হাদীস বিএন


সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ





সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3201)


3201 - (إن أخوف ما أخاف عليكم رجل قرأ القرآن، حتّى إذا رُئيتْ بهجتُه عليه، وكان رِدْءاً للإسلام؛ انسلخ منه ونبذه وراء ظهره، وسعى على جاره بالسيف، ورماه بالشرك. قلت: يا نبيَّ الله! أيُّهما أولى بالشرك، الرامي أو المرمي؟ قال: بل الرامي) .
أخرجه البخاري في `التاريخ ` (4/ 301/07 29) ، وأبو يعلى في `مسنده الكبير`
- كما في `تفسير ابن كثير` (2/265) و`المطالب العالية` (4/273/4423) - ، ومن طريق أبي يعلى: ابن حبان في `صحيحه ` (1/148/ 81) ، والبزار في
`
مسنده ` (1/99/175) من طرق عن محمد بن بكر عن الصلت] بن بهرام [: حدثنا الحسن: حدثنا جندب البجلي - في هذا المسجد - أن حذيفة حدثه قال:
قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : ... فذكره. وقال ابن كثير:
`هذا إسناد جيد، والصلت بن بهرام كان من ثقات الكوفيين، ولم يُرْمَ بشيء
إلا الإرجاء، وقد وثقه أحمد وابن معين وغيرهما`.
وأقول: لا شك أن الصلت بن بهرام ثقة، ولكن هل هو راوي هذا الحديث
عن الحسن - وهو البصري - ؟! هذا فيه نظر، وإن كان جزم به ابن كثير، وسلفه في ذلك ابن حبان، فقد قال في ترجمة الصلت بن بهرام من `ثقاته ` (6/471) : `كوفي عزيز الحديث، يروي عن جماعة من التابعين، روى عنه أهل الكوفة،
وهو الذي يروي عن الحسن، روى عنه محمد بن بكر المقرئ الكوفي - ليس بالبَرَساني - ، ومن قال: إنه الصلت بن مهران؛ فقد وهم، إنما هو الصلت بن بهرام `. كذا قال! وتعقبه الحافظ بقوله في `التهذيب `:
`هذا الذي رده جزم به البخاري عن شيخه علي بن المديني، وهو أخبر بشيخه، وقال البخاري في `التاريخ `: قال لي علي: ثنا محمد بن بكر البرساني عن الصلت بن مهران: حدثني الحسن البصري ... فذكر حديثاً `.
قلت: وهو هذا، وفيما ذكره كل من الحافظ وابن حبان ما يلفت النظر:
أولاً: لا يوجد في نسخة `التاريخ ` المطبوعة: ` البرساني، ابن مهران، البصري `؛فالظاهر أن ذلك من الحافظ ذكره من عنده على سبيل البيان لا الرواية.
ثانياً: جزم ابن حبان بأن محمد بن بكر الراوي عن الصلت ليس هو البرساني، لا أدري ما مستنده في ذلك؟! بل هو مخالف لصنيع الحفاظ الذين ذكروا في
ترجمة البرساني أنه روى عنه علي بن المديني ومحمد بن مرزوق الباهلي، وهما ممن رويا هذا الحديث عنه، الأول عند البخاري كما تقدم، والآخر عند أبي يعلى وابن حبان وكذا البزار، بل إن هذا وقع في إسناده أنه (البرساني) !
ثالثاً: لا نعرف في الرواة (محمد بن بكر المقرئ الكوفي) حتى يَرِدَ جزم ابن حبان بأنه هو، ولو احتمالاً، وكان على ابن حبان أن يورده في `ثقاته ` كما فعل بـ (البرساني) ، فقد أورده في موضعين منه؛ في (أتباع التابعين) (7/442) ، وفي (أتباع أتباعهم) (9/38) ؛ فهو إذن من المجهولين.
رابعاً: سلمنا - جدلاً - أنه غير البرساني، فلا يستقيم جزمه بأن الصلت هو
ابن بهرام، لأنه لم يقع التصريح به إلا في رواية المقرئ هذا، وهو غير معروف.
خامساً: إذا كان الأمر كذلك؛ فمن يكون الصلت هذا؟ أما البخاري فصنيعه المتقدم صريح بأنه ابن مهران؛ لأنه ساق الحديث في ترجمته، ونحوه قول ابن أبي
حاتم فيه (4/439/927 1) :
`روى عن الحسن وشهر بن حوشب، وعنه محمد بن بكر البرساني وسهل
ابن حماد`.
وعليه ` فالصلت هنا اثنان: ابن بهرام، وقد وثقه جماعة كما تقدم، وابن مهران، وهو غير مشهور؛ لأنه لم يرو عنه غير البرساني وشهر، ولذلك قال الذهبي في ` الميزان `:
`مستور، قال ابن القطان: مجهول الحال `.
وظاهر كلام البزار يميل إلى أن الصلت هذا هو الأول؛ فقد قال عقب الحديث:
`
لا نعلمه يروى إلا عن حذيفة، وإسناده حسن، والصلت مشهور، ومن بعده لا يسأل عن أمثالهم `.
قلت: وسواء كان هذا أو ذاك، فالحديث حسن إن شاء الله تعالى؛ لأن له شواهد في الجملة، منها حديث عمر مرفوعاً:
`إن أخوف ما أخاف على أمتي كل منافق عليم اللسان `
رواه أحمد وغيره بسند صحيح عن عمر، وهو مخرج فيما تقدم (3/11/1013) . ورواه البيهقي في `شعب الإيمان ` (2/284/777 1) بلفظ:
`.. منافق يتكلم بالحكمة، ويعمل بالجور`.
وحديث ابن عمر مرفوعاً بلفظ:
`إذا قال الرجل للرجل: `يا كافر! فقد باء به أحدهما إن كان كما قال، وإلا؛ رجعت على الآخر`.
أخرجه أحمد (2/44) ، ومسلم وغيرهما، وقد مضى تخريجه برقم (2891)
في المجلد السادس - . *




হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "নিশ্চয় আমি তোমাদের জন্য সবচেয়ে বেশি যে জিনিসটির ভয় করি, তা হলো এমন এক ব্যক্তি যে কুরআন পাঠ করেছে, এমনকি তার ওপর কুরআনের দীপ্তি ফুটে উঠেছে এবং সে ইসলামের সহায়ক হয়েছিল। কিন্তু সে তা থেকে বের হয়ে গেল (দ্বীন ত্যাগ করল), আর তাকে (কুরআন/দ্বীনকে) নিজের পিঠের পেছনে ফেলে দিল, এবং সে তার প্রতিবেশীর ওপর তরবারি নিয়ে ধাবিত হলো, আর তাকে শিরকের অপবাদ দিল। (বর্ণনাকারী বললেন,) আমি জিজ্ঞাসা করলাম: হে আল্লাহর নবী! তাদের উভয়ের মধ্যে কে শিরকের অধিক উপযুক্ত – যে অপবাদ দিয়েছে, নাকি যাকে অপবাদ দেওয়া হয়েছে? তিনি বললেন: বরং যে অপবাদ দিয়েছে।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3202)


3202 - (من صام الدهر؛ ضيِّقت عليه جهنم هكذا - وعقد
تسعين - ) .
أخرجه الطيالسي في `مسنده ` (514) ، وعنه البزار في `مسنده ` (1041) ، وكذا البيهقي (4/300) : حدثنا الضحاك بن يسار عن أبي تميمة عن أبي موسى عن النبي - صلى الله عليه وسلم - به.
ثم أخرجه البيهقي، وابن أبي شيبة (3/78) ، وأحمد (4/414) ،
وابن حبان (5/238/3576) من طرق أخرى عن الضحاك بن يسار به.
قلت: وهذا إسناد جيد، أبو تميمة - واسمه طريف بن مجالد الهجيمي - ثقة
من رجال البخاري.
والضحاك بن يسار، قال ابن أبي حاتم (4/462/ 2040) :
`سألت أبي عنه؟ فقال: لا بأس به `.
وذكر عن ابن معين أنه قال:
`يضعفه البصريون `.
وضعفه آخرون ذكرهم الحافظ في `التعجيل `، وهو جرح غير مفسر، وقد ذكره ابن حبان في `الثقات ` (6/683) ، وروى عنه جمع من الحفاظ مثل وكيع وأبي نعيم ومسلم بن إبراهيم، وغيرهم، فمثله يحتج به، وتطمئن النفس لحديثه،
ولا سيما وقد توبع، فقال الطيالسي (513) : حدثنا شعبة عن قتادة عن أبي تميمة به موقوفاً. وقال:
`لم يرفعه شعبة، ورفعه سعيد`.
يعني: ابن أبي عروبة.
ومن طريق الطيالسي أخرجه البيهقي أيضاً.
وقد توبع، فقال ابن أبي شيبة (3/78) : حدثنا وكيع عن شعبة به.
وكذا رواه أحمد (4/414) : ثنا وكيع ...
وتابعه الثوري في `مصنف عبد الرزاق ` (4/296/7866) ؛ فقال: عن الثوري
عن أبي تميمة الهجيمي عن أبي موسى به.
كذا وقع فيه! لم يذكر قتادة بين أبي تميمة والثوري، وهذا لم يدرك أبا
تميمة (¬1) ، فلا أدري أسقط ذكر قتادة من الناسخ أو الطابع، أم الرواية هكذا؟! والأول أرجح، والله أعلم.
ولم يتنبه لهذا الانقطاع: المعلق على `المصنف `، وكذا المعلق على `الإحسان `
(8/




আবু মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি সারা বছর রোজা রাখে, তার জন্য জাহান্নামকে এভাবে সংকুচিত করে দেওয়া হয়।” – এবং তিনি (নবী সাঃ) নব্বই (সংখ্যা বোঝাতে) যেভাবে অঙ্গভঙ্গি করা হয়, সেভাবে ইশারা করলেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3203)


3203 - (ستكون هجرة بعد هجرة، فخيار أهل الأرض ألزمهم مهاجر إبراهيم، ويبقى في الأرض شرار أهلها، تلفظهم أرضوهم، تقذرهم نفس الله، وتحشرهم النار مع القردة والخنازير) .
أخرجه أبو داود (1/




আব্দুল্লাহ ইবন হাওয়ালা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

হিজরতের পর হিজরত হবে। তখন পৃথিবীর শ্রেষ্ঠ মানুষ হবে তারা, যারা ইবরাহীম (আঃ)-এর হিজরতের স্থানে দৃঢ় থাকবে। আর পৃথিবীতে অবশিষ্ট থাকবে তার নিকৃষ্ট লোকেরা; তাদের ভূমি তাদের নিক্ষেপ করবে। আল্লাহর সত্তা তাদেরকে ঘৃণা করবেন এবং জাহান্নাম তাদের বানর ও শূকরদের সাথে একত্রিত করবে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3204)


3204 - (إذا أراد أحدكم أن يسأل؛ فليبدأ بالمدحة والثناء على
الله بما هو أهله، ثم ليصل على النبي - صلى الله عليه وسلم - ، ثم ليسأل بعد؛ فإنه أجدر أن ينجح) .
موقوف في حكم المرفوع: أخرجه عبد الرزاق في`المصنف ` (1/ 441/19642) ،
ومن طريقه: الطبراني في `المعجم الكبير` (9/170/ 8780) عن معمر عن أبي إسحاق عن أبي عبيدة بن عبد الله بن مسعود عن ابن مسعود قال: ... فذكره.
قلت: وهذا إسناد ضعيف؛ لانقطاعه بين أبي عبيدة وأبيه، قال الهيثمي في `المجمع ` (10/155) :
`رواه الطبراني، ورجاله رجال `الصحيح `؛ إلا أن أبا عبيدة لم يسمع من أبيه `. قلت: فقوله (10/160) :
`وهو حديث جيد`!
غير جيد للانقطاع الذي فيه، وأيضاً فأبو إسحاق - وهو السبيعي - مدلس مختلط؛ إلا إن كان يريد أنه جيد لشواهده، فهو كما قال، ولكنه لم يوضح.
فيقويه أن له طريقاً أخرى عند الترمذي (2/184/593) من طريق أبي بكر
ابن عياش عن عاصم عن زر بن حبيش عن عبد الله قال:
كنت أصلي؛ والنبي - صلى الله عليه وسلم - وأبو بكر وعمر معه، فلما جلست بدأت بالثناء
على الله، ثم الصلاة على النبي - صلى الله عليه وسلم - ، ثم دعوت لنفسي، فقال النبي - صلى الله عليه وسلم - :
`سل تعطه، سل تعطه `.
وقال الترمذي:
`حديث حسن صحيح `.
قلت: إسناده حسن، وقد أخرجه أحمد (1/445) من طريق أخرى عن
زائدة: ثنا عاصم بن أبي النجود بالجملة الأخيرة منه في قصة أخرى. وكذلك رواه شعبة عن أبي إسحاق عن أبي عبيدة عن عبد الله.
أخرجه أحمد (1/386 و 437) ؛ وانظر `تخريج المختارة` (455) و` المشكاة` (931) .
وله شاهد آخر بنحوه، تقدم برقم (2035) . *
من أدبه - صلى الله عليه وسلم - مع نسائه




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

যখন তোমাদের কেউ (আল্লাহর কাছে) কিছু প্রার্থনা (দো’আ) করতে ইচ্ছা করে, তখন সে যেন আল্লাহ তাআলার উপযুক্ত গুণাবলী দ্বারা তাঁর প্রশংসা ও স্তুতি দ্বারা শুরু করে। এরপর সে যেন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের উপর দরূদ পাঠ করে। অতঃপর সে যেন যা চাওয়ার তা চায়। কারণ, এতেই তার সফল হওয়ার সম্ভাবনা অধিক।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3205)


3205 - (كذلك سَوْقُكَ بالقوارير، يعني النساء. قاله - صلى الله عليه وسلم - في حجة الوداع) .
أخرجه أحمد (6/




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

আর তেমনিভাবে, কাঁচের পাত্রদের (অর্থাৎ নারীদেরকে) নিয়ে তোমার দ্রুত চালনা/হাঁকানো [ঠিক নয়]। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিদায় হজ্জের সময় এটি বলেছিলেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3206)


3206 - (لا تكرهوا البنات؛ فإنَّهنَّ المؤنسات الغاليات) .
أخرجه أحمد (4/ 151) ومن طريقه: ابن الجوزي في `العلل `، وتمّام
(11/197/2) ، والطبراني في `المعجم الكبير` (17/310/856) عن ابن لهيعة عن أبي عُشَّانةَ عن عقبة بن عامر مرفوعاً.
قلت: وهذا إسناد ضعيف؛ لسوء حفظ ابن لهيعة، وبه أعله ابن الجوزي.
وقد جاء من طريق أخرى مرسلاً وموصولاً:
أما المرسل؛ فأخرجه علي بن حرب الطائي في حديثه (ق 81/ 1) : نا أبو
معاوية عن هشام بن عروة عن أبيه مرفوعاً به؛ إلا أنه قال:
` المحقَّرات ` بدل: ` الغاليات `.
وأما الموصول؛ فأخرجه ابن عدي (6/278) ، ومن طريقه: ابن الجوزي عن محمد بن معاوية قال: ثنا أبو معاوية الضرير عن هشام بن عروة عن أبيه عن عائشة مرفوعاً.
ومحمد بن معاوية - وهو النيسا بوري - : متروك متهم.
وبعد كتابة هذا بنحو عشرين سنة؛ تبين لي أن رواية قتيبة بن سعيد عن ابن لهيعة ملحقة - من حيث الصحة - برواية العبادلة عنه كما بينه الحافظ الذهبي في `السير`، ونقلته عنه في غير ما موضع من تخريجاتي وتعليقاتي (¬1) ، ولما كان هذا
¬__________
(¬1) انظر مثلا `الصحيحة` (1/595) ، و (6/825) ، و`الضعيفة` (1/421) .
ولما كان هذا الحديث من رواية قتيبة عن ابن لهيعة؛ فقد قررت نقله من `الضعيفة` إلى هنا، وبخاصة أنه يشهد له مرسل عروة بن الزبير.




উকবাহ ইবনু আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:) তোমরা কন্যা সন্তানদের অপছন্দ করো না; কারণ তারা হলো স্নেহশীলা অন্তরঙ্গ সঙ্গী এবং অত্যন্ত মূল্যবান (সম্পদ)।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3207)


3207 - (أنا حظُّكُم من الأنبياء، وأنتم حظِّي من الأمم) .
أخرجه ابن حبان (2304) ، وا بن شاهين في `الأفراد` (ق 4/ 1) ، والبزار
(3/ 321/2847) ، وأبو نعيم في`أخبار أصبهان` (2/




আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:

"নবীগণের মধ্যে আমিই তোমাদের জন্য নির্ধারিত অংশ (বা হিসসা), আর উম্মতদের মধ্যে তোমরাই আমার জন্য নির্ধারিত অংশ (বা হিসসা)।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3208)


3208 - (يا معشر قريش! إنه ليس أحد يعبد من دون الله فيه خير
- وقد علمت قريش أن النصارى تعبد عيسى ابن مريم، وما تقول في محمد - ؛ فقالوا: يا محمد! ألست تزعم أن عيسى كان نبياً وعبداً من
عباد الله صالحاً؟! فلئن كنت صادقاً فإن آلهتهم لكما يقولون - (الأصل: تقولون!) - ، قال: فأنزل الله عز وجل: (ولما ضرب ابن مريم مثلاً إذا
قومك منه يصدون) (الزخرف: 57) قال: قلت: ما (يصدون) ؟ قال: يضجُّون. (وإنه لعلم للساعة) (الزخرف: 61) ، قال: هو خروج (وفي رواية: نزول) عيسى ابن مريم عليه السلام قبل يوم القيامة) .
أخرجه أحمد (1/




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

(রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন): “হে কুরাইশ সম্প্রদায়! আল্লাহকে বাদ দিয়ে যারই ইবাদত করা হয়, তার মধ্যে কোনো কল্যাণ নেই।”

অথচ কুরাইশরা জানত যে, খ্রিস্টানরা মারইয়াম তনয় ঈসা (আলাইহিস সালাম)-এর ইবাদত করে। (তারা তখন উপহাস করে জানতে চাইল) আর আপনি (মুহাম্মাদ) তাঁর ব্যাপারে কী বলেন?

তখন তারা বলল, হে মুহাম্মাদ! আপনি কি এটা দাবি করেন না যে, ঈসা ছিলেন একজন নবী এবং আল্লাহর সৎ বান্দাদের মধ্যে একজন?! যদি আপনি সত্যবাদী হন (যে ঈসা সৎ বান্দা), তবে তাদের (খ্রিস্টানদের) উপাস্যরাও তো এমনই (যেমনটি আপনারা বলছেন)!

(বর্ণনাকারী) বললেন: তখন আল্লাহ আযযা ওয়া জাল নাযিল করলেন: “যখন মারইয়াম-তনয়কে দৃষ্টান্ত স্বরূপ পেশ করা হলো, তখন তোমার সম্প্রদায় হট্টগোল শুরু করে দিল।” (সূরা যুখরুফ: ৫৭)।

(বর্ণনাকারী) বললেন: আমি (সাহাবীকে) জিজ্ঞেস করলাম, ‘يصدون’ (ইয়াসিদ্ধুন)-এর অর্থ কী? তিনি বললেন: তারা হট্টগোল করে/ হৈ চৈ করে (يضجُّون)।

(এরপর আয়াত নাযিল হলো): “আর নিশ্চয়ই সে (ঈসা) কিয়ামতের একটি নিদর্শন।” (সূরা যুখরুফ: ৬১)। তিনি (সাহাবী) বললেন: এর অর্থ হলো, কিয়ামতের পূর্বে ঈসা ইবনে মারইয়াম (আলাইহিস সালাম)-এর আগমন (অন্য বর্ণনায়: অবতরণ)।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3209)


3209 - (بت الليلة أقرأعلى الجن رفقاء بـ `الحَجُون `) .
أخرجه ابن حبان (1768) ، والطبري في `التفسير` (26/ 21) ، وأحمد (1/416) ، وأبو يعلى (8/474/5062) ، وأبو الشيخ في `العظمة` (5/1664/ 1104) من طريقين عن ابن شهاب عن عبيد الله بن عبد الله عن عبد الله بن مسعود قال: سمعت رسول الله - صلى الله عليه وسلم - قال: ... فذكره.
قلت: وهذا إسناد صحيح رجاله ثقات؛ لولا أنه منقطع؛ فإن عبيد الله - وهو
ابن عبد الله بن عتبة بن مسعود - لم يسمع من ابن مسعود؛ كما ذكروا في ترجمته، بل قال الحافظ المزي في `تحفة الأشراف ` (7/90) :
`لم يدركه `.
وأما ما وقع في `العظمة` من قوله: `حدثني ابن مسعود`؛ فهو خطأ من محمد بن عزيز، أو من شيخه سلامة، وهو ابن روح بن خالد - ابن أخي عقيل ابن خالد - ، وهو الراوي عن ابن شهاب، وقد قال الحافظ في سلامة:
`صدوق له أوهام، وقيل: لم يسمع من عمه (عقيل) ، وإنما يحدث من كتبه `. وقال في محمد بن عُزَيز:
`فيه ضعف، وقد تكلموا في صحة سماعه من ابن عمه سلامة`.
لكن الحديث صحيح؛ فقد جاء موصولاً من طريق داود بن أبي هند عن
الشعبي عن علقمة عن ابن مسعود مرفوعاً بلفظ:
`أتاني داعي الجن، فذهبت معه، فقرأت عليهم القرآن ` ... وفيه قصة.
أخرجه مسلم، وأبو عوانة، وابن حبان أيضاً (2/




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: আমি এই রাতে হাজূন (নামক স্থানে) সমবেত জিনদের উপর কুরআন তিলাওয়াত করে কাটিয়েছি।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3210)


3210 - (خروج الآيات بعضها على إثر بعض؛ يتتابعن كما تتابع الخَرَزُ في النظام) .
أخرجه ابن حبان في`صحيحه ` (1883) ، والطبراني في`الأوسط` (1/258/4431) من طريق أبي الربيع الزهراني قال: ناأبي عن هشام بن حسان عن محمد بن سيرين عن أبي هريرة عن النبي - صلى الله عليه وسلم - قال: ... فذكره. وقال الطبراني: `لم يروه عن هشام إلا داود العتكي، تفرد به أبو الربيع `.
قلت: هو ثقة، واسمه سليمان بن داود العتكي الزهراني، احتج به الشيخان، وقال الحافظ في `التقريب `:
`ثقة، لم يتكلم فيه أحد بحجة`.
قلت: وأبوه داود العتكي غير معروف إلا برواية ابنه عنه، ولم يترجم له أحد فيما علمت غير ابن حبان؛ فذكره في `الثقات ` (8/234) بهذه الرواية فقط! ومع ذلك وثقه الهيثمي فقال في `المجمع ` (7/ 321) :
`رواه الطبراني في `الأ وسط `، ورجاله رجال الصحيح؛ غير عبد الله بن أحمد
ابن حنبل وداود الزهراني، وكلاهما ثقة `!
وأغرب منه إعلال الدارقطني الحديث بابنه أبي الر بيع - فيما نقله عنه ابن
الجوزي في `العلل المتناهية ` - قال (2/ 371) :
`قال الدارقطني: وهم أبو الربيع، وإنما رواه هشام عن حفصة بنت سيرين عن
أبي العالية من قوله `.
والأولى إعلاله بأبيه داود لجهالته كما تقدم.
ثم إن قوله: `.. من قوله ` لا أدري إذا كان دقيقاً! فقد وجدت في `فتح
الباري ` لابن حجر العسقلاني (13/77) :
`وفي مرسل أبي العالية: الآيات كلها في ستة أشهر`.
فهذا ظاهره أنه مرفوع، لكنه مرسل. فالله أعلم.
وله شاهد موقوف من حديث حذيفة قال:
`إذا رأيتم أول الآيات؛ تتابعت `.
أخرجه ابن أبي شيبة (15/63) من طريق مجالد عن الشعبي عن صلة عنه.
وهذا إسناد جيد في الشواهد، وهو في حكم المرفوع، ولا سيما وهو من
حديث حذيفة صاحب سر رسول الله - صلى الله عليه وسلم - .
وله عنده شاهد آخر من حديث ابن عمرو، وقد مضى تخريجه برقم
(1762) . وذكرت له هناك شاهداً من حديث أنس أيضاً.
وبالجملة؛ فالحديث بهذه الشواهد صحيح بلا ريب، وكأنه لذلك ثبته الحافظ
في `الفتح ` (13/77) .
وأما حديث: `الآيات بعد المئتين `؛ فهو موضوع، وقد خرجته في `الضعيفة` (1966) .
ثم وقفت على حديث أبي العالية عند ابن أبي شيبة في `المصنف ` (15/182/
19456) من طريق حفصة عن أبي العالية قال:
`ما بين أول الآيات وآخرها ستة أشهر، تتابع كما تتابع الخرز في النظام `.
وإسناده صحيح، وهو يؤيد ما تقدم عن الدارقطني أنه من قوله.
فلعل وصف الحافظ إياه بأنه مرسل؛ إنما هو بالنظر إلى أنه في المعنى في حكم المرفوع؛ لأنه لا يقال من قبل الرأي، أو أنه وقف على رواية أخرى صريحة في الرفع. والله أعلم.
ثم رواه ابن أبي شيبة (19457) من طريق أبي المهزم عن أبي هريرة قال:
`ما بين أول الآيات وآخرها ثمانية أشهر`.
لكن أبو المهزم ضعيف. *




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:

কেয়ামতের নিদর্শনসমূহ একের পর এক প্রকাশ পাবে; সেগুলো এমনভাবে ধারাবাহিকভাবে আসতে থাকবে, যেমন সুতায় গাঁথা মুক্তার দানাগুলো একের পর এক আসে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3211)


3211 - (والذي نفس محمد بيده! لا تقوم الساعة حتى يظهر الفحش والبخل، ويخوَّن الأمين، ويؤتمن الخائن، ويهلك الوعول، وتظهر التُّحوت. قالوا: يا رسول الله! وما الوعول وما التحوتُ؟ قال: الوعول: وجوه الناس وأشرافهم، والتحوت: الذين كانوا تحت أقدام الناس لايعلم بهم) .
أخرجه البخاري في `التاريخ ` (1/98/275) ، ومن طريقه: ابن حبان رقم (




আবদুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:
"শপথ সেই সত্তার, যার হাতে মুহাম্মাদের জীবন! কিয়ামত সংঘটিত হবে না, যতক্ষণ না অশ্লীলতা (ফাহেশা) ও কৃপণতা (বخل) প্রকাশ পাবে, আমানতদারকে বিশ্বাসঘাতক মনে করা হবে এবং বিশ্বাসঘাতককে আমানতদার মনে করা হবে। আর ’আল-উঊল’ ধ্বংস হবে এবং ’আত-তুহূত’ প্রকাশ পাবে।"
সাহাবীগণ জিজ্ঞাসা করলেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! ’আল-উঊল’ ও ’আত-তুহূত’ কী?"
তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "’আল-উঊল’ হলো মানুষের সম্ভ্রান্ত ও নেতৃস্থানীয় ব্যক্তিবর্গ। আর ’আত-তুহূত’ হলো সেইসব মানুষ, যারা মানুষের পায়ের নীচে ছিল (অর্থাৎ সমাজে নিচু বা মূল্যহীন ছিল), যাদের সম্পর্কে কেউ জানত না।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3212)


3212 - (لأَسْلَم وغِفارُ، ورجالُ من مُزَيْنَةَ وجُهَيْنَةَ؛ خير من
الحليفين؛ غطُفان وبني عامر بن صعصعة) .
أخرجه البزار (3/308/2814) : حدثنا محمد بن مسكين: ثنا إبراهيم بن
محمد [بن] جناح: ثنا هلال بن الجهم: ثنا إسحاق عن أنس مرفوعاً به، قال:
فقال عيينة بن بدر: والله! لأن أكون في هؤلاء في النار - يعني: غطفان وبني عامر - أحب إلي من أن أكون في هؤلاء في الجنة.
قلت: وهذا إسناد ضعيف؛ كما قال الحافظ في `مختصر زوائد البزار`
(2/380 /2051) ، وأما الهيثمي فقال (10 /45) :
`رواه البزار، وفيه إبراهيم بن محمد بن جناح، ولم أعرفه، وبقية رجاله
ثقات `!
كذا قال! وهلال بن الجهم أشار أبو حاتم إلى تضعيفه بقوله (4/2/78) :
`ليس بمشهور، حديثه ليس بموضوع `!
ولم يذكر له راوياً غير عمر بن يونس؛ وكذلك فعل ابن حبان في `الثقات ` (7/575) ، وعليه اعتمد الهيثمي في إطلاقه التوثيق على بقية رجاله، وهي عادة له معروفة.
ولكن ينبغي أن يضاف إلى عمر بن يونس: إبراهيم بن محمد بن جناح
هذا، ولو أنه غير معروف، كما أشار إلى ذلك الهيثمي، وقد ذكره الحافظ المزي في شيوخ محمد بن مسكين في كتابه `تهذيب الكمال `.
واعلم أنني كنت أوردت الحديث سابقاً في `الضعيفة`؛ لذكر `بني عامر`
في آخره، ثم وجدت له شاهداً من حديث أبي بكرة، وفيه ذكر `بني عامر` بلفظ: `أسلم وغفار، ومزينة وجُهينة خير من بني تميم، ومن بني عامر، والحليفين:
بني أسد وبني غطفان `.
أخرجه البخاري (3515 و 3516) ، ومسلم (7/




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আসলাম, গিফার এবং মুযাইনা ও জুহাইনা গোত্রের লোকেরা দুই মিত্র গোত্র—গাতফান এবং বনু আমের ইবনে সা’সাআর—চেয়ে উত্তম।"

বর্ণনাকারী বলেন: তখন উয়াইনা ইবনে বদর বললেন: "আল্লাহর কসম! এদের (অর্থাৎ গাতফান ও বনু আমেরের) সাথে জাহান্নামে থাকাটা আমার কাছে বেশি প্রিয়, তাদের (অর্থাৎ আসলাম, গিফার, মুযাইনা, জুহাইনার) সাথে জান্নাতে থাকার চেয়ে।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3213)


3213 - (للشهيد عند الله خصال:




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ্‌র নিকট শহীদের জন্য কয়েকটি বিশেষ মর্যাদা রয়েছে:









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3214)


3214 - (إئما مثل الجليس الصالح والجليس السوء: كحامل المسك ونافخ الكير؛ فحامل المسك؛ إما أن يُحذيك، وإما أن تبتاع منه، وإما
أن تجد منه ريحاً طيبة، ونافخ الكير؛ إما أن يحرق ثيابك، وإما أن تجد [منه] ريحاً خبيثة) .
أخرجه البخاري (2101و 5534) ، ومسلم (8/




আবু মুসা আল-আশ’আরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: নিশ্চয় সৎ সঙ্গী এবং অসৎ সঙ্গীর উপমা হলো মিশক বহনকারী (আতর বিক্রেতা) এবং হাপর ফুঁকানো কামারের (মতো)।

মিশক বহনকারী হয়তো তোমাকে কিছু উপহার দেবে, অথবা তুমি তার কাছ থেকে তা খরিদ করবে, অথবা তুমি তার কাছ থেকে সুগন্ধ পাবে।

পক্ষান্তরে হাপর ফুঁকানো কামার হয়তো তোমার কাপড় পুড়িয়ে দেবে, অথবা তুমি তার কাছ থেকে দুর্গন্ধ পাবে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3215)


3215 - (أيُّ الخلق أعجبُ إيماناً؟ قالوا: الملائكة. قال: الملائكة كيف لا يؤمنون؟! قالوا: النبيون. قال: النبيون يوحى إليهم فكيف لا يؤمنون؟! قالوا: الصحابة. قال: الصحابة مع الأنبياء فكيف لا يؤمنون؟! ولكن
أعجب الناس إيماناًً: قوم يجيئُون من بعد كم فيجدون كتاباً من الوحي؛ فيؤمنون به ويتَّبعونه، فهم أعجب الناس إيماناً - أو الخلق إيماناً - ) .
أخرجه البزار في `مسنده ` (3/




উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞাসা করলেন: সৃষ্টির মধ্যে কার ঈমান সবচেয়ে আশ্চর্যজনক?

তারা বলল: ফেরেশতাগণ।

তিনি বললেন: ফেরেশতারা কীভাবে ঈমান আনবে না?!

তারা বলল: নবীগণ।

তিনি বললেন: নবীগণকে তো ওহী দ্বারা জানানো হয়, তাহলে তারা কীভাবে ঈমান আনবে না?!

তারা বলল: সাহাবীগণ।

তিনি বললেন: সাহাবীগণ তো নবীদের সাথেই আছেন, তাহলে তারা কীভাবে ঈমান আনবে না?!

কিন্তু ঈমানের দিক থেকে সবচেয়ে আশ্চর্যজনক মানুষ হলো সেই সম্প্রদায়, যারা তোমাদের পরে আসবে। অতঃপর তারা ওহী (আল্লাহর পক্ষ থেকে প্রেরিত বাণী) সম্বলিত একটি কিতাব পাবে; অতঃপর তারা তাতে ঈমান আনবে এবং তা অনুসরণ করবে। অতএব, তারাই ঈমানের দিক থেকে সবচেয়ে আশ্চর্যজনক মানুষ—অথবা সৃষ্টির মধ্যে সবচেয়ে আশ্চর্যজনক ঈমানদার।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3216)


3216 - (أبو اليقظان على الفطرة، لا يدَعُها حتى يموت، أو يمسَّهُ
الهرم) .
أخرجه البزار في `مسنده ` (3/252/




আব্দুল্লাহ ইবন মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

আবূ ইয়াকযান ফিতরাত (ঈমানের সহজাত প্রকৃতি)-এর উপর রয়েছে। সে তা পরিত্যাগ করবে না, যতক্ষণ না তার মৃত্যু হয় অথবা তাকে বার্ধক্য/জরা স্পর্শ করে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3217)


3217 - (إن آخر زادك من الدنيا ضيحٌ من لبنٍ. يعني: عمار بن
ياسرٍ) .
أخرجه الحاكم (3/389) ، والطبراني في `المعجم الأوسط ` (2/ 101/2) ، وابن عساكر في `تاريخ دمشق ` (12/659) من طريقين عن حرملة بن يحيى: ثنا عبد الله بن وهب: أخبرني إبراهيم بن سعد عن أبيه عن جده قال: سمعت عمار
ابن ياسر بـ (صِفِّين) في اليوم الذي قُتل فيه، وهو ينادي: أزلفت الجنة، وزُوجت الحور العين، اليوم نلقى حبيبنا محمداً - صلى الله عليه وسلم - ، (وفي رواية: نلقى الأحبة، محمداً وحزبه) ، عهِد إلي ... فذ كر الحديث.
وقال الطبراني - والرواية الأخرى - له:
`لم يروه عن إبراهيم بن عبد الرحمن بن عوف إلا ولده، ولا رواه عن إبراهيم
ابن سعد إلا ابن وهب، تفرد به حرملة`.
قلت: هو ثقة من شيوخ مسلم، ومن فوقه ثقات من رجال الشيخين، فهو
إسناد صحيح على شرط مسلم.
وقال الحاكم - وتبعه الذهبي - :
`صحيح على شرطهما`!!
وأورده الذهبي في `السير` (1/425) ساكتاً عليه، ولم يُخرِّجه المعلِّق عليه
ألبتة، وتحرف عليه قوله: `عن جده ` إلى `عمن حدثه `، فأفسد إسناده!
والحديث خبط الهيثمي في تخريجه؛ فقال (9/296) :
`رواه الطبراني في `الأ وسط `، وأحمد باختصار، ورجالهما رجال `الصحيح `، ورواه البزار بإسناد ضعيف، وفي رواية لأحمد: أنه لما أتي باللبن ضحك `.
ووجه الخبط أنه أوهم أنه عند الآخرين - وبخاصة عند البزار - من طريق
واحدة، وليس كذلك كما سيتبين لك من التخريج الآتي:
فمن تلك الطرق: ما رواه سفيان - وهو الثوري - عن حبيب بن أبي ثابت عن
أبي البختري قال: قال عمار يوم (صفين) :
ائتوني بشربة لبن؛ فإن رسول الله - صلى الله عليه وسلم - قال:
`آخر شربة تشربها من الدنيا شربة لبن `؛ فأتي بشربة لبن فشربها، ثم تقدم،
فقُتِل.
أخرجه ابن أبي شيبة في `المصنف ` (5 1/302 /19723) ، وأحمد (4/9 31) ، وكذا ابن سعد (3/257) . وأبو يعلى (3/188/1613) ، وابن عساكر في`تاريخ دمشق ` (2 1/ 658) ، وا لحا كم (3/ 389) وقال:
`صحيح على شرط الشيخين `. ووافقه الذهبي.
قلت: وهو كما قالا إن كان حبيب سمعه من أبي البختري؛ فإنه كان
مدلساً، وأيضاً أبو البختري - واسمه سعيد بن فيروز - لم يدرك علياً رضي الله عنه. لكنه توبع، فقال أبو يعلى (1626) - وعنه ابن عساكر (12/659) - : حدثنا
وهب ابن بقية: حدثنا خالد عن عطاء عن ميسرة وأبي البختري:
أن عماراً يوم صفين.. الحديث مثله. *
سبب نزول: (ومن يخرج من بيته مهاجراً)




আম্মার ইবন ইয়াসির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত...

রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে (আম্মার ইবন ইয়াসিরকে) উদ্দেশ্য করে বলেছিলেন: "দুনিয়াতে তোমার শেষ পাথেয় হলো সামান্য দুধের মিশ্রিত পানীয় (দুধের শরবত)।"

(অন্য এক বর্ণনায় এসেছে, সিফফিনের যুদ্ধের দিন, যেদিন তিনি শহীদ হন,) আম্মার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উচ্চস্বরে ঘোষণা করছিলেন: "জান্নাতকে সন্নিকটে আনা হয়েছে, এবং ডাগর-চোখের হুরদেরকে সজ্জিত করা হয়েছে। আজ আমরা আমাদের প্রিয়তম মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তাঁর দলের সাথে মিলিত হব।"

তিনি বলেন: "আমার জন্য এক চুমুক দুধ নিয়ে এসো। কারণ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বলেছিলেন: ‘দুনিয়াতে তুমি শেষ যে পানীয় পান করবে, তা হলো এক চুমুক দুধ।’"

অতঃপর তাঁর জন্য এক চুমুক দুধ আনা হলো। তিনি তা পান করলেন, তারপর (যুদ্ধের জন্য) অগ্রসর হলেন এবং শহীদ হয়ে গেলেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3218)


3218 - (هاجر خالد بن حزام إلى أرض الحبشة، فنهشتهُ حيةٌ
في الطريق فمات، فنزلت فيه: (ومن يخرج من بيته مهاجراً إلى الله ورسوله ثم يُدرِكه الموت فقد وقع أجره على الله وكان الله غفوراً
رحيماً) [النساء: 100] . قال الزبير بن العوام: وكنت أتوقعه وأنتظر قدومه وأنا بأرض الحبشة، فما أحزنني شيءٌ حُزنَ وفاته حين بلغني؛ لأنه قلَّ أحدٌ ممن هاجر من قريش إلا معه بعض أهله أو ذي رحِمِهِ،
ولم يكُن معي أحدٌ من بني أسد بن عبد العُزَّى، ولا أرجو غيره) .
أخرجه ابن أبي حاتم في `التفسير` (2/175/1) : حدثنا أبو زرعة: ثنا عبد الرحمن بن عبد الملك بن شيبة الحِزامي: حدثني عبد الرحمن بن المغيرة بن
عبد الرحمن الحزامي عن المنذر بن عبد الله عن هشام بن عروة عن أبيه: أن الزبير ابن العوام قال: ... فذكره.
وأخرجه أبو نعيم في `المعرفة ` (1/209/2) من طريق أخرى عن عبد الرحمن
ابن شيبة هذا دون قول الزبير: وكنت أتوقعه ... إلخ.
قلت: وهذا إسناد حسن رجاله ثقات؛ ابن شيبة الحزامي من شيوخ
البخاري، تكلم فيه بعضهم من قبل حفظه، وأخرج له البخاري متابعة كما حققه الحافظ، وانظر تعليقي على ترجمته في `تيسير الانتفاع `؛ فكأنه - لحسن حاله - مشّى حديثه هذا كما ذكروه في ترجمة خالد بن حزام وجزموا به؛ مثل الحافظ الذهبي في `التجريد`، والعسقلاني في `الإصابة `، ومن قبلهم ابن الأثير في
`أسد الغابة `.
ورواه الواقدي على وجه آخر، فقال ابن سعد في `الطبقات ` (4/119) : أخبرنا محمد بن عمر قال: حدثني المغيرة بن عبد الرحمن الحزامي قال: أخبرني أبي قال: خرج خالد بن حزام مهاجراً إلى أرض الحبشة في المرة الثانية؛ فنهش في الطريق ... الحديث؛ دون قول الزبير أيضاً.
وهذا - مع إرساله - واه جداً؛ لحال محمد بن عمر الواقدي المعروفة.
ومن طريقه: أخرجه الحاكم (3/485) بأسانيد أخرى له.
وبالجملة؛ فالعمدة على الطريق الأولى؛ لثقة رواتها.
غير أنه بقي شيء كدت أن أسهو عنه، وهو أن المنذر بن عبد الله الحزامي لم يوثقه غير ابن حبان (7/518 و 9/176) ، وقال الحافظ:
`مقبول `!
فأقول: بل هو ثقة فاضل، كما يظهر من ترجمته في `تاريخ بغداد` (13/




যুবাইর ইবনুল আওয়াম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

খালেদ ইবনু হিজাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবিসিনিয়ার (হাবশা) দিকে হিজরত করেন। পথে তাঁকে একটি সাপ দংশন করলে তিনি ইন্তেকাল করেন। তখন তাঁর সম্পর্কে আল্লাহ তাআলার এই বাণী নাযিল হয়:

"আর যে ব্যক্তি আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের দিকে হিজরত করার উদ্দেশ্যে আপন ঘর থেকে বের হয়, অতঃপর পথেই তার মৃত্যু হয়, তাহলে তার পুরস্কার আল্লাহ্‌র উপর ধার্য হয়ে যায়। আর আল্লাহ্‌ ক্ষমাশীল, পরম দয়ালু।" [সূরা নিসা: ১০০]

যুবাইর ইবনুল আওয়াম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি আবিসিনিয়ার ভূমিতে থাকা অবস্থায় তার (আগমনের) অপেক্ষা করছিলাম এবং তার পথ চেয়েছিলাম। যখন আমি তার মৃত্যুর খবর পেলাম, তখন অন্য কোনো কিছুই আমাকে তার ইন্তেকালের মতো এত গভীরভাবে ব্যথিত করেনি। কারণ কুরাইশদের মধ্যে যারা হিজরত করেছিলেন, তাদের প্রায় সবার সঙ্গেই তাদের পরিবারের কিছু সদস্য অথবা আত্মীয়-স্বজন ছিল। অথচ বনু আসাদ ইবনু আবদুল উযযার কেউ আমার সঙ্গে ছিল না, আর আমি শুধু তাঁকেই (খালেদ ইবনু হিজামকে) ভরসা করছিলাম।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3219)


3219 - (كان يخرج بعد النداء إلى المسجد، فإذا رأى أهل
المسجد قليلاًً؛ جلس حتى يرى منهم جماعةً ثم يصلي، وكان إذا خرج فرأى جماعة، أقام الصلاة) .
أخرجه البيهقي في `السنن ` (2/




তিনি আযানের পর মসজিদের দিকে বের হতেন। যখন তিনি দেখতেন যে মসজিদের মুসল্লিদের সংখ্যা কম, তখন তিনি বসে থাকতেন যতক্ষণ না তাদের মধ্যে একটি জামাআত তৈরি হতো। অতঃপর তিনি সালাত আদায় করতেন। আর যখন তিনি (বের হয়েই) জামাআত দেখতেন, তখন সালাতের ইকামত দেওয়া হতো।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3220)


3220 - (بُعثت والساعة كهاتين - وضمَّ إصبعيه الوسَّطى والتي
تلي الإبهام - ، وقال:
ما مثلي ومثل الساعة إلا كفرسي رهان. ثم قال:
ما مثلي ومثل الساعة إلا كمثل رجُلٍ بعثه قومٌ طليعةُ، فلمّا خشي
أن يسبق؛ ألاح بثوبه: أتيتم أتيتم، أنا ذاك، أنا ذاك) .
أخرجه ابن جرير الطبري في `تاريخه ` (1/8) : حدثنا محمد بن يزيد
الأدمي قال: حدثنا أبو ضمرة عن أبي حازم عن سهل بن سعد الساعدي: أن رسول الله - صلى الله عليه وسلم - قال: ... فذكره.
قلت: وهذا إسناد صحيح، رجاله ثقات رجال الشيخين؛ غير الأدمي هذا،
وهو ثقة بلا خلاف.
وقد توبع، فقال محمد بن حماد: نا أنس بن عياض الليثي عن أبي حازم -
ولا أعلمه إلا - عن سهل بن سعد به.
أخرجه البيهقي في `شعب الإيمان ` (7/260/10237) .
ومحمد بن حماد هذا ثقة أيضاً، وهو الأبيوردي؛ وثَّقه ابن حبان (9/99 و 107) ، وروى عنه جمع من الثقات.
وتابعهما الإمام أحمد (5/331) : ثنا أنس بن عياض به.
والطرف الأول منه أخرجه البخاري (4936 و5301 و 03 65) ، ومسلم (8/208) ، وابن حبان (




সহল ইবনু সা’দ আস-সা’য়িদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) বলেছেন:

“আমি প্রেরিত হয়েছি এবং কিয়ামত এই দুটির মতো।”
(এ কথা বলার সময় তিনি তাঁর মধ্যমা আঙুল এবং বুড়ো আঙুলের পাশের আঙুলটি—অর্থাৎ তর্জনী—একত্রিত করে দেখালেন।)

তিনি আরও বললেন: “আমার এবং কিয়ামতের উদাহরণ হলো কেবল দুটি প্রতিযোগিতামূলক ঘোড়ার মতো।”

অতঃপর তিনি বললেন: “আমার এবং কিয়ামতের উদাহরণ হলো সেই ব্যক্তির মতো, যাকে তার জাতি অগ্রগামী পর্যবেক্ষক (পাহারাদার) হিসেবে পাঠালো। যখন সে ভয় পেল যে (শত্রু) তার আগে এসে যেতে পারে, তখন সে তার কাপড় দিয়ে ইশারা করে বলল: ‘তোমরা এসে গেছ! তোমরা এসে গেছ! আমিই হলাম সেই সতর্ককারী, আমিই হলাম সেই সতর্ককারী!’”