হাদীস বিএন


সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ





সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (301)


301 - ` إنما ذلك عرق وليست بالحيضة، فإذا أقبلت الحيضة فدعي الصلاة، فإذا أدبرت
فاغسلي عنك الدم ثم صلي (ثم توضئي لكل صلاة حتى يجيء ذلك الوقت) `.
أخرجه الشيخان وأبو عوانة في ` صحاحهم ` وأصحاب السنن الأربعة ومالك
والدارمي والدارقطني والبيهقي وأحمد من حديث عائشة قالت:
` إن فاطمة بنت حبيش جاءت رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالت: إنى امرأة
أستحاض فلا أطهر، أفأدع الصلاة؟ قال ... ` فذكره.
وقال الترمذي: ` حديث حسن صحيح `. والزيادة له وللبخاري.
والشاهد من الحديث قوله: ` فاغسلي عنك الدم `، فهو دليل آخر على نجاسة دم
الحيض، ومن غرائب ابن حزم أنه ذهب إلى أن قوله فيه (الدم) على العموم يشمل
جميع الدماء من الإنسان والحيوان! فقال في ` المحلى ` (1 /




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, [রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন]: “নিশ্চয়ই এটি (ইস্তিহাযার রক্ত) একটি শিরা থেকে নির্গত রক্ত, এটি হায়েজ (মাসিক ঋতুস্রাব) নয়। সুতরাং, যখন হায়েজ শুরু হবে, তখন সালাত (নামাজ) ছেড়ে দাও। আর যখন তা শেষ হয়ে যাবে, তখন তুমি তোমার শরীর থেকে রক্ত ধুয়ে ফেলো এবং সালাত আদায় করো। (এরপর সেই সময় না আসা পর্যন্ত প্রত্যেক সালাতের জন্য ওযু করে নাও)।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (302)


302 - ` إن الله اصطفى كنانة من ولد إسماعيل واصطفى قريشا من كنانة واصطفى من قريش
بني هاشم واصطفاني من بني هاشم `.
أخرجه مسلم (7 / 58) وأبو يعلى في ` مسنده ` (355 / 2) والخطيب
(13 / 64) وابن عساكر (17 / 353 / 1) من طريق الوليد بن مسلم: حدثنا
الأوزاعي عن أبي عمار شداد أنه سمع واثلة بن الأسقع يقول: سمعت رسول الله
صلى الله عليه وسلم يقول: فذكره.
وأخرجه أحمد (4 / 107) : حدثنا أبو المغيرة قال: حدثنا الأوزاعي قال:
حدثني أبو عمار به.
قلت: وهذه متابعة قوية من أبي المغيرة للوليد بن مسلم، وإنما أخرجتها مع
إخراج مسلم لحديثه، خشية أن يتعلق أحد بالوليد فيعل الحديث به لأنه كان يدلس
تدليس التسوية، وهو لم يصرح بالتحديث بين الأوزاعي وأبي عمار، فأمنا تدليسه
بهذه
المتابعة.
وقد تابعه أيضا يزيد بن يوسف وهو الرحبي الصنعاني الدمشقي ولكنه ضعيف كما في
` التقريب `.
أخرجه أبو يعلى. وتابعه أيضا محمد بن مصعب قال: حدثنا الأوزاعي به إلا أنه
زاد في أوله:
` إن الله عز وجل اصطفى من ولد إبراهيم إسماعيل، واصطفى من بني إسماعيل
كنانة ... `.
أخرجه أحمد والترمذي (2 / 281) وقال:
` حديث حسن صحيح `.
قلت: محمد بن صعب وهو القرقساني صدوق كثير الغلط كما في ` التقريب `.
ففي ما تفرد به دون الثقات نظر، وتابعه يحيى بن أبي كثير لكن الراوي عنه
سليمان بن أبي سليمان وهو الزهري اليمامي أشد ضعفا من القرقساني،
فقال ابن معين ليس بشيء. وقال البخاري: منكر الحديث. ولفظ حديثه مغاير
للجميع وهو:
` إن الله اصطفى من ولد آدم إبراهيم، واتخذه خليلا، ثم اصطفى من ولد إبراهيم
إسماعيل، ثم اصطفى من ولد إسماعيل نزارا، ثم اصطفى من ولد نزار مضر، واصطفى
من ولد مضر كنانة ثم اصطفى من كنانة قريشا واصطفى من قريش بني هاشم، واصطفى
من بني هاشم بني عبد المطلب، واصطفاني من بني عبد المطلب `.
أخرجه الخطيب في ` الموضح ` (1 /




ওয়াছিলা ইবনুল আসকা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা ইসমাঈল (আঃ)-এর সন্তানদের মধ্য থেকে কিনানাহকে মনোনীত করেছেন। আর কিনানাহর মধ্য থেকে কুরাইশকে মনোনীত করেছেন। আর কুরাইশের মধ্য থেকে বনু হাশিমকে মনোনীত করেছেন। আর বনু হাশিমের মধ্য থেকে আমাকে মনোনীত করেছেন।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (303)


303 - ` أمرت أن أقاتل الناس حتى يشهدوا أن لا إله إلا الله وأن محمدا عبده ورسوله
وأن يستقبلوا قبلتنا ويأكلوا ذبيحتنا وأن يصلوا صلاتنا، فإذا فعلوا ذلك
` فقد ` حرمت علينا دماؤهم وأموالهم إلا بحقها لهم ما للمسلمين وعليهم ما على
المسلمين `.
أخرجه أبو داود (2641) والترمذي (2 / 100) عن سعيد بن يعقوب الطالقاني،
والنسائي (2 / 161، 269) عن حبان (وهو ابن موسى المروزي) وأحمد
(3 / 199) عن علي بن إسحاق (وهو السلمي المروزي) كلهم عن عبد الله بن
المبارك أخبرنا حميد الطويل عن أنس بن مالك قال: قال رسول الله صلى الله
عليه وسلم: فذكره.
وقال الترمذي: ` حديث حسن صحيح `.
وتابعه ابن وهب: أخبرني يحيى بن أيوب عن حميد الطويل به.
أخرجه أبو داود (2642) والطحاوي في ` شرح معاني الآثار ` (2 / 123) .
قلت: وهذا إسناد صحيح على شرط الشيخين، وكذلك طريق حبان المروزي.
ورواه محمد بن عبد الله الأنصاري قال: أنبأنا حميد قال: سأل ميمون بن سياه
أنس بن مالك قال: يا أبا حمزة ما يحرم دم المسلم وماله، فقال:
فذكره موقوفا.
وإسناده صحيح أيضا، ولا منافاة بينه وبين المرفوع، فكل صحيح. على أن
المرفوع أصح، ورواته أكثر.
وفيه دليل على بطلان الحديث الشائع اليوم على ألسنة الخطباء والكتاب:
أن النبي صلى الله عليه وسلم قال في أهل الذمة:
` لهم ما لنا، وعليهم ما علينا `.
وهذا مما لا أصل له عنه صلى الله عليه وسلم، بل هذا الحديث الصحيح يبطله،
لأنه صريح في أنه صلى الله عليه وسلم إنما قال ذلك فيمن أسلم من المشركين وأهل
الكتاب، وعمدة أولئك الخطباء على بعض الفقهاء الذين لا علم عندهم بالحديث
الشريف، كما بينته في ` الأحاديث الضعيفة والموضوعة ` (رقم 1103) فراجعه
فإنه من المهمات.
وللحديث شاهد بلفظ آخر، وهو:
` من أسلم من أهل الكتاب فله أجره مرتين، وله مثل الذي لنا، وعليه مثل الذي
علينا، ومن أسلم من المشركين فله أجره، وله مثل الذي لنا، وعليه مثل الذي
علينا `.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

“আমাকে নির্দেশ দেওয়া হয়েছে যে আমি মানুষের সাথে ততক্ষণ পর্যন্ত যুদ্ধ করি, যতক্ষণ না তারা সাক্ষ্য দেয় যে আল্লাহ ছাড়া কোনো উপাস্য নেই এবং মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর বান্দা ও রাসূল, যতক্ষণ না তারা আমাদের কিবলার (কিবলার দিকে) মুখ করে, আমাদের যবেহ করা পশু খায় এবং আমাদের সালাতের মতো সালাত আদায় করে। যখন তারা এই কাজগুলো করবে, তখন তাদের রক্ত ও সম্পদ আমাদের জন্য হারাম হয়ে যাবে (সংরক্ষিত হয়ে যাবে), তবে তার প্রাপ্য অধিকারের ব্যতিক্রম ছাড়া। তাদের জন্য সেই সকল অধিকার থাকবে যা মুসলিমদের জন্য রয়েছে এবং তাদের উপর সেই সকল দায়িত্ব বর্তাবে যা মুসলিমদের উপর বর্তায়।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (304)


304 - ` من أسلم من أهل الكتاب فله أجره مرتين وله مثل الذي لنا وعليه مثل الذي
علينا ومن أسلم من المشركين فله أجره وله مثل الذي لنا وعليه مثل الذي
علينا `.
رواه الروياني في ` مسنده ` (30 / 220 / 1) : أنبأنا أحمد أنبأنا عمي أنبأنا
ابن لهيعة عن سليمان بن عبد الرحمن عن القاسم عن أبي أمامة الباهلي قال:
` كنت تحت راحلة رسول الله صلى الله عليه وسلم في حجة الوداع، فقال قولا حسنا
فقال فيما قال: ` فذكره.
قلت: وهذا سند حسن: القاسم هو ابن عبد الرحمن أبو عبد الرحمن الشامي صاحب
أبي أمامة وهو صدوق.
وسليمان بن عبد الرحمن هو أبو عمر الخراساني الدمشقي وهو ثقة.
وابن لهيعة هو عبد الله المصري وهو سيىء الحفظ إلا ما رواه العبادلة عنه عبد
الله بن وهب، وعبد الله بن يزيد المقري، وعبد الله بن المبارك، وهذا من
رواية الأول منهم، فإن عم أحمد في هذا السند هو عبد الله بن وهب وهو أشهر من
أن يذكر.
وأما أحمد فهو ابن عبد الرحمن بن وهب بن مسلم المصري الملقب (بحشل) وهو
صدوق تغير بآخره كما في ` التقريب ` واحتج به مسلم، فحديثه حسن إذا لم يخالف.
وقد أخرجه الإمام أحمد (5 / 259) : حدثنا يحيى بن إسحاق السيلحيني حدثنا
ابن لهيعة به إلا أنه قال:
` يوم الفتح `. بدل ` حجة الوداع `. والأول أصح.




আবু উমামা আল-বাহিলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: আহলে কিতাবের (কিতাবধারী) মধ্য থেকে যে ব্যক্তি ইসলাম গ্রহণ করবে, তার জন্য রয়েছে দ্বিগুণ পুরস্কার। আর আমাদের জন্য যে অধিকার রয়েছে, তার জন্যও রয়েছে সেই অধিকার; এবং আমাদের উপর যে কর্তব্য রয়েছে, তার উপরও রয়েছে সেই কর্তব্য। আর মুশরিকদের মধ্য থেকে যে ব্যক্তি ইসলাম গ্রহণ করবে, তার জন্য রয়েছে তার পুরস্কার (একগুণ)। আর আমাদের জন্য যে অধিকার রয়েছে, তার জন্যও রয়েছে সেই অধিকার; এবং আমাদের উপর যে কর্তব্য রয়েছে, তার উপরও রয়েছে সেই কর্তব্য।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (305)


305 - ` لا تسموا بالحريق. يعني في الوجه `.
رواه الطبراني في ` المعجم الكبير ` (3 / 142 /




তোমরা আগুন দ্বারা দাগাঙ্কিত (দাগ বা চিহ্ন) করো না। অর্থাৎ, মুখে দাগাঙ্কিত করা (নিষেধ)।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (306)


306 - ` لما أسري بالنبي صلى الله عليه وسلم إلى المسجد الأقصى أصبح يتحدث الناس
بذلك فارتد ناس ممن كانوا آمنوا به وصدقوه وسعوا بذلك إلى أبي بكر رضي الله
عنه فقالوا: هل لك إلى صاحبك يزعم أنه أسري به الليلة إلى بيت المقدس؟ قال:
أو قال ذلك؟ قالوا: نعم، قال: لئن كان قال ذلك لقد صدق، قالوا: أو تصدقه
أنه ذهب الليلة إلى بيت المقدس وجاء قبل أن يصبح؟ قال: نعم إني لأصدقه فيما
هو أبعد من ذلك، أصدقه بخبر السماء في غدوة أو روحة. فلذلك سمي أبو بكر
الصديق `.
أخرجه الحاكم (3 / 62) من طريق محمد بن كثير الصنعاني حدثنا معمر بن راشد عن
الزهري عن عروة عن عائشة رضي الله عنها قالت: فذكره.
وقال: ` صحيح الإسناد `. ووافقه الذهبي.
قلت: وفيه نظر، لأن الصنعاني فيه ضعف من قبل حفظه، ولذلك أورده الذهبي في
` الضعفاء ` وقال: ` ضعفه أحمد `.
وقال الحافظ في ` التقريب `: ` صدوق كثير الغلط `.
قلت: فمثله لا يحتج به إذا انفرد، لكنه قد توبع كما يأتي، فحديثه لذلك صحيح
وقد عزاه الحافظ ابن كثير في ` التفسير ` (15 / 138) للبيهقي (يعني في
` الدلائل `) من طريق الحاكم، ثم سكت عليه، وكان ذلك لشواهده التي أشرنا
إليها آنفا، وإنما ذكرت الحديث من أجل ما فيه من سبب تسمية أبي بكر بـ
` الصديق `، وإلا فسائره متواتر صح من طرق جماعة من الصحابة قد استقصى كثيرا
منها الحافظ ابن كثير في أول تفسيره لسورة ` الإسراء `، فلنذكر هنا الشواهد
لهذه الزيادة فأقول:
الأول: عن شداد بن أوس مرفوعا بلفظ:
` صليت بأصحابي صلاة العتمة بمكة معتما فأتاني جبريل عليه السلام بدابة أبيض
أو قال: بيضاء ... (الحديث وفيه:) فقال أبو بكر: أشهد أنك لرسول الله،
وقال المشركون: انظروا إلى ابن أبي كبشة يزعم أنه أتى بيت المقدس الليلة!
... الحديث.
أخرجه ابن أبي حاتم والبيهقي وقال: ` هذا إسناد صحيح `.
الثاني: عن ابن شهاب عن أبي سلمة بن عبد الرحمن في قصة الإسراء قال:
` فتجهز - أو كلمة نحوها - ناس من قريش إلى أبي بكر، فقالوا: هل لك في صاحبك
يزعم أنه جاء إلى بيت المقدس ثم رجع إلى مكة في ليلة واحدة؟ !
فقال أبو بكر: أو قال ذلك؟ قالوا: نعم. قال: فأنا أشهد لئن كان قال ذلك
لقد صدق، قالوا: فتصدقه في أن يأتي الشام في ليلة واحدة، ثم يرجع إلى مكة
قبل أن يصبح؟ قال: نعم أنا أصدقه بأبعد من ذلك أصدقه بخبر السماء، قال
أبو سلمة: سمي أبو بكر الصديق `.
قلت: وهذا سند صحيح مرسل، وشاهد قوي لموصول عائشة.
الثالث: عن أبي معشر قال: أنبأنا أبو وهب مولى أبي هريرة:
` أن رسول الله صلى الله عليه وسلم ليلة أسري به، قلت لجبريل إن قومي لا
يصدقوني، فقال له جبريل يصدقك أبو بكر وهو الصديق `.
أخرجه ابن سعد في ` الطبقات ` (3 / 1 / 120) وهذا سند ضعيف.
وروى الحاكم (3 / 62) عن محمد بن سليمان السعدي يحدث عن هارون بن سعد عن
عمران بن ظبيان عن أبي يحيى سمع عليا:
` لأنزل الله تعالى اسم أبي بكر رضي الله عنه من السماء صديقا ` وقال:
` لولا مكان محمد بن سليمان السعيدي من الجهالة لحكمت لهذا الإسناد بالصحة `.
ووافقه الذهبي.
(تنبيه) كذا وقع في ` المستدرك `: ` السعدي ` وفي الموضع الآخر:
` السعيدي ` وكله خطأ والصواب ` العبدي ` كما في ` الجرح والتعديل ` (3 / 2
/ 269) و ` الميزان ` و ` اللسان `.
هذا وقد جزم الإمام أبو جعفر الطحاوي في ` مشكل الآثار ` (2 / 145) بأن سبب
تسمية أبي بكر رضي الله عنه و ` الصديق ` إنما هو سبقه الناس إلى تصديقه رسول
الله صلى الله عليه وسلم على إتيانه بيت المقدس من مكة، ورجوعه منه إلى منزله
بمكة في تلك الليلة، وإن كان المؤمنون يشهدون لرسول الله صلى الله عليه وسلم
بمثل ذلك إذا وقفوا عليه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

যখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে মসজিদুল আকসা-তে ইসরা (রাত্রিকালীন ভ্রমণ) করানো হলো, তখন সকালে মানুষজন এ নিয়ে আলোচনা করতে শুরু করল। ফলে যারা তাঁর প্রতি ঈমান এনেছিল এবং তাঁকে সত্যায়ন করেছিল, তাদের মধ্যে কিছু লোক মুরতাদ (ধর্মত্যাগী) হয়ে গেল।

তারা এই খবর নিয়ে আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেল এবং বলল: আপনি কি আপনার বন্ধুর খবর রাখেন? তিনি দাবি করছেন যে, তাকে নাকি গত রাতে বাইতুল মাকদিসে (জেরুজালেম) ইসরা করানো হয়েছে?

তিনি (আবু বকর) বললেন: তিনি কি সত্যিই এমন বলেছেন? তারা বলল: হ্যাঁ। তিনি বললেন: যদি তিনি এমন বলে থাকেন, তবে অবশ্যই সত্য বলেছেন।

তারা বলল: আপনি কি তাকে এই বিষয়েও বিশ্বাস করেন যে, তিনি এক রাতের মধ্যে বাইতুল মাকদিসে গেলেন এবং সকাল হওয়ার আগেই ফিরেও আসলেন?

তিনি (আবু বকর) বললেন: হ্যাঁ, আমি তো তাঁকে এর চেয়েও দূরের বিষয়ে বিশ্বাস করি। আমি সকাল-সন্ধ্যা তাঁর কাছে আসা আসমানের (ওহীর) খবরকেও সত্য বলে বিশ্বাস করি।

এ কারণেই আবু বকরকে ’আস-সিদ্দিক’ (সত্যায়নকারী) নামে নামকরণ করা হলো।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (307)


307 - ` تنكح المرأة على إحدى خصال ثلاثة، تنكح المرأة على مالها، وتنكح المرأة
على جمالها، وتنكح المرأة على دينها، فخذ ذات الدين والخلق تربت يمينك `.
أخرجه ابن حبان في ` صحيحه ` (1231) والحاكم (2 / 161) وأحمد (3 /




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

নারীকে তিনটি গুণের যেকোনো একটির ভিত্তিতে বিবাহ করা হয়: নারীকে তার সম্পদের জন্য বিবাহ করা হয়, নারীকে তার সৌন্দর্যের জন্য বিবাহ করা হয় এবং নারীকে তার দ্বীনের (ধর্মপরায়ণতার) জন্য বিবাহ করা হয়। অতএব, তুমি দ্বীনদার ও চরিত্রবতী নারীকে গ্রহণ করো—তাহলেই তোমরা কল্যাণ লাভ করবে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (308)


308 - ` اللهم أحيني مسكينا، وأمتني مسكينا، واحشرني في زمرة المساكين `.
أخرجه عبد بن حميد في ` المنتخب من المسند ` (110 / 2) فقال:
حدثني ابن أبي شيبة: حدثنا وكيع عن همام عن قتادة عن أبي عيسى الأسواري عن
أبي سعيد: أحبوا المساكين فإني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول
في دعائه. فذكره.
قلت: وهذا إسناد حسن عندي، رجاله كلهم ثقات رجال الشيخين غير أبي عيسى
الأسواري فقد وثقه الطبراني وابن حبان فذكره في ` الثقات ` (1 / 271) وروى
عنه ثلاثة منهم، أحدهم قتادة ولذلك قال البزار: ` إنه مشهور `.
وقول من قال فيه ` مجهول ` أو ` لم يرو عنه غير قتادة ` فبحسب علمه وفوق كل
ذي علم عليم، فقد جزم في ` التهذيب ` أنه روى عنه ثابت البناني وقتادة وعاصم
الأحول.
قلت: وهؤلاء جميعا ثقات فبهم ترتفع الجهالة العينية، وبتوثيق من ذكرنا تزول
الجهالة الحالية إن شاء الله تعالى، لاسيما وهو تابعي، ومن مذهب بعض
المحدثين كابن رجب وابن كثير تحسين حديث المستور من التابعين، وهذا خير من
المستور كما لا يخفى.
وللحديث طريق أخرى عن أبي سعيد، وشواهد عن أنس بن مالك وعبادة ابن الصامت
وابن عباس خرجتها كلها في ` إرواء الغليل ` (رقم 853) وإنما آثرت إيراد هذه
الطريق هنا لأنها مع صلاح سندها عزيزة لم يتعرض لها بذكر كل من تكلم على طرق
الحديث كابن الجوزي وابن الملقن في ` الخلاصة ` وابن حجر في ` التلخيص `
والسيوطي في ` اللآلي ` وغيرهم، ولا شك أن الحديث بمجموع طرقه يرتقي إلى
درجة الصحة، ولذلك أنكر العلماء على ابن الجوزي إيراده إياه في ` الموضوعات `
وقال الحافظ في
` التلخيص ` (ص 275) :
` أسرف ابن الجوزي فذكر هذا الحديث في ` الموضوعات `، وكأنه أقدم عليه لما
رآه مباينا للحال التي مات عليها النبي صلى الله عليه وسلم لأنه كان مكفيا،
قال البيهقي:
ووجهه عندي أنه لم يسأل حال المسكنة التي يرجع معناها إلى القلة، وإنما سأل
المسكنة التي يرجع معناها إلى الإخبات والتواضع `.




আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (তিনি বলেন,) তোমরা মিসকিনদের (দরিদ্র ও বিনয়ী ব্যক্তিদের) ভালোবাসো। কারণ আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে তাঁর দোয়ায় বলতে শুনেছি:

"হে আল্লাহ! আমাকে মিসকিন হিসেবে বাঁচিয়ে রাখুন, মিসকিন হিসেবে মৃত্যু দিন এবং মিসকিনদের দলের অন্তর্ভুক্ত করে হাশর করুন।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (309)


309 - ` يا معشر المهاجرين والأنصار إن من إخوانكم قوما ليس لهم مال ولا عشيرة،
فليضم أحدكم إليه الرجلين أو الثلاثة `.
أخرجه أبو داود (2534) عن الأسود بن قيس عن نبيح العنزي عن جابر بن عبد
الله حدث عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه أراد أن يغزو فقال: فذكره.
قال جابر:
` فما لأحدنا من ظهر يحمله إلا عقبة كعقبة يعني أحدهم، فضممت إلي اثنين
أو ثلاثة. قال: ما لي إلا عقبة كعقبة أحدهم من جملي `.
قلت: وهذا سند صحيح، رجاله كلهم ثقات سوى الأسود بن قيس وقد وثقه أبو زرعة
والعجلي وابن حبان، وصحح له الترمذي وابن خزيمة وابن حبان والحاكم، فلا
يضره بعد هذا ذكر علي بن المديني إياه في جملة المجهولين الذين يروي عنهم
الأسود بن قيس.




জাবের ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:

"হে মুহাজির ও আনসার সম্প্রদায়! তোমাদের ভাইদের মধ্যে এমন কিছু লোক আছে, যাদের কোনো সম্পদ বা আপনজন নেই। সুতরাং তোমাদের মধ্যে প্রত্যেকে যেন দু’জন বা তিনজনকে নিজের সাথে (নিজেদের কাফেলায়) শামিল করে নেয়।"

জাবের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তখন আমাদের কারো কাছেই এমন কোনো বাহন ছিল না যা তাকে বহন করে নিয়ে যেতে পারে; বরং (আরোহণের জন্য) প্রত্যেকের পালা ছিল অন্যের পালার মতোই (অর্থাৎ পালা করে আরোহণ করতে হতো)। তাই আমি আমার সাথে দু’জন বা তিনজনকে শামিল করে নিলাম। তিনি বললেন, আমার উট থেকে তাদের প্রত্যেকের জন্য একজনের পালার মতো একটি পালা (আরোহণের অংশ) ছাড়া আর কিছুই নেই।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (310)


310 - ` لو أنكم تتوكلون على الله حق توكله لرزقكم كما يرزق الطير، تغدو خماصا،
وتروح بطانا `.
أخرجه أحمد (1 / 30) والترمذي (2 /




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি তোমরা আল্লাহর উপর যথার্থভাবে তাওয়াক্কুল (নির্ভরতা) করতে, তবে তিনি অবশ্যই তোমাদেরকে সেভাবে রিযিক দান করতেন, যেভাবে তিনি পাখিদেরকে রিযিক দান করেন। তারা সকালে ক্ষুধার্ত অবস্থায় বের হয় এবং সন্ধ্যায় ভরা পেট নিয়ে (তৃপ্ত হয়ে) ফিরে আসে।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (311)


311 - ` يرد الناس كلهم النار ثم يصدرون منها بأعمالهم فأولهم كلمع البرق ثم كمر
الريح ثم كحضر الفرس ثم كالراكب ثم كشد الرجال ثم كمشيهم `.
أخرجه الترمذي (2 / 198) والدارمي (2 / 329) والزيادة الأخيرة لهما،
وكذا الحاكم (2 / 375 و 4 / 586) والسياق له، وأحمد (1 / 435)
وأبو يعلى
(255 / 1) من طريق إسرائيل عن السدي قال: سألت مرة الهمداني عن
قول الله عز وجل (وإن منكم إلا واردها كان على ربك حتما مقضيا) ؟ فحدثني أن
عبد الله بن مسعود حدثهم عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: فذكره.
والزيادة الأولى لأحمد وأبي يعلى. والثانية للترمذي وأبي يعلى.
وقال الدارمي وأحمد ` عنها `.
وقال الترمذي: ` حديث حسن `.
وقال الحاكم: ` صحيح على شرط مسلم `. ووافقه الذهبي.
قلت: وهو كما قالا، ولعل اقتصار الترمذي. إنما هو بسبب أن شعبة قد رواه عن
السدي به موقوفا. أخرجه الترمذي. لكن قال الإمام أحمد: (1 / 433) : حدثنا
عبد الرحمن بن مهدي عن شعبة عن السدي عن مرة عن عبد الله قال: (وإن منكم إلا
واردها) ؟ قال: يدخلونها أو يلجونها، ثم يصدرون منها بأعمالهم. قلت له:
إسرائيل حدثه عن النبي صلى الله عليه وسلم؟ قال: نعم، هو عن النبي صلى الله
عليه وسلم، أو كلاما هذا معناه.
وأخرجه الترمذي أيضا من هذا الوجه إلا أنه قال:
` قال شعبة: وقد سمعته من السدي مرفوعا. ولكني عمدا أدعه `.
فصح أن الحديث مرفوع، وترك شعبة رفعه، لا يعله ما دام أن شيخه السدي
وقد
رفعه وهو ثقة احتج به مسلم واسمه إسماعيل بن عبد الرحمن.
وأما السدي الصغير واسمه محمد بن مروان فهو متهم بالكذب.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:

সকল মানুষই জাহান্নামের উপর দিয়ে যাবে (বা তাতে প্রবেশ করবে)। অতঃপর তারা তাদের আমল অনুযায়ী তা থেকে ফিরে আসবে (বা মুক্তি পাবে)। তাদের মধ্যে প্রথম ব্যক্তি হবে বিদ্যুতের ঝলকের ন্যায় দ্রুতগামী। এরপর বাতাসের গতির ন্যায়, অতঃপর দ্রুতগামী ঘোড়ার দৌড়ের ন্যায়, এরপর আরোহীর গতির ন্যায়, অতঃপর দ্রুত দৌড়ে যাওয়া মানুষের ন্যায় এবং এরপর হেঁটে যাওয়া মানুষের ন্যায় দ্রুতগামী হবে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (312)


312 - ` كان يصلي، فإذا سجد وثب الحسن والحسين على ظهره، فإذا أرادوا أن يمنعوهما
أشار إليهم أن دعوهما، فلما قضى الصلاة، وضعهما في حجره، وقال: من أحبني
فليحب هذين `.
أخرجه أبو يعلى في ` مسنده ` (60 / 2) عن علي بن صالح عن عاصم عن زر،
عن عبد الله بن مسعود قال: فذكره مرفوعا.
قلت: وهذا إسناد حسن، رجاله ثقات، وفي عاصم وهو ابن أبي النجود كلام
لا يضر. وعلي بن صالح هو ابن صالح بن حي الهمداني الكوفي.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম সালাত আদায় করছিলেন। যখন তিনি সিজদা করতেন, তখন হাসান ও হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উভয়ে তাঁর পিঠের উপর আরোহণ করতেন। যখন লোকেরা তাঁদের (হাসান-হুসাইনকে) বারণ করতে চাইতেন, তখন তিনি (নবীজী) তাদের ইশারা করে বলতেন, "তাদের ছেড়ে দাও।" অতঃপর যখন তিনি সালাত শেষ করলেন, তখন তাঁদের দুজনকে কোলে বসালেন এবং বললেন, "যে ব্যক্তি আমাকে ভালোবাসে, সে যেন অবশ্যই এই দুজনকেও ভালোবাসে।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (313)


313 - ` أعجزتم أن تكونوا مثل عجوز بني إسرائيل؟ فقال أصحابه: يا رسول الله وما
عجوز بني إسرائيل؟ قال: إن موسى لما سار ببني إسرائيل من مصر، ضلوا الطريق
فقال: ما هذا؟ فقال علماؤهم: نحن نحدثك، إن يوسف لما حضره الموت أخذ علينا
موثقا من الله أن لا يخرج من مصر حتى ننقل عظامه معنا، قال: فمن يعلم موضع
قبره؟ قالوا: ما ندري أين قبر يوسف إلا عجوز من
بني إسرائيل، فبعث إليها
فأتته فقال: دلوني على قبر يوسف، قالت: لا والله لا أفعل حتى تعطيني حكمي،
قال: وما حكمك؟ قالت: أكون معك في الجنة، فكره أن يعطيها ذلك فأوحى الله
إليه أن أعطها حكمها، فانطلقت بهم إلى بحيرة موضع مستنقع ماء، فقالت: انضبوا
هذا الماء فأنضبوا، قالت: احفروا واستخرجوا عظام يوسف فلما أقلوها إلى الأرض
إذا الطريق مثل ضوء النهار `.
أخرجه أبو يعلى في ` مسنده ` (344 / 1) والحاكم (2 /




রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তোমরা কি বনী ইসরাঈলের সেই বৃদ্ধার মতো হতে অক্ষম?

তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাহাবীগণ বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! বনী ইসরাঈলের সেই বৃদ্ধাটি কে?

তিনি বললেন: মূসা (আঃ) যখন বনী ইসরাঈলকে নিয়ে মিসর থেকে রওয়ানা হলেন, তখন তারা পথ হারিয়ে ফেলল। তিনি (মূসা আঃ) জিজ্ঞেস করলেন: এটা কী হলো? তখন তাদের আলেমরা বললেন: আমরা আপনাকে বলছি, ইউসুফ (আঃ)-এর যখন মৃত্যু নিকটবর্তী হলো, তখন তিনি আল্লাহর নামে শপথ করিয়ে আমাদের কাছ থেকে অঙ্গীকার নিয়েছিলেন যে, আমরা যেন তাঁর অস্থি (হাড়) সাথে না নেওয়া পর্যন্ত মিসর থেকে বের না হই।

মূসা (আঃ) বললেন: তাঁর কবরের স্থান কে জানে? তারা বলল: বনী ইসরাঈলের এক বৃদ্ধা ছাড়া ইউসুফ (আঃ)-এর কবর কোথায়, তা আমরা জানি না।

অতঃপর তিনি তার নিকট লোক পাঠালেন। সে (বৃদ্ধাটি) তাঁর নিকট আসলো। মূসা (আঃ) বললেন: আমাকে ইউসুফ (আঃ)-এর কবরের সন্ধান দাও।

বৃদ্ধা বলল: আল্লাহর কসম! আমি তা করবো না, যতক্ষণ না আপনি আমার শর্ত পূরণ করবেন।

তিনি বললেন: তোমার শর্ত কী? সে বলল: আমি যেন জান্নাতে আপনার সঙ্গী হই।

তিনি তাকে এই শর্ত দিতে অপছন্দ করলেন। তখন আল্লাহ তাঁর নিকট ওহী প্রেরণ করলেন যে: তুমি তার শর্ত মঞ্জুর করে নাও।

অতঃপর সে (বৃদ্ধাটি) তাঁদেরকে একটি জলাভূমির দিকে নিয়ে গেল, যা ছিল পানি জমা হওয়ার স্থান। সে বলল: এই পানি শুকিয়ে ফেলো। ফলে তারা পানি শুকিয়ে ফেলল। সে বলল: তোমরা খুঁড়ো এবং ইউসুফ (আঃ)-এর অস্থি বের করো।

যখন তারা সেই অস্থি মাটির উপরে উঠিয়ে আনলো, তখন রাস্তা দিনের আলোর মতো উজ্জ্বল হয়ে গেল।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (314)


314 - ` لا تصلوا عند طلوع الشمس، ولا عند غروبها فإنها تطلع وتغرب على قرن شيطان
وصلوا بين ذلك ما شئتم `.
رواه أبو يعلى في ` مسنده ` (200 / 2) حدثنا محمد بن عبد الله بن نمير حدثنا
روح حدثنا أسامة بن زيد عن حفص بن عبيد الله عن أنس بن مالك: قال رسول
الله صلى الله عليه وسلم: فذكره.
قلت: وهذا إسناد حسن رجاله كلهم ثقات رجال الشيخين، غير أسامة بن زيد وهو
الليثي، وفيه كلام من قبل حفظه، والمتقرر أنه حسن الحديث إذا لم يخالف،
وقد استشهد به مسلم.
وللحديث شاهد من حديث علي مرفوعا بلفظ:
` لا تصلوا بعد العصر، إلا أن تصلوا والشمس مرتفعة `.
أخرجه أبو يعلى في ` مسنده ` (30 / 1 و 40 / 2) من طريق سفيان وشعبة وجرير
بن عبد الحميد عن منصور بن المعتمر عن هلال بن يساف عن وهب بن الأجدع عن علي به.
وهذا إسناد صحيح، وقد أخرجه أبو داود وغيره كما تقدم برقم (200) .
وفي هذين الحديثين دليل على أن ما اشتهر في كتب الفقه من المنع عن الصلاة بعد
العصر مطلقا ولو كانت الشمس مرتفعة نقية مخالف لصريح هذين الحديثين وحجتهم في
ذلك الأحاديث المعروفة في النهي عن الصلاة بعد العصر، مطلقا، غير أن الحديثين
المذكورين يقيدان تلك الأحاديث فاعلمه.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: তোমরা সূর্য উদয়ের সময় এবং সূর্য অস্ত যাওয়ার সময় সালাত আদায় করবে না। কারণ এটি (সূর্য) শয়তানের শিংয়ের উপর দিয়ে উদিত হয় এবং অস্ত যায়। আর এই দুই সময়ের মাঝখানে তোমরা যা চাও সালাত আদায় করো।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (315)


315 - ` كل شيء ليس من ذكر الله عز وجل فهو لغو ولهو أو سهو إلا أربع خصال: مشي
الرجل بين الغرضين، وتأديبه فرسه، وملاعبته أهله، وتعلم السباحة `.
أخرجه النسائي في ` كتاب عشرة النساء ` (ق 74 / 2) والزيادة له،
والطبراني في ` المعجم الكبير ` (1 / 89 / 2) وأبو نعيم في ` أحاديث أبي
القاسم الأصم ` (ق




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: যা কিছু মহান আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লার স্মরণ (যিকির) থেকে বিচ্ছিন্ন, তা সবই অর্থহীন (লغو), খেল-তামাশা (লাহও) অথবা ভুলে যাওয়া (সহও) হিসাবে গণ্য হবে। তবে চারটি কাজ এর ব্যতিক্রম: লক্ষ্যবস্তুর (নিশানার) মধ্যখানে মানুষের হেঁটে যাওয়া, তার ঘোড়াকে প্রশিক্ষণ দেওয়া, তার স্ত্রীর সাথে হাসি-খুশি ও প্রীতিকর আচরণ করা এবং সাঁতার শেখা।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (316)


316 - ` كان يسلم تسليمة واحدة `.
أخرجه الطبراني في ` المعجم الأوسط ` (1 / 42 /




তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একবার মাত্র সালাম (তাসলিম) ফিরাতেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (317)


317 - ` إذا رجعت إلى بيتك فمرهم فليحسنوا غذاء رباعهم ومرهم فليقلموا أظفارهم
ولا يبطوا بها ضروع مواشيهم إذا حلبوا `.
رواه الإمام أحمد (3 / 484) حدثنا أبو النضر حدثنا المرجى بن رجاء اليشكري
قال: حدثني سلم بن عبد الرحمن قال: سمعت سوادة بن الربيع قال:
أتيت النبي صلى الله عليه وسلم فسألته فأمر لي بذود ثم قال لي: فذكره.
وهذا سند حسن: أبو النضر هو هاشم بن القاسم ثقة ثبت، والمرجى وسلم بن
عبد الرحمن صدوقان كما في ` التقريب `، وفي المرجى كلام لا يضر إن شاء الله
تعالى ولذلك قواه الهيثمي حيث قال: (8 / 196) رواه أحمد وإسناده جيد.




সুওয়াদা ইবনু আর-রাবী’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:
যখন তুমি তোমার বাড়িতে ফিরে যাবে, তখন তুমি তাদের আদেশ দেবে যেন তারা তাদের যুবক পশুগুলোর (চার বছর বয়সী উট বা অন্য পশুর) খাদ্যের উত্তম ব্যবস্থা করে। আর তুমি তাদের আদেশ দেবে যেন তারা তাদের নখগুলো কেটে ফেলে, এবং দুধ দোহনের সময় তারা যেন এর দ্বারা তাদের গৃহপালিত পশুগুলোর স্তনে আঘাত না করে (বা ছিদ্র করে না ফেলে)।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (318)


318 - ` لا غرار في صلاة، ولا تسليم `.
أخرجه أبو داود (928) والحاكم (1 / 264) كلاهما عن الإمام أحمد وهذا في
` المسند ` (2 / 461) والطحاوي في ` مشكل الآثار ` (2 / 229) من
طريق
عبد الرحمن بن مهدي عن سفيان عن أبي مالك الأشجعي عن أبي حازم عن أبي هريرة
عن النبي صلى الله عليه وسلم به. زاد أبو داود.
` قال أحمد: يعني - فيما أرى - أن لا تسلم، ولا يسلم عليك، ويغرر الرجل
بصلاته، فينصرف وهو فيها شاك `.
ثم روى أحمد عن سفيان قال: سمعت أبي يقول: سألت أبا عمرو الشيباني عن قول
رسول الله صلى الله عليه وسلم ` لا إغرار في الصلاة ` فقال: إنما هو ` لا غرار
في الصلاة `، ومعنى (غرار) ، يقول: لا يخرج منها، وهو يظن أنه قد بقي
عليه منها شيء، حتى يكون على اليقين والكمال `.
وقال الحاكم: ` صحيح على شرط مسلم `.
ووافقه الذهبي. وهو كما قالا.
(فائدة) :
قال ابن الأثير في ` النهاية `:
` (الغرار) النقصان، وغرار النوم قلته، ويريد بـ (غرار الصلاة) نقصان
هيأتها وأركانها، و (غرار التسليم) أن يقول المجيب ` وعليك ` ولا يقول
` السلام `، وقيل: أراد بالغرار النوم، أي ليس في الصلاة نوم.
و` التسليم ` يروى بالنصب والجر، فمن جره كان معطوفا على الصلاة كما تقدم،
ومن نصب كان معطوفا على الغرار، ويكون المعنى: لا نقص ولا تسليم في صلاة،
لأن الكلام في الصلاة بغير كلامها لا يجوز `.
قلت: ومن الواضح أن تفسير الإمام أحمد المتقدم، إنما هو على رواية النصب،
فإذا صحت هذه الرواية، فلا ينبغي تفسير ` غرار التسليم ` بحيث يشمل تسليم غير
المصلي على المصلي، كما هو ظاهر كلام الإمام أحمد، وإنما يقتصر فيه على
تسليم المصلي على من سلم عليه، فإنهم قد كانوا في أول الأمر يردون السلام
في
الصلاة، ثم نهاهم رسول الله صلى الله عليه وسلم، وعليه يكون هذا الحديث من
الأدلة على ذلك.
وأما حمله على تسليم غير المصلي على المصلي، فليس بصواب لثبوت تسليم الصحابة
على النبي صلى الله عليه وسلم في غير ما حديث واحد، دون إنكار منه عليهم، بل
أيدهم على ذلك بأن رد السلام عليهم بالإشارة، من ذلك حديث ابن عمر قال:
` خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى قباء، يصلي فيه، قال: فجاءته
الأنصار، فسلموا عليه، وهو يصلي، قال: فقلت لبلال: كيف رأيت رسول الله
صلى الله عليه وسلم يرد عليهم حين كانوا يسلمون عليه، وهو يصلي، قال:
يقول: هكذا، وبسط كفه، وبسط جعفر بن عون - أحد رواة الحديث - كفه وجعل
بطنه أسفل، وجعل ظهره إلى فوق `.
أخرجه أبو داود وغيره، وهو حديث صحيح كما بينته في تعليقي على ` كتاب
الأحكام ` لعبد الحق الإشبيلي (رقم الحديث 1369) ، ثم في ` صحيح أبي داود `
(860) وقد احتج به الإمام أحمد نفسه وذهب إلى العمل به، فقال إسحاق
بن منصور المروزي في ` المسائل ` (ص 22) : قلت: تسلم على القوم، وهم في
الصلاة؟ قال: نعم، فذكر قصة بلال حين سأله ابن عمر: كيف كان يرد؟ قال:
كان يشير.
قال المروزي: ` قال إسحاق كما قال `.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ইরশাদ করেছেন:

“নামাজে কোনো প্রকার ঘাটতি (ত্রুটি বা সন্দেহ) নেই, এবং (নামাজের মধ্যে) সালাম দেওয়া বা উত্তর দেওয়াও নেই।”

[এই হাদীসটি আবু দাউদ (৯২৮) এবং হাকিম (১/২৬৪) বর্ণনা করেছেন।]

ইমাম আহমদ (রাহিমাহুল্লাহ) এই হাদীসের ব্যাখ্যায় বলেন— আমার মতে, এর অর্থ হলো: সালাতে থাকা অবস্থায় কাউকে সালাম দেবে না, আর তোমার প্রতি কেউ সালাম দিলেও তার উত্তর দেবে না। এবং নামাজে ’গারার’ (ঘাটতি) দ্বারা উদ্দেশ্য হলো, ব্যক্তি যেন তার সালাত নিয়ে সন্দিহান অবস্থায় ফিরে না যায়, বরং পূর্ণ নিশ্চিত হয়ে সালাত সম্পন্ন করে।

তিনি (ইমাম আহমদ) আরও উল্লেখ করেন, সুফিয়ান (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন যে তিনি তাঁর পিতাকে বলতে শুনেছেন, তিনি আবু আমর আশ-শায়বানীকে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের বাণী ‘লা ইগরার ফিস সালাহ’ সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলে তিনি বলেন, এটি মূলত ‘লা গারার ফিস সালাহ’ (নামাজে কোনো ঘাটতি নেই)। আর ‘গারার’-এর অর্থ হলো, মুসল্লি সালাত থেকে এমন অবস্থায় বের হবে না যে তার মনে সন্দেহ আছে যে সালাতের কিছু অংশ বাকি রয়ে গেছে, বরং সে পূর্ণাঙ্গ ও নিশ্চিত হওয়ার পরই বের হবে।

ইবনুল আসীর (রাহিমাহুল্লাহ) ‘নিহায়া’ গ্রন্থে বলেন: ‘গারার’ (غرار) অর্থ হলো— نقصان (ঘাটতি বা অপূর্ণতা)। সালাতের ‘গারার’ হলো এর কাঠামো ও রুকনসমূহের ঘাটতি করা। আর ‘গারারুত-তাসলিম’ (সালামের ঘাটতি) হলো— উত্তরদাতা যেন কেবল ‘ওয়া আলাইক’ বলে, কিন্তু ‘আস-সালাম’ শব্দটি উল্লেখ না করে। কেউ কেউ বলেন, গারার দ্বারা উদ্দেশ্য হলো ঘুম। অর্থাৎ, সালাতে ঘুম নেই।

মুহাদ্দিসগণ বলেন, যেহেতু সালাতে সালাতের বাইরের কোনো কথা বলা বৈধ নয়, তাই এই হাদীসটি প্রমাণ করে যে সালাতে থাকা অবস্থায় সালামের উত্তর দেওয়া বা কাউকে সালাম দেওয়া নিষিদ্ধ।

তবে, সালাত আদায়কারীকে অন্য কেউ সালাম দিলে তিনি ইশারার মাধ্যমে জবাব দিতে পারেন। যেমন ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞাসা করেছিলেন যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন সালাতরত ছিলেন এবং সাহাবাগণ তাঁকে সালাম দিতেন, তখন তিনি কীভাবে জবাব দিতেন? জবাবে বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তিনি হাত দিয়ে ইশারা করতেন। এই হাদীসটি সহীহ হিসেবে প্রমাণিত এবং ইমাম আহমদ (রাহিমাহুল্লাহ) নিজেও এর উপর আমল করতেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (319)


319 - ` لما أسن صلى الله عليه وسلم، وحمل اللحم اتخذ عمودا في مصلاه يعتمد عليه `.
أخرجه أبو داود (948) : حدثنا عبد السلام بن عبد الرحمن الوابصي حدثنا
أبي عن شيبان عن حصين بن عبد الرحمن عن هلال بن يساف قال:
` قدمت الرقة، فقال لي بعض أصحابي: هل لك في رجل من أصحاب النبي صلى الله
عليه وسلم؟ قال: قلت: غنيمة، فدفعنا إلى وابصة، قلت لصاحبي: نبدأ فننظر
إلى دله، فإذا عليه قلنسوة لاطئة، ذات أذنين، وبرنس خز أغبر، وإذا هو
معتمد على عصا في صلاته، فقلنا (له) بعد أن سلمنا؟ قال:
حدثتني أم قيس بنت محصن:
` أن رسول الله صلى الله عليه وسلم لما أسن ... `.
قلت: وهذا إسناد رجاله كلهم ثقات غير عبد الرحمن الوابصي والد عبد السلام،
واسم أبيه صخر بن عبد الرحمن، قال عبد الحق الإشبيلي في ` الأحكام `
(رقم




উম্মে কায়স বিনতে মিহসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

রাসুলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম যখন বৃদ্ধ হলেন এবং তাঁর শরীর ভারি হলো (বা স্থূলকায় হলেন), তখন তিনি তাঁর সালাতের স্থানে একটি লাঠি গ্রহণ করলেন, যার উপর তিনি ভর দিতেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (320)


320 - ` ليس المؤمن بالطعان ولا باللعان ولا بالفاحش ولا بالبذي `.
أخرجه الإمام أحمد (1 /




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: মুমিন ব্যক্তি কখনো অভ্যাগত দোষারোপকারী (বা খোঁটা দানকারী) হয় না, অভিশাপদাতা হয় না, অশ্লীলভাষী হয় না এবং অশিষ্টভাষী (বা কটূভাষী) হয় না।