সুনান আবী দাউদ
حَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ عُمَرَ بْنِ مَيْسَرَةَ، حَدَّثَنَا خَالِدُ بْنُ الْحَارِثِ، حَدَّثَنَا سَعِيدٌ، عَنْ يَعْلَى بْنِ حَكِيمٍ، عَنْ سُلَيْمَانَ بْنِ يَسَارٍ، أَنَّ رَافِعَ بْنَ خَدِيجٍ، قَالَ كُنَّا نُخَابِرُ عَلَى عَهْدِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَذَكَرَ أَنَّ بَعْضَ عُمُومَتِهِ أَتَاهُ فَقَالَ نَهَى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَنْ أَمْرٍ كَانَ لَنَا نَافِعًا وَطَوَاعِيَةُ اللَّهِ وَرَسُولِهِ أَنْفَعُ لَنَا وَأَنْفَعُ . قَالَ قُلْنَا وَمَا ذَاكَ قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " مَنْ كَانَتْ لَهُ أَرْضٌ فَلْيَزْرَعْهَا أَوْ فَلْيُزْرِعْهَا أَخَاهُ وَلاَ يُكَارِيهَا بِثُلُثٍ وَلاَ بِرُبُعٍ وَلاَ بِطَعَامٍ مُسَمًّى " .
সুলায়মান ইবনু ইয়াসার (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, রাফি’ ইবনু খাদীজ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যুগে জমি ভাগচাষে খাটাতাম। তিনি উল্লেখ করলেন, তার এক চাচা তার কাছে এসে বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি কাজ বর্জন করতে বলেছেন, যা আমাদের জন্য লাভজনক ছিলো। কিন্ত আল্লাহ্ ও তাঁর রাসূলের আনুগত্য করা আমাদের জন্য তার চেয়েও অধিক লাভজনক ও কল্যাণকর। বর্ণনাকারী বলেন, আমরা বললাম, তা কীভাবে? তিনি বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ যার জমি আছে সে নিজে তা চাষ করবে অথবা তার ভাইকে যেন চাষ করতে দেয়। সে যেন তা এক-তৃতীয়াংশ বা এক-চতুর্থাংশ অথবা নির্দিষ্ট পরিমাণ খাদ্যশস্য প্রদানের বিনিময়ে বর্গা না দেয়।
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1548)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. سعيد: هو ابن أبي عَروبة. وأخرجه مسلم (١٥٤٨)، وابن ماجه (٢٤٦٥)، والنسائي (٣٨٩٧) من طريق يعلى بن حكيم، به. وهو في "مسند أحمد" (١٥٨٢٣). وانظر ما بعده، وما سلف برقم (٣٣٨٩).
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عُبَيْدٍ، حَدَّثَنَا حَمَّادُ بْنُ زَيْدٍ، عَنْ أَيُّوبَ، قَالَ كَتَبَ إِلَىَّ يَعْلَى بْنُ حَكِيمٍ أَنِّي سَمِعْتُ سُلَيْمَانَ بْنَ يَسَارٍ، بِمَعْنَى إِسْنَادِ عُبَيْدِ اللَّهِ وَحَدِيثِهِ .
আইয়ূব (রাহিমাহুল্লাহ) সূত্র হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, ইয়া’লা ইবনু হাকীম (রাহিমাহুল্লাহ) আমাকে লিখে পাঠালেন যে, আমি (ইয়া’লা) সুলায়মান ইবনু ইয়াসারের নিকট ‘উবাইদুল্লাহর সানাদে বর্ণিত হাদীসের অনুরূপ হাদীস শুনেছি।
আমি এটি সহীহ এবং যঈফেও পাইনি।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1548)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح كسابقه. أيوب: هو ابن أبي تميمة السختياني، ومحمد بن عُبيد، هو ابن حساب الغُبَري. وأخرجه مسلم (١٥٤٨)، والنسائي (٣٨٩٥) و (٣٨٩٦) من طريق أيوب السختياني، به. وقال النسائي بإثر الطريق الأول: أيوب لم يسمعه من يعلى. لكن نقل الطبراني في "الكبير" (٤٢٨٥) عنه قوله: وسمعتُه منه بعدُ. وانظر ما قبله.
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، حَدَّثَنَا عُمَرُ بْنُ ذَرٍّ، عَنْ مُجَاهِدٍ، عَنِ ابْنِ رَافِعِ بْنِ خَدِيجٍ، عَنْ أَبِيهِ، قَالَ جَاءَنَا أَبُو رَافِعٍ مِنْ عِنْدِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ نَهَانَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَنْ أَمْرٍ كَانَ يَرْفَقُ بِنَا وَطَاعَةُ اللَّهِ وَطَاعَةُ رَسُولِهِ أَرْفَقُ بِنَا نَهَانَا أَنْ يَزْرَعَ أَحَدُنَا إِلاَّ أَرْضًا يَمْلِكُ رَقَبَتَهَا أَوْ مَنِيحَةً يَمْنَحُهَا رَجُلٌ .
ইবনু রাফি’ ইবনু খাদীজ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে তার পিতার সূত্র হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আবূ রাফি’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কাছ থেকে আমাদের নিকট এসে বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে একটি লাভজনক কাজ থেকে নিষেধ করেছেন। তিনি নিষেধ করেছেন : আমাদের কেউ যেন ভাগচাষের শর্তে কারো জমি না খাটায়। তবে তার নিজের জমি থাকলে কিংবা কেউ তাকে এমনিতেই চাষের জন্য জমি দান করলে সে চাষাবাদ করবে।
হাসান, এর পরবর্তী হাদীস দ্বারা।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن لغيره
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، أصلہ في صحیح مسلم (1550)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح. ابن رافع بن خديج غير مسمى، ذكره الذهبي في "الميزان"، وقال: لا يُعرف، وقد رقم له المزي في "التهذيب" برمز أبي داود، وتابعه الحافظ في "تهذيبه" غير أنه رقم له في "التقريب" برقم مسلم والنسائي، وبالتأمل نجد أنه إنما أورده مسلم ضمن سياق قصة حيث قال (١٥٥٠): إن مجاهداً قال لطاووس: انطلق بنا إلى ابن رافع بن خديج، فاسمع منه الحديث عن أبيه، عن النبي ﷺ، قال: فانتهره، قال: إني والله لو أعلم أن رسول الله ﷺ نهى عنه ما فعلته، ولكن حدثني من هو أعلم به منهم (يعني ابن عباس) وعليه يكون الصواب أن يرقم له بأبي داود والنسائي لأنه جاء عندهما في إسناد الحديث، وهو -وإن كان غير مُسمّى- تابعه أسيد ابن ظُهير ابن عمٍّ -وقيل: ابن أخي- رانع بن خديج كما في الطريق الآتي بعده. مجاهد: هو ابن جبْر المكي. والمقصود بأبي رافع هنا عم رافع كما بيناه في تعليقنا على "المسند" (١٥٨٢٢). وأخرجه ابن أبي شيبة ٦/ ٣٤٧، وأحمد (١٥٨٢٢) عن وكيع بن الجراح، بهذا الإسناد. لكن جاء في "مسند أحمد": عن ابن رافع بن خديج، عن أبيه، قال: جاءنا من عند رسول الله ﷺ .. فلم يذكر في إسناده أبا رافع. وأخرجه النسائي (٣٨٦٧)، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" ٤/ ١٠٦، والطبراني في "الكبير" (٤٣٥٨) من طريق عبد الكريم الجزري، والطبراني (٤٣٥٧) من طريق خصيف، كلاهما عن مجاهد قال: أخذت بيد طاووس حتى أدخلته على ابن رافع بن خديج، فحدثه عن أبيه، عن رسول الله ﷺ أنه نهى عن كراء الأرض، فأبى طاووس، فقال: سمعت ابن عباس لا يرى بذلك باساً. وأخرجه مسلم (١٥٥٠)، والنسائي (٣٨٧٣) من طريق عمرو بن دينار، أن مجاهداً قال لطاووس: انطلق بنا إلى ابن رافع بن خديج … سلف ذكره قريباً. وأخرجه بمعناه الترمذي (١٤٤٠)، والنسائي (٣٨٦٨) من طريق أبي حصين، والنسائي (٣٨٦٩) من طريق إبراهيم بن مهاجر، و (٣٨٧٠) من طريق الحكم، و (٣٨٧١) و (٣٨٧٢) من طريق عبد الملك بن ميسرة الزّرّاد، أربعتهم عن مجاهد -وقرن به عبد الملك في الموضع الثاني عطاةً وطاووساً- عن رافع بن خديج. وهذا منقطع كما قال النسائي بإثر (٣٨٦٧) لأن مجاهداً لم يسمع من رافع. وانظر ما بعده، وما سلف برقم (٣٣٨٩) و (٣٣٩٢).
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ كَثِيرٍ، أَخْبَرَنَا سُفْيَانُ، عَنْ مَنْصُورٍ، عَنْ مُجَاهِدٍ، أَنَّ أُسَيْدَ بْنَ ظُهَيْرٍ، قَالَ جَاءَنَا رَافِعُ بْنُ خَدِيجٍ فَقَالَ إِنَّ رَسُولَ اللَّهِ يَنْهَاكُمْ عَنْ أَمْرٍ، كَانَ لَكُمْ نَافِعًا وَطَاعَةُ اللَّهِ وَطَاعَةُ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَنْفَعُ لَكُمْ إِنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَنْهَاكُمْ عَنِ الْحَقْلِ وَقَالَ " مَنِ اسْتَغْنَى عَنْ أَرْضِهِ فَلْيَمْنَحْهَا أَخَاهُ أَوْ لِيَدَعْ " . قَالَ أَبُو دَاوُدَ وَهَكَذَا رَوَاهُ شُعْبَةُ وَمُفَضَّلُ بْنُ مُهَلْهَلٍ عَنْ مَنْصُورٍ . قَالَ شُعْبَةُ أُسَيْدُ ابْنُ أَخِي رَافِعِ بْنِ خَدِيجٍ .
মুজাহিদ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, উসাইদ ইবনু যুহাইর (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন, একদা রাফি’ ইবনু খাদীজ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাদের নিকট এসে বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তোমাদেরকে একটি কাজ থেকে বিরত থাকতে বলেছেন যা তোমাদের জন্য লাভজনক ছিলো। কিন্তু আল্লাহ্ ও তাঁর রাসূলের আনুগত্য করা তোমাদের জন্য অধিক লাভজনক। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তোমাদেরকে জমি বর্গা দিতে নিষেধ করেছেন। তিনি আরো বলেছেনঃ যে ব্যক্তি তার জমির মুখাপেক্ষী নয় সে যেন তার অন্য ভাইকে কোন বিনিময় ছাড়াই তা চাষাবাদ করতে দেয়, অথবা পরিত্যক্ত রেখে দেয়।
সহীহ : ইবনু মাজাহ (২৪৬০)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، حدیث مفضل بن مھلھل رواہ النسائي (3894 وسندہ صحیح)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. مجاهد: هو ابن جبْر المكي، ومنصُور: هو ابن المعتمر، وسفيان: هو الثوري. وأخرجه ابن ماجه (٢٤٦٠)، والنسائي (٣٨٦٤) و (٣٨٦٥) من طريق منصور بن المعتمر، بهذا الإسناد. وأخرجه النسائي (٣٨٦٦) من طريق سعيد بن عبد الرحمن، عن مجاهد قال: حدثني أُسيد بن رافع بن خديج، قال: قال رافع بن خديج. فجعل أُسيداً ابناً لرافع وإنما هو ابنٌ لظهر بن رافع. وهو في "مسند أحمد" (١٥٨٠٨) و (١٥٨١٥)، و"صحيح ابن حبان" (٥١٩٨). وأخرجه النسائي (٣٨٦٢) من طريق جعفر بن عبد الله بن الحكم الأنصاري، عن رافع بن أُسيد بن ظهير، عن أبيه أُسيد بن ظهير أنه قال … نهى رسول الله ﷺ عن كراء الأرض فجعله من مسند أُسيد بن ظهير! وانظر ما قبله. وما سلف برقم (٣٣٨٩) و (٣٣٩٢).
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ بَشَّارٍ، حَدَّثَنَا يَحْيَى، حَدَّثَنَا أَبُو جَعْفَرٍ الْخَطْمِيُّ، قَالَ بَعَثَنِي عَمِّي أَنَا وَغُلاَمًا، لَهُ إِلَى سَعِيدِ بْنِ الْمُسَيَّبِ قَالَ فَقُلْنَا لَهُ شَىْءٌ بَلَغَنَا عَنْكَ فِي الْمُزَارَعَةِ . قَالَ كَانَ ابْنُ عُمَرَ لاَ يَرَى بِهَا بَأْسًا حَتَّى بَلَغَهُ عَنْ رَافِعِ بْنِ خَدِيجٍ حَدِيثٌ فَأَتَاهُ فَأَخْبَرَهُ رَافِعٌ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَتَى بَنِي حَارِثَةَ فَرَأَى زَرْعًا فِي أَرْضِ ظُهَيْرٍ فَقَالَ " مَا أَحْسَنَ زَرْعَ ظُهَيْرٍ " . قَالُوا لَيْسَ لِظُهَيْرٍ . قَالَ " أَلَيْسَ أَرْضُ ظُهَيْرٍ " . قَالُوا بَلَى وَلَكِنَّهُ زَرْعُ فُلاَنٍ . قَالَ " فَخُذُوا زَرْعَكُمْ وَرُدُّوا عَلَيْهِ النَّفَقَةَ " . قَالَ رَافِعٌ فَأَخَذْنَا زَرْعَنَا وَرَدَدْنَا إِلَيْهِ النَّفَقَةَ . قَالَ سَعِيدٌ أَفْقِرْ أَخَاكَ أَوْ أَكْرِهِ بِالدَّرَاهِمِ .
আবূ জা’ফর আল-খাতমী (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা আমার চাচা আমাকে ও তার এক গোলামকে সাঈদ ইবনুল মুসাইয়্যাব (রাহিমাহুল্লাহ) এর নিকট প্রেরণ করেন। বর্ণনাকারী বলেন, আমরা তাকে বললাম, আমরা ভাগচাষ সম্পর্কে আপনার কিছু বক্তব্য জানতে পেরেছি। তিনি বললেন, ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাফি’ ইবনু খাদীজ বর্ণিত হাদীস না জানা পর্যন্ত ভাগচাষ আপত্তিকর মনে করেননি। ইবনু ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাফি’র নিকট আসলে রাফি’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে জানান, একদা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বনী হারিসার কাছে যান। তিনি যুহাইরের জমির ফসল দেখে বললেন, যুহাইরের জমিতে কি সুন্দর ফসল ফলেছে! লোকেরা বললো, হাঁ, তবে ফসল অমুক ব্যক্তির। তিনি বললেনঃ তোমাদের ফসল তোমরা নিয়ে যাও এবং তাকে কৃষিকাজের খরচ ফেরত দাও। রাফি’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমরা আমাদের উৎপাদিত ফসল নিয়ে নিলাম এবং তাকে কৃষির খরচ ফেরত দিলাম। সাঈদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, তোমার ভাইয়ের অভাব দূর করো অথবা দিরহামের বিনিময়ে ভাড়া খাটাও।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح الإسناد
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ صحیح ، أخرجہ النسائي (3920 وسندہ صحیح)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. يحيى: هو ابن سعيد القطان. وأخرجه النسائي (٣٨٨٩) عن محمد بن المثنى، عن يحيى بن سعيد، بهذا الإسناد. وانظر ما سلف برقم (٣٣٨٩) و (٣٣٩٤). وانظر ما بعده، وما سيأتي برقم (٣٤٠٣). قوله: أفقر أخاك: أي: أعطه أرضك عارية ليزرعها، وأصل الإفقار: إعارة البعير ونحوه للركوب.
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا أَبُو الأَحْوَصِ، حَدَّثَنَا طَارِقُ بْنُ عَبْدِ الرَّحْمَنِ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ الْمُسَيَّبِ، عَنْ رَافِعِ بْنِ خَدِيجٍ، قَالَ نَهَى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَنِ الْمُحَاقَلَةِ وَالْمُزَابَنَةِ وَقَالَ " إِنَّمَا يَزْرَعُ ثَلاَثَةٌ رَجُلٌ لَهُ أَرْضٌ فَهُوَ يَزْرَعُهَا وَرَجُلٌ مُنِحَ أَرْضًا فَهُوَ يَزْرَعُ مَا مُنِحَ وَرَجُلٌ اسْتَكْرَى أَرْضًا بِذَهَبٍ أَوْ فِضَّةٍ " .
রাফি’ ইবনু খাদীজ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ‘মুহাকালা’ ও ‘মুযাবানা’ পদ্ধতির ক্রয়-বিক্রয় নিষেধ করেছেন। তিনি আরো বলেছেনঃ তিন ব্যক্তি কৃষিকাজ করতে পারে। (এক) যার নিজস্ব জমি আছে সে তাতে চাষাবাদ করতে পারে। (দুই) যে ব্যক্তি ধারে জমি নিয়েছে সে তাতে জমি চাষাবাদ করতে পারে। (তিন) যে ব্যক্তি সোনা (দীনার) ও রূপার (দিরহাম) বিনিময়ে জমি ভাড়া নিয়েছে সে তাতে চাষাবাদ করতে পারে।
সহীহ : ইবনু মাজাহ (২৪৪৯)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، أخرجہ النسائي (3921 وسندہ حسن) وابن ماجہ (2449 وسندہ حسن)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده قوي من أجل طارق بن عبد الرحمن - وهو الأحمسي البجلي، لكن قوله: "إنما يزرع ثلاثة … " إلى آخر الحديث، فهو من قول سعيد بن المسيب، بين ذلك إسرائيلُ بن يونس بن أبي إسحاق السبيعي وسفيان الثوري، كلاهما عن طارق بن عبد الرحمن. أبو الأحوص: هو سلاّم بن سُليم. وأخرجه ابن ماجه (٢٢٦٧) و (٢٤٤٩)، والنسائي (٣٨٩٠) و (٤٥٣٥) من طريق أبي الأحوص، بهذا الإسناد. واقتصر ابن ماجه في الموضع الأول والنسائي في الموضع الثاني على حكاية النهي. وأخرج الشطر الأول منه مرفوعاً وهو حكايته النهي: النسائي (٣٨٨٦) من طريق أبي سلمة بن عبد الرحمن، و (٣٨٨٧) من طريق القاسم بن محمد، كلاهما عن رافع ابن خديج. وأخرج الشطر الأول منه أيضاً النسائي (٣٨٩١) من طريق إسرائيل بن يونس، عن طارق بن عبد الرحمن، و (٣٨٩٣) من طريق ابن شهاب الزهري، كلاهما عن سعيد بن المسيب، عن النبي ﷺ مرسلاً. وأخرج الشطر الثاني منه موقوفاً من قول سعيد بن المسيب: النسائي (٣٨٩١) من طريق إسرائيل بن يونس، و (٣٨٩٢) من طريق سفيان الثوري، كلاهما عن طارق بن عبد الرحمن، عن سعيد بن المسيب. قوله.
قَالَ أَبُو دَاوُدَ قَرَأْتُ عَلَى سَعِيدِ بْنِ يَعْقُوبَ الطَّالْقَانِيِّ قُلْتُ لَهُ حَدَّثَكُمُ ابْنُ الْمُبَارَكِ، عَنْ سَعِيدٍ أَبِي شُجَاعٍ، حَدَّثَنِي عُثْمَانُ بْنُ سَهْلِ بْنِ رَافِعِ بْنِ خَدِيجٍ، قَالَ إِنِّي لَيَتِيمٌ فِي حِجْرِ رَافِعِ بْنِ خَدِيجٍ وَحَجَجْتُ مَعَهُ فَجَاءَهُ أَخِي عِمْرَانُ بْنُ سَهْلٍ فَقَالَ أَكْرَيْنَا أَرْضَنَا فُلاَنَةَ بِمِائَتَىْ دِرْهَمٍ فَقَالَ دَعْهُ فَإِنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم نَهَى عَنْ كِرَاءِ الأَرْضِ .
ইমাম আবূ দাউদ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, আমি সাঈদ ইয়া’কূব আত-তালাক্বানীকে এটি পাঠ করতে শুনালাম। আপনাদেরকে ইবনুল মুবারক, সাঈদ আবূ শুজা’র সূত্রে বলেছেন, তিনি বললেন, আমাকে ‘উসমান ইবনু সাগল ইবনু রাফি’ ইবনু খাদীজ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন। ‘উসমান বলেন, আমি রাফি’ ইবনু খাদীজের নিকট ইয়াতীম হিসাবে প্রতিপালিত হয়েছি। আমি তার সাথে হাজ্জও করেছি। একদা আমার ভাই ‘ইমরান ইবনু সাহল এসে তাকে জিজ্ঞেস করলেন, আমরা আমাদের অমুক জমি দু’শো দিরহামের বিনিময়ে অমুককে ধার দিয়েছি। তিনি (রাফি’) বললেন, এটা বর্জন করো। কেননা নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জমি ধার দিতে নিষেধ করেছেন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: شاذ
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، نسائی (3958) ، وقال: عیسی بن سہل بن رافع،ابن سہل بن رافع: لم یوثقہ غیر ابن حبان وقال الحافظ فی التقریب (5296):’’ مقبول ‘‘ أي مجہول الحال ، (انوار الصحیفہ ص 122)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: ضعيف لشذوذه، فقد خالف فيه عثمان بن سهل -والصواب في اسمه عيسى ابن سهل كما في رواية النسائي، وما صوبه المزي والذهبي وتبعهما ابنُ حجر- من هو أوثق منه، وهو حنظلة بن قيس عند البخاري ومسلم، وسلف عند المصنف برقم (٣٣٩٢) و (٣٣٩٣)، إذ سأل رافعَ بنَ خديج عن كراء الأرض بالذهب والرَرقِ، فقال: لا بأس بها. سعيد أبو شجاع: هو ابن يزيد الإسكندراني. وأخرجه النسائي (٣٩٢٦) من طريق حبان بن موسى، عن عبد الله بن المبارك، عن سعيد بن يزيد، عن عيسى بن سهل بن رافع بن خديج، به. فسماه على الصواب.
حَدَّثَنَا هَارُونُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ، حَدَّثَنَا الْفَضْلُ بْنُ دُكَيْنٍ، حَدَّثَنَا بُكَيْرٌ، - يَعْنِي ابْنَ عَامِرٍ - عَنِ ابْنِ أَبِي نُعْمٍ، حَدَّثَنِي رَافِعُ بْنُ خَدِيجٍ، أَنَّهُ زَرَعَ أَرْضًا فَمَرَّ بِهِ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم وَهُوَ يَسْقِيهَا فَسَأَلَهُ " لِمَنِ الزَّرْعُ وَلِمَنِ الأَرْضُ " . فَقَالَ زَرْعِي بِبَذْرِي وَعَمَلِي لِيَ الشَّطْرُ وَلِبَنِي فُلاَنٍ الشَّطْرُ . فَقَالَ " أَرْبَيْتُمَا فَرُدَّ الأَرْضَ عَلَى أَهْلِهَا وَخُذْ نَفَقَتَكَ " .
রাফি’ ইবনু খাদীজ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি একটি জমিতে চাষাবাদ করেন। একদা নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেখান দিয়ে যাচ্ছিলেন, এ সময় রাফি’ জমিতে পানি দিচ্ছিলেন। তিনি তাকে জিজ্ঞেস করলেন : এ ফসল কার এবং জমির মালিক কে? রাফি’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, এ ফসল আমার, শ্রমও আমার। আমার অর্ধেক ভাগ এবং অমুকের পুত্রের (জমির মালিকের) অর্ধেক ভাগ। তিনি বললেনঃ তোমরা উভয়ে সুদের ব্যবসায় লিপ্ত হলে। মালিককে জমি ফিরিয়ে দাও এবং তোমার খরচ তার কাছ থেকে নিয়ে নাও।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف الإسناد
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، بکیر ضعیف ، والحدیث صححہ الحاکم (41/2) فقال الذھبي: ’’ بکیر ضعیف‘‘ ، (انوار الصحیفہ ص 122)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف. بكير بن عامر -وهو البجلي الكوفي- ضعيف. وأخرجه الطحاوي في "شرح معاني الآثار ٤/ ١٠٦، والطبراني في "الكبير" (٤٤٤٣)، والحاكم ٢/ ٤١، والبيهقي ٦/ ١٣٣ و ١٣٦ من طريق بكير بن عامر، به. وصححه الحاكم، لكن تعقبه الذهبي في "تلخيصه" بقوله: بكير ضعيف. وانظر ما بعده.
حَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ بْنُ سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا شَرِيكٌ، عَنْ أَبِي إِسْحَاقَ، عَنْ عَطَاءٍ، عَنْ رَافِعِ بْنِ خَدِيجٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " مَنْ زَرَعَ فِي أَرْضِ قَوْمٍ بِغَيْرِ إِذْنِهِمْ فَلَيْسَ لَهُ مِنَ الزَّرْعِ شَىْءٌ وَلَهُ نَفَقَتُهُ " .
রাফি’ ইবনু খাদীজ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ যে ব্যক্তি মালিকের অনুমতি ছাড়া তার জমিতে চাষাবাদ করে সে উৎপাদিত ফসলের অংশ পাবে না। তবে সে তার খরচ ফেরত পাবে।
সহীহ : ইবনু মাজাহ (২৪৬৬)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، ترمذی (1366) ابن ماجہ (2466) ، أبو إسحاق مدلس وعنعن ، وعطاء لم یسمع من رافع بن خدیج رضي اللّٰہ عنہ ، (انوار الصحیفہ ص 122)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح شَريك -وهو ابن عبد الله النخعي، وإن كان سىء الحفظ- يعتبر به في المتابعات، وقد توبع، وقد حسنه البخاري فيما حكاه عنه الترمذي بإثر (١٤١٨) وقال الترمذي: حديث حسن غريب. عطاء: هو ابن أبي رباح، وأبو إسحاق: هو عَمرو بن عبد الله السبيعي. وأخرجه ابن ماجه (٢٤٦٦)، والترمذي (١٤١٨) من طريق شريك النخعي، بهذا الإسناد. وأخرجه يحيى بن آدم في "الخراج" (٢٩٦)، ومن طريقه البيهقي ٦/ ١٣٦ عن قيس ابن الربيع، عن أبي إسحاق السبيعي، به. وقيل بن الربيع حسن الحديث في المتابعات. وأخرجه الترمذي بإثر (١٤١٨) من طريق معقل بن مالك البصري، عن عقبة بن الأصم، عن عطاء، به. وقد سلف نحوه من طريق سعيد بن المسيب عن رافع بن خديج برقم (٣٣٩٩) وإسناده صحيح. ومن طريق عبد الرحمن بن أبي نُعم، عن رافع بن خديج في الحديث السالف. ولا يُعارض هذا الحديثُ قوله ﷺ: "ليس لعرق ظالم حقٌ" السالف عند المصنف برقم (٣٠٧٣)، فقد جمع بينهما أبو عبيد جمعاً حسناً فقال: وإنما اختلف حكم الزرع والنخل، فقضى بقلع النخل، ولم يقض بقلع الزرع، لأنه قد يُوصَل في الزرع إلى أن ترجع الأرضُ إلى ربّها من غير فساد ولا ضرر يتلف به الزرع، وذلك أنه إنما يكون في الأرض سنتَه تلك، وليس له أصلٌ باقٍ في الأرض فإذا انقضت السنة رجعت الأرض إلى ربّها، وصار للآخر نفقتُه، فكان هذا أدنى إلى الرشاد من قطع الزرع بقلاً، والله لا يحب الفسادَ، وليس النخل كذلك، لأن أصله مُخَلَّدٌ في الأرض لا يوصل إلى ردّ الأرض إلى ربّها بوجه من الوجوه، وإن تطاول مكث النخل فيها إلا بنزعها، فلما لم يكن هناك وقت يُنتظر لم يكن لتاخير نزعها وجه، فلذلك كان الحكم فيها تعجيلَ قلعها عند الحكم. فهذا الفرق بين الزرع والنخل، والله أعلم بما أراد رسول الله ﷺ بذلك.
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ حَنْبَلٍ، حَدَّثَنَا إِسْمَاعِيلُ، ح وَحَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، أَنَّ حَمَّادًا، وَعَبْدَ الْوَارِثِ، حَدَّثَاهُمْ كُلُّهُمْ، عَنْ أَيُّوبَ، عَنْ أَبِي الزُّبَيْرِ، - قَالَ عَنْ حَمَّادٍ، وَسَعِيدِ بْنِ مِينَاءَ، ثُمَّ اتَّفَقُوا - عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، قَالَ نَهَى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَنِ الْمُحَاقَلَةِ وَالْمُزَابَنَةِ وَالْمُخَابَرَةِ وَالْمُعَاوَمَةِ - قَالَ عَنْ حَمَّادٍ وَقَالَ أَحَدُهُمَا وَالْمُعَاوَمَةِ وَقَالَ الآخَرُ بَيْعِ السِّنِينَ ثُمَّ اتَّفَقُوا - وَعَنِ الثُّنْيَا وَرَخَّصَ فِي الْعَرَايَا .
জাবির ইবনু ‘আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ‘মুযাবানা’, ‘মুহাকালা’, ও ‘মু’আওয়ামা’ করতে নিষেধ করেছেন। আবুয–যুবাইর হাম্মাদের সূত্রে বর্ণনা করেন, তাদের (হাম্মাদ ও সা’ঈদ ইবনু মীনা’আ) উভয়ের একজন ‘মু’আওয়ামা’ বর্ণনা করেছেন এবং অন্যজন ‘বায়‘উস সিনীন’ (কয়েক বছরের অগ্রিম চুক্তিতে ক্রয়-বিক্রয়) কথা বর্ণনা করেছেন। অতঃপর তাদের বর্ণনা একই বিন্দুতে মিলিত হয়েছে। তিনি সানাইয়া নিষেধ করেছেন; কিন্তু ‘আরিয়ার’ অনুমতি দিয়েছেন।
সহীহ : ইবনু মাজাহ (২২৬৬, ২২৬৭)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1536 بعد ح 1543)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. أبو الزبير -وهو محمد بن مسلم بن تدرس المكي- وإن لم يصرح بسماعه من جابر تابعه سعيد بن ميناء كما هو واضح هنا. وعطاء بن أبي رباح وغيره كما سيأتي. حماد: هو ابن زيد، وعبد الوارث: هو ابن سعيد العنبري، وأيوب: هو ابن أبي تميمة السختياني. وأخرجه مسلم بإثر (١٥٤٣)، وابن ماجه (٢٢٦٦) من طريق حماد بن زيد وحده، بهذا الإسناد. ولم يذكر ابن ماجه سوى المحاقلة والمزابنة. وأخرجه الترمذي (١٣٦٠)، والنسائي (٤٦٣٤) من طريق أيوب السختياني، عن أبي الزبير وحده، به. ولم يذكر الترمذي الثُّنْيا. وأخرجه مسلم بإثر (١٥٤٣)، والنسائي (٣٨٧٩) و (٤٥٢٤) من طريق ابن جريج، عن أبي الزبير، به. وقرن بأبي الزبير عطاء بن أبي رباح. ولم يذكر النسائي في روايته المعاومة والثنيا. وأخرجه مسلم بإثر (١٥٤٣) من طريق سليمان بن حيان، عن سعيد بن ميناء وحده، به دون ذكر المعاومة والثنيا والعرايا. وأخرجه مسلم (١٥٣٦) من طريق أبي الوليد المكي، والنسائي (٣٨٨٣) من طريق أبي سلمة بن عبد الرحمن، و (٣٩٢٠) من طريق عمرو بن دينار، ثلاثتهم عن جابر بن عبد الله. ولم يذكروا في رواياتهم المعاومة، وبعضهم لا يذكر الثنيا. وبعضهم لا يذكر العرايا، ولفظ أبي سلمة: نهى عن المخاضرة والمزابنة. وأخرج النسائي (٣٨٨٢) من طريق يزيد بن نعيم، عن جابر: أن النبي ﷺ عن الحقل، وهي المزابنة. وهو في "مسند أحمد" (١٤٣٥٨): و"صحيح ابن حبان" (٤٩٩٢). وقد سلف ذكر النهي عن بيع المعاومة -وهو بيع السنين- بهذا الإسناد برقم (٣٣٧٥). وانظر تالييه. قال الخطابي: "المحاقلة" بيع الزرع بالحب، و"المخابرة" هي المزارعة، والخبير: الأكّار، و"المزابنة" بيع الرطب بالتمر، وأما "المعاومة" فهي بيع السنين، ومعاه أن يبيعه سنة أو سنتين أو أكثر ثمرة نخلة بعينها أو نخلات، وهو بيع فاسد، لأنه بيع ما لم يوجد ولم يخلق ولا يدري هل يثمر أو لا يثمر؟ وبيع "الثنيا" المنهي عنه أن يبيعه ثمر حائطه ويستثني منه جزءاً غير معلوم، فيبطل، لأن المبيع حينئذٍ يكون مجهولاً، فإذا كان ما يستثنيه شيئاً معلوماً. كالثلث والربع ونحوه ان جائزاً، وكذلك إذا باعه صُبْرة طعام جزافاً، واستثنى منها قفيزاً أو قفيزين كان جائزاً، لأنه استثنى معلوماً من معلوم. وقال ابن القيم في "حاشيته على السنن": المخابرة التي نهاهم عنها رسول الله ﷺ هي التي كانوا يفعلونها من المخابرة الظالمة الجائرة، وهي التي جاءت مفسّرة في أحاديثهم، ومطلق النهي ينصرف إليها دون ما فعله هو وخلفاؤه وأصحابه من بعده، كما بيناه.
حَدَّثَنَا أَبُو حَفْصٍ، عُمَرُ بْنُ يَزِيدَ السَّيَّارِيُّ حَدَّثَنَا عَبَّادُ بْنُ الْعَوَّامِ، عَنْ سُفْيَانَ بْنِ حُسَيْنٍ، عَنْ يُونُسَ بْنِ عُبَيْدٍ، عَنْ عَطَاءٍ، عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، قَالَ نَهَى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَنِ الْمُزَابَنَةِ وَالْمُحَاقَلَةِ وَعَنِ الثُّنْيَا إِلاَّ أَنْ يُعْلَمَ .
জাবির ইবনু ‘আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ‘মুযাবানা’ ও ‘সানাইয়া’ করতে নিষেধ করেছেন, তবে পরিমাণ নির্ধারিত থাকলে তা করা যাবে।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح ، ولہ شاھد عند مسلم (1536)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. عطاء: هو ابن أبي رباح. وأخرجه الترمذي (١٣٣٦)، والنسائي (٣٨٨٠) و (٤٦٣٣) من طريق عباد بن العوام، بهذا الإسناد. وزادا ذكر المخابرة. وأخرجه البخاري (٢٣٨١)، ومسلم بإثر (١٥٤٣)، والنسائي (٣٨٧٩) و (٤٥٢٣) و (٤٥٢٤) و (٤٥٥٠) من طريق ابن جريج، ومسلم بإثر (١٥٤٣) من طريق زيد بن أبي أنيسة، كلاهما عن عطاء بن أبي رباح، به. وزادا في روايتهما: المخابرة ولم يذكرا الثنيا. وهو في "مسند أحمد" (١٤٨٧٦). وانظر ما قبله.
حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ مَعِينٍ، حَدَّثَنَا ابْنُ رَجَاءٍ، - يَعْنِي الْمَكِّيَّ - قَالَ ابْنُ خُثَيْمٍ حَدَّثَنِي عَنْ أَبِي الزُّبَيْرِ، عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، قَالَ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ " مَنْ لَمْ يَذَرِ الْمُخَابَرَةَ فَلْيَأْذَنْ بِحَرْبٍ مِنَ اللَّهِ وَرَسُولِهِ " .
জাবির ইবনু ‘আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি : যে ব্যক্তি ‘মুখারাবা’ (বর্গা) বর্জন করেনি তার বিরুদ্ধে আল্লাহ্ ও তাঁর রাসূলের পক্ষ হতে যুদ্ধের ঘোষণা দাও।
দূর্বল : যঈফাহ (৯৯৩), যঈফ আল-জামি’উস সাগীর (৫৮৪১)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، أبو الزبیر عنعن ، (انوار الصحیفہ ص 122)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: رجاله ثقات، إلا أن أبا الزبير -وهو محمد بن مسلم بن تدرس المكي- لم يصرح بسماعه من جابر. ابن خُثَيم: هو عبد الله بن عثمان بن خثيم، وابن رجاء المكي: اسمُه عبد الله. وأخرجه الترمذي في "العلل الكبير" ١/ ٥٢٦، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" ٤/ ١٠٧، وابن حبان (٥٢٠٠)، وأبو نعيم في "الحلية" ٩/ ٣٢٦، والبيهقي ٦/ ١٢٨ من طريق عبد الله بن عثمان بن خثيم، به. قال الترمذي: سألت محمداً عن هذا الحديث، قلت له: روى هذا عن ابن خثيم غير يحيى بن سُليم؟ قال: نعم، رواه مسلم بن خالد وداود بن عبد الرحمن العطار، قلت له: ما معنى هذا الحديث؟ قال: إنما نهى رسول الله ﷺ عن تلك الشروط الفاسدة التي كانوا يشترطون، فقال: من لم ينته عن الذي نهيت عنه فليأذن بحرب من الله ورسوله.
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا عُمَرُ بْنُ أَيُّوبَ، عَنْ جَعْفَرِ بْنِ بُرْقَانَ، عَنْ ثَابِتِ بْنِ الْحَجَّاجِ، عَنْ زَيْدِ بْنِ ثَابِتٍ، قَالَ نَهَى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَنِ الْمُخَابَرَةِ . قُلْتُ وَمَا الْمُخَابَرَةُ قَالَ أَنْ تَأْخُذَ الأَرْضَ بِنِصْفٍ أَوْ ثُلُثٍ أَوْ رُبُعٍ .
যায়িদ ইবনু সাবিত (রা:) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুখাবারা করতে নিষেধ করেছেন। আমি জিজ্ঞেস করলাম, মুখাবারা কি? তিনি বললেন? কারো জমি অর্ধাংশ, এক-তৃতীয়াংশ অথবা এক-চতুর্থাংশ ফসলের বিনিময়ে চাষ করা। [১]
সহীহঃ ইরওয়া (১৪৭৭)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. وأخرجه ابن أبي شيبة ٦/ ٣٤٦، وأحمد (٢١٦٣١)، وعبد بن حميد (٢٥٣)، والطبراني (٤٩٣٨)، والبيهقي ٦/ ١٣٣ من طريق جعفر بن برقان، به.
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ حَنْبَلٍ، حَدَّثَنَا يَحْيَى، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ، عَنْ نَافِعٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم عَامَلَ أَهْلَ خَيْبَرَ بِشَطْرِ مَا يَخْرُجُ مِنْ ثَمَرٍ أَوْ زَرْعٍ .
ইবনু ‘উমার (রা:) হতে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খায়বারের অধিবাসীদের এ শর্তে চাষাবাদ করতে দিয়েছিলেন যে, উৎপন্ন ফল অথবা ফসলের অর্ধেক তারা পাবে।
সহীহঃ ইবনু মাজাহ(২৪৬৭)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح بخاری (2329) صحیح مسلم (1551)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. عُبيد الله: هو ابن عمر العُمري، ويحيى: هو ابن سعيد القطان. وأخرجه البخاري (٢٣٢٩)، ومسلم (١٥٥١)، وابن ماجه (٢٤٦٧)، والترمذي (١٤٣٩) من طريق يحيى بن سعيد القطان، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٤٦٦٣). وانظر ما بعده، وما سلف برقم (٣٠٠٦) و (٣٠٠٨). قال الخطابي: في هذا إثبات المزارعة .. ، وإنما صار ابن عمر إلى حديث رافع ابن خديج تورُّعاً واحتياطاً، وهو راوي خبر أهل خيبر، وقد رأى رسول الله ﷺ أقرهم عليها أيام حياته، ثم أبا بكر ثم عمر إلى أن أجلاهم عنها. وفيه إثبات المساقاة، وهي التي يُسميها أهل العراق المعاملة، وهي: أن يدفع صاحب النخل نخله إلى الرجل ليعمل بما فيه صلاحها أو صلاح ثمرها، ويكون له الشطر من ثمرها وللعامل الشطر، فيكون من أحد الشقين: رقاب الشجر، ومن الشق الآخر: العمل، كالمزارعة يكون فيها من قِبل رب المال الدراهمُ والدنانير، ومن العامل التصرف فيها، وهذه كلها في القياس سواء. والعمل بالمساقاة ثابت في قول أكثر الفقهاء. ولا أعلم أحداً منهم أبطلها إلا أبا حنيفة، وخالفه صاحباه، فقالا بقول جماعة أهل العلم.
حَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ بْنُ سَعِيدٍ، عَنِ اللَّيْثِ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ، - يَعْنِي ابْنَ غَنَجٍ - عَنْ نَافِعٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم دَفَعَ إِلَى يَهُودِ خَيْبَرَ نَخْلَ خَيْبَرَ وَأَرْضَهَا عَلَى أَنْ يَعْتَمِلُوهَا مِنْ أَمْوَالِهِمْ وَأَنَّ لِرَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم شَطْرَ ثَمَرَتِهَا .
ইবনু ‘উমার (রা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খায়বারের ইয়াহুদীদেরকে সেখানকার বাগান ও জমি এই শর্তে চাষাবাদ করতে দিয়েছিলেন যে, তারা নিজেদের খরচে তা চাষাবাদ করবে এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)- কে উৎপন্ন ফলের অর্ধেক প্রদান করবে।
সহীহ: এর পূর্বেরটি দেখুন।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم (1551)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل محمد بن عبد الرحمن بن عَنَج، فهو صدوق حسن الحديث، وهو متابع. الليث: هو ابن سعْد. وأخرجه مسلم (١٥٥١)، والنسائي (٣٩٢٩) و (٣٩٣٠) من طريق الليث بن سعْد، بهذا الإسناد. وانظر ما قبله، وما سلف برقم (٣٠٠٦) و (٣٠٠٨).
حَدَّثَنَا أَيُّوبُ بْنُ مُحَمَّدٍ الرَّقِّيُّ، حَدَّثَنَا عُمَرُ بْنُ أَيُّوبَ، حَدَّثَنَا جَعْفَرُ بْنُ بُرْقَانَ، عَنْ مَيْمُونِ بْنِ مِهْرَانَ، عَنْ مِقْسَمٍ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ افْتَتَحَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم خَيْبَرَ وَاشْتَرَطَ أَنَّ لَهُ الأَرْضَ وَكُلَّ صَفْرَاءَ وَبَيْضَاءَ . قَالَ أَهْلُ خَيْبَرَ نَحْنُ أَعْلَمُ بِالأَرْضِ مِنْكُمْ فَأَعْطِنَاهَا عَلَى أَنَّ لَكُمْ نِصْفَ الثَّمَرَةِ وَلَنَا نِصْفٌ . فَزَعَمَ أَنَّهُ أَعْطَاهُمْ عَلَى ذَلِكَ فَلَمَّا كَانَ حِينَ يُصْرَمُ النَّخْلُ بَعَثَ إِلَيْهِمْ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ رَوَاحَةَ فَحَزَرَ عَلَيْهِمُ النَّخْلَ وَهُوَ الَّذِي يُسَمِّيهِ أَهْلُ الْمَدِينَةِ الْخَرْصَ فَقَالَ فِي ذِهْ كَذَا وَكَذَا قَالُوا أَكْثَرْتَ عَلَيْنَا يَا ابْنَ رَوَاحَةَ . فَقَالَ فَأَنَا أَلِي حَزْرَ النَّخْلِ وَأُعْطِيكُمْ نِصْفَ الَّذِي قُلْتُ . قَالُوا هَذَا الْحَقُّ وَبِهِ تَقُومُ السَّمَاءُ وَالأَرْضُ قَدْ رَضِينَا أَنْ نَأْخُذَهُ بِالَّذِي قُلْتَ .
ইবনু আব্বাস (রা:) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খায়বার বিজয়ের পর শর্ত আরোপ করলেন যে, এখানকার জমি এবং যাবতীয় সোনা-রূপা আমার। খায়বারে বসবাসকারী ইয়াহুদীরা বললো, আমরা কৃষিকাজে আপনাদের চেয়ে অধিক পারদর্শী। সুতরাং এখানে আমাদেরকে চাষাবাদ করতে দিন, উৎপাদিত ফলের অর্ধেক আপনাদের এবং অর্ধেক আমাদের। তিনি উক্ত শর্তে তাদেরকে জমি চাষ করতে দিলেন। অতঃপর খেজুর কাটার সময় এলে তিনি ‘আবদুল্লাহ ইবনু রাওয়াহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)- কে তাদের কাছে প্রেরণ করেন। তিনি তাদের খেজুরের পরিমাণ অনুমান করলেন। মাদীনাহবাসিরা একে খারস বলতো। তিনি বললেন, এতে এই এই পরিমাণ খেজুর হবে। তারা বললো, হে ইবনু রাওয়াহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)! আপনি পরিমাণের চেয়ে বেশী অনুমান করেছেন। তিনি বললেন, আমি প্রথমে খেজুর সংগ্রহ করবো। আমি যে পরিমাণ অনুমান করেছি তার অর্ধেক তোমাদের দিবো। তারা বললো, এটাই সঠিক (হক্ব)। আর আসমান-যমীন হক্বের জন্যই সুপ্রতিষ্ঠিত আছে। আমরা আপনার কথা মোতাবেক গ্রহণ করতে সম্মত।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: حسن صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ حسن ، أخرجہ ابن ماجہ (1820 وسندہ حسن)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح. مِقسَم: هو ابن بُجْرة - ويقال: نَجْدة. وأخرجه ابن ماجه (١٨٢٠) من طريق عمر بن أيوب، بهذا الإسناد. وأخرجه مختصراً ابن ماجه (٢٤٦٨) من طريق محمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن الحكم بن عتيبة، عن مقسم، عن ابن عباس: أن رسول الله ﷺ أعطى خيبر أهلها على النصف، نخلها وأرضها. وإسناده ضعيف لسوء حفظ ابن أبي ليلى. وهو في "مسند أحمد" (٢٢٥٥) من طريق محمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلى. ويشهد له بتمامه حديث ابن عمر عند البيهقي ٦/ ١١٤، وإسناده صحيح. وانظر تالييه. قوله: يُصَرم النخْل، أي: يُقطَع، من الصَّرْم، وهو القطْع. والخَرْص: من خَرَصَ يخرُصُ خَرْصاً، يقال: خَرَصَ النخلة والكرمة إذا حَزَرَ ما عليها من الرطب تمراً، ومن العنب زبيباً، فهو من الخَرْص الظَّن، لأن الحَزْر إنما هو تقدير بظن، والاسم الخِرص بالكسر.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ سَهْلٍ الرَّمْلِيُّ، حَدَّثَنَا زَيْدُ بْنُ أَبِي الزَّرْقَاءِ، عَنْ جَعْفَرِ بْنِ بُرْقَانَ، بِإِسْنَادِهِ وَمَعْنَاهُ قَالَ فَحَزَرَ وَقَالَ عِنْدَ قَوْلِهِ وَكُلَّ صَفْرَاءَ وَبَيْضَاءَ يَعْنِي الذَّهَبَ وَالْفِضَّةَ لَهُ .
জা’ফার ইবনু বুরক্বান (রাহিমাহুল্লাহ) তার সানাদ হতে বর্ণিত, অনুরূপ অর্থবোধক হাদীস বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন, তিনি (‘আবদুল্লাহ) ফলের পরিমাণ নির্ধারণ করলেন। বর্ণনাকারী বলেন, ‘সাফরা’ ও ‘বাইদা’ এর অর্থ হলোঃ সোনা ও রূপা।
সানাদ সহীহ।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح الإسناد
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، انظر الحدیث السابق (2410)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده صحيح كسالفه.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ سُلَيْمَانَ الأَنْبَارِيُّ، حَدَّثَنَا كَثِيرٌ، - يَعْنِي ابْنَ هِشَامٍ - عَنْ جَعْفَرِ بْنِ بُرْقَانَ، حَدَّثَنَا مَيْمُونٌ، عَنْ مِقْسَمٍ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم حِينَ افْتَتَحَ خَيْبَرَ فَذَكَرَ نَحْوَ حَدِيثِ زَيْدٍ قَالَ فَحَزَرَ النَّخْلَ وَقَالَ فَأَنَا أَلِي جُذَاذَ النَّخْلِ وَأُعْطِيكُمْ نِصْفَ الَّذِي قُلْتُ .
মিক্বসাম (রাহিমাহুল্লাহ) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খায়বার বিজয় করলেন। অতঃপর হাদীসের বাকী অংশ যায়িদ সূত্রে বর্ণিত হাদীসের অনুরূপ। বর্ণনাকারী বলেন, তিনি (‘আবদুল্লাহ’) অনুমান করে খেজুরের পরিমাণ নির্ধারণ করে বললেন, আমি খেজুর কাটবো এবং আমি অনুমানে নির্ধারিত পরিমাণের অর্ধেক তোমাদের দিবো।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح الإسناد
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن ، انظر الحدیث السابق (2410)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات، لكنه مرسل، وقد وصله عن جعفر ابن بُرقان عمرُ بن أيوب العبْدي وزيد بن أبي الزرقاء التغلبي كما في الطريقين السابقين، وهما ثقتان، فصح وصله. قوله: جذاذ، أي: قطْع الثمر.
حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ مَعِينٍ، حَدَّثَنَا حَجَّاجٌ، عَنِ ابْنِ جُرَيْجٍ، قَالَ أُخْبِرْتُ عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ عُرْوَةَ، عَنْ عَائِشَةَ، - رضى الله عنها - قَالَتْ كَانَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم يَبْعَثُ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ رَوَاحَةَ فَيَخْرُصُ النَّخْلَ حِينَ يَطِيبُ قَبْلَ أَنْ يُؤْكَلَ مِنْهُ ثُمَّ يُخَيِّرُ يَهُودَ يَأْخُذُونَهُ بِذَلِكَ الْخَرْصِ أَوْ يَدْفَعُونَهُ إِلَيْهِمْ بِذَلِكَ الْخَرْصِ لِكَىْ تُحْصَى الزَّكَاةُ قَبْلَ أَنْ تُؤْكَلَ الثِّمَارُ وَتُفَرَّقَ .
আয়িশাহ (রা:) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ‘আবদুল্লাহ ইবনু রাওয়াহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে খায়বারে পাঠাতেন। তিনি সেখানকার বাগানের খেজুর পাকার সময় তা খাওয়ার উপযোগী হওয়ার পূর্বে অনুমান করে পরিমাণ নির্ধারণ করতেন। অতঃপর তিনি ইয়াহুদীদেরকে এখতিয়ার দিতেনঃ তারা এই পরিমান নিতে পারে। অথবা ঐ পরিমান নিয়ে অবশিষ্ট অংশ তাকে দিবে। এরূপ করা হতো ফল খাবারযোগ্য হওয়ার এবং বণ্টনের পূর্বে যাকাত নির্ধারণ করার জন্য।
সানাদ দুর্বলঃ অনুরূপ মিশকাত (১৮০৬)।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: ضعيف الإسناد
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * ضعیف ، انظر الحدیث السابق (1606) ، (انوار الصحیفہ ص 122)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: إسناده ضعيف لانقطاعه، ابن جريج -وهو عبد الملك بن عبد العزيز- لم يسمعه من الزهري كما صرح هو بذلك في هذا الإسناد. وقد سلف برقم (١٦٠٦).
حَدَّثَنَا ابْنُ أَبِي خَلَفٍ، حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ سَابِقٍ، عَنْ إِبْرَاهِيمَ بْنِ طَهْمَانَ، عَنْ أَبِي الزُّبَيْرِ، عَنْ جَابِرٍ، أَنَّهُ قَالَ أَفَاءَ اللَّهُ عَلَى رَسُولِهِ خَيْبَرَ فَأَقَرَّهُمْ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم كَمَا كَانُوا وَجَعَلَهَا بَيْنَهُ وَبَيْنَهُمْ فَبَعَثَ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ رَوَاحَةَ فَخَرَصَهَا عَلَيْهِمْ .
জাবির (রা:) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, মহান আল্লাহ তাঁর রাসূলকে খায়বার এলাকা ফাই হিসাবে দিলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেখানকার অধিবাসীদের সেভাবে রাখলেন যেভাবে তারা ছিল। তিনি সেখানকার জমি তাদেরকে চাষবাদ করতে দিলেন। তিনি সেখানে ‘আবদুল্লাহ ইবনু রাওয়াহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে প্রেরণ করলেন। তিনি সেখানে গিয়ে তাদের ফসলের পরিমাণ নির্ধারণ করলেন।
সহীহঃ পরবর্তী (৩৪১৫) হাদীস দ্বারা।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: صحيح لغيره
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: * إسنادہ ضعيف ، أبو الزبیر مدلس وعنعن في ھذا اللفظ والحدیث الآتي (الأصل: 3415) یغني عنہ ، (انوار الصحیفہ ص 122)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل محمد بن سابق، فهو صدوق لا بأس به، ولكنه متابع وقد صرح أبو الزبير -وهو محمد بن مسلم بن تدرس المكي- بسماعه من جابر في الإسناد الآتي بعده، ابن أبي خلف: هو محمد بن أحمد بن أبي خلف. وهو في "مشيخه ابن طهمان" (٣٧) مطولاً يتضمن نحو الحديث الآتي بعده. وأخرجه أحمد (١٤٩٥٣)، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" ٣/ ٢٤٧ و ٤/ ١١٣ والدارقطي (٢٠٥٠)، والبيهقي ٤/ ١٢٣، وابن عبد البر في "التمهيد" ٦/ ٤٦١ و ٩/ ١٤٣ من طريق محمد بن سابق، والطحاوي ٢/ ٣٨ - ٣٩ و ٣/ ٢٤٧ و ٤/ ١١٣ من طريق أبي عون محمد بن عون الزيادي، كلاهما عن إبراهيم بن طهمان، به. ومحمد ابن عون ثقة. وعندهم زيادة بنحو الحديث الآتي بعده.