হাদীস বিএন


সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ





সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (61)


61 - ` لو يعلم الناس في الوحدة ما أعلم ما سار راكب بليل وحده (أبدا) `.
رواه البخاري (2 / 247) والترمذي (1 / 314) والدارمي (2 / 289)
وابن ماجه (3768) وابن حبان في ` صحيحه ` (




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ইরশাদ করেছেন: মানুষ একাকী (নিঃসঙ্গ) থাকার মধ্যে কী (ভয়াবহতা) রয়েছে, তা যদি জানত যা আমি জানি, তবে কোনো আরোহীই রাতে কখনো একা পথ চলত না।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (62)


62 - ` الراكب شيطان والراكبان شيطانان والثلاثة ركب `.
مالك (2 / 978 / 35) ، وعنه أبو داود (2607) ، وكذا الترمذي (1 / 314)
والحاكم (2 / 102) ، والبيهقي (5 / 267) ، وأحمد (2 / 186، 214) من
طريق عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده مرفوعا.
وسببه كما في ` المستدرك ` والبيهقي:
` أن رجلا قدم من سفر، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: من صحبت؟ فقال:
ما صحبت أحدا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: ` فذكره.
وقال الحاكم: ` صحيح الإسناد `.
ووافقه الذهبي.
وقال الترمذي: ` حديث حسن `.
قلت: وإسناده حسن، للخلاف في عمرو بن شعيب عن أبيه عن جده. والمتقرر فيه
أنه حسن كما فصلت القول فيه في ` صحيح أبي داود ` (رقم 124) .
وفي هذه الأحاديث تحريم سفر المسلم وحده وكذا لو كان معه آخر، لظاهر النهي
في الحديث الذي قبل هذا، ولقوله فيه: ` شيطان ` أي عاص، كقوله تعالى
(شياطين الإنس والجن) فإن معناه: عصاتهم كما قال المنذري.
وقال الطبري: ` هذا زجر أدب وإرشاد لما يخاف على الواحد من الوحشة، وليس
بحرام، فالسائر وحده بفلاة، والبائت في بيت وحده لا يأمن من الاستيحاش،
لاسيما إن كان ذا فكرة رديئة أو قلب ضعيف. والحق أن الناس يتفاوتون في ذلك،
فوقع الزجر لحسم المادة فيكره الانفراد سدا للباب، والكراهة في الاثنين أخف
منها في الواحد `.
ذكره المناوي في ` الفيض `.
قلت: ولعل الحديث أراد السفر في الصحارى والفلوات التي قلما يرى المسافر
فيها أحدا من الناس، فلا يدخل فيها السفر اليوم في الطرق المعبدة الكثيرة
المواصلات. والله أعلم.
ثم إن فيه ردا صريحا على خروج بعض الصوفية إلى الفلاة وحده للسياحة وتهذيب
النفس، زعموا! وكثيرا ما تعرضوا في أثناء ذلك للموت عطشا وجوعا، أو لتكفف
أيدي الناس، كما ذكروا ذلك في الحكايات عنهم. وخير الهدي هدي محمد صلى الله
عليه وآله وسلم.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "একাকী আরোহী (মুসাফির) হলো শয়তান, আর দুইজন আরোহী হলো দুই শয়তান। কিন্তু তিনজন হলো (নিরাপদ) কাফেলা।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (63)


63 - ` تبايعوني على السمع والطاعة في النشاط والكسل والنفقة في العسر واليسر
وعلى الأمر بالمعروف والنهي عن المنكر وأن تقولوا في الله لا تخافون في الله
لومة لائم وعلى أن تنصروني فتمنعوني إذا قدمت عليكم مما تمنعون منه أنفسكم
وأزواجكم وأبناءكم ولكم الجنة `.
رواه أحمد (3 / 322،




রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

তোমরা আমার কাছে বায়আত গ্রহণ করো এই মর্মে যে, তোমরা আমার কথা শুনবে এবং আমার আনুগত্য করবে উদ্যম ও অলসতা— উভয় অবস্থাতেই; আর অভাব ও প্রাচুর্য উভয় অবস্থায় অর্থ-সম্পদ ব্যয় করবে; তোমরা সৎকাজের আদেশ করবে ও অসৎকাজ থেকে নিষেধ করবে; আর আল্লাহর ব্যাপারে কথা বলার সময় তোমরা কোনো নিন্দুকের নিন্দার পরোয়া করবে না। আর তোমরা আমাকে সাহায্য করবে ও রক্ষা করবে, যখন আমি তোমাদের কাছে আসব, ঠিক যেভাবে তোমরা তোমাদের নিজেদের, তোমাদের স্ত্রীদের ও তোমাদের সন্তানদের রক্ষা করো। আর এর বিনিময়ে তোমাদের জন্য রয়েছে জান্নাত।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (64)


64 - ` من قال: سبحان الله العظيم وبحمده غرست له نخلة في الجنة `.
رواه ابن أبي شيبة في ` المصنف ` (12 / 125 / 2) والترمذي (2 / 258 / 259)
وابن حبان (2335) ، والحاكم (1 /




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: “যে ব্যক্তি ‘সুবহানাল্লাহিল আযীম ওয়া বিহামদিহি’ বলবে, তার জন্য জান্নাতে একটি খেজুর গাছ রোপণ করা হবে।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (65)


65 - ` لأن يزني الرجل بعشر نسوة أيسر عليه من أن يزني بامرأة جاره، ولأن يسرق
الرجل من عشر أبيات أيسر عليه من يسرق من جاره `.
رواه أحمد (6 / 8) ، والبخاري في ` الأدب المفرد ` (رقم 103) ،
والطبراني في ` الكبير ` (مجموع 6 / 80 / 2) عن محمد بن سعد الأنصاري
قال: سمعت أبا ظبية الكلاعي يقول: سمعت المقداد بن الأسود قال:
قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لأصحابه:
` ما تقولون في الزنا؟ قالوا: حرمه الله ورسوله، فهو حرام إلى يوم القيامة
قال: فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: ` فذكر الشطر الأول من الحديث ثم
سألهم عن السرقة، فأجابوا بنحو ما أجابوا عن الزنا، ثم ذكر صلى الله عليه
وسلم الشطر الثاني منه.
قلت: وهذا إسناد جيد، ورجاله كلهم ثقات، وقول الحافظ في الكلاعي هذا
` مقبول `، يعني عند المتابعة فقط، ليس بمقبول، فقد وثقه ابن معين.
وقال الدارقطني: ` ليس به بأس `. وذكره ابن حبان في ` الثقات ` (1 / 270)
فهو حجة.
وقال المنذري (3 / 195) ، والهيثمي (8 / 168) :
` رواه أحمد والطبراني في ` الكبير ` و ` الأوسط ورجاله ثقات `.




মিকদাদ ইবনুল আসওয়াদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:

কোনো ব্যক্তি যদি দশজন নারীর সাথে ব্যভিচার করে, তবে তা তার জন্য অপেক্ষাকৃত কম গুরুতর হবে, তার প্রতিবেশীর স্ত্রীর সাথে ব্যভিচার করার চেয়ে।

আর কোনো ব্যক্তি যদি দশটি বাড়ি থেকে চুরি করে, তবে তা তার জন্য অপেক্ষাকৃত কম গুরুতর হবে, তার প্রতিবেশীর বাড়ি থেকে চুরি করার চেয়ে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (66)


66 - ` إذا أدرك أحدكم (أول) سجدة من صلاة العصر قبل أن تغرب الشمس فليتم صلاته
وإذا أدرك (أول) سجدة من صلاة الصبح قبل أن تطلع الشمس فليتم صلاته `.
أخرجه البخاري في ` صحيحه ` (1 / 148) : حدثنا أبو نعيم قال: حدثنا شيبان
عن يحيى عن أبي سلمة عن أبي هريرة مرفوعا به، دون الزيادتين، وهما عند
النسائي والبيهقي وغيرهما، فقال النسائي (1 / 90) : أخبرنا عمرو بن منصور
قال حدثنا الفضل بن دكين به.
وهذا سند صحيح، فإن عمرا هذا ثقة ثبت كما في ` التقريب ` وباقي الرجال
معروفون، والفضل بن دكين هو أبو نعيم شيخ البخاري فيه وقد توبع هو والراوي
عنه على الزيادتين.
أما عمرو فتابعه محمد بن الحسين بن أبي الحنين عند البيهقي (1 / 368) وقال:
` رواه البخاري في ` الصحيح ` عن أبي نعيم الفضل بن دكين `.
ويعني أصل الحديث كما هي عادته، وإلا فالزيادتان ليستا عند البخاري كما عرفت
وأما أبو نعيم فتابعه حسين بن محمد أبو أحمد المروذي: حدثنا شيبان به.
أخرجه السراج في ` مسنده ` (ق 95 / 1) . وحسين هذا هو ابن بهرام التميمي،
وهو ثقة محتج به في ` الصحيحين `.
وللحديث عن أبي هريرة ستة طرق وقد خرجتها في كتابي: ` إرواء الغليل في تخريج
أحاديث منار السبيل ` الذي أنا في صدد تأليفه، يسر الله إتمامه ثم طبعه.
انظر (رقم 250 منه) .
وإنما آثرت الكلام على هذه الطريق لورود الزيادتين المذكورتين فيها، فإنهما
تحددان بدقة المعنى المراد من لفظ ` الركعة ` الوارد في طرق الحديث وهو إدراك
الركوع والسجدة الأولى معا، فمن لم يدرك السجدة لم يدرك الركعة، ومن لم
يدرك الركعة لم يدرك الصلاة.
من فوائد الحديث:
ومن ذلك يتبين أن الحديث يعطينا فوائد هامة:
الأولى: إبطال قول بعض المذاهب أن من طلعت عليه الشمس وهو في الركعة الثانية
من صلاة الفجر بطلت صلاته! وكذلك قالوا فيمن غربت عليه الشمس وهو في آخر
ركعة من صلاة العصر! وهذا مذهب ظاهر البطلان لمعارضته لنص الحديث كما صرح
بذلك الإمام النووي وغيره. ولا يجوز معارضة الحديث بأحاديث النهي عن الصلاة
في وقت الشروق والغروب لأنها عامة وهذا خاص، والخاص يقضي على العام كما هو
مقرر في علم الأصول.
وإن من عجائب التعصب للمذهب ضد الحديث أن يستدل البعض به لمذهبه في مسألة،
ويخالفه في هذه المسألة التي نتكلم فيها! وأن يستشكله آخر من أجلها!
فإلى الله المشتكى مما جره التعصب على أهله من المخالفات للسنة الصحيحة!
قال الزيلعي في ` نصب الراية ` (1 / 229) بعد أن ساق حديث أبي هريرة هذا
وغيره مما في معناه:
` وهذه الأحاديث أيضا مشكلة عند مذهبنا في القول ببطلان صلاة الصبح إذا طلعت
عليها الشمس، والمصنف استدل به على أن آخر وقت العصر ما لم تغرب الشمس `.!
فيا أيها المتعصبون! هل المشكلة مخالفة الحديث الصحيح لمذهبكم، أم العكس هو
الصواب! .
الفائدة الثانية: الرد على من يقول: إن الإدراك يحصل بمجرد إدراك أي جزء من
أجزاء الصلاة ولو بتكبيرة الإحرام وهذا خلاف ظاهر للحديث، وقد حكاه في
` منار السبيل ` قولا للشافعي، وإنما هو وجه في مذهبه كما في ` المجموع `
للنووي (3 / 63) وهو مذهب الحنابلة مع أنهم نقلوا عن الإمام أحمد أنه قال:
لا تدرك الصلاة إلا بركعة. فهو أسعد الناس بالحديث. والله أعلم.
قال عبد الله بن أحمد في مسائله (ص 46) :
` سألت أبي عن رجل يصلي الغداة، فلما صلى ركعة قام في الثانية طلعت الشمس
قال: يتم الصلاة، هي جائزة. قلت لأبي: فمن زعم أن ذلك لا يجزئه؟ فقال:
قال النبي صلى الله عليه وسلم: من أدرك من صلاة الغداة ركعة قبل أن تطلع الشمس
فقد أدرك `.
ثم رأيت ابن نجيح البزاز روى في ` حديثه ` (ق 111 / 1) بسند صحيح عن سعيد
ابن المسيب أنه قال: ` إذا رفع رأسه من آخر سجدة فقد تمت صلاته `.
ولعله يعني آخر سجدة من الركعة الأولى، فيكون قولا آخر في المسألة.
والله أعلم.
الفائدة الثالثة: واعلم أن الحديث إنما هو في المتعمد تأخير الصلاة إلى هذا
الوقت الضيق، فهو على هذا آثم بالتأخير، وإن أدرك الصلاة، لقوله صلى الله
عليه وسلم
` تلك صلاة المنافق، يجلس يرقب الشمس، حتى إذا كانت بين قرني
الشيطان، قام فنقرها أربعا، لا يذكر الله فيها إلا قليلا `. رواه مسلم
(2 / 110) وغيره من حديث أنس رضي الله عنه. وأما غير المتعمد، وليس هو
إلا النائم والساهي، فله حكم آخر، وهو أنه يصليها متى تذكرها ولو عند طلوع
الشمس وغروبها، لقوله صلى الله عليه وسلم ` من نسي صلاة (أو نام عنها)
فليصلها إذا ذكرها، لا كفارة لها إلا ذلك، فإن الله تعالى يقول: (أقم
الصلاة لذكري) `.
أخرجه مسلم أيضا (2 / 142) عنه، وكذا البخاري.
فإذن هنا أمران: الادراك والإثم:
والأول: هو الذي سيق الحديث لبيانه، فلا يتوهمن أحد من سكوته عن الأمر الآخر
أنه لا إثم عليه بالتأخير كلا، بل هو آثم على كل حال، أدرك الصلاة، أو لم
يدرك، غاية ما فيه أنه اعتبره مدركا للصلاة بإدراك الركعة، وغير مدرك لها
إذا لم يدركها، ففي الصورة الأولى صلاته صحيحة مع الإثم، وفي الصورة الأخرى
صلاته غير صحيحة مع الإثم أيضا، بل هو به أولى وأحرى، كما لا يخفى على أولي
النهى.
الفائدة الرابعة: ومعنى قوله صلى الله عليه وسلم: ` فليتم صلاته `، أي لأنه
أدركها في وقتها، وصلاها صحيحة، وبذلك برئت ذمته. وأنه إذا لم يدرك
الركعة فلا يتمها. لأنها ليست صحيحة، بسبب خروج وقتها، فليست مبرئة للذمة.
ولا يخفى أن مثله وأولى منه من لم يدرك من صلاته شيئا قبل خروج الوقت، أنه
لا صلاة له، ولا هي مبرئة لذمته. أي أنه إذا كان الذي لم يدرك الركعة لا
يؤمر
بإتمام الصلاة، فالذي لم يدركها إطلاقا أولى أن لا يؤمر بها، وليس ذلك
إلا من باب الزجر والردع له عن إضاعة الصلاة، فلم يجعل الشارع الحكيم لمثله
كفارة كي لا يعود إلى إضاعتها مرة أخرى، متعللا بأنه يمكنه أن يقضيها بعد
وقتها، كلا، فلا قضاء للمتعمد كما أفاده هذا الحديث الشريف وحديث أنس
السابق: ` لا كفارة لها إلا ذلك `.
ومن ذلك يتبين لكل من أوتي شيئا من العلم والفقه في الدين أن قول بعض
المتأخرين ` وإذا كان النائم والناسى للصلاة - وهما معذوران - يقضيانها بعد
خروج وقتها، كان المتعمد لتركها أولى `، أنه قياس خاطئ بل لعله من أفسد قياس
على وجه الأرض، لأنه من باب قياس النقيض على نقيضه، وهو فاسد بداهة، إذ كيف
يصح قياس غير المعذور على المعذور والمتعمد على الساهي.
ومن لم يجعل الله له كفارة، على من جعل الله له كفارة! ! وما سبب ذلك إلا
من الغفلة عن المعنى المراد من هذا الحديث الشريف، وقد وفقنا الله تعالى
لبيانه، والحمد لله تعالى على توفيقه.
وللعلامة ابن القيم رحمه الله تعالى بحث هام مفصل في هذه المسألة، أظن أنه لم
يسبق إلى مثله في الإفادة والتحقيق، وأرى من تمام هذا البحث أن أنقل منه
فصلين أحدهما في إبطال هذا القياس. والآخر في الرد على من استدل بهذا الحديث
على نقيض ما بينا.
قال رحمه الله تعالى بعد أن ذكر القول المتقدم:
` فجوابه من وجوه: أحدها المعارضة بما هو أصح منه أو مثله، وهو أن يقال:
لا يلزم من صحة القضاء بعد الوقت من المعذور - المطيع لله ورسوله الذي لم يكن
منه تفريط في فعل ما أمر به وقبوله منه - صحته وقبوله من متعد لحدود الله،
مضيع لأمره، تارك لحقه عمدا وعدوانا. فقياس هذا على هذا في صحة العبادة،
وقبولها منه، وبراءة الذمة بها من أفسد القياس `.
الوجه الثاني: أن المعذور بنوم أو نسيان لم يصل الصلاة في غير وقتها، بل في
نفس وقتها الذي وقته الله له، فإن الوقت في حق هذا حين يستيقظ ويذكر، كما
قال صلى الله عليه وسلم: ` من نسي صلاة فوقتها إذا ذكرها ` رواه البيهقي
والدارقطني.
فالوقت وقتان: وقت اختيار، ووقت عذر، فوقت المعذور بنوم أو سهو، هو وقت
ذكره واستيقاظه، فهذا لم يصل الصلاة إلا في وقتها، فكيف يقاس عليه من صلاها
في غير وقتها عمدا وعدوانا؟ !
الثالث: أن الشريعة قد فرقت في مواردها ومصادرها بين العامد والناسي، وبين
المعذور وغيره، وهذا مما لا خفاء به. فإلحاق أحد النوعين بالآخر غير جائز.
الرابع: أنا لم نسقطها عن العامد المفرط ونأمر بها المعذور، حتى يكون ما
ذكرتم حجة علينا، بل ألزمنا بها المفرط المتعدي على وجه لا سبيل له إلى
استدراكها تغليظا عليه، وجوزنا للمعذور غير المفرط.
(فصل) :
وأما استدلالكم بقوله صلى الله عليه وسلم: ` من أدرك ركعة من العصر قبل أن
تغرب الشمس فقد أدرك ` فما أصحه من حديث. وما أراه على مقتضى قولكم! فإنكم
تقولون: هو مدرك للعصر، ولو لم يدرك من وقتها شيئا البتة.
بمعنى أنه مدرك لفعلها صحيحة منه، مبرئة لذمته، فلو كانت تصح بعد خروج وقتها
وتقبل منه، لم يتعلق إدراكها بركعة، ومعلوم أن النبي صلى الله عليه وسلم لم
يرد أن من أدرك ركعة من العصر صحت صلاته بلا إثم بل هو آثم بتعمد ذلك اتفاقا.
فإنه أمر أن يوقع جميعها في وقتها، فعلم أن هذا الادراك لا يرفع الإثم، بل هو
مدرك آثم، فلو كانت تصح بعد الغروب، لم يكن فرق بين أن يدرك ركعة من الوقت،
أو لا يدرك منها شيئا.
فإن قلتم: إذا أخرها إلى بعد الغروب كان أعظم إثما.
قيل لكم: النبي صلى الله عليه وسلم لم يفرق بين إدراك الركعة وعدمها في كثرة
الإثم وخفته،
وإنما فرق بينهما في الإدراك وعدمه. ولا ريب أن المفوت
لمجموعها في الوقت أعظم من المفوت لأكثرها، والمفوت لأكثرها فيه، أعظم من
المفوت لركعة منها.
فنحن نسألكم ونقول: ما هذا الإدراك الحاصل بركعة؟ أهذا إدراك يرفع الإثم؟
فهذا لا يقوله أحد! أو إدراك يقتضي الصحة، فلا فرق فيه بين أن يفوتها بالكلية
أو يفوتها إلا ركعة منها `.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “তোমাদের মধ্যে কেউ যদি সূর্য অস্ত যাওয়ার পূর্বে আসরের সালাতের প্রথম সিজদা পায়, তাহলে সে যেন তার সালাত পূর্ণ করে নেয়। আর যদি সূর্য উদিত হওয়ার পূর্বে ফজরের সালাতের প্রথম সিজদা পায়, তাহলে সে যেন তার সালাত পূর্ণ করে নেয়।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (67)


67 - ` قوموا إلى سيدكم فأنزلوه، فقال عمر: سيدنا الله عز وجل، قال: أنزلوه،
فأنزلوه `.
أخرجه الإمام أحمد (6 /




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: (নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন,) “তোমরা তোমাদের নেতার (সরদারের) প্রতি সম্মানার্থে দাঁড়াও এবং তাকে (বাহন থেকে) নামিয়ে আনো (বা বসাও)।” তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, “আমাদের নেতা তো হলেন আল্লাহ আযযা ওয়া জাল (মহা মহিমান্বিত ও সর্বশক্তিমান)।” তিনি (নবী সাঃ) বললেন, “তাকে নামিয়ে আনো।” অতঃপর তারা তাঁকে (বাহন থেকে) নামিয়ে আনলেন (বা বসালেন)।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (68)


68 - ` لقد نزلت علي الليلة آيات ويل لمن قرأها ولم يتفكر فيها: (إن في خلق
السموات والأرض) الآية `.
رواه أبو الشيخ ابن حبان في ` أخلاق النبي صلى الله عليه وسلم ` (




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:

"নিশ্চয়ই আজ রাতে আমার উপর কয়েকটি আয়াত নাযিল হয়েছে। দুর্ভোগ তার জন্য, যে তা পাঠ করল কিন্তু তাতে চিন্তা-গবেষণা করল না। [তা হলো এই আয়াত:] ‘নিশ্চয়ই আকাশমণ্ডলী ও পৃথিবীর সৃষ্টির মধ্যে…’ (সম্পূর্ণ আয়াতটি)।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (69)


69 - ` مثل القائم على حدود الله والواقع (وفي رواية: والراتع) فيها
والمدهن فيها كمثل قوم استهموا على سفينة في البحر فأصاب بعضهم أعلاها
وأصاب بعضهم أسفلها (وأوعرها) فكان الذي (وفي رواية: الذين) في أسفلها
إذا استقوا من الماء فمروا على من فوقهم فتأذوا به (وفي رواية: فكان الذين
في أسفلها يصعدون فيستقون الماء فيصبون على الذين في أعلاه فقال الذين في
أعلاها: لا ندعكم تصعدون فتؤذوننا) ، فقالوا: لو أنا خرقنا في نصيبنا خرقا
فاستقينا منه ولم نؤذ من فوقنا (وفي رواية: ولم نمر على أصحابنا فنؤذيهم)
فأخذ فأسا فجعل ينقر أسفل السفينة،
فأتوه فقالوا: مالك؟ قال: تأذيتم بي
ولابد لي من الماء. فإن تركوهم وما أرادوا هلكوا جميعا وإن أخذوا على أيديهم
نجوا وأنجوا جميعا `.
رواه البخاري (2 / 111، 164) والترمذي (2 / 26) والبيهقي (10 / 288)
وأحمد (4 / 268، 270، 273) من طريق زكريا بن أبي زائدة والأعمش عن الشعبي
عن النعمان بن بشير عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: فذكره.
وقال الترمذي: ` حديث حسن صحيح `.
وقد تابعهما مجالد بن سعيد عند أحمد (4 / 273) وهو ضعيف وفي سياقه زيادة
` ... مثل ثلاثة ركبوا في سفينة فصار لأحدهم أسفلها وأوعرها ... `.
وتابعهما غيره فقال ابن المبارك في ` الزاهد ` (ق 219 / 2) : أنا الأجلح عن
الشعبي به ولفظه:
` إن قوما ركبوا سفينة فاقتسموها، فأصاب كل رجل منهم مكانا، فأخذ رجل منهم
الفأس فنقر مكانه، قالوا: ما تصنع؟ فقال مكاني أصنع به ما شئت! فإن أخذوا
على يديه نجوا ونجا، وإن تركوه غرق وغرقوا، فخذوا على أيدي سفهائكم قبل
أن تهلكوا `.
وأخرجه ابن المبارك في ` حديثه ` أيضا (ج 2 / 107 / 2) ومن طريقه ابن أبي
الدنيا في ` الأمر بالمعروف ` (ق 27 / 2) .
لكن الأجلح هذا - وهو ابن عبد الله أبو حجية الكندي - فيه ضعف، لاسيما عن
الشعبي،
قال العقيلي: ` روى عن الشعبي أحاديث مضطربة لا يتابع عليها `.
قلت: وهذا اللفظ هو الذي شاع في هذا الزمان عند بعض الكتاب والمؤلفين فأحببت
أن أنبه على ضعفه، وأن أرشد إلى أن اللفظ الأول هو الصحيح المعتمد، وقد
ضممت إليه ما وقفت عليه من الزيادات الصحيحة. والله الموفق.




নোমান ইবনে বাশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম ইরশাদ করেছেন:

আল্লাহর নির্ধারিত সীমারেখার (বিধি-নিষেধের) ওপর অবিচল ব্যক্তি এবং তাতে লিপ্ত (সীমা লঙ্ঘনকারী) বা উদাসীন ব্যক্তির দৃষ্টান্ত হলো একদল লোকের মতো, যারা সমুদ্রে চলমান একটি জাহাজে স্থান ভাগ করে নেওয়ার জন্য লটারি করলো। তাতে কিছু লোক জাহাজের ওপরের অংশ পেল এবং কিছু লোক নিচের, অপেক্ষাকৃত কষ্টকর অংশ পেল।

নিচের অংশে যারা ছিল, তাদের যখন পানির প্রয়োজন হতো, তখন তারা ওপরের অংশের লোকদের অতিক্রম করে যেত, ফলে ওপরের লোকেরা কষ্ট পেত। (অন্য বর্ণনায় এসেছে, যারা নিচের অংশে ছিল তারা ওপরে উঠে পানি সংগ্রহ করতো এবং তা ওপরের লোকদের ওপরও পড়তো, ফলে ওপরের অংশের লোকেরা বলল: আমরা তোমাদের ওপরে উঠতে দেব না, কারণ তোমরা আমাদের কষ্ট দাও।)

তখন নিচের অংশের লোকেরা বলল: যদি আমরা আমাদের ভাগে একটি ছিদ্র করে নিই এবং সেখান থেকেই পানি সংগ্রহ করি, তবে আর আমাদের ওপরের লোকদের কষ্ট দিতে হবে না। (অন্য বর্ণনায়: ...আর আমাদের সাথীদের বিরক্ত করতে হবে না।) এরপর তাদের একজন একটি কুঠার নিলো এবং জাহাজের নিচে ছিদ্র করতে শুরু করলো।

অন্যরা তার কাছে এসে জিজ্ঞাসা করল: তুমি কী করছো? সে বলল: তোমরা আমার দ্বারা কষ্ট পাও, অথচ আমার জন্য পানির প্রয়োজন।

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: যদি তারা এদের তাদের ইচ্ছামতো কাজ করতে দিত, তবে সবাই ধ্বংস হয়ে যেত। আর যদি তারা তাদের হাত ধরে থামিয়ে দিত, তবে তারা নিজেরাও রক্ষা পেত এবং অন্যদেরও রক্ষা করত।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (70)


70 - ` كان رسول الله صلى الله عليه وسلم ليدلع لسانه للحسن بن علي فيرى الصبي حمرة
لسانه فيبهش إليه `.
رواه أبو الشيخ ابن حبان في ` كتاب أخلاق النبي صلى الله عليه وسلم وآدابه `
(ص 90) من طريق محمد بن عمرو عن أبي سلمة عن أبي هريرة به.
قلت: وهذا إسناد حسن.
(قوله) فيبهش. أي يسرع. في ` النهاية `:
` يقال للإنسان إذا نظر إلى الشيء فأعجبه واشتهاه وأسرع إليه: قد بهش إليه `.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হাসান ইবনে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জন্য নিজের জিহ্বা বের করে দিতেন। ফলে শিশুটি যখন তাঁর জিহ্বার লালচে ভাব দেখতে পেত, তখন সে আনন্দের সাথে সেটির দিকে দ্রুত ছুটে যেত (বা আগ্রহের সাথে এগিয়ে আসত)।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (71)


71 - ` كان إذا قرب إليه الطعام يقول: بسم الله، فإذا فرغ قال: اللهم أطعمت
وأسقيت وأقنيت وهديت وأحييت، فلله الحمد على ما أعطيت `.
رواه أحمد (4 / 62، 5 / 375) وأبو الشيخ في ` أخلاق النبي صلى الله عليه
وسلم (ص 238) عن بكر بن عمرو عن عبد الله بن هبيرة السبائي عن عبد الرحمن
ابن جبير أنه حدثه رجل خدم رسول الله صلى الله عليه وسلم ثمان سنين أنه كان
يسمع رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا قرب `. الحديث.
قلت: وهذا إسناد صحيح رجاله كلهم ثقات رجال مسلم.
(أقنيت) أي ملكت المال وغيره.
وفي هذا الحديث أن التسمية في أول الطعام بلفظ ` بسم الله ` لا زيادة فيها،
وكل الأحاديث الصحيحة التي وردت في الباب كهذا الحديث ليس فيها الزيادة، ولا
أعلمها وردت في حديث، فهي بدعة عند الفقهاء بمعنى البدعة، وأما المقلدون
فجوابهم معروف: ` شو فيها؟ ! `.
فنقول: فيها كل شيء وهو الاستدراك على الشارع الحكيم الذي ما ترك شيئا يقربنا
إلى الله إلا أمرنا به وشرعه لنا، فلو كان ذلك مشروعا ليس فيه شيء لفعله ولو
مرة واحدة، وهل هذه الزيادة إلا كزيادة الصلاة على النبي صلى الله عليه وسلم
من العاطس بعد
الحمد.
وقد أنكرها عبد الله بن عمر رضي الله عنه كما في ` مستدرك الحاكم `، وجزم
السيوطي في ` الحاوي للفتاوي ` (1 / 338) بأنها بدعة مذمومة، فهل يستطيع
المقلدون الإجابة عن السبب الذي حمل السيوطي على الجزم بذلك!! قد يبادر بعض
المغفلين منهم فيتهمه - كما هي عادتهم - بأنه وهابي! مع أن وفاته كانت قبل
وفاة محمد بن عبد الوهاب بنحو ثلاثمائة سنة! ! ويذكرني هذا بقصة طريفة في بعض
المدارس في دمشق، فقد كان أحد الأساتذة المشهورين من النصارى يتكلم عن حركة
محمد بن عبد الوهاب في الجزيرة العربية، ومحاربتها للشرك والبدع والخرافات
ويظهر أنه أطرى في ذلك فقال بعض تلامذته: يظهر أن الأستاذ وهابي! !
وقد يسارع آخرون إلى تخطئة السيوطي، ولكن أين الدليل؟ ! والدليل معه وهو
قوله صلى الله عليه وسلم:
` من أحدث في أمرنا هذا ما ليس منه فهو رد `. متفق عليه.
وفي الباب غيره مما سنجمعه في كتابنا الخاص بالبدعة، نسأل الله تعالى أن ييسر
لنا إتمامه بمنه وفضله.




রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর একজন খাদেম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন:

যখন তাঁর (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর) নিকট খাবার আনা হতো, তখন তিনি বলতেন: "বিসমিল্লাহ।"

আর যখন তিনি (খাবার থেকে) ফারেগ হতেন, তখন বলতেন: "আল্লাহুম্মা আত্ব’আমতা ওয়া আসক্বাইতা ওয়া আক্বনাইতা ওয়া হাদাইতা ওয়া আহ্‌ইয়াইতা, ফালিল্লাহিল হামদু ’আলা মা আ’ত্বাইতা।"

(অর্থাৎ: হে আল্লাহ! আপনিই খাইয়েছেন, পান করিয়েছেন, সম্পদশালী করেছেন, হেদায়াত দিয়েছেন এবং জীবন দান করেছেন। সুতরাং আপনি যা কিছু দান করেছেন, তার জন্য আল্লাহ তাআলারই যাবতীয় প্রশংসা।)









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (72)


72 - ` أحب للناس ما تحب لنفسك `.
رواه البخاري في ` التاريخ الكبير ` (2 / 4 / 317 / 3155) وعبد بن حميد
في ` المنتخب من المسند ` (53 / 2) وابن سعد (7 / 428) والقطيعي في
` الجزء المعروف بالألف دينار ` (29 / 2) عن سيار عن خالد بن عبد الله
القسري عن أبيه:
` أن النبي صلى الله عليه وسلم، قال لجده يزيد بن أسيد.... ` فذكره.
ورواه عن روح بن عطاء بن أبي ميمونة، قال، حدثنا سيار به إلا أنه قال:
حدثني أبي عن جدي قال: ` قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم:
أتحب الجنة؟ وقال فأحب.. ` الحديث.
رواه بن عساكر (5 / 242) عن القطيعي من الوجه الثاني والحاكم (4 / 168)
وقال: ` صحيح الإسناد `، ووافقه الذهبي.
قلت: وخالد بن عبد الله القسري هو الدمشقي الأمير قال الذهبي في ` الميزان `
` صدوق، لكنه ناصبي بغيض ظلوم، قال بن معين: رجل سوء يقع في علي رضى الله
عنه `. وذكره ابن حبان في ` الثقات ` (2 / 72) .
وأبوه عبد الله بن يزيد أورده ابن أبي حاتم (2 / 2 / 197) ولم يذكر فيه
جرحا ولا تعديلا. وذكره ابن حبان في ` الثقات ` (1 / 123) .
والحديث قال الهيثمي في ` مجمع الزوائد ` (8 / 186) !
` رواه عبد الله والطبراني في ` الكبير ` و ` الأوسط ` بنحوه ورجاله ثقات `.
وللحديث شاهد من حديث أبي هريرة بلفظ:
` وأحب للناس ما تحب لنفسك تكن مؤمنا `. الحديث.
أخرجه الترمذي (2 / 50) وأحمد (2 / 310) .
وقال الترمذي: ` حديث غريب، والحسن لم يسمع من أبي هريرة `.
قلت: وراويه عن الحسن - وهو البصري - أبو طارق وهو مجهول كما في
` التقريب
`
ومما يشهد له أيضا:
` لا يؤمن أحدكم حتى يحب لأخيه ما يحب لنفسه (من الخير) `.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

তুমি মানুষের জন্য সেটাই ভালোবাসো যা তুমি তোমার নিজের জন্য ভালোবাসো, তাহলে তুমি (পূর্ণাঙ্গ) মুমিন হতে পারবে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (73)


73 - ` لا يؤمن أحدكم حتى يحب لأخيه ما يحب لنفسه (من الخير) `.
أخرجه البخاري (1 / 11) ، ومسلم (1 / 49) ، وأبو عوانة في ` صحيحه `
(1 / 33) ، والنسائي (2 / 271، 274) ، والترمذي (2 / 84) ، والدارمي
(2 / 307) ، وابن ماجه (رقم 66) ، والطيالسي (رقم 2004) ، وأحمد
(3 / 177، 207، 275، 278) من حديث أنس بن مالك مرفوعا.
وقال الترمذي: ` حديث صحيح `.
والزيادة لأبي عوانة والنسائي وأحمد في رواية لهم وإسنادها صحيح.
وللحديث شاهد من حديث علي مرفوعا بلفظ:
` للمسلم على المسلم ست.... ويحب له ما يحب لنفسه، وينصح له بالغيب `.
أخرجه الدارمي (2 /




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তোমাদের কেউ ততক্ষণ পর্যন্ত (পূর্ণাঙ্গ) ঈমানদার হতে পারবে না, যতক্ষণ না সে তার ভাইয়ের জন্য সেই কল্যাণ (বা উত্তম জিনিস) পছন্দ করবে, যা সে নিজের জন্য পছন্দ করে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (74)


74 - ` ما جلس قوم مجلسا لم يذكروا الله فيه ولم يصلوا على نبيهم إلا كان عليهم ترة
فإن شاء عذبهم وإن شاء غفر لهم `.

أخرجه الترمذي (2 / 242) ، والحاكم (1 / 496) ، وإسماعيل القاضي في
` فضل الصلاة على النبي صلى الله عليه وسلم (رقم 54 طبع المكتب الإسلامي) ،
وابن السني في ` عمل اليوم والليلة ` (رقم 443) ، وأحمد (2 / 446، 453،
481، 484، 495) وأبو نعيم في ` الحلية ` (8 / 130) عن سفيان الثوري عن
صالح مولى التوأمة عن أبي هريرة مرفوعا.
وقال الترمذي:
` حديث حسن صحيح، وقد روي من غير وجه عن أبي هريرة مرفوعا `.
ثم رواه من طريق أبي إسحاق عن الأغر أبي مسلم عن أبي هريرة وأبي سعيد معا
مرفوعا قال: ` مثله `، ولم يسق لفظه.
كذا قال: ` مثله `، وعندي وقفة في كون حديث الأغر مثله، فقد أخرجه مسلم
(8 / 72) وابن ماجه (2 / 418) بلفظ:
` ما جلس قوم مجلسا يذكرون الله فيه، إلا حفتهم الملائكة، وتغشتهم الرحمة،
ونزلت عليهم السكينة، وذكرهم الله فيمن عنده `.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,
"যখন কোনো দল বা গোষ্ঠী এমন কোনো মজলিসে বসে, যেখানে তারা আল্লাহ তাআলার জিকির (স্মরণ) করে না এবং তাদের নবীর প্রতি দরূদ পাঠ করে না, তখন সেই মজলিস তাদের জন্য অনুশোচনা বা আফসোসের কারণ হয়। অতঃপর আল্লাহ চাইলে তাদের শাস্তি দেবেন এবং চাইলে তাদের ক্ষমা করে দেবেন।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (75)


75 - ` ما جلس قوم مجلسا يذكرون الله فيه إلا حفتهم الملائكة وتغشتهم الرحمة ونزلت
عليهم السكينة وذكرهم الله فيمن عنده `.
والسياق لابن ماجه، ورواه الترمذي قبل حديث الباب بحديثين وقال:
` حسن صحيح `.، وقوله: ` مثله `. فالله أعلم.
فإني في شك من ثبوت ذلك عن الترمذي وإن كان ورد ذلك في بعض نسخ كتابه.
فقد أورد السيوطي في ` الجامع الصغير ` هذا الحديث من رواية الترمذي،
وابن ماجه عن أبي هريرة وأبي سعيد معا.
وفي عزوه لابن ماجه نظر أيضا، فإني لم أجد عنده إلا اللفظ الثاني الذي رواه
مسلم. والعلم عند الله تعالى.
ولم يقع في نسخة ` السنن ` التي عليها شرح ` تحفة الأحوذي ` سوق هذا الإسناد
الثاني عقب حديث الباب.
ولهذا اللفظ عنده طريق أخرى عن أبي هريرة مرفوعا بلفظ:
`.... وما اجتمع قوم في بيت من بيوت الله يتلون كتاب الله، ويتدارسونه
بينهم، إلا نزلت عليهم السكينة ... ` والباقي مثله.
وصالح مولى التوأمة الذي في اللفظ الأول ضعيف لاختلاطه، ولكنه لم يتفرد به
بل تابعه جماعة منهم: أبو صالح السمان ذكوان بلفظ:
` ما قعد قوم مقعدا لم يذكروا فيه الله عز وجل، ويصلوا على النبي صلى الله
عليه وسلم، إلا كان عليهم حسرة يوم القيامة، وإن دخلوا الجنة للثواب `.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

"যখনই কোনো সম্প্রদায় এমন কোনো মজলিসে বসে যেখানে তারা আল্লাহকে স্মরণ করে, তখন ফেরেশতারা তাদের ঘিরে ফেলেন, রহমত তাদের আচ্ছন্ন করে নেয়, তাদের ওপর প্রশান্তি (সাকীনাহ) নেমে আসে এবং আল্লাহ্‌ তাঁর নিকট যারা আছেন (অর্থাৎ উচ্চতর ফেরেশতাদের মজলিসে), তাদের মধ্যে তাদের আলোচনা করেন।"

(এই হাদীসের অন্য একটি সূত্রে আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত হয়েছে, তিনি আরও বলেছেন:)

"আর যখনই কোনো সম্প্রদায় আল্লাহর ঘরসমূহের (মসজিদের) কোনো একটি ঘরে একত্রিত হয়ে আল্লাহর কিতাব তিলাওয়াত করে এবং নিজেরা তা অধ্যয়ন ও আলোচনা করে, তখন তাদের ওপর অবশ্যই সাকীনাহ (প্রশান্তি) নেমে আসে..." (এবং বাকি বিষয়গুলো অনুরূপ)।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (76)


76 - ` ما قعد قوم مقعدا لم يذكروا فيه الله عز وجل ويصلوا على النبي صلى الله
عليه وسلم إلا كان عليهم حسرة يوم القيامة وإن دخلوا الجنة للثواب `.
رواه أحمد (2 / 463) ، وابن حبان في ` صحيحه ` (




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: কোনো সম্প্রদায় যদি কোনো মজলিসে বা স্থানে সমবেত হয়, যেখানে তারা মহামহিম আল্লাহ তাআলার যিকির করে না এবং নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের ওপর দরূদ পড়ে না, তবে কিয়ামতের দিন তা তাদের জন্য আফসোস বা পরিতাপের কারণ হবে—যদিও তারা (অন্যান্য নেক আমলের কারণে) প্রতিদানস্বরূপ জান্নাতে প্রবেশ করে থাকে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (77)


77 - ` ما من قوم يقومون من مجلس لا يذكرون الله فيه إلا قاموا على مثل جيفة حمار
وكان عليهم حسرة يوم القيامة `.
(عن سهيل بن أبي صالح عن أبيه) :
رواه أبو داود (4855) ، والطحاوي (2 / 367) ، وأبو الشيخ في ` طبقات
الأصبهانيين ` (229) ، وابن بشران في ` الأمالي ` (30 / 6 / 1 عام 3927) ،
وابن السني (439) ، والحاكم (1 / 492) ، وأبو نعيم (7 / 207)
وأحمد
(2 / 389، 515، 527) .
وقال الحاكم: ` صحيح على شرط مسلم `. ووافقه الذهبي، وهو كما قالا.
ومنهم سعيد بن أبي سعيد المقبري ولفظه:
` من قعد مقعدا لم يذكر الله فيه، كانت عليه من الله ترة، ومن اضطجع مضجعا
لا يذكر الله فيه، كانت عليه من الله ترة `.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

এমন কোনো দল নেই যারা কোনো বৈঠক থেকে উঠে যায়, আর তাতে আল্লাহকে স্মরণ করে না, তবে তারা যেন গাধার মৃতদেহের উপর থেকে উঠে গেল। আর কিয়ামতের দিন এটি তাদের জন্য আফসোস ও পরিতাপের কারণ হবে।

[অন্য একটি শব্দে বর্ণিত হয়েছে]: যে ব্যক্তি কোনো স্থানে বসলো এবং সেখানে আল্লাহকে স্মরণ করলো না, আল্লাহর পক্ষ থেকে তার উপর একটি ক্ষতি (বা বোঝা) চাপানো হলো। আর যে ব্যক্তি কোনো শয্যায় শুয়ে পড়লো এবং সেখানে আল্লাহকে স্মরণ করলো না, তার উপর আল্লাহর পক্ষ থেকে একটি ক্ষতি (বা বোঝা) চাপানো হলো।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (78)


78 - ` من قعد مقعدا لم يذكر الله فيه كانت عليه من الله ترة ومن اضطجع مضجعا
لا يذكر الله فيه كانت عليه من الله ترة `.
رواه أبو داود (4856، 5059) . والحميدي في ` مسنده ` (1158) الشطر الأول
وابن السني (743) الشطر الثاني فقط من طريق محمد بن عجلان عنه.
قلت: وهذا إسناد حسن.
وعزاه المنذري في ` الترغيب ` (2 / 235) لأبي داود بهذا اللفظ وبزيادة:
` وما مشى أحد ممشى لم يذكر الله فيه، إلا كان عليه من الله ترة `،
ثم قال: ` ورواه أحمد وابن أبي الدنيا والنسائي وابن حبان في ` صحيحه `
كلهم بنحو أبي داود `.
ولي عليه ملاحظتان:
الأولى: أن الزيادة المذكورة ليست عند أبي داود في الموضعين المشار إليهما من
كتابه وإنما هي عند ابن حبان (2321) : وعنده بدل قضية الاضطجاع:
` وما أوى أحد إلى فراشه ولم يذكر الله فيه إلا كان عليه ترة `.
(ترة) أي نقصا، والهاء فيه عوض من الواو المحذوفة.
الثانية: أن أحمد لم يروه من هذا الطريق باللفظ المذكور، وإنما رواه من طريق
أخرى باللفظ الآتي:
ومنهم أبو إسحاق مولى الحارث ولفظه:
` ما جلس قوم مجلسا فلم يذكروا الله فيه، إلا كان عليهم ترة، وما من رجل مشى
طريقا فلم يذكر الله عز وجل، إلا كان عليه ترة، وما من رجل أوى إلى فراشه
فلم يذكر الله، إلا كان عليه ترة `.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

যে ব্যক্তি কোনো মজলিসে উপবেশন করল এবং সেখানে আল্লাহকে স্মরণ (যিকির) করল না, তার উপর আল্লাহর পক্ষ থেকে অবশ্যই অনুশোচনা বা ক্ষতি (তরাহ) বর্তাবে। আর যে ব্যক্তি কোনো স্থানে শয়ন করল এবং সেখানে আল্লাহকে স্মরণ করল না, তার উপরও আল্লাহর পক্ষ থেকে অবশ্যই অনুশোচনা বা ক্ষতি (তরাহ) বর্তাবে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (79)


79 - ` ما جلس قوم مجلسا فلم يذكروا الله فيه إلا كان عليهم ترة وما من رجل مشى
طريقا فلم يذكر الله عز وجل إلا كان عليه ترة وما من رجل أوى إلى فراشه
فلم يذكر الله إلا كان عليه ترة `.
رواه أحمد (2 / 432) ، وابن السني (375) ، والحاكم (1 / 550) عن سعيد
بن أبي سعيد عن أبي إسحاق به.
وقال أحمد: ` عن إسحاق ` وقال الحاكم: ` عن إسحاق بن عبد الله بن الحارث `
وقال:
` صحيح على شرط البخاري `. وقال الذهبي: ` على شرط مسلم `.
قلت: وفي كل ذلك نظر، فإن إسحاق هذا إن كان ابن عبد الله بن الحارث كما
وقع لدى الحاكم فليس من رجال البخاري ولا مسلم ولكنه ثقة روى عنه جماعة.
وإن كان أبا إسحاق مولى الحارث فلا يعرف كما قال الذهبي، وإن كان إسحاق
غير منسوب فلم أعرفه.
وفي ` المجمع ` (10 / 80) : ` رواه أحمد وأبو إسحاق مولى عبد الله بن
الحارث بن نوفل لم يوثقه أحد، ولم يجرحه أحد وبقية رجال أحد إسنادي أحمد
رجال الصحيح `.
وله شاهد من حديث ابن عمرو بلفظ:
` ما من قوم جلسوا مجلسا لم يذكروا الله فيه، إلا رأوه حسرة يوم القيامة `.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

"যখন কোনো দল কোনো মজলিসে বসে এবং সেখানে আল্লাহকে স্মরণ না করে, তবে তা তাদের জন্য (পরকালে) আফসোস বা অনুতাপের কারণ হয়। আর যখন কোনো ব্যক্তি কোনো পথে হাঁটে এবং আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লাকে স্মরণ না করে, তবে তা তার জন্য অনুতাপের কারণ হয়। আর যখন কোনো ব্যক্তি তার বিছানায় যায় এবং আল্লাহকে স্মরণ না করে, তবে তা তার জন্য অনুতাপের কারণ হয়।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (80)


80 - ` ما من قوم جلسوا مجلسا لم يذكروا الله فيه إلا رأوه حسرة يوم القيامة `.
(عن ابن عمرو) :
أخرجه أحمد (2 / 124) بإسناد حسن.
وقال الهيثمي: ` رواه أحمد ورجاله رجال الصحيح `.
شاهد ثان: أخرجه الطيالسي (1756) عن جابر بسند على شرط مسلم.
وله شاهد آخر عن عبد الله بن مغفل مثله.
أخرجه ابن الضريسي في ` أحاديث مسلم بن إبراهيم الفراهيدي ` (8 /




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

“এমন কোনো সম্প্রদায় নেই যারা কোনো মজলিসে (বৈঠকে) বসে, আর সেখানে তারা আল্লাহকে স্মরণ (যিকির) করে না, কিয়ামতের দিন তারা সেই মজলিসকে আফসোস ও অনুতাপের কারণ হিসেবে দেখতে পাবে।”