হাদীস বিএন


সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ





সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2941)


2941 - ` جاءنا رسول الله صلى الله عليه وسلم في مسجدنا بـ (قباء) ، فجئت وأنا غلام
[حدث] حتى جلست عن يمينه، [وجلس أبو بكر عن يساره] ثم دعا بشراب فشرب منه
، ثم أعطانيه، وأنا عن يمينه، فشربت منه، ثم قام يصلي، فرأيته يصلي في
نعليه `.
أخرجه أحمد (4 / 221) وابن أبي عاصم في ` الوحدان ` (4 / 167 / 2148) من
طريق مجمع بن يعقوب: أخبرنا محمد بن إسماعيل قال: قيل لعبد الله بن أبي
حبيبة رضي الله عنه: هل أدركت من رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قال:
فذكره. قلت: وهذا إسناد حسن إن شاء الله تعالى، محمد بن إسماعيل هذا روى
عنه أيضا عاصم بن سويد إمام مسجد قباء كما في ` الجرح والتعديل `، وذكره ابن
حبان في ` الثقات ` (7 / 394) في أتباع التابعين، وكذلك ذكر فيهم الراويين
المذكورين عنه: مجمع بن يعقوب وعاصم بن سويد، وهذا مستغرب منه، لأن الظاهر
أن محمد بن إسماعيل تابعي أدرك جده من قبل أم عبد الله بن أبي حبيبة هذا.
ولذلك قال ابن السكن في ترجمته، أعني عبد الله هذا كما في ` الإصابة `:
`
إسناد حديثه صالح `. ثم ساق له هذا الحديث، وعزاه لابن أبي شيبة أيضا
والبغوي والطبراني. ويؤيد ما ذكرت إخراج الضياء المقدسي للحديث في ` المختارة
` (ج 56 / 136 /




আব্দুল্লাহ ইবনে আবি হাবিবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম ক্বুবা-তে অবস্থিত আমাদের মসজিদে তাশরীফ আনলেন। আমি তখন একজন বালক ছিলাম। আমি এসে তাঁর ডান দিকে বসলাম, আর আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর বাম দিকে বসলেন। এরপর তিনি কোনো পানীয় চাইলেন এবং তা থেকে পান করলেন। এরপর তিনি আমাকে তা দিলেন। আমি যেহেতু তাঁর ডান দিকে ছিলাম, তাই আমিও তা থেকে পান করলাম। এরপর তিনি সালাত আদায়ের জন্য দাঁড়ালেন, আর আমি তাঁকে দেখলাম যে, তিনি তাঁর জুতা পরিহিত অবস্থায় সালাত আদায় করছেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2942)


2942 - ` قال الله عز وجل: أنا عند ظن عبدي، وأنا معه إذا دعاني `.
أخرجه البخاري في ` الأدب المفرد ` (616) : حدثنا خليفة بن خياط قال: حدثنا
كثير بن هشام: حدثنا جعفر عن يزيد بن الأصم عن أبي هريرة عن رسول الله صلى
الله عليه وسلم قال: فذكره. قلت: وهذا إسناد صحيح، رجاله كلهم رجال الصحيح
، وقد أخرجه مسلم (8 / 66) من طريق وكيع عن جعفر بن برقان به. وله طريق
أخرى بزيادة في متنه بلفظ: `.. عبدي عند ظنه بي، وأنا معه إذا دعاني، فإن
ذكرني في نفسه ذكرته في نفسي، وإن ذكرني في ملأ ذكرته في ملأ خير منهم وأطيب
، وإن تقرب مني شبرا تقربت منه ذراعا، وإن تقرب مني ذراعا تقربت منه باعا،
وإن أتاني يمشي أتيته هرولة `. أخرجه أحمد (2 / 480) : حدثنا محمد بن جعفر
قال: حدثنا شعبة عن سليمان عن ذكوان عن أبي هريرة به. وهذا إسناد صحيح على
شرط الشيخين. ومن هذا الوجه أخرجه ابن حبان (2 / 91 / 809) إلى قوله: `
وأطيب `. وهو في ` الصحيحين ` من طريق أخرى عن سليمان - وهو الأعمش - بلفظ:
`.. وأنا معه إذا ذكرني.. `، وهو رواية لابن حبان (808) ، وهو مما تقدم
تخريجه تحت الرقم (2011) ، وذكرت هناك لحديث الترجمة شاهدا من حديث أنس رضي
الله عنه بسند صحيح.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন, মহান আল্লাহ্‌ তায়ালা ইরশাদ করেন:

"আমি আমার বান্দার ধারণা অনুযায়ী তার সাথে আচরণ করি (অর্থাৎ, আমি তার ধারণা অনুযায়ী থাকি)। আর যখন সে আমাকে ডাকে (বা স্মরণ করে), তখন আমি তার সাথেই থাকি। যদি সে আমাকে একান্তে স্মরণ করে, তবে আমিও তাকে একান্তে স্মরণ করি। আর যদি সে আমাকে কোনো সমাবেশে (জনসমক্ষে) স্মরণ করে, তবে আমি তাকে তাদের চেয়েও উত্তম ও পবিত্র সমাবেশে (ফেরেশতাদের মজলিসে) স্মরণ করি। যদি সে আমার দিকে এক বিঘত এগিয়ে আসে, তবে আমি তার দিকে এক হাত (এক বাহু) এগিয়ে যাই। আর যদি সে আমার দিকে এক হাত (এক বাহু) এগিয়ে আসে, তবে আমি তার দিকে দুই হাত (পূর্ণ প্রসারিত বাহু) এগিয়ে যাই। আর যদি সে হেঁটে আমার দিকে আসে, তবে আমি দ্রুত গতিতে (ত্বরা করে/দৌঁড়ে) তার দিকে যাই।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2943)


2943 - ` ذهبت بي أمي إلى النبي صلى الله عليه وسلم [وأنا غلام] فمسح على رأسي،
ودعا لي بالرزق، [وفي رواية: بالبركة] `.
أخرجه البخاري في ` الأدب المفرد ` (164 / 632) قال: حدثنا أبو نمير حدثنا
أبو اليمان قال: حدثنا إسماعيل بن أبي خالد قال: سمعت عمرو بن حريث يقول
: فذكره. قلت: وهذا إسناد رجاله ثقات غير أبي نمير هذا فلم أعرفه، وليس في
الرواة من يكنى بهذه الكنية سوى واحد فوق هذه الطبقة، ولم يذكر الحافظ الذهبي
سواه في ` كناه `. وفي الإسناد إشكال ثان، وهو أن أبا اليمان - واسمه
الحكم بن نافع البهراني - وهو من شيوخ المؤلف هنا، وفي ` الصحيح `، روى عنه
مباشرة هنا نحو خمسة عشر حديثا، ولم يذكروا أنه يروي عنه بالواسطة، وبخاصة
لأبي نمير هذا المجهول. وثمة إشكال ثالث، وهو تصريح أبي اليمان بتحديث
إسماعيل بن أبي خالد إياه، فإن هذا مستبعد جدا بالنظر إلى تاريخ الولادة
والوفاة، فقد ذكروا في ترجمة أبي اليمان أنه ولد سنة (138) ، وفي ترجمة
إسماعيل أنه مات سنة (146) ، فيكون عمر أبي اليمان (8) سنوات حين وفاة
إسماعيل، ولذلك لم يذكروا له
رواية عنه. ولعله لما ذكرت من الإشكال ذهب
الشيخ الجيلاني في شرحه على ` الأدب `، إلى أن الصواب في اسم شيخ المؤلف: `
ابن نمير `، ثم قال (2 / 89) : ` لعله انقلب السند، والصحيح: حدثنا أبو
اليمان حدثنا ابن نمير، أي: عبد الله بن نمير، وكان في المطبوعة: حدثنا
أبو نمير `. فأقول: هذا احتمال قوي، فقد ذكروا لابن نمير هذا رواية عن
إسماعيل بن أبي خالد، ووجدت تصريحه بتحديث إسماعيل إياه في ` سنن ابن ماجه `
(رقم 817) بحديث القراءة في صلاة الفجر، لكنه أدخل بينه وبين عمرو بن حريث
(أصبغ مولى عمرو بن حريث) ، فإذا صح هذا الاحتمال، فالإسناد صحيح لتصريح
إسماعيل فيه بسماعه إياه من عمرو بن حريث. وإن مما يؤكد ذلك أنني وجدت تصريح
إسماعيل بالسماع في هذا الحديث نفسه من طريق أخرى عنه، فقال أبو يعلى في `
مسنده ` (3 / 41 / 1456) : حدثنا محمد بن عبد الله ابن نمير: حدثنا يحيى بن
يمان حدثنا إسماعيل قال: سمعت عمرو بن حريث به. قلت: وهذا إسناد لا بأس به
في المتابعات والشواهد، رجاله ثقات رجال الشيخين غير يحيى هذا، وهو صدوق
يخطىء كثيرا، وكان تغير كما في ` التقريب `، وأما قول المعلق على ` مسند
أبي يعلى `: ` وقد صحح مسلم حديثه في الزهد رقم (2972) `. ففيه تدليس لعله
غير مقصود، لأن مسلما لم يحتج به وإنما قرنه بـ ` عبدة بن سليمان ` وهو
الكلابي ثقة ثبت، فتصحيح مسلم لحديثه، وليس لحديث يحيى
كما زعم، فكان الحق
أن يقال روى له مقرونا. ومن الغريب أن فؤاد عبد الباقي قد لفت نظر القراء في
الحاشية إلى هذا المعنى، ومع ذلك لم يتنبه له المعلق المشار إليه، أو أنه لم
يأخذ به، لأنه رأى المترجمين له قد رمزوا له بأنه من رجال مسلم كالحافظ في
كتابيه، وكأبي نصر الكلاباذي في ` الجمع بين رجال الصحيحين ` أطلقوا ولم
يقيدوا بأنه مقرون عنده، ولكن هذا إن صح، فما كان ينبغي للمومى إليه أن يقول
ما قال، لأن ذلك لا يصدق على الحديث الذي أشار إليه، لما ذكرت أنه مقرون،
والكلاباذي قد أشار إليه أيضا ولم يزد! فتنبه، فإنه من خفايا هذا العلم
الشريف. ومع الضعف المشار إليه، فقد خالفه في إسناده محمد بن يزيد - وهو
الواسطي الثقة - فقال: عن إسماعيل بن أبي خالد عن مولى عمرو بن حريث عن عمرو
بن حريث.. فذكر حديث القراءة المشار إليه آنفا، وزاد عقبه: ` وقال: ذهبت
بي أمي أو أبي إليه، فدعا لي بالرزق `. أخرجه أبو يعلى (1469) . قلت: فزاد
الواسطي في الإسناد مولى عمرو بن حريث، فزيادته مقبولة لثقته وحفظه.
والظاهر أن هذا المولى هو (أصبغ) المذكور في إسناد حديث ابن ماجه المتقدم،
وهو ثقة، إلا أنه كان تغير كما في ` التقريب `، ويحتمل عندي أن يكون هو
الوليد بن سريع، فإنه مولى عمرو بن حريث أيضا، وشارك (أصبغ) في رواية حديث
القراءة عن مولاه عمرو عند مسلم وغيره كأبي يعلى (1457) وهو مخرج في `
الإرواء ` (2 / 63) ، فيحتمل عندي أيضا أن يكون هو (أصبغ) نفسه، ويكون
هذا لقبا له. والله سبحانه وتعالى أعلم.
وحديث عمرو هذا أورده الهيثمي في
` المجمع ` (9 / 405) بروايتيه، أعني عن أصبغ وعن الوليد، وقال: `
رواهما أبو يعلى والطبراني بأسانيد، ورجال أبي يعلى وبعض أسانيد الطبراني
رجال الصحيح `. ثم وجدت للحديث طريقا أخرى عن عمرو بن حريث يزداد بها قوة،
فقال البخاري في ` التاريخ الكبير ` (1 / 2 / 190) : قال أبو نعيم: حدثنا
فطر عن أبيه: سمع عمرو ابن حريث قال: انطلق بي أبي إلى النبي صلى الله عليه
وسلم، وأنا غلام، فدعا لي بالبركة، ومسح على رأسي. وهذا إسناد حسن في
الشواهد والمتابعات، رجاله رجال البخاري غير والد فطر، وهو خليفة مولى عمرو
بن حريث، أورده ابن حبان في ` الثقات ` (4 / 209) برواية أبيه هذه، وقال
ابن القطان: ` مجهول الحال `. وقال الحافظ في ` التقريب `: ` لين الحديث `
. أي عند التفرد، وإلا فهو مقبول الحديث عند المتابعة كما هنا. ولعله لذلك
جزم ابن عبد البر بالحديث، فقال في ترجمة عمرو بن حريث من ` الاستيعاب `: `
رأى النبي صلى الله عليه وسلم وسمع منه، ومسح برأسه ودعا له بالبركة، وخط
له بالمدينة دارا بقوس `.
وذكر هذا بتمامه الذهبي في ` السير ` (3 /




আমর ইবনে হুরাইস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

আমার মা আমাকে নিয়ে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে গেলেন (যখন আমি ছিলাম এক বালক)। অতঃপর তিনি আমার মাথায় হাত বুলিয়ে দিলেন এবং আমার জন্য রিযকের (জীবিকার) দু’আ করলেন। (অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: তিনি আমার জন্য বরকতের দু’আ করলেন)।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2944)


2944 - ` كان من دعائه صلى الله عليه وسلم: اللهم اغفر لي ما قدمت وما أخرت، وما
أسررت وما أعلنت، وما أنت أعلم به مني، إنك أنت المقدم والمؤخر، لا إله
إلا أنت `.
أخرجه البخاري في ` الأدب المفرد ` (174 / 673) وأحمد (2 / 291 و 514 و 526
) من طرق عن عبد الرحمن المسعودي عن علقمة بن مرثد عن أبي الربيع عن أبي
هريرة قال: فذكره. قلت: وهذا إسناد جيد رجاله كلهم ثقات معروفون، وأبو
الربيع هو المدني، روى عنه أيضا سماك بن حرب ويزيد بن أبي زياد، وقال أبو
حاتم: ` صالح الحديث `. وذكره ابن حبان في ` الثقات ` (5 / 582) ، وحسن
له الترمذي، وقال الذهبي: ` صدوق `. وأما اقتصار الحافظ فيه على قوله:
`
مقبول `. فهو غير مقبول. والحق في أمثاله ما قاله الذهبي: ` صدوق `،
وكثيرا ما أرى الحافظ يوافقه. والله الهادي. وأما المسعودي فهو وإن كان قد
اختلط، فهو صحيح الحديث إذا حدث قبل الاختلاط، وطريق معرفة ذلك النظر في
الراوي عنه، فإذا كان بصريا أو كوفيا، كان صحيحا حديثه لأنهم حدثوا عنه قبل
الاختلاط، ومنهم خالد بن الحارث كما في كتاب ` ابن الكيال ` مع كون خالد هذا
ثقة ثبتا، وهو بصري. وللحديث شواهد كثيرة أقربها إليه حديث أبي موسى
الأشعري عنه صلى الله عليه وسلم أنه كان يدعو بهذا الدعاء: ` اللهم اغفر لي
خطيئتي وجهلي.. ` الحديث بطوله، وفيه هذا، وزاد في آخره: ` وأنت على كل
شيء قدير `. أخرجه البخاري (6398 و 6399) ومسلم (8 / 81) والبخاري في `
الأدب المفرد ` أيضا (177 / 688) والزيادة في ` المستدرك ` (1 / 511) من
طريق أخرى عنه نحوه. وصححه على شرطهما، ووافقه الذهبي، ومن شواهده حديث
علي الطويل في دعاء الاستفتاح، وفي آخره: ` ثم يكون من آخر ما يقول بين
التشهد والتسليم.. ` فذكره بتمامه. وهو مخرج في ` صحيح أبي داود ` (738)
برواية مسلم وغيره.
وله شاهد آخر عن ابن عباس فيما كان رسول الله صلى الله
عليه وسلم يقول إذا قام إلى الصلاة من جوف الليل، فذكره في آخره، ولكن ليس
فيه: ` وما أنت أعلم به مني `. اللهم إلا في رواية للبخاري برقم (7442)
وكذا ابن أبي شيبة في ` المصنف ` (10 /




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের দু’আসমূহের মধ্যে এই দু’আটি ছিল: "হে আল্লাহ! তুমি আমার পূর্বের ও পরের সমস্ত গুনাহ ক্ষমা করে দাও, যা আমি গোপনে করেছি এবং যা প্রকাশ্যে করেছি (তাও ক্ষমা করে দাও)। আর যে বিষয়ে তুমি আমার চেয়ে বেশি জানো (সেসবও ক্ষমা করো)। নিশ্চয়ই তুমিই অগ্রে স্থাপনকারী এবং তুমিই পশ্চাতে স্থাপনকারী (বা বিলম্বে স্থাপনকারী)। তুমি ব্যতীত আর কোনো ইলাহ (উপাস্য) নেই।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2945)


2945 - ` لا تصم يوم الجمعة إلا في أيام هو أحدها، وأما أن لا تكلم أحدا، فلعمري
لأن تكلم بمعروف، وتنهى عن منكر خير من أن تسكت `.
أخرجه أحمد (5 /




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

তোমরা শুধুমাত্র জুমু‘আর দিন রোযা রাখবে না, তবে যদি তা তোমাদের (অন্যান্য) রোযার দিনগুলোর মধ্যে একটি হয় (তাহলে ভিন্ন)। আর কারো সাথে কথা না বলার যে মান্নত (সংকল্প) করেছো—আমার জীবনের শপথ! তুমি যদি কোনো ভালো কথা বলো এবং মন্দ কাজ থেকে নিষেধ করো, তা চুপ থাকার চেয়ে উত্তম।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2946)


2946 - ` لا تجمعوا بين اسمي وكنيتي، [أنا أبو القاسم، والله يعطي، وأنا أقسم]
`.
أخرجه البخاري في ` الأدب المفرد ` والترمذي (2843) وابن حبان (




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তোমরা আমার নাম ও আমার কুনিয়াতকে (উপনাম) একসাথে করো না। [আমিই আবুল কাসিম, আর আল্লাহই দান করেন, এবং আমি (তা) বণ্টন করি।]









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2947)


2947 - ` من بنى بناء فليدعمه حائط جاره. وفي لفظ: من سأله جاره أن يدعم على حائطه
فليدعه `.
أخرجه ابن ماجه (2337) وابن جرير الطبري في ` تهذيب الآثار ` (2 / 1 /




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

যে ব্যক্তি কোনো কাঠামো নির্মাণ করে, সে যেন তার প্রতিবেশীর দেয়ালের উপর ঠেকনা দেয় (বা ঠেকনা দিতে অনুমতি দেয়)।

অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: যদি তার প্রতিবেশী তার কাছে আবেদন করে যে সে যেন তার দেয়ালের উপর ঠেকনা দেয়, তবে সে যেন তাকে সেই অনুমতি দেয়।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2948)


2948 - ` يا فاطمة! ألا ترضين أن تكوني سيدة نساء المؤمنين، أو سيدة نساء هذه الأمة
`.
أخرجه البخاري (6286) ومسلم (7 /




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

“হে ফাতিমা! তুমি কি এতে সন্তুষ্ট নও যে, তুমি মুমিন মহিলাদের সর্দার হবে, অথবা এই উম্মতের মহিলাদের সর্দার হবে?”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2949)


2949 - ` لا شيء في الهام، والعين حق، وأصدق الطير الفأل `.
أخرجه البخاري في ` الأدب المفرد ` (914) و ` التاريخ ` (2 / 1 /




আব্দুল্লাহ ইবনু মাস’ঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: “পেঁচা সংক্রান্ত কুলক্ষণের (হাম) কোনো ভিত্তি নেই, তবে বদ নজর (বা চোখ লাগা) সত্য। আর শুভ লক্ষণ বা সুসংবাদ (ফাল) গ্রহণ করাই হলো কুলক্ষণের মধ্যে সবচেয়ে উত্তম।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2950)


2950 - ` السلام عليكم يا صبيان! `.
أخرجه ابن أبي شيبة في ` المصنف ` (8 / 633 / 5826) وأحمد (3 / 183) قالا
: حدثنا وكيع عن حبيب بن حجر العبسي عن ثابت عن أنس قال: مر علينا رسول
الله صلى الله عليه وسلم ونحن صبيان، فقال: فذكره. وأخرجه ابن السني في `
عمل اليوم والليلة ` (77 / 223) وأبو نعيم في ` الحلية ` (8 / 378) من
طريقين آخرين عن وكيع به. قلت: وهذا إسناد صحيح رجاله ثقات رجال الشيخين غير
حبيب هذا، روى عنه جمع آخر من الثقات غير وكيع، وقد ذكره ابن حبان في موضعين
من ` أتباع التابعين ` من ` الثقات `، قال في الأول منهما (6 / 179) : `
حبيب بن حجر، شيخ يروي عن ثابت البناني. روى عنه روح بن عبادة `. وقال في
الموضع الآخر (6 / 249) :
` حبيب بن حجر أبو يحيى العبسي البصري، يروي عن
الأزرق بن قيس عن ابن عمر. روى عنه موسى بن إسماعيل `. فأقول: فرق ابن حبان
بينهما وهو واحد، كما يدل عليه صنيع المتقدمين كالبخاري (1 / 2 / 316)
وابن أبي حاتم (1 / 2 / 308) والمتأخرين كالحسيني، والعسقلاني في ` التعجيل
` (5 / 180) . ثم إنهم اختلفوا في ضبط (حبيب) هل هو على الجادة بالتخفيف،
أم هو (حبيب) بالتشديد، حكى الحافظ القولين دون أن يرجح. لكنه قال: `
وذكره البخاري في آخر من اسمه (حبيب) بالتخفيف `. قلت: وفاته أن يذكر أن
ابن أبي حاتم ذكره بالتشديد. ثم انتبهت لأمر كنت غافلا عنه تبعا للحافظ، ألا
وهو أن البخاري هو سلف ابن أبي حاتم، فقد أورده - أعني البخاري - في آخر حرف
(الحاء) في ` باب حبيب ` بالتشديد، فهو سلف ابن حبان أيضا في التفريق بين
هذا وبين الذي قبله (حبيب) بالتخفيف، لكن ابن حبان لم يقيد، وإنما أشار
إلى ذلك إشارة لم أتنبه لها، ولا نبه المحقق عليه، وهو أنه أورده فريدا بين
أمثاله من الأسماء المفردة! وبالجملة، فالتفريق المذكور بين الترجمتين
للاختلاف في ضبط الاسم غير ظاهر، شأنه في ذلك شأن نسبته: (العبسي) ، فإنه
هكذا وقع في إسناد الحديث - والسياق لابن أبي شيبة - ، وكذلك وقع في ترجمة (
حبيب) من ` الثقات `، خلافا لكتاب ابن السني، ولـ (الكتابين) ، أعني `
التاريخ ` و ` الجرح ` وتوابعهما، مثل ` التعجيل ` وغيره، فقالوا: `
القيسي ` وهو الراجح. والله أعلم. وقد تحرفت هذه النسبة في ` المسند `،
فصار شيخا لـ ` حبيب ` هكذا: ` حبيب عن قيس عن ثابت `!
(تنبيه) لقد وهم
الحافظ في هذا الحديث حين قال في ` الفتح ` (10 / 33) : ` ووقع لابن السني
وأبي نعيم في ` عمل اليوم والليلة ` من طريق عثمان بن مطر عن ثابت بلفظ: (
فذكر الحديث، وقال:) وعثمان واه `. ذكره عقب حديث جعفر بن سليمان عن ثابت
- يعني عن أنس - بسياق أتم من هذا، لكن ليس فيه لفظ السلام. وهو مخرج فيما
تقدم تحت الحديث (1278) ، ثم قال الحافظ عقب ما نقلته عنه: ` وعثمان واه `
. قلت: ووهم الحافظ من ناحيتين: الأولى: أن عثمان هذا ليس في إسناد ابن
السني. والأخرى: نزوله في تخريج الحديث إلى هذا وأبي نعيم! وإهماله عزوه
إياه إلى ابن أبي شيبة وأحمد مع سلامة إسنادهما من الضعف، الأمر الذي لا يليق
بـ (الحافظ) ! ثم إن الحديث من شرط ` مجمع الزوائد ` للهيثمي، ولكنه لم
يورده، ولعل السبب أن أصله في ` الصحيحين ` من طريق أخرى عن ثابت عن أنس،
وما أظن هذا يشفع له في تركه إياه. والله أعلم.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন যখন আমরা ছোট ছিলাম, তখন তিনি বললেন: **“আসসালামু আলাইকুম, ওহে শিশুরা!”**









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2951)


2951 - ` نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن نبيذ الجر `.
أخرجه النسائي في ` السنن الكبرى ` (4 / 189 / 6836) وأحمد (3 / 66)
والطبراني في ` المعجم الأوسط ` (1 / 112 / 1 / 2246) من طرق عن هشام بن حسان
عن ابن سيرين عن أبي العالية قال: سئل أبو (وفي رواية: سألت أبا) سعيد
الخدري عن نبيذ الجر؟ قال: فذكره.
قلت: وهذا إسناد صحيح على شرط الشيخين،
والرواية الأخرى لأحمد، وزاد: ` قال: قلت: فالجف؟ قال: ذاك أشر وأشر `
. وخالف الطرق المشار إليها في تابعي الحديث عاصم - وهو الأحول - فقال:
حدثنا محمد عن أبي العلانية قال: ` أتيت أبا سعيد الخدري، فسلمت، فلم يؤذن
لي.. ` الحديث، فذكر قصة وفيه: ` فسألته عن الأوعية؟ فلم أسأله عن شيء إلا
قال: حرام، حتى سألته عن الجف؟ فقال: حرام. قال محمد: يتخذ على رأسه أدم
فيوكأ `. أخرجه البخاري في ` الأدب المفرد ` (1077) . قلت: ورجاله رجال
الشيخين، لكن قوله في الإسناد المتقدم: ` أبو العلانية `. خطأ أشار إليه
النسائي بقوله عقب الإسناد المتقدم: ` أبو العالية: الصواب، والذي قبله خطأ
`. قلت: وفيه إشارة إلى أن قبل هذا الإسناد إسنادا آخر فيه الخطأ، وهو غير
موجود في مطبوعة ` كبرى النسائي ` ولا في المصورة، ولعلها أصل المطبوعة،
وقد وقفت على الساقط بواسطة ` تحفة المزي ` في موضعين منه (3 / 353 / 451) ،
فقال في الموضع الثاني: ` س في الوليمة عن عمرو بن علي عن يحيى عن هشام عن
محمد عن أبي العلانية. تابعه يزيد بن هارون عن هشام. ورواه مخلد بن يزيد عن
هشام عن
محمد بن سيرين فقال: عن أبي العالية، وقد مضى. قال (س) في حديث
يحيى (!) هذا الصواب والذي قبله خطأ. والله أعلم `. قلت: ورواية عمرو
بن علي.. عن أبي العلانية.. ومتابعة يزيد بن هارون لم أرها في ` وليمة
النسائي الكبرى `، ولا في غيره من مظان وجودها، بخلاف رواية مخلد فهي في `
الأشربة ` منه، من المطبوعة، والمصورة التي عندي، لكن وقع فيها ` أبو
العالية `، ولذلك قال النسائي عقبها: ` أبو العالية الصواب، والذي قبله
خطأ `. قلت: ولم يتقدم في المطبوعة ما يخالف الصواب المذكور، فالظاهر أن
فيها سقطا يدل عليه ما تقدم. ثم إنه يبدو أن قوله في المطبوعة ` أبو العالية `
خطأ من الطابع أو الناسخ في السند وتعقيب النسائي عليه، وأن الصواب في
الموضعين: أبو العلانية `، وبذلك يلتقي مع كلام المزي المتقدم، ويتفق مع
كلام الحافظ العسقلاني في ترجمة أبي العلانية: ` وقيل عن محمد عن أبي العالية
عن أبي سعيد. قال النسائي: وهو خطأ `. ويبدو أيضا أن الخطأ المذكور قديم،
فقد قال المزي عقب كلامه السابق: ` وقع في بعض النسخ: ` عن أبي العالية ` في
الحديثين جميعا، وكذلك ذكرهما أبو القاسم (يعني ابن عساكر) ، وهو وهم،
فإن النسائي قد نبه على الخلاف في موضعين. والله أعلم `. وعلى هذا، فما في
المصدرين المقرونين في أول التخريج مع النسائي: أحمد والطبراني خطأ أيضا،
ويؤيده بالنسبة لرواية أحمد أن المزي رواه بإسناده عن أحمد
بسنده في ` المسند `
فقال: ` أبو العلانية `، وبالنسبة للطبراني الذي رواه من طريق فهد بن عوف
أبي ربيعة قال: أخبرنا حماد بن سلمة عن أيوب السختياني، وعاصم الأحول،
وهشام بن حسان عن محمد بن سيرين عن أبي العالية.. فالجواب سهل، وهو أن فهدا
هذا غير ثقة فلا يعتد بروايته فكيف بمخالفته؟! فقد تركه مسلم وغيره، وكذبه
ابن المديني. أما بالنسبة لهشام، فقد تبين مما تقدم. وأما بالنسبة لعاصم
الأحول، فقد خالفه عبد الواحد بن زياد، فقال البخاري في ` الأدب المفرد ` (
1077) : حدثنا موسى بن إسماعيل: قال: حدثنا عبد الواحد قال: حدثنا عاصم
حدثنا محمد عن أبي العلانية قال: فذكره بنحوه. وفيه قصة وهذا إسناد صحيح
كما تقدم. وأما بالنسبة لروايته عن حماد عن أيوب، فالأمر مختلف، فقد وجدت
له متابعا قويا، فقال عبد الرزاق في ` المصنف ` (9 / 206 / 16947) : عن معمر
عن أيوب عن ابن سيرين عن أبي العالية، فهل هذا أيضا من بعض النساخ، ذلك مما
يصعب القطع به إلا بعد الوقوف على نسخة أخرى عتيقة من ` المصنف ` غير التي طبع
عليها، أو ما يؤيد ذلك من طرق أخرى عن أيوب. والله سبحانه وتعالى أعلم. ثم
إن الحديث قد توبع عليه أبو العالية أو أبو العلانية، فقال قتادة: حدثني
أربعة رجال عن أبي سعيد الخدري: فذكره. أخرجه أحمد (3 / 78) بسند صحيح،
ومن هؤلاء الأربعة أبو نضرة. رواه مسلم (6 / 94) وأحمد (3 / 3) . وله
شاهد من حديث عبد الله بن أبي أوفى. رواه البخاري (5596) وابن
حبان (5378
) ومن حديث ابن عمر من طرق عند مسلم (6 /




আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ’নাবীযুল জার’ (মাটির কলসি বা পাত্রে তৈরি পানীয়) ব্যবহার করতে নিষেধ করেছেন।

(অন্য এক বর্ণনায় অতিরিক্ত এসেছে, বর্ণনাকারী বলেন) আমি জিজ্ঞাসা করলাম: তাহলে ’আল-জাফ’ (কাঠের পাত্র) সম্পর্কে কী হুকুম? তিনি বললেন: সেটি আরও মন্দ, আরও নিকৃষ্ট।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2952)


2952 - ` كيف أصبحت يا فلان؟ قال: أحمد الله إليك يا رسول الله! فقال رسول الله صلى
الله عليه وسلم: هذا الذي أردت منك `.
أخرجه الطبراني في ` المعجم الأوسط ` (1 / 265 / 1 / 4538) من طريق
محمد بن
أبي السري العسقلاني قال: أخبرنا رشدين بن سعد عن زهرة بن معبد عن أبي عبد
الرحمن الحبلي عن عبد الله بن عمرو قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم
لرجل.. فذكره، وقال: ` لا يروى عن رسول الله صلى الله عليه وسلم إلا بهذا
الإسناد، تفرد به محمد بن أبي السري `. قلت: هو محمد بن المتوكل بن عبد
الرحمن الهاشمي مولاهم العسقلاني المعروف بابن أبي السري، قال الحافظ الذهبي:
` حافظ وثق، ولينه أبو حاتم `. وقال الحافظ العسقلاني في ` التقريب `: `
صدوق عارف، له أوهام كثيرة `. قلت: فمثله يستشهد به. ومثله شيخه رشدين بن
سعد، وبه أعله الحافظ العراقي، فقال في ` تخريج الإحياء ` (4 / 84) : `
ضعفه الجمهور لسوء حفظه `. وتبعه تلميذه الهيثمي، فقال في ` المجمع ` (8 /
46) : ` رواه الطبراني في ` الأوسط `، وفيه رشدين بن سعد، وهو ضعيف `.
وقال في موضع آخر (10 / 140) : ` رواه الطبراني، وإسناده حسن `! كذا قال:
وفيه نظر من وجهين: الأول: أنه أطلق العزو للطبراني، وهو يعني أنه في `
المعجم الكبير `، وفي
الموضع الأول عزاه إلى ` الأوسط `، وكذلك أطلق العزو
للطبراني شيخه العراقي، ومن المؤسف أن مسند عبد الله بن عمرو من ` المعجم
الكبير ` لم يطبع بعد حتى نتمكن من الجزم بأن عزوه إليه وهم. والله أعلم (¬1)
. والوجه الآخر: تحسينه لإسناده، مع تضعيفه لراويه رشدين في الموضع الأول.
نعم هو حسن ببعض الشواهد التي سأذكرها. فروى الفضيل بن عمرو قال: لقي النبي
صلى الله عليه وسلم رجلا من أصحابه فقال: كيف أنت؟ قال: صالح. قال: كيف
أنت؟ قال: بخير أحمد الله تعالى. قال: ` هذا الذي أردت منك `. أخرجه
الطبراني في ` الدعاء ` (3 / 1668 / 1939) بإسناد رجاله كلهم ثقات، فهو صحيح
لولا أن الفضيل هذا من أتباع التابعين، وفي ` ثقاتهم ` أورده ابن حبان (7 /
314) وقال: ` يروي المقاطيع `. وهو من رجال مسلم. وقد صح موقوفا على عمر
، فالظاهر أنه تلقاه من النبي صلى الله عليه وسلم، فقال مالك في ` الموطأ ` (
3 / 133) عن إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة عن أنس بن مالك أنه سمع عمر بن
الخطاب، وسلم عليه رجل فرد عليه السلام، ثم سأل عمر
¬_________
(¬1) ثم طبع جزء من ` معجم عبد الله بن عمرو `، وإذا الحديث فيه (21 / 37)
بإسناده في ` الأوسط `، فصح العزو إلى ` المعجم الكبير ` أيضا، ولم يصح
تحسينه لإسناده! . اهـ.
الرجل: كيف أنت؟ فقال
: أحمد الله إليك. فقال عمر: ذلك الذي أردت منك. وإسناده صحيح، وكذلك قال
الحافظ العراقي. ومن طريق مالك أخرجه البخاري في ` الأدب المفرد ` (1132)
والبيهقي في ` الشعب ` (4 / 109 / 4450) . وقد روي مرفوعا من طريق همام بن
يحيى وحماد بن سلمة كلاهما عن إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة: أن رجلا كان
يأتي النبي صلى الله عليه وسلم فيسلم عليه، فيقول النبي صلى الله عليه وسلم:
` كيف أصبحت؟ `. فيقول: أحمد إليك الله، وأحمد الله إليك. فكان النبي صلى
الله عليه وسلم يدعو له. فجاء يوما، فقال له النبي صلى الله عليه وسلم: `
كيف أنت يا فلان؟ `. قال: بخير إن شكرت! فسكت النبي صلى الله عليه وسلم،
فقال الرجل: يا نبي الله! كنت تسألني فتدعو لي، وإنك سألتني اليوم فلم تدع
لي؟ قال: ` إني كنت أسألك فتشكر الله، وإني سألتك اليوم فشككت في الشكر `.
أخرجه ابن أبي الدنيا في ` الشكر ` (28 / 38) ومن طريقه البيهقي في ` الشعب
` (4 / 109 / 4449) عن همام، وابن السني في ` عمل اليوم والليلة ` (65 /
184) عن حماد. وقد روي مسندا، فقال أحمد (3 / 241) : أخبرنا مؤمل حدثنا
حماد يعني ابن سلمة: حدثنا إسحاق بن عبد الله عن أنس بن مالك:
أن النبي صلى
الله عليه وسلم كان يلقى رجلا.. الحديث نحوه، وزاد في آخره: `.. فسكت عنك
`. وهذا إسناد رجاله ثقات رجال مسلم غير مؤمل، وفيه ضعف ولاسيما إذا خالف
الثقات، قال الحافظ: ` صدوق سيىء الحفظ `. وقال الهيثمي في ` المجمع ` (8
/ 183) : ` رواه أحمد ورجاله رجال الصحيح غير مؤمل بن إسماعيل، وهو ثقة،
وفيه ضعف `. هذا، وقد رويت أحاديث كثيرة عن جمع من الصحابة، وفي مناسبات
عديدة في قوله صلى الله عليه وسلم: ` كيف أصبحت `. من طرق مختلفة لا تخلو من
مقال، لا داعي لإخراجها، ففي ما تقدم كفاية، ولكن من المفيد أن أشير إلى
مصادرها: ` مصنف ابن أبي شيبة ` (11 / 42 و 43) ، ` السنة ` لابن أبي عاصم (
1 / 180 / 415) ، ` عمل اليوم والليلة ` (




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এক ব্যক্তিকে বললেন: আপনি কেমন আছেন, হে অমুক? তিনি বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমি আপনার নিকট আল্লাহর প্রশংসা করছি। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: তোমার কাছ থেকে আমি এটাই চেয়েছিলাম।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2953)


2953 - ` كان إذا أعجبه نحو الرجل أمره بالصلاة `.
أخرجه البخاري في ` التاريخ ` (1 / 1 / 180) والبزار (1 / 453 / 716)
وأبو نعيم في ` الحلية ` (1 / 343) والخطيب (4 / 360) من طريق يحيى بن عباد
أبي عباد: حدثنا محمد بن عثمان عن ثابت عن أنس مرفوعا. قلت: وهذا إسناد
رجاله ثقات غير محمد بن عثمان وهو الواسطي، وفي ترجمته أورده البخاري،
وقال: ` سمع ثابتا البناني عن أنس بن مالك، قاله عبد الملك الجدي عن سعيد بن
خالد عن محمد `. قلت: ولم يذكر فيه جرحا ولا تعديلا. وفي ` الميزان `: `
قال الأزدي: ضعيف `. وأما ابن حبان فذكره في ` الثقات ` (7 / 438) وقال:
` يروي عن ثابت البناني. روى عنه أبو عوانة `. قلت: فقد روى عنه ثلاثة:
يحيى بن عباد، وأبو عوانة، واسمه الوضاح اليشكري، وكلاهما ثقة من رجال
الشيخين، وسعيد بن خالد وهو الخزاعي، وهو ضعيف. ومن طبقته محمد بن عثمان
بن سيار القرشي البصري، سكن واسط، فقد ذكروا أنه روى عن ثابت البناني وذيال
بن عبيد بن حنظلة وغيرهما. وعنه جماعة منهم محمد بن أبي بكر المقدمي كما
يأتي في الحديث بعده، وأبو عباد يحيى بن عباد المذكور في إسناد هذا الحديث.
فيحتمل عندي أن يكون هو هذا، فإن كان كذلك فالحديث صحيح، وإلا فهو حسن.
والله سبحانه وتعالى أعلم.
والحديث قال الهيثمي في ` مجمع الزوائد ` (2 /




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন কোনো ব্যক্তির চালচলন বা আচরণে মুগ্ধ হতেন, তখন তিনি তাকে সালাত (নামাজ) আদায়ের নির্দেশ দিতেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2954)


2954 - ` كان إذا صلى الفجر تربع في مجلسه حتى تطلع الشمس `.
أخرجه أبو داود (4850) من طريق أبي داود الحضري: حدثنا سفيان الثوري عن سماك
بن حرب عن جابر بن سمرة قال: فذكره.
قلت: وهذا إسناد صحيح على شرط مسلم
، وأبو داود الحضري اسمه عمر بن سعد. وقد تابعه أبو نعيم عن سفيان به، إلا
أنه لم يذكر التربع. أخرجه الطبراني في ` المعجم الكبير ` (2 / 249 / 1885)
. وأخرجه مسلم وغيره من طرق أخرى عن سماك بألفاظ وزيادات متعددة دون التربع
، وهو مخرج في ` صحيح أبي داود ` (1171) ، وهذه ` السلسلة ` (434) .
وللتربع شاهد من حديث حنظلة بن حذيم قال: أتيت النبي صلى الله عليه وسلم،
فرأيته جالسا متربعا. أخرجه البخاري في ` الأدب المفرد ` (1179) ومن طريقه
المزي في ` التهذيب ` (7 / 435) والطبراني في ` المعجم الكبير ` (4 / 15 /
3498) من طريق محمد بن أبي بكر قال: حدثنا محمد بن عثمان القرشي قال: حدثنا
ذيال بن عبيد بن حنظلة: حدثني جدي حنظلة بن حذيم. قلت: وهذا إسناد حسن
لذاته على الأقل لما عرفت في الحديث الذي قبله من حال محمد بن عثمان هذا،
وبقية رجاله ثقات.




জাবির ইবনে সামুরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) যখন ফজরের সালাত আদায় করতেন, তখন সূর্য উদিত না হওয়া পর্যন্ত তাঁর বসার স্থানে চারজানু হয়ে বসে থাকতেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2955)


2955 - ` لا، لا، لا، الصدقة خمس، وإلا فعشر، وإلا فخمس عشرة، وإلا فعشرون،
وإلا فخمس وعشرون، وإلا فثلاثون، وإلا فخمس وثلاثون، فإن كثرت فأربعون
`.
أخرجه أحمد (5 /




না, না, না। সাদাকাহ (দান/ফাইন) হলো পাঁচ; আর না হলে দশ; আর না হলে পনেরো; আর না হলে বিশ; আর না হলে পঁচিশ; আর না হলে ত্রিশ; আর না হলে পঁয়ত্রিশ। যদি তা আরও বেড়ে যায়, তবে চল্লিশ।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2956)


2956 - ` من بات وفي يده غمر (¬1) ، فأصابه شيء فلا يلومن إلا نفسه `.
هو من حديث ابن عباس رضي الله عنهما، وله عنه طريقان:
¬_________
(¬1) في ` القاموس `: ` بالتحريك: زنخ اللحم `. اهـ.
أحدهما: من رواية
الليث عن محمد بن عمرو بن عطاء عنه. أخرجه البخاري في ` الأدب المفرد ` (1219
) والطبراني في ` المعجم الأوسط ` (1 / 185 / 2 / 3407) من طريق محمد بن
فضيل عنه. وقال الطبراني: ` لم يروه عن محمد بن عمرو إلا ليث، تفرد به محمد
`. قلت: وهو ثقة، وكذلك سائر رواته غير ليث، وهو ابن أبي سليم الحمصي،
وهو ضعيف. والطريق الآخر: يرويه الزهري عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة
عن ابن عباس به. ويرويه عن الزهري جمع: الأول: سفيان بن عيينة. أخرجه
الطبراني في ` الأوسط ` (1 / 30 / 2 /




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, "যে ব্যক্তি এমন অবস্থায় রাত্রি যাপন করে যে তার হাতে (খাবারের) তৈলাক্ততা বা গন্ধ (غمر) লেগে আছে, অতঃপর যদি তার কোনো ক্ষতি হয়, তবে সে যেন নিজেকে ছাড়া আর কাউকে দোষারোপ না করে।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2957)


2957 - ` [وراءك] يا بني! إنه قد حدث أمر، فلا تدخل علي إلا بإذن. قاله لخادمه
أنس بن مالك `.
أخرجه البخاري في ` الأدب المفرد ` (807) والطحاوي في ` شرح المعاني ` (2 /
393) وأحمد (3 / 199 و 209) ومن طريقه الحافظ المزي في ` تهذيب الكمال ` (
11 / 239) والبيهقي في ` الشعب ` (6 /




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (তাঁর শিক্ষক বা অন্য কেউ) তাঁকে (আনাসকে) বললেন, "পিছন দিকে যাও, হে আমার বৎস! নিশ্চয়ই কোনো এক ঘটনা ঘটেছে। সুতরাং, অনুমতি ছাড়া তুমি আমার কাছে প্রবেশ করবে না।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2958)


2958 - ` كأني أنظر إلى موسى بن عمران منهبطا من ثنية هرشى ماشيا `.
أخرجه ابن حبان في ` صحيحه ` (7 / 27 / 3747) : أخبرنا المفضل (¬1) بن محمد
الجندي - بمكة - حدثنا علي بن زياد اللحجي (¬2) : حدثنا أبو قرة عن ابن جريج قال
: حدثني يحيى بن سعيد عن سعيد بن المسيب عن أبي هريرة أن رسول الله صلى
الله عليه وسلم قال: فذكره.
¬_________
(¬1) و (¬2) الأصل ` الفضل ` و ` اللخمي `، والتصحيح من كتب الرجال. اهـ.
قلت: وهذا إسناد صحيح، رجاله ثقات، من ابن
جريج فصاعدا من رجال الشيخين. وأما أبو قرة - واسمه موسى بن طارق اليماني -
فهو ثقة من رجال النسائي. وعلي بن زياد اللحجي، وثقه ابن حبان (8 / 470)
وقال: ` مستقيم الحديث `. وروى عنه جمع من الثقات كما في كتاب ` تيسير
الانتفاع `، يسر الله لي إكماله بفضله وكرمه. والمفضل بن محمد الجندي، فهو
محدث مكة، وثقه الحافظ أبو علي النيسابوري كما في ` سير أعلام النبلاء ` (14
/ 258) . وللحديث شواهد بعضها في ` صحيح مسلم ` وابن خزيمة وابن حبان
والحاكم عن ابن عباس، وقد سبق تخريجها (2023) ، وإنما خرجته هنا من حديث
أبي هريرة لعزته.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, [রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:] "আমি যেন মূসা ইবনে ইমরান (আঃ)-কে দেখছি, তিনি হারশা নামক উঁচু পথ বা গিরিপথ থেকে হেঁটে হেঁটে নিচে নেমে আসছেন।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2959)


2959 - ` أنت سفينة `.
أخرجه الحاكم (3 / 606) وأحمد (5 / 220 و 221 و 222) والبزار (3 /




সফীনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, [রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে বললেন,] “তুমি হলে সফীনা।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2960)


2960 - ` انزل عن القبر، لا تؤذ صاحب هذا القبر `.
أخرجه أحمد (ق 222 /




কবর থেকে নেমে যাও। এই কবরের অধিকারীকে কষ্ট দিও না।