আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
8654 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا عبد الرحمن بن مهدي، حدثنا عِكْرمة بن عمَّار، عن حميد أبي عبد الله الفلسطيني، حدثني عبد العزيز ابن أَخي حُذيفة، عن حُذيفة قال: أولُ ما تَفقِدُون من دينكم الخشوعُ، وآخرُ ما تَفقِدون من دينكم الصلاةُ، ولَتُنقَضَنَّ عُرَى الإسلام عُروةً عُروةً، وليُصلِّيَنَّ النساء وهنَّ حُيَّض، ولتَسلُكُنَّ طريق من كان قبلكم حَذْوَ القُذَّة بالقُذَّة، وحذوَ النَّعل بالنَّعل، لا تُخطؤون [1] طريقهم ولا يُخطأُ بكم، حتى تبقى فرقتان من فرقٍ كثيرة، تقول إحداهما: ما بالُ الصلوات الخمس! لقد ضلَّ من كان قبلنا، إنما قال الله تبارك وتعالى: {وَأَقِمِ الصَّلَاةَ طَرَفَيِ النَّهَارِ وَزُلَفًا مِنَ اللَّيْلِ} [هود: 114]، لا يصلُّون إلَّا ثلاثًا، وتقول الأخرى: إنّا المؤمنون بالله كإيمان الملائكة، ما فينا كافرٌ ولا منافقٌ، حقٌّ على الله أن يَحشُرَهما مع الدَّجال [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তোমাদের দ্বীন থেকে সর্বপ্রথম যা বিলুপ্ত হবে তা হলো খুশু (বিনয় ও একাগ্রতা), আর তোমাদের দ্বীন থেকে সবশেষে যা বিলুপ্ত হবে তা হলো সালাত (নামাজ)। আর ইসলামের বন্ধন একে একে ছিন্ন হতে থাকবে। আর মহিলারা ঋতুস্রাবকালীন অবস্থাতেও সালাত আদায় করবে। তোমরা তোমাদের পূর্ববর্তীদের পথ অবলম্বন করবে—যেমন একটি তীরের পালকের সাথে অন্য একটি পালক মাপমতো লাগানো হয়, এবং যেমন এক জুতার সাথে অন্য জুতার মাপ সমান হয়। তোমরা তাদের পথ থেকে ভুল করবে না এবং তোমাদেরও ভুল করানো হবে না। অবশেষে অসংখ্য দলের মধ্য থেকে দুটি দল অবশিষ্ট থাকবে। তাদের একটি দল বলবে: পাঁচ ওয়াক্ত সালাতের কী প্রয়োজন? আমাদের পূর্ববর্তীরা পথভ্রষ্ট হয়েছে। আল্লাহ তাআলা তো শুধু বলেছেন: "আর দিনের দুই প্রান্তে এবং রাতের কিছু অংশে সালাত প্রতিষ্ঠা করো।" (সূরা হুদ: ১১৪)। তারা মাত্র তিন ওয়াক্ত সালাত আদায় করবে। আর অপর দলটি বলবে: আমরা আল্লাহর প্রতি ফেরেশতাদের ঈমানের মতোই ঈমান রাখি। আমাদের মধ্যে কোনো কাফির বা মুনাফিক নেই। আল্লাহ্র জন্য আবশ্যক যে, তিনি এই দুটি দলকেই দাজ্জালের সাথে একত্রিত করবেন।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] في النسخ الخطية: لا تخطؤوا، على النهي، وهو خطأ.
[2] إسناده ضعيف لجهالة حميد أبي عبد الله الفلسطيني، وسمّى ابن حبان في "ثقاته" 6/ 191 راوي هذا الخبر عن عبد العزيز: حميد بن زياد اليمامي! وكذا عبد العزيز ابن أخي حذيفة - وبعضهم يقول: أخو حذيفة - لم يرو عنه غير اثنين مجهولين، وقال الذهبي في "الميزان": لا يعرف.وأخرجه ابن وضاح في "البدع والنهي عنها" (155)، والطبري في مسند ابن عباس من "تهذيب الآثار" 2/ 672، والدولابي في "الكنى والأسماء" (1420)، وابن بطة في "الإبانة" 2/ 109 من طرق عن عبد الرحمن بن مهدي، بهذا الإسناد - وهو عند بعضهم مختصر، ووقع في "الكنى" للدولابي تسمية أبي عبد الله الفلسطيني هذا بجُنيد.وأخرجه أبو بكر الخلال في "السنة" (1292)، وابن بطة 1/ 174 - 175 و 2/ 571 - 572 من طريق عبد الملك بن عمرو - وهو أبو عامر العقدي - عن عكرمة بن عمار، به.وأخرج أوله في أول وآخر ما تفقده هذه الأمة: ابن أبي شيبة 13/ 381، وأحمد في "الزهد" (1003)، وأبو نعيم في "الحلية" 1/ 281 من طريق وكيع عن عكرمة بن عمار، به. وانظر خبر ابن مسعود الآتي عند المصنف برقم (8749).وأخرجه بطوله أبو عمرو الداني في "السنن الواردة في الفتن" (271) من طريق ليث بن أبي سليم، عن ابن حصين، عن أبي عبد الله الفلسطيني، قال: سمعت حذيفة بن اليمان يقول … وهذا إسناد ضعيف، ليث ضعيف سيئ الحفظ، وابن حصين هذا لم نعرفه.وأخرجه بنحوه الآجري في "الشريعة" (35) - ومن طريقه الداني (225) و (274) - من طريق هشام بن عمار، عن عبد الحميد بن حبيب، عن الأوزاعي، عن يونس بن يزيد، عن الزهري، عن الصُّنابحي، عن حذيفة. وظاهر هذا الإسناد الحُسْن، إلا أنه معلول، فقد رواه الداني (273) بإسناد قوي إلى موسى بن أعين عن الأوزاعي عن رجل من أهل الحجاز عن الصنابحي عن حذيفة ببعضه، وموسى بن أعين أوثق وأتقن من عبد الحميد بن حبيب، وقد بيّن في روايته أنَّ الواسطة بين الأوزاعي والصنابحي مبهمة لا تعرف.وانظر في انتقاض عرى الإسلام حديث أبي أمامة السالف برقم (7198).وانظر حديث أبي هريرة السالف برقم (107) في اتباع طريق الأمم السابقة. القُدَّة: واحدة القُذَذ، وهي ريش السَّهم.