হাদীস বিএন


সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ





সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (521)


521 - ` انطلقوا بنا إلى البصير الذي في بني واقف نعوده. قال: وكان رجلا أعمى `.
أخرجه أبو سعيد بن الأعرابي في ` معجمه ` (ق 133 / 1) أنبأنا ابن عفان أنبأنا
حسين الجعفي عن سفيان بن عيينة عن عمرو بن دينار عن جابر مرفوعا.
قلت: وهذا إسناد صحيح رجاله كلهم ثقات رجال الشيخين غير ابن عفان هذا وهو
الحسن بن علي بن عفان العامري كما في موضع آخر من ` المعجم ` (135 / 2) وهو
صدوق كما قال الحافظ في ` التقريب ` وقد توبع فأخرجه السلفي في ` الطيوريات `
(ق 174 / 1) من طريقين آخرين عن حسين بن علي الجعفي به. وقال:
` قال ابن
صاعد: وقوله: عن جابر بن عبد الله وهم والصحيح عن محمد بن جبير بن مطعم `.
ثم رواه السلفي من طريق ابن صاعد عن سعيد ابن عبد الرحمن وعبد الجبار بن
العلاء: أنبأنا سفيان عن عمرو عن محمد بن جبير مرسلا به.
قلت: وقال ابن وهب في ` الجامع ` (38) : وسمعت سفيان بن عيينة يحدث عن
عمرو به.
ثم رواه السلفي من طريق إبراهيم بن بشار أنبأنا سفيان بن عيينة أنبأنا عمرو بن
دينار عن محمد بن جبير بن مطعم عن أبيه مرفوعا. فزاد في السند: ` عن أبيه `
فصيره مسندا عن جبير بن مطعم. وإبراهيم بن بشار هو الرمادي وهو ثقة حافظ
وله أوهام كما في ` التقريب ` وقد تابعه محمد بن يونس الجمال كما في تاريخ
بغداد (7 / 431) للخطيب وقال: ` والمحفوظ عن محمد بن جبير فقط `.
قلت: الأرجح عندي أنه عن جابر كما رواه الجعفي وهو ثقة محتج به في
` الصحيحين `. ولم يتفرد به حتى يحكم عليه بالوهم، فقد أخرجه الخطيب من طريق
الدارقطني: حدثنا محمد بن مخلد - ولم نسمعه إلا منه - حدثنا ابن علويه الصوفي
الحسن بن منصور حدثنا سفيان بن عيينة به وقال الدارقطني: تفرد به ابن مخلد عن
ابن علويه عن ابن عيينة وهو معروف برواية حسين الجعفي عن ابن عيينة `.
قلت: وهذا إسناد صحيح كسابقه، الحسن بن منصور من شيوخ البخاري في ` صحيحه `
وابن مخلد وهو العطاء الدوري ثقة حافظ. فهي متابعة قوية لرواية الجعفي من
الحسن بن منصور وإذا كان قد خالفهما سعيد بن عبد الرحمن وهو ابن حسان وعبد
الجبار بن العلاء كما تقدم، فإن معهما من المرجحات ما ليس مع
مخالفيهما من ذلك
أنهما من رجال ` الصحيح ` والآخران ليسا كذلك ومنه أن معهما زيادة وهي الوصل
والزيادة من الثقة مقبولة فكيف من ثقتين؟
فإن قيل: فهلا رجحت بهذه الطريقة نفسها رواية إبراهيم بن بشار التي أسندها عن
جبير بن مطعم؟ أقول: كنت أفعل ذلك لو أن الذي تابعه وهو محمد بن يونس الجمال
كان ثقة أما وهو ضعيف كما في التقريب فتبقى روايته مرجوحة لتجردها عن المتابع
القوي. ومع ذلك فإنه يمكن اعتبار روايته مرجحا آخر لرواية الجعفي والحسن بن
منصور على ما خالفهما بجامع الاشتراك في إسناد الحديث ومخالفة من أرسله غاية
ما في الأمر أنه وقع في روايته أن صحابي الحديث جبير بن مطعم وفي روايتهما:
جابر بن عبد الله ` فترجح روايتهما على روايته بالكثرة والثقة. والله أعلم.
والحديث أورده المنذري في ` الترغيب ` (3 / 240) من رواية جبير ابن مطعم
وقال: ` رواه البزار بإسناد جيد `!
وقد عرفت أن الأرجح من حديث جابر بن عبد الله.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন:

"তোমরা আমাদের সাথে বানু ওয়াকিফ গোত্রে অবস্থিত ’আল-বাসীর’ (অর্থাৎ দৃষ্টিশক্তিহীন) ব্যক্তির কাছে চলো, আমরা তাকে দেখতে যাব।" [বর্ণনাকারী] বলেন: "এবং তিনি ছিলেন একজন অন্ধ পুরুষ।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (522)


522 - ` إن المسلم المسدد ليدرك درجة الصوام القوام بآيات الله عز وجل لكرم ضريبته
وحسن خلقه `.
أخرجه الإمام أحمد (2 / 220) : حدثنا علي بن إسحاق حدثنا عبد الله أنبأنا بن
لهيعة أخبرني الحارث بن يزيد عن ابن حجيرة الأكبر عن عبد الله ابن عمرو
قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: فذكره.
ثم أخرجه (2 / 177) من طريقين آخرين صحيحين عن ابن لهيعة به.
قلت: وهذا إسناد صحيح رجاله كلهم ثقات وابن لهيعة واسمه عبد الله وإن كان
قد ساء حفظه إلا أن عبد الله هذا وهو ابن المبارك صحيح الحديث عنه لأنه
سمع
منه قديما كما نبه على ذلك الحافظ عبد الغني ابن سعيد وغيره.
ولم يتنبه لهذا المنذري في ` الترغيب ` (3 / 257) ثم الهيثمي في ` المجمع `
(8 / 22) فأعلاه بابن لهيعة!
وعزاه الثاني منهما للطبراني أيضا في ` الكبير ` و ` الأوسط ` وقال:
` وبقية رجاله رجال الصحيح `.
والحديث أخرجه أيضا الخرائطي في ` مكارم الأخلاق ` (ص 9 / 60) عن ابن لهيعة
. وله شاهد من حديث أبي هريرة مرفوعا بلفظ: ` إن الله ليبلغ العبد بحسن خلقه
درجة الصوم والصلاة `. أخرجه الحاكم (1 / 60) وقال: ` صحيح على شرط مسلم
`. ووافقه الذهبي وهو كما قالا. وأخرجه هو وغيره من حديث عائشة مرفوعا
نحوه بلفظ: ` درجات قائم الليل صائم النهار `. وقال أيضا: ` صحيح على شرط
مسلم ` ووافقه الذهبي وصححه ابن حبان (1927) .




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: নিশ্চয়ই সেই সুশৃঙ্খল (সঠিক পথের অনুসারী) মুসলিম ব্যক্তি তার মহৎ স্বভাব ও সুন্দর চরিত্রের কারণে আল্লাহ্ তা‘আলার নৈকট্য অর্জনকারী সদা রোজা পালনকারী এবং (রাতের বেলা) নামাযে দণ্ডায়মানদের মর্যাদা লাভ করে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (523)


523 - ` يا عائشة ارفقي، فإن الله إذا أراد بأهل بيت خيرا دلهم على باب الرفق `.
أخرجه أحمد (6 / 104) حدثنا أبو سعيد قال: حدثنا سليمان يعني ابن بلال عن
شريك يعني ابن أبي نمر عن عطاء بن يسار عن عائشة أن رسول الله صلى الله
عليه وسلم قال لها:
قلت: وهذا إسناد على شرط البخاري وفي شريك وهو ابن عبد الله ابن أبي نمر
كلام من قبل حفظه لكنه لم يتفرد بالحديث، فقال أحمد أيضا (6 / 71) :
حدثنا هيثم بن خارجة قال: حدثنا حفص بن ميسرة عن هشام بن عروة عن أبيه عن
عائشة أنها قالت قال رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكره إلا أنه قال: ` أدخل
عليهم الرفق `. وبهذا اللفظ أورده المنذري (3 / 262) من حديث عائشة وقال:
` رواه أحمد والبزار من حديث جابر ورواتهما رواة الصحيح `.
ونحوه في ` مجمع الزوائد ` (8 / 19) للهيثمي وإسناد أحمد الثاني صحيح على
شرط البخاري.
وسبب الحديث ما روى المقدام بن شريح عن أبيه قال: سألت عائشة رضي الله عنها
عن البداوة فقالت: ` كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يبدو إلى هذه التلاع
وإنه أراد البداوة مرة، فأرسل إلى ناقة مرحمة من إبل الصدقة فقال لي: يا
عائشة ارفقي، فإن الرفق لم يكن في شيء قط إلا زانه ولا نزع من شيء قط إلا
شانه `.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁকে বললেন:

"হে আয়েশা! তুমি নম্র হও। কেননা, নম্রতা যখন কোনো কিছুতে থাকে, তা তাকে কেবলই শোভিত করে। আর যখন তা কোনো কিছু থেকে ছিনিয়ে নেওয়া হয়, তখন তা তাকে কেবলই ত্রুটিপূর্ণ করে তোলে। নিশ্চয় আল্লাহ যখন কোনো পরিবারের কল্যাণ চান, তখন তিনি তাদের নম্রতার পথে পরিচালিত করেন।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (524)


524 - ` كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يبدو إلى هذه التلاع وإنه أراد البداوة
مرة، فأرسل إلى ناقة محرمة من إبل الصدقة فقال لي: يا عائشة ارفقي، فإن
الرفق لم يكن في شيء قط إلا زانه ولا نزع من شيء قط إلا شانه `.
أخرجه أبو داود (2478) والسياق له وأحمد (6 / 58 / 222) من طريق شريك عن
المقدام. وشريك سيء الحفظ لكن تابعه شعبة عند مسلم (8 /




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম এই ঢালু ভূমিগুলিতে (উপত্যকার দিকে) মাঝে মাঝে গমন করতেন। একবার তিনি খোলা প্রান্তরে যাওয়ার ইচ্ছা করলেন। তখন তিনি সাদকার উটগুলির মধ্য থেকে একটি অনারোহণযোগ্য (সওয়ার হওয়া নিষেধ এমন) উট আনতে পাঠালেন। অতঃপর তিনি আমাকে বললেন: “হে আয়িশা! নম্রতা অবলম্বন করো। কেননা নম্রতা কোনো বস্তুতে থাকলে, তা অবশ্যই তাকে সৌন্দর্যমণ্ডিত করে তোলে এবং তা কোনো কিছু থেকে ছিনিয়ে নেওয়া হলে, তা অবশ্যই তাকে কলঙ্কিত করে দেয়।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (525)


525 - ` ما من مسلمين يلتقيان فيتصافحان إلا غفر لهما قبل أن يتفرقا `.
أخرجه أبو داود (5212) والترمذي (2 / 121) وابن ماجه (3703) وأحمد
(4 / 289 / 303) وابن عدي (31 / 1) من طريق الأجلح عن أبي إسحاق عن
البراء بن عازب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكره وقال
الترمذي:
` حديث حسن غريب من حديث أبي إسحاق عن البراء وقد روي عن البراء من
غير وجه والأجلح هو ابن عبد الله بن حجية بن عدي الكندي `.
قلت: وهو مختلف فيه وهو حسن الحديث إن شاء الله لكن شيخه أبا إسحاق وهو
عمرو بن عبد الله السبيعي كان اختلط ولا أدري سمع منه قبل الاختلاط أم بعده
ثم هو إلى ذلك مدلس وقد عنعنه.
ومن طرقه التي أشار إليها الترمذي ما أخرجه أحمد (4 / 289) من طريق مالك عن
أبي داود قال: ` لقيت البراء بن عازب فسلم علي وأخذ بيدي وضحك في وجهي قال:
تدري لم فعلت هذا بك؟ قال: قلت: لا أدري ولكن لا أراك فعلته إلا لخير قال:
إنه لقيني رسول الله صلى الله عليه وسلم ففعل بي مثل الذي فعلت بك فسألني؟
فقلت مثل الذي قلت لي، فقال: ما من مسلمين يلتقيان فيسلم أحدهما على صاحبه
ويأخذ بيده لا يأخذه إلا لله عز وجل لا يتفرقان حتى يغفر لهما `.
ولكنه إسناد واه جدا أبو داود وهو الأعمى يسمى نفيع متروك كما قال الحافظ في
` التقريب ` وبه أعله المنذري في ` الترغيب ` (3 / 270) ثم الهيثمي في
` المجمع ` (8 / 37) وعزواه للطبراني فقط في ` الأوسط `!
ومنها ما عند أحمد (4 / 293) من طريق زهير عن أبي بلج يحيى ابن أبي سليم
قال: حدثنا أبو الحكم على البصري عن أبي بحر عن البراء أن رسول الله صلى الله
عليه وسلم قال: ` أيما مسلمين التقيا، فأخذ أحدهما بيد صاحبه، ثم حمد الله
تفرقا ليس بينهما خطيئة `.
قال ابن أبي حاتم عن أبيه (2 / 274) :
` قد جود زهير هذا الحديث ولا أعلم
أحدا جوده كتجويد هذا. قلت لأبي: هو محفوظ؟ قال: زهير ثقة `.
قلت: وزهير هو ابن معاوية وقد خولف في إسناده، فرواه هشيم عن أبي بلج عن
زيد أبي الحكم العنزي عن البراء به نحوه. أخرجه أبو داود (5311) .
ورجح الحافظ في ` التعجيل ` (ص




বারাআ ইবনু আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: এমন দুজন মুসলিম নেই যারা পরস্পরের সাথে সাক্ষাৎ করে মুসাফাহা (হ্যান্ডশেক) করে, কিন্তু তারা বিচ্ছিন্ন হওয়ার পূর্বেই তাদের ক্ষমা করে দেওয়া হয়।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (526)


526 - ` إن المؤمن إذا لقي المؤمن فسلم عليه وأخذ بيده فصافحه تناثرت خطاياهما كما
يتناثر ورق الشجر `.
ذكره المنذري في ` الترغيب ` (3 / 270) ثم الهيثمي في ` المجمع ` (8 / 36)
من رواية الطبراني في ` الأوسط ` عن حذيفة، فقال الأول منهما: ` ورواته
لا أعلم فيهم مجروحا `. وقال الآخر: ` ويعقوب بن محمد بن الطحلاء روى عنه
غير واحد ولم يضعفه أحد وبقية رجاله ثقات `.
قلت: وفي هذا الكلام غرابة، فإنه إنما يقال في الراوي: ` روى عنه غير واحد
ولم يضعفه أحد `، إذا كان مستورا غير معروف بتوثيق. وليس كذلك ابن طحلاء
فقد وثقه أحمد وابن معين وأبو حاتم وغيرهم واحتج به مسلم ولذلك فإني أخشى
أن يكون يعقوب بن محمد هذا هو غير ابن الطحلاء. والله اعلم.
وقد وجدت للحديث طريقا أخرى يتقوى بها، فقال عبد الله بن وهب في ` الجامع `
(




হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় যখন কোনো মুমিন অন্য মুমিনের সাথে সাক্ষাৎ করে, অতঃপর তাকে সালাম দেয় এবং তার হাত ধরে মুসাফাহা করে, তখন তাদের উভয়ের গুনাহসমূহ এমনভাবে ঝরে পড়ে, যেভাবে গাছের পাতা ঝরে পড়ে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (527)


527 - ` قد أقبل أهل اليمن وهم أرق قلوبا منكم (قال أنس) : وهم أول من جاء
بالمصافحة `.
أخرجه البخاري في ` الأدب المفرد ` (967) وأحمد (3 /




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: (নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন) "ইয়েমেনের লোকেরা এসেছে, আর তারা তোমাদের চেয়ে অধিক নরম হৃদয়ের অধিকারী।" (আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন,) "আর তারাই হলো সর্বপ্রথম মুসাফাহা (হ্যান্ডশেক) প্রবর্তনকারী।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (528)


528 - ` لا تلعن الريح فإنها مأمورة وإنه من لعن شيئا ليس له بأهل رجعت اللعنة
عليه `.
أخرجه أبو داود (4708) : حدثنا مسلم بن إبراهيم حدثنا أبان الحديث وحدثنا
زيد بن أخزم الطائي حدثنا بشر بن عمر حدثنا أبان بن يزيد العطار حدثنا قتادة عن
أبي العالية - قال زيد: عن ابن عباس - ` أن رجلا نازعته الريح رداءه على
عهد النبي صلى الله عليه وسلم فلعنها فقال النبي صلى الله عليه وسلم ... `
فذكره. وأخرجه الترمذي (1 / 357) حدثنا زيد بن أخزم الطائي البصري به
وأخرجه الطبراني في ` الكبير ` (3 /




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:
"তোমরা বাতাসকে অভিশাপ দিও না। কেননা সে (আল্লাহর পক্ষ থেকে) আদিষ্ট। আর যে ব্যক্তি কোনো বস্তুকে অভিশাপ দেয়, যা সেই অভিশাপের যোগ্য নয়, সেই অভিশাপ তার নিজের উপরই ফিরে আসে।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (529)


529 - ` إني لا أصافح النساء إنما قولي لمائة امرأة كقولي لامرأة واحدة `.
أخرجه مالك (2 / 982 / 2) وعند النسائي في ` عشرة النساء ` من ` السنن
الكبرى ` له (2 / 93 / 2) وكذا ابن حبان (14) وأحمد (6 / 357) عن محمد
ابن المنكدر عن أميمة بنت رقيقة أنها قالت: ` أتيت رسول الله صلى الله
عليه وسلم في نسوة نبايعه على الإسلام، فقلن: يا رسول الله نبايعك على أن لا
نشرك بالله شيئا ولا نسرق ولا نزني ولا نقتل أولادنا ولا نأتي ببهتان
نفتريه بين أيدينا وأرجلنا ولا نعصيك في معروف، فقال رسول الله صلى الله
عليه وسلم: فيما استطعتن وأطقتن قالت: فقلن: الله ورسوله أرحم بنا من
أنفسنا هلم نبايعك يا رسول الله فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره.
وأخرجه النسائي في ` المجتبى ` (2 / 184) والترمذي (1 / 302) وابن ماجه
(2874) وأحمد والحميدي في مسنده (341) من طريق سفيان بن عيينة عن محمد بن
المنكدر به إلا أن الحميدي والترمذي اختصراه وزاد هذا بعد قوله: ` هلم
نبايعك `: ` قال سفيان: تعني صافحنا `. وهي عند أحمد بلفظ: ` قلنا يا رسول
الله ألا تصافحنا؟ `. وقال الترمذي: ` حديث حسن صحيح `.
قلت: وإسناده صحيح. وتابعهما محمد بن إسحاق: حدثني محمد ابن المنكدر به
وزاد في آخره: ` قالت: ولم يصافح رسول الله صلى الله عليه وسلم منا امرأة `
. أخرجه أحمد والحاكم (4 / 71) بسند حسن.
وله شاهد من حديث أسماء بنت يزيد مثله مختصرا. أخرجه الحميدي (368) وأحمد
(6 / 454، 459) والدولابي في ` الكنى ` (2 / 128) وابن عبد البر في
` التمهيد ` (3 / 24 / 1) وأبو نعيم في ` أخبار أصبهان ` (1 / 293) من
طريق شهر بن حوشب عنها. وفيه عند أحمد: ` فقالت له أسماء: ألا تحسر لنا عن
يدك يا رسول الله؟ فقال لها إني لست أصافح النساء `. وشهر ضعيف من قبل حفظه
وهذه الزيادة تشعر بأن النساء كن يأخذن بيده صلى الله عليه وسلم عند المبايعة
من فوق ثوبه صلى الله عليه وسلم، وقد روي في ذلك بعض الروايات الأخرى ولكنها
مراسيل كلها ذكرها الحافظ في ` الفتح ` (8 / 488) ، فلا يحتج بشيء منها
لاسيما وقد خالفت ما هو أصح منها كذا الحديث والآتي بعده وكحديث عائشة في
مبايعته صلى الله عليه وسلم للنساء قالت: ` ولا والله ما مست يده صلى الله
عليه وسلم يد امرأة قط في المبايعة ما بايعهن إلا بقوله: قد بايعتك على ذلك `
. أخرجه البخاري. وأما قول أم عطية رضي الله عنها:
` بايعنا رسول الله صلى
الله عليه وسلم فقرأ علينا أن لا يشركن بالله شيئا ونهانا عن النياحة، فقبضت
امرأة يدها، فقالت: أسعدتني فلانة.... `. الحديث أخرجه البخاري فليس صريحا
في أن النساء كن يصافحنه صلى الله عليه وسلم فلا يرد بمثله النص الصريح من قوله
صلى الله عليه وسلم هذا وفعله أيضا الذي روته أميمة بنت رقيقة وعائشة وابن
عمر كما يأتي. قال الحافظ: ` وكأن عائشة أشارت بذلك إلى الرد على ما جاء عن
أم عطية، فعند ابن خزيمة وابن حبان والبزار والطبري وابن مردويه من طريق
إسماعيل بن عبد الرحمن عن جدته أم عطية في قصة المبايعة، قال: فمد يده من
خارج البيت ومددنا أيدينا من داخل البيت، ثم قال: اللهم أشهد. وكذا الحديث
الذي بعده حيث قالت فيه ` قبضت منا امرأة يدها، فإنه يشعر بأنهن كن يبايعنه
بأيديهن. ويمكن الجواب عن الأول بأن مد الأيدي من وراء الحجاب إشارة إلى وقوع
المبايعة وإن لم تقع مصافحة. وعن الثاني بأن المراد بقبض اليد التأخر عن
القبول، أو كانت المبايعة تقع بحائل، فقد روى أبو داود في ` المراسيل ` عن
الشعبي أن النبي صلى الله عليه وسلم حين بايع النساء أتى ببرد قطري فوضعه على
يده وقال: لا أصافح النساء.... `. ثم ذكر بقية الأحاديث بمعناه وكلها
مراسيل لا تقوم الحجة بها. وما ذكره من الجواب عن حديثي أم عطية هو العمدة
على أن حديثها من طريق إسماعيل بن عبد الرحمن ليس بالقوي لأن إسماعيل هذا ليس
بالمشهور وإنما يستشهد به كما بينته في ` حجاب المرأة المسلمة ` (ص 26 طبع
المكتب الإسلامي) . وجملة القول أنه لم يصح عنه صلى الله عليه وسلم أنه صافح
امرأة قط حتى ولا في المبايعة فضلا عن المصافحة عند الملاقاة، فاحتجاج البعض
لجوازها بحديث أم عطية الذي ذكرته مع أن المصافحة لم تذكر فيه وإعراضه عن
الأحاديث الصريحة في تنزهه صلى الله عليه وسلم عن المصافحة لأمر لا يصدر من
مؤمن مخلص، لاسيما
وهناك الوعيد الشديد فيمن
يمس امرأة لا تحل له كما تقدم في الحديث (229) .
ويشهد لحديث أميمة بنت رقيقة الحديث الآتي. وبعد كتابة ما تقدم رأيت إسحاق
بن منصور المروزي قال في ` مسائل أحمد وإسحاق ` (211 / 1) : ` قلت (يعني
لأحمد) : تكره مصافحة النساء قال: أكرهه. قال إسحاق: كما قال، عجوز كانت
أو غير عجوز إنما بايعهن النبي صلى الله عليه وسلم على يده الثوب `.
ثم رأيت في ` المستدرك ` (2 / 486) من طريق إسماعيل بن أبي أويس حدثني أخي عن
سليمان بن بلال عن ابن عجلان عن أبيه عن فاطمة بنت عتبة بن ربيعة بن عبد شمس.
` أن أبا حذيفة بن عتبة رضي الله عنه أتى بها وبهند بنت عتبة رسول الله صلى
الله عليه وسلم تبايعه، فقالت: أخذ علينا، فشرط علينا، قالت: قلت له: يا
ابن عم هل علمت في قومك من هذه العاهات أو الهنات شيئا؟ قال أبو حذيفة: إيها
فبايعنه، فإن بهذا يبايع، وهكذا يشترط. فقالت: هند: لا أبايعك على السرقة
إني أسرق من مال زوجي فكف النبي صلى الله عليه وسلم يده وكفت يدها حتى أرسل
إلى أبي سفيان، فتحلل لها منه، فقال أبو سفيان: أما الرطب فنعم وأما اليابس
فلا ولا نعمة! قالت: فبايعناه ثم قالت فاطمة: ما كانت قبة أبغض إلي من قبتك
ولا أحب أن يبيحها الله وما فيها وو الله ما من قبة أحب إلي أن يعمرها الله
يبارك وفيها من قبتك، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم. وأيضا والله لا
يؤمن أحدكم حتى أكون أحب إليه من ولده ووالده `.
قال الحاكم: ` صحيح الإسناد `. ووافقه الذهبي.
قلت: وإسناده حسن وفي محمد بن عجلان وإسماعيل بن أبي أويس كلام لا يضر إن
شاء الله تعالى.
وهذا الحديث يؤيد أن المبايعة كانت تقع بينه صلى الله عليه
وسلم وبين النساء بمد الأيدي كما تقدم عن الحافظ لا بالمصافحة، إذ لو وقعت
لذكرها الراوي كما هو ظاهر. فلا اختلاف بينه أيضا وبين حديث الباب والحديث
الآتي.




উমায়মা বিনতে রুকাইকা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন:
আমি কিছু সংখ্যক মহিলাসহ ইসলামের ওপর বাইয়াত (আনুগত্যের শপথ) করার জন্য রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট এলাম। তখন আমরা বললাম: ‘ইয়া রাসূলুল্লাহ, আমরা আপনার কাছে এই মর্মে বাইয়াত করছি যে, আমরা আল্লাহর সাথে কোনো কিছুকে শরীক করব না, চুরি করব না, ব্যভিচার করব না, আমাদের সন্তানদের হত্যা করব না, আমরা ইচ্ছাকৃতভাবে কোনো অপবাদ রটাবো না এবং নেক কাজে আপনাকে অমান্য করব না।’

তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: ‘তোমরা যতটুকু সামর্থ্য রাখো এবং ক্ষমতা রাখো।’

তখন আমরা বললাম: ‘আল্লাহ ও তাঁর রাসূল আমাদের নিজেদের থেকেও আমাদের প্রতি অধিক দয়ালু। হে আল্লাহর রাসূল, আসুন, আমরা আপনাকে বাইয়াত করি।’

তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: ‘আমি মহিলাদের সাথে মুসাফাহা (হ্যান্ডশেক) করি না। একশো জন মহিলাকে আমার কথা বলা আর একজন মহিলাকে আমার কথা বলা (বাইয়াত নেওয়ার ক্ষেত্রে) একই।’

[অন্য বর্ণনায় আছে: ‘রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদের কারো সাথেই মুসাফাহা করেননি।’]









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (530)


530 - ` كان لا يصافح النساء في البيعة `.
أخرجه الإمام أحمد (2 / 213) حدثنا عتاب بن زياد أنبأنا عبد الله أنبأنا
أسامة بن زيد حدثني عمرو بن شعيب عن أبيه عن عبد الله بن عمرو أن رسول الله
صلى الله عليه وسلم كان....
قلت: وهذا إسناد حسن على ما تقرر عند العلماء من الاحتجاج بحديث عمرو بن شعيب
عن أبيه عن جده كأحمد والحميدي والبخاري والترمذي وغيرهم ومن دونه ثقات.
وعبد الله هو ابن المبارك.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বাই’আত (আনুগত্যের শপথ) গ্রহণের সময় মহিলাদের সাথে মুসাফাহা (হস্তমর্দন) করতেন না।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (531)


531 - ` قال الله عز وجل: يؤذيني ابن آدم يقول: يا خيبة الدهر (وفي رواية: يسب
الدهر) فلا يقولن أحدكم: يا خيبة الدهر، فإني أنا الدهر: أقلب ليله ونهاره
فإذا شئت قبضتهما `.
أخرجه البخاري (3 / 330، 4 / 478) ومسلم (7 / 45) والسياق له وأبو داود
(5274) وأحمد (2 / 138، 272، 275) من طرق عن الزهري عن ابن المسيب عن
أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكره. واستدركه
الحاكم (2 / 453) من هذا الوجه واللفظ وقال: ` صحيح على شرطهما ولم
يخرجاه هكذا `. ووافقه الذهبي، فوهما في الاستدراك على مسلم وقد أخرجه كما
ترى واغتر به المنذري فأورده في ` الترغيب ` بهذا اللفظ وقال (3 / 290) :
` رواه أبو داود والحاكم وقال: صحيح على شرط مسلم `.
وفي هذا الكلام على قلته ثلاث مؤاخذات:
الأولى: لم يعزه لمسلم وهو عنده بهذا التمام كما رأيت.
الثانية: عزاه لأبي داود وهو عنده مختصر ليس فيه ` يقول يا خيبة الدهر `
وإنما عنده الرواية الأخرى وهي رواية للشيخين وكذا ليس عنده ` فلا يقولن
أحدكم يا خيبة الدهر `.
الثالثة: أنه قال: إن الحاكم صححه على شرط مسلم والواقع أنه إنما صححه على
شرط الشيخين. وهو الصواب الموافق لحال الإسناد.
معنى الحديث:
قال المنذري: ` ومعنى الحديث أن العرب كانت إذا نزلت بأحدهم نازلة وأصابته
مصيبة أو مكروه يسب الدهر اعتقادا منهم أن الذي أصابه فعل الدهر كما كانت العرب
تستمطر بالأنواء وتقول: مطرنا بنوء كذا اعتقادا أن ذلك فعل الأنواء، فكان
هذا كاللاعن للفاعل ولا فاعل لكل شيء إلا الله تعالى خالق كل شيء وفاعله
فنهاهم النبي صلى الله عليه وسلم عن ذلك.
وكان (محمد) ابن داود ينكر رواية أهل الحديث ` وأنا الدهر ` بضم الراء
ويقول: لو كان كذلك كان الدهر اسما من أسماء الله عز وجل وكان يرويه ` وأنا
الدهر أقلب الليل والنهار `، بفتح راء الدهر على النظر في معناه: أنا طول
الدهر والزمان أقلب الليل والنهار. ورجح هذا بعضهم ورواية من قال: ` فإن
الله هو الدهر ` يرد هذا. والجمهور
على ضم الراء. والله أعلم `.
وللحديث طريق أخرى بلفظ آخر وهو: ` لا تسبوا الدهر، فإن الله عز وجل قال:
أنا الدهر الأيام والليالي لي أجددها وأبليها وآتي بملوك بعد ملوك `.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: আল্লাহ তা‘আলা ইরশাদ করেন, “আদম সন্তান আমাকে কষ্ট দেয়। তারা বলে, ‘হায়রে সময়ের দুর্ভাগ্য!’ (অন্য বর্ণনায়: তারা সময়কে গালি দেয়)। তোমাদের কেউ যেন ‘হায়রে সময়ের দুর্ভাগ্য!’—এ কথা না বলে। কারণ, আমিই তো কাল (সময়)। আমিই তার রাত ও দিনকে পরিবর্তন করি। আর যখন আমি ইচ্ছা করি, তখন এ দুটোকেই গুটিয়ে নেই।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (532)


532 - ` لا تسبوا الدهر، فإن الله عز وجل قال: أنا الدهر: الأيام والليالي لي
أجددها وأبليها وآتي بملوك بعد ملوك `.
أخرجه الإمام أحمد (2 / 496) : حدثنا ابن نمير حدثنا هشام بن سعد عن زيد بن
أسلم عن ذكوان عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم.
قلت: وهذا إسناد جيد وهو على شرط مسلم وفي هشام ابن سعد كلام لا يضر.
والحديث عزاه المنذري (3 / 290) للبيهقي وحده فقصر!
وقال الهيثمي في ` المجمع ` (8 / 71) : ` رواه أحمد ورجاله رجال الصحيح `.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম ইরশাদ করেছেন:

"তোমরা কালকে (দাহর/সময়) গালি দিও না, কেননা আল্লাহ আযযা ওয়া জাল (মহান ও পরাক্রমশালী) বলেছেন: আমিই ’দাহর’ (সময়/কাল)। দিন ও রাত আমারই; আমিই সেগুলোকে নতুন করি এবং বিলীন করি, আর আমিই এক রাজার পর অন্য রাজা আনি।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (533)


533 - ` لما عرج بي ربي عز وجل مررت بقوم لهم أظفار من نحاس يخمشون وجوههم وصدورهم
فقلت: من هؤلاء يا جبريل؟ قال: هؤلاء الذين يأكلون لحوم الناس ويقعون في
أعراضهم `.
أخرجه الإمام أحمد (3 / 224) : حدثنا أبو المغيرة حدثنا صفوان حدثني راشد بن
سعد وعبد الرحمن بن جبير عن أنس بن مالك قال: قال رسول الله صلى الله
عليه وسلم. فذكره. وأخرجه أبو داود (4878) : حدثنا ابن المصفى حدثنا بقية
وأبو المغيرة قالا: حدثنا صفوان به. قال أبو داود حدثناه يحيى بن عثمان عن
بقية ليس فيه أنس. حدثنا عيسى بن أبي عيسى السليحيني عن أبي المغيرة كما قال
ابن المصفى.
قلت: والموصول من طريق بقية هو الصواب لأنه رواية الأكثر عنه ولأنه الموافق
لرواية أبي المغيرة وهو أوثق منه واسمه عبد القدوس ابن الحجاج الخولاني
الحمصي ثقة من رجال الشيخين ومن فوقه ثقات من رجال مسلم خلا راشد بن سعد ومع
كونه ليس من رجال مسلم - على ثقته - فهو متابع فالسند من طريق عبد الرحمن بن
جبير - وهو ابن نفير - صحيح على شرط مسلم. والداعي إلى تحرير هذا أنني رأيت
المنذري قال في تخريجه للحديث من كتابه ` الترغيب ` (3 / 300) :
` رواه أبو داود وذكر أن بعضهم رواه مرسلا `.
فخشيت أن يتوهم من لا علم عنده بإسناد هذا الحديث، أن رواية البعض إياه مرسلا
مما يعل به الحديث، فأحببت الكشف عن أن هذا البعض إنما هو بقية وأنه لم يتفق
الرواة عنه على روايته مرسلا بل الأكثر عنه على وصله وأنه هو الصواب لموافقته
لرواية أبي المغيرة التي لم يختلف عليه فيها. والله الموفق. ثم الحديث أخرجه
ابن أبي الدنيا في ` الصمت ` (4 / 34 / 1) : حدثنا حسين بن مهدي حدثنا عبد
القدوس أبو المغيرة به.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

যখন আমার মহান রব্ব আমাকে মি’রাজে আরোহণ করালেন, তখন আমি এমন এক সম্প্রদায়ের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলাম, যাদের তামার নখ ছিল। তারা সেই নখ দিয়ে নিজেদের মুখমণ্ডল ও বুক ক্ষতবিক্ষত করছিল। আমি বললাম, ‘হে জিবরীল, এরা কারা?’ তিনি বললেন, ‘এরা হলো সেইসব লোক যারা মানুষের গোশত খেতো এবং তাদের মান-সম্মানে আঘাত হানতো (অর্থাৎ গীবত করতো)।’









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (534)


534 - ` أكثر خطايا ابن آدم في لسانه `.
أخرجه الطبراني (3 / 78 /




আব্দুল্লাহ ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

আদম সন্তানের অধিকাংশ পাপই তার জিহ্বার (কথাবার্তার) মাধ্যমে সংঘটিত হয়।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (535)


535 - ` ليس شيء من الجسد إلا يشكو إلى الله اللسان على حدته `.
أخرجه أبو يعلى في ` مسنده ` (1 / 4) وابن السني في ` عمل اليوم والليلة `
(7) وابن أبي الدنيا في ` الورع ` (ق 165 / 2) وأبو بكر ابن النقور في
الجزء الأول من ` الفوائد الحسان ` (133 / 1) وأبو نعيم في ` الرواة عن سعيد
ابن منصور ` (209 /




আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: "দেহের এমন কোনো অংশ বা অঙ্গ-প্রত্যঙ্গ নেই যা বিশেষভাবে (বা কেবল) জিহ্বার বিরুদ্ধে আল্লাহর নিকট অভিযোগ না করে।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (536)


536 - ` من صمت نجا `.
أخرجه الترمذي (2 / 82) والدارمي (2 / 299) وأحمد (2 / 159، 177)
والقضاعي في ` مسند الشهاب ` (ق 26 / 2) من طرق عن ابن لهيعة عن يزيد بن
عمرو المعافري عن أبي عبد الرحمن الحبلي عن عبد الله بن عمرو قال:
قال رسول الله صلى الله عليه وسلم. وقال الترمذي: ` حديث غريب لا نعرفه إلا
من حديث ابن لهيعة `.
قلت: يعني أنه حديث ضعيف لسوء حفظ ابن لهيعة الذي عرف به لكن رواه عنه بعض
العبادلة الذين حديثهم عنه صحيح عند المحققين من أهل العلم منهم عبد الله بن
المبارك فقال في ` كتاب الزهد ` (ق 172 / 1 كواكب 575 ورقم 5،




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:
"যে নীরব থাকে, সে মুক্তি লাভ করে।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (537)


537 - ` يا عائشة إياك والفحش إياك والفحش، فإن الفحش لو كان رجلا لكان رجل سوء `.
رواه العقيلي في ` الضعفاء ` (259) عن عبد الجبار بن الورد قال: سمعت ابن
أبي مليكة يقول: قالت عائشة: فذكره مرفوعا.
وقال: ` عبد الجبار قال البخاري: يخالف في بعض حديثه `، وقد روى هذا بغير
هذا الإسناد بأصلح من هذا وبألفاظ مختلفة في معنى الفحش `.
قلت: وقول البخاري هذا جرح لين لا ينهض عندي لاسقاط حديث عبد الجبار هذا فقد
وثقه أحمد وابن معين وأبو حاتم وأبو داود وغيرهم وقال ابن عدي: ` لا بأس
به يكتب حديثه `، وقال السلمي عن الدارقطني: ` لين `.
قلت: فمثله لا ينزل حديثه عن رتبة الحسن وبقية رجال الإسناد ثقات فالحديث
عندي ثابت حسن على أقل الدرجات.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
“হে আয়িশা! তুমি কুরুচিপূর্ণ ও অশ্লীল কথা (ফাহশ) পরিহার করো, তুমি কুরুচিপূর্ণ ও অশ্লীল কথা পরিহার করো। কারণ, যদি অশ্লীলতা একজন মানুষ হতো, তবে সে অবশ্যই এক মন্দ মানুষ হতো।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (538)


538 - ` ما من آدمي إلا في رأسه حكمة بيد ملك، فإذا تواضع قيل للملك: ارفع حكمته
وإذا تكبر قيل للملك: ضع حكمته `.
أخرجه الطبراني في ` المعجم الكبير ` (3 / 182 / 1) من طريق سلام أبي المنذر
عن علي بن زيد عن يوسف بن مهران عن ابن عباس عن رسول الله صلى الله عليه
وسلم قال: فذكره.
قلت: وهذا إسناد رجاله ثقات غير علي بن زيد وهو ابن جدعان وفيه ضعف من قبل
حفظه وبعضهم يجود حديثه أو يحسنه. فقد أخرج له الحاكم (2 / 591) حديثا آخر
بهذا السند ساكتا عليه، وقال الذهبي: ` إسناده جيد `! وقال الهيثمي في
` المجمع ` (8 / 82) وقد ذكره عن ابن عباس: ` رواه الطبراني وإسناده حسن `
. وقال المنذري في ` الترغيب ` (4 / 16) : ` رواه الطبراني والبزار بنحوه
من حديث أبي هريرة وإسنادهما حسن `! كذا قال وفيه نظر يعرف بعضه مما سبق
وحديث ابن عباس خير إسنادا من حديث أبي هريرة فإن مدارهما على ابن جدعان غير أن
الأول يرويه عنه سلام أبو المنذر وأما الآخر فرواه المنهال بن خليفة عنه عن
سعيد بن المسيب عن أبي هريرة مرفوعا به. أخرجه العقيلي في ` الضعفاء ` (427)
وابن عدي في ` الكامل ` (322 / 2) والضياء في ` المنتقى ` من مسموعاته بمرو
` (ق 142 / 1) وقال العقيلي:
` منهال بن خليفة قال يحيى: ضعيف وقال
البخاري: ` فيه نظر ` ولا يتابع عليه إلا من طريق تقاربه وإنما يروى هذا
مرسلا `.
قلت: وكأنه يشير إلى الطريق الأولى وهي خير من هذه كما ترى، فإن سلاما موثق
عند جماعة وهو حسن الحديث بخلاف المنهال، فإن الجمهور على تضعيفه بل البخاري
ضعفه جدا بقوله المتقدم.
وأما المرسل الذي أشار إليه، فلم أقف عليه وإنما وجدت له شاهدا موصولا من
حديث أنس وله عنه طريقان: الأول: عن علي بن الحسن الشامي عن خليد بن دعلج
عن قتادة عن أنس مرفوعا. أخرجه ابن عساكر في ` مدح التواضع ` (ق 89 / 1 / 2)
وقال: هذا حديث حسن غريب تفرد به علي بن الحسن عن خليد بن دعلج وقد روى عن
أنس من وجه آخر `.
قلت: أنى له الحسن وعلي بن الحسن هذا متهم، قال ابن حبان: ` لا يحل كتب
حديثه إلا على جهة التعجب ` وقال ابن عدي بعد أن أورد له عدة أحاديث: ` كلها
ليست محفوظة وهي بواطيل هي وجميع حديثه هو ضعيف جدا `. وقال الدارقطني:
` يكذب يروي عن الثقات بواطيل ` وقال الحاكم: ` روى أحاديث موضوعة `.
قلت: فمثله لا يستشهد بحديثه فضلا عن أن يحتج به أو يحسن حديثه.
ثم ساق ابن عساكر من الوجه الآخر وهو من طريق الزبير بن بكار: حدثنا أبو
ضمرة
- يعني أنس بن عياض الليثي حدثنا عبيد الله بن عمر عن واقد بن سلامة عن الرقاشي
يزيد عن أنس مرفوعا نحوه. وأخرجه الدامغاني الفقيه في ` الأحاديث والأخبار `
(1 / 111 / 2) من طريق أخرى عن أبي ضمرة به.
قلت: وهذا إسناد ضعيف، يزيد وهو ابن أبان ضعيف ووافد ابن سلامة أورده
البخاري والعقيلي وابن الجارود في ` الضعفاء ` وقال أبو محمد بن أبي حاتم عن
أبيه (4 / 2 / 50) : ` هو يروي عن الرقاشي فما يقال فيه؟ ! قال أبو محمد:
يعني أن الرقاشي ليس بقوي، فما وجد في حديثه من الإنكار يحتمل أن يكون من يزيد
الرقاشي `.
قلت: هو رجل صالح متعبد وقد بين الساجي سبب تضعيفه فقال: كان يهم ولا يحفظ
ويحمل حديثه لصدقه وصلاحه. وقال ابن عدي له: أحاديث صالحة عن أنس وغيره
وأرجو أنه لا بأس به لرواية الثقات عنه.
قلت: فمثله قد يستشهد به، فإذا انضم إليه المرسل الذي أشار إليه العقيلي صلحا
للاستشهاد بهما وبذلك يرتقي الحديث إلى درجة الحسن إن شاء الله تعالى.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:

এমন কোনো মানুষ নেই যার মাথায় একজন ফেরেশতার হাতে একটি লাগাম (বা রাশ) থাকে। যখন সে বিনয়ী হয়, তখন ফেরেশতাকে বলা হয়: তার লাগাম উঁচু করে দাও। আর যখন সে অহংকার করে, তখন ফেরেশতাকে বলা হয়: তার লাগাম নিচু করে দাও।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (539)


539 - ` إن أول ما يحاسب به العبد يوم القيامة أن يقال له: ألم أصح لك جسمك وأروك
من الماء البارد؟ `.
أخرجه الترمذي (2 / 240) وابن حبان (2585) والحاكم (4 / 138) وفي
` علوم الحديث ` (187) وعبد الله بن أحمد في ` زوائد الزهد ` (ص 31) وابن
معين في ` التاريخ والعلل ` (4 / 2) والخرائطي في ` فضيلة الشكر ` (ق 132
/ 2) وتمام في
` الفوائد ` (36 / 1) وابن بشران في ` الأمالي ` (18 / 5 /
1) وابن شاذان الأزجي في ` الفوائد ` (2 / 102 / 1) والرامهرمزي في
` الفاصل ` (ص 137) وابن عساكر في ` تاريخ دمشق ` (2 / 20 / 1، 8 / 203 /
1) والضياء في ` المنتقى من مسموعاته ` (ق 59 / 1) وكذا أبو القاسم بن أبي
القعنب في ` حديث القاسم بن الأشيب ` (ق 7 / 2) كلهم من طريق عبد الله بن
العلاء بن زبر قال: سمعت الضحاك بن عرزب يحدث عن أبي هريرة مرفوعا به.
وقال الحاكم: ` صحيح الإسناد `. ووافقه الذهبي. وأما الترمذي فقال: `
حديث غريب. والضحاك هو ابن عبد الرحمن بن عرزب ويقال ابن عرزم أصح `.
ولا أدري لماذا استغربه الترمذي واستغرابه يعني التضعيف غالبا مع أن رجاله
كلهم ثقات، فالسند صحيح كما قال الذهبي تبعا للحاكم.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন): "কিয়ামতের দিন বান্দার কাছ থেকে সর্বপ্রথম যে বিষয়ে হিসাব নেওয়া হবে, তা হলো তাকে জিজ্ঞাসা করা হবে: ’আমি কি তোমার শরীরকে সুস্থ রাখিনি? আর আমি কি তোমাকে শীতল পানি দ্বারা সতেজ (বা তৃষ্ণা নিবারণ) করাইনি?’"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (540)


540 - ` إن العبد ليتكلم بالكلمة ما يتبين فيها، يزل بها في النار أبعد ما بين
المشرق والمغرب `.
أخرجه أحمد (2 /




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

"নিশ্চয়ই বান্দা এমন একটি কথা বলে, যা সে ভালোভাবে বিবেচনা করে না বা যার গুরুত্ব সে উপলব্ধি করে না, আর সেই কারণে সে জাহান্নামের মধ্যে পূর্ব ও পশ্চিমের দূরত্বের চেয়েও বেশি দূরত্বে নিচে পতিত হয়।"