হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8668)


8668 - أخبرني أبو بكر محمد بن عبد الله بن أحمد الحفيد، حدثنا جدِّي، حدثنا أبو كُريب، أخبرنا أبو معاوية، عن أبي مالك الأشجعي، عن ربعي، عن حُذيفة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يَدرُسُ الإسلامُ كما يَدرُسُ وَشْيُ الثوب، حتى لا يُدرَى ما صيامٌ ولا صدقةٌ ولا نُسُك، ويُسرَى على كتاب الله في ليلةٍ فلا يبقى في الأرض منه آيةٌ، ويبقى طوائفُ من الناس؛ الشيخُ الكبير والعجوزُ الكبيرة يقولون: أدركنا آباءنا على هذه الكلمة، فنحن نقولها".قال صِلَةُ بن زُفَر لحذيفة: فما تُغني عنهم لا إلهَ إِلَّا الله وهم لا يدرون ما صيامٌ ولا صدقةٌ ولا نُسُك؟ فأعرضَ عنه حذيفةُ، فردَّدها عليه ثلاثًا، كلَّ ذلك يُعرِضُ عنه حذيفةُ، ثم أقبل عليه في الثالثة فقال: يا صِلةُ، تُنجيهم من النار، تُنجيهم من النار، تُنجيهم من النار [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "কাপড়ের নকশা যেমন পুরনো হয়ে যায়, তেমনি ইসলামও পুরনো হয়ে (বিলীন হয়ে) যাবে, এমনকি রোযা কী, সাদাকা কী এবং নুসুক (ইবাদাত) কী— তা জানা যাবে না। আর এক রাতে আল্লাহ্‌র কিতাব (কুরআন) তুলে নেওয়া হবে (জমিন থেকে); ফলে পৃথিবীতে তার একটি আয়াতও অবশিষ্ট থাকবে না। মানুষের কিছু দল অবশিষ্ট থাকবে; বৃদ্ধ পুরুষ ও বৃদ্ধা নারী। তারা বলবে: ‘আমরা আমাদের বাপ-দাদাকে এই কালিমার উপর পেয়েছি, তাই আমরাও তা বলি।’" সিলাহ ইবনু যূফার হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: তারা তো জানে না রোযা কী, সাদাকা কী বা নুসুক কী— এমতাবস্থায় ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ’ তাদের কী উপকার করবে? হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার থেকে মুখ ফিরিয়ে নিলেন। সে তাকে তিনবার কথাটি পুনরাবৃত্তি করল, আর প্রতিবারই হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার থেকে মুখ ফিরিয়ে নিলেন। অতঃপর তৃতীয়বারে তিনি তার দিকে ফিরে বললেন: "হে সিলাহ! এটা তাদের জাহান্নাম থেকে মুক্তি দেবে, এটা তাদের জাহান্নাম থেকে মুক্তি দেবে, এটা তাদের জাহান্নাম থেকে মুক্তি দেবে।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] صحيح موقوفًا، وهذا إسناد صحيح رجاله في الجملة ثقات إلّا أنَّ أبا معاوية - وهو محمد بن خازم الضرير - وإن كان أحفظ الناس لحديث الأعمش فإنه قد يهمُ في حديث غيره، وهذا منها، فقد اختُلف عليه في رفعه ووقفه.فرفعه عنه أبو كُريب - وهو محمد بن العلاء عند المصنف هنا، وعند البزار في "مسنده" (2838)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (1870)، وأحمدُ بنُ عبد الجبار عند المصنف فيما سيأتي برقم (8850)، وعلي بنُ محمد الطَّنافسي عند ابن ماجه (4049).وخالفهم نعيم بن حماد فرواه في "الفتن" (1665) عن أبي معاوية موقوفًا.ورواه موقوفًا أيضًا عن أبي مالك الأشجعي - وهو سعد بن طارق - محمدُ بنُ فُضيل في "الدعاء" له (15) وسيأتي من طريقه عند المصنف برقم (8753) - وخلفُ بن خليفة عند اللالكائي في "أصول الاعتقاد" (577)، والخطيب في تاريخ بغداد 2/ 290، وإسحاقُ بنُ أبي يحيى وهو أحد الهلكي - عند أبي عمرو الداني في "الفتن" (419)، وأبو عوانة اليشكري في رواية أبي كامل الجحدري عنه عند البزار (2839).وخرَّجه البوصيري في "مصباح الزجاجة" عن مسدَّد في "مسنده" عن أبي عوانة عن أبي مالك بإسناده ومتنه معطوفًا على رواية ابن ماجه، ففُهم من تخريجه أنه عند مسدّد عن أبي عوانة مرفوع، والله تعالى أعلم.وهذا الخبر وإن كان موقوفًا، فإنَّ مثله لا يقال من قبل الرأي، فهو في حكم المرفوع.قوله: "يدرس الإسلام" أي: ينمحي أثرُه.ووَشْي الثوب: نقوشه.