আল-জামি` আল-কামিল
1001 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لما قضى اللَّه الخلق، كتب في كتابه فهو عنده فوق العرش، إنّ رحمتي غلبتْ غضبي".
متفق عليه: رواه البخاريّ في بدء الخلق (3194)، ومسلم في التوبة (2751) كلاهما عن قتيبة بن سعيد، حدّثنا المغيرة بن عبد الرحمن القرشي، عن أبي الزِّناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন আল্লাহ তা'আলা সৃষ্টি সম্পন্ন করলেন, তিনি তাঁর কিতাবে লিপিবদ্ধ করলেন—যা তাঁর নিকট আরশের উপরে সংরক্ষিত আছে— 'নিশ্চয়ই আমার রহমত আমার ক্রোধের উপর প্রবল হয়েছে'।"
1002 - عن عمران بن حصين، قال: دخلتُ على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم (فذكر الحديث) وقال فيه: قالوا: إنّا جئناك نسألك عن هذا الأمر؟ قال:"كان اللَّه عز وجل ولم يكن شيء غيره، وكان عرشه على الماء، وكتب في الذِّكر كلّ شيء، وخلق السماوات والأرض".
صحيح: رواه البخاريّ في بدء الخلق (3191) عن عمر بن حفص بن غياث، حدّثنا أبي، حدّثنا الأعمش، حدّثنا جامع بن شدّاد، عن صفوان بن محرز، أنّه حدّثه عن عمران بن حُصين،
فذكر الحديث.
وذُكر الحديث كاملًا في الإيمان باللَّه"كان اللَّه ولم يكن قبله شيء، وكان عرشه على الماء".
ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গেলাম। (তারপর তিনি হাদীসটি বর্ণনা করলেন) এবং তাতে উল্লেখ করলেন যে, তারা (সাহাবীরা) বললো: আমরা আপনার কাছে এই বিষয়টি (সৃষ্টির সূচনা) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করতে এসেছি? তিনি বললেন: আল্লাহ আযযা ওয়া জাল ছিলেন, আর তিনি ব্যতীত অন্য কিছুই ছিল না। আর তাঁর আরশ ছিল পানির উপর। এবং তিনি যিকির (তাকদীর)-এ সবকিছু লিখে রাখলেন এবং আসমানসমূহ ও যমীন সৃষ্টি করলেন।
1003 - عن عبد اللَّه بن عمرو بن العاص، قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"كتب اللَّه مقادير الخلائق قبل أن يخلق السماوات والأرض بخمسين ألف سنة، قال: وكان عرشه على الماء".
صحيح: رواه مسلم في القدر (2653) عن أبي الطاهر أحمد بن عمرو بن عبد اللَّه بن عمرو بن سرْح، حدّثنا ابن وهب، أخبرني أبو هانئ الخولانيّ، عن أبي عبد الرحمن الحبُليّ، عن عبد اللَّه بن عمرو بن العاص، فذكره.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “আল্লাহ্ তাআলা আসমান ও যমীন সৃষ্টির পঞ্চাশ হাজার বছর পূর্বে সকল সৃষ্টির তাকদীর (ভাগ্যলিপি) লিখে রেখেছেন।” তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “আর তাঁর আরশ ছিল পানির উপরে।”
1004 - عن النّعمان بن بشير، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ اللَّه كتب كتابًا قبل أن يخلق السماوات والأرض بألفي عام، وأنزل منه آيتين ختم بهما سورة البقرة، ولا يقرآن في دار ثلاث ليالٍ فيقربها شيطان".
حسن: رواه الترمذيّ (2882) عن محمد بن بشّار، حدّثنا عبد الرحمن بن مهدي، حدّثنا حماد بن سلمة، عن أشعث بن عبد الرحمن الجرمي، عن أبي قلابة، عن أبي الأشعث الجرمي، عن النّعمان بن بشير، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم، فذكره.
وصحّحه ابن حبان (782)، والحاكم (1/ 562، 2/ 260) كلاهما من طريق حماد بن سلمة، بإسناده، مثله، إلا أنّ ابن حبان لم يذكر كتابة المقادير قبل خلق السماوات والأرض بألفي عام.
قال الحاكم في الموضع الأوّل:"صحيح الإسناد".
وقال في الموضع الثاني:"صحيح على شرط مسلم".
وفي الموضع الثاني وقع الوهم منه رحمه الله، فإنّ أشعث بن عبد الرحمن الجرمي ليس من رجال مسلم، وإنّما روى له أبو داود، والترمذيّ، والنّسائيّ، وهو"صدوق". كما قال الحافظ في التقريب.
وقال الترمذيّ:"حسن غريب".
قلت: وهو كما قال، فإنّ إسناده حسن من أجل أشعث بن عبد الرحمن الجرميّ.
ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا الإمام أحمد (18414)، والفريابيّ في القدر (88)، والدّارميّ في السنن (3430) وغيرهم.
ولكن رواه الطبرانيّ في الكبير (7146) من هذا الطريق وجعله من رواية أبي قلابة، عن أبي أسماء، عن شدّاد بن أوس، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فذكر مثله.
وهذا الحديث يخالف ما ثبت في صحيح مسلم:"بخمسين ألف سنة". ولا يمكن الجمع بينهما إلّا بتكلّف؛ ولذا قال البغويّ في"شرحه" (1201):"غريب".
وهو كما قال؛ فإن الذي في الصحيح هو الأصح.
নু'মান ইবনে বশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ আকাশসমূহ ও পৃথিবী সৃষ্টির দুই হাজার বছর পূর্বে একটি কিতাব লিপিবদ্ধ করেছেন। তিনি তা থেকে দুটি আয়াত নাযিল করেছেন, যা দ্বারা তিনি সূরা আল-বাকারাহ শেষ করেছেন। কোনো বাড়িতে তিন রাত ধরে সেই দুটি আয়াত পাঠ করা হলে, শয়তান তার কাছাকাছি আসতে পারে না।"
1005 - عن علي قال: كنّا في جنازة في بقيع الغرقد، فأتانا النّبيُّ صلى الله عليه وسلم فقعد، وقعدنا حوله ومعه مخصرة فنكّس فجعل ينكتُ بمخصرته، ثم قال:"ما منكم من أحد ما من نفس منفوسة إلّا كُتب مكانُها من الجنّة والنّار، وإلّا قد كُتبتْ شقية أو سعيدة". فقال رجل: يا رسول اللَّه أفلا نتكل على كتابنا وندع العمل، فَمَنْ كان منّا من أهل السّعادة فسيصير إلى عمل أهل السعادة، وأمّا مَنْ كان مِنّا من أهل الشّقاوة فسيصير إلى عمل أهل الشّقاوة؟ قال:"أما أهل السعادة فيُيَسَّرون لعمل السّعادة، وأمّا أهلُ الشّقاوة فيُيَسَّرون لعمل الشّقاوة". ثم قرأ: {فَأَمَّا مَنْ أَعْطَى وَاتَّقَى} الآية [سورة الليل: 5].
متفق عليه: رواه البخاريّ في الجنائز (1362)، ومسلم في القدر (2647) كلاهما من حديث جرير، عن منصور، عن سعد بن عبيدة، عن أبي عبد الرحمن، عن عليّ، فذكره، واللّفظ للبخاريّ، ولفظ مسلم نحوه.
وفي رواية عندهما:"اعملوا كلٌّ مُيسَّرٌ لما خُلق له".
وقوله:"مِخْصرة" أي عصا خفيفة.
وقوله:"نفس منفوسة" أي مولودة.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা বাকিউল গারকাদ নামক স্থানে একটি জানাযায় ছিলাম। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের কাছে এলেন এবং বসলেন। আমরাও তাঁকে ঘিরে বসলাম। তাঁর হাতে ছিল একটি লাঠি। তিনি মাথা নিচু করে লাঠিটি দিয়ে মাটিতে খোঁচা দিচ্ছিলেন। এরপর তিনি বললেন: "তোমাদের মধ্যে এমন কেউ নেই—এমন কোনো সৃষ্ট আত্মা নেই—যার স্থান জান্নাত বা জাহান্নামে নির্ধারিত হয়নি এবং যার ভাগ্য দুর্ভাগা বা সৌভাগ্যবান হিসেবে লিপিবদ্ধ হয়নি।" তখন এক ব্যক্তি বলল, "হে আল্লাহর রাসূল! আমরা কি তবে আমাদের লিখিত ভাগ্যের ওপর নির্ভর করে কাজ করা ছেড়ে দেব না? কারণ, আমাদের মধ্যে যে সৌভাগ্যবানদের অন্তর্ভুক্ত, সে তো সৌভাগ্যবানদের কাজই করবে। আর যে দুর্ভাগাদের অন্তর্ভুক্ত, সে তো দুর্ভাগাদের কাজই করবে?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "যারা সৌভাগ্যবান, তাদের জন্য সৌভাগ্যের কাজ সহজ করে দেওয়া হয়। আর যারা দুর্ভাগা, তাদের জন্য দুর্ভাগ্যের কাজ সহজ করে দেওয়া হয়।" এরপর তিনি তিলাওয়াত করলেন: "সুতরাং যে দান করে এবং আল্লাহকে ভয় করে..." (সূরা আল-লাইল, আয়াত ৫)।
1006 - عن عمران بن حُصين، قال: قال رجلٌ: يا رسول اللَّه: أيُعرف أهل الجنّة من أهل النّار؟ قال:"نعم". قال: فلِمَ يعمل العاملون؟ قال:"كلٌّ يعمل لما خُلق له، أو لما يُيَسَّرُ له".
متفق عليه: رواه البخاريّ في القدر (6596)، ومسلم في القدر (2649)، كلاهما من حديث شعبة، عن يزيد الرِّشك، قال: سمعت مطرّف بن عبد اللَّه بن الشّخِّير يحدِّثُ عن عمران بن حصين، فذكره، ولفظهما سواء.
وأمّا ما رواه البيهقيّ في القضاء والقدر (1/ 226) من طريق مؤمّل بن إسماعيل، حدّثنا سفيان بن عيينة، عن عمرو بن دينار، عن طلق بن حبيب، عن بشير بن كعب العدويّ، عن عمران بن حصين، قال: قام شابّان إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقالا: يا رسول اللَّه، أرأيتَ ما يعمل النّاسُ فيه، فيكدحون فيه في أمر قد جرتْ به المقادير، وجفّتْ به الأقلام، أم أمر يستأنفونه؟ فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"في أمر جرتْ به المقادير، وجفّتْ به الأقلام" فقالا: يا رسول اللَّه، ففيمَ العمل؟ فقال:"اعملوا فكلٌّ مُيسَّر لما خُلق له". فقالا: الآن نجدُّ العمل.
فالصّواب أنّه مرسل؛ لأنّ مؤمّل بن إسماعيل صدوق سيء الحفظ، وقد خالفه قتيبة بن سعيد
وهو إمام حافظ، فرواه من طريق بشير بن كعب العدويّ مرسلًا.
رواه الفريابي في"القدر" (101)، وابن بطّة في الإبانة (1358) من طريق قتيبة بن سعيد، عن سفيان، بإسناده.
ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক ব্যক্তি জিজ্ঞেস করল, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! জান্নাতীগণকে জাহান্নামীগণ থেকে চেনা যায় কি? তিনি বললেন, "হ্যাঁ।" লোকটি বলল, তাহলে আমলকারীরা কেন আমল করে? তিনি বললেন, "প্রত্যেক ব্যক্তি সে কাজের জন্যই আমল করে যার জন্য তাকে সৃষ্টি করা হয়েছে, অথবা যা তার জন্য সহজ করে দেওয়া হয়েছে।"
1007 - عن جابر بن عبد اللَّه، قال: جاء سراقة بن مالك بن جعشم، قال: يا رسول اللَّه، بيّن لنا ديننا كأنّا خُلقنا الآن، فيما العمل اليوم؟ أفيما جفَّتْ به الأقلام، وجرت به المقادير، أم فيما نستقبل؟ قال:"لا، بل فيما جفَّتْ به الأقلام، وجرتْ به المقادير". قال: ففيمَ العمل؟ - قال زهير: ثم تكلَّم أبو الزّبير بشيءٍ لم أفهمه، فسألتُ ما قال؟ فقال:"اعملوا فكلٌّ مُيسَّر".
صحيح: رواه مسلم في القدر (2648) من طرق عن زهير أبي خيثمة، عن أبي الزّبير، عن جابر، فذكره.
وفي رواية عنه:"كلّ عامل مُيسَّر لعمله".
والذي رواه ابن ماجه (91) عن هشام بن عمّار، قال: حدّثنا عطاء بن مسلم الخفّاف، قال: حدّثنا الأعمش، عن مجاهد، عن سراقة بن جُعشم، قال: قلت: يا رسول اللَّه، العمل فيما جفَّ به القلم، وجرتْ به المقادير، أم في أمر مستقبل؟ قال: بل فيما جفَّ به القلم، وجرتْ به المقادير، وكلٌّ ميسَّر لما خلق له". ففيه عطاء بن مسلم الخفاف ضعّفه غير واحد من أهل العلم، ومجاهد لم يسمع من سراقة، قاله البوصيريّ في"الزّوائد".
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সুরাকাহ ইবনু মালিক ইবনু জু'শুম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এলেন এবং বললেন, "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমাদের জন্য আমাদের দ্বীনকে এমনভাবে ব্যাখ্যা করে দিন যেন আমরা এইমাত্র সৃষ্টি হলাম। আজ আমরা কিসের ওপর আমল করব? যা (ইতিমধ্যে) কলম দ্বারা লিখিত হয়েছে এবং তাকদীর অনুযায়ী কার্যকর হয়েছে, নাকি যা আমরা ভবিষ্যতে করব (তার ভিত্তিতে)?" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "না, বরং যা কলম দ্বারা লিখিত হয়েছে এবং তাকদীর অনুযায়ী কার্যকর হয়েছে তার ভিত্তিতেই (আমল হবে)।" তিনি বললেন: "তাহলে আমল কিসের জন্য?" তিনি বললেন: "তোমরা আমল করতে থাকো, কেননা প্রত্যেকের জন্যই (তার কাজ) সহজ করে দেওয়া হয়েছে।"
1008 - عن أبي الأسود الدّيليّ، قال: قال لي عِمران بن الحصين: أرأيتَ ما يعمل النّاسُ اليوم ويكدحون فيه أشيء فضي عليهم ومضى عليهم منْ قَدَرِ ما سَبَقَ أو فيما يستقبلون به مما أتاهم به نبيُّهم وثَبتَتِ الحُجَّةُ عليهم؟ فقلت: بلْ شيءٌ قُضِيَ عليهم ومضى عليهم. قال: فقال: أفلا يكون ظُلْمًا؟ قال: ففزعتُ من ذلك فزعًا شديدًا، وقلتُ: كلّ شيءٍ خَلْقُ اللَّهِ ومِلْكُ يده فلا يُسألُ عمَّا يفعل وهم يُسْألون. فقال لي: يرحمك اللَّه، إنّي لَمْ أُرِدْ بما سألتك إلّا لأَحْزِر عَقْلَكَ. إنّ رجلين من مُزينة أتيا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقالا: يا رسول اللَّه، أرأيت ما يعمل النّاس اليوم ويكدحون فيه أشيء قضي عليهم ومضى فيهم من قدر قد سبق أو فيما يستقبلون به مما أتاهم به نبيهم وثبتت الحجة عليهم؟ فقال:"لا بلْ شيء قُضي عليهم ومضى فيهم"، وتصديق ذلك في كتاب اللَّه عز وجل: {وَنَفْسٍ وَمَا سَوَّاهَا (7) فَأَلْهَمَهَا فُجُورَهَا وَتَقْوَاهَا} [سورة الشمس: 7 - 8].
صحيح: رواه مسلمٌ في القدر (2650) عن إسحاق بن إبراهيم الحنظليّ، حدّثنا عثمان بن عمر،
حدّثنا عزْرة بن ثابت، عن يحيى بن عُقيل، عن يحيى بن يعمر، عن أبي الأسود الدِّيليّ، قال (فذكره).
আবূল আসওয়াদ আদ-দু'আলী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, ইমরান ইবন হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে বললেন: লোকেরা আজ যে কাজ করছে এবং তার জন্য কঠোর চেষ্টা করছে, তা কি এমন কিছু যা তাদের জন্য পূর্বেই নির্ধারণ করে দেওয়া হয়েছে এবং যা পূর্ব নির্ধারিত তাকদীরের অংশ হিসেবে তাদের উপর কার্যকর হয়ে গেছে, নাকি যা নিয়ে তাদের নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের কাছে এসেছেন এবং তাদের উপর প্রমাণ প্রতিষ্ঠা করেছেন, তা মেনে নিয়ে তারা ভবিষ্যতে কাজ করবে?
আমি বললাম: বরং এটা এমন কিছু যা তাদের জন্য পূর্বেই নির্ধারণ করা হয়েছে এবং তা তাদের উপর কার্যকর হয়ে গেছে।
তিনি (ইমরান ইবন হুসাইন) বললেন: তাহলে কি এটা যুলুম (অন্যায়) হবে না?
আবূল আসওয়াদ বলেন: আমি এতে ভীষণভাবে আতঙ্কিত হলাম এবং বললাম: সবকিছুই আল্লাহর সৃষ্টি এবং তাঁর মালিকানাধীন। তিনি যা করেন সে বিষয়ে তাঁকে প্রশ্ন করা যায় না, বরং তাদেরকেই প্রশ্ন করা হবে।
তখন তিনি আমাকে বললেন: আল্লাহ তোমাকে রহম করুন! আমি তোমাকে যে প্রশ্ন করেছি তার উদ্দেশ্য কেবল তোমার জ্ঞান পরীক্ষা করা ছিল। মুযাইনা গোত্রের দু'জন লোক রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বলেছিল: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! লোকেরা আজ যে কাজ করছে এবং তার জন্য কঠোর চেষ্টা করছে, তা কি এমন কিছু যা তাদের জন্য পূর্বেই নির্ধারণ করে দেওয়া হয়েছে এবং যা পূর্ব নির্ধারিত তাকদীরের অংশ হিসেবে তাদের উপর কার্যকর হয়ে গেছে, নাকি যা নিয়ে তাদের নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের কাছে এসেছেন এবং তাদের উপর প্রমাণ প্রতিষ্ঠা করেছেন, তা মেনে নিয়ে তারা ভবিষ্যতে কাজ করবে?
তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "না, বরং এটা এমন কিছু যা তাদের জন্য পূর্বেই নির্ধারণ করা হয়েছে এবং তা তাদের উপর কার্যকর হয়ে গেছে।" আর এর সত্যতা আল্লাহ্ আযযা ওয়া জাল্লার কিতাবে রয়েছে: "শপথ নফসের এবং তার সুঠামকারী সত্তার (৭) অতঃপর তাকে তার মন্দ ও ভালো সম্পর্কে ইলহাম (জ্ঞান) দান করেছেন। [সূরা আশ-শামস: ৭-৮]।"
1009 - عن وعن أبي الدّرداء، قال: قالوا: يا رسول اللَّه، أرأيتَ ما نعملُ، أمرٌ قد فُرغ منه، أم شيءٌ نسْتأنفه؟ قال:"بل أمر قد فُرِغ منه". قالوا: فكيف بالعمل يا رسول اللَّه؟ قال:"كلُّ امرئ مهيَّأٌ لما خُلق له".
حسن: رواه الإمام أحمد (27487) عن هيثم، -قال عبد اللَّه بن الإمام أحمد: وسمعته أنا من هيثم-، قال: أخبرنا أبو الرّبيع، عن يونس، عن أبي إدريس، عن أبي الدّرداء، فذكره.
وهيثم هو ابن خارجة صدوق، وقد تُوبع أيضًا.
وأبو الرّبيع هو سليمان بن عتبة الدّمشقيّ، مختلف فيه، فقال الإمام أحمد: لا أعرفه، وقال يحيى بن معين: لا شيء.
ووثّقه دُحيم، وقال أبو حاتم: ليس به بأس، وهو محمود عند الدّمشقيين. وكان الهيثم بن خارجة، وهشام بن عمّار يوثقانه، وذكره ابن حبان في"الثقات" فهو لا ينزل عن درجة"صدوق"، وكذا قال فيه الحافظ أيضًا وزاد:"له غرائب".
وأخرجه الفريابيّ في القدر (38)، والبزّار -كشف الأستار (2138) -، والحاكم (2/ 462)، والبيهقيّ في القضاء والقدر (1/ 231) كلّهم من حديث سليمان بن عبد الرحمن الدّمشقيّ، عن أبي الرّبيع، به، وهذا لفظ الفريابيّ:
عن أبي الدّرداء، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أنّه قيل له: أرأيتَ ما نعملُ أشيءٌ قد فُرغ منه، أم شيء نستأنفه، قال:"كلُّ امرئٍ مهيَّأ لما خلقَ له". ثم أقبل يونس علي سعيد بن عبد العزيز، فقال له: إنّ تصديق هذا الحديث في كتاب اللَّه عز وجل، فقال له سعيد: أَبِنْ لي يا حلبس، قال: أما تسمع اللَّه عز وجل يقول في كتابه: {وَاعْلَمُوا أَنَّ فِيكُمْ رَسُولَ اللَّهِ لَوْ يُطِيعُكُمْ فِي كَثِيرٍ مِنَ الْأَمْرِ لَعَنِتُّمْ وَلَكِنَّ اللَّهَ حَبَّبَ إِلَيْكُمُ الْإِيمَانَ وَزَيَّنَهُ فِي قُلُوبِكُمْ وَكَرَّهَ إِلَيْكُمُ الْكُفْرَ وَالْفُسُوقَ وَالْعِصْيَانَ أُولَئِكَ هُمُ الرَّاشِدُونَ (7) فَضْلًا مِنَ اللَّهِ وَنِعْمَةً. . .} [سورة الحجرات: 7 - 8] أرأيتَ يا سعيد، لو أنّ هؤلاء أهملوا كما يقول الأخابث، أين كانوا يذهبون حيث حبّب إليهم وزيّن لهم، أم حيث كُرِّه إليهم وبُغض إليهم". ولفظهما مختصر.
قال البزّار:"إسناده حسن". وقال الحاكم:"صحيح الإسناد". وتعقبه الذّهبيّ فقال:"بل قال ابن معين: سليمان بن عتبة لا شيء". قلت: وقد وثّقه غيره.
ورواه ابن أبي عاصم في"السنة" (246) عن هشام بن عمّار، ثنا سليمان بن عنبة، بإسناده، ولفظه:"إنّ العبد لا يبلغ حقيقة الإيمان حتى يعلم أنّ ما أصابه لم يكن ليخطئه، وما أخطأه لم يكن ليصيبه".
ورواه أيضًا أحمد (27490) عن هيثم، قال: حدّثنا أبو الربيع بإسناده، مثله.
আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁরা (সাহাবীগণ) বললেন, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমরা যে আমল করি, এ সম্পর্কে আপনার কী অভিমত? এটা কি এমন কোনো বিষয় যা চূড়ান্ত হয়ে গেছে, নাকি এমন কিছু যা আমরা নতুন করে শুরু করছি? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “বরং এটা এমন বিষয় যা চূড়ান্ত হয়ে গেছে।” তাঁরা বললেন, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! তাহলে আমলের কী হবে? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “প্রত্যেক ব্যক্তিকে সে জন্য প্রস্তুত করা হয়েছে যার জন্য তাকে সৃষ্টি করা হয়েছে।”
1010 - عن عمر أنّه سأل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم مرجعه من بدر، فقال:"أنعمل لأمر قد فُرغ منه أم لأمر نأتنفُه؟ فقال:"لأمر قد فُرغ منه". قال: ففيمَ العمل إذا؟ فقال رسول اللَّه
-صلى الله عليه وسلم:"كلٌّ مُيسَّرٌ لما كُتب له وعليه".
حسن: رواه ابن وهب في القدر (19)، وعنه ابنُ بطّة في الإبانة (1353) عن أسامة بن زيد، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدّه، أنّ عمر بن الخطّاب سأل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فذكره.
وإسناده حسن من أجل أسامة بن زيد -وهو الليثيّ- مختلف فيه غير أنّه حسن الحديث، وقد أخرج له مسلم.
وللحديث طرق غير أنّ ما ذكرته هو أصحُّها، وقد يأتي بعض طرقه مع بيان تعليلها. ومن هذه الطّرق ما رواه الترمذيّ من وجهين - الوجه الأوّل (2135): من طريق شعبة، عن عاصم بن عبيد اللَّه، عن سالم بن عبد اللَّه، يحدِّث عن أبيه، قال: قال عمر: يا رسول اللَّه، أرأيتَ ما نعمل فيه أمر مبتدع أو مبتدأ، أو فيما قد فُرغ منه؟ فقال:"فيما قد فُرغ منه يا ابن الخطّاب، وكلٌّ ميَسَّر، أمّا من كان من أهل السّعادة فإنّه يعمل للسّعادة، وأمّا من كان من أهل الشّقاء فإنّه يعمل للشّقاء".
ومن هذا الوجه رواه أيضًا الإمام أحمد (196)، والبزّار (121).
وعاصم بن عبد اللَّه أهل العلم مطبقون على تضعيفه.
وأما قول الترمذيّ:"حسن صحيح" فهو تساهل منه، أو لعلّه يقصد به الحديث لا الإسناد.
والوجه الثاني هو ما رواه أيضًا الترمذيّ (3111) من طريق سليمان بن سفيان، عن عبد اللَّه بن دينار، عن ابن عمر، عن عمر بن الخطّاب، قال: لما نزلتْ هذه الآية: {فَمِنْهُمْ شَقِيٌّ وَسَعِيدٌ} [سورة هود: 105] سألتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقلت: يا نبي اللَّه، فعلى ما نعمل؟ على شيء قد فُرغ منه، أو على شيء لم يفرغ منه؟ قال:"بل على شيء قد فُرغ منه، وجرتْ به الأقلام يا عمر، ولكن كلٌّ مُيسَّرٌ لما خُلق له".
ومن هذا الطّريق رواه أيضًا ابن أبي عاصم في السنة (170).
وسليمان بن سفيان هو التيميّ مولاهم أبو سفيان المدني"ضعيف".
উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বদরের যুদ্ধ থেকে ফেরার পথে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞেস করলেন: আমরা কি এমন কোনো কাজের জন্য আমল করি যা ইতিমধ্যে স্থির হয়ে গেছে, নাকি এমন কোনো কাজের জন্য যা আমরা নতুনভাবে শুরু করছি? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এমন কাজের জন্য যা ইতিমধ্যে স্থির হয়ে গেছে।" তিনি বললেন: তাহলে আমলের প্রয়োজন কী? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "প্রত্যেকেই সেই কাজের জন্য সহজসাধ্য করা হয়েছে যা তার জন্য বা তার উপর লিখে দেওয়া হয়েছে।"
1011 - عن ذي اللّحية الكلابيّ أنّه قال: يا رسول اللَّه، أنعملُ في أمرٍ مستأنف، أو أمر قد فُرغ منه؟ قال:"لا بل في أمر قد فُرغ منه". قال: ففيمَ نعمل؟ قال:"اعملوا فكلٌّ مُيسَّرٌ لما خُلق له".
حسن: رواه عبد اللَّه بن أحمد في مسند أبيه (16630) عن يحيى بن معين، قال: حدّثنا أبو عبيدة -يعني الحداد-، قال: حدّثنا عبد العزيز بن مسلم، عن يزيد بن أبي منصور، عن ذي اللّحية الكلابي، فذكره.
ومن هذا الطّريق رواه الطّبرانيّ في"الكبير" (4236).
قال الهيثميّ في"المجمع" (7/ 194):"رواه ابن أحمد، والطبرانيّ، ورجاله ثقات".
قلت: وهو كما قال، غير أن يزيد بن أبي منصور ليس في مرتبة الثقة، وإنّما هو صدوق، قال فيه أبو حاتم: ليس به بأس، وقال الذّهبيّ: صدوق، وذكره ابن حبان في الثقات (5/ 548)، واعتمد الحافظ قول أبي حاتم فقال:"لا بأس به".
وللحديث إسناد آخر يدور عليه.
رواه عبد اللَّه بن أحمد في مسند أبيه (16631) من وجه آخر قال: حدّثنا أبو عبد اللَّه البصريّ، حدّثنا سهل بن أسلم العدويّ، قال: حدّثنا يزيد بن أبي منصور، بإسناده، مثله.
إلّا أنّ شيخه ابا عبد اللَّه البصريّ مولى ابن سمرة واسمه: ميمون، وقيل اسم أبيه: أستاذ، ضعّفه أهلُ العلم، وأطلق عليه الحافظ لفظ"ضعيف". ولكنّه توبع في الإسناد الأوّل.
وفي الباب عن أبي بكر الصّديق، قال: قلت: يا رسول اللَّه، أنعملُ على ما قد فُرغ منه، أم على أمر مؤتنف؟ قال:"بل على أمر قد فُرغ منه". قلت: ففيمَ العمل يا رسول اللَّه؟ قال:"كلٌّ مُيسَّرٌ لما خلق له".
رواه الإمام أحمد (19)، والبزّار -كشف الأستار (2136) -، والطبرانيّ في"الكبير" (47)، والبيهقيّ في القضاء والقدر (2/ 727) كلّهم من طريق العُطّاف بن خالد، عن طلحة بن عبد اللَّه بن عبد الرحمن بن أبي بكر، عن أبيه، عن جدّه، أنّه سمع أبا بكر الصّدِّيق يقول (فذكر الحديث).
إلّا أنّ أحمد جعل بين العُطّاف بن خالد وبين طلحة بن عبد اللَّه"رجلًا من أهل البصرة".
والعُطّاف بن خالد مختلف فيه، فضعّفه النسائيُّ وابنُ حبان، ومشَّاه الآخرون، منهم: أحمد، وابنه عبد اللَّه، وابن معين، وأبو زرعة، وأبو داود، وغيرهم، فهو حسن الحديث.
ولكن شيخه طلحة بن عبد اللَّه لم يوثقه أحد، وإنّما ذكره ابنُ حبان في"الثقات" (4/ 392) وقال:"روى عنه عثمان بن أبي سليمان، وابنه محمد بن طلحة. ولذا قال فيه الحافظ:"مقبول". أي إذا توبع وإلّا فليّن الحديث.
وأمّا الهيثميّ فاعتمد على توثيق ابن حبان، فقال في"مجمعه" (7/ 194):"رواه أحمد، والبزّار، والطّبرانيّ وقال: عن عُطّاف بن خالد، حدّثني طلحة بن عبد اللَّه. وعُطّاف وثّقه ابن معين وجماعة، وفيه ضعف، وبقية رجاله ثقات إلّا أنّ في رجال أحمد رجلًا مبهمًا لم يُسمَّ" انتهى.
وقال البيهقيّ:"ورُوي عن عبد الرحمن بن سابط، عن أبي بكر الصّديق من قوله في معناه".
وفي الباب أيضًا عن ابن عباس، قال: قال رجل: يا رسول اللَّه، أنعمل فيما جرتْ به المقادير، وجفَّ القلم، أو شيء نأتنفه؟ قال:"بل لما جرتْ به المقادير وجفّ به القلم". قال: ففيمَ العمل؟ قال:"اعمل، فكلٌّ مُيَسَّرٌ".
رواه الطّبرانيّ في"الكبير" (1089) عن عبدان بن أحمد، ثنا محمد بن عبد اللَّه بن عبيد بن عقيل، ثنا إبراهيم بن سليمان الدبَّاس، ثنا يحيى بن سعيد الأنصاريّ، عن عمرو بن دينار، عن
طاوس، عن ابن عباس، فذكره.
وإسناده ضعيف من أجل إبراهيم بن سليمان الدّبّاس وهو بصريٌّ، ذكره ابنُ حبان في الثقات (8/ 69).
ويقال له أيضًا إبراهيم بن سليمان الزيات، ذكره أيضًا ابن حبان في"الثقات" (8/ 65) وقال:"من أهل الكوفة، سكن البصرة، روى عنه إبراهيم بن راشد الآدميّ، وأهل العراق". هكذا فرّق بينهما ابن حبان، فإن كان هو إبراهيم بن سليمان الزّيّات، فقد تكلّم فيه ابن عدي في"الكامل" (1/ 264) فقال:"ليس بالقوي". وترجمة الحافظ في اللسان (1/ 65).
وفي الإسناد رجال لا أعرفهم.
ورواه البزّار -كشف الأستار (2139) - من وجه آخر عن المعتمر بن سليمان، عن أبيه، قال: كتب ليث إلى سليمان بن طرخان: حدّثني حبيب بن أبي ثابت، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، نحوه. إلّا أنّه قال في آخره:"فقال القومُ بعضهم لبعض: فالجِدُّ إذًا".
قال البزّار: لا نعلم رواه عن حبيب إلّا ليث، ولا عنه إلّا سليمان. وأمّا قول الهيثميّ في"المجمع" (7/ 195):"رواه الطبرانيّ، والبزّار بنحوه، إلّا أنّه قال في آخره:"فقال القوم بعضهم لبعض: فالجدّ إذا". ورجال الطّبرانيّ ثقات، تبعًا لابن حبان.
যুল-লিহইয়া আল-কিলাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমরা কি নতুন কোনো কাজের জন্য চেষ্টা করব, নাকি সেই কাজের জন্য যা ইতোমধ্যে স্থির হয়ে গেছে? তিনি বললেন: “না, বরং সেই কাজের জন্য যা স্থির হয়ে গেছে।” তিনি বললেন, তাহলে আমরা কেন কাজ করব? তিনি বললেন: “তোমরা কাজ করতে থাকো, কারণ প্রত্যেকেই সেই কাজের জন্য সহজ করে দেওয়া হয়েছে যার জন্য তাকে সৃষ্টি করা হয়েছে।”
1012 - عن أمِّ حبيبة زوج النّبيّ صلى الله عليه وسلم قالت: اللهمّ أمتعني بزوجي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، وبأبي أبي سفيان، وبأخي معاوية. فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"قد سألتِ اللَّه لآجال مضروبة، وأيام معدودة، وأرزاق مقسومة. لن يُعجّل شيئًا قبل حلِّه، أو يؤخّر شيئًا عن حِلّه. ولو كنتِ سألتِ اللَّه أن يُعيذكِ من عذاب النّار، أو عذاب القبر كان خيرًا وأفضل".
وفي رواية:"وآثار موطوءة" بدلًا من"أيام معدودة".
فقال رجل: يا رسول اللَّه، القردة والخنازير هي مما مُسِخ؟ فقال النّبيّ صلى الله عليه وسلم:"إنّ اللَّه عز وجل لم يُهلك قومًا أو يعذِّب قومًا، فيجعل لهم نسلًا، وإنّ القردة والخنازير كانوا قبل ذلك".
صحيح: رواه مسلم في القدر (2663) من طرق عن وكيع، عن مسعر، عن علقمة بن مرثد، عن المغيرة بن عبد اللَّه اليشكريّ، عن المعرور بن سويد، عن عبد اللَّه، قال: قالت أمّ حبيبة، فذكرته.
والرّواية الثانية عنده أيضًا من وجه آخر عن الثوريّ، عن علقمة بن مرثد بإسناده مثله إلّا قوله:"وآثار موطوءة".
উম্মে হাবীবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী। তিনি বললেন, হে আল্লাহ! আমাকে আমার স্বামী আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে, আমার পিতা আবূ সুফিয়ানের সাথে এবং আমার ভাই মু‘আবিয়ার সাথে (দীর্ঘকাল) উপকৃত করো। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: ‘তুমি আল্লাহর কাছে এমন আয়ুষ্কাল চেয়েছো যা সুনির্ধারিত, এমন দিনসমূহ চেয়েছো যা গণনা করা হয়েছে এবং এমন রিযিক চেয়েছো যা বণ্টন করা হয়েছে। কোনো কিছুই তার নির্দিষ্ট সময়ের পূর্বে দ্রুত আসবে না এবং কোনো কিছুই তার নির্ধারিত সময় থেকে বিলম্বিত হবে না। যদি তুমি আল্লাহর কাছে জাহান্নামের আযাব অথবা কবরের আযাব থেকে আশ্রয় চাইতে, তবে তা তোমার জন্য উত্তম ও শ্রেষ্ঠ হতো।’
অন্য এক বর্ণনায় ‘নির্দিষ্ট দিনসমূহ’-এর স্থলে ‘যা পদদলিত হয়েছে তার চিহ্নসমূহ’ কথাটি উল্লেখ রয়েছে।
তখন এক ব্যক্তি বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! বানর ও শুকর কি সেইসব প্রাণী যাদেরকে রূপ পরিবর্তন করা হয়েছে (বিকৃত করা হয়েছে)? তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: ‘নিশ্চয়ই আল্লাহ তা‘আলা যখন কোনো কওমকে ধ্বংস করেন বা শাস্তি দেন, তখন তাদের জন্য কোনো বংশধর রাখেন না। আর বানর ও শুকর তো তারও পূর্বে থেকেই বিদ্যমান ছিল।’
1013 - عن جابر، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أيُّها النّاس اتّقوا اللَّه، وأجملوا في الطّلب، فإنّ نفسًا لن تموت حتى تستوفي رزقها، وإن أبطأ عنها. فاتقوا اللَّه، وأجملوا في الطلب، خذوا ما حلّ، ودعوا ما حُرِّمَ".
حسن: رواه ابن ماجه (2144) عن محمد بن المصفّي الحمصيّ، قال: حدّثنا الوليد بن مسلم، عن ابن جريج، عن أبي الزبير، عن جابر بن عبد اللَّه، فذكره.
وفي الإسناد الوليد بن مسلم وشيخه ابن جريج، وشيخه أبو الزبير كلّهم مدلِّسون وقد عنعنوا.
ومن هذا الوجه رواه ابن أبي عاصم في السنة (420)، ولكن باللّفظ الذي بعده.
وللحديث طريق آخر أجود منه، والعمدة عليه، وهو ما رواه ابن حبان (3239، 3241)، والحاكم (2/ 4)، والبيهقيّ (5/ 264) كلّهم من وجه آخر عن عبد اللَّه بن وهب، أخبرني عمرو بن الحارث، عن سعيد بن أبي هلال، عن محمد بن المنكدر، عن جابر بن عبد اللَّه مرفوعًا:"لا تستبطئوا الرِّزقَ، فإنّه لن يموت العبد حتى يبلغه آخر رزق هو له، فأجْملوا في الطّلب، أخذ الحلال، وترك الحرام".
قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".
قلت: وهو كذلك مع اختلاف في سعيد بن أبي هلال غير أنه حسن الحديث، وثقه ابن سعد، والعجلي، وابن خزيمة، والدارقطني وغيرهم. إلّا أنه روي عن أحمد أنه اختلط.
وأمّا ما رُوي عن جابر مرفوعًا:"لو أنّ ابن آدم هرب من رزقه كما يهرب من الموت لأدركه رزقُه كما يدركه الموت". فهو ضعيف.
رواه أبو نعيم في الحلية (7/ 90) عن سليمان بن أحمد، ثنا يحيى بن عبد الباقي، ثنا المسيب بن واضح، ثنا يوسف بن أسباط، ثنا سفيان الثوري، عن محمد بن المنكدر، عن جابر، فذكر مثله.
قال أبو نعيم:"تفرّد به عن الثوريّ يوسفُ بنُ أسباط". انتهى.
قلت: يوسف بن أسباط هو ابن واصل أبو محمد الشّيبانيّ، قال البخاريّ:"دفن كتبه، وكان لا يجيء حديثه بعدُ كما ينبغي". وقال ابن عدي:"يوسف عندي من أهل الصّدق، إلّا أنه عدم كتبه كان يحمل على حفظه، فيغلط، ويشبَّه عليه لا أنّه يتعمّد الكذب".
والرّاوي عنه المسيب بن واضح السّلميّ الحمصيّ، قال فيه أبو حاتم:"صدوق يخطئ كثيرًا، فإذا قيل له لم يقبل". وقال الدارقطني:"ضعيف". وضعّفه في أماكن من سننه. انظر:"الميزان" (4/ 116).
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হে লোক সকল! তোমরা আল্লাহকে ভয় করো এবং উপার্জনের ক্ষেত্রে উত্তম পন্থা অবলম্বন করো। কেননা, কোনো প্রাণী তার সম্পূর্ণ রিযিক (জীবিকা) গ্রহণ না করা পর্যন্ত মৃত্যুবরণ করবে না, যদিও তা বিলম্বিত হয়। অতএব, তোমরা আল্লাহকে ভয় করো এবং উপার্জনের ক্ষেত্রে উত্তম পন্থা অবলম্বন করো। যা হালাল, তা গ্রহণ করো এবং যা হারাম, তা বর্জন করো।"
1014 - عن أبي حميد السّاعديّ، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"أجملوا في طلب الدّنيا، فإنّ كلًّا مُيَسَّرٌ لما كُتب له منها".
صحيح: رواه الحاكم (2/ 3) -وعنه البيهقيّ (5/ 264) - من حديث عبد اللَّه بن وهب، أخبرنا سليمان بن بلال، قال: حدّثني ربيعة بن أبي عبد الرحمن، عن عبد الملك بن سعيد بن سويد، عن أبي حميد الساعديّ، فذكره.
ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا البيهقيّ في كتاب القضاء والقدر (2/ 460 - 461). وإسناده صحيح.
وصحّحه الحاكم وقال:"على شرط الشيخين".
وعبد الملك بن سعيد لم يخرِّج له البخاريّ، وإنّما أخرج له مسلم فقط، فهو على شرط مسلم.
ورواه ابن ماجه (2142)، وابن أبي عاصم في"السنة" (418) كلاهما عن هشام بن عمّار، قال: حدّثنا إسماعيل بن عياش، عن عمارة بن غزية، عن ربيعة بن أبي عبد الرحمن، بإسناده، مثله.
وإسماعيل بن عياش يضعّف في روايته عن غير الشّاميين، وهذا منها؛ لأنّ عمارة بن غزية مدني، فالظّاهر أنه لم يخطئُ في هذه الرّواية، ولمتابعته له في الإسناد الأوّل.
আবূ হুমাইদ আস-সা'ইদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা দুনিয়ার সন্ধানে উত্তম পন্থা অবলম্বন করো (বা, মধ্যমপন্থা অবলম্বন করো), কেননা যা তার জন্য লিখে রাখা হয়েছে, তা প্রত্যেকের জন্যই সহজসাধ্য করে দেওয়া হয়েছে।"
1015 - عن وعن أبي هريرة، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا يُعدي شيءٌ شيئًا، لا يعدي شيءٌ شيئًا" ثلاثًا. قال: فقام أعرابيٌّ فقال: يا رسول اللَّه، إنّ النُّقْبةَ تكون بمشْفر البعير، أو بعَجْبه فتشْتملُ الإبلَ جَرَبًا، قال: فسكتَ ساعةً، ثم قال:"ما أعدى الأوّلَ؟ لا عدْوى، ولا صَفَر، ولا هامَةَ. خلق اللَّه كلَّ نفس، فكتب حياتَها، وموتَها، ومُصيباتها، ورزْقها".
صحيح: رواه الإمام أحمد (8343) عن هاشم، حدّثنا محمد بن طلحة، عن ابن شُبْرمة، عن أبي زرعة بن عمرو بن جرير، عن أبي هريرة، فذكره.
ورواه أبو يعلى (6112)، والفريابي في القدر (214)، وصحّحه ابن حبان (6119) كلّهم من طريق عبد اللَّه بن شبرمة، بإسناده، نحوه.
وعبد اللَّه بن شبرمة أبو شبرمة الكوفيّ القاضيّ، فقيه أهل الكوفة، عداده في التابعين، ثقة من رجال مسلم وغيره، روي عن أبي زرعة بن عمرو وغيره، وعنه محمد بن طلحة بن مصرف وغيره.
والذي في"السنة" (419) لابن أبي عاصم من طريق الوليد بن مسلم، عن رجل من آل شبرمة، عن أبيه، عن أبي زرعة، بإسناده.
أخشى أن يكون فيه خطأ في قوله"عن أبيه" إن كان الرجل من آل شبرمة هو عبد اللَّه بن شبرمة فإنّ الحديث لعبد اللَّه بن شبرمة، وليس لولده.
وللحديث إسناد آخر رواه الترمذيّ (2143) من طريق عمارة بن القعقاع، حدّثنا أبو زرعة بن عمرو بن جرير، قال: حدّثنا صاحب لنا، عن ابن مسعود، قال: قام فينا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقال. . . فذكره.
ومن هذا الوجه رواه أيضًا الإمام أحمد (4198) فالذي يظهر أن أبا زرعة كان يروي هذا الحديث من وجهين: مرّة عن أبي هريرة، وأخرى عن أبي هريرة، عن ابن مسعود؛ لأنّ المبهم في هذا الإسناد هو أبو هريرة بدون شكّ.
والحديث صحيح من كلا الوجهين.
قوله:"النُّقبة" هي أوّل شيء يظهر من الجرب.
وقوله:"بمِشْفر" المِشْفر: هو للبعير كالشّفة للإنسان.
وقوله:"بعَجْبه" العجب: أصلُ الذّنب.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কোনো কিছু অন্য কিছুকে রোগাক্রান্ত করে না, কোনো কিছু অন্য কিছুকে রোগাক্রান্ত করে না,"—এই কথাটি তিনি তিনবার বললেন। বর্ণনাকারী বলেন: তখন একজন বেদুঈন (আরব) উঠে দাঁড়াল এবং বলল: হে আল্লাহর রাসূল, উটের ঠোঁটে বা তার লেজের গোড়ায় সামান্য ঘায়ের মতো কিছু দেখা যায়, যা পরে পুরো উটপালকে খোস-পাঁচড়া (চর্মরোগ) দ্বারা আক্রান্ত করে ফেলে। বর্ণনাকারী বলেন: তখন তিনি কিছুক্ষণ নীরব রইলেন, এরপর বললেন: "প্রথমটিকে (রোগটি) কে সংক্রমিত করেছিল? কোনো সংক্রামক রোগ নেই, 'সাফার' (মাসের কুলক্ষণ বা পেটের রোগ) নেই, এবং কোনো 'হামাহ' (অশুভ প্রেতাত্মা বা পাখি) নেই। আল্লাহ তা'আলা প্রত্যেকটি আত্মা সৃষ্টি করেছেন এবং তার হায়াত, মউত, বিপদাপদ ও রিযিক লিপিবদ্ধ করে রেখেছেন।"
1016 - عن أبي الدّرداء، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"فرغ اللَّه إلى كلّ عبد من خمس: من رزقه، وأجله، وعمله، وأثره، ومضجعه".
حسن: رواه ابن حبان في صحيحه (6150) عن الحسين بن عبد اللَّه القطّان بالرّقة، قال: حدّثنا هشام بن عمّار، قال: حدّثنا الوزير بن صبيح، قال: حدّثنا يونس بن ميسرة بن حلبس، عن أمّ الدّرداء، عن أبي الدّرداء، فذكره.
وإسناده حسن من أجل الوزير بن صبيح فإنّه حسن الحديث قال أبو حاتم"صالح الحديث"، وذكره ابن حبان في"الثقات"، وأخرج حديثه في صحيحه، وقد تُوبع.
رواه الإمام أحمد (21722)، والطّبراني في"الأوسط" (3144)، وابن أبي عاصم في السنة (304 - 306، 308) كلّهم من طرق عن خالد بن يزيد، عن يونس بن ميسرة، به، مثله.
وخالد بن يزيد هو ابن صالح بن صبيح، ثقة، إلّا أنّ الرّاوي عنه عند الإمام أحمد الفرج بن فضالة وهو ضعيف، ولكنه توبع.
ورواه الإمام أحمد (21723) من طريق آخر عن زيد بن يحيى الدّمشقيّ، حدّثنا خالد بن صبيح المريّ قاضي البلقاء، حدّثنا إسماعيل بن عبيد اللَّه، أنّه سمع أمّ الدّرداء تحدِّث عن أبي الدّرداء، فذكر الحديث مرفوعًا، ولفظه:"فرغ اللَّه إلى كلّ عبد من خمس: من أجله، ورزقه، وأثره، وشقي أم سعيد".
هذا إسناد صحيح، إسماعيل بن عبيد اللَّه هو ابن أبي المهاجر، واسمه أقرم القرشيّ المخزوميّ مولاهم، ثقة من رجال الشيخين.
ورواه البزار -كشف الأستار (2152) - من وجه آخر عن عبد اللَّه بن أحمد، ثنا صفوان بن صالح، ثنا العوّام بن صبيح، ثنا يونس بن ميسرة، عن أمّ الدّرداء، عن أبي الدّرداء مرفوعًا، ولفظه:"فرغ اللَّه إلى كلّ عبد من اجله، ورزقه، ومضجعه، وأثره".
قال البزّار:"روي عن أبي الدرداء من غير وجه، وهذا أحسنها".
وقال الهيثميّ في"المجمع" (7/ 195):"رواه أحمد، والبزّار، والطّبرانيّ في الكبير والأوسط، وأحد إسنادي أحمد رجاله ثقات".
আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহ তাআলা প্রত্যেক বান্দার জন্য পাঁচটি বিষয় স্থির করে দিয়েছেন: তার রিযিক, তার আয়ুষ্কাল, তার আমল, তার কর্মফল এবং তার শয়নস্থল।"
1017 - عن ابن عمر، قال: كنّا مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فرأى تمرة عائرةً فأعطاها سائلًا، وقال:"لو لم تأتها لأتتك".
حسن: رواه ابن أبي عاصم في"السنة" (265) عن شيبان بن فرّوخ، ثنا أبو عوانة، عن الأعمش، عن أبي قيس عبد الرحمن بن ثروان، عن هُزيل بن شرحبيل، عن ابن عمر، فذكره.
ومن هذا الوجه أخرجه البيهقيّ في القضاء والقدر (2/ 470).
وصحّحه ابن حبان (3240).
وإسناده حسن من أجل شيبان بن فرّوخ فإنّه"صدوق". روى له مسلمٌ وأصحاب السنن.
وكذلك في الإسناد أبو قيس عبد الرحمن بن ثروان الأوديّ، تكلّم فيه أبو حاتم غير أنه حسن الحديث، روى له البخاري وغيره من أصحاب السنن.
وفي الباب عن عمر بن الخطّاب أنّه خطب بالشّام خطبة يأثرها عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"وأجملوا في طلب الدّنيا، فإنّ اللَّه قد تكفّل بأرزاقكم، وكلٌّ ميسَّر له عمله الذي كان عاملًا، استعينوا باللَّه على أعمالكم فإنّه {يَمْحُو اللَّهُ مَا يَشَاءُ وَيُثْبِتُ وَعِنْدَهُ أُمُّ الْكِتَابِ} [سورة الرعد: 39]".
رواه البيهقيّ في"القضاء والقدر" (2/ 459) من حديث ابن وهب، قال: أخبرني سعيد بن عبد الرحمن بن أبي العمياء، عن السّائب بن مهجان -من أهل الشّام، وكان قد أدرك أصحاب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أنّ عمر بن الخطاب خطب، فذكره.
وسعيد بن عبد الرحمن بن أبي العمياء لم يوثقه أحد، وإنّما ذكره ابن حبان في"الثقات" (6/ 354) وقال:"روى عنه ابن وهب".
قلت: إذا هو"مجهول". وأمّا شيخه السّائب بن مهجان فلم أعرف من هو؟ ! .
وعن أبي سعيد مرفوعًا:"لو أنّ أحدكم فرَّ من رزقه لأدركهـ كما يدركه الموت".
رواه ابن عدي في"الكامل" (6/ 2045) عن أحمد بن محمد بن عبد الخالق، ثنا الحسين بن علي الصُّدائيّ، قال: حدّثني أبي، ثنا فُضيل بن مرزوق، عن عطيّة، عن أبي سعيد، فذكره.
وفضيل بن مرزوق، وشيخه ضعيفان.
وعن ابن مسعود مرفوعًا:"ليس من عمل يقرّب إلى الجنّة إلّا قد أمرتكم به، ولا عمل يقرّب إلى النّار إلّا قد نهيتكم عنه، لا يَسْتَبْطِئَنَّ أحدٌ منكم رزقه، إنّ جبريل عليه السلام أَلْقى في رَوعي: أنّ أحدًا منكم لن يخرج من الدّنيا حتى يستكمل رزقه، فاتّقوا اللَّه أيّها النّاس وأجملوا في الطّلب، فإن استبطأ أحد منكم رزقه فلا يطلبه بمعصية اللَّه، فإنّ اللَّه لا ينال فضله بمعصيةٍ".
رواه الحاكم (2/ 4) وعنه البيهقيّ في القضاء والقدر (2/ 463) عن أبي بكر بن إسحاق، أنبأ أحمد بن إبراهيم بن ملحان، عن ابن بكير، حدّثني اللّيث بن سعد، عن خالد بن يزيد، عن سعيد ابن أبي هلال، عن سعيد بن أبي أمية الثّقفيّ، عن يونس بن بكير، عن ابن مسعود، فذكره.
وسعيد بن أبي أمية هذا لم أجد من ترجمه، وقد رُوي موقوفًا على ابن مسعود
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলাম। অতঃপর তিনি একটি বিচ্ছিন্ন খেজুর দেখতে পেলেন। তিনি তা একজন ভিক্ষুককে দিলেন এবং বললেন: "যদি তুমি এর কাছে না আসতে, তবে এটি তোমার কাছে আসত।"
উমর ইবনু আল-খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সিরিয়ায় প্রদত্ত তাঁর এক ভাষণে, যা তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সূত্র ধরে বর্ণনা করেছেন, তাতে বলেন: আর তোমরা দুনিয়া অর্জনে মধ্যপন্থা অবলম্বন করো, কারণ আল্লাহ তোমাদের রিযিকের দায়িত্ব গ্রহণ করেছেন। আর প্রত্যেকের জন্যই তার সেই আমল সহজ করে দেওয়া হয়েছে যা সে করবে। তোমরা তোমাদের কাজকর্মে আল্লাহর সাহায্য চাও, কারণ, "{আল্লাহ যা ইচ্ছা মুছে দেন এবং যা ইচ্ছা প্রতিষ্ঠিত রাখেন এবং তাঁর কাছেই রয়েছে মূল কিতাব।} [সূরা রা‘দ: ৩৯]"
আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ‘ সূত্রে বর্ণিত: “যদি তোমাদের কেউ তার রিযিক থেকে পলায়ন করে, তবে তা তাকে ধরে ফেলবে, যেভাবে তাকে মৃত্যু ধরে ফেলে।”
ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ‘ সূত্রে বর্ণিত: “এমন কোনো আমল নেই যা জান্নাতের দিকে নিয়ে যায়, যা করার জন্য আমি তোমাদেরকে নির্দেশ দেইনি। আর এমন কোনো আমলও নেই যা জাহান্নামের দিকে নিয়ে যায়, যা থেকে আমি তোমাদেরকে নিষেধ করিনি। তোমাদের কেউই যেন তার রিযিক আসতে দেরি মনে না করে। নিশ্চয়ই জিবরীল (আঃ) আমার অন্তরে এই কথাটি ঢেলে দিয়েছেন যে, তোমাদের কেউই পৃথিবী থেকে বিদায় নেবে না, যতক্ষণ না সে তার রিযিক সম্পূর্ণরূপে গ্রহণ করবে। সুতরাং হে লোকসকল! তোমরা আল্লাহকে ভয় করো এবং (রিযিক) তালাশে মধ্যপন্থা অবলম্বন করো। যদি তোমাদের কেউ রিযিক আসতে দেরি মনে করে, তবে সে যেন আল্লাহর অবাধ্যতার মাধ্যমে তা কামনা না করে। কেননা আল্লাহর অনুগ্রহ অবাধ্যতার মাধ্যমে লাভ করা যায় না।”
1018 - عن أبي خُزامة -أحد بني الحارث بن سعد بن هُزيم- حدّثه، أنّ أباه حدّثه أنّه قال لرسول اللَّه صلى الله عليه وسلم: يا رسول اللَّه، أرأيتَ دواءً نتداوى به، ورُقي نسْترقيها، وتُقًى نتّقيها هل تردُّ ذلك من قدر اللَّه من شيء؟ فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّه من قدر اللَّه".
حسن: رواه عبد اللَّه بن وهب في"الجامع" (699) قال: أخبرني يونس بن يزيد وعمرو بن الحارث وابن سمعان، أنّ ابن شهاب أخبرهم أنّ أبا خُزامة، فذكره.
وأخرجه الإمام أحمد (15474)، والحاكم (4/ 199) من طريق ابن وهب، إلّا أن أحمد رواه عنه، عن عمرو بن الحارث وحده.
وهذا إسناد حسن؛ لأنّ أبا خُزامة لم يرو عنه إلّا الزّهريّ، وهو تابعي معروف، قد عرفه الزهريّ، ووهم من جعله من الصّحابة كالحافظ في التقريب فقال:"صحابي، له حديث في الرُّقي" وإنما الصحبة لأبيه.
وخالفهم جميعًا سفيان الثّوريّ، فروى عن الزهريّ، عن ابن أبي خزامة، عن أبيه، وهو خطأ. بيّنه الإمام أحمد.
قال عبد اللَّه بن أحمد: سمعت أبي يقول: سمعت سفيان وحدّث بحديث أبي خزامة، فقال: عن ابن أبي خزامة عن أبيه. قال أبي: وقد حدّثنا يحيى بن أبي بكير وحسين بن محمد، عن سفيان، عن الزهريّ، عن أبي خزامة، عن أبيه، قال أبي: والحديث إنّما يُروى عن أبي خُزامة، عن أبيه. رواه يونس، والزبيديّ، وهو أصحها". أخرجه البيهقي في القضاء والقدر (2/ 454)، وانظر: المسند (15475).
قلت: من طريق الثوريّ هذا رواه الترمذيّ (2148)، وابن ماجه (3437).
ثم رواه الترمذيّ من وجه آخر (2065)، عن سفيان، عن الزّهريّ، عن أبي خزامة، عن أبيه، فذكر مثله، وقال:"حسن" وهذا هو الصحيح.
وقد أشار الترمذيّ إلى هذا الاختلاف بقوله: وقد رُوي عن ابن عيينة كلتا الرّوايتين. فقال بعضهم: عن أبي خُزامة، عن أبيه. وقال بعضهم: عن ابن أبي خزامة، عن أبيه".
ثم قال:"وقد روى غيرُ ابن عيينة هذا الحديث عن الزهريّ، عن أبي خزامة، عن أبيه، وهذا
أصح، ولا نعرف لأبي خزامة غير هذا الحديث" انتهى.
قلت: وهو كما قال، فقد روى يونس بن يزيد، وعمرو بن الحارث، وابن سمعان كلّهم عن ابن شهاب، عن أبي خُزامة، عن أبيه، كما رواه ابن وهب.
وهذا إسناد حسن، ولا يُعَلُّ بحديث ابن عيينة مع أنه قد اختُلف عليه فيه، فمن روى عنه، عن ابن شهاب، عن أبي خزامة، عن أبيه فقد أصاب لموافقة الجماعة له.
وللزّهريّ طرق أخرى غير أنّ ما ذكرته هو أصحّها.
আবু খুযামাহ থেকে বর্ণিত, তাঁর পিতা তাঁকে বর্ণনা করেছেন যে, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি কি মনে করেন যে, যে ঔষধ আমরা সেবন করি, যে ঝাড়ফুঁক আমরা গ্রহণ করি এবং যে রক্ষামূলক ব্যবস্থা আমরা অবলম্বন করি—তা কি আল্লাহর তাকদীর (ভাগ্য) থেকে কোনো কিছু প্রতিরোধ করতে পারে? তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: 'ঐগুলোও আল্লাহর তাকদীরেরই অংশ।'
1019 - عن أبي هريرة، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"لا يأتي ابنَ آدم النّذرُ بشيء لم يكن قد قُدِّر له، ولكن يُلقيه النَّذرُ إلى القدر، قد قُدِّر له، فيستخرج اللَّه به من البخيل، فيُؤتى عليه ما لم يكن يُؤتى عليه من قبل".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الأيمان والنذور (1694)، ومسلم في النذر (1640: 7) كلاهما من حديث الأعرج، عن أبي هريرة، فذكره، واللّفظ للبخاريّ.
وفي رواية عند مسلم:"ولكن النذرُ يوافق القدر". والباقي مثله.
وفي رواية عند البخاريّ في القدر (6609) من وجه آخر:"لا يأتي ابن آدم النّذرُ بشيء لم يكن قد قدّرتُه، ولكن يلقيه القدر، وقد قدرتُه له، فأستخرج به من البخيل".
وفي رواية عند مسلم:"لا تنذروا، فإنّ النّذر لا يُغني من القدر شيئًا، وإنّما يستخرج به من البخيل".
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: মানত (নযর) আদম সন্তানের জন্য এমন কোনো কিছু নিয়ে আসে না যা তার জন্য পূর্বেই নির্ধারিত (তাকদীর) ছিল না। কিন্তু মানত কেবল তাকে সেই তাকদীরের দিকে ঠেলে দেয় যা তার জন্য পূর্বেই নির্ধারিত হয়ে আছে। এর মাধ্যমে আল্লাহ কৃপণ ব্যক্তির কাছ থেকে (দান) বের করে নেন। ফলে তাকে এমন কিছু দেওয়া হয় যা পূর্বে তাকে দেওয়া হতো না।
1020 - عن ابن عمر قال: نهى النّبيُّ صلى الله عليه وسلم عن النّذر، قال:"إنّه لا يردُّ شيئًا، وإنّما يستخرجُ به من البخيل".
متفق عليه: رواه البخاريّ في القدر (6607)، ومسلم في النّذر (1639) كلاهما من حديث سفيان، عن منصور، عن عبد اللَّه بن مرة، عن ابن عمر، فذكره. واللّفظ للبخاريّ، ومسلم أحال على من سبقه.
وفي رواية عنده:"أخذ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يومًا ينهانا عن النّذر ويقول:"إنّه لا يرد شيئًا، وإنّما يستخرج به من الشّحيح".
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মানত করতে নিষেধ করেছেন। তিনি বলেছেন: "নিশ্চয়ই তা (মানত) কোনো কিছুকে প্রতিহত করে না, বরং এর দ্বারা কৃপণ ব্যক্তির কাছ থেকে (সম্পদ) বের করে নেওয়া হয়।"