হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8640)


8640 - أخبرني أبو بكر بن أبي دارِم الحافظ بالكوفة، حدثنا محمد عثمان بن سعيد القرشي، حدثنا يزيد بن محمد الثَّقفي، حدثنا حنان بن سَدِير، عن عمرو بن قيس، عن الحَكَم، عن إبراهيم، عن علقمة بن قيس وعبيدة السَّلماني، عن عبد الله بن مسعود قال: أتينا رسول الله صلى الله عليه وسلم فخرج إلينا مستبشرًا يُعرَفُ السُّرورُ في وجهه، فما سألناه عن شيء إلَّا أخبرنا به، ولا سَكتنا إلَّا ابتدأَنا، حتى مرَّت فتيةٌ من بني هاشم فيهم الحسن والحسين، فلما رآهم خَثَرَ لمَمَرَّهم وانهملَت عيناه، فقلنا: يا رسول الله، ما نزال نرى في وجهك شيئًا نَكرَهُه، فقال: "إِنَّا أهلُ بيتٍ اختار الله لنا الآخرة على الدنيا، وإنه سيَلقَى أهلُ بيتي من بعدي تطريدًا وتشريدًا في البلاد، حتى تُرفَعَ رايات سودٌ من المشرق، فيسألون الحقَّ فلا يُعطونه، ثم يسألونه فلا يُعطونه، فيُقاتلون فيُنصرون، فمن أدركه منكم أو من أعقابكم فليأتِ إمامَ أهل بيتي ولو حَبوًا على الثَّلج، فإنها راياتُ هدى يدفعونها إلى رجل من أهل بيتي يواطئُ اسمُه اسمي، واسمُ أبيه اسمَ أبي، فيَملِكُ الأرضَ فيملؤُها قسطًا وعَدْلًا كما مُلِئَت جَوْرًا وظُلمًا" [1].




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এলাম। তিনি হাসিখুশিভাবে আমাদের দিকে বেরিয়ে আসলেন, তাঁর চেহারাতে আনন্দের ছাপ দেখা যাচ্ছিল। আমরা তাঁকে কোনো বিষয়ে জিজ্ঞাসা করলে তিনি উত্তর দিতেন, আবার আমরা চুপ থাকলে তিনি নিজেই (কথা) শুরু করতেন। এমন সময় বনু হাশিমের কিছু যুবক পাশ দিয়ে গেল, যাদের মধ্যে হাসান ও হুসাইনও ছিলেন। যখন তিনি তাঁদের দেখলেন, তাঁদের যাওয়ার পথে (চিন্তাগ্রস্ত হয়ে) থেমে গেলেন এবং তাঁর চোখ অশ্রুসিক্ত হয়ে গেল।

আমরা বললাম: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আমরা আপনার চেহারায় এমন কিছু দেখছি যা আমাদের খারাপ লাগছে।

তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই আমরা এমন এক আহলে বাইত (পরিবার), যাদের জন্য আল্লাহ্ দুনিয়ার চেয়ে আখিরাতকে বেছে নিয়েছেন। আমার পরে আমার আহলে বাইতের সদস্যরা দেশে দেশে বিতাড়ন ও দেশান্তরের সম্মুখীন হবে। যতক্ষণ না পূর্ব দিক থেকে কালো পতাকা উত্তোলন করা হবে। তারা হক (ন্যায্য অধিকার) চাইবে, কিন্তু তা তাদের দেওয়া হবে না। এরপর তারা আবার চাইবে, কিন্তু তাও দেওয়া হবে না। তখন তারা যুদ্ধ করবে এবং বিজয়ী হবে। তোমাদের মধ্যে যারা অথবা তোমাদের বংশধরদের মধ্যে যারা সেই সময় পাবে, তারা যেন আমার আহলে বাইতের ইমামের কাছে আসে, এমনকি বরফের উপর হামাগুড়ি দিয়ে হলেও। কেননা, এগুলি হলো হিদায়েতের ঝাণ্ডা। তারা এগুলো আমার আহলে বাইতের এমন এক ব্যক্তির হাতে তুলে দেবে, যার নাম হবে আমার নামের অনুরূপ এবং তার পিতার নাম হবে আমার পিতার নামের অনুরূপ। সে সমগ্র পৃথিবীর শাসক হবে এবং পৃথিবীকে ন্যায় ও ইনসাফে পরিপূর্ণ করে দেবে, যেমন তা যুলুম ও অত্যাচারে ভরে গিয়েছিল।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث منكر، وقال الذهبي في "تلخيصه": هذا موضوع. قلنا: وعلّته شيخ المصنف أبو بكر بن أبي دارم، فإنَّ الحاكم نفسه قد تكلّم فيه فقال - فيما نقله الذهبي في "ميزان الاعتدال" -: رافضي غير ثقة. وقد تفرَّد بهذا الإسناد والسياق.وإنما يعرف هذا الحديث - كما قال البزار في "مسنده" (1491) - من حديث يزيد بن أبي زياد الهاشمي مولاهم عن إبراهيم: وهو ابن يزيد النخعي. هكذا رواه جماعة عنه منهم علي بن صالح الهمداني عند ابن ماجه (4082)، وانظر تتمة تخريجه والكلام عليه هناك.خَثَرَ، أي: انزعج وتكدَّر خاطره. والنَّشَف، كما قال ابن الأثير في "النهاية": حجارة سود كأنها أُحرقت بالنار، وإذا تُركت على رأس الماء طَفَت ولم تغص فيه … ومنه حديث حذيفة؛ وذكر نحوه، ثم قال: يعني أن الأولى من الفتن لا تؤثر في أديان الناس لخفّتها، والتي بعدها كهيئة حجارة قد أُحميت بالنار فكانت رضفًا، فهي أبلغ في أديانهم، وأثلم لأبدانهم.وأخرجه بشطريه ضمن قصة طويلة في زمن فتنة مقتل عثمان رضي الله عنه: ابن عساكر في "تاريخ دمشق" - 39/ 478 - 479 من طريق جرير بن حازم، عن الصلت بن بهرام، عن زيد بن وهب، وذكر القصة. وإسناده صحيح. وسيأتي نحوه برقم (8833) من طريق عمران الخياط عن زيد بن وهب.