আল-জামি` আল-কামিল
1108 - عن عبد اللَّه بن أُنيس، قال: سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"يُحشر النّاس يوم القيامة -أو قال: العباد- عُراةً غُرلًا بُهما". قال: قلنا: وما بُهْمًا؟ قال:"ليس معهم شيءٌ، ثم يناديهم بصوتٍ يسمعه مَن بعُد كما يسمعه مَن قَرُب، أنا الملك، أنا الدّيان، ولا ينبغي لأحد من أهل النّار أن يدخل النّار، وله عند أحدٍ من أهل الجنّة حقٌّ حتّى أُقِصَّه منه، ولا ينبغي لأحد من أهل الجنّة أن يدخلَ الجنّة وأحد من أهل النّار عنده حقٌّ حتّى أُقِصَّه منه حتّى اللَّطمة" قال: قلنا: كيف وإنّا إنّما نأتي اللَّه عز وجل عُراة غُرلًا بُهْمًا؟ قال:"بالحسنات والسّيئات".
حسن: رواه الإمام أحمد (16402) واللّفظ له، والحارث بن أبي أسامة في"زوائده" (44)، والبخاري في الأدب المفرد (970) وفي خلق أفعال العباد (ص 92)، وابن أبي عاصم في السنة (514)، وصحّحه الحاكم (2/ 437) كلّهم من طرق عن همام بن يحيى، عن القاسم بن عبد الواحد المكيّ، عن عبد اللَّه بن محمد بن عقيل، أنّه سمع جابر بن عبد اللَّه يقول: بلغني حديث عن رجل سمعه من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فأشتريتُ بعيرًا، ثم شددتُ عليه رحلي، فسرتُ إليه شهرًا حتّى قدمتُ عليه الشام فإذا عبد اللَّه بن أُنيس، فقال للبّواب: قل له جابر على الباب قال: ابن عبد اللَّه؟ قلت: نعم. فخرج يطأ ثوبه فاعتنقني واعتنقته، فقلت: حديثًا بلغني عنك أنّك سمعته من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في القصاص، فخشيتُ أن تموتَ أو أموتَ قبل أن أسمعه. قال: سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول (فذكر الحديث).
وإسناده حسن من أجل القاسم بن عبد الواحد المكيّ، وشيخه عبد اللَّه بن محمد بن عقيل، فإنهما لم يبلغا درجة"الثّقات" وحسَّنه أيضًا المنذري في"الترغيب والترهيب" (4/ 202)، وإن
كان الهيثميّ رحمه الله ضعّفه في"المجمع" (1/ 133) من أجل عبد اللَّه بن محمد بن عقيل، ولكن الصواب أنه حسن الحديث إِلَّا إذا خالف فلا يقبل كما قال الذّهبيّ في ترجمته في"الميزان"، وعلقه البخاريّ بصيغة الجزم (1/ 173) وقال:"رحل جابر بن عبد اللَّه مسيرة شهر إلى عبد اللَّه بن أنيس في حديث واحد".
قال الحافظ في"الفتح" (1/ 174):"وله طريق أخرى أخرجها الطبرانيّ في"مسند الشاميين"، وتمام في"فوائده" من طريق الحجاج بن دينار، عن محمد بن المنكدر، عن جابر، وذكر نحوه وقال: وإسناده صالح، وله طريق ثالثة أخرجها الخطيب في"الرحلة" من طريق أبي الجارود العنسيّ -وهو بالنون الساكنة- عن جابر، فذكر نحوه، وفي إسناده ضعف". انتهى.
وقال ابن عباس:"كان يبلغني الحديث عن الرّجل من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم فلو أشاء أن أرسل إليه حتّى يجيء فيحدّثني فعلتُ، ولكني كنتُ أذهبُ إليه، فأقيل على بابه حتّى يخرج إليَّ فيحدّثني".
وعن سعيد بن المسيب أنه قال:"إن كنتُ لأسير اللَّيالي والأيام في طلب الحديث الواحد".
أخرجه ابن عبد البر في"جامع بيان العلم" (569 - 570)، والخطيب في"الرحلة" (41 - 42) وغيرهما.
ومن هنا قيل: الرحلة في طلب الحديث سنّة عمن سلف.
وأمّا ما رُوي أنّ أبا أيوب رحل إلى عقبة بن عامر، فأتى مسلمة بن مخلَّد، فخرج إليه، فقال: دلُّوني، فأتى عقبة، فقال: حدّثنا ما سمعته من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لم يبق أحدٌ سمعه. قال: سمعتُ رسولَ اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"من ستر على مؤمن في الدّنيا ستره اللَّه يوم القيامة، فأتى راحلته فركب، فرجع. فهو ضعيف.
رواه الإمام أحمد (17391)، والحميدي في"مسنده" (384)، وابن عبد البر في"جامع بيان العلم" (567) كلّهم من طريق سفيان، عن ابن جريج، عن أبي سعيد الأعمى، أنّه حدّث عطاءً، فذكر نحوه.
وأبو سعيد الأعمى (وقيل: أبو سعد) لم يرو عنه غير ابن جريج، وليس فيه توثيق لأحد، لذا قال فيه الذّهبيّ وابن حجر:"مجهول".
وأخرجه الطبرانيّ في الكبير (19/ 439) عن عبد اللَّه بن أحمد بن حنبل، عن أبيه، عن عباد بن عباد المهلبيّ، عن ابن عون، عن مكحول، أنّ عقبة بن عامر أتى مسلمة بن مخلد، وكان بينه وبين البواب شيء، فسمع صوته فأذن له، فقال: إنّي لم آتك زائرًا، ولكن جئتك بحاجة، أتذكر يوم قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من علم من أخيه سيئة، فسترها ستر اللَّه عليه يوم القيامة"؟ قال: نعم. قال: لهذا جئتُ".
فهذا إسناد قال فيه الهيثميّ:"رجاله رجال الصحيح" وهو كما قال، لكن المشهور أنّ الذي
خرج هو أبو أيوب إلى عقبة، ثم أيضًا في صحبة مسلمة بن مخلد اختلاف، فقيل: ولد على عهد النبيّ صلى الله عليه وسلم، وأقرَّ بصحبته البخاريّ وتعقبه ابن أبي حاتم فقال:"ليست له صحبة، نزل مصر، وكان البخاريّ كتب: إنّ له صحبة، فغيّر أبي ذلك وقال: ليست له صحبة". وقال الإمام أحمد:"مسلمة ابن مخلد ليست له صحبة". وقال ابن حبان:"ولد في السنة الأولى من الهجرة". ونقل الحافظ عن العسكريّ أنه قال:"له رؤية وليست له صحبة".
وقيل: الذي خرج إلى مسلمة بن مخلد هو جابر بن عبد اللَّه.
ورد ذلك في رواية عند الطبراني (مجمع البحرين - 217) من طريق عبيد اللَّه بن محمد بن أبي عائشة، عن يحيى بن أبي الحجاج، عن أبي سنان، عن رجاء بن حيوة، سمعت مسلمة بن مخلد.
وفيه يحيى بن أبي الحجاج، وأبو سنان عيسى بن سنان، وفيهما كلام.
والظاهر أنه وقع في إسناد هذا الخبر اضطراب لا يخلو طريق من طرقه من مقال.
والصّحيح أن جابر بن عبد اللَّه إنّما رحل إلى عبد اللَّه بن أنيس، كما سبق، واللَّه أعلم.
আবদুল্লাহ ইবনু উনাইস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "কিয়ামতের দিন মানুষকে—অথবা তিনি বলেছেন, বান্দাদেরকে—নগ্ন, খৎনাবিহীন (অ-বিচ্ছিন্ন চামড়াসহ) এবং 'বুহমা' অবস্থায় একত্রিত করা হবে।" তিনি বলেন, আমরা জিজ্ঞেস করলাম: 'বুহমা' অর্থ কী? তিনি বললেন: "তাদের সাথে কোনো কিছুই থাকবে না। তারপর আল্লাহ এমন এক আওয়াজে তাদের ডাকবেন যা দূরের লোকও শুনবে, যেমনটি কাছের লোক শুনে থাকে: আমিই বাদশাহ, আমিই প্রতিফলদাতা। জাহান্নামবাসীদের মধ্যে এমন কারো জন্য জাহান্নামে প্রবেশ করা উচিত হবে না, যার কাছে জান্নাতবাসীদের কারো কোনো প্রাপ্য অধিকার রয়েছে, যতক্ষণ না আমি তা (বদলা নিয়ে) পরিশোধ করে দেবো। আর জান্নাতবাসীদের মধ্যে এমন কারো জন্য জান্নাতে প্রবেশ করা উচিত হবে না, যার কাছে জাহান্নামবাসীদের কারো কোনো প্রাপ্য অধিকার রয়েছে, যতক্ষণ না আমি তা (বদলা নিয়ে) পরিশোধ করে দেবো—এমনকি একটি চড়ও (যদি মেরে থাকে)।" তিনি বলেন, আমরা জিজ্ঞেস করলাম: আমরা তো আল্লাহর কাছে নগ্ন, খৎনাবিহীন এবং 'বুহমা' (সম্পদহীন) অবস্থায় আসব। তখন তা কিভাবে সম্ভব হবে? তিনি বললেন: "নেকী ও পাপের বিনিময়ে।"
1109 - عن ابن عباس أنّه تمارى والحرُّ بن قيس بن حِصْن الفزاريّ في صاحب موسى فمر بهما أبي بن كعب فدعاه ابن عباس، فقال: إني تماريت أنا وصاحبي هذا في صاحب موسى الذي سأل السبيل إلى لُقِيّه، هل سمعتَ رسولَ اللَّه صلى الله عليه وسلم يذكرُ شأنه؟ قال: نعم سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"بينما موسى في ملأ من بني إسرائيل إذْ جاءه رجل فقال: هل تعلمُ أحدًا أعلم منك؟ قال موسى: لا، فأوحى اللَّه إلى موسى: بلى، عبدنا خضر. فسأل السّبيل إلى لُقيه، فجعل اللَّه له الحوتَ آية، وقيل له: إذا فقدتَ الحوت فارجعْ فإنَّك ستلقاه، فكان موسى يتّبع أثر الحوت في البحر، فقال فتى موسى لموسى: أرأيتَ إذْ أوينا إلى الصّخرة فإنّي نسيتُ الحوت، وما أنسانيه إِلَّا الشّيطان أن أذكره. قال موسى: ذلك ما كُنَّا نبغي، فارتدّا على آثارهما قصصًا، فوجدا خضرًا، فكان من شأنهما ما قصَّ اللَّه في كتابه".
متفق عليه: رواه البخاريّ في العلم (78)، ومسلم في الفضائل (2380: 174) كلاهما من طريق الزّهريّ، عن عبيد اللَّه بن عبد اللَّه بن عتبة بن مسعود، عن ابن عباس، فذكر الحديث.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি এবং হুর ইবনু ক্বাইস ইবনু হিসন আল-ফাযারী মূসা (আঃ)-এর সঙ্গীর (খিদির) ব্যাপারে বিতর্ক করছিলেন। তখন তাঁদের পাশ দিয়ে উবাই ইবনু কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যাচ্ছিলেন। ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে ডাকলেন এবং বললেন: আমি এবং আমার এই সঙ্গী মূসা (আঃ)-এর সেই সঙ্গীর ব্যাপারে বিতর্ক করছি, যাঁর সাথে সাক্ষাৎ পাওয়ার জন্য তিনি (মূসা) পথ জানতে চেয়েছিলেন। আপনি কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তাঁর (খিদিরের) ব্যাপারটি আলোচনা করতে শুনেছেন?
তিনি বললেন: হ্যাঁ, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "একদা মূসা (আঃ) বনী ইসরাঈলের এক জামাআতের মধ্যে ছিলেন। তখন এক ব্যক্তি এসে তাঁকে জিজ্ঞেস করল: আপনি কি আপনার চেয়ে অধিক জ্ঞানী কাউকে জানেন? মূসা (আঃ) বললেন: না। তখন আল্লাহ তা'আলা মূসা (আঃ)-এর প্রতি ওহী করলেন: হ্যাঁ, আমাদের বান্দা খিদির (আঃ)।"
"তখন তিনি (মূসা) তাঁর সাথে সাক্ষাতের পথ জানতে চাইলেন। আল্লাহ মাছকে তাঁর জন্য নিদর্শন হিসেবে নির্ধারণ করলেন এবং তাঁকে বলা হলো: যখন তুমি মাছটি হারিয়ে ফেলবে, তখন ফিরে যাবে। কারণ, সেখানে তুমি তাঁর সাক্ষাৎ পাবে।"
"এরপর মূসা (আঃ) সাগরে মাছের পদচিহ্ন অনুসরণ করতে লাগলেন। তখন মূসা (আঃ)-এর যুবক সঙ্গী মূসা (আঃ)-কে বললেন: আপনি কি লক্ষ করেছেন, যখন আমরা পাথরের কাছে আশ্রয় নিয়েছিলাম, তখন আমি মাছের কথা ভুলে গিয়েছিলাম? আর শয়তান ব্যতীত আর কেউ আমাকে তা স্মরণ করাতে ভুলিয়ে দেয়নি।"
মূসা (আঃ) বললেন: আমরা তো এরই সন্ধানে ছিলাম। অতঃপর তাঁরা উভয়ে নিজেদের পদচিহ্ন অনুসরণ করে ফিরে গেলেন এবং খিদির (আঃ)-এর সাক্ষাৎ পেলেন। তারপর তাঁদের মধ্যে যা ঘটেছিল, আল্লাহ তা নিজ কিতাবে বর্ণনা করেছেন।
1110 - عن أبي الدرداء قال: سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إن العلماء هم ورثة الأنبياء، لم يورثوا دينارًا ولا درهمًا، وإنما ورثوا العلم، فمن أخذ به أخذ بحظ وافر".
حسن: رواه أبو داود (3641) والتّرمذيّ (2682) وابن ماجه (223) وأحمد (21715) كلّهم من حديث عاصم بن رجاء بن حيوة، عن داود بن جميل عن كثير بن قيس، عن أبي الدّرداء، فذكره في حديث طويل.
ومنهم من لم يذكر داود بن جميل بين عاصم بن رجاء وبين كثير، وإسناده حسن لكثرة طرقه. وكثير بن قيس، يقال له: فيس بن كثير، والأوّل أكثر.
انظر لمزيد من التخريج: باب ما جاء في فضل من خرج في طلب العلم.
وأمّا ما روي:"علماء أمتي كأنبياء بني إسرائيل" فلا أصل له.
قال السخاوي في المقاصد الحسنة (702): قال شيخنا: (يعني ابن حجر)، ومن قبله الدميري والزركشي:"إنه لا أصل له" وزاد بعضهم:"لا يعرف في كتاب معتبر".
وكذلك لا يصح ما رُوي عن ابن عباس مرفوعًا:"أقرب النّاس من درجة النبوة: أهل العلم والجهاد"، رواه أبو نعيم في فضل العالم العفيف بسند ضعيف، قاله السخاوي في المقاصد الحسنة في الموضع المشار إليه أعلاه.
আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয় আলেমরা হলেন নবীদের উত্তরাধিকারী। তারা দিনার বা দিরহামের উত্তরাধিকারী করেন না, বরং তারা (নবীরা) জ্ঞানের উত্তরাধিকারী করেন। অতএব, যে ব্যক্তি তা গ্রহণ করল, সে বিরাট অংশ গ্রহণ করল।"
1111 - عن أبي سعيد الخدريّ أنه قال:"مرحبًا بوصية رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم كان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يوصينا بكم".
حسن: رواه الحاكم (1/ 88)، وعنه البيهقيّ في المدخل (621) من طريق سعيد بن سليمان الواسطيّ، ثنا عباد بن العوّام، عن الجريريّ، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد الخدريّ، فذكر الحديث.
قال الحاكم:"هذا حديث صحيح ثابت؛ لاتفاق الشيخين على الاحتجاج بسعيد بن سليمان، وعباد بن العوام، والجريريّ، ثم احتجاج مسلم بحديث أبي نضرة، فقد عددت له في"المسند الصّحيح" أحد عشر أصلًا للجريريّ، ولم يخرجا هذا الحديث الذي هو أوّل حديث في فضل طلاب الحديث ولا يعلم له علّة، فلهذا الحديث طرق يجمعها أهل الحديث عن أبي هارون العبديّ، عن أبي سعيد. وأبو هارون ممن سكتوا عنه".
وقال الذّهبيّ:"على شرط مسلم، ولا علّة له".
قلت: الجريريّ هو سعيد بن إياس، محدّث أهل البصرة أحد الثّقات الأثبات إِلَّا أنه اختلط قبل موته بثلاث سنين، وقد ذكر ابنُ حبان أن اختلاطه لم يكن فاحشًا، ولم يتبيّن لي رواية عباد بن
العوام عنه هل كانت قبل الاختلاط أو بعده، فإن كانت روايته عنه قبل التّغير فالحديث صحيح كما قال الحاكم والذهبي.
وقال العلائيّ في"بغية الملتمس" (ص 28):"إسناده لا بأس به".
ولكن قال مُهَنّا -كما في المنتخب من العلل للخلال (66) -:"سألت أحمد عن حديث حدثنا سعيد بن سليمان، ثنا عباد بن العوام، عن سعيد الجريريّ، عن أبي نضرة، فذكر الحديث. فقال أحمد: ما خلق اللَّه من ذا شيئا، هذا حديث أبي هارون عن أبي سعيد" انتهى.
قلت: حديث أبي هارون العبديّ، عن أبي سعيد روي بألفاظ متقاربة، منها ما أورده ابن عبد البر في"جامع بيان العلم" عن أبي هارون، وشهر بن حوشب أنهما قالا:"كنّا إذا أتينا أبا سعيد الخدريّ يقول: مرحبًا بوصية رسول اللَّه، قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ستفتح لكم الأرض، ويأتيكم قوم، أو يقال: غلمان حديثة أسنانهم يطلبون العلم، ويتفقهون في الدّين، ويتعلمون منكم، فإذا جاءوكم فعلّموهم، وألطفوهم، ووسّعوا لهم في المجلس، وفهِّموهم الحديث".
فكان أبو سعيد يقول لنا: مرحبًا بوصية رسول اللَّه، أمرنا رسول اللَّه أن نوسِّع لكم في المجلس، وأن نفهمكم الحديث".
أخرجه الترمذيّ (2650)، وابن ماجه (247) وغيرهما من طرق عن أبي هارون، به.
وأبو هارون اسمه: عِمارة بن جوين العيري، متروك عند أكثرهم. وكذّبه بعضهم، لكن رواه أيضًا الخطيب في"الجامع لأخلاق الرّاوي والسامع" (357) من طريق ليث بن أبي سليم، عن شهر بن حوشب عن أبي سعيد.
قلت: وهذا أيضًا إسناد ضعيف، إِلَّا أنّه أحسن حالا من إسناد أبي هارون.
قيل ليحيى بن معين: هذا أيضًا ضعيف مثل أبي هارون؟ قال: لا، هذا أقوى من ذلك وأحسن، حدّثنا ابن أبي مريم، عن يحيى بن أيوب، عن ليث. المنتخب من العلل للخلال (65).
وقال البيهقيّ في"المدخل" بعد أن رواه من طريقه:"هكذا رواه جماعة من الأئمة عن أبي هارون العبديّ، وأبو هارون وإن كان ضعيفًا فرواية أبي نضرة له شاهدة".
والخلاصة: إن لحديث أبي سعيد هذا ثلاثة طرق، طريق أبي نضرة، وطريق أبي هارون العبديّ، وطريق شهر بن حوشب، كلّهم عن أبي سعيد الخدريّ، فما كان هذا سبيله فهو لا ينزل عن درجة الحسن عند جمهور علماء الحديث، وباللَّه التوفيق.
আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: "রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অসিয়তকে স্বাগত। রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের তোমাদের প্রতি অসিয়ত (নির্দেশ) করতেন।"
1112 - عن أبي موسى، أنّ النّبيّ صلى الله عليه وسلم بعثه ومُعاذًا إلى اليمن، فقال:"يسّرا ولا تُعسِّرا، بشِّرا ولا تُنفِّرا، وتطاوعا ولا تختلفا".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الجهاد والسير (3038)، ومسلم في الجهاد والسير (1733) كلاهما من حديث وكيع، عن شعبة، عن سعيد بن أبي بردة، عن أبيه، عن جدّه أبي موسى
الأشعريّ، فذكره.
আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে এবং মু‘আযকে ইয়ামান দেশে প্রেরণ করেন। অতঃপর তিনি বলেন: তোমরা সহজ করবে, কঠিন করবে না; সুসংবাদ দেবে, বিতৃষ্ণা সৃষ্টি করবে না; এবং পরস্পর মিলেমিশে থাকবে, মতপার্থক্য করবে না।
1113 - عن أنس بن مالك، قال: كان أخوان على عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فكان أحدهما يأتي النبيَّ صلى الله عليه وسلم، والآخر يحترف، فشكا المحترف أخاه إلى النبيّ صلى الله عليه وسلم فقال:"لعلّك ترزق به".
صحيح: رواه الترمذيّ (2345) عن محمد بن بشّار، حدّثنا أبو داود، حدّثنا حمّاد بن سلمة، عن ثابت، عن أنس بن مالك، فذكر الحديث.
قال الترمذيّ:"هذا حديث حسن صحيح".
وصحّحه الحاكم (1/ 93 - 94) فرواه من طريق أبي داود، به. ثم قال:"هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ورواته عن آخرهم أثبات ثقات، ولم يخرجاه".
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে দুইজন ভাই ছিল। তাদের একজন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসতেন (ধর্মীয় জ্ঞানার্জনের জন্য), আর অন্যজন পেশাগত কাজ (উপার্জন) করতেন। অতঃপর উপার্জনকারী ব্যক্তিটি তার ভাইয়ের বিরুদ্ধে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট অভিযোগ করলেন। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সম্ভবত তুমি তার (কারণেই) রিজিকপ্রাপ্ত হচ্ছো।"
1114 - عن جابر، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"معلِّم الخير يستغفر له كلُّ شيء حتّى الحيتان في البحار".
حسن: رواه الطبرانيّ في الأوسط (مجمع البحرين - 203) عن محمد بن علي الصّائغ، ثنا إسماعيل بن عبد اللَّه بن زرارة، ثنا أبو إسحاق الفزاريّ، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر، فذكر الحديث.
وإسناده حسن من أجل إسماعيل بن عبد اللَّه فإنه صدوق، وقال الطبرانيّ:"لم يروه عن الأعمش إِلَّا الفزاريّ".
قلت: هذا ليس تعليلًا؛ لأنّ أبا إسحاق الفزاريّ إمام متقن لا يضرّ تفرّده، واللَّه أعلم.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কল্যাণের শিক্ষকের জন্য সব কিছুই ক্ষমা প্রার্থনা করে, এমনকি সমুদ্রের মাছেরা পর্যন্ত।"
1115 - عن ابن عباس، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لما بعث مُعاذًا على اليمن قال:"إنّك تقدّم على قوم أهل الكتاب فليكن أوّل ما تدعوهم إليه عبادة اللَّه، فإذا عرفوا اللَّه فأخبرهم أنّ اللَّه قد فرض عليهم خمس صلوات في يومهم وليلتهم، فإذا فعلوا
فأخبرهم أنّ اللَّه فرض عليهم زكاة من أموالهم، وتردُّ على فقرائهم، فإذا أطاعوا بها فخذ منهم وتوقَ كرائم أموالهم".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الزّكاة (1458)، ومسلم في الإيمان (19) كلاهما عن أمية بن بسطام، عن يزيد بن زريع، عن إسماعيل بن أمية، عن يحيى بن عبد اللَّه بن محمد بن صيفيّ، أنه سمع أبا معبد مولى ابن عباس يقول: سمعت ابن عباس يقول: فذكره.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ইয়ামেনের দিকে পাঠালেন, তখন তিনি বললেন: 'নিশ্চয়ই তুমি এমন এক সম্প্রদায়ের কাছে যাচ্ছ, যারা কিতাবী (আহলে কিতাব)। অতএব, সর্বপ্রথম তুমি তাদের আল্লাহর ইবাদতের দিকে আহবান করবে। যখন তারা আল্লাহকে চিনে নিবে, তখন তুমি তাদের জানাবে যে আল্লাহ তাদের উপর দিনে ও রাতে পাঁচ ওয়াক্ত সালাত (নামাজ) ফরয করেছেন। যখন তারা (তা) পালন করবে, তখন তাদের জানিয়ে দাও যে আল্লাহ তাদের সম্পদের উপর যাকাত ফরয করেছেন, যা তাদের ধনীদের থেকে গ্রহণ করা হবে এবং তাদের দরিদ্রদের মধ্যে বণ্টন করা হবে। যখন তারা তাতে অনুগত হবে, তখন তুমি তাদের থেকে তা গ্রহণ করো। তবে তাদের উৎকৃষ্ট সম্পদ (নেওয়া) হতে বিরত থেকো।'
1116 - عن أبي هريرة، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"من دعا إلى هُدى كان له من الأجر مثلُ أجور من تبعه لا يَنقص ذلك من أجورهم شيئًا، ومن دعا إلى ضلالة كان عليه من الإثم مثلُ آثام من تَبعه لا ينقص ذلك من آثامهم شيئًا".
صحيح: رواه مسلم في العلم (2674) من طرق عن إسماعيل (يعنون ابن جعفر)، عن العلاء، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যে ব্যক্তি সৎপথের দিকে আহ্বান করে, সে তার অনুসারীদের সমপরিমাণ সওয়াব লাভ করে। এর ফলে তাদের (অনুসারীদের) সওয়াব মোটেও কমে যায় না। আর যে ব্যক্তি কোনো ভ্রষ্টতার দিকে আহ্বান করে, তার উপর তার অনুসারীদের পাপের সমপরিমাণ পাপের বোঝা বর্তায়। এর ফলে তাদের (অনুসারীদের) পাপ মোটেও কমে যায় না।
1117 - عن جرير بن عبد اللَّه، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"مَنْ سَنَّ في الإسلام سنةً حسنةً، فعُمل بها بعده، كُتب له مثل أجر من عمل بها، ولا ينقص من أجورهم شيءٌ. ومَنْ سنَّ في الإسلام سنَّة سيِّئةً فعُمل بها بعده، كُتب عليه مثل وِزر من عمل بها، ولا ينقص من أوزارهم شيء".
وفي رواية: قال: كنتُ جالسًا عند رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في صدر النّهار، قال: فجاءه قوم حفاة عراة مجتابي النّمار -أو العَبَاء- متقلِّدي السّيوف، عامتهم من مضر بل كلّهم من مضر، فَتَمَعَّر وجهُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لما رأى بهم من الفاقة، فدخل، ثم خرج، فأمر بلالًا فأذّن وأقام، فصلّى ثم خطب فقال: {يَاأَيُّهَا النَّاسُ اتَّقُوا رَبَّكُمُ الَّذِي خَلَقَكُمْ مِنْ نَفْسٍ وَاحِدَةٍ وَخَلَقَ مِنْهَا زَوْجَهَا وَبَثَّ} إلى آخر الآية: {إِنَّ اللَّهَ كَانَ عَلَيْكُمْ رَقِيبًا} [سورة النساء: 1]، والآية التي في الحشر: {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ وَلْتَنْظُرْ نَفْسٌ مَا قَدَّمَتْ لِغَدٍ وَاتَّقُوا اللَّهَ} [سورة الحشر: 18]. تصدَّقَ رجلٌ من ديناره، من درهمه، من ثوبه، من صاع بُرِّه، من صاع تمره، حتّى قال:"ولو بشقِّ تمرة". قال: فجاء رجلٌ من الأنصار بصُرَّةٍ كادَتْ كفُّه تَعْجِزُ عنها، بل قد عجزَتْ. قال: ثم تتابع النَّاسُ حتّى رأيتُ كومين من طعام وثياب حتّى رأيت وجهَ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يتهلَّل كأنّه مُذْهَبَةٌ، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من سنَّ في الإسلام سنّةً حسنةً فله أجرها وأجر من
عمل بها بعده من غير أن ينقص من أجورهم شيءٌ، ومن سنَّ في الإسلام سنَّةً سيّئةً كان عليه وزرها ووزرُ من عمل بها من بعده من غير أن ينقص من أوزارهم شيءٌ".
صحيح: رواه مسلم في العلم (1017: 6800) عن زهير بن حرب، حدّثنا جرير بن عبد الحميد، عن الأعمش، عن موسى بن عبد اللَّه بن يزيد وأبي الضّحى، عن عبد الرحمن بن هلال العبسيّ، عن جرير بن عبد اللَّه، فذكر مثله.
والرّواية الثانية رواها مسلم أيضًا في الزّكاة (1017).
قوله:"مجتابي النّمار" أي لابسيها، والنِّمار جمع نمرة، وهي ثياب صوف فيها تنمير.
وقوله:"فتمعَّر" أي تغيّر وجهه.
وقوله:"يتهلّل" أي يستنير فرحًا.
জারীর ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি ইসলামের মধ্যে কোনো উত্তম রীতি (সুন্নাতুন হাসানা) প্রচলন করে, এরপর তার পরে এর উপর আমল করা হয়, তবে যারা এর উপর আমল করে তাদের সমপরিমাণ সওয়াব তার জন্য লেখা হয়। এতে তাদের সওয়াব থেকে বিন্দুমাত্রও কমানো হয় না। আর যে ব্যক্তি ইসলামের মধ্যে কোনো মন্দ রীতি (সুন্নাতুন সাইয়্যিআহ) প্রচলন করে, এরপর তার পরে এর উপর আমল করা হয়, তবে যারা এর উপর আমল করে তাদের সমপরিমাণ পাপ তার উপর লেখা হয়। এতে তাদের পাপ থেকে বিন্দুমাত্রও কমানো হয় না।"
অন্য এক বর্ণনায় তিনি বলেন: আমি দিনের প্রথম ভাগে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বসে ছিলাম। তিনি বলেন: তখন তাঁর কাছে একদল লোক এলো, যারা ছিল খালি পায়ে, উলঙ্গ (বা প্রায় বস্ত্রহীন), ডোরাকাটা পশমী চাদর বা আবায়া পরিহিত এবং তলোয়ার গলায় ঝুলিয়ে রেখেছিল। তাদের অধিকাংশ ছিল মুদার গোত্রের, বরং সকলেই ছিল মুদার গোত্রের। তাদের চরম দারিদ্র্য দেখে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চেহারা বিবর্ণ হয়ে গেল। তিনি (ঘরের) ভেতরে গেলেন, তারপর বেরিয়ে এলেন। তিনি বিলালকে আদেশ করলেন, ফলে তিনি আযান দিলেন এবং ইকামত দিলেন। তিনি সালাত আদায় করলেন, অতঃপর খুতবা দিলেন এবং বললেন: "হে মানব জাতি! তোমরা তোমাদের প্রতিপালককে ভয় করো, যিনি তোমাদেরকে সৃষ্টি করেছেন একটিমাত্র আত্মা থেকে এবং সৃষ্টি করেছেন তা থেকে তার জোড়া এবং ছড়িয়ে দিয়েছেন..." আয়াতের শেষ পর্যন্ত: "নিশ্চয়ই আল্লাহ তোমাদের উপর সর্বদা দৃষ্টি রাখেন।" (সূরা নিসা: ১)। আর হাশরের সূরার এই আয়াতটি: "হে ঈমানদারগণ! তোমরা আল্লাহকে ভয় করো এবং প্রত্যেক ব্যক্তির উচিত যে, সে আগামী দিনের জন্য কী অগ্রিম পাঠিয়েছে তা যেন দেখে। আর আল্লাহকে ভয় করো।" (সূরা হাশর: ১৮)। (অতঃপর তিনি বললেন,) একজন লোক যেন তার দীনার থেকে, তার দিরহাম থেকে, তার কাপড় থেকে, তার এক সা' গম থেকে, তার এক সা' খেজুর থেকে সাদাকা করে। এমনকি তিনি বললেন: "যদিও তা এক টুকরা খেজুরের বিনিময়ে হয়।"
বর্ণনাকারী বলেন: তখন আনসারদের মধ্য থেকে এক ব্যক্তি একটি থলি নিয়ে আসলেন, যা তার হাতের জন্য বহন করা প্রায় অসম্ভব ছিল, বরং তা (ভারী হওয়ায়) সত্যিই অসম্ভব ছিল। বর্ণনাকারী বলেন: এরপর লোকেরা একের পর এক আসতে শুরু করল, এমনকি আমি দেখলাম খাবার ও কাপড়ের দুটি স্তূপ তৈরি হয়ে গেছে। অবশেষে আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চেহারা দেখলাম যা উজ্জ্বল হচ্ছিল, যেন তা সোনার মতো ঝলমল করছে। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যে ব্যক্তি ইসলামের মধ্যে কোনো উত্তম রীতি (সুন্নাতুন হাসানা) প্রচলন করে, তার জন্য এর প্রতিদান রয়েছে এবং তার পরে যারা এর উপর আমল করে তাদেরও প্রতিদান রয়েছে, তাদের প্রতিদান থেকে বিন্দুমাত্রও কমানো ছাড়াই। আর যে ব্যক্তি ইসলামের মধ্যে কোনো মন্দ রীতি (সুন্নাতুন সাইয়্যিআহ) প্রচলন করে, তার উপর এর পাপ রয়েছে এবং তার পরে যারা এর উপর আমল করে তাদেরও পাপ রয়েছে, তাদের পাপ থেকে বিন্দুমাত্রও কমানো ছাড়াই।"
1118 - عن وعن أبي مسعود الأنصاريّ قال: جاء رجلٌ إلى النّبيّ صلى الله عليه وسلم فقال: إنّي أُبْدِعَ بي فاحملني. فقال:"ما عندي". فقال رجلٌ: يا رسولَ اللَّه، أنا أدلُّه على من يحمله. فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من دلَّ على خير فله مثل أجر فاعله".
صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1893) من طرق عن الأعمش، عن أبي عمرو الشّيبانيّ، عن أبي مسعود الأنصاريّ، فذكر الحديث.
وقوله:"أبدع بيّ" أي هلكتْ دابتي، وهي مركوبي.
আবূ মাসঊদ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল, “আমার বাহন অকেজো হয়ে গেছে (বা ধ্বংস হয়ে গেছে), সুতরাং আপনি আমাকে একটি বাহনের ব্যবস্থা দিন।” তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “আমার কাছে কিছু নেই।” তখন এক ব্যক্তি বলল, “হে আল্লাহর রাসূল! আমি তাকে এমন লোকের কাছে দেখিয়ে দেব, যে তাকে বাহন দেবে।” তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “যে ব্যক্তি কোনো কল্যাণের পথ দেখায়, তার জন্য সেই আমলকারীর সমপরিমাণ সওয়াব রয়েছে।”
1119 - عن أبي هريرة، بلفظ: جاء رجل إلى النبيّ صلى الله عليه وسلم فحثّ عليه، فقال رجل: عندي كذا وكذا، قال: فما بقي في المجلس رجلٌ إِلَّا تصدّق عليه بما قلّ أو كَثُر، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من استنَّ خيرًا فاستُنَّ به، كان له أجره كاملًا، ومن أجور منِ استنَّ به ولا ينقص من أجورهم شيئًا، ومن استنَّ سنَّة سيئة، فاستُنَّ به، فعليه وزره كاملًا، ومن أوزار الذي استنَّ به، ولا ينقص من أوزارهم شيئًا".
صحيح: رواه ابن ماجه (204) عن عبد الوارث بن عبد الصمد بن عبد الوارث، عن أبيه، قال: حدّثني أبيّ، عن أيوب، عن محمد بن سيرين، عن أبي هريرة، فذكره، وإسناده صحيح. وصحّحه البوصيريّ في"الزوائد".
وهو في مسند أحمد (10749) عن عبد الصّمد، بإسناده، مثله.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলেন। তখন তিনি তার (সাহায্যের) জন্য উৎসাহিত করলেন। এক ব্যক্তি বলল, 'আমার কাছে এতো এতো জিনিস রয়েছে।' বর্ণনাকারী বলেন, এরপর মজলিসে এমন কোনো ব্যক্তি অবশিষ্ট রইল না, যে তার প্রতি কম বা বেশি কিছু দান করেনি। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "যে ব্যক্তি কোনো উত্তম পথ (ধারা) চালু করে এবং লোকেরা তা অনুসরণ করে, সে তার পূর্ণ প্রতিদান পাবে এবং যারা তাকে অনুসরণ করবে তাদের প্রতিদানও সে পাবে, এতে তাদের প্রতিদান থেকে সামান্যও হ্রাস পাবে না। আর যে ব্যক্তি কোনো মন্দ পথ (ধারা) চালু করে এবং লোকেরা তা অনুসরণ করে, তার উপর তার পূর্ণ বোঝা (পাপ) বর্তাবে এবং যারা তাকে অনুসরণ করবে তাদের বোঝাও তার উপর বর্তাবে, এতে তাদের পাপ থেকে সামান্যও হ্রাস পাবে না।"
1120 - عن واثلة بن الأسقع، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"من سنَّ سنَّةً حسنةً، فله أجرها ما عُمل به في حياته، ويعد مماته حتّى يترك، ومن سنَّ سنّة سيئة فعليه إثمها حتّى يترك، ومن مات مرابطًا في سبيل اللَّه جرى له أجر المرابط حتّى يبعث يوم القيامة".
حسن: رواه الطبرانيّ (184) من طريقين عن إبراهيم بن العلاء الحمصيّ، ثنا إسماعيل بن
عياش، عن عمر بن رؤبة، عن عبد الواحد بن عبد اللَّه النّصريّ، عن واثلة بن الأسقع، فذكر الحديث. قال الهيثميّ:". . . رجاله موثقون".
قلت: إسناده حسن، إبراهيم بن العلاء مستقيم الأمر في الحديث، ولم ينكر عليه إلا حديث واحد، فلما أخبر بذلك تركه، فهذا يدل على صدقه وورعه.
وإسماعيل بن عياش صدوق في روايته عن أهل الشّام، وشيخه في هذا الحديث عمر بن رؤبة صدوق من أهل الشّام.
ওয়াসিলাহ ইবনুল আসকা' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো উত্তম প্রথা (সুন্নাহ হাসানা) চালু করে, সে তার জীবদ্দশায় ও মৃত্যুর পরেও তার সওয়াব পেতে থাকবে যতক্ষণ সেই অনুযায়ী আমল করা হয় এবং যতক্ষণ না তা সম্পূর্ণরূপে পরিত্যক্ত হয়। আর যে ব্যক্তি কোনো খারাপ প্রথা চালু করে, তার উপর তার পাপ বর্তাতে থাকবে যতক্ষণ না তা পরিত্যক্ত হয়। আর যে ব্যক্তি আল্লাহর পথে সীমান্ত প্রহরী (মুরাবিত) অবস্থায় মৃত্যুবরণ করে, কিয়ামত দিবসে তাকে পুনরুত্থিত করা পর্যন্ত তার জন্য সেই প্রহরীর সওয়াব জারি থাকে।"
1121 - عن حذيفة قال: سأل رجل على عهد النبيّ صلى الله عليه وسلم فأمسك القوم، ثم إنّ رجلًا أعطاه فأعطى القوم، فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"من سنَّ في الإسلام سنّة حسنة فعُمل بها، كان له أجرها وأجر من عمل بها من غير أن ينتقص من أجورهم شيئًا، ومن سنَّ في الإسلام سنّة سيئة، فعُمل بها بعده، فعليه وزرها ووزر من عمل بها من غير أن ينتقص من أوزارهم شيئًا".
حسن: رواه الإمام أحمد (23289)، والبزّار -كشف الأستار (150) - والطبرانيّ في"الأوسط" (مجمع البحرين - 238) كلّهم من حديث محمد بن سيرين، عن أبي عبيدة بن حذيفة، عن أبيه، فذكر الحديث.
وإسناده حسن من أجل أبي عبيدة، لا يعرف اسمه، وذكره ابن حبان في الثقات (5/ 597)، ولا يعرف فيه جرح ولا انقطاع، وهو حديث البيت، وله أصل.
وأمّا ما رُوي عن أنس بن مالك، قال: أتى النّبيَّ صلى الله عليه وسلم رجلٌ يستحمله، فلم يجد عنده ما يحمله، فدلّه على آخر فحمله، فأتى النبيَّ صلى الله عليه وسلم فأخبره، فقال:"إنّ الدّالَ على الخير كفاعله". فهو ضعيف.
رواه الترمذيّ (2670) عن نصر بن عبد الرحمن الكوفي، حدّثنا أحمد بن بشير، عن شبيب بن بشر، عن أنس بن مالك، فذكره.
قال الترمذيّ:"هذا حديث غريب من هذا الوجه من حديث أنس عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم".
وهذه إشارة إلى تليين هذا الحديث من هذا الوجه؛ لأنّ في بعض رواته كلامًا، فأحمد بن بشير هو المخزوميّ، أبو بكر الكوفيّ، قال ابن معين: ليس بحديثه بأس، وقال النسائي: ليس بذاك القويّ -وفي رواية: ليس به بأس-، وقال الدارقطنيّ: ضعيف يعتبر بحديثه.
وفيه أيضًا شبيب بن بشير، وهو أبو بشر الكوفيّ لم يوثقه غير ابن معين، وقال البخاريّ: منكر الحديث، وقال أبو حاتم: لين الحديث حديثه حديث الشيوخ، وذكره ابن حبان في الثقات، وقال: يخطئ كثيرًا، وقال ابن عدي: وهو من القوم الذين يكتب حديثهم.
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে এক ব্যক্তি ভিক্ষা চাইল। তখন লোকেরা চুপ করে রইল (কিছু দিল না)। অতঃপর এক ব্যক্তি তাকে কিছু দিল, তখন লোকেরাও তাকে দেওয়া শুরু করল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “যে ব্যক্তি ইসলামের মধ্যে কোনো উত্তম রীতি (সুন্নাহ) চালু করে, আর সেই অনুযায়ী আমল করা হয়, তবে তার জন্য তার প্রতিদান রয়েছে এবং যারা তা অনুসারে আমল করবে তাদেরও প্রতিদান রয়েছে, তাদের প্রতিদান থেকে সামান্যও কমানো হবে না। আর যে ব্যক্তি ইসলামের মধ্যে কোনো মন্দ রীতি (সুন্নাহ) চালু করে, আর তার পরে সেই অনুযায়ী আমল করা হয়, তবে তার জন্য তার পাপ রয়েছে এবং যারা তা অনুসারে আমল করবে তাদেরও পাপ রয়েছে, তাদের পাপ থেকে সামান্যও কমানো হবে না।”
1122 - عن سهل بن سعد، أنّه سمع النبيَّ صلى الله عليه وسلم يقول:"واللَّهِ لأنْ يهدي اللَّه بك رجلًا واحدًا خيرٌ لك من أن يكون لك حمرُ النَّعَم".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الجهاد والسير (2942)، ومسلم في الفضائل (2406) من طريق عبد العزيز بن أبي حازم، عن أبيه، عن سهل بن سعد، فذكر الحديث. وفيه قصة إعطاء النبيّ صلى الله عليه وسلم الرّاية لعلي يوم خيبر، يأتي ذكرها في موضعها إن شاء اللَّه تعالى.
সাহল ইবনু সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "আল্লাহর কসম! তোমার মাধ্যমে আল্লাহ যদি একজন মানুষকেও সঠিক পথে পরিচালিত করেন, তা তোমার জন্য লাল রঙের (দামী) উট থাকার চেয়েও উত্তম।"
1123 - عن معاوية بن أبي سفيان، قال: سمعت النبيّ صلى الله عليه وسلم يقول:"من يرد اللَّه به خيرًا يُفَقُهْهُ في الدّين، وإنّما أنا قاسم، واللَّه يعطي، ولن تزال هذه الأمّة قائمة على أمر اللَّه لا يضرّهم من خالفهم حتى يأتي أمر اللَّه".
متفق عليه: رواه البخاريّ في العلم (71)، ومسلم في الزّكاة (1037) كلاهما من طريق ابن وهب، عن يونس، عن ابن شهاب، قال: قال حميد بن عبد الرحمن: سمعت معاوية خطيبًا يقول"فذكر نحوه"، واللّفظ للبخاريّ، ولفظ مسلم قريب منه، إلا أنه لا توجد عنده الجملة الأخيرة"ولن تزال هذه الأمة. . .".
ورواه مالك في القدر (8) عن يزيد بن زياد، عن محمد بن كعب القرظيّ، قال: قال معاوية على المنبر:"اللَّهمّ لا مانع لما أعطيتَ، ولا معطي لما منعتَ، ولا ينفعُ منك الجدُّ، من يرد اللَّه به خيرًا يفقهه في الدّين". سمعتُ هؤلاء الكلمات من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم على هذا المنبر.
মুআবিয়া ইবনে আবি সুফিয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "আল্লাহ যার কল্যাণ চান, তাকে দ্বীনের জ্ঞান দান করেন। নিশ্চয় আমি শুধু বণ্টনকারী, আর আল্লাহই দান করেন। এবং এই উম্মত সর্বদা আল্লাহর নির্দেশের ওপর প্রতিষ্ঠিত থাকবে। বিরোধীরা তাদের কোনো ক্ষতি করতে পারবে না, যতক্ষণ না আল্লাহর নির্দেশ (কিয়ামত) এসে যায়।"
1124 - عن عبد اللَّه بن عباس، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"من يرد اللَّه به خيرًا يفقّهه في الدِّين".
صحيح: رواه الترمذيّ (2645) عن علي بن حجر، حدّثنا إسماعيل بن جعفر، حدّثني عبد اللَّه ابن سعيد بن أبي هند، عن أبيه، عن ابن عباس، فذكره.
قال الترمذيّ:"هذا حديث حسن صحيح".
وهو كما قال؛ فإنّ رواته كلّهم ثقات معروفون، وعبد اللَّه بن سعيد بن أبي هند، قال الإمام أحمد:"ثقة ثقة". وفي رواية:"ثقة مأمون". ووثقه أيضًا ابن معين، وابن المديني، ويعقوب الفسويّ وغيرهم.
واحتجّ به الشّيخان وغيرهما من أصحاب الأصول الستة، فالصحيح أنه ثقة، وحديثه هذا قد أخرجه أيضًا الإمام أحمد في مسنده (2790) من هذا الوجه.
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ যার কল্যাণ চান, তাকে দ্বীনের জ্ঞান দান করেন।
1125 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من يرد اللَّه به خيرًا يفقهه في الدّين".
حسن: رواه ابن ماجه (220) عن بكر بن خلف، ثنا عبد الأعلى، عن معمر، عن الزّهريّ، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.
وهذا إسناد حسن من أجل بكر بن خلف؛ فإنه صدوق وهو في مسند الإمام أحمد (7194) عن عبد الأعلى بإسناده، وزاد فيه:"وإنّما أنا قاسم، ويعطي اللَّه عز وجل".
وفي الباب عن عدد من الصّحابة، منهم: حديث عمر بن الخطّاب، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"من يرد اللَّه به خيرًا يفهمه".
رواه الطّحاويّ في"المشكل" (1692)، وابن عبد البر في"جامع بيان العلم وفضله" (81)، والخطيب في"الفقيه والمتفقه" (5) كلّهم من حديث عمرو بن الحارث، أنّ عبّاد بن سالم حدّثه، أنّ سالم بن عبد اللَّه حدّثه، عن عبد اللَّه بن عمر، عن عمر بن الخطاب، فذكره.
وفيه عباد بن سالم، وقد ذكره البخاري في التاريخ، وابن أبي حاتم في الجرح والتعديل، ولم يذكرا فيه شيئًا، فهو في عداد المجهولين، وأما ابن حبان فذكره في"ثقاته" على قاعدته في توثيق المجاهيل.
আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “আল্লাহ যার কল্যাণ চান, তাকে দ্বীনের জ্ঞান দান করেন।”
1126 - عن عبد اللَّه بن مسعود، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إذا أراد اللَّه بعبد خيرًا فقّهه في الدّين، وألهمه رشده".
حسن: رواه البزّار -كشف الأستار (137) - عن الفضل بن سهل، ثنا أحمد بن محمد بن أيوب، ثنا أبو بكر بن عياش، عن أبي وائل، عن عبد اللَّه، فذكر الحديث.
ورواه البيهقيّ في المدخل (354) من هذا الوجه إلّا أنه أدخل الأعمش بين أبي بكر بن عياش، وبين أبي وائل.
ورواه الطبرانيّ في كبيره (10445) عن عبد اللَّه بن أحمد بن حنبل، عن أبيه، عن أحمد بن محمد بن أيوب، به. إلّا أنه لم يذكر فيه:"وألهمه رشده".
قال البزار:"لا نعلمه يُروى عن عبد اللَّه إلّا من هذا الوجه".
قلت: وإسناده حسن، من أجل أحمد بن محمد بن أيوب، فإنه صدوق.
ولم أجد هذا الحديث في المسند في مظانه، وكذلك لم يذكره الحافظ ابن حجر في"إطراف المُسندِ المعتلي بأطراف المسنَد الحنبلي"، فلعلّه في مصنّف آخر من مصنفاته. واللَّه تعالى أعلم.
আবদুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহ যখন কোনো বান্দার কল্যাণ কামনা করেন, তখন তিনি তাকে দ্বীনের জ্ঞান (ফিকহ) দান করেন এবং তাকে সঠিক পথে চলার অনুপ্রেরণা দেন।"
1127 - عن أبي هريرة، قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إنّما العلم بالتّعلّم، وإنّما
الحلم بالتّحلّم، ومن يتحرَّ الخير يعطه، ومن يتوقَّ الشَّر يوقه".
حسن: رواه الخطيب في تاريخه (10/ 185) عن علي بن أحمد الرّزاز، حدّثنا عبد الصمد بن علي الطَّستي، حدّثنا أحمد بن بشر بن سعد المرثدي، حدّثنا سعد بن زنبور، حدّثنا إسماعيل بن مجالد، عن عبد الملك بن عمير، عن رجاء بن حيوة، عن أبي هريرة فذكره.
وإسناده حسن، من أجل علي بن أحمد الرزاز، وإسماعيل بن مجالد، فهما صدوقان، وبقية رجاله ثقات.
وفي الباب ما روي عن معاوية بن أبي سفيان، قال -وهو يخطب على المنبر- سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"يا أيها النّاس إنما العلم بالتعلم، والفقه بالتّفقّه، ومن يرد اللَّه به خيرًا يفقهه في الدين، وإنما يخشى اللَّه من عباده العلماء، ولن تزال طائفة من أمّتي على الحقّ ظاهرين، لا يبالون من خالفهم، ولا من ناوأهم حتى يأتي أمر اللَّه وهم ظاهرون".
رواه البيهقيّ في المدخل (352)، والخطيب في"الفقيه والمتفقه" (12) كلاهما من حديث أبي العباس محمد بن يعقوب بن يوسف الأصمّ، أنا العباس بن الوليد بن مزيد البيروتي، قال: أخبرني محمد بن شعيب بن شابور، عن عتبة بن أبي حكيم الهمداني، عن مكحول، أنه حدّثه عن معاوية بن أبي سفيان، فذكر الحديث.
وإسناده حسن من أجل عتبة بن الحكيم الهمداني فإنه حسن الحديث، ولبعض فقراته شواهد صحيحة، إلّا أنّ علّته أن مكحولًا لم يسمع من معاوية بن أبي سفيان كما قال أبو حاتم.
وفي الباب أيضّا ما رُوي عن أبي الدّرداء. رواه الخطيب (6/ 442)، وأبو نعيم في الحلية (5/ 174)، وعزاه السخاوي في المقاصد الحسنة (210) إلى الطبراني في الكبير، والعسكريّ أيضًا، كلّهم من طريق محمد بن الحسن بن يزيد الهمداني.
قال أبو نعيم:"غريب من حديث الثوريّ عن عبد الملك، تفرّد به محمد بن الحسن".
وقال السّخاويّ في"المقاصد الحسنة":"محمد بن الحسن كذاب، ورواه البيهقي في المدخل من جهة أخرى موقوفًا على أبي الدرداء".
قلت: وفاته حديث أبي هريرة، فلم يذكره.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "ইলম (জ্ঞান) অর্জন হয় কেবল শিক্ষার মাধ্যমে, আর ধৈর্য (হিলম) অর্জন হয় ধৈর্য ধারণের মাধ্যমে। আর যে ব্যক্তি কল্যাণের সন্ধান করে, তাকে তা দেওয়া হয়, আর যে ব্যক্তি মন্দ (অকল্যাণ) থেকে বাঁচার চেষ্টা করে, তাকে তা থেকে রক্ষা করা হয়।"
