হাদীস বিএন


সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ





সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (81)


81 - ` من قال: سبحان الله وبحمده سبحانك اللهم وبحمدك أشهد أن لا إله إلا أنت
أستغفرك وأتوب إليك، فقالها في مجلس ذكر كانت كالطابع يطبع عليه ومن قالها
في مجلس لغو كانت كفارة له `.
أخرجه الطبراني (1 / 79 / 2) والحاكم (1 / 537) من طريق نافع بن جبير
ابن مطعم عن أبيه مرفوعا.
وقال: ` صحيح على شرط مسلم `. ووافقه الذهبي وهو كما قالا.
وعزاه المنذري (2 / 236) للنسائي والطبراني، قال:
` ورجالهما رجال الصحيح `.
وقال الهيثمي (10 / 142 و 423) : ` رواه الطبراني ورجاله رجال الصحيح `.
قلت: وفي رواية للطبراني زيادة: ` يقولها ثلاث مرات ` وقد سكت عليها
الهيثمي، وليس بجيد، فإن في سندها خالد بن يزيد العمري وقد كذبه أبو حاتم
ويحيى، وقال ابن حبان: ` يروي الموضوعات عن الأثبات `.
فهذه الزيادة واهية لا يلتفت إليها.




জুবাইর ইবন মুত’ইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:

যে ব্যক্তি বলবে: "সুবহানাল্লাহি ওয়া বিহামদিহী, সুবহানাকা আল্লাহুম্মা ওয়া বিহামদিকা, আশহাদু আল্লা ইলাহা ইল্লা আন্তা, আসতাগফিরুকা ওয়া আতূবু ইলাইক।"—

অতঃপর যদি সে তা কোনো যিকিরের (আল্লাহর স্মরণমূলক) মজলিসে বলে, তবে তা মজলিসের উপর মোহরস্বরূপ হবে (যা মজলিসের কল্যাণকে সুরক্ষিত করবে)। আর যে ব্যক্তি তা কোনো অনর্থক ও অপ্রয়োজনীয় কথার (লাগ্বু) মজলিসে বলবে, তবে তা তার জন্য কাফফারা (গুনাহ মোচনকারী) হবে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (82)


82 - ` لا أشبع الله بطنه. يعني معاوية `.
رواه أبو داود الطيالسي في ` مسنده ` (2746) : حدثنا هشام وأبو عوانة عن أبي
حمزة القصاب عن ابن عباس:
` أن رسول الله صلى الله عليه وسلم بعث إلى معاوية ليكتب له: فقال: إنه يأكل
ثم بعث إليه، فقال: إنه يأكل، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم ` فذكره.
قلت: وهذا إسناد صحيح رجاله كلهم ثقات رجال مسلم، وفي أبي حمزة القصاب
واسمه عمران بن أبي عطاء كلام من بعضهم لا يضره، فقد وثقه جماعة من الأئمة
منهم أحمد وابن معين وغيرهما، ومن ضعفه لم يبين السبب، فهو جرح مبهم غير
مقبول، وكأنه لذلك احتج به مسلم، وأخرج له هذا الحديث في ` صحيحه ` (8 /
27) من طريق شعبة عن أبي حمزة القصاب به.
وأخرجه أحمد (1 / 240، 291، 335، 338) عن شعبة وأبي عوانة عنه به،
دون
قوله: ` لا أشبع الله بطنه ` وكأنه من اختصار أحمد أو بعض شيوخه، وزاد في
رواية: ` وكان كاتبه ` وسندها صحيح.
وقد يستغل بعض الفرق هذا الحديث ليتخذوا منه مطعنا في معاوية رضي الله عنه،
وليس فيه ما يساعدهم على ذلك، كيف وفيه أنه كان كاتب النبي صلى الله عليه
وسلم؟ ! ولذلك قال الحافظ ابن عساكر (16 / 349 / 2) ` إنه أصح ما ورد في
فضل معاوية ` فالظاهر أن هذا الدعاء منه صلى الله عليه وسلم غير مقصود، بل هو
ما جرت به عادة العرب في وصل كلامها بلا نية كقوله صلى الله عليه وسلم في بعض
نسائه ` عقرى حلقى ` و ` تربت يمينك `. ويمكن أن يكون ذلك منه صلى الله عليه
وسلم بباعث البشرية التي أفصح عنها هو نفسه عليه السلام في أحاديث كثيرة
متواترة.
منها حديث عائشة رضي الله عنها قالت:
` دخل على رسول الله صلى الله عليه وسلم رجلان، فكلماه بشيء لا أدري ما هو
فأغضباه، فلعنهما وسبهما، فلما خرجا قلت: يا رسول الله من أصاب من الخير
شيئا ما أصابه هذان؟ قال: وما ذاك؟ قالت: قلت: لعنتهما وسببتهما،
قال: ` أو ما علمت ما شارطت عليه ربي؟ قلت: اللهم إنما أنا بشر، فأي
المسلمين لعنته أو سببته فاجعله له زكاة وأجرا `.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম মুয়াবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে লোক পাঠালেন যেন তিনি তাঁর (রাসূলের) জন্য কিছু লিখে দেন। (মুয়াবিয়া) বললেন, ‘তিনি এখন খাবার খাচ্ছেন।’ এরপর আবার তাঁর কাছে লোক পাঠালেন। (মুয়াবিয়া) বললেন, ‘তিনি এখনও খাবার খাচ্ছেন।’ তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন, "আল্লাহ যেন তার পেট তৃপ্ত না করেন (অর্থাৎ সর্বদা তাকে ক্ষুধার্থ রাখেন)।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (83)


83 - ` أو ما علمت ما شارطت عليه ربي؟ قلت: اللهم إنما أنا بشر فأي المسلمين لعنته
أو سببته فاجعله له زكاة وأجرا `.
رواه مسلم مع الحديث الذي قبله في باب واحد هو ` باب من لعنه النبي صلى الله
عليه وسلم أو سبه أو دعا عليه وليس هو أهلا لذلك كان له زكاة وأجرا ورحمة `.
ثم ساق فيه من حديث أنس بن مالك قال:
` كانت عند أم سليم يتيمة وهي أم أنس، فرأى رسول الله صلى الله عليه وسلم
اليتيمة، فقال: آنت هي؟ لقد كبرت لا كبر سنك فرجعت اليتيمة إلى أم سليم تبكي
فقالت أم سليم: ما لك يا بنية؟ فقالت الجارية: دعا علي نبي الله صلى الله
عليه وسلم أن لا يكبر سني أبدا، أو قالت: قرني، فخرجت أم سليم مستعجله تلوث
خمارها حتى لقيت رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال لها رسول الله صلى الله
عليه وسلم: ما لك يا أم سليم؟ فقالت يا نبي الله، أدعوت على يتيمتي؟ قال:
وما ذاك يا أم سليم؟ قالت: زعمت أنك دعوت أن لا يكبر سنها، ولا يكبر قرنها
قال: فضحك رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم قال:
` يا أم سليم! أما تعلمين أن شرطي على ربي؟ أني اشترطت على ربي فقلت: إنما
أنا بشر أرضى كما يرضى البشر، وأغضب كما يغضب البشر، فأيما أحد دعوت عليه
من أمتي بدعوة ليس لها بأهل، أن يجعلها له طهورا وزكاة وقربة يقربه بها منه
يوم القيامة `.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

আনাসের মা উম্মে সুলাইমের কাছে একটি এতিম মেয়ে ছিল। একদিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেই এতিম মেয়েটিকে দেখতে পেলেন।

তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: ‘তুমিই কি সে? তুমি তো বড় হয়ে গেছ; আল্লাহ যেন তোমার বয়স না বাড়ান (অর্থাৎ তোমার যৌবন যেন দীর্ঘস্থায়ী না হয়)।’

মেয়েটি কাঁদতে কাঁদতে উম্মে সুলাইমের কাছে ফিরে গেল। উম্মে সুলাইম জিজ্ঞেস করলেন: "ওগো আমার মেয়ে! তোমার কী হয়েছে?"

মেয়েটি বলল: "আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার বিরুদ্ধে বদ-দু’আ করেছেন যে, আমার বয়স যেন কখনও না বাড়ে," অথবা সে বলেছিল: "আমার জীবনকাল যেন না বাড়ে।"

অতঃপর উম্মে সুলাইম দ্রুতগতিতে তার ওড়না গুছিয়ে নিতে নিতে বের হলেন, অবশেষে তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে দেখা করলেন।

রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "হে উম্মে সুলাইম! তোমার কী হয়েছে?"

তিনি বললেন: "হে আল্লাহর নবী! আপনি কি আমার এতিম মেয়েটির উপর বদ-দু’আ করেছেন?"

তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে উম্মে সুলাইম! তা আবার কী?"

তিনি বললেন: "সে (মেয়েটি) ধারণা করছে যে, আপনি দু’আ করেছেন—যেন তার বয়স না বাড়ে এবং তার জীবনকাল না বাড়ে।"

তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাসলেন এবং বললেন:

"হে উম্মে সুলাইম! তুমি কি জানো না, আমার রবের কাছে আমার কী শর্ত রয়েছে? আমি আমার রবের কাছে এই শর্ত করেছি এবং বলেছি যে: আমি তো কেবলই একজন মানুষ। মানুষ যেমন সন্তুষ্ট হয় আমিও তেমন সন্তুষ্ট হই, আর মানুষ যেমন রাগান্বিত হয় আমিও তেমন রাগান্বিত হই। সুতরাং আমার উম্মতের যেই কারও বিরুদ্ধে আমি এমন কোনো দু’আ করি, যার সে যোগ্য নয়, তবে যেন তিনি (আল্লাহ) সেই দু’আটিকে তার জন্য পবিত্রতা, যাকাত (বরকত) এবং কিয়ামত দিবসে তাঁর (আল্লাহর) নৈকট্য লাভের মাধ্যম বানিয়ে দেন।"

(অন্য এক বর্ণনায় নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম ইরশাদ করেন):

"অথবা তুমি কি জানো না, আমি আমার রবের সাথে কী চুক্তি করেছি? আমি বললাম: হে আল্লাহ! আমি তো একজন মানুষ মাত্র। সুতরাং আমার উম্মতের কোনো মুসলমানকে যদি আমি অভিসম্পাত করি বা তাকে গালি দেই, তবে আপনি তা তার জন্য পবিত্রতা, প্রতিদান এবং বরকতের কারণ বানিয়ে দিন।"
(সহীহ মুসলিম, একটি অনুচ্ছেদে পূর্ববর্তী হাদীসের সঙ্গে বর্ণিত)









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (84)


84 - ` يا أم سليم! أما تعلمين أن شرطي على ربي؟ أني اشترطت على ربي فقلت: إنما
أنا بشر أرضى كما يرضى البشر وأغضب كما يغضب البشر فأيما أحد دعوت عليه من
أمتي بدعوة ليس لها بأهل أن يجعلها له طهورا وزكاة وقربة يقربه بها منه يوم
القيامة `.
(عن أم سليم) :
ثم أتبع الإمام مسلم هذا الحديث بحديث معاوية وبه ختم الباب، إشارة منه
رحمه الله إلى أنها من باب واحد، وفي معنى واحد، فكما لا يضر اليتيمة دعاؤه
صلى الله عليه وسلم عليه بل هو لها زكاة وقربة، فكذلك دعاؤه صلى الله عليه
وسلم على معاوية.
وقد قال الإمام النووي في ` شرحه على مسلم ` (2 / 325 طبع الهند) :
` وأما دعاؤه صلى الله عليه وسلم على معاوية ففيه جوابان:
أحدهما: أنه جرى على اللسان بلا قصد.
والثانى: أنه عقوبة له لتأخره، وقد فهم مسلم رحمه الله من هذا الحديث أن
معاوية لم يكن مستحقا الدعاء عليه، فلهذا أدخله في هذا الباب، وجعله غيره من
مناقب معاوية لأنه في الحقيقة يصير دعاء له `.
وقد أشار الذهبي إلى هذا المعنى الثاني فقال في ` سير أعلام النبلاء `
(9 / 171 / 2) :
` قلت: لعل أن، يقال: هذه منقبة لمعاوية لقوله صلى الله عليه وسلم: اللهم
من لعنته أو سببته فاجعل ذلك له زكاة ورحمة `.
واعلم أن قوله صلى الله عليه وسلم في هذه الأحاديث: ` إنما أنا بشر أرضى كما
يرضى البشر.. ` إنما هو تفصيل لقول الله تبارك وتعالى: (قل إنما أنا بشر
مثلكم، يوحى إلي....) الآية.
وقد يبادر بعض ذوي الأهواء أو العواطف الهوجاء، إلى إنكار مثل هذا الحديث
بزعم تعظيم النبي صلى الله عليه وسلم وتنزيهه عن النطق به! ولا مجال إلى مثل
هذا الإنكار فإن الحديث صحيح، بل هو عندنا متواتر، فقد رواه مسلم من حديث
عائشة وأم سلمة كما ذكرنا، ومن حديث أبي هريرة وجابر رضي الله عنهما،
وورد من حديث سلمان وأنس وسمرة وأبي الطفيل وأبي سعيد وغيرهم.
انظر ` كنز العمال ` (2 / 124) .
وتعظيم النبي صلى الله عليه وسلم تعظيما مشروعا، إنما يكون بالإيمان بكل ما
جاء عنه صلى الله عليه وسلم صحيحا ثابتا، وبذلك يجتمع الإيمان به صلى الله
عليه وسلم عبدا ورسولا، دون إفراط ولا تفريط، فهو صلى الله عليه وسلم بشر،
بشهادة الكتاب والسنة، ولكنه سيد البشر وأفضلهم إطلاقا بنص الأحاديث
الصحيحة. وكما يدل عليه تاريخ حياته صلى الله عليه وسلم وسيرته، وما حباه
الله تعالى به من الأخلاق الكريمة، والخصال الحميدة، التي لم تكتمل في بشر
اكتمالها فيه صلى الله عليه وسلم، وصدق الله العظيم، إذ خاطبه بقوله
الكريم: (وإنك لعلى خلق عظيم) .




উম্মে সুলাইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে (উম্মে সুলাইমকে) বললেন: "হে উম্মে সুলাইম! তুমি কি জানো না যে, আমার রবের কাছে আমার কী শর্ত রয়েছে? আমি আমার রবের কাছে এই শর্ত রেখেছি এবং বলেছি: নিশ্চয় আমি একজন মানুষ— মানুষ যেমন সন্তুষ্ট হয় আমিও তেমন সন্তুষ্ট হই, আর মানুষ যেমন রাগান্বিত হয় আমিও তেমন রাগান্বিত হই। সুতরাং আমার উম্মতের এমন কোনো ব্যক্তি, যার উপর আমি এমন বদ-দোয়া করি, যার সে যোগ্য নয়, আল্লাহ যেন কিয়ামতের দিন সেটিকে তার জন্য পবিত্রতা, পরিশুদ্ধতা ও নৈকট্যের মাধ্যম বানিয়ে দেন, যার দ্বারা সে তাঁর নিকটবর্তী হতে পারে।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (85)


85 - ` ارحلوا لصاحبيكم واعملوا لصاحبيكم! ادنوا فكلا `.
رواه أبو بكر ابن أبي شيبة في ` المصنف ` (ج 2 / 149 / 2) ، والفريابي في
` الصيام ` (4 / 64 / 1) عنه وعن أخيه عثمان بن أبي شيبة، قالا: حدثنا عمر
بن سعد أبو داود عن سفيان عن الأوزاعي عن يحيى بن أبي كثير عن أبي سلمة عن
أبي هريرة قال:
` أتي النبي صلى الله عليه وسلم بطعام وهو بـ (مر الظهران) ، فقال لأبي بكر
وعمر: ادنوا فكلا، فقالا: إنا صائمان، فقال: ارحلوا لصاحبيكم ` الحديث.
وكذا أخرجه النسائي (1 / 315) وابن دحيم في ` الأمالي ` (2 / 1) من طرق
أخرى عن عمر بن سعد به.
ثم أخرجه النسائي من طريق محمد بن شعيب: أخبرني الأوزاعي به مرسلا لم يذكر أبا
هريرة، وكذلك أخرجه من طريق علي - وهو ابن المبارك - عن يحيى به.
ولعل الموصول أرجح، لأن الذي وصله وهو سفيان عن الأوزاعي ثقة، وزيادة
الثقة مقبولة ما لم تكن منافية لمن هو أوثق منه.
قلت: وإسناده صحيح على شرط مسلم، ورواه ابن خزيمة في ` صحيحه `
وقال: ` فيه دليل على أن للصائم في السفر الفطر بعد مضي بعض النهار `.
كما في ` فتح الباري ` (4 / 158) .
وأخرجه الحاكم (1 / 433) وقال:
` صحيح على شرط الشيخين `. ووافقه الذهبي! وإنما هو على شرط مسلم وحده،
فإن عمر بن سعد لم يخرج له البخاري شيئا.
والغرض من قوله صلى الله عليه وآله وسلم: ` ارحلوا لصاحبيكم ... ` الإنكار
وبيان أن الأفضل أن يفطرا ولا يحوجا الناس إلى خدمتهما، ويبين ذلك ما روى
الفريابي (67 / 1) عن ابن عمر رضي الله عنهما قال: ` لا تصم فى السفر فإنهم
إذا أكلوا طعاما قالوا: ارفعوا للصائم! وإذا عملوا عملا قالوا: اكفلوا
للصائم! فيذهبوا بأجرك `. ورجاله ثقات.
قلت: ففي الحديث توجيه كريم، إلى خلق قويم، وهو الاعتماد على النفس، وترك
التواكل على الغير، أو حملهم على خدمته، ولو لسبب مشروع كالصيام، أفليس في
الحديث إذن رد واضح على أولئك الذين يستغلون عملهم، فيحملون الناس على التسارع
في خدمتهم، حتى في حمل نعالهم؟ !
ولئن قال بعضهم: لقد كان الصحابة رضي الله عنهم يخدمون رسول الله صلى الله
عليه وسلم أحسن خدمة، حتى كان فيهم من يحمل نعليه صلى الله عليه وسلم وهو
عبد الله بن مسعود.
فجوابنا نعم، ولكن هل احتجاجهم بهذا لأنفسهم إلا تزكية منهم لها، واعتراف
بأنهم ينظرون إليها على أنهم ورثته صلى الله عليه وسلم في العلم حتى يصح لهم
هذا القياس؟ ! وايم الله لو كان لديهم نص على أنهم الورثة لم يجز لهم هذا
القياس،
فهؤلاء أصحابه صلى الله عليه وسلم المشهود لهم بالخيرية، وخاصة منهم
العشرة المبشرين بالجنة، فقد كانوا خدام أنفسهم، ولم يكن واحد منهم يخدم من
غيره، عشر معشار ما يخدم أولئك المعنيين من تلامذتهم ومريديهم! فكيف وهم لا
نص عندهم بذلك، ولذلك فإني أقول: إن هذا القياس فاسد الاعتبار من أصله،
هدانا الله تعالى جميعا سبيل التواضع والرشاد.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন মার আয-যাহরান নামক স্থানে ছিলেন, তখন তাঁর কাছে খাবার আনা হলো। তিনি আবু বকর ও উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন, "কাছে এসো এবং খাও।" তাঁরা উভয়ে বললেন, "আমরা তো রোযা রেখেছি।" তখন তিনি বললেন, "(তোমরা রোযা রাখার কারণে) তোমাদের দুই সঙ্গীর (যারা রোযা রাখেনি) জন্য তোমরা (তোমাদের কাজের) বোঝা বহন করো!"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (86)


86 - ` من أنظر معسرا فله بكل يوم صدقة قبل أن يحل الدين، فإذا حل الدين فأنظره فله
بكل يوم مثليه صدقة `.
رواه أحمد (5 / 360) عن سليمان بن بريدة عن أبيه قال: سمعت رسول الله
صلى الله عليه وسلم يقول:
` من أنظر معسرا فله بكل يوم مثله صدقة، قال: ثم سمعته يقول: من أنظر معسرا
فله بكل يوم مثله صدقة، قلت: سمعتك يا رسول الله تقول: من أنظر معسرا فله
بكل يوم مثله صدقة، ثم سمعتك تقول: من أنظر معسرا فله بكل يوم مثليه صدقة،
قال: له بكل يوم صدقة قبل أن يحل الدين فإذا حل الدين فأنظره فله بكل يوم
مثليه صدقة `.
قلت: وإسناده صحيح رجاله ثقات محتج بهم في ` صحيح مسلم `.
ثم رأيته في ` المستدرك ` (2 / 29) وقال: ` صحيح على شرط الشيخين ` ووافقه
الذهبي فأخطأ لأن سليمان هذا لم يخرج له البخاري، وإنما الذي
أخرج له الشيخان
هو أخوه عبد الله بن بريدة.




বুরায়দা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:

“যে ব্যক্তি কোনো অভাবগ্রস্ত ঋণগ্রহীতাকে (ঋণ পরিশোধের জন্য) অবকাশ দেয়, ঋণ পরিশোধের নির্দিষ্ট সময় আসার পূর্ব পর্যন্ত প্রতিদিন তার জন্য একটি সদকার সওয়াব রয়েছে। অতঃপর যখন ঋণের নির্দিষ্ট সময় এসে যায়, এরপরও যদি সে তাকে অবকাশ দেয়, তবে প্রতিদিন তার জন্য দ্বিগুণ সদকার সওয়াব রয়েছে।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (87)


87 - ` يدرس الإسلام كما يدرس وشي الثوب حتى لا يدرى ما صيام ولا صلاة ولا نسك
ولا صدقة وليسرى على كتاب الله عز وجل في ليلة فلا يبقى في الأرض منه آية
وتبقى طوائف من الناس: الشيخ الكبير والعجوز، يقولون: أدركنا آباءنا على هذه
الكلمة: ` لا إله إلا الله ` فنحن نقولها `.
أخرجه ابن ماجه (4049) والحاكم (4 / 473) من طريق أبي معاوية عن أبي مالك
الأشجعي عن ربعي بن حراش عن حذيفة بن اليمان مرفوعا به، وزاد:
` قال صلة بن زفر لحذيفة: ما تغني عنهم لا إله إلا الله وهم لا يدرون ما
صلاة
ولا صيام ولا نسك ولا صدقة؟ فأعرض عنه حذيفة، ثم ردها عليه ثلاثا، كل ذلك
يعرض عنه حذيفة، ثم أقبل عليه في الثالثة فقال: يا صلة! تنجيهم من النار.
ثلاثا `.
وقال الحاكم: ` صحيح على شرط مسلم `. ووافقه الذهبي.
قلت: وهو كما قالا.
وقال البوصيري في ` الزوائد ` (ق 247 / 1) : ` إسناده صحيح، رجاله ثقات `.
(يدرس) من درس الرسم دروسا: إذا عفا وهلك.
(وشي الثوب) نقشه.
من فوائد الحديث:
وفي هذا الحديث نبأ خطير، وهو أنه سوف يأتي يوم على الإسلام يمحى أثره،
وعلى القرآن فيرفع فلا يبقى منه ولا آية واحدة، وذلك لا يكون قطعا إلا بعد
أن يسيطر الإسلام على الكرة الأرضية جميعها، وتكون كلمته فيها هي العليا.
كما هو نص قول الله تبارك وتعالى (هو الذي أرسل رسوله بالهدى ودين الحق
ليظهره على الدين كله) ، وكما شرح رسول الله صلى الله عليه وسلم ذلك في
أحاديث كثيرة سبق ذكر بعضها في المقال الأول من هذه المقالات (الأحاديث
الصحيحة) .
وما رفع القرآن الكريم في آخر الزمان إلا تمهيدا لإقامة الساعة على شرار الخلق
الذين لا يعرفون شيئا من الإسلام البتة، حتى ولا توحيده!
وفي الحديث إشارة إلى عظمة القرآن، وأن وجوده بين المسلمين هو السبب لبقاء
دينهم ورسوخ بنيانه وما ذلك إلا بتدارسه وتدبره وتفهمه ولذلك تعهد الله
تبارك وتعالى بحفظه، إلى أن يأذن الله برفعه. فما أبعد ضلال بعض المقلدة
الذين يذهبون إلى أن الدين محفوظ بالمذاهب الأربعة، وأنه لا ضير على المسلمين
من ضياع قرآنهم لو فرض وقوع ذلك! ! هذا ما كان صرح لي به أحد كبار المفتين من
الأعاجم وهو يتكلم العربية الفصحى بطلاقة وذلك لما جرى الحديث بيني وبينه
حول الاجتهاد والتقليد.
قال - ما يردده كثير من الناس - : إن الاجتهاد أغلق بابه منذ القرن الرابع!
فقلت له: وماذا نفعل بهذه الحوادث الكثيرة التي تتطلب معرفة حكم الله فيها
اليوم؟
قال: إن هذه الحوادث مهما
كثرت فستجد الجواب عنها في كتب علمائنا إما عن عينها
أو مثلها.
قلت: فقد اعترفت ببقاء باب الاجتهاد مفتوحا ولا بد!
قال: وكيف ذلك؟
قلت: لأنك اعترفت أن الجواب قد يكون عن مثلها، لا عن عينها وإذ الأمر كذلك،
فلابد من النظر في كون الحادثه في هذا العصر، هي مثل التي أجابوا عنها، وحين
ذلك فلا مناص من استعمال النظر والقياس وهو الدليل الرابع من أدلة الشرع،
وهذا معناه الاجتهاد بعينه لمن هو له أهل! فكيف تقولون بسد بابه؟ ! ويذكرني
هذا بحديث آخر جرى بيني وبين أحد المفتين شمال سورية، سألته: هل تصح الصلاة
في الطائرة؟ قال: نعم. قلت: هل تقول ذلك تقليدا أم اجتهادا؟ قال: ماذا
تعني؟ قلت: لا يخفى أن من أصولكم في الإفتاء، أنه لا يجوز الإفتاء باجتهاد،
بل اعتمادا على نص من إمام، فهل هناك نص بصحة الصلاة في الطائرة؟ قال: لا،
قلت: فكيف إذن خالفتم أصلكم هذا فأفتيتم دون نص؟ قال: قياسا.
قلت: ما هو المقيس عليه؟ قال: الصلاة في السفينة.
قلت: هذا حسن، ولكنك خالفت بذلك أصلا وفرعا، أما الأصل فما سبق ذكره،
وأما الفرع فقد ذكر الرافعي في شرحه أن المصلي لو صلى في أرجوحة غير معلقة
بالسقف ولا مدعمة بالأرض فصلاته باطلة. قال: لا علم لي بهذا.
قلت: فراجع الرافعي إذن لتعلم أن (فوق كل ذي علم عليم) ، فلو أنك تعترف أنك
من أهل القياس والاجتهاد وأنه يجوز لك ذلك ولو في حدود المذهب فقط، لكانت
النتيجة أن الصلاة في الطائرة باطلة لأنها هي التي يتحقق فيها ما ذكره الرافعي
من الفرضية الخيالية يومئذ. أما نحن فنرى أن الصلاة في الطائرة صحيحة لا شك في
ذلك، ولئن كان السبب في صحة الصلاة في السفينة أنها مدعمة بالماء بينها وبين
الأرض، فالطائرة أيضا مدعمة بالهواء بينها وبين الأرض. وهذا هو الذي بدا
لكم في أول الأمر حين بحثتم استقلالا، ولكنكم لما علمتم بذلك الفرع المذهبي
صدكم عن القول بما أداكم إليه بحثكم! ؟
أعود إلى إتمام الحديث مع المفتي الأعجمي، قلت له: وإذا كان الأمر كما
تقولون: إن المسلمين ليسوا بحاجة إلى مجتهدين لأن المفتي يجد الجواب عن عين
المسألة أو مثلها، فهل يترتب ضرر ما لو فرض ذهاب القرآن؟ قال: هذا لا يقع،
قلت: إنما أقول: لو فرض، قال: لا يترتب أي ضرر لو فرض وقوع ذلك!
قلت: فما قيمة امتنان الله عز وجل إذن على عباده بحفظ القرآن حين قال: (إنا
نحن نزلنا الذكر وإنا له لحافظون) ، إذا كان هذا الحفظ غير ضروري بعد الأئمة
؟ !
والحقيقة أن هذا الجواب الذي حصلنا عليه من المفتي بطريق المحاورة، هو جواب
كل مقلد على وجه الأرض، وإنما الفرق أن بعضهم لا يجرؤ على التصريح به، وإن
كان قلبه قد انطوى عليه. نعوذ بالله من الخذلان.
فتأمل أيها القارىء اللبيب مبلغ ضرر ما نشكو منه، لقد جعلوا القرآن في حكم
المرفوع، وهو لا يزال بين ظهرانينا والحمد لله، فكيف يكون حالهم حين يسرى
عليه في ليلة، فلا يبقى في الأرض منه آية؟ ! فاللهم هداك.
حكم تارك الصلاة:
هذا وفي الحديث فائدة فقهية هامة، وهي أن شهادة أن لا إله إلا الله تنجي
قائلها من الخلود في النار يوم القيامة ولو كان لا يقوم بشيء من أركان الإسلام
الخمسة الأخرى كالصلاة وغيرها، ومن المعلوم أن العلماء اختلفوا في حكم تارك
الصلاة خاصة، مع إيمانه بمشروعيتها، فالجمهور على أنه لا يكفر بذلك، بل يفسق
وذهب أحمد إلى أنه يكفر وأنه يقتل ردة، لا حدا، وقد صح عن الصحابة أنهم
كانوا لا يرون شيئا من الأعمال تركه كفر غير الصلاة. رواه الترمذي والحاكم،
وأنا أرى أن الصواب رأي الجمهور، وأن ما ورد عن الصحابة ليس نصا على أنهم
كانوا يريدون بـ (الكفر) هنا الكفر الذي يخلد صاحبه في النار ولا يحتمل أن
يغفره الله له، كيف ذلك وهذا حذيفة بن اليمان - وهو من كبار أولئك الصحابة -
يرد
على صلة بن زفر وهو يكاد يفهم الأمر على نحو فهم أحمد له، فيقول: ما
تغني عنهم لا إله إلا الله، وهم لا يدرون ما صلاة.... ` فيجيبه حذيفة بعد
إعراضه عنه:
` يا صلة تنجيهم من النار. ثلاثا `.
فهذا نص من حذيفة رضي الله عنه على أن تارك الصلاة، ومثلها بقية الأركان ليس
بكافر، بل هو مسلم ناج من الخلود في النار يوم القيامة. فاحفظ هذا فإنه قد لا
تجده في غير هذا المكان.
وفي الحديث المرفوع ما يشهد له، ولعلنا نذكره فيما بعد إن شاء الله تعالى.
ثم وقفت على ` الفتاوى الحديثية ` (84 / 2) للحافظ السخاوي، فرأيته يقول بعد
أن ساق بعض الأحاديث الواردة في تكفير تارك الصلاة وهي مشهورة معروفة:
` ولكن كل هذا إنما يحمل على ظاهره في حق تاركها جاحدا لوجودها مع كونه ممن
نشأ بين المسلمين، لأنه يكون حينئذ كافرا مرتدا بإجماع المسلمين، فإن رجع إلى
الإسلام قبل منه، وإلا قتل. وأما من تركها بلا عذر، بل تكاسلا مع اعتقاد
وجوبها، فالصحيح المنصوص الذي قطع به الجمهور أنه لا يكفر، وأنه - على
الصحيح أيضا - بعد إخراج الصلاة الواحدة عن وقتها الضروري، كأن يترك الظهر
مثلا حتى تغرب الشمس أو المغرب حتى يطلع الفجر - يستتاب كما يستتاب المرتد،
ثم يقتل إن لم يتب، ويغسل ويصلى عليه ويدفن في مقابر المسلمين، مع إجراء
سائر أحكام المسلمين عليه. ويؤول إطلاق الكفر عليه لكونه شارك الكافر في بعض
أحكامه. وهو وجوب العمل، جمعا بين هذه النصوص وبين ما صح أيضا عنه
صلى الله عليه وسلم أنه قال: خمس صلوات كتبهن الله - فذكر الحديث. وفيه:
` إن شاء عذبه، وإن شاء غفر له ` وقال أيضا: ` من مات وهو يعلم أن لا إله
إلا الله دخل الجنة ` إلى غير ذلك. ولهذا لم يزل المسلمون يرثون تارك الصلاة
ويورثونه ولو كان كافرا لم يغفر له، ولم يرث ولم يورث `.
وقد ذكر نحو هذا الشيخ سليمان بن الشيخ عبد الله في ` حاشيته على المقنع `،
(1 /




হুযাইফা ইবনুল ইয়ামান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

ইসলাম বিলীন হয়ে যাবে, যেভাবে কাপড়ের নকশা বা কারুকার্য বিলীন হয়ে যায়। এমনকি মানুষ জানবে না সালাত কী, সিয়াম কী, নুসুক (ইবাদত) কী এবং সাদাকাহ (দান) কী।

এক রাত্রে আল্লাহ আয্যা ওয়া জাল্লার কিতাব (কুরআন) তুলে নেওয়া হবে। ফলে জমিনে এর একটি আয়াতও অবশিষ্ট থাকবে না।

আর কিছু লোক অবশিষ্ট থাকবে: বৃদ্ধ পুরুষ ও বৃদ্ধা নারী। তারা বলবে, আমরা আমাদের পূর্বপুরুষদেরকে এই কালেমার উপর পেয়েছি, তা হলো: ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ’ (আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই), তাই আমরাও এটি উচ্চারণ করি।

(হাদীসের অতিরিক্ত অংশে রয়েছে): সিলাহ ইবনে যুফার (Silah ibn Zufar) হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলেন: ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ’ তাদের কী উপকারে আসবে, যখন তারা সালাত কী, সিয়াম কী, নুসুক কী, সাদাকাহ কী— কিছুই জানে না?

হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার দিক থেকে মুখ ফিরিয়ে নিলেন। এরপর তিনি (সিলাহ) প্রশ্নটি তিনবার পুনরাবৃত্তি করলেন। প্রতিবারই হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মুখ ফিরিয়ে নিলেন। অতঃপর তৃতীয়বার তিনি তার দিকে ফিরে বললেন: হে সিলাহ! এটি তাদের জাহান্নামের আগুন থেকে মুক্তি দেবে। (এই কথাটি তিনি) তিনবার বললেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (88)


88 - ` ما اجتمع هذه الخصال في رجل في يوم إلا دخل الجنة `.
رواه مسلم في ` صحيحه ` (7 / 100) والبخاري في ` الأدب المفرد ` (رقم 515)
وابن عساكر في ` تاريخه ` (ج 9 / 288 / 1) من طريق مروان بن معاوية قال:
حدثنا يزيد بن كيسان عن أبي حازم عن أبي هريرة قال: قال رسول الله
صلى الله عليه وسلم:
` من أصبح منكم اليوم صائما؟ قال أبو بكر: أنا، قال: من عاد منكم اليوم
مريضا؟ قال أبو بكر أنا، قال: من شهد منكم اليوم جنازة؟ قال أبو بكر:
أنا، قال: من أطعم اليوم مسكينا؟ قال أبو بكر: أنا، قال مروان: بلغني أن
النبي صلى الله عليه وسلم قال: فذكره.
والسياق للبخارى. وليس عند مسلم وابن عساكر ` قال مروان: بلغني ` بل
هذا
البلاغ عندهما متصل بأصل الحديث من طريقين عن مروان. وهو الأصح إن شاء الله
تعالى.
والحديث عزاه المنذري في ` الترغيب ` (4 / 162) لابن خزيمة فقط في ` صحيحه `
! وله طريق أخرى عند ابن عساكر عن عطاء بن يسار عن أبي هريرة نحوه.
ولبعضه شاهد من حديث عبد الرحمن بن أبي بكر بلفظ:
` هل منكم أحد أطعم اليوم مسكينا؟ فقال أبو بكر رضي الله عنه:
دخلت المسجد فإذا أنا بسائل يسأل، فوجدت كسرة خبز في يد عبد الرحمن، فأخذتها
منه، فدفعتها إليه `.
أخرجه أبو داود وغيره وإسناده ضعيف كما بينته في الأحاديث ` الضعيفة `
(1400) .
وفيه فضيلة أبي بكر الصديق رضي الله عنه والبشارة له بالجنة، والأحاديث في
ذلك كثيرة طيبة.
وفيه فضيلة الجمع بين هذه الخصال في يوم واحد، وأن اجتماعها في شخص بشير له
بالجنة، جعلنا الله من أهلها.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম জিজ্ঞেস করলেন: “আজ তোমাদের মধ্যে কে রোযা রেখেছে?” আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: “আমি।” তিনি জিজ্ঞেস করলেন: “তোমাদের মধ্যে আজ কে কোনো অসুস্থ ব্যক্তিকে দেখতে গিয়েছে?” আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: “আমি।” তিনি জিজ্ঞেস করলেন: “তোমাদের মধ্যে আজ কে কোনো জানাযায় অংশগ্রহণ করেছে?” আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: “আমি।” তিনি জিজ্ঞেস করলেন: “তোমাদের মধ্যে আজ কে কোনো মিসকীনকে খাবার খাইয়েছে?” আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: “আমি।”

অতঃপর তিনি বললেন: “যে ব্যক্তির মধ্যে এই (চারটি) গুণাবলী একদিনে একত্রিত হবে, সে অবশ্যই জান্নাতে প্রবেশ করবে।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (89)


89 - ` إن أول ما يكفئ - يعني الإسلام - كما يكفأ الإناء - يعني الخمر - ، فقيل:
كيف يا رسول الله، وقد بين الله فيها ما بين؟ قال رسول الله صلى الله عليه
وسلم: يسمونها بغير اسمها `.
رواه الدارمي (2 / 114) : حدثنا زيد بن يحيى حدثنا محمد بن راشد عن أبي وهب
الكلاعي عن القاسم بن محمد عن عائشة قالت: سمعت رسول الله صلى الله عليه
وسلم يقول:
فذكره.
قلت: وهذا سند حسن، القاسم بن محمد هو ابن أبي بكر الصديق - ثقة أحد الفقهاء
في المدينة، احتج به الجماعة.
وأبو وهب الكلاعي اسمه عبيد الله بن عبيد وثقه دحيم.
وقال ابن معين: لا بأس به.
ومحمد بن راشد هو المكحولي الخزاعي الدمشقي، وثقه جماعة من كبار الأئمة كأحمد
وابن معين وغيرهما، وضعفه آخرون.
وتوسط فيه أبو حاتم فقال: ` كان صدوقا حسن الحديث `.
قلت: وهذا هو الراجح لدينا، وقال الحافظ في ` التقريب `: ` صدوق يهم `.
وزيد بن يحيى، هو إما زيد بن يحيى بن عبيد الخزاعي أبو عبد الله الدمشقي،
وإما زيد بن أبي الزرقاء يزيد الموصلي أبو محمد نزيل الرملة، ولم يترجح لدي
الآن أيهما المراد هنا، فكلاهما روى عن محمد بن راشد، ولكن أيهما كان فهو
ثقة.
وقد وجدت للحديث طريقا أخرى، أخرجه أبو يعلى في ` مسنده ` (225 / 1)
وابن عدي (ق 264 / 2) عن الفرات بن سلمان عن القاسم به، ولفظه:
` أول ما يكفأ الإسلام كما يكفأ الإناء في شراب يقال له: الطلاء `.
ثم رواه ابن عدي عن الفرات قال: حدثنا أصحاب لنا عن القاسم به.
وقال: ` الفرات هذا لم أر المتقدمين صرحوا بضعفه، وأرجو أنه لا بأس به،
لأني لم أر في رواياته حديثا منكرا `.
قلت: وقال ابن أبي حاتم (3 / 2 / 80) :
` سألت أبي عنه؟ فقال: لا بأس به، محله الصدق، صالح الحديث `.
وقال أحمد: ` ثقة `. كما في ` الميزان ` و ` اللسان `.
قلت: فالإسناد صحيح، ولا يضره جهالة أصحاب الفرات، لأنهم جمع ينجبر به
جهالتهم، ولعل منهم أبا وهب الكلاعي فإنه قد رواه عن القاسم كما في الطريق
الأولى، فالحديث صحيح. وقول الذهبي في ترجمة الفرات: ` حديث منكر ` منكر من
القول، ولعله لم يقف على الطريق الأولى، بل هذا هو الظاهر.
والله أعلم.
والحديث مما فات السيوطي فلم يورده في ` الجامع الكبير `، لا في بابا ` إن `
ولا في ` أول ` وإنما أورد فيه ما قد يصلح أن يكون شاهدا لهذا فقال
(1 / 274 / 2) :
` أول ما يكفأ أمتي عن الإسلام كما يكفأ الإناء، في الخمر. ابن عساكر عن ابن
عمرو `.
ثم رأيته في ` تاريخه ` (18 / 76 / 1) عن زيد بن يحيى بن عبيد حدثني ابن ثابت
ابن ثوبان عن إسماعيل بن عبد الله قال: سمعت ابن محيريز يقول: سمعت عبد الله
بن عمرو يقول فذكره وزاد في آخره ` قال: وقلت (لعله. وقطب) رسول الله
صلى الله عليه وسلم `.
وهذا إسناد لا بأس به في الشواهد.
وللحديث طريق أخرى بلفظ آخر عن عائشة، يأتي في الذي بعده.
(الطلاء) قال في ` النهاية `:
` بالكسر والمد: الشراب المطبوخ من عصير العنب، وهو الرب `.
ثم ذكر الحديث ثم قال:
` هذا نحو الحديث الآخر: سيشرب ناس من أمتي الخمر يسمونها بغير اسمها.
يريد: أنهم يشربون النبيذ المسكر، المطبوخ، ويسمونه طلاء، تحرجا من أن
يسموه خمرا `.
وللحديث شاهد صحيح بلفظ:
` ليستحلن طائفة من أمتي الخمر باسم يسمونها إياه، (وفي رواية) : يسمونها
بغير اسمها `.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:
"নিশ্চয়ই সর্বপ্রথম যে বিষয়টি উল্টে দেওয়া হবে— অর্থাৎ ইসলামের বিধান— তা হলো এমন, যেমন পাত্র উল্টে দেওয়া হয়— অর্থাৎ মদের ক্ষেত্রে (মদের বিধান)।"
তখন জিজ্ঞেস করা হলো: "হে আল্লাহর রাসূল! এটা কীভাবে হবে? অথচ আল্লাহ তো এ ব্যাপারে যা বলার তা স্পষ্ট করেই বলে দিয়েছেন?"
রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "তারা সেটিকে তার আসল নাম ব্যতীত অন্য নামে ডাকবে।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (90)


90 - ` ليستحلن طائفة من أمتي الخمر باسم يسمونها إياه، (وفي رواية) : يسمونها
بغير اسمها `.
أخرجه ابن ماجه (3385) وأحمد (5 / 318) وابن أبي الدنيا في ` ذم المسكر `
(ق 4 / 2) عن سعيد بن أوس الكاتب عن بلال بن يحيى العبسي عن أبي بكر ابن حفص
عن ابن محيريز عن ثابت بن السمط عن عبادة بن الصامت قال: قال رسول الله
صلى الله عليه وسلم.
قلت: وهذا إسناد جيد، رجاله كلهم ثقات، وابن محيريز اسمه عبد الله.
وهو ثقة من رجال الشيخين.
وأبو بكر بن حفص، هو عبد الله بن حفص بن عمر بن سعد بن أبي وقاص وهو ثقة
محتج به في ` الصحيحين ` أيضا.
وبلال بن يحيى العبسي، قال ابن معين:
` ليس به بأس `. ووثقه ابن حبان.
وقد تابعه شعبة، لكنه أسقط من الإسناد ` ثابت بن السمط ` وقال:
` عن رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم ` بالرواية الثانية.
أخرجه النسائي (2 / 330) ، وأحمد (4 / 237) ، وإسناده صحيح، وهو أصح
من الأول.
وروي عن أبي بكر بن حفص على وجه آخر، من طريق محمد بن عبد الوهاب أبي شهاب
عن أبي إسحاق الشيباني عن أبي بكر بن حفص عن ابن عمر قال:
قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره.
أخرجه الخطيب في ` تاريخ بغداد ` (6 / 205) .
قلت: ورجاله ثقات غير أبي شهاب هذا فلم أعرفه.
وللحديث شاهد يرويه سعيد بن أبي هلال عن محمد بن عبد الله بن مسلم أن أبا مسلم
الخولاني حج، فدخل على عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم فجعلت تسأله عن
الشام وعن بردها، فجعل يخبرها، فقالت: كيف تصبرون على بردها؟ فقال: يا أم
المؤمنين إنهم يشربون شرابا لهم، يقال له: الطلاء، فقالت: صدق الله وبلغ
حبي، سمعت حبي رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:
` إن ناسا من أمتي يشربون الخمر، يسمونها بغير اسمها `.
أخرجه الحاكم (2 / 147) والبيهقي (7 /




উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:

"আমার উম্মতের একটি দল অবশ্যই মদকে এমন নামে হালাল করে নেবে, যা তারা নিজেরাই এর নাম দেবে।" (অপর এক বর্ণনায় এসেছে: "তারা সেটিকে এর প্রকৃত নাম ব্যতীত অন্য নামে ডাকবে।")









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (91)


91 - ` ليكونن من أمتي أقوام يستحلون الحر والحرير والخمر والمعازف، ولينزلن
أقوام إلى جنب علم، يروح عليهم بسارحة لهم، يأتيهم لحاجة، فيقولون: ارجع
إلينا غدا، فيبيتهم الله، ويضع العلم، ويمسخ آخرين قردة وخنازير إلى يوم
القيامة `.
رواه البخاري في ` صحيحه ` تعليقا فقال (4 / 30) :
` باب ما جاء فيمن يستحل الخمر ويسميه بغير اسمه. وقال هشام بن عمار:
حدثنا صدقة بن خالد حدثنا عبد الرحمن بن يزيد بن جابر حدثنا عطية بن قيس
الكلابي حدثني عبد الرحمن بن غنم الأشعري قال: حدثني أبو عامر أو أبو مالك
الأشعري - والله ما كذبني - سمع النبي صلى الله عليه وسلم يقول ... ` فذكره.
وقد وصله الطبراني (1 / 167 / 1) والبيهقي (10 / 221) وابن عساكر
(19 / 79 / 2) وغيرهم من طرق عن هشام بن عمار به.
وله طريق أخرى عن عبد الرحمن بن يزيد، فقال أبو داود (4039) :
حدثنا عبد الوهاب بن نجدة حدثنا بشر بن بكر عن عبد الرحمن بن يزيد بن جابر به.
ورواه ابن عساكر من طريق أخرى عن بشر به.
قلت: وهذا إسناد صحيح ومتابعة قوية لهشام بن عمار وصدقة بن خالد، ولم يقف
على ذلك ابن حزم في ` المحلى `، ولا في رسالته في إباحة الملاهي، فأعل إسناد
البخاري بالانقطاع بينه وبين هشام، وبغير ذلك من العلل الواهية، التي بينها
العلماء من بعده وردوا عليه تضعيفه للحديث من أجلها، مثل المحقق ابن القيم في
` تهذيب السنن ` (5 /




আবু মালিক আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

"অবশ্যই আমার উম্মতের মধ্যে এমন কিছু লোক সৃষ্টি হবে, যারা ব্যভিচার, রেশমী বস্ত্র, মদ এবং বাদ্যযন্ত্রকে হালাল মনে করবে। আর একদল লোক একটি উঁচু পাহাড়ের পাদদেশে বসতি স্থাপন করবে। যখন তাদের পশুপাল সন্ধ্যার সময় তাদের কাছে ফিরে আসবে, তখন কোনো অভাবী ব্যক্তি (সাহায্যের) প্রয়োজনে তাদের কাছে এলে তারা বলবে: ’আগামীকাল আমাদের কাছে এসো।’ তখন আল্লাহ তাআলা রাতের বেলা তাদের উপর আযাব প্রেরণ করবেন, পাহাড়টিকে তাদের উপর ধ্বসিয়ে দেবেন এবং অন্য একদল লোককে কিয়ামত দিবস পর্যন্ত বানর ও শূকরে রূপান্তরিত করবেন।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (92)


92 - ` ما أنا بأقدر على أن أدع لكم ذلك على أن تشعلوا لي منها شعلة. يعني الشمس `.
رواه أبو جعفر البختري في ` حديث أبي الفضل أحمد بن ملاعب ` (47 /




আমি তা তোমাদের জন্য ছেড়ে দিতে এর চেয়ে বেশি সক্ষম নই, যতটা সক্ষম হব যদি তোমরা সূর্য থেকে আমার জন্য একটি মশাল জ্বালিয়ে দাও।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (93)


93 - ` تكون إبل للشياطين وبيوت للشياطين، فأما إبل الشياطين، فقد رأيتها يخرج
أحدكم بجنيبات معه قد أسمنها فلا يعلو بعيرا منها ويمر بأخيه قد انقطع به فلا
يحمله. وأما بيوت الشياطين فلم أرها `.
رواه أبو داود في ` الجهاد ` رقم (2568) من طريق ابن أبي فديك:
حدثني عبد الله بن أبي يحيى عن سعيد بن أبي هند قال: قال أبو هريرة
.. فذكره مرفوعا به وزاد.
` وكان سعيد يقول: ` لا أراها إلا هذه الأقفاص التي تستر الناس بالديباج `.
قلت: وهذا إسناد حسن رجاله كلهم ثقات رجال الشيخين، غير عبد الله ابن أبي
يحيى وهو عبد الله بن محمد بن أبي يحيى الأسلمي الملقب بـ ` سحبل ` وهو ثقة،
وابن أبي فديك هو محمد بن إسماعيل، وفيه كلام يسير.
والظاهر أنه عليه الصلاة والسلام عني بـ ` بيوت الشياطين ` هذه السيارات
الفخمة التي يركبها بعض الناس مفاخرة ومباهاة، وإذا مروا ببعض المحتاجين إلى
الركوب لم يركبوهم، ويرون أن إركابهم يتنافى مع كبريائهم وغطرستهم؟
فالحديث من أعلام نبوته صلى الله عليه وسلم.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

শয়তানদের কিছু উট থাকবে এবং শয়তানদের কিছু ঘর থাকবে। শয়তানদের উট—আমি তা দেখেছি। (তা হলো এই যে,) তোমাদের কেউ কেউ তার সাথে কিছু মোটাতাজা করা অতিরিক্ত উট নিয়ে বের হয়, কিন্তু সে সেগুলোর কোনোটিতে আরোহণ করে না। আর সে তার এমন ভাইয়ের পাশ দিয়ে অতিক্রম করে যে (যাত্রাপথে) আটকে গেছে বা যার (যানবাহন) বিকল হয়েছে, কিন্তু সে তাকে তাতে বহন করে না। আর শয়তানদের ঘরের কথা—তা আমি দেখিনি।

(বর্ণনাকারী সাঈদ ইবনু আবী হিন্দ বলতেন: আমার মনে হয়, শয়তানদের ঘর হলো সেই খাঁচাগুলো (পালকি বা হাওদা) যা দিয়ে মানুষকে দামি রেশমি কাপড় (দীবাজ) দ্বারা আবৃত করা হয়।)









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (94)


94 - ` من حلف بالأمانة فليس منا `.
رواه أبو داود (3253) : حدثنا أحمد بن يونس حدثنا زهير حدثنا الوليد بن ثعلبة
الطائي عن ابن بريدة عن أبيه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:
قلت: وهذا إسناد صحيح، رجاله كلهم ثقات. وابن بريدة اثنان: عبد الله
وسليمان، والأول أوثق وقد احتج به الشيخان.
وزهير هو ابن معاوية أبو خيثمة الكوفي وهو ثقة احتج به الشيخان أيضا.
ومثله أحمد بن يونس واسم أبيه عبد الله بن يونس.
والوليد بن ثعلبة وثقه ابن معين وابن حبان، وقد أخرج حديثه هذا في
` صحيحه ` (1318) .
قال الخطابي في ` معالم السنن ` (4 / 358) تعليقا على الحديث:
` هذا يشبه أن تكون الكراهة فيها من أجل أنه إنما أمر أن يحلف بالله وصفاته،
وليست الأمانة من صفاته، وإنما هي أمر من أمره، وفرض من فروضه، فنهوا عنه
لما في ذلك من التسوية بينها وبين أسماء الله عز وجل وصفاته `.




বুরাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি আমানতের নামে শপথ করে, সে আমাদের অন্তর্ভুক্ত নয়।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (95)


95 - ` انظر إليها، فإن في أعين الأنصار شيئا. يعني الصغر `.
أخرجه مسلم في ` صحيحه ` (4 / 142) وسعيد بن منصور في ` سننه ` (523)
وكذا النسائي (2 / 73) والطحاوي في ` شرح المعاني ` (2 / 8) والدارقطني
(396) والبيهقي (7 / 84) عن أبي حازم عن أبي هريرة:
` أن رجلا أراد أن يتزوج امرأة من نساء الأنصار، فقال رسول الله صلى الله عليه
وسلم `.
قلت: فذكره. والسياق للطحاوي، ولفظ مسلم والبيهقي:
` كنت عند النبي صلى الله عليه وسلم، فأتاه رجل، فأخبره أنه تزوج امرأة من
الأنصار، فقال له
رسول الله صلى الله عليه وسلم: أنظرت إليها؟ قال: لا،
قال: فانظر ... ` الحديث.
وقد جاء تعليل هذا الأمر في حديث صحيح وهو:
` انظر إليها فإنه أحرى أن يؤدم بينكما `.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট এসে তাঁকে জানাল যে, সে আনসারী মহিলাদের মধ্য থেকে একজনকে বিবাহ করেছে। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে জিজ্ঞাসা করলেন, ‘তুমি কি তাকে দেখেছ?’ সে বলল, ‘না।’

তিনি বললেন, ‘যাও, তাকে দেখে নাও।’ (অন্য বর্ণনায় এসেছে, তিনি বললেন) ‘তাকে দেখে নাও, কেননা আনসারদের চোখে কিছুটা বিশেষত্ব থাকে (অর্থাৎ ক্ষুদ্রতা বা লাজুকতার ভাব)।’

(আর এই দেখার নির্দেশ দেওয়ার কারণ হিসেবে তিনি আরও বললেন,) ‘তাকে দেখে নাও, কারণ এটি তোমাদের দুজনের মধ্যে ভালোবাসা ও সদ্ভাব সৃষ্টি করার জন্য অধিক উপযোগী।’









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (96)


96 - ` انظر إليها فإنه أحرى أن يؤدم بينكما `.
أخرجه سعيد بن منصور في ` سننه ` (




মুগীরাহ ইবনে শু‘বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

"তুমি তাকে দেখে নাও। কেননা, এটা তোমাদের দু’জনের মধ্যে প্রীতি ও গভীর সম্পর্ক স্থাপনকে অধিক উপযোগী করবে।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (97)


97 - ` إذا خطب أحدكم امرأة فلا جناح عليه أن ينظر إليها إذا كان إنما ينظر إليها
لخطبته، وإن كانت لا تعلم `.
أخرجه الطحاوي وأحمد (5 / 424) عن زهير بن معاوية قال: حدثنا عبد الله
ابن عيسى عن موسى بن عبد الله بن يزيد عن أبي حميد - وكان قد رأى النبي
صلى الله عليه وسلم قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكره.
قلت: وهذا إسناد صحيح، رجاله كلهم ثقات رجال مسلم.
وقد رواه الطبراني أيضا في ` الأوسط ` و ` الكبير ` كما في ` المجمع `
(4 / 276) وقال: ` ورجال أحمد رجال الصحيح `.
وسكت عليه الحافظ في ` التلخيص `.
وقد عمل بهذا الحديث بعض الصحابة وهو محمد بن مسلمة الأنصاري، فقال سهل
ابن أبي حثمة:
` رأيت محمد بن مسلمة يطارد بثينة بنت الضحاك فوق إجار لها ببصره طردا شديدا،
فقلت: أتفعل هذا وأنت من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ ! فقال: إني
سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:
` إذا ألقي في قلب امرىء خطبة امرأة فلا بأس أن ينظر إليها `.




আবু হুমায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যখন তোমাদের কেউ কোনো নারীকে বিবাহের প্রস্তাব দেবে, তখন তার দিকে দৃষ্টিপাত করাতে কোনো গুনাহ হবে না, যদি সে কেবল বিবাহের উদ্দেশেই তাকায়—যদিও সেই নারী তা না জানে।

(এই হাদীসের সমর্থনে) সহল ইবনে আবি হাছমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি মুহাম্মাদ ইবনে মাসলামা আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দেখলাম, তিনি বুসাইনা বিনতে দাহহাকের পিছু পিছু তার ঘরের ছাদের উপর দিয়ে তীক্ষ্ণ দৃষ্টিতে তাকে অনুসরণ করছেন। আমি বললাম, "আপনি কি এটি করছেন, অথচ আপনি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবী?" তিনি বললেন, "আমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: ‘যখন কোনো পুরুষের অন্তরে কোনো নারীকে বিবাহের প্রস্তাব দেওয়ার ইচ্ছা জাগে, তখন তার দিকে দৃষ্টিপাত করাতে কোনো সমস্যা নেই’।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (98)


98 - ` إذا ألقي في قلب امرئ خطبة امرأة فلا بأس أن ينظر إليها `.
رواه سعيد بن منصور في ` سننه ` (519) وكذا ابن ماجه (1864) والطحاوي
(2 / 8) والبيهقي
والطيالسي (1186) وأحمد (4 / 225) عن حجاج ابن أرطاة
عن محمد بن سليمان بن أبي حثمة عن عمه سليمان ابن أبي حثمة.
قلت: وهذا إسناد ضعيف من أجل الحجاج فإنه مدلس وقد عنعنه.
وقال البيهقي:
` إسناده مختلف، ومداره على الحجاج بن أرطاة، وفيما مضى كفاية `.
وتعقبه الحافظ البوصيري فقال في ` الزوائد ` (117 / 2) :
` قلت: لم ينفرد به الحجاج بن أرطاة، فقد رواه ابن حبان في ` صحيحه `
عن أبي يعلى عن أبي خيثمة عن أبي حازم، عن سهل بن أبي حثمة عن عمه سليمان
ابن أبي حثمة قال: رأيت محمد بن سلمة فذكره `.
قلت: كذا وجدته بخطي نقلا عن ` الزوائد `، فلعله سقط مني أو من ناسخ الأصل
شيء من سنده - وذاك ما استبعده - فإنه منقطع بين أبي خيثمة وأبي حازم، فإن
أبا خيثمة واسمه زهير بن حرب توفي سنة (274) ، وأما أبو حازم فهو إما سلمان
الأشجعي وإما سلمة بن دينار الأعرج وهو الأرجح وكلاهما تابعي، والثاني
متأخر الوفاة، مات سنة (140) .
ثم رأيت الحديث في ` زوائد ابن حبان ` (1225) مثلما نقلته عن البوصيري:
إلا أنه وقع فيه ` أبو خازم ` بالخاء المعجمة - عن ` سهل بن محمد ابن أبي
حثمة ` مكان ` سهيل بن أبي حثمة ` وسهل بن محمد بن أبي حثمة لم أجد له ترجمة
ولعله في ` ثقات ابن حبان ` فليراجع.
لكن للحديث طريقان آخران:
الأولى: عن إبراهيم بن صرمة عن يحيى بن سعيد الأنصاري عن محمد بن سليمان بن
أبي حثمة به.
أخرجه الحاكم (3 / 434) وقال:
` حديث غريب، وإبراهيم بن صرمة ليس من شرط هذا الكتاب `.
قال الذهبي في ` تلخيصه `:
` قلت: ضعفه الدارقطني، وقال أبو حاتم: شيخ `.
الثانية: عن رجل من أهل البصرة عن محمد بن سلمة مرفوعا به.
أخرجه أحمد (4 / 226) : حدثنا وكيع عن ثور عنه.
قلت: ورجاله ثقات غير الرجل الذي لم يسم.
وبالجملة فالحديث قوي بهذه الطرق، والله أعلم.
وقد ورد عن جابر مثل ما ذكرنا عن بن مسلمة كما يأتي.
وما ترجمنا به للحديث قال به أكثر العلماء، ففي ` فتح الباري ` (9 / 157) :
` وقال الجمهور: يجوز أن ينظر إليها إذا أراد ذلك بغير إذنها، وعن مالك
رواية: يشترط إذنها، ونقل الطحاوي عن قوم أنه لا يجوز النظر إلى المخطوبة
قبل العقد بحال، لأنها حينئذ أجنبية، ورد عليهم بالأحاديث المذكورة `.
فائدة:
روى عبد الرزاق في ` الأمالي ` (2 / 46 / 1) بسند صحيح عن ابن طاووس قال:
أردت أن أتزوج امرأة، فقال لي أبي: اذهب فانظر إليها، فذهبت فغسلت رأسي
وترجلت ولبست من صالح ثيابي، فلما رآني في تلك الهيئة قال: لا تذهب!
قلت: ويجوز له أن ينظر منها إلى أكثر من الوجه والكفين لإطلاق الأحاديث
المتقدمة ولقوله صلي الله عليه وسلم:
` إذا خطب أحدكم المرأة، فإن استطاع أن ينظر إلى ما يدعوه إلى نكاحها فليفعل `.




সুলাইমান ইবনু আবী হাছমাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

যখন কোনো পুরুষের অন্তরে কোনো নারীকে বিবাহের প্রস্তাব দেওয়ার ইচ্ছা জাগে, তখন তাকে দেখতে কোনো অসুবিধা নেই।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (99)


99 - ` إذا خطب أحدكم المرأة، فإن استطاع أن ينظر إلى ما يدعوه إلى نكاحها فليفعل `.
أخرجه أبو داود (2082) والطحاوي والحاكم والبيهقي وأحمد (3 / 334،
360) ، عن محمد بن إسحاق عن داود بن حصين عن واقد بن عبد الرحمن بن سعد بن
معاذ عن جابر بن عبد الله قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره.
قال:
` فخطبت جارية فكنت أتخبأ لها حتى رأيت منها ما دعاني إلى نكاحها وتزوجها `.
والسياق لأبي داود،
وقال الحاكم:
` هذا حديث صحيح على شرط مسلم `. ووافقه الذهبي.
قلت: ابن إسحاق إنما أخرج له مسلم متابعة، ثم هو مدلس وقد عنعنه، لكن قد
صرح بالتحديث في إحدى روايتي أحمد، فإسناده حسن، وكذا قال الحافظ في
` الفتح ` (9 / 156) ، وقال في ` التلخيص `:
` وأعله ابن القطان بواقد بن عبد الرحمن، وقال: المعروف واقد بن عمرو `.
قلت: رواية الحاكم فيها عن واقد بن عمرو وكذا هو عند الشافعي وعبد الرزاق `.
أقول: وكذلك هو عند جميع من ذكرنا غير أبي داود وأحمد في روايته الأخرى
فقالا: ` واقد بن عبد الرحمن `، وقد تفرد به عبد الواحد بن زياد خلافا لمن
قال: ` واقد بن عمرو ` وهم أكثر، وروايتهم أولى، وواقد بن عمرو ثقة من
رجال مسلم، أما واقد بن عبد الرحمن فمجهول. والله أعلم.
فقه الحديث:
والحديث ظاهر الدلالة لما ترجمنا له، وأيده عمل راويه به، وهو الصحابي
الجليل جابر بن عبد الله رضي الله عنه، وقد صنع مثله محمد بن مسلمة كما
ذكرناه في الحديث الذي قبله، وكفى بهما حجة، ولا يضرنا بعد ذلك، مذهب من
قيد الحديث بالنظر إلى الوجه والكفين فقط، لأنه تقييد للحديث بدون نص مقيد،
وتعطيل لفهم الصحابة بدون حجة، لاسيما وقد تأيد بفعل الخليفة الراشد عمر بن
الخطاب رضي الله عنه، فقال الحافظ في ` التلخيص ` (ص




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:
"যখন তোমাদের কেউ কোনো নারীকে বিবাহের প্রস্তাব দেবে, তখন যদি সে এমন কিছু দেখতে সক্ষম হয় যা তাকে তাকে বিবাহ করতে উৎসাহিত করে, তবে সে যেন তা করে।"

(জাবির রাঃ বলেন): "অতঃপর আমি এক দাসীকে বিবাহের প্রস্তাব দিলাম। আমি তার জন্য লুকিয়ে থাকতাম যতক্ষণ না আমি তার মধ্যে এমন কিছু দেখলাম যা আমাকে তাকে বিবাহ করতে উৎসাহিত করল, আর আমি তাকে বিবাহ করলাম।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (100)


100 - ` يا أبا ذر ألا أعلمك كلمات تدرك بهن من سبقك ولا يلحقك من خلفك إلا من أخذ
بمثل عملك؟ تكبر الله دبر كل صلاة ثلاثا وثلاثين، وتحمده ثلاثا وثلاثين
وتسبحه ثلاثا وثلاثين وتختمها بـ (لا إله إلا الله وحده لا شريك له، له
الملك وله الحمد وهو على كل شيء قدير) `.
رواه أبو داود (1504) : حدثنا عبد الرحمن بن إبراهيم، حدثنا الوليد بن مسلم
حدثنا الأوزاعي، حدثني حسان بن عطية قال: حدثني محمد بن أبي عائشة قال:
حدثني أبو هريرة قال:
` قال أبو ذر: يا رسول الله، ذهب أهل الدثور بالأجور، يصلون كما نصلي،
ويصومون كما نصوم، ولهم فضول أموال يتصدقون بها، وليس لنا مال نتصدق به،
فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره، وزاد في آخره:
` غفرت له ذنوبه ولو كانت مثل زبد البحر `.
قلت: وهذا إسناد صحيح رجاله كلهم ثقات رجال الصحيح، ولكني في شك من صحة هذه
الزيادة في الحديث بهذا الإسناد، فقد أخرجه أحمد (2 / 238) بهذا الإسناد:
حدثنا الوليد به، دونها. وكذلك أخرجه الدارمي من طريق أخرى فقال (1 / 312)
:
` أخبرنا الحكم بن موسى، حدثنا هقل عن الأوزاعي به، دونها `.
ومن الظاهر أنها غير منسجمة مع سياق الحديث، وقد جاءت هذه الزيادة في حديث
آخر لأبي هريرة، فأخشى أن يكون اختلط على بعض الرواة أحد الحديثين بالآخر
فدمجهما في سياق واحد! ولفظ الحديث المشار إليه يأتي في أول الجزء التالي إن
شاء الله.
وسبحانك اللهم وبحمدك، أشهد أن لا إله إلا أنت، أستغفرك وأتوب إليك.




আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বললাম: "হে আল্লাহর রাসূল! সম্পদশালীরা তো সব সওয়াব নিয়ে গেল। তারা আমাদের মতো সালাত আদায় করে, আমাদের মতো সাওম পালন করে, কিন্তু তাদের অতিরিক্ত সম্পদ রয়েছে যা তারা সাদকা করে। আমাদের তো এমন কোনো সম্পদ নেই যা আমরা সাদকা করতে পারি।"
তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে আবু যর! আমি কি তোমাকে এমন কিছু বাক্য শিখিয়ে দেব না, যার মাধ্যমে তুমি তোমার পূর্ববর্তীদের সমকক্ষ হতে পারবে এবং তোমার পরের কেউ তোমার স্তরে পৌঁছাতে পারবে না— কেবল তারা ছাড়া যারা তোমার মতো আমল করবে?

তুমি প্রত্যেক সালাতের পর ৩৩ বার ’আল্লাহু আকবার’ বলবে, ৩৩ বার ’আলহামদুলিল্লাহ’ বলবে এবং ৩৩ বার ’সুবহানাল্লাহ’ বলবে। আর তা শেষ করবে এই বলে: ’লা ইলাহা ইল্লাল্লাহু ওয়াহদাহু লা শারিকা লাহু, লাহুল মুলকু ওয়া লাহুল হামদু ওয়া হুয়া আলা কুল্লি শাইয়িন ক্বাদীর।’

তার সমস্ত গুনাহ ক্ষমা করে দেওয়া হবে, যদিও তা সমুদ্রের ফেনা সমতুল্য হয়।"