হাদীস বিএন


সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ





সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6303)


(مَنْ كَذَبَ عَلَى نَبِيِّهِ، أَوْ عَلَى عَيْنَيْهِ، أَوْ عَلَى وَالِدَيْهِ، لَمْ
يُرَحْ رَائِحَةَ الْجَنَّةِ) .
منكر بذ كر (الوالدين) .

أخرجه البخاري في `التاريخ ` (3/1/314) ،
والخرائطي في `مساوئ الأخلاق ` (123/260) ، والطبراني في `المعجم الكبير`
(1/187/591) ، وابن عدي في `الكامل ` (1/10) من طريق إسماعيل بن
عياش: حدثني عبد الرحمن بن عبد الله بن محيريز عن أبيه عن أوس بن أوس
رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: … فذكره. وقال ابن عدي:
` لا أعلم يرويه غير إسماعيل بن عياش `.
قلت: وهو مختلف فيه، والذي استقر عليه رأي الحفاظ النقاد: ما رواه ابن
عدي عن أحمد وغيره - ختم به ابن عدي ترجمته قائلاً - :
`وحديثه عن الشاميين إذا روى عنه ثقة؛ فهو مستقيم، وفي الجملة: هو ممن
يكتب حديثه ويحتج به فِي حَدِيثِ الشاميين خاصة `.
قلت: وهذا ليس من حديثه عنهم؛ لأن شيخه عبد الرحمن بن عبد الله بن
محيريز … مكي. على أن هذا مجهول؛ لم يرو عنه غير ابن عياش، ومع ذلك وثقه
ابن حبان (7/78) على قاعدته المعروفة في توثيق المجهولين! ومن هنا يتبين لك
خطأ قول الهيثمي في `المجمع ` (1/148) :
`رواه الطبراني في `الكبير`، وإسناده حسن`.
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(যে ব্যক্তি তার নবীর উপর, অথবা তার দুই চোখের উপর, অথবা তার পিতা-মাতার উপর মিথ্যা আরোপ করে, সে জান্নাতের সুগন্ধি পাবে না)।
(পিতা-মাতা) উল্লেখ করার কারণে এটি মুনকার (অস্বীকৃত)।

এটি বর্ণনা করেছেন বুখারী তাঁর ‘আত-তারীখ’ গ্রন্থে (৩/১/৩১৪), আল-খারায়েতী তাঁর ‘মাসাবিউল আখলাক’ গ্রন্থে (১২৩/২৬০), তাবারানী তাঁর ‘আল-মু'জামুল কাবীর’ গ্রন্থে (১/১৮৭/৫৯১), এবং ইবনু আদী তাঁর ‘আল-কামিল’ গ্রন্থে (১/১০) ইসমাঈল ইবনু আইয়াশ-এর সূত্রে। তিনি (ইসমাঈল ইবনু আইয়াশ) বলেন: আমাকে হাদীস বর্ণনা করেছেন আব্দুর রহমান ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু মুহাইরিয তাঁর পিতা হতে, তিনি আওস ইবনু আওস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে। তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেন। ইবনু আদী বলেন: ‘আমি ইসমাঈল ইবনু আইয়াশ ব্যতীত অন্য কাউকে এটি বর্ণনা করতে জানি না।’

আমি (আলবানী) বলি: আর সে (ইসমাঈল ইবনু আইয়াশ) এমন ব্যক্তি যার ব্যাপারে মতভেদ রয়েছে। সমালোচক হাফিযগণ যে মতের উপর স্থির হয়েছেন, তা হলো: ইবনু আদী যা আহমাদ ও অন্যান্যদের থেকে বর্ণনা করেছেন – ইবনু আদী তাঁর জীবনী শেষ করার সময় বলেছেন – :
‘শামবাসীদের থেকে তার হাদীস যদি কোনো নির্ভরযোগ্য ব্যক্তি বর্ণনা করে, তবে তা সহীহ (সুদৃঢ়)। মোটের উপর: সে এমন ব্যক্তি যার হাদীস লেখা যায় এবং বিশেষত শামবাসীদের হাদীসের ক্ষেত্রে তা দ্বারা প্রমাণ পেশ করা যায়।’

আমি বলি: আর এটি তাদের (শামবাসীদের) থেকে তার বর্ণিত হাদীস নয়; কারণ তার শায়খ আব্দুর রহমান ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু মুহাইরিয... মাক্কী (মক্কার অধিবাসী)। উপরন্তু, এই ব্যক্তি মাজহুল (অজ্ঞাত); ইবনু আইয়াশ ব্যতীত অন্য কেউ তার থেকে বর্ণনা করেনি। এতদসত্ত্বেও ইবনু হিব্বান তাকে নির্ভরযোগ্য বলেছেন (৭/৭৮) মাজহুলদের নির্ভরযোগ্য বলার ক্ষেত্রে তার সুপরিচিত নীতি অনুসারে! আর এখান থেকেই তোমার কাছে হাইসামী-এর ‘আল-মাজমা’ গ্রন্থে (১/১৪৮) করা এই উক্তির ভুল স্পষ্ট হয়ে যাবে:
‘এটি তাবারানী ‘আল-কাবীর’ গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন এবং এর সনদ হাসান।’









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6304)


لَيْسَ عَلَيْكُمْ فِى غَسْلِ مَيِّتِكُمْ غُسْلٌ إِذَا غَسَّلْتُمُوهُ، إِنَّهُ
مُسْلِمٌ مُؤْمِنٌ طَاهِرٌ، وَإِنَّ الْمُسْلِمَ (وفي لفظ: مَيِّتَكُمْ) لَيْسَ بِنَجِسٍ،
فَحَسْبُكُمْ أَنْ تَغْسِلُوا أَيْدِيَكُمْ) .
ضعيف.

أخرجه الدارقطني في `سننه ` (2/76/4) ، والحاكم (1/386) ،
ومن طريقه البيهقي في `السن ` (1/306) من وجهين عن أبي شيبة إبراهيم بن
عبد الله: ثنا خالد بن مخلد: ثنا سليمان بن بلال عن عمرو بن أبي عمرو عن
عكرمة عَنْ اِبْنِ عَبَّاسٍ قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: … فذكره. وقال الحاكم:
`صحيح على شرط البخاري `! ووافقه الذهبي!
وقال البيهقي:
`هذا ضعيف، والحمل فيه على أبي شيبة كما أظن `.
قلت: وهو الصواب، كان تعقبه الحافظ بقوله في `التلخيص` (1/138) :
(قلت: أبو شيبة - هو: إبراهيم بن أبي بكر بن أبي شيبة - احتج به النسائي،
ووثقه الناس، ومن فوقه احتج بهم البخاري؛ فالإسناد حسن `.
وأقول: هذا هو المتبادر من ظاهر الإسناد؛ ولذا كنت تبعته على تحسينه قديماً
في `أحكام الجنائز`، وبخاصة أنه قال في `التهذيب ` - متعقبأ قول البيهقي المذكور - :
`ووهم في ذلك، وكأنه ظنه جده إبراهيم بن عثمان؛ فهو المعروف بأبي
شيبة أكثر مما يعرف بها هذا، وهو المضعف كما سيأتي `.
قلت: وهذا مما أستبعده جداً عن الحافظ البيهقي؛ وذلك لأمور:
الأول: أن التوهيم المذكور كان يمكن التسليم به لو أن أبا شيبة لم يسم في
إسناده، أما وهو قد سمي بـ: (إبراهيم بن عبد الله) - كما رأيت - ؛ فكيف يعقل أن
يختلط على مثل الحافظ البيهقي بجده إبراهيم بن عثمان؟!

الثاني: أنه يؤكد ما ذكرت اختلاف طبقتهما، والبعد الشاسع بين وفاتيهما
بنحو مائة سنة! فالجد عند الحافظ من الطبقة السابعة - مات سنة (169) - ؛ أي:
فوق طبقة شيخ شيخه سليمان بن بلال في هذا الحديث؛ فهو عنده من الطبقة
الثامنة - مات سنة (177) - ، والحفيد عنده من الطبقة الحادية عشرة - مات سنة
(265) - ! فهل يمكن أن يخفى هذا التفاوت الشاسع على الحافظ البيهقي؟!
ويبدو لي - والله أعلم - أن البيهقي لما ضعفط هذا الحديث؛ قد لاحظ أمرين
اثنين:
أحدهما: أن أبا شيبة هذا - مع كونه ثقة - كان تغير قبل موته في آخر أيامه
- كما قال ابن المنادي - .
والآخر: أن أبا شيبة قد خولف في رفعه، أو أن المخالف هو شيخه خالد بن
مخلد؛ فإنه وإن كان من شيوخ البخاري؛ ففيه كلام كثير، حتى أورده الذهبي في
` الضعفاء ` وقال:
`قال أحمد: له أحاديث مناكير. وقال ابن سعد: منكر الحديث `.
ثم رأيت الذهبي في `الميزان ` قد أورد له أحاديث من مناكيره؛ هذا أحدها،
وذكرأنه مما تفرد به.
فأقول: فهذا هو الراجح؛ أن خالداً هذا هو المخالف؛ فقد أخرجه البيهقي
(6/306) من طريق معلى ومنصور بن سلمة، و (3/398) من طريق ابن وهب؛
ثلاثتهم عن سليمان بن بلال … به موقوفاً على ابن عباس،
وتابعهم رابع - وكلهم ثقات - ؛ فقال ابن أبي شيبة في `الصنف ` (3/267) :
حدثنا سفيان بن عيينة عن عمرو عن عطاء عَنْ اِبْنِ عَبَّاسٍ به موقوفاً مختصراً بلفظ:
`لا تنجسوا موتاكم؛ فإن المؤمن ليس بنجس حياً ولا ميتاً`.
قلت: وهذا إسناد صحيح على شرط الشيخين.
وتابعه ابن جريج عن عطاء … به نحوه.

أخرجه عبد الرزاق (3/405/6101) .
وتابعه عبد الملك عن عطاء … به.

أخرجه ابن أبي شيبة أيضاً.
قلت: فرواية عطاء هذه تؤيد رواية الثقات الثلاثة عن سليمان بن بلال عن
عمرو بن أبي عمرو عن عكرمة عَنْ اِبْنِ عَبَّاسٍ. وتؤكد أن الحديث عَنْ اِبْنِ عَبَّاسٍ
موقوف، وأن رفع خالد بن مخلد إياه عن سليمان بن بلال خطأ بيِّن.
فإن قيل: فقد رواه بعضهم من طريق ابن عيينة بإسناده المتقدم؛ لكن رفعه.

أخرجه الحاكم (1/385) ، ومن طريقه البيهقي، فقال الحاكم: أخبرنا إبراهيم
ابن عصمة بن إبراهيم العدل: ثنا أبو مسلم المسيب بن زهير البغدادي: ثنا أبو
بكر وعثمان ابنا أبي شيبة قالا: ثنا سفيان ابن عيينة … به. وقال الحاكم:
`صحيح على شرط الشيخين `! ووافقه الذهبي!
قلت: وهذا خطأ فاحش منهما، وسببه أنهما وقف نظرهما عند ابني أبي
شيبة - فإنهما من شيوخ الشيخين، وكذلك من فوقهما كما تقدم - ، وكان عليهما
أن ينظرا إلى من دونهما أيضاً، فإذا كانوا من الثقات؛ أمكن القول بصحة
الإسناد، وإلا؛ فلا - كما هو الشأن هنا - ، فإن شيخ الحاكم إبراهيم بن عصمة وإن
كان صد وقاً في نفسه، فقد أدخلوا في كتبه أحاديث، كما جاء في `الميزان `
و`اللسان `.
وشيخه المسيب بن زهير البغدادي ترجمه الخطيب (13/137) ، وذكر أنه
كان على شرطة بغداد في أيام المنصور والمهدي والرشيد، ولم يذكر له شيوخاً ورواة
إلا حديثاً واحداً رواه عن المهدي بإسناده، ومع ذلك ففي الطريق إليه من رمي
بالوضع - وقد مضى تخريجه برقم (787) - ؛ فهو إذن مجهول، وقد مات سنة (176) - كما ذكر الخطيب - ، ففي هذا الإسناد غرابة؛ إذ ليس من المعهود أن يروي المتوفى في هذه السنة عن المتوفى بعده بنحو ستين سنة، فإن أبا بكر بن أبي
شيبة توفي سنة (235) ، وأخاه عثمان توفي سنة (239) .
نعم؛ لو أن هذا الراوي كان معروفاً برواية الحديث وتلقيه إياه عن الحفاظ؛
لقلنا: إنه من باب (رواية الأكابر عن الأصاغر) ، ولكنه غير معروف؛ فلعله لذلك
قال البيهقي عقب الحديث:
`غريب عن ابن عيينة، المعروف موقوف `.
وخلاصة القول: أن الصواب في الحديث أنه موقوف على ابن عباس، من
الطريقين عنه، وأن تحسينه من الطريق الأولى وهم. والله سبحانه وتعالى أعلم.
‌‌6304/ م - (لا تُطْعِمِي السُّؤَّالَ مَا لا تَأْكُلِيَن منه) .
ضعيف.

أخرجه أبو بكر بن أبي شيبة في `المصنف ` (8/267 - 268) ، وعنه
أبو يعلى في `مسنده` (7/438 - 439) ، وابن أبي حاتم في `العلل ` (2/10 - 11)
من طريق عبيد بن سعيد عن سفيان عن منصور عن إبراهيم عن الأسود عن
عائشة قالت:
أهدي إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم ضب، فلم يأكل منه، قالت: فقلت: يا رسول الله!
ألا أطعمه السُّؤَّال؛ قال: … فذكره.
قلت: وهذا إسناد صحيح على شرط مسلم، لكن أعله أبو زرعة - كما في
`علل ابن أبي حاتم ` (2/11) - فقال:
`هذا خطأ؛ أخطأ فيه عبيد، قال: `عن منصور` … وإنما هو: `عن حماد`،
والصحيح ما حدثنا قبيصة عن الثوري عن حماد عن إبراهيم قال: أهدي لعائشة
ضباب`.
وكذلك رواه أبو أحمد الزبيري: ثنا سفيان … به نحوه.

أخرجه البيهقي (9/325) .
وخالف الثوريَّ حمادُ بن سلمة: فقال: ثنا حماد بن أبي سليمان عن إبراهيم
عن الأسود عن عائشة.

أخرجه أحمد (6/105 و 144) ، والطحاوي في `شرح المعاني ` (2/316) ،
والطبراني في `المعجم الأوسط ` (2/11/5248) ، والبيهقي أيضاً من طرق عن
حماد … به. وقال الطبراني:
`لم يروه عن حماد بن أبي سليمان إلا حماد بن سلمة وسفيان التوري `.
قلت: قد عرفت مما تقدم أن رواية الثوري عن حماد بن أبي سليمان منقطعة؛
لم يذكر في إسناده الأسود عن عائشة. كذلك رواه قبيصة وأبو أحمد الزبيري.
ومن ذلك يتبين أن حماد بن سلمة تفرد بروايته عن حماد بن أبي سليمان
موصولاً. وابن سلمة وإن كان ثقة من رجال مسلم، ففي حفظه شيء في غير
روايته عن ثابت؛ ولذلك أورده الذهبي في `المغني ` وقال:
`إمام ثقة، له أوهام وغرائب، وغيره أثبت منه `.
قلت: فمخالفته لسفيان الثوري تجعل النفس لا تطمئن لها، وتميل إلى
توهيمه في وصله لإسناد هذا الحديث، وقد أشار إلى ذلك البيهقي بقوله:
`إن ثبت `. ونحوه قول الهيثمي (3/113) :
`رواه الطبراني في ` الأوسط `، ورجاله موثقون `.
وأما الحافظ فذكره في `الفتح ` (9/665 و 666) من رواية الطحاوي، وسكت
عليه؛ مشيراً إلى تقويته. والله أعلم.
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لَيْسَ عَلَيْكُمْ فِى غَسْلِ مَيِّتِكُمْ غُسْلٌ إِذَا غَسَّلْتُمُوهُ، إِنَّهُ
مُسْلِمٌ مُؤْمِنٌ طَاهِرٌ، وَإِنَّ الْمُسْلِمَ (وفي لفظ: مَيِّتَكُمْ) لَيْسَ بِنَجِسٍ،
فَحَسْبُكُمْ أَنْ تَغْسِلُوا أَيْدِيَكُمْ) .
তোমাদের মৃতকে গোসল করালে তোমাদের উপর গোসল করা আবশ্যক নয়, কারণ সে মুসলিম, মুমিন, পবিত্র। আর নিশ্চয় মুসলিম (অন্য বর্ণনায়: তোমাদের মৃত) নাপাক নয়। সুতরাং তোমাদের জন্য তোমাদের হাত ধোয়াই যথেষ্ট।

যঈফ (দুর্বল)।

এটি দারাকুতনী তাঁর ‘সুনান’ গ্রন্থে (২/৭৬/৪), হাকিম (১/৩৮৬) এবং তাঁর (হাকিমের) সূত্রে বাইহাকী ‘আস-সুনান’ গ্রন্থে (১/৩০৬) দু’টি সূত্রে আবূ শাইবাহ ইবরাহীম ইবনু আব্দুল্লাহ হতে বর্ণনা করেছেন: তিনি বলেন, আমাদেরকে হাদীস বর্ণনা করেছেন খালিদ ইবনু মাখলাদ: তিনি বলেন, আমাদেরকে হাদীস বর্ণনা করেছেন সুলাইমান ইবনু বিলালাহ, তিনি আমর ইবনু আবী আমর হতে, তিনি ইকরিমা হতে, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে। তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেন।

আর হাকিম বলেছেন: ‘এটি বুখারীর শর্তানুযায়ী সহীহ!’ এবং যাহাবীও তাঁর সাথে একমত পোষণ করেছেন!
আর বাইহাকী বলেছেন: ‘এটি দুর্বল (যঈফ), আর আমার ধারণা, এর দায় আবূ শাইবাহর উপর বর্তায়।’
আমি (আলবানী) বলি: এটিই সঠিক। হাফিয (ইবনু হাজার) তাঁর ‘আত-তালখীস’ (১/১৩৮) গ্রন্থে এর সমালোচনা করে বলেছেন:
(আমি বলি: আবূ শাইবাহ—তিনি হলেন: ইবরাহীম ইবনু আবী বাকর ইবনু আবী শাইবাহ—নাসাঈ তাঁর দ্বারা দলীল পেশ করেছেন, আর লোকেরা তাঁকে বিশ্বস্ত বলেছেন, আর তাঁর উপরের রাবীগণ দ্বারা বুখারী দলীল পেশ করেছেন; সুতরাং সনদটি হাসান।)

আর আমি বলি: সনদের বাহ্যিক দিক থেকে এটিই প্রতীয়মান হয়; এই কারণে আমি পূর্বে ‘আহকামুল জানাইয’ গ্রন্থে এটিকে হাসান বলার ক্ষেত্রে তাঁর (হাফিয ইবনু হাজারের) অনুসরণ করেছিলাম। বিশেষত তিনি ‘আত-তাহযীব’ গ্রন্থে—বাইহাকীর উপরোক্ত বক্তব্যের সমালোচনা করে—বলেছেন: ‘তিনি (বাইহাকী) এ ব্যাপারে ভুল করেছেন, সম্ভবত তিনি তাঁকে তাঁর দাদা ইবরাহীম ইবনু উসমান মনে করেছেন; কারণ ইনি (ইবরাহীম ইবনু উসমান) আবূ শাইবাহ নামে বেশি পরিচিত, এর (ইবরাহীম ইবনু আব্দুল্লাহর) চেয়ে। আর ইনিই (ইবরাহীম ইবনু উসমান) দুর্বল, যেমনটি পরে আসবে।’
আমি বলি: হাফিয বাইহাকীর ক্ষেত্রে এই বিষয়টি আমি অত্যন্ত অসম্ভব মনে করি; এর কারণ কয়েকটি:
প্রথমত: যদি আবূ শাইবাহর নাম সনদে উল্লেখ না থাকত, তবে এই ভুল ধারণা মেনে নেওয়া যেত। কিন্তু যখন তাঁর নাম (ইবরাহীম ইবনু আব্দুল্লাহ) হিসেবে উল্লেখ করা হয়েছে—যেমনটি আপনি দেখেছেন—তখন হাফিয বাইহাকীর মতো ব্যক্তির কাছে কীভাবে তিনি তাঁর দাদা ইবরাহীম ইবনু উসমানের সাথে মিশ্রিত হতে পারেন?!

দ্বিতীয়ত: আমি যা উল্লেখ করেছি, তা তাদের উভয়ের স্তরগত পার্থক্য দ্বারা এবং তাদের উভয়ের মৃত্যুর সময়ের মধ্যে প্রায় একশ বছরের বিশাল ব্যবধান দ্বারা নিশ্চিত হয়! হাফিযের (ইবনু হাজার) মতে দাদা (ইবরাহীম ইবনু উসমান) হলেন সপ্তম স্তরের—তিনি (১৬৯) সনে মারা যান—অর্থাৎ: এই হাদীসের ক্ষেত্রে তাঁর (দাদার) শাইখের শাইখ সুলাইমান ইবনু বিলালের স্তরের উপরে; আর তিনি (সুলাইমান ইবনু বিলালাহ) তাঁর (হাফিযের) মতে অষ্টম স্তরের—তিনি (১৭৭) সনে মারা যান—আর নাতি (ইবরাহীম ইবনু আব্দুল্লাহ) তাঁর (হাফিযের) মতে একাদশ স্তরের—তিনি (২৬৫) সনে মারা যান! এই বিশাল পার্থক্য কি হাফিয বাইহাকীর কাছে গোপন থাকতে পারে?!

আর আমার কাছে যা প্রতীয়মান হয়—আল্লাহই ভালো জানেন—তা হলো, বাইহাকী যখন এই হাদীসটিকে দুর্বল বলেছেন; তখন তিনি দু’টি বিষয় লক্ষ্য করেছেন:
প্রথমত: এই আবূ শাইবাহ—বিশ্বস্ত হওয়া সত্ত্বেও—মৃত্যুর পূর্বে শেষ জীবনে তাঁর স্মৃতিশক্তি পরিবর্তিত হয়ে গিয়েছিল—যেমনটি ইবনু আল-মুনাদী বলেছেন।
দ্বিতীয়ত: আবূ শাইবাহর ‘মারফূ’ (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পর্যন্ত উন্নীত) করার ক্ষেত্রে বিরোধিতা করা হয়েছে, অথবা এই বিরোধিতাকারী হলেন তাঁর শাইখ খালিদ ইবনু মাখলাদ; কারণ তিনি বুখারীর শাইখদের অন্তর্ভুক্ত হওয়া সত্ত্বেও তাঁর সম্পর্কে অনেক সমালোচনা রয়েছে, এমনকি যাহাবী তাঁকে ‘আয-যুআফা’ গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন: ‘আহমাদ বলেছেন: তাঁর কাছে মুনকার (অস্বীকৃত) হাদীস রয়েছে। আর ইবনু সা’দ বলেছেন: মুনকারুল হাদীস (যার হাদীস মুনকার)।’ অতঃপর আমি যাহাবীকে ‘আল-মীযান’ গ্রন্থে দেখেছি যে, তিনি তাঁর মুনকার হাদীসগুলোর মধ্যে এটিকেও উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন যে, এটি এমন হাদীস যা বর্ণনায় তিনি একক।

সুতরাং আমি বলি: এটিই অধিকতর সঠিক; যে এই খালিদই হলেন বিরোধিতাকারী; কারণ বাইহাকী (৬/৩০৬) মুআল্লা ও মানসূর ইবনু সালামাহর সূত্রে এবং (৩/৩৯৮) ইবনু ওয়াহবের সূত্রে এটি বর্ণনা করেছেন; এই তিনজনই সুলাইমান ইবনু বিলালাহ হতে... ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উপর ‘মাওকূফ’ (সাহাবী পর্যন্ত সীমাবদ্ধ) হিসেবে বর্ণনা করেছেন।
আর চতুর্থ একজন রাবী তাঁদের অনুসরণ করেছেন—তাঁরা সকলেই বিশ্বস্ত—সুতরাং ইবনু আবী শাইবাহ ‘আল-মুসান্নাফ’ গ্রন্থে (৩/২৬৭) বলেছেন: আমাদেরকে হাদীস বর্ণনা করেছেন সুফিয়ান ইবনু উয়াইনাহ, তিনি আমর হতে, তিনি আতা হতে, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে, এই হাদীসটি ‘মাওকূফ’ হিসেবে সংক্ষিপ্ত শব্দে:
`لا تنجسوا موتاكم؛ فإن المؤمن ليس بنجس حياً ولا ميتاً`.
‘তোমরা তোমাদের মৃতদেরকে নাপাক মনে করো না; কারণ মুমিন জীবিত বা মৃত কোনো অবস্থাতেই নাপাক নয়।’
আমি বলি: এই সনদটি শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্তানুযায়ী সহীহ।

আর ইবনু জুরাইজ আতা হতে... অনুরূপভাবে তাঁর অনুসরণ করেছেন।
এটি আব্দুর রাযযাক (৩/৪০৫/৬১০১) বর্ণনা করেছেন।
আর আব্দুল মালিক আতা হতে... তাঁর অনুসরণ করেছেন।
এটিও ইবনু আবী শাইবাহ বর্ণনা করেছেন।
আমি বলি: সুতরাং আতার এই বর্ণনাটি সুলাইমান ইবনু বিলালাহ, তিনি আমর ইবনু আবী আমর, তিনি ইকরিমা, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত বিশ্বস্ত তিনজনের বর্ণনাকে সমর্থন করে। এবং এটি নিশ্চিত করে যে, হাদীসটি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে ‘মাওকূফ’ (সাহাবীর উক্তি), আর খালিদ ইবনু মাখলাদ কর্তৃক সুলাইমান ইবনু বিলালাহ হতে এটিকে ‘মারফূ’ (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উক্তি) হিসেবে বর্ণনা করা স্পষ্ট ভুল।

যদি বলা হয়: কেউ কেউ তো ইবনু উয়াইনাহর সূত্রে পূর্বোক্ত সনদেই বর্ণনা করেছেন; কিন্তু এটিকে ‘মারফূ’ করেছেন।
এটি হাকিম (১/৩৮৫) এবং তাঁর সূত্রে বাইহাকী বর্ণনা করেছেন। হাকিম বলেছেন: আমাদেরকে খবর দিয়েছেন ইবরাহীম ইবনু ইসমা ইবনু ইবরাহীম আল-আদল: তিনি বলেন, আমাদেরকে হাদীস বর্ণনা করেছেন আবূ মুসলিম আল-মুসাইয়্যাব ইবনু যুহাইর আল-বাগদাদী: তিনি বলেন, আমাদেরকে হাদীস বর্ণনা করেছেন আবূ বাকর ও উসমান ইবনু আবী শাইবাহ, তাঁরা উভয়ে বলেছেন: আমাদেরকে হাদীস বর্ণনা করেছেন সুফিয়ান ইবনু উয়াইনাহ... এই হাদীসটি। আর হাকিম বলেছেন: ‘শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্তানুযায়ী সহীহ!’ এবং যাহাবীও তাঁর সাথে একমত পোষণ করেছেন!
আমি বলি: এটি তাঁদের উভয়ের পক্ষ থেকে একটি জঘন্য ভুল। এর কারণ হলো, তাঁরা উভয়ে আবূ শাইবাহর দুই পুত্রের (আবূ বাকর ও উসমান) কাছেই তাঁদের দৃষ্টি সীমাবদ্ধ রেখেছেন—কারণ তাঁরা উভয়ে শাইখাইনের শাইখদের অন্তর্ভুক্ত, এবং তাঁদের উপরের রাবীগণও তাই, যেমনটি পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে—অথচ তাঁদের উচিত ছিল তাঁদের নিচের রাবীদের দিকেও দৃষ্টি দেওয়া। যদি তাঁরা বিশ্বস্ত হতেন, তবে সনদের সহীহ হওয়ার কথা বলা যেত, অন্যথায় নয়—যেমনটি এই ক্ষেত্রে ঘটেছে—কারণ হাকিমের শাইখ ইবরাহীম ইবনু ইসমা যদিও নিজে সত্যবাদী ছিলেন, তবুও তাঁর কিতাবে হাদীস ঢুকিয়ে দেওয়া হয়েছে, যেমনটি ‘আল-মীযান’ ও ‘আল-লিসান’ গ্রন্থে এসেছে।

আর তাঁর শাইখ আল-মুসাইয়্যাব ইবনু যুহাইর আল-বাগদাদী, খতীব (১৩/১৩৭) তাঁর জীবনী উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন যে, তিনি মানসূর, মাহদী ও রশীদ-এর শাসনামলে বাগদাদের পুলিশ প্রধান ছিলেন। তিনি তাঁর জন্য কোনো শাইখ বা রাবীর উল্লেখ করেননি, কেবল একটি হাদীস ছাড়া, যা তিনি মাহদী হতে তাঁর সনদসহ বর্ণনা করেছেন। এতদসত্ত্বেও তাঁর (মুসাইয়্যাবের) সূত্রে এমন রাবী রয়েছে যাকে জালকারী হিসেবে অভিযুক্ত করা হয়েছে—আর এর তাখরীজ (৭৮৭) নম্বরে গত হয়েছে—সুতরাং তিনি (মুসাইয়্যাব) অজ্ঞাত (মাজহূল)। আর তিনি (১৭৬) সনে মারা যান—যেমনটি খতীব উল্লেখ করেছেন—সুতরাং এই সনদে অস্বাভাবিকতা (গারাবাহ) রয়েছে; কারণ এই সনে মৃত্যুবরণকারী রাবী তাঁর প্রায় ষাট বছর পরে মৃত্যুবরণকারী রাবী হতে বর্ণনা করবেন, এটি পরিচিত নয়। কারণ আবূ বাকর ইবনু আবী শাইবাহ (২৩৫) সনে মারা যান, আর তাঁর ভাই উসমান (২৩৯) সনে মারা যান।

হ্যাঁ; যদি এই রাবী হাদীস বর্ণনার জন্য এবং হাফিযদের নিকট হতে হাদীস গ্রহণের জন্য পরিচিত হতেন; তবে আমরা বলতাম: এটি (রওয়ায়াতুল আকাবির আনিল আসাগির) (বড়দের ছোটদের নিকট হতে বর্ণনা) নীতির অন্তর্ভুক্ত। কিন্তু তিনি পরিচিত নন; সম্ভবত এই কারণেই বাইহাকী হাদীসটির শেষে বলেছেন: ‘ইবনু উয়াইনাহ হতে এটি গারীব (অস্বাভাবিক), আর যা পরিচিত তা হলো ‘মাওকূফ’ (সাহাবীর উক্তি)।’
বক্তব্যের সারসংক্ষেপ হলো: এই হাদীসের ক্ষেত্রে সঠিক হলো যে, এটি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে উভয় সূত্রেই ‘মাওকূফ’ (সাহাবীর উক্তি), আর প্রথম সূত্র থেকে এটিকে হাসান বলা ভুল। আল্লাহ সুবহানাহু ওয়া তাআলা সর্বজ্ঞ।

‌‌৬৩০৪/ ম - (لا تُطْعِمِي السُّؤَّالَ مَا لا تَأْكُلِيَن منه) .
(যা তুমি নিজে খাও না, তা ভিক্ষুকদের খেতে দিও না।)

যঈফ (দুর্বল)।

এটি আবূ বাকর ইবনু আবী শাইবাহ তাঁর ‘আল-মুসান্নাফ’ গ্রন্থে (৮/২৬৭-২৬৮), তাঁর সূত্রে আবূ ইয়া’লা তাঁর ‘মুসনাদ’ গ্রন্থে (৭/৪৩৮-৪৩৯), এবং ইবনু আবী হাতিম ‘আল-ইলাল’ গ্রন্থে (২/১০-১১) উবাইদ ইবনু সাঈদ হতে, তিনি সুফিয়ান হতে, তিনি মানসূর হতে, তিনি ইবরাহীম হতে, তিনি আল-আসওয়াদ হতে, তিনি আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট একটি গুইসাপ (দ্বাব) হাদিয়া দেওয়া হলো, কিন্তু তিনি তা খেলেন না। তিনি (আয়িশাহ) বলেন: আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আমি কি তা ভিক্ষুকদের খেতে দেব না? তিনি বললেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেন।
আমি বলি: এই সনদটি মুসলিমের শর্তানুযায়ী সহীহ, কিন্তু আবূ যুরআহ এটিকে ত্রুটিযুক্ত বলেছেন—যেমনটি ‘ইলাল ইবনু আবী হাতিম’ (২/১১) গ্রন্থে রয়েছে—তিনি বলেছেন: ‘এটি ভুল; উবাইদ এতে ভুল করেছেন, তিনি বলেছেন: ‘মানসূর হতে’... অথচ এটি হবে: ‘হাম্মাদ হতে’, আর সঠিক হলো যা আমাদেরকে কুবাইসাহ বর্ণনা করেছেন, তিনি সাওরী হতে, তিনি হাম্মাদ হতে, তিনি ইবরাহীম হতে। তিনি (ইবরাহীম) বলেন: আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে গুইসাপ হাদিয়া দেওয়া হয়েছিল।’

অনুরূপভাবে আবূ আহমাদ আয-যুবাইরীও বর্ণনা করেছেন: আমাদেরকে হাদীস বর্ণনা করেছেন সুফিয়ান... অনুরূপভাবে।
এটি বাইহাকী (৯/৩২৫) বর্ণনা করেছেন।

আর হাম্মাদ ইবনু সালামাহ সাওরী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর বিরোধিতা করেছেন: তিনি বলেছেন: আমাদেরকে হাদীস বর্ণনা করেছেন হাম্মাদ ইবনু আবী সুলাইমান, তিনি ইবরাহীম হতে, তিনি আল-আসওয়াদ হতে, তিনি আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে।
এটি আহমাদ (৬/১০৫ ও ১৪৪), তাহাবী ‘শারহুল মাআনী’ গ্রন্থে (২/৩১৬), তাবারানী ‘আল-মু’জামুল আওসাত’ গ্রন্থে (২/১১/৫২৪৮), এবং বাইহাকীও হাম্মাদ হতে বিভিন্ন সূত্রে... এই হাদীসটি বর্ণনা করেছেন। আর তাবারানী বলেছেন: ‘হাম্মাদ ইবনু আবী সুলাইমান হতে হাম্মাদ ইবনু সালামাহ এবং সুফিয়ান আস-সাওরী ছাড়া আর কেউ এটি বর্ণনা করেননি।’

আমি বলি: পূর্বে যা গত হয়েছে, তা থেকে আপনি জানতে পেরেছেন যে, সাওরী কর্তৃক হাম্মাদ ইবনু আবী সুলাইমান হতে বর্ণিত হাদীসটি মুনকাতি’ (বিচ্ছিন্ন); কারণ তাঁর সনদে আল-আসওয়াদ আন আয়িশাহ (আল-আসওয়াদ আয়িশাহ হতে) উল্লেখ নেই। অনুরূপভাবে কুবাইসাহ এবং আবূ আহমাদ আয-যুবাইরীও বর্ণনা করেছেন।
আর এর থেকে স্পষ্ট হয় যে, হাম্মাদ ইবনু সালামাহ হাম্মাদ ইবনু আবী সুলাইমান হতে এটিকে মাওসূল (সংযুক্ত) হিসেবে বর্ণনায় একক। আর ইবনু সালামাহ যদিও মুসলিমের রাবীদের অন্তর্ভুক্ত বিশ্বস্ত রাবী, তবুও সাবিত হতে তাঁর বর্ণনা ছাড়া অন্য বর্ণনায় তাঁর স্মৃতিশক্তির দুর্বলতা রয়েছে; এই কারণে যাহাবী তাঁকে ‘আল-মুগনী’ গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন: ‘তিনি বিশ্বস্ত ইমাম, তাঁর কিছু ভুল ও অস্বাভাবিকতা (আওহাম ওয়া গারাইব) রয়েছে, আর অন্যরা তাঁর চেয়ে অধিক নির্ভরযোগ্য।’
আমি বলি: সুতরাং সুফিয়ান আস-সাওরীর বিরোধিতা করার কারণে মন এতে সন্তুষ্ট হয় না, এবং এই হাদীসের সনদকে সংযুক্ত করার ক্ষেত্রে তাঁকে ভুলকারী মনে করার দিকেই ঝুঁকে যায়। বাইহাকী তাঁর এই কথা দ্বারা সেদিকেই ইঙ্গিত করেছেন: ‘যদি তা প্রমাণিত হয়।’ অনুরূপভাবে হাইসামী (৩/১১৩)-এর বক্তব্য: ‘এটি তাবারানী ‘আল-আওসাত’ গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন, আর এর রাবীগণ বিশ্বস্ত।’ আর হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আল-ফাতহ’ গ্রন্থে (৯/৬৬৫ ও ৬৬৬) তাহাবীর বর্ণনা হতে এটি উল্লেখ করেছেন এবং নীরব থেকেছেন; যা এটিকে শক্তিশালী করার ইঙ্গিত দেয়। আল্লাহই ভালো জানেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6305)


(بِحَسْبِ امْرِئٍ أَنْ يَدْعُوَ أَنْ يَقُولَ: اللَّهُمَّ! اغْفِرْ لِي،
وَارْحَمْنِي، وَأَدْخِلْنِي الْجَنَّةَ) .
ضعيف.

أخرجه الطبراني في `المعجم الكبير` (7/182/6670) من طريق
ابن لهيعة عن محمد بن عبد الرحمن بن نوفل عن يزيد بن خصيفة عن السائب
ابن يزيد أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يقول: … فذكره.
قلت: وهذا إسناد ضعيف، ورجاله كلهم ثقات؛ غير ابن لهيعة، وهو ضعيف
لسوء حفظه. وقال الهيثمي (10/180) :
`رواه الطبراني، ورجاله رجال الصحيح؛ غير ابن لهيعة، وهو حسن الحديث`!
كذا قال! وابن لهيعة ضعيف من قبل حفظه، والهيثمي قوله فيه مضطرب؛
فتارة يحسِّن حديثه - كما هنا - وتارة يضعِّفه - وقد تقدمت له أمثلة كثيرة - ، وإنما
يكون حديثه قوياً إذا كان من رواية أحد العبادلة عنه - كما تقدم مراراً - ، وليس
هذا من رواية أحدهم. فتنبه!
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(কোনো ব্যক্তির জন্য এতটুকু দো‘আ করাই যথেষ্ট যে, সে বলবে: হে আল্লাহ! আমাকে ক্ষমা করুন, আমার প্রতি রহম করুন এবং আমাকে জান্নাতে প্রবেশ করান।)
যঈফ (দুর্বল)।

এটি ত্বাবারানী তাঁর ‘আল-মু‘জামুল কাবীর’ গ্রন্থে (৭/১৮২/৬৬৭০) ইবনু লাহী‘আহ-এর সূত্রে মুহাম্মাদ ইবনু ‘আব্দির রহমান ইবনু নাওফাল হতে, তিনি ইয়াযীদ ইবনু খুসাইফাহ হতে, তিনি সায়িব ইবনু ইয়াযীদ হতে বর্ণনা করেন যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলতেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেছেন।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল)। এর সকল বর্ণনাকারীই নির্ভরযোগ্য (সিকাহ); তবে ইবনু লাহী‘আহ ব্যতীত। তিনি দুর্বল, কারণ তাঁর স্মৃতিশক্তি খারাপ ছিল (সু-উল হিফয)।

আর হাইসামী (১০/১৮০) বলেছেন: ‘এটি ত্বাবারানী বর্ণনা করেছেন, আর এর বর্ণনাকারীরা সহীহ-এর বর্ণনাকারী; তবে ইবনু লাহী‘আহ ব্যতীত। আর তিনি (ইবনু লাহী‘আহ) ‘হাসানুল হাদীস’!’ তিনি এমনই বলেছেন!

অথচ ইবনু লাহী‘আহ তাঁর স্মৃতিশক্তির কারণে দুর্বল। আর হাইসামী তাঁর (ইবনু লাহী‘আহ) সম্পর্কে পরস্পরবিরোধী কথা বলেছেন (মুদ্বত্বারিব); কখনও তিনি তাঁর হাদীসকে ‘হাসান’ বলেন—যেমন এখানে বলেছেন—আবার কখনও তিনি তাকে ‘যঈফ’ বলেন—আর এ বিষয়ে তাঁর বহু উদাহরণ পূর্বে অতিবাহিত হয়েছে। আর তাঁর হাদীস কেবল তখনই শক্তিশালী হয়, যখন তা তাঁর থেকে ‘আবদালিয়্যাহ’ (আবদাল্লাহ নামধারী) বর্ণনাকারীদের কারো সূত্রে বর্ণিত হয়—যেমনটি বহুবার পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে—কিন্তু এটি তাদের কারো সূত্রে বর্ণিত নয়। সুতরাং, সতর্ক হোন!









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6306)


(بِئْسَ الطَّعَامُ طَعَامُ الْوَلِيمَةِ؛ يُدْعَى إِلَيْهِ الْأَغْنِيَاءُ وَيُتْرَكُ
الْمَسَاكِينُ) .
شاذ بهذا اللفظ: `بئس`.

أخرجه مسلم (4/153) من طريق مالك عن
ابن شهاب عن الأعرج عن أبي هريرة: أنه كان يقول: … فذكره موقوفاً.
وهو في `الموطأ` (2/77) بهذا الإسناد إلا أنه قال: `شر الطعام … `، وكذلك رواه البخاري
(5177) عن مالك. قال الحافظ في `الفتح `: (9/245) :
`وهو الأكثر`.
وهو مخرج في ` الإرواء ` (7/3/1947) .
وقد وجدت له طرقاً باللفظ الأول؛ فلا بد من الكلام عليها، لنكون على بينة
منها:
الأولى: عن عبد الملك بن جريج عن الزهري … به مرفوعاً.

أخرجه ابن عبد البر في `التمهيد` (10/177) .
وابن جريج مدلس وقد عنعنه.
الثانية: عن محمد بن أبي حفصة البصري عن الزهري … به.

أخرجه ابن عدي في `الكامل ` (6/ 261) في ترجمة البصري هذا. وقال:
`وهو من الضعفاء الذين يكتب حديثهم `.
قلت: وهو من رجال الشيخين؛ ولكنه ممن اختلف فيه، ويبدو من مجموع
أقوال الأئمة فيه ما يدل على أنه ثقة في نفسه، وأن في حفظه ضعفاً، وقد أشار
إلى هذا الذهبي والعسقلاني، فقال الأول في `المغني `:
`ثقة مشهور، فيه شيء`. وقال الآخر في `التقريب `:
`صدوق يخطئ `.
ولعل ابن جريج تلقاه عنه ثم دلسه!
الثالثة: عن مسلم بن أبي مسلم: ثنا مخلد بن الحسين عن هشام بن حسان
عن محمد بن سيرين عن أبي هريرة … به مرفوعاً.

أخرجه أبو نعيم في `الحلية` (8/267) .
قلت: ومسلم بن أبي مسلم - هو: الجرمي - وثقه الخطيب (13/100) ، وكذا
ابن حبان (9/158) وقال:
`ربما أخطأ`. وقال البيهقي فِي حَدِيثِ آخر له تقدم (2801) :
`غير قوي `.
قلت: ويبدو لي أنه وسط حسن الحديث إذا لم يخالف - كما هو الشأن هنا - ؛
ولذلك جودت إسناد حديثه المتقدم.
وهذه الطريق عن ابن سيرين قد عزاها الحافظ في `الفتح ` (9/245) لأبي
الشيخ - هكذا أطلق العزو إليه ولم يقيده - ؛ فلا أدري إذا كانت عنده من طريق
مسلم الجرمي هذا أو غيره.
الرابعة: عن محمد بن مصعب: ثنا الحسن بن دينار عن الحسن عن أبي
هريرة … مر فوعأً.

أخرجه ابن عدي أيضاً (2/299) .
والحسن بن دينار: متروك، وكذبه بعضهم، وترجمته في `اللسان `.
ومحمد بن مصعب - هو: القُرقُساني - : صدوق كثير الخطأ - كما فى
`التقريب` - ؛ فيحتمل أن يكون الخطأ منه إن سلم من الحسن بن دينار.
والحدى يث أورده السيوطي في `الجامع الصغير` من حديث أبي هريرة بلفظ:
`بئس الطعام طعام العرس؛ يَطْعَمُه الأغنياء، ويُمْنعه المساكين `. وقال:
`رواه الدارقطني في `زوائد ابن مردك ` عن أبي هريرة `.
وبيض له المناوي في `شرحيه`؛ فلا أدري ما حال إسناده، وهل هو بإسناد
آخر غير ما تقدم؟ والله أعلم.
وبالجملة؛ فالمحفوظ في هذا الحديث إنما هو بلفظ:
`شر الطعام طعام الوليمة`.
وقد صح موقوفاً ومرفوعاً من طرق، وهو مخرج في `الإرواء` - كما تقدم - ،
وفي `الصحيحة` أيضاً (1085) .
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(নিকৃষ্টতম খাবার হলো সেই ওয়ালীমার খাবার; যেখানে ধনীদেরকে দাওয়াত দেওয়া হয় আর মিসকীনদেরকে বাদ দেওয়া হয়।)

এই শব্দে (بئس) এটি শা'য (বিরল)।

এটি মুসলিম (৪/১৫৩) মালিক হতে, তিনি ইবনু শিহাব হতে, তিনি আল-আ'রাজ হতে, তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন যে, তিনি বলতেন: ... অতঃপর তিনি এটিকে মাওকূফ হিসেবে উল্লেখ করেছেন।

আর এটি 'আল-মুওয়াত্তা' (২/৭৭)-তেও এই ইসনাদে রয়েছে, তবে সেখানে তিনি বলেছেন: `খাবারের মধ্যে নিকৃষ্টতম হলো...`। অনুরূপভাবে বুখারীও (৫১৭৭) মালিক হতে এটি বর্ণনা করেছেন।

হাফিয (ইবনু হাজার আসকালানী) 'আল-ফাতহ' (৯/২৪৫)-এ বলেছেন:
`আর এটিই অধিক প্রচলিত (আহাদيث)`.

আর এটি 'আল-ইরওয়া' (৭/৩/১৯৪৭)-এও সংকলিত হয়েছে।

আর আমি প্রথম শব্দে (بئس) এর জন্য কিছু সনদ (طرق) পেয়েছি; তাই এগুলোর উপর আলোচনা করা আবশ্যক, যাতে আমরা এ সম্পর্কে স্পষ্ট ধারণা লাভ করতে পারি:

প্রথমটি: আব্দুল মালিক ইবনু জুরাইজ হতে, তিনি যুহরী হতে... এর মাধ্যমে মারফূ' হিসেবে।

এটি ইবনু আব্দুল বার্র 'আত-তামহীদ' (১০/১৭৭)-এ সংকলন করেছেন।
আর ইবনু জুরাইজ মুদাল্লিস এবং তিনি 'আনআনা' (عنعنة) করেছেন।

দ্বিতীয়টি: মুহাম্মাদ ইবনু আবী হাফসাহ আল-বাসরী হতে, তিনি যুহরী হতে... এর মাধ্যমে।

এটি ইবনু আদী 'আল-কামিল' (৬/২৬১)-এ এই বাসরীর জীবনীতে সংকলন করেছেন। আর তিনি বলেছেন:
`তিনি দুর্বলদের অন্তর্ভুক্ত, যাদের হাদীস লেখা যায়।`

আমি (আলবানী) বলি: তিনি শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর রাবীদের অন্তর্ভুক্ত; কিন্তু তিনি তাদের মধ্যে একজন যার ব্যাপারে মতভেদ রয়েছে। ইমামগণের সম্মিলিত বক্তব্য থেকে প্রতীয়মান হয় যে, তিনি নিজে বিশ্বস্ত (ثقة), তবে তার স্মৃতিশক্তির দুর্বলতা ছিল। যাহাবী ও আসকালানী এই দিকে ইঙ্গিত করেছেন। প্রথমজন 'আল-মুগনী'-তে বলেছেন:
`তিনি বিশ্বস্ত (ثقة), প্রসিদ্ধ, তার মধ্যে কিছু দুর্বলতা আছে।` আর অন্যজন 'আত-তাকরীব'-এ বলেছেন:
`তিনি সত্যবাদী (صدوق), তবে ভুল করেন।`

সম্ভবত ইবনু জুরাইজ তার কাছ থেকে এটি গ্রহণ করেছেন, অতঃপর তা তাদলিস করেছেন!

তৃতীয়টি: মুসলিম ইবনু আবী মুসলিম হতে: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন মাখলাদ ইবনু আল-হুসাইন, তিনি হিশাম ইবনু হাসসান হতে, তিনি মুহাম্মাদ ইবনু সীরীন হতে, তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে... এর মাধ্যমে মারফূ' হিসেবে।

এটি আবূ নু'আইম 'আল-হিলইয়াহ' (৮/২৬৭)-এ সংকলন করেছেন।

আমি বলি: আর মুসলিম ইবনু আবী মুসলিম - তিনি হলেন: আল-জারমী - তাকে খতীব (১৩/১০০) বিশ্বস্ত বলেছেন, অনুরূপভাবে ইবনু হিব্বানও (৯/১৫৮) বিশ্বস্ত বলেছেন এবং বলেছেন:
`মাঝে মাঝে তিনি ভুল করতেন।` আর বায়হাকী তার অন্য একটি হাদীস সম্পর্কে, যা পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে (২৮০১), বলেছেন:
`তিনি শক্তিশালী নন।`

আমি বলি: আমার কাছে মনে হয় যে, তিনি মধ্যম মানের এবং তার হাদীস হাসান, যদি না তিনি বিরোধিতা করেন - যেমনটি এখানে ঘটেছে -; এই কারণে আমি তার পূর্বোল্লিখিত হাদীসের ইসনাদকে 'জাওয়াদতু' (উত্তম) বলেছিলাম।

আর ইবনু সীরীন হতে বর্ণিত এই সনদটিকে হাফিয (ইবনু হাজার) 'আল-ফাতহ' (৯/২৪৫)-এ আবূশ শাইখ-এর দিকে সম্পর্কিত করেছেন - এভাবে তিনি সাধারণভাবে তার দিকে সম্পর্কযুক্ত করেছেন, নির্দিষ্ট করেননি -; তাই আমি জানি না যে, এটি তার নিকট এই মুসলিম আল-জারমীর সনদেই ছিল, নাকি অন্য কোনো সনদে।

চতুর্থটি: মুহাম্মাদ ইবনু মুস'আব হতে: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আল-হাসান ইবনু দীনার, তিনি আল-হাসান হতে, তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে... মারফূ' হিসেবে।

এটি ইবনু আদীও (২/২৯৯) সংকলন করেছেন।

আর আল-হাসান ইবনু দীনার: মাতরূক (পরিত্যক্ত), এবং কেউ কেউ তাকে মিথ্যাবাদী বলেছেন। তার জীবনী 'আল-লিসান'-এ রয়েছে।

আর মুহাম্মাদ ইবনু মুস'আব - তিনি হলেন: আল-কুরকুসানী - : সত্যবাদী (صدوق), তবে অনেক ভুল করেন - যেমনটি 'আত-তাকরীব'-এ রয়েছে -; তাই যদি আল-হাসান ইবনু দীনারের ত্রুটি না থাকে, তবে ভুলটি তার পক্ষ থেকে হওয়ার সম্ভাবনা রয়েছে।

আর এই হাদীসটি সুয়ূতী 'আল-জামি' আস-সাগীর'-এ আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস হিসেবে এই শব্দে উল্লেখ করেছেন: `নিকৃষ্টতম খাবার হলো বিবাহের খাবার; যা ধনীরা খায়, আর মিসকীনদেরকে তা থেকে বঞ্চিত করা হয়।` আর তিনি বলেছেন:
`এটি দারাকুতনী 'যাওয়াইদ ইবনু মারদাক'-এ আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন।`

আর আল-মুনাভী তার ব্যাখ্যায় এর স্থান সাদা (খালি) রেখেছেন; তাই আমি জানি না এর ইসনাদের অবস্থা কী, আর এটি কি পূর্বে উল্লিখিত সনদগুলো ছাড়া অন্য কোনো সনদে রয়েছে? আল্লাহই ভালো জানেন।

মোটের উপর; এই হাদীসে যা সংরক্ষিত (আল-মাহফূয) তা হলো এই শব্দে:
`ওয়ালীমার খাবার হলো নিকৃষ্টতম খাবার।`

আর এটি বিভিন্ন সনদে মাওকূফ ও মারফূ' উভয়ভাবেই সহীহ প্রমাণিত হয়েছে। আর এটি 'আল-ইরওয়া'-তেও সংকলিত হয়েছে - যেমনটি পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে - এবং 'আস-সহীহাহ' (১০৮৫)-তেও রয়েছে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6307)


(من قال في الإسلام شعراً مُقْذِعاً؛ فلِسانُه هَدَرٌ) .
ضعيف.

أخرجه البزار في `مسنده` (2/452/2092) : حدثنا عمر بن
موسى السَّامي: ثنا أبو هلال الراسبي محمد بن سليم عن عبد الله بن بريدة عن
أبيه … مرفوعاً. وقال:
`لا نعلم رواه عن النبي صلى الله عليه وسلم إلا بريدة`.
قلت: فيما قاله تسامح في التعبير؛ لأنه يشعر بصحة الإسناد إلى بريدة،
وليس كذلك، وإن قال الهيثمي (8/123) :
`رواه البزار، ورجاله ثقات، وفي بعضهم خلاف `.
فإن هذا لا يعني أن الحديث ثابت عنده، وإن أقره الأعظمي في تعليقه على
`زوائد مسند البزار`، وتبعه المعلق على أحاديث الشعر` (113) ، وكأنه خفي
عليهم حال عمر بن موسى السامي - بالسين المهملة، فقد وقع في `الزوائد`:
(الشامي) … بالشين المعجمة، وكذلك وقع في `كامل ابن عدي` و`لسان ابن
حجر`، وهو تصحيف من بعض النساخ أو الطابعين. والتصويب من `إكمال ابن
ماكولا` (4/557) وغيره؛ وهو: عمر بن موسى بن سليمان الحادي البصري، عم
الكديمي - : قال ابن عدي (5/54) :
`ضعيف، يسرق الحديث، ويخالف في الأسانيد`.
ثم ساق له أحاديث بعضها من روايته عن أبي هلال هذا، ثم قال:
`وله غير ما ذكرت من الأحاديث التي سرقها، والتي رفعها، والتي خالف
في أسانيدها، والضعف بيِّن في رواياته`.
وأما ابن حبان فأورده في `الثقات ` (8/445) ! ومع أنه قال فيه:
`ربما أخطأ`؛ فقد نسبه الحافظ في `اللسان ` إلى الغفلة، مشيراً بذلك إلى
ترجيح تضعيف ابن عدي عليه.
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(যে ব্যক্তি ইসলামের মধ্যে অশ্লীল কবিতা আবৃত্তি করে; তার জিহ্বা মূল্যহীন/তার রক্তপাত বৈধ)।
যঈফ।

এটি বাযযার তাঁর ‘মুসনাদ’ গ্রন্থে (২/৪৫২/২০৯২) বর্ণনা করেছেন: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন উমার ইবনু মূসা আস-সামী: আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন আবূ হিলাল আর-রাসিবী মুহাম্মাদ ইবনু সুলাইম, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু বুরাইদাহ হতে, তিনি তাঁর পিতা হতে... মারফূ’ হিসেবে।
এবং তিনি (বাযযার) বলেছেন:
‘আমরা জানি না যে, বুরাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ব্যতীত অন্য কেউ এটি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম হতে বর্ণনা করেছেন।’

আমি (আল-আলবানী) বলি: তিনি (বাযযার) যা বলেছেন, তাতে অভিব্যক্তিতে শিথিলতা রয়েছে; কারণ এটি বুরাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পর্যন্ত ইসনাদের বিশুদ্ধতার ইঙ্গিত দেয়, অথচ বিষয়টি এমন নয়। যদিও হাইসামী (৮/১২৩) বলেছেন:
‘এটি বাযযার বর্ণনা করেছেন এবং এর বর্ণনাকারীগণ নির্ভরযোগ্য, তবে তাদের কারো কারো ব্যাপারে মতভেদ রয়েছে।’

এই কথাটির অর্থ এই নয় যে, হাদীসটি তাঁর (হাইসামীর) নিকট প্রমাণিত। যদিও আ’যামী ‘যাওয়াইদ মুসনাদিল বাযযার’-এর টীকায় এটিকে সমর্থন করেছেন এবং ‘আহাদীসুশ শি’র’ (কবিতার হাদীসসমূহ)-এর টীকাকার (১১৩) তাঁর অনুসরণ করেছেন। মনে হচ্ছে, উমার ইবনু মূসা আস-সামী-এর অবস্থা তাদের কাছে গোপন ছিল – (আস-সামী) সীন (س) অক্ষর দ্বারা, অথচ ‘আয-যাওয়াইদ’ গ্রন্থে এটি (আশ-শামী) – শীন (ش) অক্ষর দ্বারা এসেছে। অনুরূপভাবে এটি ‘কামিল ইবনু আদী’ এবং ‘লিসান ইবনু হাজার’-এও এসেছে। এটি কিছু লিপিকার বা মুদ্রণকারীর ভুল। এর সঠিক রূপ ‘ইকমাল ইবনু মাকুলা’ (৪/৫৫৭) এবং অন্যান্য গ্রন্থ হতে পাওয়া যায়; আর তিনি হলেন: উমার ইবনু মূসা ইবনু সুলাইমান আল-হাদী আল-বাসরী, আল-কুদাইমীর চাচা।

ইবনু আদী (৫/৫৪) বলেছেন:
‘সে যঈফ (দুর্বল), হাদীস চুরি করত এবং ইসনাদে বিরোধিতা করত।’
অতঃপর তিনি তার জন্য কিছু হাদীস উল্লেখ করেছেন, যার কিছু এই আবূ হিলাল হতে তার বর্ণনা। এরপর তিনি বলেছেন:
‘আমি যা উল্লেখ করেছি তা ছাড়াও তার আরো হাদীস রয়েছে যা সে চুরি করেছে, যা সে মারফূ’ করেছে এবং যার ইসনাদে সে বিরোধিতা করেছে। তার বর্ণনাসমূহে দুর্বলতা স্পষ্ট।’

আর ইবনু হিব্বান তাকে ‘আস-সিকাত’ (নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারীগণ)-এর মধ্যে উল্লেখ করেছেন (৮/৪৪৫)! যদিও তিনি তার সম্পর্কে বলেছেন: ‘মাঝে মাঝে সে ভুল করত’; তবুও হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আল-লিসান’ গ্রন্থে তাকে গাফিলতির (অন্যমনস্কতার) সাথে সম্পর্কিত করেছেন, এর মাধ্যমে তিনি ইবনু আদীর যঈফ ঘোষণার মতকে প্রাধান্য দেওয়ার ইঙ্গিত দিয়েছেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6308)


(إن اللهَ تعالى أوحى إليَّ، يا أخا المُرسَلِينَ! ويا أخا المُنذِرِينَ!
أَنْذِرْ قومَك أنْ لا يَدْخُلوا بَيْتاً من بيوتي ولأحَدٍ عندهم مَظْلَمَةٌ، فإني
أَلْعَنُهُ ما دام قائماً بن يديَّ يُصَلِّي حتى يَرُدَّ تلك الظُلامةَ إلى أهلها،
فأكونَ سَمْعَه الذي يَسْمَعُ به، وأكونَ بصرَه الذي يُبْصِرُ به، ويكونَ
من أوليائي وأَصْفِيائي، ويكونَ جاري مع النَّبِيِّيَن والصِّدِّيقيَن والشهداءِ
في الجنةِ) .
ضعيف.

أخرجه أبو نعيم في `الحلية` (6/116) : حدثنا سليمان بن أحمد:
ثنا أبو الزنباع روح بن الفرج: ثنا إسحاق بن إبراهيم بن رزيق: ثنا أبو اليمان: ثنا
الأوزاعي: حدثني عبدة: حدثني زر بن حبيش قال: سمعت حذيفة يقول: قال
رسول الله صلى الله عليه وسلم: … فذكره. وقال:
`غريب من حديث الأوزاعي عن عبدة، ورواه علي بن معبد عن إسحاق بن
أبي يحيى العكي عن الأوزاعي … به `.
قلت: وهذا إسناد ضعيف، رجاله كلهم ثقات مترجمون في `التهذيب`، إلا
شيخ أبي نعيم سليمان بن أحمد وهو الحافظ الطبراني صاحب `المعاجم الثلاثة`،
وهو أشهر من أن يذكر، وإلا إسحاق بن إبراهيم بن زريق. فإني جهدت في أن
أجد له ترجمة فلم أوفق.
ثم بدا لي شيء وهو أن جده: (زريق) … محرف من (زبريق) ، وأنه إسحاق
بن إبراهيم بن العلاء المصري، فإنه يعرف بـ: (ابن زبريق) ، وهو من هذه
الطبقة، وقد مضى له حديث برقم (758) من رواية الطبراني بواسطة آخر له
عنه: ثنا عمرو بن الحارث … فإذا كان هو هذا، فهو ضعيف جداً - كما بينت
هناك - ، وقال الحافظ في `التقريب`:
`صدوق يهم كثيراً، وأطلق محمد بن عوف أنه يكذب`.
ولعله قد خفي حاله على الحافظ ابن رجب الحنبلي، فقال في `جامع العلوم
والحكم` (ص 261) - بعد أن عزاه للطبراني - :
`وهذا إسناد جيد، وهو غريب جداً`.
ولم أجد من عزاه للطبراني، ولا هوفي شيء من `معجمه الثلاثة`، فلعله
في بعض كتبه الأخرى مثل `مسند الشاميين` فليراجع، فإن يدي لا تطوله الآن،
وليس هو في المجلدين المطبوعين بتحقيق أخينا عبد المجيد السلفي فرج الله عنه كربه.
وأما إسحاق بن أبي يحيى العكي: فلم أعرفه.
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(নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা আমার প্রতি ওহী করেছেন, হে রাসূলগণের ভাই! এবং হে সতর্ককারীদের ভাই!
তুমি তোমার কওমকে সতর্ক করে দাও যে, তারা যেন আমার ঘরসমূহের কোনো ঘরে প্রবেশ না করে, অথচ তাদের কাছে কারো কোনো হক (অধিকার/জুলুম) পাওনা রয়েছে। কেননা, আমি তাকে অভিশাপ দিতে থাকি যতক্ষণ সে আমার সামনে দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করে, যতক্ষণ না সে সেই জুলুম তার হকদারদের কাছে ফিরিয়ে দেয়।
তখন আমি তার শ্রবণশক্তি হয়ে যাই যা দিয়ে সে শোনে, এবং আমি তার দৃষ্টিশক্তি হয়ে যাই যা দিয়ে সে দেখে, আর সে আমার বন্ধু ও মনোনীত বান্দাদের অন্তর্ভুক্ত হয়ে যায়, এবং জান্নাতে সে নবীগণ, সিদ্দীকগণ ও শহীদগণের সাথে আমার প্রতিবেশী হবে।)
যঈফ (দুর্বল)।

এটি বর্ণনা করেছেন আবূ নুআইম তাঁর ‘আল-হিলইয়াহ’ গ্রন্থে (৬/১১৬): আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন সুলাইমান ইবনু আহমাদ:
আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আবূয যিনবা‘ রূহ ইবনুল ফারাজ: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন ইসহাক ইবনু ইবরাহীম ইবনু রুযাইক: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আবুল ইয়ামান: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আল-আওযাঈ: আমার কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আবদাহ: আমার কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন যির ইবনু হুবাইশ, তিনি বলেন: আমি হুযাইফাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেছেন। আর তিনি (আবূ নুআইম) বলেছেন:
‘এটি আবদাহ থেকে আওযাঈ-এর বর্ণনাসমূহের মধ্যে গারীব (বিরল)। আর এটি বর্ণনা করেছেন আলী ইবনু মা‘বাদ, ইসহাক ইবনু আবী ইয়াহইয়া আল-আক্কী থেকে, তিনি আওযাঈ থেকে... অনুরূপ।’
আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল)। এর সকল রাবীই নির্ভরযোগ্য এবং ‘আত-তাহযীব’ গ্রন্থে তাদের জীবনী উল্লেখ আছে, তবে আবূ নুআইম-এর শাইখ সুলাইমান ইবনু আহমাদ ছাড়া। আর তিনি হলেন হাফিয আত-তাবারানী, যিনি ‘আল-মু‘জামুস সালাসাহ’ (তিনটি মু‘জাম) গ্রন্থের রচয়িতা, তিনি এতই প্রসিদ্ধ যে তার উল্লেখ করার প্রয়োজন নেই। আর ইসহাক ইবনু ইবরাহীম ইবনু রুযাইক ছাড়া। কেননা আমি তার জীবনী খুঁজে বের করার জন্য চেষ্টা করেছি, কিন্তু সফল হইনি।
অতঃপর আমার কাছে একটি বিষয় স্পষ্ট হলো, আর তা হলো তার দাদা: (রুযাইক) ... শব্দটি (যুবরাইক) থেকে বিকৃত হয়েছে। আর তিনি হলেন ইসহাক ইবনু ইবরাহীম ইবনুল আলা আল-মিসরী। কেননা তিনি ‘ইবনু যুবরাইক’ নামে পরিচিত। আর তিনি এই স্তরের রাবী। তার একটি হাদীস পূর্বে (৭৫৮) নং-এ তাবারানীর সূত্রে অন্য একজন রাবীর মাধ্যমে বর্ণিত হয়েছে: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আমর ইবনুল হারিস...। যদি তিনি এই ব্যক্তিই হন, তবে তিনি খুবই দুর্বল - যেমনটি আমি সেখানে স্পষ্ট করেছি -। আর হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আত-তাকরীব’ গ্রন্থে বলেছেন:
‘তিনি সত্যবাদী, তবে প্রচুর ভুল করেন। আর মুহাম্মাদ ইবনু আওফ স্পষ্টভাবে বলেছেন যে, তিনি মিথ্যা বলেন।’
সম্ভবত হাফিয ইবনু রাজাব আল-হাম্বালী-এর কাছে তার অবস্থা গোপন ছিল, তাই তিনি ‘জামি‘উল উলূম ওয়াল হিকাম’ (পৃ. ২৬১) গ্রন্থে - তাবারানীর দিকে হাদীসটি সম্বন্ধিত করার পর - বলেছেন:
‘এই সনদটি জায়্যিদ (উত্তম), আর এটি খুবই গারীব (বিরল)।’
আমি এমন কাউকে পাইনি যে এটিকে তাবারানীর দিকে সম্বন্ধিত করেছে, আর এটি তার ‘তিনটি মু‘জাম’ গ্রন্থের কোনোটিতেও নেই। সম্ভবত এটি তার অন্য কোনো গ্রন্থে রয়েছে, যেমন ‘মুসনাদুশ শামিয়্যীন’। সুতরাং তা যাচাই করা উচিত। কেননা বর্তমানে আমার হাত সেখানে পৌঁছাচ্ছে না। আর এটি আমাদের ভাই আব্দুল মাজীদ আস-সালাফী (আল্লাহ তার কষ্ট দূর করুন) কর্তৃক তাহকীককৃত মুদ্রিত দুই খণ্ডের মধ্যেও নেই।
আর ইসহাক ইবনু আবী ইয়াহইয়া আল-আক্কী সম্পর্কে: আমি তাকে চিনতে পারিনি।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6309)


( [إن] أول شيءٍ خَلَقَ اللهُ القلمُ، ثم خَلَقَ بعده النُّونَ،
وهي الدَّواةُ، ثم قال سبحانه وتعالى: اكْتُب. فقال: وما أكْتُبُ؟ قال
جل وعلا: اكتب ما يكونُ من عملٍ، أو أَثَرٍ، أو رِزْقٍ، [أو أجل] . فكتبَ
ما يكونُ، وما هو كائنٌ إلى يومِ القيامةِ، فذلك قوله عز وجل: {ن.
والقلم وما يسطرون} ثم خَتَمَ على القَلَم، فلمْ يَنْطِقْ، ولا
ينطقُ إلى يومِ القيامةِ، [ثم خلق العقل فقال: وعزَّتي! لأُكَمِلَّنَّك فيمن
أَحْبَبْتُ ولأُنْقِصَنَّك فيمن أَبْغَضْتُ] ) () .
منكر.

أخرجه الآجري في `الشريعة` (ص 83) ، وابن عساكر في `تاريخ دمشق`
(2/83) من طريق أبي مروان هشام بن خالد - يعني: الدمشقي الأزرق - قال:
حدثنا الحسن بن يحيى الخُشَني عن أبي عبد الله مولى بني أمية عن أبي صالح
عن أبي هريرة رضي الله عنه … مرفوعاً.
() كتب على الهامش الأصل: `مضى نحوه (1253) `. (الناشر) .
قلت وهذا إسناد ضعيف، أبو عبد الله هذا: لم أجد له ترجمة.
والحسن بن يحيى الخشني: قال الحافظ:
`صدوق كثير الخطأ`.
وله طريق أخرى عن أبي صالح، ولكنها واهية: يرويه محمد بن وهب
الدمشقي: ثنا الوليد بن مسلم: نا مالك بن أنس عن سمي عن أبي صالح … به.

أخرجه ابن عدي في `الكامل` (6/269) وقال:
`وهذا باطل بهذا الإسناد`.
ذكره في ترجمة محمد بن وهب بن عطية الدمشقي، وقال:
`وله غير حديث منكر، ولم أر للمتقدمين فيه كلاماًً، وقد رأيتهم تكلموا
فيمن هو خير منه`.
ومن طريق ابن عدي أخرجه ابن عساكر (16/95) ، لكن ذكره في ترجمة
محمد بن وهب بن مسلم أبو عمرو القرشي الدمشقي، يشير بذلك إلى خطأ ابن
عدي في إيراده في ترجمة محمد بن وهب بن عطية. وصرح بتخطئته الذهبي في
`الميزان`، وقال عقبه:
`فصدق ابن عدي في أن الحديث باطل`.وذكر نحوه الحافظ في `التهذيب`.
واعلم أن الزيادات التي بين المعكوفتين هي لابن عساكر في الموضوع المشار إليه
من `تاريخه`، وإلا الأخيرة منها، فقد عزاها إليه الحافظ ابن كثير في تفسيره سورة
{ن} . وساق إسنادها السيوطي في `اللآلي` (1/131) من طريق أبي مروان
المتقدمة.
والحديث جاء من طرق ذكرها ابن عباس موقوفاً عليه بنحوه إلى قوله: {ن.
والقلم وما يسطرون} .

أخرجه الآجري (ص 84) ، والطبري في `التفسير` (29/9 - 10) ، و`التاريخ`
(17 - 18) ، والحاكم (2/498) ، والبيهقي في ` السنن` (9/3) من طريق أبي
ظبيان وأبي الضحى مسلم بن صبيح على شرط الشيخين`. ووافقه الذهبي.
وأخرجه الطبراني في `المعجم الكبير` (12/433/12227) من طريق مؤمل
ابن إسماعيل: حدثنا حماد بن زيد عن عطاء بن السائب عن أبي الضحى … به
مرفوعاً.
قلت وهذا منكر، قال الطبراني عقبه:
لم يرفعه عن حماد بن زيد إلا مؤمل بن إسماعيل
قال الهيثمي (7/128) عقبه:
`قلت: مؤمل ثقة كثير الخطأ، وقد وثقه ابن معين وغيره، وضعفه البخاري
وغيره، وبقية رجاله ثقات`.
وأقول: وإنما يصح مرفوعاً من هذا الحديث عَنْ اِبْنِ عَبَّاسٍ وغيره أولُه مختصراً،
فرواه سعيد بن جبير عنه بلفظ:
`إن أول شيء خلقه الله تعالى القلم، وأمره أن يكتب كل شيء يكون`.
وهو مخرج في `الصحيحة` (133) ، وله شواهد من حديث عبادة بن الصامت
من طرق عنه، ومخرج في `المشكاة` (1/34/94) ، وعَنْ ابْنِ عُمَرَ في `الصحيحة`
أيضاً (3136) .
(تنبيه) : وأما الرواية التي أخرجها الطبري في `كتابيه` من طريق سفيان عن
أبي هاشم عن مجاهد عَنْ اِبْنِ عَبَّاسٍ موقوفاً بلفظ:
`إن الله تعالى ذِكْرُهُ كان على عرشه قبل أن يخلق شيئاً فكان أول ما خلق
الله القلم، فجرى بما هو كائن إلى يوم القيامة … `. الحديث.
فهو منكر جداً عندي لقوله:`قبل أن يخلق شيئاً` … فإنه يشعر أن العرش
غير مخلوق! وهذا باطل، وقد رواه شعبة عن أبي هاشم فلم يذكر
فيه هذا الباطل. ولعله من قبل أبي هاشم الرماني، فإنه وإن كان ثقة بالاتفاق،
فقد غمزه ابن حبان، فقال في `ثقاته` (7/596) :
`كان يخطئ، يجب أن يعتبر حديثه إذا كان من رواية الثقات عنه، فأما
رواية الضعفاء عنه … فان الوهن يلزق بهم دونه لانه صدوق لم يكن له سبب
يوهن به غير الخطأ، والخطأ متى لم يفحش لا يستحق من وجد فيه ذلك الترك`.
قلت: وإذا كان لا بد من تعصيب الخطأ في ذلك القول إلى أحد من سلسلة
هذا الإسناد، فالأولى أن ينسب إلى من دون ابن عباس، ثم إن أولاهم به هو أبو
هاشم هذا - لما سبق - ، وليس الراوي عنه سفيان - وهو: الثوري - ، فإنه:`ثقة حافظ
فقيه عابد إمام حجة` - كما قال الحافظ في `التقريب` - .
وإن مما يبطل ذاك القول ونسبته إلى ابن عباس: أنه نفسه ممن روى عنه صلى الله عليه وسلم
ما يؤكد بطلانه لما تقدم بلفظ:
`إن أول شيء خلقه الله تعالى القلم … `.
ولذلك قال الطبري رحمه الله:
`وقول رسول الله صلى الله عليه وسلم الذي رويناه أولى بالصواب، لأنه كان أعلم قائل بذلك
قولاً بحقيقته وصحته، ومن غير استثناء منه شيئاً من الأشياء أنه تقدم خلقُ الله إياه
خلقَ القلم، بل عمَّ بقوله صلى الله عليه وسلم: `إن أول شيء خلق الله القلم` كل شيء، أن القلم
مخلوق قبله من غير استثناء من ذلك عرشاً ولا ماءً، ولا شيئاً غير ذلك، فالرواية
التي رويناها عن أبي ظبيان وأبي الضحى عَنْ اِبْنِ عَبَّاسٍ أولى بالصحة عن ابن
عباس من خبر مجاهد عنه الذي رواه عنه أبو هاشم، إذا كان أبو هاشم قد اختلف
في رواية ذلك عنه شعبة وسفيان على ما ذكرت من اختلافها فيها`.
وإني لأحمد الله تعالى أن هذا الكلام من هذا الإمام موافق تماماً لما كنت
ذكرته في فوائد حديث ابن عباس هذا في المصدر المذكور آنفاً `الصحيحة`، أن
فيه رداً على من يقول بأن العرش هو أول مخلوق، ولم أكن يومئذ قد وقفت عليه.
فالحمد لله على توفيقه، وأسأله المزيد من فضله.
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( [নিশ্চয়ই] আল্লাহ্ তা‘আলা সর্বপ্রথম যা সৃষ্টি করেছেন তা হলো কলম। অতঃপর এর পরে তিনি ‘নূন’ সৃষ্টি করলেন, আর তা হলো দোয়াত। অতঃপর তিনি সুবহানাহু ওয়া তা‘আলা বললেন: লেখো। কলম বলল: আমি কী লিখব? তিনি জাল্লা ওয়া ‘আলা বললেন: যা কিছু আমল, বা নিদর্শন, বা রিযিক, [বা আয়ুষ্কাল] হবে, তা লেখো। অতঃপর কলম যা কিছু হয়েছে এবং কিয়ামত পর্যন্ত যা কিছু হবে, তা লিখল। আর এটাই হলো তাঁর বাণী: {নূন। শপথ কলম ও তারা যা লিপিবদ্ধ করে তার}। অতঃপর তিনি কলমের উপর মোহর মেরে দিলেন, ফলে তা কথা বলল না, আর কিয়ামত পর্যন্ত কথা বলবেও না। [অতঃপর তিনি বিবেক (আকল) সৃষ্টি করলেন এবং বললেন: আমার ইজ্জতের কসম! আমি তোমাকে পূর্ণতা দেব যাকে আমি ভালোবাসি তার মধ্যে, আর তোমাকে কমিয়ে দেব যাকে আমি ঘৃণা করি তার মধ্যে] ) ()।
মুনকার (অস্বীকৃত)।

এটি বর্ণনা করেছেন আল-আজুরী তাঁর ‘আশ-শারী‘আহ’ গ্রন্থে (পৃ. ৮৩), এবং ইবনু আসাকির তাঁর ‘তারীখে দিমাশক’ গ্রন্থে (২/৮৩) আবূ মারওয়ান হিশাম ইবনু খালিদ—অর্থাৎ: দিমাশকী আল-আযরাক—এর সূত্রে। তিনি বলেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আল-হাসান ইবনু ইয়াহইয়া আল-খুশানী, তিনি আবূ আব্দুল্লাহ মাওলা বানী উমাইয়াহ থেকে, তিনি আবূ সালিহ থেকে, তিনি আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে... মারফূ‘ (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পর্যন্ত উন্নীত) হিসেবে।
() মূল পাণ্ডুলিপির পার্শ্বটীকায় লেখা হয়েছে: ‘এর অনুরূপটি গত হয়েছে (১২৫৩) নম্বরে।’ (প্রকাশক)।
আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল)। এই আবূ আব্দুল্লাহর জীবনী আমি খুঁজে পাইনি। আর আল-হাসান ইবনু ইয়াহইয়া আল-খুশানী সম্পর্কে হাফিয (ইবনু হাজার) বলেছেন:
‘তিনি সত্যবাদী, তবে অনেক ভুল করেন।’
আবূ সালিহ থেকে এর আরেকটি সূত্র রয়েছে, কিন্তু সেটিও ওয়াহিয়াহ (অত্যন্ত দুর্বল)। এটি বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু ওয়াহব আদ-দিমাশকী: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আল-ওয়ালীদ ইবনু মুসলিম: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন মালিক ইবনু আনাস, তিনি সুমাইয়্য থেকে, তিনি আবূ সালিহ থেকে... এই সূত্রে।

এটি বর্ণনা করেছেন ইবনু আদী তাঁর ‘আল-কামিল’ গ্রন্থে (৬/২৬৯) এবং তিনি বলেছেন:
‘এই সনদ দ্বারা এটি বাতিল (বাতিলুন বি-হাযাল ইসনাদ)।’
তিনি এটি উল্লেখ করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু ওয়াহব ইবনু আতিয়্যাহ আদ-দিমাশকী-এর জীবনীতে এবং বলেছেন:
‘তার আরও কিছু মুনকার (অস্বীকৃত) হাদীস রয়েছে। আমি পূর্ববর্তী মুহাদ্দিসগণকে তার সম্পর্কে কোনো মন্তব্য করতে দেখিনি, যদিও আমি দেখেছি তারা তার চেয়ে উত্তম ব্যক্তির সম্পর্কেও মন্তব্য করেছেন।’
ইবনু আদী-এর সূত্রেই এটি বর্ণনা করেছেন ইবনু আসাকির (১৬/৯৫), তবে তিনি এটি উল্লেখ করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু ওয়াহব ইবনু মুসলিম আবূ আমর আল-কুরাশী আদ-দিমাশকী-এর জীবনীতে। এর মাধ্যমে তিনি ইঙ্গিত করেছেন যে, মুহাম্মাদ ইবনু ওয়াহব ইবনু আতিয়্যাহ-এর জীবনীতে এটি উল্লেখ করে ইবনু আদী ভুল করেছেন। আয-যাহাবী ‘আল-মীযান’ গ্রন্থে স্পষ্টভাবে ইবনু আদী-এর ভুল ধরিয়ে দিয়েছেন এবং এর পরপরই বলেছেন:
‘সুতরাং হাদীসটি বাতিল হওয়ার বিষয়ে ইবনু আদী সত্য বলেছেন।’ হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আত-তাহযীব’ গ্রন্থেও অনুরূপ উল্লেখ করেছেন।
জেনে রাখুন, বন্ধনীর মধ্যে থাকা অতিরিক্ত অংশগুলো ইবনু আসাকির-এর ‘তারীখ’ গ্রন্থের উল্লিখিত স্থানে রয়েছে, তবে এর মধ্যে শেষের অংশটি ব্যতীত। শেষের অংশটি হাফিয ইবনু কাসীর তাঁর সূরা {নূন}-এর তাফসীরে ইবনু আসাকির-এর দিকে সম্পর্কিত করেছেন। আস-সুয়ূতী ‘আল-লাআলী’ গ্রন্থে (১/১৩১) পূর্বোক্ত আবূ মারওয়ান-এর সূত্র ধরে এর সনদ উল্লেখ করেছেন।
আর হাদীসটি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মাওকূফ (তাঁর নিজস্ব উক্তি হিসেবে) হিসেবেও বর্ণিত হয়েছে, যা {নূন। শপথ কলম ও তারা যা লিপিবদ্ধ করে তার} পর্যন্ত অনুরূপ।

এটি বর্ণনা করেছেন আল-আজুরী (পৃ. ৮৪), এবং আত-তাবারী তাঁর ‘আত-তাফসীর’ গ্রন্থে (২৯/৯-১০), এবং ‘আত-তারীখ’ গ্রন্থে (১৭-১৮), এবং আল-হাকিম (২/৪৯৮), এবং আল-বায়হাকী তাঁর ‘আস-সুনান’ গ্রন্থে (৯/৩) আবূ যবইয়ান ও আবূদ দোহা মুসলিম ইবনু সুবাইহ-এর সূত্রে, যা শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্তানুযায়ী সহীহ। আর আয-যাহাবীও এতে একমত পোষণ করেছেন।
আর এটি বর্ণনা করেছেন আত-তাবারানী তাঁর ‘আল-মু‘জামুল কাবীর’ গ্রন্থে (১২/৪৩৩/১২২২৭) মুআম্মাল ইবনু ইসমাঈল-এর সূত্রে: তিনি বলেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন হাম্মাদ ইবনু যায়দ, তিনি আতা ইবনুস সা-ইব থেকে, তিনি আবূদ দোহা থেকে... এই সূত্রে মারফূ‘ (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পর্যন্ত উন্নীত) হিসেবে।
আমি (আলবানী) বলি: এটি মুনকার (অস্বীকৃত)। আত-তাবারানী এর পরপরই বলেছেন:
হাম্মাদ ইবনু যায়দ থেকে মুআম্মাল ইবনু ইসমাঈল ব্যতীত আর কেউ এটিকে মারফূ‘ হিসেবে বর্ণনা করেননি।
আল-হাইসামী (৭/১২৮) এর পরপরই বলেছেন:
‘আমি বলি: মুআম্মাল সিকাহ (নির্ভরযোগ্য), তবে অনেক ভুল করেন। ইবনু মাঈন ও অন্যান্যরা তাকে নির্ভরযোগ্য বললেও, আল-বুখারী ও অন্যান্যরা তাকে দুর্বল বলেছেন। আর এর অবশিষ্ট বর্ণনাকারীগণ নির্ভরযোগ্য।’
আমি বলি: এই হাদীসের যে অংশটি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও অন্যান্যদের থেকে সংক্ষিপ্ত আকারে মারফূ‘ হিসেবে সহীহ, তা হলো এর প্রথম অংশ। সাঈদ ইবনু জুবাইর তাঁর থেকে এই শব্দে বর্ণনা করেছেন:
‘নিশ্চয়ই আল্লাহ্ তা‘আলা সর্বপ্রথম যা সৃষ্টি করেছেন তা হলো কলম, আর তিনি তাকে নির্দেশ দিলেন যে, যা কিছু হবে তা যেন লিখে ফেলে।’
এটি ‘আস-সহীহাহ’ গ্রন্থে (১৩৩) সংকলিত হয়েছে। এর শাহেদ (সমর্থক বর্ণনা) উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস থেকেও বিভিন্ন সূত্রে বর্ণিত হয়েছে, যা ‘আল-মিশকাত’ গ্রন্থে (১/৩৪/৯৪) সংকলিত। আর ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও ‘আস-সহীহাহ’ গ্রন্থে (৩১৩৬) সংকলিত হয়েছে।
(সতর্কীকরণ): আর যে বর্ণনাটি আত-তাবারী তাঁর উভয় গ্রন্থে সুফইয়ান-এর সূত্রে, তিনি আবূ হাশিম থেকে, তিনি মুজাহিদ থেকে, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মাওকূফ (তাঁর নিজস্ব উক্তি) হিসেবে এই শব্দে বর্ণনা করেছেন:
‘নিশ্চয়ই আল্লাহ্ তা‘আলা তাঁর আরশের উপর ছিলেন কোনো কিছু সৃষ্টি করার পূর্বে। অতঃপর আল্লাহ্ সর্বপ্রথম যা সৃষ্টি করলেন তা হলো কলম, অতঃপর তা কিয়ামত পর্যন্ত যা কিছু হবে তা লিপিবদ্ধ করল...’ হাদীসটি।
এটি আমার নিকট অত্যন্ত মুনকার (অস্বীকৃত), কারণ এর এই উক্তিটি: ‘কোনো কিছু সৃষ্টি করার পূর্বে’... এটি এই ইঙ্গিত দেয় যে আরশ সৃষ্ট নয়! আর এটি বাতিল। শু‘বাহ এই হাদীসটি আবূ হাশিম থেকে বর্ণনা করেছেন, কিন্তু তিনি এই বাতিল অংশটি উল্লেখ করেননি। সম্ভবত এটি আবূ হাশিম আর-রুম্মানী-এর পক্ষ থেকে এসেছে। যদিও তিনি সর্বসম্মতিক্রমে নির্ভরযোগ্য, তবুও ইবনু হিব্বান তার সমালোচনা করেছেন। তিনি তাঁর ‘আস-সিকাত’ গ্রন্থে (৭/৫৯৬) বলেছেন:
‘তিনি ভুল করতেন। তার হাদীস তখনই বিবেচনা করা উচিত যখন তা নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারীদের মাধ্যমে তার থেকে বর্ণিত হয়। কিন্তু দুর্বল বর্ণনাকারীদের মাধ্যমে তার থেকে বর্ণিত হলে... দুর্বলতা তাদের সাথেই যুক্ত হবে, তার সাথে নয়। কারণ তিনি সত্যবাদী ছিলেন এবং ভুল করা ছাড়া তার দুর্বল হওয়ার অন্য কোনো কারণ ছিল না। আর ভুল যদি মাত্রাতিরিক্ত না হয়, তবে যার মধ্যে তা পাওয়া যায়, তাকে পরিত্যাগ করা উচিত নয়।’
আমি বলি: যদি এই সনদের শৃঙ্খলে কারো উপর এই উক্তির ভুলের দায় চাপানো অপরিহার্য হয়, তবে ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিচের স্তরের বর্ণনাকারীর দিকেই তা সম্পর্কিত করা উচিত। আর তাদের মধ্যে এই ভুলের জন্য সবচেয়ে উপযুক্ত হলেন এই আবূ হাশিম—পূর্বোক্ত কারণে—তার বর্ণনাকারী সুফইয়ান (অর্থাৎ: আস-সাওরী) নন। কারণ তিনি: ‘সিকাহ (নির্ভরযোগ্য), হাফিয, ফকীহ, আবিদ (ইবাদতকারী), ইমাম, হুজ্জাহ (প্রমাণস্বরূপ)’—যেমনটি হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আত-তাকরীব’ গ্রন্থে বলেছেন।
আর যে বিষয়টি এই উক্তিটিকে এবং ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দিকে এর সম্পর্ককে বাতিল প্রমাণ করে, তা হলো: তিনি নিজেই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে এমন হাদীস বর্ণনা করেছেন যা এর বাতিল হওয়াকে নিশ্চিত করে, যেমনটি পূর্বে উল্লিখিত হয়েছে এই শব্দে:
‘নিশ্চয়ই আল্লাহ্ তা‘আলা সর্বপ্রথম যা সৃষ্টি করেছেন তা হলো কলম...।’
এই কারণে ইমাম আত-তাবারী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন:
‘রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যে উক্তি আমরা বর্ণনা করেছি, তা সঠিক হওয়ার অধিক উপযুক্ত। কারণ তিনি এই উক্তিটির বাস্তবতা ও বিশুদ্ধতা সম্পর্কে সবচেয়ে বেশি অবগত ছিলেন। তিনি কোনো বস্তুকে ব্যতিক্রম করেননি যে, আল্লাহ্ তা‘আলা কলম সৃষ্টির পূর্বে তা সৃষ্টি করেছেন। বরং তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর এই উক্তি: ‘নিশ্চয়ই আল্লাহ্ সর্বপ্রথম যা সৃষ্টি করেছেন তা হলো কলম’ দ্বারা সবকিছুকে অন্তর্ভুক্ত করেছেন, অর্থাৎ কলমের পূর্বে আরশ, পানি বা অন্য কোনো কিছুই সৃষ্ট ছিল না। সুতরাং, আবূ যবইয়ান ও আবূদ দোহা-এর সূত্রে ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে আমরা যে বর্ণনা পেয়েছি, তা মুজাহিদ থেকে আবূ হাশিম কর্তৃক বর্ণিত ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খবরটির চেয়ে ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে সহীহ হওয়ার অধিক উপযুক্ত, যেহেতু আবূ হাশিম থেকে শু‘বাহ ও সুফইয়ান-এর বর্ণনায় পার্থক্য দেখা দিয়েছে, যেমনটি আমি তাদের মতপার্থক্য উল্লেখ করেছি।’
আমি আল্লাহ্ তা‘আলার প্রশংসা করি যে, এই ইমামের (তাবারীর) এই বক্তব্যটি সম্পূর্ণরূপে সেই বক্তব্যের সাথে মিলে যায় যা আমি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এই হাদীসের ফাওয়াইদ (উপকারিতা) প্রসঙ্গে পূর্বে উল্লিখিত ‘আস-সহীহাহ’ গ্রন্থে উল্লেখ করেছিলাম—যে এটি তাদের খণ্ডন করে যারা বলে যে আরশ হলো প্রথম সৃষ্ট বস্তু। অথচ আমি তখন এই বক্তব্যটির (তাবারীর) উপর অবগত ছিলাম না। সুতরাং, তাঁর তাওফীকের জন্য আল্লাহর প্রশংসা, আর আমি তাঁর নিকট তাঁর অনুগ্রহের আরও বৃদ্ধি কামনা করি।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6310)


(مَنْ بدأَ أخاه بالسلامِ، كَتَبَ اللهُ له عَشْرَ حَسَناتٍ، ومَنْ
دعا له بظَهْرِ الغَيْبِ،كتب الله له عشر حسنات) .
ضعيف.

أخرجه أبو نعيم في `أخبار أصفهان` (1/129) ، وعنه ابن عساكر
في `تاريخ دمشق` (2/112) ، والشجري في `الأمالي` (1/236) من طريقين عن
سويد بن عبد العزيز: ثنا نوح بن ذكوان عن الحسن عن أنس … مرفوعاً، قال
أنس:
إن كانت الشجرة لتفرق بيننا في السفر فنتلاقى بالسلام.
قلت: وهذا إسناد ضعيف، سويد بن عبد العزيز ونوح بن ذكوان ضعيفان -
كما في `التقريب` - ، وقال ابن حبان في ابن ذكوان هذا (3/47) :
`منكر الحديث جداً `.
ثم ساق له هذا الحديث بتقديم الشطر الثاني على الأول بلفظ:
`من دعا لأخبه بظهر الغيب … ` الحديث.
وبهذا اللفظ أورده ابن طاهر المقدسي في `تذكرة الموضوعات` (ص 86) ،وقال:
`نوح ابن ذكوان متروك الحديث`.
والحديث عزاه السيوطي في `الجامع الكبير` لأبي الشيخ فقط عن أنس.
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(যে ব্যক্তি তার ভাইকে প্রথমে সালাম দেয়, আল্লাহ তার জন্য দশটি নেকি লেখেন। আর যে ব্যক্তি তার অনুপস্থিতিতে তার জন্য দু'আ করে, আল্লাহ তার জন্য দশটি নেকি লেখেন)।
যঈফ (দুর্বল)।

এটি বর্ণনা করেছেন আবূ নুআইম তাঁর ‘আখবারু ইসফাহান’ গ্রন্থে (১/১২৯), এবং তাঁর সূত্রে ইবনু আসাকির তাঁর ‘তারীখে দিমাশক’ গ্রন্থে (২/১১২), এবং আশ-শাজারী তাঁর ‘আল-আমালী’ গ্রন্থে (১/২৩৬) দুটি সূত্রে সুওয়াইদ ইবনু আব্দুল আযীয হতে: তিনি বলেন, আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন নূহ ইবনু যাকওয়ান, তিনি আল-হাসান হতে, তিনি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে... মারফূ' হিসেবে। আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন:
সফরে আমাদের মাঝে গাছও যদি পার্থক্য সৃষ্টি করত (অর্থাৎ সামান্য দূরত্ব সৃষ্টি করত), তবুও আমরা সালামের মাধ্যমে মিলিত হতাম।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল)। সুওয়াইদ ইবনু আব্দুল আযীয এবং নূহ ইবনু যাকওয়ান উভয়েই যঈফ—যেমনটি ‘আত-তাকরীব’ গ্রন্থে রয়েছে। আর ইবনু হিব্বান এই ইবনু যাকওয়ান সম্পর্কে বলেছেন (৩/৪৭): ‘সে অত্যন্ত মুনকারুল হাদীস (অগ্রহণযোগ্য হাদীস বর্ণনাকারী)’।
অতঃপর তিনি (ইবনু হিব্বান) তার জন্য এই হাদীসটি বর্ণনা করেছেন প্রথম অংশটির উপর দ্বিতীয় অংশটিকে প্রাধান্য দিয়ে এই শব্দে: ‘যে ব্যক্তি তার ভাইয়ের জন্য তার অনুপস্থিতিতে দু'আ করে...’ হাদীসটি।
আর এই শব্দেই ইবনু তাহির আল-মাকদিসী এটি তাঁর ‘তাযকিরাতুল মাওদ্বূ‘আত’ গ্রন্থে (পৃ. ৮৬) উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন: ‘নূহ ইবনু যাকওয়ান মাতরূকুল হাদীস (পরিত্যক্ত বর্ণনাকারী)’।
আর সুয়ূতী এই হাদীসটিকে ‘আল-জামি‘উল কাবীর’ গ্রন্থে শুধুমাত্র আবূশ শাইখ হতে আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর সূত্রে উল্লেখ করেছেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6311)


(وأَبِيْكَ! لو سَكَتَّ، ما زلتُ أُناوَلُ منها ذراعاً ما دعوتُ به) .
منكر.

أخرجه أحمد (2/48) : ثنا إسماعيل: ثنا يحيى بن أبي كثير عن
أبي إسحاق حدثني رجل من بني غفار في مجلس سالم بن عبد الله: حدثني
فلان: أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أُتِيَ بِطَعَامٍ مِنْ خُبْزٍ وَلَحْمٍ فَقَالَ:
`نَاوِلْنِي الذِّرَاعَ`. فَنُووِلَ ذِرَاعاً فَأَكَلَهَا - قَالَ يَحْيَى لَا أَعْلَمُهُ إِلَّا هَكَذَا - ثم قال:
`نَاوِلْنِي الذِّرَاعَ`. فَنُووِلَ ذِرَاعاً فَأَكَلَهَا، ثُمَّ قَالَ:
`نَاوِلْنِي الذِّرَاعَ`. فَقَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ! إِنَّمَا هُمَا ذِرَاعَانِ فَقَالَ: … فذكره.
فَقَالَ سَالِمٌ:
أَمَّا هَذِهِ فَلَا، سَمِعْتُ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ عُمَرَ يَقُولُ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم:
`إِنَّ اللَّهَ تبارك وتعالى يَنْهَاكُمْ أَنْ تَحْلِفُوا بِآبَائِكُمْ`.
قلت: وهذا إسناد ضعيف، لجهالة الغفاري الذي لم يسم.
وأبو إسحاق الراوي عنه لم أعرفه. ويحتمل أن يكون سليمان بن أبي سليمان
الشيباني المخرج له في `الصحيحين`، وسائر رجاله ثقات من رجالهما.
والحديث قال الهيثمي (8/312) :
`رواه أحمد، وفيه راو لم يسم`.
قلت: وفي متن الحديث نكارة ظاهرة، وهو قوله:`وأبيك`، فإنه من الحلف
بغير الله المنهي عنه، ولذلك أنكره سالم بن عبد الله بن عمر، للحديث الذي رواه
عن أبيه. وهو حديث متفق عليه من حديث ابن عمر رضي الله عنه، وهو مخرّج
في `الإرواء` (8/187/2560) من طريق نافع عنه، ومن طريق الزهري عن
سالم … به.
ثم وجدت في كتابي المذكور أن النسائي روى حديث الترجمة مختصراً من
طريق أخرى عن شيخ أحمد: إسماعيل - وهو ابن عليه - قال: ثنا يحيى بن أبي
إسحاق: حدثني رجل من بني غفار …
فظننت أنه سقط منه (يحيى بن أبي كثير) كما سقط من إسناد أحمد:
(يحيى بن) … وأن صواب الإسناد: (يحيى بن أبي كثير عن يحيى بن أبي
إسحاق) ، وذلك لأنه ذكر في `التهذيب` رواية يحيى الأول عن يحيى الآخر.
والآن ترجح عندي أن الصواب رواية النسائي، دون ذكر يحيى بن أبي كثير،
وذلك لأمور:
الأول أنهم لم يذكروا لابن علية رواية عن يحيى بن أبي كثير، وإنما ذكروا
له رواية عن يحيى بن أبي إسحاق - وهو الحضرمي مولاهم - .
الثاني: أن إسناد رواية النسائي ذكره المزي في `التحفة` - كما نقلته آنفاً - ،
فلو كان فيه سقط لنبه عليه المزي إن شاء الله تعالى.
الثالث: ما أفاده الشيخ أحمد شاكر رحمه الله في تعليقه على `المسند`
(7/133) : أن الحافظ ذكر هذا الحديث في `باب المبهمات` من `التعجيل` (550)
هكذا:
`يحيى بن أبي سحاق عن رجل من غفار: حدثني فلان أن النبي صلى الله عليه وسلم أتي
بطعام`.
قلت: وبمجموع هذه الأمور يترجح أن الصواب رواية النسائي، ولم يستحضرها
الشيخ رحمه الله، وذكر أشياء أخرى استروح إليها، ورجح هذا الذي رجحته
وأثبته في طبعته من `المسند`: (يحيى بن أبي إسحاق) .
وعليه فالسند إلى ابن عمر صحيح على شرط الشيخين، فصح قولنا أن سالم
ابن عمر أنكر قول الرجل الغفاري فِي حَدِيثِه مرفوعاً: `وأبيك`، وهو حري بذلك،
لما فِي حَدِيثِ سالم عَنْ ابْنِ عُمَرَ من النهي عن الحلف بالآباء.
ومن الغريب حقاً أن الحلف المذكور قد وقع في بعض الروايات لأحاديث
صحيحة، شذ بعض الثقات في `الصحيحين` - فضلاً عن غيرهما - فذكروه فيها،
وقد تقدم تخريجها برقم (4992) ، وانظر كتابي `صحيح أبي داود` (415) يسر
الله لي إتمامه () .
وإن مما يؤكد نكارة الحلف فِي حَدِيثِ الترجمة: أنه قد روي الحديث
من طرق عن جمع من الصحابة - منهم أبو هريرة، وإسناده حسن - ، ولم يقع في
شيء منها الحلف المذكور، فهو منكر جداً، والأحاديث المشار إليها مخرجة في
() تم طبع ما أنجزه الشيخ رحمه الله تعالى بعد وفاته في (11) مجلداً مع `الضعيف`
والفهارس.
`مختصر الشمائل` (96 - 97) ، والمشكاة` (1/106 - 107/327 و 328) ، وقد
أشار الحافظ في `الفتح` (4/346) إلى ثبوت القصة - دون الحلف بالأب طبعاً -
بسكوته عليها، وهي من معجزاته صلى الله عليه وسلم وآياته العلمية.
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(তোমার পিতার কসম! যদি তুমি চুপ থাকতে, তবে আমি যতবার চাইতাম, ততবারই এর থেকে একটি বাহু (মাংস) পেতাম।)
মুনকার (অস্বীকৃত)।

এটি বর্ণনা করেছেন আহমাদ (২/৪৮): আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন ইসমাঈল: আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন ইয়াহইয়া ইবনু আবী কাছীর, তিনি আবূ ইসহাক থেকে, তিনি বানূ গিফার গোত্রের এক ব্যক্তি থেকে, যিনি সালিম ইবনু আব্দুল্লাহর মজলিসে ছিলেন: তিনি আমাকে বর্ণনা করেছেন অমুক থেকে:
যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট রুটি ও গোশত মিশ্রিত খাবার আনা হলো। তিনি বললেন: ‘আমাকে বাহু (মাংস) দাও।’ তখন তাঁকে একটি বাহু দেওয়া হলো এবং তিনি তা খেলেন। - ইয়াহইয়া বলেন: আমি এটি এভাবেই জানি - অতঃপর তিনি বললেন: ‘আমাকে বাহু দাও।’ তখন তাঁকে আরেকটি বাহু দেওয়া হলো এবং তিনি তা খেলেন। অতঃপর তিনি বললেন: ‘আমাকে বাহু দাও।’ তখন লোকটি বলল: ইয়া রাসূলুল্লাহ! বাহু তো মাত্র দুটিই ছিল। তখন তিনি বললেন: … অতঃপর তিনি তা (পূর্বোক্ত অংশ) উল্লেখ করলেন।

তখন সালিম বললেন:
কিন্তু এটি (অর্থাৎ কসমের অংশ) ঠিক নয়। আমি আব্দুল্লাহ ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:
‘নিশ্চয়ই আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তা‘আলা তোমাদেরকে তোমাদের পিতৃপুরুষদের নামে কসম করতে নিষেধ করেছেন।’

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল), কারণ গিফারী লোকটি অজ্ঞাত, যার নাম উল্লেখ করা হয়নি। আর তার থেকে বর্ণনাকারী আবূ ইসহাককেও আমি চিনতে পারিনি। সম্ভবত তিনি সুলাইমান ইবনু আবী সুলাইমান আশ-শাইবানী, যার হাদীস ‘সহীহাইন’-এ বর্ণিত হয়েছে। আর এর অবশিষ্ট বর্ণনাকারীরা বিশ্বস্ত এবং উভয়ের (বুখারী ও মুসলিমের) বর্ণনাকারী।

আর হাদীসটি সম্পর্কে হাইসামী (৮/৩১২) বলেছেন:
‘এটি আহমাদ বর্ণনা করেছেন, আর এতে একজন বর্ণনাকারী আছেন যার নাম উল্লেখ করা হয়নি।’

আমি বলি: আর হাদীসের মতন (মূল পাঠ)-এ সুস্পষ্ট মুনকার (অস্বীকৃতি) রয়েছে, আর তা হলো তার উক্তি: ‘তোমার পিতার কসম!’ কারণ এটি আল্লাহ ব্যতীত অন্য কারো নামে কসম করা, যা নিষিদ্ধ। এই কারণেই সালিম ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু উমার এটি অস্বীকার করেছেন, তার পিতার সূত্রে বর্ণিত হাদীসের কারণে। আর এটি ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস থেকে মুত্তাফাকুন আলাইহি (সহমত পোষণকৃত) হাদীস। এটি ‘আল-ইরওয়া’ (৮/১৮৭/২৫৬০)-তে নাফি‘-এর সূত্রে তার থেকে এবং যুহরী-এর সূত্রে সালিম থেকে … বর্ণিত হয়েছে।

অতঃপর আমি আমার উল্লিখিত কিতাবে পেলাম যে, নাসাঈ এই শিরোনামের হাদীসটি সংক্ষেপে অন্য একটি সূত্রে আহমাদের শাইখ ইসমাঈল - যিনি ইবনু উলাইয়াহ - থেকে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন ইয়াহইয়া ইবনু আবী ইসহাক: আমাকে বানূ গিফার গোত্রের এক ব্যক্তি বর্ণনা করেছেন...। তখন আমি ধারণা করেছিলাম যে, (ইয়াহইয়া ইবনু আবী কাছীর) অংশটি বাদ পড়েছে, যেমন আহমাদের সনদে (ইয়াহইয়া ইবনু) অংশটি বাদ পড়েছে... এবং সনদের সঠিক রূপ হলো: (ইয়াহইয়া ইবনু আবী কাছীর, তিনি ইয়াহইয়া ইবনু আবী ইসহাক থেকে)। কারণ ‘আত-তাহযীব’-এ প্রথম ইয়াহইয়া কর্তৃক দ্বিতীয় ইয়াহইয়া থেকে বর্ণনা করার কথা উল্লেখ আছে।

আর এখন আমার নিকট প্রাধান্য পাচ্ছে যে, সঠিক হলো নাসাঈর বর্ণনা, যেখানে ইয়াহইয়া ইবনু আবী কাছীরের উল্লেখ নেই। এর কারণ কয়েকটি:
প্রথমত, তারা ইবনু উলাইয়াহর জন্য ইয়াহইয়া ইবনু আবী কাছীর থেকে কোনো বর্ণনা উল্লেখ করেননি, বরং তারা তার জন্য ইয়াহইয়া ইবনু আবী ইসহাক থেকে বর্ণনা উল্লেখ করেছেন - যিনি তাদের মাওলা আল-হাদরামী।
দ্বিতীয়ত, নাসাঈর বর্ণনার সনদ আল-মিযযী ‘আত-তুহফা’-তে উল্লেখ করেছেন - যেমনটি আমি পূর্বে উদ্ধৃত করেছি - যদি এতে কোনো বাদ পড়া অংশ থাকত, তবে ইনশাআল্লাহ আল-মিযযী সেদিকে মনোযোগ দিতেন।
তৃতীয়ত: শাইখ আহমাদ শাকির (রাহিমাহুল্লাহ) ‘আল-মুসনাদ’ (৭/১৩৩)-এর টীকায় যা বলেছেন: হাফিয ইবনু হাজার এই হাদীসটি ‘আত-তা‘জীল’ (৫৫০)-এর ‘আল-মুবহামাত’ (অজ্ঞাতদের অধ্যায়)-এ এভাবে উল্লেখ করেছেন:
‘ইয়াহইয়া ইবনু আবী ইসহাক, তিনি গিফার গোত্রের এক ব্যক্তি থেকে: আমাকে অমুক বর্ণনা করেছেন যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট খাবার আনা হয়েছিল।’

আমি বলি: এই সকল বিষয়ের সমষ্টির ভিত্তিতে প্রাধান্য পায় যে, সঠিক হলো নাসাঈর বর্ণনা। শাইখ (আহমাদ শাকির) (রাহিমাহুল্লাহ) এটি স্মরণ করতে পারেননি এবং তিনি অন্য কিছু বিষয় উল্লেখ করেছেন যার প্রতি তিনি স্বস্তি বোধ করেছিলেন। আর তিনি (শাকির) আমি যা প্রাধান্য দিয়েছি, সেটিকেই প্রাধান্য দিয়েছেন এবং ‘আল-মুসনাদ’-এর তার সংস্করণে তা সাব্যস্ত করেছেন: (ইয়াহইয়া ইবনু আবী ইসহাক)।

আর এর ভিত্তিতে ইবনু উমার পর্যন্ত সনদ শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্তানুযায়ী সহীহ। সুতরাং আমাদের এই কথাটি সঠিক যে, সালিম ইবনু উমার গিফারী লোকটির হাদীসে মারফূ‘ হিসেবে বর্ণিত উক্তি: ‘তোমার পিতার কসম!’ -কে অস্বীকার করেছেন। আর তিনি এর যোগ্য ছিলেন, কারণ সালিম কর্তৃক ইবনু উমার থেকে বর্ণিত হাদীসে পিতৃপুরুষদের নামে কসম করার নিষেধাজ্ঞা রয়েছে।

আর এটি সত্যিই অদ্ভুত যে, উল্লিখিত কসমটি কিছু সহীহ হাদীসের কিছু বর্ণনায় এসেছে, যেখানে ‘সহীহাইন’-এর কিছু বিশ্বস্ত বর্ণনাকারী - অন্য কিতাব তো বটেই - ব্যতিক্রম ঘটিয়েছেন এবং তা উল্লেখ করেছেন। এর তাখরীজ পূর্বে ৪৯৯২ নম্বরে দেওয়া হয়েছে। আর আমার কিতাব ‘সহীহ আবী দাঊদ’ (৪১৫) দেখুন, আল্লাহ আমার জন্য তা সমাপ্ত করা সহজ করুন ()।

আর যা এই শিরোনামের হাদীসে কসমের মুনকার (অস্বীকৃত) হওয়ার বিষয়টি নিশ্চিত করে, তা হলো: এই হাদীসটি সাহাবীদের একটি দল থেকে বিভিন্ন সূত্রে বর্ণিত হয়েছে - তাদের মধ্যে আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আছেন, এবং তার সনদ হাসান - কিন্তু সেগুলোর কোনোটিতেই উল্লিখিত কসমটি আসেনি। সুতরাং এটি অত্যন্ত মুনকার। আর উল্লিখিত হাদীসগুলো ‘মুখতাসারুশ শামাইল’ (৯৬-৯৭) এবং ‘আল-মিশকাত’ (১/১০৬-১০৭/৩২৭ ও ৩২৮)-এ তাখরীজ করা হয়েছে। () শাইখ (রাহিমাহুল্লাহ) যা সম্পন্ন করেছিলেন, তা তার মৃত্যুর পর ‘আদ-দাঈফ’ এবং সূচিপত্রসহ (১১) খণ্ডে প্রকাশিত হয়েছে। আর হাফিয ইবনু হাজার ‘আল-ফাতহ’ (৪/৩৪৬)-এ এই ঘটনাটির সত্যতা - অবশ্যই পিতার নামে কসমের অংশটি ছাড়া - তার নীরবতার মাধ্যমে ইঙ্গিত করেছেন। আর এটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মু‘জিযা এবং জ্ঞানগত নিদর্শনসমূহের অন্তর্ভুক্ত।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6312)


(اللَّهُمَّ! عَلَيْكَ الْوَلِيدَ، أَثِمَ بِي، مَرَّتَيْنِ [أو ثلاثاً] ) .
ضعيف.

أخرجه عبد الله بن أحمد (1/151 - 152 و152) - واللفظ له - ،
والبزار (2/248/1626 و1627) ،وأبو يعلى (1/253/294 و290/351) ،والمحاملي
في `الأمالي` (151/119) من طرق عَنْ نُعَيْمِ بْنِ حَكِيمٍ عَنْ أَبِي مَرْيَمَ [الحنفي]
عَنْ عَلِيٍّ رضي الله عنه:
أَنَّ امْرَأَةَ الْوَلِيدِ بْنِ عُقْبَةَ أَتَتْ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فَقَالَتْ يَا رَسُولَ اللَّهِ!
إِنَّ الْوَلِيدَ يَضْرِبُهَا، قَالَ:
`قُولِي لَهُ: [إنَّ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم] قَدْ أَجَارَنِي`.
قَالَ عَلِيٌّ: فَلَمْ تَلْبَثْ إِلَّا يَسِيراً حَتَّى رَجَعَتْ فَقَالَتْ: مَا زَادَنِي إِلَّا ضَرْباً!
فَأَخَذَ هُدْبَةً مِنْ ثَوْبِهِ فَدَفَعَهَا إِلَيْهَا وَقَالَ:
`قُولِي لَهُ: إِنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَدْ أَجَارَنِي `.
فَلَمْ تَلْبَثْ إِلَّا يَسِيراً حَتَّى رَجَعَتْ فَقَالَتْ: مَا زَادَنِي إِلَّا ضَرْباً! فَرَفَعَ [رَسُولِ
اللَّهِ صلى الله عليه وسلم] يَدَيْهِ وَقَالَ: … فذكره.
والزيادة الأولى والثانية للبزار، والثالثة لأبي يعلى. وزاد المحاملي في أول
الحديث زيادة غريبة ونصها - بعد قولها:`يضربها` - :
`فقال: اذهبي فاصبري`، ثم أتته فقالت: إنه يضربني، فقال لها `اذهبي
فاصبري`، ثم أتته فقالت: إنه يضربني فأخذ هدبة من ثوبه ثم قال:
`اذهبي بها إليه، اللهم عليك الوليد` `.
هذا نص الحديث عنده بتمامه، ومن الظاهر أنه قد زاد تلك الزيادة مقابل
اختصاره ذكر الإجارة، وتكرار شكواها من ضربه، إياها، فلم تطمئن النفس لهذه
الزيادة لمخالفتها لرواية الجماعة، ولا أدري ممن الوهم، فإن إسناده هكذا حدثنا زيد
ابن أخزم قال: حدثنا عبد الله بن دواد عن نعيم بن حكيم … به.
وعبد الله بن داود - وهو الخريبي - : ثقة من رجال البخاري.
وزيد بن أخزم: ثقة حافظ من رجال البخاري أيضاً، لكن قد تابعه إبراهيم
بن محمد التيمي: ثنا عبد الله بن داود … به نحوه.، لكنه لم يذكر الزيادة،
والتيمي ثقة. والله أعلم.
وخفي هذا الفرق في المتن على الدكتور القيسي المعلق على ` الأمالي`
للمحاملي، فلم ينتبه لزيادته هذه، فعزا حديثه للحفاظ الثلاثة الأولين، فأوهم أنه
عندهم كما هو عند المحاملي بزيادة جملة `الصبر`، وأكد ذلك بقوله:
`وذكر الهيثمي في `المجمع` (4/332) وقال: ورجاله ثقات`!
ثم إن الدكتور ذهب إلى أن أبا مريم الراوي عن علي هو الثقفي المدائني، وقال:
`وصرح في رواية البزار أنه الحنفي - وهو قيس - :وثقه النسائي والذهبي في
`الكاشف`، ووهم الحافظ في `التقريب` إذ قال: إنه مجهول`.
وهذا وهم عجيب! وإنما أتي من العجلة في النقل وقلة التحقيق، وذلك لأمرين:
الأول أن الحافظ بعد أن حكى الخلاف في اسم أبي مريم الثقفي المدائني قال:
`قلت: الذي يظهر لي أن النسائي وهم في قوله إن أبا مريم الحنفي يسمى
قيساً … والصواب: أن الذي يسمى قيساً هو أبو مريم الثقفي صاحب الترجمة،
كما قال أبو حاتم وابن حبان`. قال:
`وأما أبو مريم الحنفي - واسمه: إياس، كما قال ابن المديني وأبو أحمد وابن
ماكولا، وابن حبان في `الثقات` - فلم يذكره النسائي، لأنه لم يذكر إلا من عرف
اسمه. وأما أبو مريم الكوفي: فهذا ثالث لا تعلق له بهما، إلا لكونه يروي عن
علي أيضاً، وقال الدارقطني: أبو مريم الثقفي عن عمار مجهول`.
قلت: فقد فرق الحافظ بين أبي مريم الثقفي، وأبي مريم الحنفي، وأفاد أن
الأول هو المسمى (قيساً) … والآخر يسمى (إياساً) ، وأن النسائي أخطأ في
تسميته قيساً! فاختلط الأمر على الدكتور القيسي كما اختلط على النسائي! زد
على ذلك أنه في قوله المتقدم عزا إلى الحافظ أنه جهل أبا مريم الحنفي، وهذا
خلاف الواقع في كتابه `التقريب`، فقال:
`أبو مريم الثقفي، اسمه: قيس المدائني، مجهول من الثانية. ي د س.
أبو مريم الحنفي القاضي، اسمه: إياس بن صُبيح، مقبول، ومن الثانية،
ووهم من خلطه بالأول`.
فقد وَهِمَ القيسي على الحافظ حين تسب إليه أنه قال في أبي مريم الحنفي:
`مجهول` … وهو إنما قال فيه: `مقبول`، والمجهول عنده إنما هو الثقفي!! وأصل
المشكلة عند الدكتور: أنه لم يفرق بين الحنفي والثقفي، خلافاً للحافظ، ولذلك
وهم عليه.
وعدم التفريق هو الذي يترشح من قول الذهبي في `الكاشف`:
`أبو مريم الثقفي: عن علي وأبي الدرداء،وعنه عبد الملك ونُعيم (الأصل:
يعلى) ابنا حكيم، ثقة، ولي قضاء البصرة`.
والذي جعلني أميل إلى ما ذكرت: أن رواية الابنين المذكورين قد ذكرها
البخاري وابن أبي حاتم، وكذا ابن حبان في `الثقات` (5/314) ، دون قوله:
`ولي قضاء البصرة`. وإنما ذكر هذا ابن حبان في ترجمة إياس بن صبيح أبي
مريم الحنفي المتقدم من كتابه `الثقات` (4/34) ، ومن قبله الدولابي في `الكنى`
(2/110) فروى بسند قوي عن ابن سيرين قال:
`أول من قضى بالبصرة إياس بن صبيح، وهو أبو مريم الحنفي`.
لكن لعل التفريق بين الرجلين هو الأرجح، لاتفاق إمام المحدثين ومن معه
على ذلك، وهو الذي رجحه الحافظ ابن حجر - كما تقدم - .لكن اتفاقهم جميعاً
على أن الذي روى عنه نعيم بن حكيم هو: أبو مريم الثقفي، ذكروا ذلك في ترجمة
الثقفي هذا - كما تقدم عن الذهبي - ، وكذلك ذكروا في ترجمة نعيم هذا، ومنهم
الذهبي أيضاً، وقال فيه:
`ثقة`.
فإذا ثبت هذا، فتكون رواية البزار التي وقع فيها أنه: (الحنفي) … شاذة،
لمخالفتها لما تقدم من صنيع الأئمة في ترجمتهم له وللرواي عنه من جهة، ولعدم
ورودها في رواية الأئمة الآخرين الذين أخرجوا الحديث من جهة أخرى.
هذا ما أدَّاني إليه بحثي وتفكيري، فإن أصبت، فمن الله، وإن أخطأت،
فمن نفسي، سائلاً المولى سبحانه أن يغفر لي خطئي وعمدي وكل ذلك عندي.
وإذا كان الامر كذلك، فما حال الثقفي هذا وقد تقدم قول الدارقطني والعسقلاني فيه:
`مجهول`؟
فأقول: إذا كان لم يرو عنه غير الأخوين المسمّيين آنفاً، وكان أحدهما - وهو:
عبد الملك - ليس إلا راوٍ واحد، فهو مجهول العين - كما ذكرت في `تيسير
الانتفاع` - ، وعليه يترجح عندي أن شيخه هذا - الثقفي - يكون مجهول الحال.
والله أعلم.
والحديث عزاه السيوطي في `الجامع الكبير` لابن أبي شيبة ومسدد وأبي
يعلى وعبد الله وابن جرير وصححه.
أقول: لم أره في القسم المطبوع من كتاب ابن جرير `تهذيب الآثار`، وقد تبين
لي من مطالعتي إياه: أنه متساهل في التصحيح نحو تساهل ابن حبان!
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(হে আল্লাহ! তুমি ওয়ালীদকে ধরো, সে আমার সাথে দুইবার [অথবা তিনবার] পাপ করেছে)।
যঈফ (দুর্বল)।

এটি বর্ণনা করেছেন আব্দুল্লাহ ইবনু আহমাদ (১/১৫১-১৫২ ও ১৫২) – আর শব্দগুলো তারই – এবং বাযযার (২/২৪৮/১৬২৬ ও ১৬২৭), আবূ ইয়া'লা (১/২৫৩/২৯৪ ও ২৯০/৩৫১), এবং আল-মুহামিলী তাঁর ‘আল-আমালী’ গ্রন্থে (১৫১/১১৯) নু'আইম ইবনু হাকীম থেকে, তিনি আবূ মারইয়াম [আল-হানাফী] থেকে, তিনি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বিভিন্ন সূত্রে বর্ণনা করেছেন:

ওয়ালীদ ইবনু উকবাহর স্ত্রী নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! ওয়ালীদ তাকে প্রহার করে। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন:
‘তাকে বলো: [নিশ্চয়ই আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)] আমাকে আশ্রয় দিয়েছেন।’
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: সে অল্প সময়ের মধ্যেই ফিরে এসে বলল: সে আমাকে আরও বেশি প্রহার করা ছাড়া আর কিছুই করেনি!
তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কাপড়ের একটি আঁচল (বা সুতার অংশ) নিলেন এবং তাকে দিয়ে বললেন:
‘তাকে বলো: নিশ্চয়ই আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে আশ্রয় দিয়েছেন।’
সে অল্প সময়ের মধ্যেই ফিরে এসে বলল: সে আমাকে আরও বেশি প্রহার করা ছাড়া আর কিছুই করেনি! তখন [আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)] তাঁর উভয় হাত উঠালেন এবং বললেন: ... অতঃপর তিনি (উপরের দু'আটি) উল্লেখ করলেন।

প্রথম ও দ্বিতীয় অতিরিক্ত অংশটি বাযযারের, আর তৃতীয়টি আবূ ইয়া'লার। আর আল-মুহামিলী হাদীসের শুরুতে একটি অদ্ভুত অতিরিক্ত অংশ যোগ করেছেন, যার পাঠ হলো – তার (স্ত্রীর) কথা: ‘সে তাকে প্রহার করে’ – এর পরে:
‘তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: যাও, ধৈর্য ধারণ করো।’ অতঃপর সে তাঁর নিকট এলো এবং বলল: সে আমাকে প্রহার করে। তিনি তাকে বললেন: ‘যাও, ধৈর্য ধারণ করো।’ অতঃপর সে তাঁর নিকট এলো এবং বলল: সে আমাকে প্রহার করে। তখন তিনি তাঁর কাপড়ের একটি আঁচল নিলেন এবং বললেন: ‘এটি নিয়ে তার কাছে যাও, হে আল্লাহ! তুমি ওয়ালীদকে ধরো।’

এটিই তাঁর নিকট সম্পূর্ণ হাদীসের পাঠ। বাহ্যত মনে হয়, তিনি আশ্রয় দেওয়ার কথা উল্লেখ করা এবং প্রহারের অভিযোগের পুনরাবৃত্তি সংক্ষিপ্ত করার বিপরীতে এই অতিরিক্ত অংশটি যোগ করেছেন। এই অতিরিক্ত অংশের প্রতি মন আশ্বস্ত হয় না, কারণ এটি জামা'আতের বর্ণনার বিরোধী। আর আমি জানি না ভুলটি কার পক্ষ থেকে হয়েছে। কেননা এর সনদ হলো: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন যায়দ ইবনু আখযাম, তিনি বলেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আব্দুল্লাহ ইবনু দাঊদ, তিনি নু'আইম ইবনু হাকীম থেকে... (হাদীসটি)।

আর আব্দুল্লাহ ইবনু দাঊদ – যিনি আল-খুরায়বী – তিনি বুখারীর রিজালদের অন্তর্ভুক্ত এবং সিকাহ (নির্ভরযোগ্য)।
আর যায়দ ইবনু আখযামও বুখারীর রিজালদের অন্তর্ভুক্ত একজন সিকাহ (নির্ভরযোগ্য) হাফিয। কিন্তু ইবরাহীম ইবনু মুহাম্মাদ আত-তায়মী তাঁর অনুসরণ করেছেন: তিনি আমাদের নিকট আব্দুল্লাহ ইবনু দাঊদ থেকে... অনুরূপ বর্ণনা করেছেন। তবে তিনি অতিরিক্ত অংশটি উল্লেখ করেননি। আর আত-তায়মী সিকাহ (নির্ভরযোগ্য)। আল্লাহই ভালো জানেন।

আল-মুহামিলীর ‘আল-আমালী’ গ্রন্থের টীকাকার ড. আল-ক্বায়সীর নিকট মতন (মূল পাঠ)-এর এই পার্থক্যটি গোপন থেকে গেছে। তিনি এই অতিরিক্ত অংশের প্রতি মনোযোগ দেননি। ফলে তিনি হাদীসটিকে প্রথম তিনজন হাফিযের (মুহাদ্দিসের) দিকে সম্পর্কিত করেছেন, যা এই ভ্রম সৃষ্টি করেছে যে, ‘ধৈর্য’ বাক্যটির অতিরিক্ত অংশসহ হাদীসটি মুহামিলীর নিকট যেমন আছে, তাদের নিকটও তেমনই আছে। তিনি এই কথা বলে তা আরও নিশ্চিত করেছেন:
‘আর হাইসামী ‘আল-মাজমা’ গ্রন্থে (৪/৩৩২) এটি উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন: এর বর্ণনাকারীগণ সিকাহ (নির্ভরযোগ্য)!’

অতঃপর ডক্টর এই মত পোষণ করেছেন যে, আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনাকারী আবূ মারইয়াম হলেন আস-সাকাফী আল-মাদা'ইনী। তিনি বলেছেন:
‘আর বাযযারের বর্ণনায় স্পষ্টভাবে বলা হয়েছে যে, তিনি আল-হানাফী – আর তিনি হলেন ক্বায়স – তাঁকে নাসাঈ এবং যাহাবী ‘আল-কাশেফ’ গ্রন্থে সিকাহ (নির্ভরযোগ্য) বলেছেন। আর হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আত-তাক্বরীব’ গ্রন্থে ভুল করেছেন, যখন তিনি বলেছেন যে, তিনি মাজহূল (অজ্ঞাত)।’

এটি একটি বিস্ময়কর ভুল! আর এটি এসেছে বর্ণনায় তাড়াহুড়ো এবং তাহক্বীক্ব (গবেষণা)-এর স্বল্পতা থেকে। এর কারণ দুটি:
প্রথমত, হাফিয (ইবনু হাজার) আবূ মারইয়াম আস-সাকাফী আল-মাদা'ইনীর নাম নিয়ে মতভেদ উল্লেখ করার পর বলেছেন:
‘আমি বলি: আমার নিকট যা স্পষ্ট হয় তা হলো, নাসাঈ ভুল করেছেন যখন তিনি বলেছেন যে, আবূ মারইয়াম আল-হানাফীর নাম ক্বায়স... আর সঠিক হলো: যার নাম ক্বায়স, তিনি হলেন আলোচ্য জীবনীতে থাকা আবূ মারইয়াম আস-সাকাফী, যেমনটি আবূ হাতিম ও ইবনু হিব্বান বলেছেন।’ তিনি (হাফিয) আরও বলেছেন:
‘আর আবূ মারইয়াম আল-হানাফী – যার নাম ইয়াস, যেমনটি ইবনু আল-মাদীনী, আবূ আহমাদ, ইবনু মাকুলা এবং ইবনু হিব্বান ‘আস-সিক্বাত’ গ্রন্থে বলেছেন – তাঁকে নাসাঈ উল্লেখ করেননি, কারণ তিনি কেবল তাদেরই উল্লেখ করেছেন যাদের নাম জানা ছিল। আর আবূ মারইয়াম আল-কূফী: ইনি হলেন তৃতীয় ব্যক্তি, যার সাথে তাদের দুজনের কোনো সম্পর্ক নেই, তবে তিনিও আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেন। আর দারাকুতনী বলেছেন: আবূ মারইয়াম আস-সাকাফী, যিনি আম্মার থেকে বর্ণনা করেন, তিনি মাজহূল (অজ্ঞাত)।’

আমি বলি: হাফিয (ইবনু হাজার) আবূ মারইয়াম আস-সাকাফী এবং আবূ মারইয়াম আল-হানাফীর মধ্যে পার্থক্য করেছেন এবং জানিয়েছেন যে, প্রথমজনের নাম (ক্বায়স)... আর অন্যজনের নাম (ইয়াস), এবং নাসাঈ তাঁকে ক্বায়স নামে অভিহিত করে ভুল করেছেন! ফলে ড. আল-ক্বায়সীর নিকট বিষয়টি গুলিয়ে গেছে, যেমনটি নাসাঈর নিকটও গুলিয়ে গিয়েছিল!

এর সাথে যোগ করুন যে, তাঁর পূর্বের বক্তব্যে তিনি হাফিযের দিকে এই কথা সম্পর্কিত করেছেন যে, তিনি আবূ মারইয়াম আল-হানাফীকে মাজহূল (অজ্ঞাত) বলেছেন, অথচ তাঁর গ্রন্থ ‘আত-তাক্বরীব’-এর বাস্তবতার তা বিপরীত। তিনি (হাফিয) বলেছেন:
‘আবূ মারইয়াম আস-সাকাফী, তাঁর নাম: ক্বায়স আল-মাদা'ইনী, দ্বিতীয় স্তরের মাজহূল (অজ্ঞাত)। ইয়া, দা, সা। আবূ মারইয়াম আল-হানাফী আল-ক্বাদী, তাঁর নাম: ইয়াস ইবনু সুবাইহ, মাক্ববূল (গ্রহণযোগ্য), এবং দ্বিতীয় স্তরের। আর যে তাঁকে প্রথমজনের সাথে গুলিয়ে ফেলেছে, সে ভুল করেছে।’

সুতরাং আল-ক্বায়সী হাফিযের উপর ভুল করেছেন, যখন তিনি তাঁর দিকে এই কথা সম্পর্কিত করেছেন যে, তিনি আবূ মারইয়াম আল-হানাফী সম্পর্কে ‘মাজহূল’ বলেছেন... অথচ তিনি তাঁর সম্পর্কে কেবল ‘মাক্ববূল’ বলেছেন, আর তাঁর নিকট মাজহূল হলেন কেবল আস-সাকাফী!!
আর ডক্টরের নিকট সমস্যার মূল কারণ হলো: তিনি হাফিযের মত আল-হানাফী এবং আস-সাকাফীর মধ্যে পার্থক্য করেননি, আর একারণেই তিনি তাঁর উপর ভুল করেছেন।

আর পার্থক্য না করার বিষয়টিই যাহাবীর ‘আল-কাশেফ’ গ্রন্থে তাঁর বক্তব্য থেকে প্রতীয়মান হয়:
‘আবূ মারইয়াম আস-সাকাফী: আলী ও আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন, আর তাঁর থেকে বর্ণনা করেছেন আব্দুল মালিক ও নু'আইম (মূল: ইয়া'লা) ইবনু হাকীম, তিনি সিকাহ (নির্ভরযোগ্য), তিনি বসরাহর ক্বাদী (বিচারক) ছিলেন।’

আর যা আমাকে আমার উল্লিখিত মতের দিকে ঝুঁকতে বাধ্য করেছে তা হলো: উল্লিখিত দুই পুত্রের বর্ণনা বুখারী ও ইবনু আবী হাতিম উল্লেখ করেছেন, অনুরূপ ইবনু হিব্বানও ‘আস-সিক্বাত’ গ্রন্থে (৫/৩১৪) উল্লেখ করেছেন, তবে এই কথাটি ছাড়া: ‘তিনি বসরাহর ক্বাদী ছিলেন।’
ইবনু হিব্বান কেবল তাঁর ‘আস-সিক্বাত’ গ্রন্থের (৪/৩৪) পূর্বোক্ত ইয়াস ইবনু সুবাইহ আবূ মারইয়াম আল-হানাফীর জীবনীতে এই কথাটি উল্লেখ করেছেন। আর তাঁর পূর্বে আদ-দুলাবী ‘আল-কুনা’ গ্রন্থে (২/১১০) ইবনু সীরীন থেকে একটি শক্তিশালী সনদে বর্ণনা করেছেন যে, তিনি বলেছেন:
‘বসরাহতে প্রথম যিনি বিচারকার্য পরিচালনা করেন, তিনি হলেন ইয়াস ইবনু সুবাইহ, আর তিনিই আবূ মারইয়াম আল-হানাফী।’

কিন্তু সম্ভবত দুই ব্যক্তির মধ্যে পার্থক্য করাই অধিকতর সঠিক, কারণ মুহাদ্দিসগণের ইমাম এবং তাঁর সাথে যারা আছেন, তারা এই বিষয়ে একমত। আর হাফিয ইবনু হাজারও এই মতকে প্রাধান্য দিয়েছেন – যেমনটি পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে।
কিন্তু তারা সকলেই এই বিষয়ে একমত যে, যার থেকে নু'আইম ইবনু হাকীম বর্ণনা করেছেন, তিনি হলেন: আবূ মারইয়াম আস-সাকাফী। তারা আস-সাকাফীর জীবনীতে এই কথা উল্লেখ করেছেন – যেমনটি যাহাবী থেকে পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে – অনুরূপভাবে তারা এই নু'আইমের জীবনীতেও উল্লেখ করেছেন, তাদের মধ্যে যাহাবীও রয়েছেন, এবং তিনি তাঁর সম্পর্কে বলেছেন: ‘সিকাহ (নির্ভরযোগ্য)’।

যদি এটি প্রমাণিত হয়, তাহলে বাযযারের বর্ণনা, যেখানে তাঁকে (আল-হানাফী) বলা হয়েছে... তা শায (বিরল), কারণ এটি একদিকে যেমন ইমামগণের তাঁর এবং তাঁর থেকে বর্ণনাকারীর জীবনীতে উল্লিখিত কাজের বিরোধী, তেমনি অন্যদিকে যারা হাদীসটি বর্ণনা করেছেন, সেই অন্যান্য ইমামগণের বর্ণনায়ও এটি আসেনি।

আমার গবেষণা ও চিন্তাভাবনা আমাকে এই সিদ্ধান্তে উপনীত করেছে। যদি আমি সঠিক হই, তবে তা আল্লাহর পক্ষ থেকে, আর যদি ভুল করি, তবে তা আমার নিজের পক্ষ থেকে। আমি মহান মাওলার নিকট প্রার্থনা করি যেন তিনি আমার ভুল ও ইচ্ছাকৃত সকল ত্রুটি ক্ষমা করে দেন, আর এই সবই আমার নিকট রয়েছে।

আর যদি বিষয়টি এমনই হয়, তাহলে এই আস-সাকাফীর অবস্থা কী, যার সম্পর্কে দারাকুতনী ও আল-আসক্বালানীর পূর্বোক্ত বক্তব্য হলো: ‘মাজহূল (অজ্ঞাত)’?
আমি বলি: যদি তাঁর থেকে পূর্বে নাম উল্লিখিত দুই ভাই ছাড়া আর কেউ বর্ণনা না করে থাকেন, আর তাদের মধ্যে একজন – অর্থাৎ আব্দুল মালিক – যদি কেবল একজনই বর্ণনাকারী হন, তবে তিনি মাজহূলুল আইন (ব্যক্তিগতভাবে অজ্ঞাত) – যেমনটি আমি ‘তাইসীরুল ইনতিফা’ গ্রন্থে উল্লেখ করেছি – আর এর ভিত্তিতে আমার নিকট প্রাধান্য পায় যে, তাঁর এই শায়খ – আস-সাকাফী – মাজহূলুল হাল (অবস্থা অজ্ঞাত)। আল্লাহই ভালো জানেন।

সুয়ূতী ‘আল-জামি'উল কাবীর’ গ্রন্থে হাদীসটিকে ইবনু আবী শায়বাহ, মুসাদ্দাদ, আবূ ইয়া'লা, আব্দুল্লাহ এবং ইবনু জারীরের দিকে সম্পর্কিত করেছেন এবং তিনি এটিকে সহীহ বলেছেন।
আমি বলি: আমি ইবনু জারীরের ‘তাহযীবুল আসার’ গ্রন্থের মুদ্রিত অংশে এটি দেখিনি। আর আমার অধ্যয়ন থেকে আমার নিকট স্পষ্ট হয়েছে যে: তিনি সহীহ বলার ক্ষেত্রে ইবনু হিব্বানের শিথিলতার মতোই শিথিলতা প্রদর্শনকারী!









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6313)


(مَنْ قَالَ: لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَاحِداً أَحَداً صَمَداً، لَمْ يَتَّخِذْ
صَاحِبَةً وَلَا وَلَداً، وَلَمْ يَكُنْ لَهُ كُفُواً أَحَدٌ - عَشْرَ مَرَّاتٍ - كُتِبَتْ لَهُ
أَرْبَعُونَ أَلْفَ حَسَنَةٍ) .
ضعيف جداً.

أخرجه أحمد (4/103) ، وابن السني (133) ، وابن عدي
في `الكامل` (3/58 - 59) من طريق الْخَلِيل بْن مُرَّةَ عَنِ الْأَزْهَرِ بْنِ عَبْدِاللَّهِ عَنْ
تَمِيمٍ الدَّارِيِّ … مرفوعاً.
قلت: وهذا إسناد ضعيف، الخليل بن مرة مختلف فيه، والجمهور على
تضعيفه، قال الذهبي في `الميزان`:
`قال أبو زرعة: شيخ صالح. وقال البخاري: منكر الحديث. وقال أبو حاتم:
ليس بالقوي. وقال ابن عدي: ليس بمتروك`.
ثم ساق له أحاديث أنكرت عليه، قال في أحدها:
`وهو أنكرها`.
وقد روي الحديث بأنكر من هذا اللفظ، ففيه:
`كتب الله له ألفي ألف حسنة، ومن زاد زاده الله عز وجل `.
وقد مضى تخريجه برقم (5122) مع تخريج الهيثمي له. وأما حديث الترجمة
فلم يخرجه في بابه، ولا في غيره فيما علمت. والله أعلم.
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(যে ব্যক্তি দশবার বলবে: আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই, তিনি একক, অদ্বিতীয়, চিরঞ্জীব (অমুখাপেক্ষী)। তিনি কোনো স্ত্রী বা সন্তান গ্রহণ করেননি। আর তাঁর সমকক্ষ কেউ নেই – তার জন্য চল্লিশ হাজার নেকি লেখা হয়।)
খুবই যঈফ।

এটি বর্ণনা করেছেন আহমাদ (৪/১০৩), ইবনুস সুন্নী (১৩৩), এবং ইবনু আদী তাঁর ‘আল-কামিল’ গ্রন্থে (৩/৫৮-৫৯) খলীল ইবনু মুররাহ্ হতে, তিনি আল-আযহার ইবনু আব্দুল্লাহ্ হতে, তিনি তামীম আদ-দারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে... মারফূ’ হিসেবে।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ। খলীল ইবনু মুররাহ্ সম্পর্কে মতভেদ রয়েছে, তবে জুমহূর (অধিকাংশ মুহাদ্দিস) তাকে দুর্বল বলেছেন। ইমাম যাহাবী ‘আল-মীযান’ গ্রন্থে বলেন:
‘আবূ যুর’আহ্ বলেন: তিনি সালিহ (নেককার) শাইখ। আর বুখারী বলেন: মুনকারুল হাদীস (যার হাদীস প্রত্যাখ্যাত)। আবূ হাতিম বলেন: তিনি শক্তিশালী নন। ইবনু আদী বলেন: তিনি মাতরূক (পরিত্যক্ত) নন।’
অতঃপর তিনি (যাহাবী) তার (খলীল ইবনু মুররাহ্-এর) এমন কিছু হাদীস উল্লেখ করেছেন যা মুনকার (অস্বীকৃত) হিসেবে গণ্য হয়েছে। তিনি সেগুলোর একটি সম্পর্কে বলেন:
‘এটি সেগুলোর মধ্যে সবচেয়ে বেশি মুনকার।’
এই হাদীসটি এই শব্দগুলোর চেয়েও বেশি মুনকার শব্দে বর্ণিত হয়েছে। তাতে রয়েছে:
‘আল্লাহ তার জন্য বিশ লক্ষ নেকি লিখে দেন, আর যে ব্যক্তি এর চেয়ে বেশি বলবে, আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা তাকে আরও বাড়িয়ে দেবেন।’
এর তাখরীজ (৫১২২) নম্বরে হাইসামী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর তাখরীজসহ পূর্বে অতিবাহিত হয়েছে। আর আলোচ্য অনুচ্ছেদের হাদীসটি, আমার জানা মতে, তিনি (হাইসামী) তাঁর অধ্যায়ে বা অন্য কোথাও তাখরীজ করেননি। আল্লাহই সর্বাধিক অবগত।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6314)


(كان إذا صلى أَقْبَلَ علينا بوجهِهِ كالقَمرِ فيقولُ: «اللهمَّ!
إني أعوذُ بك من الهَمِّ والحَزَنِ، والعَجْزِ والكَسَلِ، والذُّلِّ والصَّغَارِ،
والفواحشِ ما ظَهَرَ منها وما بَطَنَ.
فتعلمناه من غير أن يعلمناه من كثرة ما كان يردده) .
ضعيف.

أخرجه الطبراني في `الدعاء` (2/1096/660) من طريقين عن
أحمد بن يحيى بن سعيد القطان: ثنا يحيى بن عمر الفراء: ثنا أبو الأحوص
عن مغيرة عن إبراهيم عن علقمة عن عبد الله رضي الله عنه قال: … فذكره.
قلت: وهذا إسناد رجاله ثقات، غير يحيى بن عمر الفراء، فلم أجد له ذكراً
ولم يزد. وكذلك ذكره السمعاني في مادة: (الفراء) من `الأنساب`، وعمدته في
ذلك ابن حبان، ولكنه لا يصرح به.ولم يقف عليه الدكتور المعلق على `الدعاء`!
والقطان هذا: قال أبن أبي حاتم (1/74) :
`كتبنا عنه وكان صدوقاً`. ورواه عنه الخطيب في `التاريخ` (5/117) .
وذكره ابن حبان في `الثقات` (8/38/ - 39) وقال:
`وكان متقناً) .
قلت: فعلة الحديث شيخه الفراء، فإنه شبه مجهول.
وله علة أخرى، وهي: عنعنة المغيرة - وهو: ابن مقسم - : قال الحافظ في
`التقريب`:
`ثقة متقن، إلا أنه كان يدلس، ولا سيما عن إبراهيم`.
وإبراهيم - هو:ابن زيد النخعي، وهو - : ثقة فقيه مشهور.
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(যখন তিনি সালাত শেষ করতেন, তখন চাঁদের মতো তাঁর চেহারা নিয়ে আমাদের দিকে ফিরতেন এবং বলতেন: «হে আল্লাহ! আমি আপনার নিকট আশ্রয় চাই দুশ্চিন্তা ও বিষণ্ণতা থেকে, অক্ষমতা ও অলসতা থেকে, লাঞ্ছনা ও হীনতা থেকে, এবং প্রকাশ্য ও গোপন অশ্লীলতা (ফাওয়াহিশ) থেকে। আমরা তাঁর থেকে শিক্ষা গ্রহণ করেছিলাম, যদিও তিনি আমাদের শিক্ষা দেননি, কারণ তিনি এটি খুব বেশি পুনরাবৃত্তি করতেন।)
যঈফ (দুর্বল)।

এটি ত্বাবারানী তাঁর ‘আদ-দু‘আ’ গ্রন্থে (২/১০৯৬/৬৬০) দুটি সূত্রে বর্ণনা করেছেন আহমাদ ইবনু ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদ আল-কাত্তান থেকে: আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন ইয়াহইয়া ইবনু উমার আল-ফাররা: আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন আবূল আহওয়াস, তিনি মুগীরাহ থেকে, তিনি ইবরাহীম থেকে, তিনি আলক্বামাহ থেকে, তিনি আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে। তিনি বলেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেন।
আমি বলি: এই সনদটির বর্ণনাকারীগণ নির্ভরযোগ্য (ছিক্বাত), তবে ইয়াহইয়া ইবনু উমার আল-ফাররা ব্যতীত। আমি তাঁর কোনো উল্লেখ পাইনি এবং তিনি এর বেশি কিছু বলেননি। অনুরূপভাবে আস-সাম‘আনী ‘আল-আনসাব’ গ্রন্থে (আল-ফাররা) অধ্যায়ে তাঁর উল্লেখ করেছেন, আর এ বিষয়ে তাঁর নির্ভরতা ইবনু হিব্বানের উপর, কিন্তু তিনি স্পষ্টভাবে তা বলেননি। ‘আদ-দু‘আ’ গ্রন্থের টীকাকার ডক্টর সাহেবও এর উপর অবগত হননি!
আর এই আল-কাত্তান সম্পর্কে ইবনু আবী হাতিম (১/৭৪) বলেছেন: ‘আমরা তাঁর থেকে লিখেছি এবং তিনি ছিলেন সত্যবাদী (সাদূক)।’ আর তাঁর থেকে আল-খাতীব ‘আত-তারীখ’ গ্রন্থে (৫/১১৭) বর্ণনা করেছেন। ইবনু হিব্বান তাঁকে ‘আছ-ছিক্বাত’ গ্রন্থে (৮/৩৮-৩৯) উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন: ‘তিনি ছিলেন সুনিপুণ (মুতক্বিন)।’
আমি বলি: হাদীসটির ত্রুটি (ইল্লাত) হলো তাঁর শাইখ আল-ফাররা, কারণ তিনি প্রায় অজ্ঞাত (শাব্বাহ মাজহুল)।
এর আরেকটি ত্রুটি (ইল্লাত) হলো: মুগীরাহ – আর তিনি হলেন ইবনু মিকসাম – এর আনআনাহ (عنعنة)। হাফিয ‘আত-তাক্বরীব’ গ্রন্থে বলেছেন: ‘তিনি নির্ভরযোগ্য (ছিক্বাহ) ও সুনিপুণ (মুতক্বিন), তবে তিনি তাদলীস করতেন, বিশেষ করে ইবরাহীম থেকে বর্ণনা করার সময়।’ আর ইবরাহীম – তিনি হলেন ইবনু ইয়াযীদ আন-নাখঈ, আর তিনি হলেন: নির্ভরযোগ্য (ছিক্বাহ), ফক্বীহ ও সুপরিচিত।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6315)


(إِذَا لَقِيَ أَحَدُكُمْ أَخَاهُ فِي النَّهَارِ مِرَاراً، فَلْيُسَلِّمْ عَلَيْهِ) .
موضوع.

أخرجه الطبراني في `المعجم الأوسط` (1/16/2/246 - بترقيمي) ،
وعنه أبو نعيم في `الحلية` (5/13) : حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بن رِشْدِينَ قَالَ: نا أَحْمَدُ بن
عَبْدِالْمُؤْمِنِ الْمِصْرِيُّ قَالَ: نا إِبْرَاهِيمُ بن الْحَجَّاجِ الْمَكِّيُّ قَالَ: نا يَحْيَى بن عُقْبَةَ بن
أَبِي الْعَيْزَارِ، عَنْ مُحَمَّدِ بن سُوقَةَ قَالَ: أَخْبَرَنِي نَافِعٌ عَنِ ابْنِ عُمَرَ … مرفوعاً.
وقال أبو نعيم - مضعفاً - :
`غريب من حديث محمد، لم نكتبه إلا من هذا الوجه`.
قلت وهو موضوع، آفته يحيى بن عقبة هذا، وبه أعله الهيثمي فقال
(8/34) :
`وهو كذاب`. وقال الذهبي في `المغني`:
`قال أبو حاتم: يفتعل الحديث`.
قلت ومن دونه ثلاثتهم ضعفاء، وبعضهم أشد ضعفاً من بعض:
1 - إبراهيم بن الحجاج المكي: يغلب على الظن أنه الذي في `الميزان`:
`إبراهيم بن الحجاج: عن عبد الرزاق، وعنه محمود بن غيلان، نكرة لا يعرف،
والخبر الذي رواه باطل، وما هو بـ: (الشامي) ، ولا بـ: (النيلي) ، ذانك صدوقان`.
ثم ساق الخبر من طريق الحافظ أحمد بن صالح المصري عنه عن عبد الرزاق
بإسناده عَنْ اِبْنِ عَبَّاسٍ مرفوعاً أنه صلى الله عليه وسلم قال لفاطمة:
`أما ترضين أن الله اختار من أهل الأرض رجلين: أباك وزوجك! `. وقال:
`تابعه عبد السلام بن صالح أحد الهلكى عن عبد الرزاق `.
قلت: وهذا الخبر رواه الخطيب من الوجه الأول، وعن هذا المتابع، وعن ثالث،
وقال:
`حديث غريب`.
وأورده ابن الجوزي في `العلل` (1/220 - 221) من طريق الخطيب من الوجوه
الثلاثة، وأعل الثالث بأن فيه أحمد بن عبد الله بن يزيد، قال:
`كان يضع الحديث`.
وأعل الثاني بأن عبد السلام - وهو: أبو الصلت - قال:
`وقد اتفقوا على أنه كذاب`.
كذا قال! وأما الوجه الأول فسكت عنه، ثم أخذ يتكلم على عبد الرزاق
ويحاول تعصيب التهمة بعبد الرزاق، وهذا ليس بجيد ما دام لم يروه ثقة عنه:
فتعصيب الجناية بغيره أولى.
2 - أحمد بن عبد المؤمن المصري: قال مسلمة بن قاسم - كما في `اللسان` - :
`ضعيف جداً`.
3 - أحمد بن رشدين: وهو أحمد بن محمد بن الحجاج بن رشدين المصري
قال: ()
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(যখন তোমাদের কেউ দিনের বেলায় তার ভাইয়ের সাথে বারবার সাক্ষাৎ করে, তখন সে যেন তাকে সালাম দেয়।)
মাওদ্বূ (বানোয়াট)।

এটি ত্বাবারানী তাঁর ‘আল-মু’জামুল আওসাত্ব’ (১/১৬/২/২৪৬ – আমার সংখ্যায়ন অনুযায়ী) গ্রন্থে এবং তাঁর সূত্রে আবূ নুআইম ‘আল-হিলইয়াহ’ (৫/১৩) গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আহমাদ ইবনু রিশদীন, তিনি বলেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আহমাদ ইবনু আব্দুল মু’মিন আল-মিসরী, তিনি বলেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন ইবরাহীম ইবনুল হাজ্জাজ আল-মাক্কী, তিনি বলেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন ইয়াহইয়া ইবনু উকবাহ ইবনু আবিল ‘আইযার, তিনি মুহাম্মাদ ইবনু সূকাহ হতে, তিনি বলেন: আমাকে নাফি‘ খবর দিয়েছেন ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে... মারফূ‘ হিসেবে।

আবূ নুআইম এটিকে যঈফ আখ্যা দিয়ে বলেন:
‘মুহাম্মাদের হাদীসগুলোর মধ্যে এটি গারীব (অপরিচিত)। আমরা এটি কেবল এই সূত্রেই লিপিবদ্ধ করেছি।’

আমি (আলবানী) বলি: এটি মাওদ্বূ (বানোয়াট)। এর ত্রুটি হলো এই ইয়াহইয়া ইবনু উকবাহ। এর মাধ্যমেই হাইসামী এটিকে ত্রুটিযুক্ত আখ্যা দিয়েছেন এবং বলেছেন (৮/৩৪):
‘সে মিথ্যুক।’
আর যাহাবী ‘আল-মুগনী’ গ্রন্থে বলেছেন:
‘আবূ হাতিম বলেছেন: সে হাদীস জাল করত।’

আমি বলি: আর তার (ইয়াহইয়া ইবনু উকবাহ) নিচের তিনজন বর্ণনাকারীও যঈফ (দুর্বল), তাদের কেউ কেউ আবার অন্যদের চেয়েও অধিক দুর্বল:

১ - ইবরাহীম ইবনুল হাজ্জাজ আল-মাক্কী: প্রবল ধারণা এই যে, সে-ই সেই ব্যক্তি যার কথা ‘আল-মীযান’ গ্রন্থে রয়েছে:
‘ইবরাহীম ইবনুল হাজ্জাজ: সে আব্দুর রাযযাক হতে বর্ণনা করে এবং তার থেকে বর্ণনা করেন মাহমূদ ইবনু গাইলান। সে অপরিচিত (নাকিরাহ), তাকে চেনা যায় না। আর সে যে হাদীস বর্ণনা করেছে তা বাতিল। সে (আশ-শামী) নয়, আর না (আন-নাইলী), এই দুজন বিশ্বস্ত (সাদূক)।’

অতঃপর তিনি (যাহাবী) হাফিয আহমাদ ইবনু সালিহ আল-মিসরীর সূত্রে তার (ইবরাহীম) থেকে, তিনি আব্দুর রাযযাক হতে, তাঁর সানাদে ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফূ‘ হিসেবে সেই হাদীসটি উল্লেখ করেছেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলেছিলেন:
‘তুমি কি এতে সন্তুষ্ট নও যে, আল্লাহ তা‘আলা পৃথিবীর অধিবাসীদের মধ্য থেকে দু’জন পুরুষকে নির্বাচন করেছেন: তোমার পিতা এবং তোমার স্বামী!’
আর তিনি (যাহাবী) বলেন:
‘আব্দুস সালাম ইবনু সালিহ, যে ধ্বংসপ্রাপ্তদের (আল-হালকা) একজন, সে আব্দুর রাযযাক হতে তার অনুসরণ করেছে।’

আমি বলি: এই হাদীসটি খত্বীব প্রথম সূত্র হতে, এই মুতাবী‘ (অনুসরণকারী) হতে এবং তৃতীয় আরেকজন হতে বর্ণনা করেছেন এবং বলেছেন:
‘হাদীসটি গারীব (অপরিচিত)।’
ইবনুল জাওযী ‘আল-ইলাল’ (১/২২০-২২১) গ্রন্থে খত্বীবের সূত্রে তিনটি সূত্রেই এটি উল্লেখ করেছেন। তিনি তৃতীয় সূত্রটিকে ত্রুটিযুক্ত আখ্যা দিয়েছেন এই কারণে যে, তাতে আহমাদ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু ইয়াযীদ রয়েছে। তিনি (ইবনুল জাওযী) বলেন:
‘সে হাদীস জাল করত।’
আর দ্বিতীয় সূত্রটিকে ত্রুটিযুক্ত আখ্যা দিয়েছেন এই কারণে যে, আব্দুস সালাম – আর সে হলো আবূস সলত – সম্পর্কে তিনি (ইবনুল জাওযী) বলেন:
‘তারা (মুহাদ্দিসগণ) একমত যে সে মিথ্যুক।’
তিনি এমনই বলেছেন! আর প্রথম সূত্রটি সম্পর্কে তিনি নীরব থেকেছেন। অতঃপর তিনি আব্দুর রাযযাক সম্পর্কে কথা বলতে শুরু করেন এবং আব্দুর রাযযাকের উপর দোষ চাপানোর চেষ্টা করেন। এটি ভালো নয়, যতক্ষণ না কোনো বিশ্বস্ত ব্যক্তি তার (আব্দুর রাযযাকের) সূত্রে এটি বর্ণনা করেছে: সুতরাং, অপরাধের দায়ভার অন্য কারো উপর চাপানোই অধিক উত্তম।

২ - আহমাদ ইবনু আব্দুল মু’মিন আল-মিসরী: মাসলামাহ ইবনু কাসিম – যেমনটি ‘আল-লিসান’ গ্রন্থে রয়েছে – বলেছেন:
‘সে খুবই দুর্বল (যঈফ জিদ্দান)।’

৩ - আহমাদ ইবনু রিশদীন: আর সে হলো আহমাদ ইবনু মুহাম্মাদ ইবনুল হাজ্জাজ ইবনু রিশদীন আল-মিসরী। তিনি বলেন: ()
‌‌"









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6316)


(مَنْ أَكَلَ لَحْمَ أَخِيهِ فِي الدُّنْيَا، قُرِّبَ إِلَيْهِ يَوْمَ الْقِيَامَةِ،
فَيُقَالُ لَهُ: كُلُّهُ مَيِّتاً كَمَا أَكَلْتَهُ حَيّاً، فَيَأْكُلُهُ وَيَكْلَحُ وَيَضِجُّ) .
ضعيف.

أخرجه الطبراني في `المعجم الأوسط` (1/90/1/1648) من طريق
عبد العزيز بن محمد بن معدان السَّلَمْسيني () قال: نا محمد بن سلمة، عن
محمد بن إسحاق عن موسى بن يسار عن أبي هريرة مرفوعاً به. وقال:
` لم يروه عن ابن إسحاق إلا محمد بن سلمة`.
قلت هو الحراني، وهوثقة من رجال مسلم، وكذا من فوقه، إلا أنه لم
يخرج لابن إسحاق إلا متابعة، وفيه ضعف يسير، لكنه مدلس، وقد عنعنه من كل
الطرق الآتية عنه فهي العلة، وبها أعله العراقي في `تخريج الإحياء` (3/143)
- وعزاه لابن مردويه مرفوعاً وموقوفاً - وقال الهيثمي في `المجمع` (8/92) :
`رواه الطبراني في `الأوسط`، وفيه ابن إسحاق وهو مدلس، ومن لم أعرفه `.
قلت يشير إلى الراوي عنه ابن معدان السَّلَمْسيني، وهو بفتح السين واللام،
وسكون الميم وكسر السين الثانية نسبة إلى (سلمسين) : قرية بالقرب من حرّان،
كما في `الأنساب` للسمعاني، ولم يذكره فيها، ولا وجدت له ترجمة في شيء
من كتب التراجم التي عندي.
() كذا الأصل، لم يكمل الشيخ رحمه الله، واحمد هذا متهم بالكذب، كما سبق
مراراً، وانظر `الضعيفة` (11/316،656) وغيرها. (الناشر) .
() كذا في أصل الشيخ رحمه الله، وفي مطبوعة الطحان (2/391/1677) :
`عبد الصمد بن محمد … `، وقد ذكره الشيخ على الصواب في الحديث التالي. (الناشر) .
إلا أنه قد توبع، فقال أبو يعلى: حدثنا الحكم بن موسى: حدثنا محمد بن
سلمة … به.
كذا ذكره ابن كثير في تفسير {الحجرات} من رواية أبي يعلى، وإطلاق العزو
إليه يعني: أنه في `مسنده` وليس هوفي المطبوع منه، ولا عزاه إليه الهيثمي.
فقلت: لعله في `الكبير` منه، فرجعت إلى `المطالب العالية` منه، فلم أجده
فيه - وهو على شرطه - ، فرجعت إلى `معجم شيوخه`، فلم أره في ترجمة الحكم
ابن موسى - وهو ثقة من شيوخ مسلم - وقد ساق له حديثين. والله أعلم.
وقال ابن كثير عقبه:
`وهو غريب جداً `.
وأما قول الحافظ في `الفتح` (10/470) بعدما عزاه لأبي يعلى أيضاً:
`سنده حسن`!
فهو غير حسن، ولعله ظن أن ابن إسحاق صرح بالتحديث، فإنه في هذه
الحال يكون حسن الإسناد، وهو قد عنعنه في جميع الطرق عنه، وحتى في رواية
أبي يعلى - كما تقدم - ، وكذلك رواه ابن أبي الدنيا في `الصمت` (109/178) ،
وأبو الشيخ في `التوبيخ` (226/205) من طريقين آخرين عنه معنعناً، وكذا رواه
الأصبهاني في `الترغيب` (2/899/2200) ولفظه:
يؤتى بالرجل يوم القيامة الذي كان يغتاب الناس في الدنيا، فيقال له: كل
لحم أخيك ميتاً … `.
وهو رواية الطبراني في `الأوسط`، كما ذكر الهيثمي وقال:
`وفيه ابن إسحاق، وهو مدلس، وبقية رجاله ثقات`.
وبه أعله المنذري في `الترغيب` (3/299) بعد أن عزاه لأبي يعلى والطبراني
وابي الشيخ في `كتاب التوبيخ` باللفظ الأول.
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(مَنْ أَكَلَ لَحْمَ أَخِيهِ فِي الدُّنْيَا، قُرِّبَ إِلَيْهِ يَوْمَ الْقِيَامَةِ،
فَيُقَالُ لَهُ: كُلُّهُ مَيِّتاً كَمَا أَكَلْتَهُ حَيّاً، فَيَأْكُلُهُ وَيَكْلَحُ وَيَضِجُّ) .
(যে ব্যক্তি দুনিয়াতে তার ভাইয়ের গোশত খেয়েছে, কিয়ামতের দিন তাকে তার কাছে আনা হবে। অতঃপর তাকে বলা হবে: তুমি যেমন তাকে জীবিত অবস্থায় খেয়েছিলে, তেমনি এখন মৃত অবস্থায় খাও। তখন সে তা খাবে এবং তার মুখ বিকৃত হবে ও সে চিৎকার করবে।)

যঈফ (দুর্বল)।

এটি ত্ববারানী তাঁর ‘আল-মু'জামুল আওসাত্ব’ (১/৯০/১/১৬৪৮) গ্রন্থে এই সূত্রে বর্ণনা করেছেন: আব্দুল আযীয ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু মা'দান আস-সালামসীনী () বলেন: আমাদেরকে মুহাম্মাদ ইবনু সালামাহ বর্ণনা করেছেন, তিনি মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাক্ব থেকে, তিনি মূসা ইবনু ইয়াসার থেকে, তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ' হিসেবে এটি বর্ণনা করেছেন। আর তিনি (ত্ববারানী) বলেছেন: ‘ইবনু ইসহাক্ব থেকে মুহাম্মাদ ইবনু সালামাহ ব্যতীত আর কেউ এটি বর্ণনা করেননি।’

আমি (আল-আলবানী) বলি: তিনি হলেন আল-হাররানী, আর তিনি মুসলিমের রিজাল (বর্ণনাকারী) দের অন্তর্ভুক্ত এবং সিক্বাহ (নির্ভরযোগ্য)। অনুরূপভাবে তার উপরের বর্ণনাকারীরাও। তবে তিনি ইবনু ইসহাক্ব থেকে শুধুমাত্র মুতাবা'আহ (সমর্থনমূলক বর্ণনা) হিসেবে বর্ণনা করেছেন। তার মধ্যে সামান্য দুর্বলতা রয়েছে, কিন্তু তিনি মুদাল্লিস (মিশ্রণকারী)। আর তিনি তার থেকে আগত সকল সূত্রে 'আনআনা' (অস্পষ্টভাবে 'আন' শব্দ দ্বারা) বর্ণনা করেছেন। এটাই হলো ত্রুটি (ইল্লাহ)। এই ত্রুটির কারণেই ইরাক্বী তাঁর ‘তাখরীজুল ইহয়া’ (৩/১৪৩) গ্রন্থে এটিকে ত্রুটিযুক্ত বলেছেন – এবং তিনি এটিকে ইবনু মারদাওয়াইহ-এর দিকে মারফূ' ও মাওকূফ হিসেবে সম্বন্ধিত করেছেন – আর হাইসামী ‘আল-মাজমা’ (৮/৯২) গ্রন্থে বলেছেন: ‘এটি ত্ববারানী ‘আল-আওসাত্ব’-এ বর্ণনা করেছেন। এতে ইবনু ইসহাক্ব আছেন, আর তিনি মুদাল্লিস, এবং এমন একজন আছেন যাকে আমি চিনি না।’

আমি বলি: তিনি তার থেকে বর্ণনাকারী ইবনু মা'দান আস-সালামসীনী-এর দিকে ইঙ্গিত করেছেন। এটি সীন ও লাম-এর উপর ফাতহা (যবর), মীম-এর উপর সুকূন (জযম) এবং দ্বিতীয় সীন-এর নিচে কাসরাহ (জের) সহকারে (সালামসীন) গ্রামের দিকে সম্বন্ধিত, যা হাররানের নিকটবর্তী একটি গ্রাম। যেমনটি সাম'আনী-এর ‘আল-আনসাব’ গ্রন্থে রয়েছে। তবে তিনি (সাম'আনী) তাকে (ইবনু মা'দানকে) সেখানে উল্লেখ করেননি, আর আমার কাছে থাকা কোনো জীবনী গ্রন্থেও আমি তার জীবনী পাইনি।

() মূল কিতাবে এমনই আছে, শাইখ (রাহিমাহুল্লাহ) এটি পূর্ণ করেননি। আর এই আহমাদ মিথ্যা বলার অভিযোগে অভিযুক্ত, যেমনটি পূর্বে বহুবার উল্লেখ করা হয়েছে। দেখুন ‘আয-যঈফাহ’ (১১/৩১৬, ৬৫৬) এবং অন্যান্য। (প্রকাশক)।

() শাইখ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর মূল কিতাবে এমনই আছে। আর ত্বাহহান-এর মুদ্রিত কপিতে (২/৩৯১/১৬৭৭) রয়েছে: ‘আব্দুস সামাদ ইবনু মুহাম্মাদ...’। শাইখ পরবর্তী হাদীসে এটিকে সঠিকভাবেই উল্লেখ করেছেন। (প্রকাশক)।

তবে তিনি মুতাবা'আহ (সমর্থন) লাভ করেছেন। আবূ ইয়া'লা বলেছেন: আমাদেরকে আল-হাকাম ইবনু মূসা বর্ণনা করেছেন: আমাদেরকে মুহাম্মাদ ইবনু সালামাহ বর্ণনা করেছেন... এটি।

ইবনু কাসীর {আল-হুজুরাত}-এর তাফসীরে আবূ ইয়া'লা-এর বর্ণনা থেকে এটি এভাবেই উল্লেখ করেছেন। আর তার দিকে সাধারণভাবে সম্বন্ধিত করার অর্থ হলো: এটি তার ‘মুসনাদ’-এ রয়েছে। কিন্তু এটি তার মুদ্রিত কপিতে নেই, আর হাইসামীও এটিকে তার দিকে সম্বন্ধিত করেননি।

আমি বললাম: সম্ভবত এটি তার ‘আল-কাবীর’ (বৃহৎ মুসনাদ)-এ রয়েছে। অতঃপর আমি তার ‘আল-মাত্বালিবুল আলিয়াহ’ গ্রন্থে ফিরে গেলাম, কিন্তু সেখানেও এটি পেলাম না – যদিও এটি তার শর্তানুযায়ী ছিল –। অতঃপর আমি তার ‘মু'জামু শুয়ূখিহি’ (তার শাইখদের অভিধান)-এ ফিরে গেলাম, কিন্তু আল-হাকাম ইবনু মূসা-এর জীবনীতে এটি দেখতে পেলাম না – আর তিনি মুসলিমের শাইখদের অন্তর্ভুক্ত এবং সিক্বাহ (নির্ভরযোগ্য) –। তিনি তার জন্য দুটি হাদীস বর্ণনা করেছেন। আল্লাহই সর্বাধিক অবগত।

আর ইবনু কাসীর এর পরে বলেছেন: ‘এটি খুবই গারীব (অপরিচিত)।’

আর হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আল-ফাতহ’ (১০/৪৭০) গ্রন্থে আবূ ইয়া'লা-এর দিকে সম্বন্ধিত করার পর যে উক্তি করেছেন: ‘এর সনদ হাসান’! এটি হাসান নয়। সম্ভবত তিনি ধারণা করেছেন যে ইবনু ইসহাক্ব তাদহীস (হাদীস বর্ণনা) স্পষ্টভাবে উল্লেখ করেছেন। কারণ, এই অবস্থায় এটি হাসানুল ইসনাদ হতো। অথচ তিনি তার থেকে আগত সকল সূত্রে 'আনআনা' (অস্পষ্টভাবে 'আন' শব্দ দ্বারা) বর্ণনা করেছেন, এমনকি আবূ ইয়া'লা-এর বর্ণনায়ও – যেমনটি পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে –। অনুরূপভাবে ইবনু আবীদ্ দুন্ইয়া ‘আস-সামত’ (১০৯/১৭৮) গ্রন্থে এবং আবূশ শাইখ ‘আত-তাওবীখ’ (২২৬/২০৫) গ্রন্থে তার থেকে 'আনআনা' সহকারে অন্য দুটি সূত্রে বর্ণনা করেছেন। অনুরূপভাবে আসবাহানী ‘আত-তারগীব’ (২/৮৯৯/২২০০) গ্রন্থে এটি বর্ণনা করেছেন এবং এর শব্দাবলী হলো:

‘কিয়ামতের দিন সেই ব্যক্তিকে আনা হবে যে দুনিয়াতে মানুষের গীবত করত। অতঃপর তাকে বলা হবে: তোমার ভাইয়ের গোশত মৃত অবস্থায় খাও...।’

আর এটিই ত্ববারানীর ‘আল-আওসাত্ব’-এর বর্ণনা, যেমনটি হাইসামী উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন: ‘এতে ইবনু ইসহাক্ব আছেন, আর তিনি মুদাল্লিস, তবে এর অবশিষ্ট বর্ণনাকারীরা সিক্বাহ (নির্ভরযোগ্য)।’

আর এই ত্রুটির কারণেই মুনযিরী ‘আত-তারগীব’ (৩/২৯৯) গ্রন্থে এটিকে ত্রুটিযুক্ত বলেছেন, আবূ ইয়া'লা, ত্ববারানী এবং আবূশ শাইখ-এর ‘কিতাবুত তাওবীখ’-এর দিকে প্রথম শব্দাবলী সহকারে সম্বন্ধিত করার পর।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6317)


(من قال في دُبُرِ صلاتِه: {الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي لَمْ يَتَّخِذْ وَلَداً،
وَلَمْ يَكُنْ لَهُ شَرِيكٌ فِي الْمُلْكِ، وَلَمْ يَكُنْ لَهُ وَلِيٌّ مِنَ الذُّلِّ وَكَبِّرْهُ
تَكْبِيراً} ، كان له من الأجرِ مثل السموات السَّبعِ وما فيهن، وما
تَحْتَهُنَّ، والجبالِ، وذلك أن الله عز وجل يقولُ: {تَكَادُ السَّمَوَاتُ
يَتَفَطَّرْنَ مِنْهُ وَتَنْشَقُّ الأَرْضُ وَتَخِرُّ الْجِبَالُ هَدّاً. أَنْ دَعَوْا لِلرَّحْمَنِ وَلَداً}
فلهذا من الأجْرِ كما على هذا الكافرِ من الوِزرِ) .
منكر.

أخرجه الطبراني في `كتاب الدعاء` (2/1105/676) : حدثنا أحمد
ابن النضر بن بحر العسكري، ثنا عبد الصمد بن محمد بن معدان السَّلَمْسيني:
ثنا محمد بن سلمة عن محمد بن إسحاق عن عمه موسى بن يسار عن أبي هريرة
رضي الله عنه … مرفوعاً.
قلت وهذا إسناد ضعيف وله علتان:
عنعنة ابن إسحاق، وجهالة السَّلَمْسيني هذا - كما تقدم في الحديث الذي
قبله - . وسائر رجاله ثقات.
وأما قول الدكتور محمد سعيد البخاري في تعليقخ على `الدعاء`:
`في إسناده شيخ الطبراني، وشيخ شيخه لمأقف على ترجمتهما `!
فلم يصب في شيخ الطبراني، فقد ترجمه الخطيب في `تاريخ بغداد`
(5/185 - 186) ، وذكره أنه من أهل (عسكر مكرم) ، وأن ابن المنادي قال:
`كان من ثقات وأكثرهم كتاباً، مات سنة (290) `.
قلت: فالعلة من شيخه ابن معدان، أو عنعنة ابن إسحاق. والله سبحانه
وتعالى أعلم.
ومن الغريب أن الحافظ السيوطي لم يورد هذا الحديث في `جامعيه`، ولا في
`الدر المنثور` في تفسير آية الإسراء هذه: {وقل الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي لَمْ يَتَّخِذْ وَلَداً … }
الآية، وإنما أورد تحتها ما روى ابن أبي الدنيا في `كتاب الفرج` والبيهقي في
`الأسماء والصفات` عن إسماعيل بن أبي فديك، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:
` ما كَرَبَني أمر إلا تمثل لي جبريل عليه السلام فقال: يا محمد! قل: توكلت
على الحي الذي لا يموت، و: {الحمد لله الذي لم يتخذ ولدا … } الآية`.
قلت وهذا - مع إعضاله - فيه جهالة وضعف، فقد أخرجه ابن أبي الدنيا
في `الفَرَج` (ص 20) ، ومن طريقه البيهقي في `الأسماء` (ص 113) عن الخطاب
ابن عثمان: حدثنا ابن أبي فديك: حدثني سعد بن سعيد: حدثني أبوك
إسماعيل بن أبي فديك قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: … فذكره.
أما الجهالة: فهي في إسماعيل هذا - والد محمد ين إسماعيل بن أبي فديك - ،
فقد أورده البخاري في `التاريخ` وابن أبي حاتم في `الجرح` برواية ابنه محمد
عنه ولم يذكرا فيه جرحاً ولا تعديلاً. وهنا قد أدخل محمد بينه وبين أبيه سعدَ
ابن سعيد - وهو: ابن أبي سعيد المقبري - ، وهو ليّن - كما قال الذهبي في
`الكاشف`، والعسقلاني في `التقريب`، وذكر أنه - من الطبقة الثامنة، وهي
الطبقة الوسطى من كبار أتباع التابعين، وهذا يعني أن شيخه إسماعيل بن أبي
فديك من أتباع التابعين، ومع هذا الإعضال فهو مجهول لم يوثقه أحد.
وقد روى عنه مسنداً! أخرجه الحاكم (1/509) من طريق الفضل بن محمد
الشعراني: ثنا أبو ثابت محمد بن عبيد الله: ثنا محمد بن إسماعيل بن أبي
فديك: حدثني سعد بن سعيد بن أبي سعيد المقبري عن أبيه عن أبي هريرة
مرفوعاً … به. وقال:
`صحيح الإسناد`.
كذا قال! وسقط الحديث من `التخليص` للذهبي، واستبعد أن يوافق على
تصحيحه، لأمرين:
الأول: تضعيفه لرواية سعيد المقبري - كما تقدم نقله عن `كاشفه` - ،بل قال
في `المغني في الضعفاء والمتروكين`:
`واهٍ، ورمي بالقدر`.
والآخر: أنه أورد في في `ضعفائه` المذكور الفضل بن محمد الشَّعراني وقال:
`قال أبو حاتم: تكلموا فيه`.
ولم يزد! مع أنه وثقه بعضهم، وبالغ بعضهم فرماه بالكذب، وهو من الحفاظ.
راجع `سير الأعلام` للذهبي (13/317 - 319) .
وشيخه في هذا الإسناد أبو ثابت محمد بن عبيد الله ثقة، من شيوخ البخاري،
فإن لم يكن وهم عليه الشعراني، فالخطأ من المقبري. والله سبحانه وتعالى أعلم
والحديث عزاه المنذري في `الترغيب` (3/44) للطبراني والحاكم عن أبي
هريرة، وأقر الحاكم على تصحيح إسناده! ولينظر أين أخرجه الطبراني؟ فإني لم
يتيسر لي البحث عنه كما ينبغي، ولم يورده الهيثمي في `مجمعه`. والله أعلم.
وروى الأصبهاني في `ترغيبه` (2/540/1292) من طريق إبراهيم بن الأشعث
قال سمعت الفضيل يقول:
إن رجلا على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم أسره العدو، فأراد أبوه أن يفديه، فأبوا عليه إلا
بشيء كثير فلم يطقه، فشكا ذلك إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فقال:
`اكتب إليه فليكثر من قوله: توكلت على الحي الذي لا يموت … ` إلخ.
قال: فكتب إليه، فجعل يقولها، فغفل العدو عنه فاستاق أربعين بعيراً، فقدم بها
إلى أبيه. قال المنذري:
`وهذا معضل`.
قلت وإبراهيم بن الأشعث أورده الذهبي في `المغني` وقال:
`قال أبو حاتم: كنا نظن به الخير، فقد جاء بمثل هذا الحديث، وذكر حديثاً
واهياً`.
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(যে ব্যক্তি তার সালাতের শেষে বলবে: {সমস্ত প্রশংসা আল্লাহর জন্য, যিনি কোনো সন্তান গ্রহণ করেননি, রাজত্বে তাঁর কোনো শরীক নেই এবং দুর্বলতা হেতু তাঁর কোনো অভিভাবকও নেই। আর তুমি সগৌরবে তাঁর শ্রেষ্ঠত্ব ঘোষণা করো} [সূরা ইসরা: ১১১], তার জন্য সাত আসমান ও তার মধ্যে যা কিছু আছে, তার নিচে যা কিছু আছে এবং পর্বতসমূহের সমপরিমাণ প্রতিদান থাকবে। আর তা এই কারণে যে, আল্লাহ আযযা ওয়া জাল বলেন: {তাঁর কারণে আকাশমণ্ডলী ফেটে পড়ার উপক্রম হয়, পৃথিবী বিদীর্ণ হয় এবং পর্বতমালা চূর্ণ-বিচূর্ণ হয়ে যায়। কারণ তারা দয়াময়ের জন্য সন্তান আরোপ করে} [সূরা মারইয়াম: ৯০-৯১]। সুতরাং এই ব্যক্তির জন্য সেই পরিমাণ প্রতিদান রয়েছে, যে পরিমাণ গুনাহ এই কাফিরের উপর রয়েছে।)
মুনকার (Munkar)।

এটি ত্বাবারানী তাঁর ‘কিতাবুদ দুআ’ (২/১১০৫/৬৭৬) গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আহমাদ ইবনুন নাদর ইবনু বাহর আল-আসকারী, তিনি বলেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আব্দুস সামাদ ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু মা’দান আস-সালামসীনী: তিনি বলেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু সালামাহ, তিনি মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাক থেকে, তিনি তাঁর চাচা মূসা ইবনু ইয়াসার থেকে, তিনি আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে... মারফূ’ হিসেবে।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল) এবং এতে দুটি ত্রুটি রয়েছে: ইবনু ইসহাকের ‘আনআনাহ’ (অস্পষ্ট বর্ণনা) এবং এই সালামসীনীর জাহালাত (অজ্ঞাত পরিচয়) – যেমনটি এর পূর্বের হাদীসে উল্লেখ করা হয়েছে। এর অবশিষ্ট বর্ণনাকারীগণ সিকাহ (নির্ভরযোগ্য)।

আর ‘আদ-দুআ’ গ্রন্থের টীকায় ডক্টর মুহাম্মাদ সাঈদ আল-বুখারীর এই উক্তি সম্পর্কে: ‘এর সনদে ত্বাবারানীর শায়খ এবং তাঁর শায়খের শায়খের জীবনী আমি খুঁজে পাইনি!’ – ত্বাবারানীর শায়খের ব্যাপারে তিনি সঠিক বলেননি। কারণ খতীব বাগদাদী তাঁর ‘তারীখে বাগদাদ’ (৫/১৮৫-১৮৬) গ্রন্থে তাঁর জীবনী উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন যে, তিনি (আসকার মুকাররাম)-এর অধিবাসী ছিলেন। আর ইবনুল মুনাদী বলেছেন: ‘তিনি সিকাহ (নির্ভরযোগ্য) রাবীদের অন্তর্ভুক্ত ছিলেন এবং তাঁর কিতাব ছিল সবচেয়ে বেশি। তিনি ২৯০ হিজরীতে মারা যান।’

আমি বলি: সুতরাং ত্রুটিটি হয় তাঁর শায়খ ইবনু মা’দানের পক্ষ থেকে, অথবা ইবনু ইসহাকের ‘আনআনাহ’র কারণে। আল্লাহ সুবহানাহু ওয়া তাআলা সর্বাধিক অবগত।

এটি আশ্চর্যের বিষয় যে, হাফিয সুয়ূতী এই হাদীসটি তাঁর ‘জাওয়ামি’ গ্রন্থে অথবা সূরা ইসরার এই আয়াতের তাফসীরে ‘আদ-দুররুল মানসূর’ গ্রন্থে উল্লেখ করেননি: {আর তুমি বলো: সমস্ত প্রশংসা আল্লাহর জন্য, যিনি কোনো সন্তান গ্রহণ করেননি...} আয়াতটি। বরং তিনি এর অধীনে যা উল্লেখ করেছেন তা হলো, ইবনু আবীদ দুনইয়া ‘কিতাবুল ফারাজ’ গ্রন্থে এবং বাইহাকী ‘আল-আসমা ওয়াস সিফাত’ গ্রন্থে ইসমাঈল ইবনু আবী ফুদাইক থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: ‘যখনই কোনো বিষয় আমাকে চিন্তিত করেছে, তখনই জিবরীল (আঃ) আমার সামনে আবির্ভূত হয়ে বলেছেন: হে মুহাম্মাদ! বলুন: আমি সেই চিরঞ্জীব সত্তার উপর ভরসা করলাম যিনি কখনো মরবেন না, এবং বলুন: {সমস্ত প্রশংসা আল্লাহর জন্য, যিনি কোনো সন্তান গ্রহণ করেননি...} আয়াতটি।’

আমি বলি: এটি – এর ই’দাল (সনদে দুই বা ততোধিক রাবী বাদ পড়া) থাকা সত্ত্বেও – এতে জাহালাত (অজ্ঞাত পরিচয়) এবং দুর্বলতা রয়েছে। কারণ ইবনু আবী দুনইয়া এটি ‘আল-ফারাজ’ (পৃ. ২০) গ্রন্থে এবং তাঁর সূত্রে বাইহাকী ‘আল-আসমা’ (পৃ. ১১৩) গ্রন্থে খাত্তাব ইবনু উসমান থেকে বর্ণনা করেছেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন ইবনু আবী ফুদাইক: আমার নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন সা’দ ইবনু সাঈদ: আমার নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আপনার পিতা ইসমাঈল ইবনু আবী ফুদাইক, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেন।

আর জাহালাত (অজ্ঞাত পরিচয়) হলো এই ইসমাঈলের মধ্যে – যিনি মুহাম্মাদ ইবনু ইসমাঈল ইবনু আবী ফুদাইকের পিতা –। বুখারী তাঁকে ‘আত-তারীখ’ গ্রন্থে এবং ইবনু আবী হাতিম তাঁকে ‘আল-জারহ’ গ্রন্থে তাঁর পুত্র মুহাম্মাদের সূত্রে উল্লেখ করেছেন, কিন্তু তাঁরা তাঁর সম্পর্কে জারহ (সমালোচনা) বা তা’দীল (নির্ভরযোগ্যতা) কিছুই উল্লেখ করেননি। আর এখানে মুহাম্মাদ তাঁর ও তাঁর পিতার মাঝে সা’দ ইবনু সাঈদকে প্রবেশ করিয়েছেন – আর তিনি হলেন: ইবনু আবী সাঈদ আল-মাকবুরী – এবং তিনি ‘লাইয়্যিন’ (নমনীয়/দুর্বল), যেমনটি যাহাবী ‘আল-কাশেফ’ গ্রন্থে এবং আসকালানী ‘আত-তাকরীব’ গ্রন্থে বলেছেন। আর তিনি উল্লেখ করেছেন যে, তিনি অষ্টম স্তরের অন্তর্ভুক্ত, যা হলো বড় তাবেঈ তাবেঈনদের মধ্যম স্তর। এর অর্থ হলো তাঁর শায়খ ইসমাঈল ইবনু আবী ফুদাইক তাবেঈ তাবেঈনদের অন্তর্ভুক্ত। এই ই’দাল থাকা সত্ত্বেও তিনি মাজহূল (অজ্ঞাত), তাঁকে কেউ সিকাহ (নির্ভরযোগ্য) বলেননি।

আর তিনি (ইসমাঈল) থেকে মুসনাদ হিসেবেও বর্ণিত হয়েছে! এটি হাকিম (১/৫০৯) ফাদল ইবনু মুহাম্মাদ আশ-শা’রানীর সূত্রে বর্ণনা করেছেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আবূ সাবিত মুহাম্মাদ ইবনু উবাইদুল্লাহ: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু ইসমাঈল ইবনু আবী ফুদাইক: আমার নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন সা’দ ইবনু সাঈদ ইবনু আবী সাঈদ আল-মাকবুরী, তিনি তাঁর পিতা থেকে, তিনি আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ হিসেবে... হাদীসটি। আর তিনি (হাকিম) বলেন: ‘সনদ সহীহ।’

তিনি এমনই বলেছেন! আর হাদীসটি যাহাবীর ‘আত-তালখীস’ গ্রন্থ থেকে বাদ পড়েছে। তাঁর এই সহীহ বলার সাথে একমত হওয়া সুদূরপরাহত, দুটি কারণে: প্রথমত: সাঈদ আল-মাকবুরীর বর্ণনাকে তিনি (যাহাবী) দুর্বল বলেছেন – যেমনটি তাঁর ‘কাশেফ’ গ্রন্থ থেকে পূর্বে উদ্ধৃত করা হয়েছে – বরং তিনি ‘আল-মুগনী ফিদ দুআফা ওয়াল মাতরূকীন’ গ্রন্থে বলেছেন: ‘সে ওয়াহী (অত্যন্ত দুর্বল), এবং তাকে কাদারিয়্যাহ মতবাদের সাথে অভিযুক্ত করা হয়েছে।’ আর দ্বিতীয়ত: তিনি (যাহাবী) তাঁর উল্লিখিত ‘দুআফা’ গ্রন্থে ফাদল ইবনু মুহাম্মাদ আশ-শা’রানীকে উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন: ‘আবূ হাতিম বলেছেন: লোকেরা তার সম্পর্কে কথা বলেছে।’ তিনি এর বেশি কিছু বলেননি! যদিও কেউ কেউ তাঁকে সিকাহ (নির্ভরযোগ্য) বলেছেন, আবার কেউ কেউ বাড়াবাড়ি করে তাঁকে মিথ্যার অভিযোগে অভিযুক্ত করেছেন, অথচ তিনি হাফিযদের অন্তর্ভুক্ত। (যাহাবীর ‘সিয়ারুল আ’লাম’ ১৩/৩১৭-৩১৯ দেখুন)।

আর এই সনদে তাঁর শায়খ আবূ সাবিত মুহাম্মাদ ইবনু উবাইদুল্লাহ সিকাহ (নির্ভরযোগ্য), তিনি বুখারীর শায়খদের অন্তর্ভুক্ত। যদি আশ-শা’রানী তাঁর উপর ভুল না করে থাকেন, তবে ভুলটি আল-মাকবুরীর পক্ষ থেকে। আল্লাহ সুবহানাহু ওয়া তাআলা সর্বাধিক অবগত।

আর মুনযিরী ‘আত-তারগীব’ (৩/৪৪) গ্রন্থে হাদীসটিকে আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে ত্বাবারানী ও হাকিমের দিকে সম্পর্কিত করেছেন এবং হাকিমের সনদ সহীহ বলার উপর সম্মতি জ্ঞাপন করেছেন! ত্বাবারানী এটি কোথায় বর্ণনা করেছেন তা দেখা উচিত? কারণ আমার পক্ষে যথাযথভাবে এটি অনুসন্ধান করা সহজ হয়নি, আর হাইসামীও তাঁর ‘মাজমা’ গ্রন্থে এটি উল্লেখ করেননি। আল্লাহই সর্বাধিক অবগত।

আর আসবাহানী তাঁর ‘তারগীব’ (২/৫৪০/১২৯২) গ্রন্থে ইবরাহীম ইবনুল আশআসের সূত্রে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আমি ফুযাইলকে বলতে শুনেছি: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের যুগে এক ব্যক্তিকে শত্রু পক্ষ বন্দী করে ফেলেছিল। তার পিতা তাকে মুক্তিপণ দিয়ে ছাড়িয়ে আনতে চাইলেন, কিন্তু তারা অনেক বেশি অর্থ ছাড়া রাজি হলো না, যা তার পিতার পক্ষে সম্ভব ছিল না। তখন তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট এর অভিযোগ করলেন। তিনি বললেন: ‘তুমি তার নিকট লিখে পাঠাও যেন সে এই দু’আটি বেশি বেশি পড়ে: আমি সেই চিরঞ্জীব সত্তার উপর ভরসা করলাম যিনি কখনো মরবেন না...’ ইত্যাদি। তিনি বলেন: অতঃপর তিনি তার নিকট লিখে পাঠালেন। সে ব্যক্তি তা পড়তে শুরু করল। তখন শত্রুরা তার প্রতি অমনোযোগী হয়ে গেল এবং সে চল্লিশটি উট হাঁকিয়ে নিয়ে তার পিতার নিকট ফিরে এলো। মুনযিরী বলেন: ‘এটি মু’দাল (সনদে দুই বা ততোধিক রাবী বাদ পড়া)।’

আমি বলি: আর ইবরাহীম ইবনুল আশআসকে যাহাবী ‘আল-মুগনী’ গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন: ‘আবূ হাতিম বলেছেন: আমরা তাকে ভালো মনে করতাম, কিন্তু সে এই ধরনের হাদীস নিয়ে এসেছে, এবং একটি ওয়াহী (অত্যন্ত দুর্বল) হাদীসও উল্লেখ করেছে।’









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6318)


(فالذي نِلْتُما من عٍِرْض أخيكما آنفاً أكثرُ، والذي نفسُ
محمدٍ بيدِهِ! إنه في نَهَرٍ من أنهارِ الجنةِ يَتَغَمَّسُ فيها) .
منكر.

أخرجه البخاري في `الأدب المفرد` (




(তোমরা দু'জন এইমাত্র তোমাদের ভাইয়ের সম্মান (ইজ্জত) থেকে যা অর্জন করেছো, তা আরও বেশি। যার হাতে মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর প্রাণ! নিশ্চয় সে জান্নাতের নদীসমূহের একটি নদীতে ডুব দিচ্ছে (স্নান করছে)।)

মুনকার।

এটি বুখারী 'আল-আদাবুল মুফরাদ'-এ বর্ণনা করেছেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6319)


(اللَّهُمَّ! اغْفِرْ لِلأَحْنَفِ بْنِ قَيْسٍ) .
ضعيف.

أخرجه البخاري في `التاريخ الكبير` (1/2/50) وفي `الصغير`
(ص 80 - هندية) ، وابن سعد في `الطبقات` (7/73) ، والحاكم (3/614) ، وكذا
أحمد (5/372) ، والطبراني في `المعجم الكبير` (8/32/7285) ، وابن عشاكر
في `تاريخ دمشق ` (7/424) كلهم من طريق حَمَّادِ بْنِ سَلَمَةَ عَنْ عَلِيِّ بْنِ زَيْدٍ
عَنِ الْحَسَنِ: أنَّ الأَحْنَفِ بْنِ قَيْسٍ قَالَ:
بينما أنا أَطُوفُ بِالْبَيْتِ فِي زَمَنِ عُثْمَانَ رضي الله عنه، إِذْ جاءَ رَجُلٌ
مِنْ بَنِي لَيْثٍ، فأخذ بِيَدِي فَقَالَ: أَلا أُبَشِّرُكَ؟ فَقُلْتُ: بَلَى. فَقَالَ: هَلْ تَذْكُرُ إِذْ
بَعَثَنِي رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم إِلَى قَوْمِكَ بني سعد، فَجَعَلْتُ أَعْرِضُ عَلَيْهِمُ الإِسْلامَ
وَأَدْعُوهُمْ إِلَيْهِ، فَقُلْتَ أَنْتَ: إِنَّكَ تَدْعُو إِلَى الْخَيْرِ، وَتَأْمُرُ بِالخير، وإِنَّهُ لَيَدْعُو إِلَى
الْخَيْرِ وَيَأْمُرُ بِالخير، فَبَلَّغْتُ ذَلِكَ إلى النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم، فَقَالَ: … فذكره. فَكَانَ
الأَحْنَفُ رضي الله عنه يَقُولُ: مَا من عَمَلِي شَيْءٌ أَرْجَى لِي مِنْهُ.
والسياق للحاكم وبيض له.
قلت: وهذا إسناد ضعيف، الحسن - هو:البصري، وهو: مدلس وقد عنعنه.
وعلي بن زيد - وهو: ابن جدعان، وهو: - ضعيف كما قال الحافظ في
`التقريب`. وقال في `الإصابة` - بعد أن عزاه لابن أبي عاصم فقط - :
`تفرد به علي بن زيد وفيه ضعف `.
ومما تقدم تعلم وهاء قول الهيثمي (10/2) - بعد أن عزاه لأحمد والطبراني - :
`ورجال أحمد رجال الصحيح، غير علي بن زيد، وهوحسن الحديث `.
كذا قال! وهو مدفوع بقول الحافظ المتقدم، ولو سلمنا جدلاً بما قال، فقد فاتته
العلة الأولى وهي العنعنة!
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(হে আল্লাহ! আহনাফ ইবনু ক্বাইসকে ক্ষমা করে দিন)।
যঈফ (দুর্বল)।

এটি বর্ণনা করেছেন বুখারী তাঁর ‘আত-তারীখুল কাবীর’ গ্রন্থে (১/২/৫০) এবং ‘আস-সগীর’ গ্রন্থে (পৃ. ৮০ - হিন্দী), ইবনু সা’দ তাঁর ‘আত-তাবাক্বাত’ গ্রন্থে (৭/৭৩), হাকিম (৩/৬১৪), অনুরূপভাবে আহমাদ (৫/৩৭২), ত্বাবারানী তাঁর ‘আল-মু’জামুল কাবীর’ গ্রন্থে (৮/৩২/৭২৮৫), এবং ইবনু আসাকির তাঁর ‘তারীখে দিমাশক্ব’ গ্রন্থে (৭/৪২৪)।

তাদের সকলেই হাম্মাদ ইবনু সালামাহ্ হতে, তিনি আলী ইবনু যায়দ হতে, তিনি হাসান হতে বর্ণনা করেছেন যে, আহনাফ ইবনু ক্বাইস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন:

আমি উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর যুগে বাইতুল্লাহর তাওয়াফ করছিলাম, এমন সময় বানী লাইস গোত্রের এক ব্যক্তি এসে আমার হাত ধরল এবং বলল: আমি কি তোমাকে সুসংবাদ দেব না? আমি বললাম: অবশ্যই। সে বলল: তোমার কি মনে আছে, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে তোমার গোত্র বানী সা’দ-এর নিকট পাঠিয়েছিলেন? আমি তাদের নিকট ইসলাম পেশ করছিলাম এবং তাদের প্রতি আহ্বান জানাচ্ছিলাম। তখন তুমি বলেছিলে: ‘নিশ্চয়ই আপনি কল্যাণের দিকে আহ্বান করছেন এবং কল্যাণের আদেশ দিচ্ছেন। আর নিশ্চয়ই তিনি (রাসূল) কল্যাণের দিকে আহ্বান করেন এবং কল্যাণের আদেশ দেন।’ আমি এই কথাটি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট পৌঁছালাম। তখন তিনি বললেন: ... অতঃপর তিনি (উপরের দু’আটি) উল্লেখ করলেন।

আহনাফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলতেন: আমার আমলসমূহের মধ্যে এর (এই দু’আর) চেয়ে অধিক আশাব্যঞ্জক আর কিছুই নেই।

আর এই বর্ণনাভঙ্গিটি হাকিমের এবং তিনি এর জন্য সাদা পাতা রেখেছিলেন।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ। হাসান – তিনি হলেন বাসরী, আর তিনি মুদাল্লিস (সনদ গোপনকারী) এবং তিনি ‘আনআনা’ (عن - ‘আন’ শব্দ ব্যবহার করে) বর্ণনা করেছেন।

আর আলী ইবনু যায়দ – তিনি হলেন ইবনু জুদ’আন, আর তিনি যঈফ, যেমনটি হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আত-তাক্বরীব’ গ্রন্থে বলেছেন।

আর তিনি (হাফিয ইবনু হাজার) ‘আল-ইসাবাহ’ গ্রন্থে – শুধুমাত্র ইবনু আবী আসিমের দিকে এর সূত্র উল্লেখ করার পর – বলেছেন: “আলী ইবনু যায়দ এককভাবে এটি বর্ণনা করেছেন এবং তার মধ্যে দুর্বলতা রয়েছে।”

যা কিছু পূর্বে উল্লেখ করা হলো, তা থেকে তুমি জানতে পারবে যে, হাইসামী (১০/২)-এর বক্তব্যটি কত দুর্বল, যখন তিনি এটিকে আহমাদ ও ত্বাবারানীর দিকে সম্বন্ধযুক্ত করার পর বলেন: “আহমাদের বর্ণনাকারীরা সহীহের বর্ণনাকারী, তবে আলী ইবনু যায়দ ব্যতীত, আর তিনি ‘হাসানুল হাদীস’ (যার হাদীস হাসান পর্যায়ের)।”

তিনি এমনটিই বলেছেন! কিন্তু হাফিয (ইবনু হাজার)-এর পূর্বোক্ত বক্তব্য দ্বারা এটি খণ্ডনযোগ্য। আর যদি আমরা তর্কের খাতিরেও তার (হাইসামী) কথা মেনে নেই, তবুও তিনি প্রথম ত্রুটিটি উপেক্ষা করেছেন, আর তা হলো ‘আনআনা’ (عنعنة)!









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6320)


(من قال حين يَنْصَرِفُ من صلاته: [باسمِ اللهِ] سبحان
الله العظيمِ وبِحَمْدِهٍِ، ولا حولَ ولا قوةَ إلا بالله ثلاثَ مراتٍ، قام
مغفوراً له) .
منكر.

أخرجه ابن أبي حاتم في `الجرح والتعديل` (2/4/375) - معلقاً
والزيادة له - ، وابن السني في `عمل اليوم والليلة` (45/126) ، والطبراني في
`الدعاء` (2/1136/732) من طريقين عن نصر بن علي: ثنا خلف بن عقبة، ثنا
أبو الزهراء خادم أنس بن مالك عن أنس بن مالك رضي الله عنه … مرفوعاً.
قلت: وهذا إسناد ضعيف، فيه مجهولان:
أبو الزهراء: ذكره ابن أبي حاتم، وساق له هذا الحديث، وقال:
` روى عنه خالد (!) بن عقبة القشيري`. ولم يزد!
قلت كذا وقع فيه: (خالد) … وهو خطأ مطبعي، فقد أورده على الصواب
في حرف الخاء، فقال:
`خلف بن عقبة القشيري، روى عن أبي الزهراء خادم أنس عن أنس، روى
عنه نصر بن علي الجهضمي `.
قلت فهو مجهول، لتفرد الجهضمي بالرواية عنه.
قلت: ومن الغريب أن المعلق على `الدعاء` لم يقف عليه! [فقد قال:]
`في إسناده خالد بن النضر - شيخ الطبراني - وخلف بن عقبة: لم أقف
عليهما`!!
قلت: أما خلف: فقد أوقفناك عليه في كتاب من أشهر وأقدم كتب الجرح
والتعديل. ومن الظاهر أن رجع إليه، فلم يقع بصره عليه.
وأما خالد بن النضر: فهو أبو يزيد القرشي البصري، روى له الطبراني في
`المعجم الصغير` (89 هندية، رقم 35 - `الروض النضير`) ، فالظاهر أنه من مشايخه
المجهولين، لقلة حديثه عنه، لكنه قد توبع - كما تقدمت الإشارة إلى ذلك - ، فهو
عند ابن السني عن شيخه محمد بن هارون الحضري، وهو ثقة حافظ مشهور،
أكثر عنه الطبراني.
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(যে ব্যক্তি তার সালাত শেষ করে ফিরে যাওয়ার সময় বলে: [বিসমিল্লাহ] সুবহানাল্লাহিল আযীম ওয়া বিহামদিহি, ওয়া লা হাওলা ওয়া লা কুওয়াতা ইল্লা বিল্লাহ – তিনবার, সে ক্ষমাপ্রাপ্ত হয়ে দাঁড়ায়।)
মুনকার।

এটি ইবনু আবী হাতিম তাঁর ‘আল-জারহু ওয়াত-তা’দীল’ গ্রন্থে (২/৪/৩৭৫) – মুআল্লাক্বভাবে এবং অতিরিক্ত অংশটি তাঁরই – এবং ইবনুস সুন্নী তাঁর ‘আমালুল ইয়াওমি ওয়াল-লাইলাহ’ গ্রন্থে (৪৫/১২৬), এবং ত্বাবারানী তাঁর ‘আদ-দুআ’ গ্রন্থে (২/১১৩৬/৭৩২) দুটি সূত্রে নাসর ইবনু আলী থেকে বর্ণনা করেছেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন খালাফ ইবনু উক্ববাহ, আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আবূয যাহরা আনাস ইবনু মালিকের খাদেম, তিনি আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে... মারফূ’ হিসেবে।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল)। এতে দুজন মাজহূল (অজ্ঞাত) রাবী আছেন:

আবূয যাহরা: তাঁকে ইবনু আবী হাতিম উল্লেখ করেছেন এবং তাঁর জন্য এই হাদীসটি বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেছেন: ‘তাঁর থেকে হাদীস বর্ণনা করেছেন খালিদ (!) ইবনু উক্ববাহ আল-কুশাইরী।’ তিনি এর বেশি কিছু বলেননি!

আমি বলি: এখানে এভাবেই (খালিদ) এসেছে... যা একটি মুদ্রণজনিত ভুল। কেননা তিনি (ইবনু আবী হাতিম) ‘খা’ (خ) অক্ষরের অধীনে এটিকে সঠিকভাবে উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন:

‘খালাফ ইবনু উক্ববাহ আল-কুশাইরী, তিনি আবূয যাহরা আনাসের খাদেম থেকে, তিনি আনাস থেকে হাদীস বর্ণনা করেছেন। তাঁর থেকে হাদীস বর্ণনা করেছেন নাসর ইবনু আলী আল-জাহযামী।’

আমি বলি: সুতরাং তিনি (খালাফ) মাজহূল (অজ্ঞাত), কারণ আল-জাহযামী এককভাবে তাঁর থেকে বর্ণনা করেছেন।

আমি বলি: আশ্চর্যের বিষয় হলো, ‘আদ-দুআ’ গ্রন্থের টীকাকার এই রাবীকে খুঁজে পাননি! [তিনি বলেছেন:] ‘এর সনদে খালিদ ইবনুন্ নাদ্ব্র – ত্বাবারানীর শায়খ – এবং খালাফ ইবনু উক্ববাহ আছেন: আমি তাদের দুজনের সন্ধান পাইনি’!!

আমি বলি: খালাফের ব্যাপারে, আমরা আপনাকে জারহ ওয়া তা’দীলের অন্যতম প্রসিদ্ধ ও প্রাচীন গ্রন্থে তাঁর সন্ধান দিয়েছি। স্পষ্টতই তিনি (টীকাকার) সেই গ্রন্থের দিকে ফিরেছিলেন, কিন্তু তাঁর দৃষ্টি তার উপর পড়েনি।

আর খালিদ ইবনুন্ নাদ্ব্র-এর ব্যাপারে: তিনি হলেন আবূ ইয়াযীদ আল-কুরাশী আল-বাসরী। ত্বাবারানী তাঁর ‘আল-মু’জামুস সাগীর’ গ্রন্থে (৮৯ হিন্দী, নং ৩৫ – ‘আর-রওদ্বুন্ নাদ্বীর’) তাঁর থেকে বর্ণনা করেছেন। সুতরাং স্পষ্টতই তিনি ত্বাবারানীর মাজহূল শায়খদের অন্তর্ভুক্ত, কারণ তিনি তাঁর থেকে কম হাদীস বর্ণনা করেছেন। তবে তিনি মুতাবাআত (সমর্থন) লাভ করেছেন – যেমনটি পূর্বে ইঙ্গিত করা হয়েছে – তিনি ইবনুস সুন্নীর নিকট তাঁর শায়খ মুহাম্মাদ ইবনু হারূন আল-হাযারী থেকে বর্ণিত হয়েছেন, আর তিনি (মুহাম্মাদ ইবনু হারূন) একজন সিক্বাহ (নির্ভরযোগ্য), হাফিয (স্মৃতিশক্তিধর) ও প্রসিদ্ধ রাবী, ত্বাবারানী তাঁর থেকে প্রচুর বর্ণনা করেছেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6321)


(إِذَا دَخَلَ أَحَدُكُمْ عَلَى أَخِيهِ الْمُسْلِمِ، فَأَطْعَمَهُ فَلْيَأْكُلْ
مِنْ طَعَامِهِ، وَلَا يَسْأَلْهُ عنه، وَإِنْ سَقَاهُ شَرَاباً، فَلْيَشْرَبْ مِنْ شَرَابِهِ وَلَا
يَسْأَلْهُ عَنْهُ، فَإِنْ خَشِىَ مِنْهُ، فَلْيَكْسِرْهُ بِالْمَاءِ) .
ضعيف بزيادة: (الخشية) .

أخرجه ابن الجعد في `مسنده` (2/10/3071) ،
ومن طريقه الدارقطين في `سننه` (4/258/65) ، وكذا ابن عدي في `الكامل`
(6/309) . قال ابن الجعد: أَخْبَرَني الزَّنْجِىُّ: أَخْبَرَني زَيْدُ بْنُ أَسْلَمَ [عَنْ سُمَىٍّ]
عَنْ أَبِى صَالِحٍ عَنْ أَبِى هُرَيْرَةَ … مرفوعاً.
قلت: وهذا إسناد ضعيف، وله علتان:
الأولى: الزنجي هذا - واسمه مسلم بن خالد المكي، وهو - : مختلف فيه،
والمتقرر فيه عند الحفاظ المتأخرين أنه صدوق سيئ الحفظ، ولذلك أورده الذهبي
في `الميزان`، وحكى أقوال الأئمة المختلفة فيه، وساق له بعض الأحاديث مما أنكر
عليه، ثم ختم عليه ترجمته بقوله:
`فهذه الأحاديث وأمثالها تُردُّ بها قوة الرجل ويُضَعَّف`. وقال في `الكاشف`:
`وثق، وضعفه أبو داود لكثرة غلطه `. وقال الحافظ في التقريب:
`صدوق كثير الأوهام `.
وقد ذكر ابن عدي في ترجمته أنه تفرد بروايته عن زيد بن أسلم، وقال:
وقد روي عن زيد بن أسلم عن أبيه عن أبي هريرة من رواية عبد الرحمن بن
زيد بن أسلم عن أبيه `.
قلت: ولم أقف على لفظ رواية عبد الرحمن هذا مع كونه ضعيفاً، وبعضهم
ضعفه جداً، وهو راوي حديث توسل آدم بالنبي صلى الله عليه وسلم، وقد تقدم في المجلد الأول
(25 - ح) .
وأما العلة الأخرى: فهي الاختلاف على الزنجي في الجملة الأخيرة من الحديث:
`فإن خشي منه، فليكسره بالماء`، فإن ابن عدي لم يذكرها في الحديث،
وكذلك أخرج الحديث جمع من الأئمة من طرق صحيحة عن الزنجي دونها.
وكذلك رواه ابن عجلان عن سعيد عن أبي هريرة دونها، ولذلك أخرجته في
`الصحيحة` (627) من رواية أحمد وغيره دونها.
ثم هي مفسدة للمعنى الظاهر من سياق الحديث. والله سبحانه وتعالى أعلم.
ثم رأيت لابن الجعد متابعاً عند الطحاوي في `شرح المعاني` (2/329) من
طريق أسد بن موسى قال: حدثنا مسلم بن خالد … به.
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(যখন তোমাদের কেউ তার মুসলিম ভাইয়ের কাছে প্রবেশ করে, আর সে তাকে খাবার দেয়, তখন সে যেন তার খাবার থেকে খায়, এবং সে যেন তাকে (খাবার সম্পর্কে) জিজ্ঞাসা না করে, আর যদি সে তাকে পানীয় পান করায়, তখন সে যেন তার পানীয় থেকে পান করে, এবং সে যেন তাকে (পানীয় সম্পর্কে) জিজ্ঞাসা না করে, যদি সে তা থেকে ভয় করে (সন্দেহ করে), তবে সে যেন তা পানি দ্বারা ভেঙ্গে দেয় (মিশ্রিত করে হালকা করে নেয়)।)

যঈফ (দুর্বল) এই অতিরিক্ত অংশটির কারণে: (ভয় করা/সন্দেহ করা)।

এটি ইবনুল জা'দ তার ‘মুসনাদ’ গ্রন্থে (২/১০/৩০৭১) বর্ণনা করেছেন, এবং তার সূত্রে দারাকুতনী তার ‘সুনান’ গ্রন্থে (৪/২৫৮/৬৫) বর্ণনা করেছেন, অনুরূপভাবে ইবনু আদী ‘আল-কামিল’ গ্রন্থে (৬/৩০৯) বর্ণনা করেছেন। ইবনুল জা'দ বলেছেন: আমাকে জানজিয়্যী খবর দিয়েছেন: আমাকে যায়দ ইবনু আসলাম [সুমাইয়্যি হতে] আবূ সালিহ হতে আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে... মারফূ' হিসেবে বর্ণনা করেছেন।

আমি (আল-আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল), এবং এতে দুটি ত্রুটি (ইল্লাত) রয়েছে:

প্রথমটি: এই জানজিয়্যী – যার নাম মুসলিম ইবনু খালিদ আল-মাক্কী, তার ব্যাপারে – মতভেদ রয়েছে। মুতাআখখিরীন (পরবর্তী যুগের) হাফিযগণ তার ব্যাপারে এই সিদ্ধান্তে পৌঁছেছেন যে, তিনি সাদূক (সত্যবাদী) কিন্তু তার মুখস্থশক্তি খারাপ (সাইয়্যি আল-হিফয)। এই কারণে যাহাবী তাকে ‘আল-মীযান’ গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন, এবং তার ব্যাপারে ইমামগণের বিভিন্ন উক্তি বর্ণনা করেছেন, এবং তার কিছু হাদীস উল্লেখ করেছেন যা তার উপর মুনকার (অস্বীকৃত) হিসেবে গণ্য করা হয়েছে। অতঃপর তিনি তার জীবনী শেষ করেছেন এই বলে:
‘এই হাদীসগুলো এবং এর অনুরূপ হাদীসগুলো দ্বারা লোকটির শক্তি খর্ব হয় এবং তাকে দুর্বল গণ্য করা হয়।’ আর তিনি ‘আল-কাশেফ’ গ্রন্থে বলেছেন: ‘তাকে বিশ্বস্ত বলা হয়েছে, কিন্তু আবূ দাঊদ তাকে তার অধিক ভুলের কারণে দুর্বল বলেছেন।’ আর হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আত-তাকরীব’ গ্রন্থে বলেছেন: ‘সাদূক (সত্যবাদী), কিন্তু তার অনেক ভুলভ্রান্তি রয়েছে (কাছীরুল আওহাম)।’

ইবনু আদী তার জীবনীতে উল্লেখ করেছেন যে, তিনি যায়দ ইবনু আসলাম হতে এককভাবে এটি বর্ণনা করেছেন, এবং তিনি বলেছেন: ‘এটি যায়দ ইবনু আসলাম হতে তার পিতা হতে আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে আব্দুর রহমান ইবনু যায়দ ইবনু আসলাম তার পিতা হতে বর্ণনা করেছেন।’

আমি (আল-আলবানী) বলি: এই আব্দুর রহমানের বর্ণনাটির শব্দ আমি পাইনি, যদিও তিনি যঈফ (দুর্বল), এবং কেউ কেউ তাকে খুবই দুর্বল বলেছেন। আর তিনিই সেই ব্যক্তি যিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মাধ্যমে আদম (আঃ)-এর তাওসসুলের হাদীসটি বর্ণনা করেছেন, যা প্রথম খণ্ডে (২৫ - হা) পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে।

আর দ্বিতীয় ত্রুটিটি হলো: হাদীসের শেষ বাক্যটি নিয়ে জানজিয়্যীর উপর মতভেদ রয়েছে: ‘যদি সে তা থেকে ভয় করে (সন্দেহ করে), তবে সে যেন তা পানি দ্বারা ভেঙ্গে দেয় (মিশ্রিত করে হালকা করে নেয়)’। কারণ ইবনু আদী হাদীসে এই অংশটি উল্লেখ করেননি। অনুরূপভাবে ইমামগণের একটি দল জানজিয়্যী হতে সহীহ সূত্রে এই অংশটি ছাড়াই হাদীসটি বর্ণনা করেছেন। অনুরূপভাবে ইবনু আজলান সাঈদ হতে আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে এই অংশটি ছাড়াই বর্ণনা করেছেন। এই কারণে আমি এটিকে ‘আস-সহীহাহ’ (৬২৭) গ্রন্থে আহমাদ ও অন্যান্যদের বর্ণনা হতে এই অংশটি ছাড়াই উল্লেখ করেছি।

উপরন্তু, এটি হাদীসের প্রেক্ষাপট থেকে প্রতীয়মান বাহ্যিক অর্থের জন্য ক্ষতিকর (বিপর্যয় সৃষ্টিকারী)। আর আল্লাহ সুবহানাহু ওয়া তাআলা সর্বাধিক অবগত।

অতঃপর আমি ইবনুল জা'দের জন্য আত-তাহাবী-এর ‘শারহুল মাআনী’ গ্রন্থে (২/৩২৯) আসাদ ইবনু মূসা-এর সূত্রে একটি মুতাবাআহ (সমর্থক বর্ণনা) দেখেছি। তিনি (আসাদ) বলেন: আমাদের কাছে মুসলিম ইবনু খালিদ... এই হাদীসটি বর্ণনা করেছেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6322)


(كان إذا رَفَعَ رأسَه إلى سَقْفِ البيتِ، قال: سبحانك اللهم
وبِحَمْدِك، أستَغْفِرُك وأتوبُ إليك. قالتْ عائشةُ: فسألتُه عنهن؟ فقال:
أُمِرْتُ بهن) .
منكر.

أخرجه الطبراني في `المعجم الأوسط` (2/150/1/7314) من طريق أحمد
بن المقدام العجلي: ثنا النضر بن أبي النضر عن عمرو بن عبد الجبار عن
الحكم بن عتيبة عن مسروق عن عائشة قالت: … فذكره. وقال:
«لم يروه عن الحكم إلا عمرو بن عبد الجبار، ولا عن عمرو إلا النضر بن أبي
النضر، تفرد به أبو الأشعث» .
قلت: وهو ثقة، وهو أحمد بن المقدام. لكن النضر بن أبي النضر: لم أجد له
ترجمة.
وعمرو بن عبد الجبار - الظاهر أنه السنجاري - : قال ابن عدي في `الكامل`
(5/141) :
`روى عن عمه عبيدة بن حسان مناكير `.
ثم ساق له عدة أحاديث عن عمه بأسانيد له، ثم قال:
`كلها غير محفوظة`.
والحديث أورده الهيثمي في `المجمع` (10/142) وقال:
`رواه الطبراني في `الأوسط`، وفيه من لم أعرفه `.
قلت والحديث صحيح دون رفع الرأس إلى السقف، كذلك رواه الشعبي عن
مسروق … أتم منه بنحوه، وفيه أن ذلك كان في آخر أمره.رواه مسلم وغيره. وهو
مخرج في `الصحيحة` (رقم 3175) .
ولعائشة حديث آخر: أنه كان يقول ذلك إذا ختم المجلس وقام منه، وهو المسمى
بكفارة المجلس، وقد خرجته أيضاً هناك (3164) .
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(তিনি যখন ঘরের ছাদের দিকে মাথা উঠাতেন, তখন বলতেন: “সুবহানাকা আল্লাহুম্মা ওয়া বিহামদিকা, আস্তাগফিরুকা ওয়া আতুবু ইলাইক।” [হে আল্লাহ! আপনার পবিত্রতা ঘোষণা করছি এবং আপনার প্রশংসা করছি। আমি আপনার কাছে ক্ষমা চাই এবং আপনার দিকে প্রত্যাবর্তন করি।] আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি তাঁকে এই বাক্যগুলো সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম? তিনি বললেন: “আমাকে এগুলো বলার নির্দেশ দেওয়া হয়েছে।”)
মুনকার।

এটি ত্বাবারানী তাঁর ‘আল-মু’জামুল আওসাত্ব’ (২/১৫০/১/৭৩১৪) গ্রন্থে আহমাদ ইবনুল মিকদাম আল-ইজলী-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন: তিনি (আহমাদ) বলেন, আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন আন-নাদর ইবনু আবী আন-নাদর, তিনি আমর ইবনু আব্দুল জাব্বার থেকে, তিনি আল-হাকাম ইবনু উতাইবাহ থেকে, তিনি মাসরূক থেকে, তিনি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন যে, তিনি (আয়েশা) বলেছেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেছেন।
আর তিনি (ত্বাবারানী) বলেছেন: “আল-হাকাম থেকে আমর ইবনু আব্দুল জাব্বার ব্যতীত অন্য কেউ এটি বর্ণনা করেননি, আর আমর থেকে আন-নাদর ইবনু আবী আন-নাদর ব্যতীত অন্য কেউ বর্ণনা করেননি। আবূল আশ’আস এটি এককভাবে বর্ণনা করেছেন।”

আমি (আল-আলবানী) বলি: আর তিনি (আবূল আশ’আস) নির্ভরযোগ্য, আর তিনি হলেন আহমাদ ইবনুল মিকদাম। কিন্তু আন-নাদর ইবনু আবী আন-নাদর: আমি তার জীবনী খুঁজে পাইনি।
আর আমর ইবনু আব্দুল জাব্বার – স্পষ্টতই তিনি আস-সিনজারী – : ইবনু আদী ‘আল-কামিল’ (৫/১৪১) গ্রন্থে বলেছেন:
“তিনি তাঁর চাচা উবাইদাহ ইবনু হাসসান থেকে মুনকার (অস্বীকৃত) হাদীসসমূহ বর্ণনা করেছেন।”
অতঃপর তিনি (ইবনু আদী) তার (আমরের) জন্য তার চাচার সূত্রে কয়েকটি হাদীস উল্লেখ করেছেন, যার সনদগুলো তার কাছে ছিল, অতঃপর বলেছেন:
“এগুলোর সবগুলোই অসংরক্ষিত (গ্রহণযোগ্য নয়)।”
আর এই হাদীসটি হাইসামী ‘আল-মাজমা’ (১০/১৪২) গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন:
“এটি ত্বাবারানী ‘আল-আওসাত্ব’-এ বর্ণনা করেছেন, আর এতে এমন বর্ণনাকারী রয়েছে যাকে আমি চিনি না।”
আমি বলি: আর হাদীসটি ছাদের দিকে মাথা উঠানো অংশটুকু ব্যতীত সহীহ। অনুরূপভাবে এটি শা’বী মাসরূক থেকে বর্ণনা করেছেন... এর চেয়েও পূর্ণাঙ্গভাবে, এবং এতে রয়েছে যে এটি তাঁর (নবীজির) জীবনের শেষ দিকে ছিল। এটি মুসলিম এবং অন্যান্যরা বর্ণনা করেছেন। আর এটি ‘আছ-ছহীহাহ’ (নং ৩১৭৫)-এ সংকলিত হয়েছে।
আর আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর আরেকটি হাদীস রয়েছে: যে তিনি (নবীজি) যখন মজলিস শেষ করতেন এবং সেখান থেকে উঠতেন, তখন এই দু’আটি বলতেন। আর এটি ‘কাফফারাতুল মাজলিস’ (মজলিসের কাফফারা) নামে পরিচিত। আমি এটিও সেখানে (৩১৬৪) সংকলন করেছি।