সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ
3447 - (لا تجادلُوا بالقُرْآن، ولا تكذِّبُوا كتابَ اللهِ بعضَه ببعْضٍ؛ فو الله! إنّ المؤمنَ لَيجادلُ بالقرآن فيُغلَبُ وإنّ المنافقَ لَيجادلُ بالقرآن فيَغلِبُ)
أخرجه الطبراني في `مسند الشاميين ` (2/74/942) : حدثنا محمد بن الحسين (!) بن قتيبة قال: ثنا محمد بن خلف: ثنا أبو اليمان: ثنا صفوان بن عمرو عن عبد الرحمن بن جبير بن نفير عن أبيه عن النوّاس بن سمعان عن النبي - صلى الله عليه وسلم - قال: ... فذكره.
قلت: وهذا إسناد صحيح رجاله ثقات من رجال `التهذيب `؛ غير ابن قتيبة هذا، وهو (محمد بن الحسن بن قتيبة العسقلاني) ، تحرف اسم (الحسن) إلى (الحسين) في المطبوعة، والتصحيح من النسخة المصورة (1/187) وغيرها، فقد روى له الطبراني في `المعجم الأوسط ` عدة أحاديث عن محمد بن خلف هذا - وهو أبو
نصر العسقلاني - ؛ فانظر إن شئت (ج7/ الأرقام 6664 و 6665 و
নাওয়াস ইবনে সামআন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:
তোমরা কুরআন দ্বারা বিতর্ক (বা ঝগড়া) করো না। আর তোমরা আল্লাহর কিতাবের এক অংশকে অন্য অংশ দ্বারা মিথ্যা প্রতিপন্ন করো না। আল্লাহর কসম! নিশ্চয় মুমিন কুরআন দ্বারা বিতর্ক করলে সে পরাজিত হয়। আর মুনাফিক কুরআন দ্বারা বিতর্ক করলে সে জয়ী হয়।
3448 - (من علِم الرمي ثم تركه؛ فليسَ منّا، أو قد عصَى) .
أخرجه مسلم (6/52) ، وأبو عوانة (5/
উকবাহ ইবনে আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যে ব্যক্তি তীর নিক্ষেপ (বা стрельলা) শিক্ষা করলো, অতঃপর তা ছেড়ে দিলো, সে আমাদের অন্তর্ভুক্ত নয়, অথবা সে অবাধ্যতা করলো।”
3449 - (إذا أردتَ أن تغزوَ؛ اشْترِ فَرِساً أدْهَمَ، أغَرُّ، محجلاً، مُطلَقَ اليمنى؛ فإنّك تغنمُ وتسلَمُ) .
أخرجه الحاكم (2/92) ، والطبراني في `المعجم الكبير` (17/293/809) من طريق عبيد بن الصًّبًّاح: أنبأ موسى بن علي بن رباح عن أبيه عن عقبة بن عامر رضي الله عنه، قال: قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : ... فذكره. وقال الحاكم:
`صحيح على شرط مسلم `! ووافقه الذهبي، وأقره المنذري في `الترغيب ` (2/162/20) !
قلت: هذه غفلة عجيبة من هؤلاء الحفاظ؛ فإن عبيد بن الصباح هذا: هو الخزًّاز؛ كما في ` الجرح`، وقال:
`سألت أبي عنه؟ فقال: ضعيف الحديث `.
ثم هو ليس من رجال مسلم، ولا من رجال أحد من بقية الستة! وذكره ابن حبان في `الثقات ` (8/429) . وقال الهيثمي في `المجمع ` (5/262) :
`رواه الطبراني، وفيه عبيد بن الصباح، وهو ضعيف `.
قلت: لكنه قد توبع، فقال الوليد: حدثني ابن لهيعة عن يزيد بن أبي حبيب عن علي بن رباح عن أبي قتادة الأنصاري:
أن رجلاً قال: يا رسول الله! إني أريد أن أشتري فرساً، فأيها أشتري؟ قال ... فذكره، إلا أنه قال:
` أرثم ` مكان: `أدهم `.
وزاد بعد ` اليمنى`:
`.. أو من الكميت على هذه الشِّية؛ تغنم وتسلم `.
أخرجه الدارمي (2/212) .
وابن لهيعة صدوق يستشهد به، ولا سيما وقد رواه عنه أحد العبادلة مختصراً، فقال الطيالسي في `مسنده ` (84/604) : حدثنا عبد الله بن المبارك عن عبد الله بن عقبة الحضرمي عن علي بن رباح به مرفوعاً بلفظ:
`خير الخيل: الأقرح، الأرثم، الأدهم، المحجل، طلق اليمين، فإن لم يكن أدهم؛ فكميتٌ على هذه الشِّية)) .
قلت: وهذا إسناد صحيح من رواية ابن المبارك عن ابن لهيعة، وقد نسب فيه إلى جده (عقبة) . وقد أخرجه الترمذي (1696) من طريق الطيالسي، ووقع فيه: (ابن لهيعة) .
ثم أخرجه الترمذي، والحاكم، وابن حبان (1633) من طريق يحيى بن أيوب عن يزيد بن أبي حبيب عن علي بن رباح به. وقال الترمذي:
`حسن صحيح `.
وقال الحاكم:
`صحيح على شرط الشيخين `، ووافقه الذهبي، وأقره المنذري (2/162/19) . وهو شاهد قوي لرواية الدارمي المتقدمة عن ابن لهيعة عن يزيد بن أبي حبيب. *
উকবাহ ইবনে আমের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ইরশাদ করেছেন:
“যখন তুমি (আল্লাহর পথে) যুদ্ধে যাওয়ার ইচ্ছা করো, তখন তুমি এমন একটি ঘোড়া ক্রয় করো, যা গাঢ় কালো (আদহাম), কপালে সাদা তিলকযুক্ত (আগর্র বা আকরাহ), পায়ে সাদা চিহ্নযুক্ত (মুহাজ্জাল) এবং যার ডান সামনের পা সাদা চিহ্নমুক্ত (ত্বলক আল-ইয়ামিন)। কারণ, (এরূপ ঘোড়া নিয়ে অভিযানে গেলে) তুমি গণীমত লাভ করবে এবং নিরাপদ থাকবে।”
(অন্যান্য সহীহ বর্ণনায় রয়েছে, যদি গাঢ় কালো না হয়, তবে একই ধরনের চিহ্নবিশিষ্ট লালচে-বাদামী (কুমাইত) রঙের ঘোড়াও উত্তম।)
3450 - (والذي نفْسِي بيده! لو طُوِّقْتِيه؛ ما بلغتِ العُشُر من عمله حتّى يرجع. يعني: زوجَها الغازي)
أخرجه الإمام أحمد (3/439) ، والطبراني في `المعجم الكبير` (20/196/441) من طريق رِشدين عن زبان عن سهل بن معاذ بن أنس عن أبيه عن النبي - صلى الله عليه وسلم - :
أن امرأة أتته، فقالت: يا رسول الله! انطلق زوجي غازياً وكنت أقتدي بصلاته إذا صلى، وبفعله كله، فأخبرني بعمل يبلغني عمله حتى يرجع؟ فقال لها:
`أتستطيعين أن تقومي ولا تقعدي، وتصومي ولا تفطري، وتذكري الله تبارك وتعالى ولا تفتري حتى يرجع؟ `.
قالت: ما أطيق هذا يا رسول الله! فقال: ... فذكره. والسياق لأحمد.
قلت: وهذا إسناد ضعيف؛ لحال رشدين المعروف بالضعف؛ ومثله زبان وهو ابن فائد. وقال المنذري في `الترغيب ` (2/178/32) :
`رواه أحمد من رواية رشدين بن سعد - وهو ثقة عنده - ، ولا بأس بحديثه في المتابعات والرقائق `!
كذا قال! وذهل عن إعلاله بـ (زبان) . وتبعه على ذلك الهيثمي؛ فقال (5/274) :
`رواه أحمد، والطبراني، وفيه رشدين بن سعد، وثقه أحمد، وضعفه جماعة`!
قلت: والتضعيف هو المعتمد؛ لقاعدة: (الجرح مقدم على التعديل) ؛ ولا سيما وهو قول الجمهور! على أن عزوهما لأحمد أنه وثقه هكذا مطلقاً؛ يوهم أنه لم يضعفه أيضاً، وليس كذلك، فالروايات عنه مختلفة، وهي:
الأولى: ما ذكرا من التوثيق، وهي رواية ابن شاهين في كتابه `الثقات ` (129/352) عن شيخه البغوي عن أحمد قال:
`أرجو أن يكون ثقة، أو صالح الحديث `.
لكن رواه ابن عدي في `الكامل ` (3/149) عن شيخه أيضاً البغوي، فلم يذكر: `ثقة، أو`!
الثانية: رواية الميموني قال: سمعت أبا عبد الله - يعني: أحمد بن حنبل يقول:
رشدين بن سعد ليس يبالي عمن روى، لكنه رجل صالح، فوثقه هيثم بن خارجة - وكان في المجلس - ؛ فتبسم أبو عبد الله، ثم قال: ليس به بأس في أحاديث الرقائق.
أخرجه العقيلي (2/67) .
الثالثة: رواية حرب بن إسماعيل قال:
سألت أحمد بن حنبل عن رشدين بن سعد؟ فضعفه وقدّم ابن لهيعة عليه.
رواه ابن أبي حاتم (1/2/513) .
الرابعة: رواية عبد الله بن أحمد قال: سمعت أبي يقول:
`رشدين بن سعد؛ كذا وكذا`.
رواه العقيلي (2/66) وابن عدي أيضاً.
فأقول: من سَرْدِ هذه الروايات؛ يتبين لنا أنها كلها متفقة على التضعيف إلا الرواية الأولى؛ ففيها أنها ليس فيها جزم الإمام بتوثيقه وإنما الرجاء فقط، وهذا لا يفيد الجزم كما هو ظاهر.
هذا أولاً.
وثانياً: لو فرضنا أنه يفيد الجزم؛ فالجمع بين هذه الرواية والروايات الأخرى: أن التوثيق كان قبل أن يتبين له ضعفه، وإذا كان الجرح مقدماً على التعديل في الأقوال المختلفة عن الأئمة؛ لأن الجارح معه زيادة علم، ومن علم حجة على من لم يعلم؛ فهذا هو السبيل أيضاً في التوفيق بين الأقوال المختلفة عن الإمام الواحد، ومن هذا يتبين خطأ المنذري والهيثمي في إطلاقهما عزو التوثيق لأحمد؛ الموهم
أنه لم يضعفه أيضاً. وعليه؛ فلا يعتمد على هذا التوثيق؛ لمخالفته لأقوال الإمام الأخرى، وأقوال الأئمة الاًخرين.
ثم إن زبان - وهو ابن فائد - لم يوثقه أحد، ولا خلاف في ضعفه، فسكوتهما عنه خطأ آخر.
وثمة خطأ هو أهم مما تقدم، وهو غفلتهما عن متابعة قوية لـ (زبان) عند الطبراني (رقم 440) من طريقين عن ابن وهب: حدثني سعيد بن أبي أيوب عن خير بن نعيم عن سهل بن معاذ به.
قلت: وهذا إسناد صحيح، رجاله ثقات رجال مسلم إلى سهل بن معاذ. وسهل قد قال فيه الحافظ في `التقريب `:
`لا بأس به إلا في روايات زبان عنه `.
وقال المنذري في آخر `الترغيب ` (4/284) :
`ضُعف، وحسن له الترمذي، وصحح له أيضاً، واحتج به ابن خزيمة والحاكم وغيرهما، وذكره ابن حبان في (الثقات) `.
قلت: فهو حسن الحديث على الأقل إذا كان الراوي عنه ثقة، وقد أخرج له ابن حبان أيضاً حديثاً في النهي عن اتخاذ الدواب كراسي رقم (5590) ، وهو مخرج فيما تقدم برقم (21) .
وللحديث شاهد يزداد به قوة من حديث أبي هريرة - رضي الله عنه - قال: قيل للنبي - صلى الله عليه وسلم - : ما يعدل الجهاد في سبيل الله عز وجل؟ قال:
`لا تستطيعونه `.
قال: فأعادوا عليه مرتين أو ثلاثاً؟ كلّ ذلك يقول:
`لا تستطيعونه `.
وقال في الثالثة:
`مثل المجاهد في سبيل الله، كمثل الصائم القائم القانت بآيات الله، لا يَفْتُرُ من صيام ولا صلاة، حتى يرجع المجاهد في سبيل الله `.
رواه مسلم وغيره، وسبق تخريجه برقم (2896) . *
মু’আয ইবনু আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
এক মহিলা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বললেন, “ইয়া রাসুলাল্লাহ! আমার স্বামী জিহাদে (গাজী হিসেবে) চলে গেছেন। তিনি যখন নামায পড়তেন, আমি তাঁর নামাযের অনুসরণ করতাম এবং তাঁর সকল আমলেরই অনুসরণ করতাম। সুতরাং আমাকে এমন কোনো আমলের কথা বলুন, যা করলে আমি তাঁর ফিরে আসা পর্যন্ত তাঁর আমলের সমতুল্য পৌঁছাতে পারি?”
তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: “তুমি কি সক্ষম হবে যে, তাঁর ফিরে না আসা পর্যন্ত তুমি (নামাযে) দাঁড়িয়ে থাকবে, বসবে না; রোযা রাখবে, ইফতার করবে না; এবং আল্লাহ তাআলার যিকির করতে থাকবে, ক্ষান্ত হবে না?”
মহিলাটি বললেন, “ইয়া রাসুলাল্লাহ! আমি এই কাজ করতে সক্ষম নই।”
অতঃপর তিনি বললেন: “যার হাতে আমার প্রাণ, তাঁর কসম! যদি তুমি এই কাজগুলোও (অর্থাৎ: তাঁর ফিরে না আসা পর্যন্ত ক্রমাগত দাঁড়িয়ে থাকা, রোযা রাখা ও যিকির করা) করতে পারতে, তবুও তোমার স্বামী—যিনি যুদ্ধে গেছেন—তিনি ফিরে আসা পর্যন্ত তুমি তাঁর আমলের দশ ভাগের এক ভাগও অর্জন করতে পারতে না।”
3451 - (أبشرُوا، أبشرُوا، إنه من صلى الصَّلوات الخمسَ، واجْتنبَ الكبائر، دخلَ من أيِّ أبوابِ الجنّة شاءَ:
عقوقَ الوالدين، والشركَ بالله، وقتلَ النَّفس، وقَذْفَ المحصَنات، وأكلَ مالَ اليتيمِ، والفرارَ من الزَّحفِ. وأكلَ الربا) .
أخرجه الطبراني في `المعجم الكبير` (13/
উবাদাহ ইবন সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
"তোমরা সুসংবাদ গ্রহণ করো! সুসংবাদ গ্রহণ করো! নিশ্চয় যে ব্যক্তি পাঁচ ওয়াক্ত সালাত (নামাজ) আদায় করে এবং কাবীরাহ (বড়) গুনাহসমূহ পরিহার করে— সে জান্নাতের যে দরজা দিয়ে ইচ্ছা প্রবেশ করবে।" (কাবীরাহ গুনাহসমূহ হলো:) "পিতামাতার অবাধ্যতা, আল্লাহর সাথে শিরক করা, কোনো ব্যক্তিকে হত্যা করা, সতী-সাধ্বী নারীদের অপবাদ দেওয়া, ইয়াতীমের সম্পদ ভক্ষণ করা, (জিহাদের) ময়দান থেকে পলায়ন করা এবং সুদ ভক্ষণ করা।"
3452 - (قال رجلٌ: الحمدُ لله كثيراً، فأعظَمَها الملَكُ أن يكتُبَها، وراجعَ فيها ربّه عزّ وجلّ، فقيلَ له: اكْتبها كما قالَ عبدِي: كثيراً) .
أخرجه الطبراني في `المعجم الأوسط ` (3/44/2082) قال: حدثنا أحمد ابن زهير، قال: حدثنا يوسف بن عبد الملك الواسطي الدقيقي - أخو محمد بن
عبد الملك - قال: حدثنا زكريا بن عدي قال: حدثنا أبو معاوية عن عاصم الأحول عن أبي عثمان عن سلمان قال: قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : ... فذكره.
قلت: وهذا إسناد رجاله كلهم ثقات؛ غير يوسف بن عبد الملك الواسطي الدقيقي، لم يترجم في كتب الجرح والتعديل. وقد أشار إلى ذلك المنذري بقوله في ` الترغيب ` (2/ 254/3) :
`رواه الطبراني بإسناد فيه نظر`.
وبينه الهيثمي فقال (10/96) :
`رواه الطبراني في `الأوسط `، وفيه يوسف بن عبد الملك الواسطي؛ ولم أعرفه، وبقية رجاله ثقات `.
قلت: وقد روى عنه (بحشل) في `تاريخ واسط ` (ص 109 و 236) ، فيصلح للاستشهاد (¬1) . وقد دعم حديثه المنذري بقوله:
`وروى أبو الشيخ ابن حيان من طريق عطية عن أبي سعيد مرفوعاً أيضاً:
`إذا قال العبد: الحمد لله كثيراً؛ قال الله تعالى: اكتبوا لعبدي رحمتي كثيراً` ... `!
ولقد أبعد النجعة! فقد رواه من الوجه المذكور: ابن أبي شيبة في `المصنف ` (10/295/ 9484) ، والطبراني في `الدعاء` (3/1562/1685) .
وعطية: هو العوفي؛ ضعيف؛ كما هو معروف.
¬_________
(¬1) ولم يترجم له السمعاني في مادة (الدقيقي) ، بينما ترجم لأخيه (محمد بن عبد الملك) ترجمة حسنة، ووثقه.
ويشهد له أيضاً حديث أنس قال:
كنت مع رسول الله - صلى الله عليه وسلم - جالساً؛ إذ جاء رجل فسلم على النبي - صلى الله عليه وسلم - والقوم، فقال الرجل: السلام عليكم ورحمة الله، فرد النبي - عليه الصلاة والسلام - عليه: `وعليكم السلام ورحمة الله وبركاته `، فلما جلس الرجل قال: الحمد لله كثيراً طيباً مباركاً كما يحب ربنا أن يحمد وينبغي له، فقال له النبي - صلى الله عليه وسلم - :
`كيف قلت؟ `.
فرد عليه كما قال، فقال النبي - صلى الله عليه وسلم - .
`والذي نفسي بيده! لقد ابتدرها عشرة أملاك؛ كلهم حريص على أن يكتبها، فما دروا كيف يكتبونها؟! حتى يرفعوها إلى ذي العزة، فقال: اكتبوها كما قال عبدي `.
أخرجه أحمد (3/158) : ثنا خلف عن حفص بن عمرعن أنس ...
ومن هذا الوجه أخرجه النسائي في `عمل اليوم والليلة ` (289/ 341) ، وكذا ابن السني (143/438) .
قلت: وهذا إسناد رجاله ثقات؛ لكن خلف - وهو ابن خليفة - كان اختلط في الآخر.
وبالجملة؛ فالحديث حسن على الأقل بمجموع ما ذكرنا. والله أعلم. *
সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
এক ব্যক্তি বলল, ‘আলহামদু লিল্লাহি কাছীরান’ (আল্লাহর জন্য অনেক প্রশংসা)। তখন ফেরেশতা তা লিখতে গিয়ে এর গুরুত্বকে অনেক বড় মনে করল এবং এই বিষয়ে তার মহান রব আয্যা ওয়া জাল্লার কাছে জানতে চাইল। তখন তাকে বলা হলো: "আমার বান্দা যেমনটি বলেছে, ’কাছীরান’ (অনেক) সহ ঠিক তেমনই লিখে দাও।"
3453 - (التاجرُ الأمينُ الصدوقُ المسلمُ: مع [النبيّين، والصّديقين، و] الشُّهداء يومَ القيامة) .
أخرجه ابن ماجه (2139) ، وابن أبي الدنيا في `إصلاح المال ` (73/215) ،
والمخلَّص في `الفوائد المنتقاة` (8/4/1) ، وابن حبان في `الضعفاء ` (2/
আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: বিশ্বস্ত, সত্যবাদী মুসলিম ব্যবসায়ী কিয়ামতের দিন নবীগণ, সিদ্দীকগণ (সত্যবাদীগণ) এবং শহীদগণের সঙ্গে থাকবেন।
3454 - (كفّوا صِبْيانَكم عند فَحْمةِ العِشاءِ، وإيّاكُم والسّمر بعد هَدْأةِ الرّجلِ؛ فإنّكم لا تدرُون ما يَبُثُّ اللهُ من خَلقِه؟! فأغْلِقوا الأبوابَ، وأطفِئُوا المصْباحَ، وأكفئوا الإناء، وأوكوا السّقاء) .
أخرجه الحميدي في `مسنده ` (535/1273) : ثنا سفيان قال: ثنا أبو الزبير: أنه سمع جابر بن عبد الله يقول: قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : ... فذكره.
قلت: وهذا إسناد صحيح على شرط مسلم، وقد أخرجه كما سيأتي دون تصريح أبي الزبير بالتحديث، وهذه فائدة عزيزة حفظها لنا الحميدي رحمه الله، ولذلك خرجته.
وأخرجه مسلم (6/107) من طريق عبد الرحمن: حدثنا سفيان به؛ إلا أنه لم يسق لفظه؛ وقال: `بنحو حديث زهير`.
يعني الذي قبله، وقد ساقه، وعنه البغوي في `شرح السنة` (11/393) وصححه - من طريقين عنه عن أبي الزبير عن جابر مرفوعاً:
`لا ترسلوا فَواشِيَكم وصبيانكم إذا غابت الشمس؛ حتى تذهب فحمة العشاء؛ فإن الشياطين تنبعث إذا غابت الشمس حتى تذهب فحمة العشاء`.
وهكذا أخرجه أبو عوانة في `مسنده ` (5/333) ، وأبو داود في `سننه ` (2604) ، والبيهقي (5/256) ، وأحمد (3/312 و386 و395) .
ورواه ابن خزيمة في `صحيحه ` (1/68/132 و4/148/2590) ، وعنه ابن حبان (2/285/1272) ، وأحمد (3/301) من طريق فِطْرِ بن خليفة عن أبي الزبير به نحوه.
وتابعه عطاء بن أبي رباح عن جابر ببعضه.
رواه الشيخان وغيرهما، وهو مخرج في ` الإرواء ` (1/
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:
“সন্ধ্যার গাঢ় অন্ধকার নেমে এলে তোমরা তোমাদের শিশুদের (বাইরে ঘোরাঘুরি করা থেকে) নিয়ন্ত্রণে রাখো। সাবধান! গভীর রাতে মানুষ ঘুমিয়ে যাওয়ার পর গল্পগুজব করা থেকে বিরত থাকো; কেননা তোমরা জানো না আল্লাহ তাঁর সৃষ্টিকুলের মধ্যে কী কিছু (অনিষ্টকারী শয়তান) ছড়িয়ে দেন! অতএব, তোমরা দরজাগুলো বন্ধ করে দাও, প্রদীপ নিভিয়ে দাও, পাত্রগুলো উপুড় করে রাখো (বা মুখ ঢেকে দাও), এবং মশক (পানির থলি) শক্ত করে বেঁধে রাখো।”
3455 - (رخّص - صلى الله عليه وسلم - للمسافر ثلاثة أيّام ولياليهن، وللمُقيمِ يوماً وليلةً - إذا تطهَّر فلبسَ خُفّيْهِ - أنْ يمسحَ عليهما) .
أخرجه ابن خزيمة في `صحيحه ` (1/96/192) ، والطحاوي في `شرح المعاني ` (1/50) ، والدارقطني في `سننه ` (1/194/1) ، وابن عبد البر في `التمهيد` (11/155) - والسياق لهم - ، والشافعي في `الأم ` (1/29) ، وابن أبي شيبة في `المصنف ` (1/179) ، وابن الجارود في `المنتقى` (39/87) ، وابن حبان (72/
সফওয়ান ইবন আস্সাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম অনুমতি দিয়েছেন যে, যখন কেউ পবিত্রতা অর্জন করে তার মোজা (খুফ্ফাইন) পরিধান করবে, তখন মুসাফিরের জন্য তিন দিন ও তিন রাত এবং মুকিমের (স্থায়ী বাসিন্দা) জন্য এক দিন ও এক রাত মোজার উপর মাসেহ করার অবকাশ রয়েছে।
3456 - (اللهمّ! مَن وَلِيَ من أمْر أمّتي - شيئاً فَشَقَّ عليهم؛ فاشقُقْ عليه، ومن وَليَ من أمْر أمّتي شيئاً فرفَقَ بهم؛ فارفُقْ بهِ) .
هو من حديث عائشة - رضي الله عنها - ، وله عنها طرق:
الأولى: عن حرملة بن عمران التجيبي عن عبد الرحمن بن شِماسة قال:
أتيت عائشة أسألها عن شيء؟ فقالت: ممن أنت؟ فقلت: رجل من أهل مصر، فقالت: كيف كان صاحبكم لكم في غزاتكم هذه؟ فقال: ما نقمنا منه شيئاً؛ إن كان ليموت للرجل منا البعير؛ فيعطيه البعير، والعبدُ؛ فيعطيه العبدَ، ويحتاج إلى النفقة؛ فيعطيه النفقة. فقالت: أما إنه لا يمنعني الذي فعل في
محمد بن أبي بكر - أخي - أن أخبرك ما سمعت من رسول الله - صلى الله عليه وسلم - يقول في بيتي هذا: ... فذكرته.
أخرجه مسلم (6/7) ، وأبو عوانة (4/412) - والسياق لهما - ، والنسائي في `الكبرى` (5/275/8873) - الشطر الثاني منه - ، وابن حبان (1/382/
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:
"হে আল্লাহ! আমার উম্মতের কোনো কাজের দায়িত্বভার যে গ্রহণ করে, অতঃপর তাদের উপর কঠোরতা আরোপ করে (বা তাদের জন্য কষ্টকর করে তোলে), আপনিও তার উপর কঠোর হোন। আর যে আমার উম্মতের কোনো কাজের দায়িত্বভার গ্রহণ করে, অতঃপর তাদের প্রতি নম্রতা প্রদর্শন করে (বা সদয় হয়), আপনিও তার প্রতি নম্র হোন।"
3457 - (إني لأنقلبُ إلى أهْلي، فأجدُ التمرةَ ساقطةً على فراشِي، فأرفعُها لآكلَها، ثمّ أخشَى أن تكون صدقةً! فأُلقيها) .
هو من حديث أبي هريرة، وله عنه طريقان:
الأول: همام بن مُنَبِّه:
رواه البخاري عنه - معلقاً - (عقب حديث 2055) ، ووصله (2432) ، وكذا مسلم (1070) ، وعبد الرزاق في `المصنف ` (¬1) (6944) - بلفظ قريب - ، وعنه أحمد (2/
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: (নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:) নিশ্চয় আমি যখন আমার পরিবারের কাছে (ঘরে) ফিরি, তখন আমার বিছানায় একটি খেজুর পড়ে থাকতে দেখি। আমি তা তুলে নেই যেন খেতে পারি। এরপরই আমি আশঙ্কা করি যে এটি হয়তো সাদকা (যাকাতের মাল)! তাই আমি তা ফেলে দেই।
3458 - (ألا أخبرُكم بخيرِ الشُّهداءِ؟! الذي يأتي بشهادتِه قبل أن يُسأَلَها) .
رواه مسلم (5/
যায়দ ইবনু খালিদ আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
আমি কি তোমাদেরকে শ্রেষ্ঠ সাক্ষী সম্পর্কে অবহিত করব না? (তিনি হলেন) সেই ব্যক্তি, যে তার কাছে সাক্ষ্য চাওয়ার আগেই তা পেশ করে।
3459 - ـ (أَلا أخبرُكم بخيْرِ دُورِ الأنصارِ ـ أو بخيْرِ الأنصار ِـ؟! قالوا: بلَى يا رسولَ الله! قال: بَنُو النّجارِ، ثمّ الذين يلونَهم؛ بَنُو عبدِ الأشهلِ، ثمّ الذين يلونَهم؛ بنُو الحارثِ بن الخزرجِ، ثمّ الذين يلونَهم؛ بنُو ساعدةَ، ثمّ قال بيدَيهِ، فقبضَ أصابِعه ثمّ بسطهُنَّ ـ كالرامي بيدهِ ـ، قال: وفي دُورِ الأنصارِ كلِّها خيرٌ) .
جاء من حديث أنس، وأبي أُسيد الساعدي، وأبي حُميد الساعدي، وأبي هريرة:
أولا: حديث أنس، وله عنه طريقان:
1 ـ يحيى بن سعيد:
رواه مسلم (7/175) ، والترمذي (3910) ، والنسائي في «الكبرى» (8336 و 8337) والحميدي (1197) ، وأحمد (3/202) ، وأبو يعلى (3650) و (3855) ، وأبو نعيم في «الحلية» (6/354) من طرق عنه به.
2 ـ حُميد الطويل:
رواه النسائي في «الكبرى» (8338) وأحمد (3/105) ، وابن حبان (7284 و 7285) والبغوي في «شرح السنة» (3979) .
ثانياً: حديث أبي أُسيد، ويرويه عنه جماعة:
1 ـ أنس بن مالك:
رواه البخاري (3789 و3807) ، ومسلم (7/174) ، والطيالسي (1355)
وأحمد (3/496) , والترمذي (3911) ، والنسائي في «الكبرى» (8339) ،
والطبراني (19/579) ، والبيهقي (6/371) من طرق عن شعبة عن قتادة عنه به.
2 ـ أبو سلمة بن عبد الرحمن:
رواه البخاري في «صحيحه» (3790) و (6053) ، وفي «التاريخ الكبير» (7/299) ، ومسلم (7/175) ، وأحمد (3/494) ، والنسائي في «الكبرى» (8340 و 8341 (¬1) و 8345) وابن قانع في «معجم الصحابة» (984) من طرق عنه به.
3 ـ غَزِيّة أبو عمارة:
رواه الحاكم (3/516) ، والطبراني في «الكبير» (19/588) من طريق يحي ابن بُكير عن ابن لهيعة عن عمارة بن غَزِيّة عن أبيه عنه به.
وغزيّة: هو ابن الحارث؛ صحابي ـ كما قال ابن أبي حاتم وغيره ـ وهو مترجم في «الإصابة» (3/185) .
وابن لهيعة ساء حفظه بعد احتراق كتبه، وليس ابن بكير ممن روى عنه قبل سوء حفظه.
نعم؛ الطرق الأخرى للحديث مغنية عنه جدا.
4 ـ إبراهيم بن محمد بن طلحة:
رواه مسلم (7/175) من طريق عبد الرحمن بن حُميد، عنه، به.
ثالثاً: حديث أبي حميد:
رواه البخاري (1481 و 3791) ، ومسلم (7/261) ، وأحمد (5/424 ـ 425) ، والطحاوي في «مشكل الآثار» (2808) من طريق عمرو بن يحيى عن العباس بن سهل الساعدي عنه به.
¬_________
(¬1) وقد سقط ذكره من المطبوعة!! وانظر «تحفة الأشراف» (8/345)
رابعاً: حديث أبي هريرة:
رواه مسلم (7/175) ، والنسائي في «الكبرى» (8343) ، وابن حبان (7286) ،
وعبد الرزاق (19910) ، وأحمد (2/267) من طريق الزهري عن أبي سلمة وعبيد الله ابن عبد الله عنه به.
ولقد أورد البخاري في «التاريخ الكبير» (7/299) حديث أبي أُسيد المتقدم، وحديث أبي هريرة ـ هذا ـ، وكلاهما من طريق أبي سلمة ثم قال:
«والأول أصح» ، يعني: حديث أبي أُسيد، والله أعلم.
(فائدة) : ذكر البخاري في «التاريخ الكبير» (7/288 ـ 289) في ترجمة (موسى بن عمرو بن عبد الله بن أبي حرام النَّجَّاري الأنصاري أحد بني دينار عن أبيه عن النبي - صلى الله عليه وسلم - ) ، قال:
«خير دور بني الأنصار بنو النجار ... » ، روى عنه ابن أبي أُويس.
ولم أجده مسنداً عنه فيما بحثت!
وقال ـ رحمه الله ـ في موضع آخر من «تاريخه» (6/352) :
«إبراهيم بن حمزة: حدثنا عبد العزيز بن عمرو بن عبد الله الأنصاري: قال ابن عباس رضي الله عنهما: قال النبي - صلى الله عليه وسلم - :
«خير دور الأنصار: بني (كذا) عبد الأشهل ... » ، فقال أبو أُسيد رضي الله عنه: سمعت النبي - صلى الله عليه وسلم - قال: «خير دور الأنصار: بني (كذا) النجار ... » ، وهذا أصح» .
وإبراهيم بن حمزة ـ المذكورـ من شيوخ البخاري؛ كما في «تهذيب الكمال» (2/77) ،
وهو صدوق.
ولم أجد حديث ابن عباس هذا مسنداً ـ فيما بحثت ـ أيضاً!
والله الموفق. *
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “আমি কি তোমাদের আনসারদের গোত্রগুলোর (বা মহল্লাসমূহের) মধ্যে শ্রেষ্ঠতম গোত্রের—অথবা (তিনি বললেন) আনসারদের মধ্যে শ্রেষ্ঠদের—কথা বলব না?”
সাহাবীগণ বললেন, “অবশ্যই, ইয়া রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)!”
তিনি বললেন, “(প্রথমত) বানু নাজ্জার। অতঃপর তাদের পরে যারা, তারা হলো বানু আব্দিল আশহাল। অতঃপর তাদের পরে যারা, তারা হলো বানু হারিস ইবনুল খাজরাজ। অতঃপর তাদের পরে যারা, তারা হলো বানু সায়েদা।”
অতঃপর তিনি তাঁর দুই হাত দ্বারা ইঙ্গিত করলেন। তিনি তাঁর আঙ্গুলগুলো মুষ্টিবদ্ধ করলেন এবং পরে তা প্রসারিত করলেন—যেমন কোনো ব্যক্তি হাত দিয়ে তীর নিক্ষেপ করে থাকে।
তিনি বললেন, “আর আনসারদের সকল গোত্রের মধ্যেই কল্যাণ (বা শ্রেষ্ঠত্ব) রয়েছে।”
3460 - ـ (لو ستَرْتَه بثوبِكَ؛ كان خيراً لكَ. قاله لهزّال) .
روي من حديث نُعيم بن هَزَّال، ومحمد بن المنكدر، وسعيد بن المسيَّب، كلاهما مرسلاً.
1 ـ أما حديث نعيم بن هزّال؛ فقد اختلف عليه كما يأتي:
أولاً: عن يزيد بن نعيم بن هزال عن أبيه:
أن ماعزاً أتى النبي - صلى الله عليه وسلم - ، فأقر عنده أربع مرات، فأمر برجمه، وقال لهزال: ... فذكره.
أخرجه أبو داود (4377) ، والنسائي في «السنن الكبرى» (4/305ـ306/7274) ، والحاكم (4/363) والبيهقي في «السنن» (8/219 و 228) ، وابن أبي شيبة في «المصنف» (10/78 ـ 79) ، وأحمد (5/216 ـ 217 و 217) ، وابن عبد البر في «التمهيد» (23/126) ؛ بعضهم مختصراً ـ واللفظ لأبي داود ـ وبعضهم مطولاً ـ وهو رواية لأبي داود (4419) ـ وأتمها رواية أحمد، ولفظه:
كان ماعز بن مالك [يتيماً] في حِجْر أبي، فأصاب جارية في الحي، فقال له أبي: ائت رسول الله - صلى الله عليه وسلم - فأخبره بما صنعت؛ لعله يستغفر لك، وإنما يريد بذلك رجاء أن يكون له مخرج، فأتاه، فقال: يا رسول الله! إني زنيت فأقم علي كتاب الله، فأعرض عنه، ثم أتاه الثانية، فقال: يا رسول الله! إني زنيت فأقم علي كتاب الله، ثم أتاه الثالثة، فقال: يا رسول الله! إني زنيت فأقم علي كتاب الله، ثم أتاه الرابعة، فقال: يا رسول الله! إني زنيت فأقم علي كتاب الله! فقال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - :
«إنك قد قلتها أربع مرات، فيمن؟» .
قال: بفلانة. قال:
«هل ضاجعتها؟» .
قال: نعم. قال:
«هل باشرتها؟ «.
قال: نعم. قال:
«هل جامعتها؟» .
قال: نعم.
قال: فأمر به فرُجم.
قال: فأخرج به إلى الحَرَّة، فلما رجم؛ فوجد حر الحجارة؛ جزع فخرج يشتد، فلقيه عبد الله بن أنيس، ـ وقد أعجز أصحابه ـ؛ فنزع له بوظيف بعير، فرماه به؛ فقتله.
قال: ثم أتى النبي - صلى الله عليه وسلم - ، فذكر له ذلك؟! فقال:
«هلا تركتموه؟! لعله يتوب فيتوب الله عليه.»
قال هشام: فحدثني يزيد بن نعيم بن هزال عن أبيه أن رسول الله - صلى الله عليه وسلم - قال لأبي حين رآه:
«والله يا هزال! لو كنت سترته بثوبك؛ كان خيراً مما صنعت» (¬1)
¬_________
(¬1) ورواه ابن سعد في «الطبقات» (4/324) بأتم منه، لكنه من روايته عن شيخه محمد بن عمر ـ وهو الواقدي ـ، وهو متروك.
وقال الحاكم ـ وليس عنده هذه الجملة الأخيرة؛ ولا النسائي ـ:
«صحيح الإسناد» ؛ ووافقه الذهبي، وأقره الحافظ في «الفتح» (12/127) !
وبدونها أيضا ساقه الحافظ في «التلخيص» (4/58) ، وقال:
«رواه أبو داود وإسناده حسن» .
قلت: وهذا هو الأقرب؛ فإن فيه هشام بن سعد، وهو:
«صدوق، له أوهام» ؛ كما قال الحافظ في «التقريب» .
لكن نعيم بن هزال في صحبته اختلاف، قال ابن عبد البر في «الاستيعاب» :
«روى عنه المدنيون قصة رجم (ماعز الأسلمي) ، وقد قيل: إنه لا صحبة له، وإنما الصحبة لأبيه هزال، وهو أولى بالصواب» .
وقوله: «المدنيون» يخالف ما في «تهذيب الكمال» وفروعه، و «تجريد الذهبي» ،
و «إصابة العسقلاني» ؛ فإنهم لم يذكروا عنه راوياً غير ابنه (يزيد) ، وصرح بذلك الحافظ في «التقريب» مع جزمه بصحبته؛ فقال:
«صحابي، نزل المدينة، ماله راوٍ إلا ابنه يزيد» .
قلت: ولعل سبب المخالفة هو اختلاف الروايات عن نعيم بن هزال، كما يأتي.
ثانياً: قال الليث بن سعد: عن يحيى ـ وهو ابن سعيد الأنصاري ـ عن يزيد ابن نعيم عن جده هزال:
أنه كان أمر ماعزاً أن يأتي النبي - صلى الله عليه وسلم - ... الحديث مختصراً، وفيه حديث الترجمة.
أخرجه النسائي (7278) وابن عبد البر (23/126) .
قلت: ورجاله كلهم ثقات رجال مسلم إلا هزال؛ لكنهم لم يذكروا لحفيده يزيد بن نعيم سماعاً منه، فالظاهر أنه منقطع، وفي «التهذيب» :
«يقال: مرسل» .
ونحوه رواية يحيى بن أبي كثير قال: حدثني أبو سلمة بن عبد الرحمن عن يزيد بن نعيم بن هزال ـ وكان هزال استرجم ماعزاً ـ قال:
كانت لأهلي جارية ترعى غنماً لهم يقال لها: فاطمة ... الحديث نحوه حديث الترجمة.
أخرجه النسائي (7280) ، والطحاوي في «مشكل الآثار» (1/87/93
و12/463/4944) .
وأخرجه أحمد أيضاً؛ لكنه قال: عن نعيم بن هزال ... لم يذكر يزيد بن نعيم.
ونحوه رواية يحيى بن سعيد ـ وهو الأنصاري ـ عن محمد بن المنكدر عن ابن هزال عن أبيه هزال به.
أخرجه النسائي (7275) ـ وفي سنده خطأ مطبعي ـ، والحاكم أيضاً، والبيهقي (8/330 ـ 331) ، وأحمد (5/217) ، وابن عبد البر، وقال:
«هذا الحديث محفوظ عن يحيى بن سعيد عن محمد بن المنكدر عن ابنٍ لهزال عن هزال. وعن يحيى بن سعيد عن يزيد بن نعيم بن هزال من وجوه» .
قلت: يشير إلى رواية الليث عن يحيى المتقدمة في (ثانياً) ، وظاهر أن ابن هزال هو: نعيم، وأن محمد بن المنكدر رواه عنه مباشرة، فيكون له ـ أعني: نعيماً ـ راو آخر غير ابنه يزيد بن نعيم.
2 ـ ويعكّر عليه: أن النسائي أخرجه (7276) من طريق ابن المبارك، والبيهقي من طريق سليمان بن بلال، كلاهما عن يحيى بن سعيد عن محمد بن المنكدر:
أن رسول الله - صلى الله عليه وسلم - قال لرجل من أسلم ... الحديث مرسلاً. وقال البيهقي:
«هذا أصح مما قبله» .
قلت: وزادوا إلا أحمد:
قال: يحيى فحدثت بهذا الحديث في مجلس فيه يزيد بن نعيم بن هزال الأسلمي فقال: هزال جدي، وهذا الحديث حق.
3 ـ رواه مالك في «الموطأ» (3/39) عن يحيى بن سعيد عن سعيد بن المسيَّب
أنه قال:
بلغني أن رسول الله - صلى الله عليه وسلم - قال لرجل من أسلم ـ يقال له: هزال ـ:
يا هزال! لو سترته بردائك كان خيراً لك.
قال يحيى بن سعيد ... فذكره كما في رواية الثلاثة عنه.
وقال ابن عبد البر عقبه:
«لا خلاف في إسناده في «الموطأ» على الإرسال؛ كما ترى، وهو مسند من طرق صحاح» !
كذا قال! وليس في شيء من الطرق المتقدمة ما هو مسند صحيح على ما سبق بيانه في تنسيق وتحقيق؛ ربما لا تراه في مكان آخر، اللهم! إلا الطريق الأولى؛ فهي حسنة على الخلاف المتقدم في صحبة نعيم بن هَزّال، وتفرد ابنه
يزيد بالرواية عنه، وقد صححها الحاكم والذهبي وحسنها الحافظ؛ كما رأيت، وأشار إلى ذلك عبد الحق الإشبيلى بإيراده الحديث من رواية النسائي، وسكوته عنها في كتابه «الأحكام الصغرى» (2/760) الذي اشترط فيه الصحة؛ كما هو معلوم من مقدمته.
وإن مما لا يرتاب فيه باحث محقق: أن توافر هذه الطرق على هذا المتن واجتماعها عليه؛ مما يلقي في الصدر الاطمئنان لصحته، ولا سيما وقد اقترن بها جزم رواية يزيد بن نعيم بن هزال بأنه حق.
ثم رأيت الشيخ ملا علي القاري نقل في «المرقاة» (4/82) عن صاحب «التنقيح» ـ
وهو ابن عبد الهادي ـ أنه قال:
«وإسناده صالح» .
ثم رأيت الحديث عند الطبراني في «المعجم الكبير» (22/201 ـ 202) من طريق محمد بن المنكدر وعكرمة بن عمار عن يزيد بن نعيم بن هزال عن جده هزال به مختصراً ومطولاً.
قلت: وبقي شيء يتعلق بفقه الحديث، وما المراد بقوله لهزال:
«لو سترته ... » ، فإن ظاهره غير مراد على إطلاقه؟! ولذلك فسره الباجي في «المنتقى» (7/135) بقوله:
«يريد مما أظهرته من إظهار أمره، وإخبار النبي - صلى الله عليه وسلم - وأبي بكر وعمر به، فكان ستره بأن يأمره بالتوبة، وكتمان خطيئته، وإنما ذكر فيه الرداء على وجه المبالغة، بمعنى: أنه لو لم تجد السبيل إلى ستره إلا بأن تستره بردائك ممن يشهد عليه؛ لكان
أفضل مما أتاه، وتسبب إلى إقامة الحد عليه. والله أعلم وأحكم» .
ونقله الحافظ في «الفتح» (12/125) عنه، وأقره.
والخلاصة؛ أن الحديث محمول على من كان مثل ماعز في الندم على ما فعل وليس من عادته الزنى، فينبغي الستر عنه، وعدم التشهير به؛ بخلاف من لا؛ ووصل أمره إلى إشاعته والتهتُّك، فهذا هو الذي لا يجوز الستر عليه، وينبغي رفع أمره إلى الحاكم ليقيم حكم الشارع الحكيم فيه. وانظر لهذا «المرقاة» (4/76) . *
নুআইম ইবনু হেয্যাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
মা’ইয ইবনু মালিক [এক এতিম ছিলেন] যিনি আমার পিতার (হেয্যাল-এর) তত্ত্বাবধানে ছিলেন। তিনি (মা’ইয) গোত্রের এক দাসীর সাথে ব্যভিচার করে ফেলেন। আমার পিতা (হেয্যাল) তাঁকে বললেন: তুমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে যাও এবং তুমি যা করেছ তা তাঁকে জানাও। হয়তো তিনি তোমার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করবেন। এর মাধ্যমে তিনি (হেয্যাল) আশা করছিলেন যে, তার (মা’ইয-এর) জন্য কোনো মুক্তির পথ বের হবে।
মা’ইয রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলেন এবং বললেন: "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি ব্যভিচার করেছি, সুতরাং আমার উপর আল্লাহর বিধান (কিতাবুল্লাহ) কায়েম করুন।" রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার থেকে মুখ ফিরিয়ে নিলেন। এরপর তিনি দ্বিতীয়বার আসলেন এবং বললেন: "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি ব্যভিচার করেছি, সুতরাং আমার উপর আল্লাহর বিধান কায়েম করুন।" এরপর তিনি তৃতীয়বার আসলেন এবং বললেন: "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি ব্যভিচার করেছি, সুতরাং আমার উপর আল্লাহর বিধান কায়েম করুন।" এরপর তিনি চতুর্থবার আসলেন এবং বললেন: "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি ব্যভিচার করেছি, সুতরাং আমার উপর আল্লাহর বিধান কায়েম করুন!"
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি চারবার স্বীকার করেছো। কার সাথে?" তিনি বললেন: অমুক মহিলার সাথে। রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞাসা করলেন: "তুমি কি তাকে জড়িয়ে ধরেছিলে?" তিনি বললেন: হ্যাঁ। তিনি বললেন: "তুমি কি তার সাথে সরাসরি মেলামেশা করেছিলে?" তিনি বললেন: হ্যাঁ। তিনি বললেন: "তুমি কি তার সাথে সহবাস করেছিলে?" তিনি বললেন: হ্যাঁ।
অতঃপর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে রজম (পাথর নিক্ষেপ করে শাস্তি) করার নির্দেশ দিলেন।
তাঁকে হাররাহ নামক স্থানে বের করে নিয়ে যাওয়া হলো। যখন রজম করা হচ্ছিল এবং তিনি পাথরের আঘাতের তাপ অনুভব করলেন, তিনি অস্থির হয়ে ছুটতে লাগলেন। আব্দুল্লাহ ইবনু উনাইস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর পিছু ধাওয়া করলেন—যদিও তার সঙ্গীরা তাকে ধরতে ব্যর্থ হয়েছিল। তিনি একটি উটের পায়ের হাড় তুলে নিলেন এবং তা দিয়ে আঘাত করে তাঁকে হত্যা করলেন।
এরপর আব্দুল্লাহ ইবনু উনাইস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে পুরো ঘটনা জানালেন। রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা কেন তাকে ছেড়ে দিলে না? হয়তো সে তাওবা করতো এবং আল্লাহ তার তাওবা কবুল করতেন।"
(রাবী বলেন:) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার পিতাকে (হেয্যাল-কে) দেখে বলেছিলেন: **"আল্লাহর শপথ, হে হেয্যাল! তুমি যদি তোমার কাপড় দিয়ে তাকে ঢেকে রাখতে, তবে তুমি যা করেছ তার চেয়ে সেটাই তোমার জন্য উত্তম হতো।"**
3461 - ـ (ثلاثةٌ لا يدخلونَ الجنَّةَ: الشّيخُ الزّانِي، والإِمامُ الكذّابُ، والعائلُ المزهوّ) .
أخرجه البزار في «مسنده: البحر الزخار» (6/493/2529) : حدثنا العباس ابن أبي طالب قال: أخبرنا مِنْجَاب بن الحارث قال: أخبرنا حفص بن غياث عن عاصم عن أبي عثمان عن سلمان رضي الله عنه، قال: قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : ... فذكره.
قلت: وهذا إسناد صحيح، رجاله ثقات رجال مسلم، غير العباس بن أبي طالب، وهو ثقة، وهو: ابن جعفر بن عبد الله البغدادي أبو محمد بن أبي طالب؛ وهو من شيوخ ابن ماجه، مترجم في «التهذيب» .
وقال المنذري في الترغيب (3/192/16) :
«رواه البزار بإسناد جيد» .
وقال الهيثمي (6/255) :
«رواه البزار، ورجاله رجال «الصحيح» ؛ غير العباس بن أبي طالب، وهو ثقة» .
قلت: وهو من الأحاديث التي لم يوردها الهيثمي في كتابه «كشف الأستار» ، وهو على شرطه، ولذلك فإني مما استدركته عليه في كتابي «صحيح كشف الأستار» ؛ يسر الله لي إتمامه مع قسيمه «ضعيف كشف الأستار» بمنه وكرمه وفضله!
وعزاه الدكتور محفوظ الرحمن في تعليقه على «البحر الزخار» لمعاجم الطبراني الثلاثة، وفاته التنبيه أنه آخر، وهو:
«ثلاثة لا ينظر الله إليهم يوم القيامة، ولا يزكيهم، ولهم عذاب أليم: أشيمط زانٍ، وعائل متكبر، ورجل جعل الله له بضاعة، فلا يبيع إلا بيمينه، ولا يشتري إلا بيمينه» .
أخرجه في «الكبير» (6/301/6111) ، و «الأوسط» (6/288/5573) ،
و «الصغير» (169 ـ هندية) من طريق سعيد بن عمرو الأشعثي قال: حدثنا حفص ابن غياث به. وقال:
«لم يروه عن عاصم إلا حفص، تفرد به سعيد بن عمرو» .
قلت: وهو ثقة أيضاً من شيوخ مسلم.
ومن طريقه: أخرجه البيهقي في «شعب الإيمان» (4/220/4852) .
وفي معناه أحاديث أخرى يزيد بعضهم على بعض، ساق بعضها أبو جعفر الطحاوي في «مشكل الآثار» (4/378 ـ 381) ؛ مبيناً أنه لا اختلاف بينهما؛
فراجعه إن شئت مزيداً من الفائدة. *
সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “তিন প্রকারের লোক জান্নাতে প্রবেশ করবে না: বৃদ্ধ ব্যভিচারী, মিথ্যাবাদী শাসক এবং অহংকারী দরিদ্র ব্যক্তি।”
3462 - ـ (لعنَ اللهُ مَنْ ذبَحَ لغيرِ اللهِ، لعَنَ اللهُ مَن غيَّرَ تُخُومَ الأرْضِ، لعَنَ اللهُ من كَمَه الأَعْمى عن السّبيلِ، لعَنَ اللهُ من سبَّ (وفي رواية: عقَّ) والديهِ، لعَنَ اللهُ مَنْ تولَّى غيْرَ موالِيه، [لعَنَ اللهُ مَنْ وَقَعَ على بهيمةٍ] ، لَعَنَ اللهُ من عمِلَ عَمَلَ قومِ لُوطٍ، [لعَنَ اللهُ مَنْ عَمِلَ عَمَلَ قوْمِ لوطٍ، لعَنَ اللهُ مَنْ عَمِلَ عَمَلَ قومِ لوطٍ] ) .
أخرجه الحاكم (4/356) ـ والسياق له ـ، والبيهقي في «السنن» (8/231) ،
و «الشعب» (4/254/5373) ، وأحمد (1/217 و 309 و 317) ، ـ والرواية الأخرى له ـ، وعبد بن حميد (1/513/587) ، وأبو يعلى (4/414 ـ 415/2539) ، ومن طريقه ابن حبان (43/53) ، والطبراني في «المعجم الكبير» (11/218/17546) من طرق عن عمرو بن أبي عمرو عن عكرمة عن ابن عباس: أن رسول الله - صلى الله عليه وسلم - قال: ... فذكره.
والزيادة الأولى للبيهقي وعبد بن حميد والطبراني ورواية لأحمد والحاكم، وقال الحاكم:
«صحيح الإسناد» ، ووافقه الذهبي.
والزيادة الأخرى لهم جميعاً ـ إلا الحاكم ـ، وهي والتي قبلها أخرجهما النسائي في «السنن الكبرى» (4/322/7337 و 7338) دون ما قبلهما، وكذا الخرائطي في «مساوئ الأخلاق» (203/443) .
قلت: والحديث أعله المعلق على «مسند عبد بن حميد» بـ (عمرو بن أبي عمرو) هذا فقال:
«وثقه قوم، وضعفه آخرون» !
وفيه جَنَفٌ وظلم للسُّنَّة ورواتها، فليس كل من تكلم فيه بعضهم يعل به حديثه، فكم من راوٍ من رواة الشيخين، قد تكلم فيه بعض الأئمة، ومنهم هذا، بل وشيخه عكرمة أيضاً؟! وإنما ينبغي في هذه الحالة الرجوع إلى علم الجرح والتعديل وأصوله ممن كان عالماً به، مع الاستعانة بالحفاظ الذين سبقونا في هذا المجال، خلافاً لبعض الأغرار ممن يظنون أنهم على شئ من هذا العلم، وهم لم يشموا رائحته بعد. فهذا هو الحافظ الذهبي عندما ترجم لـ (عمرو) هذا؛ صدرها بقوله:
«صدوق، حديثه مخرج في «الصحيحين» ؛ في الأصول» .
ثم ساق أقوال الأئمة فيه، ثم عقب عليها بقوله:
«حديثه صالح حسن منحط عن الدرجة العليا من الصحيح» .
ولذلك؛ أورده في رسالته القيمة «الرواة المتكلم فيهم بما لا يوجب الرد» (155/264) .
ونحوه قول الحافظ في «التقريب» .
«ثقة، ربما وهم» .
وللحديث شاهد من حديث أبي هريرة مرفوعاً بتمامه؛ إلا أنه ذكر مكان جملة: «الأعمى» قوله: «ملعون من جمع بين امرأة وابنتها» ؛ وفي إسناده ضعيفان، ولذلك خرجته في «الضعيفة» (5368) ؛ لأني لم أجد لهذه الجملة منه شاهداً، وكذلك طرفه الأول منه.
وللجملة الأولى منه، والثانية، وكذلك الرابعة لكن بلفظ:
«لعن الله من لعن والديه» .
لهذه الثلاثة شاهد صحيح من حديث علي رضي الله عنه مرفوعاً في حديث أخرجه مسلم (6/85) وغيره، وهو مخرج في «نقد نصوص الكتاني» (ص 42) .
وإن من تخاليط المعلقين الثلاثة على «الترغيب» وجهلهم بفن التخريج، فضلا عن علم الجرح والتعديل، والتصحيح والتضعيف: قولهم في تخريج حديث الترجمة (3/249) :
«رواه ابن حبان في «صحيحه» ، والبيهقي في «الشعب» ، والنسائي (7/232) من حديث علي» !!
قلت: ففيه جهالات:
أولاً: خلطوا حديث علي مع حديث ابن عباس، فلا يدري القراء مَن مِن الثلاثة أخرج حديث علي، ومن الذي أخرج حديث ابن عباس؟!
ثانياً: اقتصارهم على النسائي في العزو لحديث علي يوهم أنه لم يروه من هو أولى بالعزو منه، وليس كذلك؛ فقد رواه مسلم أيضاً؛ كما قدمت آنفاً.
ثالثاً: يوهم أيضاً أن حديث علي فيه الفقرات السبع التي في حديث ابن عباس، والواقع أنه ليس فيه إلا ثلاث على ما سبق بيانه.
رابعاً: أغمضوا عيونهم عن تخريج رواية النسائي عن ابن عباس، وقد ذكرها المنذري في تخريجه للحديث بقوله (3/198/5) :
«رواه ابن حبان في «صحيحه» ، والبيهقي، وعند النسائي آخره مكرراً» .
خامساً: لم يستدركوا الزيادة الأولى التي عند البيهقي، مع أنهم عزوا الحديث إليه بالجزء والرقم! فما أنشطهم في اجترار ما يقوله المنذري من التخريج، وإعادته
إياه في التعليق، وفي تسويد السطور بزيادة الأجزاء والصفحات والأرقام، نقلاً من الفهارس بدون فائدة تذكر! والله المستعان. *
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:
আল্লাহ তাকে লানত (অভিসম্পাত) করেন যে আল্লাহ ছাড়া অন্যের নামে যবেহ করে।
আল্লাহ তাকে লানত করেন যে জমিনের সীমাচিহ্ন (সীমানা) পরিবর্তন করে।
আল্লাহ তাকে লানত করেন যে অন্ধকে তার রাস্তা থেকে পথভ্রষ্ট করে দেয়।
আল্লাহ তাকে লানত করেন যে তার পিতামাতাকে গালি দেয় (অন্য বর্ণনায়: যে পিতামাতার অবাধ্য হয়)।
আল্লাহ তাকে লানত করেন যে তার আসল অভিভাবক/পৃষ্ঠপোষক (মাওয়ালী) ব্যতীত অন্য কারো প্রতি আনুগত্য প্রকাশ করে।
আল্লাহ তাকে লানত করেন যে পশুর সাথে সঙ্গম করে।
আল্লাহ তাকে লানত করেন যে কওমে লূতের (লূত আঃ-এর জাতির) মতো কাজ করে।
(অন্য বর্ণনায় এই শেষ বাক্যটি তিনবার বলা হয়েছে: আল্লাহ তাকে লানত করেন যে কওমে লূতের মতো কাজ করে।)
3463 - ـ (مَنْ كشَفَ سِتْراً، فأَدخَلَ بصَرَه في البيْتِ قبْلَ أن يؤْذَنَ له، فرأَى عورةَ أهلِه؛ فقدْ أتَى حدّاً لا يحلُّ له أنْ يأْتيَه؛ لو أنه حينَ أدخَلَ بصَرَهُ استقبلَه رجلٌ ففقأَ عينَه ما غَيَّرت عليه، وإنْ مرَّ الرّجلُ على بابٍ لا ستْرَ له غيرَ مغْلَقٍ فنظَر فلا خطيئةَ عليه؛ إنما الخطيئةُ على أهْلِ البيْتِ) .
أخرجه الترمذي (2707) : حدثنا قتيبة: حدثنا ابن لهيعة عن عبيد الله ابن أبي جعفر عن أبي عبد الرحمن الحُبُلي عن أبي ذر قال: قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : ... فذكره.
وأخرجه أحمد (5/181) من طريقين آخرين عن ابن لهيعة به.
وقال الترمذي:
«حديث غريب، لا نعرفه إلا من حديث ابن لهيعة» .
قلت: هو صدوق ثقة؛ لكنه كان قد أصيب بسوء الحفظ، فمن حدث عنه قبل ذلك، أو من كتابه؛ فحديثه صحيح، ومنهم العبادلة، وألحق بهم بعضهم غيرهم، مثل قتيبة بن سعيد؛ كما تقدم نقله عن الحافظ الذهبي غير مرة، وهذا من روايته عنه كما ترى، فالحديث غريب صحيح، وقد كنت ضعفته في بعض التخريجات القديمة مثل «غاية المرام» (423) ، وقبل اطلاعي على فائدة الذهبي المذكورة، ولذلك صرت بعدها أحاول الانتباه لها في كل الأحاديث التي يذكر
فيها (ابن لهيعة) ؛ راجياً من الله التوفيق والسداد.
وللشطر الأول منه شاهد من حديث أبي هريرة نحوه بألفاظ متقاربة، أخرجه ابن أبي عاصم في «الديات» (48) من طرق عنه، وأحدها مخرج في «الإرواء» (5/254/1428) من رواية الشيخين وغيرهما.
والحديث قال المنذري في «الترغيب» (3/272/2) :
«رواه أحمد، ورواته رواة «الصحيح» إلا ابن لهيعة، ورواه الترمذي وقال:
«حديث غريب حسن، لا نعرف إلا من حديث ابن لهيعة» ... » . *
من صفات المتحابين في الله ومنزلتهم عند الله
আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:
যে ব্যক্তি পর্দা সরিয়ে বা তুলে অনুমতি নেওয়ার পূর্বেই ঘরে নিজের দৃষ্টি প্রবেশ করালো এবং ঘরের বাসিন্দাদের গোপনীয়তা (আওরাত) দেখে ফেলল, সে এমন একটি সীমালঙ্ঘন করল যা তার জন্য হালাল ছিল না। সে যখন তার দৃষ্টি প্রবেশ করালো, তখন যদি ঘরের কোনো ব্যক্তি তার চোখ ফুঁড়ে দিত বা অন্ধ করে দিত, তবে এর জন্য তার বিরুদ্ধে কোনো প্রকার পরিবর্তন বা দণ্ড ধার্য করা হতো না।
আর যদি কোনো ব্যক্তি এমন দরজার পাশ দিয়ে অতিক্রম করে যেখানে কোনো পর্দা নেই এবং যা বন্ধও নয়, আর সে যদি দেখে ফেলে, তবে তার কোনো পাপ নেই; বরং পাপ হবে ঘরের বাসিন্দাদের উপর।
3464 - ـ (إنّ للهِ عباداً ليسُوا بأنْبياءَ ولا شهداءَ، يغبِطُهم الشهداءُ والأنبياءُ يومَ القيامةِ؛ لقربِهم مِنَ الله تعالى ومجلِسهم منه.
فجثَا أعرابيٌّ على ركْبتيه فقالَ: يا رسولَ الله! صفْهم لنا، وجَلِّهم لنا؟! قال:
قومٌ من أفْناءِ النّاسِ؛ مِن نُزَّاعِ القَبائلِ، تصادقُوا في اللهِ، وتحابُّوا فيه، يضعُ اللهُ عزّ وجلّ لهم يومَ القيامةِ منابرَ من نورٍ، يخافُ الناسُ ولا يخافونَ، هم أولياءُ اللهِ عزّ وجلّ `الذين لا خوفٌ عليهم ولا هُم يحْزنُون`) .
أخرجه الحاكم في «المستدرك» (4/170 ـ 171) : حدثنا أبو عبد الله محمد ابن عبد الله الزاهد الأصبهاني: ثنا أحمد بن يونس الضبي بـ (أصبهان) : ثنا أبو
بدر شجاع بن الوليد قال: سمعت زياد بن خيثمة يحدث عن أبيه عن ابن عمر رضي الله عنهما قال: قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : ... فذكره. وقال:
«صحيح الإسناد ولم يخرجاه» ، ووافقه الذهبي.
قلت: وهو كما قالا، رجاله ثقات مترجمون في «التهذيب» ؛ إلا من دون أبي بدر.
أما أحمد بن يونس الضبي؛ فقال ابن أبي حاتم (1/1/81) :
«سمعنا منه، وكان محله عندنا الصدق» .
وذكره ابن حبان في «الثقات» (8/51) ، وقال:
«روى عنه الأصبهانيون» .
وله ترجمة في «أخبار أصبهان» (1/81) ، و «تاريخ بغداد» (5/223 ـ 224) ، و «أعلام النبلاء» (12/595 ـ 596) .
وأما أبو عبد الله محمد بن عبد الله الزاهد الأصبهاني؛ فهو الصَّفَّار، أكثر عنه الحاكم، ووصفه الحافظ الذهبي في «الأعلام» (15/437) بـ:
«الإمام المحدث القدوة ... » .
وللحديث شواهد:
منها: عن أبي هريرة قال: قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : ... فذكره ببعض اختصار، وقال في آخره:
«لا يخافون إن خاف الناس، ولا يحزنون إن حزن الناس» ، ثم تلا هذه الآية:
`ألا إن أولياء الله لا خوف عليهم ولا هم يحزنون`.
أخرجه النسائي في «الكبرى» (6/362/11236) ، وأبو يعلى في «مسنده» (10/495/6110) ، ومن طريقه ابن حبان (2508) ، والطبري في «التفسير» (11/92 ـ الأميرية) ، وابن أبي الدنيا في «الإخوان» (45/5) ، والبيهقي في «الشعب» (6/485/8997) من طرق عن محمد بن فُضَيْل عن أبيه عن عُمَارة بن القعقاع عن أبي زرعة عنه به.
قلت: وإسناده صحيح على شرط الشيخين، وأعله البيهقي بما لا يقدح.
ومنها: عن أبي مالك الأشعري؛ يرويه عبد الحميد بن بهرام عن شهر بن حوشب: ثنا عبد الرحمن بن غَنْمٍ عنه.
أخرجه أحمد (5/343) ، والبيهقي في «الشعب» (6/486/9001) و «الأسماء والصفات» (ص 467) ، والطبراني في «المعجم الكبير» (3/329/3433) ، والبغوي في «التفسير» (4/139 ـ140) و «شرح السنة» (13/50/3464) كلهم من طريق عبد الرزاق، وهذا في «المصنف» (11/201 ـ202 /20324) عن معمر، وعبد الله بن المبارك في «الزهد» (248/714) ، وابن أبي الدنيا أيضاً (6) عن علي بن الجعد؛ ثلاثتهم (معمر وابن المبارك وابن الجعد) عن شهر به.
قلت: وهذا إسناد حسن في الشواهد؛ لسوء حفظ شهر بن حوشب.
وتسامح المنذري فقال في «الترغيب» (4/48/22) :
«رواه أحمد، وأبو يعلى بإسناد حسن، والحاكم، وقال: صحيح الإسناد» !
وعزوه للحاكم سهو أو تسامح آخر؛ فإنه لم يروه عن أبي مالك؛ وإنما عن ابن عمر؛ كما تقدم. *
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: নিশ্চয় আল্লাহর কিছু বান্দা আছেন, যারা নবীও নন এবং শহীদও নন। কিয়ামতের দিন শহীদগণ এবং নবীগণ তাঁদের প্রতি ঈর্ষান্বিত হবেন; আল্লাহ তাআলার নৈকট্য এবং তাঁর নিকট তাঁদের মর্যাদাপূর্ণ স্থানের কারণে।
তখন একজন বেদুঈন হাঁটু গেড়ে বসে আরয করল: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি তাদের পরিচয় দিন এবং আমাদের কাছে তাদের স্পষ্ট করে বর্ণনা করুন!
তিনি বললেন: তারা হলো সমাজের বিভিন্ন স্তরের সাধারণ মানুষ; বিভিন্ন গোত্রের বিচ্ছিন্ন লোক। তারা আল্লাহর সন্তুষ্টির জন্য বন্ধুত্ব স্থাপন করেছে এবং তাঁরই জন্য একে অপরের সাথে ভালোবাসা বজায় রেখেছে। আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা কিয়ামতের দিন তাদের জন্য নূরের মিম্বর স্থাপন করবেন। যখন মানুষ ভয় পাবে, তখন তারা নির্ভয় থাকবে। এরাই হলো আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লার সেই ওলী, ‘যাদের কোনো ভয় নেই এবং তারা চিন্তিতও হবে না।’
3465 - ـ (من شَفَعَ لأَخِيه بشفَاعةٍ، فأهْدى له هديّةً عليها؛ فقَبِلها؛ فقدْ أتَى باباً عظِيماً منْ أبوابِ الرِّبا) .
أخرجه أبو داود (3541) من طريق عمر بن مالك عن عبيد الله بن أبي جعفر عن خالد بن أبي عمران عن القاسم عن أبي أمامة عن النبي - صلى الله عليه وسلم - قال: ... فذكره.
قلت: وهذا إسناد حسن، رجاله كلهم ثقات رجال مسلم؛ غير القاسم ـ وهو ابن عبد الرحمن أبو عبد الرحمن صاحب أبي أمامة ـ، وهو حسن الحديث كما استقر عليه رأي الحفاظ مع الخلاف المعروف فيه قديماً. ولذلك ساقه شيخ الإسلام ابن تيمية مساق المسلمات في بعض كتاباته، انظر مثلاً «مجموع الفتاوى» (31/286) .
وتابع عمرَ بنَ مالكٍ ابنُ لهيعة: ثنا عبيد الله بن أبي جعفر به.
أخرجه أحمد (5/261) .
وتابع ابنَ أبي جعفر عبيدُ الله بنُ زَحْر عن عليّ بن يزيد عن قاسم به.
أخرجه الطبراني في «المعجم الكبير» (8/251/7853 و 283/7928) ، وعنه الشَّجَري في «الأمالي» (2/236) .
هذا؛ وقد ترجم أبو داود للحديث بقوله:
«باب في الهدية لقضاء الحاجة» .
وعليه أقول: إن هذه الحاجة هي التي يجب على الشفيع أن يقوم بها لأخيه، كمثل أن يشفع له عند القاضي أن يرفع عنه مظلمة، أو أن يوصل إليه حقه، ونحو ذلك مما بسط القول فيه ابن تيمية ـ رحمه الله ـ في المكان المشار إليه آنفاً؛ فليرجع إليه من شاء.
وقد يتبادر لبعض الأذهان أن الحديث مخالف لقوله - صلى الله عليه وسلم - : «من صنع إليكم
معروفاً؛ فكافئوه، فإن لم تستطيعوا أن تكافئوه؛ فادعوا له حتى تعلموا أن قد كافأتموه» . رواه أبو داود وغيره، وتقدم تخريجه برقم (254) .
فأقول: لا مخالفة، وذلك بأن يحمل هذا على ما ليس فيه شفاعة، أو على ما ليس بواجب من الحاجة. والله أعلم.
(تنبيه) : لقد اشتط ابن الجوزي وغلا في قوله في تضعيفه لهذا الحديث وقوله في «العلل» (2/268) :
«عبيد الله ضعيف عظيم، والقاسم أشد ضعفاً منه» !
قلت: عبيد الله وثقه الجمهور، وقول أحمد فيه: «ليس بالقوي» ؛ لا يعني أنه ضعيف، وإنما أنه ليس صحيح الحديث، بل حسن؛ بدليل قوله في رواية عنه: «لا بأس به» ، ولذلك؛ ذكره الذهبي في «المتكلم فيهم بما لا يوجب الرد» (142/225) ، وحسبك أن الشيخين احتجا به.
وأما القاسم؛ فهو وسط كما تقدم. *
আবু উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যে ব্যক্তি তার কোনো ভাইয়ের জন্য (কোনো বিষয়ে) সুপারিশ করলো, অতঃপর সে (যার জন্য সুপারিশ করা হলো) এর বিনিময়ে তাকে কোনো উপহার দিলো এবং (সুপারিশকারী) তা গ্রহণ করলো, তবে সে সুদের (রিবা’র) দরজাগুলোর মধ্য হতে একটি বিরাট দরজায় প্রবেশ করলো।”
3466 - ـ (كانُوا إذا فَزِعوا فَزِعُوا إلى الصلاةِ. يعني: الأنبياءَ) .
أخرجه أبو بكر الإسماعيلي في «المعجم» (ق 33/2 ـ 34/1) : حدثنا محمد ابن السَّرِيِّ: حدثنا أحمد بن إبراهيم الدَّوْرَقي: حدثنا عبد الرحمن بن مهدي عن سليمان بن المغيرة عن ثابت عن عبد الرحمن بن أبي ليلى عن صهيب عن النبي - صلى الله عليه وسلم - قال: ... فذكره.
قلت: وهذا إسناد صحيح، رِجاله كلهم ثقات رجال مسلم؛ غير محمد بن السري ـ وهو ابن سهل القَنْطَري أبو بكر ـ، ترجمه الخطيب في «التاريخ» (5/318) ،
وروى عن الدارقطني أنه سئل عنه؟ فقال:
«ثقة» .
والحديث قطعة من حديث طويل أخرجه الإمام أحمد في «المسند» قال (6/16) : ثنا عبد الرحمن بن مهدي به. وقال (4/333) : ثنا عفان ـ من كتابه ـ قال: ثنا سليمان ـ يعني: ابن المغيرة ـ بتمامه، وهو مخرج في «الصحيحة» برقم (2459) . *
সুহাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (নবীগণ) যখন কোনো বিষয়ে ভীত বা চিন্তিত হতেন, তখন তাঁরা নামাযের (সালাতের) দিকে মনোনিবেশ করতেন।