হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8833)


8833 - أخبرنا أبو سهل أحمد بن محمد بن عبد الله بن زياد القطَّان ببغداد، حدثنا أحمد بن عبيد الله النَّرْسي، حدثنا أَزهَر بن سعد، حدثنا عبد الله بن عَوْن، عن عِمران بن مسلم الخيَّاط، عن زيد بن وهب قال: كنا عند حُذَيفة في هذا المسجد فقال: أتَتكم أظلَّتكم تَرمي بالنَّشَف [1]، ثم التي بعدها تَرمي بالرَّضْف، ثم التي بعدها المُظلِمة، ما فيكم رجل حيٌّ [2] يَرى ما ترون، لم يرَ فتنةَ المسيح فيراها أبدًا، قال: وفينا أعرابيٌّ من ربيعةَ ما فينا حيٌّ غيره، قال سبحانَ الله يا أصحاب محمد! كيف بالمَسيح وقد وُصِفَ لنا عريضَ الكَبْهة، مُشرِفَ الكَتَدِ [3]، بعيد ما بين المَنكِبَين؟! فأنا رأيت حذيفةَ رُدِعَ منها رَدْعةً [4]، قال: نَشَدتُك بالله، هل تدري كيف قلت؟ قال: قلتَ: ما فيكم رجل حيٌّ يَرى ما ترون، لم يرَ فتنةً الدجال فيراها أبدًا، قال: فأنا رأيتُ حذيفةَ تَسايَرَ عن [5] وجهه، قال: قلتُ: لأنه حَفِظَ الحديثَ على وجهه؟ قال: نعم. قال: ثم قال كلمةً ضعيفةً: أرأيتم يومَ الدارِ أمس، فإنها كانت فتنةً عامةً عمَّت الناس، قال: وفينا أعرابيٌّ من ربيعةَ ما فينا حيٌّ غيرُه، قال: سبحانَ الله يا أصحابَ محمد! فأين الذين يُبعِّقون لِقاحَنا [6]، ويَنقُبون بيوتَنا؟! قال: أولئك هم الفاسقون، مرتين، قال: ولقد خرجتُ يومَ الجَرَعَة [-4] ولقد علمتُ أنه لم يُهرَقُ فيها مِحجَمةٌ من دم، وما نهيتُ عنها إلَّا ابن الحصرامة، وفينا أعرابي من ربيعةَ ما فينا حيٌّ غيرُه، قال: سبحانَ الله يا أصحابَ محمد، ابن الحصرامةِ دونَ الناس! فقال: إنها إذا أقبلَتْ كانت للقائم والقائل، وإنَّ ابنَ الحصرامةِ رجلٌ قوَّالةٌ [-4].هذا حديث صحيح الإسناد على شرط الشيخين، فقد احتجَّا بعِمران بن مسلم [-4]، ولم يخرجاه.




হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। যায়দ ইবনু ওয়াহাব (রহ.) বলেন, আমরা এই মসজিদে হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে ছিলাম। তিনি বললেন: তোমাদের উপর ঘন অন্ধকার নেমে এসেছে, যা হালকা প্রস্তর নিক্ষেপ করছে, এরপর যে ফিতনা আসবে তা উত্তপ্ত প্রস্তর নিক্ষেপ করবে, এরপরেরটি হবে সম্পূর্ণ অন্ধকারাচ্ছন্ন। তোমাদের মধ্যে এমন কোনো জীবিত ব্যক্তি নেই যে তোমরা যা দেখছো তা দেখবে, অথচ সে মাসীহ (দাজ্জাল)-এর ফিতনা দেখেনি; ফলে সে (বেঁচে থাকলে) তা সর্বদা দেখবে। বর্ণনাকারী বলেন, তখন আমাদের মাঝে রাবী‘আ গোত্রের একজন বেদুইন ছিল; জীবিতদের মধ্যে সে ছাড়া আর কেউ ছিল না। সে বলল, সুবহানাল্লাহ! হে মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণ! মাসীহ (দাজ্জাল) সম্পর্কে কী বলবেন? তার তো আমাদের কাছে প্রশস্ত কপাল, উঁচু কাঁধ এবং দুই কাঁধের মাঝখানে বেশ দূরত্ব থাকার বর্ণনা দেওয়া হয়েছে! আমি হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দেখলাম, তিনি এতে যেন একটু দমকে গেলেন। তিনি বললেন, আমি তোমাকে আল্লাহর কসম দিয়ে জিজ্ঞেস করছি, তুমি কি জানো আমি কীভাবে বলেছিলাম? সে বলল, আপনি বলেছিলেন: 'তোমাদের মধ্যে এমন কোনো জীবিত ব্যক্তি নেই যে তোমরা যা দেখছো তা দেখবে, অথচ সে দাজ্জালের ফিতনা দেখেনি; ফলে সে (বেঁচে থাকলে) তা সর্বদা দেখবে।' বর্ণনাকারী বলেন, আমি দেখলাম হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর চেহারা থেকে উদ্বেগ কেটে গেল। আমি বললাম, এটা কি এজন্য যে সে হাদীসটি হুবহু মুখস্থ রেখেছে? তিনি বললেন, হ্যাঁ। তিনি এরপর দুর্বলভাবে একটি কথা বললেন: তোমরা কি গতকালকের 'দার'-এর দিনটি দেখেছো? নিশ্চয়ই তা ছিল এমন এক ব্যাপক ফিতনা যা সকল মানুষকে গ্রাস করেছিল। বর্ণনাকারী বলেন, তখন আমাদের মাঝে রাবী‘আ গোত্রের একজন বেদুইন ছিল; জীবিতদের মধ্যে সে ছাড়া আর কেউ ছিল না। সে বলল, সুবহানাল্লাহ! হে মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণ! যারা আমাদের দুগ্ধবতী উটনীগুলো জবাই করে এবং আমাদের ঘর ভেঙে চুরি করে, তারা কোথায়?! তিনি বললেন, তারা হলো ফাসিক (পাপী)। তিনি দু’বার বললেন। তিনি বললেন, আমি 'ইয়াওমুল জারা'আহ'-এর দিন বের হয়েছিলাম এবং আমি জানতাম যে সেখানে এক শিঙার পরিমাণ রক্তও ঝরানো হয়নি। তবে আমি শুধুমাত্র ইবনু হাসরামাকে তা থেকে নিষেধ করেছিলাম। আমাদের মাঝে রাবী‘আ গোত্রের একজন বেদুইন ছিল; জীবিতদের মধ্যে সে ছাড়া আর কেউ ছিল না। সে বলল, সুবহানাল্লাহ! হে মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণ! (সকল মানুষের মধ্যে) শুধু ইবনু হাসরামা! তিনি বললেন, যখন কোনো ফিতনা উপস্থিত হয়, তখন তা সক্রিয় অংশগ্রহণকারী (দাঁড়ানো ব্যক্তি) এবং উস্কানিদাতা (বক্তা)-দের জন্য হয়ে থাকে। আর ইবনু হাসরামা হলো একজন অত্যন্ত বাচাল মানুষ।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرّف في النسخ الخطية إلى: بالقشف … بالوضح، والتصويب من كتب غريب الحديث. يريد بقوله: "أتتكم" الفتنَ، والنَّشَف: حجارة سود كأنها أُحرقت بالنار يحكُّ بها الوسخ عن اليد والرِّجل، واحدتها: نَشَفة، بالتحريك وقد تسكَّن، والرَّضف: حجارة مُحْماة على النار، واحدتها: رَضْفة. يعني: أنَّ الأولى من الفتن لا تؤثر في أديان الناس لخفّتها، والتي بعدها كهيئة حجارة أُحميت بالنار، فكانت رضفًا، فهي أبلغ في أديانهم وأثلم لأبدانهم. قاله ابن الأثير في "النهاية" (نشف).



[2] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: حتى، وستأتي على الصواب لاحقًا. في غريب الحديث 4/ 129.



8833 [3] - تحرَّف في الطبعة الهندية إلى: عريض الجبهة مشرف الجيد. وقد روى هذا الحرف الخطابي في "غريب الحديث" 2/ 328 - 329 من طريق ربعي بن إبراهيم عن عبد الله بن عون عن عمران الخياط عن زيد بن وهب عن حذيفة. ثم فسَّره فقال: الكبهة لغة رديئة في الجبهة، ومثله في كلامهم: الكَبَل والرَّكُل، يريدون: الجبل والرجل، وهو من كلام جفاة الأعراب. والكَتد: ما بين أعلى الظهر والكاهل، والنعت منه أكتَد، أي: ضخم الكتد مشرفه.وقال ابن الأثير في "النهاية" (كبه): أراد الجبهة فأخرج الجيم بين مخرجها ومخرج الكاف، وهي لغة قوم من العرب، ذكرها سيبويه مع ستة أحرف أخرى، وقال: إنها غير مستحسنة ولا كثيرة في لغة من ترضى عربيته. في غريب الحديث 4/ 129.



8833 [4] - تحرَّف في النسخ الخطية إلى: ودع منها ودعة، بالواو فيهما. والتصويب من كتاب الخطابي وغيره من كتب غريب الحديث. وقال الخطابي: قوله: "رُدع لها" معناه: وَجِم لها، أو ضجر حتى تغيّر لونه، من قولك: رَدَعتُ الثوبَ بالزعفران: إذا لوّنتَه به … يدلّ على هذا قوله في هذا الحديث: ثم تساير عن وجهه الغضب، وقد يكون رُدِع أيضًا بمعنى: ارتَدع عن الكلام وكفَّ. في غريب الحديث 4/ 129.



8833 [5] - قوله: "تساير عن" تحرَّف في النسخ الخطية إلى: يسارع، والتصويب من كتب الغريب كما سبق. والمعنى: ذهب عن وجهه الغضب. في غريب الحديث 4/ 129.



8833 [6] - أي: ينحرون إبلنا ويسيلون دماءها، يقال: قد انبعَقَ المطرُ: إذا سالَ فكثُر. قاله أبو عبيد في غريب الحديث 4/ 129.



8833 [-4] - الجرعة: موضع بالكوفة، وانظر قصة يوم الجرعة عند المصنف برقم (2701) و (8851).



8833 [-4] - إسناده فيه لِين، عمران الخياط لا يكاد يُعرَف كما قال الذهبي في "ميزان الاعتدال"، وقد ترجمه البخاري في "التاريخ الكبير" 6/ 418 وابن حبان في "الثقات" 7/ 241، ولم يذكرا في الرواة عنه غير عبد الله بن عون، وزاد ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 6/ 308 منصورًا ومغيرة، وذكره ابن شاهين في "تاريخ أسماء الضعفاء" (486) وقال: لا شيء. ولم يسمِّ أحدٌ ممن سبق أباه، وذكروا أنه مولًى لجُعفيّ، زاد ابن حبان أنه من أهل الكوفة. وقد توبع عمران على بعضه، وباقي رجاله ثقات.وأخرج بعضه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" (39/ 478 - 479 من طريق جرير بن حازم، عن الصلت بن بهرام - أحد الثقات - عن زيد بن وهب، عن حذيفة.وكذا أخرج بعضه بنحوه أبو عمرو الداني في "السنن الواردة في الفتن" (62) من طريق منصور، عن ربعي بن حراش، عن حذيفة. وفي إسناده إسحاق بن أبي يحيى، وهو هالك.وقد سلف منه عند المصنف برقم (8641) من حديث الأعمش، عن زيد بن وهب، عن حذيفة قال: أتتكم الفتنة ترمي بالرضف، أتتكم الفتنة السوداء المظلمة. فانظره هناك



8833 [-4] - هذا وهمٌ من المصنف رحمه الله، فعمران بن مسلم الذي روى له الشيخان مِنقري من أهل البصرة معروف، وأما عمران هذا فهو غيره، ولم يقع أبوه مسمَّى إلّا في رواية المصنف هذه، وهو كوفي كما سبق.