আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
5559 - أخبرنا أبو جعفر محمد بن محمد بن عبد الله، حَدَّثَنَا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حَدَّثَنَا علي بن عبد الله المَديني، حَدَّثَنَا يحيى بن سُلَيم الطائفي، حَدَّثَنَا عبد الله بن عثمان بن خُثَيم، عن مُجاهِد، عن إبراهيمَ بن الأشْتَر، عن أبيه، عن أمِّ ذرٍّ، قالت: لما حَضَرت أبا ذرٍّ الوفاةُ بَكيتُ، فقال لي: ما يُبكيكِ؟ فقلت: وما لي لا أبكي وأنت تموتُ بفَلاةٍ من الأرض، وليس عِندي ثوبٌ يَسَعُك كَفَنًا لي، ولا لكَ، ولا يَدَينِ لي بتغييبِك، قال: فأبشِري ولا تبكي، فإني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "لا يموتُ بين امرأَينِ مُسلِمَين ولدان أو ثلاثةٌ فيحتَسِبانِ فيَرَيانِ النارَ أبدًا".وإني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول لنَفَرٍ أنا فيهم: "لَيمُوتَنَّ رجل منكم بفَلاةٍ من الأرض تَشْهَدُه عِصابةٌ من المؤمنين"، وليس من أولئك النفرِ أحدٌ إلا وقد مات في قريةٍ وجماعةٍ، فأنا ذلك الرجلُ، واللهِ ما كَذَبتُ ولا كُذِبتُ، فأَبصِري الطريقَ، فقلت: أنَّى وقد ذهب الحاجُ وتَقطَّعَتِ الطَّرِيقُ؟ فقال: اذهبي فتبصَّري قالت: فكنتُ أَشتدُّ إلى الكَثِيب، ثم أرجِعُ فأُمرِّضُه، فبينما أنا وهو كذلك إذا أنا برجالٍ على رِحالِهم، كأنهم الرَّخَمُ تَخِدُ [1] بهم رواحِلُهم - قال عليٌّ: قلت ليحيى بن سُلَيم: تَخِدُ أَو تَخُبُّ؟ قال: بالدال - قالت: فألَحْتُ بثَوبي، فأسرَعُوا إِليَّ حتَّى وَقَفُوا عَلَيَّ، فقالوا: ومَن هو؟ قلتُ: أبو ذرٍّ، قالوا: صاحبُ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم؟! قلتُ: نعم، ففَدَّوهُ بآبائهم وأمّهاتهم، وأسرَعُوا إليه حتَّى دخَلُوا عليه، فقال لهم: أبشِروا، فإني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول لنَفَرٍ أنا فيهم: "ليموتَنَّ رجلٌ منكم بِفَلاةٍ من الأرض تَشْهَدُه عِصابةٌ من المؤمنين"، ما مِن أولئك النفَرِ رجلٌ إِلَّا وقد هَلَك في قريةٍ وجماعةٍ، والله ما كَذَبتُ ولا كُذِبتُ، أنتم تَسمَعون أنه لو كان عندي ثوبٌ يَسَعُني كَفَنًا أو لامرأتي لم أُكفَّن إلَّا في ثوبٍ لي أو لها، إني أَنشُدُكُم الله، ثم إني أَنشُدُكم الله، أن لا [2] يُكفِّنَني رجلٌ منكم كان أميرًا أو عَريفًا أو بَريدًا أو نَقيبًا، وليس من أولئك النفَر إلّا وقد قارَفَ [3] ما قال، إلَّا فتًى من الأنصار، فقال: أنا أُكفِّنُك يا عمِّ، أكفِّنُك في ردائي هذا، أو في ثَوبَين في عَيْبتي من غَزْل أُمّي، قال: أنتَ فكَفِّنّي، فَكَفَّنَه الأنصاريُّ في النَّفَر الذين حَضَرُوه، وقامُوا عليه ودَفَنُوه في نَفَرٍ كلُّهم يَمانٍ [4]. ذكرُ مناقب حَبِيب بن مَسلَمة الفِهْري رضي الله عنه -
উম্মু যার্র (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: যখন আবু যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মৃত্যু উপস্থিত হলো, আমি কাঁদতে লাগলাম। তিনি আমাকে বললেন: তুমি কাঁদছো কেন? আমি বললাম: আমি কাঁদব না কেন? আপনি পৃথিবীর এক খোলা প্রান্তরে মৃত্যুবরণ করছেন, আর আমার কাছে এমন কোনো কাপড় নেই যা আপনাকে বা আমাকে কাফন দেওয়ার জন্য যথেষ্ট হতে পারে। আর আপনাকে সমাহিত করার ক্ষমতাও আমার নেই। তিনি বললেন: সুসংবাদ গ্রহণ করো এবং কেঁদো না। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যখন কোনো দুই মুসলিম দম্পতির মধ্যে দুই বা তিনটি সন্তান মারা যায় এবং তারা সওয়াবের আশায় ধৈর্য ধারণ করে, তারা কখনওই জাহান্নাম দেখবে না।" আর আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে একদল লোকের মাঝে থাকতে শুনেছি, যাদের মধ্যে আমিও ছিলাম, তিনি বলেছিলেন: "তোমাদের মধ্যে একজন ব্যক্তি পৃথিবীর এক খোলা প্রান্তরে মৃত্যুবরণ করবে, যার কাছে মুমিনদের একটি দল উপস্থিত থাকবে।" ওই দলটির মধ্যে এমন কেউ নেই যে কোনো গ্রাম বা লোকালয়ে মারা যায়নি, সুতরাং আমিই সেই ব্যক্তি। আল্লাহর কসম! আমি মিথ্যা বলিনি, আর আমার প্রতিও মিথ্যা বলা হয়নি। সুতরাং তুমি রাস্তার দিকে তাকাও। আমি বললাম: কীভাবে সম্ভব? হাজীরা তো চলে গেছে এবং রাস্তা বন্ধ হয়ে গেছে। তিনি বললেন: যাও, গিয়ে দেখো। তিনি (উম্মু যার্র) বললেন: আমি বালিয়াড়ির দিকে ছুটতাম, তারপর ফিরে এসে তাঁর সেবা করতাম। আমরা যখন এই অবস্থায় ছিলাম, হঠাৎ আমি কিছু লোককে তাদের বাহনের ওপর দেখলাম, তারা যেন শকুন, তাদের বাহনগুলো দ্রুত গতিতে চলছিল। (আলী বললেন: আমি ইয়াহইয়া ইবনু সুলাইমকে জিজ্ঞেস করলাম: تَخِدُ নাকি تَخُبُّ? তিনি বললেন: دাল (দাল অক্ষর) দ্বারা [অর্থাৎ تَخِدُ])। তিনি বললেন: আমি আমার কাপড় নাড়িয়ে ইশারা করলাম। তারা দ্রুত আমার কাছে এসে থামল এবং জিজ্ঞেস করল: ইনি কে? আমি বললাম: আবু যার। তারা বলল: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবী?! আমি বললাম: হ্যাঁ। তখন তারা তাদের পিতামাতার বিনিময়ে তাঁকে উৎসর্গীকৃত করল এবং দ্রুত তাঁর কাছে গিয়ে প্রবেশ করল। তিনি (আবু যার) তাদেরকে বললেন: সুসংবাদ গ্রহণ করো। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে একদল লোকের মাঝে থাকতে শুনেছি, যাদের মধ্যে আমিও ছিলাম, তিনি বলেছিলেন: "তোমাদের মধ্যে একজন ব্যক্তি পৃথিবীর এক খোলা প্রান্তরে মৃত্যুবরণ করবে, যার কাছে মুমিনদের একটি দল উপস্থিত থাকবে।" ওই দলটির মধ্যে এমন কোনো ব্যক্তি নেই যে কোনো গ্রাম বা লোকালয়ে মারা যায়নি। আল্লাহর কসম! আমি মিথ্যা বলিনি, আর আমার প্রতিও মিথ্যা বলা হয়নি। তোমরা শোনো! যদি আমার কাছে এমন কোনো কাপড় থাকত যা আমাকে বা আমার স্ত্রীকে কাফন দেওয়ার জন্য যথেষ্ট হতো, তাহলে আমি আমার বা তার কাপড় ছাড়া অন্য কোনো কাপড়ে কাফন দিতাম না। আমি তোমাদের আল্লাহর নামে কসম দিয়ে অনুরোধ করছি, আমি তোমাদের আল্লাহর নামে কসম দিয়ে অনুরোধ করছি যে, তোমাদের মধ্যে কোনো আমীর (শাসক), আরীফ (গোষ্ঠীর নেতা), বারীদ (ডাক বাহক/কর্মকর্তা) অথবা নাকীব (সর্দার/নেতা) যেন আমাকে কাফন না দেয়। ওই দলের মধ্যে সেই আনসারী যুবক ছাড়া আর কেউ ছিল না যে (আবু যার-এর বর্ণিত) ঐসব পদে ছিল না। তখন এক আনসারী যুবক বলল: হে চাচা, আমি আপনাকে কাফন দেব। আমি আপনাকে আমার এই চাদর দিয়ে, অথবা আমার থলের মধ্যে আমার মায়ের হাতে বোনা দুটি কাপড় দিয়ে কাফন দেব। তিনি বললেন: তবে তুমিই আমাকে কাফন দাও। অতঃপর ওই আনসারী যুবক উপস্থিত লোকদের সাথে নিয়ে তাঁকে কাফন দিল, তারা তাঁর দায়িত্ব গ্রহণ করল এবং তাঁকে দাফন করল। উপস্থিত লোকেরা সবাই ছিল ইয়ামানী।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ب): تحذ، بالحاء المهملة وآخره ذال معجمة، والمثبت على الصواب من (ز) و (ص)، لكن حُرِّكت الكلمة فيهما بضم الخاء وتشديد الدَّال، وإنما الصواب: تَخِدُ، كتَعِدُ من الوَخْدة: وهو ضربٌ من سير الإبِل، وهو أن ترمي بقوائمها كمشي النَّعام. وأخرجه ابن حبان (6671) عن أبي خليفة الفَضل بن الحُباب، عن علي بن المديني، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 35/ (21373) عن إسحاق بن عيسى، وابن حبان (6670) من طريق الحسن بن محمد بن الصبَّاح، كلاهما عن يحيى بن سُلَيم، به.وأنظر ما تقدم برقم (5542).والفَلَاة: المفازة والأرض القَفْر.والحاجُّ: هو في الأصل يُطلق على الواحد من الحُجّاج، وربما أُطلق الحاجُّ على الجماعة مجازًا واتساعًا، كما جاء هنا.وتَقطَّعتِ الطريقُ: انقطع الناسُ عن الطريق.واشتدُّ إلى الكَثِيب: أُسرع إلى التلِّ الرملي.والرَّخَم: نوع من الطيور.وتَخُبُّ: من الخَبَب، وهو ضربٌ من العَدْوِ، وهو خَطْوٌّ فَسِيحٌ.والعَرِيف: القيّم بأمور القبيلة أو الجماعة من الناس، يلي أُمورهم ويتعرف الأمير منه أحوالهم.والبَريد: الرسُول.والنقيب: هو كالعريف على القوم الذي يتعرف أخبارَهم وينقّب عن أحوالهم؛ أي: يُفتش.والعَيْبة: وعاء من جلد ونحوه يكون فيه المتاعُ.ويَمَانٍ: نسبة لليمن، والألف فيها عوض من ياء النسبة.
[2] حرف "لا" لم يَرِد في (ز) و (م) و"تلخيص الذهبي" و (ب)، وأثبتناه من (ص)، وهو ثابت لأكثر من خرّج هذا الخبر، وكلا الأمرين جائز، فعلى الحذف تُقدَّر "لا" تقديرًا. وأخرجه ابن حبان (6671) عن أبي خليفة الفَضل بن الحُباب، عن علي بن المديني، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 35/ (21373) عن إسحاق بن عيسى، وابن حبان (6670) من طريق الحسن بن محمد بن الصبَّاح، كلاهما عن يحيى بن سُلَيم، به.وأنظر ما تقدم برقم (5542).والفَلَاة: المفازة والأرض القَفْر.والحاجُّ: هو في الأصل يُطلق على الواحد من الحُجّاج، وربما أُطلق الحاجُّ على الجماعة مجازًا واتساعًا، كما جاء هنا.وتَقطَّعتِ الطريقُ: انقطع الناسُ عن الطريق.واشتدُّ إلى الكَثِيب: أُسرع إلى التلِّ الرملي.والرَّخَم: نوع من الطيور.وتَخُبُّ: من الخَبَب، وهو ضربٌ من العَدْوِ، وهو خَطْوٌّ فَسِيحٌ.والعَرِيف: القيّم بأمور القبيلة أو الجماعة من الناس، يلي أُمورهم ويتعرف الأمير منه أحوالهم.والبَريد: الرسُول.والنقيب: هو كالعريف على القوم الذي يتعرف أخبارَهم وينقّب عن أحوالهم؛ أي: يُفتش.والعَيْبة: وعاء من جلد ونحوه يكون فيه المتاعُ.ويَمَانٍ: نسبة لليمن، والألف فيها عوض من ياء النسبة.
5559 [3] - في (ز) و (ب) قارب، بالياء، بدلٌ الفاء، وهما بمعنًى. وأخرجه ابن حبان (6671) عن أبي خليفة الفَضل بن الحُباب، عن علي بن المديني، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 35/ (21373) عن إسحاق بن عيسى، وابن حبان (6670) من طريق الحسن بن محمد بن الصبَّاح، كلاهما عن يحيى بن سُلَيم، به.وأنظر ما تقدم برقم (5542).والفَلَاة: المفازة والأرض القَفْر.والحاجُّ: هو في الأصل يُطلق على الواحد من الحُجّاج، وربما أُطلق الحاجُّ على الجماعة مجازًا واتساعًا، كما جاء هنا.وتَقطَّعتِ الطريقُ: انقطع الناسُ عن الطريق.واشتدُّ إلى الكَثِيب: أُسرع إلى التلِّ الرملي.والرَّخَم: نوع من الطيور.وتَخُبُّ: من الخَبَب، وهو ضربٌ من العَدْوِ، وهو خَطْوٌّ فَسِيحٌ.والعَرِيف: القيّم بأمور القبيلة أو الجماعة من الناس، يلي أُمورهم ويتعرف الأمير منه أحوالهم.والبَريد: الرسُول.والنقيب: هو كالعريف على القوم الذي يتعرف أخبارَهم وينقّب عن أحوالهم؛ أي: يُفتش.والعَيْبة: وعاء من جلد ونحوه يكون فيه المتاعُ.ويَمَانٍ: نسبة لليمن، والألف فيها عوض من ياء النسبة.
5559 [4] - إسناده حسنٌ من أجل يحيى بن سُليم الطائفي، فهو صدوق حسن الحديث، وقد تلقَّى عنه هذا الخبر جمعٌ من الأئمة الحفّاظ، ولا يُحفَظ عن غيره موصولًا وقد حسَّن هذه الرواية في وفاة أبي ذرٍّ ابن القيم في "زاد المعاد" 3/ 534، ورجَّحها على رواية ابن مسعود المتقدمة عند المصنّف برقم (4421). وأخرجه ابن حبان (6671) عن أبي خليفة الفَضل بن الحُباب، عن علي بن المديني، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 35/ (21373) عن إسحاق بن عيسى، وابن حبان (6670) من طريق الحسن بن محمد بن الصبَّاح، كلاهما عن يحيى بن سُلَيم، به.وأنظر ما تقدم برقم (5542).والفَلَاة: المفازة والأرض القَفْر.والحاجُّ: هو في الأصل يُطلق على الواحد من الحُجّاج، وربما أُطلق الحاجُّ على الجماعة مجازًا واتساعًا، كما جاء هنا.وتَقطَّعتِ الطريقُ: انقطع الناسُ عن الطريق.واشتدُّ إلى الكَثِيب: أُسرع إلى التلِّ الرملي.والرَّخَم: نوع من الطيور.وتَخُبُّ: من الخَبَب، وهو ضربٌ من العَدْوِ، وهو خَطْوٌّ فَسِيحٌ.والعَرِيف: القيّم بأمور القبيلة أو الجماعة من الناس، يلي أُمورهم ويتعرف الأمير منه أحوالهم.والبَريد: الرسُول.والنقيب: هو كالعريف على القوم الذي يتعرف أخبارَهم وينقّب عن أحوالهم؛ أي: يُفتش.والعَيْبة: وعاء من جلد ونحوه يكون فيه المتاعُ.ويَمَانٍ: نسبة لليمن، والألف فيها عوض من ياء النسبة.
5560 - حَدَّثَنَا أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حَدَّثَنَا إبراهيم بن إسحاق الحَرْبي، حدثني مصعب بن عبد الله الزُّبيري، قال: حبيبُ بن مَسْلَمة بن مالك الأكبر ابن وَهْب بن ثعلبة بن وائلة [1] بن عمرو بن شَيبان بن مُحارِب بن فِهْر، كان شريفًا قد سَمِعَ من النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم، وكان يقال له: حَبيبُ الرُّوم، من كثرةِ دُخُوله عليهم، قال: وفيه يقول شُرَيح بن الحارث:ألَا كلُّ مَن يُدعَى حَبيبًا ولو بَدَتْ … مُروءَتُه يَفْدي حبيبَ بني فِهْرِهُمَامٌ يَقُودُ الخيلَ حتَّى كأَنَّما … يَطأْنَ برَضْراضِ الحصى جاحِمَ [2] الجَمْرِ
মুস'আব ইবনে আব্দুল্লাহ আয-যুবাইরী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: হাবীব ইবনে মাসলামাহ ইবনে মালিক আল-আকবার ইবনে ওয়াহব ইবনে সা'লাবাহ ইবনে ওয়া'ইলাহ ইবনে আমর ইবনে শাইবান ইবনে মুহারিব ইবনে ফিহর ছিলেন সম্ভ্রান্ত এবং তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে শুনেছিলেন। আর তাকে হাবীব আর-রূম (রোমক/খ্রিস্টানদের হাবীব) বলা হতো, কারণ তিনি তাদের (রোমান সাম্রাজ্যের) অভ্যন্তরে বেশি প্রবেশ করতেন। তিনি (মুস'আব) বলেন: তাঁর সম্পর্কে শুরাইহ ইবনে আল-হারিস বলেন:
সাবধান! যে-কাউকে যদি হাবীব বলে ডাকা হয়, তার পৌরুষ প্রকাশ পেলেও, সে অবশ্যই বনী ফিহরের হাবীবের কাছে আত্মোৎসর্গ করবে।
তিনি সেই বীর, যিনি অশ্বারোহী বাহিনীকে নেতৃত্ব দেন, যেন তাদের ঘোড়াগুলো নুড়ি-পাথরের উপর দিয়ে জ্বলন্ত অঙ্গারের উপর পদদলিত করছে।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] المثبت بالثاء المُثلَّثة من (ز) و (ب)، وأُهملت في (ص) و (م)، وقد ضبطها بالثاء المثلثة محمد بن حبيب البغدادي في "مختلف القبائل ومؤتلفها" ص 98، والحسين بن علي المغربي في "الإيناس في علم الأنساب" ص 263، ومجد الدين بن الأثير في "جامع الأصول" في قسم التراجم 12/ 289، وخالفهم غيرُهم فقالوا: وائلة منهم الدارقطني في "المؤتلف والمختلف" 4/ 288، وابن حزم في "الجمهرة" ص 178، وابن ماكولا في "الإكمال" 7/ 385.
[2] تحرَّف في (ص) و (م) إلى: حماحم، وتصحف في (ز) و (ب) إلى: حاجم، والمثبت على الصواب من "تلخيص الذهبي"، والجمرُ الجاحمُ: هو ما اشتدَّ اشتعالُه. وفي "نسب قريش" لمصعب الزبيري ص 447: فاحم الجَمْر. وليس ببعيدٍ إدراك عطية بن قيس للقصة إذ كانت ولادتُه في حدود سنة سبع عشرة، وأما راشد بن سعد ففي إدراكه لها نظر.وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 6/ 355، ومن طريقه أخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 12/ 76 - 77 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وقال ابن عساكر بإثره: أسقط منه ابن المبارك ولا بُدَّ منه. قلنا: منه. قلنا: يعني أنه أُسقط ذكره بين أبي إسحاق الفزاري وبين أبي بكر الغَسّاني.وأخرجه أبو عَروبة الحَرّاني في "الأوائل" (130)، ومن طريقه ابن عساكر 12/ 76 عن المسيب بن واضح، عن أبي إسحاق الفزاري، عن ابن المبارك، عن أبي بكر الغساني، عن عطية بن قيس، عن راشد بن سعد. قال ابن عساكر: قوله: عن عطية عن راشد وهمٌ، وصوابه: عن عطية وراشد كما في رواية الحاكم.وأخرج ابن عساكر 12/ 74 من طريق سعيد بن عبد العزيز، و 12/ 75 من طريق ابن أبي ذئب، فذكرا القصة بنحوٍ ممّا هنا، وروايتهما منقطعة.وذكرها الواقدي كذلك كما في "تاريخ الطبري" 4/ 248، لكن مرسلة بدون إسناد.
5561 - أخبرنا الشيخ الإمام أبو بكر، أخبرنا محمد بن أحمد بن النضر، حَدَّثَنَا معاوية بن عمرو، عن أبي إسحاق الفَزَاري، حَدَّثَنَا أبو بكر الغَسّاني، عن عَطيّة بن قيس وراشد بن سعد، قالا: سارتِ الرومُ إلى حَبيب بن مَسْلَمة وهو بإرمينِيَةَ، فكتب إلى معاويةَ يَستمِدُّه، فكتب معاويةُ إلى عثمانَ بذلك، فكتب عثمانُ إلى أميرِ العراق: يأمرُه أن يُمِدَّ حَبيبًا، فأمَدّه بأهلِ العراق، وأمَّر عليهم سَلْمَانَ بن ربيعة الباهِلي، فسارُوا يريدون غِيَاثَ حَبيبٍ، فلم يبلُغُوهم حتَّى لقي هو وأصحابُه العدوَّ ففَتَحَ اللهُ لهم، فلما قدم سَلْمانُ وأصحابُه على حَبيبٍ سألُوهُم أَن يُشْرِكُوهم في الغَنِيمة، وقالوا: قد أمْدَدْناكم، وقال أهلُ الشام: لم تَشهَدوا القتالَ، ليسَ لكم معنا شيءٌ، فأَبى حَبيبٌ أن يُشْرِكَهم، وحَوَى هو وأصحابُه على غَنِيمتهم، فتنازعَ أهلُ الشام وأهلُ العراق في ذلك، حتَّى كاد أن يكون بينهم في ذلك كَونٌ، فقال بعض أهل العراق شعرًا:إن تَقْتُلُوا سلمانَ نَقتُلْ حَبيبَكمْ … وإِن تَرحَلُوا نحوَ ابن عَفَّانَ نَرَحَلِقال أبو بكر الغَسّاني: وسمعت أنها أولُ عداوةٍ وقعت بين أهل الشام والعراق [1].
আতিয়্যাহ ইবনু কায়েস ও রাশিদ ইবনু সা'দ থেকে বর্ণিত, তারা উভয়ে বললেন: রোমানরা আরমেনিয়ায় অবস্থানরত হাবীব ইবনু মাসলামাহ্র দিকে অগ্রসর হয়। তখন তিনি (হাবীব) সাহায্য চেয়ে মু'আবিয়ার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাছে পত্র লেখেন। মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সে বিষয়ে উসমানকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পত্র লেখেন। উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন ইরাকের আমীরকে পত্র লেখেন এবং হাবীবকে সাহায্য করতে নির্দেশ দেন। অতএব তিনি (ইরাকের আমীর) ইরাকবাসীদের মাধ্যমে তাকে (হাবীবকে) সাহায্য করেন এবং সালমান ইবনু রাবী'আহ আল-বাহিলীকে তাদের নেতা নিযুক্ত করেন।
তারা হাবীবকে সাহায্য করার উদ্দেশ্যে রওয়ানা হন। কিন্তু তাদের পৌঁছানোর আগেই তিনি (হাবীব) ও তাঁর সাথীরা শত্রুদের মুখোমুখি হন এবং আল্লাহ্ তাঁদের জন্য বিজয় দান করেন। অতঃপর যখন সালমান ও তাঁর সাথীরা হাবীবের কাছে পৌঁছলেন, তখন তারা তাদের (হাবীব ও তাঁর সাথীদের) কাছে গনীমতের (যুদ্ধলব্ধ সম্পদ) ভাগীদার হতে চাইলেন। তারা বললেন: আমরা তো তোমাদের সাহায্য করতে এসেছিলাম। কিন্তু শামবাসীগণ (হাবীবের সাথীরা) বললেন: তোমরা তো যুদ্ধে অংশগ্রহণ করোনি, সুতরাং আমাদের সাথে তোমাদের কোনো অংশ নেই।
হাবীব তাদের ভাগ দিতে অস্বীকার করলেন এবং তিনি ও তাঁর সাথীরা নিজেদের গনীমতের সম্পদ হস্তগত করলেন। এ নিয়ে শামবাসী ও ইরাকবাসীদের মধ্যে মতবিরোধ সৃষ্টি হলো, এমনকি তাদের মধ্যে প্রায় একটি যুদ্ধ বেধে যাওয়ার উপক্রম হয়েছিল। তখন ইরাকবাসীদের মধ্যে কেউ কেউ কবিতা আবৃত্তি করে বললেন: "যদি তোমরা সালমানকে হত্যা করো, তবে আমরা তোমাদের হাবীবকে হত্যা করব। আর যদি তোমরা ইবনু আফফানের (উসমান) দিকে যাত্রা করো, তবে আমরাও যাত্রা করব।"
আবু বকর আল-ঘাস্সানী বলেন: আমি শুনেছি, এটিই ছিল শামবাসী ও ইরাকবাসীদের মধ্যে সংঘটিত প্রথম শত্রুতা।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] خبر حسنٌ، وهذا إسناد ضعيف لضعف أبي بكر الغَسّاني: وهو أبو بكر بن عبد الله بن أبي مريم. أبو إسحاق الفزاري: هو إبراهيم بن محمد بن الحارث. قلنا: قد رويت هذه القصة من وجهين بنحوٍ مما هنا، وهما منقطعان، لكن باجتماع هذه الوجوه الثلاثة يتقوَّى الخبر، والله أعلم، وليس ببعيدٍ إدراك عطية بن قيس للقصة إذ كانت ولادتُه في حدود سنة سبع عشرة، وأما راشد بن سعد ففي إدراكه لها نظر.وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 6/ 355، ومن طريقه أخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 12/ 76 - 77 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وقال ابن عساكر بإثره: أسقط منه ابن المبارك ولا بُدَّ منه. قلنا: منه. قلنا: يعني أنه أُسقط ذكره بين أبي إسحاق الفزاري وبين أبي بكر الغَسّاني.وأخرجه أبو عَروبة الحَرّاني في "الأوائل" (130)، ومن طريقه ابن عساكر 12/ 76 عن المسيب بن واضح، عن أبي إسحاق الفزاري، عن ابن المبارك، عن أبي بكر الغساني، عن عطية بن قيس، عن راشد بن سعد. قال ابن عساكر: قوله: عن عطية عن راشد وهمٌ، وصوابه: عن عطية وراشد كما في رواية الحاكم.وأخرج ابن عساكر 12/ 74 من طريق سعيد بن عبد العزيز، و 12/ 75 من طريق ابن أبي ذئب، فذكرا القصة بنحوٍ ممّا هنا، وروايتهما منقطعة.وذكرها الواقدي كذلك كما في "تاريخ الطبري" 4/ 248، لكن مرسلة بدون إسناد.
5562 - أخبرني محمد بن يوسف بن إبراهيم العَدْل، حَدَّثَنَا محمد بن عِمران النَّسَوي، حَدَّثَنَا أحمد بن زهير بن حَرْب، قال: سمعت أبي يقول: حبيبُ بنُ مَسلَمة أبو عبد الرحمن [1].
৫৫৬২ – আমাকে খবর দিয়েছেন মুহাম্মাদ ইব্ন ইউসুফ ইব্ন ইবরাহীম আল-আদল, আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইব্ন ইমরান আন-নাসাওয়ী, আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আহমাদ ইব্ন যুহায়র ইব্ন হারব, তিনি বলেন: আমি আমার পিতাকে বলতে শুনেছি: (তিনি হলেন) হাবীব ইব্ন মাসলামা আবূ আব্দুর রহমান [১]।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وأخرجه أبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" 2/ 119، وابن عساكر عن أحمد بن زهير.
5563 - حَدَّثَنَا أبو العباس محمد بن يعقوب، حَدَّثَنَا الرَّبيع بن سُليمان، حَدَّثَنَا بِشْر بن بَكر، حَدَّثَنَا عبد الرحمن بن ثابت بن ثَوْبان، عن أبيه، عن مَكحُول، عن زياد [1] ابن جارية [2] عن حبيب بن مَسلَمة، قال: شهدتُ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم نَفَّلَ الثُلثَ [3].
হাবীব ইবনে মাসলামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এক-তৃতীয়াংশ অতিরিক্ত প্রদান (নাফল) করতে দেখেছি।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ز) و (ب): يزيد، والمثبت من (ص) و (م)، فهو وإن كان يزيد محكيًا في اسمه أيضًا، لكن قال البخاري في "تاريخه الكبير" 3/ 348: الصحيح زياد.
[2] تصحف في (ز) و (م) و (ب) إلى حارثة، وأُهملت في (ص)، والمثبت على الصواب من النسخة المحمودية كما في طبعة الميمان، وفاقًا لمصادر الترجمة والتخريج.
5563 [3] - حديث صحيح، وهذا إسناد حسنٌ من أجل عبد الرحمن بن ثابت بن ثوبان، فهو حسن الحديث، وقد توبع فيما تقدم عند المصنّف برقم (2631) و (2632) وما سيأتي برقم (5941) بأسانيد صحاح.
5564 - حَدَّثَنَا إسماعيل بن محمد الفقيه بالرَّيّ، حَدَّثَنَا أبو حاتم الرازِيّ، حَدَّثَنَا أبو اليَمَان، حَدَّثَنَا إسماعيل بن عيّاش عن صفوان بن عمرو، عن أبي اليَمَان عامر بن عبد الله بن لُحَيٍّ [1]: أنَّ أبا ذَرٍّ الغِفاريَّ والناسَ كانوا يُسمُّون حبيبَ بن مَسلَمة: حبيبَ الرومِ، لكثرةِ مُجاهَدَتِه الرُّومَ [2].
আবু যার্র আল-গিফারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি এবং অন্যান্য লোকেরা হাবীব ইবনে মাসলামাহকে ‘হাবীব আর-রূম’ নামে ডাকতেন, কারণ তিনি রোমকদের বিরুদ্ধে প্রচুর জিহাদ করতেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرّف في (ز) و (ب) إلى: يحيى. "معرفة الصحابة" (2166)، وابن عساكر 22/ 357 - 358، وابن الجوزي في "العلل المتناهية" (1239) من طرق عن أزهر بن زُفَر، بهذا الإسناد.وقال المنذري في "الترغيب والترهيب": هذا الحديث قد روي عن جماعة من الصحابة، وقد اعتنى غير واحدٍ من الحفاظ بجمع طرقه والكلام عليها، ولم أقف له على طريق صحيح كما قال البزار، بل له أسانيد حِسان عند الطبراني وغيره.وقال السخاوي في "المقاصد الحسنة" (537): وأفرد أبو نعيم طُرُقه ثم شيخُنا (يعني ابنَ حجر) في "الإنارة بطُرق غِبّ الزيارة"، وبمجموعها يتقوَّى الحديث.وانظر "فتح الباري" لابن حجر 18/ 472 - 473.وقوله: "زُر غِبًّا" معناه: زُر أخاك وقتًا بعد وقتٍ، ولا تُلازم زيارته كلَّ يوم.
[2] رجاله لا بأس بهم، لكنه مرسل فإنَّ أبا اليمان عامر بن عبد الله لا يدرك أبا ذرٍّ. وذلك مشهور في وصف حبيب بن مسلمة.أبو حاتم الرازي: هو محمد بن إدريس، وأبو اليمان: هو الحكم بن نافع.وهو عند أحمد بن عبد الله بن البرقي كما في "تهذيب الكمال" للمزي 5/ 398 عن عمرو بن أبي سلمة، عن إسماعيل بن عياش به. "معرفة الصحابة" (2166)، وابن عساكر 22/ 357 - 358، وابن الجوزي في "العلل المتناهية" (1239) من طرق عن أزهر بن زُفَر، بهذا الإسناد.وقال المنذري في "الترغيب والترهيب": هذا الحديث قد روي عن جماعة من الصحابة، وقد اعتنى غير واحدٍ من الحفاظ بجمع طرقه والكلام عليها، ولم أقف له على طريق صحيح كما قال البزار، بل له أسانيد حِسان عند الطبراني وغيره.وقال السخاوي في "المقاصد الحسنة" (537): وأفرد أبو نعيم طُرُقه ثم شيخُنا (يعني ابنَ حجر) في "الإنارة بطُرق غِبّ الزيارة"، وبمجموعها يتقوَّى الحديث.وانظر "فتح الباري" لابن حجر 18/ 472 - 473.وقوله: "زُر غِبًّا" معناه: زُر أخاك وقتًا بعد وقتٍ، ولا تُلازم زيارته كلَّ يوم.
5565 - أخبرني عبد الله بن غانِم، حَدَّثَنَا محمد بن إبراهيم العَبْدي، حَدَّثَنَا يحيى بن بُكَير، قال: تُوفّي حَبيب بن مَسلَمة بإرمِينِيَةَ سنة اثنتين وأربعين وهو ابن خمسين سنةً [1].
ইয়াহইয়া ইবনু বুকাইর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: হাবীব ইবনু মাসলামাহ আরমিনিয়ায় বিয়াল্লিশ (৪২) হিজরী সনে মৃত্যুবরণ করেন। সে সময় তাঁর বয়স ছিল পঞ্চাশ বছর।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وأخرجه الطبراني في "الكبير" (3517) عن أبي الزِّنْباع روح بن الفرج، عن يحيى بن بُكَير. لكن دون ذكر مكان وفاة حبيب بن مسلمة. ووفاته بإرمينية متفق عليها كما في "تاريخ دمشق" 68 - 81. وأما سنة وفاته فمختلف فيها، فقد ذهب الهيثم بن عدي والمدائني إلى أنه توفي سنة إحدى وأربعين، وجُمهورهم على مثلِ قول ابن بُكَير. "معرفة الصحابة" (2166)، وابن عساكر 22/ 357 - 358، وابن الجوزي في "العلل المتناهية" (1239) من طرق عن أزهر بن زُفَر، بهذا الإسناد.وقال المنذري في "الترغيب والترهيب": هذا الحديث قد روي عن جماعة من الصحابة، وقد اعتنى غير واحدٍ من الحفاظ بجمع طرقه والكلام عليها، ولم أقف له على طريق صحيح كما قال البزار، بل له أسانيد حِسان عند الطبراني وغيره.وقال السخاوي في "المقاصد الحسنة" (537): وأفرد أبو نعيم طُرُقه ثم شيخُنا (يعني ابنَ حجر) في "الإنارة بطُرق غِبّ الزيارة"، وبمجموعها يتقوَّى الحديث.وانظر "فتح الباري" لابن حجر 18/ 472 - 473.وقوله: "زُر غِبًّا" معناه: زُر أخاك وقتًا بعد وقتٍ، ولا تُلازم زيارته كلَّ يوم.
5566 - حَدَّثَنَا أحمد بن الحسن البَزَّار، حَدَّثَنَا أزهر بن زُفَر المِصري [1]، حَدَّثَنَا أبو أسلَمَ محمد بن مَخْلِدِ الرُّعَيني، حَدَّثَنَا سليمان بن أبي كَرِيمة، عن مَكحُول، عن قَزَعة بن يحيى، عن حَبيب بن مَسْلَمة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "زُرْ غِبًّا تَزْدَدْ، حُبًّا" [2].
হাবীব ইবনে মাসলামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তুমি বিরতি দিয়ে সাক্ষাৎ করো, এতে ভালোবাসা বৃদ্ধি পাবে।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في (ص) و (م) إلى: البصري. "معرفة الصحابة" (2166)، وابن عساكر 22/ 357 - 358، وابن الجوزي في "العلل المتناهية" (1239) من طرق عن أزهر بن زُفَر، بهذا الإسناد.وقال المنذري في "الترغيب والترهيب": هذا الحديث قد روي عن جماعة من الصحابة، وقد اعتنى غير واحدٍ من الحفاظ بجمع طرقه والكلام عليها، ولم أقف له على طريق صحيح كما قال البزار، بل له أسانيد حِسان عند الطبراني وغيره.وقال السخاوي في "المقاصد الحسنة" (537): وأفرد أبو نعيم طُرُقه ثم شيخُنا (يعني ابنَ حجر) في "الإنارة بطُرق غِبّ الزيارة"، وبمجموعها يتقوَّى الحديث.وانظر "فتح الباري" لابن حجر 18/ 472 - 473.وقوله: "زُر غِبًّا" معناه: زُر أخاك وقتًا بعد وقتٍ، ولا تُلازم زيارته كلَّ يوم.
[2] حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف سليمان بن أبي كريمة ومحمد بن مخلد الرُّعيني.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (3535)، وفي "الأوسط" (3052)، وفي "الصغير" (296)، وفي "مسند الشاميين" (3563)، وابن عُدي 3/ 262، وتمّام الرازي في "فوائده" (64) وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (2166)، وابن عساكر 22/ 357 - 358، وابن الجوزي في "العلل المتناهية" (1239) من طرق عن أزهر بن زُفَر، بهذا الإسناد.وقال المنذري في "الترغيب والترهيب": هذا الحديث قد روي عن جماعة من الصحابة، وقد اعتنى غير واحدٍ من الحفاظ بجمع طرقه والكلام عليها، ولم أقف له على طريق صحيح كما قال البزار، بل له أسانيد حِسان عند الطبراني وغيره.وقال السخاوي في "المقاصد الحسنة" (537): وأفرد أبو نعيم طُرُقه ثم شيخُنا (يعني ابنَ حجر) في "الإنارة بطُرق غِبّ الزيارة"، وبمجموعها يتقوَّى الحديث.وانظر "فتح الباري" لابن حجر 18/ 472 - 473.وقوله: "زُر غِبًّا" معناه: زُر أخاك وقتًا بعد وقتٍ، ولا تُلازم زيارته كلَّ يوم.
5567 - أخبرنا الشيخُ الإمام أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا بِشْر بن موسى، حَدَّثَنَا أبو عبد الرحمن المُقرئ، حَدَّثَنَا ابن لَهِيعة، قال: حدثني أبو هُبَيرة، عن حَبيب بن مَسْلَمة الفِهْري - وكان مجابَ الدعوة - أنه أُمِّر على جيشٍ، فدَرَّب الدُّرُوبَ، فلما أتى العَدوَّ قال: سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: "لا يَجتمعُ مَلأٌ فيدعُو بعضُهم، ويُؤمِّنُ بعضُهم [1] إلَّا أجابَهُم الله"، ثم إنه حَمِدَ الله وأثنى عليه، ثم قال: اللهمَّ احقِنْ دِماءَنا، واجعل أجورَنا أجورَ الشهداءِ، فبينما هم على ذلك إذ نَزَل الهنباطُ [2] أميرُ العدوِّ، فدخل على حَبيبٍ سُرادِقَه [3]. ذكرُ مناقب المِقْداد بن عمرو الكِنْدي وهو الذي قِيل له: ابن الأسْوَد
হাবীব ইবনু মাসলামা আল-ফিহরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, —তিনি ছিলেন এমন ব্যক্তি, যাঁর দু'আ কবুল হতো— একদা তাঁকে একটি বাহিনীর প্রধান নিযুক্ত করা হলো। তিনি সেনাবাহিনীর বিন্যাস করলেন। যখন তিনি শত্রুর সম্মুখীন হলেন, তখন তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে বলতে শুনেছি: “যখন কোনো দল একত্রিত হয়ে তাদের মধ্যে কেউ দু'আ করে এবং অন্যরা তাতে 'আমীন' বলে, তখন আল্লাহ তাদের দু'আ অবশ্যই কবুল করেন।” অতঃপর তিনি আল্লাহর প্রশংসা ও স্তুতি জ্ঞাপন করলেন। এরপর বললেন: হে আল্লাহ! আপনি আমাদের রক্ত রক্ষা করুন এবং আমাদের প্রতিদানকে শহীদগণের প্রতিদানের সমতুল্য করুন। তারা যখন এই অবস্থায় ছিল, তখন শত্রুবাহিনীর সেনাপতি আল-হানবাত (স্বয়ং) নেমে এলো এবং হাবীবের তাঁবুতে প্রবেশ করল।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ز) و (ب): البعض، وفي (م) و "تلخيص الذهبي": بعضٌ، والمثبت من (ص) هو الموافق لرواية البيهقي في "دلائل النبوة" 7/ 113 عن أبي عبد الله الحاكم. يُدرك حبيبَ بن مسلمة، وابنُ لَهِيعة - وهو عبد الله - روايةُ العبادلةِ عنه لا بأس بها، ومنهم أبو عبد الرحمن المقرئ - وهو عبد الله بن يزيد - فيبقى الشأن في انقطاع الإسناد.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 7/ 113، ومن طريقه ابن عساكر 12/ 77 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (3536)، ومن طريقه ابن عساكر 12/ 77 عن بشر بن موسى، به.قوله: دَرَّب الدُّرُوب، معناه دَخَل أرض العدو من بلاد الروم، وكل مَدخلٍ إلى الروم دَرْبٌ من دُرُوبها.والسُّرادِق: كل ما أحاط بشيء من حائط أو خِباء.
[2] المثبت من "تلخيص الذهبي"، وفي (ز) و (ب): الهباط، وهو تحريف، وفي (ص) و (م): الهيباط، بالياء التحتانية بدل النون، وبذلك ضبطه رضي الدين الصّغاني في "العباب الزاخر"، وتبعه صاحب "القاموس"، وخطَّأه "الزَّبيديُّ في "تاج العروس"، وهو كما قال، فقد ضبطه بالنون كلٌّ من أبي موسى المديني في "المجموع المغيث في غريبي القرآن والحديث" 3/ 513، وابنِ الأثير في "النهاية" 5/ 278، لكن اختلفت نُسَخ الكتابين في ضبط الهاء بالكسر والضّمّ، وفي "لسان العرب" بفتحها. وقد فسّره الطبراني بإثر روايته في "الكبير" (3536) بأنه بالرومية صاحبُ الجيش. يُدرك حبيبَ بن مسلمة، وابنُ لَهِيعة - وهو عبد الله - روايةُ العبادلةِ عنه لا بأس بها، ومنهم أبو عبد الرحمن المقرئ - وهو عبد الله بن يزيد - فيبقى الشأن في انقطاع الإسناد.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 7/ 113، ومن طريقه ابن عساكر 12/ 77 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (3536)، ومن طريقه ابن عساكر 12/ 77 عن بشر بن موسى، به.قوله: دَرَّب الدُّرُوب، معناه دَخَل أرض العدو من بلاد الروم، وكل مَدخلٍ إلى الروم دَرْبٌ من دُرُوبها.والسُّرادِق: كل ما أحاط بشيء من حائط أو خِباء.
5567 [3] - إسناده ضعيف لانقطاعه، لأنَّ أبا هبيرة - وهو عبد الله بن هبيرة بن أسعد المصري - لم يُدرك حبيبَ بن مسلمة، وابنُ لَهِيعة - وهو عبد الله - روايةُ العبادلةِ عنه لا بأس بها، ومنهم أبو عبد الرحمن المقرئ - وهو عبد الله بن يزيد - فيبقى الشأن في انقطاع الإسناد.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 7/ 113، ومن طريقه ابن عساكر 12/ 77 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (3536)، ومن طريقه ابن عساكر 12/ 77 عن بشر بن موسى، به.قوله: دَرَّب الدُّرُوب، معناه دَخَل أرض العدو من بلاد الروم، وكل مَدخلٍ إلى الروم دَرْبٌ من دُرُوبها.والسُّرادِق: كل ما أحاط بشيء من حائط أو خِباء.
5568 - حَدَّثَنَا أبو العباس محمد بن يعقوب، حَدَّثَنَا أحمد بن عبد الجبّار، حَدَّثَنَا يونس بن بُكَير، عن ابن إسحاق، قال: وممَّن شهد بدرًا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم من بني زُهْرة ومن حُلفائهم، المِقدادُ بن عَمرو بن ثَعْلبة بن مالك بن زَمْعة بن ثُمَامة بن مَطرُود بن عَمرو بن رَبِيعة بن زُهير بن نَمِر بن ثعلبة بن مالك [1].
ইবনু ইসহাক থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বদরের যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছিলেন, বনু যুহরাহ গোত্র ও তাদের মিত্রদের মধ্য থেকে, তিনি হলেন মিকদাদ ইবনু আমর ইবনু ছা'লাবাহ ইবনু মালিক ইবনু যামআহ ইবনু ছুমামাহ ইবনু মাত্রুদ ইবনু আমর ইবনু রাবীআহ ইবনু যুহাইর ইবনু নামির ইবনু ছা'লাবাহ ইবনু মালিক।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وهو عند ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 60/ 158 من طريق رضوان بن أحمد، عن أحمد بن عبد الجبار، به. لكن جاء فيه ذكر ربيعة بدل زمعة، وجاء فيه كذلك في نسبه بعد مطرود بن عمرو: زهير بن سعد بن الحارث بن الهُذيل البَهْراني!وهو في "سيرة ابن هشام" كذلك - وهي روايته عن زياد البكائي عن ابن إسحاق - 1/ 680 بذكر ربيعة بدلٌ زمعة أيضًا، وجاء فيها بعد مطرود بن عمرو: سعد بن زهير بن ثور بن ثعلبة بن مالك.وكذلك نسبه إبراهيم بن سعد في روايته عن ابن إسحاق عند أبي نعيم في "معرفة الصحابة" (6167) وكذلك يحيى بن سعيد الأُموي في روايته عن ابن إسحاق عند البغوي في "معجم الصحابة 2/ 292 - 293، لكنهما ذكرا لُؤَيًا بدل ثورٍ. وهو الذي صوَّبه أبو ذر الخُشني في "الإملاء المختصر في شرح غريب السير" ص 99.وكذلك نسبه خليفة في "طبقاته" ص 16 و 120 غير أنه قال: دَهير، بدلٌ زُهير، وهو قول محكي في اسمه، كما ذكر ابن هشام في "السيرة" 1/ 326. وذكر خليفة سعدًا في نسبه. وأما الواقدي فنسبه في "المغازي" 1/ 155، فقال: بن مطرود بن زهير بن ثعلبة بن مالك.
5569 - أخبرنا أبو جعفر البغدادي، حَدَّثَنَا أبو عُلَاثة، حَدَّثَنَا أبي، حَدَّثَنَا ابن لَهِيعة، عن أبي الأسْوَد، عن عُروة، في تسمية من شهد بدرًا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم من بني زُهْرة، ومن حُلفائهم: المِقدادُ بن عَمرو [1].
উরওয়াহ থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে যারা বনু জুহরাহ গোত্র এবং তাদের মিত্রদের মধ্য থেকে বদরের যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছিলেন, তাদের নামকরণের প্রসঙ্গে: মিকদাদ ইবনু আমর।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وأخرجه الطبراني في "الكبير" 20 / (552) عن أبي عُلَاثة محمد بن عمرو بن خالد، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن عساكر 60/ 158 من طريق الوليد بن مسلم، عن ابن لَهِيعة. أنَّ عمرو بن ثعلبة البَهْراني أبا المقداد صاحبَ رسول الله صلى الله عليه وسلم أصاب دمًا في قومه، فلحق بحضرموت وتزوج امرأة من الصَّدَف من بطن يقال لهم: بنو شكل … فولدت له المقداد، فجرى بين إخوته لأمّه وبين أبي شمر حجر بن مُرّة - وكان قَيلًا من أقيال حضرموت يقال له: الأذمري - كلامٌ، فشدّ المقداد على أبي شمر فضربه بالسيف على رجله فعَرِج، وهرب المقداد إلى مكة، وغنم أبو شمر وأصحابه أصحاب المقداد … فدخل المقداد مكة فنظر إلى رجل يطوف بالبيت متقلدًا سيفين … فسأل عنه، فقيل: هذا الأسود بن عبد يغوث بن عبد مناف بن زُهْرة، فأتاه المقداد وأخبره وسأل أن يحالفه وأن يُجيره، ففعل الأسودُ.وقولُ ابن الكلبي هذا يخالف رواية ابن لَهِيعة الذي جعل المقداد هو من أصاب دمًا في قومه لا أباه، فالله تعالى أعلم.
5570 - أخبرني أحمد بن يعقوب الثَّقفي، حَدَّثَنَا موسى بن زكريا التُّسْتَري، حَدَّثَنَا شَبَابٌ العُصْفُري، قال: قال ابن إسحاق: نُسِب المقدادُ إلى الأسود بن عبد يَغُوثَ بن وهبِ بن عبد مَناف بن زُهْرة لأنَّهُ تَبنّاه، ويقال: إلى الأسود بن أبي قَيس بن عبد مَناف بن زُهْرة [1].
ইবনু ইসহাক থেকে বর্ণিত, মিকদাদকে আসওয়াদ ইবনু আব্দ ইয়াগূস ইবনু ওয়াহব ইবনু আব্দ মানাফ ইবনু যুহরার সাথে সম্পর্কিত করা হয়েছিল, কারণ তিনি (আসওয়াদ) তাকে (মিকদাদকে) দত্তক নিয়েছিলেন। আবার বলা হয়, (তাকে) আসওয়াদ ইবনু আবী ক্বায়স ইবনু আব্দ মানাফ ইবনু যুহরার সাথে (সম্পর্কিত করা হয়েছিল)।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وهو في "الطبقات" لخليفة بن خياط ص 16 - 17. أنَّ عمرو بن ثعلبة البَهْراني أبا المقداد صاحبَ رسول الله صلى الله عليه وسلم أصاب دمًا في قومه، فلحق بحضرموت وتزوج امرأة من الصَّدَف من بطن يقال لهم: بنو شكل … فولدت له المقداد، فجرى بين إخوته لأمّه وبين أبي شمر حجر بن مُرّة - وكان قَيلًا من أقيال حضرموت يقال له: الأذمري - كلامٌ، فشدّ المقداد على أبي شمر فضربه بالسيف على رجله فعَرِج، وهرب المقداد إلى مكة، وغنم أبو شمر وأصحابه أصحاب المقداد … فدخل المقداد مكة فنظر إلى رجل يطوف بالبيت متقلدًا سيفين … فسأل عنه، فقيل: هذا الأسود بن عبد يغوث بن عبد مناف بن زُهْرة، فأتاه المقداد وأخبره وسأل أن يحالفه وأن يُجيره، ففعل الأسودُ.وقولُ ابن الكلبي هذا يخالف رواية ابن لَهِيعة الذي جعل المقداد هو من أصاب دمًا في قومه لا أباه، فالله تعالى أعلم.
5571 - فحدثنا بصِحّة ذلك أبو العباس محمد بن يعقوب، حَدَّثَنَا أبو الزِّنْباع رَوْح بن الفَرَج المصري، حَدَّثَنَا سعيد بن عُفَير [حَدَّثَنَا ابن لَهِيعة، عن يزيد بن أبي حبيب، عن ابن شُمَاسَة، عن سفيان بن صُهْبانة المَهْرِيّ] [1] قال: كنت صاحبًا للمقداد بن الأسود في الجاهلية، فأصابَ فيهم دمًا، فهَرَب إلى كِنْدةَ فحالَفَهم، ثم أصابَ فيهم دمًا، فهَرَب إلى مكة، فحالَفَ الأسودَ بن عبدِ يَغُوثَ، فلذلك نُسِب إليه [2].
সুফিয়ান বিন সুহ্বানাহ আল-মাহরি থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: জাহিলিয়্যাতের যুগে আমি মিকদাদ ইবনুল আসওয়াদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বন্ধু ছিলাম। তিনি (মিকদাদ) নিজ গোত্রে রক্তপাতের ঘটনা ঘটালে কিন্দাহ গোত্রের কাছে পালিয়ে গেলেন এবং তাদের সাথে মৈত্রী স্থাপন করলেন। এরপর তিনি তাদের (কিন্দাহ গোত্রের) মধ্যেও রক্তপাতের ঘটনা ঘটালে মক্কায় পালিয়ে গেলেন এবং আসওয়াদ ইবনে আব্দ ইয়াগূছের সাথে মৈত্রী স্থাপন করলেন। একারণেই তাঁকে (আসওয়াদের সাথে) সম্পর্কিত করে উল্লেখ করা হয়।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] ما بين المعقوفين سقط من النسخ الخطية ولا بدّ من ذكره، لقوله بعد ذلك: كنتُ صاحبًا للمقداد، واستدركناه من "معجم الطبراني الكبير" 20/ (558) حيث روى هذا الخبر عن أبي الزِّنباع. أنَّ عمرو بن ثعلبة البَهْراني أبا المقداد صاحبَ رسول الله صلى الله عليه وسلم أصاب دمًا في قومه، فلحق بحضرموت وتزوج امرأة من الصَّدَف من بطن يقال لهم: بنو شكل … فولدت له المقداد، فجرى بين إخوته لأمّه وبين أبي شمر حجر بن مُرّة - وكان قَيلًا من أقيال حضرموت يقال له: الأذمري - كلامٌ، فشدّ المقداد على أبي شمر فضربه بالسيف على رجله فعَرِج، وهرب المقداد إلى مكة، وغنم أبو شمر وأصحابه أصحاب المقداد … فدخل المقداد مكة فنظر إلى رجل يطوف بالبيت متقلدًا سيفين … فسأل عنه، فقيل: هذا الأسود بن عبد يغوث بن عبد مناف بن زُهْرة، فأتاه المقداد وأخبره وسأل أن يحالفه وأن يُجيره، ففعل الأسودُ.وقولُ ابن الكلبي هذا يخالف رواية ابن لَهِيعة الذي جعل المقداد هو من أصاب دمًا في قومه لا أباه، فالله تعالى أعلم.
[2] إسناده ضعيف من أجل ابن لَهِيعة - وهو عبد الله - ولا يُعرف ذِكرُ سُفيان بن صُهْبانة - ويقال: صُهابة - إلّا من طريقه. ابن شُمَاسَة: هو عبد الرحمن.وأخرجه الطبراني في "الكبير" 20 / (558)، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 60/ 155 عن أبي الزِّنْباع روح بن الفَرَج، بهذا الإسناد.ونقل محمد بن حبيب البغدادي في "المنمَّق في أخبار قريش" ص 363 عن هشام بن الكلبي: أنَّ عمرو بن ثعلبة البَهْراني أبا المقداد صاحبَ رسول الله صلى الله عليه وسلم أصاب دمًا في قومه، فلحق بحضرموت وتزوج امرأة من الصَّدَف من بطن يقال لهم: بنو شكل … فولدت له المقداد، فجرى بين إخوته لأمّه وبين أبي شمر حجر بن مُرّة - وكان قَيلًا من أقيال حضرموت يقال له: الأذمري - كلامٌ، فشدّ المقداد على أبي شمر فضربه بالسيف على رجله فعَرِج، وهرب المقداد إلى مكة، وغنم أبو شمر وأصحابه أصحاب المقداد … فدخل المقداد مكة فنظر إلى رجل يطوف بالبيت متقلدًا سيفين … فسأل عنه، فقيل: هذا الأسود بن عبد يغوث بن عبد مناف بن زُهْرة، فأتاه المقداد وأخبره وسأل أن يحالفه وأن يُجيره، ففعل الأسودُ.وقولُ ابن الكلبي هذا يخالف رواية ابن لَهِيعة الذي جعل المقداد هو من أصاب دمًا في قومه لا أباه، فالله تعالى أعلم.
5572 - أخبرنا الشيخ الإمام أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا إسماعيل بن قُتيبة، حَدَّثَنَا محمد بن عبد الله بن نُمير، قال: المِقدادُ بن الأسود، ويُكنى أبا مَعْبَد، مات سنة ثلاثين، بلغ نحوًا من سبعين سنةً، وكان يُصفِّر لِحْيتَه، مات بالجُرْفِ، فحُمِل على رِقاب الرِّجال، وصلَّى عليه عثمانُ بن عفّان رضي الله عنه، ودُفِن بالبقيع [1].
মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু নুমাইর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মিকদাদ ইবনুল আসওয়াদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যাঁর উপনাম ছিল আবু মা'বাদ, তিনি ত্রিশ (৩০) হিজরিতে ইন্তিকাল করেন। তিনি প্রায় সত্তর বছর বয়সে উপনীত হয়েছিলেন। তিনি তাঁর দাড়ি হলুদ রঙে রাঙাতেন। তিনি আল-জুরুফ নামক স্থানে ইন্তিকাল করেন। এরপর তাঁকে পুরুষদের কাঁধে বহন করে আনা হয়। উসমান ইবনু আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর জানাযার সালাত আদায় করেন এবং তাঁকে বাকী' (কবরস্থানে) দাফন করা হয়।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] كذلك جاء في نسخنا من "المستدرك" عن ابن نمير ذكر وفاة المقداد سنة ثلاثين، وجاء في "تاريخ العلماء ووفياتهم" لابن زَبْر الرَّبَعي 1/ 122 انَّ المقداد مات سنة ثلاث وثلاثين، والرَّبَعي يروي أخبار ابن نمير من طريقين كما بيَّنه في فاتحة كتابه، وهما: طريق محمد بن عبد الله بن سليمان الحضرمي، وطريق محمد بن إسماعيل الترمذي، كلاهما عن ابن نمير. فربما تكون لفظة "ثلاث" سقطت على بعض النُّساخ قديمًا.والجُرْف: موضع كان يقع شمال المدينة، وهو الآن حيٌّ من أحيائها متصلٌّ بها، فيه زراعة وسُكّان.
5573 - حَدَّثَنَا أبو عبد الله الأصبهَاني، حَدَّثَنَا الحَسن بن الجَهْم، حَدَّثَنَا الحُسين بن الفَرَج، حَدَّثَنَا محمد بن عُمر، قال: المِقداد بن عَمرو بن ثَعْلبة بن مالك بن رَبيعة، وذَكَر إلى قُضَاعةَ، كان يُكنى أبا مَعْبَد، وكان حالَفَ الأسودَ بن عبد يَغُوث الزُّهْرِيّ في الجاهلية، فتبنّاه، وكان يقال له: المِقداد بن الأسوَد، فلما نزل القرآن {ادْعُوهُمْ لِآبَائِهِمْ} [الأحزاب: 5] قيل له: المِقداد بن عَمرو. وهاجَرَ المِقدادُ إلى أرض الحبشة الهجرةَ الثانيةَ في رواية ابن إسحاق، وشهد المقداد بدرًا وأحدًا والخَندق والمَشاهِدَ كلَّها مع رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، وكان من الرُّمَاة المذكُورين من أصحابِ رسول الله صلى الله عليه وسلم [1].
মুহাম্মদ বিন উমর থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: মিকদাদ ইবনু আমর ইবনু সা'লাবা ইবনু মালিক ইবনু রাবী'আ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), এবং তিনি কুযা'আহ পর্যন্ত (তাঁর বংশ) উল্লেখ করেন। তাঁর উপনাম ছিল আবূ মা'বাদ। জাহিলিয়াতের যুগে তিনি আসওয়াদ ইবনু আব্দে ইয়াগূস আয-যুহরী’র সাথে মৈত্রী চুক্তি করেন। অতঃপর সে (আসওয়াদ) তাঁকে পোষ্যপুত্র হিসেবে গ্রহণ করে। ফলে তাঁকে মিকদাদ ইবনু আসওয়াদ বলে ডাকা হতো। যখন কুরআনের আয়াত নাযিল হলো: {তোমরা তাদেরকে তাদের পিতাদের নাম ধরে ডাকো} (সূরা আল-আহযাব: ৫), তখন তাঁকে মিকদাদ ইবনু আমর নামে ডাকা হলো। ইবনু ইসহাক (রাহিমাহুল্লাহ)-এর বর্ণনা অনুসারে, মিকদাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দ্বিতীয় হিজরতের সময় আবিসিনিয়ায় (হাবশার) ভূমিতে হিজরত করেছিলেন। আর মিকদাদ বদর, উহুদ, খন্দকসহ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সকল যুদ্ধে উপস্থিত ছিলেন। তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণের মধ্যে অন্যতম প্রসিদ্ধ তীরন্দাজ ছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] انظر "طبقات ابن سعد" 3/ 148 و 149. صَخْر. وعبدُ الله بن جعفر ثاني شيوخ الواقدي هنا: هو المَخرَمي الزهري.وما وقع عند المصنّف هنا من ذكر المؤاخاة بين المقداد وابن عتيك قاله محمد بن حبيب في "المحبَّر" ص 73، ووقع فيه: جبر بن عتيك.وقد جاء ما يخالف هذين القولين: فقد روى أبو الحسن الخِلَعي في "الخِلعيّات" (230) بسند ضعيف عن أبي رافع ذكر مؤاخاة رسول الله صلى الله عليه وسلم بين المقداد وعمار.وذكر ابن هشام في "السيرة النبوية" 2/ 560: أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم آخى بين المقداد وأبي ذر الغفاري.وروى ابن أبي خيثمة في السفر الثاني من "تاريخه" (2841)، وأبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" 5/ 293، وابن عساكر 60/ 157 من طريق إبراهيم بن سعد، عن سليمان بن محمد الأنصاري، عن رجل يقال له: الضحاك كان عالمًا … فذكر مؤاخاة المقداد لعبد الله بن رواحة. وإسناده ضعيف. فالله تعالى أعلم بالصواب.
5574 - قال ابن عُمر: حَدَّثَنَا موسى بن يعقوب، عن عَمَّتِه [عن أمّها] [1] كريمةَ بنت المِقداد: أنها وَصَفَتْ أباها لهم، فقالت: كان رجُلًا طوالًا، آدمَ، أَبْطَنَ، كثيرَ شَعر الرأسِ، يُصفِّرُ لِحْيتَه، وهي حَسَنةٌ ليست بالعَظيمةِ ولا بالخَفِيفَةِ، أَعْيَنَ مَقْرُونَ الحاجِبَين، أَقْنَى. قالت: ومات المقدادُ بالجُرْف على ثلاثة أميالٍ من المدينة، فحُمل على رِقاب الرجال، ودُفن بالمدينة، وصلَّى عليه عثمانُ بن عفّان، وذلك سنة ثلاثٍ وثلاثين، وكان يومَ ماتَ ابنَ سبعين سنةً أو نحوَها [2].
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, কারীমা বিনত আল-মিকদাদ তাঁর পিতা (মিকদাদ ইবনু আমর)-এর বর্ণনা দিয়ে বলেন: তিনি ছিলেন লম্বা, শ্যামলা বর্ণের, কিছুটা উদরবিশিষ্ট, মাথায় প্রচুর চুল ছিল। তিনি তাঁর দাড়ি হলুদ রং করতেন। তাঁর দাড়ি সুন্দর ছিল, যা খুব বেশি ঘনও ছিল না, আবার হালকাও ছিল না। তাঁর চোখ প্রশস্ত ছিল, ভ্রুদ্বয় সংযুক্ত এবং নাক ছিল উঁচু।
কারীমা বললেন: মিকদাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মদীনা থেকে তিন মাইল দূরত্বে অবস্থিত জুরুফ নামক স্থানে ইন্তিকাল করেন। এরপর তাঁকে লোকেদের কাঁধে বহন করে মদীনায় আনা হয় এবং সেখানেই তাঁকে দাফন করা হয়। উসমান ইবনু আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর জানাজার সালাত আদায় করান। এটি তেত্রিশ (৩৩) হিজরীর ঘটনা। যেদিন তিনি মারা যান, সেদিন তাঁর বয়স ছিল সত্তর বছর অথবা তার কাছাকাছি।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] ما بين معقوفين سقط من النسخ الخطية، ولا بدَّ منه، وقد استدركناه من "طبقات ابن سعد" 3/ 150 - ونقله عنه الطبريُّ في "ذيل المذيّل" كما في "منتخبه" لعُريب القرطبي 11/ 506 - حيث روى ابن سعد هذا عن شيخه محمد بن عمر الواقدي بسنده هذا الذي هنا، ومن طريق ابن سعد أخرجه ابن عساكر 60/ 154 و 182. صَخْر. وعبدُ الله بن جعفر ثاني شيوخ الواقدي هنا: هو المَخرَمي الزهري.وما وقع عند المصنّف هنا من ذكر المؤاخاة بين المقداد وابن عتيك قاله محمد بن حبيب في "المحبَّر" ص 73، ووقع فيه: جبر بن عتيك.وقد جاء ما يخالف هذين القولين: فقد روى أبو الحسن الخِلَعي في "الخِلعيّات" (230) بسند ضعيف عن أبي رافع ذكر مؤاخاة رسول الله صلى الله عليه وسلم بين المقداد وعمار.وذكر ابن هشام في "السيرة النبوية" 2/ 560: أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم آخى بين المقداد وأبي ذر الغفاري.وروى ابن أبي خيثمة في السفر الثاني من "تاريخه" (2841)، وأبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" 5/ 293، وابن عساكر 60/ 157 من طريق إبراهيم بن سعد، عن سليمان بن محمد الأنصاري، عن رجل يقال له: الضحاك كان عالمًا … فذكر مؤاخاة المقداد لعبد الله بن رواحة. وإسناده ضعيف. فالله تعالى أعلم بالصواب.
[2] وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 3/ 150، ومن طريقه ابن عساكر 60/ 154 و 182 عن محمد ابن عمر الواقدي، بهذا الإسناد. وعمة موسى: هي قُرَيبة بنت عبد الله بن وهب بن زَمْعة.آدَمُ: ذو سُمْرة شديدة.والأبطَنُ: عظيم البطن.والأقنى: طول الأنف ورقّة أَرنبته مع حدب في وسطه. صَخْر. وعبدُ الله بن جعفر ثاني شيوخ الواقدي هنا: هو المَخرَمي الزهري.وما وقع عند المصنّف هنا من ذكر المؤاخاة بين المقداد وابن عتيك قاله محمد بن حبيب في "المحبَّر" ص 73، ووقع فيه: جبر بن عتيك.وقد جاء ما يخالف هذين القولين: فقد روى أبو الحسن الخِلَعي في "الخِلعيّات" (230) بسند ضعيف عن أبي رافع ذكر مؤاخاة رسول الله صلى الله عليه وسلم بين المقداد وعمار.وذكر ابن هشام في "السيرة النبوية" 2/ 560: أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم آخى بين المقداد وأبي ذر الغفاري.وروى ابن أبي خيثمة في السفر الثاني من "تاريخه" (2841)، وأبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" 5/ 293، وابن عساكر 60/ 157 من طريق إبراهيم بن سعد، عن سليمان بن محمد الأنصاري، عن رجل يقال له: الضحاك كان عالمًا … فذكر مؤاخاة المقداد لعبد الله بن رواحة. وإسناده ضعيف. فالله تعالى أعلم بالصواب.
5575 - قال ابن عُمر: وحدثني محمدٌ عن عاصمِ بن عُمر، وعبدُ الله بنُ جعفر، بالمُؤاخاة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم آخَى بين المِقدادِ وجُبيرِ [1] بن عَتِيك [2].
ইবন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মুহাম্মাদ আমাকে আসিম ইবন উমার এবং আবদুল্লাহ ইবন জা’ফর থেকে মুআখাত (ভ্রাতৃত্ব বন্ধন) সম্পর্কে বর্ণনা করেছেন যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মিকদাদ ও জুবাইর ইবন আতীক-এর মাঝে ভ্রাতৃত্ব বন্ধন স্থাপন করেছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] المثبت من (ص) و (م) و (ب)، وفي (ز) غير واضحة إلّا أنها أقرب إلى جَبْر، وهي كذلك في "تلخيص المستدرك" للذهبي. صَخْر. وعبدُ الله بن جعفر ثاني شيوخ الواقدي هنا: هو المَخرَمي الزهري.وما وقع عند المصنّف هنا من ذكر المؤاخاة بين المقداد وابن عتيك قاله محمد بن حبيب في "المحبَّر" ص 73، ووقع فيه: جبر بن عتيك.وقد جاء ما يخالف هذين القولين: فقد روى أبو الحسن الخِلَعي في "الخِلعيّات" (230) بسند ضعيف عن أبي رافع ذكر مؤاخاة رسول الله صلى الله عليه وسلم بين المقداد وعمار.وذكر ابن هشام في "السيرة النبوية" 2/ 560: أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم آخى بين المقداد وأبي ذر الغفاري.وروى ابن أبي خيثمة في السفر الثاني من "تاريخه" (2841)، وأبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" 5/ 293، وابن عساكر 60/ 157 من طريق إبراهيم بن سعد، عن سليمان بن محمد الأنصاري، عن رجل يقال له: الضحاك كان عالمًا … فذكر مؤاخاة المقداد لعبد الله بن رواحة. وإسناده ضعيف. فالله تعالى أعلم بالصواب.
[2] هذا غريب في رواية محمد بن عمر الواقدي، فالذي في "طبقات ابن سعد" 3/ 148 عنه عن محمد بن صالح عن عاصم بن عمر بن قتادة، قال: آخى رسول الله صلى الله عليه وسلم بين المقداد وجَبَّار بن صَخْر. وعبدُ الله بن جعفر ثاني شيوخ الواقدي هنا: هو المَخرَمي الزهري.وما وقع عند المصنّف هنا من ذكر المؤاخاة بين المقداد وابن عتيك قاله محمد بن حبيب في "المحبَّر" ص 73، ووقع فيه: جبر بن عتيك.وقد جاء ما يخالف هذين القولين: فقد روى أبو الحسن الخِلَعي في "الخِلعيّات" (230) بسند ضعيف عن أبي رافع ذكر مؤاخاة رسول الله صلى الله عليه وسلم بين المقداد وعمار.وذكر ابن هشام في "السيرة النبوية" 2/ 560: أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم آخى بين المقداد وأبي ذر الغفاري.وروى ابن أبي خيثمة في السفر الثاني من "تاريخه" (2841)، وأبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" 5/ 293، وابن عساكر 60/ 157 من طريق إبراهيم بن سعد، عن سليمان بن محمد الأنصاري، عن رجل يقال له: الضحاك كان عالمًا … فذكر مؤاخاة المقداد لعبد الله بن رواحة. وإسناده ضعيف. فالله تعالى أعلم بالصواب.
5576 - حَدَّثَنَا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حَدَّثَنَا يحيى بن محمد بن يحيى، حَدَّثَنَا مُسدَّد، حَدَّثَنَا أُميّة بن خالد، عن شُعبة، عن سعد بن إبراهيم، قال: قَدِمَ المِقدادُ بنُ الأسود، فقال: لأُحالِفنَّ أعزَّ أهلِها؛ فحالف الأسودَ بن عبد يَغُوث، وقيل: مِقدادُ بن الأسود، وإنما هو مِقدادُ بن عمرو البَهْراني، وليس بابن الأسود الكِنْدي [1].
সা'দ ইবনু ইবরাহীম থেকে বর্ণিত, মিকদাদ ইবনুল আসওয়াদ (মদীনায়) আগমন করলেন এবং বললেন: আমি এখানকার সবচেয়ে সম্মানিত ব্যক্তির সাথে মৈত্রী চুক্তি করব। অতঃপর তিনি আসওয়াদ ইবনু আবদ ইয়াগূছের সাথে মৈত্রী চুক্তি করলেন। বলা হয়ে থাকে: তিনি মিকদাদ ইবনুল আসওয়াদ (নামে পরিচিত), কিন্তু প্রকৃতপক্ষে তিনি হলেন মিকদাদ ইবনু আমর আল-বাহরানি এবং তিনি আসওয়াদ আল-কিন্দি-এর পুত্র নন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] مرسلٌ رجاله ثقات. سعد بن إبراهيم: هو ابن عبد الرحمن بن عوف. الأحمسي، وعبد الله: هو ابن مسعود.وأخرجه أحمد 6/ (3698) و 7 / (4070)، والبخاري (3952) و (4609) من طرق عن إسرائيل، بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه أحمد 7/ (4376) عن عَبيدة بن حُميد، والبخاري (4609)، والنسائي (11075) من طريق عُبيد الله الأشجعي، عن سفيان الثوري، كلاهما عَبيدة وسفيان عن مخارق الأحمسي، به.وأخرجه أحمد 31/ (18827) عن وكيع، عن سفيان الثوري، عن مخارق، عن طارق مرسلًا.والمحفوظ رواية الأشجعي عن سفيان الثوري، لأنّها توافق رواية غير سفيان الثوري ممَّن وصل الحديثَ، ولهذا قال الدارقطني في "العلل" (3420): حديث الأشجعي أصح.
5577 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المَحبُوبي بمَرُو، حَدَّثَنَا سعيد بن مسعود، حَدَّثَنَا عُبيد الله بن موسى، أخبرنا إسرائيل، عن مُخارقٍ، عن طارِقٍ، عن عبد الله، قال: شَهِدتُ من المقداد مشهدًا لأن أكونَ صاحِبَه أَحبُّ إليَّ مما عُدِلَ؛ أنه أتى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وهو يدعُو على المشركين، فقال: إنا واللهِ يا رسولَ الله لا نقولُ كما قال قومُ موسى لموسى: {اذْهَبْ أَنْتَ وَرَبُّكَ فَقَاتِلَا إِنَّا هَاهُنَا قَاعِدُونَ} [المائدة: 24] ولكنا نقاتلُ عن يَمينِك وعن شِمالِك، ومن بين يَدَيك ومن خَلْفِك، فرأيتُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم يُشرِقُ لذلك، وسَرَّهُ ذلك [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه!
আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ) বলেন, আমি মিকদাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর একটি দৃশ্য প্রত্যক্ষ করেছিলাম, যার সাথী বা অংশগ্রহণকারী হওয়া আমার নিকট (দুনিয়ার) সমস্ত কিছুর বিনিময়ে অর্জিত হওয়ার চেয়েও অধিক প্রিয়। তা হলো, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন যখন তিনি মুশরিকদের বিরুদ্ধে (বদ)দোয়া করছিলেন। তখন তিনি বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! আল্লাহর শপথ, আমরা মূসা (আঃ)-এর সম্প্রদায় মূসা (আঃ)-কে যা বলেছিল, আমরা তা বলব না: "তুমি ও তোমার রব যাও এবং যুদ্ধ করো, আমরা এখানে বসে থাকব।" (সূরা আল-মায়েদাহ: ২৪)। বরং আমরা আপনার ডানদিকে, আপনার বামদিকে, আপনার সামনে এবং আপনার পেছন থেকে যুদ্ধ করব। বর্ণনাকারী বলেন, তখন আমি দেখলাম যে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চেহারা মুবারক উজ্জ্বল হয়ে উঠলো এবং এতে তিনি আনন্দিত হলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. إسرائيل: هو ابن يونس بن أبي إسحاق السَّبيعي، ومُخارق: هو ابن خليفة - ويقال: ابن عبد الله بن جابر، ويقال: ابن عبد الرحمن - الأحمسي، وطارق: هو ابن شهاب الأحمسي، وعبد الله: هو ابن مسعود.وأخرجه أحمد 6/ (3698) و 7 / (4070)، والبخاري (3952) و (4609) من طرق عن إسرائيل، بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه أحمد 7/ (4376) عن عَبيدة بن حُميد، والبخاري (4609)، والنسائي (11075) من طريق عُبيد الله الأشجعي، عن سفيان الثوري، كلاهما عَبيدة وسفيان عن مخارق الأحمسي، به.وأخرجه أحمد 31/ (18827) عن وكيع، عن سفيان الثوري، عن مخارق، عن طارق مرسلًا.والمحفوظ رواية الأشجعي عن سفيان الثوري، لأنّها توافق رواية غير سفيان الثوري ممَّن وصل الحديثَ، ولهذا قال الدارقطني في "العلل" (3420): حديث الأشجعي أصح.
5578 - أخبرني الشيخ أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا عُبيد بن شَريك، حَدَّثَنَا عبد الوهاب بن نَجْدةَ الحَوْطي، حَدَّثَنَا بَقيّة بن الوليد، عن حَرِيز بن عثمان، قال: حدثني عبد الرحمن بن مَيْسَرَة الحَضْرَمي، حدثني أبو راشد الحُبْراني، قال: رأيتُ المِقدادَ بنَ الأسود حارِسَ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم جالسًا على تابُوتٍ من تَوابِيتِ الصَّيارِفة بحِمْص، قد أفضَلَ على التابوتِ من عِظَمِه، يريدُ الغَزْوَ، فقلتُ له: لقد أعذَرَ اللهُ إليك، فقال: أبَتْ علينا سورةُ البَحُوثِ: {انفِرُوا خِفَافًا وَثِقَالًا} [التوبة: 41]، قال بَقيّة: سورةُ البَحُوث: سورةُ التوبة [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه. وقد ذكرتُ في أول مناقب أبي بكر الصَّدّيق رضي الله عنه [2] حديثَ عبد الله بن مسعود: أولُ مَن أظهَرَ إسلامَه سبعةٌ: رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وأبو بكر وعمّار وأمُّه سُميَّة وصُهيب وبِلال والمِقداد.
মিকদাদ ইবনুল আসওয়াদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ রাশিদ আল-হুবরানী বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর প্রহরী মিকদাদ ইবনুল আসওয়াদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে হিমস শহরে স্বর্ণকারদের সিন্দুকগুলোর মধ্য থেকে একটির উপর বসা অবস্থায় দেখলাম। তিনি এত বিশালদেহী ছিলেন যে তার শরীরের কারণে সিন্দুকটি প্রায় ঢেকে গিয়েছিল। তিনি (তখন) জিহাদে যাওয়ার ইচ্ছা করছিলেন। তখন আমি তাকে বললাম: আল্লাহ্ তো আপনাকে অব্যাহতি দিয়েছেন (জিহাদে না যাওয়ার ওজর দিয়েছেন)। তিনি বললেন: সূরাতুল বাহূছ আমাদেরকে বাধা দিচ্ছে— "তোমরা বের হয়ে পড়ো হালকা অবস্থায় অথবা ভারী অবস্থায়।" (সূরা তাওবা: ৪১)। বাকিয়্যাহ (বর্ণনাকারী) বলেন: সূরাতুল বাহূছ হলো সূরা আত-তাওবা।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل بقيّة بن الوليد، وقد صرّح بسماعه عند غير المصنّف فأُمن تدليسه. وهو متابع فيما تقدَّم عند المصنّف برقم (2583) و (3321).وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (290)، ومن طريقه أبو نعيم في "الحلية" 1/ 176، وأخرجه الطبراني في "الكبير" (20/ 556) عن أحمد بن عبد الوهاب بن نجدة الحَوطي، كلاهما (ابن أبي عاصم وأحمد بن عبد الوهاب) عن عبد الوهاب بن نَجْدة، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 10/ 139 - 140 عن سعيد بن عمرو السَّكُوني، عن بقية بن الوليد، به.
[2] بل ذكره المصنّف في مناقب بلال بن رباح برقم (5321). وهو في "سيرة ابن هشام" 1/ 687 - وهي بروايته عن زياد البكائي - وفي "معجم الصحابة" للبغوي 4/ 296 من طريق يحيى بن سعيد الأمري، كلاهما (البكائي والأموي) عن محمد بن إسحاق. وزادا في نسبه بين جُشَم وحارثة: مَجدَعة.