আল-জামি` আল-কামিল
10488 - عن شهر بن حوشب أنه سمع ابن غنم: لما دخلنا مسجد الجابية أنا وأبو الدرداء لقينا عبادة بن الصامت، فأخذ يميني بشماله وشمال أبي الدرداء بيمينه، فخرج يمشي بيننا ونحن ننتجي والله أعلم بما نتناجى وذاك قوله، فقال عبادة بن الصامت: لئن طال بكما عمر أحدكما أو كلاكما لتوشكان أن تريا الرجل من ثبج المسلمين - يعني من وسط - قرأ القرآن على لسان محمد صلى الله عليه وسلم. فأعاده وأبداه، وأحل حلاله، وحرم حرامه، ونزل عند منازله، أو قرأه على لسان أخيه قراءة على لسان محمد صلى الله عليه وسلم، فأعاده
وأبداه، وأحل حلاله، وحرم حرامه، ونزل عند منازله، لا يحور فيكم إلا كما يحور رأس الحمار الميت. قال: فبينا نحن كذلك إذ طلع شداد بن أوس وعوف بن مالك، فجلسا إلينا، فقال شداد: إن أخوف ما أخاف عليكم أيها الناس لما سمعت من رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من الشهوة الخفية والشرك" فقال عبادة بن الصامت وأبو الدرداء: اللهم غفرا، أو لم يكن رسول الله صلى الله عليه وسلم قد حدثنا:"إن الشيطان قد يئس أن يعبد في جزيرة العرب"؟ فأما الشهوة الخفية فقد عرفناها، هي شهوات الدنيا من نسائها وشهواتها، فما هذا الشرك الذي تخوفنا به يا شداد؟ فقال شداد: أرأيتكم لو رأيتم رجلا يصلي لرجل، أو يصوم له، أو يتصدق له، أترون أنه قد أشرك. قالوا: نعم والله، إنه من صلى لرجل، أو صام له، أو تصدق له، لقد أشرك. فقال شداد: فإني قد سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من صلى يرائي فقد أشرك، ومن صام يرائي فقد أشرك، ومن تصدق يرائي فقد أشرك" فقال عوف بن مالك عند ذلك: أفلا يعمد إلى ما ابتغي فيه وجهه من ذلك العمل كله، فيقبل ما خلص له، ويدع ما يشرك به؟ فقال شداد عند ذلك: فإني قد سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إن الله عز وجل يقول: أنا خير قسيم لمن أشرك بي، من أشرك بي شيئا فإن حشده عمله قليله وكثيره لشريكه الذي أشركه به، وأنا عنه غني".
حسن: رواه أحمد (17140) واللفظ له، والطبراني في الكبير (7/ 337)، والحاكم (4/ 329)، وأبو نعيم في الحلية (1/ 268 - 269) كلهم من حديث عبد الحميد بن بهرام، عن شهر بن حوشب أنه سمع عبد الرحمن بن غنم يقول: فذكره.
إلا أن البعض لم يذكر فيه سماعه من عبد الرحمن بن غنم.
وإسناده حسن من أجل الكلام في شهر بن حوشب غير أنه حسن الحديث، فقد وثّقه ابن معين وأحمد ويعقوب بن سفيان والبخاري وغيرهم، وتكلم فيه شعبة وأبو حاتم والنسائي وابن حبان وغيرهم، وسبب كلامهم أنه كان يخطيء كثيرا فإذا ثبت خطؤه ضعِّف وإلا فهو حسن الحديث.
وأما عبد الحميد بن بهرام فهو ممن ضبط حديث شهر بن حوشب إلا أنه لم يرتق إلى درجة الثقة فإنه حسن الحديث أيضا.
وقد حسّنه أيضا الهيثمي في المجمع (10/ 53).
وقال:"إن الولد مبخلة مجبنة، وإن آخر وطأة وطئها الرحمن بوج".
رواه أحمد (17562) عن عفان، حدثنا وهيب، حدثنا عبد الله بن عثمان بن خثيم، عن سعيد بن أبي راشد، عن يعلى العامري، فذكره.
وسعيد بن أبي راشد لم يرو عنه غير عبد الله بن عثمان بن خثيم ولم يوثّقه غير ابن حبان وهو معروف بالتساهل في توثيق من لم يُعرف فيه جرح.
ورُوي عن خولة بنت حكيم أن رسول الله صلى الله عليه وسلم خرج محتضنا أحد ابني ابنته وهو يقول:"والله إنكم لتجبنون وتبخلون وإنكم لمن ريحان الله عز وجل، وإن آخر وطأة وطئها الله بوجّ. وقال سفيان مرة: إنكم لتبخلون وإنكم لتجبنون".
رواه الترمذي (1910)، وأحمد (27314) - واللفظ له - كلاهما من طريق سفيان، عن إبراهيم بن ميسرة (هو الطائفي)، عن ابن أبي سُويد، عن عمر بن عبد العزيز، قال: زعمت المرأة الصالحة خولة بنت حكيم فذكرتْه.
وعمر بن عبد العزيز لا يُعرف له سماع من خولة بنت حكيم ذكره العلائي عن الحافظ الضياء.
وابن أبي سُويد هو: محمد لم يرو عنه إلا إبراهيم بن ميسرة ولم يوثقه غير ابن حبان وهو معروف بالتساهل في توثيق من لم يُعرف فيه جرح.
উবাদাহ ইবনে আস-সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত— (আব্দুর রহমান ইবনে গানাম বললেন:) যখন আমি ও আবুদ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জাবিয়ার মসজিদে প্রবেশ করলাম, তখন আমাদের সাথে উবাদাহ ইবনে আস-সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দেখা হলো। তিনি আমার ডান হাত তাঁর বাম হাত দ্বারা এবং আবুদ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বাম হাত তাঁর ডান হাত দ্বারা ধরলেন। এরপর তিনি আমাদের মাঝে হাঁটতে লাগলেন, আর আমরা ফিসফিস করে কথা বলছিলাম। আমরা কী বিষয়ে ফিসফিস করছিলাম, তা আল্লাহই ভালো জানেন। তিনি (উবাদাহ) বললেন: তোমাদের দুজনের বা দুজনের একজনের জীবন যদি দীর্ঘ হয়, তবে তোমরা অচিরেই এমন লোক দেখতে পাবে, যারা সাধারণ মুসলমানদের মধ্য থেকে—অর্থাৎ মধ্যবর্তী শ্রেণী থেকে—মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ভাষায় কুরআন অধ্যয়ন করেছে। তারা তা বারবার আবৃত্তি করেছে ও মুখস্থ করেছে, এর হালালকে হালাল বলে গ্রহণ করেছে, হারামকে হারাম বলে বর্জন করেছে এবং এর বিধান অনুযায়ী জীবন পরিচালনা করেছে। অথবা তারা তাদের ভাইয়ের (অন্যের) কাছ থেকে তা এমনভাবে পাঠ করেছে, যেন তা মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মুখ থেকেই পাঠ করা হয়েছে। তারা তা বারবার আবৃত্তি করেছে, হালালকে হালাল করেছে, হারামকে হারাম করেছে এবং এর বিধান মেনে চলেছে। কিন্তু তারা তোমাদের মাঝে এমনভাবে পরিবর্তন ঘটাবে না, যেভাবে মরা গাধার মাথা পরিবর্তিত হয় (অর্থাৎ তারা শুধু বাহ্যিক জ্ঞান নেবে, আমল করবে না)।
তিনি (ইবনে গানাম) বললেন: আমরা যখন এই অবস্থায় ছিলাম, তখন শাদ্দাদ ইবনে আউস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং আউফ ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেখানে এলেন এবং আমাদের সাথে বসলেন। তখন শাদ্দাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে লোক সকল! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে আমি যা বলতে শুনেছি, সেগুলির মধ্যে আমি তোমাদের জন্য সবচেয়ে বেশি ভয় করি 'গোপন কামনা (শাহওয়াতুল খাফিয়্যাহ)' এবং 'শির্কের' ব্যাপারে।
তখন উবাদাহ ইবনে আস-সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও আবুদ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর কাছে ক্ষমা প্রার্থনা করছি! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি আমাদের বলেননি যে, “শয়তান আরবের উপদ্বীপে তার উপাসনা করা হবে এই বিষয়ে নিরাশ হয়েছে”? আর গোপন কামনার কথা—তা তো আমরা জানি, তা হলো নারী ও অন্যান্য বিষয়ের দুনিয়াবি কামনা-বাসনা। তাহলে তুমি যে শির্কের ভয় দেখাচ্ছো, হে শাদ্দাদ, সেটা কী?
শাদ্দাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তোমাদের কী মনে হয়, তোমরা যদি কোনো ব্যক্তিকে দেখতে পাও যে, সে অন্য কোনো ব্যক্তির জন্য সালাত আদায় করছে, বা তার জন্য সওম পালন করছে, বা তার জন্য সাদাকাহ করছে, তবে কি তোমরা মনে করবে যে, সে শির্ক করেছে? তারা বললেন: হ্যাঁ, আল্লাহর শপথ! যে ব্যক্তি কোনো লোকের জন্য সালাত আদায় করে, বা তার জন্য সওম পালন করে, বা তার জন্য সাদাকাহ করে, সে অবশ্যই শির্ক করেছে। তখন শাদ্দাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তাহলে আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “যে ব্যক্তি লোক দেখানোর উদ্দেশ্যে সালাত আদায় করে, সে শির্ক করে। যে ব্যক্তি লোক দেখানোর উদ্দেশ্যে সওম পালন করে, সে শির্ক করে। এবং যে ব্যক্তি লোক দেখানোর উদ্দেশ্যে সাদাকাহ করে, সে শির্ক করে।”
তখন আউফ ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তবে কি আল্লাহ সেই সব আমলের মধ্য থেকে শুধু সেই অংশটুকু গ্রহণ করবেন না, যা তাঁর সন্তুষ্টির উদ্দেশ্যে করা হয়েছে? আর বাকি যা দ্বারা শির্ক করা হয়েছে, তা কি তিনি বর্জন করবেন না? তখন শাদ্দাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি, তিনি বলেছেন: “নিশ্চয়ই আল্লাহ আয্যা ওয়াজাল বলেন: যে ব্যক্তি আমার সাথে শির্ক করে, আমি তার জন্য শ্রেষ্ঠ অংশীদার। যে ব্যক্তি আমার সাথে কোনো কিছুকে শরীক করে, তার ছোট ও বড় সকল আমল সেই শরীকের জন্য হবে, যাকে সে আমার সাথে শরীক করেছে। আর আমি তার থেকে সম্পূর্ণ মুখাপেক্ষীহীন।”
10489 - عن * *
১০৪৮৯ - থেকে বর্ণিত...
10490 - عن أبي بكرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"الزمان قد استدار كهيئة يوم خلق السموات والأرض، السنة اثنا عشر شهرا، منها أربعة حرم، ثلاثة متواليات: ذو القعدة، وذو الحجة، والمحرم، ورجب مضر الذي بين جمادى وشعبان …" الحديث.
متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (4406)، ومسلم في القسامة (1679: 29) كلاهما من طريق عبد الوهاب الثقفي، حدثنا أيوب، عن محمد بن سيرين، عن ابن أبي بكرة، عن أبي بكرة فذكره.
قوله:"رجب مضر" كان بين مضر وبين ربيعة اختلاف في شهر رجب، فكانت مضر تجعل رجبا هذا الشهر المعروف الذي بين جمادى وشعبان، وكانت ربيعة تجعله رمضان، فلهذا أضافه النبي صلى الله عليه وسلم إلى مضر. وقيل: لأنهم كانوا يعظّمونه أكثر من غيرهم.
আবূ বাকরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সময় (এখন) ঐ রূপ ধারণ করেছে, যে রূপে আল্লাহ আকাশমণ্ডলী ও পৃথিবী সৃষ্টি করেছিলেন। বছর হলো বারো মাসে, এর মধ্যে চারটি মাস হলো সম্মানিত (হারাম মাস)। এর মধ্যে তিনটি হলো লাগাতার: যুল-কা‘দাহ, যুল-হাজ্জাহ ও মুহাররম। আর (চতুর্থটি হলো) মুদার গোত্রের রজব মাস, যা জুমাদা (আখিরাহ) ও শা‘বানের মধ্যবর্তী।"
10491 - عن ابن عباس: أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم خطب النّاس يوم النّحر فقال:"يا أيُّها النّاسُ، أيُّ يوم هذا؟"، قالوا: يومٌ حرام. قال:"فأيُّ بلد هذا؟"، قالوا: بلدٌ حرام. قال:"فأيُّ شهرٍ هذا؟"، قالوا: شهرٌ حرامٌ. قال:"فإنّ دماءكم، وأموالَكم، وأعراضَكم عليكم حرام، كحُرمة يومكم هذا، في بلدكم هذا، في شهركم هذا". فأعادها مرارًا، ثم رفع رأسه فقال:"اللهمّ! هل بلّغت، اللهمّ! هل بلّغت، اللهمّ! هل بلّغت؟". قال ابن عباس: فوالذي نفسي بيده، إنّها لوصيتُه إلى أمّته:"فليبلِّغ الشّاهدُ الغائب، لا ترجعوا بعدي كفّارًا، يضربُ بعضكم رقاب بعض".
صحيح: رواه البخاريّ (1739) عن علي بن عبد الله (هو ابن المديني)، حدثني يحيى بن سعيد (هو القطّان)، حدّثنا فضيل بن غزوان، حدّثنا عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.
وبمعناه أحاديث أخرى مذكورة في كتاب الحج.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোরবানির দিন (নাহরের দিন) মানুষের উদ্দেশ্যে ভাষণ দিলেন এবং বললেন: "হে লোক সকল! আজকের এই দিনটি কোন দিন?" তারা বলল: "এটা সম্মানিত (হারাম) দিন।" তিনি বললেন: "আর এই শহরটি কোন শহর?" তারা বলল: "এটা সম্মানিত (হারাম) শহর।" তিনি বললেন: "আর এই মাসটি কোন মাস?" তারা বলল: "এটা সম্মানিত (হারাম) মাস।" তিনি বললেন: "অতএব, তোমাদের রক্ত, তোমাদের সম্পদ এবং তোমাদের সম্মান (ইজ্জত) তোমাদের উপর হারাম (নিষিদ্ধ), যেমন সম্মানিত তোমাদের এই দিন, তোমাদের এই শহর এবং তোমাদের এই মাসের সম্মান।" অতঃপর তিনি তা কয়েকবার পুনরাবৃত্তি করলেন। এরপর তিনি মাথা তুলে বললেন: "হে আল্লাহ! আমি কি পৌঁছে দিয়েছি? হে আল্লাহ! আমি কি পৌঁছে দিয়েছি? হে আল্লাহ! আমি কি পৌঁছে দিয়েছি?" ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: যার হাতে আমার জীবন, এটিই ছিল তাঁর উম্মতের প্রতি তাঁর উপদেশ: "উপস্থিত ব্যক্তি যেন অনুপস্থিত ব্যক্তির নিকট তা পৌঁছে দেয়। তোমরা আমার পরে কুফরিতে ফিরে যেয়ো না যে, তোমরা একে অপরের ঘাড়ে আঘাত হানবে (বা একে অপরের সাথে যুদ্ধ করবে)।"
10492 - عن عثمان بن حكيم الأنصاري قال: سألت سعيد بن جبير عن صوم رجب؟ ونحن يومئذ في رجب فقال: سمعت ابن عباس يقول: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصوم حتى نقول لا يفطر ويفطر حتى نقول لا يصوم.
صحيح: رواه مسلم في الصيام (1157: 179) من طرق، عن عثمان بن حكيم الأنصاري قال: فذكره.
الظاهر أن مراد سعيد بن جبير بهذا الاستدلال أنه لا نهى عنه ولا ندب فيه لعينه، بل له حكم باقي الشهور، ولم يثبت في صوم رجب نهي ولا ندب لعينه. أفاده النووي.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এত বেশি সওম (রোযা) রাখতেন যে, আমরা বলতাম তিনি আর রোযা ভঙ্গ করবেন না। আবার তিনি এত বেশি রোযা ভঙ্গ করতেন যে, আমরা বলতাম তিনি আর সওম রাখবেন না।
10493 - عن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم أنها قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصوم حتى نقول: لا يفطر، ويفطر حتى نقول: لا يصوم، وما رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم استكمل صيام شهر قط إلا رمضان، وما رأيته في شهر أكثر صياما منه في شعبان.
متفق عليه: رواه مالك في الصيام (58) عن أبي النضر مولى عمر بن عبيد الله، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن عائشة فذكرته.
ورواه البخاري في الصوم (1969)، ومسلم في الصيام (1156: 175) كلاهما من طريق مالك به.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমনভাবে রোজা রাখতেন যে আমরা বলতাম, তিনি আর রোজা ভাঙবেন না, আবার এমনভাবে রোজা ভাঙতেন যে আমরা বলতাম, তিনি আর রোজা রাখবেন না। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে রমজান মাস ছাড়া অন্য কোনো মাসের রোজা সম্পূর্ণ করতে দেখিনি। আর শাবান মাস ছাড়া অন্য কোনো মাসে আমি তাঁকে এত বেশি রোজা রাখতেও দেখিনি।
10494 - عن عائشة قالت: كان أحب الشهور إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يصومه شعبان، ثم يصله برمضان.
حسن: رواه أبو داود (2431) عن أحمد وهو في مسنده (25548) والنسائي (2350)، وصحّحه ابن خزيمة (2077)، والحاكم (1/ 434) كلهم من طريق معاوية بن صالح، عن عبد الله بن أبي قيس سمع عائشة تقول: فذكرته.
وإسناده حسن من أجل معاوية بن صالح فإنه حسن الحديث.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট রোযা রাখার জন্য মাসগুলোর মধ্যে শাবানই সবচেয়ে প্রিয় ছিল, অতঃপর তিনি সেটিকে রমাদানের সাথে মিলিয়ে নিতেন।
10495 - عن أمّ سلمة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم أنه لم يكن يصوم من السنة شهرًا تامًا إلّا شعبان يصله برمضان.
صحيح: رواه أبو داود (2336) عن أحمد - وهو في مسنده (26653) - عن محمد بن جعفر، حدّثنا شعبة، عن توبة العنبري، عن محمد بن إبراهيم، عن أبي سلمة، عن أمّ سلمة، فذكرته.
ومن هذا الطريق رواه أيضًا البيهقي (4/ 210) وإسناده صحيح.
ورواه الترمذي (736)، والنسائي (2175)، وأحمد (26562) كلّهم من طريق عبد الرحمن بن مهدي، عن سفيان، عن منصور، عن سالم بن أبي الجعد، عن أبي سلمة، عن أمّ سلمة، قالت:"ما رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم صام شهرين متتابعين إلا أنه كان يصل شعبان برمضان".
وإسناده صحيح أيضًا إلا أنّ الترمذي قصّر في الحكم عليه، فقال: حديث أمّ سلمة حديث حسن.
وقد رواه أيضًا في الشمائل (295) بهذا الإسناد. وقال:"هذا إسناد صحيح".
উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বছরের কোনো মাস পূর্ণভাবে সওম পালন করতেন না, শুধু শাবান মাস ব্যতীত, যা তিনি রমজানের সাথে যুক্ত করতেন।
10496 - عن أبي أسامة، قال: قلت: يا رسول الله، لم أرك تصوم من شهر من الشّهور ما تصوم من شعبان؟ قال:"ذاك شهر يغفل الناسُ عنه بين رجب ورمضان. وهو شهر ترفع فيه الأعمال إلى ربّ العالمين، فأحبّ أن يرفع عملي وأنا صائم".
حسن: رواه أحمد (21753) وعنه الضياء في"المختارة" (1356) عن عبد الرحمن بن مهدي، حدّثنا ثابت بن قيس أبو غُصْن، حدثني أبو سعيد المقبري، حدثني أسامة بن زيد، فذكره.
وإسناده حسن من أجل ثابت بن قيس فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.
উসামা ইবনে যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! অন্য কোনো মাসে আপনাকে ততটা রোযা রাখতে দেখিনি, যতটা আপনি শা'বান মাসে রাখেন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এটি এমন একটি মাস যা রজব ও রমযানের মধ্যবর্তী হওয়ায় লোকেরা এর থেকে উদাসীন থাকে। আর এটি এমন মাস যখন সৃষ্টিকুলের প্রতিপালকের নিকট আমলসমূহ পেশ করা হয়। তাই আমি পছন্দ করি যে আমার আমল রোযাদার অবস্থায় পেশ করা হোক।"
10497 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا دخل شهرُ رمضان فُتحتْ أبوابُ السّماء، وغُلِّقت أبوابُ جهنّم، وسُلسلت الشّياطين".
متفق عليه: رواه البخاري في الصوم (1899)، ومسلم في الصيام (1079) كلاهما من طريق ابن شهاب الزهري، أخبرني ابن أبي أنس مولى التّيميين، أنّ أباه حدّثه أنه سمع أبا هريرة يقول (فذكره).
وابن أبي أنس هو نافع بن مالك بن أبي عامر.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন রমযান মাস আসে, আকাশের দরজাগুলো খুলে দেওয়া হয়, এবং জাহান্নামের দরজাগুলো বন্ধ করে দেওয়া হয়, আর শয়তানদের শৃঙ্খলিত করা হয়।"
10498 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا كان أوّل ليلة من شهر رمضان صُفِّدت الشياطين مردة الجنّ، وغُلّقت أبواب النار، فلم يفتح منها باب، وفتحت أبواب الجنّة فلم يغلق منها باب، وينادي منادٍ: يا باغي الخير أقبل، ويا باغي الشّر أقْصر، ولله عتقاء من النار، وذلك كلّ ليلة".
حسن: رواه الترمذيّ (682)، وابن ماجه (1642)، وصحّحه ابن خزيمة (1883)، وابن حبان (3435)، والحاكم (1/ 421) كلّهم من حديث محمد بن العلاء بن كريب، حدّثنا أبو بكر بن عياش، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة فذكره.
وإسناده حسن من أجل الكلام في أبي بكر بن عياش، غير أنه حسن الحديث.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন রমযান মাসের প্রথম রাত আসে, তখন শয়তান ও দুষ্ট জিনদেরকে শৃঙ্খলিত করা হয়। জাহান্নামের দরজাগুলো বন্ধ করে দেওয়া হয়, আর তার একটি দরজাও খোলা হয় না। জান্নাতের দরজাগুলো খুলে দেওয়া হয়, আর তার একটি দরজাও বন্ধ করা হয় না। এবং একজন ঘোষক ঘোষণা দেন: 'হে কল্যাণ অন্বেষণকারী! এগিয়ে আসো। আর হে মন্দের অন্বেষণকারী! বিরত হও।' আর আল্লাহ তা’আলার পক্ষ থেকে রয়েছে জাহান্নাম থেকে মুক্তিপ্রাপ্ত ব্যক্তিগণ। আর এটা প্রত্যেক রাতেই হয়ে থাকে।"
10499 - عن رجل من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، قال:"في رمضان تُفتح أبواب السماء، وتغلق أبواب النار، ويُصفَّد فيه كلّ شيطان مَريد، وينادي منادٍ كلّ ليلة: يا طالب الخير هلُمَّ، ويا طالب الشّر أمسك".
حسن: رواه النسائيّ (2108)، وأحمد (18794) كلاهما من حديث محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن عطاء بن السائب، عن عرفجة، قال: كنت في بيت فيه عتبة بن فرقد، فأردتُ أن أحدّث بحديث قال: فكان رجل من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم كأنه أولى بالحديث منه. قال: فحدَّث الرجل عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال (فذكر الحديث).
وإسناده حسن من أجل عرفجة وهو ابن عبد الله الثقفي، وثّقه العجلي، وابن حبان، وروى عنه جمع.
وعطاء بن السائب مختلط إلا أن رواية شعبة عنه كانت قبل الاختلاط.
নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জনৈক সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "রমজান মাসে আসমানের দরজাগুলো খুলে দেওয়া হয়, জাহান্নামের দরজাগুলো বন্ধ করে দেওয়া হয়, এবং তাতে (ঐ মাসে) প্রত্যেক অবাধ্য শয়তানকে শৃংখলিত করা হয়। আর প্রত্যেক রাতে একজন ঘোষণাকারী ঘোষণা করেন: 'হে কল্যাণের অন্বেষণকারী, এগিয়ে আসো! আর হে অকল্যাণের অন্বেষণকারী, থেমে যাও।'"
10500 - عن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"من صام رمضان إيمانًا واحتسابًا، غُفر له ما تقدّم من ذنبه، ومن قام ليلة القدر إيمانًا واحتسابًا غُفر له ما تقدّم من ذنبه".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصّوم (1901)، ومسلم في صلاة المسافرين (760) كلاهما من طريق هشام الدّستوائيّ، حدّثنا يحيى بن أبي كثير، حدّثنا أبو سلمة بن عبد الرحمن، أنّ أبا هريرة حدّثهم به، فذكره.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি ঈমান ও সাওয়াবের আশায় রমজানের রোজা পালন করবে, তার পূর্ববর্তী গুনাহসমূহ মাফ করে দেওয়া হবে। আর যে ব্যক্তি ঈমান ও সাওয়াবের আশায় লাইলাতুল কদরে (ইবাদতে) দাঁড়াবে, তারও পূর্ববর্তী গুনাহসমূহ মাফ করে দেওয়া হবে।"
10501 - عن عمرو بن مرّة الجهنيّ، قال: جاء رجلٌ إلى النبيّ صلى الله عليه وسلم، فقال: يا رسول الله، أرأيتَ إن شهدتُ لا إله إلا الله، وأنّك رسولُ الله، وصليتُ الصلوات الخمس، وأديتُ الزّكاة، وصمتُ رمضان وقمتُه، فممن أنا؟ قال:"من الصدِّيقين والشّهداء".
صحيح: رواه ابن خزيمة (2212)، وابن حبان (3438) كلاهما من حديث الحكم بن نافع، عن شعيب بن أبي حمزة، عن عبد الله بن عبد الرحمن بن أبي حسين، عن عيسى بن طلحة، قال: سمعت عمرو بن مرة الجهنيّ، فذكره.
ورواه البزار - كشف الأستار (25) - من وجه آخر عن الحكم بن نافع.
وحسَّن إسناده الهيثمي أو صحّحه. مجمع الزوائد (1/ 46).
আমর ইবনে মুররা আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে জিজ্ঞাসা করল, “ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি কি মনে করেন, যদি আমি সাক্ষ্য দেই যে, আল্লাহ্ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং আপনি আল্লাহর রাসূল, আর আমি পাঁচ ওয়াক্ত সালাত (নামাজ) আদায় করি, যাকাত প্রদান করি এবং রমযানের রোযা রাখি ও তাতে ইবাদতের জন্য দাঁড়াই, তবে আমি কাদের অন্তর্ভুক্ত হবো?” তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “আপনি সিদ্দীকীন (পরম সত্যবাদী) এবং শহীদগণের অন্তর্ভুক্ত হবেন।”
10502 - عن أبي أيوب الأنصاريّ، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من صام رمضان وأتبعه ستًا من شوال، كان كصيام الدَّهر".
صحيح: رواه مسلم في الصيام (1164) من طرق، عن سعد بن سعيد أخي يحيى بن سعيد، عن عمر بن ثابت بن الحارث الخزرجي، عن أبي أيوب الأنصاري، فذكره.
আবূ আইয়ুব আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যে ব্যক্তি রমযানের রোযা রাখল এবং এরপরে শাওয়ালের ছয়টি রোযা রাখল, তা সারা বছর রোযা রাখার মতো হবে।”
10503 - عن ثوبان، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"صيام رمضان بعشر أشهر، وصيام الستة أيام بشهرين، فذلك صيام السنة يعني رمضان وستة أيام بعده".
صحيح: رواه ابن ماجه (1715)، وأحمد (22412)، وابن خزيمة (2115)، وابن حبان (3635)، والطحاوي في"مشكله" (2348)، والبيهقي (4/ 293) كلّهم من حديث يحيى بن الحارث الذماريّ، عن أبي أسماء الرحبي، عن ثوبان، فذكره واللفظ لابن خزيمة.
ولفظ ابن ماجه:"من صام ستة أيام بعد الفطر كان تمام السنة، من جاء بالحسنة فله عشر أمثالها".
وإسناده صحيح، وأبو أسماء اسمه عمرو بن مرثد، وهو ثقة.
সাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “রমযানের সিয়াম দশ মাসের সমতুল্য, আর ছয় দিনের সিয়াম দুই মাসের সমতুল্য। সুতরাং এটিই হলো সারা বছরের সিয়াম (অর্থাৎ রমযান এবং এর পরের ছয় দিনের রোযা)।”
10504 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أفضل الصّيام بعد رمضان شهر الله المحرَّم، وأفضل الصلاة بعد الفريضة صلاة اللّيل".
صحيح: رواه مسلم في الصيام (1163) عن قتيبة بن سعيد، حدّثنا أبو عوانة، عن أبي بشر، عن حُميد بن عبد الرحمن الحميريّ، عن أبي هريرة، فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "রমযানের পর সর্বোত্তম সাওম হলো আল্লাহ্র মাস মুহাররমের সাওম, আর ফরয সালাতের পর সর্বোত্তম সালাত হলো রাতের সালাত (তাহাজ্জুদ)।"
10505 - عن * *
১০৫০৫ - বর্ণনা অনুপস্থিত।
10506 - عن عائشة، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"ما من يومٍ أكثر مِنْ أَنْ يُعْتق اللهُ فيه عبدًا من النّار من يوم عرفة، وإنّه ليدنو ثم يباهي بهم الملائكة فيقول: ما أراد هؤلاء؟".
صحيح: رواه مسلم في الحج (1348) من طريق ابن وهب، أخبرني مخرمة بن بكير، عن أبيه، قال: سمعت يونس بن يوسف يقول عن ابن المسيب، قال: قالت عائشة (فذكرته).
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: আরাফার দিনের চেয়ে অন্য কোনো দিনে আল্লাহ তা'আলা এত অধিক সংখ্যক বান্দাকে জাহান্নামের আগুন থেকে মুক্তি দেন না। নিশ্চয়ই তিনি (আল্লাহ) নিকটবর্তী হন। অতঃপর তাদের (হাজীদের) বিষয়ে ফেরেশতাদের সাথে গর্ব করেন এবং তিনি বলেন: তারা কী চেয়েছে/তারা কী চায়?।
10507 - عن طارق بن شهاب: أنّ أُناسًا من اليهود قالوا: لو نزلت هذه الآية فينا لاتخذنا ذلك اليوم عيدًا! فقال عمر أيَّةُ آيةٍ؟ فقالوا: {الْيَوْمَ أَكْمَلْتُ لَكُمْ دِينَكُمْ وَأَتْمَمْتُ عَلَيْكُمْ نِعْمَتِي وَرَضِيتُ لَكُمُ الْإِسْلَامَ دِينًا} [المائدة: 3]. فقال عمر: إنِّي لأعلمُ أيّ مكان أُنزلتْ؛ أُنزلتْ ورسولُ الله صلى الله عليه وسلم واقف بعرفة".
متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازيّ (4407)، ومسلم في التفسير (3017) كلاهما من طريق سفيان الثوريّ، عن قيس بن مسلم، عن طارق بن شهاب، فذكره. واللفظ للبخاريّ.
ولفظ مسلم نحوه، وزاد:"قال سفيان: أشكّ كان يوم جمعة أم لا؟".
ثم رواه مسلم من طريق إدريس (هو ابن يزيد الأوديّ)، وأبي عُميس (هو عتبة بن عبد الله المسعوديّ) - فرّقهما - كلاهما عن قيس بن مسلم، به، نحوه. وفيه أنّها نزلتْ في يوم الجمعة، ولم يشكّا.
উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইয়াহূদীদের কিছু লোক তাঁকে বলল: 'যদি এই আয়াতটি আমাদের উপর নাযিল হতো, তবে আমরা সেই দিনটিকে ঈদের দিন হিসেবে গ্রহণ করতাম!' উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জিজ্ঞেস করলেন: 'কোন আয়াত?' তারা বলল: '{আজ তোমাদের জন্য তোমাদের দীনকে পূর্ণাঙ্গ করে দিলাম, তোমাদের উপর আমার নিয়ামত সম্পূর্ণ করলাম এবং ইসলামকে তোমাদের জন্য জীবন ব্যবস্থা হিসেবে মনোনীত করলাম।} [সূরা আল-মায়িদাহ: ৩]। তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: 'আমি অবশ্যই জানি, সেটি কখন এবং কোথায় নাযিল হয়েছিল। সেটি নাযিল হয়েছিল এমন সময় যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরাফাতের ময়দানে অবস্থান করছিলেন।'