الجامع الكامل
Al-Jami Al-Kamil
আল-জামি` আল-কামিল
56 - عن أبي سعيد الخدريّ قال: إنّ أناسا من عبد القيس قدموا على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقالوا: يا نبيَّ اللَّه، إنّا حيٌّ من ربيعة وبيننا وبينك كفار مضر، ولا نقدر عليك إلا في أشهر الحرم فمرْنا بأمر نأْمُرُ به مَنْ وَراءَنا وندخل به الجنّة، إذا نحن أخذنا به فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"آمركم بأربع، وأنهاكم عن أربع: اعبدوا اللَّه ولا تشركوا به شيئًا، وأقيموا الصّلاة، وآتوا الزّكاة، وصُوموا رمضان وأعطوا الخمس من الغنائم، وأنهاكم عن أربع: عن الدُّبّاء، والحَنْتَم، والمزفَّت والنّقِير". قالوا: يا نبي اللَّه، ما علمُك بالنّقير؟ قال:"بلي جِذعٌ تنقرونه فتقذفون فيه من القُطَيْعاء -قال سعيدٌ: أو قال من التمر-، ثم تصبُّون فيه من الماء، حتى إذا سكن غلَيانُه شربتموه، حتى إنّ أحدكم -أو إنَّ أحدهم- ليضربُ ابنَ عمِّه بالسّيف" قال: وفي القوم رجل أصابته جراحة كذلك. قال: وكنتُ أَخْبأُها حياءً من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم. فقلتُ: ففيم نشرب يا رسول اللَّه؟ قال:"في أَسْقِية الأَدَم التي يُلاثُ على أفواهها". قالوا: يا رسول اللَّه،
إنّ أرضنا كثيرةُ الجِرْذان، ولا تبقى بها أسقية الأَدَم. فقال نبيُّ اللَّه صلى الله عليه وسلم:"وإن أكلتها الجرذانُ، وإن أكلتها الجرذانُ، وإن أكلتها الجرذان" قال: وقال نبيُّ اللَّه صلى الله عليه وسلم لأشج عبد القيس:"إنّ فيك لخصلتين يحبُّهما اللَّه الحِلْم والأَنَاة".
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (18) عن يحيى بن أيوب، حدثنا ابنُ عليّة، حدّثنا سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، قال: حدّثنا من لقي الوفدَ الذين قدموا على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم من عبد القيس. قال سعيد (ابن أبي عروبة): وذكر قتادة أبا نضرة، عن أبي سعيد في حديثه هذا:"أنّ ناسًا من عبد القيس" فذكره.
ورواه من وجه آخر عن ابن أبي عدي، عن سعيد، عن قتادة، قال: حدثني غيرُ واحد لقي ذاك الوفد. وذكر أبا نضرة، عن أبي سعيد الخدريّ: أنّ وفد عبد القيس لما قدموا على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بمثل حديث ابن عليّة، غير أنّ فيه:"وتَذيفُون فيه من القُطَيْعاء أو التمر والماء" ولم يقل:"قال سعيد: أو قال: من التمر".
ورواه من طريق أبي عاصم وعبد الرزّاق، قال عبد الرزّاق: أخبرنا ابن جريج، قال: أخبرني أبو قزعة، أنّ أبا نضرة أخبره وحسنًا أخبرهما، أنّ أبا سعيد الخدريّ أخبره: أنّ وفد عبد القيس لما أتوا نبي اللَّه صلى الله عليه وسلم قالوا: يا نبيّ اللَّه، جعلنا اللَّه فداءك، ماذا يصلح لنا من الأشربة؟ فقال:"لا تشرَبوا في النّقير". قالوا: يا نبي اللَّه، جعلنا اللَّه فداءك، أو تدري ما النّقير؟ قال: نعم الجِذْع يُنقرُ وسطه، ولا في الدّبّاء، ولا في الحنتمة، وعليكم بالموكَى".
وقوله:"إنّ أبا نضرة وحسنًا أخبرهما" قال ابن الصّلاح في صيانة صحيح مسلم (ص 159 - 161):"إحدى المعضلات، ولا عضال ذلك وقع فيه تغييرات من جماعة واهمة، فمن ذلك: رواية أبي نعيم الأصبهاني الحافظ في مستخرجه على كتاب مسلم بإسناده: أخبرني أبو فزعة، أنّ أبا نضرةَ وحسنًا أخبرهما أنّ أبا سعيد الخدريّ، وهذا يلزم منه أن يكون أبو قزعة هو الذي أخبر أبا نضرة وحسنًا عن أبي سعيد، فيكون أبو قزعة هو الذي سمع من أبي سعيد ذلك. وذلك منتفٍ، واللَّه أعلم.
ومن ذلك: أنّ أبا عليّ الغسّاني صاحب"تقييد المهمل" ردّ رواية مسلم هذه، وقلّده في ذلك صاحب"المُعِلمِ"، ومن شأنه تقليده فيما يذكره من علم الأسانيد، مع أنه لا يسمّيه ولا ينصفه، وصوّبهما في ذلك القاضي أبو الفضل عياض بن موسى، فقال أبو عليّ: الصّواب في الإسناد عن ابن جريج، قال: أخبرني أبو قزعة، أن أبا نضرةً وحسنًا أخبراه، أنّ أبا سعيد أخبره. وذكر أنه إنما قال:"أخبره" ولم يقل:"أخبرهما"؛ لأنّه ردّ الضّمير إلى أبي نضرة وحده، وأسقط الحسن لموضع الإرسال، فإنّه لم يسمع من أبي سعيد الخدريّ ولم يلْقَه، وذكر أنّه بهذا اللّفظ الذي ذكره خرّجه أبو عليّ بن السّكن في"مصنّفه" بإسناده قال: وأظنُّ هذا من إصلاح ابن السَّكن.
وذكر الغسّاني أيضًا: أنه رواه كذلك أبو بكر البزّار في"مسنده الكبير" بإسناده وحكى عنه، وعن عبد الغني بن سعيد الحافظ: أنّهما ذكرا أنّ حسنًا هذا هو الحسن البصريّ.
وليس الأمر في ذلك على ما ذكروه، بل ما أورده مسلمٌ في هذا الإسناد هو الصواب، وكما أورده رواه أحمد بن حنبل، عن روح بن عبادة، عن ابن جريج.
وقد انتصر له الحافظ أبو موسى الأصبهانيّ، وألّف في ذلك كتابًا لطيفًا تبجّح فيه بإجادته وإصابته، مع وهم غير واحد من الحفّاظ فيه.
فذكر: أنّ حسنًا هذا هو الحسن بن مسلمٌ بن ينّاق الذي روى عنه ابن جريج غير هذا الحديث، وأن معنى هذا الكلام: أنّ أبا نضرة أخبر بهذا الحديث أبا قزعة وحسن بن مسلم كليهما، ثم أكّد ذلك بأن أعاد فقال: أخبرهما أن أبا سعيد أخبره -يعني أبو سعيد أبا نضرة- وهذا كما تقول: إن زيدًا جاءني وعمرًا جاءاني فقالا: كذا وكذا.
وهذا من فصيح الكلام، واحتجّ على أنّ حسنًا فيه هو الحسن بن مسلم: بأنّ سلمة بن شبيب وهو ثقة، رواه عن عبد الرزّاق، وعن ابن جريج، قال: أخبرني أبو قزعة، أنّ أبا نضرة أخبره، وحسن بن مسلم أخبرهما، أنّ أبا سعيد أخبره. الحديث. رواه أبو الشيخ الحافظ في كتابه"المخرّج على صحيح مسلم".
وقد أسقط أبو مسعود الدمشقي وغيره، ذكر حسن أصلًا من الإسناد؛ لأنّه مع إشكاله لا مدخل له في رواية الحديث.
وذكر الحافظ أبو موسى ما حكاه أبو علي الغسّاني في كتابه"تقييد المهمل" في ذلك، وبيّن بطلانه، وبطلان رواية من غيّر الضمير في قوله:"أخبرهما" وعبر ذلك من تغيير، ولقد أجاد وأحسن، واللَّه أعلم، انتهى كلام ابن الصّلاح.
ونقل هذا الكلام النووي في شرح مسلم وأقرّه.
قوله:"أشج عبد القيس" اسمه منذر بن عائذ كما قال الترمذي، وهو المنذر بن عائذ بن المنذر ابن الحارث القصري -بمفتوحتين- صحابي نزل البصرة ومات بها.
অনুবাদঃ আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নিশ্চয়ই আব্দুল কায়স গোত্রের কিছু লোক রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আগমন করল। তারা বলল, "হে আল্লাহর নবী! আমরা রবীআ গোত্রের একটি শাখা, এবং আমাদের ও আপনার মাঝে মুদার গোত্রের কাফিররা রয়েছে। আমরা হারাম মাসগুলো ছাড়া আপনার কাছে আসতে পারি না। অতএব, আপনি আমাদেরকে এমন কিছু কাজের নির্দেশ দিন, যা আমরা আমাদের পিছনের লোকদেরকেও বলতে পারি এবং যা গ্রহণ করলে আমরা জান্নাতে প্রবেশ করতে পারি।"
তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আমি তোমাদেরকে চারটি কাজের নির্দেশ দিচ্ছি এবং চারটি কাজ থেকে নিষেধ করছি: তোমরা আল্লাহর ইবাদত করো এবং তাঁর সাথে কোনো কিছুকে শরীক করো না; সালাত প্রতিষ্ঠা করো; যাকাত দাও; রমযান মাসের সওম পালন করো; এবং গনীমতের মালের এক পঞ্চমাংশ (খুমুস) প্রদান করো। আর আমি তোমাদেরকে চারটি জিনিস থেকে নিষেধ করছি: দুব্বা (কুমড়োর খোলা), হানতাম (সবুজ রঙের মাটির পাত্র), মুজাফফাত (আলকাতরা মাখানো পাত্র) এবং নাকীর (কাঠের পাত্র) ব্যবহার করতে।"
তারা বলল, "হে আল্লাহর নবী! নাকীর সম্পর্কে আপনি কী জানেন?" তিনি বললেন, "তা হলো কাণ্ডের ভেতরের অংশ, যা তোমরা কেটে ফাঁপা করো এবং তাতে কুত্বাইআ' নামক ফল— সাঈদ বলেন: অথবা খেজুর— রাখো। এরপর তাতে পানি ঢালো। যখন সেটির বুদবুদ ওঠা থেমে যায়, তখন তোমরা তা পান করো। ফলে তোমাদের মধ্যে কেউ কেউ তার চাচাতো ভাইকে তরবারি দ্বারা আঘাত করতে থাকে।"
রাবী বলেন: সেই গোত্রের একজন লোক এমন আঘাতে আহত ছিল। লোকটি বলল: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর লজ্জায় তা লুকিয়ে রেখেছিলাম। আমি বললাম, "হে আল্লাহর রাসূল! তাহলে আমরা কিসে পান করব?" তিনি বললেন, "চামড়ার তৈরি মশকগুলোতে, যেগুলোর মুখ শক্ত করে বাঁধা হয়।"
তারা বলল, "হে আল্লাহর রাসূল! আমাদের এলাকায় ইঁদুরের উপদ্রব খুব বেশি, চামড়ার মশক সেখানে টিকে থাকে না।" তখন আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "ইঁদুর খেয়ে ফেললেও (তোমরা তাতেই পান করবে), ইঁদুর খেয়ে ফেললেও (তোমরা তাতেই পান করবে), ইঁদুর খেয়ে ফেললেও (তোমরা তাতেই পান করবে)।"
রাবী বলেন: আর আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আব্দুল কায়সের আশাজ্জকে বললেন, "নিশ্চয়ই তোমার মধ্যে এমন দুটি গুণ রয়েছে, যা আল্লাহ তাআলা ভালোবাসেন: সহনশীলতা (ধৈর্য) ও স্থিরতা (ধীরস্থিরতা)।"