الجامع الكامل
Al-Jami Al-Kamil
আল-জামি` আল-কামিল
আল-জামি` আল-কামিল (73)
73 - عن عتبان بن مالك قال: بعثتُ إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أني أحبُّ أن تأتيني فتصلي في منزلي فأتخذه مصلّي، قال: فأتى النّبيُّ صلى الله عليه وسلم ومن شاء اللَّه من أصحابه فدخل وهو
يصلي في منزلي، وأصحابه يتحدّثون بينهم ثم أسندوا عظم ذلك وكبره إلى مالك بن دُخْشُم قالوا: ودُّوا أنه دعا عليه فهلك، وودُّوا أنه أصابه شرٌّ، فقضى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم الصّلاة، وقال:"أليس يشهد أن لا إله إلا اللَّه، وأني رسول اللَّه؟" قالوا: إنّه يقول ذلك وما هو في قلبه! قال:"لا يشهد أحدٌ أن لا إله إلا اللَّه وأني رسول اللَّه فيدخل النّار أو تطعمه".
متفق عليه: رواه مسلم في الإيمان (33) عن شيبان بن فرّوخ، حدّثنا سليمان -يعني ابن المغيرة-، قال: حدثنا ثابت، عن أنس بن مالك، قال: حدثني محمود بن الرّبيع، عن عتبان بن مالك، قال: قدمت المدينة فلقيت عتبان، فقلت: حديث بلغني عنك؟ قال: أصابني في بصري بعض الشيء فبعثت. فذكر الحديث. قال أنس: فأعجبني هذا الحديث، فقلت لابني: اكتبه، فكتبه.
ورواه أيضًا من وجه آخر عن حماد قال: حدثنا ثابت، عن أنس، قال: حدثني عِتْبان بن مالك أنه عمي، فأرسل إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقال: تعالَ فخط لي مسجدًا، فجاء رسولُ اللَّه صلى الله عليه وسلم: وجاء قومُه، ونُعت رجل فيهم يقال له: مالك بن الدخشم ثم ذكر نحو حديث سليمان بن المغيرة. انتهى.
ورواه البخاريّ في الصلاة (435) من وجه آخر عن عُقيل، عن ابن شهاب قال: أخبرني محمود بن الربيع الأنصاريّ، عن عتبان بن مالك، فذكر الحديث نحوه. وفيه: قال قائل منهم: أين مالك بن الدُّخيشن -أو ابن الدُّخْشن- فقال بعضهم: ذاك منافق لا يحبُّ اللَّه ورسولَه. فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا تقلْ ذلك ألا تراه قد قال: لا إله إلا اللَّه يريد بذلك وجه اللَّه؟". قال: اللَّه ورسوله أعلم. قال: فإنّا نرى وجهه ونصيحته إلى المنافقين. قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"فإن اللَّه قد حرّم على النار من قال: لا إله إلا اللَّه يبتغي بذلك وجه اللَّه".
قال ابن شهاب: ثم سألتُ الحصين بن محمد الأنصاريّ -وهو أحد بني سالم، وهو من سراتهم- عن حديث محمود بن الرّبيع، فصدّقه بذلك. انتهى.
ورواه مسلم في المساجد (33: 263) من طريق يونس، عن ابن شهاب به نحوه، وفيه بعض الزيادات في أصل القصة، وأما الجزء المرفوع فهو سواء.
وقوله:"مالك بن الدُّخيشن أو ابن الدّخشن" الشّك من الرّاوي هل هو مصغر أو مكبّر. وفي رواية:"ابن الدّخشم".
وقوله:"وهو من سَراتهم" بفتح المهملة أي: خيارهم، وهو جمع سري، قال أبو عبيد: هو المرتفع القدر من سرو الرجل يسرو إذا كان رفيع القدر، وأصله من السراة: وهو أرفع المواضع من ظهر الدابة، وقيل: هو رأسها. فتح الباري (1/ 522).
অনুবাদঃ উতবান ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এই মর্মে বার্তা পাঠালাম যে, আমি চাই আপনি আমার কাছে এসে আমার ঘরে সালাত আদায় করুন, যেন আমি সেই স্থানটিকে সালাতের স্থান (মুসাল্লা) হিসেবে গ্রহণ করতে পারি।
তিনি বলেন: তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং আল্লাহর ইচ্ছায় তাঁর সাহাবীগণের মধ্য থেকে যাদের আসা দরকার ছিল, তারা এলেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রবেশ করলেন এবং আমার ঘরে সালাত আদায় করলেন।
তাঁর সাহাবীগণ নিজেদের মধ্যে কথাবার্তা বলছিলেন। এরপর তাঁরা (কথাবার্তার) গুরুত্ব ও কঠোরতা মালিক ইবনু দুখশুম-এর দিকে নিয়ে গেলেন। তাঁরা বললেন: তারা কামনা করে যে তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যেন তার বিরুদ্ধে বদ-দু'আ করেন যাতে সে ধ্বংস হয়ে যায়, এবং তারা চায় যে তার উপর কোনো অনিষ্ট আপতিত হোক।
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাত শেষ করলেন এবং বললেন: "সে কি এই সাক্ষ্য দেয় না যে আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং আমি আল্লাহর রাসূল?"
তাঁরা বললেন: সে মুখে একথা বলে, কিন্তু তার অন্তরে তা নেই!
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং আমি আল্লাহর রাসূল—যে কেউ এই সাক্ষ্য দেয়, সে জাহান্নামে প্রবেশ করবে না বা আগুন তাকে ভক্ষণ করবে না।"
(অন্য একটি বর্ণনায় এসেছে, যখন সালাত শেষ হলো,) তখন তাঁদের মধ্য থেকে একজন বলল: মালিক ইবনুদ্ দুখাইশিন কোথায়—অথবা ইবনুদ্ দুখশান? তখন তাদের কেউ কেউ বললেন: সে তো মুনাফিক, আল্লাহ ও তাঁর রাসূলকে ভালোবাসে না।
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এমন কথা বলো না। তুমি কি দেখো না যে, সে 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলেছে, আর এর দ্বারা সে আল্লাহর সন্তুষ্টিই কামনা করেছে?"
সে বলল: আল্লাহ ও তাঁর রাসূলই ভালো জানেন। আমরা তো দেখি তার মনোযোগ ও সহানুভূতি মুনাফিকদের দিকে।
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ জাহান্নামের জন্য সেই ব্যক্তিকে হারাম করে দিয়েছেন, যে আল্লাহর সন্তুষ্টি লাভের উদ্দেশ্যে 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলে।"