আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
8591 - وأخبرني أبو عبد الله الصَّنعاني، حدثنا إسحاق، أخبرنا عبد الرزاق، عن معمر، عن يحيى بن سعيد، عن سعيد بن المسيب قال: ثارت الفتنة الأولى فلم يبقَ ممَّن شَهِدَ بدرًا أَحدٌ، ثم كانت الفتنةُ الثانية فلم يبق ممَّن شهد الحديبية أحدٌ، وأظنُّ لو كانت فتنة ثالثةٌ لم ترتفع وفي الناس طَبَاخٌ [1].
সাঈদ ইবনুল মুসাইয়াব থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন প্রথম ফিতনা শুরু হলো, তখন বদরের যুদ্ধে অংশগ্রহণকারীদের কেউই অবশিষ্ট রইল না। এরপর দ্বিতীয় ফিতনা দেখা দিলো, তখন হুদাইবিয়ার সন্ধিতে অংশগ্রহণকারীদের কেউই আর অবশিষ্ট রইল না। আর আমি মনে করি, যদি তৃতীয় কোনো ফিতনা সৃষ্টি হয়, তবে মানুষের মধ্যে সামান্যতম শক্তি অবশিষ্ট থাকা পর্যন্ত তা দূর হবে না।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. إسحاق: هو ابن إبراهيم بن عباد الدَّبَري، ويحيى بن سعيد: هو الأنصاري.وهذا الأثر في "جامع معمر" برقم (20739). وأخرجه البخاري معلَّقًا في "صحيحه" بإثر (4024)، وعمر بن شبة في "تاريخ المدينة" 4/ 1274، وأبو نعيم في "مستخرجه على البخاري" كما في "فتح الباري" 12/ 98، والدارقطني في "غرائب مالك" كما في "الفتح" أيضًا من طرق عن يحيى بن سعيد الأنصاري، عن سعيد بن المسيب.والطَّبَاخ: الخير والنفع، يقال: فلان لا طباخ له، أي: لا عقل له. قاله البغوي في "شرح السنة" 14/ 396.والفتنة الأولى: مقتل أمير المؤمنين عثمان رضي الله عنه، والثانية: وقعة الحَرَّة، كما وقع مبينًا عند غير المصنف.