সুনান ইবনু মাজাহ
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ بِشْرٍ عَنْ زَكَرِيَّا عَنْ خَالِدِ بْنِ سَلَمَةَ عَنْ الْبَهِيِّ عَنْ عُرْوَةَ بْنِ الزُّبَيْرِ قَالَ قَالَتْ عَائِشَةُ مَا عَلِمْتُ حَتَّى دَخَلَتْ عَلَيَّ زَيْنَبُ بِغَيْرِ إِذْنٍ وَهِيَ غَضْبَى ثُمَّ قَالَتْ يَا رَسُولَ اللهِ أَحَسْبُكَ إِذَا قَلَبَتْ بُنَيَّةُ أَبِي بَكْرٍ ذُرَيْعَتَيْهَا ثُمَّ أَقَبَلَتْ عَلَيَّ فَأَعْرَضْتُ عَنْهَا حَتَّى قَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم دُونَكِ فَانْتَصِرِي فَأَقْبَلْتُ عَلَيْهَا حَتَّى رَأَيْتُهَا وَقَدْ يَبِسَ رِيقُهَا فِي فِيهَا مَا تَرُدُّ عَلَيَّ شَيْئًا فَرَأَيْتُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم يَتَهَلَّلُ وَجْهُهُ
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমার অজ্ঞাতে হঠাৎ যায়নব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) অনুমতি ছাড়াই রাগান্বিত অবস্থায় আমার ঘরে আসলেন, অতঃপর বলেন, হে আল্লাহ্র রসূল! আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) -এর এই ছোট্ট মেয়েটি যখন আপনার সামনে তার দু’হাত নাড়াচাড়া করে, তখন তাই কি আপনার জন্য যথেষ্ট? অতঃপর যায়নাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমার দিকে ফিরলে আমি তার থেকে মুখ ফিরিয়ে নিলাম। অবশেষে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ লও এবং তাঁর থেকে প্রতিশোধ গ্রহণ করো। অতএব আমি তাঁর মুখোমুখী হয়ে তাঁকে জব্দ করলাম, এমনকি আমি দেখলাম যে,তার মুখ শুকিয়ে গেছে। তিনি আমার কোন কথা প্রতিউত্তর করতে পারলেন না। আমি নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখলাম, তাঁর চেহারা ঝলমল করছে। [১৯৮১]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده حسن، البهي -واسمه عبد الله- صدوق حسن الحديث. زكريا: هو ابن أبي زائدة. وأخرجه البخاري في "الأدب المفرد" (٥٥٨)، والنسائي في "الكبرى" (٨٨٦٥) و (٨٨٦٦) من طريق زكريا، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٤٦٢٠). وأخرج نحو هذه القصة بأطول مما هنا من طريق عروة البخاري (٢٥٨١)، ومسلم (٢٤٤٢) من طريق الحارث بن هشام، كلاهما عن عائشة. وهو في "مسند أحمد" (٢٤٥٧٥). قولها: "أحسبُكَ" أي: أيكفيك فعل عائشة حين تُقلب لك الذراعين، أي: كأنك لشدة حبك لها لا تنظر إلى أمر آخر. و"ذُرَيْعيها" تثنية ذُريع تصغير الذراع.
حَدَّثَنَا حَفْصُ بْنُ عَمْرٍو حَدَّثَنَا عُمَرُ بْنُ حَبِيبٍ الْقَاضِي قَالَ حَدَّثَنَا هِشَامُ بْنُ عُرْوَةَ عَنْ أَبِيهِ عَنْ عَائِشَةَ قَالَتْ كُنْتُ أَلْعَبُ بِالْبَنَاتِ وَأَنَا عِنْدَ رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم فَكَانَ يُسَرِّبُ إِلَيَّ صَوَاحِبَاتِي يُلَاعِبْنَنِي
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সামনে পুতুল নিয়ে খেলা করতাম। তিনি আমার বান্ধবীদেরকে আমার সাথে খেলা করার জন্য আমার নিকট পাঠিয়ে দিতেন। [১৯৮২]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: بخاری ومسلم
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح. عمر بن حبيب القاضي -وإن كان ضعيفًا- تابعه غير واحد من الثقات. حفص بن عمرو: هو ابن ربال الرقاشي. وأخرجه البخاري (٦١٣٠)، ومسلم (٢٤٤٠)، وأبو داود (٤٩٣١)، والنسائي في "الكبرى" (٨٨٩٧) و (٨٨٩٨) و (٨٨٩٩) من طرق عن هشام بن عروة، بهذا الإسناد. وأخرجه النسائي (٨٩٠٠) من طريق يزيد بن رومان، عن عروة، به. وهو في "مسند أحمد" (٢٤٢٩٨)، و "صحيح ابن حبان" (٥٨٦٣) و (٥٨٦٥) و (٥٨٦٦).
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ حَدَّثَنَا عَبْدُ اللهِ بْنُ نُمَيْرٍ حَدَّثَنَا هِشَامُ بْنُ عُرْوَةَ عَنْ أَبِيهِ عَنْ عَبْدِ اللهِ بْنِ زَمْعَةَ قَالَ خَطَبَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم ثُمَّ ذَكَرَ النِّسَاءَ فَوَعَظَهُمْ فِيهِنَّ ثُمَّ قَالَ إِلَامَ يَجْلِدُ أَحَدُكُمْ امْرَأَتَهُ جَلْدَ الْأَمَةِ وَلَعَلَّهُ أَنْ يُضَاجِعَهَا مِنْ آخِرِ يَوْمِهِ
আবদুল্লাহ বিন যামআহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ভাষণ দিলেন, অতঃপর মহিলাদের উল্লেখ করে তাদের ব্যাপারে লোকজনকে উপদেশ দিলেন। তিনি বলেনঃ তোমাদের কেউ কেন তার স্ত্রীকে দাসীর মত বেত্রাঘাত করে? অথচ দিনের শেষেই সে আবার তাঁর শয্যাসংগী হয়! [১৯৮৩]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: بخاری ومسلم
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه البخاري (٤٩٤٢) و (٥٢٠٤) و (٦٠٤٢)، ومسلم (٢٨٥٥)، والترمذي (٣٦٣٧)، والنسائي في "الكبرى" (٩١٢١) من طريق هشام بن عروة، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٦٢٢١)، و"صحيح ابن حبان" (٤١٩٠) و (٥٧٩٤).
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ حَدَّثَنَا وَكِيعٌ عَنْ هِشَامِ بْنِ عُرْوَةَ عَنْ أَبِيهِ عَنْ عَائِشَةَ قَالَتْ مَا ضَرَبَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم خَادِمًا لَهُ وَلَا امْرَأَةً وَلَا ضَرَبَ بِيَدِهِ شَيْئًا
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কখনও তাঁর কোন খাদেমকে অথবা তাঁর কোন স্ত্রীকে মারপিট করেননি এবং নিজ হাতে অপর কাউকেও প্রহার করেননি। [১৯৮৪]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه مسلم (٢٣٢٨)، والنسائي في "الكبرى" (٩١٢٠) من طريق هشام بن عروة، بهذا الإسناد. وأخرجه أبو داود (٤٧٨٦)، والنسائي (٩١١٨) و (٩١١٩) من طريق الزهري، عن عروة، به. وهو في "مسند أحمد" (٢٤٠٣٤)، و "صحيح ابن حبان" (٤٨٨) و (٦٤٤٤).
أَخْبَرَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الصَّبَّاحِ أَنْبَأَنَا سُفْيَانُ بْنُ عُيَيْنَةَ عَنْ الزُّهْرِيِّ عَنْ عَبْدِ اللهِ بْنِ عَبْدِ اللهِ بْنِ عُمَرَ عَنْ إِيَاسِ بْنِ عَبْدِ اللهِ بْنِ أَبِي ذُبَابٍ قَالَ قَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم لَا تَضْرِبُنَّ إِمَاءَ اللهِ فَجَاءَ عُمَرُ إِلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ يَا رَسُولَ اللهِ قَدْ ذَئِرَ النِّسَاءُ عَلَى أَزْوَاجِهِنَّ فَأْمُرْ بِضَرْبِهِنَّ فَضُرِبْنَ فَطَافَ بِآلِ مُحَمَّدٍ صلى الله عليه وسلم طَائِفُ نِسَاءٍ كَثِيرٍ فَلَمَّا أَصْبَحَ قَالَ لَقَدْ طَافَ اللَّيْلَةَ بِآلِ مُحَمَّدٍ سَبْعُونَ امْرَأَةً كُلُّ امْرَأَةٍ تَشْتَكِي زَوْجَهَا فَلَا تَجِدُونَ أُولَئِكَ خِيَارَكُمْ
আবদুল্লাহ বিন আবু যূবাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ তোমরা আল্লাহ্র দাসীদের প্রহার করো না। অতঃপর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) -এর কাছে এসে বলেনঃ হে আল্লাহ্র রাসূল! নারীরা তো তাদের স্বামীদের অবাধ্যাচরণ করছে। তাই তাদেরকে মারার অনুমতি দিলেন এবং তারা প্রহিত হলো। পরে অনেক নারী রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর বাড়িতে সমবেত হলো। সকাল বেলা তিনি বলেনঃ আজ রাতে মুহাম্মদের পরিবারের সত্তুরজন মহিলা এসে তাদের প্রত্যেকেই নিজ নিজ স্বামীর বিরুদ্ধে অভিযোগ করেছে। তোমরা মারপিটকারীদেরকে তোমাদের মধ্যে উত্তম হিসাবে পাবে না। [১৯৮৫]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * حسن صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. إياس بن عبد الله بن أبي ذُباب قال البخاري في "تاريخه" ١/ ٤٤٠: لا تعرف له صحبة، وخالفه أبو حاتم وأبو زرعة، فأثبتا صحبته كما في "الجرح والتعديل" ٢/ ٢٨٠، ورجح الحافظ صحبته في "تهذيب التهذيب"، وصحح إسناد حديثه هذا في "الإصابة". وأخرجه أبو داود (٢١٤٦)، والنسائي في "الكبرى" (٩١٢٢) من طريق سفيان ابن عيينة، بهذا الإسناد. وهو في "صحيح ابن حبان" (٤١٨٩). وبعضهم يسمي الراوي عن إياس: عُبيد الله، وهو أيضًا من ولد عبد الله بن عمر بن الخطاب، وعلى أي حالِ فكلاهما ثقة محتج به عند الشيخين. وله شاهد مرسل عن أم كلثوم بنت الصِّدَّيق عند الحاكم ١٩١/ ٢ والبيهقي ٧/ ٣٠٤. قوله: ذئر النساء" بوزن فَرِحَ: نَشزْنَ واجترأنَ.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ يَحْيَى والْحَسَنُ بْنُ مُدْرِكٍ الطَّحَّانُ قَالَا حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ حَمَّادٍ حَدَّثَنَا أَبُو عَوَانَةَ عَنْ دَاوُدَ بْنِ عَبْدِ اللهِ الْأَوْدِيِّ عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ الْمُسْلِيِّ عَنْ الْأَشْعَثِ بْنِ قَيْسٍ قَالَ ضِفْتُ عُمَرَ لَيْلَةً فَلَمَّا كَانَ فِي جَوْفِ اللَّيْلِ قَامَ إِلَى امْرَأَتِهِ يَضْرِبُهَا فَحَجَزْتُ بَيْنَهُمَا فَلَمَّا أَوَى إِلَى فِرَاشِهِ قَالَ لِي يَا أَشْعَثُ احْفَظْ عَنِّي شَيْئًا سَمِعْتُهُ عَنْ رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم لَا يُسْأَلُ الرَّجُلُ فِيمَ يَضْرِبُ امْرَأَتَهُ وَلَا تَنَمْ إِلَّا عَلَى وِتْرٍ وَنَسِيتُ الثَّالِثَةَ
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ خَالِدِ بْنِ خِدَاشٍ حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ مَهْدِيٍّ حَدَّثَنَا أَبُو عَوَانَةَ بِإِسْنَادِهِ نَحْوَهُ.
উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, (আশ‘আস) বলেন, আমি এক রাতে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) -এর বাড়িতে মেহমান হলাম। মধ্যরাতে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর স্ত্রীকে প্রহার করতে উঠলেন। আমি তাদের দু’জনের মাঝে প্রতিবন্ধক হলাম। অতঃপর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) শয্যা গ্রহণ করে আমাকে বলেন, হে আশ‘আস! তুমি আমার থেকে একটা বিষয় মনে রাখবে যা আমি রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর নিকট শুনেছি। স্বামী তার স্ত্রীকে প্রহার করলে এ ব্যাপারে জওয়াবদিহি করতে হবে না, বিতর সালাত না পড়ে ঘুমাবে না। রাবী বলেন, আমি তৃতীয় কথাটি ভুলে গেছি। [১৯৮৬]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف لجهالة عبد الرحمن المُسلي. أبو عوانة: هو الوضاح اليشكري. وأخرجه أبو داود (٢١٤٧)، والنسائي في "الكبرى" (٩١٢٣) من طريق أبي عوانة الوضاح، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٢٢). وانظر ما بعده. * إسناده ضعيف كسابقه
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ حَدَّثَنَا عَبْدُ اللهِ بْنُ نُمَيْرٍ وَأَبُو أُسَامَةَ عَنْ عُبَيْدِ اللهِ بْنِ عُمَرَ عَنْ نَافِعٍ عَنْ ابْنِ عُمَرَ عَنْ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم أَنَّهُ لَعَنَ الْوَاصِلَةَ وَالْمُسْتَوْصِلَةَ وَالْوَاشِمَةَ وَالْمُسْتَوْشِمَةَ
ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেই নারীকে অভিসম্পাত করেছেন, যে কৃত্রিম চুল সংযোজন করে এবং যে তা করায় এবং যে দেহে উল্কি অংকন করে এবং যে তা করায়। [১৯৮৭]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. أبو أسامة: هو حماد بن أسامة. وأخرجه البخاري (٥٩٣٧)، ومسلم (٢١٢٤)، وأبو داود (٤١٦٨)، والترمذي (١٨٥٧) و (٢٩٨٩)، والنسائي ٨/ ١٤٥ و ١٨٧ و ١٨٨ من طريق نافع، عن ابن عمر. وهو في "مسند أحمد" (٤٧٢٤)، و"صحيح ابن حبان" (٥٥١٣). الواصلة: هي التي تصل الشعر سواء كان لنفسها أو لغيرها، والمستوصلة: التي تطلب فعل ذلك، ويفعل بها. وذهب الليث بن سعد، ونقله أبو عبيد [في "غريبه" ١/ ١٦٧] عن كثير من الفقهاء أن الممتنع من ذلك وصل الشعر بالشعر، وأما إذا وصلت شعرها بغير الشعر من خرقة أو غيرها، فلا يدخل في النهي، وأخرج أبو داود (٤١٧١) بسند صحيح عن سعيد بن جير، قال: لا بأس بالقرامل، وبه قال أحمد، والقرامل: جمع قَرْمَل: نبات طويل الفروع لين، والمراد به هنا خيوط من حرير أو صوف يعمل ضفائر تَصِلُ بها المرأة شعرها. انظر "الفتح" ١٠/ ٣٧٥. والواشمة: هي التي تفعل الوشم لغيرها أو لنفسها، والمستوشمة: هي التي تطلب فعل ذلك. والوشم: أن يَغْرِز الجلد بإبرة، ثم يُحشى بكحل أو نيل، فيزرق أثرُه، ويخضر.
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ حَدَّثَنَا عَبْدَةُ بْنُ سُلَيْمَانَ عَنْ هِشَامِ بْنِ عُرْوَةَ عَنْ فَاطِمَةَ عَنْ أَسْمَاءَ قَالَتْ جَاءَتْ امْرَأَةٌ إِلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَقَالَتْ إِنَّ ابْنَتِي عُرَيِّسٌ وَقَدْ أَصَابَتْهَا الْحَصْبَةُ فَتَمَرَّقَ شَعْرُهَا فَأَصِلُ لَهَا فِيهِ فَقَالَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم لَعَنَ اللهُ الْوَاصِلَةَ وَالْمُسْتَوْصِلَةَ
আসমা' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক মহিলা নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর নিকট এসে বললো, আমার মেয়ের সদ্য বিবাহ হয়েছে, কিন্তু রোগের কারণে তার মাথার চুল ঝরে গেছে। আমি কি তার মাথায় কৃত্রিম চুল জোড়া দিবো? রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ যে নারী পরচুলা সংযোজন করে এবং যে সংযোজন করায়, আল্লাহ্ তাদের উভয়কে অভিসম্পাত করেন। [১৯৮৮]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: بخاری ومسلم
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. فاطمة: هي بنت المنذر بن الزبير بن العوام زوج هشام بن عروة بن الزبير بن العوام، وأسماء: هي بنت أبي بكر الصديق جدة هشام بن عروة. وأخرجه مطولًا ومختصرًا البخاري (٥٩٣٦)، ومسلم (٢١٢٢)، والنسائي ٨/ ١٤٥ و ١٨٧ - ١٨٨ من طريق هشام بن عروة، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٣٨٠٤) و (٢٦٩١٨). وأخرجه بنحوه البخاري (٥٩٣٥)، ومسلم (٢١٢٢) من طريق صفية بنت شيبة عن أسماء. قوله: "عُريِّس" بضم العين وفتح الراء وتشديد الياء، تصغير عروس. "تمرَّق" براء مهملة أو بزاي معجمة: قاله السندي.
حَدَّثَنَا أَبُو عُمَرَ حَفْصُ بْنُ عَمْرٍو وَعَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ عُمَرَ قَالَا حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ مَهْدِيٍّ حَدَّثَنَا سُفْيَانُ عَنْ مَنْصُورٍ عَنْ إِبْرَاهِيمَ عَنْ عَلْقَمَةَ عَنْ عَبْدِ اللهِ قَالَ لَعَنَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم الْوَاشِمَاتِ وَالْمُسْتَوْشِمَاتِ وَالْمُتَنَمِّصَاتِ وَالْمُتَفَلِّجَاتِ لِلْحُسْنِ الْمُغَيِّرَاتِ لِخَلْقِ اللهِ فَبَلَغَ ذَلِكَ امْرَأَةً مِنْ بَنِي أَسَدٍ يُقَالُ لَهَا أُمُّ يَعْقُوبَ فَجَاءَتْ إِلَيْهِ فَقَالَتْ بَلَغَنِي عَنْكَ أَنَّكَ قُلْتَ كَيْتَ وَكَيْتَ قَالَ وَمَا لِي لَا أَلْعَنُ مَنْ لَعَنَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم وَهُوَ فِي كِتَابِ اللهِ قَالَتْ إِنِّي لَأَقْرَأُ مَا بَيْنَ لَوْحَيْهِ فَمَا وَجَدْتُهُ قَالَ إِنْ كُنْتِ قَرَأْتِهِ فَقَدْ وَجَدْتِهِ أَمَا قَرَأْتِ {وَمَا آتَاكُمْ الرَّسُولُ فَخُذُوهُ وَمَا نَهَاكُمْ عَنْهُ فَانْتَهُوا} قَالَتْ بَلَى قَالَ فَإِنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم قَدْ نَهَى عَنْهُ قَالَتْ فَإِنِّي لَأَظُنُّ أَهْلَكَ يَفْعَلُونَ قَالَ اذْهَبِي فَانْظُرِي فَذَهَبَتْ فَنَظَرَتْ فَلَمْ تَرَ مِنْ حَاجَتِهَا شَيْئًا قَالَتْ مَا رَأَيْتُ شَيْئًا قَالَ عَبْدُ اللهِ لَوْ كَانَتْ كَمَا تَقُولِينَ مَا جَامَعَتْنَا
আবদুল্লাহ বিন মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেই সব নারীকে অভিসম্পাত করেছেন, যারা অন্যের দেহে আঁকে এবং যারা নিজেদের দেহে উল্কি অংকন করায়, যারা ভ্রুর চুল উপড়ে ফেলে এবং যারা সৌন্দর্যের জন্য দাঁতের মাঝে ফাঁক সৃষ্টি করে, তারা আল্লাহ্র সৃষ্টিতে পরিবর্তন করে। আসাদ গোত্রের উম্মু ইয়া'কূব নাম্নী মহিলার কাছে এ হাদীস পৌঁছলে, তিনি আবদুল্লাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) -এর কাছে এসে বলেন, আমি অবগত হয়েছি যে, আপনি এমন এমন কথা বলেছেন। আবদুল্লাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি তাদেরকে কেন অভিসম্পাত করবো না যাদেরকে রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অভিসম্পাত করেছেন এবং বিষয়টি আল্লাহ্র কিতাবে উক্ত আছে! মহিলা বলেন, আমি সম্পূর্ণ কুরআ'ন পডেছি, কিন্তু কোথাও তো তা পাইনি। আবদুল্লাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তুমি খেয়াল করে তা পড়লে, অবশ্যই পেতে। তুমি কি এ আয়াত পড়োনি (অনুবাদ) : "রসূল তোমাদেরকে যা দেয় তা তোমরা গ্রহণ করো এবং যা থেকে তোমাদের নিষেধ করে তা থেকে তোমরা বিরত থাকো" (সূরা হাশরঃ ৭)? মহিলা বললেন, হাঁ। আবদুল্লাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এ কাজ করতে নিষেধ করেছেন। মহিলা বলেন, আমার মনে হয় আপনার পরিবার (স্ত্রী) এরূপ করে থাকে। তিনি বলেন, তাহলে তুমি গিয়ে লক্ষ্য করে দেখো। অতএব সে গিয়ে লক্ষ্য করলো, কিন্তু তার কোন লক্ষণই দেখতে পেলো না। শেষে সে বললো, আমি এমন কিছু দেখতে পাইনি। আবদুল্লাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তোমার কথা ঠিক হলে সে আমাদের সাথে একত্রে থাকতে পারতো না। [১৯৮৯]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: بخاری ومسلم
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. سفيان: هو الثوري، ومنصور: هو ابن المعتمر، وإبراهيم: هو ابن يزيد النخعي، وعلقمة: هو ابن قيس النخعي. وأخرجه مطولًا ومختصرًا البخاري (٤٨٨٦)، ومسلم (٢١٢٥)، وأبو داود (٤١٦٩)، والترمذي (٢٩٨٨)، والنسائي ٨/ ١٤٦ و ١٨٨ من طريق إبراهيم النخعي، به. وأخرجه مختصرًا النسائي ٨/ ١٤٦ من طريق مسروق، و ٨/ ١٤٨ و ١٤٨ - ١٤٩ وقبيصة بن جابر، كلاهما عن ابن مسعود. وهو في "مسند أحمد" (٤١٢٩)، و"صحيح ابن حبان" (٥٥٠٤). النمص: هو إزالة شعر الوجه بالمنقاش، ويقال: إن النماص يختص بإزالة شعر الحاجبين لترفيعهما أو تسويتهما، قال أبو داود في "السُّنن" النامصة التي تنقش الحاجب حتى ترقه. وقال الحافظ في "الفتح"١٠/ ٣٧٨: وقال النووي: يستثنى من النماص ما إذا نبت للمرأة لحية أو شارب أو عنفقة، فلا يحرم عليها إزالتها، بل يستحب، قلت (القائل ابن حجر): وإطلاقه مقيد بإذن الزوج وعلمه، وإلا فمتى خلا عن ذلك منع للتدليس. وقال بعض الحنابلة: إن كان النمص أشهر شعار للفواجر، امتنع، وإلا فيكون تنزيهًا، وفي رواية: يجوز بإذن الزوج إلا إن وقع به تدليس فيحرم، قالوا: ويجوز الحف والتحمير والنقش والتطريف إذا كان بإذن الزوج، لأنه من الزينة. وقد أخرج الطبري من طريق أبي إسحاق عن امرأته أنها دخلت على عائشة وكانت شابة يعجبها الجمال فقال: المرأة تحف جبينها لزوجها، فقالت: أميطي عنك الأذى ما استطعت. وقوله: ما جامعتنا، أي: لا يكون بينه وبينها اجتماع، قال الحافظ في "الفتح" تعليقًا على رواية البخاري: ما جامعتُها: يحتمل أن يكون المراد بالجماع الوطء، أو الاجتماع وهو أبلغ، ويؤيده قوله في رواية الكشميهني: ما جامعتنا، وللإسماعيلي: ما جامعتني.
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ حَدَّثَنَا وَكِيعُ بْنُ الْجَرَّاحِ ح و حَدَّثَنَا أَبُو بِشْرٍ بَكْرُ بْنُ خَلَفٍ حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ سَعِيدٍ جَمِيعًا عَنْ سُفْيَانَ عَنْ إِسْمَعِيلَ بْنِ أُمَيَّةَ عَنْ عَبْدِ اللهِ بْنِ عُرْوَةَ عَنْ عُرْوَةَ عَنْ عَائِشَةَ قَالَتْ تَزَوَّجَنِي النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم فِي شَوَّالٍ وَبَنَى بِي فِي شَوَّالٍ فَأَيُّ نِسَائِهِ كَانَ أَحْظَى عِنْدَهُ مِنِّي وَكَانَتْ عَائِشَةُ تَسْتَحِبُّ أَنْ تُدْخِلَ نِسَاءَهَا فِي شَوَّالٍ
আ'য়িশাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে শাওয়াল মাসে বিবাহ করেন এবং শাওয়াল মাসে আমার সাথে বাসর যাপন করেন। আর রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর কোন স্ত্রী তাঁর কাছে আমার চেয়ে অধিক প্রিয় ছিল! আ'য়িশাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নব বিবাহিতার সাথে তার স্বামীর শাওয়াল মাসেই বাসর যাপন পছন্দ করতেন। [১৯৯০]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح مسلم
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. سفيان: هو الثوري. وأخرجه مسلم (١٤٢٣)، والترمذي (١١١٨)، والنسائي ٦/ ٧٠ و١٣٠ من طريق سفيان الثوري، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٧٣٢٠)، و "صحيح ابن حبان" (٤٠٥٨).
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ حَدَّثَنَا أَسْوَدُ بْنُ عَامِرٍ حَدَّثَنَا زُهَيْرٌ عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ إِسْحَقَ عَنْ عَبْدِ اللهِ بْنِ أَبِي بَكْرٍ عَنْ أَبِيهِ عَنْ عَبْدِ الْمَلِكِ بْنِ الْحَارِثِ بْنِ هِشَامٍ عَنْ أَبِيهِ أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم تَزَوَّجَ أُمَّ سَلَمَةَ فِي شَوَّالٍ وَجَمَعَهَا إِلَيْهِ فِي شَوَّالٍ
হারিস বিন হিশাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে শাওয়াল মাসে বিবাহ করেন এবং শাওয়াল মাসেই তাকে তাঁর সহবাসে একত্র করেন। আবূ বকর বিন আবদির রহমান বর্ণনায় মুরসাল। [১৯৯১]
তাহকীক আলবানীঃ মুরসাল।
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * مرسل
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، عبدالملک ھو ابن أبي بکر بن عبد الرحمٰن بن الحارث المخزومي،وأبوہ، ثقۃ تابعي فالحدیث مرسل وانظرالضعيفۃ (9/ 336-347 ح 4350) وأما ابن إسحاق، فصرح بالسماع عند ابن سعد (8/ 95)، (انوار الصحیفہ ص 450)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * ضعيف لاضطرابه، فقد اختلف فيه على ابن إسحاق كما سيأتي. زهير: هو ابن معاوية، وعبد الله بن أبي بكر: هو ابن محمَّد بن عمرو بن حزم الأنصاري، وعبد الملك بن الحارث بن هشام، الصحيح في اسمه: عبد الرحمن كما نبه عليه المزي في ترجمة أبيه الحارث بن هشام من "التهذيب" ٥/ ٣٠٢ وقد ذكر ابن الأثير في "أسد الغابة" ١/ ٤٢١ أن أهل النسب يقولون: لم يبقَ من ولد الحارث بن هشام بعده إلا عبد الرحمن وأخته أم حكيم. وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (٧٢٤)، والطبراني في "الكبير" (٣٣٤٧)، والمزي في ترجمة الحارث بن هشام من "التهذيب" ٥/ ٣٠٢ - ٣٠٣ من طريق ابن أبي شيبة، بهذا الإسناد. وأخرجه المزي ٥/ ٣٠٣ من طريق محمَّد بن يزيد المستملي، عن أسود بن عامر، به، وسمَّى عبد الملك: عبد الرحمن بن الحارث على الصواب. وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" ٨/ ٩٤ - ٩٥ عن أحمد بن عبد الله بن يونس، عن زهير بن معاوية، عن ابن إسحاق، عن عبد الله بن أبي بكر، عن أبيه، عن عبد الملك بن أبي بكر بن الحارث بن هشام، عن أبيه: أن رسول الله … إلخ. وأخرجه ابن إسحاق في "سيرته" (٣٧٩) من رواية يونس بن بكير عنه، فقال: حدثني عبد الملك بن أبي بكر بن عبد الرحمن بن الحارث، عن أبيه فذكره. ليس بين ابن إسحاق وبين عبد الملك أحد. وأخرجه الدارقطني (٣٧٣٢) من طريق محمَّد بن سلمة، عن ابن إسحاق، عن عبد الله بن أبي بكر بن عمرو بن حزم، عن عبد الملك بن أبي بكر بن عبد الرحمن ابن الحارث، فذكره. ذكر بين ابن إسحاق وبين عبد الملك عبد الله بن أبي بكر. وأخرجه الدارقطني (٣٧٣٢) من طريق محمَّد بن سلمة، عن محمَّد بن إسحاق، عن عبد الله بن أبي بكر بن عمرو بن حزم، عن عبد الملك بن أبي بكر بن عبد الرحمن بن الحارث بن هشام قال: تزوج رسول الله ﷺ أم سلمة … رواه هكذا مرسلًا. وأخرجه ابن سعد ٨/ ٩٥ عن محمَّد بن عمر الواقدي، عن عمر بن عثمان، عن عبد الملك بن أبي بكر بن عبد الرحمن بن الحارث بن هشام، عن أبيه، قال: أعرس رسول الله ﷺ بأم سلمة في شوال. قلنا: وأصل القصة في "صحيح مسلم" (١٤٦٠) من طريق محمَّد بن أبي بكر ابن محمَّد بن عمرو بن حزم، عن عبد الملك بن أبي بكر بن عبد الرحمن بن الحارث، عن أبيه، عن أم سلمة: أن رسول الله ﷺ تزوج أم سلمة أقام عندها ثلاثًا، وقال: "إنه ليس بك على أهلك هوان، إن شئت سبعت لك، وإن سبعت لك سبعت لنسائي". ليس فيه ذكر تزويجها في شوال. وقد سلف عند المصنف برقم (١٩١٧). ثم أخرجه من طريق عبد الله بن أبي بكر، عن عبد الملك بن أبي بكر بن عبد الرحمن: أن رسول الله … فذكره مرسلًا.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ يَحْيَى حَدَّثَنَا الْهَيْثَمُ بْنُ جَمِيلٍ حَدَّثَنَا شَرِيكٌ عَنْ مَنْصُورٍ ظَنَّهُ عَنْ طَلْحَةَ عَنْ خَيْثَمَةَ عَنْ عَائِشَةَ أَنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم أَمَرَهَا أَنْ تُدْخِلَ عَلَى رَجُلٍ امْرَأَتَهُ قَبْلَ أَنْ يُعْطِيَهَا شَيْئًا
আ'য়িশাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক কনেকে স্বামীর কিছু (মাহ্র, উপহার ইত্যাদি) দেয়ার পূর্বেই তার সাথে বাসর যাপনের ব্যবস্থা করে দেয়ার জন্য তাকে নির্দেশ দেন। [১৯৯২]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: إسنادہ ضعيف ، سنن أبي داود (2128)، (انوار الصحیفہ ص 450)
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف لانقطاعه، فإن خيثمة -وهو ابن عبد الرحمن بن أبي سَبرة- لم يسمع من عائشة فيما قاله أبو داود عند تخريجه هذا الحديث. وشريك -وهو ابن عبد الله النخعي- ضعيف سيئ الحفظ. وأخرجه أبو داود (٢١٢٨) عن محمَّد بن الصباح البزاز، عن شريك النخعي، بهذا الإسناد. ويغني عنه في هذا الباب حديث عقبة بن عامر عند أبي داود (٢١١٧)، وصححه ابن حبان (٤٠٧٢): أن النبي ﷺ زوج رجلًا من امرأة فدخل بها ولم يفرض لها صداقا.
حَدَّثَنَا هِشَامُ بْنُ عَمَّارٍ حَدَّثَنَا إِسْمَعِيلُ بْنُ عَيَّاشٍ حَدَّثَنِي سُلَيْمَانُ بْنُ سُلَيْمٍ الْكَلْبِيُّ عَنْ يَحْيَى بْنِ جَابِرٍ عَنْ حَكِيمِ بْنِ مُعَاوِيَةَ عَنْ عَمِّهِ مِخْمَرِ بْنِ مُعَاوِيَةَ قَالَ سَمِعْتُ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ لَا شُؤْمَ وَقَدْ يَكُونُ الْيُمْنُ فِي ثَلَاثَةٍ فِي الْمَرْأَةِ وَالْفَرَسِ وَالدَّارِ
মিখ্মার বিন মুআবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: অশুভ আলামাত বলতে কিছু নেই। অবশ্য তিনটি জিনিসে শুভ আলামাত আছেঃ স্ত্রীলোক, ঘোড়া ও বাড়ি। [১৯৯৩]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: حسن
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده ضعيف، لجهالة حكيم بن معاوية -والصحيح في اسمه: معاوية ابن حكيم كما سيأتي بيانُه- فلم يرو عنه غير يحيى بن جابر -وهو الطائي- ولم يؤثر توثيفه عن أحد، وقد وقع لهشام بن عمار في هذا الإسناد غير ما وهم: منها: قلبه لاسم التابعي: حكيم بن معاوية والصحيح أنه: معاوية بن حكيم كما تقدم، وتسميته للصحابي: مخمر بن معاوية، ومرة قال: مخمر بن حَيدة، والصحيح أن اسمه: حكيم بن معاوية كما رواه الثقات عن إسماعيل بن عياش، وكذلك ترجمه ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" ٣/ ٢٠٧. وأخرجه الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (٧٨٥)، والخطيب البغدادي في "موضح أوهام الجمع والتفريق" ١/ ٩٤ من طريق هشام بن عمار، بهذا الإسناد. وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (١٤٩١)، والخطيب ١/ ٩٤ من طريق هشام بن عمار، به، إلا أنه سمى التابعي: معاوية بن حكيم، على الصواب. وأخرجه الطبراني في "الكبير" ٢٠/ (٧٩٦) من طريق هشام بن عمار، به لكن سمى الصحابي: مخمر بن حيدة. وأخرجه سعيد بن منصور في "سننه" (٢٢٩٦) ومن طريقه الخطيب في "الموضح"١/ ٩٣، وأخرجه الترمذي (٣٠٣٦) من طريق علي بن حجر، والطبراني في "الكبير" (٢١٤٨)، والخطيب في "الموضح" ١/ ٩٣ من طريق يحيى بن عبد الحميد الحماني، وابن عبد البر في "التمهيد" ٩/ ٢٧٩ - ٢٨٠، والخطيب ١/ ٩٢ من طريق الهيثم بن خارجة، والخطيب ١/ ٩٢ من طريق عبد الوهاب بن نجدة، و١/ ٩٢ من طريق إسحاق بن إدريس، و١/ ٩٢ - ٩٣ من طريق علي بن عياش، و١/ ٩٣ من طريق الحسن بن عرفة، ثمانيتهم عن إسماعيل بن عياش، عن سليمان ابن سليم الكناني، عن يحيى بن جابر الطائي، عن معاوية بن حكيم، عن عمه حكيم بن معاوية. قلنا: وقد وقع للشيخ الألباني ﵀ في هذا الحديث التباس أدى به إلى تصحيح هذا الحديث في "الصحيحة" (١٩٣٠) بناءً على أن تابعي الحديث معاوية ابن حكيم مذكور في الصحابة، فهو رواية صحابي عن صحابي، ومنشأ هذا الوهم هو الوهم الذي وقع لهشام بن عمار فقد سمى التابعي مرة: حكيم بن معاوية كما هو عند المصنف في روايتنا، وهو خطأ بين في اسمه كما سلف، وهو غير حكيم بن معاوية المذكور في الصحابة- على الاختلاف في صحبته كذلك. وكذلك وقع الخطأ للدكتور بشار عواد حيث جعل العلة في يحيى بن جابر وأنه يرسل كثيرًا وليس هناك في الإسناد إرسال ولا تدليس، ولكن أوهام في تسمية بعض رجال الإسناد وقعت لهشام بن عمار وخالفه الثقات كما أسلفنا. وانظر ما بعده.
حَدَّثَنَا عَبْدُ السَّلَامِ بْنُ عَاصِمٍ حَدَّثَنَا عَبْدُ اللهِ بْنُ نَافِعٍ قَالَ حَدَّثَنَا مَالِكُ بْنُ أَنَسٍ عَنْ أَبِي حَازِمٍ عَنْ سَهْلِ بْنِ سَعْدٍ أَنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ إِنْ كَانَ فَفِي الْفَرَسِ وَالْمَرْأَةِ وَالْمَسْكَنِ يَعْنِي الشُّؤْمَ
সাহ্ল বিন সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেনঃ অশুভ আলামাত বলতে কিছু থাকলে তা ঘোড়া, স্ত্রীলোক ও ঘরেই থাকতো। [১৯৯৪]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: بخاری ومسلم
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وهو في "موطأ مالك" ٢/ ٩٧٢، ومن طريقه أخرجه البخاري (٢٨٥٩) و (٥٠٩٥)، ومسلم (٢٢٢٦). وهو في "مسند أحمد" (٢٢٨٣٦).
حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ خَلَفٍ أَبُو سَلَمَةَ حَدَّثَنَا بِشْرُ بْنُ الْمُفَضَّلِ عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ إِسْحَقَ عَنْ الزُّهْرِيِّ عَنْ سَالِمٍ عَنْ أَبِيهِ أَنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ الشُّؤْمُ فِي ثَلَاثٍ فِي الْفَرَسِ وَالْمَرْأَةِ وَالدَّارِ
قَالَ الزُّهْرِيُّ فَحَدَّثَنِي أَبُو عُبَيْدَةَ بْنُ عَبْدِ اللهِ بْنِ زَمْعَةَ أَنَّ جَدَّتَهُ زَيْنَبَ حَدَّثَتْهُ عَنْ أُمِّ سَلَمَةَ أَنَّهَا كَانَتْ تَعُدُّ هَؤُلَاءِ الثَّلَاثَةَ وَتَزِيدُ مَعَهُنَّ السَّيْفَ.
আবদুল্লাহ্ বিন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন, অশুভ আলামাত তিন জিনিসের মধ্যে থাকতে পারে, ঘোড়া, স্ত্রীলোক ও ঘর। যুহ্রী (রঃ) বলেন, আবূ উবায়দাহ বিন আবদুল্লাহ্ বিন যামআহ আমাকে বলেছেন যে, তার দাদী যায়নাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেন যে, তিনি এই তিনটির সাথে তরবারিও যোগ করতেন, উম্মু সালামাহ'র কথা ব্যতীত, তাদের শব্দ হলো- অশুভ আলামাত যে বস্তুর মধ্যে তাহল… অতঃপর তরবারী ব্যতীত তিনটি উল্লেখ করেন। [১৯৯৫]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * شاذ ق وفي لفظ لهما إن كان الشؤم ففي فذكر الثلاث دون السيف وهو المحفوظ
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: بخاری ومسلم
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * حديث صحيح. عبد الرحمن بن إسحاق المدني -كان كان صدوقًا حسن الحديث- تابعه مالك في "موطئه" ٢/ ٩٧٢، وشعيب بن أبي حمزة، وغيرهما. وروايتهما عند البخاري ومسلم. وأخرج حديث ابن عمر البخاري (٢٨٥٨) و (٥٠٩٣)، ومسلم (٢٢٢٥)، وأبو داود (٣٩٢٢)، والترمذي (٣٠٣٤) و (٣٠٣٥)، والنسائي ٦/ ٢٢٠ من طريق الزهري، بهذا الإسناد. وقُرن سالم في بعض الروايات بأخيه حمزة. = وأخرجه البخاري (٥٠٩٤)، ومسلم (٢٢٢٥) (١١٧) من طريق محمَّد بن زيد العسقلاني، عن ابن عمر. ولفظ رواية حمزة ومحمد بن زيد: "إن كان الشؤم في شيء … ". وهو في "مسند أحمد" (٤٥٤٤)، و "شرح مشكل الآثار" (٧٧٦). وأما حديث أم سلمة فأخرجه الدارقطي في "غرائب مالك" - كما في "فتح الباري" لابن حجر ٦/ ٦٣ - من طريق جويرية، وكذا من طريق سعيد بن داود، كلاهما عن مالك، عن الزهري، عن بعض أهل أم سلمة، عن أم سلمة. قال الحافظ: وإسناده صحيح إلى الزهري، ونقل عن الدارقطي قوله: والمبهم المذكور هو أبو عبيدة بن عبد الله بن زمعة، سماه عبد الرحمن بن إسحاق عن الزهري في روايته. قلنا: يعني روايتنا هذه. وأخرجه معمر بن راشد في "جامعه" الملحق بـ "مصنف عبد الرزاق" (١٩٥٢٧)، ومن طريقه ابن عبد البر في "التمهيد" ٩/ ٢٧٨ عن الزهري، عن سالم أو حمزة بن عبد الله، عن ابن عمر … الحديث. ثم قال: وقالت أم سلمة: والسيف. وهذا مرسل. قال الإمام الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" بعد أن أورد حديث ابن عمر بلفظ: "إن كان الشؤم في شيء … ": فكان ما في هذا على أن الشؤم إن كان، كان في هذه الثلاثة الأشياء، لا يتحقق كونه فيها. وقد وافق ما في هذا الحديث ما رُوي عن جابر وسهل بن سعد عن النبي ﷺ في هذا المعنى، فذكر حديث سهل السالف عند المصنف، وذكر حديث جابر، وهو حديث صحيح أخرجه مسلم (٢٢٢٧). قال: وقد ثبت عن عائشة ﵂ إنكارها لذلك، واخبارها أن رسول الله ﷺ إنما قال ذلك إخبارًا منه عن أهل الجاهلية أنهم كانوا يقولونه، غير أنها ذكرته عنه ﵇ بالطيرة لا بالشؤم، والمعنى فيهما واحد. قلنا: وحديث عائشة أخرجه أحمد (٢٦٠٣٤) من طريق أبي حسان الأعرج، قال: دخل رجلان من بني عامر على عائشة، فأخبراها أن أبا هريرة يُحدث عن النبي ﷺ أنه قال: "الطيرة في = الدار والمرأة والفرس" فغضبت، فطارت شِقَّة منها في السماء، وشِقَّة في الأرض، وقالت: والذي أنزل الفرقان على محمَّد، ما قالها رسول الله ﷺ قط، إنما قال: "كان أهل الجاهلية يتطيَّرون من ذلك". وإسناده صحيح. قال الطحاوي: وإذا كان ذلك كذلك، كان ما روي عنها مما حفظته عن رسول الله ﷺ من إضافته ذلك الكلام إلى أهل الجاهلية أولى مما روي عن غيرها فيه عنه ﷺ، لحفظها عنه في ذلك ما قصر غيرها عن حفظه عنه فيه، لا سيما وقد ثبت عنه ﷺ نفي الطيرة والشؤم، وذكر حديث جابر أن رسول الله ﷺ قال: "لا غول ولا طيرة ولا شؤم"، وهو حديث صحيح. ثم قال: فكان في ذلك ما قد دل على انتفاء ذلك القول المضاف إلى رسول الله ﷺ في إثباته الشؤم في الثلاثة الأشياء التي روينا عنه أن الشؤم فيها. وانظر لزامًا ما علقناه على "المسند" (٢٦٠٣٤).
- حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ إِسْمَعِيلَ حَدَّثَنَا وَكِيعٌ عَنْ شَيْبَانَ أَبِي مُعَاوِيَةَ عَنْ يَحْيَى بْنِ أَبِي كَثِيرٍ عَنْ أَبِي سَهْمٍ عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ قَالَ قَالَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم مِنْ الْغَيْرَةِ مَا يُحِبُّ اللهُ وَمِنْهَا مَا يَكْرَهُ اللهُ فَأَمَّا مَا يُحِبُّ فَالْغَيْرَةُ فِي الرِّيبَةِ وَأَمَّا مَا يَكْرَهُ فَالْغَيْرَةُ فِي غَيْرِ رِيبَةٍ
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেনঃ আল্লাহ্ আত্মমর্যাদাবোধ পছন্দ করেন এবং অপছন্দও করেন। যা থেকে বিপর্যয় সৃষ্টির আশংকা থাকে তা ত্যাগ করার আত্মমর্যাদাবোধ আল্লাহ্ পছন্দ করেন এবং যাতে বিপর্যয় সৃষ্টির আশংকা নেই তা ত্যাগের আত্মমর্যাদাবোধ আল্লাহ্ অপছন্দ করেন। [১৯৯৬]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: صحیح
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. محمَّد بن إسماعيل: هو ابن سَمُرة الأحمسي، وأبو سلمة: هو ابن عبد الرحمن بن عوف. وفي الباب عن عقبة بن عامر عند أحمد في "مسنده" (١٧٣٩٨)، وابن خزيمة في "صحيحه" (٢٤٧٨)، وفي إسناده عبد الله بن زيد الأزرق مجهول. وعن جابر بن عتيك عند أحمد في "مسنده" (٢٣٧٤٧)، وأبي داود (٢٦٥٩)، والنسائي ٥/ ٧٨ - ٧٩، وفي إسناده ابن جابر بن عتيك مجهول الحال. قوله: "فالغيرة في الريبة" أي: في مظنة الفساد، أي: إذا ظهرت أمارات الفساد في محل، فالقيام بمقتضى الغيرة محمود، وأما إذا قام بدون ظهور شيء فالقيام به مذموم، لما فيه من اتهام المسلمين بالسوء من غير وجه. قاله السندي.
حَدَّثَنَا هَارُونُ بْنُ إِسْحَقَ حَدَّثَنَا عَبْدَةُ بْنُ سُلَيْمَانَ عَنْ هِشَامِ بْنِ عُرْوَةَ عَنْ أَبِيهِ عَنْ عَائِشَةَ قَالَتْ مَا غِرْتُ عَلَى امْرَأَةٍ قَطُّ مَا غِرْتُ عَلَى خَدِيجَةَ مِمَّا رَأَيْتُ مِنْ ذِكْرِ رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم لَهَا وَلَقَدْ أَمَرَهُ رَبُّهُ أَنْ يُبَشِّرَهَا بِبَيْتٍ فِي الْجَنَّةِ مِنْ قَصَبٍ يَعْنِي مِنْ ذَهَبٍ قَالَهُ ابْن مَاجَةَ.
আ'য়িশাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি খাদিজা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) -এর ক্ষেত্রে যে আত্মমর্যাদাবোধ উপলব্ধি করতাম, তদ্রূপ অপর কোন নারীর ক্ষেত্রে অনুভব করতাম না। কেননা আমি রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে প্রায়ই তার কথা উল্লেখ করতে দেখেছি। আল্লাহ্ তাআলা তার রসূলকে খাদীজা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) -এর জন্য জান্নাতে স্বর্ণ নির্মিত একটি প্রাসাদের সুসংবাদ দেয়ার নির্দেশ দিয়েছেন। ইবনু মাজাহ (রঃ) তা বলেছেন (অর্থাৎ কাসাব-এর অর্থ সোনা বলেছেন)। [১৯৯৭]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: بخاری ومسلم
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه البخاري (٣٨١٦)، ومسلم (٢٤٣٥)، والترمذي (٢١٣٦) و (٤٢١٣) و (٤٢١٤)، والنسائي في "الكبرى" (٨٣٠٣) و (٨٣٠٤) و (٨٣٠٥) و (٨٨٦٤) من طريق عروة، عن عائشة عند البخاري ومسلم والترمذي في الموضع الأول والثاني زيادة: وإن كان ليذبح الشاة، فيُهدي في خلائلها منها ما يسَعُهُنَ. وهو في "مسند أحمد" (٢٤٣١٥)، و"صحيح ابن حبان" (٧٠٠٦). قوله: "يعني من ذهب" كذا فسَّره ابن ماجه. قال ابن الأثير: القصب: لؤلؤ مجوف واسع كالقصر المنيف. وقال النووي في "شرح مسلم" قال جمهور العلماء: المراد به قصب اللؤلؤ المجوف كالقصر المنيف. وقيل: قصب من ذهب منظوم بالجوهر. قال أهل اللغة: القصب الجوهر ما استطال منه في تجويف، قالوا: ويقال لكل مجوف: قصب، وقد جاء في الحديث مفسرًا ببيت من لؤلؤة مجبَّأة (مجوفة).
حَدَّثَنَا عِيسَى بْنُ حَمَّادٍ الْمِصْرِيُّ حَدَّثَنَا اللَّيْثُ بْنُ سَعْدٍ عَنْ عَبْدِ اللهِ بْنِ أَبِي مُلَيْكَةَ عَنْ الْمِسْوَرِ بْنِ مَخْرَمَةَ قَالَ سَمِعْتُ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم وَهُوَ عَلَى الْمِنْبَرِ يَقُولُ إِنَّ بَنِي هِشَامِ بْنِ الْمُغِيرَةِ اسْتَأْذَنُونِي أَنْ يُنْكِحُوا ابْنَتَهُمْ عَلِيَّ بْنَ أَبِي طَالِبٍ فَلَا آذَنُ لَهُمْ ثُمَّ لَا آذَنُ لَهُمْ ثُمَّ لَا آذَنُ لَهُمْ إِلَّا أَنْ يُرِيدَ عَلِيُّ بْنُ أَبِي طَالِبٍ أَنْ يُطَلِّقَ ابْنَتِي وَيَنْكِحَ ابْنَتَهُمْ فَإِنَّمَا هِيَ بَضْعَةٌ مِنِّي يَرِيبُنِي مَا رَابَهَا وَيُؤْذِينِي مَا آذَاهَا
মিসওয়ার বিন মাখরামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মিম্বারে দাঁড়িয়ে বলতে শুনেছিঃ বনূ হিশাম ইবনুল মুগীরাহ তাদের কন্যাকে আলী বিন আবূ তালিবের নিকট বিবাহ দিতে আমার নিকট অনুমতি চেয়েছে। আমি তাদেরকে অনুমতি দিবো না, আমি তাদেরকে অনুমতি দিবো না, আমি অনুমতি দিবো না, আমি তাদেরকে অনুমতি দিবো না। তবে আলী বিন আবূ তালিব আমার কন্যাকে তালাক দিলে তা করতে পারে। কেননা ফাতিমা অবশ্যি আমার দেহের একটি টুকরা। যা তার মনঃকষ্টের কারণ হয় তা আমারও মনঃকষ্টের কারণ হয় এবং যা তাকে কষ্ট দেয় তা আমাকেও কষ্ট দেয়। [১৯৯৮]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: بخاری ومسلم
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه تامًا ومختصرًا البخاري (٥٢٣٠)، ومسلم (٢٤٤٩)، وأبو داود (٢٠٧٠) و (٢٠٧١)، والترمذي (٤٢٠٥)، والنسائي في "الكبرى" (٨٣١٢) و (٨٣١٣) و (٨٤٦٥) و (٨٤٦٦) و (٨٤٦٧) من طريق عبد الله بن أبي مليكة، عن المسور. وتابع في رواية أبي داود الأولى عبد الله: عروةُ بن الزبير. وعبد الله بن أبي مُليكة: هو عبد الله بن عبيد الله بن أبي مليكة. وهو في "مسند أحمد" (١٨٩٢٦)، و"صحيح ابن حبان" (٦٩٥٥). وانظر ما بعده. قوله: "بضعة" بفتح الباء، وقد تكسر، أي: أنها جزء مني كما أن البضعة جزء من اللحم. "يريبني" بفتح الياء، أي: يوقعني في القلق. قاله السندي.
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ يَحْيَى حَدَّثَنَا أَبُو الْيَمَانِ أَنْبَأَنَا شُعَيْبٌ عَنْ الزُّهْرِيِّ أَخْبَرَنِي عَلِيُّ بْنُ الْحُسَيْنِ أَنَّ الْمِسْوَرَ بْنَ مَخْرَمَةَ أَخْبَرَهُ أَنَّ عَلِيَّ بْنَ أَبِي طَالِبٍ خَطَبَ بِنْتَ أَبِي جَهْلٍ وَعِنْدَهُ فَاطِمَةُ بِنْتُ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَلَمَّا سَمِعَتْ بِذَلِكَ فَاطِمَةُ أَتَتْ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فَقَالَتْ إِنَّ قَوْمَكَ يَتَحَدَّثُونَ أَنَّكَ لَا تَغْضَبُ لِبَنَاتِكَ وَهَذَا عَلِيٌّ نَاكِحًا ابْنَةَ أَبِي جَهْلٍ قَالَ الْمِسْوَرُ فَقَامَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم فَسَمِعْتُهُ حِينَ تَشَهَّدَ ثُمَّ قَالَ أَمَّا بَعْدُ فَإِنِّي قَدْ أَنْكَحْتُ أَبَا الْعَاصِ بْنَ الرَّبِيعِ فَحَدَّثَنِي فَصَدَقَنِي وَإِنَّ فَاطِمَةَ بِنْتَ مُحَمَّدٍ بَضْعَةٌ مِنِّي وَأَنَا أَكْرَهُ أَنْ تَفْتِنُوهَا وَإِنَّهَا وَاللهِ لَا تَجْتَمِعُ بِنْتُ رَسُولِ اللهِ وَبِنْتُ عَدُوِّ اللهِ عِنْدَ رَجُلٍ وَاحِدٍ أَبَدًا قَالَ فَنَزَلَ عَلِيٌّ عَنْ الْخِطْبَةِ
মিসওয়ার বিন মাখরামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলেন, আলী বিন আবূ তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবূ জাহলের কন্যাকে বিবাহ করার প্রস্তাব দেন। অথচ নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর কন্যা ফাতিমাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর বিবাহাধীন ছিলেন। ফাতিমাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তা শুনতে পেয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর নিকট এসে বলেন, আপনার সম্প্রদায়ের লোক বলাবলি করছে যে, আপনি আপনার কন্যাদের ব্যাপারে কোন কথায় রাগান্বিত হন না। এই আলী আবূ জাহলের কন্যাকে বিবাহ করতে যাচ্ছে। মিসওয়ার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়ালেন, আমি তাঁকে কালিমা শাহাদাত পাঠ করার পর বলতে শুনলামঃ আমি আবূল আস ইবনুল রাবী' এর নিকট আমার এক কন্যার (যায়নব) বিবাহ দিয়েছিলাম। সে আমাকে যে কথা দিয়েছিল তা রক্ষা করেছে। নিশ্চয় ফাতিমাহ বিনতু মুহাম্মাদ আমার দেহের একটি অংশ। তোমরা তাকে গুনাহে নিক্ষেপ করবে তা আমি পছন্দ করি না। আল্লাহ্র শপথ! আল্লাহ্র রসূলের কন্যা এবং আল্লাহ্র দুশমনের কন্যা এক ব্যক্তির অধীন কখনো একত্র হতে পারে না। [১৯৯৯]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: بخاری ومسلم
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. أبو اليمان: هو الحكم بن نافع، وشعيب: هو ابن أبي حمزة. وأخرجه تامًا ومختصرًا البخاري (٣١١٥) و (٣٧٢٩)، ومسلم (٢٤٤٩) (٩٥ و ٩٦)، وأبو داود (٢٠٦٩)، والنسائي في "الكبرى" (٨٣١٤) و (٨٤٦٨) و (٨٤٦٩) من طريق الزهري، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (١٨٩١١)، و"صحيح ابن حبان" (٦٩٥٦) و (٦٩٥٧). وانظر ما قبله.
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ حَدَّثَنَا عَبْدَةُ بْنُ سُلَيْمَانَ عَنْ هِشَامِ بْنِ عُرْوَةَ عَنْ أَبِيهِ عَنْ عَائِشَةَ أَنَّهَا كَانَتْ تَقُولُ أَمَا تَسْتَحِي الْمَرْأَةُ أَنْ تَهَبَ نَفْسَهَا لِلنَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم حَتَّى أَنْزَلَ اللهُ {تُرْجِي مَنْ تَشَاءُ مِنْهُنَّ وَتُؤْوِي إِلَيْكَ مَنْ تَشَاءُ} قَالَتْ فَقُلْتُ إِنَّ رَبَّكَ لَيُسَارِعُ فِي هَوَاكَ
আ'য়িশাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত, তিনি বলতেন, যে নারী নিজেকে নবী (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) -এর জন্য পেশ করে তার কি লজ্জা হয় না? অবশেষে এ আয়াত নাযিল হয়ঃ (অর্থানুবাদ) : "তুমি তাদের মধ্যে যাকে ইচ্ছা তোমার নিকট থেকে দূরে রাখতে পারো এবং যাকে ইচ্ছা তোমার নিকট স্থান দিতে পারো" (সূরা আহযাবঃ ৫১)। আ'য়িশাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তখন আমি বললাম, আপনার প্রভু তো আপনার ইচ্ছা পূরণে আপনার চেয়েও অগ্রগামী। [২০০০]
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح
تحقيق الشيخ زبیر العلیزي الباكستاني: بخاری ومسلم
تحقيق الشيخ شعيب الأرناؤوط: * إسناده صحيح. وأخرجه البخاري (٤٧٨٨)، ومسلم (١٤٦٤)، والنسائي ٦/ ٥٤ من طريق هشام بن عروة، بهذا الإسناد. وهو في "مسند أحمد" (٢٥٠٢٦) و (٢٥٢٥١)، و "صحيح ابن حبان" (٦٣٦٧). وقول عائشة: إن ربك ليُسارع في هواك، ورواية البخاري: ما أرى ربك إلا يُسارع في هواك، أي: ما أرى الله إلا موجدًا لما تريد بلا تأخير، منزلأ لما تُحِب وتختار.