আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
81 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق، حدثنا إبراهيم بن عبد السلام.وحدثنا محمد بن صالح، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب؛ قالا: حدثنا أبو كُريب، حدثنا حسين بن علي، عن زائدة، عن عاصم بن كُلَيب، عن مُحارِب بن دِثَار، عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "اتَّقُوا دَعَواتِ المظلوم، فإنها تَصعَدُ إلى السماءِ كأنها شَرَارٌ" [1].قد احتجَّ مسلم بعاصم بن كُليب، والباقون من رُوَاة هذا الحديث متَفقٌ على الاحتجاج بهم، ولم يُخرجاه.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা মজলুমের (অত্যাচারিতের) দো'আ থেকে বেঁচে থাকো, কারণ তা স্ফুলিঙ্গের ন্যায় আকাশের দিকে উঠে যায়।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح من جهة إبراهيم بن أبي طالب، أما إبراهيم بن عبد السلام - وهو أبو إسحاق الوشّاء - فقد ضعَّفه الدارقطني. أبو كريب: هو محمد بن العلاء الهمداني، وزائدة: هو ابن قُدامة.وأخرجه أبو منصور الديلمي في "مسند الفردوس" كما في "الغرائب الملتقطة" لابن حجر (128) من طريق عمرو بن مرزوق، عن زائدة بن قدامة، عن عطاء بن السائب، عن محارب بن دثار، به. وفي الإسناد إلى عمرو بن مرزوق من لا يُعرَف، وما عند الحاكم أصحُّ.
82 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصَّفّار، حدثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدثنا محمد بن أبي بكر المقدَّمي، حدثنا فُضَيل بن سليمان، حدثنا موسى بن عُقْبة، حدثني إسحاق بن يحيى، عن عُبادة بن الصامت قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أنا سيِّدُ الناس يومَ القيامة ولا فَخْر، ما من أحدٍ إلَّا وهو تحت لِوائي يومَ القيامة ينتظرُ الفَرَج، وإنَّ معي لواءَ الحمد، أنا أَمشي ويمشي الناسُ معي حتى آتيَ بابَ الجنة فأَستفتحَ فيقال: مَن هذا؟ فأقول: محمَّدٌ، فيقال: مرحبًا بمحمَّدٍ، فإذا رأيتُ ربِّي خَرَرتُ له ساجدًا أنظُرُ إليه" [1].هذا حديث كبير في الصفات والرُّؤية، صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه!
উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি কিয়ামতের দিন মানবজাতির সরদার, আর এতে কোনো অহংকার নেই। কিয়ামতের দিন এমন কেউ থাকবে না যে আমার ঝাণ্ডার (পতাকার) নিচে মুক্তি/নিষ্কৃতির প্রতীক্ষায় থাকবে না। আর নিশ্চয়ই আমার সাথে থাকবে 'হামদ' (প্রশংসা)-এর ঝাণ্ডা। আমি হাঁটতে থাকব এবং মানুষেরা আমার সাথে হাঁটতে থাকবে, যতক্ষণ না আমি জান্নাতের দরজায় এসে তা খুলতে বলি। তখন জিজ্ঞেস করা হবে: ইনি কে? আমি বলব: মুহাম্মাদ। তখন বলা হবে: মুহাম্মাদের জন্য স্বাগতম। আর যখন আমি আমার রবকে দেখব, তখন আমি তাঁর উদ্দেশ্যে সিজদায় লুটিয়ে পড়ব এবং তাঁর দিকে তাকিয়ে থাকব।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف لجهالة إسحاق بن يحيى - وهو ابن الوليد بن عبادة بن الصامت - ثم إنه لم يدرك جدَّ أبيه عبادة، فهو منقطع، كما أنَّ فضيل بن سليمان ليس بذاك القوي.وأخرجه أبو منصور الديلمي في "مسند الفردوس" كما في "الغرائب الملتقطة" (936) من طريق الحاكم بهذا الإسناد.وعزاه الهيثمي في "المجمع" 10/ 376 للطبراني، وهو عنده بنحوه، وقال: وإسحاق بن يحيى لم يدرك عبادة.وانظر حديث أبي هريرة الطويل في الشفاعة عند البخاري (4712) ومسلم (194).
83 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا العباس بن الوليد بن مَزْيَد البيروتي، حدثني أَبي قال: سمعت الأوزاعيَّ.وحدثنا أبو عبد الله محمد بن علي بن مَخلَد الجوهري ببغداد، حدثنا إبراهيم بن الهيثم البَلَدي، حدثنا محمد بن كثير المِصِّيصي، حدثنا الأوزاعي.وحدثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا بِشْر بن موسى، حدثنا معاوية بن عمرو، حدثنا أبو إسحاق الفَزَاري، حدثنا الأوزاعي - وهذا لفظ حديث أبي العباس - قال: حدثني ربيعة بن يزيد ويحيى بن أبي عمرو السَّيباني قالا: حدثنا عبد الله بن فَيرُوزَ الدَّيلَمي قال: دخلتُ على عبد الله بن عمرو بن العاص وهو في حائطٍ له بالطائف يقال له: الوَهْط، وهو يخاصرُ [1] فتًى من قريش، وذلك الفتى يُزَنُّ بشرب الخمر، فقلت لعبد الله بن عمرو: خِصالٌ تَبلُغني عنك تحدِّث بها عن رسول الله صلى الله عليه وسلم: أنه من شرب الخمرَ شَرْبةً، لم تُقبَل توبتُه أربعين صباحًا - فاختَلَجَ الفتى يدَه من يد عبد الله ثم ولَّى - وأنَّ الشقيَّ من شَقِيَ في بطن أُمه، وأنه من خَرَجَ من بيته لا يريد إلّا الصلاةَ ببيت المقدِس، خرج من خطيئته كيومَ وَلَدتْه أمُّه.فقال عبد الله بن عمرو: اللهم إني لا أُحِلُّ لأحدٍ أن يقول عليَّ ما لم أقل، إني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "مَن شربَ الخمرَ شَرْبةً، لم تُقبَلْ توبتُه أربعين صباحًا، فإن تابَ تابَ الله عليه، فإنْ عادَ لم تُقبَلْ توبتُه أربعين صباحًا - فلا أدري في الثالثة أو في الرابعة قال: - فإنْ عادَ كان حقًّا على الله أن يَسقِيَه من رَدْغةِ الخَبَالِ يومَ القيامة".قال: وسمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "إِنَّ الله خلقَ خَلْقَه في ظُلْمةٍ، ثم ألقى عليهم من نُورِه، فمن أصابه من ذلك النُّورِ يومئذٍ شيءٌ فقد اهتدى، ومن أخطأَه ضَلَّ"، فلذلك أقول: جَفَّ القلمُ على عِلْم الله.وسمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "إنَّ سليمان بن داود سألَ ربَّه ثلاثًا، فأعطاه اثنتين، ونحن نرجو أن يكونَ قد أعطاه الثالثةَ: سأله حُكمًا يُصادِفُ حُكْمَه، فأعطاه إياه، وسأله مُلكًا لا ينبغي لأحدٍ من بعدِه، فأعطاه إياه، وسأله أيُّما رجل يخرجُ من بيته لا يريدُ إلّا الصلاةَ في هذا المسجد، أن يخرجَ من خطيئته كيومَ وَلَدتْه أمُّه، فنحن نرجو أن يكونَ اللهُ قد أعطاه إيَّاه" [2]. قال الأوزاعي: حدثني ربيعة بن يزيد بهذا الحديث فيما بين المِقسِلَّاط والباب الصغير [3].هذا حديث صحيح قد تداوَلَه الأئمة، وقد احتجَّا بجميع رواته [4] ثم لم يُخرجاه، ولا أعلمُ له علةً.
আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আব্দুল্লাহ ইবনু ফাইরূয আদ-দাইলামী বলেন: আমি তায়েফে তাঁর 'ওয়া'হ্ত' নামক একটি বাগানে আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করলাম। তিনি তখন কুরাইশের এক যুবককে বাহুতে ধরে রেখেছিলেন, যার বিরুদ্ধে মদ পানের অভিযোগ ছিল।
আমি আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললাম: আপনার থেকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সূত্রে যে কথাগুলো আমার কাছে পৌঁছেছে, তা হলো: যে ব্যক্তি এক ঢোক মদ পান করে, তার তওবা চল্লিশ সকাল পর্যন্ত কবুল হয় না—(এ কথা শুনে যুবকটি আব্দুল্লাহর হাত থেকে নিজের হাত ছাড়িয়ে নিয়ে চলে গেল)—এবং নিশ্চয় দুর্ভাগা সেই, যে তার মায়ের গর্ভে থাকতেই দুর্ভাগা প্রমাণিত হয়। আর যে ব্যক্তি বাইতুল মুকাদ্দাসে সালাত আদায়ের ইচ্ছা ছাড়া ঘর থেকে বের হয়, সে তার গুনাহ থেকে এমনভাবে মুক্ত হয়ে যায় যেন তার মা তাকে এইমাত্র জন্ম দিয়েছেন।
আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আল্লাহ, আমি কাউকে অনুমতি দিচ্ছি না যে, সে আমার উপর এমন কথা আরোপ করুক যা আমি বলিনি। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি এক ঢোক মদ পান করে, তার তওবা চল্লিশ সকাল পর্যন্ত কবুল হয় না। তবে যদি সে তওবা করে, আল্লাহ তার তওবা কবুল করেন। যদি সে আবার পান করে, তবে তার তওবা চল্লিশ সকাল পর্যন্ত কবুল হয় না। যদি সে পুনরায় মদ পান করে—(বর্ণনাকারী বলেন, আমি জানি না, তিনি কি তৃতীয় বারে না চতুর্থ বারে বলেছিলেন)—তবে কিয়ামতের দিন আল্লাহ্র জন্য অপরিহার্য হয়ে যায় যে তিনি তাকে 'রাদগাতুল খবাল' থেকে পান করাবেন।"
তিনি (আব্দুল্লাহ ইবনু আমর) আরও বললেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয় আল্লাহ্ তাঁর সৃষ্টিকে অন্ধকারে সৃষ্টি করলেন, অতঃপর তাদের উপর তাঁর নূরের কিছু অংশ ঢেলে দিলেন। সেদিন যার উপর সেই নূর পৌঁছাল, সে হেদায়েত প্রাপ্ত হলো, আর যাকে তা এড়িয়ে গেল, সে পথভ্রষ্ট হলো।" এই জন্যই আমি বলি: আল্লাহ্র জ্ঞানের উপর কলম শুকিয়ে গেছে (তকদীর নির্ধারিত হয়ে গেছে)।
তিনি আরও বললেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয় সুলাইমান ইবনু দাউদ (আঃ) তাঁর রবের কাছে তিনটি বিষয় চেয়েছিলেন। তিনি তাঁকে দু’টি দান করেছেন, আর আমরা আশা করি যে তিনি তাঁকে তৃতীয়টিও দান করেছেন: তিনি এমন বিচার ব্যবস্থা চাইলেন যা আল্লাহ্র বিচারের অনুরূপ হবে, অতঃপর আল্লাহ্ তাঁকে তা দান করলেন। তিনি এমন রাজত্ব চাইলেন যা তাঁর পরে আর কারো জন্য উপযুক্ত হবে না, অতঃপর আল্লাহ্ তাঁকে তা দান করলেন। আর তিনি চাইলেন, যে কোনো ব্যক্তি এই মাসজিদে (বাইতুল মুকাদ্দাসে) সালাত আদায়ের উদ্দেশ্য ছাড়া নিজ ঘর থেকে বের হবে, সে যেন তার গুনাহ থেকে এমনভাবে মুক্ত হয়ে যায় যেন তার মা তাকে এইমাত্র জন্ম দিয়েছেন। আমরা আশা করি, আল্লাহ্ তাঁকে এটিও দান করেছেন।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تصحف في المطبوع إلى: محاضر.
[2] إسناده صحيح، ومحمد بن كثير المصيصي - وإن كان فيه ضعف - تابعه هنا في روايته عن الأوزاعي اثنان. وأبو إسحاق الفزاري: اسمه إبراهيم بن محمد بن الحارث.وأخرجه بطوله أحمد 11/ (6644) عن معاوية بن عمرو، بهذا الإسناد - ولم يذكر يحيى بنَ أبي عمرو السيباني. وقال في المرفوع منه: "لم تقبل له صلاة أربعين صباحًا"، وهو الصواب إن شاء الله الذي يتفق مع السياق.وأخرج الحديث الأول فيمن شرب الخمر: النسائي (5160) عن القاسم بن زكريا بن دينار، عن معاوية بن عمرو، عن أبي إسحاق، عن الأوزاعي، عن ربيعة بن يزيد وحده، به.وأخرجه ابن ماجه (3377)، وابن حبان (5357) من طريق الوليد بن مسلم، والنسائي (5160) من طريق بقية بن الوليد، كلاهما عن الأوزاعي، به. وقال الوليد في حديثه: "لم تقبل له صلاة أربعين صباحًا". وانظر الأحاديث الآتية بالأرقام (958) و (7418) و (7419) و (7422).وأخرج الحديث الثاني: ابن حبان (6169) من طريق ابن المبارك، عن الأوزاعي، عن ربيعة بن يزيد، به.وأخرجه أيضًا (6170) من طريق معاوية بن صالح، عن ربيعة، به.وأخرجه الترمذي (2642) من طريق إسماعيل بن عياش، عن يحيى بن أبي عمرو السيباني، به.وأخرج الحديث الثالث: ابن حبان (1633) من طريق الوليد بن مسلم، عن الأوزاعي، عن ربيعة، به.وأخرجه النسائي (774) من طريق سعيد بن عبد العزيز، عن ربيعة بن يزيد، عن أبي إدريس الخولاني، عن ابن الديلمي، به - وهذا من المزيد في متصل الأسانيد.وأخرجه ابن ماجه (1408) من طريق أيوب بن سويد، عن يحيى بن أبي عمرو السيباني، به.وسيأتي عند المصنف برقم (3666).يُزَنُّ: أي: يُتَّهم. واختَلَجَ يده: نزعها.رَدْغة الخبال: هي عُصارة أهل النار كما جاء تفسيره في الحديث نفسه عند ابن ماجه وابن حبان، والرَّدغة لغةً: طين ووحل كثير، والخبال في الأصل: الفساد، ويكون في الأفعال والأبدان والعقول.
83 [3] - قوله: "والباب الصغير" تحرَّف في النسخ الخطية والمطبوع إلى: والجاصعير، والتصويب من "المعرفة والتاريخ" ليعقوب بن سفيان 2/ 293 - 294 و"تاريخ دمشق" لابن عساكر 72/ 194. وهما موضعان بدمشق، والمِقسلاط موضع النحّاسين بدمشق، انظر كتاب "غوطة دمشق" لمحمد كرد علي ص 11.
83 [4] - عبد الله بن فيروز الديلمي لم يحتجَّ به أحد منهما.
84 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الرَّبيع بن سليمان [1]، حدثنا عبد الله بن وهب، أخبرني معاوية بن صالح، عن راشد بن سعد، عن عبد الرحمن بن قَتَادة السَّلَمي - وكان من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "خلقَ اللهُ آدمَ ثم خلقَ الخلقَ من ظَهرِه، ثم قال: هؤلاء للجنة ولا أُبالي، وهؤلاء للنار ولا أُبالي" قال: فقيل: يا رسول الله، فعلى ماذا نعملُ؟ قال: "على مُوَافقةِ القَدَر" [2].هذا حديث صحيح قد اتفقا على الاحتجاج برُوَاته عن آخرهم إلى الصحابة [3]، وعبد الرحمن بن قتادة من بني سَلِمة من الصحابة، وقد احتجَّا جميعًا بزهير بن عمرو [4] عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، وليس له راوٍ غيرُ أبي عثمان النَّهْدي، وكذلك احتجَّ البخاريُّ بحديث أبي سعيد بن المعلَّى، وليس له راوٍ غيرُ حفص بن عاصم.
আবদুর রহমান ইবনু কাতাদাহ আস-সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "আল্লাহ তাআলা আদমকে সৃষ্টি করলেন, এরপর তাঁর পৃষ্ঠদেশ থেকে সব সৃষ্টিকে তৈরি করলেন। অতঃপর বললেন: 'এরা জান্নাতের জন্য, আর আমি (এ বিষয়ে) কোনো পরোয়া করি না; আর এরা জাহান্নামের জন্য, আর আমি (এ বিষয়েও) কোনো পরোয়া করি না।'" বর্ণনাকারী বলেন, এরপর জিজ্ঞাসা করা হলো: হে আল্লাহর রাসূল! তাহলে আমরা কিসের উপর আমল করব? তিনি বললেন: "তাকদীরের অনুকূলে।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في (ب) إلى: سليم.
[2] إسناده صحيح، وأعلَّه بعض أهل العلم بالاضطراب ولا يصحُّ ذلك.وأخرجه ابن حبان (338) من طريق الحارث بن مسكين، عن ابن وهب، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 29/ (17660) من طريق ليث بن سعد، عن معاوية بن صالح، به. وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (187) من طريق أبي جعفر الحذّاء، عن علي بن المديني، به.وأخرجه ابن أبي عاصم في "السنة" (358)، والبزار (2837)، وابن منده في "التوحيد" (113)، واللالكائي في "أصول الاعتقاد" (943)، والبيهقي في "الأسماء والصفات" (37) من طرق عن مروان بن معاوية به.وأخرجه المحاملي في "أماليه" (325)، واللالكائي (942) من طريق أبي خالد الأحمر، وأبو القاسم بن بشران في "أماليه" (1243) من طريق يحيى بن زكريا، كلاهما عن أبي مالك الأشجعي، به.وأخرجه البخاري في "خلق أفعال العباد" (118) من طريق الأعمش، عن شقيق أبي وائل، عن حذيفة موقوفًا.
84 [3] - هذا ذهولٌ منه، فإنَّ راشد بن سعد - على ثقته - لم يحتجَّ به أحدٌ منهما، وإنما معاوية بن صالح فإنه من رجال مسلم وحده. وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (187) من طريق أبي جعفر الحذّاء، عن علي بن المديني، به.وأخرجه ابن أبي عاصم في "السنة" (358)، والبزار (2837)، وابن منده في "التوحيد" (113)، واللالكائي في "أصول الاعتقاد" (943)، والبيهقي في "الأسماء والصفات" (37) من طرق عن مروان بن معاوية به.وأخرجه المحاملي في "أماليه" (325)، واللالكائي (942) من طريق أبي خالد الأحمر، وأبو القاسم بن بشران في "أماليه" (1243) من طريق يحيى بن زكريا، كلاهما عن أبي مالك الأشجعي، به.وأخرجه البخاري في "خلق أفعال العباد" (118) من طريق الأعمش، عن شقيق أبي وائل، عن حذيفة موقوفًا.
84 [4] - بل هو من أفراد مسلم. وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (187) من طريق أبي جعفر الحذّاء، عن علي بن المديني، به.وأخرجه ابن أبي عاصم في "السنة" (358)، والبزار (2837)، وابن منده في "التوحيد" (113)، واللالكائي في "أصول الاعتقاد" (943)، والبيهقي في "الأسماء والصفات" (37) من طرق عن مروان بن معاوية به.وأخرجه المحاملي في "أماليه" (325)، واللالكائي (942) من طريق أبي خالد الأحمر، وأبو القاسم بن بشران في "أماليه" (1243) من طريق يحيى بن زكريا، كلاهما عن أبي مالك الأشجعي، به.وأخرجه البخاري في "خلق أفعال العباد" (118) من طريق الأعمش، عن شقيق أبي وائل، عن حذيفة موقوفًا.
85 - حدثنا أبو النَّضْر محمد بن [1] محمد بن يوسف الفقيه، حدثنا عثمان بن سعيد الدارِمي، حدثنا علي بن المَدِيني، حدثنا مروان بن معاوية، حدثنا أبو مالك الأشجَعي، عن ربعي بن حِرَاش عن حُذيفة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إِنَّ الله يَصنَعُ [2] كلَّ صانعٍ وصَنْعتَه" [3].
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ প্রতিটি কারিগর এবং তার শিল্পকর্ম সৃষ্টি করেন।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] قوله: "محمد بن" لم يرد في (ب) والمطبوع، والصواب إثباته كما في (ص)، فإنَّ أبا النضر اسمه محمد وكذا اسم أبيه. وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (187) من طريق أبي جعفر الحذّاء، عن علي بن المديني، به.وأخرجه ابن أبي عاصم في "السنة" (358)، والبزار (2837)، وابن منده في "التوحيد" (113)، واللالكائي في "أصول الاعتقاد" (943)، والبيهقي في "الأسماء والصفات" (37) من طرق عن مروان بن معاوية به.وأخرجه المحاملي في "أماليه" (325)، واللالكائي (942) من طريق أبي خالد الأحمر، وأبو القاسم بن بشران في "أماليه" (1243) من طريق يحيى بن زكريا، كلاهما عن أبي مالك الأشجعي، به.وأخرجه البخاري في "خلق أفعال العباد" (118) من طريق الأعمش، عن شقيق أبي وائل، عن حذيفة موقوفًا.
[2] هكذا في (ص)، وفي المطبوع: "خالق". وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (187) من طريق أبي جعفر الحذّاء، عن علي بن المديني، به.وأخرجه ابن أبي عاصم في "السنة" (358)، والبزار (2837)، وابن منده في "التوحيد" (113)، واللالكائي في "أصول الاعتقاد" (943)، والبيهقي في "الأسماء والصفات" (37) من طرق عن مروان بن معاوية به.وأخرجه المحاملي في "أماليه" (325)، واللالكائي (942) من طريق أبي خالد الأحمر، وأبو القاسم بن بشران في "أماليه" (1243) من طريق يحيى بن زكريا، كلاهما عن أبي مالك الأشجعي، به.وأخرجه البخاري في "خلق أفعال العباد" (118) من طريق الأعمش، عن شقيق أبي وائل، عن حذيفة موقوفًا.
85 [3] - إسناده صحيح. أبو مالك الأشجعي: هو سعد بن طارق.وأخرجه البيهقي في "الأسماء والصفات" (825)، و"الاعتقاد" ص 144 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه البخاري في "خلق أعمال العباد" (117)، ومن طريقه البيهقي في "الأسماء والصفات" (570)، والخطيب في "تاريخ بغداد" 2/ 353 عن علي بن عبد الله - وهو ابن المديني - به. وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (187) من طريق أبي جعفر الحذّاء، عن علي بن المديني، به.وأخرجه ابن أبي عاصم في "السنة" (358)، والبزار (2837)، وابن منده في "التوحيد" (113)، واللالكائي في "أصول الاعتقاد" (943)، والبيهقي في "الأسماء والصفات" (37) من طرق عن مروان بن معاوية به.وأخرجه المحاملي في "أماليه" (325)، واللالكائي (942) من طريق أبي خالد الأحمر، وأبو القاسم بن بشران في "أماليه" (1243) من طريق يحيى بن زكريا، كلاهما عن أبي مالك الأشجعي، به.وأخرجه البخاري في "خلق أفعال العباد" (118) من طريق الأعمش، عن شقيق أبي وائل، عن حذيفة موقوفًا.
86 - حدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدثنا محمد بن أبي بكر المقدَّمي، حدثنا الفُضيل بن سليمان، عن أبي مالك الأشجعي، عن رِبْعيِّ بن حِرَاش، عن حذيفة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إِنَّ الله خالقُ كلِّ صانعٍ وصَنْعتِه" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “নিশ্চয়ই আল্লাহ প্রত্যেক কারিগর এবং তার শিল্পকর্মের সৃষ্টিকর্তা।”
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح الفضيل بن سليمان - وإن كان فيه كلام - متابَع في الذي قبله، وباقي رجاله ثقات.وأخرجه ابن أبي عاصم في "السنة" (357) عن محمد بن أبي بكر المقدمي، بهذا الإسناد. سيأتي عند المصنف برقم (7620)، وهذا أصحُّ من حديث معمر وصالح بن أبي الأخضر عن الزهري عن عروة عن حكيم، وابن أبي خِزامة هذا - أو أبو خزامة - لا يُعرف وقد تفرَّد بالرواية عنه الزهري، ولم يؤثر توثيقه عن أحد. وانظر ما بعده.لكن له شاهد من حديث كعب بن مالك عند ابن حبان في "صحيحه" (6100). وإسناده حسن إن شاء الله، فيتحسّن الحديث بالطريقين.قوله: "هو من قدر الله" يعني أنه تعالى قدَّر الأسباب والمسبَّبات، وربط المسبَّبات بالأسباب، فحصول المسبَّبات عند حصول الأسباب من جملة القدر، والله تعالى أعلم، قاله السندي في حاشيته على "مسند أحمد "24/ (15472).
87 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا يحيى بن محمد بن يحيى، حدثنا مُسدَّد، حدثنا يزيد بن زُرَيع، حدثنا مَعمَر، عن الزُّهْري، عن عُروة، عن حَكِيم بن حِزَام قال: قلت: يا رسول الله، رُقًى كنا نسترقي بها، وأدويةٌ كنا نتداوى بها، هل تردُّ من قَدَرِ الله؟ قال: "هو مِن قَدَرِ الله" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ثم لم يخرجاه [2]، وقال مسلم في تصنيفه فيما أخطأ معمرٌ بالبصرة: إنَّ معمرًا حدَّث به مرتين، فقال مرةً: عن الزهري، عن ابن أبي خِزَامة، عن أبيه.وقال الحاكم: وعندي أنَّ هذا لا يُعلِّله، فقد تابع صالحُ بن أبي الأخضر معمرَ بن راشد في حديثه عن الزهري عن عروة، وصالحٌ وإن كان في الطبقة الثالثة من أصحاب الزهري، فقد يُستشهَد بمثله.
হাকীম ইবনে হিযাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, আমি বললাম, "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আমরা যে ঝাড়ফুঁক করি, অথবা যে ঔষধ সেবন করি, তা কি আল্লাহর কোনো তাকদীরকে রদ করতে পারে?" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তাও আল্লাহর তাকদীরের অংশ।"
এই হাদীসটি শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্তানুযায়ী সহীহ, কিন্তু তারা এটি সংকলন করেননি। মুসলিম তাঁর সংকলনে বসরায় মা‘মার যে ভুলগুলো করেছিলেন সে প্রসঙ্গে বলেন: মা‘মার এই হাদীসটি দু'বার বর্ণনা করেছেন। একবার তিনি বলেছেন, যুহরী থেকে, তিনি ইবনে আবী খিযামা থেকে, তিনি তাঁর পিতা থেকে। হাকিম (রহ.) বলেন: আমার মতে, এটি ত্রুটিপূর্ণ নয়। কেননা সালিহ ইবনে আবিল আখদার যুহরী থেকে উরওয়া হয়ে বর্ণিত হাদীসে মা‘মার ইবনে রাশীদের অনুসরণ করেছেন। সালিহ যুহরীর ছাত্রদের তৃতীয় স্তরের হলেও, তার দ্বারা সাক্ষ্য নেওয়া যেতে পারে।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد قد اختُلف فيه على الزهري كما سيذكر المصنف عقبَه وكما في "علل ابن أبي حاتم" (2537) و"علل الدارقطني" 2/ 251 (250)، وقد رواه جماعة من ثقات أصحاب الزهري عنه عن ابن أبي خِزَامة عن أبيه عن النبي صلى الله عليه وسلم، أو عن أبي خِزامة عن أبيه كما سيأتي عند المصنف برقم (7620)، وهذا أصحُّ من حديث معمر وصالح بن أبي الأخضر عن الزهري عن عروة عن حكيم، وابن أبي خِزامة هذا - أو أبو خزامة - لا يُعرف وقد تفرَّد بالرواية عنه الزهري، ولم يؤثر توثيقه عن أحد. وانظر ما بعده.لكن له شاهد من حديث كعب بن مالك عند ابن حبان في "صحيحه" (6100). وإسناده حسن إن شاء الله، فيتحسّن الحديث بالطريقين.قوله: "هو من قدر الله" يعني أنه تعالى قدَّر الأسباب والمسبَّبات، وربط المسبَّبات بالأسباب، فحصول المسبَّبات عند حصول الأسباب من جملة القدر، والله تعالى أعلم، قاله السندي في حاشيته على "مسند أحمد "24/ (15472).
[2] للعلّة التي ذكرناها آنفًا.
88 - حدَّثَناه أبو بكر أحمد بن كامل القاضي ببغداد وأبو أحمد بكر بن محمد الصَّيْرفي بمَرْو قالا: حدثنا أبو قِلَابة، حدثنا إبراهيم بن حُميد، حدثنا صالح بن أبي الأخضر، عن الزُّهري، عن عروة، عن حَكيم بن حِزام قال: قلت: يا رسول الله، رُقًى كنا نَستَرقي بها، وأدويةٌ كنّا نتداوى بها، هل تردُّ من قَدَرِ الله؟ قال: "هو من قَدَرِ الله" [1].
হাকীম ইবনে হিযাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! ঝাড়ফুঁক যা আমরা করে থাকি, আর ঔষধপত্র যা দ্বারা আমরা চিকিৎসা করি—এগুলো কি আল্লাহর নির্ধারিত তাকদীরকে প্রতিহত করতে পারে? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এটাও আল্লাহর তাকদীরেরই অংশ।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف صالح بن أبي الأخضر، وللخلاف الذي وقع فيه كما بيَّنّا في الحديث السابق. أبو قلابة: هو عبد الملك بن محمد الرَّقاشي.وأخرجه الطبراني (3090)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (1890) من طريق أبي مسلم الكشّي، عن إبراهيم بن حميد - وهو الطويل - بهذا الإسناد.وسيأتي برقم (7619) و (8427).
89 - حدثنا أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا إسحاق بن الحسن [1] بن ميمون، حدثنا عفّان بن مسلم، حدثنا حسان بن إبراهيم الكِرْماني، حدثنا سعيد بن مسروق، عن يوسف بن أبي بُرْدة بن أبي موسى، عن أبي بُرْدة قال: أتيتُ عائشةَ فقلت: يا أُمّاه، حدِّثيني بشيء سمعتِه من رسول الله صلى الله عليه وسلم، قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "الطَّيرُ تجري بقَدَرٍ"، وكان يعجبُه الفَأْلُ الحَسَن [2].قد احتجَّ الشيخان برُواةِ هذا الحديث عن آخرهم غير يوسف بن أبي بُردة، والذي عندي أنهما لم يُهمِلاه بجَرْحٍ ولا لضعف، بل لقِلَّة حديثه فإنه عزيز الحديث جدًّا.
আবূ বুরদাহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট এসে বললাম, হে আমার মা, আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে যা শুনেছেন, সে সম্পর্কে আমাকে কিছু বলুন। তিনি বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "পাখি তাকদীর (ভাগ্য) অনুযায়ী চলে।" আর তাঁর নিকট শুভ লক্ষণ বা সুধারণা পছন্দনীয় ছিল।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في (ص) و (ب) إلى: الحسين، وقد جاء في المواضع الأخرى من "المستدرك" على الصواب، وانظر ترجمته في "سير أعلام النبلاء" 13/ 410. أبو عاصم: هو الضحاك بن مخلد النبيل، وسفيان: هو الثوري، ومنصور: هو ابن المعتمر.وأخرجه ابن حبان (178) عن الفضل بن الحُباب، عن محمد بن كثير، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 2/ (758) عن محمد بن جعفر، والترمذي (2145) من طريق أبي داود الطيالسي، كلاهما عن شعبة، عن منصور، به.وخالفهما النضر بن شميل عند الترمذي (2145 م) فرواه عن شعبة بإدخال الواسطة بين ربعيٍّ وعليّ، قال الترمذي: حديث أبي داود عن شعبة عندي أصحُّ من حديث النضر.وأخرجه ابن ماجه (81) من طريق شريك النخعي، عن منصور، عن ربعي، عن علي.
[2] إسناده حسن من أجل حسان بن إبراهيم ويوسف بن أبي بردة.وأخرجه أحمد 41/ (24982) عن عفان بن مسلم بهذ الإسناد.وأخرجه ابن حبان (5824) من طريق داود بن عمرو الضّبّي، عن حسان بن إبراهيم، به.والفأل: هو الاستبشار الحسن بقول أو فعل، وهو ضدُّ التشاؤم. أبو عاصم: هو الضحاك بن مخلد النبيل، وسفيان: هو الثوري، ومنصور: هو ابن المعتمر.وأخرجه ابن حبان (178) عن الفضل بن الحُباب، عن محمد بن كثير، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 2/ (758) عن محمد بن جعفر، والترمذي (2145) من طريق أبي داود الطيالسي، كلاهما عن شعبة، عن منصور، به.وخالفهما النضر بن شميل عند الترمذي (2145 م) فرواه عن شعبة بإدخال الواسطة بين ربعيٍّ وعليّ، قال الترمذي: حديث أبي داود عن شعبة عندي أصحُّ من حديث النضر.وأخرجه ابن ماجه (81) من طريق شريك النخعي، عن منصور، عن ربعي، عن علي.
90 - أخبرنا أبو الحسين محمد بن أحمد بن تَميم الحنظلي ببغداد، حدثنا عبد الملك بن محمد بن عبد الله الرَّقَاشي، حدثنا أبو عاصم، حدثنا سفيان.وأخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المحبوبي بمَرْو، حدثنا أحمد بن سيَّار، حدثنا محمد بن كثير؛ قالا: حدثنا سفيان عن منصور، عن رِبْعي بن حِرَاش، عن علي بن أبي طالب، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "لا يؤمنُ العبدُ حتى يؤمنَ بأربعٍ: حتى يشهدَ أن لا إله إلَّا الله، وأني رسولُ الله بَعَثَني بالحقِّ، ويؤمنَ بالبَعْث بعد الموت، ويؤمنَ بالقَدَر" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، وقد قصَّر بروايته بعضُ أصحاب الثَّوْري، وهو عندنا مما لا يُعبَأُ:
আলী ইবন আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কোনো বান্দা মু'মিন হতে পারে না, যতক্ষণ না সে চারটি বিষয়ে বিশ্বাস স্থাপন করে: (১) সে সাক্ষ্য দেয় যে আল্লাহ ব্যতীত কোনো উপাস্য নেই, (২) এবং আমি আল্লাহর রাসূল, যিনি আমাকে সত্যসহ প্রেরণ করেছেন, (৩) এবং সে মৃত্যুর পর পুনরুত্থানে ঈমান আনে, (৪) এবং সে তাকদীরে (ভাগ্যে) ঈমান আনে।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح وقد اختُلف فيه على منصور كما سيذكر المصنف، فبعضهم زاد فيه بين ربعيٍّ وعليٍّ رجلًا مبهمًا، وهو الذي صوَّبه الدارقطني في "العلل" 3/ 196 (357)، وأكثر الرواة على إسقاطه بينهما، وهو الذي رجَّحه الترمذي في "جامعه" (2145) والمصنف هنا. أبو عاصم: هو الضحاك بن مخلد النبيل، وسفيان: هو الثوري، ومنصور: هو ابن المعتمر.وأخرجه ابن حبان (178) عن الفضل بن الحُباب، عن محمد بن كثير، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 2/ (758) عن محمد بن جعفر، والترمذي (2145) من طريق أبي داود الطيالسي، كلاهما عن شعبة، عن منصور، به.وخالفهما النضر بن شميل عند الترمذي (2145 م) فرواه عن شعبة بإدخال الواسطة بين ربعيٍّ وعليّ، قال الترمذي: حديث أبي داود عن شعبة عندي أصحُّ من حديث النضر.وأخرجه ابن ماجه (81) من طريق شريك النخعي، عن منصور، عن ربعي، عن علي.
91 - حدَّثَناه أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا محمد بن غالب، حدثنا أبو حُذيفة، حدثنا سفيان، عن منصور، عن رِبْعي عن رجل، عن علي بن أبي طالب، عن النبي صلى الله عليه وسلم نحوَه.أبو حذيفة موسى بن مسعود النَّهْدي وإن كان البخاريُّ يحتجُّ به، فإنه كثير الوَهْم لا يُحكَم له على أبي عاصم النبيل ومحمد بن كثير وأقرانهم، بل يَلزَمُ الخطأُ إذا خالفهم [1]، والدليل على ما ذكرتُه متابعةُ جريرِ بن عبد الحميد الثوريَّ في روايته عن منصور عن رِبْعي عن علي، وجريرٌ من أعرف الناس بحديث منصور:
৯১ - আবূ বাকর ইবনু ইসহাক আমাদের নিকট তা বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন, মুহাম্মাদ ইবনু গালিব আমাদের অবহিত করেছেন। তিনি বলেন, আবূ হুযাইফাহ আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন, সুফিয়ান, মানসূর হতে, তিনি রি‘ঈ হতে, তিনি এক ব্যক্তি হতে, তিনি আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে, তিনি নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হতে এই ধরনের (হাদীস) বর্ণনা করেছেন।
আবূ হুযাইফাহ মূসা ইবনু মাসঊদ আন-নাহদী – যদিও ইমাম বুখারী তাঁকে প্রমাণ হিসেবে গ্রহণ করেন – তিনি প্রচুর ভুল করেন (কাছীরুল ওয়াহম)। আবূ ‘আসিম আন-নাবীল, মুহাম্মাদ ইবনু কাছীর এবং তাঁদের সমপর্যায়ের রাবীদের ওপর তাঁকে প্রাধান্য দেওয়া যায় না। বরং তিনি যখন তাঁদের বিরোধিতা করেন, তখন ভুল অবশ্যম্ভাবী হয়ে যায় [১]। আমি যা উল্লেখ করলাম তার প্রমাণ হলো জারীর ইবনু আবদিল হামীদের মুতাবা'আত (সমর্থন), যা তিনি সাওরী হতে, তিনি মানসূর হতে, তিনি রি‘ঈ হতে, তিনি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনায় করেছেন। আর জারীর হলেন মানসূরের হাদীস সম্পর্কে মানুষের মধ্যে সবচেয়ে অবগত ব্যক্তি।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] لكن تابعه وكيع عند أحمد 2/ (1112)، وأبو نعيم الفضل بن دكين عند عبد بن حميد (75). وأخرجه أبو يعلى (583) عن أبي خيثمة زهير بن حرب عن جرير، بهذا الإسناد.
92 - حدَّثَناه يحيى بن منصور القاضي، حدثنا علي بن عبد العزيز، حدثنا إسحاق بن إسماعيل الطَّالْقاني، حدثنا جرير.وحدثنا محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب ومحمد بن شاذان قالا: حدثنا إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا جرير، عن منصور، عن رِبْعي، عن علي، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "لا يؤمنُ عبدٌ حتَّى يؤمن بأربعٍ: يشهدُ أن لا إلهَ إلَّا الله وحده لا شريكَ له، وأنِّي رسول الله بَعَثَني بالحقّ، وأنه مبعوثٌ بعد الموت، ويؤمنُ بالقَدَرِ كلِّه" [1].
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “কোনো বান্দা ততক্ষণ পর্যন্ত মুমিন হতে পারে না, যতক্ষণ না সে চারটি বিষয়ে ঈমান আনবে: (১) সে সাক্ষ্য দেবে যে আল্লাহ ব্যতীত অন্য কোনো ইলাহ নেই, তিনি একক, তাঁর কোনো শরীক নেই, (২) আর আমি আল্লাহর রাসূল, তিনি আমাকে সত্যসহ প্রেরণ করেছেন, (৩) এবং সে মৃত্যুর পর পুনরুত্থিত হবে, (৪) এবং সে তাকদীরের (ভাগ্য) সব কিছুর ওপর ঈমান আনবে।”
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. جرير: هو ابن عبد الحميد. وأخرجه أبو يعلى (583) عن أبي خيثمة زهير بن حرب عن جرير، بهذا الإسناد.
93 - أخبرنا أبو بكر أحمد بن سلمان الفقيه، حدثنا أبو داود سليمان بن الأشعَث، حدثنا سليمان [1] بن حرب وشَيبان بن أبي شَيْبة قالا: حدثنا جَرير.وأخبرني أبو بكر بن عبد الله، حدثنا الحسن بن سفيان، حدثنا يزيد بن صالح ومحمد بن أَبَان قالا: حدثنا جرير بن حازم قال: سمعتُ أبا رجاء العُطَارِدي يقول: سمعتُ ابن عباس يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا يزالُ أمرُ هذه الأُمَّةِ مُوامِرًا - أو قال: مُقارِبًا - ما لم يتكلَّموا في الوِلْدانِ والقَدَر" [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولا نعلم له عِلّةً [3]، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “এই উম্মতের অবস্থা সুশৃঙ্খল (মুওয়ামিরান) থাকবে – অথবা তিনি বলেছেন: নৈকট্যপূর্ণ (মুকারিবান) থাকবে – যতক্ষণ না তারা শিশু (বা সন্তান) এবং তাকদীর (ভাগ্য) নিয়ে কথা বলবে।”
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في (ب) إلى: سليم.
[2] صحيح موقوفًا، وقد اختُلف في رفعه ووقفه على جرير بن حازم، ومن ثقات أصحابه من رواه عنه موقوفًا كوكيع بن الجراح عند عبد الله بن أحمد في "السنة" (870)، وأبي أُسامة حماد بن أسامة ويزيد بن هارون عند الفريابي في "القدر" (260)، وصحَّح وقفَه البيهقي في "القضاء والقدر" (445 - 447) وقال في المرفوع: ليس بمحفوظ، ورجَّح وقفَه أيضًا ابن القيِّم في "أحكام أهل الذمة" 2/ 190. شيبان بن أبي شيبة: هو شيبان بن فرُّوخ، وأبو عطاء العطاردي: اسمه عمران بن مِلحان، وهو مشهور بكنيته.وأخرجه ابن حبان (6724) عن الحسن بن سفيان بهذا الإسناد. وقال: الولدان أراد به أطفال المشركين.
93 [3] - علَّته الخلاف على جرير بن حازم في رفعه ووقفه.
94 - حدثنا دَعلَج بن أحمد السِّجْزي ببغداد، حدثنا موسى بن هارون وصالح بن مُقاتِل.وحدثنا علي بن حَمْشاذ، حدثنا أبو المثنَّى العَنبَري وأحمد بن علي الأبَّار.وحدثنا أحمد بن سهل [1] بن حَمدَوَيهِ الفقيه ببُخارَى، حدثنا صالح بن محمد بن حَبيب الحافظ، قالوا: حدثنا أحمد بن جَنَابٍ المِصِّيصي، حدثنا عيسى بن يونس، عن سفيان الثَّوْري، عن زُبَيد عن مُرَّة، عن عبد الله قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إِنَّ الله قَسَمَ بينكم أخلاقَكم كما قَسَمَ بينكم أرزاقَكم، وإنَّ الله يُعطي الدنيا مَن يحبُّ ومَن لا يحبُّ، ولا يُعطي الإيمانَ إلَّا من يحبُّ" [2].هذا حديث صحيح الإسناد، تفرَّد به أحمد بن جَنَاب المِصِّيصي وهو ثقة، ومن شَرطِنا في هذا الكتاب أنَّا نخرج أفرادَ الثقات إذا لم نَجِدْ لها عِلَّة.وقد وَجَدْنا لعيسى بن يونس فيه متابِعَين أحدهما من شرط هذا الكتاب: وهو سفيان بن عُقْبة أخو قَبِيصة:
আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তোমাদের মধ্যে তোমাদের চরিত্র (বা স্বভাব) ভাগ করেছেন, যেমন তিনি তোমাদের মধ্যে তোমাদের রিযিক ভাগ করেছেন। আর নিশ্চয় আল্লাহ দুনিয়া তাকেও দান করেন যাকে তিনি ভালোবাসেন এবং তাকেও দান করেন যাকে তিনি ভালোবাসেন না। তবে তিনি ঈমান কেবল তাকেই দান করেন যাকে তিনি ভালোবাসেন।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في المطبوع إلى: سفيان.
[2] صحيح موقوفًا على عبد الله بن مسعود، أحمد بن جناب صدوق ومن فوقه ثقات، وقد اختُلف على سفيان في رفعه ووقفه، والصحيح وقفه كما قال الدارقطني في "العلل" 5/ 271.موسى بن هارون: هو الحمّال، وزبيد: هو ابن الحارث الياميّ، ومُرَّة: هو ابن شَراحيل الهَمْداني.وأخرجه البيهقي في "القضاء والقدر" (366 - 367) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الدارقطني 5/ 271، والإسماعيلي في "معجم شيوخه" 3/ 726 - 727، وأبو نعيم في "الحلية" 5/ 35 من طرق عن أحمد بن جناب، به.وخالف عيسى بنَ يونس في رفعه: عبدُ الرحمن بن مهدي عند الحسين المروزي في زياداته على "زهد ابن المبارك" (1134)، ومحمدُ بن كثير العبدي عند البخاري في "الأدب المفرد" (275)، وأبي داود في "الزهد" (147)، ومحمدُ بن طلحة بن مصرِّف عند الطبراني (8990)، وأبي نعيم في "الحلية" 4/ 165، ومالك بن مِغوَل عند أبي نعيم أيضًا 4/ 165، فرووه عن سفيان الثوري عن زبيد عن مرة عن ابن مسعود من قوله، وهؤلاء أكثر وأثبت.وتابع سفيانَ على وقفه أيضًا زهيرُ بن معاوية عن زُبيد، أخرجه أبو داود في "الزهد" (147).وانظر الحديث التالي وما سيأتي عند المصنف برقم (3712) و (7488).
95 - حدثناه أبو علي الحسين بن علي الحافظ، أخبرنا مِهْران بن هارون الرازي، حدثنا الفضل بن العباس الرازي - وهو فَضْلَكُ الرازي - حدثنا إبراهيم بن محمد بن حَمَّويهِ الرازي، حدثنا سفيان بن عُقْبة أخو قَبيصة، عن حمزة الزيَّات وسفيان الثَّوري، عن زُبَيد، عن مُرَّة، عن عبد الله بن مسعود، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "إِنَّ الله قَسَمَ بينكم أخلاقَكم كما قَسَمَ بينكم أرزاقَكم، وإنَّ الله يعطي المالَ مَن يحبُّ ومن لا يحبّ، ولا يُعطي الإيمانَ إلَّا من يحبُّ، وإذا أَحبَّ اللهُ عبدًا أعطاه الإيمانَ" [1].وأما المتابع الذي ليس من شرط هذا الكتاب، فعبدُ العزيز بن أَبان [2]، والحديث معروفٌ به، فقد صحَّ بمتابعَينِ لعيسى بن يونس، ثم بمتابع للثوري عن زُبيدٍ، وهو حمزة الزيَّات.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তোমাদের মধ্যে তোমাদের চরিত্রসমূহ বণ্টন করে দিয়েছেন, যেমন তিনি তোমাদের মধ্যে তোমাদের জীবিকা (রিযিক) বণ্টন করে দিয়েছেন। আর নিশ্চয় আল্লাহ যাকে ভালোবাসেন এবং যাকে ভালোবাসেন না—উভয়কেই ধন-সম্পদ দান করেন, কিন্তু তিনি ঈমান কেবল তাঁকেই দান করেন যাকে তিনি ভালোবাসেন। আর আল্লাহ যখন কোনো বান্দাকে ভালোবাসেন, তখন তাকে ঈমান দান করেন।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] صحيح موقوفًا كسابقه، وهذا إسناد فيه من لم نقف له على ترجمة ولم نعرف حاله، وهما: مهران بن هارون وإبراهيم بن محمد بن حمّويه الرازيان.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (599) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وسقط من إسناده في المطبوع الفضل بن العباس وإبراهيم بن محمد بن حمويه.
[2] وهو متروك الحديث، ومثله لا يُعتبر به.
96 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا بِشْر بن موسى، حدثنا الحُميدي.وحدثنا علي بن عيسى، حدثنا محمد بن عمرو الحَرَشيّ، حدثنا يحيى بن يحيى.وحدثنا محمد بن الحسن، حدثنا هارون بن يوسف، حدثنا ابن أبي عمر؛ قالوا: حدثنا سفيان - واللفظ للحُمَيدي - حدثنا الزُّهْري، حدثني عُروة بن الزُّبير قال: سمعت كُرْز بن علقمة يقول: سأل رجلٌ النبيَّ صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله، هل للإسلام من مُنتهًى؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "نَعَم، أيُّما أهلِ بيتٍ من العرب والعَجَم أراد اللهُ بهم خيرًا، أَدخلَ عليهم الإسلامَ، ثمَّ تقع الفتنُ كأنها الظُّلَلُ" [1].تابعه مَعمَرُ [2] بن راشد ويونسُ بن يزيد عن الزهري.أما حديث مَعمَر:
কুরয ইবনে আলকামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞেস করল এবং বলল: হে আল্লাহর রাসূল, ইসলামের কি কোনো সমাপ্তি আছে? তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হ্যাঁ। আরব ও অনারবের যে কোনো পরিবারের প্রতি আল্লাহ কল্যাণ চান, তাদের মধ্যে ইসলাম প্রবেশ করিয়ে দেন। এরপর ফেতনা (বিপর্যয়) এমনভাবে সংঘটিত হবে যেন তা ঘন অন্ধকার মেঘের মতো।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. الحميدي: هو عبد الله بن الزبير الحميدي، ويحيى بن يحيى: هو النيسابوري، وابن أبي عمر: هو محمد بن يحيى بن أبي عمر العَدَني، وسفيان: هو ابن عيينة.وأخرجه أحمد 25/ (15917) عن سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد. وانظر ما بعده.
[2] تحرَّف في (ب) إلى: محمد.
97 - فأخبرَناه القاسم بن القاسم السَّيّاري، حدثنا أبو الموجِّه، حدثنا عَبْدانُ، أخبرنا عبد الله، عن مَعمَر، عن الزُّهري، عن عُرْوة بن الزُّبير، عن كُرْز بن علقمة قال: قال أعرابيٌّ: يا رسول الله، هل للإسلام من مُنتهًى؟ فقال: "نَعَم، أيُّما أهلِ بيتٍ من العرب والعَجَم أراد اللهُ بهم خيرًا، أدخلَ عليهم الإسلامَ، ثم تقعُ الفتنُ كأنها الظُّلَلُ" [1].هذا حديث صحيح وليس له عِلَّة، ولم يُخرجاه لتفرُّد عروةَ بالرواية عن كُرْز بن علقمة [2]، وكُرْز بن علقمة صحابيٌّ مُخرَّج حديثُه في مسانيد الأئمة.سمعتُ عليَّ بن عمر الحافظ يقول: مما يُلزَم مسلمٌ والبخاريُّ إخراجَه حديثُ كُرز بن علقمة: هل للإسلام مُنتهًى، فقد رواه عروةُ بن الزُّبير، ورواه الزهري وعبد الواحد بن قيس عنه [3].قال الحاكم: والدليل الواضح على ما ذكره أبو الحسن أنهما جميعًا قد اتَّفقا [4] على حديث عِتْبان بن مالك الأنصاري الذي صلَّى النبيُّ صلى الله عليه وسلم في بيته، وليس له راوٍ غيرُ محمود بن الرَّبيع.
কুরয ইবনে আলকামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, একজন বেদুইন বললেন, "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! ইসলামের কি কোনো সমাপ্তি আছে (বা শেষ সীমা)?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "হ্যাঁ। আরব বা অনারবের যে কোনো পরিবারের জন্য আল্লাহ কল্যাণ চান, তাদের মধ্যে ইসলাম প্রবেশ করিয়ে দেন। এরপর ফিতনা (বিপর্যয়) এমনভাবে আপতিত হবে যেন তা ঘন মেঘের ছায়া।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. أبو الموجِّه: هو محمد بن عمرو الفَزَاري وعبدان: هو عبد الله بن عثمان المروزي، وعبد الله: هو ابن المبارك.وسيأتي بأطول مما هنا برقم (8609) من طريق عبد الرزاق عن معمر. وانظر ما قبله.
[2] قد وَهِمَ المصنف رحمه الله في نسبة هذا المذهب إلى الشيخين، بناءً على ما قرَّره هو في بعض كتبه كـ "المدخل إلى الإكليل": أنهما لا يخرجان إلَّا للصحابي الذي له راويان ثقتان فأكثر؛ وهذا مناقض لما ذكره سابقًا في "المستدرك" بإثر حديث (61) بأنهما خرَّجا للصحابي حتى وإن انفرد عنه راوٍ واحد، وهو ما ذكره لاحقًا!! وقد أشار إلى تناقضه هذا الحافظُ السَّخاوي في "فتح المغيث" 1/ 43.وقد ردَّ على الحاكم في دعواه هذه غيرُ واحدٍ من أئمة الحديث منهم أبو الفضل محمد بن طاهر المقدسي وأبو بكر الحازمي في كتابيهما في شروط الأئمة محتجِّين في رد هذه الدعوى بعدّة أحاديث في "الصحيحين" مما انفرد به صحابيٌّ وعنه تابعيٌّ واحد لا يُعرف روى عنه غيرُه، وانظر "النكت على مقدمة ابن الصلاح" للزركشي 1/ 258 - 266.
97 [3] - ورواية عبد الواحد بن قيس عند أحمد 25/ (5919)، وابن حبان (5956).
97 [4] - البخاري (424)، ومسلم (33).
98 - حدثنا أبو الفضل الحسن بن يعقوب العَدْل، حدثنا السَّرِيُّ بن خُزيمة، حدثنا عبد الله بن يزيد المقرئ.وأخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصَّفّار وأبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ قالا: حدثنا بِشْر بن موسى، حدثنا أبو عبد الرحمن المقرئ، حدثنا حَيْوة بن شُرَيح، أخبرنا أبو هانئ حُمَيد بن هانئ الخَوْلاني، أنَّ أبا علي الجَنْبي أخبره، أنه سمع فَضَالةَ بن عُبيد يُخبِر أنه سمع النبيَّ صلى الله عليه وسلم يقول: "طُوبَى لمن هُدِيَ إلى الإسلام، وكان عيشُه كَفَافًا وقَنِعَ" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، وبلغني أنه خرَّجه بإسناد آخر [2].
ফাদালা ইবনে উবাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছেন: "ধন্য সেই ব্যক্তি, যাকে ইসলামের পথ দেখানো হয়েছে, যার জীবনধারণের ব্যবস্থা ছিল প্রয়োজনমতো এবং যে তাতে সন্তুষ্ট ছিল।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. أبو عبد الرحمن المقرئ: هو عبد الله بن يزيد، وأبو علي الجنبي: هو عمرو بن مالك.وأخرجه أحمد 39/ (23944)، والترمذي (2349)، وابن حبان (705) من طريق أبي عبد الرحمن المقرئ بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن صحيح.وأخرجه النسائي (11793) من طريق ابن المبارك، عن حيوة بن شريح، به.وسيأتي برقم (7321) من طريق ابن وهب عن أبي هانئ الخولاني.
[2] يشير إلى حديث عبد الله بن عمرو بن العاص مرفوعًا: "قد أفلح من أسلم، ورُزق كفافًا، وقنّعه الله بما آتاه"، أخرجه مسلم برقم (1054).
99 - حدثني أبو جعفر محمد بن صالح بن هانئ وأبو عبد الله محمد بن عبد الله بن دينار قالا: حدثنا الحسين بن فَضْل البَجَلي.وأخبرنا أبو محمد جعفرُ [1] بن إبراهيم الحذّاء بمكة، حدثنا محمد بن سليمان ابن الحارث، حدثنا هَوْذة بن خَليفة، حدثنا حماد بن سَلَمة، عن عثمان الشَّحّام، عن مسلم بن أبي بَكْرة، عن أبي بَكْرة قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "اللهمَّ أعوذُ بك من الكُفْر والفَقْر، وعذابِ القَبْر" [2].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه، وقد احتجَّ مسلمٌ بعثمان الشَّحَّام.
আবূ বাকরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "হে আল্লাহ! আমি আপনার নিকট কুফর, দারিদ্র্য এবং কবরের আযাব থেকে আশ্রয় প্রার্থনা করি।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] في (ع) و (ب): أبو محمد بن جعفر، وفي "إتحاف المهرة" للحافظ ابن حجر (17141): أبو محمد بن أبي جعفر. وكله خطأ والصواب ما أثبتنا كما في (ص)، وهو - والله أعلم - أبو محمد جعفر بن أحمد بن إبراهيم، نُسب هنا إلى جدّه، وله ترجمة في "تاريخ بغداد" للخطيب 8/ 152 و"غاية النهاية" لابن الجزري 1/ 190، وذكر الخطيب أنه عاش إِلى سنة خمسين وثلاث مئة ومات قريبًا من ذلك، إلَّا أنه لم يصفه بالحذّاء، ووصفه ابن الجزري بالخصّاف، والخصّاف: مَن يَخصِف النعل، أي: يخرزها، وهي مهنة الحذّاء نفسها.
[2] إسناده قوي.وأخرجه ابن حبان (1028) من طريق إبراهيم بن الحجاج السامي، عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 34/ (20381) و (20409) و (20447)، والترمذي (3503)، والنسائي (1271) و (7841) و (7849) من طرق عن عثمان الشحام، به - وعند بعضهم: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم كان يدعو بها في دُبُر الصلاة. وقال الترمذي: حديث حسن.وأخرجه ضمن حديثٍ: أحمد 34/ (20430)، وأبو داود (5090)، والنسائي (10332) من طريق عبد الرحمن بن أبي بكرة، عن أبيه.وسيأتي من طريق مسلم بن أبي بكرة برقم (940). "معجمه" (2450)، والرامهرمزي في "أمثال الحديث" (13)، والطبراني في "الأوسط" (2981)، و"الصغير" (264)، وأبو طاهر المخلِّص في "المخلّصيات" (2989)، والقضاعي في "مسند الشهاب" (1160) و (1161)، والبيهقي في "الدلائل" 1/ 157 - 158، و"شعب الإيمان" (1340)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 5/ 400 - 401 من طرق عن زياد بن يحيى الحسّاني، بهذا الإسناد.وأخرجه الرامهرمزي (13)، والآجري في "الشريعة" (1000) من طريق مؤمل بن إهاب، عن مالك بن سعير، به.وخالف مالكَ بنَ سعير وكيعٌ فرواه عن الأعمش عن أبي صالح عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلًا، أخرجه ابن سعد في "الطبقات" 1/ 192، وابن أبي شيبة 6/ 325، وابن الأعرابي (1088)، والبيهقي في "الدلائل" 1/ 157، و"الشعب" (1339) من طرق عن وكيع به قال الدارقطني في "العلل" 10/ 105 (1897): وهو الصواب.وخالف عبدُ الله بن نصر الأصمُّ فرواه عن وكيع موصولًا بذِكْر أبي هريرة، أخرجه ابن عدي في "الكامل" 4/ 230، وعبد الله بن نصر هذا منكر الحديث، وقال ابن عدي: غير محفوظ عن وكيع.وتابع وكيعًا على إرساله عليُّ بن مُسهِر عن الأعمش عند الدارمي في "مسنده" (15).فهذان - وكيع وعلي بن مسهر - ثقتان أرسلاه، فيقضى لهما على مالك بن سعير وهو أدنى منهما رتبة في الثقة والضبط، والله تعالى أعلم.ويشهد له حديث معبد بن خالد الجَدَلي - أحد الأثبات من التابعين - عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلًا أيضًا، أخرجه ابن سعد 1/ 163، وسنده إلى معبد صحيح.قوله: "مُهداة" بضم الميم، يعني: أُهديت لكم، كما جاء في بعض الروايات، وقال الرامهرمزي في "أمثال الحديث": اتفقت ألفاظهم في ضمِّ الميم من قوله: "مُهداة" إلَّا ابن البرتي - أحد رواة الحديث عنده - قال: "مِهْداة" بكسر الميم، من الهِداية، وكان ضابطًا فَهِمًا متصرِّفًا في الفقه واللغة، والذي قاله أجود في الاعتبار، لأنه بُعث صلى الله عليه وسلم هاديًا كما قال الله عز وجل: {وَإِنَّكَ لَتَهْدِي إِلَى صِرَاطٍ مُسْتَقِيمٍ} [الشورى: 52]، وكما قال عز وجل: {وَأَنْزَلْنَا إِلَيْكَ الذِّكْرَ لِتُبَيِّنَ لِلنَّاسِ} [النحل: 44]، و {لِتُخْرِجَ النَّاسَ مِنَ الظُّلُمَاتِ إِلَى النُّورِ} [إبراهيم: 1]، وأشباه ذلك، ومن رواه بضم الميم إنما أراد أنَّ الله عز وجل أهداه إلى الناس، وهو قريب.
100 - حدثنا أبو بكر محمد بن جعفر المزكِّي [1]، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب ومحمد بن إسحاق بن خُزَيمة قالا: حدثنا أبو الخطَّاب زياد بن يحيى الحَسّاني.وحدثنا أبو الفضل محمد بن إبراهيم، حدثنا الحسين بن محمد بن زياد وإبراهيم بن أبي طالب قالا: حدثنا زياد بن يحيى الحَسّاني، أخبرنا مالك بن سُعَير، حدثنا الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يا أيها الناسُ، إنما أنا رحمةٌ مُهداةٌ" [2]. هذا حديث صحيح على شرطهما، فقد احتجَّا جميعًا بمالك بن سُعَير، والتفرُّد من الثقات مقبول [3].
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হে মানবমণ্ডলী! আমি তো উপহারস্বরূপ প্রেরিত এক রহমত মাত্র।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في (ب) والمطبوع إلى: المزني. "معجمه" (2450)، والرامهرمزي في "أمثال الحديث" (13)، والطبراني في "الأوسط" (2981)، و"الصغير" (264)، وأبو طاهر المخلِّص في "المخلّصيات" (2989)، والقضاعي في "مسند الشهاب" (1160) و (1161)، والبيهقي في "الدلائل" 1/ 157 - 158، و"شعب الإيمان" (1340)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 5/ 400 - 401 من طرق عن زياد بن يحيى الحسّاني، بهذا الإسناد.وأخرجه الرامهرمزي (13)، والآجري في "الشريعة" (1000) من طريق مؤمل بن إهاب، عن مالك بن سعير، به.وخالف مالكَ بنَ سعير وكيعٌ فرواه عن الأعمش عن أبي صالح عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلًا، أخرجه ابن سعد في "الطبقات" 1/ 192، وابن أبي شيبة 6/ 325، وابن الأعرابي (1088)، والبيهقي في "الدلائل" 1/ 157، و"الشعب" (1339) من طرق عن وكيع به قال الدارقطني في "العلل" 10/ 105 (1897): وهو الصواب.وخالف عبدُ الله بن نصر الأصمُّ فرواه عن وكيع موصولًا بذِكْر أبي هريرة، أخرجه ابن عدي في "الكامل" 4/ 230، وعبد الله بن نصر هذا منكر الحديث، وقال ابن عدي: غير محفوظ عن وكيع.وتابع وكيعًا على إرساله عليُّ بن مُسهِر عن الأعمش عند الدارمي في "مسنده" (15).فهذان - وكيع وعلي بن مسهر - ثقتان أرسلاه، فيقضى لهما على مالك بن سعير وهو أدنى منهما رتبة في الثقة والضبط، والله تعالى أعلم.ويشهد له حديث معبد بن خالد الجَدَلي - أحد الأثبات من التابعين - عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلًا أيضًا، أخرجه ابن سعد 1/ 163، وسنده إلى معبد صحيح.قوله: "مُهداة" بضم الميم، يعني: أُهديت لكم، كما جاء في بعض الروايات، وقال الرامهرمزي في "أمثال الحديث": اتفقت ألفاظهم في ضمِّ الميم من قوله: "مُهداة" إلَّا ابن البرتي - أحد رواة الحديث عنده - قال: "مِهْداة" بكسر الميم، من الهِداية، وكان ضابطًا فَهِمًا متصرِّفًا في الفقه واللغة، والذي قاله أجود في الاعتبار، لأنه بُعث صلى الله عليه وسلم هاديًا كما قال الله عز وجل: {وَإِنَّكَ لَتَهْدِي إِلَى صِرَاطٍ مُسْتَقِيمٍ} [الشورى: 52]، وكما قال عز وجل: {وَأَنْزَلْنَا إِلَيْكَ الذِّكْرَ لِتُبَيِّنَ لِلنَّاسِ} [النحل: 44]، و {لِتُخْرِجَ النَّاسَ مِنَ الظُّلُمَاتِ إِلَى النُّورِ} [إبراهيم: 1]، وأشباه ذلك، ومن رواه بضم الميم إنما أراد أنَّ الله عز وجل أهداه إلى الناس، وهو قريب.
[2] صحيح مرسلًا، مالك، مالك بن سعير مختلف فيه، قال أبو زرعة وأبو حاتم الرازيان والدارقطني: صدوق، وذكره ابن حبان في "الثقات"، لكن ضعَّفه أبو داود وقال الأزدي: عنده مناكير. قلنا: وقد خولف في وصله كما سيأتي.وأخرجه الترمذي في "العلل الكبير" (685)، والبزار في "مسنده" (9205)، وابن الأعرابي في "معجمه" (2450)، والرامهرمزي في "أمثال الحديث" (13)، والطبراني في "الأوسط" (2981)، و"الصغير" (264)، وأبو طاهر المخلِّص في "المخلّصيات" (2989)، والقضاعي في "مسند الشهاب" (1160) و (1161)، والبيهقي في "الدلائل" 1/ 157 - 158، و"شعب الإيمان" (1340)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 5/ 400 - 401 من طرق عن زياد بن يحيى الحسّاني، بهذا الإسناد.وأخرجه الرامهرمزي (13)، والآجري في "الشريعة" (1000) من طريق مؤمل بن إهاب، عن مالك بن سعير، به.وخالف مالكَ بنَ سعير وكيعٌ فرواه عن الأعمش عن أبي صالح عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلًا، أخرجه ابن سعد في "الطبقات" 1/ 192، وابن أبي شيبة 6/ 325، وابن الأعرابي (1088)، والبيهقي في "الدلائل" 1/ 157، و"الشعب" (1339) من طرق عن وكيع به قال الدارقطني في "العلل" 10/ 105 (1897): وهو الصواب.وخالف عبدُ الله بن نصر الأصمُّ فرواه عن وكيع موصولًا بذِكْر أبي هريرة، أخرجه ابن عدي في "الكامل" 4/ 230، وعبد الله بن نصر هذا منكر الحديث، وقال ابن عدي: غير محفوظ عن وكيع.وتابع وكيعًا على إرساله عليُّ بن مُسهِر عن الأعمش عند الدارمي في "مسنده" (15).فهذان - وكيع وعلي بن مسهر - ثقتان أرسلاه، فيقضى لهما على مالك بن سعير وهو أدنى منهما رتبة في الثقة والضبط، والله تعالى أعلم.ويشهد له حديث معبد بن خالد الجَدَلي - أحد الأثبات من التابعين - عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلًا أيضًا، أخرجه ابن سعد 1/ 163، وسنده إلى معبد صحيح.قوله: "مُهداة" بضم الميم، يعني: أُهديت لكم، كما جاء في بعض الروايات، وقال الرامهرمزي في "أمثال الحديث": اتفقت ألفاظهم في ضمِّ الميم من قوله: "مُهداة" إلَّا ابن البرتي - أحد رواة الحديث عنده - قال: "مِهْداة" بكسر الميم، من الهِداية، وكان ضابطًا فَهِمًا متصرِّفًا في الفقه واللغة، والذي قاله أجود في الاعتبار، لأنه بُعث صلى الله عليه وسلم هاديًا كما قال الله عز وجل: {وَإِنَّكَ لَتَهْدِي إِلَى صِرَاطٍ مُسْتَقِيمٍ} [الشورى: 52]، وكما قال عز وجل: {وَأَنْزَلْنَا إِلَيْكَ الذِّكْرَ لِتُبَيِّنَ لِلنَّاسِ} [النحل: 44]، و {لِتُخْرِجَ النَّاسَ مِنَ الظُّلُمَاتِ إِلَى النُّورِ} [إبراهيم: 1]، وأشباه ذلك، ومن رواه بضم الميم إنما أراد أنَّ الله عز وجل أهداه إلى الناس، وهو قريب.
100 [3] - لكنه لم يتفرد به بل خولف فيه فأرسله من هو أوثق منه.