আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
8655 - حدثنا علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، حدثنا محمد بن غالب، حدثنا موسى بن إسماعيل، حدثنا هشام بن أبي عبد الله، عن قتادة، عن أبي الطُّفيل قال: انطلقتُ أنا وعمرُو بن صُلَيع إلى حذيفة بن اليَمَان وعنده سِماطانِ من الناس، فقلنا: يا حذيفةُ، أدركت ما لم نُدرك، وعَلِمتَ ما لم نعلم، وسمعت ما لم نسمع، فحدِّثنا بشيءٍ لعلَّ الله أن ينفعنا به، فقال: لو حدَّثتُكم بكل ما سمعتُ، ما انتظرتم بي الليل القريب، قال: قلنا: ليس عن هذا نسألك، ولكن حدِّثنا بأمرٍ لعلَّ الله أن ينفعنا به، قال: لو حدَّثتكم أنَّ أمَّ أحدكم تغزو في كتيبةٍ حتى تضرِبَ بالسيف ما صدَّقتموني، قلنا: ليس عن هذا نسألك، ولكن حدثنا بشيءٍ لعلَّ الله أن ينفعنا به، فقال حذيفة: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "إنَّ هذا الحيَّ من مُضَرَ لا يزالُ بكلِّ عبدٍ صالح يقتلُه ويُهلكه ويُفنيه، حتى يُدرِكَهم الله بجنودٍ من عنده فتقتلهم، حتى لا يمنعَ ذَنَبَ تَلْعة".قال عمرو بن صُلَيع: واثُكلَ أُمِّه! ألهوت الناسَ إلَّا عن مضر، قال: ألستَ من مُحارِبِ خَصَفةَ؟ قال: بلى، قال: فإذا رأيت قيسًا قد توالتِ الشام، فخُذْ حذرك [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
হুযাইফা ইবনুল ইয়ামান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: আবুত তুফাইল বলেন, আমি এবং আমর ইবনু সুলাই' হুযাইফা ইবনুল ইয়ামানের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিকট গেলাম। তাঁর কাছে মানুষের দুটি সারি (বা দল) ছিল। আমরা বললাম: হে হুযাইফা! আপনি এমন বিষয়গুলো উপলব্ধি করেছেন যা আমরা করিনি, এমন জ্ঞান অর্জন করেছেন যা আমরা করিনি এবং এমন কিছু শুনেছেন যা আমরা শুনিনি। তাই আপনি আমাদের এমন কিছু বলুন যার দ্বারা আল্লাহ হয়তো আমাদের উপকৃত করবেন। তিনি (হুযাইফা) বললেন: আমি যদি তোমাদেরকে আমার শোনা সব কথা বলতাম, তবে তোমরা সামান্য রাত হওয়া পর্যন্তও আমার জন্য অপেক্ষা করতে না। আমরা বললাম: আমরা আপনাকে এই বিষয়ে জিজ্ঞাসা করছি না, বরং আপনি আমাদেরকে এমন একটি বিষয় বলুন যার দ্বারা আল্লাহ হয়তো আমাদের উপকৃত করবেন। তিনি বললেন: আমি যদি তোমাদেরকে বলি যে, তোমাদের কারও মা একটি সৈন্যদলের সাথে যুদ্ধ করবে এবং তরবারি চালাবে, তবুও তোমরা আমাকে বিশ্বাস করবে না। আমরা বললাম: আমরা আপনাকে এই বিষয়ে জিজ্ঞাসা করছি না, বরং আপনি আমাদের এমন কিছু বলুন যার দ্বারা আল্লাহ হয়তো আমাদের উপকৃত করবেন। তখন হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "মুদার গোত্রের এই দলটি প্রত্যেক নেককার বান্দাকে হত্যা, ধ্বংস ও বিনাশ করতে থাকবে, যতক্ষণ না আল্লাহ তাঁর পক্ষ থেকে একদল সৈন্যদল দ্বারা তাদের পাকড়াও করবেন। এরপর সেই সৈন্যদল তাদের এমনভাবে হত্যা করবে যে, উপত্যকার শেষ প্রান্তের লেজও আর সুরক্ষিত থাকবে না।" আমর ইবনু সুলাই' বললেন: হায়, তার মায়ের কী দুর্ভাগ্য! তিনি (হুযাইফা) কি মুদার ব্যতীত অন্য লোকদের ভুলে গেলেন? তিনি (হুযাইফা) বললেন: তুমি কি মুহারিব খাসাফাহ গোত্রের নও? তিনি বললেন: হ্যাঁ, অবশ্যই। তখন (হুযাইফা) বললেন: যখন তুমি দেখবে কায়েস গোত্র সিরিয়ার (শাসকীয়) দায়িত্বভার গ্রহণ করেছে, তখন সতর্ক হয়ে যেয়ো।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. أبو الطفيل: هو عامر بن واثلة، وهو وعمرو بن صليع معدودان في صغار الصحابة.وأخرجه بنحوه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 26/ 85 - 86 من طريق محمد بن أبي عدي، عن هشام - وهو الدستوائي - بهذا الإسناد.وأخرج المرفوع منه أحمد 38 (23316) عن أبي داود الطيالسي، عن هشام، به.وأخرجه أحمد أيضًا (23435) من طريق هزيل بن شرحبيل، عن حذيفة.وسيأتي عند المصنف قريبًا برقم (8657) من طريق عمرو بن حنظلة عن حذيفة.السِّماطان من الناس: الجانبان.والمراد بالحي من مضر: قريش. وذَنَب التَّلعة: المراد به أسفل مَسِيل الماء. وهذا - كما قال السندي في حاشيته على "مسند أحمد" - وصفٌ لهم بالذل والضعف وقلّة المنعة، كأنه قال: حتى لا يملكوا أسفل وادٍ، فضلًا عن البلاد والحكم بين العباد.وقوله: "ألهوت الناس إلّا عن مضر" لم نتبين معناه.