আল-জামি` আল-কামিল
1021 - عن أنس، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"ادعوا فإنّ الدّعاء يردُّ القدر".
حسن: رواه الطبرانيّ في كتاب"الدّعاء" (29) عن عثمان بن عمر الضّبيّ، ثنا عبد اللَّه بن رجاء، أنبأنا إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن بريد بن أبي مريم، عن أنس بن مالك، فذكره.
وإسناده حسن من أجل عبد اللَّه بن رجاء هو ابن عمر الغداني -بضم الغين- قال ابن معين: كان شيخًا صدوقًا، وذكره ابن حبان في"الثقات" (8/ 341)، وروى له البخاريّ. وبقية رجاله ثقات غير شيخ الطّبراني وهو عثمان بن عمر الضبيّ لا يعرف عنه شيء إلّا أنّ السجزي نقل عن الحاكم توثيقه، وذكره ابن حبان في الثقات، وجعل بعض أهل العلم شيوخ الطبراني من الثقات.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা দুআ করো, কেননা নিশ্চয় দুআ তাকদীরকে রদ করে দেয়।"
1022 - عن سلمان، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا يردّ القضاء إلّا الدّعاء، ولا يزيد في العمر إلّا البرُّ".
حسن: رواه الترمذيّ (2139) عن محمد بن حميد الرّازيّ، وسعيد بن يعقوب، قالا: حدّثنا يحيى ابن الضريس، عن أبي مودود، عن سليمان التّيمي، عن أبي عثمان النّهديّ، عن سلمان، فذكره.
وقال:"هذا حديث حسن غريب من حديث سلمان، لا نعرفه إلّا من حديث يحيى بن الضريس، وأبو مودود اثنان: أحدهما يقال له: فضّة، والآخر:
عبد العزيز بن أبي سليمان. أحدهما بصريّ، والآخر مدني. وكانا في عصر واحد. وأبو مودود الذي روى هذا الحديث اسمه فضّة، بصريّ". انتهى.
قلت: ترجمه ابن أبي حاتم في الجرح والتعديل (7/ 93) فقال:"روى عن الحسن، وسليمان التيمي، روى عنه يحيى بن الضريس، وعلي بن الحسن الواسطيّ، سمعت أبي يقول ذلك. ويقول: قدم الري كان خراسانيًّا، ونزل بها وهو ضعيف. وقال أبو زرعة: أبو مودود البصريّ اسمه فضّة روى عن الحسن، كان بالرّي".
قلت: إسناده حسن من أجل فضة البصري؛ فإنه لا بأس به في الشواهد، ولعل الترمذيّ حسّنه لذلك.
সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ফায়সালা বা তাকদীরকে কেবল দোয়াই প্রতিরোধ করতে পারে, আর নেক কাজ ছাড়া অন্য কিছু আয়ু বৃদ্ধি করে না।
1023 - عن ثوبان، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا يزيد في العمر إلّا البر، ولا يردّ القدر إلّا الدّعاء، وإنّ الرّجل ليُحرم الرِّزقَ بخطيئة يعملها".
حسن: رواه ابن ماجه (90) عن علي بن محمد، قال: حدّثنا وكيع، عن سفيان، عن عبد اللَّه بن عيسى، عن عبد اللَّه بن أبي الجعد، عن ثوبان، فذكره.
وصحّحه ابن حبان (872)، والحاكم (1/ 493) فروياه من طريق عبد اللَّه بن عيسى، به، مثله.
وقال الحاكم:"صحيح الإسناد".
ورواه أيضًا أحمد (22386)، والبيهقيّ في القضاء والقدر (249).
عبد اللَّه بن أبي الجعد روى عنه اثنان وهما: عبد اللَّه بن عيسى، وابن ابن أخيه رافع بن سلمة بن زياد ابن أبي الجعد، ولم يعلم فيه جرح، ولذا حسّنه العراقي كما نقل البوصيري في الزوائد فقال:"سألت شيخنا أبا الفضل العراقيّ رحمه الله عن هذا الحديث فقال:"هذا حديث حسن". انتهى. ورواه أحمد ابن منيع في مسنده: ثنا أبو أحمد الزبيري، ثنا سفيان، فذكره بتمامه". انتهى كلام البوصيريّ.
وفي معناه ما رُوي عن ابن عمر مرفوعًا:"من فُتِح له منكم باب الدُّعاء، فُتحتْ له أبواب الرّحمة، وما سُئل اللَّه شيئًا يعني أحبَّ إليه من أن يسأل العافية".
وقال أيضًا:"إنّ الدّعاء ينفع مما نزل، ومما لم ينزل، فعليكم عبادَ اللَّه بالدّعاء".
رواه التّرمذيّ (3548) عن الحسن بن عرفة، حدّثنا يزيد بن هارون، عن عبد الرحمن بن أبي بكر القرشيّ، عن موسى بن عقبة، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.
وأخرجه أيضًا الحاكم (1/ 493) من طريق يزيد بن هارون، ولم يتكلّم عليه بشيء. وقال الذهبي:"عبد الرحمن واهٍ".
وقال الترمذيّ: هذا حديث غريب -وفي نسخة: حسن غريب- لا نعرفه إلّا من حديث عبد الرحمن بن أبي بكر القرشيّ، وهو المكيّ المليكي، وهو ضعيف الحديث. تكلّم فيه بعض أهل الحديث من قبل حفظه، وقد روى إسرائيل هذا الحديث عن عبد الرحمن بن أبي بكر، عن موسى ابن عقبة، عن نافع، عن ابن عمر، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم، قال:"ما سئل اللَّه شيئًا أحبَّ إليه من العافية". قال: حدّثنا بذلك القاسم بن دينار الكوفي، حدّثنا إسحاق بن منصور الكوفي، عن إسرائيل بهذا". انتهى كلام الترمذيّ.
قلت: وهو كما قال، فإنّ عبد الرحمن بن أبي بكر بن عبد اللَّه القرشي، جمهور أهل العلم مطبقون على تضعيفه، فقال الإمام أحمد:"منكر الحديث". وقال النسائي:"متروك الحديث".
وفي معناه أيضًا ما روي عن عبادة بن الصّامت قال: أتي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وهو قاعد في ظلّ الحطيم بمكة، فقيل: يا رسول اللَّه، أُتي على مالِ أبي فلان بسيف البحر فذهب؟ فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ما تلف مالٌ في بر ولا بحر إلّا بمنع الزّكاة، فأحرزوا أموالكم بالزّكاة، وداووا مرضاكم بالصّدقة، وادفعوا عنكم طوارق البلاء بالدّعاء، فإنّ الدّعاء ينفع مما نزل، ومما لم ينزل، ما نزل يكشفه، وما لم ينزل يحبسه".
رواه الطبرانيّ في الدّعاء (34) عن محمد بن أبي زرعة الدّمشقي، ثنا هشام بن عمّار، ثنا عراك بن خالد بن يزيد، حدّثني أبي، قال: سمعت إبراهيم بن أبي عبلة، يحدّث عن عبادة بن الصّامت، فذكره.
قال ابن أبي حاتم في"العلل" (140):"سألت أبي عن حديث رواه هشام بن عمّار (فذكر الحديث بإسناده) قال: قال أبي:"حديث منكر؛ إبراهيم لم يدرك عبادة، وعراك منكر الحديث، وأبوه خالد بن يزيد أوثق منه، وهو صدوق". انتهى.
وفي معناه أحاديث أخرى معلولة، ومعنى الحديث أن الدعاء من أسباب دفع البلاء المقدر كما أن الدواء من أسباب دفع المرض المقدر، ولذا أمرنا بالدعاء والتداوي.
قال سماحة الشيخ ابن باز رحمه الله:"ومراده أن القدر المعلق بالدعاء يرده الدعاء". انظر: فتاواه (6/ 204).
وقال الشيخ ابن عثيمين رحمه الله:"والدعاء يرد القضاء، قد يقضي اللَّه القضاء، ويجعل له سببا بمنع، ومنه الدعاء".
সাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "পুণ্য (নেক আমল) ব্যতীত অন্য কিছু আয়ু বৃদ্ধি করে না, আর দোয়া ব্যতীত অন্য কিছু তাকদীর (আল্লাহর বিধান/ভাগ্য) রদ করে না। নিশ্চয়ই মানুষ তার কৃত কোনো গুনাহের কারণে জীবিকা (রিযক) থেকে বঞ্চিত হয়।"
1024 - عن عبد اللَّه بن عباس: أنّ عمر بن الخطاب خرج إلى الشّام حتى إذا كان بِسَرْغٍ لقيه أهلُ الأجناد -أبو عبيدة بن الجراح وأصحابه- فأخبروه أنّ الوباء قد وقع بالشام. قال ابن عباس: فقال عمرُ: ادعُ لي المهاجرين الأوّلين فدعوتُهم، فاستشارهم وأخبرهم أنّ الوباء قد وقع بالشّام فاختلفوا، فقال بعضهم: قد خرجت لأمر ولا نرى أن ترجع عنه. وقال بعضهم: معك بقيةُ النّاس وأصحابُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ولا نرى أن تُقْدِمَهُم على هذا الوباء. فقال: ارتفعوا عنّي، ثم قال: ادعُ لي الأنصار فدعوتُهم له، فاستشارهم، فسلكوا سبيل المهاجرين واختلفوا كاختلافهم. فقال: ارتفعوا عنّي، ثم قال: ادع لي من كان ها هنا من مشيخة قريش من مُهاجِرَةِ الفتح، فدعوتهم فلم يختلف عليه رجلان فقالوا: نرى أن ترجع بالنّاس ولا تُقدمهم على هذا الوباء. فنادى عمر في النّاس: إِنِّي مُصْبحٌ على ظَهْر فأصبحوا عليه. فقال أبو عبيدة بن الجرَّاح: أفِرارًا من قدر اللَّه؟ فقال عمر: لو غيرُك قالها يا أبا عبيدة -وكان عمر يكره خلافه- نعم، نَفرُّ من قدر اللَّه إلى قدر اللَّه، أرأيت لو كانتْ لك إبل فهبطت واديًا له عُدْوتان: إحداهما خصبة والأخرى جدية، أليس إن رَعَيْتَ الْخَصْبةَ رَعَيْتَها بقدر اللَّه، وإنْ رَعَيْتَ الْجَدْبةَ رَعَيْتَها بقدر اللَّه؟ قال: فجاء عبد الرحمن ابن عوف -وكان مُتَغَيَّبًا في بعض حاجته- فقال: إنّ عندي مِنْ هذا عِلْمًا سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إذا سمعتم به بأرض فلا تَقْدَمُوا عليه، وإذا وقع بأرض وأنتم بها فلا تخرجوا فرارًا منه". قال: فحمد اللَّه عمر بن الخطاب، ثم انصرف".
متفق عليه: رواه مالك في كتاب الجامع (22) عن ابن شهاب، عن عبد الحميد بن عبد الرحمن ابن زيد بن الخطّاب، عن عبد اللَّه بن عبد اللَّه بن الحارث بن نوفل، عن عبد اللَّه بن عباس، فذكره.
ورواه البخاريّ في الطب (5729) عن عبد اللَّه بن يوسف، ومسلم في السّلام (2219) عن يحيى بن يحيى التميميّ - كلاهما عن مالك، به.
وقوله:"بسَرْغٍ" قرية بوادي تبوك، يجوز فيها الصّرف وعدمه. وقيل: هي مدينة افتتحها أبو عبيدة، وهي واليرموك والجابية متصلات.
"الأجناد" جمع جند، والمراد هنا مدن الشّام الخمس، وهي: فلسطين، والأردن، ودمشق،
وحمص، وقنسرين.
"وعدوتان" العدو -بضم العين وكسرها- هي جانب الوادي.
قال البيهقي في القضاء والقدر (2/ 500):"قال أصحابنا في هذا الخبر: إنّ أمير المؤمنين عمر رضي الله عنه استعمل الحذر، وأثبت القدر معًا، وهو طريق السنة، ونهج السّلف الصّالح رحمة اللَّه عليهم".
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সিরিয়ার (শাম) উদ্দেশ্যে বের হলেন। যখন তিনি ‘সার্গ’ নামক স্থানে পৌঁছালেন, তখন তাঁর সাথে সামরিক ছাউনিগুলোর (আল-আজনাদ) অধিবাসীরা—আবু উবাইদাহ ইবনুল জাররাহ এবং তাঁর সঙ্গীরা—সাক্ষাৎ করলেন। তারা তাঁকে জানালেন যে সিরিয়ায় মহামারি (প্লেগ) ছড়িয়ে পড়েছে।
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমার কাছে প্রথম যুগের মুহাজিরগণকে ডেকে আনো। আমি তাঁদের ডাকলাম। তিনি তাঁদের সাথে পরামর্শ করলেন এবং জানালেন যে সিরিয়ায় মহামারি দেখা দিয়েছে। তাঁরা (পরামর্শে) ভিন্নমত পোষণ করলেন। তাঁদের কেউ কেউ বললেন: আপনি একটি কাজের জন্য বের হয়েছেন, তাই আমাদের মতে আপনার ফিরে যাওয়া উচিত নয়। আবার কেউ কেউ বললেন: আপনার সাথে বহু সংখ্যক লোক এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সাহাবীগণ আছেন। আমাদের মতে, আপনি এদেরকে এই মহামারির দিকে ঠেলে দিতে পারেন না।
উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তোমরা আপাতত চলে যাও। এরপর তিনি বললেন: আমার জন্য আনসারদের ডেকে আনো। আমি তাঁদের ডাকলাম। তিনি তাঁদের সাথে পরামর্শ করলেন। তাঁরাও মুহাজিরদের পথ অনুসরণ করলেন এবং তাঁদের মতোই ভিন্নমত পোষণ করলেন।
তিনি বললেন: তোমরা আপাতত চলে যাও। এরপর তিনি বললেন: এখানে ফাতহ (মক্কা বিজয়)-এর মুহাজির কুরাইশের যে সকল বয়োজ্যেষ্ঠ (শাইখ) আছেন, তাঁদের ডেকে আনো। আমি তাঁদের ডাকলাম। তাঁদের মধ্যে দু’জন লোকও ভিন্নমত পোষণ করলেন না। তাঁরা বললেন: আমাদের মতে, আপনি লোকদের নিয়ে ফিরে যান এবং এদেরকে এই মহামারির দিকে নিয়ে যাবেন না।
এরপর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) লোকজনের মধ্যে ঘোষণা দিলেন: আমি কাল সকালে (মদীনার দিকে) ফিরে যাব, আপনারাও ফিরে যাওয়ার প্রস্তুতি নিন।
তখন আবূ উবাইদাহ ইবনুল জাররাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আপনি কি আল্লাহর তাকদীর (নির্ধারণ) থেকে পলায়ন করছেন? উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আবূ উবাইদাহ! যদি আপনি ছাড়া অন্য কেউ একথা বলত (তবে আমি তাকে ভিন্নভাবে দেখতাম, কারণ উমর তাঁর বিরোধিতা করা অপছন্দ করতেন)। হ্যাঁ, আমরা আল্লাহর এক তাকদীর থেকে আল্লাহর আরেক তাকদীরের দিকে পলায়ন করছি। আপনি কি মনে করেন না, যদি আপনার কিছু উট থাকত এবং তা এমন একটি উপত্যকায় নামত যার দু’টি দিক (পার) রয়েছে—একটি উর্বর এবং অন্যটি শুষ্ক ও অনাবাদী, আপনি যদি উর্বর দিকটিতে চরাতে দেন, তবে তা কি আল্লাহর তাকদীর অনুসারেই চরানো হবে না? আর যদি শুষ্ক দিকে চরাতে দেন, তবে তা কি আল্লাহর তাকদীর অনুসারেই চরানো হবে না?
বর্ণনাকারী বলেন: তখন আব্দুর রহমান ইবনে আউফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এলেন—তিনি কোনো প্রয়োজনে অনুপস্থিত ছিলেন। তিনি বললেন: এ বিষয়ে আমার জানা আছে। আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে বলতে শুনেছি: "যখন তোমরা কোনো এলাকায় মহামারির খবর শোনো, তখন সেখানে প্রবেশ করো না। আর যদি তোমরা কোনো এলাকায় থাকাকালে সেখানে মহামারি দেখা দেয়, তবে তা থেকে পলায়নের উদ্দেশ্যে সেখান থেকে বের হয়ো না।" বর্ণনাকারী বলেন: তখন উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আল্লাহর প্রশংসা করলেন, এরপর তিনি ফিরে গেলেন।
1025 - عن عائشة أم المؤمنين قالت: توفي صبي. فقلت: طوبي له، عصفور من عصافير الجنّة. فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أو لا تدرين أن اللَّه خلق الجنّة وخلق النّار. فخلق لهذه أهلا ولهذه أهلا".
وفي رواية: دُعي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم إلى جنازة صبيّ من الأنصار، فقلت: يا رسول اللَّه! طوبى لهذا. عصفور من عصافير الجنّة. لم يعمل السُّوء ولم يدركهـ. قال:"أو غير ذلك يا عائشة! إن اللَّه خلق للجنة أهلا، خلقهم لها وهم في أصْلاب آبائهم. وخلق للنار أهلًا خلقهم لها وهم في أصْلاب آبائهم".
صحيح: رواه مسلم في القدر (2662) عن زهير بن حرب، حدّثنا جرير، عن العلاء بن المسبب، عن فُضيل بن عمرو، عن عائشة بنت طلحة، عن عائشة أم المؤمنين فذكرت مثله.
والرواية الثانية عنده أيضًا من وجه آخر عن طلحة بن يحيى، عن عمته عائشة بنت طلحة بإسناده.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একটি ছোট শিশু মারা গেল। আমি বললাম: তার জন্য শুভ সংবাদ, সে তো জান্নাতের চড়ুইপাখি। তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি কি জান না যে, আল্লাহ জান্নাত সৃষ্টি করেছেন এবং জাহান্নাম সৃষ্টি করেছেন? আর এর (জান্নাতের) জন্য অধিবাসী সৃষ্টি করেছেন এবং এর (জাহান্নামের) জন্যও অধিবাসী সৃষ্টি করেছেন।"
অন্য এক বর্ণনায় আছে: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে আনসার গোত্রের একটি শিশুর জানাযায় দাওয়াত দেওয়া হলো। আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! এই শিশুর জন্য শুভ সংবাদ। সে তো জান্নাতের চড়ুইপাখি। সে কোনো মন্দ কাজ করেনি এবং তা বোঝার বয়সও পায়নি। তিনি বললেন: "হে আয়েশা! এটি ছাড়াও অন্য কিছু হতে পারে! নিশ্চয়ই আল্লাহ জান্নাতের জন্য অধিবাসী সৃষ্টি করেছেন, তিনি তাদেরকে এর জন্যই সৃষ্টি করেছেন যখন তারা তাদের পিতাদের পৃষ্ঠদেশেই ছিল। আর তিনি জাহান্নামের জন্যও অধিবাসী সৃষ্টি করেছেন, তিনি তাদেরকে এর জন্যই সৃষ্টি করেছেন যখন তারা তাদের পিতাদের পৃষ্ঠদেশেই ছিল।"
1026 - عن أبي هريرة، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"أربعة يوم القيامة -يعني يدلون على اللَّه عز وجل بحجّة-: رجل أصمّ لا يسمع، ورجل أحمق، ورجل هرم، ورجل مات في فترة. فأمّا الأصمّ فيقول: ربّ قد جاء الإسلام وما أسمع شيئًا، وأمّا الأحمق
فيقول: ربّ لقد جاء الإسلام والصِّبيان يخذفونني بالبعر، وأما الهرم فيقول: ربّ لقد جاء الإسلام وما أعقل شيئًا. وأمّا الذي مات في فترة فيقول: ربّ ما أتاني الرّسول، فيأخذ مواثيقهم لَيُطيعُنَّه ويرسل إليهم أن ادخلوا النّار، فوالذي نفس محمد بيده لو دخلوها ما كانت عليهم إلّا بردًا وسلامًا".
حسن: رواه البيهقيّ في القضاء والقدر (3/ 910 - 911) بإسناده عن علي بن عبد اللَّه، نا معاذ، نا أبي، عن قتادة، عن الحسن، عن أبي رافع، عن أبي هريرة، فذكر نحوه.
ورواه الإمام أحمد (16302) عن علي بن عبد اللَّه، بإسناده، وقال في آخره:"فمن دخلها كانت عليه بردًا وسلامًا، ومن لم يدخلها يُسحب إليها".
قال البيهقيّ:"هذا إسناد صحيح. ورُوي بإسناد آخر فيه ضعف".
قلت: الصّواب أنّ إسناده حسن من أجل الكلام في معاذ وهو ابن هشام الدّستوائيّ غير أنه حسن الحديث، وقد احتجّ به الشّيخان.
وقتادة وإن كان مدلِّسًا إلّا أنّ سماعه من الحسن ثابت.
وأمّا الحسن فعنعن عن أبي رافع وهو نُفيع الصّائغ من التابعين من أقرانه، وإنّما يُخشى من تدليسه -إذا عنعن- عن الصّحابة.
وأمّا قول البيهقيّ:"ورُوي بإسناد آخر فيه ضعف". فلعلّه يشير إلى ما رواه حمّاد بن سلمة، عن علي بن زيد، عن أبي رافع، عن أبي هريرة، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أربعة كلّهم يُدلي على اللَّه يوم القيامة بحجّة وعذر. رجل مات في الفترة، ورجل أدركه الإسلام هرمًا، ورجل أصمّ أبكم، ورجل معتوه، فيبعث اللَّه إليهم ملكًا رسولًا فيقول: اتبعوه، فيأتيهم الرسول فيؤجّج لهم نارًا، ثم يقول: اقتحموها، فمن اقتحمها كانت عليه بردًا وسلامًا، ومن لا حقَّتْ عليه كلمةُ العذاب".
رواه ابن أبي عاصم في"السنة" (404) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدّثنا الحسن بن موسى، حدّثنا حماد بن سلمة، بإسناده.
وفيه علي بن زيد وهو ابن جدعان ضعيف.
ويشهد له حديث الأسود بن سريع نحوه.
رواه الإمام أحمد (16301) عن علي، حدّثنا معاذ بن هشام، قال: حدّثني أبي، عن قتادة، عن الأحنف بن قيس، عن الأسود بن سريع، فذكر نحوه.
قتادة مدلِّس وقد عنعن، فإن كان ولد في البصرة سنة (60 هـ)، وتوفي الأحنف سنة (67 هـ) فمن المستبعد سماعه منه.
وقال الهيثمي في"المجمع" (7/ 216) -بعد أن ذكر حديث الأسود بن سريع، وحديث أبي
هريرة-:"هذا لفظ أحمد، ورجاله في طريق الأسود بن سريع وأبي هريرة رجال الصّحيح، وكذلك رجال البزّار فيهما".
قلت: وهو كما قال لولا خشية الانقطاع بين قتادة والأحنف بن قيس لحكمتُ على حديث الأسود بن سريع بالحسن، كما حكمتُ على حديث أبي هريرة.
ويشهد له أيضًا حديث أنس مرفوعًا:"يؤتى بأربعةٍ يوم القيامة: بالمولود، وبالمعتوه، وبمن مات في الفترة، وبالشّيخ الفاني كلّهم يتكلّم بحجّته، فيقول الرّبُّ تبارك وتعالى لعُنُقٍ من النّار: ابرُزْ، فيقول لهم: إنّي كنتُ أبعثُ إلى عبادي رسلًا من أنفسهم، وإني رسول نفسي إليكم، ادخلوا هذه، فيقول من كُتب عليه الشّقاء: يا ربّ، أين ندخلها ومنها كُنّا نفِرُّ! قال: ومَنْ كُتِب عليه السّعادةُ يَمْضي فيقتحمُ فيها مُسْرعًا. قال: فيقول تبارك وتعالى: أنتم لرسلي أشدُّ تكذيبًا ومعصية، فيُدخل هؤلاء الجنّة، وهؤلاء النّار".
رواه أبو يعلى، والبزّار بنحوه. قال الهيثمي في"المجمع" (7/ 216):"وفيه ليث بن أبي سُليم وهو مدلِّس، وبقية رجال أبي يعلى رجال الصّحيح".
ومن طريقه رواه البيهقي في القضاء والقدر (3/ 911).
قلت: ليث بن أبي سليم هو ابن زُنيم لم أجد مَنْ وصفه بالتدليس إلّا أنّ أهل العلم مجمعون على تضعيفه. وليَّن فيه الحافظ القول فقال:"صدوق اختلط أخيرًا، ولم يتميّز حديثه فترك". فلعلّه وصفه بصدوق لصلاحه وعبادته، وإلّا فهو ضعيف الحديث مضطرب الحديث، وبعد اختلاطه يقلب الأسانيد ويرفع المراسيل، ويأتي عن الثّقات بما ليس من حديثهم -أي من أجل الاختلاط- ولم يثبت أنه تعمّد ذلك.
ورُوي أيضًا عن أبي سعيد الخدريّ.
رواه البزّار، وفيه عطية، وهو ضعيف كما قال الهيثميّ.
ورُوي أيضًا عن معاذ بن جبل.
"رواه الطبراني في الأوسط، والكبير، وفيه عمرو بن واقد، وهو متروك عند البخاريّ وغيره، ورُمي بالكذب. وقال محمد بن المبارك الصّوريّ: كان يتبع السّلطان، وكان صدوقًا، وبقية رجال الكبير رجال الصّحيح". كذا قال الهيثميّ في"المجمع".
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: কিয়ামতের দিন চার ব্যক্তি আল্লাহ্র সামনে প্রমাণ পেশ করবে: এক বধির ব্যক্তি যে কিছুই শুনতে পায় না, এক নির্বোধ ব্যক্তি, এক অতি বৃদ্ধ ব্যক্তি এবং ফাতরাতের (দুই রাসূলের মধ্যবর্তী সময়কালে) মৃত্যুবরণকারী ব্যক্তি। অতঃপর বধির বলবে: হে আমার রব! ইসলাম এসেছিলো কিন্তু আমি কিছুই শুনতে পাইনি। নির্বোধ বলবে: হে আমার রব! ইসলাম এসেছিলো, আর শিশুরা আমাকে গোবর ছুঁড়ে মারতো। আর অতি বৃদ্ধ বলবে: হে আমার রব! ইসলাম এসেছিলো কিন্তু আমি কিছুই বুঝতে পারিনি। আর ফাতরাতের সময়কালে মৃত্যুবরণকারী ব্যক্তি বলবে: হে আমার রব! আমার কাছে কোনো রাসূল আসেননি। তখন আল্লাহ তাদের কাছ থেকে আনুগত্যের অঙ্গীকার নেবেন এবং তাদের কাছে নির্দেশ পাঠাবেন যে, তোমরা আগুনে প্রবেশ করো। মুহাম্মাদের জীবন যার হাতে, তার কসম! যদি তারা তাতে প্রবেশ করতো, তবে তা তাদের উপর শীতল ও শান্তিদায়ক হয়ে যেতো।
1027 - عن عبد اللَّه بن عمرو، قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إنّ اللَّه عزّ وجلّ
خلق خلقَه في ظلمة، فألقى عليهم من نوره، فمن أصابه من ذلك النّور اهتدى، ومن أخطأه ضلّ".
صحيح: رواه الترمذيّ (2644) عن الحسن بن عرفة، حدّثنا إسماعيل بن عياش، عن يحيى بن أبي عمرو الشّيبانيّ، عن عبد اللَّه بن الدّيلميّ، قال: سمعت عبد اللَّه بن عمرو، فذكر الحديث.
وهذا إسناد حسن؛ لأنّ إسماعيل بن عياش صدوق في روايته عن أهل بلده، وهذه منها. وقال الترمذيّ:"هذا حديث حسن".
ورواه الإمام أحمد (6644)، وصحّحه ابن حبان (6169)، والحاكم (1/ 30)، والبيهقيّ في القضاء والقدر (1/ 257) كلّهم من وجه آخر عن الأوزاعيّ، قال: حدّثني ربيعة بن يزيد، عن عبد اللَّه الدّيلميّ، فذكر أحاديث منها هذا الحديث.
قال الحاكم:"هذا حديث صحيح، قد تداوله الأئمّة، وقد احتجّا بجميع رواته، ثم لم يخرجاه، ولا أعلم له علّة".
ورواه أيضًا الإمام أحمد (6854)، والبزّار -كشف الأستار (2145) - بإسنادين مختلفين عن عبد اللَّه بن عمرو، ولعلّه إليه يشير الهيثميّ في"المجمع" (7/ 193 - 194) بقوله:"رواه أحمد بإسنادين، والبزار والطبرانيّ، ورجال أحد إسنادي أحمد ثقات".
قلت: إلّا أنّ الحديث ليس على شرطه.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয়ই আল্লাহ্ তা'আলা তাঁর সৃষ্টিকে অন্ধকারে সৃষ্টি করেছেন, অতঃপর তিনি তাদের ওপর তাঁর নূরের (আলোর) অংশ নিক্ষেপ করলেন। সুতরাং সেই নূর যাকে স্পর্শ করেছে, সে হেদায়েত লাভ করেছে; আর যে তা থেকে বঞ্চিত হয়েছে, সে পথভ্রষ্ট হয়েছে।"
1028 - عن أُبي بن كعب قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّ الغلام الذي قتله الخضر طُبع كافرًا، ولو عاش لأرهق أبويه طُغيانًا وكفرًا".
صحيح: رواه مسلم في القدر (2661) عن عبد اللَّه بن مسلمة بن قعنب، حدّثنا معتمر بن سليمان، عن أبيه، عن رقبة بن مسقلة، عن أبي إسحاق، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، عن أُبي بن كعب، فذكره.
ورواه الشيخان -البخاريّ في التفسير (4727)، ومسلم في كتاب الفضائل (2380) - كلاهما من حديث سفيان بن عيينة، عن عمرو بن دينار، عن سعيد بن جبير، بإسناده في سياق طويل، سيأتي في موضعه.
وجاء فيه:"فبينما هما يمشيان على السّاحل إذا غلام يلعبُ مع الغِلْمان، فأخذ الخضرُ برأسه فاقتلعه بيده فقتله، فقال موسى: {قَالَ أَقَتَلْتَ نَفْسًا زَكِيَّةً بِغَيْرِ نَفْسٍ لَقَدْ جِئْتَ شَيْئًا نُكْرًا} [سورة الكهف: 74]".
উবাই ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই যে বালকটিকে খিযির হত্যা করেছিলেন, সে প্রকৃতিগতভাবে কাফির স্বভাবের ছিল। আর যদি সে বেঁচে থাকত, তবে সে তার পিতা-মাতাকে সীমালঙ্ঘন ও কুফরি দ্বারা জর্জরিত করত।"
1029 - عن أبي موسى الأشعريّ قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّ اللَّه خلق آدم من قبضة قبضها من جميع الأرض، فجاء بنو آدم على قدر الأرض، جاء منهم الأحمر، والأبيض والأسود، وبين ذلك، والسّهل والحزن، والخبيث والطيّب".
صحيح: رواه أبو داود (4693)، والترمذيّ (2958) كلاهما من حديث يحيى بن سعيد، عن عوف ابن أبي جميلة الأعرابيّ، عن قسامة بن زهير، عن أبي موسى الأشعريّ، فذكره، ولفظهما سواء.
وصحّحه ابن خزيمة، وأخرجه في كتاب التوحيد (101، 102) من هذا الوجه، كما أخرجه أيضًا الحاكم (2/ 261) من وجه آخر عن عوف، وقال:"هذا حديث صحيح الإسناد".
وقال الترمذيّ:"حسن صحيح".
قلت: وهو كما قال، وقسامة بن زهير المازنيّ البصريّ وثّقه العجليّ، وابن سعد، وذكره ابن حبان في"الثقات"، وبقية رجاله ثقات.
وقوله:"الحزن" أي الخشن والغليظ الطّبع.
আবূ মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা আদমকে সৃষ্টি করেছেন একটি মুষ্টি থেকে, যা তিনি পৃথিবীর সব স্থান থেকে গ্রহণ করেছিলেন। ফলে আদম সন্তানেরা পৃথিবীর (মাটির) প্রকৃতি অনুসারে এসেছে। তাদের মধ্যে এসেছে লাল, সাদা, কালো এবং এদের মাঝামাঝি (বর্ণের মানুষ); এবং এসেছে নরম-কোমল স্বভাবের, কঠোর-রূঢ় স্বভাবের, মন্দ ও ভালো প্রকৃতির লোক।”
1030 - عن أبي الدّرداء، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"خلق اللَّه آدم حين خلقه، فضرب كتفه اليمني، فأخرج ذريّة بيضاء كأنّهم الذّرُّ، وضرب كتفه اليسرى، فأخرج ذريّةً سوداء كأنّهم الْحُمَم. فقال للذي في يمينه: إلى الجنّة ولا أُبالي، وقال للذي في كفِّه اليسرى: إلى النّار ولا أبالي".
حسن: رواه أحمد (27488) عن هيثم -وقال عبد اللَّه بن أحمد: وسمعتُه أنا منه- قال: حدّثنا أبو الرّبيع، عن يونس، عن أبي إدريس، عن أبي الدّرداء، فذكره.
وإسناده حسن للكلام الذي في أبي الرّبيع.
ورواه البزّار -كشف الأستار (2144) - عن إبراهيم، ثنا الهيثم بن خارجة بإسناده، مثله. وقال:"لا نعلمه بروي بهذا اللفظ إلا بهذا الإسناد، وإسناده حسن".
وقال الهيثميّ في"المجمع" (7/ 185):"رواه أحمد، والبزّار، والطّبرانيّ، ورجاله رجال الصّحيح".
আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ তা‘আলা যখন আদমকে সৃষ্টি করলেন, তখন তিনি তাঁর ডান কাঁধে আঘাত করলেন। ফলে সেখান থেকে এমন শুভ্র (সাদা) বংশধর বের হলো, যেন তারা পিপীলিকার মতো (অসংখ্য)। আর তিনি তাঁর বাম কাঁধে আঘাত করলেন। ফলে সেখান থেকে এমন কালো বংশধর বের হলো, যেন তারা কালো অঙ্গার (বা ছাই)। অতঃপর তিনি তাঁর ডান দিকের বংশধরকে বললেন: জান্নাতের দিকে (যাও), আমি কোনো পরোয়া করি না। আর তিনি তাঁর বাম হাতের বংশধরকে বললেন: জাহান্নামের দিকে (যাও), আমি কোনো পরোয়া করি না।
1031 - عن أبي نضْرة أنّ رجلًا من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم يقال له: أبو عبد اللَّه دخل عليه أصحابه يعودونه وهو يبكي، فقالوا له: ما يُبكيك؟ ألم يقلْ لك رسولُ اللَّه صلى الله عليه وسلم:"خذْ من شارِبك، ثم أقرَّه حتّى تلقاني"؟ قال: بلى، ولكنّي سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إنّ اللَّه قبض بيمينه قبضةً، وأخرى باليد الأخرى، وقال: هذه لهذه، وهذه لهذه، ولا أُبالي". فلا أدري في أيّ القبضتين أنا؟ ! .
صحيح: رواه الإمام أحمد (17593، 17594، 20668) من طرق عن حمّاد بن سلمة، قال: أخبرنا سعيد الجريريّ، عن أبي نَضرة، فذكر مثله.
وسعيد الجريريّ -بضم الجيم، وفتح الرّاء المهملة- هو ابن إياس أبو مسعود، ثقة احتجّ به الشيخان، واختلط قبل موته بثلاث سنين، إِلَّا أنّ اختلاطه لم يكن فاحشًا.
قال أبو حاتم: تغيَّر حفظه قبل موته، فمن كتب عنه قديمًا فهو صالح، وهو حسن الحديث."الجرح والتعديل" (2/ 1 - 2).
قلت: وممن روى عنه قبل اختلاطه حمّاد بن سلمة، روى له مسلم من رواية حمّاد بن سلمة عنه في كتاب فضائل الصّحابة - باب فضائل أويس القرني (4/ 1968).
وحديث الباب، ذكره الهيثميّ في"المجمع" (7/ 186 - 187) وقال:"رواه أحمد ورجاله رجال الصّحيح".
আবু আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন তাঁর সঙ্গীরা তাঁকে দেখতে গেলেন, তখন তিনি কাঁদছিলেন। তাঁরা তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন: কীসে আপনাকে কাঁদাচ্ছে? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি আপনাকে বলেননি: "তুমি তোমার গোঁফ থেকে নাও (কেটে ছোট করো), তারপর আমাকে না পাওয়া পর্যন্ত (মৃত্যু পর্যন্ত) এটিকে এভাবেই রাখো"? তিনি বললেন: হ্যাঁ, (বলেছিলেন)। কিন্তু আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয় আল্লাহ তাঁর ডান হাতে একটি মুষ্টি নিলেন, আর অন্য হাতে আরেকটি মুষ্টি নিলেন। অতঃপর তিনি বললেন: এটি এর জন্য এবং এটি এর জন্য। আমি পরোয়া করি না।" সুতরাং আমি জানি না, আমি কোন মুষ্টির মধ্যে আছি!
1032 - عن ابن عمر، أنّ النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"هؤلاء لهذه، وهؤلاء لهذه". قال: فتفرَّق النَّاسُ وهم لا يختلفون في القدر.
صحيح: رواه البيهقيّ في القضاء والقدر (1/ 275 - 276) عن الحافظ أبي عبد اللَّه، حدّثنا أبو النَّضر الفقيه، حدّثنا أبو جعفر محمد بن عبد اللَّه الحضرميّ، والحسن بن سفيان، قالا: حدّثنا إبراهيم بن سعيد، حدّثنا أبو أحمد، عن سفيان، عن أيوب وإسماعيل بن أمية، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.
ورواه أيضًا بإسناده السّابق عن النَّضر بن أحمد البغداديّ الحافظ، حدّثنا إبراهيم بن سعيد، فذكره بإسناده إِلَّا أنّه قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"هؤلاء اللجنّة ولا أُبالي، وهؤلاء للنَّار ولا أبالي".
وذكره الهيثميّ في"المجمع" (7/ 186)، وعزاه إلى البزّار والطّبراني في الصّغير وقال:"رجال البزّار رجال الصّحيح".
ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "এরা এর জন্য, আর ওরা ওর জন্য।" বর্ণনাকারী বলেন: এরপর লোকেরা পৃথক হয়ে গেল, অথচ তারা তকদীরের (ভাগ্য) বিষয়ে কোনো মতপার্থক্য করত না।
1033 - عن هشام بن حكيم، أنّ رجلًا أتى النبيّ صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول اللَّه، أنبتدأ الأعمال أم قُضي القضاء؟ فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّ اللَّه عز وجل أخذ ذريّة آدم من ظهره، وأشهدهم على أنفسهم، ثم أفاض بهم في كفّيه فقال: هؤلاء للجنّة، وهؤلاء للنَّار، فأهل الجنّة ميسّرون لعمل أهل الجنّة، وأهل النّار ميسّرون لعمل أهل النّار".
حسن: رواه الفريابيّ في القدر (22)، وعنه الآجريّ في الشّريعة (330)، وابن أبي عاصم في السنة (168) كلّهم من حديث عمرو بن عثمان بن سعيد بن كثير بن دينار الحمصيّ، حدّثنا بقية بن الوليد، حدّثنا الزبيديّ، حدّثني راشد بن سعد، عن عبد الرحمن بن قتادة النّصيريّ، عن هشام بن حكيم، فذكره.
وإسناده حسن من أجل عمرو بن عثمان فإنّه"صدوق"، وبقية رجاله ثقات.
وبقية مدلّس، ولكنّه صرّح بالتحديث وقد تُوبع أيضًا، فرواه الفريابيّ (24) من وجه آخر عن راشد بن سعد، بإسناده، مثله.
ومَنْ رواه بخلاف هذا فقد أخطأ، فقد جاء الحديث عن عبد الرحمن، عن قتادة السّلميّ -وكان من أصحاب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إنّ اللَّه خلق آدم، وأخذ من ظهره، فقال: هؤلاء في الجنّة ولا أبالي، وهؤلاء في النّار ولا أبالي". فقال رجل: يا رسول اللَّه، على ماذا العمل؟ قال:"على مواقع القدر".
رواه الإمام أحمد (17660)، والفريابيّ في القدر (25، 26)، والحاكم (1/ 30) كلّهم من أوجه أخرى عن معاوية بن صالح، عن راشد بن سعد، عن عبد الرحمن بن قتادة السلميّ، فذكره.
قال الحاكم:"هذا حديث صحيح، قد اتفقا على الاحتجاج بروايته عن آخرهم إلى الصّحابة. وعبد الرحمن بن قتادة من بني سلمة من الصّحابة".
ولكن نقل الحافظ ابن حجر في"التعجيل" في ترجمة عبد الرحمن بن قتادة السلميّ بأنَّه صحابيّ، نزل الشّام، ونقل عن البخاريّ: أنّ الصّواب هو عن راشد عن عبد الرحمن عن هشام". ونقل عن ابن السّكن الاضطراب في الإسناد.
قلت: السّند الأوّل الذي ذكرته وهو أصح ما رُوي به هذا الحديث، وليس فيه اضطراب، والصحيح لا يُعلّل بالضّعيف.
وأمّا ما رُوي عن أنس بن مالك، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّ اللَّه قبض قبضةً فقال: للجنّة برحمتيّ، ونبض قبضةً فقال: للنّار ولا أُبالي". فهو ضعيف.
رواه أبو يعلى من طريق الحكم بن سنان الباهليّ، عن ثابت البنانيّ، عن أنس بن مالك، فذكره.
ومن هذا الطّريق رواه ابن أبي عاصم في السنة (248)، والبيهقي في القضاء والقدر (1/ 263 - 264)، والعقيليّ في الضعفاء (313).
والحكم بن سنان الباهليّ القِرَبيّ -بكسر القاف، وفتح الرّاء- أبو عون أهل العلم مطبقون على تضعيفه منهم: ابن معين، وابن سعد، وأبو داود والنسائيّ. وقال البخاريّ:"عنده وهم كثير". وقال ابن حبان:"ممن تفرّد عن الثقات بالأحاديث الموضوعات لا يشتغل به". وبه أعلّه الهيثميّ في"المجمع" (7/ 186) وقال العقيليّ:"لا يتابع عليه، وقد رُوي في القبضتين أحاديث بأسانيد صالحة".
قلت: هي التي ذكرتُها قبل.
وفي الباب عن عمر بن الخطّاب أنّه سئل عن هذه الآية: {وَإِذْ أَخَذَ رَبُّكَ مِنْ بَنِي آدَمَ مِنْ ظُهُورِهِمْ ذُرِّيَّتَهُمْ وَأَشْهَدَهُمْ عَلَى أَنْفُسِهِمْ أَلَسْتُ بِرَبِّكُمْ قَالُوا بَلَى شَهِدْنَا أَنْ تَقُولُوا يَوْمَ الْقِيَامَةِ إِنَّا كُنَّا عَنْ هَذَا غَافِلِينَ}
[سورة الأعراف: 172]، فقال عمر بن الخطّاب: سمعتُ رسولَ اللَّه صلى الله عليه وسلم يسأل عنها، فقال رسول اللَّه: صلى الله عليه وسلم:"إنّ اللَّه تبارك وتعالى خلق آدم، ثم مسح ظهره بيمينه فاستخرج منه ذريّة، فقال: خلقتُ هؤلاء للجنّة، وبعمل أهل الجنّة يعملون. ثم مسح ظهره فاستخرج منه ذريّةً فقال: خلقتُ هؤلاء للنَّار، وبعمل أهل النّار يعملون". فقال رجل: يا رسول اللَّه، ففيمّ العمل؟ قال: فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّ اللَّه إذا خلق العبد للجنّة استعمله بعمل أهل الجنّة حتّى يموت على عمل من أعمال أهل الجنّة فيدخلُه به الجنّة. وإذا خلق العبد للنَّار استعمله بعمل أهل النّار حتّى يموت على عمل من أعمال أهل النّار فيدخله به النّار".
رواه مالك في القدر (2) عن زيد بن أبي أُنيسة، عن عبد الحميد بن عبد الرحمن بن زيد بن الخطّاب، أنه أخبر عن مسلم بن يسار الجهنيّ، أن عمر بن الخطّاب سئل، فذكره.
ومن هذا الوجه رواه أبو داود (4703)، والترمذي (3075)، وابن أبي عاصم في السنة (196)، وصحّحه ابن حبان (6166)، والبيهقيّ في القضاء والقدر (1/ 260 - 263)، والحاكم (1/ 27) وقال:"صحيح على شرطهما".
وردّه الذّهبيّ فقال:"فيه إرسال".
قلت: وهو كما قال، وقال الترمذيّ:"حسن، ومسلم بن يسار لم يسمع من عمر. وقد ذكر بعضهم في هذا الإسناد بين مسلم بن يسار وبين عمر رجلًا".
قلت: قيل: إنّ الرّجل المبهم هو نعيم بن ربيعة، كما رواه أبو داود (4704) من وجه آخر عن زيد بن أبي أَنيسة، عن عبد الحميد بن عبد الرحمن، عن مسلم بن يسار، عنه، قال: كنتُ عند عمر ابن الخطّاب، فذكر الحديث، وحديث مالك أتم.
ومسلم بن يسار تفرّد عنه عبد الحميد بن عبد الرحمن بن زيد بن الخطّاب كما قال الذّهبيّ في"الميزان"، وإنّما ذكره ابن حبان في"الثقات" ولم يوثقه أحد يعتدّ به، ولذا قال فيه الحافظ"مقبول". أي لين الحديث لأنّه لم يتابع.
وشيخه نعيم بن ربيعة الأزديّ، قال فيه الذّهبيّ في الميزان:"لا يعرف". وإنّما ذكره ابن حبان في الثقات، هو لين الحديث أيضًا لأنه لم يتابع.
ورجَّح الرّواية المرسلة ابن عبد البر في"التمهيد" (6/ 4 - 5) وقال ابن كثير:"أسقط مالكٌ نعيم بنَ ربيعة عمدًا لما جهل حاله".
ولكن رجَّح الدارقطني الرواية المتصلة بذكر نعيم بن ربيعة على رواية مالك المرسلة، انظر العلل للدّارقطنيّ (2/ 222) وفي جميع الأحوال إسناده ضعيف، وإن كان روى معناه عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم من وجوه كثيرة، كما قال ابن عبد البر.
وقد رُوي من وجه آخر وفيه إرسال: رواه ابن وهب في القدر (20)، والفريابي في القدر (29،
30)، وابن أبي عاصم في السنة (161، 162) كلّهم من طرق عن الزّهريّ، عن سعيد بن المسيب، عن عمر بن الخطّاب، أنه قال: يا رسول اللَّه، أرأيتَ عملنا هذا على أمر قد فُرغ منه، أم على أمر نستقبله. فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"بل على أمر قد فُرغ منه". فقال عمر: ففيمَ العمل إذن؟ فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"كلٌّ لا ينال إِلَّا بالعمل". فقال عمر: إذن نجتهد.
وفيه سعيد بن المسيب لم يسمع من عمر بن الخطّاب، وله طرق موصولة بذكر أبي هريرة بين سعيد بن المسيب، وبين عمر بن الخطّاب إِلَّا أنّ الدَّارقطنِيّ رجّح إرساله.
وفي الباب أيضًا عن أبي قلابة، قال:"إنّ اللَّه عز وجل لما خلق آدمَ عليه السلام أخرج ذريّته، ثم نثرهم في كفِّه، ثم أفاضهم، فألقى التي في يمينه عن يمينه، والتي في يده الأخرى عن شماله ثم قال: هؤلاء لهذه ولا أبالي، وهؤلاء لهذه ولا أبالي، وكتب أهل النّار وما هم عاملون، وأهل الجنّة وما هم عاملون، وطوى الكتاب ورفع القلم".
رواه ابن وهب في"القدر" (12) عن جرير بن حازم، عن أيوب السَّختيانيّ، عن أبي قلابة، فذكر مثله موقوفًا، ولم يرفعه.
وأبو قلابة هو عبد اللَّه بن زيد بن عمرو الجرميّ، ثقة فاضل، كثير الإرسال كما في التقريب.
ورواه مسدد في"مسنده" كما في"المطالب العالية" (2967) عن حمّاد، عن أيوب، عن أبي قلابة، عن أبي صالح، فذكر مثله موقوفًا، فجعل الأثر لأبي صالح، وهو باذام -ويقال: باذان- مولى أم هانئ - قال الحافظ في"التقريب":"ضعيف، مدلّس". وقال الدَّارقطنيّ:"لا أدري من هو؟ !".
وكذلك لا يصح ما رُوي عن أبي هريرة مرفوعًا:"لما خلق اللَّه تعالى آدم ضرب بيده على شقّ آدم الأيمن، فأخرجَ ذروًا كالذّرِّ، قال: يا آدم هؤلاء ذريَّتَك من أهل الجنّة. ثم ضرب بيده على شقّ آدم الأيسر فأخرج ذروًا كالحمم ثم قال: هؤلاء ذريّتك من أهل النّار".
رواه الفريابي في القدر (421) عن محمد بن مصفّي، حدّثنا بقية بن الوليد، حدّثني مبشر بن عبيد، عن الزّهريّ، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة، فذكره.
وفي إسناده مبشر بن عبيد، رماه الإمام أحمد بالوضع، وقال الدَّارقطنيّ: متروك الحديث، والرّاوي عنه بقية بن الوليد، وفيه كلام وإن كان صرَّح هنا بالتّحديث.
وفي الباب أيضًا عن معاذ بن جبل.
رواه الإمام أحمد (22077)، وفيه البراء الغنوي وهو: ابن عبد اللَّه بن يزيد الغنويّ ضعّفه أبو داود والنسائيّ وغيرهما.
وفي الإسناد الحسن البصريّ وهو لم يدرك معاذ بن جبل.
بهاتين العلّتين علَّله الهيثميّ في"المجمع" (7/ 187) إِلَّا أنّه لم يعزه إلى أحمد، وإنّما عزاه إلى الطّبرانيّ في"الكبير" فقط.
وعن أبي موسى رواه البزّار -كشف الأستار (2143) -، والطبرانيّ في"الكبير"، و"الأوسط" قال الهيثميّ في"المجمع" (7/ 186) بعد أن عزاه إلى هؤلاء الثّلاثة:
"فيه روح بن المسيب قال ابن معين:"صويلح" وضعّفه غيره".
ومن طريقه أخرجه ابن أبي عاصم في السنة (203).
قلت: روح بن المسيب هو الكلبيّ البصريّ، قال فيه ابن عدي:"أحاديثه غير محفوظة". وقال ابن حبان:"يروي الموضوعات عن الثقات، لا تحلّ الرّواية عنه". انظر"الميزان" (2/ 61). وفي الإسناد شيخه يزيد الرَّقاشيّ وهو ضعيف أيضًا.
وسكت عنه الهيثميّ، والتّعليل به أولى.
وإذا روى الثقة المأمون خبرا تتوفر الدواعي على نقله لا يقبل تفرده، فكيف بمن هو دونه.
ورواه البيهقيّ في"القضاء والقدر" (1/ 254 - 255) من وجه آخر عن عبد اللَّه بن عمرو بن العاص - وكان النَّبيّ صلى الله عليه وسلم يفضّل. عبد اللَّه على أبيه، قال: خرج علينا رسولُ اللَّه صلى الله عليه وسلم ذات يوم قابضًا على كفيه، ومعه كتابان. فقال:"هذا كتابٌ من ربِّ العالمين" فذكر الحديث بمعناه يزيد وينقص، ومما زاد، قال: وقبل أن يستقروا نطفًا في الأصلاب، وقبل أن يصيروا نطفًا في الأرحام، إذ هم في الطّينة منجدلون، فليس زائد فيهم ولا ناقص منهم إجمال من اللَّه عليهم إلى يوم القيامة". وقال في آخره:"عدل من اللَّه عز وجل".
أخرجه من طريق بشر بن زكريّا، حدّثنا سعيد بن سنان، عن أبي الزّاهرية -حدير بن كريب-، عن عبد اللَّه بن عمرو بن العاص، فذكر مثله، إِلَّا أنّ فيه سعيد بن سنان وهو أبو مهدي الحنفيّ الكنديّ ضعيف جدًّا.
قال ابن عدي:"وعامّة ما يرويه، وخاصّة عن أبي الزّاهرية غير محفوظ".
وروي أيضًا عن ابن عباس، قال: خرج النبيُّ صلى الله عليه وسلم فسمع ناسًا من أصحابه يذكرون القدر، فقال:"إنّكم قد أخذتم في شعبتين بعدتي الغور، فيهما هلك أهل الكتاب من قبلكم". ولقد أخرج يومًا كتابًا، قال وهو يقرأ:"هذا كتابٌ من اللَّه الرحمن الرّحيم، فيه تسمية أهل الجنّة بأسمائهم، وأسماء آبائهم وقبائلهم وعشائرهم، لا ينقص منهم أحدٌ، فريقٌ في الجنّة، وفريق في السّعير".
رواه ابنُ بطّة في الإبانة (1277)، واللالكائيّ في أصول الاعتقاد (1083) كلاهما من حديث ابن وهب، قال: أخبرنا عبد الرحمن بن سلمان، عن عقيل، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكر مثله.
واللّفظ للالكائيّ، وأمّا ابن بطّة فلم يسق لفظه كاملًا.
وفيه عبد الرحمن بن سلمان وهو الحجري الرُّعيني المصريّ وهو وإن كان من رجال مسلم فقد ذكره البخاريّ في الضعفاء وقال: فيه نظر، وقال ابن يونس: يروي عن عقيل غرائب ينفرد بها، وهذا من روايته عنه.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن ابن عمر، قال: خرج علينا رسولُ اللَّه صلى الله عليه وسلم قابضًا على شيء في يده، ففتح يده اليمنيّ، فقال: بسم اللَّه الرحمن الرحيم، كتاب من الرّحمن الرّحيم، فيه أهل الجنّة بأعدادهم وأسمائهم وأحسابهم، يُجمل عليهم إلى يوم القيامة، لا ينقص منهم أحد، ولا يُزاد فيهم أحد، وقد يُسلك بالسَّعيد طريقُ الشَّقاء حتّى يقال: هو منهم، ما أشبهه بهم! ثم يزال إلى سعادته قبل موته ولو بفواق ناقة. وفتح يده اليسرى فقال: بسم اللَّه الرّحمن الرّحيم، كتابٌ من الرّحمن الرّحيم، فيه أهل النّار بأعدادهم وأسمائهم وأحسابهم، يُجمل عليهم إلى يوم القيامة، لا يَنقص منهم! ولا يُزاد فيهم أحد، وقد يسلك بالأشقياء طريقُ أهل السّعادة حتّى يقال: هو منهم، وما أشبهه بهم، ثم يدرك أحدَهم شقاؤه قبل موته ولو بفواق ناقة"، ثم قال رسولُ اللَّه صلى الله عليه وسلم:"العمل
بخواتيمه، العمل بخواتيمه، ثلاثًا". فهو ضعيف.
رواه البزّار -كشف الأستار (2156) - عن زياد بن يحيى أبي الخطّاب، ثنا عبد اللَّه بن ميمون المكيّ، عن عبيد اللَّه بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.
ورواه اللالكائيّ في"أصول الاعتقاد" (1088) من وجه آخر عن عبد اللَّه بن ميمون القداح بإسناده، مثله.
قال البزّار:"لا نعلم رواه عن عبيد اللَّه إِلَّا عبد اللَّه بن ميمون وهو صالح".
قلت: عبد اللَّه بن ميمون القداح ليس بصالح، بل أهل العلم مطبقون على تضعيفه حتى قال الحاكم:"روى عن عبيد اللَّه بن عمر أحاديث موضوعة. ومن أجله ضعّفه الهيثميّ في"المجمع" (7/ 212).
وفي الباب أحاديث عن البراء بن عازب، وابن عباس، وعبد اللَّه بن بسر، وعلي بن أبي طالب كلها ضعيفة.
হিশাম ইবনে হাকীম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে একজন লোক নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: হে আল্লাহর রসূল! আমরা কি কাজ নতুনভাবে শুরু করি নাকি (তা ভাগ্যলিপিতে) নির্ধারিত হয়ে আছে? রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আল্লাহ তা‘আলা আদমের পৃষ্ঠদেশ থেকে তার বংশধরদের বের করলেন এবং তাদের নিজেদের ওপর সাক্ষ্য গ্রহণ করলেন। অতঃপর তাদেরকে তাঁর দুই হাতের মুঠোয় ঢেলে (বিভক্ত করে) দিলেন এবং বললেন: এরা জান্নাতের জন্য, আর এরা জাহান্নামের জন্য। সুতরাং জান্নাতবাসীদের জন্য জান্নাতবাসীদের কাজ সহজ করা হয়েছে, আর জাহান্নামবাসীদের জন্য জাহান্নামবাসীদের কাজ সহজ করা হয়েছে।
1034 - عن سهل بن سعد، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ الرّجل ليعمل عمل أهل الجنّة، فيما يبدو للنّاس وهو من أهل النّار، وإنَّ الرّجل ليعمل عمل أهل النّار فيما يبدو للنّاس، وهو من أهل الجنّة".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الجهاد والسير (2898)، ومسلم في القدر (12) هكذا مختصرًا - كلاهما عن قتيبة بن سعيد، حدّثنا يعقوب بن عبد الرحمن القاري، عن أبي حازم، عن سهل بن سعد، فذكره ورواه مسلم في الإيمان (112) بالتفصيل وهو عن سهل بن سعد الساعدي أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم التقى هو والمشركون فاقتلوا، فلما مال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم إلى عسكره. ومال الآخرون إلى عسكرهم. وفي أصحاب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم رجل لا يدع لهم شاذة إِلَّا اتبعها بضربها بسيفه، فقالوا: ما أجزأ منا اليوم أحد كما أجزأ فلان. فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أما إنه من أهل النّار" فقال رجل من القوم: أنا صاحبه أبدًا. قال فخرج معه. كلما وقف وقف معه. وإذا أسرع أسرع معه. قال فجرح الرجل جرحًا شديدًا. فاستعجل الموت فوضع نصل سيفه بالأرض وذبابه بين ثدييه. ثم تحامل على سيفه فقتل نفسه. فخرج الرجل إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال: أشهد أنك رسول اللَّه. قال:"وما ذاك؟" قال: الرجل الذي ذكرت آنفا أنه من أهل النّار. فأعظم النّاس ذلك. فقلت: أنا لكم به. فخرجت في طلبه حتى جرح جرحًا شديدًا. فاستعجل الموت. فوضع نصل سيفه بالأرض وذبابه بين ثديه. ثم تحامل عليه فقتل نفسه. فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عند ذلك"إن الرجل ليعمل عمل أهل الجنّة فيما يبدو للناس وهو من أهل النّار. وإن الرجل ليعمل عمل أهل النّار فيما يبدو للناس وهو من أهل الجنّة".
وعند البخاريّ في القدر (6607) من وجه آخر عن أبي حازم:"وإنّما الأعمال بالخواتيم".
সহল ইবনে সাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই কোনো ব্যক্তি মানুষের দৃষ্টিতে জান্নাতবাসীর কাজ করে, অথচ সে জাহান্নামবাসী। আর নিশ্চয়ই কোনো ব্যক্তি মানুষের দৃষ্টিতে জাহান্নামবাসীর কাজ করে, অথচ সে জান্নাতবাসী।"
1035 - عن أبي هريرة، قال: شهدنا مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم خيبر فقال لرجل ممن يدّعي الإسلام:"هذا من أهل النّار". فلما حضر القتال قاتل الرّجلُ قتالًا شديدًا، فأصابته جراحة. فقيل: يا رسول اللَّه الذي قلتَ إنّه من أهل النّار فإنّه قد قاتل اليوم قتالًا شديدًا، وقد مات! فقال النّبيّ صلى الله عليه وسلم:"إلى النّار". قال: فكاد بعضُ النّاس أن يرتاب فبينما هم على ذلك، إذ قيل: إنّه لم يمت، ولكنَّ به جراحا شديدًا. فلما كان من اللّيل لم يصبرْ على الجراح فقتل نفسَه، فأُخبر النبيُّ صلى الله عليه وسلم بذلك فقال:"اللَّه أكبر! أشهدُ أني عبد اللَّه ورسوله". ثم أمر بلالًا فنادى بالنّاس:"إنّه لا يدخل الجنّة إِلَّا نفسٌ مسلمةٌ، وإنَّ اللَّه ليؤيِّدُ هذا الدِّينَ بالرَّجُل الفاجر".
وفي رواية: شهدنا مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم خيبر فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لرجل ممن معه يدعي الإسلام:"هذا من أهل النّار". فلمّا حضر القتالُ قاتل الرّجلُ من أشدِّ القتال، وكثرت به الجراح فَأَثْبَتَتَه فجاء رجلٌ من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول اللَّه أرأيت الذي تحدَّثْتَ أنه من أهل النّار قد قاتل في سبيل اللَّه من أشدّ القتال، فكثرت به الجراح فقال النبيّ صلى الله عليه وسلم:"أما إنّه من أهل النّار". فكاد بعض المسلمين يرتاب فبينما هو على ذلك إذْ وَجد الرَّجُلُ أَلَمَ الجراح فأهوى بيده إلى كنانته فانتزع منها سَهْمًا فانتحر بها فاشتَدَّ رجال من المسلمين إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقالوا: يا رسول اللَّه، صدق اللَّهُ حديثك قد انتحر فلان، فقتل نفسه فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"يا بلال قُمْ فأذِّن: لا يدخل الجنّةَ إِلَّا مؤمنٌ، وإنَّ اللَّه ليؤَيِّدُ هذا الدِّين بالرَّجُل الفاجر".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الجهاد والسير (3062)، ومسلم في الإيمان (111) كلاهما من حديث عبد الرزّاق، أخبرنا معمر، عن الزّهريّ، عن ابن المسيب، عن أبي هريرة، فذكره.
والرّواية الثانية عند البخاريّ في القدر (6606) من وجه آخر عن معمر، بإسناده، مثله.
وقوله:"فأثبتته" أي جعلته ساكنًا لا حركة له من شدّة جراحه.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে খাইবারের যুদ্ধে উপস্থিত ছিলাম। তিনি এমন এক ব্যক্তি সম্পর্কে বললেন, যে ইসলামের দাবিদার ছিল: "এ ব্যক্তি জাহান্নামী।"
এরপর যখন যুদ্ধ শুরু হলো, লোকটি প্রচণ্ডভাবে যুদ্ধ করল এবং আঘাতপ্রাপ্ত হলো। তখন বলা হলো: "হে আল্লাহর রাসূল! আপনি যাকে জাহান্নামী বলেছিলেন, সে তো আজ প্রচণ্ড যুদ্ধ করেছে এবং মৃত্যুবরণ করেছে!" নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে জাহান্নামীই।"
বর্ণনাকারী বলেন: এতে কিছু লোক প্রায় সন্দেহে পড়ে গিয়েছিল। তারা এই অবস্থায় থাকতেই বলা হলো: "সে মারা যায়নি, কিন্তু সে মারাত্মকভাবে আহত হয়েছে।" যখন রাত হলো, সে আঘাতের যন্ত্রণা সহ্য করতে পারল না। সে তার তূণ থেকে একটি তীর বের করে তা দিয়ে আত্মহত্যা করল।
নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এই বিষয়ে জানানো হলে তিনি বললেন: "আল্লাহু আকবার! আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আমি আল্লাহর বান্দা ও তাঁর রাসূল।" অতঃপর তিনি বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে নির্দেশ দিলেন, যেন তিনি লোকদের মধ্যে ঘোষণা দেন: "মুসলিম (বা মুমিন) আত্মা ছাড়া কেউ জান্নাতে প্রবেশ করবে না। আর নিশ্চয় আল্লাহ তা'আলা এই দীনকে পাপী ব্যক্তি দ্বারাও সাহায্য করেন।"
1036 - عن أبي هريرة، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ الرَّجلَ ليعملُ الزَّمَنَ الطّويلَ بعملِ أهل الجنّة، ثم يُخْتَمُ لهُ عملُهُ بعمل أهل النّار. وإنَّ الرجل ليعملُ الزَّمنَ الطّويلَ بعمل أهل النّار، ثم يُختم له عملُه بعمل أهل الجنّة".
صحيح: رواه مسلم في القدر (2651) عن قتيبة بن سعيد، حدّثنا عبد العزيز (يعني ابن محمد)، عن العلاء، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.
وأمّا ما رُوي مرفوعًا:"إنّ الرّجل ليعمل -أو قال: يعمل- بعمل أهل النّار سبعين سنة، ثم يُختم له بعمل أهل الجنّة، ويعمل العامل سبعين سنة بعمل أهل الجنّة، ثم يُختم له بعمل أهل النّار". فهو ضعيف.
رواه البزّار -كشف الأستار (2158) -، والطبرانيّ في"المعجم الأوسط" (2448)، عبد اللَّه ابن وهب في القدر (48) كلّهم من طريق عبد اللَّه بن عمر، عن خبيب بن عبد الرحمن، عن حفص ابن عاصم، عن أبي هريرة، فذكره.
عبد اللَّه بن عمر وهو ابن حفص بن عاصم بن عمر بن الخطّاب المدنيّ، أهل العلم مطبقون على تضعيفه.
وأمّا الهيثميّ فقال في"المجمع" (7/ 217):"رواه الطبرانيّ في الأوسط، ورجاله رجال الصّحيح". لأنّ عبد اللَّه بن عمر بن حفص، أخرج له مسلم.
আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই একজন ব্যক্তি দীর্ঘ সময় ধরে জান্নাতবাসীদের আমল করতে থাকে, কিন্তু অবশেষে তার আমল জাহান্নামবাসীদের আমলের মাধ্যমে সমাপ্ত হয়। আর নিশ্চয়ই একজন ব্যক্তি দীর্ঘ সময় ধরে জাহান্নামবাসীদের আমল করতে থাকে, কিন্তু অবশেষে তার আমল জান্নাতবাসীদের আমলের মাধ্যমে সমাপ্ত হয়।"
1037 - عن عائشة، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ الرّجلَ ليعمل بعمل أهل الجنّة، وإنّه لمكتوب في الكتاب من أهل النّار، فإذا كان قبل موته تحوَّل فعمل بعمل أهل النّار فمات، فدخل النّار. وإنَّ الرّجل ليعمل بعمل أهل النّار، وإنّه لمكتوب في الكتاب من أهل الجنّة، فإذا كان قبل موته تحوَّل، فعمل بعمل أهل الجنّة، فمات، فدخل الجنّة".
صحيح: رواه الإمام أحمد (24762)، وأبو يعلى (46668)، والبيهقي في القضاء والقدر (1/ 322 - 323) كلّهم من طرق عن حمّاد بن سلمة، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته.
ورواه ابن أبي عاصم في السنة (252)، وصحّحه ابن حبان (346) كلاهما من وجه آخر عن هشام بن عروة، بإسناده، مثله.
وأورده الهيثميّ في"المجمع" (7/ 211 - 212) وقال:"رواه أحمد، وأبو يعلى بأسانيد، وبعض أسانيدها رجاله رجال الصّحيح".
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: নিশ্চয়ই কোনো ব্যক্তি জান্নাতবাসীদের আমল করতে থাকে, অথচ আল্লাহর কিতাবে (তাকদীরে) সে জাহান্নামবাসীদের অন্তর্ভুক্ত হিসেবে লিপিবদ্ধ। অতঃপর তার মৃত্যুর পূর্ব মুহূর্তে সে পরিবর্তিত হয়ে যায় এবং জাহান্নামবাসীদের আমল করে মারা যায়, ফলে সে জাহান্নামে প্রবেশ করে। আর নিশ্চয়ই কোনো ব্যক্তি জাহান্নামবাসীদের আমল করতে থাকে, অথচ আল্লাহর কিতাবে সে জান্নাতবাসীদের অন্তর্ভুক্ত হিসেবে লিপিবদ্ধ। অতঃপর তার মৃত্যুর পূর্ব মুহূর্তে সে পরিবর্তিত হয়ে যায় এবং জান্নাতবাসীদের আমল করে মারা যায়, ফলে সে জান্নাতে প্রবেশ করে।
1038 - عن أنس، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا عليكم أن لا تُعْجَبُوا بأحدٍ حتّى تنظروا بِمَ يُخْتم له، فإنّ العاملَ يعمل زمانًا من عمره، أو بُرهةً من دهره بعمل صالح، لو مات عليه دخل الجنّةَ، ثم يتحوَّلُ فيعملُ عمَلًا سيِّئًا، وإنَّ العبد لَيْعُملُ البُرْهَةَ من دهرٍ بعملٍ سيء، لو مات عليه دخل النّار، ثم يتحوَّل فيعملُ عملًا صالحًا. وإذا أراد اللَّه بعبد خيرًا استعمله قبل مَوْته". قالوا: يا رسول اللَّه، وكيف يستعمله؟ قال:"يوفِّقه لعملٍ صالِحٍ، ثم يَقْبضُه عليه".
صحيح: رواه أحمد (12214) عن يزيد بن هارون، أخبرنا حُميد، عن أنس، فذكره.
ورواه أبو يعلى (3840)، والبيهقيّ في القضاء والقدر (1/ 323) كلاهما من طريق يزيد بن هارون، بإسناده، مثله. وإسناده صحيح.
وأخرجه ابن أبي عاصم في السنة (393 - 398)، والبزّار -كشف الأستار (2157) - كلاهما من طرف عن حميد، به، مختصرًا ومطوَّلًا.
قال الهيثميّ في"المجمع" (7/ 211): رواه أحمد، وأبو يعلى، والبزَّار، والطبرانيَّ في الأوسط، ورجاله رجال الصّحيح".
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তোমাদের উচিত নয় যে তোমরা কারও কাজ দেখে মুগ্ধ হও যতক্ষণ না তোমরা দেখো তার সমাপ্তি কী দ্বারা হচ্ছে। কারণ, একজন আমলকারী তার জীবনের দীর্ঘ সময় বা একটি সময় ধরে নেক কাজ করে, যদি সে এর উপর মারা যেত, তবে সে জান্নাতে প্রবেশ করত। এরপর সে পরিবর্তিত হয়ে খারাপ কাজ করতে শুরু করে। আর নিশ্চয়ই কোনো বান্দা একটি দীর্ঘ সময় ধরে মন্দ কাজ করতে থাকে, যদি সে এর উপর মারা যেত, তবে সে জাহান্নামে প্রবেশ করত। এরপর সে পরিবর্তিত হয়ে সৎ কাজ করতে শুরু করে। আর আল্লাহ যখন কোনো বান্দার জন্য কল্যাণ চান, তখন মৃত্যুর পূর্বে তাকে কাজে লাগিয়ে নেন। সাহাবাগণ জিজ্ঞেস করলেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! কীভাবে তিনি তাকে কাজে লাগান? তিনি বললেন: তাকে সৎ কাজ করার তাওফীক দান করেন, এরপর তার উপরই তাকে মৃত্যু দেন।
1039 - عن عدي بن عدي قال: سمعتُ العرسَ -وكان من أصحاب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول: سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إنّ العبد ليعمل بعمل أهل النّار، ثم تعرض له الجادة من جَوادّ الجنّة فيعمل بها حتّى يموت عليها، وذلك لما كتب. وإنَّ الرّجلَ ليعمل بعمل أهل الجنّة البُرهة من دهره، ثم تُعرض له الجادَّةُ من جوادِّ أهل النّار فيعمل بها حتّى يموت عليها، وذلك لما كتب عليه".
صحيح: رواه البزّار -كشف الأستار (2159) - عن إبراهيم بن عبد اللَّه بن الجنيد، ثنا سعيد بن كثير بن عفير، ثنا عبد اللَّه بن وهب، عن يونس بن يزيد، عن ابن أبي عبلة، عن عدي بن عديّ، فذكره.
ورواه ابنُ أبي عاصم في"السنة" (119) من وجه آخر عن سعيد بن كثير، بإسناده، مثله موقوفًا على العرس إِلَّا أنّه قال في آخر الحديث:"أحسبه عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم". وإسناده صحيح.
وابن أبي عبلة اسمه إبراهيم السّامي من رجال الجماعة.
قال الهيثميّ في"المجمع" (7/ 212):"رواه البزّار والطَّبرانيّ في الصّغير والكبير، ورجالهم ثقات".
وعرس: هو ابن قيس بن سعيد بن الأرقم الكندي له صحبة، وقد ينسب إلى أمِّه"عميرة".
আল-উরস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “নিশ্চয়ই কোনো বান্দা এমন কাজ করে যা জাহান্নামবাসীদের কাজ। অতঃপর তার সামনে জান্নাতের পথসমূহের মধ্য থেকে একটি পথ প্রকাশ পায়। তখন সে সেই অনুযায়ী আমল করতে থাকে, যতক্ষণ না সে এর উপর মৃত্যুবরণ করে। আর এটাই হলো তার জন্য যা লিপিবদ্ধ করা হয়েছে। এবং নিশ্চয়ই কোনো ব্যক্তি তার জীবনের একটি দীর্ঘ সময় জান্নাতবাসীদের মতো আমল করে। অতঃপর তার সামনে জাহান্নামবাসীদের পথসমূহের মধ্য থেকে একটি পথ প্রকাশ পায়। তখন সে সেই অনুযায়ী আমল করতে থাকে, যতক্ষণ না সে এর উপর মৃত্যুবরণ করে। আর এটাই হলো তার উপর যা লিপিবদ্ধ করা হয়েছে।”
1040 - عن عائشة، أنّ النّبيَّ صلى الله عليه وسلم قال:"إنّما الأعمالُ بالخواتيم".
حسن: رواه ابن حبان في صحيحه (340) عن عبد اللَّه بن صالح البخاريّ ببغداد، حدّثنا الحسن ابن علي الحلوانيّ، قال: حدّثنا نُعيم بن حمّاد، قال: حدّثنا عبد العزيز بن أبي حازم، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته.
إسناده حسن من أجل نعيم بن حمّاد وهو ابن معاوية بن الحارث الخزاعيّ أبو عبد اللَّه المروزيّ، وثقه الإمام أحمد، وابن معين، والعجليّ وغيرهم، وأُنْكرَ عليه روايته بعض الأحاديث، وقد تتبّعها ابن عدي في الكامل (7/ 2482 - 2485) وقال:"وعامّة ما أنكر عليه هو هذا الذي ذكرتُه، وأرجو أن يكون باقي حديثه مستقيمًا".
وحديث عائشة ليس فيما ذكره ابن عدي مما أنكر على نعيم بن حمّاد، ثم يشهد له حديث معاوية الآتي.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই আমলসমূহ (বা কাজ) তার সমাপ্তির উপর নির্ভরশীল।"