আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
5539 - حدثنا أبو عبد الله الأصبهاني، حدثنا الحسن بن الجهم، حدثنا الحسين بن الفَرَج، حدثنا محمد بن عمر، قال: وأبو الدَّرْداء عُوَيمِر بن زيد بن قيس بن عائشة [1] ابن أُمية بن مالك بن عامر بن عَدِيّ بن كعب بن الخَزرج بن الحارث بن الخَزرج، وقيل: إِنَّ اسم أبي الدَّرْداء عامرٌ، ولكنه صُغِّر فقيل: عويمر، وأمُّه محبة بنت واقد بن عمرو بن الإطنابة بن عامر بن زيد مَنَاة بن مالك بن ثعلبة بن كعب.وكان أبو الدرداء - فيما ذُكر - آخر داره إسلامًا، لم يَزَل متعلقًا بصنَمٍ له قد وَضَعَ عليه منديلًا، وكان عبد الله بن رَوَاحة يَدعُوه إلى الإسلام فيأبي، فتَحيَّنَه عبد الله بنُ رواحة، وكان له أخًا في الجاهلية والإسلام [2]، فلما رآهُ قد خرج مِن بَيتِه خالفَه، فدخَل بيته، وأعجَلَ امرأته وإنها لتمشُط رأسها، فقال: أين أبو الدَّرْداء؟ فقالت: خرج أخوك آنفًا، فدخل بَيتَه الذي كان فيه الصَّنمُ ومعه القَدُوم، فأنزله وجعلَ يَفْلِذُه فَلْذًا فَلْذًا، وهو يَرتَجزُ:تبرّأ [3] من اسماءِ الشَّياطين كُلِّها … ألا كلُّ ما يُدعَى معَ الله باطلُثم خرج وسمعتِ المرأةُ صوت القَدُوم، وهو يضربُ ذلك الصنَمَ، فقالت: أهلكتني يا ابن رواحة، فخرج على ذلك، فلم يكن شيءٌ حتى أقبل أبو الدَّرْداء إلى منزله، فدخل فوجد المرأةَ قاعدةً تبكي شَفَقًا منه، فقال: ما شأنُك؟ قالت: أخُوك عبدُ الله بنُ رَوَاحة دخل عليَّ فصنَع ما تَرى فَغَضِبَ غضبًا شديدًا، ثم فكَّر في نفسِه، فقال: لو كان عند هذا خيرٌ لَدَفَع عن نفسه، فانطلق حتى أتى رسول الله صلى الله عليه وسلم ومعه ابن رَواحةَ، فأسلم.وقيل: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم نَظَر إلى أبي الدرداء والناسُ مُنهزِمُون كُلَّ وَجْهٍ يومَ أُحُد، فقال: "نِعمَ الفارسُ عُوَيمرٌ غيرَ أُفَّةٍ [4] " يعني: غير ثقيلٍ. قال ابن عُمر: وسمعت من يَذكُر أن أبا الدَّرداء لم يشهد أحُدًا.وقد كان من عِلْية أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم، وقد شَهِدَ معه مَشاهِدَ كثيرةً.قال ابن عمر: وتُوفّي أبو الدَّرْداء بدمشقَ سنة اثنتين وثلاثين في خلافة عثمان بن عفان رضي الله عنه [5].
মুহাম্মাদ ইবনু উমর থেকে বর্ণিত,
আবূ দারদা’ ('উওয়াইমির ইবনু যায়দ) হলেন 'উওয়াইমির ইবনু যায়দ ইবনু ক্বায়স ইবনু আ-য়িশা ইবনু উমাইয়্যা ইবনু মালিক ইবনু আমির ইবনু আদী ইবনু কা'ব ইবনু আল-খাযরাজ ইবনু আল-হারিছ ইবনু আল-খাযরাজ। বলা হয়, আবূ দারদা'র আসল নাম ছিল আমির, কিন্তু তা ছোট করে ('তাছগীর' করে) 'উওয়াইমির রাখা হয়েছে। তাঁর মাতা হলেন মুহিব্বা বিনত ওয়াক্বিদ ইবনু 'আমর ইবনু আল-ইতনাবা ইবনু আমির ইবনু যায়দ মানাত ইবনু মালিক ইবনু ছা'লাবা ইবনু কা'ব।
যেমনটি উল্লেখ করা হয়েছে, আবূ দারদা’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর ঘরের সদস্যদের মধ্যে সবশেষে ইসলাম গ্রহণ করেছিলেন। তিনি তখনও তাঁর মূর্তির সাথে লেগে ছিলেন, যার ওপর তিনি একটি রুমাল রেখেছিলেন। আবদুল্লাহ ইবনু রাওয়াহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে ইসলামের দিকে আহ্বান করতেন, কিন্তু তিনি তা প্রত্যাখ্যান করতেন। অতঃপর আবদুল্লাহ ইবনু রাওয়াহা সুযোগের অপেক্ষা করলেন। (আবদুল্লাহ ইবনু রাওয়াহা জাহেলিয়াত ও ইসলাম উভয় যুগেই তাঁর ভাই ছিলেন)। যখন আবদুল্লাহ ইবনু রাওয়াহা দেখলেন যে আবূ দারদা’ ঘর থেকে বের হয়েছেন, তখন তিনি ভিন্ন পথে আবূ দারদা'র ঘরে প্রবেশ করলেন। তাঁর স্ত্রী তখন চুল আঁচড়াচ্ছিলেন, তিনি দ্রুত ভেতরে ঢুকলেন এবং জিজ্ঞাসা করলেন: আবূ দারদা' কোথায়? স্ত্রী বললেন: আপনার ভাই এইমাত্র বের হয়ে গেলেন।
অতঃপর তিনি সেই ঘরে প্রবেশ করলেন যেখানে মূর্তিটি ছিল। তাঁর সাথে একটি কুঠার ছিল। তিনি মূর্তিটিকে নামিয়ে টুকরো টুকরো করে কাটতে লাগলেন এবং এই বলে কবিতা আবৃত্তি করছিলেন:
"সে সকল শয়তানের নাম থেকে মুক্ত,
সাবধান! আল্লাহ ছাড়া যাকে ডাকা হয়, সবই বাতিল।"
এরপর তিনি বের হয়ে গেলেন। স্ত্রী কুঠার দিয়ে মূর্তি ভাঙার শব্দ শুনে বলেছিলেন: হে ইবনু রাওয়াহা, তুমি তো আমাকে ধ্বংস করে দিলে! (আবদুল্লাহ) তা সত্ত্বেও বের হয়ে গেলেন। এরপরেই আবূ দারদা’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর বাড়িতে ফিরে এলেন। তিনি প্রবেশ করে দেখলেন, তাঁর স্ত্রী (স্বামীকে দেখে শাস্তির ভয়ে) বসে কাঁদছেন। তিনি জিজ্ঞাসা করলেন: তোমার কী হয়েছে? স্ত্রী বললেন: আপনার ভাই আবদুল্লাহ ইবনু রাওয়াহা আমার কাছে এসে যা দেখলেন, তা-ই করেছেন (অর্থাৎ মূর্তি ভেঙে দিয়েছেন)। আবূ দারদা’ এতে ভীষণ রাগান্বিত হলেন। অতঃপর তিনি নিজের মনে চিন্তা করলেন, এবং বললেন: যদি এর (মূর্তির) মধ্যে কোনো কল্যাণ থাকত, তবে সে নিজেকে রক্ষা করতে পারত। এরপর তিনি আবদুল্লাহ ইবনু রাওয়াহা'কে সঙ্গে নিয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গেলেন এবং ইসলাম গ্রহণ করলেন।
বলা হয় যে, উহুদের দিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবূ দারদা’র দিকে তাকালেন, যখন লোকেরা সবদিক থেকে পালিয়ে যাচ্ছিল। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "উওয়াইমির কতই না উত্তম অশ্বারোহী, সে অলস (অকর্মণ্য) নয়।" এর অর্থ: স্থূল/ভারী নয় (অর্থাৎ কর্মঠ)।
ইবনু উমর (বর্ণনাকারী) বলেন: আমি এমন কথাও শুনেছি যে, আবূ দারদা’ উহুদের যুদ্ধে উপস্থিত ছিলেন না।
তিনি (আবূ দারদা’) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর শ্রেষ্ঠ সাহাবীদের অন্তর্ভুক্ত ছিলেন এবং তাঁর সাথে বহু যুদ্ধে অংশ নিয়েছিলেন।
ইবনু উমর বলেন: আবূ দারদা' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উসমান ইবনু আফ্ফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফতকালে বত্রিশ হিজরিতে দামেশকে মৃত্যুবরণ করেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] المثبت كما في "طبقات ابن سعد" 4/ 351 و 9/ 395، وفي المطبوع: خناسة، وكذلك رُسمت في (ز) و (ب) وأُهملت فلم تُعجم فيهما، وفي (ص) و (م) رسمت هكذا: حاسة، غير معجمة أيضًا فيهما، ويغلب على ظننا أنها تحرَّفت عما أثبته، وأقرب ذلك إليها ما في (ص) و (م). وهذ الاسم اختُلف فيه على ثلاثة أقوال: عائشة، وعيشة، وعبسة، والأكثرون على عائشة، فالله أعلم.
[2] في نسخنا الخطية: عن الإسلام والغالب أنَّ "عن" تحريف عن الواو، والمثبت كما في "طبقات ابن سعد" 4/ 351 و 9/ 395.
5539 [3] - رُسمت هذه الكلمةُ في نسخنا الخطية: سرا، وهو تحريف عن المثبت، والمثبت من "طبقات ابن سعد" 4/ 351 و 9/ 395.
5539 [4] - تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: أنه، والتصويب من "طبقات ابن سعد" 4/ 352 و 9/ 395 ومن كتب اللغة والغريب.
5539 [5] - انظر "طبقات ابن سعد" 4/ 351 و 9/ 395.وذكر نحو قصة إسلامه باختصار جبيرُ بنُ نُفَير مرسلًا، فيما نقله البيهقيُّ في "دلائل النبوة" 6/ 301 عن أبي بكر القَفّال الشاشي بسنده إلى جبير بن نُفير، وجبير من كبار التابعين، والإسنادُ إليه ثقات عن آخرهم.وأما قصة شهوده أُحُدًا فذكرها الواقدي في "مغازيه" 1/ 253، ونقله عنه كذلك ابن سعد في "طبقاته" 4/ 352 و 9/ 395.وروى شهودَه أحدًا وأنه أَبلى فيها بلاء حسنًا عبدُ الرحمن بنُ عائذ الثُّمالي وشُريح بن عُبيد الحضرمي عند الطبراني في "مسند الشاميين" (967) و (1876)، وهما تابعيّان، فخبرهما مرسل، لكن باجتماعهما مع رواية الواقدي يتقوى الخبر.
5540 - حدثنا علي بن حَمشاذ العدل، حدثنا محمد بن بِشر بن مَطَر، حدثنا أبو إبراهيم التّرجُماني، قال: رأيتُ شيخًا بدمشقَ يُقال له: إسحاقُ أبو حارثٍ [1] مولى لبني هَبّار القرشي، قال: رأيتُ أبا الدَّرداء عُويمر بن قيس بن عائشة [2] صاحب رسول الله صلى الله عليه وسلم أشهلَ أقْنى يَخضِبُ بالصُّفْرة، ورأيتُ عليه قَلَنسُوة مُضرَّبةً صغيرةً، ورأيتُ عليه عِمامةً قد ألقاها على كَتِفَيه، قال العباس [3]: فسمعتُ رجلًا كان معي يقول له: مُذْ كم رأيته؟ قال: رأيتُه منذُ أكثر من مئة سنةٍ، قال: وكان عليه جَورَبان ونَعْلان. قال: وكان أتى على إسحاق نحوٌ من عشرين ومئة سنةٍ [4]. ذكرُ مناقب أبي ذرٍّ الغفاري رضي الله عنه -
আবুদ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবী আবুদ দারদা উয়াইমির ইবনে কায়স ইবনে আইশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে আমি দেখলাম, তিনি ছিলেন ইষৎ লালচে চোখ বিশিষ্ট, উন্নত নাসিকা বিশিষ্ট, যিনি হলুদ রঙ্গে খেজাব (চুলে রঙ) লাগাতেন। আমি তাঁর পরিধানে একটি ছোট, নকশাযুক্ত টুপি দেখলাম এবং আমি তাঁর পরিধানে একটি পাগড়ি দেখলাম, যা তিনি তাঁর দুই কাঁধের ওপর ফেলে রেখেছিলেন। আব্বাস [নামক বর্ণনাকারী] বলেন: আমার সাথে থাকা একজন লোককে আমি তাকে [ইসহাককে] বলতে শুনলাম, 'আপনি তাঁকে (আবুদ দারদাকে) কত কাল আগে দেখেছেন?' সে [ইসহাক] বলল: আমি তাঁকে একশত বছরেরও বেশি আগে দেখেছি। তিনি বলেন: তাঁর পায়ে মোজা ও জুতো ছিল। তিনি বললেন: ইসহাকের বয়স তখন একশত বিশ বছরের কাছাকাছি ছিল। আবূ যর গিফারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ফযীলতসমূহ প্রসঙ্গে আলোচনা।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرّف في نسخنا الخطية تحرَّف إلى: إسحاق أبو حرب، غير أنَّ الباء لم تُعجم في (ص) و (م).
[2] في نسخنا الخطية: خناسة، وتقدم التعليق عليه. هو جُندب أو بُرَير، وهو ما اقتصر عليه الحاكم في كتابه "علوم الحديث" ص 225. وكذلك ضبطه ابن ماكولا في "الإكمال" 1/ 257، والذهبي في "المشتبه" ص 58.
5540 [3] - كذلك جاء في (ز) و (ب): العباس، وفي (ص) و (م): إسحاق، وكلاهما مشكِلٌ، لأنَّ اسم أبي إبراهيم التَّرجُماني إسماعيلُ بنُ إبراهيم، والكلام الذي بعده ظاهره أنَّ قائله هو التّرجُماني، فالله أعلم. وقال الذهبي في "التلخيص": أخاف لا يكون سقط من سنده. هو جُندب أو بُرَير، وهو ما اقتصر عليه الحاكم في كتابه "علوم الحديث" ص 225. وكذلك ضبطه ابن ماكولا في "الإكمال" 1/ 257، والذهبي في "المشتبه" ص 58.
5540 [4] - إسناده ضعيف لجهالة إسحاق أبي حارث مولى بني هبَّار - واسمه إسحاق بن إبراهيم - ولا يُقبل ادِّعاؤه لقاء أبي الدرداء كما بيَّنه الذهبي في "الميزان" 1/ 189، وأقره عليه ابن حجر في "لسان الميزان" 2/ 53، فيكون منقطعًا أيضًا.وأخرجه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (5288)، وابن عساكر 8/ 197 و 48/ 104 - 105 من طرق عن أبي إبراهيم - واسمه إسماعيل بن إبراهيم - به.والأشهل: من كان في سواد عينه حُمرة.والأقنى: من كان طويل الأنف رقيق الأرنَبة مع حَدَب في وسطه.ويخضب بالصفرة: أي بخلط الوَرْس والزعفران، ويشمل صباغ الشعر والثياب.والقَلَنْسُوَة: لباس للرأس.والمُضرَّبة: المَخيطة. هو جُندب أو بُرَير، وهو ما اقتصر عليه الحاكم في كتابه "علوم الحديث" ص 225. وكذلك ضبطه ابن ماكولا في "الإكمال" 1/ 257، والذهبي في "المشتبه" ص 58.
5541 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا إبراهيم بن إسحاق الحَربي، حدثنا مصعب بن عبد الله الزُّبَيري، قال: أبو ذرٍّ جُندُب بن جُنادة، وقيل: بُرَير [1] بن جُنادة، تُوفّي بالرَّبذة سنة اثنتين وثلاثين، واختلفوا فيمن صلَّى عليه، فقيل: عبدُ الله بن مسعود، وقيل: جَرير بن عبد الله البَجَلي [2].
আবু বকর মুহাম্মাদ ইবনু আহামদ ইবনু বালাওয়াইহ আমার নিকট বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন, ইব্রাহীম ইবনু ইসহাক আল-হারবী আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন, মুসআব ইবনু আব্দুল্লাহ আয-যুবাইরী আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন, তিনি বললেন: আবু যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নাম হলো জুনদুব ইবনু জুনাদাহ, অথবা বলা হয়: বুরাইর ইবনু জুনাদাহ। তিনি বত্রিশ (৩২) হিজরিতে রাবযাহ নামক স্থানে ইনতিকাল করেন। কে তাঁর জানাযার সালাত পড়িয়েছিলেন সে বিষয়ে মতপার্থক্য রয়েছে। কেউ কেউ বলেছেন: আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। আবার কেউ কেউ বলেছেন: জারীর ইবনু আব্দুল্লাহ আল-বাজালী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: يزيد، والمثبت بباء موحدة مضمومة ورائين، تصغير (بَر) هو الصواب، وذلك لأنه لا يُعرف في الخلاف في اسم أبي ذرٍّ ذِكر يزيد، إنما اختُلف في اسمه هل هو جُندب أو بُرَير، وهو ما اقتصر عليه الحاكم في كتابه "علوم الحديث" ص 225. وكذلك ضبطه ابن ماكولا في "الإكمال" 1/ 257، والذهبي في "المشتبه" ص 58.
[2] قال ابن عبد البر في "الاستيعاب" (800): أكثر وأصح ما قيل فيه: جُندب بن جُنادة.قلنا: وممّن جزم بصلاة ابن مسعود على أبي ذرٍّ: إبراهيم بنُ المنذر وأبو الحسن المدائني وخليفةُ ابن خيّاط وابن سعد. انظر "تاريخ دمشق" لابن عساكر 66/ 175 و 222. وجاء ذلك في رواية متصلة تقدمت عند المصنف برقم (4421)، غير أنَّ إسنادها ضعيف. وستأتي رواية أخرى مطوَّلة في ذكر وفاته برقم (5559) ليس فيها ذكر ابن مسعود، وإسنادها حسن. 66/ 219 - 220 بذلك الإسناد نفسِه إلى وُهَيب، فلم يجاوز به إبراهيم بن الأشتر، يعني كرواية أحمد وغيره ممّن رواه من طريق وُهيب، فهو المحفوظ في روايته أنه لم يجاوز به إبراهيم بن الأشتر.وسيأتي برقم (5559) من طريق يحيى بن سُليم الطائفي، عن عبد الله بن عثمان بن خُثيم، عن مجاهد، عن إبراهيم بن الأشتر، عن أبيه، عن أم ذرٍّ. ويحيى بن سُليم صدوق حسنُ الحديث، روى عنه هذا الخبر موصولًا جمعٌ من الأئمة الحفاظ، ولا يُحفظ هذا الخبر موصولًا عن غيره.
5542 - أخبرنا الشيخ الإمام أبو بكر بن إسحاق، حدثنا محمد بن أحمد بن النَّضر الأزدي، حدثنا معاوية بن عمرو، حدثنا زائدةُ، عن عبد الله بن عثمان بن خُثَيم، حدثنا مُجاهد، قال: قال أبو ذَرٍّ لنَفَرٍ عنده: إنه قد حَضَرني ما تَرَون من الموت، ولو كان لي ثَوبٌ يَسَعُني كَفَنًا أو لصاحبتي لم أُكفَّن إلَّا في ذلك، وإني أَنشُدُكُم أن لا يُكفِّنَني منكم رجلٌ كان عَريفًا أو نقيبًا أو أميرًا أو بريدًا، وكان القومُ أشرافًا، كان حُجرٌ المَدَريُّ ومالكٌ الأشتَرُ في نَفَرٍ فيهم رجل من الأنصار، وكلُّ القومِ قد أصابَ لذلك منزلًا إِلَّا الأنصاريَّ، فقال: أنا أُكفِّنُك في رِدائي هذا، وفي ثَوبَين في عَيبَتي من غَزْلِ أُمّي حاكَتْهُما لي حتى أُحرِمَ فيهما، فقال أبو ذرٍّ: كَفَاني. [1].
আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর কাছে উপস্থিত লোকদের বললেন: তোমরা দেখতে পাচ্ছ, আমার সামনে মৃত্যু উপস্থিত হয়েছে। যদি আমার কাছে এমন কোনো কাপড় থাকত যা আমাকে কাফন দেওয়ার জন্য যথেষ্ট হতো অথবা আমার স্ত্রীর জন্য হতো, তাহলে আমি তা ছাড়া অন্য কিছুতে কাফন নিতাম না। আর আমি তোমাদের কাছে আবেদন করছি, তোমাদের মধ্যে এমন কোনো ব্যক্তি যেন আমাকে কাফন না দেয়, যে আরীফ (গোত্রের প্রধান), নকীব (প্রতিনিধি), আমীর (শাসক) বা বারীদ (দূত/ডাকপিওন) ছিল। সেই লোকেরা ছিলেন সম্ভ্রান্ত। তাদের মধ্যে ছিলেন হুজর আল-মাদারী এবং মালিক আল-আশতার, তাদের সাথে আনসারী সম্প্রদায়ের একজন লোকও ছিলেন। আনসারী ছাড়া উপস্থিত সবাই (উপরোক্ত পদের কারণে) কাফন দেয়ার যোগ্যতা থেকে বঞ্চিত হলো। তখন তিনি (আনসারী) বললেন: আমি আপনাকে আমার এই চাদর এবং আমার বাক্সে রাখা দুটি কাপড়ে কাফন দেব, যা আমার মা আমার জন্য বুনেছিলেন যেন আমি সেগুলোতে ইহরাম বাঁধতে পারি। আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এটাই আমার জন্য যথেষ্ট।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث حسنٌ، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم لكنه مرسل، لأنَّ مجاهدًا - وهو ابن جَبْر المكي - لم يُدرك أبا ذرٍّ الغفاري، لكن روي هذا الخبر متصلًا من طريق أخرى حَسَنة عن عبد الله بن عثمان بن خُثيم ستأتي عند المصنف برقم (5559). زائدة: هو ابن قُدامة.وأخرجه أحمد 35/ (21467) من طريق وُهيب بن خالد، عن عبد الله بن عثمان بن خثيم، عن مجاهد، عن إبراهيم بن الأشتر: أنَّ أبا ذرٍّ حضره الموت … فذكره بنحوه مرسلًا كذلك، لأنَّ إبراهيم لم يُدرك أبا ذر أيضًا.وما وقع عند ابن الأثير في "أسد الغابة" 1/ 358 من رواية وهيب بن خالد لهذا الخبر موصولًا بذكر الأشتر وزوجة أبي ذرٍّ، فهو وهمٌ، لأنَّ ابن الأثير يرويه عن أبي محمد بن أبي القاسم بن عساكر، عن أبيه، بسنده إلى وهيب بن خالد موصولًا، مع أن ابن عساكر قد روى الخبر في "تاريخ دمشق" 66/ 219 - 220 بذلك الإسناد نفسِه إلى وُهَيب، فلم يجاوز به إبراهيم بن الأشتر، يعني كرواية أحمد وغيره ممّن رواه من طريق وُهيب، فهو المحفوظ في روايته أنه لم يجاوز به إبراهيم بن الأشتر.وسيأتي برقم (5559) من طريق يحيى بن سُليم الطائفي، عن عبد الله بن عثمان بن خُثيم، عن مجاهد، عن إبراهيم بن الأشتر، عن أبيه، عن أم ذرٍّ. ويحيى بن سُليم صدوق حسنُ الحديث، روى عنه هذا الخبر موصولًا جمعٌ من الأئمة الحفاظ، ولا يُحفظ هذا الخبر موصولًا عن غيره.
5543 - أخبرني أبو محمد أحمد بن عبد الله المُزَني، حدثنا أبو خليفة، حدثنا محمد بن سَلَّام الجُمَحي، حدثنا أبو عُبيدة مَعْمَر بن المثنَّى قال: أبو ذرٍّ الغفاريُّ جُندُب بن جُنادة بن سفيان بن عُبيد بن حَرَام. قال ابن سَلّام: ويقال: اسمُه بُرَير [1].
আবু উবাইদা মা'মার ইবনুল মুসান্না থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আবু যারর আল-গিফারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হলেন জুনদুব ইবনু জুনাদা ইবনু সুফইয়ান ইবনু উবাইদ ইবনু হারাম। ইবনু সাল্লাম বলেন: এ-ও বলা হয় যে, তাঁর নাম বুরাইর।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ز) و (ص) و (ب): يزيد، والمثبت من (م)، وهو الصواب كما تقدم. وأخرجه الدولابي في "الكنى والأسماء" (176)، وأخرجه الطبراني في "الكبير" (1616)، وعنه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (1546) عن عبد الرحمن بن معاوية العُتبي، كلاهما (الدولابي والعُتبي) عن ابن بُكَير، بهذا الإسناد.
5544 - أخبرنا الشيخ أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا إسماعيل بن قُتيبة حدثنا محمد بن عبد الله بن نُمير، قال: أبو ذرٍّ جُندُب بن جُنَادة بن قيس بن عَمرو بن صُعَير بن حَرَام بن غِفَار، وأمُّه رَمْلةُ بنت وَقِيعة [1] بن غِفَار [2].وأما ذكرُ بُرَير [3]، فقد رُوي أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم سمّاه به:
শায়খ আবু বকর ইবনে ইসহাক আমাদের অবহিত করেছেন, তিনি বলেন, ইসমাঈল ইবনে কুতাইবাহ আমাদের অবহিত করেছেন, তিনি বলেন, মুহাম্মদ ইবনে আব্দুল্লাহ ইবনে নুমাইর আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আবু যার্র (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হলেন জুনদুব ইবনে জুনাদাহ ইবনে কায়স ইবনে আমর ইবনে সুআইর ইবনে হারাম ইবনে গিফার। এবং তার মা হলেন রামলা বিনতে ওয়াকী'আ ইবনে গিফার। আর বুরাইর-এর উল্লেখের বিষয়ে, বর্ণিত আছে যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাকে এই নামে নামকরণ করেছেন:
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ز) و (ب) رقيعة، وفي (ص) و (م): ربيعة، وكلاهما تحريف صوَّبناه من "طبقات خليفة" ص 32، و"الاستيعاب" لابن عبد البر ص 110 و 800، و"تاريخ دمشق" لابن عساكر 46/ 251. وأخرجه الدولابي في "الكنى والأسماء" (176)، وأخرجه الطبراني في "الكبير" (1616)، وعنه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (1546) عن عبد الرحمن بن معاوية العُتبي، كلاهما (الدولابي والعُتبي) عن ابن بُكَير، بهذا الإسناد.
[2] وأخرجه الطبراني في "الكبير" (1619) عن محمد بن عبد الله الحضرمي، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (1545) من طريق محمد بن عبدوس، كلاهما عن محمد بن عبد الله بن نمير، قال: أبو ذر جندب بن جُنادة، مختصرًا. وأخرجه الدولابي في "الكنى والأسماء" (176)، وأخرجه الطبراني في "الكبير" (1616)، وعنه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (1546) عن عبد الرحمن بن معاوية العُتبي، كلاهما (الدولابي والعُتبي) عن ابن بُكَير، بهذا الإسناد.
5544 [3] - تحرّف في نسخنا الخطية إلى: يزيد. وأخرجه الدولابي في "الكنى والأسماء" (176)، وأخرجه الطبراني في "الكبير" (1616)، وعنه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (1546) عن عبد الرحمن بن معاوية العُتبي، كلاهما (الدولابي والعُتبي) عن ابن بُكَير، بهذا الإسناد.
5545 - حدَّثناهُ أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا أحمد بن إبراهيم بن مِلحان، حدثنا يحيى بن بُكير، حدثنا اللّيثُ، عن خالد بن يزيد، عن سعيد بن أبي هلال، عن زيد بن أسلَمَ: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال لأبي ذرٍّ: "كيف بك يا بُريرُ [1] "في حديثٍ طويل [2].
আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: “হে বুরাইর, তোমার কেমন হবে?” (এটি একটি দীর্ঘ হাদীসের অংশবিশেষ)।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: يزيد. وأخرجه الدولابي في "الكنى والأسماء" (176)، وأخرجه الطبراني في "الكبير" (1616)، وعنه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (1546) عن عبد الرحمن بن معاوية العُتبي، كلاهما (الدولابي والعُتبي) عن ابن بُكَير، بهذا الإسناد.
[2] رجاله ثقات، لكنه مرسل. الليث: هو ابن سعد، ويحيى بن بُكَير: هو يحيى بن عبد الله بن بُكير. وأخرجه الدولابي في "الكنى والأسماء" (176)، وأخرجه الطبراني في "الكبير" (1616)، وعنه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (1546) عن عبد الرحمن بن معاوية العُتبي، كلاهما (الدولابي والعُتبي) عن ابن بُكَير، بهذا الإسناد.
5546 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن سِنَان القزّاز، حدثنا أبو عاصم وسعيد [1] بن عامر، قالا: حدثنا المُثنَّى بن سعيد القَصِير، حدثني أبو جَمْرة [2]، قال: قال لنا ابن عباس: ألا أُخبرُكم بإسلام أبي ذرٍّ؟ قال: قلنا: بلى، قال: قال أبو ذرٍّ: كنتُ رجلًا من غِفارٍ، فبلغنا أنَّ رجلًا خرجَ بمكةَ يَزْعُم أَنه نَبيّ، فقلت لأخي: انطلِق إلى هذا الرجل فكلِّمه وأتني بخَبَره، فانطلَقَ فلقِيَه، ثم رجَع، فقلتُ: ما عندك؟ فقال: والله لقد رأيت رجلًا يأمر بالخير ويَنهى عن الشرِّ، قال: فقلتُ له: لم تَشْفني من الخَبَر، قال: فأخذتُ جرابًا وعصًا ثم أقبلتُ إلى مكة، فجعلتُ لا أعرفُه وأكرَهُ أن أسأل عنه، وأشربُ من ماء زَمزَم وأكونُ في المسجد، قال: فمَرَّ بي عليٌّ، فقال: كأنَّ الرجلَ غَريب؟ قلت: نعم، قال: فانطَلِق إلى المَنزل، فانطلقتُ معه لا يسألُني عن شيءٍ ولا أُخبِرُه، قال: ثم أصبحتُ غَدَوتُ إِلى المَسجِد لأسأل عنه، وليس أحدٌ يُخبرني عنه بشيءٍ، فمرَّ بي عليٌّ، فقال: أما آن للرَّجُل أن يعرف منزله بعدُ؟ قال: قلتُ: لا، قال: انطَلِق معي، فقال: ما أقدَمَك هذه البلدة؟ قلت: إِن كَتَمتَ علَيَّ أخبرتُك، قال: فإني أفعلُ، قلتُ له: بلَغَنا أنه خرج مِن هاهنا رجلٌ يَزْعُمُ أنه نَبيّ، فأرسلتُ أخي ليكلِّمه فرَجَع ولم يَشفِني من الخبر، فأردتُ أن ألقاهُ، قال: أما إنك قد رَشَدْتَ، هذا وجهي، فاتبَعني وادخُل - حيثُ أدخُل، فإني إن رأيتُ أحدًا أخافُه عليكَ، قُمتُ إلى الحائطِ كأنّي أُصلِح نَعْلي، وامْضِ أنتَ.قال: فمضى ومضيتُ معه حتى دخل ودخلتُ معه على النبي صلى الله عليه وسلم، فقلت: يا رسول الله، اعرِضْ علَيَّ الإسلام، فعَرَضَ عَلَيَّ الإسلام، فأسلمتُ مكاني، قال: فقال لي: "يا أبا ذرٍّ، اكتُمْ هذا الأمر، وارجِع إلى بَلَدِك، فإذا بلَغَك ظهورُنا فأَقبل"، قال: فقلتُ: والذي بعثك بالحقِّ لأصرُخَنَّ بها بين أظهُرهم، فجاء إلى المَسجِد وقريشٌ فيه، فقال: يا مَعشرَ قُريشٍ، أشْهَدُ أن لا إلهَ إِلَّا اللهُ، وأشهدُ أنَّ محمدًا عبدُه ورسولُه، فقالوا: قُومُوا إلى هذا الصابئ، فقاموا فضُرِبتُ لأمُوتَ، فأدركني العباسُ فَأَكَبَّ علَيَّ، ثم أقبلَ عليهم، فقال: وَيلَكُم تَقتُلون رجلًا من غِفار، ومَتجَرُكُم ومَمَرُّكُم على غِفارٍ، فأقلُعوا عنّي، فلما أصبحتُ الغَدَ رجعتُ فقلتُ مثل ما قلت بالأمس، فقالوا: قُومُوا إلى هذا الصابئ، فأدركَني العباسُ، فأكبَّ عليَّ، وقال مثل مقالتِه بالأمسِ. فكان هذا أولَ إسلامِ أبي ذرٍّ [3].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين.فأما الحديث المُفسَّرُ في إسلام أبي ذَرٍّ حديثُ الشاميين:
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আমাদের বললেন: আমি কি তোমাদের আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ইসলাম গ্রহণের ঘটনা শোনাবো না? আমরা বললাম: অবশ্যই শোনান। তিনি বললেন, আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: আমি গিফার গোত্রের একজন লোক ছিলাম। আমাদের কাছে খবর পৌঁছল যে মক্কায় এক লোক বের হয়েছেন, যিনি নিজেকে নবী বলে দাবি করেন। আমি আমার ভাইকে বললাম: তুমি এই লোকটির কাছে যাও, তার সাথে কথা বলো এবং তার খবর নিয়ে আসো। সে গেল এবং তার সাথে সাক্ষাৎ করল। তারপর ফিরে আসলে আমি জিজ্ঞেস করলাম: তুমি কী নিয়ে এসেছো? সে বলল: আল্লাহর কসম! আমি এমন একজন লোককে দেখেছি যিনি ভালো কাজের আদেশ দেন এবং মন্দ কাজ থেকে নিষেধ করেন। আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি তাকে বললাম: তুমি তো খবর দ্বারা আমাকে সন্তুষ্ট করতে পারোনি। অতঃপর আমি একটি মশক ও একটি লাঠি নিয়ে মক্কার উদ্দেশ্যে রওয়ানা হলাম।
আমি সেখানে গিয়ে তাঁকে চিনতে পারছিলাম না এবং তাঁর ব্যাপারে জিজ্ঞেস করতেও অপছন্দ করছিলাম। আমি যমযমের পানি পান করতাম এবং মসজিদে অবস্থান করতাম। তিনি বলেন: আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমার পাশ দিয়ে গেলেন এবং বললেন: মনে হচ্ছে আপনি মুসাফির? আমি বললাম: হ্যাঁ। তিনি বললেন: চলুন আমার বাসায়। আমি তার সাথে গেলাম। তিনি আমাকে কিছু জিজ্ঞেস করলেন না, আমিও তাকে কিছু বললাম না। পরদিন সকালে আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করার জন্য মসজিদে গেলাম, কিন্তু কেউ তাঁর সম্পর্কে কোনো খবর দিতে পারল না। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবার আমার পাশ দিয়ে গেলেন এবং বললেন: লোকটি কি এখনও তার থাকার জায়গা জানতে পারলেন না? আমি বললাম: না। তিনি বললেন: চলুন আমার সাথে। অতঃপর তিনি জিজ্ঞেস করলেন: আপনি এই শহরে কেন এসেছেন? আমি বললাম: যদি আপনি আমার বিষয়টি গোপন রাখেন, তবে আমি আপনাকে বলব। তিনি বললেন: আমি তাই করব। আমি তাকে বললাম: আমাদের কাছে খবর এসেছে যে এখান থেকে এক ব্যক্তি বের হয়েছেন যিনি নিজেকে নবী বলে দাবি করেন। আমি আমার ভাইকে তার সাথে কথা বলার জন্য পাঠিয়েছিলাম, কিন্তু সে ফিরে এসে আমাকে সন্তোষজনক খবর দিতে পারেনি, তাই আমি তার সাথে দেখা করতে চেয়েছি।
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আপনি সঠিক পথ খুঁজে পেয়েছেন। এই যে আমি যাচ্ছি, আপনি আমার অনুসরণ করুন এবং আমি যেখানে প্রবেশ করি, আপনিও সেখানে প্রবেশ করবেন। যদি আমি এমন কাউকে দেখি যাকে আপনার জন্য ভয় করি, তবে আমি দেয়ালের কাছে গিয়ে এমনভাবে দাঁড়াব যেন আমি আমার জুতো মেরামত করছি, আর আপনি সামনে চলে যাবেন। আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর তিনি চললেন এবং আমি তার সাথে চললাম। তিনি প্রবেশ করলেন এবং আমিও তার সাথে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশ করলাম। আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আমার কাছে ইসলাম পেশ করুন। তিনি আমার কাছে ইসলাম পেশ করলেন, আর আমি তৎক্ষণাৎ ইসলাম গ্রহণ করলাম।
তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন: "হে আবূ যার! এই বিষয়টি গোপন রাখো এবং তোমার দেশে ফিরে যাও। যখন তুমি আমাদের বিজয়ের খবর পাবে, তখন ফিরে এসো।" আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি বললাম: যে সত্তা আপনাকে সত্য সহকারে প্রেরণ করেছেন, তার কসম! আমি তাদের সামনে তা উচ্চস্বরে ঘোষণা করবই। অতঃপর তিনি মসজিদে আসলেন, তখন সেখানে কুরাইশরা উপস্থিত ছিল। তিনি বললেন: হে কুরাইশ সম্প্রদায়! আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর বান্দা ও রাসূল। তারা বলল: এই 'ধর্মত্যাগী'র (সাবী') দিকে এগিয়ে যাও। তারা উঠে দাঁড়াল এবং আমাকে এমন মার মারল যে আমি মরে যেতে লাগলাম। এমন সময় আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এসে আমাকে জড়িয়ে ধরলেন। তারপর তিনি তাদের দিকে ফিরে বললেন: তোমাদের ধ্বংস হোক! তোমরা গিফার গোত্রের একজন লোককে হত্যা করছ? অথচ তোমাদের বাণিজ্য পথ ও যাতায়াতের রাস্তা গিফার গোত্রের উপর দিয়ে? তখন তারা আমাকে ছেড়ে দিল। পরদিন সকালে আমি ফিরে গেলাম এবং আগের দিনের মতোই ঘোষণা করলাম। তারা বলল: এই 'ধর্মত্যাগী'র দিকে এগিয়ে যাও। আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এসে আমাকে জড়িয়ে ধরলেন এবং গতকালের মতোই কথা বললেন। আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ইসলাম গ্রহণের এটিই ছিল প্রথম ঘটনা।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في (ز) و (ب) إلى: سعد، والمثبت على الصواب من (ص) و (م).
[2] تصحف في (ز) و (ص) و (ب) إلى: حمزة، بحاء مهملة وزاي، والمثبت على الصواب من "تلخيص الذهبي"، وأُهمل في (م). وأبو جَمْرة هذا: هو نصر بن عمران الضُّبَعي.
5546 [3] - حديث صحيح، ومحمد بن سنان القَزّاز متابع. أبو عاصم: هو الضحاك بن مخلد النَّبيل.وأخرجه البخاري (3861)، ومسلم (2474) من طريق عبد الرحمن بن مهدي، والبخاري (3522) من طريق أبي قُتيبة سَلْم بن قُتيبة، كلاهما عن المثنى بن سعيد، بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وستأتي قصة إسلام أبي ذر بعده من وجه آخر بسياقة أخرى.
5547 - أخبرناهُ أبو جعفر محمد بن محمد البغدادي، حدثنا أحمد بن إبراهيم القُرشي بدمشق، حدثنا محمد بن عائذ الدمشقي، حدثني الوليد بن مُسلم، حدثنا أبو طَرَفة عَبّادُ بن الرَّيَّان اللَّخمي، قال: سمعتُ عُروة بن رُوَيمِ اللَّخمِي الأَشْعَرِي يقول: حدثني عامر بن لُدَين الأشْعَري - وكان مع عبد الملك بن مروان - قال: سمعتُ أبا ليلى الأشعريَّ يقولُ: حدثني أبو ذَرٍّ، قال: إنَّ أول ما دَعاني إلى الإسلام أنّا كنّا قومًا عَرَبًا فأصابتنا السَّنَةُ، فاحتملتُ أمّي وأخي - وكان اسمُه أُنيسًا - إلى أصهارٍ لنا بأعلى نَجْد، فلما حَلَلْنا بهم أكرمُونا، فلما رأى ذلك رجلٌ من الحيِّ مشَى إلى خالي، فقال: تَعلَمُ أَنَّ أُنيسًا يُخالِفُك إلى أهلِك؟ قال: فحَنِق في قلبه، فانصرفتُ في رِعْية إبلي، فوجدتُه كَئيبًا يبكي، فقلتُ: ما بُكَاكَ يا خالِ؟ فأعلَمني الخبرَ، فقلتُ: حَجَرَ [1] اللهُ من ذلك، إنَّا نخافُ الفاحشةَ، وإن كان الزمانُ قد أخلَّ بنا، ولقد كَدَّرتَ علينا صَفْوَ ما ابتدأتنا به، ولا سبيلّ إلى اجتماعٍ، فاحتملْتُ أمي وأخي حتى نَزَلْنا بحضرة مكة، فقال أخي: إني رجلٌ مُدافِعٌ على الماء بشعر، وكان رجلًا شاعرًا، فقلتُ: لا تفعل، فخرج به اللَّجَاجُ حتى دافَعَ دُرَيدَ بن الصِّمَّة صِرْمَتَهُ [2] إلى صِرْمتِه، وايمُ الله لَدُرَيدٌ يومئذٍ أشعرُ من أخي، فتقاضَيا إلى خَنْساءَ [3]، ففضَّلَتْ أخي على دُرَيْدٍ، وذلك أنَّ دُرَيدًا خطبَها إلى أبيها، فقالت: شيخٌ كبيرٌ لا حاجةَ لي فيه، فحَقَدَت عليه، فضَمَمْنا صِرْمته إلى صِرْمَتِنا، فكانت لنا هَجْمةٌ. قال: ثم أتيتُ مكةَ، فابتدأتُ بالصَّفا، فإذا عليها رجالاتُ قُريش، وقد بلغني أنَّ بها صابئًا أو مجنُونًا أو شاعرًا أو ساحرًا، فقلت: أين هذا الذي تَزعُمُونَهُ؟ فقالوا: ها هو ذاك حيثُ تَرى، فانقَلبْتُ إليه، فوالله ما جُزْتُ عنهم قِيدَ حَجَر حتى أكَبُّوا عَلَيَّ كلَّ عَظْم وحَجَر ومَدَر، فضَرَّجُوني بدَمي، وأتيتُ البيت فدخلتُ بين السُّتور والبناء، وصُمْتُ فيه ثلاثين يومًا لا أكُلُ ولا أشربُ إلَّا من ماءِ زَمزمَ حتى كانت ليلةٌ قَمْراءُ إضْحِيانٌ أقبلتِ امرأتانِ من خُزاعةَ طافَتا بالبيت، ثم ذَكَرتا إسافًا ونائلةَ - وهما وَثَنانِ كانوا [4] يعبُدونهما - فأخرجتُ رأسي من تحت السُّتور، فقلتُ: احمِلا أحدَهما على صاحبه؟ فغَضِبَتا ثم قالتا: أمَ والله لو كانت رجالُنا حُضُورًا ما تكلَّمتَ بهذا، ثم وَلَّتا، فخرجتُ أقْفُو آثارَهُما، حتى لَقِيَتا رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: "ما أنتُما؟ ومن أين أنتُما؟ ومن أين جئتُما؟ وما جاء بِكُما؟ "، فأخبرَتاهُ الخَبَر، فقال: "أين تركتُما الصابئ؟ " فقالتا: تركناهُ بين السُّتور والبِناء، فقال لهما: "هل قال لكما شيئًا؟ " قالتا: نعم، وأقبلتُ حتى جئتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم سلَّمتُ عليه عند ذلك، فقال: "مَن أنتَ؟ وممَّن أنتَ؟ ومن أين أنتَ؟ ومن أين جئتَ؟ وما جاء بك؟ " فأنشأتُ أُعْلِمُه الخَبَر، فقال: "من أين كنتَ تأكُلُ وتشربُ؟ " فقلتُ: من ماء زمزم، فقال: "أما إنه طعامُ طُعْم"، ومعه أبو بكرٍ فقال: يا رسول الله، ائذن لي أن أُعشِّيَه، قال: "نعم"، ثم خرجَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يمشي، وأخذ أبو بكرٍ بيدي، حتى وَقَفَ رسول الله صلى الله عليه وسلم باب أبي بكر، ثم دخل أبو بكر بيتَه، ثم أتى بزبيبٍ من زَبيب الطائف، فجعل يُلقيه لنا، قبضًا قبضًا، ونحن نأكلُ منه حتى تملَّأنا منه.فقال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يا أبا ذرِّ" فقلتُ: لبَّيك، فقال لي: "إنه قد رُفِعَت لي أرضٌ، وهى ذاتُ مالٍ ولا أحسَبُها إِلَّا تِهامة، فاخرُج إلى قومك فادْعُهم إلى ما دخلت فيه"، قال: فخرجتُ حتى أتيتُ أمّي وأخي، فأعلمتُهُم الخبر، فقالا: ما لنا رغبةٌ عن الدِّين الذي دخلت فيه، فأسلما، ثم خرجنا حتى أتينا المدينةَ، فأعلمتُ قومي، فقالوا: إنا قد صَدَّقناك، ولعلَّنا نلقى محمدًا، صلى الله عليه وسلم، فلما قَدِم علينا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم لَقيناهُ، فقالت له غِفارٌ: يا رسول الله، إنَّ أبا ذرٍّ أعلمَنا ما أعلمتَه، وقد أسلَمْنا وشَهِدْنا أنك رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، ثم تَقدَّمَت أَسلَمُ خُزاعة [5]، فقالت: يا رسول الله، إنا قد رَغِبْنا ودخَلْنا فيما دخل فيه إخوانُنا وحُلفاؤنا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أسلَمُ سَالَمَها اللهُ، وغِفارُ غَفَرَ اللهُ لها"، ثم أخذ أبو بكر بيدي، فقال: يا أبا ذرّ، فقلتُ: لبَّيك يا أبا بكرٍ، فقال: هل كنتَ تَألَّهُ في جاهِليَّتك؟ قلتُ: نعم، لقد رأيتني أقومُ عند الشمس، فلا أزالُ مُصلِّيًا حتى يُؤذِيَني حَرُّها، فأخِرُّ كأَنِّي خِفَاءٌ، فقال لي: فأينَ كنتَ تَوَجَّهُ؟ قلتُ: لا أدري إلَّا حيث وجَّهَني الله، حتى أدخَلَ الله عَلَيَّ الإسلام [6].
আবু যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, সর্বপ্রথম যে বিষয়টি আমাকে ইসলামের দিকে আহ্বান করেছিল, তা হলো: আমরা ছিলাম আরবের একটি গোত্র। একবার আমাদের এলাকায় দুর্ভিক্ষ দেখা দিল। আমি আমার মা ও আমার ভাইকে—যার নাম ছিল উনায়স—আমাদের নজদের উপরের দিকে অবস্থিত শ্বশুরবাড়ির কাছে নিয়ে গেলাম। আমরা যখন সেখানে পৌঁছলাম, তারা আমাদের খুব সম্মান করল। যখন গোত্রের একজন লোক তা দেখল, সে আমার মামার কাছে গিয়ে বলল, তুমি কি জানো না যে উনায়স তোমার স্ত্রীর কাছে যায়? (অর্থাৎ, মন্দ উদ্দেশ্যে)। রাবী বলেন, এতে তিনি (মামা) মনে মনে ক্রোধান্বিত হলেন। আমি আমার উট চরাতে চলে গেলাম। ফিরে এসে দেখলাম তিনি (মামা) বিষণ্ণ অবস্থায় কাঁদছেন। আমি বললাম, হে মামা, আপনি কাঁদছেন কেন? তিনি আমাকে সব ঘটনা জানালেন। আমি বললাম, আল্লাহ তা থেকে রক্ষা করুন! আমরা তো অশ্লীলতাকে ভয় করি, যদিও এখন সময়টা আমাদের জন্য প্রতিকূল। আপনি আমাদের সাথে শুরুতে যে ভালো ব্যবহার করেছেন, তা আপনি নষ্ট করে দিলেন। একত্রে থাকা আর সম্ভব নয়। অতঃপর আমি আমার মা ও ভাইকে নিয়ে রওয়ানা হলাম এবং মক্কার কাছাকাছি এসে অবস্থান নিলাম।
আমার ভাই বলল, আমি কবিতা দিয়ে (অন্য কবিদের) সাথে প্রতিদ্বন্দিতা করি। সে একজন কবি ছিল। আমি বললাম, তুমি তা করো না। কিন্তু তার জিদ তাকে তাড়িয়ে নিয়ে গেল, এমনকি সে দুরাইদ ইবনুস সিম্মাহর দলের (কবিতা) সাথে তার নিজের দলের প্রতিদ্বন্দিতা করাল। আল্লাহর কসম! দুরাইদ সেদিন আমার ভাইয়ের চেয়ে বড় কবি ছিলেন। কিন্তু তারা যখন খানসার কাছে বিচার চাইল, তখন তিনি দুরাইদের চেয়ে আমার ভাইকে প্রাধান্য দিলেন। এর কারণ হলো, দুরাইদ তাকে (খানসাকে) তার পিতার কাছে বিয়ের প্রস্তাব দিয়েছিলেন। কিন্তু খানসা বলেছিলেন: "বৃদ্ধ লোক! আমার তাকে প্রয়োজন নেই।" ফলে তিনি দুরাইদের প্রতি বিদ্বেষ পোষণ করতেন। তাই আমরা তার (দুরাইদের) পশুপাল আমাদের পশুপালের সাথে যুক্ত করলাম। এতে আমাদের অনেক পশুপাল হয়ে গেল।
এরপর আমি মক্কায় এলাম। আমি প্রথমে সাফা পাহাড়ে গেলাম। সেখানে কুরাইশের গণ্যমান্য ব্যক্তিরা উপস্থিত ছিল। আমার কাছে খবর পৌঁছেছিল যে সেখানে একজন ‘সাবেয়ী’ (ধর্মত্যাগী), অথবা পাগল, অথবা কবি, অথবা জাদুকর আছে। আমি বললাম, তোমরা যার কথা বলছো, সে কোথায়? তারা বলল, ঐ তো সে, যেখানে তুমি দেখছ। আমি তার দিকে ফিরলাম। আল্লাহর শপথ! আমি তাদের থেকে এক পাথরের দূরত্বও পার হতে পারিনি, এমন সময় তারা (কুরাইশরা) আমার উপর ঝাঁপিয়ে পড়ল এবং আমাকে আঘাত করতে শুরু করল হাড়, পাথর আর মাটির ঢিলা দিয়ে। তারা আমাকে রক্তাক্ত করে দিল। আমি কাবা ঘরে এসে পৌঁছলাম এবং কাপড়ের পর্দা ও দেয়ালের মাঝে প্রবেশ করলাম। আমি সেখানে ত্রিশ দিন রোযা রাখলাম। আমি কিছুই খেতাম না বা পান করতাম না, কেবল যমযমের পানি ছাড়া।
অবশেষে এক চাঁদনী আলোকিত রাতে খুযা‘আ গোত্রের দু’জন মহিলা আসলো। তারা কাবা শরীফ তাওয়াফ করল। এরপর তারা ইসাফ ও নায়েলার কথা উল্লেখ করল—যা ছিল দুটি মূর্তি, যার ইবাদত তারা করত। আমি পর্দার নিচ থেকে মাথা বের করে বললাম: তোমরা দু’জনের একজনকে অন্যজনের উপর চাপিয়ে নাও (অর্থাৎ ব্যঙ্গ করলাম)। এতে তারা রাগান্বিত হলো এবং বলল: আল্লাহর কসম! আমাদের পুরুষেরা যদি এখানে উপস্থিত থাকত, তবে তুমি এ কথা বলতে পারতে না। অতঃপর তারা চলে গেল। আমি তাদের পিছু নিলাম। অবশেষে তারা আল্লাহর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সাক্ষাৎ করল। তিনি বললেন: "তোমরা কে? তোমরা কোথা থেকে এসেছ? তোমরা কোথা থেকে এসেছ এবং কী তোমাদের নিয়ে এসেছে?" তারা তাঁকে ঘটনা জানাল। তিনি বললেন: "তোমরা সেই সাবীয়কে কোথায় রেখে এসেছ?" তারা বলল: আমরা তাকে পর্দার ভেতরে ও দেয়ালের মাঝে রেখে এসেছি। তিনি তাদের বললেন: "সে কি তোমাদের কিছু বলেছে?" তারা বলল: হ্যাঁ। আমি সামনে এগিয়ে গিয়ে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে পৌঁছলাম এবং তাঁকে সালাম দিলাম। তিনি বললেন: "তুমি কে? তুমি কোন্ গোত্রের লোক? তুমি কোথা থেকে এসেছ? আর কী তোমাকে নিয়ে এসেছে?" তখন আমি তাঁকে ঘটনা জানাতে শুরু করলাম। তিনি বললেন: "তুমি কোথা থেকে খাচ্ছিলে ও পান করছিলে?" আমি বললাম: যমযমের পানি থেকে। তিনি বললেন: "সাবধান! এটি হলো খাদ্যের জন্য খাদ্যস্বরূপ (অর্থাৎ শুধু পানীয় নয়, এটি ক্ষুধাও নিবারণ করে)।"
তাঁর (নবীজীর) সাথে আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উপস্থিত ছিলেন। তিনি বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমাকে অনুমতি দিন, আমি তাকে রাতের খাবার খাওয়াই। তিনি বললেন: "হ্যাঁ।" এরপর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হেঁটে বের হলেন। আর আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমার হাত ধরলেন। আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবু বকরের দরজায় এসে দাঁড়ালেন। এরপর আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর ঘরে প্রবেশ করলেন। অতঃপর তিনি তায়েফের কিছু কিশমিশ আনলেন। তিনি মুষ্টি ভরে ভরে আমাদের দিচ্ছিলেন। আমরা তা থেকে খেলাম, যতক্ষণ না আমরা পরিতৃপ্ত হলাম।
এরপর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন: "হে আবু যার!" আমি বললাম: লাব্বাইক। তিনি আমাকে বললেন: "আমার জন্য একটি ভূমিকে উপরে তুলে দেখানো হয়েছে, যা সম্পদশালী। আমি মনে করি না যে সেটি তিহামা ছাড়া অন্য কিছু। সুতরাং তুমি তোমার কওমের কাছে যাও এবং তুমি যাতে প্রবেশ করেছ, তাদেরকেও তাতে আহ্বান করো।"
রাবী বলেন, অতঃপর আমি বেরিয়ে এলাম এবং আমার মা ও ভাইয়ের কাছে এসে তাদের ঘটনা জানালাম। তারা দু’জনই বলল: তুমি যে দ্বীন গ্রহণ করেছ, তার প্রতি আমাদের কোনো অনীহা নেই। সুতরাং তারা দু’জনই ইসলাম গ্রহণ করল। এরপর আমরা বেরিয়ে এলাম এবং মদীনার কাছে আসলাম। আমি আমার গোত্রের লোকদেরকে খবর জানালাম। তারা বলল: আমরা তোমাকে সত্যবাদী মনে করি, আর সম্ভবত আমরা মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সাক্ষাৎ পাব। যখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের কাছে আগমন করলেন, আমরা তাঁর সাথে সাক্ষাৎ করলাম। তখন গিফার গোত্রের লোকেরা তাঁকে বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আবু যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাদেরকে সেই খবর জানিয়েছেন, যা আপনি তাঁকে জানিয়েছেন। আমরা ইসলাম গ্রহণ করেছি এবং সাক্ষ্য দিয়েছি যে আপনি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)। এরপর খুযা‘আ গোত্রের ‘আসলাম’ শাখা এগিয়ে এলো এবং বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমরা আগ্রহী হয়েছি এবং আমাদের ভাই ও মিত্ররা যাতে প্রবেশ করেছে, আমরাও তাতে প্রবেশ করেছি। তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আসলাম! আল্লাহ তাদেরকে শান্তি দিন (সালামাহাল্লাহু), আর গিফার! আল্লাহ তাদেরকে ক্ষমা করুন (গাফারাল্লাহু লাহা)।"
এরপর আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমার হাত ধরলেন এবং বললেন: হে আবু যার! আমি বললাম: লাব্বাইক, হে আবু বকর! তিনি বললেন: তুমি কি তোমার জাহেলিয়াতের যুগেও উপাসনা করতে? আমি বললাম: হ্যাঁ। আমি নিজেকে সূর্যের দিকে মুখ করে দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করতে দেখেছি। আমি এভাবে সালাত আদায় করতাম যতক্ষণ না সূর্যের তাপ আমাকে কষ্ট দিত। তখন আমি কাপড়ের মতো লুটিয়ে পড়তাম। তিনি আমাকে বললেন: তখন তুমি কোন্ দিকে মুখ করতে? আমি বললাম: আমি জানি না, তবে আল্লাহ আমাকে যেদিকে মুখ করাতেন (সেদিকেই করতাম), যতক্ষণ না আল্লাহ আমার উপর ইসলামকে প্রবেশ করালেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ب): حجز، بالزاي، وأُهملت في بقية نسخنا الخطية، ولهذا أثبتناها بالراء المهملة، إذ لو كانت بالزاي لأُعجمت لضرورة بيانها، وكلاهما قريبٌ في المعنى.
[2] الصِّرمة: القطعة القليلة من الإبل.
5547 [3] - تحرَّف في (ز) و (ب) و"تلخيص الذهبي" إلى: خباء، والمثبت على الصواب من هامش (ز) مُصحَّحًا عليه، وسقط الاسم من (ص) و (م)، فصار كأنَّ القاضي بين دريد وأُنيس هو أبو ذرّ نفسُه، وإنما الصحيح أنها الخنساء، فهي المقصودة بقوله بعد قليل: وذلك أنَّ دريدًا خطبها إلى أبيها .. وقصتُها في ذلك مشهورة عند أهل الأدب.
5547 [4] - في نسخنا الخطية: كان والجادة ما أثبتنا.
5547 [5] - وقع في نسخنا الخطية: أسلم وخزاعة، بواو العطف، وإنما أراد الإضافة لا العطف، يعني أسلم الذين هم إخوة خُزاعة، دون غيرهم. وانظر "معرفة علوم الحديث" للحاكم ص 167 حيث ذكر أسلم خزاعة وأسلم بني جُمح، مُفرِّقًا بينهما في مؤتلف ومختلف الأنساب.
5547 [6] - إسناده صالح كما قال الذهبي في "تلخيصه"، فإنَّ أبا طرفة عبّاد بن الريّان صالح الحديث كما قال الذهبي في "تاريخ الإسلام" 3/ 903، وكذلك عامر بن لدين الأشعري صالح الحديث، روى عنه جمع ووثقه العجلي، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وأبو ليلى الأشعري تابعيٌّ كبير، وبعضهم ذكره الصحابة. وقد روي نحو هذا الحديث من وجه آخر عن أبي ذرٍّ.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (773)، وفي "الأوسط" (60)، وفي "الأحاديث الطوال" (5)، وعنه أبو نُعيم في "معرفة الصحابة" (1577)، وفي "حلية الأولياء" 1/ 157، وأخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 26/ 224 - 225 من طريق أبي القاسم بن أبي العقب، ومن طريق أبي عبد الله محمد بن إبراهيم بن مروان - وهو القرشي الدمشقي - ثلاثتهم (الطبراني وابن أبي العقب وابن مروان) عن أبي عبد الملك أحمد بن إبراهيم القرشي، بهذا الإسناد.وأخرجه الدولابي في "الكنى والأسماء" (1213) عن أبي القاسم يزيد بن محمد بن عبد الصمد، عن محمد بن عائذ، به مختصرًا بقوله صلى الله عليه وسلم عن زمزم: "أما إنه طعام طعم". قال الدُّولابي: مختصر من حديث إسلام أبي ذر الحديث الطويل.وأخرجه بنحوه أحمد 35/ (21525) و (21526)، ومسلم (2473)، وابن حبان (7133) من طريق عبد الله بن الصامت ابن أخي أبي ذرٍّ، عن عمه أبي ذرٍّ، غير أنه ذكر أنَّ الذي حكم بين أخيه أُنيس وبين الرجل الآخر وفضّل أنيسًا على ذلك الرجل هو كاهنٌ وليس الخنساء، ولم يسم ذلك الرجل الذي دافع أُنيسًا، بل أبهمه، خلافًا لما في رواية أبي ليلى الأشعري حيث ذكر أنه دريد بن الصِّمة. وقال ابن الصامت في روايته: "وُجِّهت لي أرضٌ ذات نخل ولا أُراها إلا يثرب" بدل قوله: "ولا أحسبها إلّا تهامة" وليس المعنى بعيدًا إذ المدينة من تِهامة.ويشهد لهذا الحرف من الحديث حديث عائشة عند أحمد 42/ (25626) والبخاري (2297)، بلفظ: "أُريتُ دار هجرتكم، رأيت سبخةً ذات نخل بين لابتين". وقد تقدم عند المصنف برقم (4308).والسَّنَة: الجَدْبُ والقَحْطُ.والهجمة: قريبٌ من المئة من الإبل.وقِيْد حَجَر: أي قَدْر حَجَر، يعني مسافة قريبة جدًّا. والمَدَر: قِطَع الطين اليابس.وضَرَّجوني: لَطَّخوني.وقوله: بين السُّتور والبناء: يعني بين الكعبة وأستارها.وأقفو آثارهما: أتبعهما من ورائهما.و"زمزم طعام طُعْم"، أي: تُشبعُ الإنسانَ إذا شرب ماءها كما يَشبع من الطعام.والقُبَض: جمع قَبْضَة، وهو ما قَبَضتَ عليه من شيءٍ.وتألَّهُ: مضارع حذفت إحدى تائيه تخفيفًا، وهو من التألُّه، أي: التنسُّك والتعبُّد.والخِفَاء: ككِساء وزنًا ومعنًى.
5548 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عيسى اللَّخْمي بتِنِّيسَ، حدثنا عمرو بن أبي سَلَمة، حدثنا صَدَقة بن عبد الله، عن نَصْر بن عن عَلْقمة، عن أخيه، عن ابن عائذٍ، عن جُبير بن نُفَير، قال: كان أبو ذرٍّ يقول: لقد رأيتُني رُبعَ الإسلامِ، لم يُسلِمُ قَبلي إلَّا النبيُّ صلى الله عليه وسلم وأبو بكر وبلالٌ [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.
আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলতেন: আমি নিজেকে ইসলামের চতুর্থতম ব্যক্তি হিসেবে দেখতাম। আমার পূর্বে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ব্যতীত আর কেউই ইসলাম গ্রহণ করেননি।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف أحمد بن عيسى اللخمي، لكنه متابع، وصدقة بن عبد الله - وهو السَّمين الدمشقي - ضعيف منكر الحديث وقد روي نحو هذا الخبر بعده من وجه آخر محتمل للتحسين.وأخرجه الطبري في "تاريخه" 2/ 315 عن ابن عبد الرحيم البرقي، وأخرجه الطبرى. "الكبير" (1618)، وعنه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (1551) عن عبد الله بن سعيد بن أبي مريم، والطبراني في "مسند الشاميين" (2528) ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 46/ 266 عن أحمد بن مسعود الدمشقي، ثلاثتهم عن عمرو بن أبي سلمة، بهذا الإسناد. وفي رواية أحمد بن مسعود والبرقي عن جبير بن نفير، قال: كان أبو ذر وعمرو بن عَبَسَة كلاهما يقول، فذكره … وآخره: كلاهما لا يدري متى أسلم الآخر.حديث عمرو بن عَبَسة تقدَّم برقم (4467) من وجه آخر عنه.
5549 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا الحُسين بن محمد بن زياد، حدثنا عبد الله بن الرُّومي، حدثنا النضر بن محمد، حدثنا عِكْرمة بن عمّار، عن أبي زُمَيل سِماك بن الوليد، عن مالك بن مَرثَد، عن أبيه، عن أبي ذرٍّ، قال: كنت ربُعَ الإسلام: أسلمَ قبلي ثلاثةُ نفرٍ وأنا الرابعُ، أتيتُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم فقلتُ: السلامُ عليك يا رسولَ الله، أشهدُ أن لا إله إلَّا الله، وأنَّ محمدًا عبدُه ورسولُه، فرأيتُ الاستِبْشار في وجهِ رسول الله صلى الله عليه وسلم [1].
আবূ যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি ইসলামের চতুর্থ ব্যক্তি ছিলাম। আমার আগে তিনজন লোক ইসলাম গ্রহণ করেছিলেন এবং আমি ছিলাম চতুর্থ। আমি নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বললাম: আসসালামু আলাইকা ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে আল্লাহ ছাড়া কোনো উপাস্য নেই এবং মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর বান্দা ও রাসূল। তখন আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চেহারায় আনন্দের ছাপ দেখতে পেলাম।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده محتمل للتحسين من أجل مَرْثَد - وهو ابن عبد الله الزِّمَاني ويقال: الذِّماري - فهو وإن لم يرو عنه غير ابنه مالك، تابعيٌّ ذكره ابن حبان في "الثقات" وصحَّح حديثه، ووثقه العجلي، وحسَّن الترمذيُّ له حديثَين، وصحَّح له ابن خزيمة حديثًا.وأخرجه ابن حبان (7134) عن أحمد بن الحسين بن عبد الجبار، عن عبد الله بن الرومي، بهذا الإسناد. ولصدق لهجة أبي ذرٍّ الغفاري مفردةً شاهدان من حديث عبد الله بن عمرو بن العاص وأبي الدرداء، وسيأتيان بعده.وثالث من حديث ابن عُمر سيأتي برقم (6414).ورابع من حديث علي بن أبي طالب سيأتي برقم (8688). وأسانيد الأربعة ضعيفة.وخامس من مرسل محمد بن سيرين عند ابن سعد في "طبقاته" 4/ 214. ورجاله لا بأس بهم. فهي حسنةٌ بشواهدها.والخضراء: السماء والغَبْراء: الأرض.
5550 - أخبرنا أبو الفضل محمد بن إبراهيم المُزَني، حدثنا أحمد بن سلَمة، حدثنا العباس بن عبد العظيم العَنْبري، حدثنا النَّضر بن محمد، حدثنا عِكْرمة بن عمار، حدثنا أبو زُمَيل، عن مالك بن مَرثد، عن أبيه، عن أبي ذرٍّ، قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "ما تُقِلُّ الغَبْراءُ، ولا تُظِلُّ الخَضْراء من ذِي لَهْجةٍ أصدقَ ولا أوفَى مِن أبي ذرٍّ، شَبيهِ عيسى ابن مريم"، فقام عمرُ بنُ الخطاب فقال: يا رسول الله، فنعرفُ ذلك له؟ قال: "نعم، فاعرِفُوه له" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم ولم يُخرجاه.وقد رُويَ عن عبد الله بن عَمرو، وأبي الدَّرْداء.أما حديث عبد الله بن عمرو:
আবূ যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর চেয়ে অধিক সত্যবাদী ও অধিক বিশ্বস্ত (কথা বলার) কোনো মানুষকে ধূসর পৃথিবী ধারণ করেনি এবং সবুজ আকাশ ছায়া দেয়নি। সে মারইয়াম তনয় ঈসার (আঃ)-এর সাথে সাদৃশ্যপূর্ণ।" তখন উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দাঁড়িয়ে বললেন, ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমরা কি তাঁর জন্য এই মর্যাদাটি স্বীকৃতি দেব? তিনি বললেন: "হ্যাঁ, তোমরা তাঁকে এর স্বীকৃতি দাও।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده محتمل للتحسين كسابقه.وأخرجه الترمذي (3802)، وابن حبان (7132) من طريق العباس بن عبد العظيم، بهذا الإسناد.وقال الترمذي: حديث حسنٌ غريب من هذا الوجه.وأخرجه ابن حبان (7135) من طريق أبي داود سليمان بن معبد السِّنْجي، عن النضر بن محمد، به.ويشهد له دون قصة عمر بن الخطاب حديثُ أبي هريرة عند ابن سعد في "الطبقات" 4/ 214، وابن أبي شيبة 12/ 125، والعقيلي في "الضعفاء الكبير" (1138)، وأبي نعيم في "معرفة الصحابة" (1555)، من طريقين عن أبي هريرة فيهما مَقالٌ، لكن يشدُّ أحدهما الآخر.وشاهد آخرُ من مرسل مالك بن دينار عند ابن سعد 4/ 214 أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "أيكم يلقاني على الحال التي أفارقه عليها؟ " فقال أبو ذرّ: أنا، فقال له النبي صلى الله عليه وسلم: "صدقت"، ثم قال: "ما أظلّتِ الخضراء، ولا أقلّتِ الغبراء على ذي لهجة أصدق من أبي ذر، من سرّه أن ينظر إلى زهد عيسى ابن مريم فلينظر إلى أبي ذرٍّ". ورجاله ثقات. ولصدق لهجة أبي ذرٍّ الغفاري مفردةً شاهدان من حديث عبد الله بن عمرو بن العاص وأبي الدرداء، وسيأتيان بعده.وثالث من حديث ابن عُمر سيأتي برقم (6414).ورابع من حديث علي بن أبي طالب سيأتي برقم (8688). وأسانيد الأربعة ضعيفة.وخامس من مرسل محمد بن سيرين عند ابن سعد في "طبقاته" 4/ 214. ورجاله لا بأس بهم. فهي حسنةٌ بشواهدها.والخضراء: السماء والغَبْراء: الأرض.
5551 - فحدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا العباس بن محمد الدُّورِي، حدثنا أبو يحيى الحِمّاني، عن الأعمش.وأخبرني بكر بن محمد الصَّيرَفي، حدثنا أبو قِلابَة، حدثنا يحيى بن حمّاد، حدثنا أبو عَوَانة، عن سليمان الأعمش، عن عثمان بن قيس البَجَلي، عن أبي حَرْب الدِّيلِي قال: سمعتُ عبدَ الله بن عَمرو يقول: سمعتُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم يقول: "ما أظلَّتِ الخَضْراءُ، ولا أقلّتِ الغَبْراءُ على رجلٍ أصدقَ لَهْجةً من أبي ذرٍّ" [1].وأما حديث أبي الدَّرْداء:
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “সবুজ আকাশমণ্ডলী এমন কোনো ব্যক্তিকে ছায়া দেয়নি এবং ধূসর পৃথিবীও এমন কোনো ব্যক্তিকে বহন করেনি, যে আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর চেয়ে অধিক সত্যবাদী।”
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف عثمان بن قيس البَجَلي، وهو عثمان بن عُمير بن قيس أبو اليَقظان، لكن للحديث شواهد يصح بها. أبو يحيى الحِمّاني: هو عبد الحميد بن عبد الرحمن، والأعمش: هو سليمان بن مِهْران، وأبو قلابة: هو عبد الملك بن الرَّقَاشي، وأبو عوانة: هو الوضَّاح بن عبد الله اليشكُري، وأبو حرب الدِّيْلي: هو ابن أبي الأسود.وأخرجه أحمد 11/ (6630) و (7078) عن يحيى بن حماد، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (6519)، وابن ماجه (156)، والترمذي (3801) من طريق عبد الله بن نُمير، عن سليمان الأعمش، به. وقال الترمذي: حديث حسن.
5552 - فحدَّثَناهُ الشيخُ أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدثنا سليمان بن حَرْب، حدثنا حماد بن سَلَمة، عن علي بن زيد، عن بلال بن أبي الدَّرداء، عن أبي الدَّرداء، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما أظلَّتِ الخَضْراءُ، ولا أَقَلَّتِ الغَبْراءُ من ذي لَهجةٍ أصدقَ من أبي ذرٍّ" [1]. محنةُ أبي ذرٍّ رضي الله عنه -قد صَحَتِ الروايةُ من أَوجُه عن مصعبِ بن سعد بن أبي وقّاصٍ عن أبيه عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال: "أشدُّ الناس بلاءً الأنبياءُ، ثم العلماءُ، ثم الأمثَلُ فالأمثَلُ" [2].
আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আকাশ তার নিচে আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর চেয়ে অধিক সত্যবাদী মুখের (ব্যক্তির) উপর ছায়া ফেলেনি এবং পৃথিবী তার উপর আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর চেয়ে অধিক সত্যবাদী ব্যক্তিকে বহন করেনি।" আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পরীক্ষা। বিভিন্ন সূত্রে মুসআব ইবনু সা'দ ইবনু আবি ওয়াক্কাস তাঁর পিতা থেকে বর্ণনা করেছেন যে, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মানুষের মধ্যে সবচেয়ে কঠিন বিপদের সম্মুখীন হন নবীগণ, অতঃপর আলেমগণ, অতঃপর যারা গুণে ও কর্মে উত্তম, অতঃপর যারা তাদের কাছাকাছি।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف علي بن زيد - وهو ابن جُدعان. وقد رُوي الحديثَ من وجه آخر عن أبي الدرداء سيأتي عند المصنف برقم (5556).وأخرجه أحمد 45/ (27493) عن حسن بن موسى الأشيب وسليمان بن حرب، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي شيبة 13/ 343 عن أبي معاوية الضرير، عن الحسن بن سالم بن أبي الجعد، عن أبيه، قال: بعث أبو الدرداء إلى أبي ذر رسولًا … فذكر قصةً، في آخرها: فقال أبو الدرداء: ما أظلَّتِ الخضراءُ ولا أقلَّتِ الغَبْراء على ذي لهجة أصدقَ منك يا أبا ذَرّ. ورجاله ثقات لكنه مرسل لأن سالمًا لم يدرك أبا ذرّ. وقد وقع في إسناد "المصنَّف" تحريف يوهم اتصالَ الإسناد، صوَّبناه من "الزهد" لابن أبي عاصم (68) حيث روى بعض حروف قصة أبي الدرداء مع أبي ذر عن ابن أبي شيبة بسنده هذا.
[2] تقدَّم عند المصنف برقم (121) و (122)، لكن بلفظ: "الأنبياء ثم الأمثلُ فالأمثلُ" ليس فيه ذكر العلماء، بل لم يَرِد ذكرُ العلماءِ إلّا في روايةِ الحاكم لحديث أبي سعيد الخُدري الذي تقدَّم عنده برقم (120)، ولم يذكره غيره ممَّن خرَّج حديث أبي سعيد الخدري.
5553 - أخبرنا أبو النَّضْر محمد بن يوسف الفَقِيه وأبو إسحاق إبراهيم بن محمد القارئ الزاهد، قالا: حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي، حدثنا أبو تَوْبة الربيعُ بنُ نافع، حدثنا يزيدُ بن ربيعة، عن أبي الأشعث الصَّنْعانِي، عن أبي عُثمان النَّهْدي، عن أبي ذرٍّ قال: قال لي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "يا أبا ذَرٍّ، كيف [1] أنتَ إذا كنتَ في حُثالةٍ" وشبَّكَ بين أصابعه، قلت: يا رسولَ الله، فما تأمُرُني؟ قال: "اصبِرْ، اصبِرْ، اصبِرْ، خالِقُوا الناسَ بأخلاقِهم، وخالِفُوهم في أعمالِهم" [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে বললেন: "হে আবূ যার, তোমার অবস্থা কেমন হবে যখন তুমি মানুষের নিকৃষ্ট অংশের (বা আবর্জনার) মধ্যে থাকবে?" এই কথা বলার সময় তিনি তাঁর আঙ্গুলগুলো একটির সাথে আরেকটি মিলিয়ে দেখালেন। আমি বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ, তখন আপনি আমাকে কী করতে নির্দেশ দেন? তিনি বললেন: "ধৈর্য ধারণ করো, ধৈর্য ধারণ করো, ধৈর্য ধারণ করো। তোমরা মানুষের সাথে তাদের (উত্তম) স্বভাব দ্বারা মেলামেশা করো, কিন্তু তাদের (মন্দ) কাজ থেকে ভিন্ন থাকো।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] لفظة "كيف" سقطت من نسخنا الخطية، واستدركناها من "تلخيص المستدرك" للذهبي.
[2] إسناده ضعيف من أجل يزيد بن ربيعة - وهو الرَّحْبي الصَّنْعاني - فهو ضعيف منكر الحديث.وأخرجه البيهقي في "الزهد" (192) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (470) عن أحمد بن خُليد الكِنْدي الحلبي، عن أبي توبة الربيع بن نافع، به.وأخرجه البزار (4165) عن إبراهيم بن سعيد الجوهري، والعُقيلي في "الضعفاء" (1932) عن محمد بن أحمد بن الوليد الأنطاكي، كلاهما عن أبي توبة، به. غير أنهما جعلاه من مسند ثوبان، بدل أبي ذرٍّ. وقال العقيلي: هذا يروى بغير هذا الإسناد وخلاف هذا اللفظ من طريقٍ صالح.قلنا: يشير إلى حديث عبد الله بن عمرو بن العاص الذي تقدم برقم (2704) بلفظ: "كيف بكم وبزمان - أو يُوشك أن يأتي زمانٌ - يُغربَل الناسُ غربلةٌ، ويبقى حُثالةٌ من الناس قد مَرِجَتْ عهودُهم وأماناتهم، واختلفوا فكانوا هكذا" وشبَّك بين أصابعه، قالوا: فكيف بنا يا رسول الله؟ قال: "تأخذون ما تعرفون، وتَدَعُون ما تنكرون، وتُقبِلون على أمر خاصَّتكم، وتَدَعون أمر عامَّتكم".
5554 - أخبرَناهُ أبو الحُسين عبد الصمد بن علي بن مُكرَم ابن أخي الحسن بن مُكرَم البَزّاز ببغداد، أخبرنا عبد الوارث بن إبراهيم العسكري، حدثنا سَيف بن مِسكين الأُسْواري، حدثنا المبارك بن فَضَالة، عن المُنتصِر بن عُمارة بن أبي ذرٍّ الغِفاري، عن أبيه، عن جده، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "إذا اقتربَ الزمانُ كَثُر لُبْسُ الطَّيَالسة، وكَثُرَت التجارةُ، وكَثُر المالُ، وعَظُمَ ربُّ المالِ بمالِه، وكَثُرت الفاحِشةُ، وكانت إمارةُ الصِّبْيان، وكَثُر النساءُ، وجارَ السلطانُ، وطُفِّفَ في المِكْيال والمِيزان، ويُربّي الرجلُ جَرْوَ كلبٍ خيرٌ له من أن يُربِّي ولدًا له، ولا يُوقَّرُ كبيرٌ، ولا يُرحَمُ صغيرٌ، ويَكثُر أولادُ الزِّنى، حتى إنَّ الرجلَ ليَغْشى المرأةَ على قارِعةِ الطريق، فيقولُ أمثَلُهم في ذلك الزمانِ: لو اعتزلتُما عن الطريق، ويلبَسُون جُلودَ الضَّأْنِ على قُلوب الذئابِ، أمثَلُهم في ذلك الزمانِ المُداهِنُ" [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . هذا حديث تَفرَّد به سَيفُ بن مِسكين عن المُبارَك بن فَضَالة، والمُبارَكُ بن فَضَالة ثقة.
আবূ যারর আল-গিফারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন কিয়ামত নিকটবর্তী হবে, তখন (আরবদের মধ্যে) তাইলাসাহ (লম্বা চাদর/শাল) পরিধান বৃদ্ধি পাবে, ব্যবসা-বাণিজ্য বৃদ্ধি পাবে, ধন-সম্পদ বৃদ্ধি পাবে, এবং সম্পদের মালিক তার সম্পদের কারণে সম্মানিত হবে। অশ্লীলতা বৃদ্ধি পাবে, বালকেরা (অযোগ্যরা) শাসক হবে, নারীদের সংখ্যা বৃদ্ধি পাবে, এবং শাসকরা যুলুম করবে। মাপ ও ওজনে কম দেওয়া হবে (ঠকানো হবে)। মানুষ তার নিজের সন্তান প্রতিপালন করার চেয়ে কুকুরের বাচ্চা প্রতিপালন করাকে উত্তম মনে করবে। বড়দের সম্মান করা হবে না এবং ছোটদের প্রতি দয়া করা হবে না। ব্যভিচারের সন্তান বৃদ্ধি পাবে, এমনকি মানুষ রাস্তার ধারে প্রকাশ্যে নারীর সাথে মিলিত হবে। সেই যুগে তাদের মধ্যে যে উত্তম হবে, সে শুধু এতটুকুই বলবে: ‘তোমরা যদি রাস্তা থেকে একটু সরে যেতে!’ তারা মেষের চামড়া পরিধান করবে (বাহ্যিক ধার্মিকতা দেখাবে), অথচ তাদের অন্তর হবে নেকড়ের মতো। আর সেই যুগে তাদের মধ্যে যে সবচেয়ে ভালো হবে, সে হবে তোষামোদকারী (বা অসৎ কাজ সহ্যকারী)।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده واهٍ من أجل سيف بن مسكين، فهو واهٍ كما قال الذهبي في "تلخيصه" وزاد قائلًا: ومنتصر وأبوه مجهولان. وهو كما قال.وأخرجه عبد الباقي بن قانع في "جزء من حديثه" (55)، والطبراني في "الأوسط" (4860) عن عبد الوارث بن إبراهيم العسكري، بهذا الإسناد. لكن زاد ابن قانع بين المبارك والمنتصر الحَسَنَ!وأخرج الطبراني في "الكبير" (10556)، وفي "الأوسط" (4861) عن عبد الوارث بن إبراهيم، عن سيف بن مسكين، عن مبارك بن فضالة، عن الحسن، عن عُتَيٍّ السَّعْدي، عن ابن مسعود … فذكر بعض أشراط الساعة الواردة في حديث أبي ذرٍّ الغفاري، فظهر بذلك سبب ذكر الحسن في حديث أبي ذَرٍّ عند ابن قانع، وأنَّ سيفًا قد اضطرب فيه أيضًا. والحسن: هو البصري.ولكثرة التجارة في آخر الزمان شاهد من حديث عبد الله بن مسعود عند أحمد 6/ (3870)، والبخاري في "الأدب المفرد" (1049) وغيرهما.وسيأتي عند المصنف برقم (7220) و (8583).وآخر من حديث عمرو بن تَغْلب عند أحمد 39/ (24009/ 77)، والنسائي (6005) وغيرهما، وتقدَّم عند المصنف برقم (2176).وثالث من حديث علي بن أبي طالب عند أبي سعيد عيسى بن سالم الشاشي في "حديثه" (46)، ومن طريقه أخرجه أبو العباس المستغفري في "دلائل النبوة" (282)، والشجري في "الأمالي الخميسية" (2724). ورجاله ليس بهم بأس.ولكثرة المال في آخر الزمان شاهد من أبي هريرة عند أحمد 13/ (8135)، والبخاري (1036)، ومسلم (157) وغيرهم.ومن حديث عمرو بن تَغْلب الذي تقدم.وثالث من حديث عوف بن مالك عند أحمد 39/ (23971)، والبخاري (3176)، وسيأتي عند المصنف برقم (6460) و (8500).ورابعٌ من حديث أبي سعيد الخدري عند أحمد 17/ (11012) و (11326)، ومسلم (2914)، وسيأتي عند المصنف برقم (8886).وخامس من حديث جابر بن عبد الله عند أحمد 17/ (11339)، ومسلم (2913)، وسيأتي عند المصنف برقم (8606). وسادس من حديث أبي موسى الأشعري عند البخاري (1414)، ومسلم (1012).ولكثرة الفاحشةِ في آخر الزمان شاهد من حديث أنس بن مالك عند أحمد 20/ (12527)، والبخاري (80)، ومسلم (2671)، وغيرهم.وآخر من حديث علي بن أبي طالب الذي تقدم.ولإمارة الصبيان في آخر الزمان شاهد من حديث عبد الله بن عمرو بن العاص سيأتي عند المصنف برقم (8627) و (8832).وآخر من حديث الحكم بن عمرو الغِفاري سيأتي عند المصنف برقم (5984).وثالث من حديث عابس الغِفاري عند أحمد 25 / (16040).ورابع من حديث علي بن أبي طالب عند أبي سعيد عيسى بن سالم وغيره، وتقدم ذكره قريبًا.ولكثرة النساء في آخر الزمان شاهد من حديث أنس بن مالك عند أحمد 19/ (11944) والبخاري (81)، ومسلم (2671). وسيأتي عند المصنف برقم (8723) و (8725).ولجَوْر السلطان آخر الزمان شاهدٌ من حديث عبد الله بن عُمر عند ابن ماجه (4019)، وغيره، وسيأتي عند المصنف برقم (8837). وهو حديث حسن.وآخر من حديث رافع بن خَديج عند الفريابي في "القدر" (223)، والعقيلي في "الضعفاء" (1344)، والآجُرّي في "الشريعة" (389)، والطبراني في "الكبير" (4270)، وغيرهم، وسنده لا بأس به عند بعضهم.وثالث من حديث علي بن أبي طالب عند أبي سعيد عيسى بن سالم الشاشي في "حديثه" (46) وغيره كما تقدم ذكره قريبًا. وانظر حديث علي بن أبي طالب الآتي برقم (8121).ولتطفيف المكيال والميزان في آخر الزمان شاهد من حديث عبد الله بن عُمر الذي تقدمت الإشارة إليه قريبًا.وآخر من حديث علي بن أبي طالب عند أبي سعيد عيسى بن سالم وغيره وقد تقدم.وللرغبة عن الولد وكراهيته في آخر الزمان شاهد من حديث أبي موسى الأشعري عند ابن أبي الدنيا في "العقوبات" (340)، وأبي العباس المستغفري في "دلائل النبوة" (262) و (263)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 21/ 27 و 22/ 11، بلفظ: "لا تقوم الساعة حتى … ويكون الولد غَيظًا ..... ".ومثلُ هذا اللفظ من حديث عائشة عند الخرائطي في "مكارم الأخلاق" (349)، والطبراني في "الأوسط" (6427)، والقضاعي في "مسند الشهاب" (949). وإسناده ضعيف.ومثلُه كذلك من حديث علي بن أبي طالب عند أبي سعيد عيسى بن سالم الشاشي في "حديثه" (46)، ومن طريقه أخرجه المستغفري في دلائل النبوة (282)، والشجري في "الأمالي الخميسية" (2724).ومثله من حديث حذيفة بن اليمان عند أبي نعيم في "حلية الأولياء" 3/ 35 وإسناده ضعيف.لكن يعضده ما جاء عن حذيفة بن اليمان من وجه آخر عند المعافى بن عمران الموصلي في "الزهد" (19)، ومن طريقه أخرجه أبو نعيم في "الحلية" (5/ 187)، وأبو عمرو الداني في "السنن الواردة في الفتن" (233) و (438)، بلفظ: "لا تقوم الساعة حتَّى يتمنى أبو الخمسة أنهم أربعة، وأبو الأربعة أنهم ثلاثة، وأبو الثلاثة أنهم اثنان، وأبو الاثنين أنهم واحد، وأبو الواحد أنه ليس له ولد". وإسناده ضعيف.ولعدم توقير الكبير ورحمة الصغير آخرَ الزمان شاهدٌ من حديث ابن عُمر عند ابن أبي الدنيا في "العقوبات" (34)، وفي "الأمر بالمعروف والنهي عن المنكر" (8)، وإسناده ضعيف.وآخر من حديث عائشة الذي تقدم ذكره قريبًا.ولكثرة أولاد الزنى في آخر الزمان شاهدٌ من حديث معاذ بن أنس الآتي عند المصنّف برقم (8576)، وإسناده ضعيف.ولغِشيان الرجلِ المرأة في قارعة الطريق آخر الزمان شاهد من حديث أبي هريرة الآتي عند المصنّف برقم (8726).وآخر من حديث عبد الله بن مسعود موقوفًا عند نعيم بن حماد في "الفتن" (1832)، وابن أبي الدنيا في "العقوبات" (318)، والطبراني في "الكبير" (8585) و (8586)، وإسناده صحيح. ومثله لا يقال من قِبَل الرأي، فله حكم المرفوع. وسيأتي مرفوعًا من وجه آخر عند المصنّف برقم (8803)، ولكنه لا يصح.وثالث من حديث عبد الله بن عمرو عند ابن حبان (6767)، وغيره، وسيأتي عند المصنّف برقم (8613).ورابع من حديث النواس بن سمعان الآتي عند المصنّف برقم (8718).وانظر "فتح الباري" للحافظ ابن حجر 23/ 169.ولوجود أناسٍ يلبسون جلود الضأن على قلوب الذئاب شاهد من حديث أبي هريرة عند الترمذي (2404)، وغيره، وإسناده ضعيف.ولمعناه شاهد من حديث عبد الله بن عُمر عند الترمذي (2405) وقال: حديث حسن غريب بلفظ: "إنَّ الله تعالى قال: لقد خلقت خلقًا ألسنتهم أحلى من العسل، وقلوبُهم أمَرُّ من الصَّبِر … ". والصحيح أنَّ هذا الحرف من الحديث مما نُقل عن أهل الكتاب، فقد صحَّ مثلُه عن نَوف البكالي عند ابن وهب في التفسير من "جامعه" (28)، ومن طريقه أخرجه الطبري في "تفسيره" 2/ 313 - 314.وروي مثلُه عن وهب بن مُنبِّه عند ابن المبارك في "الزهد" (470) وغيره.ومثلُه عن أبي العالية رفيع بن مهران من قوله عند أحمد في "الزهد" (8741)، وابن أبي الدنيا في "العقوبات" (341) وغيرهما.ولكون أمثلهم في ذلك الزمان المُداهن شاهدٌ من قول أبي الجَلْد جيلان بن فروة عند الدولابي في "الكنى" (775)، وهو تابعيّ ثقة معروف بقراءة كتب أهل الكتاب وقد روي مرفوعًا موصولًا بذكر معقل بن يسار عند الحارث بن أبي أسامة كما في "بغية الباحث" (768)، وغيره، لكنه لا يصحُّ.وعن أنس بن مالك، قال: قيل: يا رسول الله، متى يُترك الأمر بالمعروف والنهي عن المُنكر؟ قال: "إذا ظهر فيكم مثل ما ظهر في بني إسرائيل" قيل: وما ذاك يا رسول الله؟ قال: "إذا ظهر الإدمان في خياركم، والفاحشة في شراركم، وتحوّل المُلك في صغاركم، والفقه في أرذالكم"، أخرجه ابن وضاح في "البدع" (195)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (3350)، والطبراني في "الشاميين" (1547) و (3368)، وأبو طاهر الذهبي في "مُخلِّصياته" (1490) وغيرهم. وإسناده حسنٌ.
5555 - حَدَّثَنَا أبو بكر أحمد بن سلْمان الفقيه، حَدَّثَنَا محمد بن الهيثم القاضي، حَدَّثَنَا الهيثم بن جَميل الأنطاكي، حَدَّثَنَا شَريك، عن أبي المُحجَّل، عن صَدَقة بن أبي عمران [عن عِمران] [1] بن حِطّان، قال: أتيتُ أبا ذرٍّ فوجدتُه في المسجد مُحتبيًا بكِساءٍ أسودَ وحدَه، فقلتُ: يا أبا ذرٍّ، ما هذه الوَحْدةُ؟ فقال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "الوحدةُ خَيرٌ من جَليسِ السُّوء، والجليسُ الصالح خيرٌ من الوَحْدة، وإملاءُ الخيرِ خيرٌ من السُّكوت، والسكوتُ خيرٌ من إملاءِ الشَّرِّ" [2].
আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, [ইমরান ইবনে হিট্টান বলেন:] আমি আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এলাম এবং তাকে মসজিদে একা একটি কালো চাদর মুড়ি দিয়ে বসে থাকতে দেখলাম। আমি বললাম, হে আবু যর, এই একাকীত্ব কেন? তিনি বললেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "একাকীত্ব মন্দ সঙ্গীর চেয়ে উত্তম। আর সৎ সঙ্গী একাকীত্বের চেয়ে উত্তম। আর উত্তম কথা বলা নীরবতার চেয়ে উত্তম। আর নীরবতা মন্দ কথা বলার চেয়ে উত্তম।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] ما بين المعقوفين سقط من نسخنا الخطية، واستدركناه من "شعب الإيمان" للبيهقي (4639) حيث رواه عن الحاكم بسنده هذا، وقد جاء على الصواب في "إتحاف المهرة" للحافظ ابن حجر (17587).
[2] صحيح موقوفًا من قول أبي ذرٍّ، ولم يصح مرفوعًا، ولعلَّ هذا هو مراد الذهبي في "تلخيصه" حين قال: لم يصحّ ولا صححه الحاكم.وقد وقع في إسناده خلاف فقد رواه محمد بن الهيثم القاضي عن الهيثم بن جميل كما جاء في رواية المصنّف هنا، وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (4639) عن أبي عبد الله الحاكم.وخالفه جماعةٌ، فرووه عن الهيثم بن جميل عن شريك - وهو ابن عبد الله النخعي - عن أبي المُحجَّل - واسمه رُدَينيّ بن مرة، وقيل غير ذلك في اسمه - عن معفس بن عمران بن حِطّان، عن ابن الشَّنية - واسمه عبد الله - عن أبي ذرٍّ الغفاري. كذلك أخرجه الدولابي في "الكُنى" (1734) عن محمد بن عوف الطائي، والخرائطي في "مكارم الأخلاق" (753)، والقضاعي في "مسند الشهاب" (1266)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 66/ 215 من طريق سعدان بن يزيد، وأبو الشيخ الأصبهاني كما في "الغرائب الملتقطة" للحافظ ابن حجر (2836) من طريق أحمد بن الفرات، ثلاثتهم عن الهيثم بن جميل.وكذلك رواه عون بن سلام عند أبي القاسم الأصبهاني في "الترغيب والترهيب" (1737)، ومحمد بن سعيد بن سليمان الأصبهاني فيما أشار إليه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 59/ 356، كلاهما عن شريك. غير أنهما جعلاه من قول أبي ذر الغفاري موقوفًا عليه، وهذا أشبه.فقد رواه كذلك موقوفًا سفيانُ الثوريُّ في روايته عن أبي المحجّل عند ابن أبي شيبة 13/ 341، وابن أبي الدنيا في "العُزلة والانفراد" (163)، وابن أبي عاصم في "الزهد" (65)، غير أنَّ سفيان خالف شريكًا في إسناده فرواه عن أبي المحجّل، عن ابن عمران بن حِطّان، عن أبيه، قال: قال أبو ذرٍّ، فذكره موقوفًا من قول أبي ذرٍّ. فهذا هو الصحيح في هذا الخبر أنه موقوف من قول أبي ذرٍّ الغفاري، والله تعالى أعلم.وكأنَّ قول شريكٍ النخعيِّ في إسناده هو الصواب دون قول سفيان الثوري، لأنَّ في رواية شريك ذكر قصة دخول عبد الله بن الشَّنيّة على أبي ذَرٍّ ومحاورته له. وعمران بن حِطّان لم يُدرك أبا ذرٍّ الغِفاري، وعبد الله بن الشَّنية تابعيّ لم يؤثر توثيقه عن أحد، ولا يُعرف في غير هذا الخبر، فهو مجهولٌ، لكنه لم ينفرد به.فقد أخرجه ابن أبي الدنيا في "العُزلة والانفراد" (126)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (4638) من طريق الأحنف بن قيس، عن أبي ذرٍّ الغفاري موقوفًا. وإسناده حسنٌ.وأخرجه الخرائطي في "مكارم الأخلاق" (476) و (810)، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 66/ 215 عن الحسن بن عرفة عن عباد بن عباد المهلبي، عن يونس بن عبيد: أنَّ رجلًا أتى أبا ذرٍّ. فذكر مثله موقوفًا، ورجاله ثقات لكنه مرسل، يونس بن عُبيد لم يدرك أبا ذرٍّ.
5556 - حَدَّثَنَا أبو العباس محمد بن يعقوب، حَدَّثَنَا الحسن بن علي بن عفَّان، حَدَّثَنَا أبو يحيى الحِمّاني، عن الأعمش، عن شِمْر بن عَطِيَّة، عن شَهْر بن حَوشَبٍ، عن عبد الرحمن بن غَنْم، قال: كنتُ مع أبي الدَّرْداء، فجاء رجلٌ من قِبَل المدينةِ، فساء لَهُ، فأخبره أن أبا ذرٍّ سُيِّر إلى الرَّبَذة، فقال أبو الدَّرْداء: إنا لله وإنا إليه راجِعُون، لو أنَّ أبا ذرٍّ قَطَع لي عُضوًا أو يدًا ما هَجَّنْتُه بعدما سمعتُ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يقول: "ما أظلَّتِ الخَضْراءُ، ولا أقلّتِ الغَبْراءُ من رجُل أصدقَ لَهْجةً من أبي ذرٍّ" [1].
আবুদ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (আব্দুর রহমান ইবনে গানম বলেন,) আমি তাঁর সাথে ছিলাম। তখন মদীনার দিক থেকে একজন লোক এসে তাঁকে প্রশ্ন করল। সে তাঁকে জানালো যে, আবু যার্র (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে রাবাযাহতে পাঠিয়ে দেওয়া হয়েছে। তখন আবুদ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ইন্না লিল্লাহি ওয়া ইন্না ইলাইহি রাজিউন (নিশ্চয় আমরা আল্লাহর জন্য এবং আমরা তাঁর কাছেই প্রত্যাবর্তনকারী)। তিনি আরও বললেন: যদি আবু যার্র আমার কোনো অঙ্গ বা হাতও কেটে ফেলতেন, তবুও আমি তাঁকে নিন্দা করতাম না। কারণ আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "সবুজ আকাশ কারো উপর ছায়া দেয়নি এবং ধূসর পৃথিবীও আবু যার্র (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর চেয়ে অধিক সত্যবাদী কথার অধিকারী অন্য কোনো ব্যক্তিকে ধারণ করেনি।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] المرفوع في آخره حسن لغيره، وهذا إسناد فيه لِينٌ من أجل شهر بن حوشب، لكن روى عنه هذه القصة عبدُ الحميد بنُ بَهْرام عند أحمد 3 / (21724)، وروايتهُ عنه قويةٌ عند بعض أهل العلم، ولعلَّه لذلك جوَّد إسنادَه الذهبي في "تلخيصه".وقد جاء في روايةٍ أخرى من طريق قتادة بعض عن شهر بن حوشب مرسلًا في قصة أبي ذرٍّ عند أحمد في "الزهد" (798) ما يُفسِّر قوله هذا من تسيير أبي ذرٍّ إلى الرَّبَذة أنه كان باختيار أبي ذرٍّ وطلبه هو بعد أن عرضَ عليه عثمان بن عفان أن يقيم في المدينة، حيث قال له عثمان: يا أبا ذرٍّ، أقم عندنا، تغدو عليكم اللقاح وتروح، فقال: لا حاجة لي فيها، وقال: إنَّ الرَّبذة كانت لي منزلًا فائذن لي أن آتيها، فأذِن له.ويشهد لذلك حديثُ زيد بن وهب عند البخاري (1406)، قال: مررتُ بالرَّبذة، فإذا بأبي ذرٍّ، فقلت له: ما أنزلك منزلك هذا؟ قال: كنت بالشام، فذكر قصته مع معاوية في اختلافهما في كنز الذهب والفضة، وأنَّ معاوية شكاه لعثمان فاستقدمه عثمان إلى المدينة، قال أبو ذرٍّ: فكثر عليَّ الناسُ، حتَّى كأنهم لم يروني قبل ذلك، فذكرت ذاك لعثمان، فقال لي: إن شئت تنحّيتَ، فكنتَ قريبًا، فذاك الذي أنزلني هذا المنزل.وحديثُ عبد الله بن الصامت عند ابن سعد 4/ 218، وابن شَبَّة في "تاريخ المدينة" 3/ 1035، وأبي عوانة في "صحيحه" (11467 - طبعة الجامعة الإسلامية)، وابن حبان (5964)؛ في قصة دخول أبي ذرٍّ على عثمان لما قدم من الشام. وفيه: أنه استأذنه إلى الرَّبذة، فأذن له، بل قال له عثمان: نأذن لك ونأمر لك بنَعَمٍ من نَعَم الصدقة، فتصيبُ من رِسْلِها. والرُّسل: اللبن. ومرسلُ محمد بن سيرين، عند ابن سعد 4/ 212، وابن أبي عمر العدني في "مسنده" كما "إتحاف الخيرة" للبوصيري (4178) مثل رواية قتادة عن شهر، ورجاله ثقات، وفيه زيادة بنحو حديث أبي ذرٍّ الآتي بعده.وقد تقدَّم المرفوع منه من طريق أخرى عن أبي الدرداء برقم (5552).
5557 - حَدَّثَنَا أبو بكر أحمد بن كامل بن خَلَف القاضي، حَدَّثَنَا أبو قِلابة بنُ الرَّقَاشِي، حَدَّثَنَا سعيد بن عامر، حَدَّثَنَا أبو عامر - وهو صالح بن رُستُم الخَزّاز - عن حُميد بن هلال، عن عبد الله بن الصامِت، قال: قالت أمُّ ذرّ: والله ما سيَّرَ عثمانُ أبا ذرٍّ، ولكنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم قال: "إذا بَلَغَ البِناءُ سَلْعًا فاخرُجْ منها". قال أبو ذرٍّ: فلما بلغ البِناءُ سَلْعًا وجاوزَ، خرجَ أبو ذرٍّ إلى الشامِ؛ وذكر باقيَ الحديثِ بطُوله [1].هذا حديث صحيح الإسناد على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه. والحديث المفسَّر في هذا الباب حديثُ الأعمش عن أبي وائل عن حَلّام بن جَزْلٍ [2] الغِفاري، تَركتُه لألفاظٍ فيه، ولِطُوله أيضًا، واقتصرتُ على الإسنادَين الصحيحَين.
উম্মে যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: "আল্লাহর কসম, উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবূ যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে নির্বাসিত করেননি। বরং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: ‘যখন ইমারত (নির্মাণকাজ) সালা' (পর্বত) পর্যন্ত পৌঁছে যাবে, তখন তুমি সেখান থেকে বেরিয়ে যেও।’ আবূ যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ‘অতএব যখন ইমারত (নির্মাণকাজ) সালা' পর্যন্ত পৌঁছালো এবং তা অতিক্রম করলো, তখন আবূ যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সিরিয়ার (শাম) দিকে বের হয়ে গেলেন।’ এবং বর্ণনাকারী অবশিষ্ট দীর্ঘ হাদীসটি উল্লেখ করেছেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسنٌ من أجل أبي عامر صالح بن رُستُم، فهو حسن الحديث. أبو قلابة بن الرقاشي: هو عبد الملك بن محمد. والذي حدَّث أم ذرٍّ بالحديث هو أبو ذرٍّ كما يظهر من سياق الخبر، فلا يُعلُّ بالإرسال.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 401 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه بنحوه ابن أبي شيبة في "مسنده" كما في "المطالب العالية" لابن حجر (4338)، وابن الأعرابي في "معجمه" (109) من طريق بدر بن خالد الجرمي، عن أبي ذرٍّ. وإسناده حسنٌ إن شاء الله. وقد تحرَّف اسم بدر في مسند ابن أبي شيبة إلى: زيد، وهو تحريف قديم فيما يغلب على الظن، لأنَّ الذهبي أورد الخبر في "السير" 20/ 70 وسماه: زيد بن خالد الجهني، وإنما هو بدر بن خالد الجرمي، فقد أخرج بعض هذا الخبر البخاري في "تاريخه الكبير" 2/ 138 في ترجمة بدر بن خالد، وكذلك ذكره الدارقطني في "العلل" (1097) فسماه على الصواب، وانظر "الجرح والتعديل" لابن أبي حاتم 2/ 412، فقد ترجم لبدر بن خالد وأنه روى عن عثمان وأبي ذرٍّ. وروى عنه أبو الجويرية. وذكره ابن حبان في "ثقاته".ويشهد له مرسل محمد بن سيرين عند ابن سعد 4/ 212، وابن أبي عمر العدني في "مسنده" كما في "إتحاف الخيرة" للبوصيري (4178)، والخلال في "السنة" (50)، ورجاله ثقات.وسَلْع: جبل قرب المدينة.
[2] تحرَّف في (ب) إلى: حرام بن جندل. والظاهر أنَّ المصنّف أراد الحديث الذي سيُخرِّجُ بعضَه برقم (8688).
5558 - أخبرنا أحمد بن يعقوب الثَّقفي، حَدَّثَنَا موسى بن زكريا، حَدَّثَنَا خليفة بن خيّاط، قال: مات أبو ذرٍّ بالرَّبَذة سنة اثنتين وثلاثين، وصلَّى عليه عبد الله بن مَسعُود، وفيها أيضًا مات عبد الله بن مسعود [1].وصلاة عبد الله بن مسعود عليه لا تَبعُد، فقد رُويَ بإسنادٍ آخرَ أنه كان في الرَّهْط من أهل الكوفة الذين وَقَفُوا للصلاةِ عليه [2]
খলীফা ইবনে খাইয়্যাত থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বত্রিশ হিজরি সনে রাবযা নামক স্থানে ইন্তেকাল করেন এবং আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর জানাযার সালাত আদায় করান। এই বছরেই আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও ইন্তেকাল করেন। আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর (আবু যরের) জানাযার সালাত আদায় করা অসম্ভব নয়। কেননা, ভিন্ন সূত্রে বর্ণিত হয়েছে যে তিনি কুফাবাসীর সেই ছোট দলটির অন্তর্ভুক্ত ছিলেন, যারা তাঁর জানাযার সালাত আদায়ের জন্য দাঁড়িয়েছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وهو في "الطبقات" لخليفة بن خيّاط ص 31 - 32، ومن طريقه أخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 66/ 222.
[2] كما تقدَّم عند المصنّف برقم (4421)، وإسناده ضعيف. وانظر ما تقدَّم برقم (5541).