الحديث


شرح معاني الآثار
Sharhu Ma’anil-Asar
শারহু মা’আনিল-আসার





شرح معاني الآثار (1071)


حدثنا عبد الغني بن أبي عقيل قال: ثنا عبد الرحمن بن زياد، قال: ثنا شعبة، (ح) وحدثنا ابن مرزوق، قال: ثنا سعيد بن عامر قال: ثنا شعبة، عن سيار بن سلامة، قال: دخلت مع أبي على أبي برزة فقال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصلي العصر فيرجع الرجل إلى أقصى المدينة والشمس حية . قيل له: قد مضى جوابنا في هذا فيما تقدم من هذا الباب، فلم نجد في هذه الآثار لما صُحِّحَت وجمعت ما يدل إلا على تأخير العصر، ولم نجد شيئا منها يدل على تعجيلها إلا ما قد عارضه غيره فاستحببنا بذلك تأخير العصر إلا أنها تصلى والشمس بيضاء في وقت يبقى بعده هو من وقتها مدة قبل أن تغير الشمس. ولو خلينا والنظر لكان تعجيل الصلوات كلها في أوائل أوقاتها أفضل، ولكن اتباع ما روي عن رسول الله صلى الله عليه وسلم مما تواترت به الآثار أولى. وقد روي عن أصحابه من بعده، ما يدل على ذلك أيضا




অনুবাদঃ আবু বারযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এমন সময়ে আসরের সালাত আদায় করতেন যে, (সালাত শেষে) কোনো ব্যক্তি মদীনার দূরতম প্রান্তে ফিরে যেতে পারত আর সূর্য তখনো উজ্জ্বল থাকত। (বিদ্বানদের) বলা হলো: এই অধ্যায়ে এর জবাব ইতোপূর্বে চলে গেছে। আমরা যাচাই-বাছাই ও সংকলন করে এই সকল বর্ণনার মধ্যে আসরকে বিলম্বিত করা ব্যতীত অন্য কোনো কিছুর প্রমাণ পাইনি। এর কোনোটিতেই আসরকে দ্রুত আদায় করার প্রমাণ পাইনি, কেবল এমন বর্ণনা ব্যতীত যা অন্য বর্ণনা দ্বারা খণ্ডন করা হয়েছে। সুতরাং আমরা আসরকে বিলম্বিত করাকে মুস্তাহাব মনে করি, তবে তা এমন সময় আদায় করতে হবে যখন সূর্য সাদা (উজ্জ্বল) থাকে এবং সূর্য লালচে হয়ে যাওয়ার আগে তার সময়ের কিছু অংশ বাকি থাকে। যদি আমরা কেবল নিজস্ব দৃষ্টিভঙ্গির উপর নির্ভর করতাম, তাহলে সকল সালাতকে তার প্রথম ওয়াক্তে আদায় করাই উত্তম হতো। কিন্তু রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে যে সকল বর্ণনা মুতাওয়াতির সূত্রে বর্ণিত হয়েছে, সেগুলোর অনুসরণ করাই অধিক শ্রেয়। আর তাঁর পরবর্তীতে সাহাবীগণ থেকেও এমন বর্ণনা এসেছে, যা একই ইঙ্গিত করে।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح، هو مكرر سابقه برقم (991).