ইরওয়াউল গালীল
*788* - (قوله صلى الله عليه وسلم: ` ابتغوا فى أموال اليتامى كيلا تأكله الزكاة `. رواه الترمذى ، وروى موقوفا على عمر.
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف.
أخرجه الترمذى (1/125) والدارقطنى (ص 206) والبيهقى (4/107) من طريق المثنى بن الصباح عن عمرو بن شعيب عن أبيه عن جده أن النبى صلى الله عليه وسلم خطب الناس فقال: ` ألا من ولى يتيما له مال فليتجر فيه ولا يتركه حتى تأكله الصدقة `.
وقال الترمذى: ` فى إسناده مقال ، لأن المثنى بن الصباح يضعف فى الحديث `.
قلت: وقد تابعه محمد بن عبيد الله عن عمرو به.
أخرجه الدارقطنى (207) ، ومحمد بن عبيد الله هو العزرمي [1] وهو متروك كما فى ` التقريب ` و` التلخيص ` (ص 176) وتابعه أيضا عبد الله بن على أبو أيوب الأفريقى.
أخرجه الجرجانى فى ` تاريخ جرجان ` (126 ـ 127 ، 455) وكذا ابن عدى كما فى ` التلخيص ` وقال: ` وهو ضعيف `.
وتابعه أبو إسحاق الشيبانى وهو ثقة ، لكن الراوى عنه مندل.
أخرجه الدارقطنى. ومندل هو ابن على العنزى وهو ضعيف أيضا.
وخالفهم جميعا حسين المعلم فقال: عن عمرو بن شعيب عن سعيد بن المسيب أن عمر بن الخطاب قال: ` ابتغوا بأموال اليتامى لا تأكلها الصدقة `.
أخرجه الدارقطنى والبيهقى وقال: ` هذا إسناد صحيح ، وله شواهد عن عمر رضى الله عنه `.
قلت: ورواه ابن أبى شيبة (4/25) من طريق الزهرى ومكحول عن عمر.
والشافعى (1/235) عن يوسف بن ماهك أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: ` ابتغوا فى مال اليتيم أو فى مال اليتامى لا تذهبها أو لا تستأصلها الصدقة `.
وهذا مرسل ، ورجاله ثقات لولا أن فيه عنعنة ابن جريج.
وفى الباب عن أنس بن مالك يرويه الطبرانى فى ` المعجم الأوسط ` (1/85/2) : حدثنا على بن سعيد حدثنا الفرات بن محمد القيروانى حدثنا شجرة بن عيسى المعافرى عن عبد الملك بن أبى كريمة عن عمارة بن غزية عن يحيى بن سعيد عنه مرفوعا بلفظ: ` اتجروا فى مال اليتامى لا تأكلها الزكاة `.
وقال الطبرانى: ` لا يروى عن أنس إلا بهذا الإسناد `.
قلت: وهو واهٍجدا آفته الفرات هذا أورده الحافظ فى ` اللسان `
وقال: ` قال ابن حارث كان يغلب عليه الرواية والجمع ومعرفة الأخبار ، وكان ضعيفا متهما بالكذب `.
ومن ذلك تعلم ما فى قول الهيثمى (3/67) : ` وأخبرنى سيدى وشيخى: أن إسناده صحيح ` من البعد عن الحقيقة. ولعل شيخه (وهو الحافظ العراقى) لم يستحضر حال هذا الرجل ، أو توهم أنه غيره.
(৭৮৮) - (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বাণী: ‘তোমরা ইয়াতীমদের সম্পদে ব্যবসা করো, যাতে যাকাত তা খেয়ে না ফেলে।’ এটি তিরমিযী বর্ণনা করেছেন এবং এটি উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উপর মাওকুফ (তাঁর নিজস্ব উক্তি হিসেবে) হিসেবেও বর্ণিত হয়েছে।)
শাইখ নাসিরুদ্দিন আল-আলবানী কর্তৃক তাহক্বীক্ব: * যঈফ (দুর্বল)।
এটি তিরমিযী (১/১২৫), দারাকুতনী (পৃ. ২০৬) এবং বাইহাক্বী (৪/১০৭) মুসান্না ইবনুস সাব্বাহ-এর সূত্রে, তিনি আমর ইবনু শুআইব থেকে, তিনি তাঁর পিতা থেকে, তিনি তাঁর দাদা থেকে বর্ণনা করেন যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) লোকদের উদ্দেশ্যে ভাষণ দিলেন এবং বললেন: ‘সাবধান! যে ব্যক্তি কোনো ইয়াতীমের অভিভাবক হয়, যার সম্পদ আছে, সে যেন তা দিয়ে ব্যবসা করে এবং তাকে যেন ফেলে না রাখে, যাতে সাদাকাহ (যাকাত) তা খেয়ে ফেলে।’
আর তিরমিযী বলেছেন: ‘এর ইসনাদে (সনদে) দুর্বলতা রয়েছে, কারণ মুসান্না ইবনুস সাব্বাহ হাদীসের ক্ষেত্রে দুর্বল বলে গণ্য।’
আমি (আলবানী) বলছি: তাকে (মুসান্নাকে) মুহাম্মাদ ইবনু উবাইদুল্লাহও আমর (ইবনু শুআইব)-এর সূত্রে অনুসরণ করেছেন। এটি দারাকুতনী (২০৭) বর্ণনা করেছেন। আর মুহাম্মাদ ইবনু উবাইদুল্লাহ হলেন আল-আযরামী [১] এবং তিনি মাতরূক (পরিত্যক্ত), যেমনটি ‘আত-তাক্বরীব’ এবং ‘আত-তালখীস’ (পৃ. ১৭৬)-এ উল্লেখ আছে। তাকে আব্দুল্লাহ ইবনু আলী আবূ আইয়ূব আল-আফরীক্বীও অনুসরণ করেছেন।
এটি আল-জুরজানী ‘তারীখু জুরজান’ (১২৬-১২৭, ৪৫৫)-এ বর্ণনা করেছেন। অনুরূপভাবে ইবনু আদীও বর্ণনা করেছেন, যেমনটি ‘আত-তালখীস’-এ আছে। আর তিনি (ইবনু আদী) বলেছেন: ‘তিনি (আব্দুল্লাহ ইবনু আলী) দুর্বল।’
আর তাকে আবূ ইসহাক্ব আশ-শাইবানীও অনুসরণ করেছেন, যিনি সিক্বাহ (নির্ভরযোগ্য)। কিন্তু তাঁর থেকে বর্ণনাকারী হলেন মানদাল। এটি দারাকুতনী বর্ণনা করেছেন। আর মানদাল হলেন ইবনু আলী আল-আনযী এবং তিনিও দুর্বল।
আর হুসাইন আল-মুআল্লিম তাদের সকলের বিরোধিতা করেছেন এবং বলেছেন: আমর ইবনু শুআইব থেকে, তিনি সাঈদ ইবনুল মুসাইয়্যাব থেকে যে, উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: ‘তোমরা ইয়াতীমদের সম্পদ দিয়ে ব্যবসা করো, যাতে সাদাকাহ (যাকাত) তা খেয়ে না ফেলে।’
এটি দারাকুতনী ও বাইহাক্বী বর্ণনা করেছেন। আর তিনি (বাইহাক্বী) বলেছেন: ‘এই ইসনাদ সহীহ (বিশুদ্ধ), এবং উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এর শাওয়াহিদ (সমর্থক বর্ণনা) রয়েছে।’
আমি বলছি: ইবনু আবী শাইবাহ (৪/২৫) এটি যুহরী এবং মাকহূলের সূত্রে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন।
আর শাফিঈ (১/২৩৫) ইউসুফ ইবনু মাহাক থেকে বর্ণনা করেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ‘তোমরা ইয়াতীমের সম্পদে অথবা ইয়াতীমদের সম্পদে ব্যবসা করো, যাতে সাদাকাহ (যাকাত) তা নিঃশেষ করে না দেয় বা তা সমূলে বিনাশ না করে।’
আর এটি মুরসাল। এর বর্ণনাকারীগণ সিক্বাহ, যদি না এতে ইবনু জুরাইজ-এর ‘আনআনাহ’ (অস্পষ্ট বর্ণনা) না থাকত।
এই বিষয়ে আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও বর্ণনা রয়েছে। এটি তাবারানী ‘আল-মু’জামুল আওসাত্ব’ (১/৮৫/২)-এ বর্ণনা করেছেন: আলী ইবনু সাঈদ আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, তিনি ফুরাত ইবনু মুহাম্মাদ আল-ক্বাইরাওয়ানী থেকে, তিনি শাজারা ইবনু ঈসা আল-মাআফিরী থেকে, তিনি আব্দুল মালিক ইবনু আবী কারীমা থেকে, তিনি উমারাহ ইবনু গাযিয়্যাহ থেকে, তিনি ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদ থেকে, তিনি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উক্তি হিসেবে) হিসেবে এই শব্দে বর্ণনা করেছেন: ‘তোমরা ইয়াতীমদের সম্পদে ব্যবসা করো, যাতে যাকাত তা খেয়ে না ফেলে।’
আর তাবারানী বলেছেন: ‘আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এই ইসনাদ ছাড়া আর কোনো সূত্রে এটি বর্ণিত হয়নি।’
আমি বলছি: আর এটি অত্যন্ত দুর্বল (ওয়াহী জিদ্দান)। এর ত্রুটি হলো এই ফুরাত। হাফিয (ইবনু হাজার) তাকে ‘আল-লিসান’ গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন: ‘ইবনু হারিস বলেছেন, তার উপর বর্ণনা, সংকলন এবং সংবাদ জানার প্রবণতা প্রবল ছিল, কিন্তু তিনি দুর্বল এবং মিথ্যার অভিযোগে অভিযুক্ত ছিলেন।’
এর থেকে তুমি জানতে পারো যে, হাইসামী (৩/৬৭)-এর এই উক্তিটি সত্য থেকে কত দূরে: ‘আমার সাইয়্যিদ ও শাইখ আমাকে জানিয়েছেন যে, এর ইসনাদ সহীহ।’ সম্ভবত তাঁর শাইখ (যিনি হাফিয আল-ইরাক্বী) এই লোকটির (ফুরাতের) অবস্থা স্মরণ করতে পারেননি, অথবা তিনি ভুলবশত মনে করেছেন যে, সে অন্য কেউ।
*789* - (قال عثمان بمحضر من الصحابة: ` هذا شهر زكاتكم فمن كان عليه دين فليؤده حتى تخرجوا زكاة أموالكم ` رواه أبو عبيد (ص 184) .
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح.
أخرجه مالك (1/253/17) : عن ابن شهاب عن السائب بن يزيد أن عثمان بن عفان كان يقول: فذكره إلا أنه قال: ` حتى تحصل أموالكم فتؤدون منه الزكاة `.
وهذا سند صحيح.
ومن طريق مالك رواه الشافعى (1/237) والبيهقى (4/148) عنه.
ورواه ابن أبى شيبة (4/48) عن ابن عيينة عن الزهرى به إلا أنه قال: ` فليقضه ، وزكوا بقية أموالكم `.
ورواه البيهقى (4/148) من طريق شعيب عن الزهرى قال أخبرنى السائب بن يزيد أنه سمع عثمان بن عفان رضى الله عنه خطيبا على منبر رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: هذا شهر زكاتكم ـ ولم يسم لى السائب الشهر ولم أسأله عنه ـ قال: فقال عثمان: فمن كان عليه دين فليقض دينه حتى تخلص أموالكم فتؤدوا منها الزكاة `. وقال: ` رواه البخارى فى الصحيح `.
قلت: ولم أره فيه.
*৭৮৯* - (উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাহাবীগণের উপস্থিতিতে বললেন: ‘এটি তোমাদের যাকাতের মাস। সুতরাং যার উপর ঋণ আছে, সে যেন তা পরিশোধ করে দেয়, যাতে তোমরা তোমাদের সম্পদের যাকাত বের করতে পারো।’ এটি বর্ণনা করেছেন আবূ উবাইদ (পৃ. ১৮৪)।
শাইখ নাসিরুদ্দীন আল-আলবানী’র তাহক্বীক্ব: * সহীহ।
এটি বর্ণনা করেছেন মালিক (১/২৫৩/১৭): ইবনু শিহাব থেকে, তিনি সা’ইব ইবনু ইয়াযীদ থেকে যে, উসমান ইবনু আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলতেন। অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেছেন, তবে তিনি বলেছেন: ‘...যাতে তোমাদের সম্পদ প্রস্তুত হয় এবং তোমরা তা থেকে যাকাত আদায় করতে পারো।’ আর এই সনদটি সহীহ।
মালিকের সূত্রে এটি বর্ণনা করেছেন শাফিঈ (১/২৩৭) এবং বাইহাক্বী (৪/১৪৮) তাঁর থেকে।
আর এটি বর্ণনা করেছেন ইবনু আবী শাইবাহ (৪/৪৮) ইবনু উয়াইনাহ থেকে, তিনি যুহরী সূত্রে অনুরূপ, তবে তিনি বলেছেন: ‘সে যেন তা পরিশোধ করে দেয়, আর তোমরা তোমাদের অবশিষ্ট সম্পদের যাকাত দাও।’
আর এটি বর্ণনা করেছেন বাইহাক্বী (৪/১৪৮) শুআইব-এর সূত্রে, তিনি যুহরী থেকে। যুহরী বলেন: সা’ইব ইবনু ইয়াযীদ আমাকে জানিয়েছেন যে, তিনি উসমান ইবনু আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মিম্বরে দাঁড়িয়ে খুতবা দিতে শুনেছেন, তিনি বলছিলেন: ‘এটি তোমাদের যাকাতের মাস’— সা’ইব আমার কাছে মাসটির নাম উল্লেখ করেননি এবং আমিও তাঁকে জিজ্ঞেস করিনি— যুহরী বলেন: অতঃপর উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ‘সুতরাং যার উপর ঋণ আছে, সে যেন তার ঋণ পরিশোধ করে দেয়, যাতে তোমাদের সম্পদ মুক্ত হয়ে যায় এবং তোমরা তা থেকে যাকাত আদায় করতে পারো।’
আর তিনি (বাইহাক্বী) বলেছেন: ‘এটি বুখারী তাঁর সহীহ গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন।’ আমি (আলবানী) বলি: আমি এটি তাতে দেখিনি।
*790* - (حديث: ` … فدين الله أحق بالوفاء … ` (ص 185) .
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح.
أخرجه البخارى (1/464 ، 4/431) والبيهقى (4/335) عن سعيد بن جبير عن ابن عباس: ` أن امرأة جاءت إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالت: إن أمى نذرت أن تحج فماتت قبل أن تحج ، أفأحج عنها؟ قال: نعم فحجى عنها ، أرأيت لو كان على أمك دين أكنت قاضيته؟ قالت: نعم قال: اقضوا الله ، فإن الله أحق بالوفاء `.
وأخرجه النسائى (2/4) والدارمى (2/24) وأحمد (1/239 ـ 240) إلا أنهما قالا: ` أن امرأة نذرت أن تحج فماتت ، فأتى أخوها النبى صلى الله عليه وسلم فسأل عن ذلك ، فقال: أرأيت.. `.
وفى أخرى لأحمد (1/345) : ` جاء رجل إلى النبى صلى الله عليه وسلم فقال: إن أختى نذرت أن تحج وقد ماتت.. `.
وهو رواية للبخارى (4/275) وابن الجارود (250) .
وفى رواية أخرى عن سعيد بن جبير عنه: ` إن امرأة أتت رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالت: إن أمى ماتت وعليها صوم شهر ، فقال: أرأيت لو كان عليها دين أكنت تقضيه؟ قالت: نعم ، قال: فدين الله أحق بالقضاء `.
أخرجه مسلم (3/155 ، 156) وأحمد (1/224 و227 و258 و362) . ورواه ابن ماجه (1758) عن سعيد بن جبير وعطاء ومجاهد عن ابن عباس به إلا أنه قال:
` وعليها صيام شهرين متتابعين `.
وليس الحديث مضطربا كما يبدو لأول وهلة من الاختلاف فى النذر هل هو الحج أو الصوم ، فإن الواقع أنهما قضيتان سألت عنهما المرأة ، فروى بعض الرواة إحداهما ، وبعضهم الأخرى ، بدليل حديث عبد الله بن بريدة عن أبيه رضى الله عنه قال: ` بينا أنا جالس عند رسول الله صلى الله عليه وسلم إذ أتته امرأة ، فقالت: إنى تصدقت على أمى بجارية ، وإنها ماتت ، قال: فقال: وجب أجرك ، وردها عليك الميراث ، قالت يا رسول الله إنه كان عليها صوم شهر (وفى رواية: شهرين) أفأصوم عنها؟ قال: صومى عنها ، قالت: إنها لم تحج قط أفأحج عنها؟ قال: حجى عنها `
أخرجه مسلم (3/156 ، 157) وأحمد (5/349 و351 و359) .
وهذه المرأة السائلة ، هى غير الخثعمية التى سألت عن أبيها صباح يوم النحر ، وقد روى قصتها ابن عباس أيضا ، وعنه سليمان بن يسار قال: ` كان الفضل بن عباس رديف رسول الله صلى الله عليه وسلم فجاءته امرأة من خثعم تستفتيه ، فجاء [1] الفضل ينظر إليها ، وتنظر إليه ، فجعل رسول الله صلى الله عليه وسلم يصرف وجه الفضل إلى الشق الآخر، قالت: يا رسول الله! إن فريضة الله على عباده فى الحج أدركت أبى شيخا كبيرا ، لا يستطيع أن يثبت على الراحلة أفأحج عنه؟ قال: نعم ، وذلك فى حجة الوداع`.
أخرجه البخارى (1/464 و4/172) ومسلم (4/101) ومالك (1/359/97) والشافعى (1/287) وأبو داود (1809) والنسائى (1/4 و5) والترمذى (1/174) وابن ماجه (2909) والدارمى (2/39 ـ 40 و41) والبيهقى (4/328) وأحمد (1/212 و359) وزاد هو والدارمى وابن ماجه: ` نعم فإنه لو كان على أبيك دين قضيته ` وإسنادها صحيح. وزاد النسائى وابن الجارود:
` غداة النحر ` وسندها صحيح أيضا.
ورواه نافع بن جبير عن عبد الله بن عباس: ` أن امرأة من خثعم جاءت النبى صلى الله عليه وسلم فقالت: يا رسول الله إن أبى شيخ كبير قد أفند ، وأدركته فريضة الله على عباده فى الحج ، ولا يستطيع أداءها ، فهل يجزىء عنه أن أؤديها عنه؟ قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: نعم ` أخرجه ابن ماجه (2907) وسنده حسن.
وثم قصة ثالثة يرويها موسى بن سلمة عن ابن عباس قال: ` أمرت امرأة سلمان بن عبد الله الجهنى أن يسأل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن أمها توفيت ولم تحج ، أيجزىء عنها أن تحج عنها؟ فقال النبى صلى الله عليه وسلم: أرأيت لو كان على أمها دين فقضته عنها أكان يجزىء عن أمها؟ قال: فلتحجج عن أمها ، وسأله عن ماء البحر؟ فقال: ماء البحر طهور `.
أخرجه أحمد (1/279) بسند صحيح.
باب زكاة السائمة
*৭৯০* - (হাদীস: `...সুতরাং আল্লাহর ঋণ পরিশোধের অধিক হকদার...` (পৃ. ১৮৫)।
শাইখ নাসিরুদ্দীন আল-আলবানী কর্তৃক তাহক্বীক্ব: * সহীহ।
এটি বুখারী (১/৪৬৪, ৪/৪৩১) এবং বাইহাক্বী (৪/৩৩৫) সাঈদ ইবনু জুবাইর (রাহিমাহুল্লাহ) সূত্রে ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন যে, এক মহিলা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট এসে বললেন: আমার মা হজ্জ করার মানত করেছিলেন, কিন্তু হজ্জ করার আগেই তিনি মারা গেছেন। আমি কি তার পক্ষ থেকে হজ্জ করব? তিনি বললেন: হ্যাঁ, তুমি তার পক্ষ থেকে হজ্জ করো। তুমি কি মনে করো না যে, যদি তোমার মায়ের উপর ঋণ থাকতো, তবে কি তুমি তা পরিশোধ করতে? মহিলা বললেন: হ্যাঁ। তিনি বললেন: আল্লাহর ঋণ পরিশোধ করো, কারণ আল্লাহই পরিশোধের অধিক হকদার।
আর এটি নাসাঈ (২/৪), দারিমী (২/২৪) এবং আহমাদ (১/২৩৯-২৪০) বর্ণনা করেছেন। তবে তারা বলেছেন: এক মহিলা হজ্জ করার মানত করেছিল, অতঃপর সে মারা গেল। তখন তার ভাই নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট এসে এ বিষয়ে জিজ্ঞাসা করল। তিনি বললেন: তুমি কি মনে করো না যে...।
আহমাদ-এর অন্য একটি বর্ণনায় (১/৩৪৫) এসেছে: এক ব্যক্তি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট এসে বলল: আমার বোন হজ্জ করার মানত করেছিল, কিন্তু সে মারা গেছে...।
এটি বুখারী (৪/২৭৫) এবং ইবনু জারূদ-এরও (২৫০) বর্ণনা।
সাঈদ ইবনু জুবাইর (রাহিমাহুল্লাহ) সূত্রে ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে অন্য একটি বর্ণনায় এসেছে: এক মহিলা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট এসে বললেন: আমার মা মারা গেছেন, আর তার উপর এক মাসের সওম (রোযা) ছিল। তিনি বললেন: তুমি কি মনে করো না যে, যদি তার উপর ঋণ থাকতো, তবে কি তুমি তা পরিশোধ করতে? মহিলা বললেন: হ্যাঁ। তিনি বললেন: সুতরাং আল্লাহর ঋণ পরিশোধের অধিক হকদার।
এটি মুসলিম (৩/১৫৫, ১৫৬) এবং আহমাদ (১/২২৪, ২২৭, ২৫৮ ও ৩৬২) বর্ণনা করেছেন। আর ইবনু মাজাহ (১৭৫৮) এটি সাঈদ ইবনু জুবাইর, আতা ও মুজাহিদ (রাহিমাহুল্লাহ) সূত্রে ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন, তবে তিনি বলেছেন: `আর তার উপর পরপর দুই মাসের সওম ছিল।`
হাদীসটি 'মুদ্বতারিব' (অস্থির/বিপরীতমুখী) নয়, যেমনটি প্রথম দেখায় মানতের ভিন্নতার কারণে মনে হতে পারে যে, তা কি হজ্জ নাকি সওম। বাস্তবতা হলো, মহিলাটি দুটি ভিন্ন বিষয়ে জিজ্ঞাসা করেছিলেন। ফলে কিছু বর্ণনাকারী একটি বর্ণনা করেছেন এবং কিছু বর্ণনাকারী অন্যটি বর্ণনা করেছেন। এর প্রমাণ হলো আব্দুল্লাহ ইবনু বুরাইদাহ (রাহিমাহুল্লাহ) কর্তৃক তার পিতা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত হাদীস। তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট বসে ছিলাম, এমন সময় এক মহিলা তার নিকট এসে বললেন: আমি আমার মায়ের জন্য একটি দাসী সাদকা করেছিলাম, কিন্তু তিনি মারা গেছেন। তিনি বললেন: তোমার সওয়াব ওয়াজিব হয়েছে, আর মীরাস (উত্তরাধিকার) তা তোমার কাছে ফিরিয়ে দিয়েছে। মহিলা বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! তার উপর এক মাসের সওম (অন্য বর্ণনায়: দুই মাসের) ছিল, আমি কি তার পক্ষ থেকে সওম পালন করব? তিনি বললেন: তুমি তার পক্ষ থেকে সওম পালন করো। মহিলা বললেন: তিনি কখনো হজ্জ করেননি, আমি কি তার পক্ষ থেকে হজ্জ করব? তিনি বললেন: তুমি তার পক্ষ থেকে হজ্জ করো।
এটি মুসলিম (৩/১৫৬, ১৫৭) এবং আহমাদ (৫/৩৪৯, ৩৫১ ও ৩৫৯) বর্ণনা করেছেন।
এই প্রশ্নকারী মহিলা সেই খাসআম গোত্রের মহিলা নন, যিনি নহরের দিন সকালে তার পিতা সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করেছিলেন। ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও তার ঘটনা বর্ণনা করেছেন। তার থেকে সুলাইমান ইবনু ইয়াসার (রাহিমাহুল্লাহ) বর্ণনা করেন: ফাদল ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের পিছনে সওয়ারীতে উপবিষ্ট ছিলেন। তখন খাসআম গোত্রের এক মহিলা তাঁর নিকট ফাতওয়া (বিধান) জিজ্ঞাসা করতে এলেন। ফাদল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার দিকে তাকাতে লাগলেন এবং সেও তার দিকে তাকাতে লাগল। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ফাদল-এর মুখ অন্য দিকে ঘুরিয়ে দিলেন। মহিলা বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আল্লাহর পক্ষ থেকে বান্দাদের উপর হজ্জের যে ফরয বিধান, তা আমার পিতাকে এমন বৃদ্ধ অবস্থায় পেয়েছে যে, তিনি সওয়ারীর উপর স্থির থাকতে পারেন না। আমি কি তার পক্ষ থেকে হজ্জ করব? তিনি বললেন: হ্যাঁ। আর এটি ছিল বিদায় হজ্জের সময়।
এটি বুখারী (১/৪৬৪ ও ৪/১৭২), মুসলিম (৪/১০১), মালিক (১/৩৫৯/৯৭), শাফিঈ (১/২৮৭), আবূ দাঊদ (১৮০৯), নাসাঈ (১/৪ ও ৫), তিরমিযী (১/১৭৪), ইবনু মাজাহ (২৯০৯), দারিমী (২/৩৯-৪০ ও ৪১), বাইহাক্বী (৪/৩২৮) এবং আহমাদ (১/২১২ ও ৩৫৯) বর্ণনা করেছেন। আহমাদ, দারিমী ও ইবনু মাজাহ অতিরিক্ত বর্ণনা করেছেন: `হ্যাঁ, কারণ তোমার পিতার উপর যদি ঋণ থাকতো, তবে তুমি তা পরিশোধ করতে।` আর এর ইসনাদ (বর্ণনাসূত্র) সহীহ। নাসাঈ ও ইবনু জারূদ অতিরিক্ত বর্ণনা করেছেন: `কুরবানীর দিনের সকালে।` আর এর সনদও সহীহ।
আর নাফি' ইবনু জুবাইর (রাহিমাহুল্লাহ) আব্দুল্লাহ ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন: খাসআম গোত্রের এক মহিলা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট এসে বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমার পিতা অতিশয় বৃদ্ধ হয়ে গেছেন এবং আল্লাহর পক্ষ থেকে বান্দাদের উপর হজ্জের ফরয বিধান তাকে এমন অবস্থায় পেয়েছে যে, তিনি তা আদায় করতে সক্ষম নন। আমি কি তার পক্ষ থেকে তা আদায় করলে যথেষ্ট হবে? রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: হ্যাঁ। এটি ইবনু মাজাহ (২৯০৭) বর্ণনা করেছেন এবং এর সনদ হাসান।
এরপর তৃতীয় আরেকটি ঘটনা রয়েছে, যা মূসা ইবনু সালামাহ (রাহিমাহুল্লাহ) ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: এক মহিলা সালমান ইবনু আব্দুল্লাহ আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে নির্দেশ দিলেন যেন তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট তার মা সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করেন, যিনি হজ্জ না করেই মারা গেছেন। তার পক্ষ থেকে হজ্জ করলে কি যথেষ্ট হবে? তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: তুমি কি মনে করো না যে, যদি তার মায়ের উপর ঋণ থাকতো এবং সে তা পরিশোধ করতো, তবে কি তার মায়ের জন্য যথেষ্ট হতো? তিনি বললেন: সুতরাং সে যেন তার মায়ের পক্ষ থেকে হজ্জ করে। আর তিনি তাঁকে সমুদ্রের পানি সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলেন। তিনি বললেন: সমুদ্রের পানি পবিত্রকারী (পবিত্র)।
এটি আহমাদ (১/২৭৯) সহীহ সনদসহ বর্ণনা করেছেন।
সায়িমা (বিচরণশীল) পশুর যাকাত অধ্যায়।
*791* - (حديث بهز بن حكيم عن أبيه عن جده مرفوعا: ` فى كل إبل سائمة فى كل أربعين ابنة لبون ` رواه أحمد وأبو داود والنسائى.
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * حسن.
أخرجه أبو داود (1575) والنسائى (1/335 ـ 336 و339) وفى ` الكبرى ` (2/2 و3/1) والدارمى (1/396) وابن أبى شيبة (4/10) وابن الجارود (174) والحاكم (1/398) والبيهقى (4/105) وأحمد (4/2 و4) من طرق عن بهز به ، وتمامه:
` لا يفرق إبل عن حسابها ، من أعطاها مؤتجرا فله أجرها ، ومن أبى فإنا آخذوها وشطر ماله ، عزمة عن عزمات ربنا ، لا يحل لآل محمد صلى الله عليه وسلم منها شيئا `.
وقال الحاكم: ` صحيح الإسناد `. ووافقه الذهبى.
قلت: وإنما هو حسن للخلاف المعروف فى بهز بن حكيم.
৭৯১ - (বাহয ইবনু হাকীম তাঁর পিতা থেকে, তিনি তাঁর দাদা থেকে মারফূ' সূত্রে বর্ণিত হাদীস: ‘প্রত্যেক বিচরণশীল উটের (যাকাত) চল্লিশটিতে একটি ‘ইবনাতু লাবূন’ (দুই বছর পূর্ণ করে তিন বছরে পদার্পণকারী মাদী উট)।’ এটি বর্ণনা করেছেন আহমাদ, আবূ দাঊদ এবং নাসাঈ।)
শাইখ নাসিরুদ্দীন আল-আলবানী কর্তৃক তাহক্বীক্ব (পর্যালোচনা): * হাসান (Hasan)।
এটি সংকলন করেছেন আবূ দাঊদ (১৫৭৫), নাসাঈ (১/৩৩৫-৩৩৬ ও ৩৩৯) এবং তাঁর ‘আল-কুবরা’ গ্রন্থে (২/২ ও ৩/১), দারিমী (১/৩৯৬), ইবনু আবী শাইবাহ (৪/১০), ইবনু আল-জারূদ (১৭৪), আল-হাকিম (১/৩৯৮), আল-বায়হাক্বী (৪/১০৫) এবং আহমাদ (৪/২ ও ৪) – বাহয (ইবনু হাকীম) থেকে বিভিন্ন সূত্রে। এবং এর পূর্ণাঙ্গ পাঠ হলো:
‘উটের হিসাব থেকে (যাকাত দেওয়ার সময়) সেগুলোকে পৃথক করা যাবে না (অর্থাৎ কম করার জন্য ভাগ করা যাবে না)। যে ব্যক্তি সওয়াবের আশায় তা প্রদান করবে, সে তার প্রতিদান পাবে। আর যে অস্বীকার করবে, আমরা তা (যাকাত) গ্রহণ করব এবং তার সম্পদের অর্ধেকও (শাস্তিস্বরূপ) গ্রহণ করব। এটি আমাদের রবের পক্ষ থেকে সুনির্ধারিত বিধানসমূহের মধ্যে একটি সুনির্ধারিত বিধান। মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরিবারের জন্য এর (যাকাতের) কোনো অংশই হালাল নয়।’
আল-হাকিম বলেছেন: ‘সহীহুল ইসনাদ’ (সনদ সহীহ)। এবং যাহাবী তাঁর সাথে একমত পোষণ করেছেন।
আমি (আল-আলবানী) বলছি: কিন্তু এটি কেবল ‘হাসান’ (Hasan), কারণ বাহয ইবনু হাকীম সম্পর্কে যে মতপার্থক্য (জারহ ওয়া তা'দীল সংক্রান্ত) সুবিদিত, তার কারণে।
*792* - (حديث الصديق مرفوعا: ` وفى الغنم فى سائمتها إذا كانت أربعين ففيها شاة ` الحديث (ص 185) .
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح.
أخرجه أبو داود (1567) والنسائى (1/336 ـ 338) والدارقطنى (209) والحاكم (1/390 ـ 392) والبيهقى (4/86) وأحمد (1/11 ـ 12) عن حماد بن سلمة قال: ` أخذت هذا الكتاب من ثمامة بن عبد الله بن أنس عن أنس بن مالك أن أبا بكر رضى الله عنه كتب لهم: إن هذه فرائض الصدقة التى فرض رسول الله صلى الله عليه وسلم على المسلمين التى أمر الله عز وجل بها رسول الله صلى الله عليه وسلم فمن سئلها من المسلمين على وجهها فليعطها ومن سئل فوق ذلك فلا يعطه فيما دون خمس وعشرين من الإبل ، ففى كل خمس ذود شاة ، فإذا بلغت خمسا وعشرين ففيها ابنة مخاض إلى خمس وثلاثين ، فإن لم تكن ابنة مخاض ، فابن لبون ، ذكر ، فإذا بلغت ستة وثلاثين ففيها ابنة لبون غلى خمس وأربعين ، فإذا بلغت ستة وأربعين ففيها حقة طروقة الفحل إلى ستين. فإذا بلغت إحدى وستين ففيها جذعة إلى خمس وسبعين ، فإذا بلغت ستة وسبعين ، ففيها بنتا لبون إلى تسعين ، فإذا بلغت إحدى وتسعين ففيها حقتان طروقتا الفحل إلى عشرين ومائة ، فإن زادت على عشرين ومائة ففى كل أربعين ابنة لبون ، وفى كل خمسين حقة ، فإذا تباين أسنان الإبل فى فرائض الصدقات ، فمن بلغت عنده صدقة الجذعة ، وليست عنده جذعة وعنده حقة فإنها تقبل منه ، ويجعل معها شاتين إن استيسرتا له أو عشرين درهماً ، ومن بلغت عنده صدقة الحقة
وليست عنده إلا جذعة فإنها تقبل منه ويعطيه المصدق عشرين درهماً أو شاتين ، ومن بلغت عنده صدقة الحقة وليست عنده ، وعنده بنت لبون فإنها تقبل منه ، ويجعل منها شاتين إن استيسرتا له أو عشرين درهماً ، ومن بلغت عنده صدقة ابن لبون وليست عنده إلا حقة فإنها تقبل منه ،
ويعطيه المصدق عشرين درهما أو شاتين ، ومن بلغت عنده صدقة ابنة لبون ، وليست عنده ابنة لبون وعنده ابنة مخاض ، فإنها تقبل منه ، ويجعل معها شاتين إن استيسرتا له أو عشرين درهما ومن بلغت عنده صدقة بنت مخاض وليس عنده إلا ابن لبون ذكر ، فإنه يقبل منه ، وليس معه شىء ، ومن لم يكن عنده إلا أربع من الإبل فليس فيها شىء إلا أن يشاء ربها ، وفى صدقة الغنم فى سائمتها ، إذا كانت أربعين ففيها شاة إلى عشرين ومائة ، فإن زادت ففيها شاتان إلى مائتين ، فإذا زادت واحدة ففيها ثلاث شياه إلى ثلاثمائة ، فإذا زادت ففى كل مائة شاة. ولا تؤخذ فى الصدقة هرمة ، ولا ذات عوار ولا تيس إلا أن يشاء المتصدق ، ولا يجمع بين متفرق ، ولا يفرق بين مجتمع خشية الصدقة ، وما كان من خليطين ، فإنهما يتراجعان بينهما بالسوية ، وإذا كانت سائمة الرجل ناقصة من أربعين شاة واحدة فليس فيها شىء إلا أن يشاء ربها ، وفى الرقة ربع العشر فإذا لم يكن المال إلا تسعين ومائة درهم فليس فيها شىء إلا أن يشاء ربها `.
وقال الحاكم: ` حديث صحيح على شرط مسلم ` ووافقه الذهبى.
وقال الدارقطنى: ` إسناده صحيح ، وكلهم ثقات `. وأقره البيهقى.
وقد تابعه أيوب قال: رأيت عند ثمامة بن عبد الله بن أنس كتابا كتبه أبو بكر الصديق رضى الله عنه لأنس بن مالك رضى الله عنه حين بعثه على صدقة البحرين ، عليه خاتم النبى صلى الله عليه وسلم ` محمد رسول الله ` فيه مثل هذا القول `
أخرجه البيهقى.
وتابعه محمد بن عبد الله بن المثنى الأنصارى قال: حدثنى أبى قال: حدثنى ثمامة بن عبد الله بن أنس أن أنسا حدثه أن أبا بكر كتب له هذا الكتاب
لما وجه إلى البحرين ، بسم الله الرحمن الرحيم. هذه فريضة صدقة الصدقة التى فرض رسول الله على المسلمين … الحديث نحوه.
أخرجه البخارى (1/368 و2/110) وابن ماجه (1800) وابن الجارود (174 ـ 178) والبيهقى (40/85) ، وأشار إليه الحاكم وقال: ` وحديث حماد بن سلمة أصح وأشفى وأتم من حديث الأنصارى `.
قلت: ولأكثر فقرات الحديث أو كثير منها شاهد من حديث ابن عمر رضى الله عنه قال: ` كتب رسول الله صلى الله عليه وسلم كتاب الصدقة فلم يخرجه إلى عماله حتى قبض ، فقرن بسيفه فعمل به أبو بكر حتى قبض ، ثم عمل به عمر حتى قبض ، فكان فيه: ` فى خمس من الإبل شاة … ` الحديث بطوله.
أخرجه أصحاب السنن والدارمى (1/381) وابن أبى شيبة (3/121) والحاكم (1/392 ـ 394) والبيهقى (4/88) وأحمد (2/14 و15) من طريق سفيان بن حسين عن الزهرى عن سالم عنه.
وقال الحاكم: ` وتصحيحه على شرط الشيخين حديث عبد الله بن المبارك عن يونس بن يزيد عن الزهرى ، وإن كان فيه أدنى إرسال فإنه شاهد صحيح لحديث سفيان بن حسين `.
ثم ساقه هو والدارقطنى (ص 209) عنه عن ابن شهاب قال: ` هذه نسخة كتاب لرسول الله صلى الله عليه وسلم التى كتب الصدقة ، وهى عند آل عمر بن الخطاب قال ابن شهاب: أقرأنيها سالم بن عبد الله بن عمر فوعيتها على وجهها ، وهى التى انتسخ عمر بن عبد العزيز من عبد الله بن عمر ، وسالم بن عبد الله حين أمر على المدينة ، فأمر عماله بالعمل بها ، وكتب بها إلى الوليد فأمر الوليد عماله بالعمل بها ، ثم لم يل [1] الخلفاء يأمرون بذلك بعده ، ثم أمر بها
هشام ، فنسخها إلى كل عامل من المسلمين ، وأمرهم بالعمل بما فيها ، ولا ينقدونها ، وهذا كتاب يفسر `.
لا يؤخذ فى شىء من الإبل الصدقة حتى تبلغ خمس ذود ، فإذا بلغت خمسا فيها شاة … ` الحديث بطوله.
وقد تابعه سليمان بن كثير عن الزهرى عن سالم عن أبيه به.
أخرجه البيهقى وروى عن البخارى أنه قال: ` الحديث أرجو أن يكون محفوظا ، وسفيان بن حسين صدوق `.
*৭৯২* - (সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মারফূ' হাদীস: ‘আর চারণভূমিতে বিচরণকারী ছাগলের ক্ষেত্রে, যখন তা চল্লিশটি হবে, তখন তাতে একটি ছাগল ফরয।’ হাদীসটি (পৃ. ১৮৫)।)
শাইখ নাসিরুদ্দীন আল-আলবানী কর্তৃক তাহক্বীক্ব: * সহীহ।
আবু দাউদ (১৫৬৭), নাসাঈ (১/৩৩৬-৩৩), দারাকুতনী (২০৯), হাকিম (১/৩৯০-৩৯২), বাইহাক্বী (৪/৮৬) এবং আহমাদ (১/১১-১২) হাম্মাদ ইবনু সালামাহ্ (রাহিমাহুল্লাহ) সূত্রে এটি বর্ণনা করেছেন। হাম্মাদ ইবনু সালামাহ্ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: ‘আমি এই কিতাবটি সুমামাহ্ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু আনাস (রাহিমাহুল্লাহ)-এর নিকট থেকে আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে গ্রহণ করেছি যে, আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের নিকট লিখেছিলেন:
‘এগুলো হলো যাকাতের সেই ফরযসমূহ যা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুসলিমদের উপর ফরয করেছেন এবং যা আল্লাহ তা‘আলা তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে আদেশ করেছেন। মুসলিমদের মধ্যে যে কেউ যথাযথভাবে এই যাকাত চাইবে, তাকে তা দিতে হবে। আর যে এর চেয়ে বেশি চাইবে, তাকে তা দেওয়া হবে না।
পঁচিশটির কম উটের ক্ষেত্রে: প্রতি পাঁচটি উটের জন্য একটি ছাগল।
যখন তা পঁচিশটি হবে, তখন পঁয়ত্রিশটি পর্যন্ত তাতে একটি ‘বিনতে মাখাদ’ (এক বছর পূর্ণ হওয়া মাদী উট)। যদি ‘বিনতে মাখাদ’ না থাকে, তবে একটি ‘ইবনু লাবূন’ (দুই বছর পূর্ণ হওয়া পুরুষ উট)।
যখন তা ছত্রিশটি হবে, তখন পঁয়তাল্লিশটি পর্যন্ত তাতে একটি ‘বিনতে লাবূন’ (দুই বছর পূর্ণ হওয়া মাদী উট)।
যখন তা ছেচল্লিশটি হবে, তখন ষাটটি পর্যন্ত তাতে একটি ‘হিক্কাহ্’ (তিন বছর পূর্ণ হওয়া মাদী উট, যা প্রজননক্ষম)।
যখন তা একষট্টিটি হবে, তখন পঁচাত্তরটি পর্যন্ত তাতে একটি ‘জাযা‘আহ্’ (চার বছর পূর্ণ হওয়া মাদী উট)।
যখন তা ছিয়াত্তরটি হবে, তখন নব্বইটি পর্যন্ত তাতে দুটি ‘বিনতে লাবূন’।
যখন তা একানব্বইটি হবে, তখন একশ বিশটি পর্যন্ত তাতে দুটি ‘হিক্কাহ্’ (যা প্রজননক্ষম)।
যদি একশ বিশটির বেশি হয়, তবে প্রতি চল্লিশটিতে একটি ‘বিনতে লাবূন’ এবং প্রতি পঞ্চাশটিতে একটি ‘হিক্কাহ্’।
যখন যাকাতের ফরযসমূহে উটের বয়স ভিন্ন হয় (অর্থাৎ, যা ফরয হয়েছে, তা দাতার কাছে নেই): যার উপর ‘জাযা‘আহ্’ ফরয হয়েছে, কিন্তু তার কাছে ‘জাযা‘আহ্’ নেই, বরং তার কাছে ‘হিক্কাহ্’ আছে, তবে তা তার কাছ থেকে গ্রহণ করা হবে এবং তার সাথে দুটি ছাগল যোগ করা হবে, যদি তা তার জন্য সহজলভ্য হয়, অথবা বিশ দিরহাম।
আর যার উপর ‘হিক্কাহ্’ ফরয হয়েছে, কিন্তু তার কাছে ‘জাযা‘আহ্’ ছাড়া অন্য কিছু নেই, তবে তা তার কাছ থেকে গ্রহণ করা হবে এবং যাকাত আদায়কারী তাকে বিশ দিরহাম বা দুটি ছাগল দেবে।
আর যার উপর ‘হিক্কাহ্’ ফরয হয়েছে, কিন্তু তার কাছে তা নেই, বরং তার কাছে ‘বিনতে লাবূন’ আছে, তবে তা তার কাছ থেকে গ্রহণ করা হবে এবং তার সাথে দুটি ছাগল যোগ করা হবে, যদি তা তার জন্য সহজলভ্য হয়, অথবা বিশ দিরহাম।
আর যার উপর ‘ইবনু লাবূন’ ফরয হয়েছে, কিন্তু তার কাছে ‘হিক্কাহ্’ ছাড়া অন্য কিছু নেই, তবে তা তার কাছ থেকে গ্রহণ করা হবে এবং যাকাত আদায়কারী তাকে বিশ দিরহাম বা দুটি ছাগল দেবে।
আর যার উপর ‘বিনতে লাবূন’ ফরয হয়েছে, কিন্তু তার কাছে ‘বিনতে লাবূন’ নেই, বরং তার কাছে ‘বিনতে মাখাদ’ আছে, তবে তা তার কাছ থেকে গ্রহণ করা হবে এবং তার সাথে দুটি ছাগল যোগ করা হবে, যদি তা তার জন্য সহজলভ্য হয়, অথবা বিশ দিরহাম।
আর যার উপর ‘বিনতে মাখাদ’ ফরয হয়েছে, কিন্তু তার কাছে একটি পুরুষ ‘ইবনু লাবূন’ ছাড়া অন্য কিছু নেই, তবে তা তার কাছ থেকে গ্রহণ করা হবে এবং তার সাথে আর কিছু নেওয়া হবে না।
আর যার কাছে চারটি উট ছাড়া অন্য কিছু নেই, তাতে কোনো যাকাত নেই, যদি না তার মালিক স্বেচ্ছায় দিতে চায়।
আর চারণভূমিতে বিচরণকারী ছাগলের যাকাতের ক্ষেত্রে, যখন তা চল্লিশটি হবে, তখন একশ বিশটি পর্যন্ত তাতে একটি ছাগল। যদি তা বেড়ে যায়, তবে দু’শটি পর্যন্ত তাতে দুটি ছাগল। যদি একটিও বেড়ে যায়, তবে তিনশটি পর্যন্ত তাতে তিনটি ছাগল। যদি এর চেয়েও বেড়ে যায়, তবে প্রতি একশতে একটি ছাগল।
যাকাত হিসেবে বুড়ো (হরমাহ্), ত্রুটিযুক্ত (যাতু আওয়ার) এবং পুরুষ ছাগল (তাইস) নেওয়া হবে না, যদি না যাকাত দাতা স্বেচ্ছায় দিতে চায়।
যাকাতের ভয়ে বিচ্ছিন্নকে একত্রিত করা যাবে না এবং একত্রিতকে বিচ্ছিন্ন করা যাবে না।
আর যারা অংশীদার (খালীতাইন), তারা নিজেদের মধ্যে সমতার ভিত্তিতে সমন্বয় করে নেবে।
যদি কোনো ব্যক্তির চারণভূমিতে বিচরণকারী ছাগল চল্লিশটি থেকে একটি কম হয়, তবে তাতে কোনো যাকাত নেই, যদি না তার মালিক স্বেচ্ছায় দিতে চায়।
আর রৌপ্যের (রিক্কাহ্) ক্ষেত্রে এক-চতুর্থাংশ উশর (অর্থাৎ চল্লিশ ভাগের এক ভাগ)। যদি সম্পদ একশ নব্বই দিরহাম ছাড়া অন্য কিছু না হয়, তবে তাতে কোনো যাকাত নেই, যদি না তার মালিক স্বেচ্ছায় দিতে চায়।’
আর হাকিম (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: ‘হাদীসটি মুসলিমের শর্তানুযায়ী সহীহ।’ যাহাবী (রাহিমাহুল্লাহ) তাঁর সাথে একমত পোষণ করেছেন।
আর দারাকুতনী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: ‘এর সনদ সহীহ এবং এর সকল রাবী নির্ভরযোগ্য (সিক্বাহ)।’ বাইহাক্বী (রাহিমাহুল্লাহ) তা সমর্থন করেছেন।
আর আইয়্যুব (রাহিমাহুল্লাহ) তাঁর অনুসরণ করেছেন। তিনি (আইয়্যুব) বলেন: আমি সুমামাহ্ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু আনাস (রাহিমাহুল্লাহ)-এর নিকট একটি কিতাব দেখেছি, যা আবূ বাকর আস-সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট লিখেছিলেন, যখন তিনি তাঁকে বাহরাইনের যাকাত আদায়ের জন্য প্রেরণ করেন। তাতে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সীলমোহর ছিল— ‘মুহাম্মাদ রাসূলুল্লাহ’— এবং তাতে অনুরূপ বক্তব্য ছিল। বাইহাক্বী (রাহিমাহুল্লাহ) এটি বর্ণনা করেছেন।
আর মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু আল-মুছান্না আল-আনসারী (রাহিমাহুল্লাহ) তাঁর অনুসরণ করেছেন। তিনি বলেন: আমার পিতা আমার নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: সুমামাহ্ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু আনাস (রাহিমাহুল্লাহ) আমার নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন যে, আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন যে, আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন তাঁকে বাহরাইনে প্রেরণ করেন, তখন তাঁর জন্য এই কিতাবটি লিখেছিলেন: ‘বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহীম। এই হলো যাকাতের ফরয যা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুসলিমদের উপর ফরয করেছেন...’ হাদীসটি অনুরূপ। বুখারী (১/৩৬৮ ও ২/১১০), ইবনু মাজাহ (১৮০০), ইবনু জারূদ (১৭৪-১৭৮) এবং বাইহাক্বী (৪০/৮৫) এটি বর্ণনা করেছেন। হাকিম (রাহিমাহুল্লাহ) এর দিকে ইঙ্গিত করে বলেছেন: ‘আল-আনসারীর হাদীসের চেয়ে হাম্মাদ ইবনু সালামাহ্-এর হাদীস অধিক সহীহ, অধিক আরোগ্যদায়ক (আশফা) এবং অধিক পূর্ণাঙ্গ (আতাম)।’
আমি (আলবানী) বলি: এই হাদীসের অধিকাংশ বা বহু অংশের জন্য ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস থেকে শাহেদ (সমর্থক বর্ণনা) রয়েছে। তিনি (ইবনু উমার) বলেন: ‘রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যাকাতের কিতাব লিখেছিলেন, কিন্তু তিনি তা তাঁর কর্মচারীদের নিকট প্রেরণ করেননি, যতক্ষণ না তিনি ইন্তিকাল করেন। অতঃপর তা তাঁর তরবারির সাথে যুক্ত ছিল। আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর ইন্তিকাল পর্যন্ত এর উপর আমল করেছেন। অতঃপর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর ইন্তিকাল পর্যন্ত এর উপর আমল করেছেন। তাতে ছিল: ‘পাঁচটি উটের ক্ষেত্রে একটি ছাগল...’ সম্পূর্ণ হাদীসটি। আসহাবুস্ সুনান, দারিমী (১/৩৮১), ইবনু আবী শাইবাহ্ (৩/১২১), হাকিম (১/৩৯২-৩৯৪), বাইহাক্বী (৪/৮৮) এবং আহমাদ (২/১৪ ও ১৫) এটি সুফিয়ান ইবনু হুসাইন (রাহিমাহুল্লাহ) সূত্রে যুহরী (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে, তিনি সালিম (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে, তিনি তাঁর (পিতা ইবনু উমার) থেকে বর্ণনা করেছেন।
আর হাকিম (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: ‘আব্দুল্লাহ ইবনুল মুবারক (রাহিমাহুল্লাহ) কর্তৃক ইউনুস ইবনু ইয়াযীদ (রাহিমাহুল্লাহ) সূত্রে যুহরী (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত হাদীসটি শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্তানুযায়ী সহীহ। যদিও এতে সামান্য ইরসাল (বিচ্ছিন্নতা) রয়েছে, তবুও এটি সুফিয়ান ইবনু হুসাইন-এর হাদীসের জন্য একটি সহীহ শাহেদ (সমর্থক বর্ণনা)।’
অতঃপর তিনি (হাকিম) এবং দারাকুতনী (পৃ. ২০৯) তাঁর (আব্দুল্লাহ ইবনুল মুবারক) সূত্রে ইবনু শিহাব (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণনা করেছেন। ইবনু শিহাব (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: ‘এটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সেই কিতাবের অনুলিপি, যা তিনি যাকাতের জন্য লিখেছিলেন। এটি উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পরিবারের নিকট ছিল। ইবনু শিহাব বলেন: সালিম ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু উমার (রাহিমাহুল্লাহ) আমাকে তা পাঠ করে শুনিয়েছিলেন এবং আমি তা যথাযথভাবে মুখস্থ করেছিলাম। উমার ইবনু আব্দুল আযীয (রাহিমাহুল্লাহ) যখন মদীনার শাসক নিযুক্ত হন, তখন তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং সালিম ইবনু আব্দুল্লাহ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর নিকট থেকে এর অনুলিপি তৈরি করেন। অতঃপর তিনি তাঁর কর্মচারীদেরকে এর উপর আমল করার নির্দেশ দেন এবং ওয়ালীদ-এর নিকট তা লিখে পাঠান। ওয়ালীদ তাঁর কর্মচারীদেরকে এর উপর আমল করার নির্দেশ দেন। এরপর [১] খলীফাগণ আর এর দ্বারা নির্দেশ দেননি। অতঃপর হিশাম (রাহিমাহুল্লাহ) এর নির্দেশ দেন এবং মুসলিমদের সকল কর্মচারীর নিকট এর অনুলিপি প্রেরণ করেন এবং তাদেরকে এর উপর আমল করার নির্দেশ দেন এবং এর সমালোচনা না করতে বলেন। আর এই কিতাবটি ব্যাখ্যা করে:
‘উট পাঁচটির কম হলে তাতে কোনো যাকাত নেওয়া হবে না। যখন তা পাঁচটি হবে, তখন তাতে একটি ছাগল...’ সম্পূর্ণ হাদীসটি।
আর সুলাইমান ইবনু কাছীর (রাহিমাহুল্লাহ) যুহরী (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে, তিনি সালিম (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে, তিনি তাঁর পিতা (ইবনু উমার) থেকে অনুরূপ বর্ণনা করে তাঁর অনুসরণ করেছেন। বাইহাক্বী (রাহিমাহুল্লাহ) এটি বর্ণনা করেছেন। আর বুখারী (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত আছে যে, তিনি বলেছেন: ‘আমি আশা করি হাদীসটি সংরক্ষিত (মাহফূয)। আর সুফিয়ান ইবনু হুসাইন সত্যবাদী (সাদূক)।’
*793* - (وفى آخر: ` إذا كانت سائمة الرجل ناقصة من أربعين شاة شاة واحدة فليس فيها شىء إلا أن يشاء ربها ` (ص 185) .
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح.
وهو قطعة من حديث أنس عن أبى بكر الذى قبله ، خلافا لما أوهم المؤلف بقوله آخر. وسيذكرها المؤلف نفسه عن أنس (797) .
ولهذا القدر منه شاهد من حديث عمرو بن شعيب عن أبيه عن جده عن النبى صلى الله عليه وسلم قال: ` ليس فى أقل من أربعين شىء `.
أخرجه ابن أبى شيبة (4/16) بسند ضعيف إلى عمرو.
*৭৯৩* - (এবং অন্য বর্ণনায়/শেষে রয়েছে: ‘যদি কোনো ব্যক্তির চারণশীল পশু (ভেড়া/ছাগল) চল্লিশটি ভেড়া/ছাগলের চেয়ে একটি কম হয়, তাহলে তাতে কিছু (যাকাত) নেই, যদি না তার মালিক ইচ্ছা করে।’ (পৃ. ১৮৫)।
শাইখ নাসিরুদ্দীন আল-আলবানী কর্তৃক তাহক্বীক্ব: * সহীহ।
এটি হলো আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কর্তৃক আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত পূর্ববর্তী হাদীসেরই একটি অংশ, যা লেখক কর্তৃক ‘শেষে’ কথাটির মাধ্যমে বোঝানো হয়েছে তার বিপরীত। লেখক নিজেই আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে এটি (৭৯৭ নং হাদীসে) উল্লেখ করবেন।
আর এর এই পরিমাণের জন্য একটি শাহিদ (সমর্থক বর্ণনা) রয়েছে, যা আমর ইবনু শুআইব থেকে, তাঁর পিতা থেকে, তাঁর দাদা সূত্রে নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: ‘চল্লিশের কমের মধ্যে কিছু (যাকাত) নেই।’
এটি ইবনু আবী শাইবাহ (৪/১৬) সংকলন করেছেন, যা আমর পর্যন্ত যঈফ (দুর্বল) সনদযুক্ত।
*794* - (حديث أنس أن أبا بكر الصديق كتب له حين وجهه إلى البحرين: بسم الله الرحمن الرحيم ` هذه فريضة الصدقة التى فرضها رسول الله صلى الله عليه وسلم على المسلمين التى أمر الله بها رسوله ، فمن سئلها من المسلمين على وجهها فليعطها ومن سئل فوقها فلا يعطها ، فى أربع وعشرين من الإبل فما دونها من الغنم فى كل خمس شاة ، فإذا بلغت خمسا وعشرين إلى خمس وثلاثين ففيها بنت
مخاض، فإن لم يكن بنت مخاض
فابن لبون ذكر ، فإذا بلغت ستة وثلاثين إلى خمس وأربعين ففيها بنت لبون أنثى ، فإذا بلغت ستة وأربعين ففيها حقة طروقة الفحل ، فإذا بلغت إحدى وستين إلى خمس وسبعين ففيها جذعة ، فإذا بلغت ستاً وسبعين إلى تسعين ففيها ابنتا لبون ، فإذا بلغت إحدى وتسعين إلى عشرين ومائة ففيها حقتان طروقتا الفحل ، فإذا زادت على عشرين ومائة ، ففى كل أربعين بنت لبون ، وفى كل خمسين حقة `. رواه أحمد وأبو داود والنسائى والبخارى وقطعه فى مواضع (ص 186) .
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح.
وتقدم قريبا بتمامه ، ويأتى بعضه (797) .
*৭৯৪* - (আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত হাদীস যে, আবূ বকর আস-সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন তাঁকে বাহরাইনে প্রেরণ করেন, তখন তাঁর জন্য লিখেছিলেন:
বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহীম (পরম করুণাময় দয়ালু আল্লাহর নামে)। ‘এটি হলো সাদাকার (যাকাতের) সেই ফরয বিধান, যা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুসলিমদের উপর ফরয করেছেন এবং আল্লাহ তাঁর রাসূলকে এর আদেশ করেছেন। মুসলিমদের মধ্যে যার কাছেই যথাযথভাবে এটি চাওয়া হবে, সে যেন তা প্রদান করে। আর যার কাছে এর চেয়ে বেশি চাওয়া হবে, সে যেন তা প্রদান না করে।
চব্বিশটি উট এবং এর চেয়ে কম সংখ্যক ছাগলের ক্ষেত্রে: প্রতি পাঁচটি ছাগলে একটি ছাগল (যাকাত দিতে হবে)।
যখন (উটের সংখ্যা) পঁচিশ থেকে পঁয়ত্রিশে পৌঁছাবে, তখন তাতে একটি ‘বিনতে মাখাদ’ (এক বছর পূর্ণ হওয়া উটনী) দিতে হবে। যদি ‘বিনতে মাখাদ’ না থাকে, তবে একটি পুরুষ ‘ইবনু লাবূন’ (দুই বছর পূর্ণ হওয়া পুরুষ উট) দিতে হবে।
যখন (উটের সংখ্যা) ছত্রিশ থেকে পঁয়তাল্লিশে পৌঁছাবে, তখন তাতে একটি স্ত্রী ‘বিনতে লাবূন’ (দুই বছর পূর্ণ হওয়া উটনী) দিতে হবে।
যখন (উটের সংখ্যা) ছেচল্লিশ থেকে ষাট-এ পৌঁছাবে, তখন তাতে একটি ‘হিক্কাহ’ (তিন বছর পূর্ণ হওয়া উটনী, যা প্রজননক্ষম) দিতে হবে।
যখন (উটের সংখ্যা) একষট্টি থেকে পঁচাত্তরে পৌঁছাবে, তখন তাতে একটি ‘জাযআহ’ (চার বছর পূর্ণ হওয়া উটনী) দিতে হবে।
যখন (উটের সংখ্যা) ছিয়াত্তর থেকে নব্বইয়ে পৌঁছাবে, তখন তাতে দুটি ‘বিনতে লাবূন’ দিতে হবে।
যখন (উটের সংখ্যা) একানব্বই থেকে একশত বিশে পৌঁছাবে, তখন তাতে দুটি ‘হিক্কাহ’ (যা প্রজননক্ষম) দিতে হবে।
আর যখন একশত বিশের বেশি হবে, তখন প্রতি চল্লিশটিতে একটি ‘বিনতে লাবূন’ এবং প্রতি পঞ্চাশটিতে একটি ‘হিক্কাহ’ দিতে হবে।’
এটি বর্ণনা করেছেন আহমাদ, আবূ দাঊদ, নাসাঈ এবং বুখারী (রাহিমাহুল্লাহ), তবে তিনি এটি বিভিন্ন স্থানে খণ্ড খণ্ডভাবে বর্ণনা করেছেন। (পৃষ্ঠা ১৮৬)।
শাইখ নাসিরুদ্দীন আল-আলবানী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর তাহক্বীক্ব: * সহীহ (বিশুদ্ধ)।
এর পূর্ণাঙ্গ বর্ণনা শীঘ্রই সামনে এসেছে, এবং এর কিছু অংশ (৭৯৭) নম্বরে আসবে।
*795* - (قول معاذ: ` بعثنى رسول الله صلى الله عليه وسلم أصدق أهل اليمن فأمرنى أن آخذ من البقر من كل ثلاثين تبيعا ومن كل أربعين مسنة ` الحديث رواه أحمد (ص 186) .
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح.
أخرجه أحمد (5/240) من طريق سلمة بن أسامة عن يحيى بن الحكم أن معاذا قال: ` بعثنى رسول الله صلى الله عليه وسلم أصدق أهل اليمن ، وأمرنى أن آخذ من البقر من كل ثلاثين تبيعا ـ قال هارون بن معروف: والتبيع الجذع أو الجذعة - ومن كل أربعين مسنة ، قال: ` فعرضوا على أن آخذ ما بين الأربعين أو الخمسين ، وبين الستين والسبعين ، وما بين الثمانين والتسعين فأبيت ذاك وقلت لهم ، حتى أسأل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن ذلك فقدمت ، فأخبرت النبى صلى الله عليه وسلم ، فأمرنى أن آخذ من كل ثلاثين تبيعا. ومن كل أربعين مسنة ، ومن الستين تبيعين ، ومن السبعين مسنة وتبيعا ، ومن الثمانين مسنتين ، ومن التسعين ثلاثة أتباع ، ومن المائة مسنة وتبيعين ومن العشرة والمائة مسنتين وتبيعا ، ومن العشرين ومائة ثلاث مسنات أو أربعة أتباع ، قال: وأمرنى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن لا آخذ فيما بين ذلك شيئا إلا أن يبلغ مسنة أو جذعا ، وزعم أن الأوقاص لا فريضة فيها `.
قلت: وهذا سند ضعيف لانقطاعه بن يحيى بن الحكم ومعاذ كما ذكر
الحافظ فى ` التعجيل `. ثم هو غير معروف الحال وكذا الراوى عنه سلمة ، فإنه لم يوثقهما أحد ، وقول الحافظ أنهما معروفان كأنه يعنى أنهما غير مجهولى العين ، لأنه لم يوثقهما ولا حكى ذلك عن أحد من الأئمة.
لكن القسم الأول منه له طرق أخرى ، فقال الأعمش: عن أبى وائل عن مسروق عن معاذ ابن جبل قال: ` بعثنى النبى صلى الله عليه وسلم إلى اليمن ، فأمره أن يأخذ من كل ثلاثين بقرة تبيعا أو تبيعة ، ومن كل أربعين مسنة ، ومن كل حالم دينارا ، أو عدله معاقر `
أخرجه أبو داود (1578) والترمذى (1/122) والنسائى (1/339) والدارمى (1/382) وابن ماجه (1/576/1803) وابن أبى شيبة (4/12) وابن حبان (794) وابن الجارود (178) والدارقطنى (203) والحاكم (1/398) والبيهقى (4/98 و9/193) وقال الترمذى: ` حديث حسن `.
وقال الحاكم: ` صحيح على شرط الشيخين ` ووافقه الذهبى.
قلت: وهو كما قالا ، وقد قيل أن مسروقا لم يسمع من معاذ فهو منقطع ، ولا حجة على ذلك ، وقد قال ابن عبد البر: ` والحديث ثابت متصل `.
وقد رواه الأعمش عن إبراهيم أيضا عن مسروق به.
أخرجه أبو داود (1577) والنسائى والدارمى وابن أبى شيبة والدارقطنى والبيهقى.
وتابعه عاصم وهو ابن أبى النجود عن أبى وائل به.
أخرجه الدارمى عن أبى بكر بن عياش عنه.
قلت: وهذا سند حسن. ومن هذا الوجه أخرجه أحمد (5/233) لكنه لم يذكر فى إسناده مسروقا.
ثم أخرجه (5/247) كذلك من طريق شريك
عن عاصم به.
قلت: وشريك هو ابن عبد الله القاضى وهو سىء الحفظ.
وللحديث طريق أخرى ، فقال مالك (1/259/24) عن حميد بن قيس المكى عن طاوس اليمانى: ` أن معاذ بن جبل الأنصارى أخذ من ثلاثين بقرة ، تبيعا ، ومن أربعين بقرة مسنة ، وأتى بما دون ذلك فأتى أن يأخذ منه شيئا ، وقال: لم أسمع من رسول الله صلى الله عليه وسلم فيه شيئا حتى ألقاه فأسأله ، فتوفى رسول الله صلى الله عليه وسلم قبل أن يقدم معاذ بن جبل `.
ومن طريق مالك رواه الشافعى (1/229) والبيهقى.
ورواه أحمد (5/230 و231) عن عمرو بن دينار أن طاوسا أخبره به نحوه.
وهذا سند رجاله كلهم ثقات إلا أنه منقطع بين طاوس ومعاذ لكن قال الحافظ فى ` التلخيص ` (ص 174) : ` قد قال الشافعى: طاوس عالم بأمر معاذ وإن لم يلقه لكثرة من لقيه ممن أدرك معاذا ، وهذا مما لا أعلم من أحد فيه خلافا `.
قلت: وقد روى موصولا ، فقال بقية: حدثنى المسعودى عن الحكم عن طاوس عن ابن عباس قال: ` لما بعث رسول الله صلى الله عليه وسلم معاذا إلى اليمن أمره أن يأخذ من كل ثلاثين من البقر تبيعا أو تبيعة جذعا أو جذعة. ومن كل أربعين بقرة مسنة. فقالوا: فالأوقاص؟ قال: ما أمرنى فيها بشىء ، وسأسأل رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا قدمت عليه ، فلما قدم على رسول الله صلى الله عليه وسلم سأله عن الأوقاص ، فقال: ليس فيها شىء (قال المسعودى: والأوقاص ما دون الثلاثين وما بين الأربعين إلى الستين) فإذا كانت ستين ففيها تبيعان فإذا كانت سبعون ففيها مسنة أو تبيع ، فإذا كانت
ثمانون ففيها مسنتان ، فإذا كانت تسعون ففيها ثلاث تبايع ` أخرجه الدارقطنى (202) وعنه البيهقى (99) .
قال الحافط فى ` التلخيص ` (ص 174) : ` وهذا موصول ، لكن المسعودى اختلط ، وتفرد بوصله عنه بقية بن الوليد ، وقد رواه الحسن بن عمارة عن الحكم أيضا ، لكن الحسن ضعيف ، ويدل على ضعفه قوله فيه: أن معاذا قدم على النبى صلى الله عليه وسلم من اليمن فسأله ، ومعاذ لما قدم على النبى صلى الله عليه وسلم ، كان قد مات `.
ثم ذكر رواية مالك المتقدمة وفيها التصريح بوفاته صلى الله عليه وسلم قبل قدوم معاذ.
لكن قد علمت أنه منقطع. فلا يصلح أن يستدل به على ضعف رواية المسعودى ، واستدل الزيلعى بدليل آخر وهو حديث جابر فى قصة دينه وعجزه عن الوفاء وإرسال النبى صلى الله عليه وسلم إياه إلى اليمن ، وفيه ` فلم يزل بها حتى توفى رسول الله صلى الله عليه وسلم `. ولو صح هذا لكان دليلاً واضحا ، ولكنه من رواية محمد بن عمر وهو الواقدى وهو متروك. فلا حجة فيه ، على أن الزيلعى ساقه ملفقا من عدة أحاديث على أنه حديث واحد ، كما نبه على ذلك المعلق الفاضل عليه.
ثم إن للحديث شاهدا من حديث عبد الله بن مسعود يرويه خصيف عن أبى عبيدة عنه أن النبى صلى الله عليه وسلم قال: ` فى ثلاثين من البقر تبيع أو تبيعة ، وفى أربعين مسنة `.
أخرجه الترمذى (1/121) وابن ماجه (1804) وابن الجارود (179) والبيهقى (4/99) وقال الترمذى: ` وأبو عبيدة بن عبد الله لم يسمع من عبد الله `.
قلت: وخصيف سىء الحفظ.
وبالجملة فالحديث بطريقه وهذا الشاهد صحيح بلا ريب.
৭৯৫ - (মু'আযের উক্তি: ‘রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাকে ইয়ামানের অধিবাসীদের কাছ থেকে সাদাকাহ (যাকাত) সংগ্রহের জন্য প্রেরণ করেন। তিনি আমাকে নির্দেশ দেন যে, গরুর যাকাত হিসেবে প্রতি ত্রিশটি থেকে একটি ‘তাবী’ (তাবি’আ) এবং প্রতি চল্লিশটি থেকে একটি ‘মুসিন্নাহ’ গ্রহণ করতে হবে।’ হাদীসটি বর্ণনা করেছেন আহমাদ (পৃ. ১৮৬)।)
শাইখ নাসিরুদ্দীন আল-আলবানী কর্তৃক তাহক্বীক্ব: * সহীহ।
আহমাদ (৫/২৪০) এটি সালমাহ ইবনু উসামাহ সূত্রে ইয়াহইয়া ইবনুল হাকাম থেকে বর্ণনা করেছেন যে, মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: ‘রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাকে ইয়ামানের অধিবাসীদের কাছ থেকে সাদাকাহ (যাকাত) সংগ্রহের জন্য প্রেরণ করেন। তিনি আমাকে নির্দেশ দেন যে, গরুর যাকাত হিসেবে প্রতি ত্রিশটি থেকে একটি ‘তাবী’ (তাবি’আ) – হারূন ইবনু মা'রূফ বলেন: ‘তাবী’ হলো ‘জাযা’ (এক বছর বয়সী পুরুষ বা স্ত্রী বাছুর) – এবং প্রতি চল্লিশটি থেকে একটি ‘মুসিন্নাহ’ গ্রহণ করতে হবে।’ তিনি (মু'আয) বলেন: ‘তারা আমার কাছে চল্লিশ বা পঞ্চাশের মধ্যবর্তী, ষাট ও সত্তর এর মধ্যবর্তী, এবং আশি ও নব্বই এর মধ্যবর্তী সংখ্যাগুলোর যাকাত নিতে প্রস্তাব করল। কিন্তু আমি তা প্রত্যাখ্যান করলাম এবং তাদের বললাম, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে এ বিষয়ে জিজ্ঞেস না করা পর্যন্ত (কিছু নেব না)। অতঃপর আমি (মদীনায়) আগমন করলাম এবং নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে বিষয়টি জানালাম। তিনি আমাকে নির্দেশ দিলেন যে, প্রতি ত্রিশটি থেকে একটি ‘তাবী’ এবং প্রতি চল্লিশটি থেকে একটি ‘মুসিন্নাহ’ গ্রহণ করতে হবে। ষাটটি থেকে দুটি ‘তাবী’, সত্তরটি থেকে একটি ‘মুসিন্নাহ’ ও একটি ‘তাবী’, আশিটি থেকে দুটি ‘মুসিন্নাহ’, নব্বইটি থেকে তিনটি ‘আতবা’ (তাবী-এর বহুবচন), একশটি থেকে একটি ‘মুসিন্নাহ’ ও দুটি ‘তাবী’, একশ দশটি থেকে দুটি ‘মুসিন্নাহ’ ও একটি ‘তাবী’, এবং একশ বিশটি থেকে তিনটি ‘মুসিন্নাহ’ অথবা চারটি ‘আতবা’ গ্রহণ করতে হবে। তিনি (মু'আয) বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাকে নির্দেশ দেন যে, এর মধ্যবর্তী সংখ্যাগুলো থেকে কিছু গ্রহণ করা যাবে না, যতক্ষণ না তা ‘মুসিন্নাহ’ বা ‘জাযা’র সংখ্যায় পৌঁছায়। তিনি ধারণা দেন যে, ‘আল-আওক্বাস’ (মধ্যবর্তী সংখ্যা) এর মধ্যে কোনো ফরয (যাকাত) নেই।’
আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল), কারণ ইয়াহইয়া ইবনুল হাকাম এবং মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মাঝে ইনকিতা' (বিচ্ছিন্নতা) রয়েছে, যেমনটি হাফিয ‘আত-তা'জীল’ গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন। উপরন্তু, তার (ইয়াহইয়া ইবনুল হাকামের) অবস্থা অজ্ঞাত (গায়র মা'রূফুল হাল), এবং তার থেকে বর্ণনাকারী সালমাহও অনুরূপ। কেননা, কেউ তাদের উভয়কে নির্ভরযোগ্য (তাওসীক্ব) বলেননি। হাফিযের এই উক্তি যে তারা ‘মা'রূফ’ (পরিচিত), এর অর্থ সম্ভবত এই যে, তারা ‘মাজহূলুল আইন’ (অজ্ঞাত ব্যক্তি) নন, কারণ তিনি তাদের নির্ভরযোগ্যতা প্রমাণ করেননি এবং কোনো ইমাম থেকেও তা উদ্ধৃত করেননি।
কিন্তু এর প্রথম অংশের জন্য অন্যান্য সূত্র (ত্বরীক্ব) রয়েছে। আল-আ'মাশ বলেন: আবূ ওয়ায়েল সূত্রে মাসরূক থেকে, তিনি মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেন, তিনি বলেন: ‘নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাকে ইয়ামানে প্রেরণ করেন এবং নির্দেশ দেন যে, প্রতি ত্রিশটি গরু থেকে একটি ‘তাবী’ বা ‘তাবি’আহ’ (পুরুষ বা স্ত্রী বাছুর), প্রতি চল্লিশটি থেকে একটি ‘মুসিন্নাহ’, এবং প্রত্যেক বালেগ (স্বপ্নদোষ হওয়া ব্যক্তি) থেকে এক দীনার অথবা তার সমমূল্যের ‘মা'আক্বির’ (কাপড়) গ্রহণ করতে হবে।’
এটি আবূ দাঊদ (১৫৭৮), তিরমিযী (১/১২২), নাসাঈ (১/৩৩৯), দারিমী (১/৩৮২), ইবনু মাজাহ (১/৫৭৬/১৮০৩), ইবনু আবী শাইবাহ (৪/১২), ইবনু হিব্বান (৭৯৪), ইবনু জারূদ (১৭৮), দারাকুতনী (২০৩), হাকিম (১/৩৯৮) এবং বাইহাক্বী (৪/৯৮ ও ৯/১৯৩) সংকলন করেছেন। তিরমিযী বলেন: ‘হাদীসটি হাসান।’ হাকিম বলেন: ‘শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্তানুযায়ী সহীহ।’ যাহাবীও তার সাথে একমত পোষণ করেছেন।
আমি বলি: এটি তাদের উভয়ের উক্তি অনুযায়ীই (সহীহ)। যদিও বলা হয়েছে যে, মাসরূক মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে শোনেননি, ফলে এটি মুনক্বাতি' (বিচ্ছিন্ন)। কিন্তু এর সপক্ষে কোনো প্রমাণ নেই। ইবনু আব্দুল বার্র বলেছেন: ‘হাদীসটি প্রমাণিত এবং মুত্তাসিল (সংযুক্ত)।’
আল-আ'মাশ এটি ইবরাহীম থেকেও, তিনি মাসরূক সূত্রে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন। এটি আবূ দাঊদ (১৫৭৭), নাসাঈ, দারিমী, ইবনু আবী শাইবাহ, দারাকুতনী এবং বাইহাক্বী সংকলন করেছেন।
আছিম – তিনি ইবনু আবী নুজূদ – আবূ ওয়ায়েল সূত্রে অনুরূপ বর্ণনা করে তার মুতাবা'আত (সমর্থন) করেছেন। এটি দারিমী আবূ বাকর ইবনু আইয়াশ সূত্রে তার থেকে সংকলন করেছেন।
আমি বলি: এই সনদটি হাসান। এই সূত্রেই আহমাদ (৫/২৩৩) এটি সংকলন করেছেন, তবে তিনি তার ইসনাদে মাসরূকের নাম উল্লেখ করেননি। অতঃপর তিনি (আহমাদ) (৫/২৪৭) এটি শারীক সূত্রে আছিম থেকে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন। আমি বলি: শারীক হলেন ইবনু আব্দুল্লাহ আল-ক্বাযী, এবং তিনি ‘সায়্যি'উল হিফয’ (দুর্বল স্মৃতিশক্তির অধিকারী)।
এই হাদীসের আরেকটি সূত্র রয়েছে। মালিক (১/২৫৯/২৪) হুমাইদ ইবনু ক্বাইস আল-মাক্কী সূত্রে ত্বাউস আল-ইয়ামানী থেকে বর্ণনা করেন: ‘মু'আয ইবনু জাবাল আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ত্রিশটি গরু থেকে একটি ‘তাবী’ এবং চল্লিশটি গরু থেকে একটি ‘মুসিন্নাহ’ গ্রহণ করতেন। এর চেয়ে কম সংখ্যা নিয়ে আসা হলে তিনি তা থেকে কিছু নিতে অস্বীকার করেন এবং বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছ থেকে এ বিষয়ে কিছু শুনিনি, যতক্ষণ না আমি তাঁর সাথে সাক্ষাৎ করে জিজ্ঞেস করি। কিন্তু মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আগমন করার পূর্বেই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম ইন্তিকাল করেন।’
মালিকের সূত্র ধরে এটি শাফিঈ (১/২২৯) এবং বাইহাক্বী বর্ণনা করেছেন। আহমাদ (৫/২৩০ ও ২৩১) এটি আমর ইবনু দীনার সূত্রে বর্ণনা করেছেন যে, ত্বাউস তাকে অনুরূপ খবর দিয়েছেন।
এই সনদটির সকল রাবী নির্ভরযোগ্য (সিক্বাহ), তবে এটি ত্বাউস এবং মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মাঝে মুনক্বাতি' (বিচ্ছিন্ন)। কিন্তু হাফিয ‘আত-তালখীস’ (পৃ. ১৭৪) গ্রন্থে বলেছেন: ‘শাফিঈ বলেছেন: ত্বাউস মু'আযের বিষয়গুলো সম্পর্কে অবগত ছিলেন, যদিও তিনি তার সাথে সাক্ষাৎ করেননি, কারণ তিনি এমন বহু লোকের সাথে সাক্ষাৎ করেছেন যারা মু'আযকে পেয়েছেন। আমি জানি না যে, এ বিষয়ে কারো কোনো দ্বিমত আছে।’
আমি বলি: এটি মাওসূল (সংযুক্ত) হিসেবেও বর্ণিত হয়েছে। বাক্বিয়্যাহ বলেন: আমাকে মাসঊদী হাদীস শুনিয়েছেন, তিনি হাকাম থেকে, তিনি ত্বাউস থেকে, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেন, তিনি বলেন: ‘যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম মু'আযকে ইয়ামানে প্রেরণ করেন, তখন তিনি তাকে নির্দেশ দেন যে, প্রতি ত্রিশটি গরু থেকে একটি ‘তাবী’ বা ‘তাবি’আহ’ (পুরুষ বা স্ত্রী বাছুর), এবং প্রতি চল্লিশটি গরু থেকে একটি ‘মুসিন্নাহ’ গ্রহণ করতে হবে। তারা (ইয়ামানবাসীরা) জিজ্ঞেস করল: ‘আল-আওক্বাস’ (মধ্যবর্তী সংখ্যা) এর কী হবে? তিনি (মু'আয) বললেন: এ বিষয়ে তিনি আমাকে কোনো নির্দেশ দেননি, আমি তাঁর কাছে ফিরে গেলে জিজ্ঞেস করব। যখন তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছে আগমন করলেন, তখন তিনি তাঁকে ‘আল-আওক্বাস’ সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলেন। তিনি বললেন: এর মধ্যে কিছু নেই। (মাসঊদী বলেন: ‘আল-আওক্বাস’ হলো ত্রিশের কম সংখ্যা এবং চল্লিশ থেকে ষাটের মধ্যবর্তী সংখ্যা)। যদি ষাটটি হয়, তবে তাতে দুটি ‘তাবী’। যদি সত্তরটি হয়, তবে তাতে একটি ‘মুসিন্নাহ’ ও একটি ‘তাবী’। যদি আশিটি হয়, তবে তাতে দুটি ‘মুসিন্নাহ’। যদি নব্বইটি হয়, তবে তাতে তিনটি ‘তাবী’।’ এটি দারাকুতনী (২০২) এবং তার সূত্রে বাইহাক্বী (৯৯) সংকলন করেছেন।
হাফিয ‘আত-তালখীস’ (পৃ. ১৭৪) গ্রন্থে বলেন: ‘এটি মাওসূল (সংযুক্ত), কিন্তু মাসঊদী ‘ইখতিলাত’ (স্মৃতিবিভ্রাট) এ আক্রান্ত হয়েছিলেন, এবং বাক্বিয়্যাহ ইবনুল ওয়ালীদ এককভাবে তার থেকে এটি মাওসূল হিসেবে বর্ণনা করেছেন। হাসান ইবনু উমারাহও হাকাম থেকে এটি বর্ণনা করেছেন, কিন্তু হাসান যঈফ (দুর্বল)। তার দুর্বলতার প্রমাণ হলো, তার বর্ণনায় এই উক্তি রয়েছে যে, মু'আয ইয়ামান থেকে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছে আগমন করে তাঁকে জিজ্ঞেস করেন, অথচ মু'আয যখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছে আগমন করেন, তখন তিনি ইন্তিকাল করেছিলেন।’
অতঃপর তিনি মালিকের পূর্বোক্ত বর্ণনাটি উল্লেখ করেন, যেখানে মু'আযের আগমনের পূর্বেই নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের ইন্তিকালের স্পষ্ট উল্লেখ রয়েছে। কিন্তু আপনি জেনেছেন যে, এটি মুনক্বাতি' (বিচ্ছিন্ন)। সুতরাং মাসঊদীর বর্ণনাকে দুর্বল প্রমাণ করার জন্য এটি দ্বারা দলীল পেশ করা উপযুক্ত নয়। যাইলাঈ অন্য একটি দলীল পেশ করেছেন, যা হলো জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস, তার ঋণ এবং তা পরিশোধে অক্ষমতার ঘটনা এবং নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম কর্তৃক তাকে ইয়ামানে প্রেরণের ঘটনা সম্পর্কিত। তাতে রয়েছে: ‘তিনি সেখানেই ছিলেন, যতক্ষণ না রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম ইন্তিকাল করেন।’ যদি এটি সহীহ হতো, তবে তা স্পষ্ট দলীল হতো। কিন্তু এটি মুহাম্মাদ ইবনু উমার আল-ওয়াক্বিদী কর্তৃক বর্ণিত, আর তিনি ‘মাতরূক’ (পরিত্যক্ত রাবী)। সুতরাং এতে কোনো দলীল নেই। উপরন্তু, যাইলাঈ এটিকে একাধিক হাদীস থেকে একত্রিত করে একটি হাদীস হিসেবে পেশ করেছেন, যেমনটি এর উপর মন্তব্যকারী সম্মানিত মু'আল্লিক্ব (টীকাভাষ্যকার) সতর্ক করেছেন।
অতঃপর, এই হাদীসের একটি শাহেদ (সমর্থক বর্ণনা) রয়েছে আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস থেকে, যা খুসাইফ আবূ উবাইদাহ সূত্রে তার (ইবনু মাসঊদ) থেকে বর্ণনা করেন যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: ‘ত্রিশটি গরুর জন্য একটি ‘তাবী’ বা ‘তাবি’আহ’ এবং চল্লিশটির জন্য একটি ‘মুসিন্নাহ’।’ এটি তিরমিযী (১/১২১), ইবনু মাজাহ (১৮০৪), ইবনু জারূদ (১৭৯) এবং বাইহাক্বী (৪/৯৯) সংকলন করেছেন। তিরমিযী বলেন: ‘আবূ উবাইদাহ ইবনু আব্দুল্লাহ, আব্দুল্লাহ (ইবনু মাসঊদ) থেকে শোনেননি।’ আমি বলি: আর খুসাইফ ‘সায়্যি'উল হিফয’ (দুর্বল স্মৃতিশক্তির অধিকারী)।
মোটকথা, এই হাদীসটি তার সূত্রসমূহ এবং এই শাহেদের কারণে নিঃসন্দেহে সহীহ।
*796* - (قول سعد [1] بن ديسم: أتانى رجلان على بعير فقالا: إنا
رسولا رسول الله صلى الله عليه وسلم لتؤدى صدقة غنمك. قلت: فأى شىء تأخذان؟ قالا: عناق جذعة أو ثنية ` رواه أبو داود (ص 187) .
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف.
رواه أبو داود (1581) والنسائى (1/341) وأحمد (3/414) عن مسلم بن ثفنة اليشكرى قال: ` استعمل نافع بن علقمة أبى على عرافة قومه فأمره أن يصدقهم ، قال: فبعثنى أبى فى طائفة منهم ، فأتيت شيخا كبيرا يقال له سعد [1] بن ديسم ، فقلت: إن أبى بعثنى إليك ـ يعنى لأصدقك ـ قال: ابن أخى ، وأى نحو تأخذون؟ قلت: نختار حتى إنا نتبين ضروع الغنم ، قال: ابن أخى ، فإنى أحدثك أنى كنت فى شعب من هذه الشعاب على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم فى غنم لى ، فجاءنى رجلان على بعير ، فقالا لى: إنا رسولا رسول الله صلى الله عليه وسلم إليك لتؤدى صدقة غنمك ، فقلت: ما على فيها؟ فقالا: شاة ، فأعمد إلى شاة قد عرفت مكانها ممتلئة محضا وشحما فأخرجتها إليهما ، فقالا: هذه شاة الشافع وقد نهانا رسول الله صلى الله عليه وسلم أن نأخذ شافعا ، قلت: فأى شىء تأخذان؟ قالا: عناقا جذعة أو ثنية ، قال: فأعمد إلى عناق معتاط ، والمعتاط: التى لم تلد ولدا ، وقد حان ولادها فأخرجتها إليهما ، فقالا: ناولناها ، فجعلاها معهما على بعيرهما ، ثم انطلقا `.
قلت: وهذا سند ضعيف مسلم بن ثفنة ، قال الذهبى ` أخطأ فيه وكيع وصوابه ابن شعبة. لا يعرف `. قلت: وعلى الصواب رواه النسائى فى رواية له.
৭৯৬ – (সা’দ ইবনু দাইসাম [১]-এর উক্তি: আমার নিকট একটি উটের পিঠে চড়ে দুজন লোক এলো এবং তারা বলল: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দুজন দূত, যেন তুমি তোমার ছাগলের যাকাত আদায় করো। আমি বললাম: আপনারা কী জিনিস গ্রহণ করবেন? তারা বলল: একটি জাযা‘আহ (এক বছর বয়সী) অথবা সানিয়্যাহ (দুই বছর বয়সী) বকরীর বাচ্চা। এটি আবূ দাঊদ (পৃ. ১৮৭) বর্ণনা করেছেন।)
শাইখ নাসিরুদ্দীন আল-আলবানী কর্তৃক তাহক্বীক্ব: * যঈফ (দুর্বল)।
আবূ দাঊদ (১৫৮১), নাসাঈ (১/৩৪১) এবং আহমাদ (৩/৪১৪) এটি মুসলিম ইবনু সাফনাহ আল-ইয়াশকুরী সূত্রে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: নাফি’ ইবনু ‘আলক্বামাহ আমার পিতাকে তাঁর গোত্রের ‘আরাফাহ (যাকাত সংগ্রাহক) হিসেবে নিযুক্ত করলেন এবং তাকে তাদের থেকে যাকাত সংগ্রহ করতে নির্দেশ দিলেন। তিনি (মুসলিম ইবনু সাফনাহ) বলেন: আমার পিতা আমাকে তাদের একটি দলের নিকট পাঠালেন। আমি সা’দ ইবনু দাইসাম [১] নামক এক বৃদ্ধের নিকট আসলাম। আমি বললাম: আমার পিতা আমাকে আপনার নিকট পাঠিয়েছেন—অর্থাৎ আপনার থেকে যাকাত সংগ্রহ করার জন্য।
তিনি বললেন: হে ভাতিজা, আপনারা কী ধরনের (পশু) গ্রহণ করেন?
আমি বললাম: আমরা বাছাই করি, এমনকি আমরা ছাগলের ওলানও পরীক্ষা করে দেখি।
তিনি বললেন: হে ভাতিজা, আমি তোমাকে বলছি যে, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে আমার কিছু ছাগল নিয়ে এই উপত্যকাগুলোর একটিতে ছিলাম। তখন একটি উটের পিঠে চড়ে দুজন লোক আমার নিকট এলো। তারা আমাকে বলল: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দুজন দূত, যেন তুমি তোমার ছাগলের যাকাত আদায় করো।
আমি বললাম: এর উপর আমার কী (দায়িত্ব) আছে?
তারা বলল: একটি ছাগল।
আমি এমন একটি ছাগলের দিকে গেলাম যার স্থান আমার জানা ছিল, যা দুধ ও চর্বিতে পরিপূর্ণ ছিল। আমি সেটি তাদের নিকট বের করে দিলাম।
তারা বলল: এটি ‘শাতুশ শাফি’ (গর্ভধারণে সক্ষম ছাগল)। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে ‘শাফি’ গ্রহণ করতে নিষেধ করেছেন।
আমি বললাম: আপনারা কী জিনিস গ্রহণ করবেন?
তারা বলল: একটি ‘আনা-ক্ব জাযা‘আহ অথবা সানিয়্যাহ (নির্দিষ্ট বয়সের বকরীর বাচ্চা)।
তিনি বললেন: আমি তখন একটি মু’তা’ত (معتاط) বকরীর বাচ্চার দিকে গেলাম। আর মু’তা’ত হলো: যা এখনো বাচ্চা প্রসব করেনি, কিন্তু তার প্রসবের সময় আসন্ন। আমি সেটি তাদের নিকট বের করে দিলাম।
তারা বলল: এটি আমাদের হাতে দিন।
তারা সেটিকে তাদের উটের পিঠে নিজেদের সাথে রাখল, অতঃপর তারা চলে গেল।
(আলবানী) আমি বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল)। (কারণ) মুসলিম ইবনু সাফনাহ। আল-যাহাবী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: “ওয়াকী’ এতে ভুল করেছেন, এর সঠিক নাম হলো ইবনু শু’বাহ। সে অপরিচিত (লা ইউ’রাফ)।” (আলবানী) আমি বলি: সঠিক নামানুসারে নাসাঈ তাঁর এক বর্ণনায় এটি বর্ণনা করেছেন।
*797* - (حديث أنس فى كتاب الصدقات: ` وفى سائمة الغنم إذا كانت أربعين إلى عشرين ومائة شاة ، فإذا زادت على عشرين ومائة ففيها شاتان ، فإذا زادت على مائتين إلى ثلاث ففيها ثلاث شياه ، فإذا زادت على ثلاثمائة ففى كل مائة شاة ، فليس فيها صدقة ، إلا أن يشاء ربها ` رواه أحمد وأبو داود (ص 187) .
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح.
وتقدم تخريجه (792) مع سوقنا إياه بتمامه.
فصل فى الخلطة
৭৯৭ - (আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কর্তৃক বর্ণিত সাদাকাত (যাকাত) অধ্যায়ের হাদীস: ‘আর চারণভূমিতে বিচরণকারী ছাগলের ক্ষেত্রে, যখন তার সংখ্যা চল্লিশ থেকে একশত বিশটি পর্যন্ত হয়, তখন একটি ছাগল (যাকাত দিতে হবে)। আর যখন তা একশত বিশটির বেশি হয়, তখন তাতে দুটি ছাগল (যাকাত দিতে হবে)। আর যখন তা দুইশত থেকে তিনশত পর্যন্ত হয়, তখন তাতে তিনটি ছাগল (যাকাত দিতে হবে)। আর যখন তা তিনশত-এর বেশি হয়, তখন প্রতি একশত-তে একটি ছাগল (যাকাত দিতে হবে)। তখন তাতে কোনো সাদাকা (যাকাত) নেই, যদি না তার মালিক ইচ্ছা করে।’ এটি বর্ণনা করেছেন আহমাদ এবং আবূ দাঊদ (পৃষ্ঠা ১৮৭)।
শাইখ নাসিরুদ্দীন আল-আলবানী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর তাহক্বীক্ব: * সহীহ।
আর এর তাখরীজ (৭৯২) নম্বরে পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে, যেখানে আমরা এটিকে পূর্ণাঙ্গভাবে উদ্ধৃত করেছি।
খিলতা (যাকাতের ক্ষেত্রে অংশীদারিত্ব) সংক্রান্ত পরিচ্ছেদ
*798* - (روى أنس فى كتاب الصدقات: ` ولا يجمع بين متفرق ولا يفرق بين مجتمع خشية الصدقة ، وما كان من خليطين فإنهما يتراجعان بالسوية ` رواه أحمد وأبو داود والنسائى.
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح.
وتقدم تخريجه (792) .
باب زكاة الخارج من الأرض
৭৯৮ - (আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে সাদাকাত (যাকাত) অধ্যায়ে বর্ণিত: “যাকাতের ভয়ে বিচ্ছিন্নকে একত্রিত করা হবে না এবং একত্রিতকে বিচ্ছিন্ন করা হবে না। আর যদি দুই শরিকদার থাকে, তবে তারা উভয়ে সমতার ভিত্তিতে একে অপরের কাছ থেকে (যাকাতের অংশ) ফেরত নেবে।”) এটি বর্ণনা করেছেন আহমাদ, আবূ দাঊদ এবং নাসাঈ।
শাইখ নাসিরুদ্দীন আল-আলবানী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর তাহক্বীক্ব (পর্যালোচনা): * সহীহ (Sahih)।
এর তাখরীজ (Hadith authentication) পূর্বে (৭৯২) নম্বরে অতিবাহিত হয়েছে।
জমির উৎপাদিত ফসলের যাকাত (Zakat) পরিচ্ছেদ।
*799* - (حديث: ` فيما سقت السماء والعيون أو كان عثريا (1) العشر ، وفيما سقى بالنضح نصف العشر ` رواه البخارى.
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
أخرجه البخارى (1/377) وأبو داود (1596) والنسائى (1/344) والترمذى (1/125) وابن ماجه (1817) والطحاوى (1/315) وابن الجارود (180) والدارقطنى (215) والبيهقى (4/130) والطبرانى فى ` الصغير ` (225) من طريق ابن شهاب عن سالم بن عبد الله عن أبيه مرفوعا.
وله طريق أخرى ، يرويه ابن جريج: أخبرنى نافع عن ابن عمر قال: ` كتب رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى أهل اليمن إلى الحارث بن عبد كلال ومن معه من اليمن من معافر وهمدان: أن على المؤمنين صدقة العقار عشر ما سقت العين وسقت السماء ، وعلى ما سقى الغرب نصف العشر `
أخرجه ابن أبى شيبة (4/22) {و} الدارقطنى والبيهقى بسند صحيح.
وورد الحديث عن جابر بن عبد الله ، وأبى هريرة ومعاذ بن جبل ، وعبد الله بن عمرو وعمرو بن حزم.
أما حديث جابر ، فيرويه أبو الزبير أنه سمع جابر بن عبد الله يذكر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: فذكره نحوه.
أخرجه مسلم وأبو داود والنسائى والطحاوى وابن الجارود والدارقطنى والبيهقى وأحمد (3/353) وقال البيهقى: ` إسناده صحيح `.
وأما حديث أبى هريرة فيرويه الحارث بن عبد الرحمن بن أبى ذياب عن سليمان بن يسار وبسر بن سعيد عن أبى هريرة به.
أخرجه ابن ماجه والترمذى وقال: ` وقد روى هذا الحديث عن بكير بن عبد الله بن الأشج عن سليمان بن يسار وبسر بن سعيد عن النبى صلى الله عليه وسلم مرسلا ، وكأن هذا أصح. وقد صح حديث ابن عمر عن النبى صلى الله عليه وسلم فى هذا الباب `.
وأما حديث معاذ بن جبل فيرويه عاصم بن أبى النجود عن أبى وائل عنه.
أخرجه النسائى والدارمى (1/393) وابن ماجه (1818) والطحاوى والدارقطنى وأحمد (5/233) ، وأدخل بعضهم بينه وبين أبى وائل مسروقا.
والسند حسن.
وأما حديث عبد الله بن عمرو فيرويه ابن أبى ليلى عن عبد الكريم عن عمرو بن شعيب عن أبيه عن جده مرفوعا.
أخرجه ابن أبى شيبة ، وسنده ضعيف.
وأما حديث عمرو بن حزم ، فيرويه أبو بكر بن محمد بن عمرو بن حزم عن أبيه عن جده أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كتب إلى أهل اليمن بكتاب فيه الفرائض والسنن ، وكتب فيه: ` ما سقت السماء أو كان سيحا أو بعلا فيه العشر إذا بلغ خمسة أوسق ، وما سقى بالرشاء أو بالدالية ففيه نصف العشر إذا بلغ خمسة أوسق `.
أخرجه الطحاوى (1/315) والحاكم (1/395 ـ 397) وصححه
ووافقه الذهبى وفى ` فيض البارى ` للشيخ الكشميرى الحنفى (3/46) : ` وإسناده قوى ` وفى ذلك نظر بينه الحافظ فى ` التهذيب ` وفيه زيادة عزيزة ليست فى شىء من الطرق الأخرى ، ولكن لها شواهد تقويه ، ويأتى بعضها قريبا.
৭৯৯ - (হাদীস: `যে ফসল আকাশ ও ঝর্ণার পানি দ্বারা সিক্ত হয় অথবা যা আছারিয়া (১) (বৃষ্টির পানিতে স্বয়ংক্রিয়ভাবে উৎপন্ন) হয়, তাতে উশর (দশ ভাগের এক ভাগ), আর যা সেচের মাধ্যমে সিক্ত হয়, তাতে নিসফু’ল উশর (বিশ ভাগের এক ভাগ) দিতে হবে।`) এটি বুখারী বর্ণনা করেছেন।
শাইখ নাসিরুদ্দীন আল-আলবানী কর্তৃক তাহক্বীক্ব (পর্যালোচনা): * সহীহ
এটি বুখারী (১/৩৭৭), আবূ দাঊদ (১৫৯৬), নাসাঈ (১/৩৪৪), তিরমিযী (১/১২৫), ইবনু মাজাহ (১৮১৭), ত্বাহাভী (১/৩১৫), ইবনু জারূদ (১৮০), দারাকুতনী (২১৫), বাইহাক্বী (৪/১৩০) এবং ত্বাবারানী তাঁর ‘আস-সাগীর’ (২২৫) গ্রন্থে ইবনু শিহাবের সূত্রে, তিনি সালিম ইবনু আব্দুল্লাহ থেকে, তিনি তাঁর পিতা (আব্দুল্লাহ ইবনু উমার) (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পর্যন্ত উন্নীত) হিসেবে বর্ণনা করেছেন।
এর আরেকটি সূত্র রয়েছে, যা ইবনু জুরাইজ বর্ণনা করেছেন: আমাকে নাফি’ খবর দিয়েছেন, তিনি ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেন, তিনি বলেন: `রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ইয়ামানবাসীদের নিকট, বিশেষত আল-হারিস ইবনু আব্দে কুলাল এবং তার সাথে ইয়ামানের মা’আফির ও হামদান গোত্রের লোকদের নিকট লিখেছিলেন: মুমিনদের উপর ফসলের যাকাত (সাদাকাতুল ‘আক্বার) ফরয। যা ঝর্ণার পানি ও আকাশের পানি দ্বারা সিক্ত হয়, তাতে উশর (দশ ভাগের এক ভাগ), আর যা ‘গারব’ (বড় বালতি বা সেচের যন্ত্র) দ্বারা সিক্ত হয়, তাতে নিসফু’ল উশর (বিশ ভাগের এক ভাগ) দিতে হবে।`
এটি ইবনু আবী শাইবাহ (৪/২২), দারাকুতনী এবং বাইহাক্বী সহীহ সানাদে (সূত্রে) বর্ণনা করেছেন।
এই হাদীসটি জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ, আবূ হুরাইরাহ, মু’আয ইবনু জাবাল, আব্দুল্লাহ ইবনু আমর এবং আমর ইবনু হাযম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও বর্ণিত হয়েছে।
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটি আবূয যুবাইর বর্ণনা করেছেন যে, তিনি জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছেন যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: অতঃপর তিনি অনুরূপ হাদীসটি উল্লেখ করেন।
এটি মুসলিম, আবূ দাঊদ, নাসাঈ, ত্বাহাভী, ইবনু জারূদ, দারাকুতনী, বাইহাক্বী এবং আহমাদ (৩/৩৫৩) বর্ণনা করেছেন। বাইহাক্বী বলেছেন: `এর ইসনাদ (সূত্র) সহীহ।`
আর আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটি আল-হারিস ইবনু আব্দুর রহমান ইবনু আবী যিয়াব বর্ণনা করেছেন, তিনি সুলাইমান ইবনু ইয়াসার ও বুসর ইবনু সাঈদ থেকে, তাঁরা আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এটি বর্ণনা করেছেন।
এটি ইবনু মাজাহ ও তিরমিযী বর্ণনা করেছেন। তিরমিযী বলেছেন: `এই হাদীসটি বুকাইর ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনুল আশাজ্জ-এর সূত্রে সুলাইমান ইবনু ইয়াসার ও বুসর ইবনু সাঈদ থেকে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে মুরসাল (সাহাবীর নাম উল্লেখ ছাড়া সরাসরি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণিত) হিসেবেও বর্ণিত হয়েছে। সম্ভবত এটিই অধিক সহীহ। তবে এই অধ্যায়ে ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত হাদীসটি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে সহীহ প্রমাণিত।`
আর মু’আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটি ‘আসিম ইবনু আবী নুজূদ বর্ণনা করেছেন, তিনি আবূ ওয়ায়েল থেকে, তিনি মু’আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে।
এটি নাসাঈ, দারিমী (১/৩৯৩), ইবনু মাজাহ (১৮১৮), ত্বাহাভী, দারাকুতনী এবং আহমাদ (৫/২৩৩) বর্ণনা করেছেন। কেউ কেউ তাঁর (মু’আয) ও আবূ ওয়ায়েলের মাঝে মাসরূক-কে অন্তর্ভুক্ত করেছেন।
আর এই সানাদ (সূত্র) হাসান (Hasan)।
আর আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটি ইবনু আবী লায়লা বর্ণনা করেছেন, তিনি আব্দুল কারীম থেকে, তিনি আমর ইবনু শু’আইব থেকে, তিনি তাঁর পিতা থেকে, তিনি তাঁর দাদা থেকে মারফূ’ হিসেবে বর্ণনা করেছেন।
এটি ইবনু আবী শাইবাহ বর্ণনা করেছেন, এবং এর সানাদ যঈফ (Da'if)।
আর আমর ইবনু হাযম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটি আবূ বাকর ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু আমর ইবনু হাযম বর্ণনা করেছেন, তিনি তাঁর পিতা থেকে, তিনি তাঁর দাদা থেকে যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ইয়ামানবাসীদের নিকট একটি কিতাব লিখেছিলেন, যাতে ফরযসমূহ ও সুন্নাতসমূহ উল্লেখ ছিল। তাতে তিনি লিখেছিলেন: `যা আকাশ দ্বারা সিক্ত হয় অথবা যা স্বয়ংক্রিয়ভাবে প্রবাহিত হয় (সাইহান) অথবা যা বৃষ্টির পানিতে উৎপন্ন হয় (বা’লান), তাতে উশর (দশ ভাগের এক ভাগ) দিতে হবে, যখন তা পাঁচ ওয়াসাক্ব পরিমাণ হবে। আর যা রশি (রিশা) বা ডালিয়াহ (সেচের যন্ত্র) দ্বারা সিক্ত হয়, তাতে নিসফু’ল উশর (বিশ ভাগের এক ভাগ) দিতে হবে, যখন তা পাঁচ ওয়াসাক্ব পরিমাণ হবে।`
এটি ত্বাহাভী (১/৩১৫) এবং হাকিম (১/৩৯৫-৩৯৭) বর্ণনা করেছেন এবং তিনি (হাকিম) এটিকে সহীহ বলেছেন এবং যাহাবীও তাঁর সাথে একমত পোষণ করেছেন।
আর হানাফী শাইখ আল-কাশমীরী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর ‘ফাইযুল বারী’ (৩/৪৬) গ্রন্থে রয়েছে: `এবং এর ইসনাদ শক্তিশালী (ক্বাওয়ী)`। তবে এ বিষয়ে আপত্তি রয়েছে, যা হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আত-তাহযীব’ গ্রন্থে স্পষ্ট করেছেন। এতে একটি মূল্যবান অতিরিক্ত অংশ (যিয়াদাহ আযীযাহ) রয়েছে, যা অন্য কোনো সূত্রে পাওয়া যায় না, কিন্তু এর এমন কিছু শাহেদ (সমর্থক বর্ণনা) রয়েছে যা এটিকে শক্তিশালী করে। এর কিছু অংশ শীঘ্রই আসছে।
*800* - (حديث: ` ليس فيما دون خمسة أوسق صدقة ` متفق عليه (ص 189) .
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح.
أخرجه البخارى (1/355) ومسلم (3/66) ومالك (1/244/2) وأبو نعيم فى ` المستخرج ` (16/37/2) وأبو داود (1558) والنسائى (1/342) والترمذى (1/122) والدارمى (1/384 ـ 385) وابن ماجه (1793) وأبو عبيد (424/1175
و1176) والطحاوى (1/314) وابن أبى شيبة (4/7 و10 ـ 11 و18) وابن الجارود (173 و181) والدارقطنى (215) والبيهقى (4/120) والطيالسى (2197) وأحمد (3/6 و30 و45 و59 و60 و73 و74 و79 و86 و97) من طرق عن أبى سعيد الخدرى قال: قال النبى صلى الله عليه وسلم: ` ليس فيما دون خمس أواق صدقة ، ولا فيما دون خمس ذود صدقة ، وليس فيما دون خمسة أوسق صدقة `.
وفى رواية لمسلم ` ليس فى حب ولا تمر صدقة حتى يبلغ خمسة أوسق `. وسيذكرهاالمؤلف قريبا.
وقال الترمذى: ` حديث حسن صحيح `.
وزاد أحمد فى رواية من طريق أبى البخترى عن أبى سعيد: ` والوسق ستون مختوما `.
وهى عند ابن ماجه (1832) وأبى عبيد (517 و1589) وأبى داود
أيضا (1559) وأعله بقوله: ` أبو البخترى لم يسمع من أبى سعيد `.
قلت: وكذا قال أبو حاتم ، لكن الدارقطنى أخرجها من طريق أخرى ، إلا أن فيها عبد الله بن صالح وأبو بكر بن عياش وفيهما ضعف ويأتى (803) لها شاهد من حديث جابر.
وللحديث شاهد من حديث جابر.
أخرجه مسلم وأبو نعيم وابن ماجه (1794) والطحاوى والطيالسى (1702) وأحمد (3/296) وسيأتى لفظه (رقم 816) .
وآخر من حديث ابن عمر.
أخرجه الطحاوى والبيهقى وأحمد (2/92) عن ليث عن نافع عنه.
وليث هو ابن أبى سليم وهو ضعيف ، وليس هو ابن سعد الثقة الإمام وإن كان يروى أيضا عن نافع.
(800/1) - (حديث: `لا زكاة في حب ولا ثمر حتى يبلغ خمسة أوسق`. رواه مسلم) . (ص789)
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح.
وهو رواية لمسلم من حديث أبي سعيد المتقدم قبله، لكنه بلفظ: `ليس في حب ولا تمر (وفي رواية: ثمر) صدقة حتى …
ورواه البيهقي (4/128) وابن الجارود.
*৮০০* - (হাদীস: ‘পাঁচ ওসাকের কম পরিমাণে কোনো সাদাকাহ (যাকাত) নেই।’ মুত্তাফাকুন আলাইহি। (পৃ. ১৮৯)।
শাইখ নাসিরুদ্দীন আল-আলবানী কর্তৃক তাহক্বীক্ব (পর্যালোচনা): * সহীহ (বিশুদ্ধ)।
এটি সংকলন করেছেন: বুখারী (১/৩৫৫), মুসলিম (৩/৬৬), মালিক (১/২৪৪/২), আবূ নুআইম তাঁর ‘আল-মুসতাখরাজ’ গ্রন্থে (১৬/৩৭/২), আবূ দাঊদ (১৫৫৮), নাসাঈ (১/৩৪২), তিরমিযী (১/১২২), দারিমী (১/৩৮৪-৩৮৫), ইবনু মাজাহ (১৭৯৩), আবূ উবাইদ (৪২৪/১১৭৫ ও ১১৭৬), ত্বাহাভী (১/৩১৪), ইবনু আবী শাইবাহ (৪/৭, ১০-১১ ও ১৮), ইবনুল জারূদ (১৭৩ ও ১৮১), দারাকুতনী (২১৫), বাইহাক্বী (৪/১২০), ত্বায়ালিসী (২১৯৭) এবং আহমাদ (৩/৬, ৩০, ৪৫, ৫৯, ৬০, ৭৩, ৭৪, ৭৯, ৮৬ ও ৯৭)।
তাঁরা বিভিন্ন সূত্রে আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ‘পাঁচ আওক্বিয়ার কম পরিমাণে কোনো সাদাকাহ নেই, পাঁচ যওদের কম পরিমাণে কোনো সাদাকাহ নেই এবং পাঁচ ওসাকের কম পরিমাণে কোনো সাদাকাহ নেই।’
মুসলিমের একটি বর্ণনায় এসেছে: ‘শস্য বা খেজুরের মধ্যে পাঁচ ওসাক না পৌঁছা পর্যন্ত কোনো সাদাকাহ নেই।’ লেখক (ইবনু কুদামাহ) শীঘ্রই এটি উল্লেখ করবেন।
আর তিরমিযী বলেছেন: ‘হাদীসটি হাসান সহীহ।’
আহমাদ আবূল বাখতারী সূত্রে আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত একটি বর্ণনায় অতিরিক্ত যোগ করেছেন: ‘আর এক ওসাক হলো ষাট মুখতূম (মানদণ্ড)।’
এটি ইবনু মাজাহ (১৮৩২), আবূ উবাইদ (৫১৭ ও ১৫৮৯) এবং আবূ দাঊদ (১৫৫৯)-এর নিকটও রয়েছে। আবূ দাঊদ এই হাদীসটিকে ত্রুটিযুক্ত (আ'ল্লাহু) ঘোষণা করেছেন এই বলে: ‘আবূল বাখতারী আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে শোনেননি।’
আমি (আলবানী) বলি: আবূ হাতিমও অনুরূপ বলেছেন। কিন্তু দারাকুতনী এটি অন্য সূত্রে সংকলন করেছেন। তবে সেই সূত্রে আব্দুল্লাহ ইবনু সালিহ এবং আবূ বাকর ইবনু আইয়াশ রয়েছেন, আর তাদের উভয়ের মধ্যেই দুর্বলতা (দা'ফ) রয়েছে। জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস থেকে এর একটি শাহেদ (সমর্থক বর্ণনা) আসছে (৮০৩ নম্বরে)।
এই হাদীসের জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস থেকে একটি শাহেদ (সমর্থক বর্ণনা) রয়েছে। এটি সংকলন করেছেন মুসলিম, আবূ নুআইম, ইবনু মাজাহ (১৭৯৪), ত্বাহাভী, ত্বায়ালিসী (১৭০২) এবং আহমাদ (৩/২৯৬)। এর শব্দাবলী শীঘ্রই আসবে (৮১৬ নম্বর)।
এবং ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস থেকে আরেকটি শাহেদ রয়েছে। এটি সংকলন করেছেন ত্বাহাভী, বাইহাক্বী এবং আহমাদ (২/৯২) লায়স সূত্রে নাফি’ থেকে, তিনি ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে। আর লায়স হলেন ইবনু আবী সুলাইম, এবং তিনি যঈফ (দুর্বল)। তিনি বিশ্বস্ত ইমাম লায়স ইবনু সা’দ নন, যদিও তিনিও নাফি’ থেকে বর্ণনা করেন।
*(৮০০/১) - (হাদীস: ‘শস্য বা ফল-ফলাদিতে যাকাত নেই, যতক্ষণ না তা পাঁচ ওসাক পরিমাণে পৌঁছায়।’ এটি মুসলিম বর্ণনা করেছেন।) (পৃ. ৭৮৯)*
শাইখ নাসিরুদ্দীন আল-আলবানী কর্তৃক তাহক্বীক্ব: * সহীহ।
এটি হলো পূর্বোক্ত আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসেরই মুসলিমের একটি বর্ণনা, তবে এর শব্দাবলী হলো: ‘শস্য বা খেজুরের মধ্যে (অন্য বর্ণনায়: ফল-ফলাদি) সাদাকাহ নেই, যতক্ষণ না...’ এটি বাইহাক্বী (৪/১২৮) এবং ইবনুল জারূদও বর্ণনা করেছেন।
*801* - (روى موسى بن طلحة: ` أن معاذا لم يأخذ من الخضروات صدقة ` (ص 190) .
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح.
رواه ابن أبى شيبة (4/19) عن وكيع عن عمرو بن عثمان عن موسى بن طلحة أن معاذا لما قدم اليمن لم يأخذ الزكاة إلا فى الحنطة والشعير
والتمر والزبيب.
ورجاله ثقات لولا أنه منقطع بين موسى ومعاذ.
لكن أخرجه الدارقطنى (201) والحاكم (1/401) وعنه البيهقى (4/128 ـ 129) عن عبد الرحمن بن مهدى حدثنا سفيان عن عمرو بن عثمان عن موسى بن طلحة قال: ` عندنا كتاب معاذ عن النبى صلى الله عليه وسلم أنه إنما أخذ الصدقة من الحنطة والشعير والزبيب والتمر `.
وقال الحاكم: ` هذا حديث قد احتجا بجميع رواته ، وموسى بن طلحة تابعى كبير ، لا ينكر أن يدرك أيام معاذ `.
ووافقه الذهبى فقال: ` على شرطهما `.
وقد تعقبه صاحب التنقيح بالانقطاع الذى أشرنا إليه فقال: ` قال أبو زرعة: موسى بن طلحة بن عبيد الله عن عمر مرسل ، ومعاذ توفى فى خلافة عمر ، فرواية موسى بن طلحة عنه أولى بالإرسال ` ذكره فى ` نصب الراية ` (2/386) .
وأقول: لا وجه عندى لإعلال هذا السند بالإرسال ، لأن موسى إنما يرويه عن كتاب معاذ ، ويصرح بأنه كان عنده فهى رواية من طريق الوجادة وهى حجة على الراجح من أقوال علماء أصول الحديث ، ولا قائل باشتراط اللقاء مع صاحب الكتاب.
وإنما يشترط الثقة بالكتاب وأنه غير مدخول. فإذا كان موسى ثقة ويقول: ` عندنا كتاب معاذ ` بذلك ، فهى وجادة من أقوى الوجادات لقرب العهد بصاحب الكتاب. والله أعلم.
ويشهد له ما روى أبو حذيفة حدثنا سفيان عن طلحة بن يحيى عن أبى بردة عن أبى موسى ومعاذ بن جبل حين بعثهما رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى اليمن يعلمان الناس أمر دينهم:
` لا تأخذوا الصدقة إلا من هذه الأربعة: الشعير ، والحنطة ، والزبيب ، والتمر `.
أخرجه الدارقطنى والحاكم وقال: ` إسناد صحيح `. ووافقه الذهبى. وأقره الزيلعى فى ` نصب الراية ` (2/389) ، إلا أنه قال:
` قال الشيخ فى ` الإمام `: وهذا غير صريح فى الرفع `.
قلت: لكنه ظاهر فى ذلك إن لم يكن صريحا ، فإن الحديث لا يحتمل إلا أحد أمرين ، إما أن يكون من قوله صلى الله عليه وسلم ، أو من قول أبى موسى ومعاذ ، والثانى ممنوع ، لأنه لا يعقل أن يخاطب الصحابيان به النبى صلى الله عليه وسلم ، والقول بأنهما خاطبا به أصحابهما يبطله أن ذلك إنما قيل فى زمن بعث النبى صلى الله عليه وسلم إياهما إلى اليمن ، فتعين أنه هو الذى خاطبهما بذلك ، وثبت أنه مرفوع قطعا.
ومما يؤيد أن أصل الحديث مرفوع أن أبا عبيد أخرجه فى ` الأموال ` (1174 و1175) من طرق عن عمرو بن عثمان بن عبد الله بن موهب ـ مولى آل طلحة ـ قال: سمعت موسى بن طلحة يقول: ` أمر رسول الله صلى الله عليه وسلم معاذ بن جبل حين بعثه إلى اليمن أن يأخذ الصدقة من الحنطة والشعير والنخل ، والعنب `.
وهذا سند صحيح مرسل ، وهو صريح فى الرفع ، ولا يضر إرساله لأمرين:
الأول: أنه صح موصولا عن معاذ كما تقدم من رواية ابن مهدى عن سفيان عن عمرو ابن عثمان.
الثانى: أن عبد الله بن الوليد العدنى ـ وهو ثقة ـ رواه عن سفيان به وزاد فيه: ` قال: بعث الحجاج بموسى بن المغيرة على الخضر والسواد ، فأراد أن
يأخذ من الخضر الرطاب والبقول ، فقال موسى بن طلحة عندنا كتاب معاذ عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه أمره أن يأخذ من الحنطة والشعير والتمر والزبيب. قال: فكتب إلى الحجاج فى ذلك ، فقال: صدق `.
رواه البيهقى (4/129) . ثم روى من طريق عطاء بن السائب قال: ` أراد موسى بن المغيرة أن يأخذ من خضر أرض موسى بن طلحة فقال له موسى بن طلحة: انه ليس فى الخضر شىء. ورواه عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: فكتبوا بذلك إلى الحجاج ، فكتب الحجاج أن موسى بن طلحة أعلم من موسى بن المغيرة `.
ومن هذا الوجه عزاه فى ` المنتقى ` (4/29) للأثرم فى سننه ، ثم قال: ` وهو من أقوى المراسيل ، لاحتجاج من أرسله به `.
قلت: فلولا أن الحديث صحيح عند موسى بن طلحة لما احتج به إن شاء الله تعالى.
وللحديث طرق أخرى متصلة ومرسلة ، وقد اقتصرت هنا على أقواها ، فمن أراد الإطلاع على سائرها فليراجع ` نصب الراية ` و` التلخيص ` ، و` نيل الأوطار ` للشوكانى ، وقد ذهب فيه إلى تقوية الحديث بطرقه ونقله عن البيهقى وهو الحق.
৮০১ - (মূসা ইবনু তালহা (রাহিমাহুল্লাহ) বর্ণনা করেন: ‘মু‘আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) শাক-সবজি থেকে সাদাকাহ (যাকাত) গ্রহণ করেননি।’ (পৃ. ১৯০)।
শাইখ নাসিরুদ্দীন আল-আলবানী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর তাহক্বীক্ব: * সহীহ।
এটি ইবনু আবী শাইবাহ (৪/১৯) ওয়াকী‘ (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে, তিনি ‘আমর ইবনু উসমান (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে, তিনি মূসা ইবনু তালহা (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণনা করেছেন যে, মু‘আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন ইয়ামানে আগমন করলেন, তখন তিনি গম, যব, খেজুর ও কিশমিশ ব্যতীত অন্য কিছুতে যাকাত গ্রহণ করেননি।
এর বর্ণনাকারীগণ নির্ভরযোগ্য (ছিক্বাহ), তবে মূসা (রাহিমাহুল্লাহ) ও মু‘আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মাঝে ইনক্বিতা‘ (বিচ্ছিন্নতা) রয়েছে।
কিন্তু এটি দারাকুতনী (২০১), হাকিম (১/৪০১) এবং তাঁর সূত্রে বাইহাক্বী (৪/১২৮-১২৯) বর্ণনা করেছেন ‘আব্দুর রহমান ইবনু মাহদী (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে। তিনি বলেন, আমাদেরকে সুফিয়ান (রাহিমাহুল্লাহ) হাদীস বর্ণনা করেছেন ‘আমর ইবনু উসমান (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে, তিনি মূসা ইবনু তালহা (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে। তিনি বলেন: ‘আমাদের নিকট মু‘আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পক্ষ থেকে নবী সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর একটি কিতাব (পত্র) রয়েছে, যাতে তিনি গম, যব, কিশমিশ ও খেজুর ব্যতীত অন্য কিছু থেকে সাদাকাহ গ্রহণ করেননি।’
হাকিম (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: ‘এই হাদীসের সকল বর্ণনাকারী দ্বারা (বুখারী ও মুসলিম) দলীল গ্রহণ করেছেন। আর মূসা ইবনু তালহা (রাহিমাহুল্লাহ) একজন বড় তাবেঈ, তিনি মু‘আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর যুগ পেয়েছেন—এটা অস্বীকার করা যায় না।’
যাহাবী (রাহিমাহুল্লাহ) তাঁর সাথে একমত পোষণ করে বলেন: ‘এটি তাঁদের (বুখারী ও মুসলিমের) শর্তানুযায়ী।’
কিন্তু ‘তানক্বীহ’ গ্রন্থের লেখক সেই ইনক্বিতা‘ (বিচ্ছিন্নতা) দ্বারা এর সমালোচনা করেছেন, যার প্রতি আমরা ইঙ্গিত করেছি। তিনি বলেন: ‘আবূ যুর‘আহ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: মূসা ইবনু তালহা ইবনু ‘উবাইদুল্লাহ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা মুরসাল (বিচ্ছিন্ন)। আর মু‘আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফতকালে ইন্তিকাল করেন। সুতরাং মূসা ইবনু তালহা (রাহিমাহুল্লাহ)-এর তাঁর থেকে বর্ণনা মুরসাল হওয়ার অধিক উপযুক্ত।’ এটি তিনি ‘নাসবুর রায়াহ’ (২/৩৮৬)-তে উল্লেখ করেছেন।
আমি (আলবানী) বলি: আমার মতে এই সনদকে ইরসাল (বিচ্ছিন্নতা) দ্বারা ত্রুটিযুক্ত করার কোনো কারণ নেই। কারণ মূসা (রাহিমাহুল্লাহ) এটি মু‘আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কিতাব (পত্র) থেকে বর্ণনা করেছেন এবং স্পষ্টভাবে বলেছেন যে, তা তাঁর নিকট ছিল। সুতরাং এটি ‘আল-ওয়াজাদাহ’ (লিখিত পাণ্ডুলিপি প্রাপ্তি)-এর মাধ্যমে বর্ণনা, যা উসূলুল হাদীসের অধিকাংশ আলেমের মতে দলীল হিসেবে গ্রহণযোগ্য। আর কিতাবের (পত্রের) লেখকের সাথে সাক্ষাতের শর্তারোপ করার কোনো প্রবক্তা নেই।
বরং শর্ত হলো কিতাবটির নির্ভরযোগ্যতা এবং তাতে কোনো ভেজাল না থাকা। যখন মূসা (রাহিমাহুল্লাহ) নির্ভরযোগ্য (ছিক্বাহ) এবং তিনি বলেন: ‘আমাদের নিকট মু‘আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এই কিতাবটি রয়েছে,’ তখন কিতাবের লেখকের নিকটবর্তী সময়ের কারণে এটি ওয়াজাদাহ-এর শক্তিশালী প্রকারগুলোর মধ্যে গণ্য হবে। আল্লাহই সর্বাধিক অবগত।
এর সমর্থনে আবূ হুযাইফাহ (রাহিমাহুল্লাহ) কর্তৃক বর্ণিত হাদীসটি পেশ করা যায়। তিনি বলেন, আমাদেরকে সুফিয়ান (রাহিমাহুল্লাহ) হাদীস বর্ণনা করেছেন তালহা ইবনু ইয়াহইয়া (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে, তিনি আবূ বুরদাহ (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে, তিনি আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও মু‘আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁদেরকে ইয়ামানে প্রেরণ করেন মানুষকে তাদের দ্বীনের বিষয়াদি শিক্ষা দেওয়ার জন্য:
‘তোমরা এই চারটি জিনিস ব্যতীত অন্য কিছু থেকে সাদাকাহ (যাকাত) গ্রহণ করবে না: যব, গম, কিশমিশ এবং খেজুর।’
এটি দারাকুতনী ও হাকিম বর্ণনা করেছেন। হাকিম (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: ‘এর সনদ সহীহ।’ যাহাবী (রাহিমাহুল্লাহ) তাঁর সাথে একমত পোষণ করেছেন। যাইলা‘ঈ (রাহিমাহুল্লাহ) ‘নাসবুর রায়াহ’ (২/৩৮৯)-তে এটিকে সমর্থন করেছেন, তবে তিনি বলেছেন: ‘শাইখ ‘আল-ইমাম’ গ্রন্থে বলেছেন: এটি মারফূ‘ (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দিকে সম্পর্কিত) হওয়ার ক্ষেত্রে সুস্পষ্ট নয়।’
আমি (আলবানী) বলি: যদি এটি সুস্পষ্ট নাও হয়, তবুও এটি সেদিকেই ইঙ্গিত করে। কারণ হাদীসটি দুটি বিষয়ের মধ্যে একটি ছাড়া অন্য কিছু বহন করে না: হয় এটি নবী সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর উক্তি, অথবা আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও মু‘আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উক্তি। দ্বিতীয়টি (সাহাবীদের উক্তি হওয়া) নিষিদ্ধ, কারণ এটা বোধগম্য নয় যে, দুই সাহাবী এই কথা দ্বারা নবী সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে সম্বোধন করবেন। আর এই কথা বলা যে, তাঁরা তাঁদের সাথীদেরকে এই কথা দ্বারা সম্বোধন করেছেন—তা বাতিল হয়ে যায় এই কারণে যে, এই কথাটি তখনই বলা হয়েছিল যখন নবী সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁদেরকে ইয়ামানে প্রেরণ করেছিলেন। সুতরাং এটি নিশ্চিত যে, তিনিই (নবী সাঃ) তাঁদেরকে এই কথা দ্বারা সম্বোধন করেছিলেন, এবং এটি নিশ্চিতভাবে মারফূ‘ হিসেবে প্রমাণিত।
এই হাদীসের মূল অংশটি মারফূ‘ হওয়ার সমর্থনে আরেকটি বিষয় হলো, আবূ ‘উবাইদ (রাহিমাহুল্লাহ) এটি ‘আল-আমওয়াল’ (১১৭৪ ও ১১৭৫)-এ ‘আমর ইবনু ‘উসমান ইবনু ‘আব্দিল্লাহ ইবনু মাওহিব—যিনি আল-ই তালহার মুক্তদাস—তাঁর সূত্রে বিভিন্ন সনদে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: আমি মূসা ইবনু তালহা (রাহিমাহুল্লাহ)-কে বলতে শুনেছি: ‘রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম মু‘আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে যখন ইয়ামানে প্রেরণ করেন, তখন তাঁকে গম, যব, খেজুর এবং আঙ্গুর থেকে সাদাকাহ (যাকাত) গ্রহণ করার নির্দেশ দেন।’
এই সনদটি সহীহ মুরসাল। এটি মারফূ‘ হওয়ার ক্ষেত্রে সুস্পষ্ট। এর ইরসাল (বিচ্ছিন্নতা) দুটি কারণে ক্ষতিকর নয়:
প্রথমত: এটি মু‘আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মাওসূল (সংযুক্ত) হিসেবে সহীহ প্রমাণিত হয়েছে, যেমনটি পূর্বে ইবনু মাহদী (রাহিমাহুল্লাহ) কর্তৃক সুফিয়ান (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে, তিনি ‘আমর ইবনু ‘উসমান (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত হাদীসে উল্লেখ করা হয়েছে।
দ্বিতীয়ত: ‘আব্দুল্লাহ ইবনু ওয়ালীদ আল-‘আদানী (রাহিমাহুল্লাহ)—যিনি নির্ভরযোগ্য (ছিক্বাহ)—তিনি সুফিয়ান (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে এটি বর্ণনা করেছেন এবং তাতে অতিরিক্ত যোগ করেছেন: ‘তিনি বলেন: হাজ্জাজ (ইবনু ইউসুফ) মূসা ইবনু মুগীরাহ (রাহিমাহুল্লাহ)-কে শাক-সবজি ও শস্যক্ষেত্রের (আল-খাদর ওয়াস-সাওয়াদ) দায়িত্বে প্রেরণ করেন। তিনি শাক-সবজি থেকে তাজা ফল ও ডালপালা নিতে চাইলেন। তখন মূসা ইবনু তালহা (রাহিমাহুল্লাহ) বললেন: আমাদের নিকট রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর পক্ষ থেকে মু‘আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর একটি কিতাব (পত্র) রয়েছে, যাতে তিনি তাঁকে গম, যব, খেজুর ও কিশমিশ থেকে (যাকাত) গ্রহণ করার নির্দেশ দিয়েছেন। তিনি (মূসা ইবনু মুগীরাহ) বলেন: অতঃপর তিনি (হাজ্জাজ) এ বিষয়ে পত্র লিখলেন, তখন তিনি (হাজ্জাজ) বললেন: সে সত্য বলেছে।’
এটি বাইহাক্বী (৪/১২৯) বর্ণনা করেছেন। অতঃপর তিনি ‘আত্বা ইবনুস সা-ইব (রাহিমাহুল্লাহ)-এর সূত্রে বর্ণনা করেন। তিনি বলেন: ‘মূসা ইবনু মুগীরাহ (রাহিমাহুল্লাহ) মূসা ইবনু তালহা (রাহিমাহুল্লাহ)-এর জমির শাক-সবজি থেকে (যাকাত) নিতে চাইলেন। তখন মূসা ইবনু তালহা (রাহিমাহুল্লাহ) তাঁকে বললেন: শাক-সবজিতে কোনো কিছু (যাকাত) নেই। তিনি এটি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম থেকে বর্ণনা করেন। তিনি বলেন: অতঃপর তাঁরা এ বিষয়ে হাজ্জাজ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর নিকট লিখলেন। তখন হাজ্জাজ (রাহিমাহুল্লাহ) লিখলেন যে, মূসা ইবনু তালহা (রাহিমাহুল্লাহ) মূসা ইবনু মুগীরাহ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর চেয়ে অধিক জ্ঞানী।’
এই সূত্র ধরে ‘আল-মুনতাক্বা’ (৪/২৯)-তে এটিকে আছরাম (রাহিমাহুল্লাহ)-এর ‘সুনান’ গ্রন্থের দিকে সম্পর্কিত করা হয়েছে। অতঃপর তিনি (গ্রন্থকার) বলেন: ‘এটি মুরসাল হাদীসগুলোর মধ্যে সবচেয়ে শক্তিশালী, কারণ যিনি এটি মুরসাল হিসেবে বর্ণনা করেছেন, তিনি এর দ্বারা দলীল পেশ করেছেন।’
আমি (আলবানী) বলি: যদি মূসা ইবনু তালহা (রাহিমাহুল্লাহ)-এর নিকট হাদীসটি সহীহ না হতো, তবে তিনি এর দ্বারা দলীল পেশ করতেন না, ইনশাআল্লাহ।
এই হাদীসের আরও অন্যান্য মুত্তাসিল (সংযুক্ত) ও মুরসাল (বিচ্ছিন্ন) সূত্র রয়েছে। আমি এখানে সেগুলোর মধ্যে সবচেয়ে শক্তিশালীগুলোর উপরই সীমাবদ্ধ থাকলাম। যে ব্যক্তি এর বাকি সূত্রগুলো দেখতে চান, তিনি যেন ‘নাসবুর রায়াহ’, ‘আত-তালখীস’ এবং শাওকানী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর ‘নাইলুল আওত্বার’ গ্রন্থগুলো দেখেন। শাওকানী (রাহিমাহুল্লাহ) সেখানে বাইহাক্বী (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে উদ্ধৃত করে এর সূত্রগুলোর মাধ্যমে হাদীসটিকে শক্তিশালী বলে মত দিয়েছেন, আর এটাই সত্য।
*802* - (وروى الأثرم بإسناده عن سفيان بن عبد الله الثقفى: ` أنه كتب إلى عمر ـ وكان عاملا له على الطائف ـ أن قبله حيطانا فيها من الفرسك (1) والرمان ما هو أكثر غلة من الكروم أضعافا ، فكتب يستأمر فى العشر ، فكتب إليه عمر: أن ليس عليها عشر ، هى من العضاه كلها ، فليس عليها عشر (ص 190)
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * لم أقف على إسناده [1] .
(৮০২) - আর আল-আছরাম তাঁর সনদ (বর্ণনা সূত্র) সহ সুফিয়ান ইবনে আব্দুল্লাহ আস-সাকাফী (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণনা করেছেন: যে তিনি উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে চিঠি লিখেছিলেন—আর তিনি (সুফিয়ান) ছিলেন তায়েফের উপর তাঁর (উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর) গভর্নর—যে তাঁর এলাকায় এমন বাগান রয়েছে যেখানে ফারসাক (১) এবং আনার (ডালিম) রয়েছে, যা আঙ্গুর ক্ষেতের চেয়ে বহুগুণ বেশি ফলন দেয়। অতঃপর তিনি (সুফিয়ান) উশর (দশমাংশ যাকাত) সম্পর্কে পরামর্শ চেয়ে চিঠি লিখলেন। অতঃপর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে লিখে পাঠালেন: যে এর উপর কোনো উশর নেই। এগুলো সবই 'আদাহ' (কাঁটাযুক্ত গাছ/ফল) এর অন্তর্ভুক্ত, সুতরাং এর উপর কোনো উশর নেই। (পৃষ্ঠা ১৯০)
শাইখ নাসিরুদ্দিন আল-আলবানী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর তাহক্বীক্ব:
* আমি এর সনদ খুঁজে পাইনি [১]।
*803* - (خبر: ` الوسق ستون صاعا ` رواه أحمد وابن ماجه (ص 190) .
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف.
وهو من حديث أبى سعيد الخدرى فى رواية عنه وقد سبق ذكر علتها فى الحديث (800) ، لكن له طريق أخرى ، كما تقدم هناك.
وله شاهد يرويه محمد بن عبيد الله عن عطاء بن أبى رباح وأبى الزبير عن جابر ابن عبد الله قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكره.
وقال البوصيرى فى ` الزوائد ` (115/2) : ` هذا إسناد ضعيف ، فيه محمد بن عبيد الله العرزمى ، وهو متروك الحديث ، وله شاهد من حديث أبى سعيد الخدرى ، رواه الشيخان وغيرهما وروى ذلك عن سعيد بن المسيب وعطاء والحسن البصرى والنخعى وغيرهم `.
قلت: حديث أبى سعيد الخدرى عند الشيخين ليس فيه هذا الخبر ، وإنما هو زيادة عند أحمد وابن ماجه فى حديثه المتقدم هناك ، والآثار المشار إليها أخرجها ابن أبى شيبة فى ` المصنف ` (4/18) ، وروى فيه خبر أبى سعيد أيضا ولكنه أوقفه.
*৮০৩* - (বাণী: ‘এক ওয়াসাক হলো ষাট সা’ (صاع)।’ এটি বর্ণনা করেছেন আহমাদ এবং ইবনু মাজাহ (পৃ. ১৯০)।
শাইখ নাসিরুদ্দিন আল-আলবানী কর্তৃক তাহক্বীক্ব (পর্যালোচনা): * যঈফ (দুর্বল)।
এটি আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে বর্ণিত একটি রিওয়ায়াত। এর 'ইল্লাত' (ত্রুটি) সম্পর্কে হাদীস (৮০০)-এ পূর্বে আলোচনা করা হয়েছে। তবে এর আরেকটি সূত্র (ত্বরীক্ব) রয়েছে, যেমনটি সেখানে (পূর্বে) উল্লেখ করা হয়েছে।
এর একটি শাহেদ (সমর্থক বর্ণনা) রয়েছে, যা বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু উবাইদুল্লাহ, তিনি আত্বা ইবনু আবী রাবাহ এবং আবূয যুবাইর থেকে, তাঁরা জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেন। তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তা (বাণীটি) বলেছেন।
আর আল-বূসীরী (রাহিমাহুল্লাহ) ‘আয-যাওয়াইদ’ (২/১১৫)-এ বলেছেন: ‘এই ইসনাদটি যঈফ (দুর্বল)। এতে মুহাম্মাদ ইবনু উবাইদুল্লাহ আল-আরযামী রয়েছেন, আর তিনি ‘মাতরূকুল হাদীস’ (হাদীস বর্ণনায় পরিত্যাজ্য)। এর একটি শাহেদ আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস থেকে রয়েছে, যা শাইখান (বুখারী ও মুসলিম) এবং অন্যান্যরা বর্ণনা করেছেন। আর এটি সাঈদ ইবনুল মুসাইয়্যাব, আত্বা, আল-হাসান আল-বাসরী, আন-নাখঈ এবং অন্যান্যদের থেকেও বর্ণিত হয়েছে।’
আমি (আলবানী) বলছি: শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর নিকট আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর যে হাদীসটি রয়েছে, তাতে এই বাণীটি নেই। বরং এটি আহমাদ এবং ইবনু মাজাহ-এর নিকট তাঁর (আবূ সাঈদের) পূর্বে আলোচিত হাদীসে একটি অতিরিক্ত অংশ (যিয়াদাহ) হিসেবে এসেছে। আর যে সকল আসার (সাহাবী বা তাবেঈদের উক্তি) এর প্রতি ইঙ্গিত করা হয়েছে, তা ইবনু আবী শাইবাহ তাঁর ‘আল-মুসান্নাফ’ (৪/১৮)-এ সংকলন করেছেন। তিনি তাতে আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বাণীটিও বর্ণনা করেছেন, তবে তিনি সেটিকে ‘মাওকূফ’ (সাহাবী পর্যন্ত সীমাবদ্ধ) করেছেন।
*804* - (حديث أبى سعيد مرفوعا: ` ليس فيما دون خمسة أوسق صدقة ` رواه الجماعة.
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح.
وتقدم قريبا (800) .
*৮০৪* - (আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ' সূত্রে বর্ণিত হাদীস: ‘পাঁচ ওয়াসাকের কম পরিমাণের উপর কোনো সাদাকাহ (যাকাত) নেই।’ এটি জামা‘আত (সকল মুহাদ্দিসগণ) বর্ণনা করেছেন।)
শাইখ নাসিরুদ্দীন আল-আলবানী কর্তৃক তাহক্বীক্ব (পর্যালোচনা): *সহীহ*।
আর এটি নিকটেই (৮০০) নং-এ উল্লেখ করা হয়েছে।
*805* - (حديث عائشة: ` أن النبى صلى الله عليه وسلم كان يبعث عبد الله بن رواحة إلى يهود فيخرص عليهم النخل حين يطيب قبل أن يؤكل منه ` رواه أبو داود.
أخرجه أبو داود (1606) وأبو عبيد (483/1438) والبيهقى (4/123) وأحمد (6/163) من طريق ابن جريج قال: أخبرت عن ابن شهاب عن عروة عنها.
قلت: ورجاله ثقات كلهم غير أنه منقطع بين ابن جريج وابن شهاب.
وله شاهد من حديث جابر قال: ` أفاء الله عز وجل خيبر على رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأمرهم [1] رسول الله صلى الله عليه وسلم كما كانوا ، وجعلها بينه وبينهم ، فبعث عبد الله بن رواحة فخرصها عليهم ، ثم قال لهم: يا
معشر اليهود أنتم أبغض الخلق إلى ، قتلتم أنبياء الله عز وجل ، وكذبتم على الله ، وليس يحملنى بغضى إياكم على أن أحيف عليكم ، قد خرصت عشرين ألف وسق من تمر ، فإن شئتم فلكم ، وإن أبيتم فلى ، فقالوا: بهذا قامت السماوات والأرض ، قد أخذنا ، فاخرجوا عنا `.
أخرجه البيهقى وأحمد (3/367) والطحاوى (1/317) .
قلت: وهذا إسناد رجاله ثقات لولا أن أبا الزبير مدلس وقد عنعنه ، لكنه قد صرح بالتحديث فى رواية لأحمد (3/296) من طريق ابن جريج: أخبرنى أبو الزبير أنه سمع جابر بن عبد الله يقول: ` خرصها ابن رواحة أربعين ألف وسق ، وزعم أن اليهود لما خيرهم ابن رواحة أخذوا التمر وعليهم عشرون ألف وسق `.
قلت: وهذا سند صحيح على شرط مسلم. ورواه ابن أبى شيبة (4/49) معنعنا.
وله شاهد آخر من حديث ابن عمر: ` أن النبى صلى الله عليه وسلم بعث ابن رواحة إلى خيبر يخرص عليهم ، ثم خيرهم أن يأخذوا أو يردوا ، فقالوا: هذا هو الحق ، بهذا قامت السماوات والأرض `.
أخرجه أحمد (2/24) ورجاله ثقات غير العمرى وهو عبد الله بن عمر العمرى المكبر وهى سىء الحفظ ، لكن تابعه عبد الله بن نافع ، عند الطحاوى (1/316) وهو ضعيف أيضا ، غير أن أحدهما يقوى الآخر.
وعن عتاب بن أسيد أن النبى صلى الله عليه وسلم كان يبعث على الناس من يخرص عليهم كرومهم وثمارهم `.
أخرجه أبو داود (1603) والترمذى (1/125) والبيهقى (4/122) وقال الترمذى ` حديث حسن ` من طريقين عن ابن شهاب عن سعيد بن المسيب عن عتاب به.
وأخرجه مالك (2/703) عن ابن شهاب عن سعيد بن المسيب مرسلا نحوه.
قلت: وهذا أصح.
وعن ابن عباس: ` ان النبى صلى الله عليه وسلم حين افتتح خيبر اشترط عليهم أن له الأرض ، وكل صفراء وبيضاء ، يعنى الذهب والفضة وقال له أهل خيبر: نحن أعلم بالأرض ، فأعطناها على أن نعملها ويكون لنا نصف الثمرة ، ولكم نصفها ، فزعم أنه أعطاهم على ذلك. فلما كان حين يصرم النخل ، بعث إليهم ابن رواحة فحزر النخل وهو الذى يدعونه أهل المدينة ، الخرص ، فقال: فى ذا: كذا وكذا ، فقالوا: هذا الحق ، وبه تقوم السماء والأرض فقالوا: قد رضينا أن نأخذ بالذى قلت ` رواه ابن ماجه (1820) وإسناده جيد.
*৮০৫* - (আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর হাদীস: ‘নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আব্দুল্লাহ ইবনু রাওয়াহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ইয়াহূদীদের নিকট পাঠাতেন, যেন তিনি খেজুর পাকার পর, তা খাওয়ার উপযুক্ত হওয়ার পূর্বে তাদের উপর খেজুরের অনুমান (খরস) করেন।’ এটি আবূ দাঊদ বর্ণনা করেছেন।
এটি আবূ দাঊদ (১৬০৬), আবূ উবাইদ (৪৮৩/১৪৩৮), আল-বায়হাকী (৪/১২৩) এবং আহমাদ (৬/১৬৩) ইবনু জুরাইজ-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন। তিনি (ইবনু জুরাইজ) বলেন: আমাকে ইবনু শিহাব থেকে, তিনি উরওয়াহ থেকে, তিনি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে (এই হাদীস) সম্পর্কে অবহিত করেছেন।
আমি বলি: এর বর্ণনাকারীগণ সকলেই নির্ভরযোগ্য (ছিকাহ), তবে ইবনু জুরাইজ এবং ইবনু শিহাবের মাঝে ইনকিতা’ (বিচ্ছিন্নতা) রয়েছে।
এর একটি শাহেদ (সমর্থক বর্ণনা) জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস থেকে পাওয়া যায়। তিনি বলেন: ‘আল্লাহ তা‘আলা খাইবারের সম্পদ তাঁর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর উপর ফায় (বিনা যুদ্ধে প্রাপ্ত সম্পদ) হিসেবে দান করলেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাদেরকে [১] পূর্বের মতোই কাজ করার নির্দেশ দিলেন এবং (উৎপন্ন ফসল) তাঁর ও তাদের মাঝে ভাগ করে দিলেন। তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু রাওয়াহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে পাঠালেন। তিনি তাদের উপর (ফসল) অনুমান (খরস) করলেন। অতঃপর তিনি তাদেরকে বললেন: হে ইয়াহূদী সম্প্রদায়! তোমরা আমার নিকট সৃষ্টির মধ্যে সবচেয়ে ঘৃণিত। তোমরা আল্লাহর নাবীগণকে হত্যা করেছ এবং আল্লাহর উপর মিথ্যা আরোপ করেছ। তোমাদের প্রতি আমার এই ঘৃণা আমাকে তোমাদের প্রতি অবিচার করতে প্ররোচিত করবে না। আমি বিশ হাজার ওয়াসাক খেজুর অনুমান করেছি। যদি তোমরা চাও, তবে তা তোমাদের জন্য, আর যদি তোমরা অস্বীকার করো, তবে তা আমার জন্য। তখন তারা বলল: এই নীতির মাধ্যমেই আসমান ও যমীন প্রতিষ্ঠিত আছে। আমরা গ্রহণ করলাম। সুতরাং আপনি আমাদের কাছ থেকে চলে যান।’
এটি আল-বায়হাকী, আহমাদ (৩/৩৬৭) এবং আত-ত্বাহাভী (১/৩১৭) বর্ণনা করেছেন।
আমি বলি: এই ইসনাদের বর্ণনাকারীগণ নির্ভরযোগ্য (ছিকাহ), তবে আবূয যুবাইর একজন মুদাল্লিস (বর্ণনা গোপনকারী) এবং তিনি ‘আন‘আনা (অস্পষ্টভাবে ‘থেকে’ বলে বর্ণনা) করেছেন। কিন্তু আহমাদ (৩/২৯৬)-এর একটি বর্ণনায় ইবনু জুরাইজ-এর সূত্রে তিনি (আবূয যুবাইর) তাছরীহ বিত-তাহদীছ (শ্রবণের স্পষ্ট উল্লেখ) করেছেন: আবূয যুবাইর আমাকে অবহিত করেছেন যে, তিনি জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছেন: ‘ইবনু রাওয়াহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) চল্লিশ হাজার ওয়াসাক খেজুর অনুমান করেছিলেন। আর তিনি (জাবির) ধারণা করেন যে, ইবনু রাওয়াহা যখন ইয়াহূদীদেরকে (গ্রহণ বা প্রত্যাখ্যানের) স্বাধীনতা দিলেন, তখন তারা খেজুর গ্রহণ করল এবং তাদের উপর বিশ হাজার ওয়াসাক (দেওয়ার দায়িত্ব) বর্তাল।’
আমি বলি: এই সনদটি মুসলিমের শর্তানুযায়ী সহীহ। আর ইবনু আবী শাইবাহ (৪/৪৯) এটি ‘আন‘আনা সহকারে বর্ণনা করেছেন।
এর আরেকটি শাহেদ ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস থেকে পাওয়া যায়: ‘নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম ইবনু রাওয়াহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে খাইবারে পাঠালেন, যেন তিনি তাদের উপর (ফসল) অনুমান (খরস) করেন। অতঃপর তিনি তাদেরকে গ্রহণ বা প্রত্যাখ্যানের স্বাধীনতা দিলেন। তখন তারা বলল: এটাই সত্য, এই নীতির মাধ্যমেই আসমান ও যমীন প্রতিষ্ঠিত আছে।’
এটি আহমাদ (২/২৪) বর্ণনা করেছেন। এর বর্ণনাকারীগণ নির্ভরযোগ্য (ছিকাহ), তবে আল-উমারী ছাড়া। তিনি হলেন আব্দুল্লাহ ইবনু উমার আল-উমারী আল-মুকাব্বার, যিনি দুর্বল স্মৃতিশক্তির অধিকারী (সায়্যি’উল হিফয)। কিন্তু আত-ত্বাহাভী (১/৩১৬)-এর নিকট আব্দুল্লাহ ইবনু নাফি’ তাকে অনুসরণ করেছেন। তিনিও দুর্বল, তবে তাদের একজন অন্যজনকে শক্তিশালী করে।
আর ইতাব ইবনু উসাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: ‘নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম মানুষের উপর এমন ব্যক্তিকে পাঠাতেন, যে তাদের আঙ্গুরের বাগান ও ফলসমূহের অনুমান (খরস) করত।’
এটি আবূ দাঊদ (১৬০৩), আত-তিরমিযী (১/১২৫) এবং আল-বায়হাকী (৪/১২২) বর্ণনা করেছেন। আত-তিরমিযী বলেন: ‘হাদীসটি হাসান।’ এটি ইবনু শিহাব থেকে, তিনি সাঈদ ইবনুল মুসাইয়্যাব থেকে, তিনি ইতাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, এই সূত্রে দুটি পথে বর্ণিত হয়েছে।
আর মালিক (২/৭০৩) এটি ইবনু শিহাব থেকে, তিনি সাঈদ ইবনুল মুসাইয়্যাব থেকে, মুরসাল (বিচ্ছিন্ন) সূত্রে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।
আমি বলি: এটিই অধিক সহীহ (বিশুদ্ধ)।
আর ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: ‘নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম যখন খাইবার জয় করলেন, তখন তিনি তাদের উপর শর্ত আরোপ করলেন যে, ভূমি তাঁর এবং সকল হলুদ ও সাদা বস্তুও তাঁর—অর্থাৎ সোনা ও রূপা। তখন খাইবারের অধিবাসীরা তাঁকে বলল: আমরা ভূমি সম্পর্কে অধিক অবগত। সুতরাং আপনি আমাদেরকে এই শর্তে দিন যে, আমরা তাতে কাজ করব এবং উৎপন্ন ফসলের অর্ধেক আমাদের হবে আর অর্ধেক আপনাদের। বর্ণনাকারী ধারণা করেন যে, তিনি তাদেরকে সেই শর্তে দিলেন। যখন খেজুর কাটার সময় হলো, তখন তিনি তাদের নিকট ইবনু রাওয়াহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে পাঠালেন। তিনি খেজুর অনুমান করলেন (হাযার), যা মাদীনাবাসীগণ ‘খরস’ বলে অভিহিত করে। তিনি বললেন: এতে এত এত (পরিমাণ) রয়েছে। তখন তারা বলল: এটাই সত্য, আর এর মাধ্যমেই আসমান ও যমীন প্রতিষ্ঠিত আছে। অতঃপর তারা বলল: আপনি যা বলেছেন, আমরা তা গ্রহণ করতে সম্মত।’ এটি ইবনু মাজাহ (১৮২০) বর্ণনা করেছেন এবং এর ইসনাদ ‘জাইয়িদ’ (উত্তম)।
*806* - (حديث ابن عمر: ` فيما سقت السماء العشر وفيما سقى بالنضح نصف العشر `. رواه أحمد والبخارى والنسائى وأبى داود وابن ماجه: ` فيما سقت السماء والأنهار والعيون ، أو كان بعلا: العشر وفيما سقى بالسواقى والنضح: نصف العشر `.
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح.
وقد تقدم برقم (799) .
*৮০৬* - (ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস: ‘আকাশ যা সেচ করে, তাতে এক-দশমাংশ (উশর) এবং যা সেচযন্ত্র দ্বারা সেচ করা হয়, তাতে অর্ধ-দশমাংশ (নিসফ আল-উশর)।’ এটি বর্ণনা করেছেন আহমাদ, বুখারী, নাসাঈ, আবূ দাঊদ এবং ইবনু মাজাহ: ‘আকাশ, নদী ও ঝর্ণা যা সেচ করে, অথবা যা বৃষ্টির উপর নির্ভরশীল (বা'ল), তাতে এক-দশমাংশ (উশর); আর যা সেচযন্ত্র (সাওয়াকী) ও সেচ (নাদ্বহ) দ্বারা সেচ করা হয়, তাতে অর্ধ-দশমাংশ (নিসফ আল-উশর)।’
শাইখ নাসিরুদ্দীন আল-আলবানী কর্তৃক তাহক্বীক্ব: * সহীহ (Sahih)।
আর এটি ইতিপূর্বে (৭৯৯) নম্বরে অতিবাহিত হয়েছে।
*807* - (روى الدارقطنى عن عتاب بن أسيد: ` أن النبى صلى الله عليه وسلم أمره أن يخرص العنب زبيبا كما يخرص التمر `.
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف.
أخرجه الدارقطنى (217) وكذا الترمذى (1/125) وأبو داود (1603) والبيهقى (4/122) من طريق محمد بن صالح التمار عن ابن شهاب عن سعيد بن المسيب عن عتاب به.
وزاد الترمذى: ` ثم تؤدى زكاته زبيبا كما تؤدى زكاة النخل تمرا `. وقال: ` حديث حسن غريب `
قلت: ورجاله ثقات غير التمار هذا فقال الحافظ فى ` التقريب `: ` صدوق يخطىء ` لكن تابعه عبد الرحمن بن إسحاق عند أبى داود والدارقطنى.
وقال أبو داود: ` وسعيد لم يسمع من عتاب شيئا `.
وأعله الدارقطنى بالإرسال فقال: ` رواه صالح بن أبى الأخضر عن الزهرى عن ابن المسيب عن أبى هريرة ، وأرسله مالك ويعمر وعقيل عن الزهرى عن النبى صلى الله عليه وسلم مرسلا `.
قلت: ورواية مالك هذه تقدم تخريجها قبل حديث ، وليس فيه ما فى رواية التمار هذه من خرص العنب من أجل الزكاة فكأن الدارقطنى يعنى أصل الحديث.
وعبد الرحمن بن إسحاق المتابع للتمار هو العامرى القرشى وهو حسن الحديث كما تقدم مرارا ، وفى حفظه ضعف كالتمار ، فوصلهما للإسناد مع إرسال أولئك الثقات له ، مما لا تطمئن النفس لقبوله والله سبحانه وتعالى أعلم.
*৮০৭* - (দারাকুতনী আত্তাব ইবনে উসাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন: ‘নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁকে আঙ্গুরকে কিসমিস হিসেবে অনুমান (খরস) করতে নির্দেশ দেন, যেভাবে খেজুরকে অনুমান করা হয়।’
শাইখ নাসিরুদ্দিন আল-আলবানী কর্তৃক তাহকীক: * যঈফ (দুর্বল)।
এটি দারাকুতনী (২/১৭), অনুরূপভাবে তিরমিযী (১/১২৫), আবূ দাঊদ (১৬০৩) এবং বাইহাকী (৪/১২২) মুহাম্মাদ ইবনে সালিহ আত-তাম্মার সূত্রে, তিনি ইবনে শিহাব থেকে, তিনি সাঈদ ইবনুল মুসাইয়্যাব থেকে, তিনি আত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন।
তিরমিযী অতিরিক্ত বর্ণনা করেছেন: ‘অতঃপর এর যাকাত কিসমিস হিসেবে আদায় করা হবে, যেভাবে খেজুরের যাকাত খেজুর হিসেবে আদায় করা হয়।’ এবং তিনি (তিরমিযী) বলেন: ‘হাদীসটি হাসান গারীব (উত্তম, একক)।’
আমি (আলবানী) বলছি: এই আত-তাম্মার ব্যতীত এর বর্ণনাকারীগণ সকলেই নির্ভরযোগ্য (সিকাহ)। হাফিয (ইবনে হাজার) ‘আত-তাকরীব’ গ্রন্থে তার সম্পর্কে বলেছেন: ‘তিনি সত্যবাদী, তবে ভুল করেন।’ কিন্তু আবূ দাঊদ ও দারাকুতনীর বর্ণনায় তাকে আব্দুল্লাহ ইবনে ইসহাক অনুসরণ করেছেন।
আবূ দাঊদ বলেছেন: ‘সাঈদ (ইবনুল মুসাইয়্যাব) আত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে কিছুই শোনেননি।’
আর দারাকুতনী হাদীসটিকে ইরসাল (বিচ্ছিন্নতা) দ্বারা ত্রুটিযুক্ত করেছেন। তিনি বলেন: ‘এটি সালিহ ইবনে আবিল আখদার যুহরী থেকে, তিনি ইবনুল মুসাইয়্যাব থেকে, তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। আর মালিক, ইয়া'মার এবং উকাইল এটি যুহরী থেকে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম থেকে মুরসাল (বিচ্ছিন্ন) হিসেবে বর্ণনা করেছেন।’
আমি বলছি: মালিকের এই বর্ণনাটির তাখরীজ এর পূর্বের হাদীসে উল্লেখ করা হয়েছে। তাতে আত-তাম্মারের এই বর্ণনায় যাকাতের জন্য আঙ্গুর অনুমান (খরস) করার যে বিষয়টি আছে, তা নেই। যেন দারাকুতনী হাদীসের মূল অংশটি বুঝিয়েছেন।
আর আত-তাম্মারের অনুসারী আব্দুল্লাহ ইবনে ইসহাক হলেন আল-আমিরী আল-কুরাশী। যেমনটি পূর্বে বহুবার উল্লেখ করা হয়েছে, তিনি হাসানুল হাদীস (যার হাদীস উত্তম)। তবে আত-তাম্মারের মতোই তার স্মৃতিশক্তির দুর্বলতা রয়েছে। তাদের উভয়ের ইসনাদকে যুক্ত করা (ওয়াসল করা), যখন ঐ সকল নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারীগণ এটিকে মুরসাল (বিচ্ছিন্ন) হিসেবে বর্ণনা করেছেন—এমন অবস্থায় মন এটিকে গ্রহণ করতে স্বস্তি পায় না। আর আল্লাহ সুবহানাহু ওয়া তাআ'লা সমধিক অবগত।