সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ
2541 - ` اللهم أكثر ماله وولده وأطل عمره واغفر له. يعني أنسا رضي الله عنه `.
أخرجه أبو يعلى في ` مسنده ` (3 / 1048) : حدثنا أبو الربيع الزهراني أخبرنا
حماد ابن زيد عن سنان بن ربيعة عن أنس بن مالك قال: انطلقت بي أمي إلى
رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالت: يا رسول الله! خويدمك فادع الله له.
فقال: (فذكره) قال: فكثر مالي، وطال عمري حتى قد استحييت من أهلي،
وأينعت ثماري (!) ، وأما الرابعة يعني المغفرة. قلت: وهذا إسناد جيد،
رجاله ثقات رجال الشيخين غير سنان بن ربيعة، فأخرج له البخاري مقرونا بغيره،
وقال الحافظ: ` صدوق فيه لين `. وأخرجه البخاري في ` الأدب المفرد ` (653
) من طريق سعيد بن زيد عن سنان به نحوه، وفيه أنه قال: ` فدعا لي بثلاث،
فدفنت مائة وثلاثة، وإن ثمرتي لتطعم في السنة مرتين، وطالت حياتي حتى
استحييت من الناس، وأرجو المغفرة `. وترجم له بـ ` باب من دعا بطول العمر `
. وأصله في ` صحيح البخاري ` (11 /
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার মা আমাকে নিয়ে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গেলেন এবং বললেন, ‘হে আল্লাহর রাসূল! এ আপনার ছোট খাদেম (সেবক), আপনি তার জন্য আল্লাহর কাছে দু‘আ করুন।’
তখন তিনি (রাসূল সাঃ) দু‘আ করলেন:
"হে আল্লাহ! তার ধন-সম্পদ ও সন্তান-সন্ততিকে প্রাচুর্য দান করুন, তার জীবন দীর্ঘ করুন এবং তাকে ক্ষমা করে দিন।"
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, "ফলে আমার ধন-সম্পদ প্রচুর হলো, আর আমার জীবন এত দীর্ঘ হলো যে, আমি আমার পরিবারের (পরবর্তী প্রজন্মের) সামনে লজ্জিত বোধ করতাম এবং আমার ফলমূল প্রাচুর্যময় হলো। আর চতুর্থ বিষয়টি (অর্থাৎ আল্লাহর ক্ষমা) আমি (দৃঢ়ভাবে) আশা করি।"
2542 - ` يا سعد! اتق أن تجيء يوم القيامة ببعير تحمله له رغاء `.
أخرجه البزار في ` مسنده ` (ص
সা‘দ ইবনে আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইরশাদ করেছেন:
“হে সা‘দ! সতর্ক হও, ক্বিয়ামাতের দিন তুমি যেন এমন একটি উট বহন করে না নিয়ে আসো, যার গোঙানির আওয়াজ থাকবে।”
2543 - ` لا يفتح الإنسان على نفسه باب مسألة إلا فتح الله عليه باب فقر، يأخذ الرجل
حبله فيعمد إلى الجبل فيحتطب على ظهره فيأكل به خير له من أن يسأل الناس معطى
أو ممنوعا `.
أخرجه أحمد (2 / 418) : حدثنا قتيبة قال: حدثنا عبد العزيز بن محمد عن
العلاء - يعني - ابن عبد الرحمن عن أبيه عن أبي هريرة أن رسول الله صلى
الله عليه وسلم قال: فذكره. قلت: وهذا إسناد صحيح على شرط مسلم، وصححه
ابن حبان (
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
কোনো ব্যক্তি নিজের জন্য চাওয়ার (ভিক্ষা বা প্রার্থনার) দরজা খুলে দিলে আল্লাহ তার জন্য দারিদ্র্যের একটি দরজা খুলে দেন। কোনো ব্যক্তি তার রশি নিয়ে পাহাড়ের দিকে যাবে এবং নিজের পিঠে কাঠ বহন করে এনে তা দ্বারা জীবিকা নির্বাহ করবে—এটা তার জন্য উত্তম মানুষের কাছে চাওয়া অপেক্ষা, চাই তারা তাকে দিক বা না দিক।
2544 - ` بقي كلها غير كتفها `.
أخرجه الترمذي (2 / 77) وأحمد (6 / 50) عن يحيى بن سعيد عن سفيان عن أبي
إسحاق عن أبي ميسرة عن عائشة: أنهم ذبحوا شاة، فقال النبي صلى الله عليه
وسلم: ما بقي منها؟ قالت: ما بقي منها إلا كتفها. قال: ... فذكره. وقال
الترمذي:
حديث صحيح، وأبو ميسرة هو الهمداني، اسمه عمرو بن شرحبيل `. قلت
: هو ثقة عابد مخضرم من رجال الشيخين، وكذلك سائر رجاله ثقات من رجال الشيخين
، وأبو إسحاق هو عمرو بن عبد الله السبيعي، وهو وإن كان رمي بالتدليس
والاختلاط، فإن سفيان - وهو الثوري - سمع منه قبل الاختلاط، ولعله كان لا
يروي عنه إلا ما صرح بالتحديث كشعبة، فقد قالوا: الثوري أثبت الناس فيه.
وللحديث طريق أخرى، وشاهد من حديث أبي هريرة. أما الطريق، فأخرجه أبو نعيم
في ` الحلية ` (5 / 23) : حدثنا محمد بن إسحاق بن إبراهيم حدثنا موسى بن
إسحاق القاضي الأنصاري حدثنا عيسى بن عثمان حدثنا عمي يحيى بن عيسى حدثنا
الأعمش عن طلحة عن مسروق عنها قالت: أهدي لنا شاة مشوية، فقسمتها إلا كتفها،
فلما جاء رسول الله صلى الله عليه وسلم ذكرت له. فقال: ` بقي لكم إلا كتفها `
، وقال: ` غريب من حديث الأعمش عن طلحة، تفرد به يحيى بن عيسى `. قلت:
وهو النهشلي الفاخوري، وهو صدوق يخطىء، واحتج به مسلم. وعيسى بن عثمان هو
النهشلي الكسائي، وهو صدوق من شيوخ الترمذي. وموسى بن إسحاق الأنصاري
القاضي، قال ابن أبي حاتم (4 / 1 / 135) : ` سمعت عنه، وهو ثقة صدوق `.
قلت: فالسند حسن لولا أنني لم أجد لشيخ أبي نعيم ترجمة الآن. وأما الشاهد،
فقال البزار (ص
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,
তাঁরা একটি বকরী যবেহ করেছিলেন। অতঃপর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম জিজ্ঞেস করলেন: এর কতটুকু অবশিষ্ট রয়েছে? তিনি (আয়িশা) বললেন: এর কাঁধের অংশটুকু ছাড়া আর কিছুই অবশিষ্ট নেই। তখন তিনি বললেন: (বরং) এর কাঁধের অংশটুকু ছাড়া পুরোটাই (আল্লাহর কাছে) অবশিষ্ট রইলো।
2545 - ` إن الله تبارك وتعالى لا يقبل توبة عبد كفر بعد إسلامه `.
أخرجه أحمد (4 / 446 و 5 / 2 و 3) من طريق أبي قزعة الباهلي عن حكيم بن
معاوية عن أبيه قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم: فذكره. قلت: وهذا
إسناد صحيح، رجاله كلهم ثقات، واسم أبي قزعة سويد بن حجير.
وفي لفظ له:
` لا يقبل الله عز وجل من أحد توبة أشرك بعد إسلامه `. وتابعه عليه بهز بن
حكيم عن أبيه به، إلا أنه قال: ` عملا ` مكان: ` توبة `. أخرجه أحمد (5 /
5) . قلت: وبهز ثقة حجة، لاسيما في روايته عن أبيه، وفيها ما يفسر رواية
أبي قزعة، ويزيل الإشكال الوارد على ظاهرها، فهي في ذلك كقوله تعالى: * (إن
الذين كفروا بعد إيمانهم ثم ازدادوا كفرا لن تقبل توبتهم) * (آل عمران: 90)
ولذلك أشكلت على كثير من المفسرين، لأنها بظاهرها مخالفة لما هو معلوم من
الدين بالضرورة من قبول توبة الكافر، ومن الأدلة على ذلك قوله تعالى قبل
الآية المذكورة: * (كيف يهدي الله قوما كفروا بعد إيمانهم) * إلى قوله: * (
أولئك جزاؤهم أن عليهم لعنة الله والملائكة والناس أجمعين. خالدين فيها ...
) * إلى قوله: * (إلا الذين تابوا من بعد ذلك وأصلحوا فإن الله غفور رحيم) * (
آل عمران:
মুয়াবিয়া ইবনে হাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:
"নিশ্চয় আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তা’আলা এমন কোনো বান্দার তাওবা কবুল করেন না, যে ইসলাম গ্রহণের পর কুফরি করেছে।"
অপর এক বর্ণনায় এসেছে:
"আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা এমন কোনো ব্যক্তির তাওবা কবুল করেন না, যে ইসলাম গ্রহণের পর শির্ক করেছে।"
2546 - ` اشووا لنا منه، فقد بلغ محله `.
أخرجه أبو يعلى (2 / 796) ومن طريقه الضياء في ` الأحاديث المختارة ` (ق
194 / 2) : حدثنا محمد بن يحيى بن أبي سمينة السامي أخبرنا وكيع عن شعبة عن
قتادة عن أنس: أن النبي صلى الله عليه وسلم دخل بيت عائشة فرأى لحما،
فقال: اشووا لنا منه. فقالوا يا رسول الله! إنها صدقة. فقال رسول الله صلى
الله عليه وسلم ... ` فذكره. قلت: وهذا إسناد صحيح رجاله ثقات رجال الشيخين
غير ابن أبي سمينة وهو التمار البغدادي، ثقة. ولكني لم أجد من قال فيه (
السامي) (¬2) . والله أعلم ثم رواه (2 / 823) من طريق أبي داود قال: أنبأنا
شعبة به نحوه بلفظ: ` هو عليها صدقة، ولنا هدية `. وهو بهذا اللفظ في `
الصحيحين ` وغيرهما.
¬_________
(¬1) أخرجه في تفسيره (6 / 579 رقم
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ঘরে প্রবেশ করলেন এবং সেখানে কিছু গোশত দেখতে পেলেন। তিনি বললেন, “আমাদের জন্য তা থেকে কিছু ভুনা করো।” উপস্থিত লোকেরা বলল, “হে আল্লাহর রাসূল! এটি তো সাদাকা (দানের গোশত)।” তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন, “এটি তার (যার জন্য সাদাকা দেওয়া হয়েছে, তার) জন্য সাদাকা, আর আমাদের জন্য হাদিয়া (উপহার)।”
2547 - ` إن الله إذا استودع شيئا حفظه `.
أخرجه النسائي في ` عمل اليوم ` (509) وابن حبان (
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:
নিশ্চয় আল্লাহ তাআলার কাছে যখন কোনো জিনিস আমানত রাখা হয়, তখন তিনি সেটিকে সংরক্ষণ করেন।
2548 - ` ما من ذي رحم يأتي رحمه فيسأله فضلا أعطاه الله إياه فيبخل عليه إلا أخرج له
يوم القيامة من جهنم حية يقال لها: شجاع، يتلمظ، فيطوق به `.
أخرجه الطبراني في ` الكبير ` (1 / 235 /
আব্দুল্লাহ ইবন আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
"এমন কোনো রক্তসম্পর্কীয় আত্মীয় নেই, যে তার অপর আত্মীয়ের কাছে এসে আল্লাহ প্রদত্ত অতিরিক্ত সম্পদ (বা অনুগ্রহ) চায়, আর সে (দাতা) তার প্রতি কৃপণতা করে—তবে অবশ্যই কিয়ামতের দিন জাহান্নাম থেকে তার জন্য এমন একটি সাপ বের করা হবে, যার নাম হলো ‘শুজা’ (ভয়ঙ্কর সাপ)। সেটি জিহ্বা বের করে চাটতে থাকবে এবং তাকে (কৃপণ ব্যক্তিকে) পেঁচিয়ে ধরবে (গলায় বেষ্টন করে নেবে)।"
2549 - ` أحسن ابن الخطاب `.
أخرجه أحمد (5 / 368) : حدثنا محمد بن جعفر حدثنا شعبة عن الأزرق بن قيس عن
عبد الله بن رباح عن رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم: أن رسول الله صلى
الله عليه وسلم صلى العصر، فقام رجل يصلي، فرآه عمر، فقال له: اجلس، فإنما
هلك أهل الكتاب أنه لم يكن لصلاتهم فصل. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:
فذكره. قلت: وهذا إسناد صحيح رجاله ثقات رجال البخاري، وجهالة الصحابي لا
تضر، وهو أبو رمثة كما في رواية أبي داود (1007) من طريق المنهال بن خليفة
عن الأزرق بن قيس به نحوه. والمنهال ضعيف. وللحديث شاهد من حديث معاوية رضي
الله عنه أن النبي صلى الله عليه وسلم أمر أن لا توصل صلاة بصلاة حتى يتكلم أو
يخرج. رواه مسلم وغيره، وهو مخرج في ` صحيح أبي داود ` (1034) . والحديث
نص صريح في تحريم المبادرة إلى صلاة السنة بعد الفريضة دون تكلم أو خروج، كما
يفعله كثير من الأعاجم وبخاصة منهم الأتراك، فإننا نراهم في الحرمين الشريفين
لا يكاد الإمام يسلم من الفريضة إلا بادر هؤلاء من هنا وهناك قياما إلى السنة
! وفي الحديث فائدة أخرى هامة، وهي جواز الصلاة بعد العصر، لأنه لو كان غير
جائز، لأنكر ذلك على الرجل أيضا كما هو ظاهر، وهو مطابق لما ثبت عن النبي
صلى الله عليه وسلم أنه كان يصلي بعد العصر ركعتين، ويدل على أن ذلك ليس من
خصوصياته صلى الله عليه وسلم، وما صح عنه صلى الله عليه وسلم أنه قال: ` لا
صلاة بعد العصر حتى تغرب الشمس ` محمول على ما إذا كانت الشمس مصفرة، لأحاديث
صحت مقيدة
بذلك. وقد سبق تخريج بعضها مع الكلام عليها من الناحية الفقهية تحت
الحديث (200 و 314) .
জনৈক সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আসরের সালাত আদায় করলেন। অতঃপর এক ব্যক্তি দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করতে শুরু করল। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে দেখে বললেন, "বসো! কিতাবধারীরা (পূর্ববর্তী ধর্মাবলম্বীরা) তো কেবল এ কারণেই ধ্বংস হয়েছিল যে, তাদের এক সালাত থেকে আরেক সালাতের মধ্যে কোনো বিরতি (ব্যবধান) ছিল না।" তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামও অনুরূপ কথা বললেন।
2550 - ` يا أيها الناس! لا ترفعوني فوق قدري، فإن الله اتخذني عبدا قبل أن يتخذني
نبيا `.
أخرجه الحاكم (3 / 179) من طريق علي بن قادم: حدثنا عبد السلام بن حرب عن
يحيى ابن سعيد قال: كنا عند علي بن الحسين فجاء قوم من الكوفيين، فقال
علي: يا أهل العراق أحبونا حب الإسلام، سمعت أبي يقول: قال رسول الله صلى
الله عليه وسلم: فذكره. فذكرته لسعيد بن المسيب، فقال: وبعدما اتخذه نبيا
. وقال: ` صحيح الإسناد `. ووافقه الذهبي. قلت: وهو كما قالا.
হুসাইন ইবনু আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "হে লোক সকল! আমাকে আমার মর্যাদার চেয়ে বেশি বাড়িয়ে দিও না। কারণ আল্লাহ আমাকে নবী হিসেবে গ্রহণ করার পূর্বে বান্দা হিসেবেই গ্রহণ করেছেন।"
2551 - ` ما من يوم أكثر من أن يعتق الله فيه عبدا من النار من يوم عرفة وإنه ليدنو،
ثم يباهي بهم الملائكة، فيقول: ما أراد هؤلاء؟ `.
أخرجه مسلم (4 / 107) والنسائي (2 / 44) وفي ` الكبرى ` أيضا (ق 83 / 1
) وابن ماجه (3014) والدارقطني في ` سننه ` (ص 289) وكذا البيهقي (5 /
118) وابن عساكر في جزء ` فضل عرفة ` (ق 2 / 2) كلهم من طريق مخرمة بن بكير
عن أبيه قال: سمعت يونس بن يوسف يحدث عن سعيد بن المسيب عن عائشة أن رسول
الله صلى الله عليه وسلم قال: فذكره.
(تنبيه) : قد وقع لبعض العلماء بعض
الأوهام في متن الحديث، فوجب بيانها ليكون القراء على حذر منها: أولا: قال
المنذري في ` الترغيب ` (2 / 129) بعدما عزاه لمسلم والنسائي وابن ماجه: `
وزاد رزين في ` جامعه ` فيه: اشهدوا ملائكتي! أني قد غفرت لهم `. فأقول:
هذه الزيادة لا أصل لها في شيء من روايات الحديث التى وقفت عليها، وقد ذكرت
آنفا مخرجيها، وإنما رويت هذه الزيادة من حديث جابر رضي الله عنه، لكن فيه
عنعنة أبي الزبير، مع الاختلاف عليه في لفظه، ولذلك أوردته في الكتاب الآخر
(679) وهو شاهد قوي لحديث الترجمة، دون قوله: ` فيقول: ما أراد هؤلاء؟ `
، وفيه: ` ينزل الله إلى السماء الدنيا `، بدل قوله: ` وإنه ليدنو `.
وإنا لنعهد من رزين أنه كثيرا ما يخلط بين حديث وحديث يختلفان في المخرج،
فيسوق أحدهما ثم يضم إليه زيادة من حديث آخر، دون أن يشير إلى ذلك، وقد تكون
زيادة لا أصل لها في شيء من طرق الحديث. والله أعلم. ثانيا: أورد السيوطي
حديث الترجمة في ` الجامع الكبير ` من رواية مسلم والنسائي وابن ماجه أيضا
بلفظ: ` عبدا أو أمة `. فهذه الزيادة ` أو أمة ` لا أصل لها أيضا عندهم،
ولا عند غيرهم ممن أخرج الحديث. وانطلى أمرها على صاحب ` الفتح الكبير في ضم
الزيادة إلى الجامع الصغير `، وعلي أيضا حينما جعلت ` الفتح ` قسمين: ` صحيح
الجامع الصغير وزيادته ` و ` ضعيف الجامع الصغير وزيادته `، فأوردت الحديث
في القسم الأول برقم (5672) ، فمن كان عنده فليعلق عليه بما يدل على أن هذه
الزيادة لا أصل لها.
ثالثا: جاء الحديث في ` الترغيب ` (2 /
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:
আরাফাতের দিনের চেয়ে এমন কোনো দিন নেই, যেদিন আল্লাহ তাআলা এত বেশি বান্দাকে জাহান্নামের আগুন থেকে মুক্তি দেন। আর নিশ্চয়ই তিনি (আল্লাহ) নিকটবর্তী হন, অতঃপর তিনি (হাজিদের) নিয়ে ফেরেশতাদের কাছে গর্ব করেন (বাহা করেন)। তিনি জিজ্ঞেস করেন: এরা কী চেয়েছে?
2552 - ` إن الله عز وجل أنزل: * (ومن لم يحكم بما أنزل الله فأولئك هم الكافرون) *
و* (أولئك هم الظالمون) * و * (أولئك هم الفاسقون) *. قال ابن عباس: أنزلها
الله في الطائفتين من اليهود، وكانت إحداهما قد قهرت الأخرى في الجاهلية حتى
ارتضوا واصطلحوا على أن كل قتيل قتله (العزيزة) من (الذليلة) فديته خمسون
وسقا، وكل قتيل قتله (الذليلة) من (العزيزة) فديته مائة وسق، فكانوا على
ذلك، حتى قدم النبي صلى الله عليه وسلم المدينة، فذلت الطائفتان كلتاهما
لمقدم رسول الله صلى الله عليه وسلم، ويؤمئذ لم يظهر ولم يوطئهما عليه (¬1)
وهو في الصلح، فقتلت الذليلة من العزيزة قتيلا، فأرسلت (العزيزة) إلى (
الذليلة) أن ابعثوا إلينا بمائة وسق، فقالت (الذليلة) : وهل كان هذا في
حيين قط دينهما واحد، ونسبهما واحد، وبلدهما واحد، دية بعضهم نصف دية بعض
؟ ! إنا إنما أعطيناكم هذا ضيما
¬_________
(¬1) لفظ الطبراني: ` ورسول الله صلى الله عليه وسلم يؤمئذ لم يظهر عليهم ولم
يوطئهما، وهو الصلح `. اهـ.
منكم لنا، وفرقا منكم، فأما إذ قدم محمد فلا
نعطيكم ذلك، فكادت الحرب تهيج بينهما، ثم ارتضوا على أن يجعلوا رسول الله
صلى الله عليه وسلم بينهما، ثم ذكرت (العزيزة) فقالت: والله ما محمد
بمعطيكم منهم ضعف ما يعطيهم منكم، ولقد صدقوا، ما أعطونا هذا إلا ضيما منا
وقهرا لهم، فدسوا إلى محمد من يخبر لكم رأيه، إن أعطاكم ما تريدون حكمتموه
وإن لم يعطكم حذرتم فلم تحكموه. فدسوا إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم ناسا
من المنافقين ليخبروا لهم رأي رسول الله صلى الله عليه وسلم، فلما جاء رسول
الله صلى الله عليه وسلم أخبر الله رسوله بأمرهم كله وما أرادوا، فأنزل الله
عز وجل: * (يا أيها الرسول لا يحزنك الذين يسارعون في الكفر من الذين قالوا:
آمنا) * إلى قوله: * (ومن لم يحكم بما أنزل الله فأولئك هم الفاسقون) *، ثم
قال: فيهما والله نزلت، وإياهما عنى الله عز وجل `.
أخرجه أحمد (1 / 246) والطبراني في ` المعجم الكبير ` (3 / 95 / 1) من
طريق عبد الرحمن بن أبي الزناد عن أبيه عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة بن
مسعود عن ابن عباس قال: فذكره. وعزاه السيوطي في ` الدر المنثور ` (2 /
281) لأبي داود أيضا وابن جرير وابن المنذر وأبي الشيخ وابن مردويه عن ابن
عباس، وهو عند ابن جرير في ` التفسير ` (12037 ج 10 / 352) من هذا الوجه،
لكنه لم يذكر في إسناده ابن عباس. وعند أبي داود (3576) نزول الآيات الثلاث
في اليهود خاصة في قريظة والنضير. فقط خلافا لما يوهمه قول ابن كثير في `
التفسير ` (6 / 160) بعد ما ساق رواية أحمد هذه المطولة: ` ورواه أبو داود
من حديث ابن أبي الزناد عن أبيه نحوه `!
وقد نقل عنه صاحب ` الروض الباسم في
الذب عن سنة أبي القاسم ` أنه حسن إسناده. ولم أر هذا في كتابه: ` التفسير `
، فلعله في بعض كتبه الأخرى. وتحسين هذا الإسناد هو الذي تقتضيه قواعد هذا
العلم الشريف، فإن مداره على عبد الرحمن بن أبي الزناد، وهو كما قال الحافظ
: ` صدوق، تغير حفظه لما قدم بغداد، وكان فقيها `. فقول الهيثمي (7 / 16)
: ` رواه أحمد والطبراني بنحوه، وفيه عبد الرحمن بن أبي الزناد، وهو ضعيف
، وقد وثق، وبقية رجال أحمد ثقات `. قلت: فقوله فيه: ` ضعيف، وقد وثق `
ليس بجيد لأنه يرجح قول من ضعفه على قول من وثقه، والحق أنه وسط حسن الحديث،
إلا أن يخالف وهذا مما لا يستفاد من قوله المذكور فيه. والله أعلم. (فائدة
هامة) : إذا علمت أن الآيات الثلاث: * (ومن لم يحكم بما أنزل الله فأولئك هم
الكافرون) *، * (فأولئك هم الظالمون) *، * (فأولئك هم الفاسقون) * نزلت في
اليهود وقولهم في حكمه صلى الله عليه وسلم: ` إن أعطاكم ما تريدون حكمتموه،
وإن لم يعطكم حذرتم فلم تحكموه `، وقد أشار القرآن إلى قولهم هذا قبل هذه
الآيات فقال: * (يقولون إن أوتيتم هذا فخذوه، وإن لم تؤتوه فاحذروا) *، إذا
عرفت هذا، فلا يجوز حمل هذه الآيات على بعض الحكام المسلمين وقضاتهم الذين
يحكمون بغير ما أنزل الله من القوانين الأرضية، أقول: لا يجوز تكفيرهم بذلك،
وإخراجهم من الملة إذا كانوا مؤمنين بالله ورسوله، وإن كانوا مجرمين بحكمهم
بغير ما أنزل الله، لا يجوز ذلك، لأنهم وإن كانوا كاليهود من جهة حكمهم
المذكور، فهم مخالفون لهم من جهة
أخرى، ألا وهي إيمانهم وتصديقهم بما أنزل
الله، بخلاف اليهود الكفار، فإنهم كانوا جاحدين له كما يدل عليه قولهم
المتقدم: ` ... وإن لم يعطكم حذرتموه فلم تحكموه `، بالإضافة إلى أنهم ليسوا
مسلمين أصلا، وسر هذا أن الكفر قسمان: اعتقادي وعملي. فالاعتقادي مقره
القلب. والعملي محله الجوارح. فمن كان عمله كفرا لمخالفته للشرع، وكان
مطابقا لما وقر في قلبه من الكفر به، فهو الكفر الاعتقادي، وهو الكفر الذي
لا يغفره الله، ويخلد صاحبه في النار أبدا. وأما إذا كان مخالفا لما وقر في
قلبه، فهو مؤمن بحكم ربه، ولكنه يخالفه بعمله، فكفره كفر عملي فقط، وليس
كفرا اعتقاديا، فهو تحت مشيئة الله تعالى إن شاء عذبه، وإن شاء غفر له،
وعلى هذا النوع من الكفر تحمل الأحاديث التي فيها إطلاق الكفر على من فعل شيئا
من المعاصي من المسلمين، ولا بأس من ذكر بعضها:
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
নিশ্চয়ই আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্ল নাযিল করেছেন: "আর যারা আল্লাহ যা নাযিল করেছেন তদনুসারে বিচার করে না, তারা কাফির" (সূরা মায়েদা ৫:৪৪), "তারা যালিম" (সূরা মায়েদা ৫:৪৫), এবং "তারা ফাসিক" (সূরা মায়েদা ৫:৪৭)।
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আল্লাহ তাআলা এই আয়াতগুলো ইয়াহুদিদের দুটি দলের ব্যাপারে নাযিল করেছেন। জাহেলিয়াতের যুগে তাদের এক দল অন্য দলের উপর আধিপত্য বিস্তার করেছিল। এক পর্যায়ে তারা এই মর্মে সমঝোতা ও সন্ধি করেছিল যে, ক্ষমতাবান দলটি (আল-‘আযীযা) দুর্বল দলের (আয-যালীলা) কোনো লোককে হত্যা করলে তার দিয়াত হবে পঞ্চাশ ওয়াসাক (খেজুর), আর দুর্বল দলটি ক্ষমতাবান দলের কোনো লোককে হত্যা করলে তার দিয়াত হবে একশ’ ওয়াসাক। তারা এই চুক্তিতেই ছিল, যতক্ষণ না নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম মদীনায় আগমন করলেন।
রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর আগমনের কারণে উভয় দলই (সাময়িকভাবে) দুর্বল হয়ে পড়ল। তখনো তিনি তাদের ওপর (পুরোপুরি) কর্তৃত্ব প্রতিষ্ঠা করেননি এবং সেই চুক্তির ওপর তাদের স্থিতিশীলও রাখেননি। এমন সময় দুর্বল দলটি ক্ষমতাবান দলের একজনকে হত্যা করল। তখন ক্ষমতাবান দলটি দুর্বল দলের কাছে বার্তা পাঠাল যে, তোমরা আমাদের একশ’ ওয়াসাক (খেজুর) পাঠিয়ে দাও। দুর্বল দলটি বলল: একই ধর্ম, একই বংশ এবং একই দেশের দুটি দলের মধ্যে কি কখনো এমন হয়েছে যে, তাদের কারো দিয়াত অন্যের দিয়াতের অর্ধেক হবে?! আমরা তো তোমাদেরকে এই চুক্তি দিয়েছিলাম তোমাদের পক্ষ থেকে আমাদের প্রতি জুলুমের কারণে এবং তোমাদের ভয়ে। এখন যখন মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আগমন করেছেন, তখন আমরা তোমাদেরকে তা আর দেব না। এতে তাদের মাঝে যুদ্ধ বেঁধে যাওয়ার উপক্রম হলো।
এরপর তারা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে বিচারক মানতে রাজি হলো। তখন ক্ষমতাবান দলটি নিজেদের মধ্যে আলোচনা করে বলল: আল্লাহর কসম, মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তোমাদের কাছ থেকে তাদের দ্বিগুণ দিয়াত আদায় করে দেবেন না, যা তারা তোমাদের থেকে আদায় করে। তারা (দুর্বল দলটি) সত্যই বলেছে, তারা তো আমাদেরকে এই চুক্তি দিয়েছিল আমাদের পক্ষ থেকে তাদের প্রতি জুলুম ও তাদের ওপর আমাদের কর্তৃত্বের কারণে। অতএব, তোমরা মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এমন লোক পাঠাও যারা তোমাদের জন্য তাঁর সিদ্ধান্ত জানতে পারবে। যদি তিনি তোমাদের চাওয়ামতো ফয়সালা দেন, তবে তোমরা তাঁকে বিচারক হিসেবে মেনে নেবে। আর যদি তা না দেন, তবে সতর্ক থাকবে এবং তাঁকে বিচারক হিসেবে মানবে না। অতঃপর তারা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর কাছে তাঁর সিদ্ধান্ত জানার জন্য কিছু মুনাফিক লোককে পাঠাল।
যখন তারা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর কাছে এলো, তখন আল্লাহ তাআলা রাসূলকে তাদের পুরো ব্যাপার এবং তাদের উদ্দেশ্য সম্পর্কে জানিয়ে দিলেন। অতঃপর আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্ল নাযিল করলেন: "হে রাসূল! যারা কুফরের দিকে দ্রুত ধাবিত হয় তাদের জন্য আপনি চিন্তিত হবেন না— যারা মুখে বলেছে, ‘আমরা ঈমান এনেছি’..." থেকে শুরু করে তাঁর বাণী: "...আর যারা আল্লাহ যা নাযিল করেছেন তদনুসারে বিচার করে না, তারা ফাসিক" পর্যন্ত।
(ইবনে আব্বাস) এরপর বললেন: আল্লাহর কসম! এই আয়াতগুলো তাদের দুজনের ব্যাপারেই নাযিল হয়েছে এবং আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্ল তাদের উদ্দেশ্যেই (এগুলো) বলেছেন।
2553 - ` من خرج حاجا فمات كتب الله له أجر الحاج إلى يوم القيامة، ومن خرج معتمرا
فمات كتب الله له أجر المعتمر إلى يوم القيامة، ومن خرج غازيا في سبيل الله
فمات كتب الله له أجر الغازي إلى يوم القيامة `.
أخرجه أبو يعلى في ` مسنده ` (4 / 1505) : حدثنا إبراهيم بن زياد - سبلان - :
أخبرنا أبو معاوية أخبرنا محمد بن إسحاق عن جميل بن أبي ميمونة عن عطاء بن يزيد
الليثي عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره.
وتابع أبا يعلى، الحافظ الطبراني في ` الأوسط ` (2 / 24 / 2 / 5454) : حدثنا
محمد ابن السري قال: أخبرنا إبراهيم بن زياد - سبلان - به. وقال: ` تفرد به
أبو معاوية `. ومن طريقه أخرجه ابن أبي حاتم في ` العلل ` (1 /
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:
"যে ব্যক্তি হজ্জের উদ্দেশ্যে বের হয় এবং পথেই মৃত্যুবরণ করে, আল্লাহ তাআলা তার জন্য কিয়ামত দিবস পর্যন্ত হাজ্জের সাওয়াব লিপিবদ্ধ করে দেন। আর যে ব্যক্তি উমরার উদ্দেশ্যে বের হয় এবং পথেই মৃত্যুবরণ করে, আল্লাহ তাআলা তার জন্য কিয়ামত দিবস পর্যন্ত উমরার সাওয়াব লিপিবদ্ধ করে দেন। আর যে ব্যক্তি আল্লাহর রাস্তায় (জিহাদের উদ্দেশ্যে) গাজি হিসেবে বের হয় এবং পথেই মৃত্যুবরণ করে, আল্লাহ তাআলা তার জন্য কিয়ামত দিবস পর্যন্ত গাজীর সাওয়াব লিপিবদ্ধ করে দেন।"
2554 - ` ما خالط قلب امرئ مسلم رهج (¬1) في سبيل الله إلا حرم الله عليه النار `.
¬_________
(¬1) أي: الغبار. اهـ.
أخرجه أحمد (6 / 85) : حدثنا أبو اليمان قال: حدثنا إسماعيل بن عياش عن
الأوزاعي عن عبد الرحمن بن القاسم عن أبيه عن عائشة: أن مكاتبا لها دخل
عليها ببقية مكاتبته، فقالت له: أنت غير داخل علي غير مرتك هذه، فعليك
بالجهاد في سبيل الله، فإني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: فذكره.
قلت: وهذا إسناد صحيح، رجاله كلهم ثقات رجال الشيخين غير إسماعيل بن عياش
وهو ثقة في روايته عن الشاميين، وهذه منها. وقال المنذري (2 / 168) وتبعه
الهيثمي (5 / 276) : ` رواه أحمد، ورواته ثقات `. قلت: وأخرجه ابن أبي
عاصم (ق 84 / 2) من طريق سويد بن عبد العزيز: حدثنا الأوزاعي به. قلت:
وقد وجدت له طريقا أخرى قد يعتضد به ويقوى، فقال الطبراني في ` الأوسط ` (2 /
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, কোনো মুসলিম ব্যক্তির হৃদয়ে আল্লাহর পথের (জিহাদের) ধূলি বা ধূলিকণা প্রবেশ করলে, আল্লাহ অবশ্যই তার জন্য জাহান্নামের আগুন হারাম করে দেন।
2555 - ` من رمى بسهم في سبيل الله كان له نورا يوم القيامة `.
أخرجه البزار في ` مسنده ` (ص
যে ব্যক্তি আল্লাহর পথে একটি তীর নিক্ষেপ করবে, কিয়ামতের দিন তা তার জন্য নূরে (আলো) পরিণত হবে।
2556 - ` من جرح جرحا في سبيل الله جاء يوم القيامة ريحه ريح المسك ولونه لون
الزعفران عليه طابع الشهداء ومن سأل الله الشهادة مخلصا أعطاه الله أجر شهيد
وإن مات على فراشه `.
أخرجه ابن حبان (
হাদীসে বর্ণিত হয়েছে:
যে ব্যক্তি আল্লাহর পথে কোনো আঘাতপ্রাপ্ত হয়, কিয়ামতের দিন সে এমন অবস্থায় আসবে যে তার ক্ষতস্থানের ঘ্রাণ হবে কস্তুরীর ঘ্রাণের ন্যায় এবং তার রঙ হবে জাফরানের রঙের ন্যায়। তার উপর শহীদদের সীলমোহর থাকবে। আর যে ব্যক্তি আন্তরিকতার সাথে আল্লাহর কাছে শাহাদাত (মৃত্যু) কামনা করে, আল্লাহ তাকে শহীদের সওয়াব দান করেন, যদিও সে নিজ বিছানায় মৃত্যুবরণ করে।
2557 - ` ما من قوم اجتمعوا في مجلس، فتفرقوا ولم يذكروا الله إلا كان ذلك المجلس
حسرة عليهم يوم القيامة `.
أخرجه الطبراني في ` الأوسط ` (مصورة الجامعة الإسلامية 4 / 434) والبيهقي
في ` الشعب ` (1 / 400 / 533) من طريق شداد بن سعيد الراسبي: حدثنا جابر بن
عمرو الراسبي عن عبد الله بن مغفل قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم
: فذكره، وقال: ` لا يروى عن عبد الله بن مغفل إلا بهذا الإسناد `.
قلت:
وهو حسن في الشواهد والمتابعات، فإن جابر بن عمرو، وشداد بن سعيد، وإن
كانا من رجال مسلم ففيهما ضعف من قبل حفظهما، وقال المنذري في ` الترغيب ` (
2 / 236) : ` رواه الطبراني في ` الكبير ` و ` الأوسط `، والبيهقي، ورواة
الطبراني محتج بهم في (الصحيح) `. وقال الهيثمي (10 / 80) : ` رواه
الطبراني في ` الأوسط ` و ` الكبير `، ورجالهما رجال (الصحيح) `. قلت:
وقد تقدمت بعض شواهده من حديث أبي هريرة وغيره، فراجع الأرقام (
আব্দুল্লাহ ইবনে মুগাফ্ফাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:
এমন কোনো সম্প্রদায় নেই যারা কোনো মজলিসে একত্রিত হলো, অতঃপর আল্লাহ্র যিকির (স্মরণ) না করেই সেখান থেকে বিদায় নিলো, কিন্তু কিয়ামতের দিন সেই মজলিসটি তাদের জন্য অবশ্যই আফসোস ও অনুতাপের কারণ হবে।
2558 - ` أفضل الجهاد عند الله يوم القيامة الذين يلقون في الصف الأول فلا يلفتون
وجوههم حتى يقتلوا، أولئك يتلبطون في الغرف العلى من الجنة ينظر إليهم ربك،
إن ربك إذا ضحك إلى قوم فلا حساب عليهم `.
أخرجه الطبراني في ` الأوسط ` (2 /
মু’আয ইবনে জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
আল্লাহ্র নিকট ক্বিয়ামতের দিন শ্রেষ্ঠতম জিহাদ হচ্ছে তাদের জন্য, যারা প্রথম সারিতে শত্রুর মোকাবিলা করে এবং শহীদ হওয়া পর্যন্ত মুখমণ্ডল ফিরিয়ে নেয় না (পিঠ দেখায় না)। তারাই জান্নাতের সুউচ্চ কক্ষসমূহে (গুরফাহ্) আরামদায়ক জীবন যাপন করবে; আপনার রব তাদের প্রতি দৃষ্টিপাত করবেন। নিশ্চয় আপনার রব যখন কোনো দলের প্রতি হাসেন (সন্তুষ্ট হন), তখন তাদের কোনো হিসাব-নিকাশ থাকবে না।
2559 - ` أول ثلة (¬1) يدخلون الجنة الفقراء المهاجرون الذين تتقى بهم المكاره، إذا
أمروا سمعوا وأطاعوا وإن كانت للرجل منهم حاجة إلى السلطان لم تقض له حتى
يموت وهي في صدره، وإن الله عز وجل ليدعو يوم القيامة الجنة فتأتي بزخرفها
وزينتها فيقول: أين عبادي الذين قاتلوا في سبيلي وقوتلوا وأوذوا في سبيلي
وجاهدوا في سبيلي، ادخلوا الجنة، فيدخلونها بغير حساب. وتأتي الملائكة
فيسجدون، فيقولون: ربنا نحن نسبح بحمدك الليل والنهار ونقدس لك، من هؤلاء
الذين آثرتهم علينا؟ فيقول الرب عز وجل: هؤلاء عبادي الذين قاتلوا في سبيلي
وأوذوا في سبيلي، فتدخل عليهم الملائكة من كل باب * (سلام عليكم بما صبرتم فنعم
عقبى الدار) * [الرعد: 24] `.
أخرجه الأصفهاني في ` الترغيب والترهيب ` (ص
জান্নাতে প্রবেশকারী প্রথম দল হবে দরিদ্র মুহাজিরগণ, যাদের মাধ্যমে বিপদ-আপদ দূরীভূত হয়। যখন তাদের কোনো নির্দেশ দেওয়া হয়, তখন তারা তা মনোযোগ দিয়ে শোনে এবং পুরোপুরি মেনে নেয়। যদি তাদের কারো শাসকের কাছে কোনো প্রয়োজন থাকে, তবে তার মৃত্যু হওয়ার পূর্ব পর্যন্ত সেই প্রয়োজন পূরণ হয় না এবং তা তার হৃদয়েই থেকে যায়।
আর কিয়ামতের দিন আল্লাহ তা‘আলা জান্নাতকে আহ্বান করবেন। তখন তা তার সব জমকালো সাজসজ্জা ও অলঙ্কারাদি নিয়ে হাজির হবে। অতঃপর আল্লাহ বলবেন: আমার সেই বান্দারা কোথায়, যারা আমার পথে যুদ্ধ করেছে, যাদেরকে আমার পথে হত্যা করা হয়েছে, আমার পথে কষ্ট দেওয়া হয়েছে এবং আমার পথে জিহাদ করেছে? তোমরা জান্নাতে প্রবেশ করো। তখন তারা বিনা হিসাবে জান্নাতে প্রবেশ করবে।
অতঃপর ফেরেশতারা এসে সিজদায় লুটিয়ে পড়বে এবং বলবে: হে আমাদের রব! আমরা তো দিন-রাত আপনার প্রশংসার সাথে তাসবিহ করি এবং আপনার পবিত্রতা ঘোষণা করি। এরা কারা, যাদের আপনি আমাদের উপর প্রাধান্য দিলেন?
তখন পরাক্রমশালী রব বলবেন: এরাই হলো আমার সেই বান্বারা, যারা আমার পথে যুদ্ধ করেছে এবং আমার পথে কষ্ট ভোগ করেছে।
অতঃপর ফেরেশতারা তাদের কাছে প্রতিটি দরজা দিয়ে প্রবেশ করবে [এবং বলবে]: "তোমাদের প্রতি শান্তি; তোমরা ধৈর্য ধারণ করেছিলে। আর এই (আখিরাতের) আবাস কতই না উত্তম!" (সূরা আর-রাদ: ২৪)।
2560 - ` أين ذهبتم؟! إنما هي يا أيها الذين آمنوا لا يضركم من ضل - من الكفار - إذا
اهتديتم `.
أخرجه أحمد (4 / 129 و
তোমরা কোথায় চলে গেলে?! (বিষয়টি তো এই) যে, "হে মুমিনগণ! যারা পথভ্রষ্ট হয়েছে, (তারা তোমাদের কোনো ক্ষতি করতে পারবে না)—(এই পথভ্রষ্টরা হলো) কাফিরদের মধ্য থেকে—যদি তোমরা নিজেরা সৎপথে (হিদায়াতের উপর) থাকো।"