আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
4999 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حَدَّثَنَا محمد بن غالب، حَدَّثَنَا علي بن عبد الله بن جعفر المَدِيني، حدثني أبي، حَدَّثَنَا العلاء بن عبد الرحمن، عن أبيه، عن أبي هُريرة قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "أُرِيتُ جعفرَ بنَ أبي طالب مَلَكًا يطيرُ مع الملائكةِ بجَناحَينِ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমাকে জাফর ইবনে আবী তালিবকে ফেরেশতা হিসেবে দেখানো হয়েছে, যিনি দু'টি ডানা নিয়ে ফেরেশতাদের সাথে উড়ছেন।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث حسن. وهذا إسنادٌ حسنٌ في المتابعات والشواهد من أجل عبد الله بن جعفر المديني، فإنه - وإن كان ضعيفًا - يُكتبُ حديثه كما قال أبو حاتم وابنُ عدي، قلنا: خصوصًا وأنَّ ابنه الإمام عليًا قد روى عنه هذا الحديث، وقد توبع، ثم إنَّ للحديث بنحوه طرقًا أخرى عن أبي هريرة ستأتي عند المصنّف برقم (5008)، ورجالها ثقات، لكنه اختُلف في وصلها وانقطاعها كما سيأتي بيانه في موضعه ولكن مع ذلك فباجتماع هذه الطرق يمكن تصحيح الحديث عن أبي هريرة إن شاء الله، مع ما له من شواهد.وأخرجه الترمذي (3763) عن علي بن حُجر، عن عبد الله بن جعفر، بهذا الإسناد.وقال الترمذي: هذا حديث غريب من حديث أبي هريرة لا نعرفه إلّا من حديث عبد الله بن جعفر، وقد ضعَّفه يحيى بن معين وغيره. وعبد الله بن جعفر هو والد علي بن المديني.قلنا: قد رواه غيرُ عبد الله بن جعفر، فقد أخرجه ابن حبان (7047) من طريق يحيى بن نصر بن حاجب، عن أبيه، عن العلاء، به. وإسناده حسن في المتابعات والشواهد من أجل يحيى بن نصر بن حاجب، فإنه مختلفٌ فيه، وأقل أحواله أنه يُكتَب حديثُه، وأبوه أعلى منه بقليل.ويشهد له حديث ابن عباس بالأرقام (4951) و (4997) و (5001)، وانظر حديث البراء بن عازب المتقدم برقم (4396).وقد صحَّ معناه من حديث عبد الله بن عُمر فيما تقدم عند المصنّف برقم (4400) أنه كان إذا حيّا عبد الله بن جعفر، قال: السلام عليك يا ابن ذي الجَناحين. وإسناده صحيح. برقم (4397)، ثم إنَّ للحديث طريقًا أخرى صحيحة عن عائشة كما سيأتي برقم (5017).
5000 - أخبرنا أبو محمد الحسن بن محمد بن يحيى العَلَوي ابن أخي طاهر، حَدَّثَنَا جَدّي، حَدَّثَنَا إبراهيم بن يحيى بن عَبّاد الشَّجَري، عن أبيه، عن محمد بن إسحاق، قال: حدثني عبد الرحمن بن القاسم، عن أبيه، عن عائشةَ زوجِ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، قالت: لما أتي نَعْيُ جعفرٍ عَرَفْنا في وجهِ رسول الله صلى الله عليه وسلم الحُزنَ [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন জা‘ফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর শাহাদাতের খবর এলো, তখন আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চেহারায় দুঃখের চিহ্ন দেখতে পেলাম।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لضعف الحسن بن محمد العَلَوي وإبراهيم بن يحيى وأبيه، لكنهم لم ينفردوا به، بل رُوي هذا الحديث من طرق عن محمد بن إسحاق، كما تقدَّم برقم (4397)، ثم إنَّ للحديث طريقًا أخرى صحيحة عن عائشة كما سيأتي برقم (5017).
5001 - حَدَّثَنَا أبو العباس محمد بن يعقوب، حَدَّثَنَا العباس بن محمد الدُّورِي، حَدَّثَنَا الحسن بن بِشر، حَدَّثَنَا سَعْدانُ بن الوليد بَيّاعُ السابَرِي، عن عطاء بن أبي رباح، عن ابن عباس قال: بينما رسولُ الله صلى الله عليه وسلم جالسٌ وأسماءُ بنتُ عُمَيسٍ قريبةٌ إذ رَدَّ السلامَ، ثم قال: "يا أسماءُ، هذا جعفرُ بن أبي طالبٍ مع جِبريلَ ومِيكائيلَ وإسرافيلَ، سلّموا علينا، فرُدِّي عليهمُ السلامَ، وقد أخبرني أنه لقيَ المشركين يومَ كذا وكذا - قبل مَمَرِّه على رسول الله صلى الله عليه وسلم بثلاثٍ أو أربعٍ - فقال: لقيتُ المشركين، فأُصِبتُ في جَسدي مِن مَقَادِيمي ثلاثًا وسبعين بين رَمْيةٍ وطَعْنةٍ وضَرْبةٍ، ثم أخذتُ اللواءَ بيدي اليُمنى فقُطعِت، ثم أخذتُ باليد اليُسرى فقُطِعت، فعوّضَني اللهُ من يَديَّ جَناحَين أطير بهما مع جبريل وميكائيل، أَنزِلُ من الجنة حيثُ شئتُ، وآكلُ من ثِمارها ما شئتُ"، فقالت أسماءُ: هنيئًا لجعفرٍ ما رَزَقَهُ الله من الخيرِ، ولكن أخافُ أن لا يُصدِّقَ الناسُ، فاصعَدِ المِنبرَ فَأَخبِرْ به، فصَعِدَ المِنبَر فحمِدَ الله وأثنى عليه، ثم قال: "يا أيُّها الناسُ، إنَّ جعفرًا مع جبريلَ وميكائيلَ له جَناحان عَوَّضَه اللهُ من يدَيه، سَلَّم عليَّ"، ثم أخبرهم كيف كان أمرُه حيثُ لقيَ المشركين، فاستبانَ للناسِ بعد اليومِ الذي أخبَرَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أن جعفرًا لَقِيَهم؛ فلذلك سُمّي الطّيَّارَ في الجنة [1].
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (ইবনু আব্বাস) বলেন, একদা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উপবিষ্ট ছিলেন এবং আসমা বিনত উমাইস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কাছেই ছিলেন। এমন সময় তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালামের উত্তর দিলেন এবং বললেন: “হে আসমা! এই যে জাফর ইবনু আবি তালিব, তিনি জিবরাঈল, মীকাঈল ও ইসরাফীল (আঃ)-এর সাথে আছেন। তারা আমাদের প্রতি সালাম প্রেরণ করেছেন। তুমি তাদের সালামের উত্তর দাও। তিনি আমাকে সংবাদ দিয়েছেন যে, তিনি অমুক অমুক দিন মুশরিকদের সাথে যুদ্ধ করেছিলেন—রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসার তিন অথবা চার দিন পূর্বে—তিনি বললেন: আমি মুশরিকদের মুখোমুখি হয়েছিলাম এবং আমার শরীরের সম্মুখভাগে তীর, বল্লম ও তলোয়ারের আঘাত মিলিয়ে তিয়াত্তরটি আঘাত লেগেছিল। এরপর আমি ডান হাত দিয়ে ঝাণ্ডা ধরেছিলাম, ফলে তা কেটে ফেলা হয়। তারপর আমি বাম হাত দিয়ে ধরেছিলাম, ফলে সেটিও কেটে ফেলা হয়। অতঃপর আল্লাহ তা‘আলা আমার উভয় হাতের বদলে দুটি ডানা দান করেছেন, যা দিয়ে আমি জিবরাঈল ও মিকাঈল (আঃ)-এর সাথে উড়ে বেড়াই, জান্নাতের যেখানে ইচ্ছা অবতরণ করি এবং তার ফলমূল থেকে যা ইচ্ছা আহার করি।” আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আল্লাহ তা‘আলা জাফরকে যে কল্যাণ দান করেছেন, তা তার জন্য শুভ হোক! কিন্তু আমার ভয় হয় যে, মানুষ হয়তো এটা বিশ্বাস করবে না। তাই আপনি মিম্বারে আরোহণ করে এ সংবাদ দিন। তখন তিনি মিম্বারে আরোহণ করলেন এবং আল্লাহর প্রশংসা ও স্তুতি জ্ঞাপন করলেন। এরপর বললেন: “হে লোক সকল! জাফর জিবরাঈল ও মিকাঈল (আঃ)-এর সাথে আছেন। আল্লাহ তার দুই হাতের পরিবর্তে তাকে দুটি ডানা দান করেছেন। সে আমাকে সালাম দিয়েছে।” এরপর তিনি তাদের কাছে বর্ণনা করলেন যে, জাফর যখন মুশরিকদের মুখোমুখি হয়েছিলেন, তখন তার কী হয়েছিল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যেদিন এ সংবাদ দিলেন, সেদিন থেকেই মানুষের কাছে প্রকাশ হয়ে গেল যে, জাফর মুশরিকদের সাথে যুদ্ধ করেছেন। এ কারণেই জান্নাতে তাকে 'আত-তাইয়্যার' (উড্ডয়নকারী) নামে অভিহিত করা হয়।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لجهالة سعدان بن الوليد، فلم نقف له على ترجمة.وأخرجه أبو جعفر بن البَخْتَري في "مصنفاته" (211)، والطبراني في "الأوسط" (6936)، وابن الفاخر في "موجبات الجنة" (409) و (410) من طريق سعدان بن الوليد، به.وسيأتي مرة أخرى عند المصنّف برقم (5011) من طريق محمد بن علي بن عفّان العامري عن الحسن بن بشر.وقد روي نحو هذه القصة بأخصر ممّا هاهنا من حديث عبد الله بن جعفر بن أبي طالب عند الواقدي في "مغازيه" 2/ 766 - 767، ومن طريقه أخرجه ابن سعد في "الطبقات" 6/ 462، والبيهقي في "دلائل النبوة" 4/ 371، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 27/ 257 عن محمد بن مسلم الزهري، عن يحيى بن أبي يعلى (ويقال في اسمه: يعلى بن أبي يحيى) قال: سمعت عبد الله بن جعفر. والواقدي فيه مقال.
5002 - حَدَّثَنَا علي بن حَمْشاذَ العَدْل، حَدَّثَنَا إسحاق بن إبراهيم بن سُنَين [1]، حَدَّثَنَا المنذر بن عمار بن حبيب بن حسان، حَدَّثَنَا مَعْمَر [2] بن زائدة الأسَدي الكوفي قائدُ الأعمش، عن الأعمش، عن أبي صالح عن ابن عباس، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "رأيتُ أني دخلتُ الجنةَ فرأيت لجعفرٍ درجةً فوق درجةِ زَيدٍ، فقلتُ: ما كنتُ أظنُّ أنَّ زيدًا بدونِ أَحدٍ، فقيل: يا محمدُ، تدري بِمَ رُفعَتْ درجةُ جعفرٍ؟ قال: قلت: لا، قال: لِقرابةِ ما بينَك وبينَه" [3].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি দেখলাম যে আমি জান্নাতে প্রবেশ করেছি এবং আমি জাফরের জন্য যায়িদের মর্যাদার উপরে একটি মর্যাদা দেখলাম। তখন আমি বললাম: আমি তো ভাবিনি যে যায়িদ কারও চেয়ে নিচে থাকবেন। অতঃপর বলা হলো: হে মুহাম্মাদ, আপনি কি জানেন, কী কারণে জাফরের মর্যাদা উঁচু করা হয়েছে? তিনি [নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)] বললেন: আমি বললাম, না। তখন বলা হলো: আপনার ও তার মধ্যে যে আত্মীয়তা রয়েছে তার কারণে।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في (ص) و (م) و (ع) إلى: سفين، بالفاء بدلٌ النون. وإنما هو بالنون، وهو الخُتَّلي.
[2] تحرّف في النسخ الخطية إلى: معن. وإنما هو معمر بن زائدة.
5002 [3] - إسناده ضعيف بمرَّة لضعف إسحاقَ بن إبراهيم بن سُنَين، ولضعف معمرِ بن زائدة أيضًا، فقد قال عنه العُقيلي في "الضعفاء الكبير" الترجمة (1796): لا يُتابع على حديثه، ولهذا ضعَّف الذهبيُّ في "تلخيصه" هذا الإسناد، وأنكر الحديث.وقد رُوي نحو هذا الحديث عن محمد بن عمر بن علي بن أبي طالب منقطعًا عند الواقدي في "مغازيه" 2/ 762، ومن طريقه أخرجه ابن سعد في "طبقاته" 4/ 35، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 19/ 369.
5003 - أخبرني أبو بكر محمد بن المُؤمَّل، حَدَّثَنَا الفضل بن محمد الشَّعراني، حَدَّثَنَا إبراهيم بن حمزة، حَدَّثَنَا عبد العزيز بن محمد، عن يزيد بن الهادِ، عن محمد بن نافع بن عُجَير، عن أبيه نافع، عن علي بن أبي طالب، في قصة بنتِ حمزةَ، قال: فقال جعفرٌ: أنا أحقُّ بها، إنَّ خالتَها عندي، فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "أما أنتَ يا جعفرُ، فأشبهتَ خَلْقي وخُلُقي، وأنت من شَجَرتي التي أنا منها"، قال: قد رضيتُ يا رسول الله بذلك، "وأما الجاريةُ فأقضي بها لجعفرٍ، فإنَّ خالتَها عنده، وإنما الخالةُ أمٌّ". فكان أبو هريرة يقول: ما أظلَّتِ الخَضْراءُ على وجهٍ أحبَّ إليَّ بعدَ رسول الله صلى الله عليه وسلم من جعفر بن أبي طالبٍ، لقولِ رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أشبهتَ خَلْقي وخُلُقي" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আলী ইবনে আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, হামযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কন্যা সংক্রান্ত ঘটনায় তিনি বলেন: তখন জাফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমি তার অধিক হকদার, কারণ তার খালা আমার কাছেই আছে। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: “হে জাফর! তুমি আমার দৈহিক আকৃতি ও চারিত্রিক বৈশিষ্ট্যের সাথে সাদৃশ্যপূর্ণ। আর তুমি আমার সেই বৃক্ষের অংশ যার থেকে আমি এসেছি।” তিনি (জাফর) বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি এতে সন্তুষ্ট। (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন,) “আর বালিকাটির ব্যাপারে আমি জাফরের অনুকূলে ফয়সালা দিচ্ছি। কেননা তার খালা তার কাছেই আছে। আর নিশ্চয়ই খালা মায়ের সমতুল্য।” আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলতেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর পরে জা’ফর ইবনু আবী ত্বলিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) অপেক্ষা প্রিয় মুখমণ্ডল সবুজ আকাশ আর কারো উপর ছায়া ফেলেনি। কারণ রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁকে বলেছিলেন: “তুমি আমার দৈহিক আকৃতি ও চারিত্রিক বৈশিষ্ট্যের সাথে সাদৃশ্যপূর্ণ।”
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح دون قول أبي هريرة بإثره، فلم يرد في هذه الطريق إلّا عند المصنِّف، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم ولكنه اختُلِف فيه على عبد العزيز بن محمد - وهو الدَّراوردي - فرواه عنه إبراهيم بن حمزة وجماعةٌ كما جاء في رواية المصنّف هنا، وخالفهم أبو عامر العَقَدي عبد الملك بن عمرو عند أبي داود (2278) وغيره، فرواه عن عبد العزيز الدراوردي، عن يزيد بن الهاد، عن محمد بن إبراهيم التيمي، عن نافع بن عجير، عن أبيه، عن علي. فجعله من رواية نافع بن عجير، عن أبيه عُجير وهو ابن عبد يزيد عن عليّ، وزاد في الإسناد محمد بن إبراهيم التيمي، وقد صحَّح البيهقي 8/ 6 رواية إبراهيم بن حمزة ومن تبعه عن الدراوردي، أي: من روايته عن ابن الهاد عن محمد بن نافع عن أبيه عن عليٍّ، لكن ذكر الحافظ ابن حجر في "النكت الظراف" (10240) احتمالًا أنه لعله كان في أصل رواية إبراهيم بن حمزة ومن تبعه: عن يزيد بن الهاد، عن محمد عن نافع، يعني بما يُوافق رواية أبي عامر العَقَدي. قلنا: يُعكِّر عليه أنَّ بكر بن مضر قد روى هذا الحديث عند الطحاوي في "شرح المشكل" (3082) عن ابن الهاد، عن محمد بن نافع بن عجير، عن عليّ، فجعله من رواية محمد بن نافع بن عجير، لكنه لم يذكر أباه في إسناده، بل جعله من رواية محمد بن نافع عن علي مباشرة.فكأنَّ هذا الذي حصل في إسناد الحديث من الاختلاف إنما هو من جهة ابن الهاد لا من جهة الدراوردي، ومما يقوّيه أنَّ ابن الهاد روى مثل هذا الحديث عند الطحاوي (3084) عن محمد بن إبراهيم التيمي، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، فكأنَّ ابنَ الهاد هو من كان يضطربُ فيه أحيانًا، وربما دخل له حديث أبي هريرة بحديث عليٍّ، فيذكر محمد بن إبراهيم التيمي في حديث عليٍّ، وإنما هو في حديث أبي هريرة، والله تعالى أعلم.وعلى أي حالٍ فللحديث طريق أُخرى صحيحة عن عليٍّ تقدمت برقم (4664) لكن ليس فيها قول أبي هريرة.وقد اختصر المصنّف هنا رواية محمد بن نافع بن عُجير، فاقتصر على ما قاله رسول الله صلى الله عليه وسلم لجعفرٍ وقضائه بابنةِ حمزة له، مع أنَّ أصل القصة مطول بذكر خلاف بين جعفرٍ وعليٍّ وزيد بن حارثة في ابنة حمزة.وقد أخرج منه قولَ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم لعليٍّ دون سائره: النسائيُّ (8404) من طريق ابن أبي عمر وأبي مروان محمد بن عثمان بن خالد، عن عبد العزيز الدراوردي، عن ابن الهاد، عن محمد ابن نافع ابن عُجير، عن أبيه، عن عليٍّ.وفي رواية محمد بن نافع بن عجير عن أبيه زيادات قليلة ليست في الرواية الأخرى التي تقدمت عند المصنّف برقم (4664)، وفي تلك الأخرى ما ليس هنا أيضًا.
5004 - أخبرني مُكرَم بن أحمد القاضي، حَدَّثَنَا أبو بكر بن أبي العَوّام الرِّيَاحي، حَدَّثَنَا سَعْد بن عبد الحميد، حَدَّثَنَا عبد الله بن زياد اليَمَامي، عن عِكْرمة بن عمار، عن إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة، عن أنس بن مالك، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: "نحن بنو عبد المُطَّلب سادةُ أهلِ الجنةِ، أنا وعليٌّ وجعفرٌ وحمزةُ والحسنُ والحسينُ والمَهديُّ" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমরা আব্দুল মুত্তালিবের বংশধরেরা জান্নাতবাসীদের সর্দার: আমি, আলী, জাফর, হামযাহ, হাসান, হুসাইন ও মাহদী।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] موضوع كما قال الذهبي في "التلخيص" وكذلك أنكره ابن كثير في "البداية والنهاية" 19/ 65، والحملُ فيه على عبد الله بن زياد اليمامي، فقد قال عنه البخاري في "تاريخه الكبير" 5/ 95: منكر الحديث.وأخرجه ابن ماجه (4087) عن هديّة بن عبد الوهاب، عن سعد بن عبد الحميد، بهذا الإسناد.وسمّى شيخ سعد فيه عليَّ بن زياد، وهو خطأ.وقد رُوي من وجه آخر عن أنس عند أبي نعيم في "معرفة الصحابة" (1825)، وفي "تاريخ أصبهان" 2/ 130، والخطيب البغدادي في "تاريخ بغداد" 11/ 92 - 93، وأبي طاهر السِّلَفي في "المشيخة البغدادية" (94)، وابن الجوزي في "العلل المتناهية" (350). لكن قال عنه الخطيب: هذا الحديث منكر جدًّا، وهو غير ثابت، وفي إسناده غير واحدٍ من المجهولين. وقال الذهبي في "الميزان" في ترجمة أحد رواته - وهو عبد الله بن الحسن بن إبراهيم الأنباري -: عن الأصمعي بخبر باطل في المهدي. يعني هذا الحديث.
5005 - أخبرني علي بن عبد الرحمن بن عيسى السَّبِيعيّ بالكوفة، حَدَّثَنَا الحُسين بن الحَكَم الحِبَري، حَدَّثَنَا الحسن بن الحسين العُرَني، حَدَّثَنَا أجْلَحُ بن عبد الله، عن الشَّعْبي، عن جابر، قال: لما قَدِمَ رسولُ الله مِن خَيْبَرَ قدم جعفرٌ من الحبشةِ تلقّاهُ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فقبَّل جَبْهتَه، ثم قال: "واللهِ ما أدري بأيِّهما أنا أفرَحُ: بفَتحِ خَيْبر، أم بِقُدُومِ جعفر؟ " [1]أرسلَه إسماعيلُ بن أبي خالد وزكريا بن أبي زائدة:
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, যখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খায়বার থেকে প্রত্যাবর্তন করলেন, তখন জা'ফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবিসিনিয়া থেকে এলেন। আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাথে সাক্ষাৎ করলেন এবং তাঁর কপালে চুম্বন করলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "আল্লাহর কসম, আমি জানি না কোনটির জন্য আমি বেশি আনন্দিত: খায়বার বিজয়ের জন্য, নাকি জা'ফরের আগমনের জন্য?"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف الحسن بن الحسين العُرَني، وقد تابعه أبو غسان النَّهْدي فيما تقدَم برقم (4295).وخالفهما عليُّ بن مسهر عند ابن أبي شيبة 8/ 621، وعنه أبو داود في "السنن" (5220) و"المراسيل" (491)، وعبدُ الله بن نمير عند ابن سعد 4/ 32، وسفيانُ الثوري عند ابن سعد أيضًا والبيهقي في "السنن" 7/ 101، فرواه ثلاثتهم عن أجلح عن الشعبي مرسلًا؛ ورواية ابن مسهر مختصرة بقصة استقبال جعفر وتقبيل ما بين عينيه.وخولف أجلحُ أيضًا في وصل الحديث بذكر جابر، خالفه من هو أوثقُ منه وأجلُّ كما في الطريق التالية، فرواه عن الشعبي مرسلًا، وهو الصواب كما قال الذهبي في "تلخيصه".وخالف مجالدُ بنُ سعيد عند البيهقي في "السنن" 7/ 101 و "شعب الإيمان" (8561)، فرواه عن عامر الشعبي، عن عبد الله بن جعفر بن أبي طالب مختصرًا، ومجالد ضعيف.وروي بتمامه من حديث عبد الله بن جعفر عند البزار (2249) من طريق محمد بن إسماعيل بن أبي فديك، عن عبد الرحمن بن أبي مليكة، عن إسماعيل بن عبد الله بن جعفر، عن أبيه.وعبد الرحمن بن أبي مليكة متفق على ضعفه منكر الحديث.لكن يشهد للحديث حديثُ أبي جحيفة عند الطبراني في "الكبير" (1470) و 22/ (244) وفي "الأوسط" (2003) وفي "الصغير" (30)، وإسناده حسن.ويشهد أيضًا لتلقّيه وتقبيل ما بين عينيه - يعني جبهته - دون قوله: "ما أدري بأيِّهما … " حديث عائشة عند ابن أبي الدنيا في "الإخوان" (123)، وأبي يعلى في "معجمه" (21) وغيرهما، وإسناده ضعيف.
5006 - فيما حدَّثَناه عليُّ بن عيسى الحِيري، حَدَّثَنَا إبراهيم بن أبي طالب، حَدَّثَنَا ابن أبي عُمر، حَدَّثَنَا سفيان، عن ابن أبي خالد وزكريا، عن الشَّعْبي، قال: قَدِمَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم من خيبرَ، فذكرَ الحديثَ [1].هذا حديثٌ صحيحٌ، إنما ظَهَر بمثل هذا الإسنادِ الصحيح مرسلًا، وقد وصله أجْلَحُ بن عبد الله.
শা'বী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খায়বার থেকে আগমন করলেন, অতঃপর হাদীসটি বর্ণনা করলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حسن لغيره كسابقه، وهذا إسناد رجاله ثقات لكنه مرسلٌ. سفيان: هو ابن عيينة، وابن أبي خالد: هو إسماعيل، وزكريا: هو ابن أبي زائدة.
5007 - أخبرنا عبد الرحمن بن حَمْدان الجَلّاب بهَمَذان، حَدَّثَنَا هلال بن العلاء الرَّقّي، حَدَّثَنَا عبد الله بن رجاء، حَدَّثَنَا المَسعُوديُّ، عن عَدِيّ بن ثابت، عن أبي بُردةَ، عن أبي موسى، قال: لقيَ عمرُ أسماءَ بنتَ عُمَيسٍ، فقال: أنتم نِعْمَ القومُ، لولا أنكم سُبِقتُم بالهجرة، فنحن أفضلُ منكم، [فقالت] [1]: كنتم [2] مع رسولِ الله صلى الله عليه وسلم يَحمِلُ راجِلَكُم، ويُعلّم جاهِلَكم، ففررنا بدِينِنا! فقالت: لستُ براجعةٍ حتَّى أدخُلَ على رسول الله صلى الله عليه وسلم، فدخلَتْ عليه، فقالت: يا رسولَ الله، إني لقيتُ عُمرَ، فقال: كذا وكذا، فقال: "بلى، لكم هِجْرتانِ: هِجْرتُكم إلى الحَبَشة، وهِجْرتُكم إلى المدينة" [3].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه!
আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আসমা বিনত উমাইস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে সাক্ষাৎ করলেন এবং বললেন: তোমরা কতোই না উত্তম সম্প্রদায়, যদি না তোমরা হিজরতের ক্ষেত্রে আমাদের চেয়ে পিছিয়ে থাকতে। অতএব, আমরা তোমাদের চেয়ে শ্রেষ্ঠ। আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তোমরা তো রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলে, তিনি তোমাদের পদাতিকদের বহন করতেন এবং তোমাদের অজ্ঞদের শিক্ষা দিতেন। আর আমরা আমাদের দ্বীন নিয়ে (হাবশার দিকে) পলায়ন করেছিলাম! তিনি (আসমা) বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে প্রবেশ না করা পর্যন্ত ফিরব না। এরপর তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে প্রবেশ করলেন এবং বললেন: ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমি উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে দেখা করেছি, আর তিনি এমন এমন কথা বলেছেন। তখন তিনি (নবী) বললেন: "অবশ্যই, তোমাদের জন্য দুটি হিজরত রয়েছে: তোমাদের হিজরত হাবশার দিকে এবং তোমাদের হিজরত মদীনার দিকে।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] لفظة "فقالت" سقطت من نسخنا الخطية، ولا بدَّ منها، لأنَّ ما بعدها من مقول أسماء بنت عميس، وليس من قول عمر، وأثبتناها من "تاريخ المدينة" لابن شبّة 2/ 497 حيث روى هذا الحديث عن عبد الله بن رجاء، وكذلك رواه غير واحدٍ عن المسعودي.
[2] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى كنا.
5007 [3] - حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل هلال بن العلاء الرَّقي، وهو متابع، وسماعُ عبد الله بن رجاء من المسعودي - واسمه عبد الرحمن بن عبد الله بن عُتبة - قبل اختلاطه، على أنَّ المسعوديَّ مُتابعٌ أيضًا. أبو بُردة: هو ابن أبي موسى الأشعري.وأخرجه أحمد 32/ (19524) عن وكيع بن الجراح، و (19694) عن أبي عبد الرحمن عبد الله بن يزيد المقرئ، كلاهما عن المسعودي، بهذا الإسناد.وأخرجه البخاري (4230) و (4231)، ومسلم (2503)، والنسائي (8330) من طريق أبي أسامة حماد بن أسامة، عن بُرَيد بن عبد بن عبد الله بن أبي بُردة، عن أبي بردة، عن أبي موسى، عن أسماء بنت عُميس. وفيه: أنَّ أسماء هي التي حدثت أبا موسى الأشعري به.وسيأتي عند المصنّف مختصرًا بذكر آخره المرفوع برقم (6551) من طريق يحيى بن بُريد بن عبد الله بن أبي بُردة، عن أبيه، عن أبي بردة، عن أبي موسى، عن أسماء.وأخرج هذا القدر منه ابن حبان (7194) من طريق طلحة بن يحيى، عن أبي بردة، عن أبي موسى. فجعله من مسند أبي موسى.
5008 - حَدَّثَنَا محمد بن صالح بن هانئ، حَدَّثَنَا الحُسين بن الفضل، حَدَّثَنَا سليمان ابن حَرْب، حَدَّثَنَا حماد بن سَلَمة، عن عبد الله بن المُختار، عن محمد بن سِيرِين، عن أبي هريرة، قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "مَرَّ بي جعفرٌ الليلةَ في ملأٍ من الملائكة، وهو مُخَضَّبُ الجَناحَين بالدَّمِ أبيضُ القَوادمِ [1] " [2].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আজ রাতে আমার পাশ দিয়ে জাফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ফেরেশতাদের এক জামাতের সঙ্গে অতিক্রম করেছেন, আর তাঁর দুই ডানা রক্তে রঞ্জিত ছিল, অথচ অগ্রভাগের পালকগুলো ছিল সাদা।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرّف في نسخنا الخطية إلى: الفؤاد، والمثبت على الصواب من مصادر التخريج التي خرّجت هذا الخبر عن حماد بن زيد عن عبد الله بن المختار. نفسه عند البخاري (3136) و (4230) ومسلم (2502).
[2] رجاله لا بأس بهم، إلَّا أنَّ حماد بن سلمة قد خولف في وصله، خالفه حماد بن زيد - وهو أضبط للرواية منه - عند ابن سعد في "الطبقات" 4/ 36، وابن أبي الدنيا في "الهواتف" (11)، فرواه عن عبد الله بن المختار عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم معضَلًا، ومع ذلك قوَّى ابن حجر إسنادَ رواية حماد بن سَلَمة في "فتح الباري" 11/ 149!وقد سلف نحوه عن أبي هريرة من وجهٍ آخر برقم (4999) ليس فيه ذكر خِضاب الجناحين بالدم، وهو المحفوظ. نفسه عند البخاري (3136) و (4230) ومسلم (2502).
5009 - حدثني علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، حَدَّثَنَا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حَدَّثَنَا أبو ثابت محمد بن عُبيد الله، حَدَّثَنَا عبد العزيز بن محمد، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، قال: ضربَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم لجعفرِ بن أبي طالب يومَ بدرٍ بسَهْمه وأجْرِه [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বদরের যুদ্ধের দিন জাফর ইবনু আবী তালিবের জন্য তাঁর অংশ (গণিমত) ও তাঁর পুরস্কার নির্ধারণ করে দিয়েছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] خبر منكر، وقد اختُلف فيه عن عبد العزيز بن محمد - وهو الدَّراوردي - فرواه عنه أبو ثابت محمد بن عبيد الله هنا عند المصنّف موصولًا، وخالفه يعقوب بن محمد الزهري عند الحارث بن أبي أسامة كما في "بغية الباحث" (684)، ومحمدُ بنُ عمر الواقدي في "مغازيه" 1/ 153، وهما من أئمة السير والمغازي، فرويا هذا الخبر عن عبد العزيز الدراوردي عن جعفر بن محمد - وهو الصادق - عن أبيه مرسلًا. فالظاهر أنَّ هذا هو الأشبه، يعني المرسَل، خصوصًا وأنَّ الواقدي ذكر أنَّ هذا الخبر لم يذكره أحدٌ من أصحابه الذين نقل عنهم خبرَ بدرٍ، يشير إلى أنه انفرد بنقله الدَّراورديُّ، والله تعالى أعلم.قلنا: والصحيح أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم إنما قَسَمَ لجعفر وأصحابه القادمين من الحبشة - ومعهم أبو موسى الأشعري وأصحابه الأشعريون - من فتح خيبر لما وافقوه حين افتتحها كما في حديث أبي موسى نفسه عند البخاري (3136) و (4230) ومسلم (2502).
5010 - أخبرنا علي بن عبد الرحمن السَّبيعي، حَدَّثَنَا الحُسين بن الحَكَم، حَدَّثَنَا إسماعيل بن أبان، حَدَّثَنَا أبو أُويس، عن عُبيد الله [1] بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر، قال: كُنَّا بمؤتةَ مع جعفرِ بن أبي طالب، فوَجَدْناه في القَتْلى، فوجدنا به بِضْعًا وسبعين [2].
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা মু'তা যুদ্ধে জা'ফর ইবনু আবী তালিবের সাথে ছিলাম। অতঃপর আমরা তাকে নিহতদের মধ্যে পেলাম। আমরা তার দেহে সত্তর-এর কিছু বেশি সংখ্যক (আঘাত/ক্ষত) পেলাম।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرّف في النسخ الخطية إلى: عَبد الله، مكبَّرًا، وإنما هو من رواية عُبيد الله، مصغَّرًا، كما رواه غير واحدٍ عن إسماعيل بن أبان، وكما رواه غير واحدٍ أيضًا عن أبي أُويس، وهما أخوان، لكن المحفوظ أن الرواية لعُبيد الله.
[2] خبر صحيح، رواه جماعة عن نافع، لكن لم يروه عن عُبيد الله بن عمر - وهو العُمري - غير أبي أويس - وهو عَبد الله بن عَبد الله بن أويس - وهو ضعيفٌ يُعتبر به، ولهذا قال أبو حاتم فيما نقله عنه ابنُه في "العلل" (995): حديث منكر من حديث عُبيد الله.وأخرجه أبو بكر بن أبي شيبة في "مصنفه" 4/ 521، وأبو عوانة في "مستخرجه" (7544)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (1438)، وفي "الحلية" 1/ 117 من طريق أبي إسحاق الأزدي إسماعيل بن أبان، عن أبي أويس، عن عُبيد الله بن عمر، به لكن تحرّف عُبيد الله في مطبوع "الحلية" إلى: عَبد الله.وأخرجه ابن سعد في "طبقاته" 4/ 35 عن إسماعيل بن أبي أويس، عن أبيه، عن عَبد الله بن عُمر.هكذا وقع فيه مكبّرًا، فالظاهر أنه تحريف.وأخرجه البخاري (4261)، وابن حبان (4741) من طريق عبد الله بن سعيد بن أبي هند، والبخاري (4260) من طريق سعيد بن أبي هلال، كلاهما عن نافع، به.
5011 - أخبرنا الحسن بن علي بن محمد بن عُقبة الشَّيباني بالكوفة، حَدَّثَنَا محمد بن علي بن عَفّان العامِري، حَدَّثَنَا الحسن بن بشر بن سَلْم العِجْلي، حَدَّثَنَا سَعْدان بن يحيى، عن عطاء، عن ابن عباس، قال: بينما رسولُ الله صلى الله عليه وسلم جالسٌ وأسماءُ بنتُ عُمَيس قريبةٌ منه إذ ردَّ السلامَ، فأشار بيدِه، ثم قال: "يا أسماءُ، هذا جعفرُ بن أبي طالبٍ مع جبريلَ وميكائيلَ، مَرُّوا فسلَّمُوا علينا، فرُدِّي عليهمُ السلامَ، وقد أخبرَ أنه لقيَ المشركين يومَ كذا وكذا - قبلُ بثلاثٍ أو أربعٍ - فقال: لقيتُ المشركين فأُصِبتُ من مَقادِيمي ثلاثًا وسبعين بين طَعْنةٍ ورَمْيةٍ، فأخذتُ اللواءَ بيدي اليُمنى فقُطِعت، ثم أخذتُه بيدي اليُسرى فقُطِعت، فعوَّضَني الله من يَدَيَّ جَناحَين أَطيرُ بهما في الجنة مع جبريلَ وميكائيلَ، فآكُلُ من ثمارِها ما شئتُ"، قالت أسماءُ: هنيئًا لجعفرٍ ما رزقه اللهُ من الخير، قال: ثم صَعِدَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم المِنبرَ فأخبرَ به الناسَ، قال: فاستبانَ الناسُ بعد ذلك ما أخبرَ به رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فسُمِّي جعفرٌ الطَّيارَ [1]. ذكر مناقب زيدٍ الحِبِّ بن حارِثةَ بن شَراحِيل بن عبد العُزّىحِبِّ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، أسَرَه بنو القَيْنِ، فاشترتْه خديجةُ بنتُ خُوَيلد بأربع مئة درهم، فلما تَزوَّجها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وَهبَتْه له.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বসে ছিলেন এবং আসমা বিনতে উমাইস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কাছেই ছিলেন। হঠাৎ তিনি সালামের জবাব দিলেন এবং হাত দিয়ে ইশারা করলেন। অতঃপর বললেন: "হে আসমা! এই যে জা'ফর ইবনু আবি তালিব, তিনি জিবরাঈল ও মিকাঈলের (আঃ) সাথে ছিলেন। তাঁরা আমাদের পাশ দিয়ে যাওয়ার সময় আমাদের সালাম দিয়েছেন। সুতরাং তুমিও তাঁদের সালামের জবাব দাও।"
আর তিনি জানিয়েছেন যে, তিনি অমুক অমুক দিনে—তিন বা চার দিন আগে—মুশরিকদের সাথে সাক্ষাৎ (যুদ্ধ) করেছিলেন। তিনি বললেন: "আমি মুশরিকদের মোকাবিলা করলাম এবং আমার সম্মুখভাগে তীর ও বল্লমের তিয়াত্তরটি আঘাত পেয়েছি। আমি আমার ডান হাত দিয়ে পতাকা ধরলাম, ফলে সেটি কেটে ফেলা হলো। এরপর আমি তা আমার বাম হাত দিয়ে ধরলাম, ফলে সেটিও কেটে ফেলা হলো। অতএব আল্লাহ তাআলা আমার দুই হাতের বিনিময়ে আমাকে দুটি ডানা দান করেছেন, যার সাহায্যে আমি জিবরাঈল ও মিকাঈলের (আঃ) সাথে জান্নাতে উড়ে বেড়াই এবং ইচ্ছামতো সেখানকার ফলমূল ভক্ষণ করি।"
আসমা বললেন: জা'ফরের জন্য আল্লাহর পক্ষ থেকে এই যে কল্যাণ, তা খুবই মুবারক হোক।
তিনি (ইবনে আব্বাস) বললেন: এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মিম্বরে আরোহণ করলেন এবং লোকজনকে এই (ঘটনা) জানালেন। ইবনে আব্বাস বললেন: এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যা বলেছিলেন, তা লোকজনের কাছে স্পষ্ট হয়ে গেল এবং তখন থেকে জা'ফর আত-তাইয়ার (উড্ডয়নকারী/ডানাওয়ালা) নামে পরিচিত হন।
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর প্রিয়পাত্র যায়িদ আল-হিব্ব ইবনু হারিসাহ ইবনু শারাহিল ইবনু আব্দুল উযযার মর্যাদা: তাকে বানু কায়িন গোত্র বন্দী করে ফেলেছিল। অতঃপর খাদীজা বিনত খুওয়ায়লিদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) চারশত দিরহামের বিনিময়ে তাকে কিনে নেন। যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে (খাদীজা) বিবাহ করলেন, তখন তিনি যায়িদকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট হেবা (উপহার) করে দেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف، وقد تقدَّم عند المصنّف برقم (5001) من طريق العباس بن محمد الدُّوري عن الحسن بن بشر. وما وقع في إسناد المصنّف هنا من تسمية الراوي عن عطاء - وهو ابن أبي رباح - بسعدان بن يحيى فهو وهمٌ ممن دون الحسن بن بشر، فإنَّ هذا الحديث معروفٌ بسعدان بن الوليد بيَّاع السابري كما رواه غير واحدٍ عن الحسن بن بشر، ومنهم العباس بن محمد الدُّوري في روايته المتقدمة برقم (5001).
5012 - حدثني أبو زُرعة أحمد بن الحُسين الصُّوفي بالرَّيّ، حَدَّثَنَا أبو الفضل أحمد بن عبد الله بن نصر بن هِلال الدمشقي بدمشق، حَدَّثَنَا أبو زكريا يحيى بن أيوب بن أبي عِقَال بن زيد بن الحسن بن أسامة بن زيد بن حارثةَ بن شَراحيل بن عبد العُزَّى بن امرئ القيس بن عامر بن عبد وَدَّ بن عوف بن كِنانة، حدثني عمِّي زيدُ بن أبي عِقَال بن زيد، حدثني أبي، عن جده الحسن بن أُسامة بن زيد، عن أبيه، قال: كان حارثةٌ بن شَراحيل تزوجَ امرأةً في طيِّئٍ من نَبْهان، فأولَدَها جَبَلةَ وأسماءَ وزيدًا، فتُوفِّيت وأخلَفَتْ وَلَدَها في حِجْر جَدِّهم لأُمِّهم [1]، وأراد حارثةُ حَمْلَهم، فأَبَى جدُّهم [2] فقال: ما عندنا فهو خيرٌ لهم، فتَراضَوا إلى أن حَمَلَ جَبَلَةَ وأسماءَ، وخَلَّف زيدًا، وجاء خيلٌ من تِهَامَةَ من فَزَارةَ، فأغارت على طيِّئٍ، فسَبَتْ زيدًا فصيَّروه إلى سوق عُكاظٍ، فرآه النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم مِن قبلِ أن يُبعثَ، فقال لخديجةَ: "يا خَديجةُ، رأيتُ في السوق غُلامًا من صفتِه كَيْتَ وكَيْتَ - يَصِفُ عَقْلًا وأدبًا وجمالًا - لو أنَّ لي مالًا لاشتَرَيتُه"، فأمرت ورقةَ بنَ نَوفَلٍ فاشتراه من مالِها، فقال: "يا خديجةُ، هَبِي لي هذا الغلامَ بَطِيبٍ من نَفْسِك"، فقالت: يا محمد، أرى غُلامًا وَضِيئًا، وأخافُ أن تَبِيعَه أو تَهَبَه، فقال النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم: "يا مُوفَّقةُ، ما أردتُ إِلَّا لأتَبنّاهُ"، فقالت: نَعَم يا محمد، فرَبَّياه وتَبنَّياه، فكان يقال له: زيد بن محمد، فجاء رجلٌ من الحَيِّ فنظر إلى زيدٍ فعَرَفه، فقال: أنتَ زيدُ بن حارثةَ؟ قال: لا، أنا زيدُ بن محمد، قال: لا، بل أنت زيدُ بن حارثةَ، من صفة أبيك وعُمُومتك وأخوالك كَيْت وكَيْت، قد أتعَبُوا الأبدان وأنفَقُوا الأموالَ في سبيلِك، فقال زيد:أحِنُّ إلى قَوْمي وإن كنتُ نائيًا … فإنِّي قَطِينُ البيتِ عند المَشاعرِوكُفُّوا عن الوَجْدِ [3] الذي قد شَجَاكُمُ … ولا تُعمِلُوا في الأرض فِعلَ الأباعِرِفإني بحمدِ اللهِ في خيرِ أُسرةٍ … خِيارٍ مَعَدٍّ كابرٍ بعدَ كابِرٍفقال حارثةُ لما وَصَل إليه خبرُه:بَكَيتُ على زيدٍ ولم أدْرِ ما فَعَلْ … أحيٌّ فيُرجَى [4] أم أَتى دونَه الأجَلْفواللهِ ما أدري وإني لَسَائلٌ … أغالَكَ سَهْلُ الأرضِ أم غالَكَ الجَبَلْ فيا ليتَ شِعْري هل لَك الدَّهْرَ رَجْعَةٌ … فحَسْبي من الدنيا رُجُوعُك لي بَجَلْ [5]تُذَكِّرُنِيهِ الشمسُ عند طُلُوعها … ويَعرِضُ لي ذِكرَاهُ إِذْ عَسْعَسَ الطَّفَلْ [6]وإن هَبَّتِ الأرواحُ هَيْمَنَ ذِكرُهُ … فيَا طُولَ أحزاني عليه ويا وَجَلْسأُعمِلُ نَصَّ العِيسِ [-4] في الأرض جاهِدًا … ولا أسأَمُ التَّطوافَ أو تَسأَمَ الإبلفيأتيَ أو تأتيَ عليَّ مَنيَّتي … وكلُّ امرئٍ فانٍ وإن غَرَّهُ الأمَلْفقَدِمَ حارثةُ بن شَرَاحِيلَ إلى مكةَ في إخوتِه وأهلِ بيتِه، فأتى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في فِناءِ الكَعْبة في نفرٍ من أصحابه، فيهم زيدُ بن حارثة، فلما نَظَروا إلى زيدٍ عَرفُوه وعَرَفَهم ولم يقُمْ إليهم إجلالًا لرسولِ الله صلى الله عليه وسلم، فقالوا له: يا زَيدُ، فلم يُجِبْهم، فقال له النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم: "مَن هؤلاء يا زيدُ؟ " قال: يا رسول الله، هذا أبي وهذا عمِّي وهذا أخي وهؤلاءِ عشيرتي، فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم: "قُمْ فَسَلِّمْ عليهم يا زيد" فقام فسلَّم عليهم وسلَّمُوا عليه، ثم قالوا له: امْضِ مَعَنا يا زَيدُ، فقال: ما أُريدُ برسولِ الله صلى الله عليه وسلم بدَلًا ولا غيرَه أحدًا، فقالوا: يا محمدُ، إنا مُعطُوكَ بهذا الغلامِ دِياتٍ، فَسَمِّ ما شئتَ فإنا حامِلُوه إليك، فقال: "أسألُكم أن تَشهَدوا أن لا إله إلَّا الله وأني خاتَمُ أنبيائِه ورُسُله، وأُرسِلُه معَكَم" فأَبَوا وتَلكَّؤوا وتَلَجْلَجُوا، فقالوا: تَقبَّلْ منا ما عَرَضْنا عليك من الدنانير، فقال لهم: "هاهنا خَصْلةٌ غيرُ هذِه، قد جَعَلتُ الأمرَ إليه، فإن شاءَ فليَقُمْ وإن شاءَ فليَدخُلْ" قالوا: ما بقي شيْءٌ؟ قالوا: يا زيدُ، قد أذِنَ لك الآنَ محمدٌ، فانطلِقْ معنا، قال: هَيهاتَ هَيهاتَ، ما أُريدُ برسولِ الله صلى الله عليه وسلم بدلًا، ولا أُوثِرُ عليه والدًا ولا ولدًا، فأَدارُوه وأَلاصُوه واستعطفُوه وأخبروه خَبَرَ مَن وراءَه من وجْدِهم، فأَبي، وحَلَفَ أَن لا يَلْحَقَهم، قال حارثةُ: أمّا أنا فأُواسِيكَ بنفسي، أنا أشهدُ أن لا إلهَ إِلَّا اللهُ، وأَنَّ محمدًا عبدُه ورسولُه، وأَبى الباقُون [-4].
উসামা বিন যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, হারিসাহ ইবনে শুরাহিল তাঈ গোত্রের বনু নাবহান শাখার একজন নারীকে বিবাহ করেছিলেন। তার গর্ভে জাবালাহ, আসমা ও যায়েদ জন্মগ্রহণ করেন। এরপর সেই স্ত্রী মারা গেলে তিনি সন্তানদেরকে তাদের মাতামহের কাছে রেখে যান। হারিছাহ তাদেরকে নিয়ে যেতে চাইলে তাদের মাতামহ রাজি হননি এবং বলেন: "আমাদের কাছে যা আছে, তা তাদের জন্য উত্তম।" এরপর তারা এই মর্মে রাজি হন যে, তিনি জাবালাহ ও আসমাকে নিয়ে যাবেন, কিন্তু যায়েদকে ছেড়ে যাবেন।
এরপর তিহামার ফাযারাহ গোত্রের একদল অশ্বারোহী এসে তাঈ গোত্রের উপর আক্রমণ চালায় এবং যায়েদকে বন্দী করে। তারা তাকে উক্বাযের বাজারে নিয়ে যায়। নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নবুওয়াত লাভের পূর্বেই তাকে সেখানে দেখতে পান এবং খাদীজা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "হে খাদীজা! আমি বাজারে একটি বালককে দেখেছি, তার বৈশিষ্ট্য এমন এমন— তিনি তার বুদ্ধি, আদব ও সৌন্দর্যের বর্ণনা দিচ্ছিলেন— যদি আমার কাছে সম্পদ থাকতো, তবে আমি তাকে কিনে নিতাম।"
অতঃপর (খাদীজা) ওয়ারাকাহ ইবনে নাওফালকে নির্দেশ দিলে তিনি তার (খাদীজা'র) অর্থ দিয়ে বালকটিকে কিনে আনেন। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে খাদীজা! তুমি তোমার মন থেকে সন্তুষ্ট হয়ে এই বালকটিকে আমাকে দান করো।" খাদীজা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "হে মুহাম্মাদ! আমি দেখছি বালকটি খুব সুন্দর, আমার আশঙ্কা হচ্ছে আপনি হয়তো তাকে বিক্রি করে দেবেন বা অন্য কাউকে দান করে দেবেন।" নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে কল্যাণময়ী! আমি তাকে শুধু দত্তক নেওয়ার উদ্দেশ্যেই চেয়েছি।" খাদীজা বললেন: "হ্যাঁ, হে মুহাম্মাদ!" এরপর তারা দুজনই তাকে লালন-পালন করেন এবং দত্তক নেন। তাই তাকে 'যায়েদ বিন মুহাম্মাদ' বলা হতো।
এরপর গোত্রের এক ব্যক্তি এসে যায়েদকে দেখে চিনতে পারল। সে জিজ্ঞেস করল: "তুমি কি যায়েদ বিন হারিছাহ?" যায়েদ বললেন: "না, আমি যায়েদ বিন মুহাম্মাদ।" লোকটি বলল: "না, তুমি অবশ্যই যায়েদ বিন হারিছাহ। তোমার পিতা, চাচা ও মামাদের বিবরণ এমন এমন। তারা তোমার খোঁজে নিজেদের শরীরকে ক্লান্ত করেছে এবং সম্পদ ব্যয় করেছে।"
তখন যায়েদ উত্তর দিলেন:
যদিও আমি দূরে থাকি, তবুও আমি আমার গোত্রের প্রতি মায়া অনুভব করি;
তবে আমি মাশা'ইরের নিকটস্থ ঘরের প্রতিবেশী।
আর যে উদ্বেগ তোমাদেরকে ব্যথিত করেছে, তা থেকে বিরত হও;
এবং উটের মতো পৃথিবীতে পরিশ্রম করো না।
কেননা আল্লাহর প্রশংসায়, আমি এক উত্তম পরিবারে আছি;
যারা সেরা মা'আদ্দ গোত্রের এক প্রজন্ম থেকে আরেক প্রজন্মের সেরা।
যখন হারিছাহর কাছে যায়েদের খবর পৌঁছাল, তখন তিনি বললেন:
আমি যায়েদের জন্য কেঁদেছি, কিন্তু জানি না সে কী করেছে;
সে কি জীবিত, নাকি তার মৃত্যু এসে গেছে?
আল্লাহর কসম! আমি জানি না, আমি জিজ্ঞেস করছি;
সমতল ভূমি নাকি পাহাড় তাকে ধ্বংস করেছে?
আহা! যদি আমি জানতাম, তোমার ফিরে আসার কোনো দিন আছে কি?
আমার জন্য দুনিয়াতে তোমার ফিরে আসাই যথেষ্ট!
সূর্য যখন উদিত হয়, তখন তা আমাকে তার কথা স্মরণ করিয়ে দেয়;
এবং সন্ধ্যা নেমে আসলে তার স্মৃতি আমার মনে ভেসে ওঠে।
বাতাস যখন বয়ে যায়, তার স্মৃতি আমাকে আচ্ছন্ন করে;
হায় আমার দীর্ঘ শোক! হায় আমার ভয়!
আমি ক্লান্ত না হওয়া পর্যন্ত উটের ওপর আরোহণ করে পৃথিবীতে কঠোরভাবে চেষ্টা করব;
অথবা আমার মৃত্যু এসে যাবে।
আর প্রত্যেক মানুষই বিনাশী, যদিও আশা তাকে প্রতারণা করে।
এরপর হারিছাহ ইবনে শুরাহিল তার ভাই ও পরিবারের সদস্যদের নিয়ে মক্কায় আসলেন। তিনি কাবাঘরের প্রাঙ্গণে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন। তার সাথে তার কয়েকজন সাহাবী ছিলেন, যাদের মধ্যে যায়েদ বিন হারিছাহও ছিলেন। যখন তারা যায়েদকে দেখলেন, তখন তারা তাকে চিনতে পারলেন এবং যায়েদও তাদেরকে চিনতে পারলেন। কিন্তু রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর প্রতি সম্মান দেখিয়ে তিনি তাদের দিকে এগিয়ে গেলেন না।
তারা তাকে ডাকলেন: "হে যায়েদ!" কিন্তু তিনি সাড়া দিলেন না। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে জিজ্ঞেস করলেন: "হে যায়েদ! এরা কারা?" তিনি বললেন: "ইয়া রাসূলাল্লাহ! ইনি আমার পিতা, ইনি আমার চাচা, ইনি আমার ভাই এবং এরা আমার আত্মীয়-স্বজন।" নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যাও, তাদের প্রতি সালাম জানাও, হে যায়েদ।" তখন তিনি উঠে তাদের সালাম দিলেন এবং তারাও তাকে সালাম দিলেন। এরপর তারা তাকে বললেন: "হে যায়েদ! আমাদের সাথে চলো।" তিনি বললেন: "আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বদলে অন্য কাউকে চাই না এবং তাকে ছাড়া অন্য কারো প্রতি অগ্রাধিকার দেবো না।"
তারা বললেন: "হে মুহাম্মাদ! আমরা এই বালকের পরিবর্তে আপনাকে রক্তমূল্য (দিয়াত) দেবো। আপনি যা খুশি দাম বলুন, আমরা তা আপনার কাছে বহন করে নিয়ে আসব।" নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি তোমাদের কাছে চাই যে, তোমরা সাক্ষ্য দাও যে, আল্লাহ ব্যতীত কোনো ইলাহ নেই এবং আমি তাঁর নবী ও রাসূলগণের শেষ, তাহলে আমি তাকে তোমাদের সাথে পাঠিয়ে দেবো।" কিন্তু তারা প্রত্যাখ্যান করল এবং ইতস্তত করল ও আমতা আমতা করতে লাগল। তারা বলল: "আমরা আপনার কাছে যে দিনারগুলো দিতে চেয়েছি, সেগুলো গ্রহণ করুন।" নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন বললেন: "এখানে এর বাইরে আরেকটি সুযোগ আছে। আমি বিষয়টি তার (যায়েদের) উপর ছেড়ে দিয়েছি। সে যদি চায়, তবে সে তোমাদের সাথে যেতে পারে। আর যদি চায়, তবে (এখানে) থাকতে পারে।"
তারা বলল: "আর কোনো কথা বাকি আছে কি?" তারা (যায়েদকে) বলল: "হে যায়েদ! মুহাম্মাদ তোমাকে এখন অনুমতি দিয়েছেন, তুমি আমাদের সাথে চলো।" যায়েদ বললেন: "হায় আফসোস! হায় আফসোস! আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বদলে অন্য কাউকে চাই না এবং তার ওপর আমার পিতা বা পুত্র কাউকেই অগ্রাধিকার দেবো না।" তারা তাকে বোঝানোর চেষ্টা করল, অনুরোধ করল, আবেগাপ্লুত করল এবং পিছনে যারা তাদের জন্য অপেক্ষা করছে, তাদের দুর্দশার কথা জানাল। কিন্তু তিনি অস্বীকার করলেন এবং কসম করলেন যে, তিনি তাদের সাথে যাবেন না।
হারিছাহ বললেন: "আমি নিজেকে দিয়ে তোমাকে সান্ত্বনা দিচ্ছি। আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আল্লাহ ব্যতীত কোনো ইলাহ নেই এবং মুহাম্মাদ তাঁর বান্দা ও রাসূল।" তবে বাকিরা (ইসলাম গ্রহণ করতে) অস্বীকার করল।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: لأبيهم، والتصويب من مصادر التخريج.
[2] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: جدّهما، بضمير المثنى، وإنما هم ثلاثة أولاد، فالصحيح التعبير بضمير الجمع.
5012 [3] - تحرّف في النسخ الخطية إلى: الوجه، والتصويب من مصادر التخريج.
5012 [4] - في (ص) و (م): يُرجى.
5012 [5] - بَجَل وتُسكَّن الجيم، واللام ساكنة أبدًا، اسم فِعل بمعنى: حَسْب.
5012 [6] - الطَّفَل بفتحتين: وقت مغيب الشمس حين تصفَرّ ويضعُف ضوؤها.
5012 [-4] - نصُّ العِيس: سَيْر الإبل السَّريع، فالنصُّ: هو السير السريع، والعِيسُ: الإبل البِيض التي في بياضها ظلمة خفيّة.
5012 [-4] - خبر محتمل للتحسين، وزيد بن أبي عِقالٍ وأبوه وإن كان فيهما جهالة لم يُعرفا بجرحٍ، وقد رويا قصةً حصلت لجدِّهما زيد بن حارثة، والرجل أدرى وأعلم بأهل بيته على أنه رُوي نحو هذه القصة من وجوه ضعيفةٍ، ولكنها - وإن كانت كذلك - تدلُّ على أنَّ للقصة أصلًا، على شهرتها كذلك عند أهل المغازي والسير، وعليه فلا يُسلَّم للحافظ ابن حجر إنكاره للقصة في "تهذيب التهذيب" في ترجمة أبي عقال هلال بن زيد بن الحسن.وأخرجه ابن مَندَهْ في "معرفة الصحابة" كما في "الإصابة" لابن حجر 1/ 615 - ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 19/ 529 - 531 - وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (1987)، وأبو بكر محمد بن علي بن محمد بن عمر المُطَّوّعي الغازي في "من صبر ظفر" (11) من طرق عن أبي زكريا يحيى بن أيوب بن أبي عِقال، عن عمه زيد بن أبي عِقال بن زيد بن الحسن بن أسامة بن زيد، عن أبيه أبي عِقالِ بن زيد بن الحسن، عن أبيه زيد بن الحسن بن أسامة، عن أبيه الحسن بن أسامة بن زيد، عن أبيه. فزادوا فيه زيدَ بنَ الحسن بن أسامة، وفيه جهالة أيضًا، لكنه من ولد زيد بن حارثة كذلك، فحالُه كحالِ أبي عِقال وولده زيد.وأخرجه تمام الرازي في "فوائده" (1200) و (1201)، وفي "جزء إسلام زيد" (1)، ومن طريقه أخرجه ابن عُساكر 10/ 136 - 139 من طرق عن يحيى بن أيوب بن أبي عقال، أنَّ أباه حدّثه وكان صغيرًا فلم يَعِ عنه، قال: فحدثنى عمي زيد بن أبي عِقال، عن أبيه، أنَّ آباءه حدَّثوه: أن حارثة تزوّج … فذكره.وقوله: أداروه، من أداره على الأمر، بمعنى: حاوَلَه أن يفعله.وقوله: أَلاصُوه، من ألصْتُ الشيءَ: إذا حرَّكْتَه لتنتزعَه عن موضعه.وروي نحو هذه القصة من وجوهٍ ضعيفةٍ عند ابن سعد في "طبقاته" 3/ 38 - 40، والزُّبير بن بَكَّار في "الأخبار المُوفَّقِيات" (176)، والطبري في "ذيل المذيَّل" كما في "منتخبه" المطبوع بإثر "تاريخ الطبري" 11/ 495 - 496. قلنا: ورُويَت قصة استرقاق زيد ثم مصيره لخديجة بنحو ما جاء هنا باختصار عن أبي إسحاق السَّبيعي مرسلًا عند أبي القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (317)، وابن قانع في "معجم الصحابة" 1/ 162، وابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 123، وابن عساكر 19/ 351 - 352.وأورد الذهبيُّ في "سير أعلام النبلاء" 1/ 223 قصة رؤية النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم لزيد يُباع في السوق وسؤاله خديجة أن تشتريه ثم هبتها زيدًا للنبي صلى الله عليه وسلم عن أبي فَزَارة راشد بن كيسان العَبْسي مرسلًا.وقال ابن حجر في "الإصابة" 2/ 600: وقد ذكر ابن إسحاق قصة مجيء حارثة والد زيد في طلبه بنحوه.وروى شِعرَ حارثة والد زيد الذي قاله لما فَقَد ابنَه زيدًا الواقديُّ عن شيوخه كما سيأتي عند المصنّف بعده.
5013 - Null
5013 - فحدّثنا أبو عبد الله الأصبَهاني، حَدَّثَنَا الحَسن بن الجَهْمَ، حَدَّثَنَا الحُسين بن الفَرَج، حَدَّثَنَا محمد بن عُمر، عن شُيوخه، قال: كان حارثةُ بن شَراحِيلَ حين فَقَدَ ابنَه زيدًا يَبكِيه فيقول:بَكَيتُ على زيدٍ ولم أدْرِ ما فَعَلْثم ذكر القصيدةَ بطولها.
মুহাম্মাদ ইবনু উমর থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর শায়খগণ থেকে বর্ণনা করেন যে, হারিসা ইবনু শুরাহবিল যখন তার পুত্র যায়িদকে হারালেন, তখন তার জন্য কাঁদতেন এবং বলতেন: আমি যায়িদের জন্য কাঁদলাম, আর আমি জানি না তার কী হলো। এরপর তিনি পুরো কবিতাটি উল্লেখ করলেন।
5014 - حَدَّثَنَا علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، حَدَّثَنَا أحمد بن بِشر المَرْثَدي، حَدَّثَنَا عبد الغفار بن عَبد الله [1] بن الزُّبير المَوصِلي، حَدَّثَنَا علي بن مُسهِر، عن إسماعيل بن أبي خالد، عن أبي عمرو الشَّيباني، حدثني جَبَلة بن حارثة أخو زيد بن حارثة، قال: أتيت النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم، فقلتُ: يا رسول الله، ابعَثْ معي أخي زيدًا، فقال: "هو ذا هو، إن أراد لم أَمنعْهُ"، فقال زيدٌ: لا واللهِ لا أختارُ عليك أحدًا، قال جَبَلةُ: فقلتُ: إنّ رأيَ أخي أفضلُ من رأيي [2]. صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه، وهو شاهدٌ للحديثِ الماضي.
জাবালা ইবনু হারিসাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমার ভাই যায়দকে আমার সাথে পাঠিয়ে দিন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: সে তো এই যে এখানে আছে। যদি সে চায়, আমি তাকে বারণ করব না। তখন যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর কসম! আমি আপনার চেয়ে অন্য কাউকে বেছে নেব না। জাবালা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তখন আমি বললাম, আমার ভাইয়ের অভিমত আমার অভিমত থেকে উত্তম।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: عُبيد الله، بالتصغير، والتصويب من مصادر ترجمته، وكذلك سمّاه تلميذه أبو يعلى الموصلي إذ روى عنه في "مسنده" عدة أحاديث. وأخرجه الترمذي (3815) من طريق محمد بن عمر بن الرُّومي، عن علي بن مُسهر، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن غريب.وتابعهما منجابُ بن الحارث عند الطبراني في "المعجم الكبير" (2192) وغيره.ورواه أيضًا أبو النضر عمرو بن النضر البصري عن إسماعيل بن أبي خالد عند ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (2600)، والطبراني (2193) وغيرهما.
[2] حديث صحيح، وهذا إسناد حسنٌ من أجل عبد الغفار بن عبد الله بن الزبير الموصلي، فقد روى عنه جمع وذكره ابن حبان في "الثقات"، وقد تابعه على رواية هذا الحديث مِنْجابُ بن الحارث وغيره، ومنجابٌ ثقة. أبو عمرو الشيباني: هو سعْد بن إياس. وأخرجه الترمذي (3815) من طريق محمد بن عمر بن الرُّومي، عن علي بن مُسهر، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن غريب.وتابعهما منجابُ بن الحارث عند الطبراني في "المعجم الكبير" (2192) وغيره.ورواه أيضًا أبو النضر عمرو بن النضر البصري عن إسماعيل بن أبي خالد عند ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (2600)، والطبراني (2193) وغيرهما.
5015 - Null
5015 - حَدَّثَنَا أبو العباس محمد بن يعقوب، حَدَّثَنَا أحمد بن عبد الجبار، حَدَّثَنَا يونس بن بُكَير، عن ابن إسحاق، فيمن شَهِدَ بدرًا مع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم: زيدُ بن حارثة بن شَراحيل الكَلْبي مولى رسولِ الله صلى الله عليه وسلم.
ইবনে ইসহাক থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বদরের যুদ্ধে অংশগ্রহণকারীদের মধ্যে ছিলেন: যায়েদ ইবনে হারেসা ইবনে শুরাহীল আল-কালবী, যিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আযাদকৃত গোলাম (মাওলা) ছিলেন।
5016 - حَدَّثَنَا أبو جعفر الرازي البغدادي، حَدَّثَنَا أبو عُلَاثة، حَدَّثَنَا أبي، حَدَّثَنَا ابن لَهِيعة، عن أبي الأسود، عن عُروة: أنَّ أولَ من أسلَمَ زيدُ بنُ حارثة [1].
উরওয়াহ থেকে বর্ণিত যে, প্রথম যে ব্যক্তি ইসলাম গ্রহণ করেছিলেন, তিনি হলেন যায়দ ইবনু হারিসাহ।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله لا بأس بهم كما تقدَّم بيانه برقم (4378)، وهو مرسل. أبو عُلَاثة: هو محمد بن عمرو بن خالد الحَرَّاني ثم المصري، وابن لَهِيعة: هو عبد الله، وأبو الأسود: هو محمد بن عبد الرحمن المعروف بيتيم عروة.وأخرجه الطبري في "تاريخه" 2/ 316 من طريق عبد الملك بن مسلمة، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 19/ 353 - 354 من طريق سعيد بن أبي مريم، كلاهما عن ابن لَهِيعة، به.وروي مثلُه عن الزهري عند عبد الرزاق في "مصنفه" (9719)، وابن سعد في "طبقاته" 3/ 42، وأحمد في "العلل ومعرفة الرجال" برواية ابنه عبد الله (5817)، والبَلاذُري في "أنساب الأشراف" 1/ 112 و 470 و 471، والطبري في "تاريخه" 2/ 316، وابن عساكر 19/ 353 و 354.وروي مثلُه كذلك عن سليمان بن يسار عند ابن سعد 3/ 42، والبَلاذُري 1/ 112، والطبري 2/ 316، وابن عساكر 19/ 353. وفي الإسناد إليه ضعفٌ.وقد روي خلافُ ذلك كما تقدم عند الحديث السالف برقم (4702) حيث جاء في روايات أنَّ أول من أسلم علي بن أبي طالب، وفي بعضها أنَّ أول من أسلم أبو بكر الصِّدِّيق. وذكرنا هناك الجمع بينهما، وهذا قول ثالث أنَّ أول من أسلم زيد بن حارثة، قال الثعلبي في "تفسيره" 5/ 85: كان إسحاق بن إبراهيم الحنظلي يجمع بين الأخبار فيقول: أول من أسلم من الرجال أبو بكر، ومن النساء خديجة، ومن الصبيان علي، ومن الموالي زيد بن حارثة.
5017 - حَدَّثَنَا أبو محمد المُزَني، حَدَّثَنَا محمد بن عثمان بن أبي شَيْبة، حَدَّثَنَا العلاء بن عَمرو الحَنَفي، حَدَّثَنَا سعيد بن مَسلَمة، سمعتُ عَمْرة بنت عبد الرحمن تقول: سمعت عائشة تقول: لما قُتل زيدُ بنُ حارثة وجعفرُ بن أبي طالب وعبدُ الله بن رَوَاحَةَ جَلَسَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يَبكِيهم، ويُعرَف فيه الحُزنُ [1].
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন যায়িদ ইবনু হারিসা, জাফর ইবনু আবী তালিব এবং আব্দুল্লাহ ইবনু রাওয়াহা শহীদ হলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বসে তাদের জন্য কাঁদছিলেন এবং তাঁর মধ্যে বিষণ্ণতা পরিলক্ষিত হচ্ছিল।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح دون قوله: يبكيهم، فلم يرد في شيء من الروايات عن يحيى بن سعيد - وهو الأنصاري - إلّا في هذه الرواية، وإسنادها ضعيف لضعف سعيد بن مسلمة - وهو ابن هشام الأُموي - وضعف الراوي عنه، وقد انفرد أحدُهما بهذا الحرف.وأخرجه أحمد 40 / (24313)، ومسلم (935)، وابن حبان "3155) من طريق عبد الله بن نُمير، والبخاري (1299) و (1305) و (4263)، ومسلم (935) من طريق عبد الوهاب بن عبد المجيد الثقفي، ومسلم (935)، والنسائي (1986) من طريق معاوية بن صالح، ومسلم (935) من طريق عبد العزيز بن مسلم القَسْملي، وأبو داود (3122) من طريق سليمان بن كثير العَبْدي، وابن حبان (3147) من طريق عُبيد الله بن عَمرو الرَّقي، ستَّتُهم عن يحيى بن سعيد الأنصاري، به. بذكر الحُزن دون البكاء.وقد تقدَّم برقم (4397) و (5000) من طريق القاسم بن محمد بن أبي بكر الصديق عن عمته عائشة. و (15011) و 13 / (428)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (2856)، والبيهقي في "دلائل النبوة" 4/ 358 - 359، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 2/ 6 و 19/ 373 من طرق عن محمد بن إسحاق، به: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم بعث بَعْثًا إلى مؤتة في جمادى الأُولى سنة ثمانٍ واستعمل عليهم زيد بن حارثة، وقال: "إن أُصيب زيدٌ فجعفر بن أبي طالب على الناس، فإن أصيب جعفر فعبد الله بن رواحة على الناس"، وجاء في رواية خليفة وابن أبي خليفة وحدهما: فقُتِل زيد وجعفر وابن رواحة. وجاء في "سيرة ابن هشام" 2/ 377، و "معرفة الصحابة" لأبي نعيم أن قوله: فقاتل زيد بن حارثة … إلى آخره، من قول ابن إسحاق لم يسنده.ولقصة غزوة مؤتة واستشهاد قادتها الثلاثة انظر حديث أبي قتادة الأنصاري عند أحمد 37/ (22551) و (22566)، والنسائي (8103) و (8192) و (8224)، وابن حبان (7048)، وإسناده جيد.وحديث عبد الله بن جعفر بن أبي طالب عند أحمد 3/ (1750)، والنسائي (8550)، وإسناده صحيح.وقوله: شاطَ في رماح القوم، أي: هلك، وأصله من شاط الزيتُ: إذا نَضِج حتَّى كاد أن يحترق.
5018 - حَدَّثَنَا أبو العباس محمد بن يعقوب، حَدَّثَنَا أحمد بن عبد الجبار، حَدَّثَنَا يونس بن بُكَير، عن ابن إسحاق، عن محمد بن جعفر بن الزُّبير، عن عُروة، قال: بَعَثَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بَعْثَه إلى مُؤتة، فقاتل زيدُ بنُ حارثة برايةِ رسول الله صلى الله عليه وسلم في جُمادى الأُولى سنةَ ثمانٍ، حتَّى شاطَ في رِماحٍ القوم، ثم أخذَها جعفرُ بنُ أبي طالب [1].
উরওয়া থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁর বাহিনী মুতার দিকে প্রেরণ করলেন। অতঃপর যায়িদ ইবনু হারিসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) অষ্টম হিজরীর জুমাদাল উলা মাসে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের পতাকা নিয়ে যুদ্ধ করলেন, যতক্ষণ না তিনি শত্রুদের বর্শার আঘাতে ছিন্নভিন্ন হলেন, এরপর জা’ফর ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পতাকাটি গ্রহণ করলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله لا بأس بهم، لكنه مرسل، وهو خبر صحيح مشهور.وأخرج ابن هشام في "السيرة" 2/ 373، وخليفة بن خياط في "تاريخه" ص 86، وابن أبي خيثمة في السَّفر الثالث من "تاريخه الكبير" (1529)، والطبري في "تاريخه" 3/ 36، وأبو الفرج الأصبهاني في "مقاتل الطالبيين" ص 11، والطبراني في "الكبير" (1457) و (4655) و (15011) و 13 / (428)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (2856)، والبيهقي في "دلائل النبوة" 4/ 358 - 359، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 2/ 6 و 19/ 373 من طرق عن محمد بن إسحاق، به: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم بعث بَعْثًا إلى مؤتة في جمادى الأُولى سنة ثمانٍ واستعمل عليهم زيد بن حارثة، وقال: "إن أُصيب زيدٌ فجعفر بن أبي طالب على الناس، فإن أصيب جعفر فعبد الله بن رواحة على الناس"، وجاء في رواية خليفة وابن أبي خليفة وحدهما: فقُتِل زيد وجعفر وابن رواحة. وجاء في "سيرة ابن هشام" 2/ 377، و "معرفة الصحابة" لأبي نعيم أن قوله: فقاتل زيد بن حارثة … إلى آخره، من قول ابن إسحاق لم يسنده.ولقصة غزوة مؤتة واستشهاد قادتها الثلاثة انظر حديث أبي قتادة الأنصاري عند أحمد 37/ (22551) و (22566)، والنسائي (8103) و (8192) و (8224)، وابن حبان (7048)، وإسناده جيد.وحديث عبد الله بن جعفر بن أبي طالب عند أحمد 3/ (1750)، والنسائي (8550)، وإسناده صحيح.وقوله: شاطَ في رماح القوم، أي: هلك، وأصله من شاط الزيتُ: إذا نَضِج حتَّى كاد أن يحترق.