হাদীস বিএন


সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ





সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (981)


981 - ` لا تصوموا يوم الجمعة إلا وقبله يوم أو بعده يوم `.
أخرجه الترمذي (1 / 143) وابن ماجه (1 / 526) وأحمد (2 / 495) من طريق
الأعمش عن أبي صالح عن أبي هريرة مرفوعا به. وهذا إسناد صحيح على شرط
الشيخين، وقد صححه الترمذي. وقد جاء من طرق أخرى فانظر الذي قبله. و ` إن
يوم الجمعة يوم عيد ... ` وهو مخرج في ` الإرواء ` رقم (94) . و ` نهى عن
صيام يوم الجمعة `. وسيأتي برقم (1012) . ومن طرقه ما أخرجه الطحاوي في
` شرح المعاني ` (1 / 339) من طريق محمد بن عمرو عن أبي سلمة عن أبي هريرة
مرفوعا بلفظ: ` لا تصوموا يوم الجمعة إلا أن تصوموا قبله يوما أو بعده يوما `
. وهذا إسناده حسن. وأخرجه أحمد (2 / 365 و 422 و 458 و 526) والطحاوي
أيضا من طريق عبد الملك بن عمير عن زياد الحارثي عنه نحوه. وهذا سند صحيح
رجاله رجال الستة غير زياد الحارثي، قال في ` التعجيل `. ` قال شيخنا: لا
أعرفه. قلت قد جزم الحسيني بأنه أبو الأوبر وهو معروف ولكنه مشهور بكنيته
أكثر من اسمه، وقد سماه زيادا النسائي والدولابي وأبو أحمد الحاكم وغيرهم
ووثقه ابن معين وابن حبان وصحح حديثه `.
قلت: وقد جاء مكنيا بهذه الكنية في بعض طرق الحديث في ` المسند ` مما يدل على
أنه هو زياد الحارثي، فالسند صحيح. والله أعلم. ويأتي الحديث نحوه من طريق
أخرى عن أبي هريرة (1012) . وله شاهد من حديث جنادة بن أبي أمية قال:
` دخلت على رسول الله صلى الله عليه وسلم في نفر من الأزد يوم الجمعة، فدعانا
رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى طعام بين يديه، فقلنا: إنا صيام، فقال:
صمتم أمس؟ قلنا: لا قال: أفتصومون غدا؟ قلنا: لا، قال: فأفطروا، ثم قال
: ` لا تصوموا يوم الجمعة مفردا `. أخرجه الحاكم (3 / 608) وقال: ` صحيح
على شرط مسلم `. ووافقه الذهبي.
قلت: وفيه أن ابن إسحاق لم يخرج له مسلم إلا مقرونا، ثم هو مدلس وقد عنعنه.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) ইরশাদ করেছেন: “তোমরা জুমু’আর দিন রোজা রেখো না, তবে তার আগের দিন অথবা পরের দিনের সাথে মিলিয়ে (রোজা রাখলে তা ভিন্ন)।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (982)


982 - ` نفقة الرجل على أهله يحتسبها صدقة `.
أخرجه البخاري (5 / 17) والترمذي (1 / 356) وقال ` حسن صحيح ` وأحمد (5
/ 273) عن أبي مسعود البدري مرفوعا. وليس عند الأولين (يحتسبها) .
وهي زيادة صحيحة ثابتة عند الشيخين وغيرهما.




আবু মাসঊদ আল-বদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

"একজন লোক তার পরিবার-পরিজনের জন্য যে খরচ করে এবং এর দ্বারা সওয়াবের আশা রাখে, তা তার জন্য সাদকা হিসেবে গণ্য হয়।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (983)


983 - ` من خرج من الطاعة وفارق الجماعة، فمات مات ميتة جاهلية ومن قاتل تحت راية
عمية يغضب لعصبة أو يدعو إلى عصبة أو ينصر عصبة، فقتل، فقتلة جاهلية ومن خرج
على أمتي يضرب برها وفاجرها ولا يتحاشى من مؤمنها ولا يفي لذي عهد عهده،
فليس مني ولست منه `.
أخرجه مسلم (6 / 21) والنسائي (2 / 177) وأحمد (2 / 306 و 488) من حديث
أبي هريرة مرفوعا. ولبعضه شاهد عن حديث جندب بن عبد الله البجلي مضى
(433) بلفظ: ` من قتل تحت راية عمية ` ...




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

যে ব্যক্তি (শরীয়তের) আনুগত্য থেকে বেরিয়ে গেল এবং মুসলিম জামাআত (ঐক্য) থেকে বিচ্ছিন্ন হয়ে গেল, অতঃপর সে মৃত্যুবরণ করল, সে জাহেলিয়াতের মৃত্যু বরণ করল।

আর যে ব্যক্তি কোনো অন্ধ পতাকার (অস্পষ্ট ও ভ্রান্ত উদ্দেশ্যের) নিচে যুদ্ধ করল—কোনো দলীয় গোঁড়ামির (আসাবিয়্যাহ্) কারণে রাগান্বিত হয়ে, অথবা কোনো গোঁড়া দলের দিকে আহ্বান করে, অথবা কোনো গোঁড়া দলকে সাহায্য করে—অতঃপর নিহত হলো, তার নিহত হওয়াটা জাহেলিয়াতের নিহত হওয়া।

আর যে ব্যক্তি আমার উম্মতের বিরুদ্ধে বিদ্রোহ করল, তাদের নেককার ও পাপিষ্ঠদের নির্বিচারে প্রহার করল, তার মুমিনদের (হত্যা করা থেকে) বিরত থাকল না, এবং চুক্তিবদ্ধদের সাথে তার চুক্তি পূর্ণ করল না, সে আমার কেউ নয় এবং আমিও তার কেউ নই।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (984)


984 - ` من خلع يدا من طاعة لقي الله يوم القيامة ولا حجة له ومن مات وليس في عنقه
بيعة مات ميتة جاهلية `.
أخرجه مسلم (6 / 22) من حديث ابن عمر. وأخرجه الحاكم (1 / 77 و 117)
بلفظ: ` من خرج من الجماعة قيد شبر، فقد خلع ربقة الإسلام من عنقه حتى يراجعه
ومن مات وليس عليه إمامة وجماعة فإن موتته موتة جاهلية `. وقال الحاكم:
` صحيح على شرط الشيخين `. وافقه الذهبي.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

যে ব্যক্তি আনুগত্য (নেতার বাধ্যতা) থেকে হাত গুটিয়ে নেবে, সে কিয়ামতের দিন আল্লাহর সাথে এমন অবস্থায় সাক্ষাৎ করবে যে তার (নিজেকে নির্দোষ প্রমাণ করার) কোনো যুক্তি থাকবে না। আর যে ব্যক্তি এমতাবস্থায় মারা গেল যে তার কাঁধে কোনো বাইয়াত (নেতৃত্বের শপথ বা আনুগত্যের বন্ধন) নেই, সে জাহিলিয়্যাতের (ইসলাম-পূর্ব অন্ধকার যুগের) মৃত্যু বরণ করল।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (985)


985 - ` يا أيها الناس إن هذا من غنائمكم، أدوا الخيط والمخيط، فما فوق ذلك، فما
دون ذلك، فإن الغلول عار على أهله يوم القيامة وشنار ونار `.
أخرجه ابن ماجه (2 / 197) عن أبي سنان عيسى بن سنان عن يعلى بن شداد عن
عبادة بن الصامت قال: ` صلى بنا رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم حنين
إلى جنب بعير من المقاسم، ثم تناول شيئا من البعير فأخذ منه قردة - يعني وبرة
- فجعل بين إصبعيه ثم قال: ` فذكره. ورجاله ثقات غير عيسى بن سنان وهو
مختلف فيه قال في ` الميزان `: ضعفه أحمد وابن معين وهو ممن يكتب حديثه على
لينه وقواه بعضهم يسيرا، وقال العجلي: لا بأس به، وقال أبو حاتم، ليس
بالقوي `. وفي ` التقريب `: ` لين الحديث `.
قلت: لكنه يتقوى بورود الحديث من طريق أخرى عن عبادة بلفظ: ` يا أيها الناس
إنه لا يحل لي مما أفاء الله عليكم قدر هذه إلا الخمس والخمس مردود عليكم
فأدوا الخيط والمخيط وإياكم والغلول، فإنه عار على أهله يوم القيامة
وعليكم بالجهاد في سبيل الله، فإنه بابا من أبواب الجنة يذهب الله به الهم
والغم. وكان يكره {الأنفال} ويقول: ليرد قوي المؤمنين على ضعيفهم `.
أخرجه ابن حبان (1693) والحاكم (3 / 49) (5 / 318، 319، 324) مفرقا من
طريق عبد الرحمن بن الحارث عن سليمان بن موسى الأشدق عن مكحول عن أبي سلام عن
أبي أمامة الباهلي عن عبادة بن الصامت قال: ` أخذ رسول الله صلى الله عليه
وسلم يوم حنين وبرة من جنب بعير ثم قال ` فذكره. وروى منه النسائي (2 / 178
) الجملة الأولى، والدارمي (2 / 229، 230) الثانية والثالثة والأخيرة
بهذا الإسناد.
وهو إسناد حسن رجاله كلهم ثقات وفي عبد الرحمن بن الحارث
وشيخه سليمان بن موسى الأشدق كلام لا ينزل حديثهما عن رتبة الحسن، لاسيما وقد
جاء من طرق هذه إحداها.
والثاني عن يعلى بن شداد عن عبادة وهو الذي قبله.
والثالث عن أبي بكر بن عبد الله بن أبي مريم ويحيى ابن أبي كثير عن أبي سلام
به بلفظ أتم منه وسيأتي (1972) بلفظ: ` إن هذه من غنائمكم `.
وقد روى أبو سلام هذه القصة عن عمرو بن عبسة أيضا قال: ` صلى بنا رسول الله
صلى الله عليه وسلم إلى بعير، فلما أسلم أخذ وبرة من جنب البعير ثم قال: ولا
يحل لي من غنائمكم مثل هذا إلا الخمس والخمس مردود فيكم `! أخرجه أبو داود
(1 / 433) : حدثنا الوليد بن عتبة حدثنا الوليد حدثنا عبد الله بن العلاء أنه
سمع أبا سلام بن الأسود قال: سمعت عمرو بن عبسة. وهذا سند صحيح رجاله رجال
الصحيح غير الوليد بن عتبة وهو ثقة. وشيخه الوليد هو ابن مسلم. ولأبي سلام
فيه إسناد آخر، قال الدولابي في ` الكنى ` (2 / 163) : أخبرني أحمد بن شعيب
عن محمد بن وهب قال: حدثنا محمد بن سلمة قال: حدثني أبو عبد الرحيم، قال:
حدثني منصور الخولاني عن أبي يزيد غيلان عن أبي سلام عن المقدام بن كعب (بياض
) معد يكرب عن الحارث ابن معاوية عن عبادة بن الصامت: ` أن رسول الله صلى الله
عليه وسلم صلى إلى بعير من القسم، فلما فرغ أخذ قردة بين إصبعيه وهي وبرة
فقال: ` ألا إن هذه من غنائكم وليس لي منها إلا الخمس والخمس مردود عليكم `
.
هكذا وقع إسناده في الأصل: بياض بين كعب ومعد ولعل الصواب: المقدام بن
معد يكرب فقد أورد الحديث الحافظ في ` الإصابة ` وقال: ` قال: أبو نعيم:
` رواه أبو سلام عن المقدام الكندي فقال: الحارث بن معاوية الكندي `.
والمقدام الكندي هو ابن معد يكرب وهو صحابي مشهور، وأما الحارث هذا فقد
اختلفوا في صحبته واستظهر الحافظ في ` التعجيل ` أنه من المخضرمين. وذكر
نحوه في ` الإصابة `. وغيلان هو ابن أنس قال في ` التقريب `: ` مقبول `.
وبقية الرجال ثقات غير منصور الخولاني فلم أجد له ترجمة.




উবাদা ইবনে সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:

“হে লোক সকল! নিশ্চয় এটি তোমাদের গণীমতের মাল। তোমরা সূতা এবং সূঁচ—এর চেয়ে বড় হোক বা এর চেয়ে ছোট হোক, সবকিছু পরিশোধ করে দাও। কারণ, (গণীমতের সম্পদে) খেয়ানত করা কিয়ামতের দিন এর অধিকারীর জন্য লজ্জা, অপবাদ ও জাহান্নামের আগুন হবে।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (986)


986 - ` خير الصحابة أربعة وخير السرايا أربعمائة وخير الجيوش أربعة آلاف ولا يغلب
اثنا عشر ألفا من قلة `.
أخرجه أبو داود (1 / 407) والترمذي (1 / 294) وابن خزيمة في ` صحيحه ` (
1 / 255 / 1) وابن حبان (1663) والحاكم (1 / 443 و 2 / 101) وأحمد (1
/ 294) وعبد بن حميد في ` المنتخب من المسند ` (73 / 1) ومحمد بن مخلد في
` المنتقى من حديثه ` (2 / 3 / 2) والضياء في ` المختارة ` (62 / 292 / 2)
من طريق وهب بن جرير حدثنا أبي سمعت يونس عن الزهري عن عبيد الله بن عبد الله
عن ابن عباس مرفوعا. وقال الحاكم: ` صحيح على شرط الشيخين ولم يخرجاه
لخلاف بين الناقلين فيه عن الزهري `.
وكذا قال الذهبي. وقال الترمذي:
` حديث حسن غريب لا يسنده كبير أحد غير جرير بن حازم وإنما روي هذا الحديث عن
الزهري عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلا، وقد رواه حبان ابن علي العنزي عن
عقيل عن الزهري عن عبيد الله عن ابن عباس عن النبي صلى الله عليه وسلم، ورواه
الليث بن سعد عن عقيل عن الزهري عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلا `.
قلت: جرير بن حازم ثقة احتج به الشيخان وقد وصله وهي زيادة يجب قبولها ولا
يضره رواية من قصر به على الزهري ولذلك قال ابن القطان كما في الفيض: ` هذا
ليس بعلة فالأقرب صحته `. وقد تابعه حبان بن علي العنزي على وصله، كما ذكره
الترمذي. ووصله لوين في ` حديثه ` (ق 2 / 2) : حدثنا حبان بن علي به.
وهكذا وصله ابن عدي (108 / 1) من طريق أخرى عنه. وأخرجه الطحاوي في
` المشكل ` (1 / 238) من طريق النسائي عنه. وأخرجه الدارمي (2 / 215)
هكذا: حدثنا محمد بن الصلت حدثنا حبان ابن علي عن يونس وعقيل عن ابن شهاب عن
عبيد الله بن عبد الله عن ابن عباس مرفوعا به نحوه بلفظ: ` وما بلغ اثني عشر
ألفا فصبروا وصدقوا فغلبوا من قلة `.
ورجاله كلهم ثقات رجال البخاري غير
حبان بن علي وهو ضعيف لكنه لم يترك كما قال الذهبي، فمثله يستشهد به.
ورواية الليث التي علقها الترمذي عن عقيل عن الزهري مرسلا وصلها الطحاوي من
طريق ابن صالح عنه. وابن صالح اسمه عبد الله كاتب الليث وفيه ضعف فلا يحتج
به عند التفرد فكيف عند المخالفة؟




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইরশাদ করেছেন:

“উত্তম সাথিদল (বা সামরিক দল) হলো চারজন, উত্তম সামরিক অভিযান দল (সারিয়্যা) হলো চারশত জন, আর উত্তম সেনাবাহিনী হলো চার হাজার জন। আর বারো হাজার সৈন্যদল সংখ্যাল্পতার কারণে কখনো পরাজিত হবে না।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (987)


987 - ` لا إله إلا الله، ويل للعرب من شر قد اقترب فتح اليوم من ردم يأجوج ومأجوج
مثل هذه، وحلق بإصبعه الإبهام والتي تليها، فقلت: يا رسول الله: أنهلك
وفينا الصالحون؟ قال: نعم إذا كثر الخبث `.
أخرجه البخاري (13 /




যায়নাব বিনত জাহশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই। আরবের জন্য সর্বনাশ! কারণ এক ভয়াবহ বিপদ সন্নিকটে এসে পড়েছে। আজ ইয়া’জূজ ও মা’জূজের প্রাচীর (বাঁধ) থেকে এতটুকু খুলে গেছে।"

এই বলে তিনি তাঁর বৃদ্ধাঙ্গুলি ও শাহাদাত আঙুল দিয়ে একটি বৃত্তাকার আকৃতি তৈরি করে দেখালেন।

আমি (যায়নাব) বললাম, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমাদের মধ্যে নেককার (সৎকর্মশীল) লোক থাকা সত্ত্বেও কি আমরা ধ্বংস হয়ে যাব?"

তিনি বললেন, "হ্যাঁ, যখন মন্দ কাজ ও পাপাচার (অশ্লীলতা) বেড়ে যাবে।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (988)


988 - ` لا تجني نفس على أخرى `.
أخرجه ابن ماجه (2 / 148) : حدثنا محمد بن عبد الله بن عبيد بن عقيل حدثنا
عمرو بن عاصم حدثنا أبو العوام القطان عن محمد بن جحادة عن زياد بن علاقة عن
أسامة بن شريك مرفوعا. قال في ` الزوائد `: ` إسناده صحيح، محمد بن عبد
الله ذكره ابن حبان في ` الثقات `، وقال النسائي: لا بأس به، وأبو العوام
القطان اسمه عمران بن داور وثقه الجمهور وباقي رجال الإسناد على شرط الشيخين `
. قلت: عمران متكلم فيه من جهة حفظه، وفي التقريب: ` صدوق يهم `، فحديثه
لا يبلغ درجة الصحيح، بل هو حسن فقط. غير أن حديثه هذا صحيح، لأن له شاهدا
من حديث الأشعث بن سليم عن أبيه عن رجل من بني ثعلبة بن يربوع مرفوعا بهذا
اللفظ. أخرجه النسائي (2 / 251) وأحمد (5 / 377) وسنده صحيح رجاله رجال
الشيخين. وله شاهد آخر بلفظ: ` ألا لا يجني جان إلا على نفسه ... ` وسيأتي
إن شاء الله تعالى برقم (1974) . وشاهد ثالث وهو: ` لا تجني أم على ولد،
لا تجني أم على ولد `.




উসামা ইবনু শারীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

"কোনো ব্যক্তি অন্য কোনো ব্যক্তির (অপরাধের) ভার বহন করবে না।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (989)


989 - ` لا تجني أم على ولد لا تجني أم على ولد `.
أخرجه النسائي (2 / 251) وابن ماجه (2 / 147) وابن حبان (1683)
والحاكم (2 /




আবদুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, কোনো মায়ের অপরাধের দায় তার সন্তানের উপর বর্তাবে না; কোনো মায়ের অপরাধের দায় তার সন্তানের উপর বর্তাবে না।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (990)


990 - ` لا تجني عليه ولا يجني عليك `.
أخرجه ابن ماجه (2 /




রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন, "আপনি তার উপর কোনো অন্যায় (ক্ষতি/অপরাধ) করবেন না এবং সেও আপনার উপর কোনো অন্যায় (ক্ষতি/অপরাধ) করবে না।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (991)


991 - ` من أحب الأنصار أحبه الله ومن أبغض الأنصار أبغضه الله `.
أخرجه ابن ماجه (1 / 70) من حديث البراء بن عازب وسنده صحيح على شرط
الشيخين.
وقد أخرجاه في حديث: ` الأنصار لا يحبهم إلا مؤمن `. وسيأتي بإذن
الله (1975) . وقد ورد بهذا اللفظ تماما من حديث أبي هريرة. أخرجه أحمد (2
/ 501 و 527) عن محمد بن عمرو عن أبي سلمة عنه. وهذا إسناد حسن، وقال
الهيثمي (10 / 39) : ` رواه أبو يعلى وإسناده جيد، ورواه البزار وفيه
محمد بن عمرو وهو حسن الحديث، وبقية رجاله رجال الصحيح `. وكأنه ذهل عن
كونه في ` المسند ` من هذا الوجه وإلا لعزاه له قبل أولئك. وورد من حديث
الحارث بن زياد مرفوعا. أخرجه ابن حبان (2291) . ومن حديث معاوية بن أبي
سفيان. أخرجه أحمد أيضا (4 / 100) عن الحكم بن ميناء عن يزيد بن جارية عنه.
وهذا إسناد محتمل للتحسين أو هو حسن لغيره. وقال الهيثمي: ` رواه أحمد
وأبو يعلى قال: مثله والطبراني في ` الكبير ` و ` الأوسط ` ورجال أحمد رجال
الصحيح `. كذا قال: وليس بصحيح، فإن يزيد بن جارية هذا لم يرو له من الستة
إلا النسائي، ووثقه لكن وقع في كتاب الهيثمي: ` عن زيد بن ثابت ` بدل:
` يزيد بن جارية ` فلا أدري آلوهم منه أو من بعض النساخ. وورد الحديث بلفظ:
` من أحب الأنصار فبحبي أحبهم ومن أبغض الأنصار فببغضي أبغضهم `. رواه
الطبراني من حديث أبي هريرة. قال في ` مجمع الزوائد ` (10 / 39) :
` ورجاله رجال الصحيح، غير أحمد بن حاتم وهو ثقة، ورواه الطبراني أيضا عن
معاوية بهذا اللفظ، ورجاله رجال الصحيح غير النعمان بن مرة وهو ثقة `.
قلت: وهو في ` المعجم الصغير ` (ص




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

"যে ব্যক্তি আনসারদের ভালোবাসবে, আল্লাহ তাকে ভালোবাসবেন। আর যে ব্যক্তি আনসারদের ঘৃণা করবে, আল্লাহ তাকে ঘৃণা করবেন।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (992)


992 - ` كان إذا بعث أحدا من أصحابه في بعض أمره قال: بشروا ولا تنفروا ويسروا
ولا تعسروا `.
أخرجه مسلم (5 / 141) وأبو داود (2 / 293) من طريق أبي أسامة عن بريد بن
عبد الله عن أبي بردة عن أبي موسى قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم
إذا. الحديث. وسيأتي في ` يسروا ولا تعسروا ... ` برقم (1151) .




আবু মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন তাঁর কোনো সাহাবীকে কোনো কাজে পাঠাতেন, তখন তিনি বলতেন: তোমরা সুসংবাদ দাও, ঘৃণা বা বিতৃষ্ণা সৃষ্টি করো না এবং সহজ করো, কঠিন করো না।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (993)


993 - ` الطيرة من الدار والمرأة والفرس `.
أخرجه أحمد (6 / 150، 240، 246) والطحاوي في ` مشكل الآثار ` (1 / 341)
عن قتادة عن أبي حسان قال: ` دخل رجلان من بني عامر على عائشة، فأخبراها أن
أبا هريرة يحدث عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال (فذكره) فغضبت، فطارت
شقة منها في السماء وشقة في الأرض، وقالت: والذي أنزل الفرقان على محمد ما
قالها رسول الله صلى الله عليه وسلم قط، إنما قال: كان أهل الجاهلية يتطيرون
من ذلك `. وفي رواية لأحمد: ` ولكن نبي الله صلى الله عليه وسلم كان يقول:
كان أهل الجاهلية يقولون: الطيرة في المرأة والدار والدابة، ثم قرأت عائشة
(ما أصاب من مصيبة في الأرض ولا في أنفسكم إلا في كتاب) إلى آخر الآية `.
وأخرجها الحاكم (2 / 479) وقال:
` صحيح الإسناد ` ووافقه الذهبي.
وهو كما قالا، بل هو على شرط مسلم، فإن أبا حسان هذا قال الزركشي في
` الإجابة ` (ص 128) : ` اسمه مسلم الأجرد، يروي عن ابن عباس وعائشة `.
قلت: وهو ثقة من رجال مسلم. ورواه ابن خزيمة أيضا كما في ` الفتح ` (6 /
46) . ويشهد له ما أخرجه الطيالسي في ` مسنده ` (1537) : حدثنا محمد بن
راشد عن مكحول قيل لعائشة: إن أبا هريرة يقول: قال رسول الله صلى الله عليه
وسلم: الشؤم في ثلاث: في الدار والمرأة والفرس. فقالت عائشة: لم يحفظ أبو
هريرة لأنه دخل ورسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: قاتل الله اليهود يقولون
: إن الشؤم في الدار والمرأة والفرس، فسمع آخر الحديث، ولم يسمع أوله `.
وإسناده حسن لولا الانقطاع بين مكحول وعائشة، لكن لا بأس به في المتابعات
والشواهد، إن كان الرجل الساقط من بينهما هو شخص ثالث غير العامريين المتقدمين
. هذا ولعل الخطأ الذي أنكرته السيدة عائشة هو من الراوي عن أبي هريرة، وليس
أبا هريرة نفسه، فقد روى أحمد (2 / 289) من طريق أبي معشر عن محمد بن قيس
قال: ` سئل أبو هريرة: سمعت من رسول الله صلى الله عليه وسلم: الطيرة في
ثلاث في المسكن والفرس والمرأة؟ قال: كنت إذن أقول على رسول الله صلى الله
عليه وسلم (ما لم يقل ولكن سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم) يقول: أصدق
الطيرة الفأل والعين حق `. وأبو معشر فيه ضعف.
وقد وجدت لحديث الترجمة شاهدا من حديث ابن عمر مرفوعا بلفظ: ` الطيرة في
المرأة والدار والفرس `. أخرجه الطحاوي في ` شرح المعاني ` (2 / 381)
والطبراني في ` المعجم الكبير ` (3 / 192 / 2) من طرق عن محمد بن جعفر عن عتبة
بن مسلم عن حمزة بن عبد الله بن عمر عن أبيه. وهذا إسناد صحيح على شرط مسلم،
لكنه شاذ بهذا الاختصار، فقد خالفه سليمان بن بلال: حدثني عتبة بن مسلم بلفظ
: ` إن كان الشؤم في شيء ففي الفرس.. ` الحديث. أخرجه مسلم (7 / 34)
والطحاوي.
قلت: فزادا في أوله. ` إن كان الشؤم في شيء `. وهي زيادة من ثقة فيجب
قبولها، لاسيما وقد جاءت من طريق أخرى عن ابن عمر عند البخاري ولها شواهد
كثيرة منها عن سهل بن سعد وجابر وقد خرجتها فيما تقدم (799) . ومنها عن
سعد بن أبي وقاص مرفوعا بلفظ: ` لا طيرة، وإن كانت الطيرة في شيء ففي المرأة
.... `. أخرجه الطحاوي من طريق يحيى بن أبي كثير عن الحضرمي بن لاحق أن سعيد
بن المسيب حدثه قال: ` سألت سعدا عن الطيرة. فانتهرني (زاد في رواية: فقال
: من حدثك؟ فكرهت أن أحدثه) وقال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم `
فذكره.
وإسناده جيد، فقد ذكر له شاهدا من رواية ابن أبي ليلى عن عطية عن أبي
سعيد به. وآخر من حديث أنس وسنده حسن. ونحوه حديث صخر أو حكيم بن معاوية
مرفوعا بلفظ: ` لا شؤم، وقد يكون اليمن في ثلاثة: في المرأة، والفرس،
والدار `. وهو صحيح الإسناد كما بينته فيما سيأتي (1930) .
وجملة القول أن الحديث اختلف الرواة في لفظه، فمنهم من رواه كما في الترجمة،
ومنهم من زاد عليه في أوله ما يدل على أنه لا طيرة أو شؤم (وهما بمعنى واحد
كما قال العلماء) ، وعليه الأكثرون، فروايتهم هي الراجحة، لأن معهم زيادة
علم، فيجب قبولها، وقد تأيد ذلك بحديث عائشة الذي فيه أن أهل الجاهلية هم
الذين كانوا يقولون ذلك، وقد قال الزركشي في ` الإجابة ` (ص 128) :
` قال بعض الأئمة: ورواية عائشة في هذا أشبه بالصواب إن شاء الله تعالى (
يعنى من حديث أبي هريرة) لموافقته نهيه عليه الصلاة والسلام عن الطيرة نهيا
عاما، وكراهتها وترغيبه في تركها بقوله: ` يدخل الجنة سبعون ألفا بغير حساب
، وهم الذين لا يكتوون (الأصل لا يكنزون) ولا يسترقون، ولا يتطيرون،
وعلى ربهم يتوكلون `.
قلت: وقد أشار بقوله: ` بعض الأئمة ` إلى الإمام الطحاوي رحمه الله تعالى.
فقد ذهب إلى ترجيح حديث عائشة المذكور في ` مشكل الآثار `، ونحوه في ` شرح
المعاني ` وبه ختم بحثه في هذا الموضوع، وقال في حديث سعد وما في معناه:
` ففي هذا الحديث ما يدل على غير ما دل عليه ما قبله من الحديث، (يعني حديث
ابن عمر برواية عتبة بن مسلم وما في معناه عن ابن عمر) ، وذلك أن سعدا أنتهر
سعيدا حين ذكر له الطيرة، وأخبره عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال: لا
طيرة، ثم قال: إن تكن الطيرة في شيء ففي المرأة والفرس والدار، فلم يخبر
أنها فيهن، وإنما قال: إن تكن في شيء
ففيهن، أي: لو كانت تكون في شيء
لكانت في هؤلاء، فإذ لم تكن في هؤلاء الثلاث فليست في شيء `.




আবু হাসসান (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বনী আমির গোত্রের দুজন লোক আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে আগমন করলেন। তারা তাঁকে জানালেন যে, আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে বর্ণনা করেন যে, তিনি বলেছেন: **“অশুভ লক্ষণ তিনটি জিনিসে থাকে: ঘর, নারী ও ঘোড়া।”**

(এই কথা শুনে) আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাগান্বিত হয়ে উঠলেন, যেন তাঁর দেহের এক অংশ আকাশে এবং আরেক অংশ মাটিতে চলে গেল। তিনি বললেন: ‘যিনি মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওপর ফুরকান (কুরআন) অবতীর্ণ করেছেন, তাঁর কসম! রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কখনই একথা বলেননি। তিনি বরং বলেছেন: **‘জাহেলিয়াতের যুগের লোকেরা এসব জিনিস থেকে অশুভ লক্ষণ নিত।’**

ইমাম আহমাদ-এর অন্য একটি বর্ণনায় এসেছে: ‘কিন্তু আল্লাহর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলতেন: **‘জাহেলিয়াতের যুগের লোকেরা বলত, অশুভ লক্ষণ নারী, ঘর ও চতুষ্পদ জন্তুর মধ্যে থাকে।’** এরপর আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এই আয়াত পাঠ করলেন: **(অর্থ) ‘পৃথিবীতে অথবা তোমাদের নিজেদের মধ্যে কোনো বিপদ আসুক না কেন, তা কিতাবে (লিখিত) আছেই...’** (আয়াতের শেষ পর্যন্ত)।

[এই হাদীসের সনদ (সূত্রপরম্পরা) সহীহ, যেমনটি হাকিম ও যাহাবী অভিমত দিয়েছেন।]

এর সমর্থনে তাইয়ালিসী তাঁর মুসনাদে (১৫৩৭) বর্ণনা করেছেন: মাকহুল থেকে বর্ণিত, আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করা হলো: ‘আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলছেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: অশুভ লক্ষণ তিনটি জিনিসে থাকে: ঘর, নারী ও ঘোড়া।’ তখন আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: **‘আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) (কথাটি) ভালোভাবে মনে রাখতে পারেননি। কারণ রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন কথাটি বলছিলেন, তখন তিনি (আবু হুরায়রা) সেখানে প্রবেশ করেছিলেন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলছিলেন: ‘আল্লাহ ইহুদিদের ধ্বংস করুন! তারা বলে, অশুভ লক্ষণ ঘর, নারী ও ঘোড়ার মধ্যে থাকে।’ তিনি (আবু হুরায়রা) হাদীসের শেষ অংশ শুনেছেন, কিন্তু প্রথম অংশ শোনেননি।’**

***

ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রেও মারফু’ (রাসূলের প্রতি আরোপিত) একটি শাহেদ (সমর্থক বর্ণনা) পাওয়া যায়, যার শব্দ হলো: **“অশুভ লক্ষণ নারী, ঘর ও ঘোড়ার মধ্যে।”**

তবে ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মুসলিমের সহীহ বর্ণনায় অতিরিক্ত শব্দ পাওয়া যায়, যা দ্বারা জানা যায় যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: **“যদি কোনো কিছুর মধ্যে অশুভত্ব থাকত, তবে তা ঘোড়া, নারী এবং ঘরের মধ্যে থাকত।”**

সাদ ইবন আবি ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও বর্ণিত আছে, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: **“কোনো অশুভ লক্ষণ নেই। আর যদি কোনো কিছুর মধ্যে অশুভত্ব থাকে, তবে তা নারী, ঘোড়া ও ঘরের মধ্যে।”**

***

**শরহ (ব্যাখ্যা/সারসংক্ষেপ):**
এই হাদীসের শব্দ নিয়ে রাবীদের মধ্যে মতভেদ রয়েছে। তবে অধিকাংশের বর্ণনাতেই এর শুরুতে এমন অতিরিক্ত শব্দ যোগ করা হয়েছে যা প্রমাণ করে যে, সাধারণভাবে কোনো অশুভ লক্ষণ বা অমঙ্গল নেই। এই অধিকাংশের বর্ণনাটিই অধিক গ্রহণযোগ্য।

আলিমগণ বলেন, এই বিষয়ে আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বর্ণনাটিই অধিকতর সঠিক। কেননা এটি সাধারণভাবে অশুভ লক্ষণ (ত্বীয়াাাহ) থেকে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিষেধের সাথে সামঞ্জস্যপূর্ণ। তিনি অশুভ লক্ষণকে অপছন্দ করতেন এবং তা বর্জন করার প্রতি উৎসাহিত করেছেন তাঁর এই বাণীর মাধ্যমে: **‘সত্তর হাজার লোক বিনা হিসেবে জান্নাতে প্রবেশ করবে। তারা হলো, যারা না সেঁক গ্রহণ করে, না ঝাড়ফুঁক করায়, না অশুভ লক্ষণ মানে, বরং কেবল তাদের রবের উপর ভরসা রাখে।’**

ইমাম ত্বাহাবী (রাহিমাহুল্লাহ) সাদ ইবন আবি ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসের ব্যাখ্যায় বলেছেন: সাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন বললেন: “যদি কোনো কিছুর মধ্যে ত্বীয়াাাহ থাকে, তবে তা নারী, ঘোড়া ও ঘরের মধ্যে,” এর অর্থ হলো: যদি ত্বীয়াাাহ কোনো কিছুর মধ্যে হওয়া সম্ভব হতো, তবে এই তিনটির মধ্যে হতো। যেহেতু এই তিনটির মধ্যেও ত্বীয়াাাহ নেই, অতএব অন্য কোনো কিছুর মধ্যেও তা নেই।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (994)


994 - ` إن التجار يبعثون يوم القيامة فجارا إلا من اتقى الله وبر وصدق `.
أخرجه الترمذي (1 / 228) والدارمي (2 / 247) وابن ماجه (2 / 5) وابن
حبان (1095) والحاكم (2 / 6) من طريق عبد الله بن عثمان بن خثيم عن
إسماعيل بن عبيد بن رفاعة عن أبيه عن جده: ` أنه خرج مع النبي صلى الله
عليه وسلم إلى المصلى، فرأى الناس يتبايعون، فقال: يا معشر التجار!
فاستجابوا لرسول الله صلى الله عليه وسلم ورفعوا أعناقهم وأبصارهم إليه فقال
` فذكره. وقال الترمذي: ` حديث حسن صحيح `. والحاكم: ` صحيح الإسناد `
ووافقه الذهبي مع أنه قال في ترجمة إسماعيل هذا: ` ما علمت روى عنه سوى عبد
الله بن عثمان بن خثيم ولكن صحح هذا الترمذي `. وفي التقريب: إنه مقبول.
وللحديث شاهد يرتقي به إلى درجة الحسن إن شاء الله ولفظه: ` إن التجار هم
الفجار. قالوا: يا رسول الله: أليس قد أحل الله البيع؟ قال بلى ولكنهم
يحلفون فيأثمون ويحدثون فيكذبون `.
وقد مضى تخريجه برقم (365) فراجعه.




রিফা‘আহ ইবনু রাফি‘আহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

"নিশ্চয়ই ব্যবসায়ীরা কিয়ামতের দিন ফাসিক (পাপী) রূপে উত্থিত হবে, তবে তারা ব্যতীত যারা আল্লাহকে ভয় করেছে, নেক কাজ করেছে এবং সত্য কথা বলেছে।"

অন্য এক বর্ণনায় এসেছে, (তিনি বলেছেন): "নিশ্চয় ব্যবসায়ীরাই হলো পাপী (ফাসিক)।" তাঁরা (সাহাবীগণ) বললেন, "হে আল্লাহর রাসূল! আল্লাহ কি বেচা-কেনাকে হালাল করেননি?" তিনি বললেন, "অবশ্যই করেছেন। কিন্তু তারা শপথ করে, ফলে পাপ করে এবং তারা কথা বলার সময় মিথ্যা বলে।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (995)


995 - ` إن أرواح المؤمنين في أجواف طير خضر تعلق بشجر الجنة `.
رواه ابن ماجه (1449) والحربي في ` غريب الحديث ` (5 / 210 / 1) وابن
منده في ` المعرفة ` (2 / 363 / 1) عن محمد بن إسحاق عن الحارث بن فضيل عن
الزهري عن عبد الرحمن بن كعب بن مالك عن أبيه قال: ` لما حضر كعبا الوفاة دخلت
عليه أم مبشر بنت البراء بن معرور فقالت: يا أبا عبد الرحمن إن لقيت ابني
فأقرأه مني السلام، فقال: يغفر الله لك يا أم مبشر نحن أشغل من ذلك فقالت:
يا أبا عبد الرحمن أما سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول (فذكره) قال:
بلى، قالت: فهو ذلك `.
قلت: وهذا سند ضعيف، رجاله ثقات وإنما علته ابن إسحاق فقد كان يدلس
والظاهر أنه تلقاه عن بعض الضعفاء ثم أسقطه، فقد رواه معمر الزهري عن عبد
الرحمن بن كعب بن مالك قال: ` قالت أم مبشر لكعب بن مالك وهو شاك: اقرأ على
ابني السلام - تعني مبشرا - فقال: يغفر الله لك يا أم مبشر أو لم تسمعي ما قال
رسول الله صلى الله عليه وسلم: إنما نسمة المسلم طير تعلق في شجر الجنة حتى
يرجعها الله عز وجل إلى جسده يوم القيامة! قالت: صدقت، فأستغفر الله `.
أخرجه أحمد (3 / 455) .
قلت: وهذا إسناد صحيح على شرط الشيخين. وفيه مخالفة لما روى ابن إسحاق،
فإن قولها ` صدقت، فأستغفر الله ` صريح في أن كعبا أقام الحجة عليها بخلاف
رواية ابن إسحاق فإنها على العكس من ذلك، كما هو
ظاهر. ومتن الحديث دون
القصة أخرجه مالك في ` الموطأ ` (1 / 240 / 49) وعنه النسائي (1 / 292)
وابن ماجه (4271) وأحمد (3 / 455) وأبو نعيم في ` الحلية ` (9 / 156)
كلهم عن مالك عن الزهري به نحوه. وتابعه صالح ويونس عن ابن شهاب. رواه أحمد
(3 / 455) . وتابعه أيضا سفيان بن عينية. رواه أحمد (6 / 386) والترمذي
(1 / 309) وقال: ` حديث حسن صحيح `. وتابعه الليث بن سعد. عند ابن حبان
في ` صحيحه ` (734) ، وكلهم قالوا: ` المسلم ` أو ` المؤمن ` إلا سفيان،
فإنه قال: ` الشهداء `، فروايته شاذة والله أعلم.




কা’ব ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। যখন কা’ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ওফাতের সময় ঘনিয়ে এলো, তখন উম্মে মুবাশশির বিনতে আল-বারা’ ইবনে মা’রূর তাঁর কাছে এলেন। তিনি বললেন: "হে আবু আব্দুর রহমান! যদি আপনি আমার ছেলের সাথে সাক্ষাৎ পান, তবে তাকে আমার পক্ষ থেকে সালাম পৌঁছে দেবেন।"

কা’ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "আল্লাহ আপনাকে ক্ষমা করুন, হে উম্মে মুবাশশির। আমরা এর চেয়েও অধিক ব্যস্ত থাকব।"

উম্মে মুবাশশির বললেন: "হে আবু আব্দুর রহমান! আপনি কি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শোনেননি?" (অতঃপর তিনি হাদীসটি উল্লেখ করলেন)।

তিনি (কা’ব) বললেন: "অবশ্যই শুনেছি।"

উম্মে মুবাশশির বললেন: "তাহলে তো সেই (ব্যস্ততার) কথাই বললেন!"

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: **"নিশ্চয় মু’মিনদের রূহ সবুজ পাখির অভ্যন্তরে থাকে। তারা জান্নাতের বৃক্ষরাজিতে ঘুরে বেড়ায়।"**

(অন্য এক সহীহ বর্ণনায় কা’ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উম্মে মুবাশশিরকে বলেছিলেন: "নিশ্চয় মুসলিমের রূহ একটি পাখি, যা জান্নাতের বৃক্ষসমূহে বিচরণ করে, যতক্ষণ না আল্লাহ আযযা ওয়া জাল কিয়ামতের দিন তাকে তার দেহের দিকে ফিরিয়ে দেন।" উম্মে মুবাশশির তখন বলেন: আপনি সত্য বলেছেন, আমি আল্লাহর কাছে ক্ষমা প্রার্থনা করছি।)









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (996)


996 - ` قاتل الله قوما يصورون ما لا يخلقون `.
رواه الضياء في ` المختارة ` (1 / 434) من طريق الطيالسي وهذا في ` المسند `
(623) : حدثنا ابن أبي ذئب عن عبد الرحمن بن مهران قال: حدثني عمير مولى ابن
عباس عن أسامة بن زيد قال: ` دخلت على رسول الله صلى الله عليه وسلم في
الكعبة فرأى صورا، قال: فدعا بدلو من ماء، فأتيته به، فجعل يمحوها ويقول:
فذكره. ث
م رواه من طريق خالد بن يزيد العمري أنبأنا ابن أبي ذئب به، ثم قال:
` لم نعتمد في رواية هذا الحديث على خالد العمري بل على رواية أبي داود `.
قلت: لكن شيخه ابن مهران وهو المديني مولى بني هاشم مجهول كما قال الحافظ في
` التقريب `. ثم رواه (1 /




উসামা ইবনে যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি কাবা শরীফের ভেতরে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট প্রবেশ করলাম। তিনি সেখানে কিছু ছবি দেখতে পেলেন। তিনি এক বালতি পানি চাইলেন। আমি তা তাঁর কাছে নিয়ে আসলাম। তিনি তখন সেগুলো মুছতে শুরু করলেন এবং বলছিলেন: "আল্লাহ ধ্বংস করুন সেই সম্প্রদায়কে, যারা এমন কিছুকে চিত্রিত করে যা তারা সৃষ্টি করে না।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (997)


997 - ` إنما تضرب أكباد المطي إلى ثلاثة مساجد: المسجد الحرام ومسجدي هذا والمسجد
الأقصى `.
أخرجه أبو يعلى في ` مسنده ` (ق 306 / 1) : حدثنا محمد بن المنهال حدثنا يزيد
بن زريع حدثنا روح عن زيد بن أسلم عن سعيد بن أبي سعيد المقبري:
` أن أبا بصرة جميل بن بصرة لقي أبا هريرة وهو مقبل من (الطور) ، فقال:
لو لقيتك قبل أن تأتيه لم تأته، إني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول `
: فذكره.
قلت: وهذا إسناد صحيح رجاله كلهم ثقات وهو على شرط الشيخين إن كان محمد بن
المنهال هذا هو التميمي الحافظ، وفي طبقته محمد بن المنهال البصري الأنماطي
أخو الحجاج وهو ثقة اتفاقا وكلاهما يروي عن يزيد بن زريع وعنهما أبو يعلى.
والحديث في ` الصحيحين ` وغيرهما من طرق عن أبي هريرة بلفظ ` لا تشد الرحال `
وقد خرجتها في ` إرواء الغليل ` (رقم 951) ، وإنما خرجته هنا لهذه الزيادة
التي فيها إنكار أبي بصرة على أبي هريرة رضي الله عنهما سفره إلى الطور، ولها
طرق أخرى أوردتها هناك، فلما وقفت على هذه الطريق أحببت أن أقيدها هنا، وقد
فاتتني ثم. وفي هذه الزيادة فائدة هامة، وهي أن راوي الحديث وهو الصحابي
الجليل أبو بصرة رضي الله عنه قد فهم من النبي صلى الله عليه وسلم أن النهي
يشمل غير المساجد الثلاثة من المواطن الفاضلة كالطور وهو جبل كلم الله عليه
موسى تكليما ولذلك أنكر على أبي هريرة سفره إليه، وقال: ` لو لقيتك قبل أن
تأتيه لم تأته ` وأقره على ذلك أبو هريرة ولم
يقل له كما يقول بعض المتأخرين
: ` الاستثناء مفرغ، والمعنى: لا تسافر لمسجد للصلاة فيه إلا لهذه الثلاثة `
! بل المراد: لا يسافر إلى موضع من المواضع الفاضلة التي تقصد لذاتها ابتغاء
بركتها وفضل العبادة فيها إلا إلى ثلاثة مساجد. وهذا هو الذي يدل عليه فهم
الصحابين المذكورين، وثبت مثله عن ابن عمر رضي الله عنه كما بينته في كتابي
` أحكام الجنائز وبدعها ` وهو الذي اختاره جماعة من العلماء كالقاضي عياض،
والإمام الجويني والقاضي حسين، فقالوا: ` يحرم شد الرحل لغير المساجد
الثلاثة كقبور الصالحين والمواضع الفاضلة `. ذكره المناوي في ` الفيض `.
فليس هو رأي ابن تيمية وحده كما يظن بعض الجهلة وإن كان له فضل الدعوة إليه،
والانتصار له بالسنة وأقوال السلف بما لا يعرف له مثيل، فجزاه الله عنا خير
الجزاء. فهل آن للغافلين أن يعودوا إلى رشدهم ويتبعوا السلف في عبادتهم وأن
ينتهوا عن اتهام الأبرياء بما ليس فيهم؟ .




আবু বসরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই আবু বসরা জামিল ইবনে বসরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে দেখা করলেন যখন তিনি (আবু হুরায়রা) তূর পাহাড় থেকে ফিরে আসছিলেন। তখন (আবু বসরা) বললেন, "আমি যদি আপনাকে সেখানে যাওয়ার আগে পেতাম, তবে আপনি সেখানে যেতেন না। নিশ্চয়ই আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি যে:

নিশ্চয়ই (সাওয়াবের উদ্দেশ্যে) কেবল তিনটি মসজিদের দিকেই আরোহীর পিঠে কঠোর সফর করা চলে: মসজিদুল হারাম, আমার এই মসজিদ (মসজিদে নববী) এবং মসজিদুল আকসা।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (998)


998 - ` أوثق عري الإيمان الموالاة في الله والمعاداة في الله والحب في الله
والبغض في الله `.
رواه الطبراني (3 / 125 / 2) والبغوي في ` شرح السنة ` (3 /




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

ঈমানের সবচেয়ে মজবুত বন্ধন হলো, আল্লাহর জন্য বন্ধুত্ব স্থাপন করা এবং আল্লাহর জন্য শত্রুতা পোষণ করা; আর আল্লাহর জন্য ভালোবাসা এবং আল্লাহর জন্য ঘৃণা করা।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (999)


999 - ` إن أعظم الذنوب عند الله رجل تزوج امرأة فلما قضى حاجته منها طلقها وذهب
بمهرها ورجل استعمل رجلا فذهب بأجرته وآخر يقتل دابة عبثا `.
رواه الحاكم (2 / 182) من طريق ابن خزيمة أبي بكر محمد بن إسحاق الإمام
المشهور: حدثنا عبد الوارث بن عبد الصمد بن عبد الوارث العنبري: حدثني أبي عن
عبد الرحمن بن عبد الله بن دينار عن محمد بن سيرين عن ابن عمر مرفوعا.
وقال الحاكم: ` صحيح على شرط البخاري `، ووافقه الذهبي.
قلت: وليس كما قالا، فإن عبد الوارث بن عبد الصمد ليس من رجال البخاري
وإنما هو من رواة مسلم. ثم إن عبد الرحمن بن عبد الله وإن روى له البخاري
فهو متكلم فيه، وقال الذهبي في ` الميزان `: إنه صالح الحديث وقد وثق وفي
التقريب: ` صدوق يخطىء `. فهو حسن الحديث إن شاء الله تعالى.




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:) নিশ্চয় আল্লাহর নিকট সবচেয়ে বড় গুনাহ হলো এমন ব্যক্তি যে কোনো নারীকে বিবাহ করলো, অতঃপর তার থেকে নিজের প্রয়োজন পূর্ণ হওয়ার পর তাকে তালাক দিয়ে দিলো এবং তার মোহর (বা দেনমোহর) আত্মসাৎ করলো; আর এমন ব্যক্তি যে কোনো লোক নিয়োগ করলো, কিন্তু তার পারিশ্রমিক ফাঁকি দিলো; এবং আরেকজন যে কোনো প্রাণীকে অনর্থক বা বিনা কারণে হত্যা করে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (1000)


1000 - ` إن الله مع الدائن (أي المديون) حتى يقضي دينه ما لم يكن فيما يكره الله `.
أخرجه الدارمي (2 / 263) وابن ماجه (2 / 75) والحاكم (2 / 23) وأبو
نعيم في ` الحلية ` (3 / 204) وابن عساكر (9 / 36 / 1) من طريق محمد بن
إسماعيل بن أبي فديك: حدثنا سعيد بن سفيان مولى الأسلميين عن جعفر بن محمد عن
أبيه عن عبد الله بن جعفر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم....
وزادوا إلا الحاكم: ` قال: وكان عبد الله بن جعفر يقول لخازنه: اذهب فخذ
لي بدين فإني أكره أن أبيت ليلة إلا والله معي، بعد ما سمعت من رسول الله صلى
الله عليه وسلم ` فذكر الحديث وقال الحاكم: ` صحيح الإسناد ` ووافقه الذهبي
. وقال في الزوائد: ` إسناده صحيح `. وقال المنذري (3 / 36) : ` إسناده
حسن `: كذا قالوا! ورجاله رجال الصحيح غير سعيد بن سفيان قال الذهبي في
` الميزان `: ` لا يكاد يعرف، قواه ابن حبان
` وقال الحافظ في التقريب `.
` مقبول `. أي عند المتابعة.
ولم أقف له على متابع بهذا المتن أو السند، وإن كان له شواهد، فهو لذلك
صحيح المعنى، فانظر الحديث الآتي (1029) بلفظ: ` من أخذ دينا.... `.
الاستدراكات




আব্দুল্লাহ ইবনে জা’ফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:

"নিশ্চয় আল্লাহ ঋণগ্রহীতার (অর্থাৎ দেনাদারের) সাথে থাকেন যতক্ষণ না সে তার ঋণ পরিশোধ করে ফেলে, যদি না তা এমন কোনো কাজে হয় যা আল্লাহ অপছন্দ করেন।"

(বর্ণনাকারীগণ বলেন) আব্দুল্লাহ ইবনে জা’ফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছ থেকে এই হাদীস শোনার পর তাঁর কোষাধ্যক্ষকে বলতেন: "যাও, আমার জন্য ঋণ নাও। কেননা আমি এমন কোনো রাত অতিবাহিত করা অপছন্দ করি, যখন আল্লাহ আমার সাথে থাকবেন না।"