হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (10688)


10688 - عن سعد بن أبي وقاص قال: مر علي النبي صلى الله عليه وسلم وأنا أدعو بإصبعي فقال:"أحِّدْ، أحِّدْ" وأشار بالسبابة.

صحيح: رواه أبو داود (1499)، والنسائي (1273)، وصحّحه الحاكم (1/ 536) كلهم من طريق أبي معاوية، حدثنا الأعمش، عن أبي صالح، عن سعد بن أبي وقاص فذكره. وإسناده صحيح.

وقد اختلف فيه على الأعمش ولكن قول أبي معاوية أشبه بالصواب كما قال الدارقطني في العلل (4/ 397).

وقال الحاكم:"صحيح على شرطهما إن كان أبو صالح السمان سمعه من سعد.

قلت: لا معنى لشك الحاكم في سماع أبي صالح من سعد فإنه وُلِدَ في خلافة عمر، وسعد بن أبي وقاص مات سنة خمس وخمسين على المشهور، وقد ثبت أن أبا صالح ذكوان سأل سعدا مسألة في الزكاة، وصرّح البخاري في التاريخ الكبير (8/ 513) بسماعه من سعد. والله أعلم.




সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, তখন আমি আমার (বিভিন্ন) আঙ্গুল দিয়ে দু'আ করছিলাম। তখন তিনি বললেন: "এক করো, এক করো।" এবং তিনি শাহাদাত (তর্জনী) আঙ্গুল দিয়ে ইশারা করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (10689)


10689 - عن أنس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا دعا أحدكم فليعزم المسألة، ولا يقولن: اللهم! إن شئت فأعطني، فإنه لا مستكره له".

متفق عليه: رواه البخاري في الدعوات (6338)، ومسلم في الذكر والدعاء (2678)، كلاهما من طريق إسماعيل ابن علية، أخبرنا عبد العزيز بن صهيب، عن أنس فذكره.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমাদের কেউ দু'আ করে, তখন সে যেন দৃঢ়তার সাথে (তার) প্রার্থনা করে, আর সে যেন না বলে: হে আল্লাহ! যদি তুমি চাও, তাহলে আমাকে দাও, কেননা তাঁকে (আল্লাহকে) জোর করার মতো কেউ নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (10690)


10690 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا يقل أحدكم إذا دعا: اللهم! اغفر لي إن شئت، اللهم! ارحمني إن شئت، ليعزم المسألة؛ فإنه لا مكره له".

وفي رواية:"وليعظّم الرغبة، فإن الله لا يتعاظمه شيء أعطاه".

متفق عليه: رواه مالك في كتاب القرآن (28) عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة فذكره. ورواه البخاري في الدعوات (6339) من طريق مالك به.

ورواه مسلم في الذكر والدعاء (2679: 8) من طريق إسماعيل بن جعفر، عن العلاء (هو: ابن عبد الرحمن بن يعقوب الحرقي)، عن أبيه، عن أبي هريرة بنحوه.

والرواية الأخرى له.

ورواه أيضا (2679: 9) من طريق عطاء بن ميناء، عن أبي هريرة بنحوه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের কেউ যখন দু'আ করে, তখন সে যেন না বলে: 'হে আল্লাহ! তুমি চাইলে আমাকে ক্ষমা করো', কিংবা 'হে আল্লাহ! তুমি চাইলে আমাকে রহম করো।' বরং সে যেন দৃঢ়তার সাথে প্রার্থনা করে; কারণ আল্লাহকে বাধ্য করার মতো কেউ নেই।"

অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: "আর সে যেন আগ্রহকে মহৎ (বড়) করে। কারণ আল্লাহ যা দান করেন, তা দিতে তাঁর কাছে কোনো কিছুই বিরাট বা কঠিন নয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (10691)


10691 - عن عبد الله بن عمرو أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"القلوب أوعية وبعضها أوعى من بعض، فإذا سألتم الله عز وجل، أيها الناس، فاسألوه وأنتم موقنون بالإجابة، فإن الله لا يستجيب لعبد دعاه عن ظهر قلب غافل".

حسن: رواه أحمد (6655) عن حسن، حدثنا ابن لهيعة، حدثنا بكر بن عمرو، عن أبي عبد الرحمن الحبلي، عن عبد الله بن عمرو فذكره.

وفي إسناده ابن لهيعة وهو سيء الحفظ وفيه كلام معروف كما مضى إلا أنه لم يخطئ في هذا الحديث لأن له أصلا. وشاهد ضعيف أيضا.

وقد حسّنه المنذري في الترغيب (2571)، والهيثمي في المجمع (10/ 148).
وأما ما روي عن أبي هريرة قال قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ادعوا الله وأنتم موقنون بالإجابة واعلموا أن الله لا يستجيب دعاء من قلب غافل لاه". فإسناده ضعيف جدا.

رواه الترمذي (3479)، وابن حبان في ترجمة صالح بن بشير المري من المجروحين (1/ 471)، وابن عدي في الكامل (4/ 1380)، والحاكم (1/ 493) كلهم من طريق صالح المري، عن هشام بن حسان، عن محمد بن سيرين، عن أبي هريرة فذكره.

وقال الترمذي:"هذا حديث غريب لا نعرفه إلا من هذا الوجه".

وأما الحاكم فقال:"هذا حديث مستقيم الإسناد، تفرد به صالح المري، وهو أحد زهاد أهل البصرة".

وتعقبه المنذري فقال:"صالح المري لا شك في زهده، لكن تركه أبو داود والنسائي".

الترغيب والترهيب (2572).

وكذلك تعقبه الذهبي بقوله:"قلت: صالح متروك".



ولذلك صحّح الحافظ ابن حجر الموقوف في الفتح (9/ 565).




আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: “মানুষের অন্তরসমূহ হল পাত্রস্বরূপ, আর সেগুলোর মধ্যে কিছু পাত্র অন্যগুলো অপেক্ষা বেশি ধারণক্ষমতাসম্পন্ন। সুতরাং হে লোকসকল, তোমরা যখন পরাক্রমশালী ও মহিমান্বিত আল্লাহর কাছে কিছু চাইবে, তখন এমনভাবে চাইবে যেন তোমরা নিশ্চিত যে তিনি তোমাদের ডাকে সাড়া দেবেন। কেননা আল্লাহ তাআলা কোনো গাফেল (অন্যমনস্ক) ও উদাসীন অন্তরের অধিকারী বান্দার দু’আ কবুল করেন না।”









আল-জামি` আল-কামিল (10692)


10692 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من آمن بالله وبرسوله وأقام الصلاة، وصام رمضان، كان حقا على الله أن يدخله الجنة، جاهد في سبيل الله، أو جلس في أرضه التي ولد فيها". فقالوا: يا رسول الله! أفلا نبشر الناس؟ قال:"إن في الجنة مائة درجة أعدها الله للمجاهدين في سبيل الله، ما بين الدرجتين كما بين السماء والأرض، فإذا سألتم الله فاسألوه الفردوس؛ فإنه أوسط الجنة، وأعلى الجنة، - أراه - فوقه عرش الرحمن، ومنه تفجر أنهار الجنة".

صحيح: رواه البخاري في الجهاد والسير (2790) عن يحيى بن صالح، حدثنا فليح، عن هلال بن علي، عن عطاء بن يسار، عن أبي هريرة فذكره.

وقوله:"أو جلس في أرضه التي وُلد فيها" أي في بيته مع نية الجهاد ولكنه منعه عذر شرعي فهو لا يكون محروما من أجر الجهاد وإن كان للمجاهدين درجات في الجنة.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের প্রতি ঈমান আনল, সালাত কায়েম করল এবং রমাদানের সিয়াম পালন করল, তাকে জান্নাতে প্রবেশ করানো আল্লাহর জন্য কর্তব্য হয়ে যায়—সে আল্লাহর পথে জিহাদ করুক অথবা যে ভূমিতে সে জন্মগ্রহণ করেছে, সেখানেই বসে থাকুক।" তখন সাহাবিগণ বললেন, "হে আল্লাহর রাসূল! আমরা কি লোকদেরকে এই সুসংবাদ দেব না?" তিনি বললেন, "জান্নাতে আল্লাহর পথে জিহাদকারীদের জন্য আল্লাহ একশত স্তর প্রস্তুত রেখেছেন। দুই স্তরের মধ্যবর্তী ব্যবধান আসমান ও যমিনের মধ্যবর্তী ব্যবধানের ন্যায়। সুতরাং যখন তোমরা আল্লাহর কাছে চাইবে, তখন জান্নাতুল ফিরদাউস চাইবে। কেননা, এটি হলো জান্নাতের মধ্যম স্থান এবং জান্নাতের সর্বোচ্চ স্থান।" (বর্ণনাকারী বলেন, 'আমার মনে হয় তিনি বলেছেন), 'এর উপরে রয়েছে রহমানের আরশ, আর সেখান থেকেই জান্নাতের নহরসমূহ প্রবাহিত হয়েছে।'









আল-জামি` আল-কামিল (10693)


10693 - عن أوسط بن إسماعيل بن أوسط البجلي أنه سمع أبا بكر حين قبض النبي صلى الله عليه وسلم يقول: قام رسول الله في مقامي هذا عام الأول، ثم بكى أبو بكر ثم قال:"عليكم بالصدق؛ فإنه مع البر وهما في الجنة، وإياكم والكذب؛ فإنه مع الفجور وهما في النار، وسلوا الله المعافاة فإنه لم يؤت أحد بعد اليقين خيرا من المعافاة". الحديث.

صحيح: رواه ابن ماجه (3849)، وأحمد (5، 17)، والبخاري في الأدب المفرد (724)، والنسائي في عمل اليوم والليلة (879 - 883) وصحّحه ابن حبان (952)، والحاكم (1/ 529) كلهم من طرق، عن أوسط البجلي فذكره.

وإسناده صحيح. وصحّحه الحاكم.

ورواه أحمد (6) من طريق معاذ بن رفاعة بن رافع الأنصاري، عن أبيه، رفاعة بن رافع، قال: سمعت أبا بكر الصديق، يقول على منبر رسول الله صلى الله عليه وسلم: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: فبكى أبو بكر حين ذكر رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم سري عنه، ثم قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول في هذا القيظ عام الأول:"سلوا الله العفو والعافية، واليقين في الآخرة والأولى".




আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তেকাল করলেন, তখন তিনি বললেন: গত বছর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার এই স্থানে দাঁড়িয়েছিলেন। এরপর আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কেঁদে ফেললেন, অতঃপর বললেন: তোমরা সততাকে আঁকড়ে ধরো। কেননা সততা পুণ্যের সাথে থাকে এবং এই উভয়ই জান্নাতে নিয়ে যায়। আর তোমরা মিথ্যা থেকে দূরে থাকো। কেননা মিথ্যা পাপাচারের (ফুজুর) সাথে থাকে এবং এই উভয়ই জাহান্নামে নিয়ে যায়। আর তোমরা আল্লাহর কাছে 'মা'আফাত' (সুস্থতা, নিরাপত্তা ও বিপদমুক্তি) প্রার্থনা করো। কেননা দৃঢ় বিশ্বাসের (ইয়াকীন) পর কাউকে 'মা'আফাতের' চেয়ে উত্তম কোনো কিছু দেওয়া হয়নি।









আল-জামি` আল-কামিল (10694)


10694 - عن ابن عباس أن النبي صلى الله عليه وسلم قال لعمه العباس:"يا عم! أكثر الدعاء بالعافية".

حسن: رواه الطبراني في الكبير (11/ 330 - 331)، والحاكم (1/ 529) كلاهما من طريق
هلال بن خباب، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.

وقال الحاكم: صحيح على شرط البخاري.

قلت: هلال بن خباب لم يخرج له البخاري، وإنما روى له الأربعة فقط، وهو حسن الحديث.

وروي الحديث أيضا من مسند العباس رواه الترمذي (3514)، وأحمد (1783)، والبخاري في الأدب المفرد (726) كلهم من طرق، عن يزيد بن أبي زياد، عن عبد الله بن الحارث، عن العباس قال: قلت: يا رسول الله! علمني شيئا أسأله الله عز وجل قال:"سل الله العافية"، فمكثت أياما ثم جئت قلت: يا رسول الله! علمني شيئا أسأله الله فقال لي:"يا عباس! يا عم رسول الله! سل الله العافية في الدنيا والآخرة".

وقال الترمذي: هذا حديث صحيح، وعبد الله بن الحارث بن نوفل قد سمع من العباس بن عبد المطلب.

قلت: في إسناده يزيد بن أبي زياد وهو ضعيف عند جمهور أهل العلم.




আব্বাস ইবনু আব্দুল মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমাকে এমন কিছু শিখিয়ে দিন যা আমি আল্লাহর কাছে প্রার্থনা করব। তিনি বললেন: "তুমি আল্লাহর কাছে 'আফিয়াত' (নিরাপত্তা ও কল্যাণ) চাও।" আমি কিছু দিন পরে আবার এসে বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমাকে এমন কিছু শিখিয়ে দিন যা আমি আল্লাহর কাছে চাইব। তখন তিনি আমাকে বললেন: "হে আব্বাস! হে আল্লাহর রাসূলের চাচা! তুমি দুনিয়া ও আখিরাতে আল্লাহর কাছে আফিয়াত (নিরাপত্তা ও কল্যাণ) প্রার্থনা করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (10695)


10695 - عن أنس أن النبي صلى الله عليه وسلم مر بقوم مبتلين فقال:"أما كان هؤلاء يسألون الله العافية".

صحيح: رواه البزار (6643) عن العباس بن جعفر البغدادي، حدثنا يزيد بن مهران، حدثنا أبو بكر بن عياش، عن حميد، عن أنس فذكره.

وقال البزار: لا نعلم رواه عن حميد إلا أبو بكر بن عياش.

قلت: أبو بكر بن عياش ثقة، وكذا جميع رجال الإسناد فهو صحيح.

وبمعناه ما رُوي عن أنس بن مالك أن رجلا جاء إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله! أي الدعاء أفضل؟ قال:"سل ربك العافية والمعافاة في الدنيا والآخرة"، ثم أتاه في اليوم الثاني فقال: يا رسول الله أي الدعاء أفضل؟ فقال له مثل ذلك، ثم أتاه في اليوم الثالث فقال له مثل ذلك، قال:"فإذا أعطيت العافية في الدنيا وأعطيتها في الآخرة فقد أفلحت".

رواه الترمذي (3512)، وابن ماجه (3848)، وأحمد (12291)، والبخاري في الأدب المفرد (637) كلهم من طرق عن سلمة بن وردان، عن أنس فذكره.

وقال الترمذي:"هذا حديث حسن غريب من هذا الوجه إنما نعرفه من حديث سلمة بن وردان".

قلت: سلمة بن وردان ضعيف، قال أحمد منكر الحديث ضعيف الحديث، وقال ابن معين: ليس بشيء، وقال أبو حاتم وأبو زرعة:"لا نعلم أنه حدث حديثا عن أنس شاركه فيه غيره إلا في حديث واحد، حديث أنس عن معاذ:"من مات لا يشرك بالله شيئا". فإن هذا قد شاركه فيه غيره. وقال ابن حبان: كان يروي عن أنس أشياء لا تشبه حديثه.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কিছু বিপদগ্রস্ত লোকের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। তখন তিনি বললেন: “এরা কি আল্লাহর কাছে সুস্থতা (আফিয়াহ) প্রার্থনা করত না?”









আল-জামি` আল-কামিল (10696)


10696 - عن عبد الله بن مغفل أنه سمع ابنه يقول: اللهم! إني أسألك القصر الأبيض عن
يمين الجنة إذا دخلتها. فقال: أي بني! سل الله الجنة، وتعوذ به من النار، فإني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إنه سيكون في هذه الأمة قوم يعتدون في الطهور والدعاء".

صحيح: رواه أبو داود (96)، وابن ماجه (3864)، وصحّحه ابن حبان (6764)، والحاكم (1/ 162، 540) كلهم من حديث حماد بن سلمة، ثنا الجريري، عن أبي نعامة، عن عبد الله بن مغفل فذكره إلا أن ابن ماجه لم يذكر"الطهور". وإسناده صحيح.

وصحّحه أيضا ابن حجر في التلخيص (1/ 144).

وبمعناه ما روي عن أبي نعامة، عن ابن لسعد قال: سمعني أبي وأنا أقول: اللهم! إني أسألك الجنة ونعيمها وبهجتها وكذا وكذا، وأعوذ بك من النار وسلاسلها وأغلالها وكذا وكذا، فقال. يا بني! إني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"سيكون قوم يعتدون في الدعاء" فإياك أن تكون منهم، إن أعطيت الجنة أعطيتها، وما فيها من الخير، وإن أعذت من النار، أعذت منها وما فيها من الشر.

رواه أبو داود (1480) عن مسدد حدثنا يحيى عن شعبة عن زياد بن مخراق عن أبي نعامة فذكره. وقد وقع في إسناده اضطراب شديد فإن زياد بن مخراق وإن كان ثقة، فإنه لم يُقِمْ إسناد هذا الحديث كما قال أحمد، فإن الصحيح أنه من حديث عبد الله بن مغفل كما سبق.




আব্দুল্লাহ ইবনে মুগাফফাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর পুত্রকে বলতে শুনলেন: "হে আল্লাহ! আমি জান্নাতে প্রবেশ করলে, জান্নাতের ডান পাশে অবস্থিত সাদা প্রাসাদটি আপনার কাছে চাই।" তখন তিনি (আব্দুল্লাহ ইবনে মুগাফফাল) বললেন: "হে আমার বৎস! আল্লাহর কাছে জান্নাত চাও এবং তাঁর কাছে জাহান্নাম থেকে আশ্রয় প্রার্থনা করো। কারণ আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: 'নিশ্চয়ই এই উম্মতের মধ্যে এমন একদল লোক আসবে, যারা পবিত্রতা অর্জন ও দু'আ করার ক্ষেত্রে সীমা লঙ্ঘন করবে।'"









আল-জামি` আল-কামিল (10697)


10697 - عن أبي هريرة قال: قام رسول الله صلى الله عليه وسلم في صلاة، وقمنا معه، فقال أعرابي وهو في الصلاة: اللهم! ارحمني ومحمدا، ولا ترحم معنا أحدا، فلما سلم النبي صلى الله عليه وسلم قال للأعرابي:"لقد حجرت واسعا" يريد رحمة الله.

صحيح: رواه البخاري في الأدب (6010) عن أبي اليمان، أخبرنا شعيب، عن الزهري، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সালাতে দাঁড়ালেন এবং আমরাও তাঁর সাথে দাঁড়ালাম। তখন সালাতরত অবস্থায় এক বেদুঈন বলল: হে আল্লাহ! আমাকে এবং মুহাম্মাদকে রহম করুন, আর আমাদের সাথে অন্য কাউকে রহম করবেন না। যখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সালাম ফিরালেন, তখন তিনি বেদুঈনটিকে বললেন: "তুমি তো প্রশস্ত জিনিসকে (আল্লাহর রহমতকে) সংকীর্ণ করে দিলে।" (এর দ্বারা তিনি আল্লাহর রহমতকে উদ্দেশ্য করেছিলেন)।









আল-জামি` আল-কামিল (10698)


10698 - عن عبد الله بن عمرو، أن رجلا جاء فقال: اللهم! اغفر لي ولمحمد، ولا تشرك في رحمتك إيانا أحدا فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"من قائلها؟" فقال الرجل: أنا. فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"لقد حجبتهن عن ناس كثير".

صحيح: رواه أحمد (6590) - واللفظ له - والبخاري في الأدب المفرد (626)، وصحّحه ابن حبان (986) كلهم من طريق حماد بن سلمة، عن عطاء بن السائب، عن أبيه، عن عبد الله بن عمرو فذكره.

وإسناده صحيح عطاء بن السائب ثقة، وثقه الأئمة إلا أنه اختلط في آخر عمره لكن رواية حماد بن سلمة عنه قبل الاختلاط.

وأما الهيثمي فقال في المجمع (10/ 150):"رواه أحمد والطبراني بنحوه، وإسنادهما حسن.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি এসে বলল: হে আল্লাহ! আমাকে এবং মুহাম্মাদকে ক্ষমা করে দিন এবং আপনার রহমতে আমাদের দু’জনের সাথে অন্য কাউকে শরিক করবেন না। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কে এই কথাগুলো বলল?" লোকটি বলল: আমি। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি তো অনেক লোকের কাছ থেকে (আল্লাহর রহমতকে) সীমাবদ্ধ করে দিলে/সংকুচিত করে দিলে।"









আল-জামি` আল-কামিল (10699)


10699 - عن ابن عباس قال: حدث الناس كل جمعة مرة، فإن أبيت فمرتين، فإن أكثرت فثلاث مرار، ولا تمل الناس هذا القرآن، ولا ألفينك تأتي القوم وهم في حديث من حديثهم، فتقص عليهم، فتقطع عليهم حديثهم، فتملهم ولكن أنصت، فإذا أمروك فحدثهم وهم يشتهونه، فانظر السجع من الدعاء فاجتنبه، فإني عهدت رسول الله صلى الله عليه وسلم وأصحابه لا يفعلون إلا ذلك. يعني: لا يفعلون إلا ذلك الاجتناب.

صحيح: رواه البخاري في الدعوات (6337) عن يحيى بن محمد بن السكن، حدثنا حبان بن هلال أبو حبيب، حدثنا هارون المقرئ، حدثنا الزبير بن الخريت، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.

قال أهل العلم: إن السجع المذموم في الدعاء هو المتكلف فإنه يُذهب الخشوع والخضوع والاخلاص، ويُلهي عن الضراعة والافتقار وفراغ القلب، فأما ما حصل بلا تكلف ولا إعمال فكر لكمال الفصاحة ونحو ذلك فلا بأس به.

انظر: شرح النووي على صحيح مسلم (17/ 41).




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তুমি প্রতি জুমাবারে একবার লোকদেরকে উপদেশ দাও। যদি তুমি (তাতে) অস্বীকৃত হও (অর্থাৎ বেশি দিতে চাও), তবে দু'বার (দাও)। যদি তুমি আরও বাড়াতে চাও, তবে তিনবার (দাও)। আর এই কুরআনকে (উপদেশ দিতে গিয়ে) মানুষের কাছে বিরক্তিকর করো না। আর আমি যেন তোমাকে এমন অবস্থায় না দেখি যে, তুমি কোনো সম্প্রদায়ের কাছে এলে আর তারা তাদের নিজেদের কথাবার্তায় ব্যস্ত আছে, আর তুমি তাদের কাছে (উপদেশমূলক) বর্ণনা শুরু করলে, তাদের কথা কেটে দিলে এবং তাদের বিরক্ত করে তুললে। বরং নীরব থাকো। যখন তারা তোমাকে আদেশ করবে, তখন তাদের কাছে আলোচনা করো, যখন তারা আগ্রহ বোধ করে। আর দু'আর মধ্যে ছন্দবদ্ধ ও মিলযুক্ত বাক্য (সাজ') পরিহার করো। কারণ, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও তাঁর সাহাবীগণকে শুধুমাত্র তা-ই (অর্থাৎ সেই পরিহার) করতে দেখেছি।









আল-জামি` আল-কামিল (10700)


10700 - عن أبي هريرة، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"يستجاب لأحدكم ما لم يعجل فيقول: قد دعوت فلم يُستجب لي".

متفق عليه: رواه مالك في القرآن (29) عن ابن شهاب، عن أبي عبيد مولى ابن أزهر، عن أبي هريرة فذكره. ورواه البخاري في الدعوات (6340)، ومسلم في الذكر والدعاء (2735: 90) كلاهما من طريق مالك به.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের কারো দু'আ কবুল করা হতে থাকে, যতক্ষণ না সে তাড়াহুড়ো করে। (তাড়াহুড়ো করে) সে বলে, 'আমি তো দু'আ করলাম, কিন্তু আমার দু'আ কবুল করা হলো না'।"









আল-জামি` আল-কামিল (10701)


10701 - عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال:"لا يزال يستجاب للعبد ما لم يدع بإثم أو قطيعة رحم ما لم يستعجل". قيل: يا رسول الله ما الاستعجال؟ قال: يقول:"قد دعوت وقد دعوت فلم أر يستجيب لي فيستحسر عند ذلك ويدع الدعاء".

صحيح: رواه مسلم في الذكر والدعاء (2735: 92) عن أبي الطاهر، أخبرنا ابن وهب، أخبرني معاوية (وهو ابن صالح)، عن ربيعة بن يزيد، عن أبي إدريس الخولاني، عن أبي هريرة فذكره.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: বান্দার দু’আ ততক্ষণ পর্যন্ত কবুল হতে থাকে, যতক্ষণ না সে কোনো পাপ অথবা আত্মীয়তার সম্পর্ক ছিন্ন করার জন্য দু’আ করে এবং যতক্ষণ না সে তাড়াহুড়ো করে। জিজ্ঞাসা করা হলো, "হে আল্লাহর রাসূল! তাড়াহুড়ো কী?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: (তাড়াহুড়ো হলো এই যে,) সে বলে, "আমি তো দু’আ করলাম, দু’আ করলাম, কিন্তু দেখলাম না যে আমার দু’আ কবুল করা হয়েছে।" তখন সে নিরাশ হয়ে যায় এবং দু’আ করা ছেড়ে দেয়।









আল-জামি` আল-কামিল (10702)


10702 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما من رجل يدعو الله بدعاء إلا
استجيب له، فإما أن يُعجل له في الدنيا، وإما أن يدخر له في الآخرة، وإما أن يكفر عنه من ذنوبه بقدر ما دعا ما لم يدع بإثم أو قطيعة رحم أو يستعجل" قالوا: يا رسول الله! وكيف يستعجل؟ قال:"يقول دعوت ربي فما استجاب لي".

حسن: رواه الترمذي (3406/ 3) عن يحيى بن موسى قال: أخبرنا أبو معاوية، أخبرنا الليث هو ابن أبي سليم، عن زياد، عن أبي هريرة فذكره.

وقال: هذا حديث غريب من هذا الوجه.

قلت: وهو كما قال فإن ليث بن أبي سليم ضعيف، وشيخه زياد ترجم له المزي في تهذيب الكمال (3/ 62) فقال: زياد غير منسوب عن أبي هريرة … وذكر له الحديث المذكور ثم قال: يحتمل أن يكون الطائي اهـ.

وزياد الطائي مجهول أرسل عن أبي هريرة كما في التقريب.

وقال الذهبي في الميزان: لا يُعرف.

ولكن رواه البخاري في الأدب المفرد (711)، وأحمد (9785)، والحاكم (1/ 497) كلهم من طريق عبيد الله بن عبد الرحمن بن موهب، عن عمه عبيد الله، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ما من مؤمن ينصب وجهه إلى الله يسأله مسألة إلا أعطاه إياها، إما عجلها له في الدنيا، وإما دخرها له في الآخرة ما لم يعجل. قال: يا رسول الله وما عجلته؟ قال: يقول: دعوت ودعوت ولا أراه يستجاب لي". واللفظ للبخاري، وسياق أحمد والحاكم مختصر. وقال الحاكم:"صحيح الإسناد".

قلت: في إسناده عبيد الله بن عبد الرحمن بن عبد الله بن موهب هو حسن الحديث لكن عمه هو عبيد الله بن عبد الله بن موهب لا يعرف حاله.

وبمجموع الإسنادين يصير الحديث حسنا.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এমন কোনো ব্যক্তি নেই যে আল্লাহর কাছে কোনো দুআ করে, আর তার দুআ কবুল করা হয় না। হয়তো তাকে দুনিয়াতেই তা দ্রুত দেওয়া হয়, অথবা তার জন্য তা আখেরাতের জন্য সঞ্চয় করে রাখা হয়, অথবা তার দুআর পরিমাণে তার পাপসমূহ থেকে ক্ষমা করে দেওয়া হয়। যদি না সে পাপের জন্য, বা আত্মীয়তার সম্পর্ক ছিন্ন করার জন্য দুআ করে, অথবা সে তাড়াহুড়ো করে।" সাহাবায়ে কেরাম বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! তাড়াহুড়ো করা কেমন?" তিনি বললেন: "(তাড়াহুড়ো হলো) সে বলে, 'আমি আমার রবের কাছে দুআ করলাম, কিন্তু তিনি আমার দুআ কবুল করলেন না'।"









আল-জামি` আল-কামিল (10703)


10703 - عن أبي سعيد، أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ما من مسلم يدعو بدعوة ليس فيها إثم، ولا قطيعة رحم، إلا أعطاه الله بها إحدى ثلاث: إما أن تعجل له دعوته، وإما أن يدخرها له في الآخرة، وإما أن يصرف عنه من السوء مثلها" قالوا: إذا نكثر، قال:"الله أكثر".

حسن: رواه أحمد (11133)، والبخاري في الأدب المفرد (710)، والحاكم (1/ 493) كلهم من طرق عن علي بن علي الرفاعي قال: سمعت أبا المتوكل الناجي قال: قال أبو سعيد الخدري، عن النبي صلى الله عليه وسلم فذكره.

وإسناده حسن من أجل علي بن علي الرفاعي فإنه حسن الحديث.

وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد".




আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: কোনো মুসলিম এমন কোনো দুআ করে না যাতে কোনো পাপ বা আত্মীয়তার বন্ধন ছিন্ন করার বিষয় নেই, কিন্তু আল্লাহ তাকে এর বিনিময়ে তিনটি জিনিসের মধ্যে একটি দান করেন: হয় তার দুআটি দ্রুত কবুল করে নেন, অথবা তা তার জন্য আখেরাতে জমা করে রাখেন, অথবা এর অনুরূপ কোনো মন্দ বিষয় তার থেকে দূর করে দেন। সাহাবাগণ বললেন: তবে তো আমরা বেশি বেশি দুআ করব। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আল্লাহ (দানের ক্ষেত্রে) আরও বেশি।









আল-জামি` আল-কামিল (10704)


10704 - عن جابر قال سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ما من أحد يدعو بدعاء إلا آتاه الله
ما سأل أو كف عنه من السوء مثله ما لم يدع بإثم أو قطيعة رحم".

حسن: رواه الترمذي (3381)، وأحمد (14879) كلاهما عن قتيبة بن سعيد، قال: حدثنا ابن لهيعة، عن أبي الزبير، عن جابر فذكره. وإسناده حسن من أجل ابن لهيعة وفيه كلام معروف لكن ما رواه قتيبة بن سعيد عنه مستقيم.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “এমন কোনো ব্যক্তি নেই যে কোনো দু'আ করে, কিন্তু আল্লাহ তাকে তার প্রার্থিত জিনিস দেন অথবা তার থেকে সমপরিমাণ মন্দ দূর করে দেন, যতক্ষণ না সে কোনো পাপের অথবা আত্মীয়তার সম্পর্ক ছিন্ন করার দু'আ করে।”









আল-জামি` আল-কামিল (10705)


10705 - عن عبادة بن الصامت حدثهم أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"ما على الأرض مسلم يدعو الله بدعوة إلا آتاه الله إياها أو صرف عنه من السوء مثلها ما لم يدع بمأثم أو قطيعة رحم". فقال رجل من القوم: إذا نكثر. قال"الله أكثر".

حسن: رواه الترمذي (3573)، وعبد الله بن أحمد في زياداته على المسند (22785) كلاهما من طريق محمد بن يوسف عن ابن ثوبان عن أبيه عن مكحول عن جبير بن نفير أن عبادة بن الصامت حدثهم فذكره.

وقال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح غريب من هذا الوجه وابن ثوبان هو عبد الرحمن بن ثابت بن ثوبان العابد الشامي".

وإسناده حسن من أجل عبد الرحمن بن ثابت بن ثوبان فإنه مختلف فيه إلا أنه حسن الحديث، وبقية رجاله ثقات، وأبوه هو ثابت بن ثوبان العنسي الشامي، ومحمد بن يوسف هو الفريابي.




উবাদা ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি কোনো মুসলিম পৃথিবীতে (আল্লাহর কাছে) এমন কোনো দু'আ করে, যা কোনো পাপের বা আত্মীয়তার সম্পর্ক ছিন্ন করার জন্য না হয়, তবে আল্লাহ তাকে হয় সেই দু'আটি মঞ্জুর করেন অথবা তার থেকে সমপরিমাণ খারাপ/অনিষ্ট দূর করে দেন।" তখন উপস্থিত লোকদের মধ্য থেকে একজন বলল: "তাহলে তো আমরা বেশি বেশি দু'আ করব।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আল্লাহ আরো বেশি দেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (10706)


10706 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من سره أن يستجيب الله له عند الشدائد والكرب فليكثر الدعاء في الرخاء".

حسن: رواه الترمذي (3382)، وأبو يعلى (6396)، والطبراني في الدعاء (45) كلهم من طريق عبيد بن واقد، ثنا سعيد بن عطية الليثي، عن شهر بن حوشب، عن أبي هريرة فذكره.

ورواه أبو نعيم في أخبار أصبهان من طريق عمرو بن علي الصيرفي، ثنا عبيد بن واقد به مثله.

ثم قال عمرو بن علي:"لا أعلمه رواه غير عبيد بن واقد وكان ثقة.

والحديث ضعّفه الترمذي بقوله:"حديث غريب".

وسبب ضعفه أنه مسلسل بالضعفاء فعبيد بن واقد هو القيسي مختلف فيه وثقه الصيرفي كما سبق، وضعفه أبو حاتم الرازي، وقال ابن عدي:"وعامة ما يرويه لا يتابع عليه".

والحافظ ابن حجر لم يقف على توثيق الصيرفي له - وهو أحد الرواة عنه - ولذلك أطلق القول بتضعيفه.

وأما شيخه سعيد بن عطية الليثي فلم يوثقه غير ابن حبان، ولذأ قال الحافظ:"مقبول" يعني حيث يتابع.

وقد توبع فرواه أبو يعلى (6397) عن عمرو الناقد، ثنا هشيم، ثنا أبو بشر جعفر بن إياس، عن
شهر بن حوشب به مثله.

وإسناده حسن من أجل شهر بن حوشب وفيه كلام معروف غير أنه حسن الحديث إذا لم يخالف، وقد توبع.

فقد رواه الطبراني في الدعاء (44)، والحاكم (1/ 544) كلاهما من طريق عبد الله بن صالح، ثنا معاوية بن صالح، عن أبي عامر الألهاني، عن أبي هريرة مثله.

وقال الحاكم:"حديث صحيح الإسناد احتج البخاري بأبي صالح، وأبو عامر الألهاني أظنه الهوزني وهو صدوق".

قلت: وإسناده حسن من أجل عبد الله بن صالح هو أبو صالح، وأما أبو عامر الألهاني فاسمه عبد الله بن غابر حمصي. قال الدارقطني:"لا بأس به". ووثّقه العجلي وابن حبان وهو أحد شيوخ حريز بن عثمان ولذا أطلق الحافظ القول بتوثيقه.

فالحديث بمجموع طرقه حسن على أقل الأحوال.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি চায় যে, কঠিন বিপদ ও সংকটের সময় আল্লাহ তার দু’আ কবুল করুন, সে যেন স্বাচ্ছন্দ্যের সময় বেশি করে দু’আ করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (10707)


10707 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"ينزل الله تبارك وتعالى كلّ ليلة إلى السّماء الدّنيا حين يبقى ثلثُ اللّيل الآخر، فيقول: من يدعوني فأستجيبَ له، من يسألني فأُعطيه، من يستغفرني فأغفرَ له".

متفق عليه: رواه مالك في القرآن (30) عن ابن شهاب، عن أبي عبد الله الأغرّ، وأبي سلمة، عن أبي هريرة، فذكره. ورواه البخاريّ في التهجد (1145) ومسلم في صلاة المسافرين (758) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.

وقال الترمذي: وقد روي هذا الحديث من أوجه كثيرة عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم، وروي عنه أنه قال:"ينزل الله عز وجل حين يبقى ثلث الليل الآخر" وهو أصح الروايات.

قلت: وروي عن جمع من الصحابة والكلام عليه مبسوط في كتاب الإيمان.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তাআলা প্রতি রাতে রাতের শেষ তৃতীয়াংশ বাকি থাকতে দুনিয়ার আসমানে অবতরণ করেন। অতঃপর তিনি বলেন: ‘কে আমাকে ডাকবে যে আমি তার ডাকে সাড়া দেব? কে আমার কাছে চাইবে যে আমি তাকে দান করব? কে আমার কাছে ক্ষমা প্রার্থনা করবে যে আমি তাকে ক্ষমা করে দেব?’