলা হলো: ওই যে তোমার পিতা এসেছেন। উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি তাঁর নিকট আসলাম, দেখলাম তিনি লোকদের সামনে দাঁড়িয়ে বলছেন: উৎবাহ ইবনু রাবী‘আ, শায়বাহ ইবনু রাবী‘আ, আবূ জাহল ইবনু হিশাম, নুবাইহ ও মুনাব্বিহ এবং উমাইয়াহ ইবনু খালাফ নিহত হয়েছে। আমি বললাম: হে আমার আব্বা, এটা কি সত্য? তিনি বললেন: হ্যাঁ, আল্লাহর শপথ, হে আমার পুত্র।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] كذا جاء في نسخ "المستدرك" بذكر أبي أمامة بن سهل في إسناد الخبر، ولم يرد ذكره في رواية البيهقي في "الدلائل" 3/ 187، وفي "السنن الكبرى" 9/ 183 عن أبي عبد الله الحاكم بإسناده هذا الذي هنا، ولم يرد كذلك في رواية زياد البكائي عن ابن إسحاق كما في "سيرة ابن هشام" 2/ 51، ولا في رواية سَلَمة بن الفضل الأبرش عن ابن إسحاق كما في "تاريخ الطبري" 2/ 487، فالظاهر أنَّ ذكر أبي أمامة بن سهل في إسناده وهمٌ، والله أعلم.



[2] أي: سوى التراب. وأخرجه أحمد في "مسنده" 39/ (24009/ 3) عن أسود بن عامر، عن شريك النخعي، عن أبي إسحاق، عن جَبَلة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان إذا لم يغزُ أعطى سلاحه عليًّا أو أسامة. كذا ذكر أسامة بن زيد بن حارثة بدلٌ أبيه!ووافق شريكًا النخعي في ذكر أسامة إسرائيل بنُ يونس بن أبي إسحاق السبيعي، غير أنه روى الحديث عن جدِّه مرسلًا، أخرجه من طريقه أحمد في "فضائل الصحابة" (965).ووافق إبراهيمَ بنَ يوسف السَّبيعي على متنه بذكر زيد بن حارثة بدلٌ أسامة: حُديجُ بنُ معاوية، غير أنه اختُلف على حُديج في إسناده، وفي حُديج ضعفٌ: فمرة يرويه حُديج عن أبي إسحاق عن جَبَلة بن حارثة، كما عند أبي نعيم في "تاريخ أصبهان" 2/ 222، ومرة يرويه حُديج عن أبي إسحاق قال: كان جبلة بن حارثة في الحيّ فأتاه الحيُّ فقالوا … فذكر أحاديثَ أحدُها حديثُنا، أخرجه البغوي في "معجم الصحابة" (317).



5025 [3] - حسنٌ لغيره، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم، لكنه مرسلٌ، وكأنَّ الخبر من مسند أسامة بن زيد نفسِه، كما يدلُّ عليه سياقُ الحديث بعد ذلك، فإن صحَّ ذكر أبي أمامة بن سهل في إسناده يمكن الحكم باتصال الإسناد ويكون حسنًا، لكن تقدم قريبًا أنه لم يرد ذكر أبي أمامة إلّا في رواية المصنِّف هنا، وإذا كان لا يصح ذكر أبي أمامة كان الإسناد منقطعًا لعدم إدراك عبد الله بن أبي بكر بن حزم وصالح بن أبي أمامة لأسامة بن زيد، والله تعالى أعلم.وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 9/ 183، وفي "دلائل النبوة" 3/ 187 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. ليس فيه أبو أمامة بن سهل.وأخرجه كذلك ابن هشام في "السيرة النبوية" 2/ 51 عن زياد بن عبد الله البكّائي، والطبري في "تاريخه" 2/ 487 من طريق سلمة بن الفضل الأبرش، كلاهما عن ابن إسحاق، به.ويشهد له مرسلًا حديثًا عروة بن الزبير والزهري الآتيان برقمي (7024) و (7029). وأخرجه أحمد في "مسنده" 39/ (24009/ 3) عن أسود بن عامر، عن شريك النخعي، عن أبي إسحاق، عن جَبَلة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان إذا لم يغزُ أعطى سلاحه عليًّا أو أسامة. كذا ذكر أسامة بن زيد بن حارثة بدلٌ أبيه!ووافق شريكًا النخعي في ذكر أسامة إسرائيل بنُ يونس بن أبي إسحاق السبيعي، غير أنه روى الحديث عن جدِّه مرسلًا، أخرجه من طريقه أحمد في "فضائل الصحابة" (965).ووافق إبراهيمَ بنَ يوسف السَّبيعي على متنه بذكر زيد بن حارثة بدلٌ أسامة: حُديجُ بنُ معاوية، غير أنه اختُلف على حُديج في إسناده، وفي حُديج ضعفٌ: فمرة يرويه حُديج عن أبي إسحاق عن جَبَلة بن حارثة، كما عند أبي نعيم في "تاريخ أصبهان" 2/ 222، ومرة يرويه حُديج عن أبي إسحاق قال: كان جبلة بن حارثة في الحيّ فأتاه الحيُّ فقالوا … فذكر أحاديثَ أحدُها حديثُنا، أخرجه البغوي في "معجم الصحابة" (317).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5026)


5026 - أخبرني عبد الله بن محمد بن زياد، حَدَّثَنَا محمد بن إسحاق الإمام، حَدَّثَنَا أحمد بن عثمان بن حَكِيم الأَوْدي، حَدَّثَنَا شُريح بن مَسْلَمة، حَدَّثَنَا إبراهيم بن يوسف، عن أبيه، عن أبي إسحاق، عن جَبَلة بن حارثة أخي زيد، قال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إذا لم يَغْزُ لم يُعْطِ سِلاحَه إِلَّا عليًّا أو زيدًا [1]. هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه.




জাবালা ইবনে হারিসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন যুদ্ধে যেতেন না, তখন তিনি তাঁর অস্ত্র আলী অথবা যায়দ ব্যতীত অন্য কাউকে দিতেন না।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لانقطاعه بين أبي إسحاق - وهو عمرو بن عبد الله السبيعي - وبين جبلة بن حارثة، وإبراهيم بن يوسف - وهو ابن إسحاق بن أبي إسحاق السَّبيعي - فيه لينٌ، لكنه لم ينفرد به، بل توبع، لكن اختُلف في هذا الحديث على أبي إسحاق السبيعي كما سيأتي. وأخرجه أحمد في "مسنده" 39/ (24009/ 3) عن أسود بن عامر، عن شريك النخعي، عن أبي إسحاق، عن جَبَلة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان إذا لم يغزُ أعطى سلاحه عليًّا أو أسامة. كذا ذكر أسامة بن زيد بن حارثة بدلٌ أبيه!ووافق شريكًا النخعي في ذكر أسامة إسرائيل بنُ يونس بن أبي إسحاق السبيعي، غير أنه روى الحديث عن جدِّه مرسلًا، أخرجه من طريقه أحمد في "فضائل الصحابة" (965).ووافق إبراهيمَ بنَ يوسف السَّبيعي على متنه بذكر زيد بن حارثة بدلٌ أسامة: حُديجُ بنُ معاوية، غير أنه اختُلف على حُديج في إسناده، وفي حُديج ضعفٌ: فمرة يرويه حُديج عن أبي إسحاق عن جَبَلة بن حارثة، كما عند أبي نعيم في "تاريخ أصبهان" 2/ 222، ومرة يرويه حُديج عن أبي إسحاق قال: كان جبلة بن حارثة في الحيّ فأتاه الحيُّ فقالوا … فذكر أحاديثَ أحدُها حديثُنا، أخرجه البغوي في "معجم الصحابة" (317).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5027)


5027 - أخبرني أبو الحسين محمد بن أحمد القَنْطَرِي ببَرَدَان [1]، حَدَّثَنَا أبو قِلابة، حَدَّثَنَا أبو عاصم، حَدَّثَنَا يزيد بن أبي عُبيد، عن سلمة بن الأكوع، قال: غزوتُ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم سبعَ غَزَواتٍ، ومع زيدِ بن حارثة تسعَ غَزَوات، يُؤمِّره رسول الله صلى الله عليه وسلم علينا [2]. صحيح على شرط الشيخين.




সালামাহ ইবনুল আক্‌ওয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সাতটি গাজওয়ায় (যুদ্ধে) অংশগ্রহণ করেছি এবং যায়েদ ইবনু হারিসার সাথে নয়টি গাজওয়ায় অংশগ্রহণ করেছি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে আমাদের উপর সেনাপতি নিযুক্ত করতেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] المثبت من (ز) و (ب)، وفي (ص) و (م): ببغداد وبَرَدان، محرّكة: من قرى بغداد على بعد سبعة فراسخ منها، وقد جَرَتْ عادةُ المصنّف أن يسمع من شيخه هذا ببغداد كما نصَّ عليه مرارًا، ولعلَّ المصنّف يكون سمع منه في تلك القرية وكان يطلق القول: ببغداد، لكونها من قرى بغداد، أو أنَّ شيخَه القنطري كان يتردَّد بين بغداد المدينة وبين هذه القرية، فربما سمع منه الحاكم في قريته تلك، والله أعلم. وعُذْرُ البخاريِّ بهذا الاختصار أنَّ غير أبي عاصم رواه بلفظ: غزوت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم سبع غزوات، وخرجتُ فيما يبعث من البعوث تسع غزوات، علينا مرةً أبو بكر، ومرةً أسامة بن زيد.كذلك أخرجه البخاري (4270)، ومسلم (1815) من طريق حاتم بن إسماعيل، والبخاري (4271) من طريق حفص بن غياث كلاهما عن يزيد بن أبي عُبيد، عن سلمة بن الأكوع.وانظر "فتح الباري" 12/ 448 و 490.



[2] حديث صحيح، وهذا إسناد قويٌّ من أجل أبي قلابة - وهو عبد الملك بن محمد الرَّقاشي - وقد توبع. أبو عاصم: هو الضحاك بن مخلد الشيباني.وأخرجه ابن حبان (7174) من طريق محمد بن عبد الله بن نمير، عن أبي عاصم، بهذا الإسناد.وأخرجه البخاري (4272) عن أبي عاصم به. لكنه اختصر منه عدد البعوث التي أُمِّر فيها ابن حارثة، كذلك قال: ابن حارثة، ولم يذكر اسمه، مع أنَّ جميع أصحاب أبي عاصم الضحاك رووه عنه تامًّا بذكر عدد الغزوات التي أُمِّر فيها زيد بن حارثة، هكذا بالنصِّ على اسمه. وعُذْرُ البخاريِّ بهذا الاختصار أنَّ غير أبي عاصم رواه بلفظ: غزوت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم سبع غزوات، وخرجتُ فيما يبعث من البعوث تسع غزوات، علينا مرةً أبو بكر، ومرةً أسامة بن زيد.كذلك أخرجه البخاري (4270)، ومسلم (1815) من طريق حاتم بن إسماعيل، والبخاري (4271) من طريق حفص بن غياث كلاهما عن يزيد بن أبي عُبيد، عن سلمة بن الأكوع.وانظر "فتح الباري" 12/ 448 و 490.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5028)


5028 - حَدَّثَنَا أحمد بن سهل ببُخَارى، حَدَّثَنَا سهل بن المُتوكِّل، حَدَّثَنَا حامد بن يحيى البَلْخيّ، حَدَّثَنَا سفيان بن عُيينة، عن إسماعيل بن أبي خالد، عن الشَّعبي، عن مسروق، عن عائشة قالت: ما بَعَثَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم زَيدًا في سريةٍ إِلَّا أَمَّره عليهم [1].صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যায়িদকে কোনো সামরিক অভিযানে পাঠালে অবশ্যই তাকে তাদের সেনাপতি নিযুক্ত করতেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. الشَّعْبي: هو عامر بن شَراحيل، ومَسروق: هو ابن الأجدع. وانظر ما سلف برقم (5020 م). وأخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 19/ 360 من طريق شُريح بن مسلمة، عن إبراهيم بن يوسف، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو نعيم الأصبهاني في "أخبار أصبهان" 12/ 222 من طريق حُديج بن معاوية، عن أبي إسحاق، عن جَبَلة بن حارثة. غير أنه قال: فدفع أحدهما إلى زيد، والآخر إلى عليٍّ.وأخرجه أبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (317) من طريق حُديج بن معاوية، عن أبي إسحاق، قال: كان جَبَلة في الحيّ، فأتاه الحيُّ فقالوا … فذكر أحاديث أحدُها حديثنا هذا. ولفظه كلفظ أبي نعيم الأصبهاني بذكر عليٍّ بدل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5029)


5029 - أخبرنا أبو بكر بن أبي دارِم الحافظُ بالكوفة، حَدَّثَنَا أحمد بن موسى بن إسحاق التَّمِيمي بالكوفة، حَدَّثَنَا العلاء بن عمرو الحَنَفي، حَدَّثَنَا إبراهيم بن يوسف بن أبي إسحاق السَّبيعي، عن أبيه، عن أبي إسحاق، عن جَبَلة بن حارثة أخي زيد بن حارثة، قال: أُهدي للنبيِّ صلى الله عليه وسلم رَحْلانِ [1]، فأخذَ أحدهما، وأعطى زيدًا الآخَر [2]. صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه. ‌‌ذكرُ مناقب بِشْر بن البَراء بن مَعْرُورٍ رضي الله عنه -




জাবালাহ ইবনু হারিসাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দুটি হাওদা (বা সওয়ারির সরঞ্জাম) উপহার দেওয়া হয়েছিল। তিনি সে দুটির মধ্যে একটি গ্রহণ করলেন এবং অপরটি যায়িদকে (যায়িদ ইবনু হারিসাহকে) দিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرّف في نسخنا الخطية إلى: حلتين، وفي "تلخيص المستدرك" إلى: حلتان، ويدل على التحريف تذكير الضمير في قوله بعد ذلك: أحدهما، وفي قوله الآخَر. وأخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 19/ 360 من طريق شُريح بن مسلمة، عن إبراهيم بن يوسف، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو نعيم الأصبهاني في "أخبار أصبهان" 12/ 222 من طريق حُديج بن معاوية، عن أبي إسحاق، عن جَبَلة بن حارثة. غير أنه قال: فدفع أحدهما إلى زيد، والآخر إلى عليٍّ.وأخرجه أبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (317) من طريق حُديج بن معاوية، عن أبي إسحاق، قال: كان جَبَلة في الحيّ، فأتاه الحيُّ فقالوا … فذكر أحاديث أحدُها حديثنا هذا. ولفظه كلفظ أبي نعيم الأصبهاني بذكر عليٍّ بدل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم.



[2] إسناد ضعيف بمرّةٍ أبو بكر بن أبي دارم والعلاء بن عمرو الحنفي وإبراهيم بن يوسف السبيعي متكلَّم فيهم. وقد رواه أيضًا حُديجُ بن معاوية عن أبي إسحاق، فأرسله مرةً ووصله أخرى بذكر جَبَلة، وقد ذكرنا فيما تقدم برقم (5026) أنَّ أبا إسحاق السبيعي لم يسمع من جبلة بن حارثة. وأخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 19/ 360 من طريق شُريح بن مسلمة، عن إبراهيم بن يوسف، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو نعيم الأصبهاني في "أخبار أصبهان" 12/ 222 من طريق حُديج بن معاوية، عن أبي إسحاق، عن جَبَلة بن حارثة. غير أنه قال: فدفع أحدهما إلى زيد، والآخر إلى عليٍّ.وأخرجه أبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (317) من طريق حُديج بن معاوية، عن أبي إسحاق، قال: كان جَبَلة في الحيّ، فأتاه الحيُّ فقالوا … فذكر أحاديث أحدُها حديثنا هذا. ولفظه كلفظ أبي نعيم الأصبهاني بذكر عليٍّ بدل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم.



5030 - Null









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5030)


5030 - حَدَّثَنَا أبو العباس محمد بن يعقوب، حَدَّثَنَا أحمد بن عبد الجبار، حَدَّثَنَا يونس بن بُكَير، عن ابن إسحاق، في تسمية من شهد بدرًا من بني سَلِمة ثم من بني عَدِيّ بن غَنْم بن سَلِمة: بِشْرُ بن البَراء بن مَعْرُورِ بن صَخْر بن خَنْساء.




ইবনু ইসহাক থেকে বর্ণিত, বনী সালিমাহ গোত্রের এবং অতঃপর বনী আদী ইবনু গানম ইবনু সালিমাহ গোত্রের মধ্যে থেকে যারা বদরের যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছিলেন, তাদের নাম উল্লেখ প্রসঙ্গে [তিনি বলেন]: বিশর ইবনুল বারা ইবনু মা’রূর ইবনু সাখর ইবনু খানসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)।









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5031)


5031 - حَدَّثَنَا أبو العباس محمد بن يعقوب، حَدَّثَنَا محمد بن إسحاق الصَّغَاني [1]، حَدَّثَنَا محمد بن يعلى.وأخبرنا أبو الطيِّب محمد بن علي الزاهد وأبو حامد أحمد بن محمد [2] بن شُعيب الفقيه، قالا: حَدَّثَنَا سَهْل بن عمّار العَتَكي، حَدَّثَنَا محمد بن يعلي، حَدَّثَنَا محمد بن عمرو بن علقمة، عن أبي سَلَمة، عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن سيِّدُكم يا بني سَلِمةَ؟ " قالوا: الجَدُّ بن قَيس، إلَّا أنَّ فيه بُخْلًا، قال: "وأَيُّ داءٍ أَدْوَى من البُخل؟ سيِّدُكم بِشرُ بن البَراء بن مَعْرُور" [3]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে বনি সালামাহ! তোমাদের নেতা কে?" তারা বললো: জাদ ইবনু ক্বায়স, তবে তার মধ্যে কৃপণতা রয়েছে। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কৃপণতার চেয়ে মারাত্মক রোগ আর কী হতে পারে? তোমাদের নেতা হলেন বিশর ইবনু আল-বারা' ইবনু মা'রূর।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في (ب) إلى: أحمد بن إسحاق الصنعاني. تابعه النضرُ بنُ شُميل وسعيدُ بنُ محمد الوراق، والنضر ثقة وسعيد بن محمد ضعيف فإسناده حسنٌ من رواية النضر بن شُميل، لأنَّ محمد بن عمرو بن علقمة حسن الحديث، لكنه اختُلف عنه في وصل الحديث وإرساله، فقد خالف أولئك الثلاثةَ الرواةَ عنه غيرُهم، فأرسَلُوا الحديث لم يذكروا فيه أبا هريرة، كذلك رواه مرسلًا يزيدُ بنُ هارون وسعيدُ بنُ يحيى اللَّخْمي، وعلى أي حال فللحديث شواهد يحسن بها إن شاء الله.وأخرجه أبو الشيخ في "أمثال الحديث" (94)، وأبو نُعيم في "أخبار أصبهان" 2/ 250 - 251، والخطيب البغدادي في "البخلاء" (37) من طرق عن أبي عمرو محمد بن عبد العزيز بن أبي رِزْمة، عن النضر بن شُميل، عن محمد بن عمرو، به.وأخرجه ابن سعد في "طبقاته الكبرى" 3/ 528 عن يزيد بن هارون، وهشام بن عمار في "حديثه" (106) عن سعيد بن يحيى اللَّخْمي، كلاهما عن محمد بن عمرو بن علقمة، عن أبي سلمة، مرسلًا.وسيأتي عند المصنّف برقم (7480) من طريق سعيد بن محمد الوراق، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة موصولًا.ويشهد له حديث كعب بن مالك عند يعقوب بن سفيان في "تاريخه" كما في "الإصابة" لابن حجر 1/ 294، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (5538)، والطبراني في "الكبير" 19/ (163)، وأبي الشيخ في "أمثال الحديث" (95)، وابن مَنْدَه في "معرفة الصحابة" 1/ 220 - 221، وأبي نعيم في "معرفة الصحابة" (1170)، والخطيب في "البخلاء" (32)، وابن حجر في "تغليق التعليق" 3/ 347، وقد صحَّح إسناده ابن حجرٍ في "تغليق التعليق"، لكنه قال بعد ذلك في "فتح الباري": رجال إسناده ثقات إلّا أنه اختُلف في وصله وإرساله على الزُهري.قلنا: هو كذلك، فقد رواه غير واحدٍ عن الزهري عن ابن كعب بن مالك مرسلًا، كذلك أخرجه معمر بن راشد في "جامعه" (20705)، وابن سعد 3/ 528، والخرائطي في "مكارم الأخلاق" (593) و (647)، وفي "مساوئ الأخلاق" له أيضًا (366)، والطبراني في "الكبير" 19/ (164)، والخطيب في "البخلاء" (35) من طُرُق، عن ابن شهاب، عن ابن كعب بن مالك.بعضهم يقول: عبد الرحمن بن كعب بن مالك، وبعضهم يقول: عبد الرحمن بن عبد الله بن كعب بن مالك، وكلاهما تابعيّ يروي عنه الزهري والثاني ابن أخي الأول، وكلاهما يروي عن كعب بن مالك، ولكن الأشبه إرساله.ويشهد له أيضًا حديث جابر بن عبد الله عند أبي نعيم في "معرفة الصحابة" (1171)، والخطيب في "البخلاء" (36) من طريق عبد الملك بن جابر بن عتيك، عن جابر، وإسناده لا بأس به. لكن خالف ابنَ عَتيك فيه أبو الزبير محمد بن مسلم المكي عند البخاري في "الأدب المفرد" (296) وغيره، فرواه عن جابر بن عبد الله، فذكر عمرَو بن الجَمُوح بدلٌ بشر بن البراء بن مَعْرور، وإسناده عن أبي الزبير صحيح، وصرَّح بسماعه من جابر.وكذلك رواه بذكر عمرو بن الجَمُوح: عمرو بن دينار وحبيب بن أبي ثابت ومحمد بن المنكدر جميعهم رووه مرسلًا عند ابن سعد 4/ 376، ووصلَ بعضُهم رواية عمرو بن دينار بذكر جابر، كذلك أخرجه محمد بن مخلد في "المنتقى من حديثه" (157)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (10359)، والخطيبُ في "البخلاء" (24) و (26) وفي "تاريخ بغداد" 5/ 354.وبعضهم وصل رواية عمرو بن دينار بذكر أبي سلمة عن أبي هريرة - يعني كإسناد المصنّف - كذلك رواه إبراهيم بن يزيد الخُوزي عن عمرو عند الطبراني في "الأوسط" (3650)، وأبي بكر الإسماعيلي في "معجم شيوخه" (278)، وأبي الشيخ في "الأمثال" (90)، والبيهقي في "الشعب" (10358)، والخطيب في "البخلاء" (28)، لكن إبراهيم بن يزيد الخوزي هذا متروك الحديث.على أنَّ المحفوظ في رواية أبي سلمة ذكر بشر بن البراء بن معرور كما تقدم.ولهذ قال الدارقطني في "العلل" (1399) عن رواية عمرو بن دينار: المرسل أشبه.وقد رجَّح ابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 84، وابن الأثير في "أسد الغابة" 1/ 218 قول من ذكر بشر بن البراء بن معرور، على قول من ذكر عمرو بن الجَمُوح. لكن قال ابن حجر في "الفتح" 8/ 158: يمكن الجمع بأن تُحمل قصة بشر على أنها كانت بعد قتل عمرو بن الجَمُوح جمعًا بين الحديثين!



[2] وقع في النسخ الخطية: محمد بن أحمد، بتقديم محمد علي أحمد، وإنما اسم هذا الشيخ كما أثبتناه، كذلك سمّاه المصنّف غير مرة في "المستدرك" بتقديم أحمد على محمد، على أنه في شيوخ المصنّف من اسمه محمد بن أحمد بن شعيب رجُلين، غير أنَّ أحدهما يُكنى بأبي أحمد، والآخر يُكنى بأبي سعيد، ذكرهم جميعًا في "تاريخ نيسابور". تابعه النضرُ بنُ شُميل وسعيدُ بنُ محمد الوراق، والنضر ثقة وسعيد بن محمد ضعيف فإسناده حسنٌ من رواية النضر بن شُميل، لأنَّ محمد بن عمرو بن علقمة حسن الحديث، لكنه اختُلف عنه في وصل الحديث وإرساله، فقد خالف أولئك الثلاثةَ الرواةَ عنه غيرُهم، فأرسَلُوا الحديث لم يذكروا فيه أبا هريرة، كذلك رواه مرسلًا يزيدُ بنُ هارون وسعيدُ بنُ يحيى اللَّخْمي، وعلى أي حال فللحديث شواهد يحسن بها إن شاء الله.وأخرجه أبو الشيخ في "أمثال الحديث" (94)، وأبو نُعيم في "أخبار أصبهان" 2/ 250 - 251، والخطيب البغدادي في "البخلاء" (37) من طرق عن أبي عمرو محمد بن عبد العزيز بن أبي رِزْمة، عن النضر بن شُميل، عن محمد بن عمرو، به.وأخرجه ابن سعد في "طبقاته الكبرى" 3/ 528 عن يزيد بن هارون، وهشام بن عمار في "حديثه" (106) عن سعيد بن يحيى اللَّخْمي، كلاهما عن محمد بن عمرو بن علقمة، عن أبي سلمة، مرسلًا.وسيأتي عند المصنّف برقم (7480) من طريق سعيد بن محمد الوراق، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة موصولًا.ويشهد له حديث كعب بن مالك عند يعقوب بن سفيان في "تاريخه" كما في "الإصابة" لابن حجر 1/ 294، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (5538)، والطبراني في "الكبير" 19/ (163)، وأبي الشيخ في "أمثال الحديث" (95)، وابن مَنْدَه في "معرفة الصحابة" 1/ 220 - 221، وأبي نعيم في "معرفة الصحابة" (1170)، والخطيب في "البخلاء" (32)، وابن حجر في "تغليق التعليق" 3/ 347، وقد صحَّح إسناده ابن حجرٍ في "تغليق التعليق"، لكنه قال بعد ذلك في "فتح الباري": رجال إسناده ثقات إلّا أنه اختُلف في وصله وإرساله على الزُهري.قلنا: هو كذلك، فقد رواه غير واحدٍ عن الزهري عن ابن كعب بن مالك مرسلًا، كذلك أخرجه معمر بن راشد في "جامعه" (20705)، وابن سعد 3/ 528، والخرائطي في "مكارم الأخلاق" (593) و (647)، وفي "مساوئ الأخلاق" له أيضًا (366)، والطبراني في "الكبير" 19/ (164)، والخطيب في "البخلاء" (35) من طُرُق، عن ابن شهاب، عن ابن كعب بن مالك.بعضهم يقول: عبد الرحمن بن كعب بن مالك، وبعضهم يقول: عبد الرحمن بن عبد الله بن كعب بن مالك، وكلاهما تابعيّ يروي عنه الزهري والثاني ابن أخي الأول، وكلاهما يروي عن كعب بن مالك، ولكن الأشبه إرساله.ويشهد له أيضًا حديث جابر بن عبد الله عند أبي نعيم في "معرفة الصحابة" (1171)، والخطيب في "البخلاء" (36) من طريق عبد الملك بن جابر بن عتيك، عن جابر، وإسناده لا بأس به. لكن خالف ابنَ عَتيك فيه أبو الزبير محمد بن مسلم المكي عند البخاري في "الأدب المفرد" (296) وغيره، فرواه عن جابر بن عبد الله، فذكر عمرَو بن الجَمُوح بدلٌ بشر بن البراء بن مَعْرور، وإسناده عن أبي الزبير صحيح، وصرَّح بسماعه من جابر.وكذلك رواه بذكر عمرو بن الجَمُوح: عمرو بن دينار وحبيب بن أبي ثابت ومحمد بن المنكدر جميعهم رووه مرسلًا عند ابن سعد 4/ 376، ووصلَ بعضُهم رواية عمرو بن دينار بذكر جابر، كذلك أخرجه محمد بن مخلد في "المنتقى من حديثه" (157)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (10359)، والخطيبُ في "البخلاء" (24) و (26) وفي "تاريخ بغداد" 5/ 354.وبعضهم وصل رواية عمرو بن دينار بذكر أبي سلمة عن أبي هريرة - يعني كإسناد المصنّف - كذلك رواه إبراهيم بن يزيد الخُوزي عن عمرو عند الطبراني في "الأوسط" (3650)، وأبي بكر الإسماعيلي في "معجم شيوخه" (278)، وأبي الشيخ في "الأمثال" (90)، والبيهقي في "الشعب" (10358)، والخطيب في "البخلاء" (28)، لكن إبراهيم بن يزيد الخوزي هذا متروك الحديث.على أنَّ المحفوظ في رواية أبي سلمة ذكر بشر بن البراء بن معرور كما تقدم.ولهذ قال الدارقطني في "العلل" (1399) عن رواية عمرو بن دينار: المرسل أشبه.وقد رجَّح ابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 84، وابن الأثير في "أسد الغابة" 1/ 218 قول من ذكر بشر بن البراء بن معرور، على قول من ذكر عمرو بن الجَمُوح. لكن قال ابن حجر في "الفتح" 8/ 158: يمكن الجمع بأن تُحمل قصة بشر على أنها كانت بعد قتل عمرو بن الجَمُوح جمعًا بين الحديثين!



5031 [3] - حسن إن شاء الله، وهذا إسناد ضعيف لضعف محمد بن يعلي - وهو السّلمي الكوفي - وقد تابعه النضرُ بنُ شُميل وسعيدُ بنُ محمد الوراق، والنضر ثقة وسعيد بن محمد ضعيف فإسناده حسنٌ من رواية النضر بن شُميل، لأنَّ محمد بن عمرو بن علقمة حسن الحديث، لكنه اختُلف عنه في وصل الحديث وإرساله، فقد خالف أولئك الثلاثةَ الرواةَ عنه غيرُهم، فأرسَلُوا الحديث لم يذكروا فيه أبا هريرة، كذلك رواه مرسلًا يزيدُ بنُ هارون وسعيدُ بنُ يحيى اللَّخْمي، وعلى أي حال فللحديث شواهد يحسن بها إن شاء الله.وأخرجه أبو الشيخ في "أمثال الحديث" (94)، وأبو نُعيم في "أخبار أصبهان" 2/ 250 - 251، والخطيب البغدادي في "البخلاء" (37) من طرق عن أبي عمرو محمد بن عبد العزيز بن أبي رِزْمة، عن النضر بن شُميل، عن محمد بن عمرو، به.وأخرجه ابن سعد في "طبقاته الكبرى" 3/ 528 عن يزيد بن هارون، وهشام بن عمار في "حديثه" (106) عن سعيد بن يحيى اللَّخْمي، كلاهما عن محمد بن عمرو بن علقمة، عن أبي سلمة، مرسلًا.وسيأتي عند المصنّف برقم (7480) من طريق سعيد بن محمد الوراق، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة موصولًا.ويشهد له حديث كعب بن مالك عند يعقوب بن سفيان في "تاريخه" كما في "الإصابة" لابن حجر 1/ 294، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (5538)، والطبراني في "الكبير" 19/ (163)، وأبي الشيخ في "أمثال الحديث" (95)، وابن مَنْدَه في "معرفة الصحابة" 1/ 220 - 221، وأبي نعيم في "معرفة الصحابة" (1170)، والخطيب في "البخلاء" (32)، وابن حجر في "تغليق التعليق" 3/ 347، وقد صحَّح إسناده ابن حجرٍ في "تغليق التعليق"، لكنه قال بعد ذلك في "فتح الباري": رجال إسناده ثقات إلّا أنه اختُلف في وصله وإرساله على الزُهري.قلنا: هو كذلك، فقد رواه غير واحدٍ عن الزهري عن ابن كعب بن مالك مرسلًا، كذلك أخرجه معمر بن راشد في "جامعه" (20705)، وابن سعد 3/ 528، والخرائطي في "مكارم الأخلاق" (593) و (647)، وفي "مساوئ الأخلاق" له أيضًا (366)، والطبراني في "الكبير" 19/ (164)، والخطيب في "البخلاء" (35) من طُرُق، عن ابن شهاب، عن ابن كعب بن مالك.بعضهم يقول: عبد الرحمن بن كعب بن مالك، وبعضهم يقول: عبد الرحمن بن عبد الله بن كعب بن مالك، وكلاهما تابعيّ يروي عنه الزهري والثاني ابن أخي الأول، وكلاهما يروي عن كعب بن مالك، ولكن الأشبه إرساله.ويشهد له أيضًا حديث جابر بن عبد الله عند أبي نعيم في "معرفة الصحابة" (1171)، والخطيب في "البخلاء" (36) من طريق عبد الملك بن جابر بن عتيك، عن جابر، وإسناده لا بأس به. لكن خالف ابنَ عَتيك فيه أبو الزبير محمد بن مسلم المكي عند البخاري في "الأدب المفرد" (296) وغيره، فرواه عن جابر بن عبد الله، فذكر عمرَو بن الجَمُوح بدلٌ بشر بن البراء بن مَعْرور، وإسناده عن أبي الزبير صحيح، وصرَّح بسماعه من جابر.وكذلك رواه بذكر عمرو بن الجَمُوح: عمرو بن دينار وحبيب بن أبي ثابت ومحمد بن المنكدر جميعهم رووه مرسلًا عند ابن سعد 4/ 376، ووصلَ بعضُهم رواية عمرو بن دينار بذكر جابر، كذلك أخرجه محمد بن مخلد في "المنتقى من حديثه" (157)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (10359)، والخطيبُ في "البخلاء" (24) و (26) وفي "تاريخ بغداد" 5/ 354.وبعضهم وصل رواية عمرو بن دينار بذكر أبي سلمة عن أبي هريرة - يعني كإسناد المصنّف - كذلك رواه إبراهيم بن يزيد الخُوزي عن عمرو عند الطبراني في "الأوسط" (3650)، وأبي بكر الإسماعيلي في "معجم شيوخه" (278)، وأبي الشيخ في "الأمثال" (90)، والبيهقي في "الشعب" (10358)، والخطيب في "البخلاء" (28)، لكن إبراهيم بن يزيد الخوزي هذا متروك الحديث.على أنَّ المحفوظ في رواية أبي سلمة ذكر بشر بن البراء بن معرور كما تقدم.ولهذ قال الدارقطني في "العلل" (1399) عن رواية عمرو بن دينار: المرسل أشبه.وقد رجَّح ابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 84، وابن الأثير في "أسد الغابة" 1/ 218 قول من ذكر بشر بن البراء بن معرور، على قول من ذكر عمرو بن الجَمُوح. لكن قال ابن حجر في "الفتح" 8/ 158: يمكن الجمع بأن تُحمل قصة بشر على أنها كانت بعد قتل عمرو بن الجَمُوح جمعًا بين الحديثين!









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5032)


5032 - أخبرنا أحمد بن جعفر، حَدَّثَنَا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حَدَّثَنَا إبراهيم بن خالد، حَدَّثَنَا رَبَاح، عن مَعمَر، عن الزُّهري، عن عبد الرحمن بن عبد الله بن كعب بن مالك، عن أبيه، عن أم مُبشِّر، قالت: دخلتُ على رسول الله صلى الله عليه وسلم في وَجَعِه الذي قُبِضَ فيه، فقلت: بأبي أنت يا رسول الله، ما تَتَّهم بنفسِك؟ فإني لا أتَّهِم بابني إلَّا الطعامَ الذي أكلَه معك بخَيبَر، وكان ابنُها بشرُ بنُ البراء بن مَعْرُور مات قبل النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "وأنا لا أتَّهِمُ غيرَها، هذا أوانُ انقطاعِ أبْهَرِي" [1]. صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




উম্মু মুবাশশির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যে অসুস্থতায় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তেকাল করেন, আমি সেই অসুস্থতার সময় তাঁর নিকট প্রবেশ করলাম। আমি বললাম: আমার পিতামাতা আপনার জন্য উৎসর্গ হোন, হে আল্লাহর রাসূল! আপনি নিজের অসুস্থতার কারণ কী বলে সন্দেহ করছেন? আমি তো আমার পুত্রের মৃত্যুর কারণ হিসাবে সেই খাবার ছাড়া অন্য কিছুকে সন্দেহ করি না, যা সে আপনার সাথে খায়বারের দিন খেয়েছিল। (স্মর্তব্য, তাঁর পুত্র বিশর ইবনু বারা ইবনু মা'রূর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পূর্বে ইন্তিকাল করেছিলেন।) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমিও তা ছাড়া অন্য কিছুকে সন্দেহ করি না। এই মুহূর্তে আমার শাহরগ (মহা-ধমনী) ছিন্ন হওয়ার সময় উপস্থিত হয়েছে।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات، لكن اختُلف فيه على معمر - وهو ابن راشد - كما تقدَّم بيانه برقم (4441). وذكر عبد الرزاق فيما نقله عنه أبو داود بإثر (4513) أنَّ معمرًا كان يحدثهم بالحديث مرةً مرسلًا، فيكتُبُونه، ويحدثهم مرّةً به فيُسنده فيكتبونه، وكل صحيح عندنا، قال عبد الرزاق: فلما قدم ابن المبارك على معمر أسند له أحاديث كان يُوقفها.وقد اختُلف فيه كذلك على الزُّهري كما مضى بيانه، وأنَّ الخبر كان معروفًا في آل كعب بن مالك، فلا يبعد تعدد روايات الزهري بوصفه كان واسعَ الرواية.وهو في "مسند أحمد" 39/ (23933)، وعنه أخرجه أبو داود (4514) غير أنه وقع في رواية "المسند": عن عبد الرحمن بن عبد الله بن كعب بن مالك، عن أمِّه: أن أم مبشّر دخلت .... الحديث. وكذلك جاء في "سنن أبي داود" غير أنه سقط حرف "أن" من روايته فصار: عن أمِّه أم مبشِّر. فقال أبو سعيد بن الأعرابي - وهو أحدُ رواة "السنن" عن أبي داود -: كذا قال: عن أمّه، والصواب: عن أبيه عن أم مبشِّر.وأخرجه أبو داود (4513) من طريق عبد الرزاق، عن معمر، عن الزهري، عن ابن كعب بن مالك، عن أبيه: أنَّ أم مبشِّر قالت … الحديث.وقد تقدَّم برقم (4441) من طريق يونس بن يزيد، عن الزهري، عن عروة، عن عائشة مختصرًا بالمرفوع مخاطبًا فيه النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم عائشة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5033)


5033 - حَدَّثَنَا محمد بن صالح بن هانئ، حَدَّثَنَا السَّرِيّ بن خُزيمة، حَدَّثَنَا عبد العزيز بن داود الحَرّاني، حَدَّثَنَا حماد سَلَمة بن عن محمد بن عمرو الليثي، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة: أنَّ امرأةً يهوديةً دَعَتِ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم وأصحابًا له على شاةٍ مَصْليّة، فلما قَعَدوا يأكُلُون أخذَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم لُقمةٌ فوضَعَها، ثم قال لهم: "أمسِكُوا، إِنَّ هذه الشاةَ مَسمُومةٌ" فقال لليهودية: "ويلَكِ، لأيِّ شيءٍ سَمَمْتِني؟! " قالت: أردتُ أن أَعلمَ إن كنتَ نبيًّا، فإنه لا يَضرُّك، وإن كان غيرَ ذلك أن أُريحَ الناسَ مِنك، فأكَلَ منها بِشرُ بن البَراء فمات، فقتَلَها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه. ‌‌ذكرُ مناقب أبي مَرْثَد كَنّاز بن الحُصَين الغَنَوي [2]وقيل: كَنّاز بن حِصْن [3] بن يَربُوع، كان رسول الله صلى الله عليه وسلم آخَى بينه وبين عُبادة بن الصامِت، شَهِدَ بدرًا وأُحدًا والخندق، وهو أبو مَرثَدِ بن أَبي مَرثَدٍ، أَمَّره [4] رسول الله صلى الله عليه وسلم على السَرِيّة التي وجَّهها إلى الرَّجِيع فقُتِل بها.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ইয়াহুদি মহিলা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তাঁর কয়েকজন সাহাবীকে একটি ভুনা বকরির গোশত খাওয়ার দাওয়াত দিল। যখন তারা খেতে বসলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি লোকমা নিলেন এবং সেটি রাখলেন (খেলেন না)। অতঃপর তিনি তাদের বললেন: "তোমরা থেমে যাও, নিশ্চয় এই বকরির মাংস বিষাক্ত।" এরপর তিনি ইয়াহুদি মহিলাকে বললেন: "তোমার সর্বনাশ হোক! কেন তুমি আমাকে বিষ দিলে?" সে বলল: আমি জানতে চেয়েছিলাম যে আপনি কি সত্যিই নবী কি না। যদি আপনি নবী হন, তবে এই বিষ আপনার কোনো ক্ষতি করবে না। আর যদি আপনি নবী না হন, তবে আমি মানুষকে আপনার থেকে মুক্তি দেব। অতঃপর বিশর ইবনুল বারাআ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এই মাংস খেলেন এবং মারা গেলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে (ঐ মহিলাকে) হত্যা করার নির্দেশ দিলেন।

(হাদীসটি সহীহ মুসলিমের শর্ত অনুযায়ী সহীহ, কিন্তু বুখারী ও মুসলিম এটি উদ্ধৃত করেননি।)

আবূ মারসাদ কান্নায ইবনুল হুসায়ন আল-গানাবী-এর ফজিলতসমূহ বর্ণনা: এবং বলা হয়ে থাকে: কান্নায ইবন হিসন ইবন ইয়ারবু'। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর ও উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মধ্যে ভ্রাতৃত্ব স্থাপন করেছিলেন। তিনি বদর, উহুদ ও খন্দকের যুদ্ধে উপস্থিত ছিলেন। তিনিই আবূ মারসাদ ইবনু আবী মারসাদ। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে আর-রাজী'-এর দিকে প্রেরিত সেনাদলের প্রধান নিযুক্ত করেছিলেন, যেখানে তিনি শহীদ হন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله لا بأس بهم، لكنه اختُلف في وصلِه وإرسالِه عن محمد بن عَمرو اللَّيثي - وهو ابن علقمة - فقد رواه عنه حماد بن سلمة وعبّاد بن العوام موصولًا بذكر أبي هريرة، ورواه عنه خالد بن عبد الله الطحّان وجعفر بن عون، فأرسله لم يذكر فيه أبا هريرة.وقد روي هذا الخبر عن أبي هريرة من وجه آخر صحيح، لكن ليس فيه ذكر قتله صلى الله عليه وسلم مَن سمَّه، بل قد روي من طريق سفيان بن حُسين، عن الزهري، عن أبي سلمة وسعيد بن المسيب عن أبي هريرة: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم لم يعرض لليهودية. يعني لم يقتلها، لكن سفيان بن حسين على ثقته تُضعَّف روايتُه عن الزهري خاصةً.وأخرجه ابن حزم في "المحلى" 11/ 27، والبيهقي في "الكبرى" 8/ 46 من طريق عباد بن العوام، عن محمد بن عمرو، به. مختصرًا: أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قتلها، يعني التي سمّتْه.وأخرجه أبو داود بطوله (4511) و (4512/ 2) من طريق خالد بن عبد الله الطحان، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، مرسلًا.وقد روى هذا الخبر القاضي عياض في "الشفا" 1/ 316 من طريق أحمد بن سعيد بن حزم، عن أبي سعيد بن الأعرابي، عن أبي داود، فوصله بذكر أبي هريرة وابن الأعرابي هذا أحدُ رواة "السنن" عن أبي داود، لكنَّ وصلَه من طريقه غريب جدًّا، فإنَّ هذا الخبر لم يروه عن أبي داود أصلًا غير ابن الأعرابي كما في هامش نسخة (هـ) التي عندنا من "سنن أبي داود" حيث أثبتنا الحديث من هامشها، وأشار الناسخ إلى أنه في رواية أحمد بن سعيد بن حزم عن ابن الأعرابي، ووقع فيه قوله: عن أبي سلمة ولم يذكر أبا هريرة؛ كذلك نصَّ على عدم ذكر أبي هريرة فيه، فلعله سقط من أصل القاضي عياض عبارة: "لم يذكر" فصار الحديث موصولًا، والله أعلم.ومما يؤيده أنَّ غير أحمد بن سعيد بن حزم قد رواه عن ابن الأعرابي مرسلًا، كما أخرجه ابن بشكوال في "غوامض الأسماء المبهمة" ص 162 من طريق أحمد بن عون الله عن أبي سعيد بن الأعرابي، عن أبي داود، به، فقال: عن أبي سلمة، ولم يذكر أبا هريرة، فوافق ما نقلناه من هامش (هـ) لـ "سنن أبي داود"، والله أعلم.وقد تابع خالدًا الواسطيَّ على إرساله جعفر بن عون عند الدارمي (68).وأرسله سعيد بن محمد الثقفي مرة كما وقع عند ابن سعد 1/ 145، ووصله مرة أخرى كما وقع عند الطبراني (1202)، وسعيد بن محمد هذا ضعيف الحديث.وأخرجه أبو داود (4509) من طريق سفيان بن حُسين، عن الزهري، عن سعيد وأبي سلمة، عن أبي هريرة: أنَّ امرأة من اليهود أهدت إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم شاةً مسمومة، قال: فما عَرَض لها النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم. كذا قال! ولكن سفيان بن حسين هذا ضعيف الحديث في الزهري خاصةً، وإن كان ثقةً في غيره.وأخرجه أحمد 15/ (9827)، والبخاري (3169) و (4249) و (5777)، والنسائي (11291) من طريق سعيد المقبري، عن أبي هريرة، قال: لما فُتحت خيبر أُهديتْ لرسول الله صلى الله عليه وسلم شاة فيها سُمٌّ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "اجمعوا لي من كان هاهنا من اليهود" فجُمعوا له، فقال لهم رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "إني سائلكم عن شيءٍ فهل أنتم صادقيَّ عنه؟ قالوا: نعم يا أبا القاسم، فقال لهم رسول الله صلى الله عليه وسلم: "هل جعلتم في هذه الشاة سمًّا" فقالوا: نعم، فقال: "ما حملكم على ذلك؟ " فقالوا: أردنا إن كنت كذابًا نستريح منك، وإن كنت نبيًّا لم يَضرَّك.وفي الباب عن أنس بن مالك عند أحمد 21/ (13285)، والبخاري (2617)، ومسلم (2190)، وأبي داود (4508)، غير أنه قال في حديثه: فقيل: ألا نقتُلُها؟ قال: "لا".وعن جابر بن عبد الله عند أبي داود (4510)، وفيه: فعفا عنها رسول الله صلى الله عليه وسلم ولم يعاقبها. ورجاله ثقات لكنه منقطع.وعن ابن عباس عند أحمد 5/ (2784) و (3547). وإسناده صحيح. لكن ليس فيه أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم عاقبها أو عفا عنها.وسيأتي عند المصنّف برقم (7267) عن أبي سعيد الخُدري، وليس فيه كذلك عقوبتها والعفو عنها.وعن عبد الرحمن بن كعب بن مالك مرسلًا عند معمر في "جامعه" (19814)، وعبد الرزاق في "مصنفه" (10019)، والبيهقي في "الدلائل" 4/ 260، وسكت أيضًا عن مصير المرأة اليهودية، أعُفي عنها أم قُتِلت. لكن قال الزهري - وهو راويه عن ابن كعب -: فأسلمت فتركها النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم.وقال معمر: وأما الناس فيقولون: قتلها النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم.وقال البيهقي في "الدلائل" 4/ 262: يحتمل أنه لم يقتلها في الابتداء، ثم لما مات بشر بن البراء أمر بقتلها. ونحوه قال عياض في "الإكمال" 7/ 93 - 94 والسُّهيلي كما في "الروض الأُنف" له.وقال ابن ناصر الدين في "جامع الآثار" 6/ 390: الرواية مصرِّحة بما ظنه البيهقي في حديث ابن سعد الذي رواه عن الواقدي عن رجاله. قلنا: أخرجه ابن سعد 2/ 180، وفيه: أنه لما مات بشر بن البراء دفعها رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى ولاة بشر بن البراء، فقتلوها. قال الواقدي: وهو الثبت، ووافقه كاتبه وابن سعدٍ لما ساق قصة غزوة خيبر 2/ 102، فقال: وهو الثبت عندنا.



[2] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: العَدَوي. وإنما هو الغَنَوي، نسبة لغنيّ بن أعصر من قيس عَيلان.



5033 [3] - وقع في نسخنا الخطية: حُصين، مصغرًا، وقوله قبل ذلك: وقيل، يقتضي مغايرة ما قبلها لما بعدها. وهما روايتان في اسم والد أبي مرثد.



5033 [4] - يعني مرتدًا لا أبا مرثد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5034)


5034 - أخبرنا بجميع ما ذكرته أبو عبد الله الأصبهاني، حَدَّثَنَا الحسن بن الجَهْم، حَدَّثَنَا الحُسين بن الفَرَج، حَدَّثَنَا محمد بن عُمر، عن شُيوخه [1].




৫ ০৩৪ – আবূ আব্দুল্লাহ আল-ইসফাহানী আমাদের তা সমস্ত জানিয়েছেন, যা আমি উল্লেখ করেছি। হাসান ইবনু জাহম আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন। হুসাইন ইবনুল ফারাজ আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন। মুহাম্মাদ ইবনু উমার আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন, তাঁর শাইখদের (শিক্ষকদের) সূত্রে।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وكذلك قال ابن إسحاق في شأن المؤاخاة بين أبي مرثد وبين عبادة بن الصامت فيما حكاه ابن سعد في "طبقاته" 3/ 45. وعلى ذلك اتفق أهل السير بعدهم.وأما شهوده بدرًا فسيأتي عن عروة بن الزبير أيضًا برقم (5037)، وتقدَّم برقم (4935).وذكره ابن إسحاق أيضًا فيمن شهد بدرًا، كما في "سيرة ابن هشام" 1/ 678.وكذلك الزهريُّ كما في "الآحاد والمثاني" لابن أبي عاصم (345)، والبغوي في "معجم الصحابة" بين يدي الحديث (2025).وأما تأمير مرثد بن أبي مرثد على السّرية يوم الرّجيع فذكره أيضًا ابن إسحاق عن عاصم بن عُمر بن قتادة كما في "سيرة ابن هشام" 2/ 168 - 170.لكن خالفهما أبو هريرة عند البخاري (4086) إذ ذكر أنَّ أميرهم كان إذ ذاك عاصمَ بن ثابت.وهو ما رجَّحه السُّهيليُّ كما نقله عنه ابن كثير في "الفصول في السيرة" ص 153، ورجّحه أيضًا ابن حجر في "الفتح" 12/ 213.بينما حكى الواقديُّ في "مغازيه" 1/ 355، وابنُ سعد في "طبقاته" 2/ 51، القولين جميعًا من غير ترجيح. ابن رُسته: هو محمد بن عبد الله بن رُسْته الضّبي، وسليمان بن داود: هو الشاذكوني.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5035)


5035 - حَدَّثَنَا أبو عبد الله الأصبَهاني، حَدَّثَنَا ابن رُستَهْ، حَدَّثَنَا سليمان بن داود، حَدَّثَنَا محمد بن عُمر، قال: مات أبو مَرثَدٍ الغَنَوِي كَنّاز بن الحُصَين حليفُ حمزةَ بن عبد المطّلب [1] بالمدينة في خلافة أبي بكر الصِّدّيق سنة اثنتَي عشرةَ [2]. وقال غيرُه: بل قُتل بأجنادِينَ [3].




মুহাম্মদ ইবন উমার থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আবু মারসাদ আল-গানাবী, কান্নায ইবনুল হুসাইন, যিনি হামযা ইবন আবদুল মুত্তালিবের মৈত্রী চুক্তিবদ্ধ ছিলেন, তিনি আবূ বকর আস-সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফতকালে দ্বাদশ হিজরী সনে মদীনায় ইন্তিকাল করেন। অন্যেরা বলেন: বরং তিনি আজনাদাইনে নিহত হন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] زاد في نسخنا الخطية بعده: وكان مرتد مات وهي عبارة مقحمة، وإيرادها يدلُّ على أن الذي مات بالمدينة في خلافة أبي بكر هو مرثد لا أبوه، وهذا خطأ، لأنَّ الواقدي ذكر هذا في ترجمة أبي مرثد الغَنَوي نفسه، وكان يرى أنَّ ابنه مرثدًا إنما قُتل يوم الرجيع في عهد النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم كما في مقالتِه التي تقدَّمت عند المصنِّف، فالعبارة مُقحمة بلا شكٍّ. ابن رُسته: هو محمد بن عبد الله بن رُسْته الضّبي، وسليمان بن داود: هو الشاذكوني.



[2] ورواه عن محمد بن عمر - وهو الواقدي - أيضًا كاتبُه محمد بن سعد في "طبقاته الكبرى" 3/ 47، وزاد فيه الواقديّ قوله: وهو يومئذٍ ابن ست وستين سنة. وقد وافق الواقديّ عليه مصعبُ بن عبد الله الزبيري وإبراهيمُ الحِزامي كما سيأتي عند المصنّف برقم (5036) و (5038). ابن رُسته: هو محمد بن عبد الله بن رُسْته الضّبي، وسليمان بن داود: هو الشاذكوني.



5035 [3] - قال ذلك ابن حبان في "مشاهير علماء الأمصار" و "الثقات". وفي المطبوع: جلان، بالجيم المعجمة بدل الحاء المهملة. وقد ذكر أبو ذرٍّ الخُشَني في شرحه لسيرة ابن هشام ص 172 أنَّ هذا الاسم روي بالجيم وبالحاء المهملة، ثم قال: وصوابه بالجيم. كذا صوَّب رواية الجيم، وقد جاء هذا الاسم في "تحفة الأشراف" للمزي مضبوطًا بالحاء المهملة المضمومة، وضبطه القلْقشندي في "نهاية الأرب" ص 240 بالحروف، فقال: بضم الحاء وتشديد اللَّام. وفي "معجم الطبراني الكبير" 19/ (431) بإسناده إلى ابن إسحاق: أبو مرثد كناز بن حُصين .... بن جلان، ويقال حلان هكذا ذكر القولين أيضًا، ولا نظن هذا من قول ابن إسحاق، فإنَّ ابن هشام في "سيرته" 1/ 678 ذكر وجهًا واحدًا عن ابن إسحاق، وأكثر نسخه أنه بالجيم، وفي نسخةٍ منه بالحاء المهملة كما نبَّه عليه مُحقِّقوه.وضبطه مجد الدين بن الأثير في قسم التراجم من "جامع الأصول" ص 814، بالجيم المكسورة وتشديد اللَّام، وكذلك ضبطه أخوه عز الدين بن الأثير في "أسد الغابة" في ترجمة أنس بن أبي مرثد بالجيم واللام المشددة. وكذلك ضبطه ابن ناصر الدين الدمشقي في "التوضيح" في حرف الجيم بالجيم المكسورة، ولم يذكر ابن دريد في "الاشتقاق" ص 323 غير جِلّان بالجيم المكسورة، قال: وهو فِعلان من قولهم: جَلَلَتُ الشيء: أخذتُ جُلَّه. فالله تعالى أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5036)


5036 - أخبرنا أبو الحسين بن يعقوب الحافظ، أخبرنا محمد بن إسحاق الثَّقفي، أخبرني أبو يونس المَديني، حَدَّثَنَا إبراهيم بن المُنذر، قال: مات أبو مرثد الغَنَوي كَنّازُ بنُ الحُصين حليف حمزة بن عبد المطلب، ودفن بالمدينة في خلافة أبي بكر الصِّدِّيق في سنة ثنتَي عشرةَ [1].




ইবরাহীম ইবনুল মুনযির থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আবু মারসাদ আল-গানাবী, কান্নায ইবনুল হুসাইন, যিনি হামযা ইবনু আবদুল মুত্তালিবের চুক্তিবদ্ধ মিত্র ছিলেন, তিনি ইন্তিকাল করেন। তাঁকে আবূ বকর সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফতকালে দ্বাদশ হিজরীতে (১২ হিজরী) মদীনায় দাফন করা হয়।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وافق إبراهيمُ بنُ المنذر في ذلك قولَ محمد بن عُمر الواقديّ الذي تقدَّم قبله، وقولَ مصعبِ بن عبد الله الزُّبيري الآتي برقم (5038). أبو يونس المديني: هو محمد بن أحمد بن يزيد بن عبد الله، مفتي أهل المدينة. وفي المطبوع: جلان، بالجيم المعجمة بدل الحاء المهملة. وقد ذكر أبو ذرٍّ الخُشَني في شرحه لسيرة ابن هشام ص 172 أنَّ هذا الاسم روي بالجيم وبالحاء المهملة، ثم قال: وصوابه بالجيم. كذا صوَّب رواية الجيم، وقد جاء هذا الاسم في "تحفة الأشراف" للمزي مضبوطًا بالحاء المهملة المضمومة، وضبطه القلْقشندي في "نهاية الأرب" ص 240 بالحروف، فقال: بضم الحاء وتشديد اللَّام. وفي "معجم الطبراني الكبير" 19/ (431) بإسناده إلى ابن إسحاق: أبو مرثد كناز بن حُصين .... بن جلان، ويقال حلان هكذا ذكر القولين أيضًا، ولا نظن هذا من قول ابن إسحاق، فإنَّ ابن هشام في "سيرته" 1/ 678 ذكر وجهًا واحدًا عن ابن إسحاق، وأكثر نسخه أنه بالجيم، وفي نسخةٍ منه بالحاء المهملة كما نبَّه عليه مُحقِّقوه.وضبطه مجد الدين بن الأثير في قسم التراجم من "جامع الأصول" ص 814، بالجيم المكسورة وتشديد اللَّام، وكذلك ضبطه أخوه عز الدين بن الأثير في "أسد الغابة" في ترجمة أنس بن أبي مرثد بالجيم واللام المشددة. وكذلك ضبطه ابن ناصر الدين الدمشقي في "التوضيح" في حرف الجيم بالجيم المكسورة، ولم يذكر ابن دريد في "الاشتقاق" ص 323 غير جِلّان بالجيم المكسورة، قال: وهو فِعلان من قولهم: جَلَلَتُ الشيء: أخذتُ جُلَّه. فالله تعالى أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5037)


5037 - أخبرنا [1] أبو جعفر البَغدادي، حَدَّثَنَا أبو عُلَاثة، حَدَّثَنَا أبي، حَدَّثَنَا ابن لَهِيعة، عن أبي الأسود، عن عُرْوة، في تسمية مَن شهد بدرًا [مع] [2] رسول الله صلى الله عليه وسلم: أبو مَرثَدٍ الغَنَوي حليفُ حمزةَ بن عبد المطلب.




উরওয়াহ থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে যারা বদরের যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছিলেন, তাদের নাম উল্লেখ প্রসঙ্গে (তিনি বলেন): আবূ মারছাদ আল-গানাবী, যিনি হামযা ইবনু আবদিল মুত্তালিব-এর চুক্তিবদ্ধ মিত্র (হা'লীফ)।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] جاء قبل هذه الرواية في نسخنا الخطية عنوان الترجمة الذي أثبتناه بين يدي الحديث (5046) نفسُه في ذكر مرثد بن أبي مرثد، وليس محلُّه هنا قطعًا، لأنَّ الروايات الواردة بعده هنا متعلِّقةٌ بأبي مرثد لا بابنه مرثد، فلزم حذُفه من هنا، وإثباتُه في موضعه اللائق به هناك. وفي المطبوع: جلان، بالجيم المعجمة بدل الحاء المهملة. وقد ذكر أبو ذرٍّ الخُشَني في شرحه لسيرة ابن هشام ص 172 أنَّ هذا الاسم روي بالجيم وبالحاء المهملة، ثم قال: وصوابه بالجيم. كذا صوَّب رواية الجيم، وقد جاء هذا الاسم في "تحفة الأشراف" للمزي مضبوطًا بالحاء المهملة المضمومة، وضبطه القلْقشندي في "نهاية الأرب" ص 240 بالحروف، فقال: بضم الحاء وتشديد اللَّام. وفي "معجم الطبراني الكبير" 19/ (431) بإسناده إلى ابن إسحاق: أبو مرثد كناز بن حُصين .... بن جلان، ويقال حلان هكذا ذكر القولين أيضًا، ولا نظن هذا من قول ابن إسحاق، فإنَّ ابن هشام في "سيرته" 1/ 678 ذكر وجهًا واحدًا عن ابن إسحاق، وأكثر نسخه أنه بالجيم، وفي نسخةٍ منه بالحاء المهملة كما نبَّه عليه مُحقِّقوه.وضبطه مجد الدين بن الأثير في قسم التراجم من "جامع الأصول" ص 814، بالجيم المكسورة وتشديد اللَّام، وكذلك ضبطه أخوه عز الدين بن الأثير في "أسد الغابة" في ترجمة أنس بن أبي مرثد بالجيم واللام المشددة. وكذلك ضبطه ابن ناصر الدين الدمشقي في "التوضيح" في حرف الجيم بالجيم المكسورة، ولم يذكر ابن دريد في "الاشتقاق" ص 323 غير جِلّان بالجيم المكسورة، قال: وهو فِعلان من قولهم: جَلَلَتُ الشيء: أخذتُ جُلَّه. فالله تعالى أعلم.



[2] لفظة "مع" من النسخة المحمودية كما في طبعة الميمان. وفي المطبوع: جلان، بالجيم المعجمة بدل الحاء المهملة. وقد ذكر أبو ذرٍّ الخُشَني في شرحه لسيرة ابن هشام ص 172 أنَّ هذا الاسم روي بالجيم وبالحاء المهملة، ثم قال: وصوابه بالجيم. كذا صوَّب رواية الجيم، وقد جاء هذا الاسم في "تحفة الأشراف" للمزي مضبوطًا بالحاء المهملة المضمومة، وضبطه القلْقشندي في "نهاية الأرب" ص 240 بالحروف، فقال: بضم الحاء وتشديد اللَّام. وفي "معجم الطبراني الكبير" 19/ (431) بإسناده إلى ابن إسحاق: أبو مرثد كناز بن حُصين .... بن جلان، ويقال حلان هكذا ذكر القولين أيضًا، ولا نظن هذا من قول ابن إسحاق، فإنَّ ابن هشام في "سيرته" 1/ 678 ذكر وجهًا واحدًا عن ابن إسحاق، وأكثر نسخه أنه بالجيم، وفي نسخةٍ منه بالحاء المهملة كما نبَّه عليه مُحقِّقوه.وضبطه مجد الدين بن الأثير في قسم التراجم من "جامع الأصول" ص 814، بالجيم المكسورة وتشديد اللَّام، وكذلك ضبطه أخوه عز الدين بن الأثير في "أسد الغابة" في ترجمة أنس بن أبي مرثد بالجيم واللام المشددة. وكذلك ضبطه ابن ناصر الدين الدمشقي في "التوضيح" في حرف الجيم بالجيم المكسورة، ولم يذكر ابن دريد في "الاشتقاق" ص 323 غير جِلّان بالجيم المكسورة، قال: وهو فِعلان من قولهم: جَلَلَتُ الشيء: أخذتُ جُلَّه. فالله تعالى أعلم.



5038 - Null









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5038)


5038 - أخبرني أبو بكر بن بالَوَيهِ، حَدَّثَنَا موسى بن هارون، سمعتُ مصعبَ بن عبد الله الزُّبَيري يقول: مات أبو مَرثَدٍ الغَنَوي في سنة اثنتي عشرة من الهجرة، وهو ابن ستٍّ وستين سنةً.




মুসআব ইবনু আবদুল্লাহ আয-যুবায়রী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আবূ মারছাদ আল-গানাবী হিজরতের দ্বাদশ বছরে ইন্তেকাল করেন, যখন তাঁর বয়স ছিল ছিষট্টি বছর।