সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ
181 - ` لا طاعة ` لبشر ` في معصية الله، إنما الطاعة في المعروف `.
أخرجه البخاري (13 /
আল্লাহর না-ফরমানি বা অবাধ্যতার ক্ষেত্রে কোনো মানুষের আনুগত্য করা যাবে না। আনুগত্য কেবল ভালো কাজের (বা সৎকাজের) ক্ষেত্রেই।
182 - ` إذا زار أحدكم أخاه فجلس عنده، فلا يقومن حتى يستأذنه `.
رواه أبو الشيخ في ` تاريخ أصبهان ` (113) : حدثنا إسحق بن محمد ابن حكيم
قال: حدثنا يحيى بن واقد قال: حدثنا ابن أبي غنية قال: حدثنا أبي قال:
حدثنا جبلة بن سحيم عن ابن عمر قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:
فذكره.
قلت: وهذا سند صحيح، رجاله كلهم ثقات معرفون.
أما جبلة بن سحيم فهو ثقة أخرج له البخاري في ` الأدب المفرد `.
وابن أبي غنية فهو يحيى بن عبد الملك بن حميد بن أبي غنية، فهو ثقة من رجال
الشيخين، وكذا أبوه عبد الملك.
وأما يحيى بن واقد، فترجمه أبو الشيخ فقال:
` كان رأساً في النحو والعربية، كثير الحديث. وقال إبراهيم بن أرومة: يحيى
من الثقات، وذكر أن مولده سنة خمس وستين، خلافة المهدي. ومن حسان حديثه
.. `.
قلت: ثم ساق له ثلاثة أحاديث هذا أولها.
وأما إسحاق بن محمد بن حكيم، فهو إسحاق بن محمد بن إبراهيم بن حكيم قال
أبو الشيخ (267) :
` شيخ صدوق من أهل الأدب والمعرفة بالحديث، عنده كتب أبي عبيدة وعبد الرزاق
.. كثير الحديث. وكان صدوقا ثقة، لا يحدث إلا من كتابه. توفي سنة اثنتي
عشرة وثلاثمائة `.
قلت: ومن العجائب أن هذا الحديث مما فات السيوطي في ` الجامع الكبير ` فلم
يورده فيه، بينما هو ذكره في ` الجامع الصغير ` من رواية الديلمي عن ابن عمر،
فكأنه استدركه فيه، ولكنه فاته هذا المصدر العالي وهو ` تاريخ أصبهان ` كما
فات ذلك شارحه المناوي أيضا وقال معللا سند الديلمي:
` وفيه من لا يعرف `.
قلت: فإما أن يكون إسناد الديلمي غير إسناد أبي الشيخ، وأما أن يكون هو هذا
ولكن خفي عليه بعض رواته لأنهم لم يترجموا في غير هذا ` التاريخ `، وهو الذي
أرجحه. والله أعلم.
وبالجملة فهذا الحديث من الفوائد العزيزة التي لا تراها في كتاب بهذا الإسناد
والتحقيق. فلله الحمد، وهو ولي التوفيق.
وفي الحديث تنبيه على أدب رفيع وهو أن الزائر لا ينبغي أن يقوم إلا بعد أن
يستأذن المزور، وقد أخل بهذا التوجيه النبوي الكريم كثير من الناس في بعض
البلاد العربية، فتجدهم يخرجون من المجلس دون استئذان، وليس هذا فقط، بل
وبدون سلام أيضا! وهذه مخالفة أخرى لأدب إسلامي آخر، أفاده الحديث الآتى:
` إذا انتهى أحدكم إلى المجلس فليسلم، فإذا أراد أن يقوم فيسلم، فليست الأولى
بأحق من الآخرة `.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: যখন তোমাদের কেউ তার কোনো (মুসলিম) ভাইয়ের সাথে দেখা করতে যায় এবং তার কাছে বসে, তখন সে যেন তার অনুমতি না নিয়ে উঠে না যায়।
183 - ` إذا انتهى أحدكم إلى المجلس فليسلم، فإذا أراد أن يقوم فيسلم، فليست الأولى
بأحق من الآخرة `.
رواه البخاري في ` الأدب المفرد ` (1007 و 1008) وأبو داود (5208)
والترمذي (2 / 118) والطحاوي في ` المشكل ` (2 / 139) وأحمد (2 / 230،
287، 429) والحميدي (1162) وأبو يعلى في ` مسنده ` (ق 306 / 1)
والفاكهي في ` حديثه عن أبي يحيى بن أبي ميسرة ` (1 / 5 / 2) عن ابن عجلان
عن سعيد المقبري عن أبي هريرة مرفوعا به وقال الترمذي: ` حديث حسن `.
قلت: وإسناده جيد، رجاله كلهم ثقات، وفي ابن عجلان واسمه محمد، كلام
يسير لا يضر في الاحتجاج بحديثه، لاسيما وقد تابعه يعقوب ابن زيد التيمي عن
المقبري به. والتيمي هذا ثقة: فصح الحديث، والحمد لله. وله شواهد تقويه
كما يأتي.
والحديث عزاه السيوطي في ` الجامع الصغير ` و ` الكبير ` (1 / 45 / 1) لابن
حبان والحاكم في ` المستدرك ` أيضا، ثم عزاه في مكان آخر من ` الكبير `
(1 / 21 / 1) لابن السني في ` عمل اليوم والليلة ` والطبراني في ` الكبير `
ولم أره في ` المستدرك ` بعد أن راجعته فيه في ` البر ` و ` الصلة ` و ` الأدب
`. والله أعلم.
ومن شواهد الحديث ما أخرجه أحمد (3 / 438) من طريق ابن لهيعة حدثنا زبان عن
سهل بن معاذ عن أبيه عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:
` حق على من قام على مجلس أن يسلم عليهم، وحق على من قام من مجلس أن يسلم.
فقام رجل ورسول الله صلى الله عليه وسلم يتكلم، ولم يسلم، فقال رسول الله
صلى الله عليه وسلم: ما أسرع ما نسي؟ !
قلت: وهذا سند ضعيف، ولكن لا بأس به في الشواهد. ويقويه أن البخاري أخرجه
في ` الأدب المفرد ` (1009) من طريق أخرى عن بسطام قال: سمعت معاوية بن قرة
قال: قال لي أبي:
` يا بني إن كنت في مجلس ترجو خيره فعجلت بك حاجة فقل: سلام عليكم، فإنك
تشركهم فيما أصابوا في ذلك المجلس، وما من قوم يجلسون مجلسا فيتفرقون عنه لم
يذكروا الله، إلا كأنما تفرقوا عن جيفة حمار `.
وإسناده صحيح، رجاله كلهم ثقات، وهو وإن كان موقوفا، فهو في حكم المرفوع
لأنه لا يقال من قبل الرأي، لاسيما وغالبه قد صح مرفوعا، فطرفه الأول ورد
في حديث أبي هريرة هذا، والآخر ورد من حديثه أيضا، وقد سبق برقم (77)
وانظر ما قبله وما بعده.
والسلام عند القيام من المجلس أدب متروك في بعض البلاد، وأحق من يقوم
بإحيائه هم أهل العلم وطلابه، فينبغي لهم إذا دخلوا على الطلاب في غرفة الدرس
مثلا أن يسلموا، وكذلك إذا خرجوا، فليست الأولى بأحق من الأخرى، وذلك من
إفشاء السلام المأمور به في الحديث الآتى:
` إن السلام اسم من أسماء الله تعالى وضعه في الأرض، فأفشوا السلام بينكم `.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যখন তোমাদের কেউ কোনো মজলিসে (বৈঠকে) পৌঁছায়, তখন সে যেন সালাম দেয়। আর যখন সে (মজলিস থেকে) উঠে যেতে চায়, তখনও যেন সালাম দেয়। কেননা, প্রথম সালামটি শেষ সালামের চেয়ে অধিক হকদার (জরুরি) নয়।
184 - ` إن السلام اسم من أسماء الله تعالى وضعه في الأرض، فأفشوا السلام بينكم `.
رواه البخاري في ` الأدب المفرد ` (989) حدثنا شهاب قال: حدثنا حماد بن سلمة
عن حميد عن أنس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره.
قلت: وهذا إسناد صحيح، رجاله كلهم ثقات رجال الشيخين غير حماد بن سلمة فمن
رجال مسلم وحده.
وله شاهد من حديث عبد الله بن مسعود مرفوعا به.
أخرجه أبو الشيخ في ` الطبقات ` (147، 295) من طريق عبد الله بن عمر قال:
حدثنا يحيى بن سعيد عن الأعمش عن زيد بن وهب عن عبد الله به. وقال:
` تفرد به عبد الله بن عمر `.
قلت: وهو عبد الله بن عمر بن يزيد الزهري قال أبو الشيخ:
` يكنى أبا محمد، ولي القضاء بالكرخ، وخرج إليها، مات سنة اثنتين وخمسين
ومائتين، وكان راوية عن يحيى، وعبد الرحمن وروح وحماد بن مسعدة ومحمد
بن بكر وأبو قتيبة وغيرهم، وله مصنفات كثيرة، وقد حدث بغير حديث يتفرد به
`.
ثم ساق له أحاديث هذا أولها.
وقد أورده ابن أبي حاتم (2 / 2 / 111) ولم يذكر فيه جرحا.
قلت: فالرجل يستشهد به إن لم يحتج به، فإنه ليس فيما ساق له أبو الشيخ من
الأحاديث ما ينكر عليه، والله أعلم.
والحديث أورده المنذري في ` الترغيب ` (3 /
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ইরশাদ করেছেন: নিশ্চয়ই ‘সালাম’ (শান্তি) হলো আল্লাহ তাআলার নামসমূহের মধ্যে একটি নাম, যা তিনি পৃথিবীতে স্থাপন করেছেন। সুতরাং তোমরা তোমাদের মাঝে সালামের প্রসার (বিনিময়) করো।
185 - ` خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى قباء يصلي فيه. فجاءته الأنصار فسلموا
عليه وهو يصلي، قال: فقلت لبلال: كيف رأيت
رسول الله صلى الله عليه وسلم
يرد عليهم حين كانوا يسلمون عليه وهو يصلي؟ قال: يقول هكذا، وبسط كفه
وبسط جعفر بن عون كفه، وجعل بطنه أسفل، وجعل ظهره إلى فوق `.
أخرجه أبو داود (927) بسند جيد وبقية أصحاب السنن.
وقال الترمذي (2 / 204) : ` حديث حسن صحيح `.
وله طريق أخرى في المسند (2 / 30) وغيره عن ابن عمر.
وسنده صحيح على شرط الشيخين.
وقد ذهب إلى الحديث الإمامان أحمد بن حنبل وإسحاق بن راهويه فقال المروزي في
` المسائل ` (ص 22) :
` قلت (يعني لأحمد) : يسلم على القوم وهم في الصلاة؟ قال: نعم، فذكر قصة
بلال حين سأله ابن عمر، كيف كان يرد؟ قال: كان يشير، قال إسحاق: كما قال `
:
واختار هذا بعض محققي المالكية فقال القاضي أبو بكر بن العربي في ` العارضة `
(2 / 162) :
` قد تكون الإشارة في الصلاة لرد السلام لأمر ينزل بالصلاة، وقد تكون في
الحاجة تعرض للمصلي. فإن كانت لرد السلام ففيها الآثار الصحيحة كفعل النبي
صلى الله عليه وسلم في قباء وغيره. وقد كنت في مجلس الطرطوشي، وتذاكرنا
المسألة، وقلنا الحديث واحتججنا به، وعامي في آخر الحلقة، فقام وقال:
ولعله كان يرد عليهم نهيا لئلا يشغلوه! فعجبنا من فقهه! ثم رأيت بعد ذلك أن
فهم الراوي أنه كان لرد السلام قطعي في الباب، على حسب ما بيناه في أصول الفقه
`.
ومن العجيب أن النووي بعد أن صرح في الأذكار بكراهة السلام على المصلي قال ما
نصه:
` والمستحب أن يرد عليه في الصلاة بالإشارة، ولا يتلفظ بشيء `.
أقول: ووجه التعجب أن استحباب الرد فيه أن يستلزم استحباب السلام عليه
والعكس بالعكس، لأن دليل الأمرين واحد، وهو هذا الحديث وما في معناه،
فإذا كان يدل على استحباب الرد، فهو في الوقت نفسه يدل على استحباب الإلقاء،
فلو كان هذا مكروها لبينه رسول الله صلى الله عليه وسلم ولو بعدم الإشارة
بالرد، لما تقرر أن تأخير البيان عن وقت الحاجة لا يجوز. وهذا بين ظاهر
والحمد لله.
ومن ذلك أيضا السلام على المؤذن وقارىء القرآن، فإنه مشروع، والحجة ما
تقدم فإنه إذا ما ثبت استحباب السلام على المصلي، فالسلام على المؤذن
والقارىء أولى وأحرى. وأذكر أنني كنت قرأت في المسند حديثا فيه سلام النبي
صلى الله عليه وسلم على جماعة يتلون القرآن، وكنت أود أن أذكره بهذه المناسبة
وأتكلم على إسناده، ولكنه لم يتيسر لي الآن.
وهل يردان السلام باللفظ أم بالإشارة؟ الظاهر الأول، قال النووي: ` وأما
المؤذن فلا يكره له رد الجواب بلفظه المعتاد لأن ذلك يسير، لا يبطل الأذان
ولا يخل به `.
ومن ذلك تكرار السلام بعد حصول المفارقة ولو بعد مدة يسيرة، لقوله صلى الله
عليه وسلم:
` إذا لقي أحدكم أخاه فليسلم عليه، فإن حالت بينهما شجرة أو جدار أو حجر ثم
لقيه فليسلم عليه أيضا `.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুবায় গেলেন সেখানে সালাত আদায় করার জন্য। তখন আনসারগণ এসে তাঁর উপর সালাম দিলেন, যখন তিনি সালাত আদায় করছিলেন। (ইবনে উমর) বলেন: আমি বেলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললাম: যখন আনসারগণ সালাতের মধ্যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সালাম দিচ্ছিলেন, তখন তাঁকে কীভাবে জবাব দিতে দেখেছেন? তিনি বললেন: তিনি এভাবে বলতেন (ইশারা করতেন)। এই কথা বলে তিনি (বেলাল) তার হাতের তালু প্রসারিত করলেন। (হাদীসের রাবী) জাফর ইবনে আউনও তার হাতের তালু প্রসারিত করলেন, এবং এর ভেতরের অংশ নিচের দিকে রাখলেন এবং বাইরের অংশ উপরের দিকে রাখলেন (অর্থাৎ হাতের পিঠ দেখালেন)।
হাদিসটি আবু দাউদ (৯২৭) উত্তম সনদে এবং অন্যান্য সুনান গ্রন্থকারগণও বর্ণনা করেছেন। ইমাম তিরমিযী (২/২০৪) বলেছেন: ’হাদীসটি হাসান সহীহ’।
মুসনাদ (২/৩০) এবং অন্যান্য গ্রন্থে ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এর আরেকটি সনদ রয়েছে, যা শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্তানুসারে সহীহ।
দুই ইমাম আহমদ ইবনে হাম্বল এবং ইসহাক ইবনে রাহাওয়াইহ এই হাদীসটি গ্রহণ করেছেন। মারওয়াযী ’আল-মাসাইল’ (পৃ. ২২)-এ বলেছেন: আমি (অর্থাৎ ইমাম আহমাদকে) বললাম: লোকেদের সালাতরত অবস্থায় সালাম দেওয়া যাবে কি? তিনি বললেন: হ্যাঁ। এরপর তিনি বেলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ঘটনাটি উল্লেখ করলেন, যখন ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে জিজ্ঞাসা করেছিলেন যে, নবীজি কীভাবে জবাব দিতেন? তিনি বললেন: তিনি ইশারা করতেন। ইসহাক বললেন: তিনি (আহমাদ) যেমন বললেন।
কিছু মুহাক্কিক মালিকী ফকীহ এই মতটি গ্রহণ করেছেন। কাযী আবু বকর ইবনুল আরাবী ’আল-আরিদাহ’ (২/১৬২)-তে বলেছেন: সালাতের মধ্যে ইশারা কখনও কখনও সালামের জবাব দেওয়ার জন্য হতে পারে—যদি সালাতে কোনো পরিস্থিতি আসে, অথবা কখনও কখনও সালাত আদায়কারীর প্রয়োজনের কারণেও হতে পারে। যদি তা সালামের জবাব দেওয়ার জন্য হয়, তবে এর পক্ষে সহীহ বর্ণনা রয়েছে, যেমন কুবায় এবং অন্য স্থানে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আমল।
আশ্চর্যের বিষয় হলো, ইমাম নববী (রাহিমাহুল্লাহ) ’আল-আযকার’-এ সালাতরত ব্যক্তিকে সালাম দেওয়া মাকরুহ (অপছন্দনীয়) বলে স্পষ্টভাবে উল্লেখ করার পর আবার বলেছেন: ’মুস্তাহাব হলো সালাতের মধ্যে ইশারার মাধ্যমে সালামের জবাব দেওয়া, মুখে কোনো কিছু উচ্চারণ না করা।’
আমি বলি: আশ্চর্যের কারণ হলো, জবাব দেওয়া মুস্তাহাব হলে তা অবশ্যই সালাম শুরু করাকেও মুস্তাহাব প্রমাণ করে এবং এর বিপরীতটিও প্রযোজ্য। কারণ, এই দুটি বিষয়ের (সালাম দেওয়া ও জবাব দেওয়া) প্রমাণ একই—আর তা হলো এই হাদীস এবং এর অনুরূপ হাদীসসমূহ। সুতরাং, যদি এটি জবাব দেওয়াকে মুস্তাহাব প্রমাণ করে, তবে একই সাথে এটি সালাম শুরু করাকেও মুস্তাহাব প্রমাণ করে। যদি এটি মাকরুহ হতো, তাহলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা স্পষ্ট করে দিতেন, অন্তত জবাবের ইশারা না করার মাধ্যমে হলেও। কারণ, এই নীতি স্বীকৃত যে, প্রয়োজনের সময় থেকে বিধান বর্ণনা বিলম্বিত করা জায়েজ নয়। আলহামদুলিল্লাহ, এটি স্পষ্ট ও সুস্পষ্ট।
অনুরূপভাবে, মুয়াযযিন (আযান প্রদানকারী) এবং কুরআন তেলাওয়াতকারীকে সালাম দেওয়াও শরীয়তসম্মত। এর প্রমাণ হলো পূর্বে যা বলা হয়েছে—কারণ যখন সালাতরত ব্যক্তিকে সালাম দেওয়া মুস্তাহাব প্রমাণিত হলো, তখন মুয়াযযিন এবং তেলাওয়াতকারীকে সালাম দেওয়া আরও বেশি যুক্তিযুক্ত।
তারা কি শব্দের মাধ্যমে সালামের জবাব দেবেন নাকি ইশারার মাধ্যমে? সুস্পষ্ট মত হলো, শব্দের মাধ্যমে। ইমাম নববী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: ’আর মুয়াযযিনের জন্য তার স্বাভাবিক শব্দে জবাব দিতে কোনো অপছন্দনীয়তা নেই, কারণ তা সামান্য এবং তা আযানকে বাতিল করে না বা আযানে ত্রুটি সৃষ্টি করে না।’
অনুরূপভাবে, সামান্য সময়ের জন্য আলাদা হওয়ার পরে আবার সালামের পুনরাবৃত্তি করাও (মুস্তাহাব)। কারণ নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ’তোমাদের মধ্যে কেউ যখন তার ভাইয়ের সাথে সাক্ষাৎ করে, সে যেন তাকে সালাম দেয়। এরপর যদি তাদের দুজনের মাঝে কোনো গাছ, দেয়াল বা পাথর আড়াল হয়, অতঃপর সে তার সাথে আবার সাক্ষাৎ করে, তবে সে যেন তাকে পুনরায় সালাম দেয়।’
186 - ` إذا لقي أحدكم أخاه فليسلم عليه، فإن حالت بينهما شجرة أو جدار أو حجر ثم
لقيه فليسلم عليه أيضا `.
رواه أبو داود (5200) من طريق ابن وهب قال. أخبرني معاوية ابن صالح عن أبي
موسى عن أبي مريم عن أبي هريرة قال: إذا لقي ... قال معاوية: وحدثني
عبد الوهاب بن بخت عن أبي الزناد عن الأعرج عن أبي هريرة عن رسول الله صلى الله
عليه وسلم مثله سواء.
قلت: وإسناد المرفوع صحيح رجاله كلهم ثقات، وأما إسناد الموقوف ففيه
أبو موسى هذا وهو مجهول. وقد أسقطه بعضهم من السند، فرواه عبد الله
بن صالح قال: حدثني معاوية عن أبي مريم عن أبي هريرة به موقوفا.
أخرجه البخاري في ` الأدب المفرد ` (1010) . وعبد الله ابن صالح فيه ضعف فلا
يحتج به، وخصوصا عند مخالفته، لكن قد أخرجه أبو يعلى (297 / 1) عنه هكذا،
وعنه عن معاوية ابن صالح عن عبد الوهاب بن بخت مثل رواية ابن وهب المرفوعة،
فهذا أصح.
وقد ثبت أن الصحابة كانوا يفعلون بمقتضى هذا الحديث الصحيح.
فروى البخاري في ` الأدب ` (1011) عن الضحاك بن نبراس أبي الحسن عن ثابت عن
أنس بن مالك.
` إن أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم كانوا يكونون، فتستقبلهم الشجرة، فتنطلق
طائفة منهم عن يمينها وطائفة عن شمالها، فإذا التقوا سلم بعضهم على بعض `.
قلت: والضحاك هذا لين الحديث، لكن عزاه المنذري (3 / 268) والهيثمي
(8 / 34) للطبراني في الأوسط وقالا: ` وإسناده حسن `.
فلا أدري أهو من طريق أخرى، أم من هذه الطريق؟ ثم إنه بلفظ:
` كنا إذا كنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، فتفرق بيننا شجرة، فإذا
التقينا يسلم بعضنا
على بعض `. ثم رأيته في ` عمل اليوم والليلة ` لابن السني
رقم (241) من طريق أخرى عن حماد بن سلمة حدثنا ثابت وحميد عن أنس به.
وهذا سند صحيح.
ويشهد له حديث المسيء صلاته المشهور عن أبي هريرة.
` إن رسول الله صلى الله عليه وسلم دخل المسجد، فدخل رجل فصلى، ثم جاء فسلم
على رسول الله صلى الله عليه وسلم، فرد رسول الله صلى الله عليه وسلم السلام،
قال: ارجع فصل فإنك لم تصل، فرجع الرجل فصلى كما كان صلى، ثم جاء إلى النبي
صلى الله عليه وسلم فسلم عليه. (فعل ذلك ثلاث مرات) `.
أخرجه الشيخان وغيرهما. وبه استدل صديق حسن خان في ` نزل الأبرار `
(ص
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: যখন তোমাদের কেউ তার ভাইয়ের সাথে সাক্ষাৎ করে, তখন সে যেন তাকে সালাম দেয়। অতঃপর যদি তাদের দুজনের মাঝে কোনো গাছ, দেয়াল অথবা পাথর আড়াল সৃষ্টি করে, এরপর আবার যখন তার সাথে সাক্ষাৎ হয়, তখনও যেন সে তাকে সালাম দেয়।
187 - ` تعلم كتاب اليهود، فإني لا آمنهم على كتابنا `.
رواه أبو داود (3645) والترمذي (2 / 119) والحاكم (1 / 75) وصححه
وأحمد (5 / 186) والفاكهي في ` حديثه ` (1 / 14 / 2) واللفظ له، كلهم
عن عبد الرحمن بن أبي الزناد عن أبيه عن خارجه بن زيد عن أبيه قال:
` لما قدم النبي صلى الله عليه وسلم المدينة، أتي بي إليه، فقرأت عليه،
فقال لي.. ` فذكره، قال: فما مر بي خمس عشرة حتى تعلمته، فكنت أكتب للنبي
صلى الله عليه وسلم، وأقرأ كتبهم إليه `.
وقال الترمذي: ` حديث حسن صحيح `.
قلت: وإسناده حسن، وإنما صححه الترمذي لأن له طريقا أخرى، وقد قال
الترمذي عقب ذلك:
` وقد روي من غير هذا الوجه عن زيد بن ثابت، رواه الأعمش، عن ثابت بن عبيد
الأنصاري عن زيد بن ثابت قال:
(أمرني رسول الله صلى الله عليه وسلم أن أتعلم السريانية) `.
قلت: وصله أحمد (5 / 182) والحاكم (3 / 422) عن جرير عن الأعمش به بلفظ:
قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم:
` أتحسن السريانية؟ فقلت: لا، قال: فتعلمها فإنه يأتينا كتب، فتعلمها في
سبعة عشر يوما `.
زاد الحاكم:
` قال الأعمش: كانت تأتيه كتب لا يشتهي أن يطلع عليها إلا من يثق به `.
وقال:
` صحيح إن كان ثابت بن عبيد سمعه من زيد بن ثابت `.
قلت: لا أدري الذي حمل الحاكم على التردد في سماع ثابت إياه من زيد وهو مولاه
ولم يتهم بتدليس! قال ابن حبان في ` الثقات ` (1 / 6) :
` ثابت بن عبيد الأنصاري، كوفي يروي عن عمر وزيد بن ثابت، روى عن ابن سيرين
والأعمش، وهو مولى زيد بن ثابت `:
وقد قيل إن ثابت بن عبيد الأنصاري هو غير ثابت بن عبيد مولى زيد، فرق بينهما
أبو حاتم في ` الجرح والتعديل ` (1 / 1 / 454) ، وعزى الحافظ في ` التهذيب
` هذا التفريق إلى ابن حبان أيضا وهو وهم، بل ما نقلته عن ابن حبان آنفا يدل
عن عدم التفريق وهو الذي اعتمده الحافظ في ` التقريب ` وسواء كان هذا أو ذاك
فكلاهما ثقة، فالسند صحيح.
والحديث علقه البخاري في صحيحه فقال: ` وقال خارجة بن زيد ابن ثابت عن زيد
بن ثابت أن النبي صلى الله عليه وسلم أمره أن يتعلم كتاب اليهود `.
قال الحافظ ابن حجر في شرحه (13 / 161) :
` وقد وصله مطولا في (كتاب التاريخ) `.
ثم ذكر ابن حجر الطريق الأخرى التي علقها الترمذي ثم قال:
` وهذا الطريق وقعت لي بعلو في ` فوائد هلال الحفار `.
وأخرجه أحمد وإسحاق في ` مسنديهما `، وأبو بكر بن أبي داود في
` كتاب المصاحف ` وأبو يعلى، وعنده: إني أكتب إلى قوم فأخاف أن يزيدوا علي
وينقصوا فتعلم السريانية. فذكره.
وله طريق أخرى أخرجها ابن سعد. وفي كل ذلك رد على من زعم أن عبد الرحمن
بن أبي الزناد تفرد به. نعم لم يروه عن أبيه عن خارجة إلا عبد الرحمن.
فهو تفرد نسبي. وقصة ثابت يمكن أن تتحد مع قصة خارجة، فإن من لازم تعلم
كتابة اليهود تعلم لسانهم، ولسانهم السريانية، لكن المعروف أن لسانهم
العبرانية، فيحتمل أن زيدا تعلم اللسانين لاحتياجه إلى ذلك `.
قلت: وهذا الحديث في معنى الحديث المتداول على الألسنة: ` من تعلم لسان قوم
أمن من مكرهم ` لكن لا أعلم له أصلا بهذا اللفظ، ولا ذكره أحد ممن ألف في
الأحاديث المشتهرة على الألسنة، فكأنه إنما اشتهر في الأزمنة المتأخرة.
যায়েদ ইবনে সাবেত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম মদীনায় আগমন করলেন, আমাকে তাঁর কাছে আনা হলো। আমি তাঁকে ক্বিরাআত (কুরআন) পড়ে শোনালাম। তখন তিনি আমাকে বললেন:
**"তুমি ইহুদিদের কিতাব (লিপি) শিখে নাও, কারণ আমি তাদের ওপর আমাদের কিতাবের (লেখার) বিষয়ে নিরাপদ মনে করি না।"**
তিনি (যায়েদ) বলেন: পনেরো দিনও পেরোয়নি, এর মধ্যে আমি তা শিখে ফেললাম। এরপর আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের জন্য লিখতাম এবং তাদের (ইহুদিদের) পক্ষ থেকে আসা চিঠিগুলো তাঁকে পড়ে শোনাতাম।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাকে সুরইয়ানী (Syriac) ভাষা শিখতে নির্দেশ দিয়েছিলেন।
অপর এক বর্ণনায় যায়েদ ইবনে সাবেত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাকে বললেন, "তুমি কি সুরইয়ানী (ভাষা) ভালো জানো?" আমি বললাম, "না।" তিনি বললেন, "তাহলে তা শিখে নাও, কারণ আমাদের কাছে (বিদেশি) চিঠি আসে।" এরপর আমি সতেরো দিনের মধ্যে তা শিখে নিলাম।
188 - ` انقضي شعرك واغتسلي. أي في الحيض `.
رواه ابن أبي شيبة في ` المصنف ` (1 / 26 / 1) : أنبأنا وكيع عن هشام عن أبيه
عن عائشة أن النبي صلى الله عليه وسلم قال لها في الحيض: فذكره.
وأخرجه ابن ماجه (641) من طريق ابن أبي شيبة وعلي بن محمد قالا: حدثنا
وكيع به.
قلت: وهذا سند صحيح على شرط الشيخين. وهو عندهما في أثناء حديث عائشة في
قصة حيضها في حجة الوداع وأن النبي صلى الله عليه وسلم قال لها:
` انقضي رأسك وامتشطي وأمسكي عن عمرتك.. الحديث وليس فيه ` واغتسلي ` وهي
زيادة صحيحة بهذا السند الصحيح، وسياق الشيخين، يقتضيها ضمنا، وإن لم يصرح
بها لفظا. ولعل هذا هو وجه استدراك السندي على البوصيري قوله في ` الزوائد `
: ` وهذا إسناد رجاله ثقات `
فقال السندي ` قلت: ليس الحديث من الزوائد،
بل هو في الصحيحين وغيرهما `.
وأقول: ولكل وجهة، فالسندي راعى المعنى الذي يقتضيه السياق كما أشرت إليه.
والبوصيري راعى اللفظ، ولا شك أنه بهذه الزيادة ` واغتسلي ` إنما هو من
الزوائد على الشيخين، ولذلك أورده البوصيري، وتكلم في إسناده ووثقه.
وكان عليه أن يصرح بصحته كما فعل المجد ابن تيمية في ` المنتقى ` والله
الموفق.
ولا تعارض بين الحديث وبين ما رواه أبو الزبير عن عبيد بن عمير قال:
` بلغ عائشة أن عبد الله بن عمرو يأمر النساء إذا اغتسلن أن ينقضن رؤوسهن،
فقالت: يا عجبا لابن عمرو هذا، يأمر النساء إذا اغتسلن أن ينقضن رؤوسهن!
أفلا يأمرهن أن يحلقن رؤوسهن؟ ! لقد كنت أغتسل أنا ورسول الله صلى الله عليه
وسلم من إناء واحد، ولا أزيد على أن أفرغ على رأسي ثلاث إفراغات `.
أخرجه مسلم (1 / 179) وابن أبي شيبة (1 / 24 /
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁকে (মাসিকের পর) বললেন:
"তুমি তোমার চুল খুলে দাও এবং গোসল করো।"
[এই ঘটনার বিপরীতে, গোসলের সাধারণ নিয়ম সম্পর্কে অন্য বর্ণনায় এসেছে:]
উবাইদ ইবনে উমাইর (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে খবর পৌঁছাল যে, আবদুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মহিলাদেরকে নির্দেশ দেন যে তারা যখন (অপবিত্রতার) গোসল করবে, তখন যেন চুল খুলে দেয় (বা বিনুনি খুলে ফেলে)।
তখন তিনি (আয়েশা) বললেন: এই ইবনে আমরের জন্য আশ্চর্য! তিনি নারীদের নির্দেশ দেন যেন তারা গোসলের সময় তাদের চুল খুলে ফেলে! তিনি কি তবে তাদের মাথা কামিয়ে ফেলার নির্দেশ দেবেন না?!
আমি এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একই পাত্র থেকে গোসল করতাম, আর আমি আমার মাথায় তিনবার পানি ঢালার বেশি করতাম না (অর্থাৎ চুল না খুলেই গোসল করতাম)।
189 - ` لا إنما يكفيك إن تحثي على رأسك ثلاث حثيات ثم تفيضين عليك فتطهرين `.
رواه مسلم (رقم 178) وأصحاب السنن الأربعة وأبو علي الحسين ابن محمد
اللحياني في ` حديثه ` (ق 123 / 1) وابن أبي شيبة والبيهقي (1 / 181)
وأحمد (6 / 289 و
উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন,) “না, এর বেশি নয়। বরং তোমার জন্য এটাই যথেষ্ট যে, তুমি তোমার মাথায় তিনবার পানি ঢেলে দেবে, অতঃপর তোমার সারা শরীরে পানি প্রবাহিত করবে। এর দ্বারাই তুমি পবিত্রতা অর্জন করবে।”
190 - ` لا خير فيها، هي من أهل النار. يعني امرأة تؤذي جيرانها بلسانها `.
رواه البخاري في ` الأدب المفرد ` (رقم 119) وابن حبان (2054) والحاكم
(4 / 166) وأحمد (2 / 440) وأبو بكر محمد ابن أحمد المعدل في ` الأمالي `
(6 /
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
“তার মধ্যে কোনো কল্যাণ নেই; সে জাহান্নামবাসী হবে।” (অর্থাৎ এমন মহিলা যে তার প্রতিবেশীদেরকে নিজের জিহ্বা (কটূ কথা) দ্বারা কষ্ট দেয়।)
191 - ` كان يصوم في السفر ويفطر، ويصلي ركعتين لا يدعهما، يقول: لا يزيد عليهما
. يعني الفريضة `.
أخرجه الطحاوي (1 / 333) وأحمد (1 / 402 و 407) من طريق حماد عن إبراهيم
عن علقمة عن ابن مسعود مرفوعا.
قلت: وهذا سند جيد، وهو على شرط مسلم وحماد هو ابن أبي سليمان الفقيه
وفيه كلام لا يضر، والحديث صحيح قطعا بشقيه، أما قصر الصلاة ففيه أحاديث
كثيرة مشهورة عن جماعة من الصحابة فلا نطيل الكلام بذكرها. وأما الصوم في
السفر، فقد بدرت من الصنعاني في ` سبل السلام ` كلمة نفى فيها أن يكون النبي
صلى الله عليه وسلم صام في السفر فرضا فقال (2 / 34) :
ثبت عنه صلى الله عليه وسلم أنه لم يتم رباعية في سفر، ولا صام فيه فرضا `!
ولهذا توجهت الهمة إلى ذكر بعض الأحاديث التي تدل على خطأ النفي المذكور،
فأقول:
ورد صومه صلى الله عليه وسلم في السفر عن جماعة من الصحابة منهم عبد الله
بن مسعود. وعبد الله بن عباس وأنس بن مالك، وأبو الدرداء.
ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সফরে সাওম (রোযা) পালন করতেন এবং (কখনও) সাওম ভঙ্গও করতেন। আর তিনি দুই রাকাত সালাত আদায় করতেন, যা তিনি কখনও ছাড়তেন না। তিনি বলতেন: তিনি এই দুই রাকাতের উপর বাড়াতেন না। এর দ্বারা উদ্দেশ্য হলো ফরয সালাত।
192 - ` هي رخصة ـ يعني الفطر في السفر ـ من الله، فمن أخذ بها فحسن، ومن أحب أن
يصوم، فلا جناح عليه `.
رواه مسلم (3 / 145) والنسائي (1 / 317) والبيهقي (4 / 243) من طريق
أبي مراوح عن حمزة بن عمرو الأسلمي رضي الله عنه أنه قال:
` يا رسول الله! أجد بي قوة على الصيام في السفر، فهل علي جناح؟ فقال رسول
الله صلى الله عليه وسلم ... ` فذكره.
قال مجد الدين بن تيمية في ` المنتقى `:
` وهو قوي الدلالة على فضيلة الفطر `.
قلت: ووجه الدلالة قوله في الصائم ` فلا جناح عليه `، أي: لا إثم عليه،
فإنه يشعر بمرجوحية الصيام كما هو ظاهر، لاسيما مع مقابلته بقوله في الفطر
` فحسن `، لكن هذا الظاهر غير مراد عندي، والله أعلم، وذلك لأن رفع الجناح
في نص ما عن أمر ما، لا يدل إلا على أنه يجوز فعله وأنه لا حرج على فاعله،
وأما هل هذا الفعل مما يثاب عليه فاعله أو لا، فشيء آخر لا يمكن أخذه من النص
ذاته بل من نصوص أخرى خارجة عنه، وهذا شيء معروف عند من تتبع الأمور التي ورد
رفع الجناح عن فاعلها وهي على قسمين:
أ - قسم منها يراد بها رفع الحرج فقط مع استواء الفعل والترك، وهذا هو
الغالب، ومن أمثلته قوله صلى الله عليه وسلم:
` خمس من الدواب ليس على المحرم في قتلهن جناح: الغراب، والحدأة، والفأرة
والعقرب، والكلب العقور `.
হামযা ইবনে আমর আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন:
"হে আল্লাহর রাসূল! আমি সফরে রোযা রাখার শক্তি অনুভব করি। তাহলে আমার ওপর কি কোনো দোষ হবে?"
তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন:
"এটা (অর্থাৎ সফরে রোযা ভঙ্গ করা) আল্লাহ্র পক্ষ থেকে একটি ছাড় (সুযোগ)। অতএব, যে ব্যক্তি এই ছাড় গ্রহণ করে, তবে তা উত্তম। আর যে ব্যক্তি রোযা রাখতে পছন্দ করে, তার ওপর কোনো দোষ নেই।"
193 - ` خمس من الدواب ليس على المحرم في قتلهن جناح: الغراب، والحدأة، والفأرة
والعقرب، والكلب العقور `.
أخرجه الشيخان ومالك وأصحاب السنن الأربعة إلا الترمذي والدارمي (2 / 36)
والبيهقي وأحمد (2 / 8، 32، 37، 48، 52، 54، 65، 82، 138)
من طرق
عن ابن عمر مرفوعا به.
ومن الواضح أن المراد من رفع الجناح في هذا الحديث هو تجويز القتل، ولا يفهم
منه أن القتل مستحب أو واجب أو تركه أولى.
ب - وقسم يراد به رفع الحرج عن الفعل، مع كونه في نفسه مشروعا له فضيلة، بل
قد يكون واجبا، وإنما يأتي النص برفع الحرج في هذا القسم دفعا لوهم أو زعم من
قد يظن الحرج في فعله، ومن أمثلة هذا ما روى الزهري عن عروة قال:
` سألت عائشة رضي الله عنها؟ فقلت لها: أرأيت قول الله تعالى (إن الصفا
والمروة من شعائر الله، فمن حج البيت أو اعتمر فلا جناح عليه أن يطوف بهما)
فوالله ما على أحد جناح أن لا يطوف بالصفا والمروة! قالت: بئس ما قلت يا ابن
أختي، إن هذه لو كانت كما أولتها عليه كانت ` لا جناح عليه أن لا يطوف بهما `
! ولكنها أنزلت في الأنصار، كانوا قبل أن يسلموا يهلون لمناة الطاغية التي
كانوا يعبدونها عند المشلل، فكان من أهل يتحرج أن يطوف بالصفا والمروة، فلما
أسلموا سألوا رسول الله صلى الله عليه وسلم عن ذلك، قالوا: يا رسول الله إنا
كنا نتحرج أن نطوف بالصفا والمروة، فأنزل الله: (إن الصفا والمروة من
شعائر الله فمن حج البيت أو اعتمر فلا جناح عليه أن يطوف بهما) ، قالت عائشة
رضي الله عنها: وقد سن رسول الله صلى الله عليه وسلم الطواف بينهما، فليس
لأحد أن يترك الطواف بينهما `.
أخرجه البخاري (1 / 414) وأحمد (6 / 144، 227) .
إذا تبين هذا فقوله صلى الله عليه وسلم في الحديث ` ومن أحب أن يصوم فلا جناح
عليه `، لا يدل إلا على رفع الإثم عن الصائم، وليس فيه ما يدل على ترجيح
الإفطار على الصيام،
ولكن إذا كان من المعلوم أن صوم رمضان في السفر عبادة
بدليل صيامه صلى الله عليه وسلم فيه، فمن البدهي حينئذ أنه أمر مشروع حسن،
وإذا كان كذلك فإن وصف الإفطار في الحديث بأنه حسن، لا يدل على أنه أحسن من
الصيام، لأن الصيام أيضا حسن كما عرفت، وحينئذ فالحديث لا يدل على أفضلية
الفطر المدعاة، بل على أنه والصيام متماثلان.
ويؤكد ذلك حديث حمزة بن عمرو من رواية عائشة رضي الله عنها: أن حمزة بن عمرو
الأسلمي سأل رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله إني رجل أسرد
الصوم، فأصوم في السفر؟ قال:
` صم إن شئت، وأفطر إن شئت `.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
পাঁচ প্রকারের প্রাণী রয়েছে, যাদেরকে হত্যা করলে ইহরামকারী ব্যক্তির কোনো পাপ হয় না: কাক, চিল, ইঁদুর, বিচ্ছু এবং হিংস্র কুকুর।
[টীকা:] এই হাদীসে ‘পাপ নেই’ (رفع الجناح) বলার উদ্দেশ্য স্পষ্টতই হলো—হত্যা করা বৈধ। এর দ্বারা এটা বোঝা যায় না যে হত্যা করা মুস্তাহাব বা ওয়াজিব, কিংবা হত্যা না করা উত্তম।
খ) [দ্বিতীয় প্রকারের] একটি অংশ হচ্ছে, যার দ্বারা কোনো কাজ করার উপর থেকে দ্বিধা বা সঙ্কোচ দূর করা হয়, যদিও কাজটি নিজ গুণে শরীয়তসম্মত ও উত্তম, এমনকি কখনো কখনো তা ওয়াজিবও হতে পারে। এই ধরনের ক্ষেত্রে দ্বিধা বা সঙ্কোচের ধারণা দূর করার জন্যই নসে (কুরআন-হাদীসের বক্তব্যে) পাপ না হওয়ার কথা আসে। এর একটি উদাহরণ হলো—যূহরী (রাহিমাহুল্লাহ) উরওয়া (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন:
আমি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম, আমি কি আল্লাহ তাআলার এই বাণী সম্পর্কে আপনার মতামত জানতে পারি: "(নিশ্চয়ই সাফা ও মারওয়া আল্লাহর নিদর্শনসমূহের অন্তর্ভুক্ত। অতএব যে ব্যক্তি কা’বা গৃহের হজ বা ওমরাহ করে, তার জন্য এই দু’টির প্রদক্ষিণ করাতে কোনো পাপ নেই।)" (সূরা বাকারা: ১৫৮)। [উরওয়া বললেন,] আল্লাহর কসম! আমার কাছে মনে হয়, যদি কেউ সাফা ও মারওয়া তাওয়াফ না করে, তবে তার কোনো পাপ হবে না! (কারণ আল্লাহ বলেছেন ’পাপ নেই’ তাওয়াফ করলে।)
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আমার ভাগ্নে! তুমি কতই না খারাপ কথা বললে! যদি এর অর্থ সেটাই হতো যা তুমি ব্যাখ্যা করলে, তবে অবশ্যই আয়াতে বলা হতো: "তার জন্য এই দু’টির প্রদক্ষিণ ’না’ করাতে কোনো পাপ নেই!" বরং এই আয়াতটি আনসারদের সম্পর্কে নাযিল হয়েছিল। তারা ইসলাম গ্রহণের আগে মুশাল্লালের নিকটবর্তী তাগূত ’মানাআত’-এর জন্য ইহরাম বাঁধত, যার তারা ইবাদত করত। যারা এর জন্য ইহরাম বাঁধত, তারা সাফা ও মারওয়া প্রদক্ষিণ করতে দ্বিধা বা সঙ্কোচবোধ করত। যখন তারা ইসলাম গ্রহণ করল, তখন তারা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এ বিষয়ে জিজ্ঞেস করল। তারা বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমরা তো সাফা ও মারওয়া তাওয়াফ করতে দ্বিধাবোধ করতাম। তখন আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: "(নিশ্চয়ই সাফা ও মারওয়া আল্লাহর নিদর্শনসমূহের অন্তর্ভুক্ত। অতএব যে ব্যক্তি কা’বা গৃহের হজ বা ওমরাহ করে, তার জন্য এই দু’টির প্রদক্ষিণ করাতে কোনো পাপ নেই।)" আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তো এই দু’টির মধ্যে প্রদক্ষিণ করাকে সুন্নাত হিসেবে প্রতিষ্ঠিত করে দিয়েছেন। সুতরাং, কারো জন্যই তাওয়াফ (সা’ঈ) ছেড়ে দেওয়া উচিত নয়।
যখন এটা স্পষ্ট হলো, তখন হাদীসে তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই বাণী: “আর যে রোযা রাখতে পছন্দ করে, তার কোনো পাপ নেই”—এটা কেবল রোযাদার ব্যক্তির উপর থেকে গুনাহ তুলে নেওয়ার প্রমাণ দেয়। এর দ্বারা সিয়াম (রোযা) এর উপর ইফطارকে (রোযা ভাঙাকে) প্রাধান্য দেওয়া হয়—এমন কিছু প্রমাণিত হয় না। তবে যখন এটা জানা যে, সফর অবস্থায় রমযানের রোযা রাখা একটি ইবাদত (যেমনটি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম নিজেও সফরে রোযা রেখেছেন), তখন এটা স্পষ্ট যে রোযা রাখা একটি শরীয়তসম্মত ও উত্তম কাজ। যদি তাই হয়, তবে হাদীসে ইফطارকে ’উত্তম’ বলে আখ্যায়িত করা হলেও, এর দ্বারা সিয়াম থেকে তা অধিক উত্তম প্রমাণিত হয় না। কেননা, সিয়ামও উত্তম, যেমনটি আপনি জানতে পারলেন। অতএব, এই হাদীসটি দাবিকৃতভাবে ইফতারের শ্রেষ্ঠত্বের প্রমাণ দেয় না, বরং তা (রোযা রাখা এবং রোযা ভাঙা) উভয়ই সমতুল্য।
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
এই বিষয়টি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কর্তৃক বর্ণিত হামযাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস দ্বারাও সমর্থিত হয়। হামযাহ ইবনে আমর আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে জিজ্ঞেস করলেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি এমন একজন লোক যে ধারাবাহিকভাবে রোযা রাখে, আমি কি সফরেও রোযা রাখব?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তুমি চাইলে রোযা রাখো, আর চাইলে রোযা ভেঙ্গে দাও।"
194 - ` صم إن شئت، وأفطر إن شئت `.
أخرجه الشيخان وغيرهما من أصحاب الستة وابن أبي شيبة (2 / 150 / 1) وعنه
أبو حفص الكناني في ` الأمالي ` (17 / 1) .
قلت: فخيره صلى الله عليه وسلم بين الأمرين، ولم يفضل له أحدهما على الآخر،
والقصة واحدة، فدل على أن الحديث ليس فيه الأفضلية المذكورة.
ويقابل هذه الدعوى قول الشيخ علي القاري في ` المرقاة ` أن الحديث دليل على
أفضلية الصوم. ثم تكلف في توجيه ذلك.
والحق أن الحديث يفيد التخيير لا التفضيل، على ما ذكرناه من التفصيل.
نعم يمكن الاستدلال لتفضيل الإفطار على الصيام بالأحاديث التي تقول:
` إن الله يحب أن تؤتى رخصه كما يكره أن تؤتى معصيته. (وفي رواية) : كما
يحب أن تؤتى عزائمه `.
وهذا لا مناص من القول به، لكن يمكن أن يقيد ذلك بمن لا يتحرج بالقضاء،
وليس عليه حرج في الأداء، وإلا عادت الرخصة عليه بخلاف المقصود. فتأمل.
وأما حديث ` من أفطر (يعني في السفر) فرخصة، ومن صام فالصوم أفضل `.
فهو حديث شاذ لا يصح. والصواب أنه موقوف على أنس كما بينته في ` الأحاديث
الضعيفة ` (رقم 936) ، ولو صح لكان نصا في محل النزاع، لا يقبل الخلاف،
وهيهات، فلابد حينئذ من الاجتهاد والاستنباط، وهو يقتضى خلاف ما أطلقه
هذا الحديث الموقوف، وهو التفصيل الذي ذكرته. والله الموفق.
(এই আলোচনাটি একটি ফিকহী পর্যালোচনা যেখানে একটি হাদীস ও তৎসম্পর্কিত মতামতসমূহ বিশ্লেষণ করা হয়েছে। মূল হাদীসের পাঠটি হলো:)
**(হাদীসের মূল পাঠ: তুমি চাইলে রোযা রাখো, আর চাইলে রোযা ভেঙ্গে দাও।)**
এই হাদিসটি শাইখান (বুখারী ও মুসলিম) সহ অন্যান্য সিহাহ সিত্তার সংকলকগণ এবং ইবনে আবি শাইবাহ (২/১৫০/১) বর্ণনা করেছেন। তাঁর (ইবনে আবি শাইবাহ) সূত্রে এটি আবু হাফস আল-কিনানী তাঁর ‘আল-আমালী’ (১৭/১) গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন।
আমি (পর্যালোচক) বলি: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম এই দুটি বিষয়ের মধ্যে (রোযা রাখা ও না রাখার) এখতিয়ার দিয়েছেন, কিন্তু একটিকে অন্যটির উপর প্রাধান্য দেননি। যেহেতু ঘটনাটি একই, তাই এই হাদিসে উল্লেখিত কোনো শ্রেষ্ঠত্ব বা অগ্রাধিকার প্রমাণিত হয় না।
এই দাবির বিপরীতে রয়েছে শায়খ আলী আল-কারী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর ‘আল-মিরকাত’ গ্রন্থে প্রদত্ত বক্তব্য যে, এই হাদিসটি সিয়ামের শ্রেষ্ঠত্বের প্রমাণ দেয়। এরপর তিনি এর সমর্থনে কঠিন ব্যাখ্যা প্রদান করেছেন।
তবে সত্য হলো, আমরা যে বিস্তারিত আলোচনা করেছি, সেই অনুযায়ী হাদিসটি প্রাধান্য নয়, বরং এখতিয়ার প্রদান করে।
হ্যাঁ, ওইসব হাদিস দ্বারা সিয়ামের উপর ইফতারকে (রোযা ভাঙাকে) অগ্রাধিকার দেওয়ার পক্ষে যুক্তি দেওয়া যেতে পারে, যেখানে বলা হয়েছে: "আল্লাহ তাআলা যেমন তাঁর নির্ধারিত গুনাহের কাজ করাকে অপছন্দ করেন, তেমনি তাঁর প্রদত্ত ছাড় (রুখসত) গ্রহণ করাকে ভালোবাসেন।" (অন্য বর্ণনায় এসেছে): "যেমন তিনি তাঁর দৃঢ় বিধান (আযাইম) পালন করাকে ভালোবাসেন।"
এ কথা অস্বীকার করার উপায় নেই, তবে এটিকে ওই ব্যক্তির সাথে সীমাবদ্ধ করা যেতে পারে, যার জন্য পরে কাযা আদায় করতে কোনো অসুবিধা হবে না এবং বর্তমানে রোযা রাখতেও কোনো কষ্ট হবে না। অন্যথায়, তার জন্য রুখসত (ছাড়) গ্রহণ উদ্দেশ্য থেকে ভিন্ন ফল নিয়ে আসবে। সুতরাং, (বিষয়টি) গভীরভাবে চিন্তা করো।
আর এই হাদিসটি: "যে ব্যক্তি ইফতার করলো (অর্থাৎ সফরে রোযা ভাঙলো) তা তার জন্য একটি ছাড় (রুখসত), আর যে রোযা রাখলো, সেই রোযা রাখাটিই উত্তম।" এটি একটি শায (বিরল) হাদিস, যা সহীহ নয়। সঠিক কথা হলো, এটি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিজস্ব বক্তব্য (মাওকুফ)। যেমনটি আমি ‘আহাদীস আদ-দাঈফাহ’ (দুর্বল হাদিসসমূহ, ক্রমিক ৯৩৬) গ্রন্থে বর্ণনা করেছি। যদি এটি সহীহ হতো, তাহলে এটি বিতর্কের স্থানে স্পষ্ট দলীল হতো এবং কোনো মতপার্থক্য গ্রহণযোগ্য হতো না। কিন্তু আফসোস! (যেহেতু তা নয়) তাই এই ক্ষেত্রে ইজতিহাদ ও ইসতিনবাত (গভীর গবেষণা ও সিদ্ধান্ত গ্রহণ) অপরিহার্য। আর এই মাওকুফ হাদিসটি সাধারণভাবে যা নির্দেশ করে, তার বিপরীতেই আমার পূর্বে উল্লিখিত বিস্তারিত ব্যাখ্যা প্রয়োজন। আল্লাহই তাওফীকদাতা।
195 - ` إن الله يبغض كل جعظرى جواظ، سخاب في الأسواق، جيفة بالليل، حمار بالنهار
عالم بأمر الدنيا، جاهل بأمر الآخرة `.
رواه بن حبان في ` صحيحه ` (
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা এমন প্রতিটি ব্যক্তিকে ঘৃণা করেন (বা অপছন্দ করেন) যে অহংকারী ও দাম্ভিক, যে বাজারে উচ্চস্বরে চেঁচামেচি করে বেড়ায়, যে রাতে মৃত লাশের মতো (বেহুঁশ হয়ে ঘুমিয়ে থাকে) এবং দিনে গাধার মতো (কেবল পার্থিব শ্রমে) ব্যস্ত থাকে; যে দুনিয়ার বিষয়ে খুবই বিজ্ঞ, কিন্তু আখিরাতের বিষয়ে সম্পূর্ণ অজ্ঞ।
196 - ` كان يقول في دبر كل صلاة مكتوبة ` حين يسلم `: لا إله إلا الله وحده لا شريك
له، له الملك وله الحمد ` يحيي ويميت، وهو حي لا يموت بيده الخير `، وهو
على كل
شيء قدير ` ثلاث مرات `، اللهم لا مانع لما أعطيت، ولا معطي لما منعت
ولا ينفع ذا الجد منك الجد `.
رواه البخاري (2 /
মুগীরাহ ইবনু শু‘বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
তিনি (রাসূলুল্লাহ ﷺ) প্রত্যেক ফরয সালাতের শেষে সালাম ফিরানোর সময় বলতেন:
"আল্লাহ্ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই। তিনি এক, তাঁর কোনো শরীক নেই। রাজত্ব তাঁরই এবং সকল প্রশংসা তাঁরই প্রাপ্য। তিনি জীবন দান করেন ও মৃত্যু দেন। আর তিনি চিরঞ্জীব, তাঁর মৃত্যু নেই। তাঁর হাতেই সকল কল্যাণ। আর তিনি সকল কিছুর উপর ক্ষমতাবান।" (এটি তিনি তিনবার বলতেন)।
"হে আল্লাহ্, আপনি যা দান করেন, তা রোধ করার ক্ষমতা কারো নেই। আর আপনি যা রোধ করেন, তা দেওয়ার ক্ষমতা কারো নেই। আর আপনার সামনে ধন-সম্পদশালীর ধন-সম্পদ কোনো কাজে আসবে না।"
197 - ` إذا رأيتني على مثل هذه الحالة فلا تسلم علي، فإنك إذا فعلت ذلك لم أرد
عليك `.
رواه بن ماجه (1 / 145 / 146) وابن أبي حاتم في ` العلل ` (1 / 34) عن
عيسى بن يونس عن هاشم بن البريد عن عبد الله بن محمد بن عقيل عن جابر بن عبد
الله ` أن رجلا مر على النبي صلى الله عليه وسلم وهو يبول فسلم عليه، فقال
رسول الله صلى الله عليه وسلم ... ` الحديث.
وقال ابن أبي حاتم عن أبيه:
` لا أعلم روى هذا الحديث أحد غير هاشم بن البريد `.
قلت: وهو ثقة، ولا يضره أنه رمي بالتشيع، ولهذا قال البوصيري في
` الزوائد ` (ق 27 / 2) :
` هذا إسناد حسن `.
قلت: وظاهر الحديث أنه صلى الله عليه وسلم قال ذلك وهو يبول، ففيه دليل على
جواز الكلام على الخلاء، والحديث الوارد في أن الله يمقت على ذلك مع أنه لا
يصح من قبل إسناده، فهو غير صريح فيه فإنه بلفظ:
` لا يتناجى اثنان على غائطهما، ينظر كل منهما إلى عورة صاحبه، فإن الله يمقت
على ذلك `.
فهذا النص إنما يدل على تحريم هذه الحالة وهي التحدث مع النظر إلى العورة،
وليس فيه أن التحدث وحده - وإن كان في نفسه مستهجنا - مما يمقته الله تبارك
وتعالى، بل هذا لابد له من دليل يقتضي تحريمه وهو شيء لم نجده، بخلاف
تحريم النظر إلى العورة، فإن تحريمه ثابت في غير ما حديث.
ثم رأيت للحديث شاهدا من حديث ابن عمر بهذا اللفظ نحوه.
أخرجه ابن الجارود في ` المنتقى ` (
জাবের ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের পাশ দিয়ে অতিক্রম করার সময় তাঁকে সালাম দেয়, যখন তিনি পেশাব করছিলেন। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন:
"যখন তুমি আমাকে এই ধরনের অবস্থায় দেখবে, তখন আমাকে সালাম দেবে না। কারণ, যদি তুমি তা করো, তাহলে আমি তোমার সালামের উত্তর দেব না।"
198 - ` من نسي أن يذكر الله في أول طعامه فليقل حين يذكر: بسم الله في أوله وآخره
فإنه يستقبل طعاما جديدا، ويمنع الخبيث ما كان يصيب منه `.
رواه ابن حبان في ` صحيحه ` (
হাদিসে বর্ণিত আছে যে, যে ব্যক্তি তার খাবারের শুরুতে আল্লাহ্র নাম (বিসমিল্লাহ) নিতে ভুলে যায়, সে যখন স্মরণ করে, তখন যেন বলে: **’বিসমিল্লাহি ফি আওওয়ালিহি ওয়া আখিরিহি’** (আল্লাহ্র নামে, এর শুরুতে এবং এর শেষে)। কারণ এর দ্বারা সে নতুনভাবে খাবার শুরু করে এবং এর ফলে শয়তান যা কিছু অংশ লাভ করছিল, তা থেকে তাকে বিরত রাখা হয়।
199 - ` ما أصاب أحدا قط هم ولا حزن، فقال: اللهم إني عبدك وابن عبدك وابن أمتك
ناصيتي بيدك ماض في حكمك عدل في قضاؤك، أسألك بكل اسم هو لك سميت به نفسك،
أو علمته أحدا من خلقك، أو أنزلته في كتابك، أو استأثرت به في علم الغيب عندك
أن تجعل القرآن ربيع قلبي ونور صدري وجلاء حزني وذهاب همي. إلا أذهب الله
همه وحزنه وأبدله مكانه فرجا. قال: فقيل: يا رسول الله ألا نتعلمها؟ فقال
بلى ينبغي لمن سمعها أن يتعلمها `.
رواه أحمد (3712) والحارث بن أبي أسامة في مسنده (ص 251 من زوائده)
وأبو يعلى (ق 156 / 1) والطبراني في ` الكبير ` (3 / 74 / 1) وابن حبان
في ` صحيحه ` (2372) والحاكم (1 / 509) من طريق فضيل بن مرزوق حدثنا
أبو سلمة الجهني عن القاسم بن عبد الرحمن عن أبيه عن عبد الله قال:
قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره.
وقال الحاكم:
` حديث صحيح على شرط مسلم، إن سلم من إرسال عبد الرحمن بن عبد الله عن أبيه،
فإنه مختلف في سماعه من أبيه `.
وتعقبه الذهبي بقوله:
` قلت: وأبو سلمة لا يدري من هو ولا رواية له في الكتب الستة `.
قلت: وأبو سلمة الجهني ترجمه الحافظ في ` التعجيل ` وقال:
` مجهول. قاله الحسيني. وقال مرة: لا يدري من هو. وهو كلام الذهبي في
` الميزان `، وقد ذكره ابن حبان في ` الثقات `، وأخرج حديثه في ` صحيحه `،
وقرأت بخط الحافظ بن عبد الهادي: يحتمل أن يكون خالد بن سلمة.
قلت: وهو بعيد لأن خالدا مخزومي وهذا جهني `.
قلت: وما استبعده الحافظ هو الصواب، لما سيأتي، ووافقه على ذلك الشيخ أحمد
شاكر رحمه الله تعالى في تعليقه على المسند (5 / 267) وأضاف إلى ذلك قوله:
` وأقرب منه عندي أن يكون هو ` موسى بن عبد الله أو ابن عبد الجهني ويكنى أبا
سلمة، فإنه من هذه الطبقة `.
قلت: وما استقر به الشيخ هو الذي أجزم به بدليل ما ذكره، مع ضميمة شيء آخر
وهو أن موسى الجهني قد روى حديثا آخر عن القاسم بن عبد الرحمن به، وهو
الحديث الذي قبله فإذا ضمت إحدى الروايتين إلى الأخرى ينتج أن الراوي عن القاسم
هو موسى أبو سلمة الجهني، وليس في الرواة من اسمه موسى الجهني إلا موسى بن
عبد الله الجهني وهو الذي يكنى بأبي سلمة وهو ثقة من رجال مسلم، وكأن
الحاكم رحمه الله أشار إلى هذه الحقيقة حين قال في الحديث ` صحيح على شرط مسلم
... ` فإن معنى ذلك أن رجاله رجال مسلم ومنهم أبو سلمة الجهني ولا يمكن أن
يكون كذلك إلا إذا كان هو موسى بن عبد الله الجهني. فاغتنم هذا التحقيق فإنك
لا تراه في غير هذا الموضع. والحمد لله على توفيقه.
بقي الكلام على الانقطاع الذي أشار إليه الحاكم، وأقره الذهبي عليه، وهو
قوله:
` إن سلم من إرسال عبد الرحمن بن عبد الله عن أبيه ... `.
قلت: هو سالم منه، فقد ثبت سماعه منه بشهادة جماعة من الأئمة، منهم سفيان
الثوري وشريك القاضي وابن معين والبخاري وأبو حاتم، وروى البخاري في
` التاريخ الصغير ` بإسناد لا بأس به عن القاسم بن عبد الرحمن بن عبد الله
بن مسعود عن أبيه قال:
` لما حضر عبد الله الوفاة، قال له ابنه عبد الرحمن: يا أبت أوصني، قال:
ابك من خطيئتك `.
فلا عبرة بعد ذلك بقول من نفى سماعه منه، لأنه لا حجة لديه على ذلك إلا عدم
العلم بالسماع، ومن علم حجة على من يعلم.
والحديث قال الهيثمي في ` المجمع ` (10 / 136) :
` رواه أحمد وأبو يعلى والبزار والطبراني ورجال أحمد رجال الصحيح غير
أبي سلمة الجهني وقد وثقه ابن حبان `!
قلت: وقد عرفت مما سبق من التحقيق أنه ثقة من رجال مسلم وأن اسمه موسى
بن عبد الله. ولم ينفرد بهذا الحديث بل تابعه عبد الرحمن بن إسحاق عن القاسم
بن عبد الله بن مسعود به، لم يذكر عن أبيه.
أخرجه محمد بن الفضل بن غزوان الضبي في ` كتاب الدعاء ` (ق 2 /
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:
যখনই কোনো বান্দাকে কোনো দুশ্চিন্তা বা মনোকষ্ট স্পর্শ করে, আর সে বলে:
**"আল্লাহুম্মা ইন্নি আবদুক, ওয়াবনু আবদিক, ওয়াবনু আমাতিক। নাসিয়াতী বিয়াদিক, মা-দ্বিন ফিয়্যা হুকমুক, আ’দলুন ফী কাযা-উক। আসআলুকা বিকুল্লি ইসমিন হুয়া লাকা সাম্মাইতা বিহী নাফসাক, আও আল্লামতাহু আহাদান মিন খালকিক, আও আন্যালতাহু ফী কিতাবিক, আও ইসতা’ছারতা বিহী ফী ইলমিল গাইবি ইন্দাক; আন তাজ‘আলাল কুরআনা রাবী‘আ ক্বালবী, ওয়া নূরা সাদরী, ওয়া জালা-আ হুযনী, ওয়া যাহাবা হাম্মী।"**
(অর্থ: "হে আল্লাহ! আমি আপনার বান্দা, আপনার বানস্যের সন্তান এবং আপনার দাসীর সন্তান। আমার ভাগ্য আপনার হাতে। আমার উপর আপনার বিধান কার্যকর, আপনার বিচার ন্যায়সঙ্গত। আমি আপনার কাছে আপনার সেই সকল নামের মাধ্যমে প্রার্থনা করি, যা দ্বারা আপনি নিজেকে নামকরণ করেছেন, অথবা আপনার সৃষ্টির কাউকে তা শিখিয়েছেন, অথবা আপনার কিতাবে তা নাযিল করেছেন, অথবা আপনার নিকট গায়বের জ্ঞানে গোপন করে রেখেছেন—যেন আপনি কুরআনকে আমার হৃদয়ের বসন্ত, আমার বক্ষের জ্যোতি, আমার দুঃখ দূরকারী এবং আমার দুশ্চিন্তা বিদূরণকারী বানিয়ে দেন।")
তবে আল্লাহ অবশ্যই তার দুশ্চিন্তা ও মনোকষ্ট দূর করে দেন এবং তার স্থলে প্রশান্তি দান করেন।
রাবী বলেন, অতঃপর (সাহাবীরা) জিজ্ঞেস করলেন: "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমরা কি এই (দোয়াটি) শিখবো না?" তিনি বললেন: "হ্যাঁ, যে-ই এটি শুনবে, তার উচিত এটি শিখে নেওয়া।"
200 - ` نهى عن الصلاة بعد العصر إلا والشمس مرتفعة `.
رواه أبو داود (1 / 200) والنسائي (1 / 97) وعنه ابن حزم في ` المحلى `
(3 / 31) وأبو يعلى في ` مسنده ` (1 / 119) وابن حبان في ` صحيحه `
(621،
622) وابن الجارود في ` المنتقى ` (281) والبيهقي (2 / 458)
والطيالسي (1 /
মুয়াবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আসরের পর সালাত আদায় করতে নিষেধ করেছেন, তবে যখন সূর্য উঁচু (ও উজ্জ্বল) অবস্থায় থাকে (তখন ব্যতিক্রম)।