সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ
3467 - ـ (لما افتَتَحَ - صلى الله عليه وسلم - مكةَ؛ رَنَّ إبليسُ رنّةً اجتمعتْ إليه جنودُه، فقالَ: ايْأَسُوا أن نرى أمّةَ محمّدٍ على الشّركِ بعْدَ يومِكم هذا! ولكنِ افتنُوهم في دينِهِم، وأَفْشُوا فيهم النَّوحَ) .
أخرجه الطبراني في «المعجم الكبير» (12/11/12318) : حدثنا عبدان بن أحمد: ثنا عمرو بن العباس الرازي: ثنا عبد الرحمن بن مهدي: ثنا يعقوب القُمِّي عن جعفر بن أبي المغيرة عن سعيد بن جبير عن ابن عباس رضي الله عنهما قال: ... فذكره.
ومن طريق الطبراني: أخرجه الضياء في «المختارة» (59/12/1) ، وذلك يقتضي أنه عنده حسن على الأقل، وهو كذلك عندي؛ لولا أن عمرو بن العباس الرازي شبه مجهول؛ فإني لم أجد له ترجمة؛ إلا أن ابن حبان ذكره في «ثقاته» (8/486) من رواية عبدان هذا ـ وهو الجواليقي الحافظ ـ، وقاعدة ابن حبان في توثيق المجهولين معروفة، ومع ذلك فقد قال فيه:
«ربما خالف» .
فإن تبين أن للرازي هذا متابعاً؛ فينقل إلى «الصحيحة» . والله سبحانه وتعالى أعلم.
ثم وجدت له متابعاً قويّاً، وكان ينبغي أن أتنبه له من قبل، ولكن هكذا قُدِّرَ، فقد ذكره الضياء عقب رواية الطبراني، لكن بخطه الدقيق وعلى الحاشية، رواه بإسناده عن أبي يعلى الموصلي: ثنا إبراهيم بن محمد بن عرعرة: ثنا عبد الرحمن ابن مهدي به.
وإبراهيم بن عرعرة هذا ثقة؛ كما في «التقريب» ، فثبت الحديث بهذه المتابعة والحمد لله.
وقد عزاه الحافظ في «المطالب العالية» (4/248/4363) لأبي يعلى، وكذا البوصيري في «إتحاف السادة المهرة» (2/99/1) وسكتا عنه! وقنع بذلك المعلق الشيخ الأعظمي على «المطالب» ، فسكت على سكوتهما! ثم رأيته في «المطالب العالية المسندة» (2/86/1) ، قال: قال أبو يعلى: حدثنا إبراهيم بن محمد بن عرعرة ... إلخ.
(فائدة) : ذكر الحافظ في «التهذيب» أن ابن حبان نقل في «الثقات» عن أحمد بن حنبل توثيق جعفر بن أبي المغيرة هذا، وهو في «ثقات ابن حبان» (6/134) ، ولكن ليس فيه هذا التوثيق.
نعم، هو في «العلل ومعرفة الرجال» لعبد الله بن أحمد؛ قال (2/159/1057) : «سمعت أبي يقول: جعفر بن أبي المغيرة القمي ـ وهو جعفر المصور ـ ثقة، وهو جعفر بن دينار» . وهذه فائدة عزيزة خلت منها الأمهات، والحمد لله الذي بنعمته تتم الصالحات.
وقد مضى الكلام عليه وعلى الراوي عنه يعقوب بن عبد الله القمي تحت الحديث (580) . *
أثر الإخلاص لله في الأَعمال الصالحة والتوسل بها
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা বিজয় করলেন, তখন ইবলীস এমন জোরে চিৎকার করল যে, তার সকল সৈন্য তার কাছে একত্রিত হলো। অতঃপর সে (ইবলীস) বলল: আজকের দিনের পর তোমরা এই বিষয়ে হতাশ হয়ে যাও যে, তোমরা আর কখনো মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উম্মতকে শিরকের উপর দেখতে পাবে! তবে তোমরা তাদের দীনের (ধর্মীয় বিষয়ে) মধ্যে ফেতনা সৃষ্টি করো এবং তাদের মধ্যে উচ্চস্বরে বিলাপ (মৃতের জন্য মাতম/আর্তনাদ) ছড়িয়ে দাও।
3468 - ـ (إنّ ثلاثةً كانُوا في كهْفٍ، فوقعَ الجبلُ على بابِ الكهْفِ فأَوصدَ عليهم، قالَ قائلٌ منهم: تذَاكرُوا؛ أيّكُم عملَ حَسَنَةً؛ لعلّ اللهَ عزّ وجلّ برحمتِه يرحمُنا!
فقالَ رجلٌ منهم: قدْ عملتُ حسَنَةً مرّةً؛ كانَ لي أُجَراءُ يعملونَ، فجاءَ عمّالٌ لِي، فاستأْجرتُ كلّ رجلٍ منهُم بأجْرٍ معلومٍ، فجاءني رجلٌ ذاتَ يومٍ وسطَ النّهارِ، فاستأْجَرتُه بشَطْرِ أصحابِه، فعمِلَ في بقيّةِ نهارِه كما عملَ كلّ رجلٍ منهم في نهارِه كلّه، فرأيتُ عليّ في الذِّمامِ أنْ لا أنقصَه مما استأجرتُ به أصحابَه؛ لِما جَهِدَ في عملِه، فقالَ رجلٌ منهم: أتعطِي هذا مثْلَ ما أعطيتَني ولم يعملْ إلا نصْفَ نهارٍ؟! فقلتُ: يا عبدَ الله! لم أبخسْكَ شيئاً من شرْطِك، وإنّما هو مالي أحكمُ فيه ما شئتُ! قال: فغضبَ وذهبَ، وتركَ أجرَه. قال: فوضعتُ حقّه في جانبٍ من البيْتِ ما شاءَ اللهُ، ثمّ مرّتْ بي بعدَ ذلكَ بقرٌ، فاشتريتُ به فصِيلَة (¬1) من البقَرِ؛ فبلغتْ ما شاءَ اللهُ. فمرّ بي بعدَ حينٍ شيْخاً ضَعِيفاً لا أعرفُه، فقال: إنّ لي عندَك حقّاً؛ فذكَّرنِيه حتى عرفْته، فقلتُ: إيّاك أبْغي، هذا حقُّك، فعرضتُها عليهِ جميعها! فقالَ: يا عبدَ الله! لا تسخرْ بي! إنْ لم تصْدُقْ عليَّ فأَعطِني حقِّي، قلتُ: واللهِ! لا أسخَرُ بكَ؛ إنّها لحقّكَ، ما لي منها شيءٌ، فدفعتها إليهِ جميعاً، اللهمّ! إنْ كنتُ فَعلتُ ذلكَ لوجهِك؛ فافْرُج عنّا! قال: فانصدعَ الجبلُ حتّى رأوا منه وأَبْصَرُوا
¬_________
(¬1) هو ما فصل من اللبن من أولاد البقر: «نهاية» .
قال الآخرُ: قد عملتُ حسنةً مرّةً؛ كانَ لي فضْل، فأصابتِ الناسَ شدّةٌ، فجاءتْني امرأةٌ تطلبُ منِّي معرُوفاً، قال: فقلتُ: واللهِ ما هو دونَ نفسِكِ! فأبتْ عليّ فذهبتْ، ثم رجعتْ فذكَّرتْني باللهِ، فأَبيتُ عليها وقلت: لا واللهِ؛ ما هو دون نفسِك! فأبتْ عليّ وذهبتْ، فذكرتْ لزوجِها، فقال لها: أَعطيهِ نفسَكِ، وأَغْني عيالَك! فرجعتْ إليّ، فناشدتْني باللهِ، فأبيتُ عليها، وقلتُ واللهِ ما هو دون نفسِك! فلمّا رأتْ ذلكَ أسلمتْ إليّ نفْسها، فلمّا تكشَّفْتُها وهممت بها؛ ارتعدتْ من تَحتي، فقلتُ: ما شأْنُك؟! قالتْ: أخافُ اللهَ ربَّ العالمينَ! فقلتُ لها: خفتِيه في الشّدةِ، ولم أَخفْهُ في الرّخاءِ! فتركتُها وأعطيتُها ما يحقُّ عليّ بما تكشّفتها، اللهمّ! إنْ كنتُ فعلتُ ذلك لوجهكَ؛ فافْرُج عنّا! قال: فانصدعَ حتّى عرفُوا وتبيّن لهم.
قال الآخرُ: عملتُ حسنةً مرة؛ كانَ لي أبَوانِ شيخانِ كبيرانِ، وكانَ لي غَنَمٌ، فكنتُ أُطعِم أبويَّ وأسقِيهما، ثمّ رجعتُ إلى غنمي، قال: فأَصابني يومُ غيْثٍ حَبَسنِي، فلمْ أبْرحْ حتّى أمسيْتُ، فأتيتُ أهْلي، وأخذتُ مِحلبي، فحلبتُ غنمِي قائمةً، فمضيتُ إلى أبويّ؛ فوجدتُهما قد ناما، فشقّ عليّ أن أُوقظَهما، وشقّ أنْ أتركَ غنمِي، فما برحتُ جالساً؛ ومِحلبي على يدي حتى أيقظَهما الصبْحُ فسقيتُهما، اللهمّ! إنْ كنتُ فعلتُ ذلكَ لوجهِك؛ فافْرُج عنّا! ـ قال النعمان: لكأنِّي أسمعُ هذِه من رسولِ اللهِ - صلى الله عليه وسلم - ـ قال الجبل: طاق؛ ففرج الله عنهم فخرجوا) .
أخرجه الإمام أحمد (4/274 ـ 275) : ثنا إسماعيل بن عبد الكريم بن مَعْقِل
ابن مُنَبِّه: حدثني عبد الصمد ـ يعنى: ابن معقل ـ قال: سمعت وهباً يقول: حدثني النعمان بن بشير:
أنه سمع رسول الله - صلى الله عليه وسلم - يذكر الرقيم فقال: ... فذكره.
وعن إسماعيل هذا: أخرجه الطبراني في «المعجم الكبير» (25/284/410) ، وفي «الدعاء» أيضاً (2/866/190) .
وهو إسناد جيد متصل مسلسل بالتحديث.
ثم أخرجه في «الدعاء» و «المعجم الأوسط» (3 /160ـ 162/ 2328 و 2329)
من طرق أخرى عن وهب بن منبه؛ فهو صحيح؛ لأن وهباً هذا ثقة من رجال الشيخين.
وأخرجه البزار أيضاً (4/52_ 54/3178_ 3180) من طرق أخر عن النعمان
بن بشير نحوه.
والحديث قال الهيثمي (8/142) :
» رواه أحمد، والطبراني في «الأوسط» و «الكبير» ، والبزار بنحوه من طرق، ورجال أحمد ثقات» .
ثم أخرجه من حديث أنس، وأبي هريرة، وعلي رضي الله عنهم بألفاظ متقاربة. وحديث علي أخرجه البزار أيضاً (2/1867) وإسناده جيد.
وهو في «الصحيحين» وغيرهما من حديث عبد الله بن عمر بنحوه. وإنما آثرت هنا تخريجه من حديث النعمان بن بشير رضي الله عنه؛ لأنه حوى تفاصيل بعض الأمور التي لم ترد فيه، مع استقامة إسناده، والله سبحانه ولي التوفيق. *
নুমান ইবনু বাশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
তিন ব্যক্তি একটি গুহার মধ্যে ছিল। হঠাৎ একটি পাথর গড়িয়ে গুহার প্রবেশপথ বন্ধ করে দিল এবং তারা ভেতরে আটকা পড়ল। তাদের মধ্যে একজন বলল: তোমরা পরস্পরে স্মরণ করো—তোমাদের মধ্যে কে কী সৎ কাজ করেছ, যার মাধ্যমে হয়তো মহান আল্লাহ তাঁর রহমতে আমাদের প্রতি দয়া করবেন!
তাদের মধ্যে একজন বলল: আমি একবার একটি সৎ কাজ করেছিলাম। আমার কিছু মজুর ছিল যারা কাজ করত। কিছু শ্রমিক আমার কাছে এসে হাজির হলো, আমি তাদের প্রত্যেককে একটি নির্দিষ্ট মজুরির বিনিময়ে ভাড়া করলাম। একদিন দুপুরের দিকে আমার কাছে একজন লোক এলো, আমি তাকে তার সঙ্গীদের মজুরির অর্ধেক দামে কাজ করার জন্য ভাড়া করলাম। সে দিনের অবশিষ্ট অংশ কাজ করল, যেমন তার অন্য সঙ্গীরা পুরো দিনে করেছিল। আমি মনে করলাম, আমার দায়িত্ব হলো—তার পরিশ্রমের কারণে তাকে অন্য শ্রমিকদের যে মজুরি দিয়েছিলাম, তার থেকে কম দেব না। তাদের মধ্যে একজন (অন্য শ্রমিক) বলল: আপনি একে আমার সমান মজুরি দিচ্ছেন, অথচ সে দিনের অর্ধেক সময় কাজ করেছে?! আমি বললাম: হে আল্লাহর বান্দা! তোমার চুক্তি থেকে আমি কিছুই কম করিনি। আর এটা আমার সম্পদ, আমি যা ইচ্ছা তা করতে পারি। লোকটি রেগে গেল এবং তার মজুরি না নিয়ে চলে গেল।
বর্ণনাকারী বলেন: আমি আল্লাহর ইচ্ছানুযায়ী তার প্রাপ্য মজুরি ঘরের এক কোণে রেখে দিলাম। এরপর কিছু গরু আমার কাছ দিয়ে যাচ্ছিল, তখন আমি সেই মজুরি দিয়ে একটি বাছুর কিনলাম। আল্লাহর ইচ্ছায় সেটি বড় হতে থাকল। কিছুকাল পর, এক দুর্বল বৃদ্ধ লোক আমার পাশ দিয়ে যাচ্ছিল, যাকে আমি চিনতে পারছিলাম না। সে বলল: আমার কাছে তোমার কিছু পাওনা আছে। সে আমাকে স্মরণ করিয়ে দিল, ফলে আমি তাকে চিনতে পারলাম। আমি বললাম: আমি তোমাকেই খুঁজছি! এই নাও তোমার হক। আমি পুরো গরুর পালটি তার সামনে পেশ করলাম। সে বলল: হে আল্লাহর বান্দা! তুমি আমার সাথে উপহাস করো না! যদি তুমি আমার সাথে সত্য কথা না বলো, তবে শুধু আমার পাওনাটুকু দাও। আমি বললাম: আল্লাহর কসম! আমি তোমার সাথে উপহাস করছি না। এই সব তোমারই হক, এর মধ্যে আমার কিছুই নেই। আমি পুরো পালটি তাকে দিয়ে দিলাম। হে আল্লাহ! যদি আমি কাজটি আপনার সন্তুষ্টির জন্য করে থাকি, তবে আমাদের জন্য এই বিপদ দূর করে দিন! বর্ণনাকারী বলেন: তখন পাথরটি সরে গেল, ফলে তারা দেখতে পেল এবং আলো দেখতে পেল।
অপরজন বলল: আমি একবার একটি সৎ কাজ করেছিলাম। আমার আর্থিক সচ্ছলতা ছিল। একবার মানুষের উপর কঠিন সঙ্কট এলো। তখন একজন মহিলা আমার কাছে এসে কিছু সাহায্য চাইল। আমি বললাম: আল্লাহর কসম! এটা তোমার নিজের সত্তার বিনিময়ে ছাড়া হবে না! সে অস্বীকার করল এবং চলে গেল। এরপর সে ফিরে এলো এবং আমাকে আল্লাহর দোহাই দিল। আমি তখনো তাকে প্রত্যাখ্যান করলাম এবং বললাম: না, আল্লাহর কসম! এটা তোমার নিজের সত্তার বিনিময়ে ছাড়া হবে না! সে অস্বীকার করে চলে গেল। এরপর সে তার স্বামীকে বিষয়টি জানালো। স্বামী তাকে বলল: তুমি তাকে নিজেকে সমর্পণ করো এবং তোমার পরিবারকে সচ্ছল করো। ফলে সে আমার কাছে ফিরে এলো এবং আমাকে আল্লাহর দোহাই দিতে থাকল। আমি তাকে তখনও প্রত্যাখ্যান করলাম এবং বললাম: আল্লাহর কসম! এটা তোমার নিজের সত্তার বিনিময়ে ছাড়া হবে না! যখন সে (কোনো উপায় না দেখে) বুঝল, তখন সে নিজেকে আমার কাছে সমর্পণ করল। যখন আমি তাকে উন্মুক্ত করে তার সাথে সংগমের ইচ্ছা করলাম, তখন সে আমার নিচে কাঁপতে শুরু করল। আমি বললাম: তোমার কী হয়েছে? সে বলল: আমি আল্লাহ, জগৎসমূহের প্রতিপালককে ভয় করি! আমি তাকে বললাম: তুমি কঠিন পরিস্থিতিতে তাঁকে ভয় করলে, আর আমি কি আরামের সময়ে তাঁকে ভয় করব না?! অতঃপর আমি তাকে ছেড়ে দিলাম এবং তাকে উন্মুক্ত করার কারণে আমার উপর যে হক ছিল তা তাকে দিয়ে দিলাম। হে আল্লাহ! যদি আমি কাজটি আপনার সন্তুষ্টির জন্য করে থাকি, তবে আমাদের জন্য এই বিপদ দূর করে দিন! বর্ণনাকারী বলেন: তখন পাথরটি আরও সরে গেল, ফলে তারা পরিস্থিতি বুঝতে পারল এবং তাদের কাছে স্পষ্ট হয়ে গেল।
অপরজন বলল: আমি একবার একটি সৎ কাজ করেছিলাম। আমার বৃদ্ধ পিতামাতা ছিলেন। আমার কিছু বকরি ছিল। আমি প্রথমে আমার পিতামাতাকে খাওয়াতাম এবং পান করাতাম, এরপর আমার বকরির কাছে ফিরে যেতাম। বর্ণনাকারী বলেন: একদিন বৃষ্টির দিন এলো, যা আমাকে আটকে রাখল। সন্ধ্যা হওয়া পর্যন্ত আমি নড়তে পারিনি। এরপর আমি আমার পরিবারের কাছে এলাম এবং আমার দুধের পাত্রটি নিলাম। দাঁড়িয়ে থাকা অবস্থায় আমি আমার বকরির দুধ দোহন করলাম। অতঃপর আমার পিতামাতার কাছে গেলাম। গিয়ে দেখলাম, তারা ঘুমিয়ে গেছেন। তাদেরকে জাগানো আমার কাছে কঠিন মনে হলো, আবার তাদেরকে (দুধ না খাইয়ে) রেখে দেওয়াও আমার কাছে কঠিন মনে হলো। আমি পাত্র হাতে নিয়ে বসে রইলাম, সকাল পর্যন্ত আমি সেখান থেকে নড়িনি, যখন তারা জেগে উঠলেন, তখন আমি তাদের পান করালাম। হে আল্লাহ! যদি আমি কাজটি আপনার সন্তুষ্টির জন্য করে থাকি, তবে আমাদের জন্য এই বিপদ দূর করে দিন! নুমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: যেন আমি এই কথাগুলো রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের মুখ থেকেই শুনছি। (তখন) পর্বতটি সরে গেল। ফলে আল্লাহ তাআলা তাদের উপর থেকে বিপদ দূর করে দিলেন এবং তারা বেরিয়ে এলো।
3469 - ـ (يُبعَثُ الناسُ حفاةً عُراةً غُرْلاً، يُلْجِمُهم العَرَقُ، ويبلغُ شحمةَ الأُذنِ، قالتْ سَودةُ: قلت: يا رسولَ اللهِ! وا سوْءتاهُ! ينظرُ بعضُنا إلى بعْضٍ؟! قال:
شُغِلَ الناسُ عن ذلكَ. وتلا ` يومَ يفرُّ المرءُ من أخِيه *وأمِّه وأبيهِ *وصاحبتهِ وبنيهِ *لكلّ امْرئٍ منهم يوْمئذٍ شأْنٌ يغْنيهِ `) .
أخرجه الطبراني في «المعجم الكبير» (24/34/91) ، والحاكم (2/514 ـ 515) ، والبغوي في «تفسيره» (8/340) من طريق إسماعيل بن أبي أُويس:
حدثني أبي عن محمد بن أبي عياش عن عطاء بن يسار عن سودة زوج النبي - صلى الله عليه وسلم - قالت: قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - :. . . فذكره. والسياق للحاكم، قال:
«صحيح على شرط مسلم» ! ووافقه الذهبي!
قلت: محمد بن أبي عياش ليس من رجال مسلم، ولا غيره من الستة، وذكره البخاري في التاريخ (1/ 1/236 ـ 237/41) ، وابن أبي حاتم (4/1/84/352) ، وقالا:
«محمد بن أبي موسى ـ ويقال: ابن أبي عياش ـ. . روى عنه عبد الحميد بن سليمان، وأبو أويس» .
وكذا في «ثقات ابن حبان» (7/426) ؛ إلا أنه سقط منه: «ويقال» فصار أبو عياش جدَّه! ويبدو أنه سقط قديم؛ لأنه كذلك وقع في «ترتيب الثقات» ، والصواب ما في كتابي البخاري وابن أبي حاتم. والذي قال: (محمد ابن أبي موسى) هو (عبد الحميد بن سليمان) المذكور عندهما، فهو متابع لأبي أويس،
ومخالف له في اسم والد (محمد) ، كما شاركه في رواية الحديث عن عطاء بن يسار به، لكنه خالفه أيضاً في متنه، فزاد في آخره جملة، وفي إسناده فجعله من مسند (أم سلمة) رضي الله عنها؛ وقد خرجته في «الضعيفة» (5318) .
والحديث قال المنذري في «الترغيب» (4/193/4) :
«رواه الطبراني، ورجاله ثقات» .
ونحوه قول الهيثمي (10/333) :
«رواه الطبراني، ورجاله رجال «الصحيح» ؛ غير محمد بن عباس (!) وهو ثقة» .
كذا وقع فيه: «. . بن عباس» ، وهو خطأ، ولعله من الناسخ، والصواب: «.. بن أبي عياش» كما تقدم في إسناد الحديث، وفي ترجمته.
وكذلك تحرف اسمه في حديث أم سلمة المشار إليه آنفاً إلى: (محمد بن موسى بن أبي عياش) ! وقد نبهت عليه هناك.
ثم إن توثيق الهيثمي تبعاً للمنذري لـ (محمد) هذا؛ إنما هو من تساهلهما، تابعين في ذلك لابن حبان في توثيقه! فلا غرابة حينئذٍ أن يتقلد ذلك الجهلة الثلاثة في تعليقهم على «الترغيب» (4/ 288) ، وأن يستلزموا من ذلك ـ كعادتهم ـ ويقولوا:
«حسن، قال الهيثمي ... » !
والصواب أن يقال: حسن لغيره؛ لأن له شاهداً من حديث عائشة رضي الله عنها؛ يرويه سعيد بن أبى هلال أنه سمع عثمان بن عبد الرحمن القرظي قال:
قرأت عائشة رضي الله عنها قول الله عز وجل: ` ولقد جئتمونا فرادى كما
خلقناكم أول مرة`، فقالت: يا رسول الله! وا سوءتاه! إن الرجال والنساء يحشرون
جميعاً، ينظر بعضهم إلى سوءة بعض؟! فقال رسول الله:
«`لكل امرئ منهم يومئذٍ شأن يغنيه`، لا ينظر الرجال إلى النساء، ولا النساء إلى الرجال، شغل بعضهم عن بعض» .
أخرجه ابن أبي حاتم في «التفسير» (2/98/2 ـ 99/ 1) ، والحاكم (4/565)
ـ والسياق له ـ من طريق سعيد بن أبي هلال به. وقال الحاكم:
«صحيح الإسناد» . ورده الذهبي بقوله:
«قلت: فيه انقطاع» !
قلت: لم يظهر لي موضعه! والمتبادر أنه يعني: بين عثمان بن عبد الرحمن القرظي وعائشة رضي الله عنها، ولكني لم أعرف ابن عبد الرحمن هذا، ولم يسمه ابن أبي حاتم، وإنما ذكره بنسبته (القرظي) فقط، وحينئذٍ فيحتمل أن يكون هو (محمد بن كعب القرظي) ، فقد ذكروا في ترجمته ـ وهو ثقة ـ أنه روى عن عائشة رضي الله عنها، فإن ثبت أنه هو فلا انقطاع. والله سبحانه وتعالى أعلم.
والحديث عزاه الحافظ في «الفتح» (11/387) للترمذي، والحاكم! ولم أره في «سنن الترمذي» ، ولعله سبق قلم من المؤلف أو الناسخ.
وحديثها عند البخاري (6527) ، ومسلم (8/159) ، والنسائي في «الكبرى»
(6/507 / 11648) ، وابن ماجه (4276) ، وأحمد (6/89 ـ 90) ، وابن أبي الدنيا
في «الأهوال» (236/232) من طريق أخرى عن عائشة دون جملة الشغل.
ثم رأيت الحافظ ابن كثير قد ساقه بتمامه في «النهاية» (2/285) من رواية
البيهقي من طريق إسماعيل بن أبي أويس بإسناده المتقدم، وقال:
«إسناده جيد، وليس هو في «المسند» ، ولا في الكتب» !
كذا قال! ثم إنني لا أدري وجه تجويده لإسناده، وقد عرفت ما فيه؛ إلا أن يكون قد وجد له موثقاً غير ابن حبان، وهذا مما أستبعده! والله أعلم.
ثم ساق (1/286 ـ 287) من رواية أبي يعلى من طريق كوثر عن نافع عن ابن عمر مرفوعاً مثل حديث الترجمة دون تلاوة الآية؛ وفيه زيادة، فيها أمور منكرة. وقال:
«هذا حديث غريب من هذا الوجه، ولبعضه شاهد في «الصحيح» ، كما سيأتي ... » .
قلت: وعلته كوثر هذا ـ وهو ابن حكيم ـ؛ قال الحافظ الذهبي في «المغني» :
«تركوا حديثه؛ وله عجائب» .
ووقع في «النهاية» : «كرز» ! وهو خطأ من الطابع أو الناسخ، فصححته من «جامع المسانيد» (29/431/2869) ، و «المطالب العالية المسندة» (2/105/1) . وليس له ذكر في «مجمع الزوائد» ، ولا في «مسند أبي يعلى المطبوع فالظاهر أنه في «المسند الكبير» له، ولم يطبع، والله سبحانه وتعالى أعلم.
وقد خالف محمدَ بن أبي عياش في إسناده ومتنه: سعيدُ بن المَرْزُبان أبو سعد: فقال: عن عطاء عن الحسن بن علي رضي الله عنه مرفوعاً نحو حديث الترجمة مختصراً دون ذكر الآية والشغل؛ وزاد:
قال: «إن الأبصار يومئذٍ شاخصة» .
وهذه الزيادة في حديث ابن عمر المذكور آنفاً، وزاد أبو سعد أيضاً:
فرفع بصره إلى السماء. فقالت: يا رسول الله! ادع الله أن يستر عورتي. قال:
«اللهم! استر عورتها» .
أخرجه الطبراني في «المعجم الكبير» (1/133 ـ مخطوطة الظاهرية) و (3/93/2755ـ ط) ـ وسقط منه بعض السند ـ من طريق محمد بن الحسنالمزني عن عطاء بن أبي رباح عن الحسن بن علي. . . وهو بإسناده في «جامعالمسانيد» (3/487/2157) .
وسعيد بن المرزبان؛ قال الحافظ في «التقريب» :
«ضعيف مدلس» .
قلت: وتركه بعضهم، ومع هذا الضعف والمخالفة؛ قال الجهلة الثلاثة فيتعليقهم على «الترغيب» (4/288) :
«حسن بشواهده» ! *
من أهوال العذاب في جهنم
সাউদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:
মানুষকে (কিয়ামতের দিন) খালি পায়ে, উলঙ্গ অবস্থায় এবং খাতনাবিহীন (অচর্মচ্ছেদী) অবস্থায় পুনরুত্থিত করা হবে। (উত্তাপের কারণে) ঘাম তাদের মুখে লাগাম পরিয়ে দেবে এবং তা কানের লতি পর্যন্ত পৌঁছে যাবে।
সাউদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি জিজ্ঞাসা করলাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! হায় লজ্জা! (তখন কি) আমরা একে অপরের দিকে তাকাবো?
তিনি (রাসূলুল্লাহ ﷺ) বললেন: লোকেরা (সেই দিনের কঠিন পরিস্থিতির কারণে) সেই দিকে মনোযোগ দেওয়ার সুযোগ পাবে না। অতঃপর তিনি তেলাওয়াত করলেন: "সেদিন মানুষ পলায়ন করবে তার ভাই থেকে, তার মাতা, তার পিতা থেকে, এবং তার স্ত্রী ও তার সন্তান-সন্ততি থেকে। সেদিন তাদের প্রত্যেকেরই থাকবে এমন এক গুরুতর অবস্থা, যা তাকে সম্পূর্ণরূপে ব্যস্ত রাখবে।" (সূরা আবাসা, ৮০: ৩৪-৩৭)
3470 - ـ (إنّ (الحميمَ) ليُصبُّ على رؤوسهم، فينفذُ (الحميمُ) حتّىيخلُصَ إلى جوْفِه؛ فيسْلُت ما في جَوْفِه؛ حتّى يَمْرُق من قدمَيْه، وهو (الصَّهر) ، ثم يعاد كما كان) .
أخرجه ابن المبارك في «الزهد» (89/312 / زوائد نعيم) . ومن طريق ابنالمبارك: رواه الترمذي (2582) ، والحاكم (2/387) ، وعنه البيهقي في «البعث»
(282/579) ، وأحمد (2/374) ، وابن أبي الدنيا في «صفة النار» (ق 5/2) ،
وأبو نعيم في «الحلية» (8/182) ، والبغوي في «شرح السنة» (15/244/4406) ،
و «التفسير» (5/374) ، وكذا ابن جرير في «تفسيره» (17/100) كلهم عن ابن
المبارك: أخبرنا سعيد بن يزيد عن أبي السمح عن ابن حُجًيْرة عن أبي هريرة عن
النبي - صلى الله عليه وسلم - قال:. . . فذكره. وقال الترمذي:
«حديث حسن صحيح غريب، وابن حجيرة: هو عبد الرحمن بن حجيرة المصري، وسعيد بن يزيد: يكنى أبا شجاع، وهو مصري» .
وأقره المنذري في «الترغيب» (4/234/2) . وقال الحاكم:
«صحيح الإسناد» . ووافقه الذهبي!
والذي أراه ـ والله أعلم ـ أنه حسن؛ للخلاف المعروف في أبي السمح ـ واسمه
دراج ـ، وقد كنت ضعفت حديثه هذا قديماً كأحاديثه الأخرى، ثم ترجح عندي
قول أبي داود في التفريق بين ما يرويه عن أبي الهيثم؛ فضعيف، وما يرويه عن
ابن حجيرة؛ فمستقيم، كما سبق أن بينت ذلك، وهذا من روايته عنه. والله أعلم. *
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:
নিশ্চয়ই তাদের (মাথার) উপর ফুটন্ত গরম পানি (হামীম) ঢেলে দেওয়া হবে। অতঃপর সেই ফুটন্ত গরম পানি প্রবেশ করে তার পেটে পৌঁছে যাবে। ফলে তা তার পেটের ভেতরের সব কিছুকে গলিয়ে দেবে, এমনকি তা তার দু’পা দিয়ে বের হয়ে যাবে। আর এটাই হলো (গলিয়ে দেওয়ার শাস্তি) ‘আস-সাহার’। এরপর তাকে পুনরায় পূর্বের অবস্থায় ফিরিয়ে আনা হবে।
3471 - ـ (إنّ في الجنّةِ لَسُوقاً يأْتونَها كلَّ جُمُعةٍ؛ (فيه كُثْبانُ
المسْكِ (، فَتَهُبُّ ريحُ الشّمالِ، فتحثُو في وُجوهِهم وثيابِهم (الْمسك (،
فيزدادونَ حُسْناً وجَمَالاً، فيرجعونَ إلى أهْليهم، وقد ازدادُوا حُسْناً
وجَمَالاً، فيقولُ لهم أهلُوهم: واللهِ! لقدِ ازددتُم بعدَنا حُسْناً وجمالاً،
فيقولونَ: وأنتُم واللهِ! لقدِ ازددتُم بعدَنا حُسْناً وجمالاً) .
أخرجه مسلم (8/145) ، وابن حبان (9/256 ـ 257/7382) ، وابن أبي
شيبة (13/150/ 962 15) ، وأحمد (3/284 ـ 285) ، وأبو نعيم في «صفة الجنة»
(253/417) ، و «الحلية» (6/253) ، والبيهقي في «البعث» (209/415) ، والبغوي
في «شرح السنة» (15/226 ـ 227/4389) و «التفسير» أيضاً (1/76) كلهم من
طريق حماد بن سلمة عن ثابت البناني عن أنس أن رسول الله - صلى الله عليه وسلم - قال: ... فذكره. وقال البغوي:
«هذا حديث صحيح» .
والسياق لمسلم، والزيادتان لابن حبان وأحمد وغيرهما.
وله طريق أخرى؛ فقال الدارمي في «سننه» (2/338 ـ 339) : أخبرنا يزيد
ابن هارون: أنا حميد عن أنس به نحوه.
قلت: وهذا إسناد صحيح، وهو ثلاثي؛ إن كان حميد ـ وهو الطويل ـ سمعه
من أنس؛ فإن عامة حديثه عن أنس سمعه من ثابت؛ كما قاله غير واحد.
وقد أوقفه بعضهم، فقال الحسين المروزي في «زوائد الزهد» (524 ـ 525/
7491) : أخبرنا محمد بن أبي عدي: حدثنا حميد عن أنس قال:. . . فذكره
ولم يرفعه.
ورواه ابن أبي الدنيا في «صفة الجنة» (81/252) من طريق ابن المبارك: أنا
حميد الطويل به موقوفاً.
وتابعه عنده (251) من طريق ابن المبارك أيضاً، وهذا في «الزهد» (70/241
ـ نعيم) ، وابن أبي شيبة أيضاً (13/102/15822) كلهم من طريق سليمان التيمي
عن أنس به موقوفاً. *
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: জান্নাতে একটি বাজার রয়েছে, যেখানে জান্নাতবাসীরা প্রত্যেক জুমুআর দিনে আসবে। সেখানে কস্তুরীর স্তূপসমূহ থাকবে। তখন উত্তরের বাতাস প্রবাহিত হবে, যা তাদের মুখমণ্ডল ও পোশাকে কস্তুরী ছিটিয়ে দেবে। ফলে তারা আরও বেশি সুন্দর ও লাবণ্যময় হয়ে উঠবে। এরপর তারা তাদের পরিবারের কাছে ফিরে আসবে, আর তারা সুন্দর ও লাবণ্যময় হয়ে উঠেছে। তখন তাদের পরিবারবর্গ তাদেরকে বলবে: আল্লাহর কসম! আমাদের ছেড়ে যাওয়ার পর আপনারা আরও বেশি সুন্দর ও লাবণ্যময় হয়ে এসেছেন। তারা (জান্নাতবাসীরা) উত্তর দেবে: আল্লাহর কসম! আমাদের ছেড়ে আসার পর আপনারাও আরও বেশি সুন্দর ও লাবণ্যময় হয়ে উঠেছেন।
3472 - ـ (كان إذا دعَا دعَا ثلاثاً، وإذا سألَ سألَ ثلاثاً) .
أخرجه مسلم (5/179 ـ 180) عن زكريا عن أبي إسحاق عن عمرو بن
ميمون الأَوْدي عن ابن مسعود قال:
بينما رسول الله - صلى الله عليه وسلم - يصلي عند البيت، وأبو جهل وأصحاب له جلوس، وقد
نُحرت جزور بالأمس، فقال أبو جهل: أيكم يقوم إلى سلا جزور بني فلان
فيأخذه، فيضعه في كتفي محمد إذا سجد؟ فانبعث أشقى القوم، فأخذه، فلما
سجد النبي - صلى الله عليه وسلم - ؛ وضعه بين كتفيه، قال: فاستضحكوا، وجعل بعضهم يميل
على بعض؛ وأنا قائم أنظر؛ لو كانت لي منعة طرحته عن ظهر رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ،
والنبي - صلى الله عليه وسلم - ساجد ما يرفع رأسه، حتى انطلق إنسان فأخبر فاطمة، فجاءت ـ وهي
جويرية ـ فطرحته عنه، ثم أقبلت عليهم تشتمهم، فلما قضى النبي - صلى الله عليه وسلم - صلاته؛
رفع صوته ثم دعا عليهم، وكان إذا دعا. . . ثم قال:
«اللهم! عليك بقريش» (ثلاث مرات) .
فلما سمعوا صوته: ذهب عنهم الضحك، وخافوا دعوته، ثم قال:
«اللهم! عليك بأبي جهل بن هشام، وعتبة بن ربيعة، وشيبة بن ربيعة،
والوليد بن عقبة، وأمية بن خلف، وعقبة بن أبي معيط» ، وذكر السابع ولم
أحفظه. فوالذي بعث محمداً - صلى الله عليه وسلم - بالحق؛ لقد رأيت الذين سمى صرعى يوم بدر،
ثم سُحبوا إلى القليب: قليب بدر.
قال أبو إسحاق: (الوليد بن عقبة) غلط في هذا الحديث.
ومن هذا الوجه أخرجه البيهقي في «دلائل النبوة» (2/278) . وروى منه أبو
نعيم في «الحلية» (4/153 و 347) حديث الترجمة، وقال:
«رواه سفيان الثوري، وزهير، وإسرائيل عن أبي إسحاق نحوه» .
قلت: أخرجها عنهم البخاري، وعن شعبة أيضاً (240و520 و2934و3185
و3854 و2960) نحوه مطولاً ومختصراً، وكذا مسلم عنهم غير إسرائيل.
وأخرجه النسائي (1/58) في «الكبرى» (8668و8669) ، وابن حبان
(6536) ، وأحمد (1/393و417) ، والبزار (2398و2399) ، والطبراني في
«المعجم الأوسط» (762 ـ دار الحرمين) ، والبيهقي أيضاً وفي «السنن الكبرى»
(9/7 ـ 8) بعضهم من بعض الطرق المذكورة، وبعضهم من طرق أخرى.
وفي حديث سفيان عند مسلم وغيره:
وكان يستحب ثلاثً يقول: «اللهم! عليك بقريش، اللهم ... » . *
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
(রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের অভ্যাস ছিল,) তিনি যখন কোনো দু’আ করতেন, তিনবার করতেন, আর যখন কিছু চাইতেন, তিনবার চাইতেন।
একবার রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কাবা ঘরের কাছে সালাত আদায় করছিলেন। সেখানে আবু জাহল ও তার সঙ্গীরা বসা ছিল। আগের দিন সেখানে একটি উট জবাই করা হয়েছিল। আবু জাহল বলল: "তোমাদের মধ্যে কে আছে যে অমুক গোত্রের জবাই করা উটের নাড়িভুড়ি ও গর্ভফুল (সালাতুল জিযূর) এনে মুহাম্মদ যখন সিজদা করবে, তখন তার কাঁধের উপর চাপিয়ে দেবে?"
গোত্রের সবচেয়ে হতভাগ্য লোকটি উঠে দাঁড়াল এবং সেটা নিয়ে আসলো। যখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সিজদা করলেন, তখন সে সেটা তাঁর দুই কাঁধের মাঝখানে রেখে দিল।
বর্ণনাকারী বলেন: তারা (কাফিররা) তখন হাসতে শুরু করল এবং হাসির চোটে একজন আরেকজনের উপর ঢলে পড়তে লাগল। আর আমি দাঁড়িয়ে দেখছিলাম। যদি আমার ক্ষমতা থাকত, তবে আমি তা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের পিঠ থেকে সরিয়ে ফেলতাম। কিন্তু নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সিজদারত ছিলেন এবং মাথা তুলছিলেন না।
অবশেষে একজন লোক গিয়ে ফাতিমাকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খবর দিল। তিনি আসলেন—তখন তিনি ছিলেন ছোট বালিকা—এবং তা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পিঠ থেকে সরিয়ে দিলেন। এরপর তিনি তাদের দিকে মুখ করে তাদের তিরস্কার করলেন।
যখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর সালাত শেষ করলেন, তখন তিনি উচ্চস্বরে তাদের উপর বদদোয়া করলেন। তিনি বললেন:
"হে আল্লাহ! তুমি কুরাইশদের পাকড়াও করো।" (তিনবার)।
যখন তারা তাঁর আওয়াজ শুনল, তখন তাদের হাসি চলে গেল এবং তারা তাঁর বদদোয়াকে ভয় পেল। এরপর তিনি বললেন:
"হে আল্লাহ! তুমি আবু জাহল ইবনে হিশাম, উতবাহ ইবনে রাবী’আ, শাইবাহ ইবনে রাবী’আ, ওয়ালীদ ইবনে উকবা, উমাইয়াহ ইবনে খালাফ এবং উকবাহ ইবনে আবী মু’আইতকে পাকড়াও করো।"
(বর্ণনাকারী বলেন) তিনি সপ্তম আরেকজনের নাম উল্লেখ করেছিলেন, কিন্তু আমার তা স্মরণ নেই।
যাঁর শপথ করে মুহাম্মদ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে সত্যসহ প্রেরণ করা হয়েছে, আমি অবশ্যই দেখেছি, তিনি যাদের নাম নিয়েছিলেন, তারা সকলেই বদরের দিন নিহত অবস্থায় পড়ে আছে, অতঃপর তাদের টেনে হিঁচড়ে বদরের কূয়ার (ক্বালিব) মধ্যে নিক্ষেপ করা হয়েছিল।
3473 - ـ (كانَ إذا تَكلَّمَ بكلمَةٍ أعادَها ثلاثاً؛ حتّى تُفْهَمَ عنه، وإذا
أتَى على قوْمٍ فَسَلَّمَ عليهم؛ سلّم عليهم ثلاثاً) .
أخرجه البخاري (94 و 95 و 6244) ، والترمذي (2723 و3640) ، و «الشمائل»
(120/192 ـ مختصر الشمائل) ، وأبو الشيخ في «أخلاق النبي - صلى الله عليه وسلم - » (83) ،
وأحمد (3/213و221) من طريق عبد الله بن المثنى قال: حدثنا ثمامة بن عبد الله
عن أنس عن النبي - صلى الله عليه وسلم - : أنه كان ...
واللفظ للبخاري، وعنه البغوي في «شرح السنة» (1/304/141) ، وقال:
«هذا حديث صحيح، قال: تسليمه ثلاثاً عند الاستئذان إذا لم يؤذن بمرة أو
مرتين يسلم ثلاثاً، ثم ينصرف كما جاء في الحديث: الاستئذان ثلاث» .
قلت: هذا متفق عليه كما يأتي بعده. وقال الترمذي في حديث الترجمة:
«حديث حسن صحيح غريب، إنما نعرفه من حديث عبد الله بن المثنى» .
قلت: وهو مختلف فيه، وقد ذكر الحافظ أقوال العلماء فيه ما بين موثق،
ومضعف، ومتوسط، ثم رجح توثيقه، فانظره إن شئت (1/189) .
فأقول: في اعتقادي أن الرجل فيه نوع من الضعف، وحديثه هذا يدل على
ذلك؛ فإنه اضطرب فيه اضطراباً عجيباً، ولكنه مع ذلك ليس من النوع الذي يعل
به الحديث؛ لأنه لا تضاد بين رواياته، فهو أشبه ما يكون باختلاف التنوع، وهذا
الذي خرجته نوع.
ونوع ثانٍ: مختصر عنه، ولفظه:
كان إذا سلم سلّم ثلاثاً، وإذا تكلّم بكلمة أعادها ثلاثاً.
رواه البخاري، والترمذي وغيرهما في رواية.
وثالث: أخصر منه، ولفظه:
كان يعيد الكلمة لتعقل عنه.
وهي رواية «الشمائل» ورواية له في «السنن» .
وكنت ذكرت في التعليق على «مختصر الشمائل» أن الحاكم استدركه على
الشيخين؛ وأن الذهبي تعقبه بقوله:
«أخرجه البخاري سوى قوله: (لتعقل عنه) » .
فتعقبته هناك بأنه لا وجه لهذا التعقب؛ لأن البخاري رواه ـ كما في حديث
الترجمة ـ بلفظ: (حتى تفهم عنه) ؛ والمعنى واحد.
ورابع: بلفظ:
كان إذا تكلم تكلّم ثلاثاً، وكان يستأذن ثلاثاً.
وهو رواية لأحمد. وهذا في الحقيقة يفسر قوله: (فسلم عليهم) ؛ أي
«للاستئذان» وبه فسَّره الحافظ فقال (1/189) :
«قال الإسماعيلي: شبه أن يكون ذلك كان إذا سلم سلام الاستئذان على
ما رواه أبو موسى وغيره، وأما أن يمر المار مُسَلِّماً؛ فالمعروف عدم التكرار. قلت
(الحافظ) : وقد فهم المصنف هذا بعينه، فأورد هذا الحديث مقروناً بحديث أبي
موسى في قصته مع عمر كما سيأتي في «الاستئذان» . لكن يحتمل أن يكون
ذلك كان يقع أيضاً منه إذا خشي أن لا يسمع سلامه. وما ادعاه الكرماني من أن
الصيغة المذكورة تفيد الاستمرار؛ مما ينازع فيه. والله أعلم» .
وحديث أبي موسى المشار إليه هو الآتي.
بقي شيء، وهو أن الشطر الثاني من الحديث له شاهد من حديث أبي أمامة
مرفوعاً بلفظ:
إذا تكلم تكلّم ثلاثاً؛ لكي يفهم عنه.
أخرجه الطبراني في «المعجم الكبير» (8/342/8095) : حدثنا أبو حبيب
زيد ابن المهتدي المروزي: ثنا علي بن خَشْرَم: ثنا الفضل بن موسى عن الحسين بن
واقد عن أبى غالب عنه.
وهذا إسناد حسن؛ كما قال الهيثمي في «المجمع» (1/129) ، ورجاله كلهم
معروفون من رجال «التهذيب» ؛ غير زياد بن المهتدي المروزي، ترجمه الخطيب في
«التاريخ» (8/448) برواية ثلاثة من الحفاظ؛ منهم الطبراني ولم يذكر فيه جرحاً
ولا تعديلاً؛ ووقع فيه: «المَرْوَ الرُّوذيّ» وهو الصواب. ويقال: (المرُّوذي) أيضاً؛ كما
في «الأنساب» و «اللباب» . فما في «المعجم الكبير» : «المروزي» بالزاي بعد الراء
خطأ! إنما هو بالذال، وانظر «الروض النضير» رقم (30) . *
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন কোনো কথা বলতেন, তখন তা তিনবার করে পুনরাবৃত্তি করতেন, যাতে তা ভালোভাবে বোঝা যায়। আর যখন তিনি কোনো গোত্রের নিকট এসে তাদের সালাম দিতেন, তখন তাদের উপর তিনবার সালাম দিতেন।
3474 - ـ (إذا استأْذنَ أحدُكم ثلاثاً فلمْ يُؤذَن لَه؛ فَلْيَرْجِعْ) .
أخرجه البخاري (6245) ، ومسلم (6/177 ـ 179) ، وأبو داود (5180 ـ
5184) ، والترمذي (2690) ، والدارمي (2/274) ، وابن ماجه (3706) ، وابن
حبان (5776) ، وأحمد (3/6 و19) عن أبي سعيد وغيره؛ قال أبو سعيد:
كنت في مجلس من مجالس الأنصار؛ إذ جاء أبو موسى كأنه مذعور فقال:
استأذنت على عمر ثلاثاً فلم يؤذن لي، فرجعت، فقال: ما منعك؟ قلت:
استأذنت ثلاثاً فلم يؤذن لي فرجعت، وقال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - :
«إذا استأذن أحدكم ثلاثاً فلم يؤذن له؛ فليرجع» .
فقال: والله! لتقيمن عليه بينة، أمنكم أحد سمعه من النبي - صلى الله عليه وسلم - ؟ فقال أبيّ
ابن كعب: والله! لا يقوم معك إلا أصغر القوم، فكنت أصغر القوم، فقمت معه
فأخبرت عمر أن النبي - صلى الله عليه وسلم - قال ذلك.
والسياق للبخاري، ومسلم. وفي لفظ له ـ وهو لفظ الترمذي ـ:
«الاستئذان ثلاث، فإن أُذن لك، وإلا؛ فارجع» .
وقال الترمذي:
«حديث حسن صحيح» .
وله شاهد من حديث جندب بن عبد الله البجلي مرفوعاً باللفظ الأول.
أخرجه الطبراني في «لمعجم الكبير» (2/181/1687) و «الأوسط» أيضاً
(7/313/7597 ـ الحرمين) من طريق العباس بن محمد: ثنا شَبَابة بن سَوَّار: ثناالمغيرة بن مسلم عن يونس بن عبيد عن الوليد بن مسلم عنه.
قلت: وهذا إسناد جيد. وسكت عنه الحافظ (11/29) مشيراً إلى تقويته.
وأما قول الهيثمي (8/46) :
«رواه الطبراني في «الكبير» و «الأوسط» ، ورجاله رجال «الصحيح» ؛ غير
العباس بن محمد الدوري، وهو ثقة» !
ففيه تسامح؛ لأن المغيرة بن مسلم لم يرو له إلا البخاري، وفي «الأدبالمفرد» ، لا في «الصحيح» !
هذا.. وفي رواية لأبي داود (5183) من طريق أبي بردة بن أبي موسى عنأبيه بهذه القصة، قال:
فقال عمر لأبي موسى: إني لم أتهمك، ولكن الحديث عن رسول الله - صلى الله عليه وسلم - شديد.
وسنده جيد. *
আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,
তিনি (আবু সাঈদ) বলেন, আমি আনসারদের মজলিসসমূহের মধ্যে এক মজলিসে ছিলাম। এমন সময় আবু মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এলেন, যেন তিনি ভীত-সন্ত্রস্ত। তিনি বললেন: আমি উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে তিনবার প্রবেশের অনুমতি চেয়েছিলাম, কিন্তু আমাকে অনুমতি দেওয়া হয়নি, তাই আমি ফিরে এসেছি।
(পরে উমার রাঃ) জিজ্ঞেস করলেন: তোমাকে কিসে বাধা দিল?
আমি বললাম: আমি তিনবার অনুমতি চেয়েছি কিন্তু আমাকে অনুমতি দেওয়া হয়নি, তাই আমি ফিরে এসেছি। আর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যখন তোমাদের কেউ তিনবার অনুমতি চাইবে এবং তাকে অনুমতি দেওয়া হবে না, তখন সে যেন ফিরে যায়।”
তখন তিনি (উমার রাঃ) বললেন: আল্লাহর কসম! তোমাকে অবশ্যই এ বিষয়ে প্রমাণ পেশ করতে হবে। তোমাদের মধ্যে এমন কেউ কি আছে, যে এটা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট থেকে শুনেছে?
তখন উবাই ইবনু কা‘ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর কসম! তোমার সঙ্গে কওমের সবচেয়ে ছোট ব্যক্তিই দাঁড়াবে।
(আবু সাঈদ রাঃ বলেন) আমি ছিলাম কওমের সবচেয়ে ছোট ব্যক্তি, তাই আমি তাঁর সাথে দাঁড়ালাম এবং উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জানালাম যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ওই কথা বলেছেন।
[অন্য এক বর্ণনায় এসেছে, উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবু মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলেছিলেন: “আমি তোমাকে সন্দেহ করিনি, কিন্তু রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের হাদীসের বিষয়টি গুরুতর।”]
রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আরও বলেছেন: “অনুমতি চাওয়ার নিয়ম হলো তিনবার। যদি তোমাকে অনুমতি দেওয়া হয়, তবে (প্রবেশ করো); অন্যথায়, ফিরে যাও।”
3475 - ـ (صلاةُ الرّجلِ في جماعةٍ تزيدُ على صَلاتِهِ وحدَه خمْساً
وعشرينَ دَرجَةً، وإنْ صلاها بأرضِ فلاةٍ، فأتمّ وُضوءها وركوعَها
وسجودَها؛ بلغتْ صلاتُه خمسينَ درجةٍ) .
أخرجه ابن أبي شيبة في «المصنف» (2/479 ـ 480) : حدثنا أبو معاوية عن
هلال بن ميمون عن عطاء بن يزيد الليثي عن أبي سعيد الخدري، قال: قال رسول
الله - صلى الله عليه وسلم - : ... فذكره.
ومن طريق ابن أبي شيبة: أخرجه أبو يعلى في «مسنده» (2/291/1011) ،
وعن هذا: ابن حبان (431 ـ موارد) .
وأخرجه أبو داود (560) ، ومن طريقه: البغوي في «شرح السنة» (3/341/
788) ـ وصححه (ص 339) ـ، والحاكم (1/208) ، ومن طريقه: البيهقي في
«شعب الإيمان» (3/48/ 2831) من طرق أخرى عن أبي معاوية به، إلا أن الحاكم
وقع في إسناده: (هلال بن أبي ميمونة) بزيادة: (أبي) بين الأب والابن!
ولذلك قال:
«حديث صحيح على شرط الشيخين، فقد اتفقا على الحجة بروايات هلال
ابن أبي هلال، ويقال: ابن أبي ميمونة، ويقال: ابن علي، ويقال: ابن أسامة:
وكله واحد» .
قلت: وقد وافقه الذهبي! وهو وهم على وهم؛ وقع للحاكم في إسناده،
خالف كل الطرق المشار إليها عن أبي معاوية ـ وهو محمد بن خازم ـ، وهذا إنما
يروي عن هلال بن ميمون ـ وهو الجهني ـ، وثقه ابن معين وغيره، ولم يذكروا
لأبي معاوية رواية عن هلال بن أبي ميمونة، فهو من أوهام الحاكم رحمه الله التي
أشار إليها العلماء في ترجمته؛ مما وقع له في «مستدركه» .
وإن مما يؤكد ذلك: أن رواية البيهقي المشار إليها آنفاً عنه سالمة من هذا الخطأ.
ولم ينتبه له المعلق عليه، فقال:
«أخرجه الحاكم (1/208) بنفس الإسناد وصححه، ووافقه الذهبي» !
وكذلك لم ينتبه له المنذري في «الترغيب» (1/152/1) ! وتبعه المعلق على
«مسند أبي يعلى» ، وسقط منه لفظ: «فلاة» !
هذا.. والشطر الأول منه أخرجه ابن ماجه (788) من طريق آخر عن أبي
معاوية به.
وأخرجه البخاري (646) ، والبيهقي أيضاً (2830) و «السنن» (3/60) ،
وأحمد (3/55) من طرق عن ابن الهاد عن عبد الله بن خباب عن أبي
سعيد به.
(تنبيه) : قال أبو داود عقب الحديث:
«قال عبد الواحد بن زياد في هذا الحديث: «صلاة الرجل في الفلاة يضاعف
على صلاته في الجماعة» وساق الحديث» .
قلت: هذا معلق لم يسنده أبو داود عن عبد الواحد، ولا ندري هل أسنده أو
أعضله؟! ولذلك لم ينشرح صدري لذكره في كتابي «صحيح الترغيب» في طبعته
الجديدة، وهي وشيكة الصدور مع بقية الكتاب، ومع قسيمه «ضعيف الترغيب»
إن شاء الله تعالى.
وقد اختلف العلماء في قوله في حديث الترجمة: «وإن صلاها بأرض
فلاة ... » هل يعني في جماعة؛ كما هو ظاهر الحديث؟! أو المنفرد؛ كما هو صريح
رواية عبد الواحد؟! وإلى هذا مال الشوكاني في «نيل الأوطار» ؛ خلافا للحافظ
في «الفتح» (2/134 ـ 135) . والغريب أنه سكت عن الرواية المذكورة، وقد
عرفت ما فيها!! *
আবু সাঈদ আল-খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:
কোনো ব্যক্তির জামাআতের সাথে সালাত আদায় করা তার একাকী সালাতের তুলনায় পঁচিশ স্তর বেশি মর্যাদা বাড়িয়ে দেয়। আর যদি সে জনমানবহীন কোনো প্রান্তরে (ফালাতে) সালাত আদায় করে এবং উত্তমরূপে তার উযু, রুকু ও সিজদা সম্পন্ন করে, তবে তার সালাতের মর্যাদা পঞ্চাশ স্তর পর্যন্ত পৌঁছে যায়।
3476 - ـ (كان يعلّمُنا يقولُ:
«لا تبادرُوا الإمامَ [بالرّكوعِ والسُّجود] : إذا كبَّر فكبِّروا، وإذا قال:
` ولا الضالين ` فقولُوا: (آمينَ) ؛ [فإنّه إذا وافقَ كلامُه كلامَ الملائكة
غُفِرَ له] [ما تقدّم من ذنْبه] ، وإذا ركعَ فارْكعُوا، وإذا قالَ: (سمعَ اللهُ
لمن حمِدَه) فقولُوا: (اللهمّ ربَّنا! ولكَ الحمْدُ) ، [ولا ترفعُوا قبلَه] ،
[وإذا سجد فاسجدُوا] » ) .
أخرجه مسلم (2/20) ، وأبو عوانة (2/121) ، والبيهقي في «سننه» (2/92) ،
وأحمد (2/440) من طريق الأعمش عن أبي صالح عن أبي هريرة قال: ... فذكره.
أخرجه مسلم وحده من طريق عيسى بن يونس: حدثنا الأعمش. . . والسياق
له، والثلاثة الآخرون من طريق محمد بن عبيد: ثنا الأعمش به، والزيادة الأولى
لأحمد، والثانية لأبي عوانة، والخامسة للبيهقي.
وتابع الأعمشَ: سُمَيٌّ مولى أبي بكر عن أبي صالح به مختصراً، وفيه الزيادة
الثالثة ولفظه:
«إذا قال الإمام: `غير المغضوب عليهم ولا الضالين`: فقولوا: آمين: فإنه
من وافق قوله قول الملائكة؛ غُفِرَ له ما تقدم من ذنبه» .
أخرجه البخاري (782 و4475) ، والنسائي (1/147) وغيرهما.
وتابعه أيضاً سهيل بن أبي صالح عن أبيه به أتم منه.
أخرجه مسلم أيضاً، وأبو عوانة (2/144) ، وعندهما الزيادة الثالثة، وعند
مسلم الزيادة الرابعة.
وقد تابع أبا صالح: خمسةٌ آخرون من الثقات بنحو حديث سُمَيٍّ عنه، وفيه
عندهم الزيادة الثالثة، وأحاديثهم مخرجة عندي في أصل «صفة صلاة النبي
- صلى الله عليه وسلم - » تخريجاً مفصلاً مع بيان الاختلاف في بعض الألفاظ، ومخرج تخريجاً
مجملاً في «الإرواء» (2/62/344) .
إذا عرفت هذا؛ فإن مما ينبغي التنبيه عليه: أن الزيادة الثانية: «غفر له ... »
قد وقعت عند أحمد والبيهقي بلفظ:
«غفر لمن في المسجد» !
وقد عزاها الحافظ المنذري في «الترغيب» (1/177/1) للنسائي! ولم أجده
عنده لا في «السنن الصغرى» ، ولا في «الكبرى» له، وقد أخرجه فيهما باللفظ
الأول من أكثر الطرق المشار إليها آنفاً، علاوة على طريق سمي عن أبي صالح؛
فلعل ذكر (النسائي) فيه خطأ من بعض النساخ، أو سبق ذهن أو قلم من المؤلف،
وقد بلوت ذلك منه في تحقيقي الجديد إياه، وهو تحت الطبع، فلعل الصواب:
(البيهقي) أو: (أحمد) مكان: (النسائي) . والله أعلم!
ثم هو بهذا اللفظ منكر جدّاً عندي؛ لمخالفته للفظ الأول: فإنه متواتر عن أبي
هريرة رضي الله عنه، ومن الظاهر أن محمد بن عبيد ـ وهو الطنافسي ـ هو العلة،
فإنه كان يضطرب فيه، فتارة يرويه بلفظ الجماعة: «غفر له» ، ولذلك؛ أودعه أبو
عوانة في «صحيحه» ومن طريقه، وتارة يرويه باللفظ المخالف. فيبدو لي أن ابن
عبيد هذا ـ مع اتفاق الحفاظ على توثيقه ـ كانت له بعض الأوهام، ولذلك قال
الإمام أحمد ـ فيما رواه ابنه صالح عنه ـ قال:
«كان يظهر السنة، وكان يخطئ ولا يرجع عن خطئه» ؛ كما في «تهذيب
التهذيب» .
وقد وقفت له على حديث صحيح المتن، رواه بإسناده المتقدم عن أبي هريرة،
خالف فيه الجماعة، أخرجه البيهقي في «الشعب» (3/41) من طريق العباس بنمحمد الدوري عنه به. وقال الدوري:
«وهذا حديث غريب» .
قال البيهقي:
«وهذا؛ لأن الجماعة إنما رووه عن الأعمش عن أبي سفيان عن جابر،
ومحمد بن عبيد رواه عن الأعمش عن أبي صالح عن أبي هريرة. والله أعلم» .
قلت: فهذا خالف فيه الجماعة في الإسناد «فهو شاذ سنداً، وذاك خالف فيهالجماعة لفظاً، فهو شاذ متناً.
وإن مما يؤكد نكارته: منافاته لسياق الحديث؛ فإنه ينهى عن مبادرة الإمامومسابقته في التأمين أيضاً، ويذكر لمن انتهى ووافق الملائكة في ذلك من الفضلما ذكر من المغفرة، وليس ذلك لمن خالف وسابق بداهة، ومن المشاهد أن أكثرالمصلين في المسجد يسابقونه في التأمين حتى قبل فراغه من`ولا الضآلين`
فكيف يغفر للمخالف؛ بسبب الموافق؟!
وفي النهي عن المبادرة بالركوع والسجود أحاديث أخرى من رواية أنس، ومعاوية، وأبي هريرة أيضاً من طريق الأعرج عنه، وهي مخرجة في «الإرواء» (2/289 ـ 290) . *
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (রাসূলুল্লাহ ﷺ) আমাদেরকে শিক্ষা দিতেন এবং বলতেন:
"তোমরা ইমামের আগে (রুকু ও সিজদার ক্ষেত্রে) অগ্রগামী হয়ো না। যখন তিনি তাকবীর দেন, তখন তোমরাও তাকবীর দাও। আর যখন তিনি বলেন: ‘ওয়ালাদ-দ্বাল্লীন’ (পথভ্রষ্টদের নয়), তখন তোমরা বলো: ‘আমীন’। কেননা, যার আমীন বলা ফেরেশতাদের আমীন বলার সাথে মিলে যায়, তার পূর্ববর্তী সকল গুনাহ ক্ষমা করে দেওয়া হয়। আর যখন তিনি রুকু করেন, তখন তোমরাও রুকু করো। আর যখন তিনি বলেন: ‘সামি’আল্লাহু লিমান হামিদাহ’ (যে তাঁর প্রশংসা করে আল্লাহ তার কথা শোনেন), তখন তোমরা বলো: ‘আল্লাহুম্মা রাব্বানা ওয়া লাকাল হামদ’ (হে আল্লাহ! আমাদের রব! আর সকল প্রশংসা কেবল তোমারই জন্য)। তোমরা তার আগে (রুকু বা সিজদা থেকে) মাথা উঠিয়ো না। আর যখন তিনি সিজদা করেন, তখন তোমরাও সিজদা করো।"
3477 - ـ (يقولُ اللهُ عزّ وجلّ: استقرضْتُ عبدِي فلم يُقرضْنِي، وشتمَني عبدِي وهو لا يدْري (وفي روايةٍ: ولا ينبغِي له شتْمِي) ، يقولُ: وادهْراه! وادهراه! [ثلاثاً] ، وأنا الدهرُ) .
أخرجه البخاري في «خلق أفعال العباد» (ص 57) ، والحاكم في «المستدرك»
(1/418 و2/453) ، وابن جرير الطبري في «التفسير» (25/92) ، وأحمد (2/ 300
و506) ، وأبو يعلى (11/353/6466) كلهم من طريق محمد بن إسحاق عن
العلاء بن عبد الرحمن عن أبيه عن أبي هريرة عن النبي - صلى الله عليه وسلم - قال: ... فذكره.
وقال الحاكم:
«صحيح على شرط مسلم» ! ووافقه الذهبي! وأقره المنذري (3/290) !
كذا قالوا! وابن إسحاق لم يخرج له مسلم إلا متابعة، ثم إنه مدلس؛ وقد
عنعنه عندهم جميعاً.
لكن تابعه إبراهيم بن طهمان، أخرجه في «مشيخته» (158/105) عن
العلاء بن عبد الرحمن به، والرواية الأخرى والزيادة له.
وإبراهيم بن طهمان ثقة من رجال الشيخين، فبه صح الحديث. قال الذهبي
في «الكاشف» :
«من أئمة الإسلام، وفيه إرجاء، وثقه أحمد وأبو حاتم»
وتابعه ابن أبي حازم عن العلاء به مختصراً.
أخرجه ابن أبي عاصم في «السنة» (1/265/598) .
وقد جاء الحديث في «الصحيحين» وغيرهما من طرق أخرى عن أبي هريرة
نحوه بألفاظ مختلفة، وقد خرجت بعضها فيما تقدم برقم (ا53 و532) .
قلت: وهذا الحديث جاء على أسلوب الحديث القدسي الآخر:
«إن الله عز وجل يقول يوم القيامة: يا ابن آدم! مرضت فلم تعدني، قال: يا
رب! كيف أعودك وأنت رب العالمين؟! قال: أما علمت أن عبدي فلاناً مرض فلم
تعده؟! أما علمت أنك لو عدته لوجدتني عنده؟! ... » الحديث بطوله.
أخرجه مسلم (8/13) ، والبخاري في «الأدب المفرد» (رقم 517) وغيرهمامن حديث أبي هريرة أيضاً.
ثم رأيت الحديث قد أخرجه الحاكم من الوجه الأول في مكان آخر (2/491) بزيادة:
ثم تلا أبو هريرة قول الله عز وجل: ` إن تقرضوا الله قرضاً حسناً يضاعفه
لكم`. وصححه هو والذهبي! كما تقدم. *
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
আল্লাহ তা‘আলা বলেন: আমি আমার বান্বাকে ঋণ দিতে বলেছিলাম, কিন্তু সে আমাকে ঋণ দেয়নি। এবং আমার বান্দা আমাকে গালি দেয়, অথচ সে তা জানে না (অন্য বর্ণনায়: আর আমাকে গালি দেওয়া তার জন্য শোভনীয় নয়)। সে বলে: হায় কাল! হায় কাল! হায় কাল! অথচ আমিই কাল (সময়)।
3478 - ـ (ثلاثةٌ يحبُّهم اللهُ عزّ وجلّ، ويضحكُ إليهم، ويستبشرُ بهم:
الذي إذا انكَشَفتْ فئةٌ؛ قاتلَ وراءَها بنفسِه لله عزّ وجلّ، فإمّا أنْ
يُقتلَ، وإمّا أن يَنصُرَه اللهُ ويكفِيَه، فيقولُ اللهُ: انظرُوا إلى عبدِي كيف صَبَرَ لي نفسَه؟!
والذي له امرأة حسناء، وفراش لين حسن، فيقوم من الليل،
فـ[يقول:] يذر شهوتَه، فيذكُرني ويناجيني، ولو شاءَ رقَدَ!
والذِي يكونُ في سَفَرٍ، وكانَ معَه ركْبٌ؛ فسهِرُوا ونصِبُوا ثمّ
هَجَعُوا، فقامَ من السّحرِ في سرّاءَ أو ضرّاءَ) .
أخرجه الحاكم (1/25) ، والبيهقي في «الأسماء والصفات» (ص 471 ـ
472) ـ والسياق له ـ من طريق فُضَيل بن سليمان: نا موسى بن عقبة: حدثني
عبيد الله بن سلمان عن أبيه عن أبي الدرداء عن النبي - صلى الله عليه وسلم - قال: ... فذكره.
وقال الحاكم:
«حديث صحيح، وقد احتجا بجميع رواته» !
كذا قال! وبيض له الذهبي.
وعبيد الله بن سلمان ـ وهو الأغر ـ لم يخرج له مسلم إطلاقاً.
وفضيل بن سليمان ـ وهو النُّميري ـ إنما خرج له البخاري متابعة؛ كما حققه
الحافظ في «مقدمة الفتح» (435) ، وفيه كلام كثير، لخصه الحافظ في «التقريب»
فقال:
«صدوق، له خطأ كثير» .
فمثله حديثه مرشح للتحسين، وأما الصحة فلا! وقد قال المنذري في
«الترغيب» (1/219/32) :
«رواه الطبراني في «الكبير» بإسناد حسن» !
وقال الهيثمي (2/255) :
«قلت: روى أبو داود منه: «الذي كان في سرية» ـ فقط ـ رواه الطبراني،
ورجاله رجال (الصحيح) » !
قلت: وما عزاه لأبي داود يوهم أنه عنده من حديث أبي الدرداء، وإنما هو من
حديث ابن مسعود رضي الله عنه! وقد رواه غيره بأتم منه، وهو من رواية حماد بن
سلمة عن عطاء بن السائب عن مرة الهمداني عن عبد الله بن مسعود رضي الله
عنه: أن رسول الله - صلى الله عليه وسلم - قال:
«عجب ربنا من رجلين: رجل ثار عن وطائه ولحافه، من بين حِبِّه وأهله إلى
صلاته؛ فيقول الله جل وعلا: انظروا إلى عبدي، ثار من فراشه ووطائه من بين
حبه وأهله إلى صلاته؛ رغبةً فيما عندي، وشفقة مما عندي.
ورجل غزا في سبيل الله، وانهزم أصحابه، وعلم ما عليه في الانهزام، وما له
في الرجوع؛ فرجع حتى يهريق دمه، فيقول الله لملائكته: انظروا إلى عبدي؛ رجع
رجاءً فيما عندي، وشفقة مما عندي، حتى يهريق دمه» .
أخرجه ابن حبان (643و644ـ موارد) ، والبيهقي في «الأسماء» أيضاً
و «السنن» (9/164) ، وابن أبي شيبة في «المصنف» (5/313 ـ 314) ، ومن طريقه:
ابن أبي عاصم في «السنة» (1/249/569) ، وأحمد (1/416) ، وأبو يعلى
(9/5272 و5361 و5362) ، والطبراني في «المعجم الكبير» (10/221/10383) ،
وأبو نعيم في «الحلية» (4/167) ، والبغوي في «شرح السنة» (4/42/930) .
وروى منه أبو داود (2536) جملة الغازي؛ كما تقدمت الإشارة إليه، وكذا
الحاكم (2/112) ، وهو رواية لـ «سنن البيهقي» (9/46) . وقال الحاكم:
«صحيح الإسناد» . ووافقه الذهبي، وغيره ممن عاصَرْنَا!!
وغفلوا أو غضوا النظر عما ذكره الحافظ أن حماد بن سلمة روى عن عطاء بن
السائب بعد الاختلاط أيضاً، ففي هذه الحالة لا يجوز تصحيح حديثه عنه بحجة
أنه روى عنه قبل الاختلاط، كما هو ظاهر لكل ذي بصيرة! ولعل الهيثمي لاحظ
هذا، فلم يصححه، ولكنه توسط فقال (2/255) :
«رواه أحمد، وأبو يعلى، والطبراني في «الكبير» ، وإسناده حسن» !
وقد خالفه حماد بن زيد؛ فرواه عن عطاء بن السائب به موقوفاً نحوه، وزاد
في آخر كل من الرجلين:
«فيقول [الله تعالى] : فإني قد أعطيته ما رجا، وأمَّنته مما خاف» .
أخرجه الطبراني في «الكبير» (9/104/8532) : حدثنا علي بن عبد العزيز: ثنا عارم أبو النعمان: ثنا حماد بن زيد ...
قلت: وهذا إسناد صحيح رجاله ثقات كلهم. وحماد بن زيد سمع من عطاء
ابن السائب قبل الاختلاط. ومع ذلك قال الهيثمي (2/256) أيضاً:
«رواه الطبراني في «الكبير» ، وإسناده حسن» !
فلم يصححه، فلعل ذلك لأن عارماً أبا الفضل ـ واسمه محمد بن الفضل ـ
كان اختلط، أو تغير. قال الحافظ في «التقريب» :
«ثقة ثبت، تغير في آخر عمره» .
وقال الذهبي في «الكاشف» .
«.. الحافظ، وعنه (خ) .. تغير قبل موته؛ فما حدَّث» .
وقال في «الميزان» :
«حافظ صدوق مكثر» .
ثم ذكر بعض الأقوال التي صرحت باختلاطه، ولكنه ذكر عن الدارقطني
أنه قال:
«تغير بأخرة، وما ظهر له بعد اختلاطه حديث منكر، وهو ثقة» .
وبه رد على ابن حبان الذي زعم أنه وقع في حديثه المناكير الكثيرة! قال
الذهبي:
«قلت: ولم يَقْدِرِ ابن حبان أن يسوق له حديثاً منكراً، فأين ما زعم؟!» .
وكأنه لم يرتض رميه بالاختلاط، فأشار إلى توهين القول به في رسالته
«المتكلم فيهم بما لا يوجب الرد» فقال (169/306) :
«ثقة شهير، يقال: اختلط بآخره» .
والله سبحانه وتعالى أعلم.
وعلى كل حال؛ فحمّاد بن زيد قد وافق حماد بن سلمة في روايته إياه سنداً
ومتناً، وخالفه في رفعه، فإن كان وهم فيه؛ فإنما هو إيقافه إياه، فالخطب حينئذٍ
سهل؛ لأنه في حكم المرفوع؛ لأنه لا يقال بمجرد الرأي كما هو ظاهر، وعليه يكون
متابعاً قويّاً لحماد بن سلمة. والله ولي التوفيق.
وقد رواه ابن أبي الدنيا في «التهجد» (36 ـ 37) من طريق خالد بن عبد الله
عن عطاء بن السائب به موقوفاً.
وللحديث شاهد من حديث أبي ذر مرفوعاً نحوه، وفي إسناده جهالة، وهو
مخرج في «المشكاة» (1922/ التحقيق الثاني) . *
আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:
তিন প্রকারের লোক এমন, যাদেরকে আল্লাহ তাআলা মহব্বত করেন, তাদের প্রতি সন্তুষ্ট হয়ে মৃদু হাসেন এবং তাদের সম্পর্কে সুসংবাদ দেন:
১. সেই ব্যক্তি যে যুদ্ধের ময়দানে (যখন শত্রুর আক্রমণে) একটি দল পিছু হটে যায়, তখনও সে আল্লাহ তাআলার সন্তুষ্টির জন্য নিজের জীবন বাজি রেখে তাদের পেছনে (দৃঢ়ভাবে) যুদ্ধ চালিয়ে যায়। অতঃপর হয় সে শাহাদাত বরণ করে, নয়তো আল্লাহ তাকে বিজয় দান করেন এবং তাকে যথেষ্ট করে দেন। তখন আল্লাহ বলেন: "আমার বান্দার দিকে দেখো! সে কীভাবে আমার জন্য তার জীবনকে উৎসর্গ করেছে!"
২. আর সেই ব্যক্তি যার একজন সুন্দরী স্ত্রী ও আরামদায়ক নরম বিছানা রয়েছে, কিন্তু সে রাতের বেলা (ঘুম থেকে) উঠে দাঁড়ায়। সে তার (ঘুম ও ভোগের) আকাঙ্ক্ষা ত্যাগ করে আমার স্মরণ করে এবং আমার সাথে নীরবে কথোপকথন করে (মুনাজাত করে), যদিও সে চাইলে তখন ঘুমাতে পারত।
৩. আর সেই ব্যক্তি যে কোনো সফরে রয়েছে এবং তার সাথে একটি কাফেলাও আছে। তারা সারারাত জেগে থাকার পর ক্লান্ত হয়ে পড়ে এবং পরিশেষে ঘুমিয়ে পড়ে। কিন্তু সে সাহরির সময় (শেষ রাতে) আরামদায়ক বা কষ্টকর উভয় অবস্থাতেই (ইবাদতের জন্য) উঠে দাঁড়ায়।
3479 - ـ (مَثَلُ الذي يتعلَّمُ العِلْمَ ثمَّ لا يحدِّثُ به؛ كمَثَلِ الذي
يكنِزُ الكنْزَ فلا ينفقُ منه) .
أخرجه الطبراني في «المعجم الأوسط» (1/213/689) قال: حدثنا أحمد
قال: نا يونس بن عبد الأعلى قال: نا عبد الله بن وهب قال: حدثني ابن لهيعة
عن دَرَّاج أبي السمح عن أبي الهيثم وعبد الرحمن بن حجيرة عن أبي هريرة أن
رسول الله - صلى الله عليه وسلم - قال: ... فذكره.
قلت: وهذا إسناد حسن عزيز من رواية ابن وهب عن ابن لهيعة، وهو صحيح
الحديث عنه، ومن رواية دراج عن ابن حجيرة، وهو حسن الحديث عنه؛ كما
تقدم تقريره برقم (3350) ، وبقية رجاله ثقات من رجال مسلم؛ غير أحمد ـ وهو
ابن علي الأبار ـ، وهو ثقة حافظ متقن.
وقد توبع، فأخرجه ابن عبد البر في «جامع بيان العلم» (1/122) من طريق
سُحْنون: حدثنا ابن وهب به؛ إلا أنه لم يذكر في إسناده: (أبا الهيثم) .
وغفل المنذري عن أن الحديث من رواية ابن وهب عن ابن لهيعة، فأعله في
«الترغيب» (1/74/6) ، فقال:
«رواه الطبراني في «الأوسط» ، وفي إسناده ابن لهيعة» !
يشير إلى ضعفه. وصرح بذلك الهيثمي فقال (1/164) :
« ... وفيه ابن لهيعة، وهو ضعيف» !
وقد أخرجه أبو خيثمة في «العلم» (147/162) ، وأبو القاسم بن عبد الحكم
في «فتوح مصر» (ص 281) ، وابن عدي في «الكامل» (3/115) ، وابن عبد البر
أيضاً من طرق أخرى عن ابن لهيعة به.
وله طريق أخرى يرويه إبراهيم عن أبي عياض عن أبي هريرة به.
أخرجه الدارمي في «سننه» (1/134) ,وأحمد في «مسنده» (2/499) ،
والخطيب في «اقتضاء العلم العمل» (165/12) .
قلت: وإسناده حسن في المتابعات، رجاله كلهم ثقات عند الدارمي رجال
مسلم؛ غير إبراهيم هذا ـ وهو ابن مسلم الهجري ـ؛ قال الحافظ في «التقريب» :
«لين الحديث رفع موقوفات» .
ومن طريقه: أخرجه القضاعي في «مسند الشهاب» (1/180/263) ، لكنه
قال: عن إبراهيم الهجري عن أبي الأحوص عن عبد الله!
وله شاهد؛ يرويه عمر بن يحيى بن نافع قال: حدثنا عيسى بن شعيب قال:
حدثنا رَوْحُ بن القاسم عن أيوب عن نافع عن ابن عمر مرفوعاً به.
أخرجه ابن عبد البر.
وعمر بن يحيى بن نافع: هو الأبلي؛ كما في ترجمة شيخه عيسى بن
شعيب من «تهذيب المزي» ، ولم أقف له على ترجمة. *
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: যে ব্যক্তি জ্ঞান অর্জন করে কিন্তু তা (অন্যদের মাঝে) প্রচার করে না, তার উদাহরণ হলো সেই ব্যক্তির মতো যে গুপ্তধন সঞ্চয় করে কিন্তু তা থেকে (আল্লাহর পথে) কিছুই ব্যয় করে না।
3480 - ـ (من انتفَى من ولَدِه لِيفضَحه في الدُّنيا؛ فضَحَه اللهُ يومَ
القيامةِ على رؤوس الأَشهادِ، قِصاصٌ بِقِصَاصٍ) .
أخرجه أحمد (2/26) ، ومن طريقه: الطبراني في «المعجم الكبير»
(12/400/13478) و «المعجم الأوسط» (4/312/4297 ـ حرمين) ، وعنه أبو
نعيم في «الحلية» (9/223 ـ 224) : ثنا وكيع عن أبيه عن عبد الله بن أبي المجالد
عن مجاهد عن ابن عمر قال: قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : ... فذكره.
قلت: وهذا إسناد حسن رجاله كلهم ثقات رجال «الصحيح» ؛ وفي أبي وكيع
ـ واسمه: الجراح بن مَلِيح الرُّؤَاسي ـ ضعف لا ينزل حديثه إن شاء الله عن مرتبة
الحسن.
وعبد الله بن أبي المجالد؛ قال في «التقريب» :
«يقال: اسمه محمد، ثقة» .
قلت: وتابعه ليث بن أبي سليم عن مجاهد به نحوه.
أخرجه الطبراني (12/407 ـ 408/13503) .
وله طريق أخرى؛ يرويه سعيد بن بشير عن مطر الورَّاق عن نافع عن ابن عمر به.
أخرجه البيهقي في «السنن الكبرى» (8/332 ـ 333) .
قلت: وهو إسناد جيد في الشواهد والمتابعات.
وله شاهد من حديث أبي هريرة مرفوعاً.
أخرجه أبو داود وغيره؛ صححه ابن حبان، والدارقطني، والحاكم، والذهبي،
وفي إسناده جهالة، كما كنت بينته في «الإرواء» (8/34 ـ 35) . *
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:
যে ব্যক্তি তার সন্তানকে দুনিয়াতে অপমানিত করার উদ্দেশ্যে অস্বীকার করবে (বা তার থেকে সম্পর্ক ছিন্ন করবে), আল্লাহ তাআলা কিয়ামতের দিন সকল সাক্ষীর সামনে তাকে জনসম্মুখে অপমানিত করবেন। এটা হবে কাজের যথাযথ প্রতিদান (কিসাস)।
3481 - ـ (كانَ إذا خرجَ من الخَلاء؛ توضَّأ) .
أخرجه أحمد (6/189) من طريق جابر عن عبد الرحمن بن الأسود عن أبيه
عن عائشة: أن رسول الله - صلى الله عليه وسلم - كان ...
قلت: ورجال إسناده ثقات رجال الشيخين؛ غير جابر هذا ـ وهو ابن يزيد
الجعفي ـ، وهو ضعيف. وقال الهيثمي في «مجمع الزوائد» (1/241) :
«رواه أحمد، وفيه جابر الجعفي، وثقه شعبة وسفيان، وضعفه أكثر الناس» .
قلت: له شاهد مرسل صحيح، رواه ابن أبي شيبة في «المصنف» (1/193) :
حدثنا جرير عن منصور عن إبراهيم قال:
بلغني أن رسول الله - صلى الله عليه وسلم - لم يدخل الخلاء إلا توضأ، أو مسح ماءً.
قلت: وهذا مرسل صحيح الإسناد، رجاله ثقات رجال الشيخين.
وقد رواه بعض الضعفاء موصولاً؛ فقال يحيى بن طلحة اليَربوعي قال:
حدثنا أبو الأحوص عن منصور عن إبراهيم عن الأسود عن عائشة قالت:
ما رأيت النبي - صلى الله عليه وسلم - صائماً العشر قط، ولا خرج من الخلاء إلا مسَّ ماءً.
أخرجه ابن حبان (69/165 ـ الموارد) .
قلت: ويحيى هذا لم يوثقه غير ابن حان، ولكنه قال (9/264) :
«وكان يغرب عن أبى نعيم» .
قلت: وأخرج له في صحيحه ثلاثة أحاديث فقط؛ هذا أحدها، والحديث
الثاني هو فيه متابع. والثالث قرنه بآخر ثقة، وهو في صحيح مسلم، مختصراً،
والثاني في الموارد أيضاً، وفيه لفظة منكرة؛ كما سبق بيانه تحت الحديث (2757) .
ولهذا؛ ضعفه آخرون، وقال الحافظ:
«ليِّن الحديث» .
وإن من ضعفه: خلطه بين حديث الترجمة، وحديث (صوم العشر) ؛ فإنهذا قد أخرجه مسلم وغيره من طرق عن الأعمش عن إبراهيم به. وخالفه هنادابن السري فقال: ثنا أبو الأحوص عن منصور به دون الشطر الثاني.
أخرجه ابن ماجه، وهو مخرج في «صحيح أبي داود» (2108) . *
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম যখন শৌচাগার থেকে বের হতেন, তখন ওযু করতেন।
(অন্য এক বর্ণনায় এসেছে যে, তিনি শৌচাগার থেকে বের হওয়ার পর অবশ্যই পানি স্পর্শ করতেন/ব্যবহার করতেন।)
3482 - ـ (إنّه سينْهاهُ ما يقولُ) .
أخرجه أحمد (2/447) : ثنا وكيع: ثنا الأعمش قال: أنا (كذا) أبو صالح
عن أبي هريرة قال:
جاء رجل إلى النبي - صلى الله عليه وسلم - فقال: إن فلاناً يصلي بالليل، فإذا أصبح سرق؟!
قال: ... فذكره.
قلت: وهذا إسناد متصل ظاهر الصحة، رجاله ثقات رجال الشيخين.
لكن له علة، وهي أن قوله: «أنا» تحرف على الناسخ والطابع، والصواب: «أرى أبا صالح ذكره عن أبي هريرة» . هكذا رواه إبراهيم بن عبد الله العَبْسي في «حديث وكيع بن الجراح» (ق 134/1 ـ مخطوطة الظاهرية) ، ومن طريقه: البيهقي
في «شعب الإيمان» (3/174/ 3261) . ويؤيده: أن الحافظ ابن كثير ذكره في «تفسيره» (3/415) من رواية أحمدبسنده المذكور عن الأعمش قال: أرى أبا صالح عن أبي هريرة ... إلخ.
ولعله سقط من الناسخ كلمة: «ذكره» .
وزيادةً في التحقيق: رجعت إلى «أطراف المسند» للحافظ العسقلاني؛ فرأيته
ساق الحديث (7/193/447) عقب حديث آخر بإسناد آخر عن أبي صالح ـ يعني
عن أبي هريرة ـ. ثم ساق إسناد هذا إلى الأعمش قائلاً: «عنه به» ، فلم يسقهبتمامه لنتبين كيف وقع الإسناد في نسخته من «المسند» ؟!
ونحوه قول الهيثمي في «المجمع» (2/258) :
«رواه أحمد، والبزار، ورجاله رجال (الصحيح) » !
إلا أنه في مكان آخر أفاد مثل ما تقدم عن ابن كثير، فقال (7/89) :
«رواه أحمد، ورجاله رجال «الصحيح» ؛ إلا أن الأعمش قال: أرى أبا صالحعن أبي هريرة» .
وبالجملة؛ فهذا وما قبله يبين أن ما في «المسند» أن الأعمش قال: «أنا»
تحريف من بعض النساخ، والله أعلم.
وقد تابع وكيعاً: جماعةٌ من الثقات، ولكنهم قالوا: عن الأعمش عن أبي
صالح عن أبي هريرة ... فذكروه على الجادة.
أخرجه الطحاوي في «مشكل الآثار» (2/430) ، وابن حبان في «صحيحه»
(4/116/ 2551) عن عيسى بن يونس، والبزار في «مسنده» (1/346/720) عن
محاضر بن المُوَرِّعِ، كلاهما عن الأعمش به.
وخالفهم جرير بن عبد الحميد فقال: عن الأعمش عن أبي صالح ـ قال: أراه ـ
عن جابر ...
وتابعه زياد بن عبيد الله عن الأعمش به؛ لكنه لم يقل: قال: أراه ...
أخرجهما البزار (رقم 721 و722) .
وزياد بن عبد الله: هو البكائي العامري من رجال مسلم، وجرير بن عبد الحميد
من رجال الشيخين، وفيهما كلام يسير من جهة الحفظ.
قلت: فالظاهر من مجموع ما تقدم: أن الأعمش كان يتردد في إسناده بين
أبي هريرة وجابر، وذلك مما لا يضر إن شاء الله تعالى؛ لأن كلاً منهما صحابي
جليل، والله سبحانه وتعالى أعلم.
(تنبيه على أوهام) :
أولاً: غفل المعلق الداراني على «موارد الظمآن» (2/ 378) عن أن هذا
الاختلاف مداره على الأعمش، فقال في تخريجه لحديث أبي هريرة:
«ويشهد له حديث جابر عند البزار ... » !
فجعل المشهود شاهداً، وهذا مما يدل على الحداثة في هذا العلم!
ثانياً: جاء في «مختصر تفسير ابن كثير» للشيخ نسيب الرفاعي رحمه الله
تعالى ما نصه (3/421) :
«روى الحافظ أبو بكر البزار عن جابر أو عن رجل قال للنبي ... » !
وهذا خلط عجيب لا يخفى فساده، ولا حاجة إلى بيانه.
ثالثاً: قول ابن بلده الشيخ الصابوني في «مختصره» (3/38) :
«وروى الحافظ أبو بكر البزار قال: قال رجل ... » !
فهو ـ لجهله بهذا العلم الشريف ـ لما رأى الاختلاف المذكور في الأصل ـ أعني:
«تفسير ابن كثير» ـ؛ لم يستطع أن يختصره بمثل قوله: «.. عن أبي هريرة أو جابر» !
ولو أنه كان عن واحد منهما؛ لاختصره منه وطبعه في التعليق موهماً القراء أنه
من تخريجه، متشبعاً بما لم يعط؛ (شنشنة نعرفها من أخزم) ! والله المستعان. *
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,
একজন ব্যক্তি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বললেন: অমুক ব্যক্তি রাতে সালাত আদায় করে, কিন্তু যখন সকাল হয়, তখন সে চুরি করে?! তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: নিশ্চয়ই তার এই (সালাত বা আমল) শীঘ্রই তাকে (মন্দ কাজ থেকে) বিরত রাখবে।
3483 - ـ (تركَ كَيَّتَيْن، أو ثلاثَ كيّاتٍ! قاله لمن ماتَ وتركَ دينارينِ
أو ثلاثة) .
أخرجه ابن أبي شيبة في «المصنف» (3/372) : حدثنا عبد الله بن نمير: حدثنا
فُضَيْل بن غزوان عن أبي حازم عن أبي هريرة قال:
أُتيَ رسول الله - صلى الله عليه وسلم - بجنازة رجل من الأنصار فصلى عليه، ثم قال:
«ما ترك؟» . قالوا: ترك دينارين أو ثلاثة، قال: ... فذكره.
وأخرجه أحمد (2/429) : ثنا يحيى بن سعيد عن فضيل بن غزوان به؛
ليس فيه: من الأنصار.
قلت: وهذا إسناد صحيح على شرط الشيخين.
وتابعه هارون بن سعد، قال: سمعت أبا حازم الأشجعي ...
أخرجه أحمد أيضاً (2/493) .
وأبو حازم الأشجعي هذا: هو سَلَمَةُ بن دينار الأعرج، وقد ذكره المزي في
الرواة عن أبي هريرة (34/375) رامزاً أن ذلك عند الشيخين والأربعة.
وهارون بن سعد ـ وهو العجلي ـ من رجال مسلم، صدوق رمي بالرفض.
ورواه يحيى بن عبد الحميد الحِمَّاني عن ابن فضيل عن أبيه عن أبي حازم
به؛ وزاد:
فلقيت عبد الله بن القاسم مولى أبي بكر، فذكرت ذلك له، فقال: ذاك رجل
كان يسأل الناس تكثراً.
أخرجه البيهقي في «الشعب» (3/271/3515) .
وعبد الله ابن القاسم هذا تابعي مجهول الحال، لم يوثقه غير ابن حبان، فهذه
الزيادة مقطوعة لا تصح.
ويحيى بن عبد الحميد الحماني؛ قال الذهبي في «المغني» :
«حافظ، منكر الحديث، وقد وثقه ابن معين وغيره، وقال أحمد: كان
يكذب جهاراً. وقال النسائي: ضعيف» .
وقال الحافظ في «التقريب» :
«حافظ؛ إلا أنهم اتهموه بسرقة الحديث» .
وللحديث شاهد من حديث سلمة بن الأكوع، عند البخاري وغيره، وهو
مخرج في «أحكام الجائز» (ص 110 ـ المعارف) .
وآخر من حديث عبد الله بن مسعود، رواه ابن حبان وغيره بسند حسن، وهو
مخرج في «الترغيب» (2/43) .
ثم إن حديث الحماني هذا، قد وقع فيه للمنذري وهم عجيب؛ فإنه جعله
(2/3/10) من حديث مسعود بن عمرو رضي الله عنه! وإنما هو من حديث أبي
هريرة؛ كما رأيت.
وأظن أنه التبس عليه بحديث آخر في الباب لمسعود بن عمرو، بلفظ:
«لا يزال العبد يسأل وهو غني، حتى يَخلَقَ وجهه، فما يكون له عند الله
وجه» .
أخرجه البزار في «مسنده» (1/434/919 ـ الكشف) ، والطبراني في «المعجم
الكبير» (20/333/760) من طريق ابن أبي ليلى عن عبد الكريم عن سعيد بن
يزيد عنه مرفوعاً به.
قلت: وهذا إسناد ضعيف؛ كما قال الحافظ في «مختصر الزوائد» (1/383/
628) ، وأشار المنذري في «الترغيب» (2/3/4) ، ثم الهيثمي في «المجمع» (3/96)
إلى إعلاله بـ (محمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلى) . وقال الآخر:
«وفيه كلام» .
قلت: ولخصه الحافظ في «التقريب» بقوله:
«صدوق سيّئ الحفظ جدّاً» .
قلت: وشيخه عبد الكريم ـ وهو ابن أبي المخارق البصري ـ ضعيف أيضاً.
وسعيد بن يزيد؛ الظاهر أنه أبو سلمة الأزدي البصري؛ وثقه ابن معين، وقال
أبو حاتم:
«صالح» .
فقه الحديث:
أقول: لعل الرجل الذي جاء فيه هذا الوعيد الشديد: إنما كان لأمر غير مجرد
تركه دينارين أو ثلاثة؛ لأن مثل هذا الأمر لا يستحق صاحبه النار باتفاق العلماء،
ألا ترى إلى قوله - صلى الله عليه وسلم - لسعد بن أبي وقاص رضي الله عنه:
«إنك أنْ تدع ورثتك أغنياء: خير من أن تدعهم يتكففون الناس» .
متفق عليه، وهو في «الإرواء» (3/416 ـ 417) .
وقوله - صلى الله عليه وسلم - للنجدي جواباً على سؤاله: هل علي غيرهن؟ قال:
«لا، إلا أن تطوع» .
رواه الشيخان، وهو مخرج في «صحيح أبي داود» (415) ، ونحوهما في السنة
كثير؟! ومن أبواب الإمام البخاري في «صحيحه» :
«باب ما أدِّي زكاته فليس بكنز؛ لقول النبي - صلى الله عليه وسلم - : «ليس فيما دون خمسة
أوسق صدقة» ... » . وانظر «فتح الباري» (3/271 ـ 273) .
وعلى هذا؛ فلعل الرجل كان قد أخل بالقيام ببعض الواجبات المتعلقة بحقوق
المال، مثل الإنفاق على العيال، أو إطعام الجائع، وكسوة العاري، أو التظاهر بالفقر؛
كما في مرسل علقمة المزني قال:
كان أهل الصفة يبيتون في المسجد، فتوفي رجل منهم، ففتح إزاره، فوجد
فيه ديناران، فقال النبي - صلى الله عليه وسلم - :
«كيتان» .
أخرجه عبد الرزاق في «مصنفه» (1/421/1649) . أو سؤال الناس تكثراً
كما تقدم في أثر مولى أبي بكر، ونحو ذلك! والله سبحانه وتعالى أعلم. *
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,
রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট জনৈক আনসার ব্যক্তির জানাজা আনা হলো। তিনি তাঁর উপর জানাজার সালাত আদায় করলেন। অতঃপর তিনি জিজ্ঞেস করলেন, "সে (মৃত্যুর পর) কী রেখে গেছে?"
সাহাবীগণ উত্তরে বললেন, "সে দুই দিনার অথবা তিন দিনার রেখে গেছে।"
(এ কথা শুনে) তিনি বললেন: "সে যেন (তার জন্য জাহান্নামের) দুই বার অথবা তিন বার আগুনের ছেঁকা (দাগ) রেখে গেছে!"
3484 - ـ (إنّ الصّدقة لَتطفئُ عن أهْلِها حرَّ القُبورِ، وإنّما يستظلُ
المؤمنُ يومَ القيامةِ في ظلِّ صَدَقَتِه) .
أخرجه الطبراني في «المعجم الكبير» (17/ 286/788) : حدثنا يحيى بن
عثمان بن صالح: ثنا سعيد بن أبي مريم: ثنا رِشدين بن سعد: حدثني عمرو بن
الحارث وابن لهيعة والحسن بن ثوبان عن يزيد بن أبي حبيب عن أبي الخير عن
عقبة بن عامر قال: قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : ... فذكره.
ومن هذا الوجه وعن هذا الشيخ: أخرجه البيهقي في «الشعب» (3/212/
3347) ، إلا أنه قال: عنه: نا أبو صالح كاتب الليث: حدثني ابن لهيعة ورشدين
ابن سعد عن (!) الحسن بن ثوبان عن عمرو بن الحارث و (!) يزيد بن أبي حبيب
عن أبي الخير.....به.
قلت: وأنا أظن أن قوله: «عن الحسن بن ثوبان» خطأ من الطابع أو الناسخ،
صوابه: «والحسن بن الثوبان» ، وعلى العكس من ذلك قوله بعد: «ويزيد بن أبي
حبيب» ، صوابه: «عن يزيد بن أبي حبيب» ؛ كما في «الطبراني» ؛ (لأن عمرو
ابن الحارث) ليس من طبقة (يزيد بن أبي حبيب) ؛ وإنما من الرواة عنه؛ بخلاف
(الحسن بن ثوبان) ؛ فإنه من طبقة (ابن لهيعة) و (رِشدين) !
وأما قوله: «أبو صالح كاتب الليث» مكان: «سعيد بن أبي مريم» ؛ فإنه إن لم
يكن خطأً أيضاً؛ فهو انتقال من شيخ إلى شيخ أخر؛ لأن كلاً منهما من شيوخ
يحيى بن عثمان بن صالح المصري، وهذا صدوق؛ كما قال الذهبي والعسقلاني،
لكن الأول منهما ـ وهو سعيد بن أبي مريم ـ ثقة ثبت من رجال الشيخين، بخلاف
أبي صالح؛ فهو من شيوخ البخاري، وفيه كلام معروف.
وجملة القول؛ أن إسناد الطبراني جيد بالمتابعات المذكورة: (عمرو بن
الحارث) ، و (ابن لهيعة) ، و (الحسن بن ثوبان) عن يزيد بن أبي حبيب.
وبهذا التحقيق يتبين تقصير المنذري في قوله في «الترغيب» (2/25) :
«رواه الطبراني في «الكبير» ، والبيهقي، وفيه ابن لهيعة» !
ونحوه قول الهيثمي في «المجمع» (3/110) :
«رواه الطبراني في «الكبير» ، وفيه ابن لهيعة، وفيه كلام» !
ففاتهما متابعة الحسن بن ثوبان وعمرو بن الحارث المقوية له، مما ورطني قديماً
ـ وقبل طبع «المعجم الكبير» ـ أن أخرج الحديث في «الضعيفة» برقم (3021)
متابعة مني لهما، ولا يسعني إلا ذلك؛ ما دام المصدر الذي عزواه إليه لا تطوله
يدي؛ كما كنت بينت ذلك في مقدمة كتابي «صحيح الترغيب» ، أما وقد وقفت
عليه الآن، وعلمت أن ابن لهيعة قد توبع ـ خلافاً لما أوهما ـ؛ فقد قررت إيداعه
في «صحيح الترغيب» ، لا سيما والشطر الثاني منه قد رواه بعض الثقات ـ غير
من تقدم ـ عن يزيد بن أبي حبيب، وهو مخرج في «تخريج أحاديث مشكلة
الفقر» (رقم 118) . *
উকবাহ ইবন আমের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ইরশাদ করেছেন:
নিশ্চয়ই সাদাকা (দান) তার প্রদানকারীর উপর থেকে কবরের উষ্ণ আগুন/তীব্রতা নিভিয়ে দেয়। আর কিয়ামতের দিন মুমিন ব্যক্তি তার সাদাকার ছায়ার নিচে আশ্রয় লাভ করবে।
3485 - ـ (أتانِي جبريلُ في خَضِرٍ معلّقٍ به الدُّرُّ) .
أخرجه أحمد (1/407) : ثنا زيد بن الحُبَاب: حدثني حسين: حدثني
حُصين: حدثني شَقِيق قال: سمعت ابن مسعود يقول: قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : ...
فذكره.
وأخرجه أبو الشيخ في «العظمة» (2/774 ـ 475/349) ، والدارقطني في
«الغرائب والأفراد» (ق 224/1 ـ الأطراف) من طرق أخرى عن زيد بن الحباب به.
وقال الدارقطني:
«تفرد به الحسين بن واقد، وعنه زيد بن الحباب وغيره، وبه عن الحسين عن
عاصم» .
قلت: وهذا إسناد جيد؛ كما قال الحافظ ابن كثير في «التفسير» (4/251) ،
ورجاله ثقات رجال مسلم، وفي بعضهم كلام لا ينزل به حديثه عن مرتبة
الحسن. وأما الشيخ أحمد شاكر رحمه الله فقال (5/330) :
«إسناده صحيح» !
وأعله أخونا الفاضل رضى المباركفوري في تعليقه على «العظمة» بقوله:
«فيه حصين بن عبد الرحمن، وهو ثقة تغير حفظه بالأخرة، ولم يذكر حسين
بن واقد فيمن سمع منه قبل التغير» !
فأقول: المتغير لا يساق مساق المختلط، ولا يعامل معاملته فيما أعلمه من
صنيع أهل العلم في تخريجاتهم وتصحيحاتهم، ويقوون حديثه؛ لأن التغير أقل سوءاً
من الاختلاط، فحديثه على أقل الدرجات حسن، لا سيما إذا توبع؛ كما يأتي.
ورواه أحمد قبيل هذا، وبالإسناد نفسه؛ إلا أنه جعل مكان (حصين) : عاصم
ابن بهدلة ... بلفظ:
«رأيت جبريل على السدرة المنتهى، وله ستُّ مئة جناح» . قال: سألت
عاصماً عن الأجنحة؟ فأبى أن يخبرني، قال: فأخبرني بعض أصحابه: أن الجناح
ما بين المشرق والمغرب. وكذا أخرجه ابن جرير (27/29) .
وقد تابعه على هذا الإسناد: حماد بن سلمة عن عاصم ابن بهدلة؛ إلا أنه
قال: عن زر عن ابن مسعود.
أخرجه أحمد (1/412 و460) ، والنسائي في «السنن الكبرى» (6/473/
11542) ، وابن جرير أيضاً , وابن خزيمة في «التوحيد» (ص 133) ، والبيهقي في
«دلائل النبوة» (2/372) كلهم عن حماد به، ولفظه:
«رأيت جبريل عند سدرة المنتهى؛ عليه ستُّ مئة جناح، ينتثر من ريشه
التهاويل: الدر والياقوت» .
وهذا إسناد جيد قوي؛ كما قال ابن كثير.
ورواه شريك عن عاصم عن أبي وائل عن عبد الله بلفظ:
«يسقط من جناحه ـ من التهاويل والدر والياقوت ـ ما الله به عليم» .
أخرجه أحمد (1/395) . وشريك ضعيف.
وله طريق أخرى؛ عن إسرائيل عن أبي إسحاق عن عبد الرحمن بن يزيد عن
عبد الله في قوله: `ما كذب الفؤاد ما رأى` قال:
رأى رسولُ الله - صلى الله عليه وسلم - جبريلَ في حُلة من رَفْرف، قد ملأ ما بين السماء والأرض.
أخرجه أحمد (1/394 و 418) ، والنسائي (11531 ـ الكبرى) ، وابن خزيمة
أيضاً، وكذا ابن جرير، والطبراني في «المعجم الكبير» (9/245/9050) ، وأبو
الشيخ (2/766/341) ، وابن منده في «الإيمان» (2/731/751) .
وهذا إسناد على شرط الشيخين؛ لولا اختلاط أبي إسحاق وعنعنته،
وإسرائيل سمع منه بعد الاختلاط. لكن في رواية لابن منده (752) قد تابعه
سفيان عن أبي إسحاق به.
وسفيان ـ وهو الثوري ـ سمع منه قبل الاختلاط.
وله طريق أخرى عن ابن مسعود؛ يرويه شعبة، وسفيان أيضاً، وغيرهما:
عند ابن خزيمة، والطبراني (9051و9053) ، وابن منده (747 ـ750) ، وأحمد
أيضاً (1/449) ، ولفظ ابن خزيمة:
رأى رفرفاً أخضر سد أفق السماء. وسنده صحيح.
وله شاهد من حديث عائشة أن رسول الله - صلى الله عليه وسلم - قال:
«رأيت جبريل عليه السلام منهبطاً، قد ملأ ما بين السماء والأرض، وعليه
ثياب سندس، معلقاً به اللؤلؤ والياقوت» .
أخرجه أحمد (6/120) : ثنا عفان: ثنا حماد قال: أخبرنا عطاء بن السائب
عن الشعبي عن مسروق عنها.
ومن هذا الوجه أخرجه أبو الشيخ أيضاً (رقم 343) .
وهو إسناد صحيح؛ إن كان حماد ـ وهو ابن سلمة ـ سمعه من عطاء قبل
الاختلاط، وإلا؛ فهو شاهد قوي لما تقدم.
وخالف عون بن عمارة؛ فقال: ثنا الخليل بن أحمد عن عاصم عن الشعبي
عن عائشة به.
أخرجه أبو الشيخ في «طبقات الأصبهانيين» (1/216/125) .
قلت: وعون هذا ضعيف، لكن الراوي عنه ـ وهو علي بن بشر الأموي ـ أشد
ضعفاً منه، قال أبو الشيخ:
«كان يضعَّف، حدث عن يزيد بن هارون عن يحيى عن أنس مرفوعاً: رأيت
في الجنة ذئباً» ! قال الذهبي في «الميزان» :
«وهذا من بلاياه» .
وبالجملة؛ فالحديث من الطريق الأولى عن ابن مسعود حسن، وهو صحيح
بالطرق الأخرى والشاهد عن عائشة رضي الله تعالى عنها.
ولقد كنت أوردته في «ضعيف الجامع» ؛ اغتراراً مني بالمناوي الذي نقل في
«فيض القدير» عن الدارقطني أنه ضعفه في «الأفراد» ! والآن وقد وقفت على إسناده
بواسطة «أطرافه» لابن طاهر المقدسي، وليس فيه ما يشعر بتضعيفه، ولو سلمنا به
فرضاً؛ فهو مدفوع بما ذكرت من ثقة رجاله، وطرقه وشاهده، ولذلك فقد نقلته من
«ضعيف الجامع» إلى «صحيحه» . والله تعالى ولي التوفيق؛ وأسأله المزيد من فضله! *
ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আমার নিকট জিবরীল (আঃ) একটি সবুজ পরিচ্ছদে এসেছিলেন, যার সাথে মুক্তা (দُر) ঝুলন্ত ছিল।"
3486 - ـ (لمّا نزلتْ هذه الآيةُ: `ليسَ على الذينَ آمنُوا وعمِلُوا
الصالحاتِ جُناحٌ فيما طَعِمُوا إذا ما اتَّقَوا وآمنُوا وعمِلُوا الصالحاتِ ثم
اتّقَوا وآمنُوا ثم اتّقَوا وأحسَنُوا والله يحب المحسنين`؛ قال لي [يعني:
ابن مسعود] : «قيل لي: أنت منهم» ) .
أخرجه مسلم (7/147) ، والترمذي (3053) ، والنسائي في «السنن الكبرى»
(6/337/11153) ، وابن جرير الطبري في «التفسير» (7/25) ، وكذا ابن أبي
حاتم (4/1201/6776) من طريق علي بن مُسْهِر عن الأعمش عن إبراهيم عن
علقمة عن عبد الله قال: ... فذكره. وقال الترمذي:
«حديث حسن صحيح» .
وتابعه قيس بن الربيع عن الأعمش به. أخرجه ابن أبي حاتم (6778) .
وخالفهما سليمان بن أرقم عن الأعمش به؛ فزاد في متنه فقال:
لما نزلت تحريم الخمر؛ قالت اليهود: أليس إخوانكم الذين ماتوا كانوا يشربونها؟!
فأنزل الله عز وجل: `ليس على الذين.. ` ... » وذكر الحديث.
أخرجه الطبراني (10/95/15011) ، والحاكم (4/143 ـ 144) ، وقال:
«صحيح الإسناد، ولم يخرجاه، إنما اتفقا على حديث شعبة عن أبي إسحاق
عن البراء مختصراً» !
كذا قال! ووافقه الذهبي على التصحيح، وفي ذلك نظر من وجوه:
الأول: أن سليمان بن أرقم سيِّئ الحفظ كما في «التقريب» ؛ فلا وجه
لتصحيح حديثه!
الثاني: أنه خالف عليَّ بنَ مسهر الثقة ومتابعه، فتكون زيادته عليه منكرة،
لكن قد جاء ما يشهد لها، فلننظر هل ذلك مما يقويها؟! فلننتظر.
الثالث: أنه خفي عليه أن مسلماً قد أخرجه؛ فنفيه إياه وهم من أوهامه؛ إلا
أن يعني بالزيادة، وهو ما أستبعده!
وقد جاءت أحاديث أخرى في نزول هذه الآية عن جمع آخر من الصحابة،
لا بأس من تخريجها للفائدة، ولأنه وقع في بعضها علة خفيت على بعضهم
فصححه، وهم أنس بن مالك، وأبو هريرة، وعبد الله بن عباس، والبراء بن عازب،
وجابر بن عبد الله.
1 ـ أما حديث أنس؛ فله عنه طريقان:
الأولى: عن حماد بن زيد: أخبرنا ثابت عنه قال:
كنت ساقي القوم يوم حرمت الخمر في بيت أبي طلحة، وما شرابهم إلا
الفضيخ: البسر والتمر، فإذا منادٍ ينادي:
«ألا إن الخمر قد حرمت» .
قال: فَجَرَتْ في سكك المدينة، فقال لي أبو طلحة: اخرج فأهرقها، فهرقتها.
فقالوا ـ أو قال بعضهم ـ: قُتل فلان، قتل فلان وهي في بطونهم! قال ـ فلا
أدري هو من حديث أنس ـ: فأنزل الله عز وجل: `ليس على الذين آمنوا
وعملوا الصالحات جناح فيما طعموا إذا ما اتقوا وآمنوا وعملوا الصالحات`.
أخرجه البخاري (4620) ، ومسلم (6/87) ـ والسياق له ـ، والبيهقي
(8/286) ، وأحمد (3/227) ، وأبو يعلى (6/ 3362 و 3462) .
والأخرى: عن عَبَّاد بن راشد عن قتادة عن أنس قال:
بينا أنا أدير الكأس على أبي طلحة، وأبي عبيدة بن الجراح، ومعاذ بن جبل،
وسهيل ابن بيضاء، وأبي دجانة ـ حتى مالت رؤوسهم ـ ... الحديث نحوه، وفيه:
وتوضأ بعضنا واغتسل بعضنا ثم خرجنا إلى المسجد، وإذا رسول الله - صلى الله عليه وسلم -
يقرأ: ` أيها الذين آمنوا إنما الخمر والميسر والأنصاب والأزلام رجس من عمل
الشيطان فاجتنبوه لعلكم تفلحون` إلى قوله: `فهل أنتم منتهون`؛ فقال رجل:
يا رسول الله! فما منزلة من مات منا وهو يشربها؟! فأنزل الله تعالى: `ليس على
الذين آمنوا وعملوا الصالحات جناح فيما طعموا ... ` الآية.
فقال رجل لقتادة: سمعته من أنس بن مالك؟ قال: نعم، وقال رجل لأنس
ابن مالك: أنت سمعته من رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ؟! قال: نعم، أو حدثني من لم يكذب،
والله! ما كنا نكذب، ولا ندري ما الكذب.
أخرجه ابن جرير (7/24 ـ 25) ، والبزار (3/351/2922) .
وإسناده حسن، وسكت عنه ابن كثير في «التفسير» (2/93 ~ 94) ، وكذا
الحافظ في «الفتح» (8/279) ، وعزاه لابن مردويه فقط كشاهد للزيادة التي شك
فيها حماد في الطريق الأولى.
وعزاه السيوطي في «الدر المنثور» (2/ 321) لأبي الشيخ أيضاً.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
যখন এই আয়াতটি নাযিল হলো: “যারা ঈমান এনেছে এবং সৎকর্ম করেছে, তারা পূর্বে যা আহার করেছে, সে ব্যাপারে তাদের কোনো পাপ নেই, যদি তারা আল্লাহকে ভয় করে এবং ঈমান আনে ও সৎকর্ম করে, এরপরও ভয় করে ও ঈমান আনে, এরপরও ভয় করে ও সৎকর্ম করে। আর আল্লাহ সৎকর্মশীলদের ভালোবাসেন।” (সূরা মায়েদা, আয়াত ৯৩) তখন তিনি (ইবনে মাসউদ) আমাকে বলেন: “আমাকে বলা হয়েছিল: ’আপনি তাদেরই একজন।’”