সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ
3107 - (إنَّ رسولَ الله يفعلُ ذلكَ (يعني: تقبيلَ الزوجةِ وهو صائمٌ) ، أنا أتقاكم للهِ، وأعلمُكم بحدودِ اللهِ) .
أخرجه عبد الرزاق في `المصنف ` (4/184/8412) ، ومن طريقه: أحمد (5/434) : أنا ابن جريج: أخبرني زيد بن أسلم عن عطاء بن يسار عن رجل من الأنصار: أن الأنصاري أخبر عطاءً:
أنه قبَّل امرأته على عهد رسول الله - صلى الله عليه وسلم - وهو صائم، فأمر امرأته فسألت النبي - صلى الله عليه وسلم - عن ذلك؟ فقال النبي - صلى الله عليه وسلم - :
`إن رسول الله يفعل ذلك `.
فأخبرته امرأته فقال: إن النبي يرخص له في أشياء، فارجعي إليه فقولي له، فرجعت إلى النبي - صلى الله عليه وسلم - فقالت: قال: إن النبي يرخص له في أشياء؟ ! فقال:
`أنا أتقاكم لله، وأعلمكم بحدود الله `.
قلت: وهذا إسناد صحيح رجاله كلهم ثقات رجال الشيخين إلا الرجل الأنصاري فهو لم يسم، ومعلوم أن جهالة الصحابي لا تضر؛ لأنهم كلهم عدول عند أهل السنة.
والحديث أخرجه مالك (1/273) عن زيد بن أسلم عن عطاء بن يسار: أن رجلاً ... ؛ فأرسله. لم يذكر الرجل الأنصاري، والموصول أرجح؛ لأن زيادة الثقة مقبولة.
وللحديث شواهد كثيرة من حديث عائشة وغيرها بنحوه من طرق بألفاظ متقاربة، تقدم أحدها برقم (328) ، وفي طريق آخر عنها بلفظ:
`والله! إني لأرجو أن أكون أخشاكم لله، وأعلمكم بما أتقي `.
أخرجه مسلم وابن خزيمة وابن حبان في `صحاحهم `، وهو مخرج في `صحيح أبي داود` (2067) .
وقد كان تقدم مني تخريج هذا الحديث برواية أحمد فقط عقب حديث عائشة المشار إليه آنفاً (329) ، والآن قدر لي إعادة تخريجه بزيادة فائدة والحمد لله.
وله شاهد بنحوه من حديث عمر بن أبي سلمة عند مسلم وغيره، وهو مخرج في ` الإرواء ` (4/84) . *
আনসারী সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,
তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর যুগে রোযা অবস্থায় তাঁর স্ত্রীকে চুম্বন করলেন। তিনি তাঁর স্ত্রীকে আদেশ দিলেন যেন তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর কাছে এ বিষয়ে জিজ্ঞাসা করেন। তাঁর স্ত্রী নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর কাছে জিজ্ঞাসা করলে, তিনি (নবী) বললেন:
**"নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহও (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অনুরূপ করে থাকেন।"**
তাঁর স্ত্রী (ফিরে এসে) তাঁকে একথা জানালে, তিনি (সাহাবী) বললেন: "নবীজীকে তো কিছু কিছু ক্ষেত্রে বিশেষ অনুমতি দেওয়া হয়েছে। তুমি তাঁর কাছে আবার যাও এবং তাঁকে এই কথা বলো।" স্ত্রী পুনরায় নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর কাছে ফিরে গিয়ে বললেন: (আমার স্বামী) বলেছেন, "নবীজীকে তো কিছু কিছু ক্ষেত্রে বিশেষ অনুমতি দেওয়া হয়েছে!"
তখন তিনি (রাসূলুল্লাহ সাঃ) বললেন:
**"আমি তোমাদের মধ্যে আল্লাহকে সর্বাধিক ভয়কারী (সবচেয়ে মুত্তাকী), এবং তোমাদের মধ্যে আল্লাহর সীমাসমূহ সম্পর্কে সর্বাধিক জ্ঞাত।"**
3108 - (إنَّه سيُلحِدُ فيه رجلٌ من قريشٍ، لو وُزنتْ ذنوبُه بذنوبِ الثقلينِ لرجحت. يعني: الحرم) .
أخرجه أحمد (2/136) : ثنا محمد بن كُنَاسة: ثنا إسحاق بن سعيد عن أبيه قال:
أتى عبد الله بن عمر عبد الله بن الزبير فقال: يا ابن الزبير! إياك والإلحاد في - حرم الله تبارك وتعالى؛ فإني سمعت رسول الله - صلى الله عليه وسلم - يقول ... فذكره. قال: فانظر لا تكونه.
قلت: وهذا إسناد رجاله ثقات رجال الشيخين؛ غير محمد بن كناسة - وهو محمد بن عبد الله بن عبد الأعلى بن كناسة الكوفي - وهو ثقة، لكن قال أبو حاتم: ` كان صاحب أخبار، يكتب حديثه ولا يحتج به `.
قلت: وقد خالفه هاشم بن القاسم، فقال أحمد في مسند عبد الله بن عمرو (2/219) : ثنا هاشم: ثنا إسحاق - يعني: ابن سعيد - : ثنا سعيد بن عمرو قال:
أتى عبد الله بن عمرو ابن الزبير، وهو جالس في الحجر فقال: يا ابن الزبير! إياك والإلحاد.. الحديث نحوه، قال: فانظر أن لا تكون هو يا ابن عمرو! فإنك قد قرأت الكتب، وصحبت الرسول - صلى الله عليه وسلم - ، قال: فإني أشهدك أن هذا وجهي إلى الشام مجاهداً.
قلت: وهذا إسناد صحيح، رجاله كلهم ثقات رجال الشيخين، فهو أصح من الذي قبله؛ فإن هاشم بن القاسم - وهو أبو النضر الليثي مولاهم البغدادي - قال الحافظ فيه:
`ثقة ثبت `.
وقال في الذي قبله - ابن كناسة - :
` صدوق `.
وقال الهيثمي في حديث ابن كناسة هذا (3/258) :
`رواه أحمد، ورجاله ثقات `.
وقال في حديث هاشم:
`رواه أحمد، ورجاله رجال الصحيح `.
وإذا عرفت هذا؛ فقد اختلفا في راوي هذا الحديث عن رسول الله - صلى الله عليه وسلم - والقائل لابن الزبير: إياك والإلحاد في.. فقال ابن كناسة: عبد الله بن عمر، وقال هاشم: عبد الله بن عمرو. وهذا هو الأرجح؛ لأن هاشماً أحفظ من ابن كناسة كما عرفت من ترجمة الحافظ لهما، ومن تخريج الهيثمي لحديثهما. ويؤيد ذلك أمور ثلاثة:
الأول: أن ابن كناسة اضطرب في إسناده، فرواه مرة عن إسحاق بن سعيد كما تقدم. ومرة قال: ثنا إسحاق بن عيسى بن عاصم عن أبيه قال ... فذكره مثل روايته المتقدمة.
أخرجه الحاكم (2/388) من طريق الحسين بن الفضل البجلي: ثنا محمد ابن كناسة به. وقال:
` صحيح الإسناد `.
ورده الذهبي بقوله:
`قلت: [قال] أبو حاتم: ابن كناسة لا يحتج به `.
والحسين الراوي عنه إمام محدث مفسر لغوي جليل، له ترجمة في `سير الأعلام ` (13/ 414) للذهبي، ولذلك أنكر عليه الحافظ في `اللسان ` إيراده إياه في ` الميزان ` وقال:
`فكان الأولى أن لا يذكره لجلالته `. فراجع `اللسان ` (2/
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:
“নিশ্চয়ই কুরাইশ গোত্রের একজন লোক এই স্থানে (অর্থাৎ পবিত্র হারামে) সীমা লঙ্ঘন বা ধর্মদ্রোহিতা করবে। যদি তার পাপসমূহকে সাক্বালাঈন (মানুষ ও জিন) এর পাপসমূহের সাথে ওজন করা হয়, তবে তার পাপই ভারী হবে।”
3109 - (كُلُوهُ من ذِي الحجَّةِ إلى ذي الحجَّةِ. يعني: لحمَ الأضاحي) .
أخرجه البخاري في ` التاريخ ` (4/2/
তোমরা এটি যিলহজ্জ মাস থেকে (পরবর্তী) যিলহজ্জ মাস পর্যন্ত খাও। অর্থাৎ: (এর দ্বারা) কুরবানীর গোশত বোঝানো হয়েছে।
3110 - (نهى أنْ يجلسَ بين الضَّحِّ والظل، وقال: مجلس الشيطان) .
أخرجه أحمد (3/
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,
নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম রোদ এবং ছায়ার মাঝামাঝি স্থানে বসতে নিষেধ করেছেন এবং তিনি বলেছেন: এটি শয়তানের বসার স্থান।
3111 - (ليسَ في الأرضِ منَ الجنةِ إلا ثلاثةُ أشياء: غرْسُ العجوة، وأواقٍ تنزلُ في الفراتِ كلَّ يومٍ من بركةِ الجنةِ والحَجَرُ) .
أخرجه الخطيب في `التاريخ ` (1/55) قال: أخبرنا القاضي أبو عمر القاسم
ابن جعفر بن عبد الواحد الهاشمي - بالبصرة - قال: نا عبد الرحمن بن أحمد الخُتَّلي قال: حدثني عبد الله بن محمد بن علي البَلْخي قال: نا محمد بن أبان قال: نا أبو معاوية عن الحسن بن سالم بن أبي الجعد عن أبيه عن أبي هريرة: قال: قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ... فذكره.
قلت: وهذا إسناد جيد، رجاله كلهم ثقات، وإليك البيان:
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: পৃথিবীতে জান্নাতের তিনটি জিনিস ছাড়া আর কিছু নেই: আজওয়া খেজুরের চারা, জান্নাতের বরকতময় অংশ যা প্রতিদিন ফুরাত নদীতে নেমে আসে এবং (হাজরে আসওয়াদ) পাথর।
3112 - (اجعلُوا من صلاتِكم في بُيوتِكم، ولا تجعلُوها عليكم قُبوراً، كما اتَّخذت اليهود والنصارى في بيوتهم قبوراً، وإنَّ البيت ليُتلى فيه القرآن؛ فيتراءى لأهلِ السماء كما تتراءى النجومُ لأهل الأرضِ) .
أخرجه الذهبي في `سير أعلام النبلاء` (8/
তোমরা তোমাদের কিছু সালাত তোমাদের ঘরে আদায় করো এবং তোমাদের ঘরগুলোকে নিজেদের জন্য কবর বানিয়ে ফেলো না, যেমন ইহুদি ও নাসারারা তাদের ঘরগুলোকে কবরের ন্যায় বানিয়েছিল। আর নিশ্চয় যে ঘরে কুরআন তিলাওয়াত করা হয়, তা আসমানবাসীদের নিকট এমনভাবে দৃশ্যমান হয়, যেমন পৃথিবীর অধিবাসীদের নিকট নক্ষত্ররাজি দৃশ্যমান হয়।
3113 - (الله الله في قبطِ مِصرَ؛ فإنَّكم ستظهرونَ عليهم، ويكونُون لكم عُدَّةً وأعواناً في سبيل الله) .
أخرجه الطبراني في `الكبير` (23/265/561) قال: حدثنا زكريا بن يحيى الساجي: ثنا بُندار. ح حدثنا محمد بن صالح النَّرْسي: حدثنا محمد ابن المثنى قالا: حدثنا وهب بن جرير: حدثنا أبي عن يحيى بن أيوب عن يزيد ابن أبي حبيب عن أبي سلمة عن أم سلمة: أن رسول الله - صلى الله عليه وسلم - أوصى عند وفاته فقال ... فذكره.
قلت: وهذا إسناد صحيح لا أعرف له علة؛ فإن رجاله كلهم ثقات رجال الشيخين؛ غير شيخي الطبراني، لكن الأول منهما زكريا الساجي؛ فهو ثقة حافظ مترجم في `تذكرة الحفاظ `، وقال في `الميزان `:
`أحد الأثبات، ما عرفت فيه جرحاً أصلاً `.
وشيخه `بُندار` اسمه محمد بن بشار أبو بكر، وقد تابعه محمد بن المثنى،
وهو المعروف بـ `الزَّمِن `، وكلاهما من رجالهما، قال الحافظ في `التقريب `:
`وكان هو و`بندار` فَرَسَيْ رهان، وماتا في سنة واحدة`.
لكن الراوي عنه محمد بن صالح النرسي لم أجد له ترجمة، وقد روى له الطبراني في `المعجم الصغير` حديثاً واحداً (129/
উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর ওফাতের সময় উপদেশ দিয়ে বললেন:
"মিশরের কিবতিদের (খ্রিস্টান) ব্যাপারে আল্লাহকে ভয় করো, আল্লাহকে ভয় করো (তাদের সাথে সদ্ব্যবহার করো)! কেননা তোমরা তাদের উপর অবশ্যই কর্তৃত্ব লাভ করবে, আর তারা তোমাদের জন্য আল্লাহর পথে শক্তি ও সাহায্যকারী হবে।"
3114 - (إن سَرَّك أنْ تفي بنذْركِ؛ فأعتقي مُحَرَّراً من هؤلاء. يعني: من بني العَنْبرِ) .
أخرجه مسلم (7/181) - ولم يسق لفظه - ، والحاكم (4/84) ، والبيهقي (9/75) من طريق مسلمة بن علقمة المازني عن داود بن أبي هند عن عامر عن أبي هريرة رضي الله عنه قال:
ثلاث سمعتهن لبني تميم من رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ؛ لا أبغض بني تميم بعدهن أبداً:
كان على عائشة رضي الله عنها نذرُ محرَّر من ولد إسماعيل، فسُبِيَ سَبْيٌّ من بني العنبر، فلما جيء بذلك السبي، قال لها رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ... فذكر الحديث وقال: فجعلهم من ولد إسماعيل.
وجيء بنَعَم من نعم الصدقة، فلما رآه راعه حسنه قال: فقال:
`هذا نَعَمُ قومي `، فجعلهم قومه، قال: وقال:
`هم أشد قتالاً في الملاحم `.
وقال الحاكم:
`حديث صحيح على شرط مسلم `.
وبيض له الذهبي، ولعل الحاكم إنما استدركه على مسلم؛ لأنه لم يسقه بتمامه وإنما ساق منه جملة الملاحم، وأحال سائره على حديث قبله من رواية أبي زرعة قال: قال أبو هريرة ... فذكر الحديث بتمامه نحوه. وقال في الجملة:
`هم أشد أمتي على الدجال `.
وهكذا أخرجه البخاري (2543 و 4366) ، وأبو يعلى في `مسنده ` (10/493/6108) ، ومن طريقه: البيهقي (7/11) .
وأخرجه أحمد (2/390) مختصراً بلفظ:
`هذه صدقة قومي، وهم أشد الناس على الدجال. يعني: بني تميم `.
قال أبو هريرة: ما كان قوم من الأحياء أبغض إلي منهم، فأحببتهم منذ سمعت رسول الله - صلى الله عليه وسلم - يقول هذا.
وحديث الترجمة له شاهدان:
أحدهما: من حديث ابن عمر، بسند حسن، وصححه الحافظ ابن حجر في `مختصر الزوائد ` (2/382) .
والآخر: من حديث ابن مسعود، بسند ضعيف.
رواهما البزار، وهما مخرجان في الكتاب الآخر (5731) . *
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট থেকে বনু তামিম গোত্র সম্পর্কে আমি তিনটি কথা শুনেছি। এরপর থেকে আমি তাদের প্রতি আর কখনো ঘৃণা পোষণ করিনি।
১. আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উপর ইসমাঈল (আঃ)-এর বংশোদ্ভূত একজন দাস মুক্ত করার মানত ছিল। একবার বনু আনবার গোত্রের কিছু যুদ্ধবন্দীকে (দাসী-দাস) ধরে আনা হলো। যখন সেই বন্দীদের আনা হলো, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁকে (আয়িশা রাঃ-কে) বললেন: **"যদি তোমার মানত পূর্ণ করা তোমাকে আনন্দিত করে, তবে এদের (অর্থাৎ বনু আনবার গোত্রের) মধ্য থেকে একজন মুক্ত করে দাও।"** এভাবে তিনি তাদের (বনু আনবারকে) ইসমাঈল (আঃ)-এর বংশধর বলে গণ্য করলেন।
২. একবার সাদাকার (যাকাতের) কিছু পশু আনা হলো। যখন তিনি সেগুলোর সৌন্দর্য দেখে মুগ্ধ হলেন, তখন বললেন: "এগুলো আমার কওমের পশু।" এভাবে তিনি তাদের তাঁর কওম হিসেবে গণ্য করলেন।
৩. তিনি আরও বললেন: "মহা যুদ্ধসমূহে (আল-মালাহিম) তারা (বনু তামিম) হবে সবচেয়ে কঠোর যোদ্ধা।"
3115 - (كان في الكعبة صورٌ، فأمَرَ عمر بن الخطاب أنْ يمحوَها، فَبَلَّ عمرُ ثوباً ومحاها به، فدخلها - صلى الله عليه وسلم - وما فيها من شيءٍ) .
أخرجه أحمد (3/396) : ثنا سليمان بن داود: حدثنا عبد الرحمن عن موسى بن عقبة عن أبي الزبير عن جابر قال ... فذكره.
قلت: وهذا إسناد جيد على شرط مسلم، وأبو الزبير قد صرح بالتحديث وتوبع كما يأتي؛ فقال أحمد (3/383) : ثنا روح: ثنا ابن جريج: أخبرني أبو الزبير: أنه سمع جابر بن عبد الله يقول ... فذكره بنحوه.
وهذا إسناد متصل صحيح.
ثم أخرجه أحمد (3/335) ، والبيهقي في `دلائل النبوة` (5/73) من طريقين آخرين عن ابن جريح به.
وتابعه ابن لهيعة: ثنا أبو الزبير به.
أخرجه أحمد (3/336) .
وتابعه وهب عن جابر به.
أخرجه ابن سعد في `الطبقات ` (2/142) بسند جيد عن وهب، وهو ابن مُنَبَّه اليماني، وهو تابعي ثقة من رجال الشيخين.
وللحديث شاهدان مختصران:
أحدهما: عن صفية بنت شيبة قالت:
رأيت رسول الله - صلى الله عليه وسلم - بَلَّ ثوباً وهو في الكعبة، ثم جعل يضرب التصاوير التي فيها.
أخرجه الطبراني `المعجم الكبير` (24/323/811) : حدثنا جعفر بن الفضل المُخَرَّمي المؤدب: ثنا داود بن عبد الله بن أبي الكرام الجعفري: ثنا عبد العزيز بن محمد الدراوردي عن منصور بن صفية بنت شيبة عن أمه..
وهذا إسناد حسن رجاله صدوقون مترجمون في `التهذيب ` غير جعفر هذا، أورده الخطيب في `تاريخ بغداد` (7/194) برواية الطبراني فقط عنه، وساق له حديثاً آخر، رواه في ` المعجم الصغير` (
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
কা’বা শরীফের ভেতরে কিছু ছবি ছিল। তখন উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেগুলোকে মুছে ফেলার নির্দেশ দিলেন। অতঃপর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একটি কাপড় ভিজিয়ে নিলেন এবং তা দিয়ে ছবিগুলো মুছে দিলেন। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) কা’বার ভেতরে প্রবেশ করলেন, যখন তার মধ্যে (কোনো ছবি বা আপত্তিকর) কিছুই অবশিষ্ট ছিল না।
3116 - (كان يستَحبُّ للرجل أن يقاتل تحت راية قومه) .
أخرجه أحمد (4/263) قال: ثنا يحيى بن عبد الملك بن أبي غَنِيَّة قال: حدثنا عقبة بن المغيرة عن جد أبيه المخارق قال:
لقيت عماراً يوم الجمل، وهو يبول في قرن؛ فقلت: أقاتل معك فأكون معك؟ فقال:
قاتل تحت راية قومك؛ فإن رسول الله - صلى الله عليه وسلم - كان ... الحديث.
وأخرجه أبو يعلى في `مسنده ` (3/206/1641) : حدثنا عبد الله بن عمر بن أبان: حدثنا ابن أبي غنية به؛ إلا أنه أدخل واسطة بين عقبة والجد، فقال: `عمن حدثه عن جد أبيه.. `.
قلت: وهذه الزيادة أقرب إلى الصواب، ولعل ابن أبي غنية كان يضطرب في إسناده؛ فيذكرها أحياناً، وتسقط عنه أحياناً؛ فإنه - وإن كان ثقة، واحتج به مسلم، وخرج له البخاري مقروناً بآخر؛ كما في `الميزان ` ـ؛ فقد قال ابن عدي في `الكامل ` (7/210) :
`بعض ما يرويه لا يتابع عليه، وهو ممن يكتب حديثه `.
أضف إلى ذلك أن السَّقط لا يمكن أن ينسب إلى الإمام أحمد؛ لأنه إمام في الحفظ والضبط، ولأن الذي روى الزيادة عنه - وهو ابن أبان - ثقة أيضاً.
وإنما قلنا: إن الزيادة أقرب إلى الصواب؛ لأنه قد توبع عليها في الجملة؛ فقد رواه البخاري في ` التاريخ ` (4/1/430/1890) ، والبزار (2/278/1700) من طريقين عن عقبة بن المغيرة قال: حدثني إسحاق بن أبي إسحاق الشيباني عن أبيه عن المخارق بن سليم قال:
`رأيت عماراً يوم الجمل.. `. الحديث.
وقال البزار:
`لا نعلمه عن النبي - صلى الله عليه وسلم - إلا بهذا الإسناد`.
قلت: وهو حسن إن شاء الله تعالى، ولا بد من الكلام على رجاله ولو بإيجاز بعد أن اتفق الثقتان عليه، فأقول:
أما عقبة بن المغيرة؛ فهو صدوق، وثقه ابن حبان، وروى عنه جمع، كما كنت حققته في `الضعيفة` تحت الحديث (6035) .
ونحوه شيخه إسحاق بن أبي إسحاق الشيباني، كما تراه هناك.
وأما أبوه - واسمه سليمان بن أبي سليمان الشيباني - ؛ فثقة من رجال الشيخين.
وأما المخارق بن سُليم - وهو الشيباني - فهو تابعي كما في هذه الرواية، وصرح بذلك ابن حبان فذكره في `ثقات التابعين ` (5/444) برواية ابنه عبد الله عنه. وزاد في `التهذيب ` ابناً ثانياً عنه: قابوس. وظاهر صنيعه أنه لم يفرق بين المخارق ابن سليم الشيباني هذا الذي روى عنه أبو إسحاق الشيباني وبين مخارق أبي قابوس، وعنه ابنه قابوس. وقد ذكرهما البخاري في موضعين وابن أبي حاتم، خلافاً لابن حبان؛ فإنه ذكر في ترجمة أبي قابوس أنه روى عن علي وعمار، وهذا ذكره ابن أبي حاتم في الشيباني. وقال الحافظ في `التقريب `:
`مخارق بن سُليم الشيباني أبو قابوس، مختلف في صحبته، وذكره ابن حبان في ثقات التابعين `.
وأما الذهبي؛ فجزم في `الكاشف ` بأنه صحابي!
قلت: فمثله حسن الحديث إن شاء الله تعالى.
والحديث قال الهيثمي في `مجمع الزوائد` (5/326) :
`رواه أحمد - وإسناده منقطع - ، وأبو يعلى، والبزار، والطبراني، وفيه إسحاق ابن أبي إسحاق الشيباني، روى عنه جماعة، ولم يضعفه أحد، وبقية أحد أسانيد الطبراني ثقات `. *
মাখারিক ইবনে সুলাইম (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত:
আমি জামাল যুদ্ধের দিন আম্মার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে সাক্ষাৎ করলাম। তখন তিনি একটি পাত্রে পেশাব করছিলেন। আমি বললাম, আমি কি আপনার সাথে যুদ্ধ করব এবং আপনার সাথে থাকব?
তিনি বললেন, তুমি তোমার নিজ গোত্রের পতাকার নিচে যুদ্ধ করো। কেননা, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট এটা পছন্দনীয় ছিল যে, কোনো ব্যক্তি যেন তার নিজ গোত্রের পতাকার নিচে থেকে লড়াই করে।
3117 - (إنْ لمْ تجدِيني فَأتي أبا بكرٍ) .
أخرجه البخاري (3659 و7220 و360) ، ومسلم (7/110) ، والترمذي (3677) وصححه، وابن حبان (8/226/6622) ، والطيالسي في `مسنده ` (944) ، وكذا أحمد (4/82 و 83) ، وأبو يعلى (13/399/7402) ، وعنه ابن
حبان أيضاً (9/12/6832) ، وابن أبي عاصم في `السنة` (2/547/1151) ، والبيهقي في `السنن ` (8/153) من حديث جبير بن مطعم قال:
أتت امرأة النبي - صلى الله عليه وسلم - ، فأمرها أن ترجع إليه، قالت: أرأيت إن جئتُ ولم أجدكَ؟ كأنها تقول الموت، قال - صلى الله عليه وسلم - ... فذكره. *
জুবাইর ইবনে মুত’ইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
এক মহিলা নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম)-এর কাছে এলেন। তিনি তাকে (পরে) আবার তাঁর কাছে ফিরে আসার নির্দেশ দিলেন। মহিলাটি জিজ্ঞেস করলেন, "আপনি কি মনে করেন, যদি আমি আসি এবং আপনাকে না পাই?" (বর্ণনাকারী বলেন, যেন তিনি নাবীজীর মৃত্যুর ইঙ্গিত করছিলেন)। নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) বললেন, "যদি তুমি আমাকে না পাও, তবে আবূ বকরের কাছে যেও।"
3118 - (تَهجُمون على رجلٍ مُعتَجرٍ ببردٍ حَبِرَةٍ، يبايعُ الناسَ، من أهل الجنة)
أخرجه ابن أبي عاصم في `السنة` (2/290/1292) ، والحاكم (3/98) ، وابن عدي في `الكامل ` (3/393) ، وابن عساكر في `تاريخ دمشق ` (9/
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
তোমরা এমন একজন লোককে ঘিরে ধরেছ (বা আক্রমণ করতে উদ্যত হয়েছ), যিনি একটি মূল্যবান ডোরাকাটা চাদর দিয়ে (মাথা ও মুখ) মুড়িয়ে আছেন এবং লোকদের থেকে বাইয়াত গ্রহণ করছেন। তিনি জান্নাতের অধিবাসী।
3119 - (لَتَخْرُجَنَّ فتنةٌ من تحتِ قدمَيْ ـ أو بين رجلَيْ - هذا، (يعني: عثمان رضي الله عنه) ، هذا يومئذٍ ومن اتبعهُ على الهُدى) .
أخرجه أحمد (4/236) ، وابن أبي عاصم (2/591/1295) ، والطبراني في `المعجم الكبير` (20/316/753) ، و`مسند الشاميين ` (2/394) من طرق عن معاوية عن سُليم بن عامر عن جُبَيْر بن نُفَيْرٍ قال:
كنا معسكِرِين مع معاوية بعد قتل عثمان رضي الله عنه، فقام كعب بن مرة
البهزي فقال: لولا شيء سمعته من رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ما قمت هذا المقام، فلما سمع [معاوية] بذكر رسول الله - صلى الله عليه وسلم - أجلس الناس، فقال:
بينما نحن عند رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ؛ إذ مر عثمان بن عفان عليه مُرَجَّلاً [مُغدِفاُ] ، قال: فقال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ... فذكره، قال: فقام ابن حوالة الأزدي من عند المنبر، فقال: إنك لصاحب هذا؟ قال: نعم، قال: والله! إني لحاضر ذلك المجلس، ولو علمت أن لي في الجيش مُصَدِّقاً؛ كنت أول متكلم به. والزيادتان للطبراني، واليه وحده عزاه الهيثمي في `المجمع ` (9/89) وقال:
` ورجاله وُثِّقوا `!
قلت: واسناد أحمد صحيح على شرط مسلم، ومعاوية: هو ابن صالح الحمصي، قال الحافظ في `التقريب `:
`صدوق له أوهام `.
وله طريق ثان، يرويه وُهيب بن خالد: ثنا أيوب عن أبي قلابة عن أبي الأشعث قال:
قامت خطباء بـ (إيلياء) في إمارة معاوية رضي الله عنه؛ فتكلموا، وكان آخر من تكلم مُرَّةُ بن كعب، فقال: لولا حديث سمعته من رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ما قمت ... فذكره مختصراً، وفيه:
`فمر رجل مُقنْع، فقال: `هذا يومئذ وأصحابه على الحق والهدى`، فقلت: هذا يا رسول الله - وأقبلت بوجهه إليه - ؟ فقال: `هذا`. فإذا هو عثمان رضي الله عنه `.
أخرجه أحمد أيضاً، والحاكم (3/102) وقال:
`صحيح على شرط الشيخين `. ووافقه الذهبي، وهو كما قالا.
وتابعه عبد الوهاب الثقفي: حدثنا أيوب به.
أخرجه الترمذي (3705) وقال:
`حديث حسن صحيح `.
وخالفهما إسماعيل بن إبراهيم: ثنا أيوب عن أبي قلابة قال:
لما قُتل عثمان رضي الله عنه قام خطباء بـ (إيلياء) .. إلخ، لم يذكر في إسناده أبا الأشعث.
أخرجه أحمد (4/235) ، وابن أبي شيبة (12/41/12075) .
ورجاله ثقات أيضاً، وإسماعيل هذا هو ابن عُلَيَّة، لكن الموصول أصح، لاتفاق ثقتين عليه.
وله شاهد يرويه محمد بن سيرين عن كعب بن عُجرة قال:
ذكر رسول الله - صلى الله عليه وسلم - فتنة فقرَّبها، فمر رجل مقَنْغٌ رأسَه، فقال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : `هذا يومئذ على الهدى` فوثبت، فأخذت بضَبْعَيْ عثمان، ثم استقبلت رسول الله - صلى الله عليه وسلم - قلت: هذا؟ قال: هذا`.
أخرجه ابن ماجه (1/41/111) ، وابن أبي شيبة (12/41/12074) ، وعنه ابن أبي عاصم (1297) ، وأحمد (4/242 و 243) من طريقين عنه.
ورجاله ثقات، فالسند صحيح إن كان محمد بن سيرين سمع من كعب بن عُجرة؛ فقد ذكروا أن أبا حاتم قال: لم يسمع منه، مع أن سنَّه يمكنه من السماع
منه فإنه ولد سنة (33) ، ومات كعب بعد الخمسين. فالله أعلم.
ثم وجدت للحديث طريقاً أخرى من طريق أبي سلمة سليمان بن سُليم عن ابن جابر قال:
اجتمع الناس ببيت المقدس، قد همُّوا أن يبايعوا معاوية بيعة على ما اجتمعت عليه الأمة، وفيهم عبد الله بن حوالة وكعب بن مرة، فقام عبد الله بن حوالة فقال ... فذكر الحديث نحو رواية جبير بن نفير، إلا أنه جعل الخطيب الأول ابن حوالة كما ترى، وكعباً الخطيب الآخر.
أخرجه ابن أبي عاصم (1293) .
ورجاله ثقات؛ إلا أنه منقطع؛ لأن ابن جابر - وهو يحيى الطائي الحمصي - تابع تابعي؛ لم يدرك أحداً من الصحابة. *
কাব ইবনে মুররা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন:
আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকটে ছিলাম। এমন সময় উসমান ইবনে আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পরিপাটি অবস্থায় (বা মাথা ঢাকা অবস্থায়) আমাদের পাশ দিয়ে অতিক্রম করলেন।
তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: “অবশ্যই এই লোকটির (অর্থাৎ, উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর) দুই পায়ের মধ্যখান থেকে—অথবা তিনি বলেছেন, দুই পায়ের নিচ থেকে—একটি মহা ফিতনা বা বিপর্যয় বের হবে। সেই দিন এই ব্যক্তি এবং যারা তাঁর অনুসরণ করবে, তারা হিদায়াত ও সত্যের উপর থাকবে।”
(অপর এক বর্ণনায় এসেছে, সাহাবী প্রশ্ন করলেন: “হে আল্লাহর রাসূল! এই লোকটি?” তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “হ্যাঁ।” তখন দেখা গেল তিনি হলেন উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)।)
3120 - (إذا تغوَّط الرَّجُلانِ، فليَتَوارَ كلَّ واحدٍ منهما عن صاحبِهِ، ولا يتحدَّثان على طوفِهِما، فإن الله يَمقُتُ على ذلك) .
قال أبو علي بن السكن: حدثني يحيى بن محمد بن صاعد: حدثنا الحسن ابن أحمد بن أبي شعيب الحراني: حدثنا مسكين بن بكير عن الأوزاعي عن يحيى بن أبي كثير عن محمد بن عبد الرحمن عن جابر بن عبد الله قال: قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ... فذكره.
كذا في `الوهم والإيهام ` (2/142/2) لابن القطان، وقال:
`قال ابن السكن: رواه عكرمة بن عمار عن يحيى بن أبي كثير عن هلال بن عياض عن أبي سعيد عن النبي - صلى الله عليه وسلم - ، وأرجو أن يكونا صحيحين `.
وقال ابن القطان عقبه:
`وليس فيه تصحيح حديث أبي سعيد الذي فَرغْنَا من تعليله، وإنما يعني أن القولين عن يحيى بن أبي كثير صحيحان، وصدق في ذلك؛ صح عن يحيى بن أبي كثير أنه قال: عن محمد بن عبد الرحمن عن جابر، وأنه قال: عن عياض أو [هلال بن عياض، عن أبي سعيد الخدري. ولا يمكن أن يصحح ابن السكن حديث أبي سعيد] (¬1) أصلاً، ولو فعل، كان [ذلك خطأ من القول، وإنما يصح من حديث جابر] (1) ، ومحمد بن عبد الرحمن بن ثوبان ثقة، وقد صح سماعه من جابر، وقد بينا ذلك فيما تقدم، ومسكين بن بكير أبو عبد الرحمن الحذاء لا بأس به؛ قاله ابن معين، وهذا اللفظ هو منه مؤنَس بين ذلك بنفسه، وبين أنه إذا قال في رجل: لا بأس به، فهو عنده ثقة، (¬2) وكذا قال فيه أبو حاتم.
والحسن بن أحمد بن أبي شعيب أبو مسلم: صدوق لا بأس به.
وسائر من في الإسناد لا يسأل عنه، وعن يحيى بن أبي كثير`.
قلت: وخلاصة تحقيق ابن القطان هذا أن الحديث من هذه الطريق جيد، وهو ما صرح به قبل أن يسوق إسناده، وبعد أن تكلم طويلاً على طريق عكرمة بن عمار عن يحيى بن أبي كثير عن هلال بن عياض - وفي رواية: عياض بن أبي زهير - عن أبي سعيد، وأعله بالاضطراب في إسناده ومتنه، وجهالة عياض هذا، ومن أجل ذلك كنت أوردته في `ضعيف أبي داود` برقم (3) ، وبسطتُ القول فيه
¬_________
(¬1) في `الأصل ` المخطوط بياضٌ، ثم استدركناه من مطبوعته (5/260) حيث استدركه محققه - جزاه الله خيراً - .
(¬2) انظر `الرفع والتكميل في الجرح والتعديل ` لأبي الحسنات اللكنوي (ص 100) .
في اضطراب إسناده؛ وجهالة راويه عياض، ومن ذلك أنه روي عن عكرمة عن يحيى عن أبي سلمة عن أبي هريرة.
والآن وقد أوقفنا ابن القطان - جزاه الله خيراً - على هذا السند الجيد من غير طريق عكرمة بن عمار، فقد وجب نقله من `ضعيف أبي داود`، إلى `صحيح أبي داود` ومن `ضعيف الجامع ` إلى `صحيح الجامع `، و`ضعيف الترغيب ` إلى `صحيح الترغيب `، و`ضعيف ابن ماجه ` إلى `صحيح ابن ماجه `، ولفظه ولفظ أبي داود وغيرهما من طريق عكرمة نحو حديث الترجمة.
ثم وجدته في `تاريخ بغداد` (12/122) من طريق عبد الملك بن الصباح: حدثنا الأوزاعي عن يحيى، وعكرمة بن عمار عن يحيى بن أبي كثير عن هلال ابن عياض عن أبي سعيد الخدري مرفوعاً بلفظ:
`إذا تغوط الرجلان.. ` الحديث.
ثم وجدت له طريقاً أخرى عن أبي سعيد، لكن فيها متهم بالوضع فلا يُفرح بها، أذكرها للعلم: أخرجه الدارقطني في `غرائب مالك ` من طريق محمد بن يوسف بن يعقوب الرازي قال: ثنا إدريس بن علي الرازي قال: ثنا يحيى ابن الضُّرَيْس قال: ثنا مالك عن زيد بن أسلم عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد ... رفعه مثله. وقال الدارقطني:
`لا يصح عن عطاء، ولا عن زيد، ولا عن مالك، والمتهم بوضعه محمد بن يوسف، وكان يضع الأحاديث `.
ذكره الحافظ في ترجمة ابن يوسف هذا من `اللسان `.
وله شاهد من حديث خلاد بن السائب الجُهَني عن أبيه مرفوعاً نحوه،
سيأتي الكلام عليه تحت الحديث (3316) ، وبه يزداد الحديث قوة على قوة. *
জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:
"যখন দুই ব্যক্তি মলত্যাগ করতে বসে, তখন তাদের প্রত্যেকে যেন তার সাথী থেকে আড়াল হয়ে যায় (অর্থাৎ দূরে সরে যায়)। আর তারা যেন মলত্যাগের সময় পরস্পরের সাথে কথাবার্তা না বলে। কারণ, আল্লাহ তাআলা এই কাজের ওপর অসন্তুষ্ট হন।"
3121 - (مَنْ مَرَّ بحائطٍ فلْيأكُلْ ولا يحْمِلْ) .
أخرجه الترمذي، وابن ماجه، وأحمد في `مسائل أبي داود عنه ` (ص 304) من طريق يحيى بن سُلَيْم عن عبد الله عن نافع عن ابن عمر عن النبي عليه السلام قال ... فذكره. وقال الترمذي:
`حديث غريب لا نعرفه إلا من حديث يحيى بن سليم `.
قلت: وبه أعله الإمام أحمد، كما أشار إلى ذلك أبو داود بقوله:
`ذكرت لأحمد حديث يحيى بن سليم.. فانتهرني؛ استضعافاً للحديث `.
قلت: لكني وجدت له شاهداً من حديث ابن عمرو، فقال ابن أبي شيبة في `المصنف ` (6/85/356) : نا وكيع عن هشام بن سعد عن عمرو بن شعيب قال: قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ... فذكره بالحرف الواحد.
وهذا معضل، ولكنه قد جاء موصولاً، فقال الإمام أحمد في `المسند` (2/224) : ثنا حماد بن خالد: ثنا هشام بن سعد عن عمرو بن شعيب عن أبيه عن جده عبد الله بن عمرو: سئل رسول الله - صلى الله عليه وسلم - عن الرجل يدخل الحائط؟ قال:
`يأكل غير متخذ خبنة`.
وهذا إسناد متصل حسن.
وتابعه محمد بن إسحاق عن عمرو بن شعيب به نحوه.
أخرجه ابن أبي شيبة (6/82/347) ، وأحمد (2/180) .
وتابعه محمد بن عجلان به، ولفظه:
أن النبي - صلى الله عليه وسلم - سئل عن الثمر المعلق؟ فقال:
`من أصاب منه من ذي حاجة غير متخذ خُبْنَةً؛ فلا شيء عليه `.
أخرجه جمع منهم الترمذي (1289) وقال:
`هذا حديث حسن `.
وله شاهد موقوف، يرويه مجاهد عن أبي عياض قال: قال عمر:
`إذا مررت ببستان فكل ولا تتخذ خبنة`.
أخرجه ابن أبي شيبة (6/83/350) ، والبيهقي (9/359) من طريقين عن منصور عن مجاهد به.
قلت: وهذا إسناد صحيح كما قال البيهقي. وقال:
`وهو عندنا محمول على حال الضرورة. والله أعلم `.
قلت: وهذا معناه أو لازمه: أنه لا يجوز أن يدخل الحائط أو البستان إلا للضرورة، ومن الأدلة روايات عديدة ساقها البيهقي، منها قوله - صلى الله عليه وسلم - :
`.. وإذا أتيت على حائط بستان؛ فنادِ صاحب البستان ثلاث مرات، فإن أجابك، وإلا؛ فكل، غير أن لا تفسد، وفي رواية: ولا يحملن `.
وإسناده جيد، وهو مخرج في `الإرواء` (2521) .
ثم إن أثر عمر: رواه عبد الرزاق (10/223/18918) بسند آخر منقطع. *
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,
রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে জিজ্ঞেস করা হয়েছিল কোনো ব্যক্তি ফলবাগানে প্রবেশ করা সম্পর্কে। তিনি বললেন: সে (পেট ভরে) খেতে পারে, কিন্তু কাপড়ের আঁচলে ভরে (সাথে) নিতে পারবে না।
অন্য এক বর্ণনায় এসেছে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ঝুলন্ত ফল সম্পর্কে জিজ্ঞাসিত হলে তিনি বলেন: যে অভাবী ব্যক্তি তা থেকে (কিছু) খাবে, কিন্তু আঁচলে বা থলেতে ভরে সাথে নেবে না, তার কোনো দোষ নেই।
অন্য একটি (সহীহ) বর্ণনায় এসেছে, তিনি বলেছেন: যে ব্যক্তি কোনো ফলের বাগান অতিক্রম করবে, সে যেন তা থেকে খায়, কিন্তু (সাথে করে) বহন না করে।
3122 - (لا تأكل متَّكِئاً، ولا على غِرْبَالٍ، ولا تتخِذَنَّ مِنَ المسجدِ مُصلىً لا تصلِّي إلا فيهِ، ولا تَخَطَّ رِقابَ الناسِ يومَ الجُمُعَةِ؛ فيجعلَكَ الله لُهمْ جسراً يوم القيامة) .
أخرجه ابن عساكر في `تاريخ دمشق ` (13/391) قال: أنا أبو الحسن بن رزقويه: نا أبو العباس عبد الله بن عبد الرحمن بن أحمد بن حماد العسكري - إملاءً - في سنة ثمان وثلاثين وثلاث مئة: نا أيوب بن سليمان الصُّغْدي: نا أبو اليمان: نا أرطاة بن المنذر عن عبد الله بن رُزَيْق الألهاني عن عمرو بن الأسود العَنْسي عن أبي الدرداء قال: قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ... فذكره. وقال:
`قال الخطيب: كذا سماه ونسبه أبو اليمان؛ ووهم في ذلك، والصواب أنه رُزَيقٌ أبو عبد الله، كذلك ذكره أبو مسهر عبد الأعلى بن مسهر، وأبو عبد الله البخاري، وأبو حاتم الرازي `.
قلت: وكذا ابن حبان في كتابيه: `الثقات ` (4/239) ، و`الضعفاء` (1/301) ، وذلك من تناقضه! والأول هو الأقرب؛ لقول ابن أبي حاتم (1/2/505) :
`سئل أبو زرعة عنه؟ فقال: حمصي لا بأس به `.
ولذلك قال الذهبي في `المغني `:
`صدوق، قال ابن حبان: لا يحتج به `.
وفي `الميزان ` جمع بين قول ابن حبان هذا وقول أبي زرعة، وفاته أنه في `ثقات ابن حبان `. وقال الحافظ في `التقريب `:
`صدوق له أوهام `.
قلت: فهو حسن الحديث - إن شاء الله تعالى - .
وسائر رجال الإسناد كلهم ثقات من رجال `التهذيب `؛ سوى مَن دون أبي اليمان، فهم مترجمون في `تاريخ بغداد`:
আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: তোমরা হেলান দিয়ে বা ঠেস দিয়ে খাবে না, আর চালনির উপর (কিছু রেখে) খাবে না, আর তোমরা মাসজিদের কোনো অংশকে এমন মুসাল্লা (নামাযের স্থান) বানিও না, যেখানে তোমরা শুধুমাত্র সেখানেই নামায আদায় করো, আর জুমু’আর দিনে মানুষের ঘাড় ডিঙিয়ে যেও না; কারণ, এর ফলে আল্লাহ তাআলা কিয়ামতের দিন তোমাকে তাদের জন্য সেতু (বা সাঁকো) বানিয়ে দেবেন।
3123 - (من فطرة الإسلام: الغُسْلُ يومَ الجمعة، والاستنانُ، وأخذ الشارب، وإعفاءُ اللِّحى؛ فإنَّ المجوس تُعْفي شَوَارِبَها، وتُحفي لِحاها، فَخالِفُوهم: خُذُوا شواربَكم، وأعفُوا لحاكُم) .
أخرجه ابن حبان (
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: "ইসলামের ফিতরাতের (স্বভাবজাত বিষয়ের) অন্তর্ভুক্ত হলো: জুমু’আর দিনে গোসল করা, মিসওয়াক করা, গোঁফ ছোট করা এবং দাড়ি লম্বা রাখা। কারণ অগ্নিপূজক মাজুসরা তাদের গোঁফ লম্বা রাখে এবং দাড়ি কামিয়ে ফেলে। সুতরাং তোমরা তাদের বিরোধিতা করো: তোমাদের গোঁফ ছোট করো এবং দাড়ি লম্বা রাখো।"
3124 - (لا تُشَدِّدوا على أنفسكم؛ فإنّما هلك من قبلَكم بتشدِيدِهم على أنفسهم، وستَجِدُونَ بقاياهُم في الصوامع والدِّياراتِ) !.
أخرجه البخاري في `التاريخ ` (2/2/97) : وقال لنا عبد الله بن صالح: حدثني أبو شُريح: سمع سهل بن أبي أمامة بن سهل بن حُنَيفٍ عن أبيه عن جده عن النبي - صلى الله عليه وسلم - قال ... فذكره.
ومن هذا الوجه: أخرجه ابن قانع في ترجمة سهل من `المعجم `، والطبراني في `المعجم الكبير` (6/88/5551) و`الأوسط ` (1/174/2/3230) ، والبيهقي في `شعب الإيمان ` (3/401/3884) .
قلت: وهذا إسناد جيد بما بعده، رجاله ثقات رجال مسلم؛ غير عبد الله بن صالح، فهو من شيوخ البخاري كما ترى، وذكر غير واحد أنه روى عنه في `صحيحه `، كالمنذري في آخر `الترغيب ` (4/286) ، والذهبي في `الكاشف `، وقال في ` المغني `:
`والصحيح أن البخاري روى عنه في الصحيح `.
وقال تبعاً للمنذري:
`صالح الحديث، له مناكير`.
وقال الحافظ في `التقريب `.
`صدوق كثير الغلط، ثبت في كتابه، وكانت فيه غفلة`.
ورمز له بأن البخاري روى له تعليقاً، وذكر في `تهذيبه ` تبعاً لأصله، أن البخاري استشهد به في `الصحيح `؛ لكنه في `مقدمة الفتح ` (ص
সাহল ইবনে হুনাইফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, [রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:] তোমরা নিজেদের উপর কঠোরতা আরোপ করো না। কেননা তোমাদের পূর্ববর্তী লোকেরা কেবল নিজেদের উপর কঠোরতা আরোপ করার কারণেই ধ্বংস হয়েছে। আর তোমরা তাদের অবশিষ্টদেরকে মঠ ও গির্জাসমূহে দেখতে পাবে।
3125 - (كانَ يكرهُ أنْ يُؤْخَذَ مِنْ رأْسِ الطعامِ) .
أخرجه الطبراني في `المعجم الكبير` (24/297/754) من طريق إبراهيم بن
المنذر الحِزامي: ثنا مَعْنُ بن عيسى: ثنا فائد مولى عبادل (¬1) عن مولاه عبيد الله بن علي بن أبي رافع عن جدته سلمى قالت ... فذكرته.
قلت: وهذا إسناد صحيح، رجاله ثقات رجال البخاري؛ غير فائد هذا، وهو ثقة؛ وثقه ابن معين وغيره، وقال الحافظ في `التقريب `:
` صدوق `.
والحديث؛ قال الهيثمي في `مجمع الزوائد` (5/27) :
`رواه الطبراني، ورجاله ثقات `.
وقد صح عنه - صلى الله عليه وسلم - النهي عن أن يأكل من أعلى الصّحْفة من حديث ابن عباس وعبد الله بن بسر، وهما مخرجان في `الإرواء` (7/
সালমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খাবারের স্তূপের উপরিভাগ বা মাথা থেকে খাবার গ্রহণ করা অপছন্দ করতেন।
3126 - (الإيمانُ يَمانٍ، هكذا إلى لَخْمٍ وجُذامٍ) .
أخرجه أحمد (3/224) ، ومن طريقه: ابن عساكر في `تاريخ دمشق ` (3/150) : ثنا علي بن عياش: ثنا محمد بن مهاجر عن عروة بن رُوَيْمٍ قال:
أقبل أنس بن مالك إلى معاوية بن أبي سفيان - وهو بدمشق - فدخل عليه، فقال له معاوية: حدثني بحديث سمعته من رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ليس بينك وبينه أحد، قال: قال أنس: سمعت رسول الله - صلى الله عليه وسلم - يقول ... فذكره.
وأخرجه الطبراني في `مسند الشاميين ` (1/297) من طريق علي بن عياش به.
قلت: وهذا إسناد صحيح رجاله ثقات رجال `الصحيح `؛ غير عروة بن رويم،
¬_________
(¬1) الأصل: `عباد`! والتصحيح من كتب الرجال. *
وهو ثقة من أهل الأردن، قال ابن عساكر (11/554) :
`قدم الجابية، وسمع بها أنس بن مالك يحدث الخليفة`.
كأنه يشير إلى هذا الحديث. وقد علقه البخاري في `التاريخ ` (3/1/87) ، وعنه ابن عساكر (9/189) ، فقال:
`وقال محمد بن مهاجر: عن عروة بن رويم عن أبي خالد الحرشي عن أنس ... `.
فأدخل بين عروة وأنس أبا خالد الحرشي، ولم أعرفه.
وقد وصله الدولابي في ترجمته من `الكنى` (1/163) من طريق أبي توبة الربيع بن نافع قال: حدثنا محمد بن مهاجر به.
قلت: ولم يسمه الدولابي، ولم يورده الذهبي في `المقتنى` مطلقاً، والله أعلم.
ثم رواه ابن عساكر - في ترجمة عروة - بسند ضعيف عن عروة عن أنس به مثل رواية أحمد، لكنه جعل مكان معاوية عبد الملك بن مروان، وفيه التصريح بحضور عروة في ذاك المجلس.
ثم علقه البخاري وابن عساكر من طريق عبد الله بن راشد: سمع عروة بن رويم عن أنس به.
وابن راشد هذا وثقه أبو مسهر، وابن حبان (7/35) .
ثم علقاه من طريق سليمان بن عبد الرحمن: حدثني عبد الكريم بن محمد اللخمي: حدثنا عروة بن رويم: سمعت أنساً - رضي الله عنه - ...
وهذا وصله أبو نعيم في `أخبار أصبهان ` (1/156) ، وابن عساكر (10/434) .
وعبد الكريم بن محمد اللخمي؛ ترجمه البخاري في `التاريخ ` وابن حبان في كتابه `الثقات ` (7/131) ، وابن عساكر أيضاً برواية سليمان بن عبد الرحمن هذا فقط، فهو مجهول.
وبالجملة؛ فالحديث صحيح فإن أكثر الطرق لا تُثْبت الواسطة بين عروة بن رويم وأنس، ولا سيما أن السند الأول صحيح، وقد قال الهيثمي في `مجمع الزوائد` (10/55) :
`رواه أحمد، ورجاله رجال الصحيح؛ خلا عروة بن رويم، وهو ثقة `.
ثم وقفت على خلاف آخر في هذه الطريق، فقال الطبراني في `المعجم الكبير` (22/342/857) ، و`مسند الشاميين ` (1/299/522) : حدثنا أحمد ابن خُلَيْدٍ الحلبي: ثنا أبو توبة الربيع بن نافع: ثنا محمد بن مهاجر عن عروة بن رويم عن أبي كبشة الأنماري قال:
خرجنا مع رسول الله - صلى الله عليه وسلم - في غزوة من مغازيه، فنزل منزلاً، فأتيناه فيه، فرفع يديه وقال ... فذكره.
قلت: وهذا صحيح أيضاً، رجاله ثقات من رجال `التهذيب `؛ غير أحمد بن خليد، وهو الكندي، روى عنه جمع من الحفاظ، وقال الذهبي في ترجمته من `السير` (13/489) :
`ما علمت به بأساً `.
وقوله: `عن أبي كبشة الأنماري `؛ إن كان قد حفظه، فلا يضر في إسناده؛ لأنه انتقال من صحابي إلى صحابي، والله أعلم.
وروى عبد الرزاق عن معمر عن قتادة قال: قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - :
`الإيمان يمان إلى هنا - وأشار بيده حذو جذام - ؛ صلوات الله على جذام `.
وهذا مرسل، رجاله ثقات، وعزاه السيوطي في `الجامع الكبير` للشيرازي عن أبي هريرة مرفوعاً، وزاد: `يقاتلون الكفار على رؤوس الشَّعَف، ينصرون الله ورسوله `.
ولم أقف إلى الآن على إسناده، وقد أشار السمعاني في مادة (الجذامي) إلى ضعفه.
وللحديث شاهد صحيح في أول الحديث التالي.
والشطر الأول منه متفق عليه من حديث أبي هريرة، وله عندهما تتمة، وهو مخرج في `الروض النضير` (1045) .
ثم رأيته في ` تاريخ دمشق ` (6/298) من مرسل رَوْح بن زِنْبَاع أن النبي - صلى الله عليه وسلم - قال:
`الإيمان يمان حتى جبال جذام، وبارك الله في جذام `. *
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "ঈমান ইয়ামানবাসীদের মধ্যে (নিহিত); এভাবে লাখম ও জুযাম (অঞ্চল) পর্যন্ত।"