শুয়াবুল ঈমান লিল-বায়হাক্বী
697 - أَخْبَرَنَا أَبُو حَازِمٍ الْحَافِظُ، وَأَبُو حَسَّانَ مُحَمَّدُ بْنُ أَحْمَدَ بْنِ مُحَمَّدِ بْنِ جَعْفَرٍ الْمُزَكِّي قَالَا: أَخْبَرَنَا أَبُو عَمْرِو بْنُ نُجَيْدٍ، حدثنا أَبُو جَعْفَرٍ مُحَمَّدُ بْنُ مُوسَى الْحُلْوَانِيُّ، حدثنا مُحَمَّدُ بْنُ عُبَيْدٍ الْعَامِرِيُّ، حدثنا أَبُو أُسَامَةَ قَالَ: قُلْتُ لِمُحَمَّدِ بْنِ النَّضْرِ: " أَمَا تَسْتَوْحِشُ مِنْ طُولِ الْجُلُوسِ فِي الْبَيْتِ؟ قَالَ: وَمَا لِي أَسْتَوْحِشُ وَهُوَ يَقُولُ: أَنَا جَلِيسُ مَنْ ذَكَرَنِي "
মুহাম্মদ ইবনুন নাদর (রাহিমাহুল্লাহ)-কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল: "আপনি কি দীর্ঘ সময় ধরে গৃহে অবস্থান করার কারণে একাকীত্ব (বা অস্বস্তি) অনুভব করেন না?"
তিনি বললেন: "আমি কেন একাকীত্ব অনুভব করব? আল্লাহ তাআলা তো বলেন, ‘যে ব্যক্তি আমাকে স্মরণ করে, আমি তার সঙ্গী।’"
تحقيق الشيخ د. عبد العلي عبد الحميد حامد : محمد بن النضر الحارثي أبو عبد الرحمن العابد. ذكره ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" (8/ 110) وقال: روى عن الأوزاعي روى عنه عبد الله بن المبارك وأبو نصر التمار. سمعت أبي يقول ذلك. قال أبو محمد وروي عنه عبد الرحمن بن مهدي.
698 - أَخْبَرَنَا أَبُو الْحُسَيْنِ بْنُ بِشْرَانَ، أَخْبَرَنَا الْحُسَيْنُ بْنُ صَفْوَانَ، حدثنا ابْنُ أَبِي الدُّنْيَا، -[183]- حدثنا الْحَسَنُ بْنُ أَبِي الرَّبِيعِ، أَخْبَرَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ، حدثنا سُفْيَانُ، عَنِ الْأَعْمَشِ، عَنْ أَبِي الضُّحَى، عَنْ مَسْرُوقٍ قَالَ: إِنَّ " الرَّجُلَ لَمَحْقُوقٌ أَنْ يَكُونَ لَهُ سَاعَةٌ يَخْلُو فِيهَا فَيَذْكُرُ رَبَّهُ وَيَسْتَغْفِرُ اللهَ "
মাসরুক (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নিশ্চয়ই একজন ব্যক্তির জন্য এটি জরুরি যে তার এমন একটি সময় থাকবে যখন সে নির্জনে একাকী হবে, অতঃপর সে তার প্রতিপালককে স্মরণ করবে এবং আল্লাহর কাছে ক্ষমা প্রার্থনা করবে।
تحقيق الشيخ د. عبد العلي عبد الحميد حامد : إسناده: رجاله ثقات.
699 - قَالَ: وَأَخْبَرَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ، عَنْ مَعْمَرٍ، عَنْ زَيْدِ بْنِ أَسْلَمَ، أَنَّ نَبِيَّ اللهِ مُوسَى عَلَيْهِ السَّلَامُ قَالَ: يَا رَبِّ، قَدْ أَنْعَمْتَ عَلَيَّ كَثِيرًا فَدُلَّنِي أَنْ أَشْكُرَكَ كَثِيرًا قَالَ: " اذْكُرْنِي كَثِيرًا فَإِذَا ذَكَرْتَنِي كَثِيرًا فَقَدْ شَكَرْتَنِي كَثِيرًا، وَإِذَا نَسِيتَنِي فَقَدْ كَفَرْتَنِي "
যায়িদ ইবনে আসলাম (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত, নাবীউল্লাহ মূসা আলাইহিস সালাম বললেন:
"হে আমার রব! আপনি আমার উপর বহু নিয়ামত দান করেছেন। সুতরাং আমাকে পথ দেখান, যেন আমি আপনার অধিক শুকরিয়া আদায় করতে পারি।"
আল্লাহ বললেন: "তুমি আমার অধিক যিকর (স্মরণ) করো। কারণ যখন তুমি আমার অধিক যিকর করবে, তখন তুমি আমার অধিক শুকরিয়া আদায় করলে। আর যখন তুমি আমাকে ভুলে যাবে, তখন তুমি আমার প্রতি অকৃতজ্ঞতা প্রকাশ করলে।"
تحقيق الشيخ د. عبد العلي عبد الحميد حامد : ذكره السيوطي في "الدر المنثور" (1/ 360) ونسبه لابن أبي الدنيا، وابن أبي حاتم والمؤلف.
700 - أَخْبَرَنَا أَبُو عَبْدِ اللهِ الْحَافِظُ قَالَ: سَمِعْتُ الزُّبَيْرَ بْنَ عَبْدِ الْوَاحِدِ بِأَسَدَآبَادَ يَقُولُ: سَمِعْتُ أَبَا بَكْرٍ الشِّبْلِيَّ يَقُولُ: " سَهْوَةُ طَرْفَةِ عَيْنٍ عَنِ اللهِ شِرْكٌ بِاللهِ "
আবু বকর শিবলী (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: "আল্লাহ থেকে এক পলকের সময়ের জন্যও গাফলতি (বিমুখ হওয়া) আল্লাহর সাথে শিরক করার শামিল।"
تحقيق الشيخ د. عبد العلي عبد الحميد حامد : . الزبير بن عبد الواحد الأسداباذي (م 347 هـ) كان من الصالحين المذكورين والحفاظ مرّ في الجزء الأول. وراجع ترجمته في: السير" (15/ 570).
701 - أَخْبَرَنَا أَبُو الْقَاسِمِ الْحَسَنُ بْنُ مُحَمَّدِ بْنِ حَبِيبٍ، حدثنا أَبُو الْحَسَنِ الْكَارِزِيُّ قَالَ: سَمِعْتُ أَبَا عَبْدِ الرَّحْمَنِ مُحَمَّدَ بْنَ يُونُسَ الْمُقْرِئَ قَالَ: سَمِعْتُ أَبَا الْحَسَنِ عَلِيَّ بْنَ جَيِّدٍ الْبَلْخِيَّ يَقُولُ: سَمِعْتُ مُحَمَّدَ بْنَ عَبْدِ الْوَهَّابِ الْبَلْخِيَّ يَقُولُ: مَا " أَقْبَحَ الْغَفْلَةَ عَنْ ذِكْرِ مَنْ لَا يَغْفَلُ عَنْ بِرِّكَ "
মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুল ওয়াহ্হাব আল-বালখী (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন:
আপনার প্রতি অনুগ্রহ করা থেকে যিনি (আল্লাহ) কখনো গাফেল হন না, তাঁর স্মরণ (যিকির) থেকে গাফেল হয়ে যাওয়া কতই না নিকৃষ্ট!
تحقيق الشيخ د. عبد العلي عبد الحميد حامد : لم يتضح لي حال إسناده.
702 - أَخْبَرَنَا أَبُو عَبْدِ اللهِ الْحَافِظُ، حدثنا أَبُو مُحَمَّدٍ يَحْيَى بْنُ مَنْصُورٍ الْقَاضِي، حدثنا أَبُو بَكْرٍ الْإِسْمَاعِيلِيُّ، حدثنا أَحْمَدُ بْنُ أَبِي الْحَوَارِيِّ قَالَ: سَمِعْتُ أَبَا سُلَيْمَانَ الدَّارَانِيَّ، يَقُولُ: " بَيْنَا أَنَا سَاجِدٌ إِذْ ذَهَبَ بِي النَّوْمُ فَإِذَا أَنَا بِهَا يَعْنِي الْحُورَ، قَدْ رَكَضَتْنِي بِرِجْلِهَا فَقَالَتْ: حَبِيبِي أَتَرْقُدُ عَيْنَاكَ وَالْمَلِكُ يَقْظَانُ يَنْظُرُ إِلَى الْمُتَهَجِّدِينَ فِي تَهَجُّدِهِمٍ بُؤْسًا لِعَيْنٍ آثَرَتْ لَذَّةَ نَوْمِهِ عَلَى لَذَّةِ مُنَاجَاةِ الْعَزِيزِ قُمْ فَقَدْ دَنَا الْفَرَاغُ وَلَقِيَ الْمُحِبُّونَ بَعْضَهُمْ بَعْضًا فَمَا هَذَا الرُّقَادُ حَبِيبِي وَقُرَّةَ عَيْنِي أَتَرْقُدُ عَيْنَاكَ، وَأَنَا أُرَبَّى لَكَ فِي الْخِدْرِ مُنْذُ كَذَا وَكَذَا؟ فَوَثَبْتُ فَزِعًا وَقَدْ عَرِقْتُ اسْتِحْيَاءً مِنْ تَوْبِيخِهَا إِيَّايَ وَإِنَّ حَلَاوَةَ مَنْطِقِهَا لَفِي سَمْعِي وَقَلْبِي "
আবু সুলাইমান আদ-দারানী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন:
আমি সিজদারত অবস্থায় ছিলাম, এমন সময় আমার চোখ ঘুমে আচ্ছন্ন হয়ে গেল। হঠাৎ দেখলাম, তিনি—অর্থাৎ সেই হুর—তাঁর পা দিয়ে আমাকে ধাক্কা মারলেন।
অতঃপর তিনি বললেন, ‘হে আমার প্রিয়তম! তোমার চোখ কি ঘুমাচ্ছে? অথচ (সৃষ্টির) মালিক (আল্লাহ) জাগ্রত এবং তিনি গভীর রাতে ইবাদতকারীদের দিকে দৃষ্টিপাত করছেন। ধিক্কার সেই চোখের জন্য, যা পরাক্রমশালী সত্তার (আল্লাহর) সাথে নির্জনে কথোপকথনের আনন্দের চেয়ে ঘুমের আনন্দকে অগ্রাধিকার দেয়! ওঠো! (ইবাদতের) সমাপ্তি ও বিশ্রামের সময় নিকটবর্তী হয়ে গেছে। প্রেমিকেরা একে অপরের সাথে মিলিত হবে। হে আমার প্রিয়তম এবং হে আমার নয়নমণি! এই কেমন ঘুম! তোমার চোখ কি ঘুমাচ্ছে, অথচ আমি এতদিন ধরে পর্দার আড়ালে কেবল তোমার জন্যই লালিত-পালিত হচ্ছি?’
(এ কথা শুনে) আমি ভীতসন্ত্রস্ত হয়ে লাফিয়ে উঠলাম এবং তাঁর তিরস্কারে লজ্জায় আমি ঘর্মাক্ত হয়ে গেলাম। আর তাঁর কথার মিষ্টতা তখনও আমার কান ও হৃদয়ে বিদ্যমান ছিল।
تحقيق الشيخ د. عبد العلي عبد الحميد حامد : ذكره أبو نعيم في "الحلية" (9/ 259) مختصرًا.
703 - أَخْبَرَنَا حَمْزَةُ بْنُ عَبْدِ الْعَزِيزِ بْنِ مُحَمَّدٍ الصَّيْدَلَانِيُّ، أَخْبَرَنَا عَبْدُ اللهِ بْنُ مُحَمَّدِ بْنِ مَنَازِلَ، حدثنا أَبُو سَعِيدٍ مُحَمَّدُ بْنُ شَاذَانَ، حدثنا أَبُو عَمَّارٍ الْحُسَيْنُ بْنُ حُرَيْثٍ، حدثنا إِسْمَاعِيلُ بْنُ مُوسَى، عَنْ مِسْعَرٍ، عَنِ ابْنِ عَوْنٍ قَالَ: " ذِكْرُ النَّاسِ دَاءٌ وَذِكْرُ اللهِ دَوَاءٌ "
ইবনে আউন (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মানুষের আলোচনা (বা পরনিন্দা) হলো ব্যাধি, আর আল্লাহর স্মরণ হলো ঔষধ।
704 - أَخْبَرَنَا عَبْدُ اللهِ بْنُ يُوسُفَ الْأَصْبَهَانِيُّ، أَخْبَرَنَا أَبُو بَكْرٍ عُثْمَانُ بْنُ مُحَمَّدِ بْنِ صَاحِبِ الْكَتَّانِيِّ، حدثنا أَبُو عُثْمَانَ الْكَرْخِيُّ، بِطَرْطُوسَ، حدثنا عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ عُمَرَ بْنِ رُسْتَةَ، حدثنا عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ مَهْدِيٍّ، عَنِ ابْنِ الْمُبَارَكِ، عَنْ عِيسَى بْنِ عُمَرَ، عَنْ عُمَرَ بْنِ مُرَّةَ، أَنَّ الرَّبِيعَ بْنَ خُثَيْمٍ، ذُكِرَ عِنْدَهُ رَجُلٌ فَقَالَ: " ذِكْرُ اللهِ خَيْرٌ مِنْ ذِكْرِ النَّاسِ "
রবী’ ইবনু খুসাইম (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত,
তাঁর নিকট একবার যখন কোনো ব্যক্তি সম্পর্কে আলোচনা করা হলো, তখন তিনি বললেন: "আল্লাহর স্মরণ (যিকির) মানুষের আলোচনা (বা সমালোচনা) অপেক্ষা উত্তম।"
تحقيق الشيخ د. عبد العلي عبد الحميد حامد : إسناده: لم أعرف بعض رجاله.
705 - أَخْبَرَنَا أَبُو الْحُسَيْنِ بْنُ بِشْرَانَ، أَخْبَرَنَا الْحُسَيْنُ بْنُ صَفْوَانَ، حدثنا ابْنُ أَبِي الدُّنْيَا، -[185]- حدثنا عَلِيُّ بْنُ إِشْكَابٍ، حدثنا أَبُو النَّضْرِ، حدثنا أَبُو عَقِيلٍ، عَنْ عَبْدِ اللهِ بْنِ يَزِيدَ، عَنْ مَكْحُولٍ قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: إِنَّ " ذِكْرَ اللهِ شِفَاءٌ وَإِنَّ ذِكْرَ النَّاسِ دَاءٌ " هَذَا مُرْسَلٌ وَرُوِيَ عَنْ عُمَرَ بْنِ الْخَطَّابِ رَضِيَ اللهُ عَنْهُ مِنْ قَوْلِهِ
মাকহুল (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “নিশ্চয়ই আল্লাহর যিকির (স্মরণ) হলো আরোগ্য এবং নিশ্চয়ই মানুষের আলোচনা হলো ব্যাধি।”
تحقيق الشيخ د. عبد العلي عبد الحميد حامد : إسناده: ضعيف، وهو مرسل.
706 - أَخْبَرَنَا أَبُو عَبْدِ اللهِ الْحَافِظُ، وَمُحَمَّدُ بْنُ مُوسَى قَالَا: حدثنا أَبُو الْعَبَّاسِ مُحَمَّدُ بْنُ يَعْقُوبَ، حدثنا مُحَمَّدُ بْنُ إِسْحَاقَ، حدثنا يَحْيَى بْنُ مَعِينٍ، حدثنا مُحَمَّدُ بْنُ فُضَيْلٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ مَاهَانَ الْحَنَفِيِّ قَالَ: " أَمَا يَسْتَحِي أَحَدُكُمْ أَنْ تَكُونَ دَابَّتُهُ الَّتِي يَرْكَبُهَا، وَثَوْبُهُ الَّذِي يَلْبَسُ أَكْثَرَ ذِكْرًا لِلَّهِ مِنْهُ قَالَ: وَكَانَ لَا يَفْتُرُ مِنَ التَّسْبِيحِ وَالتَّهْلِيلِ وَالتَّكْبِيرِ "
মাহান আল-হানফী (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তোমাদের কেউ কি এমন হওয়াতে লজ্জা পায় না যে, তার আরোহণের বাহন এবং পরিধানের পোশাক তার চেয়ে আল্লাহর অধিক যিকিরকারী (স্মরণকারী) হয়?
বর্ণনাকারী বলেন, তিনি (মাহান) তাসবীহ (সুবহানাল্লাহ), তাহলীল (লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ) ও তাকবীর (আল্লাহু আকবার) পাঠ করা থেকে কখনো বিরত হতেন না।
تحقيق الشيخ د. عبد العلي عبد الحميد حامد : إسناده: رجاله ثقات.
707 - أَخْبَرَنَا أَبُو الْحُسَيْنِ بْنُ بِشْرَانَ، أَخْبَرَنَا دَعْلَجُ بْنُ أَحْمَدَ، حدثنا إِبْرَاهِيمُ بْنُ أَبِي طَالِبٍ، حدثنا إِسْحَاقُ بْنُ مُوسَى الْأَنْصَارِيُّ، حدثنا الْوَلِيدُ بْنُ مُسْلِمٍ، حدثنا عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ يَزِيدَ بْنِ جَابِرٍ قَالَ: قُلْتُ لِعُمَيْرِ بْنِ هَانِئٍ: " أَرَى لِسَانَكَ لَا يَفْتُرُ مِنْ ذِكْرِ اللهِ فَكَمْ تُسَبِّحُ فِي كُلِّ يَوْمٍ؟ قَالَ: مِائَةَ أَلْفٍ إِلَّا أَنْ تُخْطِئَ الْأَصَابِعُ "
আব্দুর রহমান ইবনে ইয়াযীদ ইবনে জাবির (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি উমায়ের ইবনে হানি (রাহিমাহুল্লাহ)-কে জিজ্ঞেস করলাম: "আমি দেখতে পাই আপনার জিহ্বা আল্লাহ্র যিকির (স্মরণ) থেকে কখনো বিরত থাকে না। আপনি প্রতিদিন কতবার তাসবীহ (আল্লাহর পবিত্রতা ঘোষণা) পাঠ করেন?"
তিনি উত্তর দিলেন: "এক লক্ষ বার, যদি না আঙ্গুল ভুল করে বসে।"
تحقيق الشيخ د. عبد العلي عبد الحميد حامد : إسناده: رجاله ثقات.
708 - أَخْبَرَنَا أَبُو الْحُسَيْنِ، أَخْبَرَنَا دَعْلَجُ بْنُ أَحْمَدَ، حدثنا إِبْرَاهِيمُ بْنُ أَبِي طَالِبٍ، حدثنا جَعْفَرُ بْنُ عِمْرَانَ التَّغْلَبِيُّ، حدثنا الْمُحَارِبِيُّ، عَنْ سُعَيْرِ بْنِ الْخِمْسِ، عَنْ عَبْدِ الْعَزِيزِ بْنِ أَبِي رَوَّادٍ قَالَ: " كَانَتِ امْرَأَةٌ فِي أَسْفَلِ مَكَّةَ تُسَبِّحُ فِي كُلِّ يَوْمٍ اثْنَيْ عَشَرَ أَلْفَ تَسْبِيحَةٍ، فَمَاتَتْ فَلَمَّا بُلِغَ بِهَا الْقَبْرُ أُخِذَتْ مِنْ بَيْنِ أَيْدِي الرِّجَالِ "
আব্দুল আযীয ইবনে আবী রওয়াদ (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মক্কার নিম্নাঞ্চলে একজন মহিলা ছিলেন, যিনি প্রতিদিন বারো হাজার বার তাসবীহ (আল্লাহর পবিত্রতা ঘোষণা) পাঠ করতেন। অতঃপর তিনি ইন্তেকাল করলেন। যখন তাঁকে কবরের কাছে নেওয়া হলো, তখন পুরুষদের হাত থেকে (বা দৃষ্টির সামনে থেকে) তাঁকে তুলে নেওয়া হলো (তিনি অদৃশ্য হয়ে গেলেন)।
تحقيق الشيخ د. عبد العلي عبد الحميد حامد : إسناده: حسن.
709 - أَخْبَرَنَا أَبُو بَكْرٍ مُحَمَّدُ بْنُ بَكْرٍ الْفَقِيهُ الطُّوسِيُّ، أَخْبَرَنَا أَبُو بِشْرٍمُحَمَّدُ بْنُ أَحْمَدَ بْنِ حَاضِرٍ، أَخْبَرَنَا أَبُو الْعَبَّاسِ مُحَمَّدُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ بْنِ مِهْرَانَ، حدثنا عَبْدُ اللهِ بْنُ سَعِيدٍ، حدثنا مُحَمَّدُ بْنُ فُضَيْلٍ، عَنْ رَجُلٍ، قَالَ: رَأَيْتُ أَبَا صَالِحٍ مَاهَانَ حِينَ صَلَبَهُ الْحَجَّاجَ عَلَى الْخَشَبَةِ فَجَعَلَ يُسَبِّحُ، وَيَعْقِدُ قَالَ: " فَبَلَغَ التَّسْبِيحَ فِي يَدِهِ ثَلَاثًا وَثَلَاثِينَ يَعْقِدُهَا قَالَ: فَجَاءَ رَجُلٌ فَطَعَنَهُ فَقَتَلَهُ قَالَ: فَلَقَدْ رَأَيْتُ فِي يَدِهِ الْعُقُدَ بَعْدَ كَذَا "
একজন বর্ণনাকারী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন:
আমি আবু সালেহ মাহানকে দেখেছিলাম, যখন হাজ্জাজ তাকে কাঠের উপর শূলবিদ্ধ করেছিল। তখন তিনি তাসবীহ জপতে এবং (আঙ্গুলে) গণনা করতে শুরু করলেন। বর্ণনাকারী বলেন, তার হাতে তাসবীহ গণনা তেত্রিশ পর্যন্ত পৌঁছেছিল, যা তিনি গুনে যাচ্ছিলেন। বর্ণনাকারী বলেন, এরপর একজন লোক এসে তাকে আঘাত করে হত্যা করে ফেলল। বর্ণনাকারী আরও বলেন, আমি তার মৃত্যুর পরেও তার হাতে সেই গণনা (আঙ্গুলের ভাঁজ) দেখতে পেয়েছিলাম।
تحقيق الشيخ د. عبد العلي عبد الحميد حامد : إسناده: لم أعرف كل رجاله وفيه مجهول.
710 - أَخْبَرَنَا أَبُو عَبْدِ اللهِ الْحَافِظُ، أَخْبَرَنَا عَلِيُّ بْنُ عِيسَى بْنُ إِبْرَاهِيمُ بْنُ مُحَمَّدٍ السُّلوليُّ، حدثنا مُحَمَّدُ بْنُ عَبْدِ الْعَزِيزِ بْنِ أَبِي رِزْمَةَ، عَنْ أَبِيهِ، عَنِ ابْنِ الْمُبَارَكِ، أَنَّ أَبَا مِجْلَزٍ، كَانَ يَرْكَبُ مَعَ قُتَيْبَةَ بْنِ مُسْلِمٍ فِي مَوْكِبِهِ فَيُسَبِّحُ اللهَ اثْنَيْ عَشَرَ أَلْفَ تَسْبِيحَةٍ وَيَعُدُّهَا بِبَنَانِهِ "
আবু মিজলায (রাহিমাহুল্লাহ) সম্পর্কে বর্ণিত, তিনি কুতাইবা ইবনে মুসলিমের সাথে তার কাফেলায় আরোহণ করতেন। এ অবস্থায় তিনি বারো হাজার বার আল্লাহ্র তাসবীহ পাঠ করতেন এবং তা নিজ আঙ্গুলের ডগা দিয়ে গণনা করতেন।
تحقيق الشيخ د. عبد العلي عبد الحميد حامد : لم أعرف شيخ الحاكم علي بن عيسى ولا شيخه إبراهيم بن محمد. وكلمة "السلولي" غير واضحة في الأصل.
711 - أَخْبَرَنَا أَبُو الْفَتْحِ هِلَالُ بْنُ مُحَمَّدِ بْنِ جَعْفَرٍ، أَخْبَرَنَا الْحُسَيْنُ بْنُ يَحْيَى بْنِ عَيَّاشٍ، حدثنا أَبُو الْأَشْعَثِ، حدثنا الْمُعْتَمِرُ بْنُ سُلَيْمَانَ، حدثنا أَبُو كَعْبٍ، عَنْ جَدِّهِ بَقِيَّةَ عَنْ أَبِي صَفِيَّةَ، مَوْلَى النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَنَّهُ كَانَ " يُوضَعُ لَهُ نِطَعٌ وَيُؤْتَى بِزِنْبِيلٍ فِيهِ حَصًا فَيُسَبِّحُ بِهِ إِلَى نِصْفِ النَّهَارِ، ثُمَّ يَرْفَعُ فَإِذَا صَلَّى الْأُولَى أُتِيَ بِهِ فَيُسَبِّحُ بِهِ حَتَّى يُمْسِيَ "
আবু সাফিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যিনি নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের আযাদকৃত গোলাম ছিলেন, থেকে বর্ণিত:
তাঁর জন্য একটি চামড়ার বিছানা (নিত্বা’) বিছিয়ে দেওয়া হতো এবং একটি ঝুড়ি আনা হতো, যার মধ্যে নুড়ি পাথর থাকত। তিনি এই নুড়িগুলো দ্বারা দুপুর পর্যন্ত তাসবীহ পাঠ করতেন। এরপর তা (তাঁকে দেওয়ার পর) সরিয়ে নেওয়া হতো। অতঃপর যখন তিনি ‘উলা’ (প্রথম সালাত, অর্থাৎ যুহরের সালাত) আদায় করতেন, তখন তা পুনরায় তাঁর কাছে আনা হতো এবং তিনি সন্ধ্যা পর্যন্ত তা দিয়ে তাসবীহ পাঠ করতেন।
تحقيق الشيخ د. عبد العلي عبد الحميد حامد : إسناده: لم يتضح لِى حاله.
712 - أَخْبَرَنَا أَبُو عَبْدِ اللهِ الْحَافِظُ، رَحِمَهُ اللهُ أَخْبَرَنَا الْحَسَنُ بْنُ مُحَمَّدِ بْنِ إِسْحَاقَ قَالَ: سَمِعْتُ سَعِيدَ بْنَ عُثْمَانَ الْحَنَّاطَ يَقُولُ: سَمِعْتُ ذَا النُّونِ يَقُولُ: " ثَلَاثَةٌ مِنْ عَلَامَاتِ مَوْتِ الْقَلْبِ الْأُنْسُ مَعَ الْخَلْقِ، وَالْوَحْشَةُ فِي الْخَلْوَةِ مَعَ اللهِ وَافْتِقَادُ حَلَاوَةِ الذِّكْرِ الْمَقْسُومِ وَثَلَاثَةٌ مِنْ أَعْلَامِ الْوَلَهِ إِلَى اللهِ: اضْطِرَابُ الرُّوحِ فِي الْبَدَنِ عِنْدَ الذِّكْرِ تَشَوُّقًا وَارْتِيَاحُ الْعَقْلِ عِنْدَ النَّجْوَى تَمَلُّقًا وَوُلُوجُ الْهِمَّةِ فِي الْغُيُوبِ نَحْوَ اللهِ تَخَلُّقًا "
যুননূন (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন:
হৃদয়ের মৃত্যুর তিনটি আলামত (লক্ষণ) রয়েছে: সৃষ্টিকুলের সাথে ঘনিষ্ঠতা অনুভব করা, আল্লাহর সাথে নির্জনে একাকীত্ব (অস্বস্তি) বোধ করা, এবং নিয়মিত (বা নির্ধারিত) যিকিরের মাধুর্য হারিয়ে ফেলা।
আর আল্লাহর প্রতি তীব্র আগ্রহ (বা মুগ্ধতা)-এর তিনটি আলামত রয়েছে: আগ্রহবশত যিকিরের সময় শরীরে রূহের অস্থিরতা সৃষ্টি হওয়া, বিনয় প্রকাশের উদ্দেশ্যে গোপনে আলাপচারিতার (মুনাজাতের) সময় বুদ্ধির স্বস্তি লাভ করা, এবং উন্নত চরিত্র গঠনের জন্য আল্লাহর দিকে লক্ষ্য রেখে অদৃশ্য বিষয়সমূহে সংকল্পের (ইচ্ছাশক্তির) প্রবেশ করা।
713 - وَسَمِعْتُ أَبَا سَعْدِ بْنِ أَبِي عُثْمَانَ الزَّاهِدُ يَقُولُ: سَمِعْتُ عَلِيُّ بْنُ الْحُسَيْنِ الْفَقِيهُ يَقُولُ: سَمِعْتُ أَبِي يَقُولُ: سَمِعْتُ عَمِّي الْبِسْطَامِيَّ يَقُولُ: سَمِعْتُ أَبِي يَقُولُ: سُئِلَ أَبُو يَزِيدَ الْبِسْطَامِيُّ، عَنْ حَقِيقَةِ الْمَعْرِفَةِ فَقَالَ: " الْحَيَاةُ بِذِكْرِ اللهِ وَعَنْ حَقِيقَةِ الْجَهْلِ فَقَالَ الْغَفْلَةُ عَنِ اللهِ "
আবু ইয়াযীদ আল-বিস্তামী (রাহিমাহুল্লাহ)-কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল, মারিফাতের (আল্লাহর সঠিক পরিচয়) হাকীকত (প্রকৃত স্বরূপ) কী?
তিনি বললেন: "তা হলো আল্লাহ্র যিকির বা স্মরণের মাধ্যমে জীবন যাপন করা।"
আর জাহালাত বা অজ্ঞতার হাকীকত কী, জিজ্ঞাসা করা হলে তিনি বললেন: "তা হলো আল্লাহ তা‘আলা থেকে গাফেল (বিস্মৃত) হয়ে যাওয়া।"
714 - سَمِعْتُ أَبَا عَبْدِ الرَّحْمَنِ السُّلَمِيُّ رَحِمَهُ اللهُ يَقُولُ: سَمِعْتُ أَبَا نَصْرِ بْنَ عَبْدِ اللهِ يَقُولُ: -[188]- سَمِعْتُ يَعْقُوبَ بْنَ إِسْحَاقَ يَقُولُ: سَمِعْتُ إِبْرَاهِيمَ الْهَرَوِيَّ يَقُولُ: سَمِعْتُ أَبَا يَزِيدَ الْبِسْطَامِيَّ رَحِمَهُ اللهُ وَسُئِلَ مَا عَلَامَةُ الْعَارِفِ فَقَالَ: أَنْ لَا يَفْتُرَ مِنْ ذِكْرِهِ، وَلَا يَمَلَّ مِنْ حَقِّهِ، وَلَا يَسْتَأْنِسَ بِغَيْرِهِ قَالَ: وَقَالَ أَبُو يَزِيدَ: " غَلَطْتُ فِي ابْتِدَائِي فِي أَرْبَعَةِ أَشْيَاءَ تَوَهَّمْتُ أَنِّي أَذْكُرُهُ وَأَعْرِفُهُ وَأُحِبُّهُ وَأَطْلُبُهُ فَلَمَّا انْتَهَيْتُ رَأَيْتُ ذِكْرَهُ سَبَقَ ذِكْرِي وَمَعْرِفتَهُ تَقَدَّمَتْ مَعْرِفَتِي وَمَحَبَّتَهُ أَقْدَمَ مِنْ مَحَبَّتِي وَطَلَبَهُ لِي أَوَّلًا حَتَّى طَلَبْتُهُ، يُرِيدُ بِالطَّلَبِ هَهُنَا إِرَادَتَهُ وَقَصْدَهُ إِلَى رَفْعِ مَحِلِّهِ بِالتَّوْفِيقِ لَهُ وَاللهُ أَعْلَمُ "
আবু ইয়াযীদ আল-বিস্তামী (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত,
তাঁকে জিজ্ঞেস করা হয়েছিল: আরেফের (আল্লাহ্-প্রেমিক বা আল্লাহর পরিচিত) আলামত কী? তিনি বললেন: সে যেন তাঁর (আল্লাহর) যিকির (স্মরণ) থেকে কখনো বিরত বা শিথিল না হয়, তাঁর হকের (কর্তব্যের) ব্যাপারে ক্লান্ত না হয়, এবং তিনি ব্যতীত অন্য কারো সাথে যেন ঘনিষ্ঠতা বা স্বস্তি অনুভব না করে।
আবু ইয়াযীদ (রাহিমাহুল্লাহ) আরো বলেন: "আমার আধ্যাত্মিক পথের শুরুতে আমি চারটি বিষয়ে ভুল করেছিলাম। আমি ধারণা করেছিলাম যে, আমি তাঁকে স্মরণ করি, তাঁকে জানি, তাঁকে ভালোবাসি এবং তাঁকে তালাশ করি। কিন্তু যখন আমি (পথের) শেষ পর্যায়ে পৌঁছলাম, তখন আমি দেখলাম যে, তাঁর যিকির আমার যিকিরের আগে এসেছে, তাঁর জ্ঞান আমার জ্ঞানের চেয়ে অগ্রগামী, তাঁর মহব্বত আমার মহব্বতের চেয়ে প্রাচীন, এবং তিনি আমাকে প্রথমে তালাশ করেছেন, যার ফলেই আমি তাঁকে তালাশ করতে পেরেছি।"
(বর্ণনাকারীগণ বলেন) এখানে ‘তালাশ’ দ্বারা উদ্দেশ্য হলো, আল্লাহ্র ইচ্ছা ও উদ্দেশ্য—যা তাঁকে (আরেফকে) তাওফীক প্রদানের মাধ্যমে তাঁর মর্যাদা উন্নত করার জন্য নিবেদিত ছিল। আর আল্লাহই ভালো জানেন।
تحقيق الشيخ د. عبد العلي عبد الحميد حامد : . أبو عبد الرحمن السلمي الصوفي، وفي (ن) والمطبوعة (أبا عبد الله السلمي).
715 - أَخْبَرَنَا أَبُو عَلِيٍّ الرُّوذْبَارِيُّ، رَحِمَهُ اللهُ أَخْبَرَنَا الْحُسَيْنُ بْنُ الْحَسَنِ بْنِ أَيُّوبَ الطُّوسِيُّ، أَخْبَرَنَا أَبُو حَاتِمٍ الرَّازِيُّ، حدثنا عَبْدُ الرَّحِيمِ بْنُ مُطَرِّفٍ، أَخْبَرَنَا عِيسَى بْنُ يُونُسَ، عَنِ الْأَوْزَاعِيِّ قَالَ: قَالَ حَسَّانُ بْنُ عَطِيَّةَ رَضِيَ اللهُ عَنْهُ: " مَا عَادَى عَبْدٌ رَبَّهُ بِشَيْءٍ أَشَدَّ عَلَيْهِ مِنْ أَنْ يَكْرَهَ ذِكْرَهُ أَوْ مَنْ يذْكُرُهُ "
الْحَادِيَ عَشَرَ مِنْ شُعَبِ الْإِيمَانِ وَهُوَ بَابٌ فِي الْخَوْفِ مِنَ اللهِ تَعَالَى قَالَ اللهُ تَعَالَى: {إِنَّمَا ذَلِكُمُ الشَّيْطَانً يُخَوِّفُ أَوْلِيَاءَهُ فَلَا تَخَافُوهُمْ وَخَافُونِ إِنْ كُنْتُمْ مُؤْمِنِينَ} [آل عمران: 175] وَقَالَ {فَلَا تَخْشَوُا النَّاسَ وَاخْشَوْنِ} [المائدة: 44] وقَالَ: {وَإِيَّايَ فَارْهَبُونَ} [البقرة: 40] وَقَالَ: {وَاذْكُرْ رَبَّكَ فِي نَفْسِكَ تَضَرُّعًا وَخِيفَةً} [الأعراف: 205] وَأَثْنَى عَلَى مَلَائِكَتِهِ لِخَوْفِهِمْ مِنْهُ فَقَالَ: {وَهُمْ مِنْ خَشْيَتِهِ مُشْفِقُونَ} [الأنبياء: 28] وَمَدَحَ أَنْبِيَاءَهَ عَلَيْهِمُ السَّلَامُ، وَأَوْلِيَاءَهُ بِمِثْلِ ذَلِكَ فَقَالَ: {إِنَّهُمْ كَانُوا يُسَارِعُونَ فِي الْخَيْرَاتِ وَيَدْعُونَنَا رَغَبًا، وَرَهَبًا وَكَانُوا لَنَا خَاشِعِينَ} [الأنبياء: 90] وَقَالَ: {وَالَّذِينَ يَصِلُونَ مَا أَمَرَ اللهُ بِهِ أَنْ يُوصَلَ وَيَخْشَوْنَ رَبَّهُمْ وَيَخَافُونَ سُوءَ الْحِسَابِ} [الرعد: 21] وَعَاتَبَ الْكُفَّارَ عَلَى غَفْلَتِهِمْ فَقَالَ: {مَا لَكُمْ لَا تَرْجُونَ لِلَّهِ وَقَارًا} [نوح: 13] فَقِيلَ فِي التَّفْسِيرِ مَا لَكُمْ لَا تَخَافُونَ عَظَمَةَ اللهِ، وَذَمَّهُمْ فِي آيَةٍ أُخْرَى فَقَالَ: {وَقَالَ: الَّذِينَ لَا يَرْجُونَ لِقَاءَنَا} [الفرقان: 21] فَقِيلَ أَرَادَ بِهِ: لَا يَخَافُونَ.
فَدَلَّ جَمِيعُ مَا وَصَفْنَاهُ عَلَى أَنَّ الْخَوْفَ مِنَ اللهِ تَعَالَى مِنْ تَمَامِ الِاعْتِرَافِ بِمُلْكِهِ وَسُلْطَانِهِ وَنَفَاذِ مَشِيئَتِهِ فِي خَلْقِهِ , وَأَنَّ إِغْفَالَ ذَلِكَ إِغْفَالُ الْعُبُودِيَّةِ إِذْ كَانَ مِنْ حَقِّ كُلِّ عَبْدٍ وَمَمْلُوكٍ أَنْ يَكُونَ رَاهِبًا لِمَوْلَاهُ لِثُبُوتِ يَدِ الْمَوْلَى عَلَيْهِ , وَعَجْزِ الْعَبْدِ عَنْ مُقَاوَمَتِهِ وَتَرْكِ الِانْقِيَادِ لَهُ. قَالَ الْحَلِيمِيُّ رَحِمَهُ اللهُ وَالْخَوْفُ عَلَى وُجُوهٍ: أَحَدُهَا: مَا يَحْدُثُ مِنْ مَعْرِفَةِ الْعَبْدِ بِذِلَّةِ نَفْسِهِ وَهَوَانِهَا وَقُصُورِهَا , وَعَجْزِهَا عَنِ الِامْتِنَاعِ عَنِ اللهِ - تَعَالَى جَدُّهُ - إِنْ أَرَادَهُ بِسُوءٍ وَهَذَا نَظِيرُ خَوْفِ الْوَلَدِ وَالِدَيْهِ , وَخَوْفِ النَّاسِ سُلْطَانَهُمْ وَإِنْ كَانَ عَادِلًا مُحْسِنًا , وَخَوْفِ الْمَمَالِيكِ مُلَّاكَهُمْ. وَالثَّانِي: مَا يَحْدُثُ مِنَ الْمَحَبَّةِ , وَهُوَ أَنْ يَكُونَ الْعَبْدُ فِي عَامَّةِ الْأَوْقَاتِ وَجِلًا مِنْ أَنْ يَكِلَهُ إِلَى نَفْسِهِ , وَيَمْنَعَهُ مَوَادَ التَّوْفِيقِ , وَيَقْطَعَ دُونَهُ الْأَسْبَابَ. وَهَذَا خُلُقُ كُلِّ مَمْلُوكٍ أَحْسَنَ إِلَيْهِ سَيِّدُهُ , فَعَرَفَ قَدْرَ إِحْسَانِهِ فَأَحَبَّهُ , فَإِنَّهُ لَا يَزَالُ يُشْفِقُ عَلَى مَنْزِلَتِهِ عِنْدَهُ خَائِفًا مِنَ السُّقُوطِ عَنْهَا وَالْفَقْدِ لَهَا. والثَّالِثُ: مَا يَحْدُثُ مِنَ الْوَعِيدِ. وَقَدْ نَبَّهَ الْكِتَابُ عَلَى هَذِهِ الْأَنْوَاعِ كُلِّهَا. أَمَّا الْأَوَّلُ فَقَوْلُهُ تَعَالَى: {مَا لَكُمْ لَا تَرْجُونَ لِلَّهِ وَقَارَا} [نوح: 13] أَيْ لَا تَخَافُونَ لِلَّهِ عَظَمَةً. قَالَ الْبَيْهَقِيُّ رَحِمَهُ اللهُ: هَكَذَا فَسَّرَهُ الْكَلْبِيُّ فِيمَا رَوَاهُ، عَنْ أَبِي صَالِحٍ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ
হাসসান ইবনে আতিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কোনো বান্দা এমন কোনো কিছু দ্বারা তার রবের সাথে শত্রুতা পোষণ করেনি, যা তার জন্য এর চেয়েও বেশি কঠিন— যে সে তাঁর (আল্লাহর) যিকিরকে অথবা যারা যিকির করে তাদেরকে অপছন্দ করবে।
(এটি) ঈমানের শাখাসমূহের একাদশতম অংশ, আর তা হলো মহান আল্লাহ তাআলার প্রতি ভীতি (খাওফ) সম্পর্কিত অধ্যায়।
আল্লাহ তাআলা বলেছেন: "এরাই শয়তান, যারা তাদের বন্ধু-বান্ধবদের ভয় দেখায়। অতএব, তোমরা তাদেরকে ভয় করো না, আমাকেই ভয় করো, যদি তোমরা মুমিন হও।" [সূরা আলে ইমরান: ১৭৫]
এবং তিনি বলেছেন: "তোমরা মানুষকে ভয় করো না, আমাকেই ভয় করো।" [সূরা মায়েদা: ৪৪]
এবং তিনি বলেছেন: "আর তোমরা শুধু আমাকেই ভয় করো।" [সূরা বাকারা: ৪০]
এবং তিনি বলেছেন: "আর আপনি আপনার রবের যিকির করুন মনে মনে বিনীতভাবে ও ভয় সহকারে।" [সূরা আ’রাফ: ২০৫]
আল্লাহ তাআলা ফেরেশতাদের প্রশংসা করেছেন যে, তারা তাঁকে ভয় করে, যেমন তিনি বলেছেন: "আর তারা তাঁর ভয়ে সর্বদা সতর্ক থাকে।" [সূরা আম্বিয়া: ২৮]
তিনি তাঁর নবীগণ (আলাইহিমুস সালাম) ও ওলীগণকে অনুরূপ গুণের জন্য প্রশংসা করে বলেছেন: "নিশ্চয়ই তারা কল্যাণকর কাজে দ্রুত ধাবিত হতো এবং আশা ও ভীতি সহকারে আমাদেরকে ডাকত। আর তারা ছিল আমাদের প্রতি বিনয়ী।" [সূরা আম্বিয়া: ৯০]
এবং তিনি বলেছেন: "আর যারা আল্লাহ যে সম্পর্ক অক্ষুণ্ণ রাখতে আদেশ করেছেন তা অক্ষুণ্ণ রাখে এবং তাদের রবকে ভয় করে এবং কঠিন হিসাবের আশঙ্কা করে।" [সূরা রাদ: ২১]
আর তিনি কাফিরদের তাদের উদাসীনতার জন্য তিরস্কার করে বলেছেন: "তোমাদের কী হলো যে, তোমরা আল্লাহর জন্য কোনো মর্যাদা প্রত্যাশা করো না?" [সূরা নূহ: ১৩]
তাফসীরে বলা হয়েছে: তোমাদের কী হলো যে, তোমরা আল্লাহর মহিমাকে ভয় করো না?
এবং তিনি অন্য এক আয়াতে তাদের নিন্দা করে বলেছেন: "আর যারা আমাদের সাক্ষাতের আশা রাখে না, তারা বলে..." [সূরা ফুরকান: ২১]
বলা হয়েছে, এর দ্বারা উদ্দেশ্য হলো— তারা ভয় করে না।
আমরা যা কিছু বর্ণনা করেছি, তার সবই প্রমাণ করে যে, মহান আল্লাহ তাআলাকে ভয় করা তাঁর রাজত্ব ও কর্তৃত্বের পূর্ণ স্বীকৃতি এবং সৃষ্টির উপর তাঁর ইচ্ছার বাস্তবায়নের পূর্ণ স্বীকৃতির অন্তর্ভুক্ত। আর এই বিষয়ে উদাসীন হওয়া মানে দাসত্বের (উবুদিয়্যাতের) প্রতি উদাসীন হওয়া; কারণ প্রত্যেক দাস ও ক্রীতদাসের জন্য উচিত হলো তার মনিবকে ভয় করা, যেহেতু তার মনিবের হাত তার উপর প্রতিষ্ঠিত এবং দাস তার বিরোধিতা করতে বা তার আদেশ মানতে অস্বীকার করতে অক্ষম।
ইমাম আল-হালীমি (রহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: ভয় কয়েক প্রকার:
**প্রথম প্রকার:** বান্দার নিজের তুচ্ছতা, দুর্বলতা, ত্রুটি এবং মহান আল্লাহর কাছ থেকে নিজেকে রক্ষা করতে অক্ষমতা— যদি আল্লাহ তার ক্ষতি করতে চান— এসব জানার ফলে যে ভীতি সৃষ্টি হয়। এটি এমন ভয়ের মতো, যেমন সন্তান তার পিতামাতাকে ভয় করে, অথবা মানুষ তাদের শাসককে ভয় করে, যদিও তিনি ন্যায়পরায়ণ ও অনুগ্রহকারী হন, এবং যেমন ক্রীতদাসরা তাদের মালিকদের ভয় করে।
**দ্বিতীয় প্রকার:** ভালোবাসা থেকে যে ভীতি সৃষ্টি হয়। আর তা হলো বান্দা সর্বদা ভীত থাকা যে, আল্লাহ তাকে তার নিজের দায়িত্বে ছেড়ে দেবেন, কিংবা তাকে সফলতার উপকরণ (তাওফীক) থেকে বঞ্চিত করবেন এবং তার জন্য পথ বন্ধ করে দেবেন। এটি সেই ক্রীতদাসের স্বভাব, যার প্রতি তার মনিব অনুগ্রহ করেছেন, ফলে সে সেই অনুগ্রহের মূল্য বোঝে এবং তাকে ভালোবাসে। এরপর সে সর্বদা তার অবস্থান নিয়ে উদ্বিগ্ন থাকে, ভয় করে যে সে সেই অবস্থান থেকে বিচ্যুত হতে পারে এবং তা হারাতে পারে।
**তৃতীয় প্রকার:** শাস্তির হুমকি (ওয়াঈদ) থেকে যে ভীতি সৃষ্টি হয়।
কিতাব (আল-কুরআন) এই সব ধরনের ভীতি সম্পর্কেই সতর্ক করেছে।
প্রথম প্রকারের প্রমাণ হলো মহান আল্লাহর বাণী: {তোমাদের কী হলো যে, তোমরা আল্লাহর জন্য কোনো মর্যাদা প্রত্যাশা করো না?} [সূরা নূহ: ১৩] অর্থাৎ তোমরা আল্লাহর মহিমাকে ভয় করো না কেন?
ইমাম বাইহাকী (রহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: এভাবেই কালবি এটি ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে আবু সালিহ-এর মাধ্যমে ব্যাখ্যা করেছেন।
تحقيق الشيخ د. عبد العلي عبد الحميد حامد : إسناده: رجاله ثقات.
716 - أَخْبَرَنَا أَبُو زَكَرِيَّا بْنُ أَبِي إِسْحَاقَ الْمُزَكِّي، أَخْبَرَنَا أَبُو الْحَسَنِ أَحْمَدُ بْنُ مُحَمَّدِ بْنِ عَبْدُوسٍ، حَدَّثَنَا عُثْمَانُ بْنُ سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللهِ بْنُ صَالِحٍ، عَنْ -[191]- مُعَاوِيَةَ بْنِ صَالِحٍ، عَنْ عَلِيِّ بْنِ أَبِي طَلْحَةَ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، فِي قَوْلِهِ عَزَّ وَجَلَّ: { مَا لَكُمْ لَا تَرْجُونَ لِلَّهِ وَقَارًا} [نوح: 13] يَقُولُ: عَظَمَةً وَقَوْلُهُ {وَقَدْ خَلَقَكُمْ أَطْوَارًا} [نوح: 14] يَقُولُ: نُطْفَةً ثُمَّ عَلَقَةً ثُمَّ مُضْغَةً "
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে আল্লাহ্ তাআলার বাণী:
**{ তোমাদের কী হলো যে তোমরা আল্লাহর জন্য কোনো মর্যাদা প্রত্যাশা করো না? }** (সূরা নূহ: ১৩) - এর ব্যাখ্যায় তিনি বলেন: এর অর্থ হলো ’মহিমা’ বা ’শ্রেষ্ঠত্ব’।
আর তাঁর (আল্লাহ্ তাআলার) বাণী: **{ অথচ তিনি তোমাদেরকে সৃষ্টি করেছেন বিভিন্ন স্তরে স্তরে? }** (সূরা নূহ: ১৪) - এর ব্যাখ্যায় তিনি বলেন: এর অর্থ হলো (সৃষ্টির স্তরগুলো): প্রথমে ’শুক্রবিন্দু’ (নুত্বফাহ), অতঃপর ’রক্তপিণ্ড’ (আলাক্বাহ), অতঃপর ’মাংসপিণ্ড’ (মুদগাহ)।
تحقيق الشيخ د. عبد العلي عبد الحميد حامد : إسناده: فيه انقطاع.
