আল-জামি` আল-কামিল
11148 - عن أم الدرداء، أن فضالة بن عبيد، كان يقول:"اللهم! إني أسألك الرضا بعد القضاء، وبرد العيش بعد الموت، ولذة النظر في وجهك، والشوق إلى لقائك من غير ضراء مضرة ولا فتنة مضلة". وزعم أنها دعوات كان يدعو بها النبي صلى الله عليه وسلم.
صحيح: رواه ابن أبي عاصم في السنة (436)، والطبراني في الأوسط (مجمع البحرين 4681)، والكبير (18/ 319) كلهم من طريق عثمان بن سعيد بن كثير بن دينار الحمصي، حدثنا محمد بن مهاجر (وهو الشامي)، عن يونس بن ميسرة بن حلبس، عن أم الدرداء فذكرته. وإسناده صحيح.
ফাদালাহ ইবনে উবাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলতেন: "হে আল্লাহ! আমি আপনার কাছে (আপনার) ফয়সালা কার্যকর হওয়ার পর সন্তুষ্টি কামনা করি, মৃত্যুর পর আরামদায়ক জীবন কামনা করি, আপনার চেহারার (দীদার) প্রতি দৃষ্টিপাতের আনন্দ কামনা করি, এবং আপনার সাক্ষাতের তীব্র আকাঙ্ক্ষা কামনা করি—যা কোনো ক্ষতিকারক দুঃখ অথবা পথভ্রষ্টকারী ফিতনা থেকে মুক্ত হবে।" আর তিনি দাবি করতেন যে এইগুলো এমন দু'আ যা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম পাঠ করতেন।
11149 - عن عطاء بن السّائب، عن أبيه، قال: صلّى بنا عمّار بن ياسر صلاةً فأوجز فيها، فقال بعض القوم: لقد خفَّفت أو أوجزت الصلاة. فقال: أما على ذلك فقد دعوت فيها بدعوات سمعتُهنّ من رسول الله صلى الله عليه وسلم فلما قام تبعه رجلٌ من القوم -هو أبي غير أنه كنّى عن نفسه-، فسأله عن الدّعاء، ثم جاء فأخبر به القوم:"اللهمّ! بعلمك الغيب، وقدرتك على الخلق أَحْيني ما علمت الحياة خيرًا لي، وتوفّني إذا علمتَ الوفاة خيرًا لي اللهمّ، وأسألك خشيتك في الغيب والشّهادة، وأسألك كلمة الحقّ في الرّضا والغضب، وأسألك القصْد في الفقر والغنى وأسألك نعيمًا لا ينفد، وأسألك قرّة عين لا تنقطع، وأسألك الرّضا بعد القضاء، وأسألك بَرْد العيش بعد الموت، وأسألك لذّة النّظر إلى وجهك والشّوق إلى لقائك في غير ضرّاءَ مُضرَّة ولا فتنةٍ مُضِلَّةٍ، اللهمّ زَيّنّا بزينة الإيمان، واجعلنا هداةً مهتدين".
صحيح: رواه النسائيّ (1305) عن يحيى بن حبيب بن عربي، قال: حدّثنا حمّاد، قال: حدّثنا عطاء بن السّائب، فذكره.
وصحّحه ابن خزيمة في كتاب التوحيد (12)، وعنه ابن حبان في صحيحه (1971)، والحاكم (1/ 524) كلّهم من طريق حمّاد بن زيد، بإسناده.
قال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد".
قلت: وهو كما قال؛ فإن عطاء بن السّائب ثقة، وثقه الأئمة إلا أنه اختلط، لكن روى حماد بن زيد عنه قبل اختلاطه.
আম্মার ইবনু ইয়াসির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আমাদের নিয়ে সালাত আদায় করলেন এবং তা সংক্ষেপে শেষ করলেন। তখন উপস্থিত কিছু লোক বলল: আপনি সালাতকে হালকা বা সংক্ষেপ করেছেন। তিনি বললেন: তা সত্ত্বেও আমি এই সালাতে কিছু দু'আ করেছি যা আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে শুনেছি। যখন তিনি দাঁড়ালেন, তখন লোকদের মধ্য থেকে একজন লোক—তিনিই আমার পিতা, তবে তিনি নিজের নাম গোপন রেখেছেন—তাঁর (আম্মারের) অনুসরণ করলেন এবং দু'আ সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলেন। অতঃপর তিনি ফিরে এসে লোকদেরকে দু'আটি সম্পর্কে জানালেন:
“হে আল্লাহ! তোমার গায়েবের জ্ঞান এবং সৃষ্টির উপর তোমার পূর্ণ ক্ষমতাকে ব্যবহার করে আমাকে ততক্ষণ জীবিত রাখো যতক্ষণ তুমি জানো যে, আমার জন্য জীবনধারণ কল্যাণকর। আর যখন তুমি জানো যে, আমার জন্য মৃত্যু কল্যাণকর, তখন তুমি আমাকে মৃত্যু দাও। হে আল্লাহ! আমি তোমার নিকট গোপনে ও প্রকাশ্যে তোমাকে ভয় করার ক্ষমতা প্রার্থনা করি। আমি তোমার নিকট সন্তুষ্টি ও ক্রোধ উভয় অবস্থায়ই হক কথা বলার সামর্থ্য চাই। আমি তোমার নিকট দারিদ্র্য ও প্রাচুর্য উভয় অবস্থায়ই মধ্যপন্থা অবলম্বন করার ক্ষমতা চাই। আমি তোমার নিকট এমন নিয়ামত প্রার্থনা করি যা কখনো শেষ হবে না। আমি তোমার নিকট এমন চোখের শীতলতা (আনন্দ) চাই যা কখনো বন্ধ হবে না। আমি তোমার নিকট তাকদীরের (ফয়সালার) পর সন্তুষ্টি প্রার্থনা করি। আমি তোমার নিকট মৃত্যুর পর স্বাচ্ছন্দ্যময় জীবন প্রার্থনা করি। আমি তোমার দীদার লাভের স্বাদ এবং তোমার সাক্ষাতের জন্য আকাঙ্ক্ষা প্রার্থনা করি—এমন অবস্থায় নয় যখন কোনো ক্ষতিকারক কষ্ট বা পথভ্রষ্টকারী ফিতনা আমাকে স্পর্শ করে। হে আল্লাহ! আমাদেরকে ঈমানের অলঙ্কারে সজ্জিত করো এবং আমাদেরকে সৎপথপ্রাপ্ত পথপ্রদর্শক বানাও।”
11150 - عن أبي بن كعب قال: قال لي النبي صلى الله عليه وسلم: ألا أعلمك مما علمني جبريل عليه السلام؟ قلت: بلى يا رسول الله، قال:"قل: اللهم! اغفر لي خطاياي وعمدي وهزلي وجدي ولا تحرمني بركة ما أعطيتني، ولا تفتني بما حرمتني".
حسن: رواه أبو يعلى (مطالب-3346)، والطبراني في الأوسط (مجمع البحرين 4690) كلاهما من حديث شيبان بن فروخ، حدثنا سلام بن مسكين، حدثنا عصمة أبو حكيمة، عن أبي عثمان النهدي، عن أبي بن كعب فذكره.
وقال الطبراني:"لا يروي عن أبي بن كعب إلا بهذا الإسناد، تفرد به سلام".
قلت: سلام بن مسكين ثقة فلا يضر تفرده، والإسناد حسن من أجل شيبان بن فروخ فإنه صدوق.
وعصمة أبو حكيمة حسن الحديث أيضا فقد روى عنه جمع وقال أبو حاتم: محله الصدق وذكره ابن حبان في الثقات.
وقال الهيثمي في مجمع الزوائد (10/ 172):"رواه الطبراني في الأوسط، ورجاله رجال الصحيح غير عصمة أبي حكيمة وهو ثقة".
উবাই ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন: "আমি কি তোমাকে এমন কিছু শিখাবো না, যা জিবরীল (আঃ) আমাকে শিখিয়েছিলেন?" আমি বললাম: "হ্যাঁ, ইয়া রাসূলাল্লাহ।" তিনি বললেন: "তুমি বলো: 'হে আল্লাহ! আমার সব ভুলভ্রান্তি, ইচ্ছাকৃত কাজ, ঠাট্টা ও আন্তরিকতা (সব ধরনের কাজ) ক্ষমা করে দাও, আর তুমি আমাকে যা দান করেছ, তার বরকত থেকে আমাকে বঞ্চিত করো না এবং যা তুমি আমার জন্য হারাম করেছ, তা দিয়ে আমাকে ফিতনায় (পরীক্ষায়) ফেলো না।'"
11151 - عن بسر بن أرطاة القرشي قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يدعو:"اللهم! أحسن عاقبتنا في الأمور كلها، وأجرنا من خزي الدنيا وعذاب الآخرة".
حسن: رواه عبد الله بن أحمد في زياداته على المسند (17628)، وصحّحه ابن حبان (949) كلاهما من طريق محمد بن أيوب بن ميسرة بن حلبس قال: سمعت أبي يحدث عن بسر بن أرطاة فذكره.
وإسناده حسن من أجل محمد بن أيوب بن ميسرة حسن الحديث. فقد روى عنه جماعة وقال أبو حاتم:"صالح لا بأس به ليس بالمشهور". وذكره ابن حبان في الثقات وهو من رجال التعجيل.
وأبوه أيوب بن ميسرة حسن الحديث أيضًا فقد قال أبو حاتم: صالح الحديث وقال أبو مسهر الدمشقي:"كان أيوب بن حلبس أكبر من يونس (يعني أخاه) وأفقه وكان يفتي في الحلال والحرام وكان عامل عمر بن عبد العزيز على ديوانه. انظر: تاريخ دمشق (10/ 135)، وتعجيل المنفعة (1/
334 - 335).
বুসর ইবন আরতাত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দু’আ করতে শুনেছি: "হে আল্লাহ! আমাদের সকল বিষয়ের শেষ পরিণতি সুন্দর করুন, এবং আমাদেরকে দুনিয়ার লাঞ্ছনা ও আখেরাতের শাস্তি থেকে রক্ষা করুন।"
11152 - عن أبي هريرة قال: كان رسول لله صلى الله عليه وسلم يدعو فيقول:"اللهم متعني بسمعي وبصري واجعلهما الوارث مني وانصرني على من يظلمني، وخذ منه بثأري" وفي رواية:"وأرني فيه ثأري".
حسن: رواه الترمذي (3604/ 7)، والبخاري في الأدب المفرد (650)، والحاكم (1/ 523، 2/ 142) كلهم من طرق، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكره.
وإسناده حسن من أجل محمد بن عمرو وهو ابن علقمة فإنه حسن الحديث.
وقال الترمذي:"هذا حديث حسن غريب من هذا الوجه".
وأما الحاكم فقال:"هذا حديث صحيح على شرط مسلم".
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুআ করতেন এবং বলতেন: "হে আল্লাহ! আমার শ্রবণশক্তি ও দৃষ্টিশক্তি দ্বারা আমাকে উপকৃত করো এবং এই দু'টিকে আমার উত্তরাধিকারী করো। আর যে আমার প্রতি জুলুম করে, তার বিরুদ্ধে আমাকে সাহায্য করো এবং তার থেকে আমার প্রতিশোধ নাও।" অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: "এবং তার মধ্যে আমাকে আমার প্রতিশোধ দেখাও।"
11153 - عن محمد بن كعب القرظي، عن عبد الله بن يزيد الخطمي، أراه رفعه إلى النبي صلى الله عليه وسلم أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يقول:"اللهم! ارزقني حبك وحب ما ينفعني حبه عندك، اللهم! ما رزقتني مما أحب، فاجعله لي قوة فيما تحب، وما زويت عني مما أحب، فاجعله لي فراغا فيما تحب".
صحيح: رواه ابن المبارك في الزهد (430) عن حماد بن سلمة، عن أبي جعفر الأنصاري، عن محمد بن كعب القرظي، عن عبد الله بن يزيد الخطمي فذكره.
وإسناده صحيح، وأبو جعفر الأنصاري هو عمير بن يزيد الخطمي.
ورواه الترمذي (3491) عن سفيان بن وكيع قال: حدثنا ابن أبي عدي، عن حماد بن سلمة به.
وقال الترمذي:"هذا حديث حسن غريب".
قلت: لأن في إسناده سفيان بن وكيع وفيه مقال وإلا فإسناد ابن المبارك صحيح.
وفي الباب عن أبي الدرداء قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: كان من دعاء داود يقول:"اللهم! إني أسألك حبك وحب من يحبك والعمل الذي يبلغني حبك، اللهم! اجعل حبك أحب إلي من نفسي وأهلي ومن الماء البارد قال: وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا ذكر داود يحدث عنه قال: كان أعبد البشر".
رواه الترمذي (3490)، والبزار -كشف الأستار (2354)، والحاكم (2/ 433) كلهم من طريق محمد بن سعد الأنصاري، عن عبد الله بن ربيعة بن يزيد الدمشقي، عن عائذ الله أبي إدريس الخولاني، عن أبي الدرداء فذكره.
وقال الترمذي:"هذا حديث حسن غريب".
وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد".
وتعقبه الذهبي بقوله:"بل عبد الله هذا قال أحمد: أحاديثه موضوعة".
قلت: لعله اشتبه عليه لأنه وقع في رواية الحاكم:"عبد الله بن يزيد الدمشقي" وهو عبد الله بن ربيعة بن يزيد الدمشقي من رجال الترمذي.
وأما قول أحمد هذا فهو في عبد الله بن يزيد بن آدم الدمشقي كما ذكره الذهبي في الميزان (2/ 526) وهو ليس من رجال الترمذي، وإنما المذكور في الإسناد هو عبد الله بن ربيعة بن يزيد الدمشقي كما في إسناد البزار، ويقال: عبد الله بن يزيد بن ربيعة وهذا مجهول كما قال ابن حجر فالعلة فيه جهالته.
وأما ما روي عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"اللهم! عافني في جسدي وعافني في بصري واجعله الوارث مني لا إله إلا الله الحليم الكريم، سبحان الله رب العرش العظيم، الحمد لله رب العالمين". فإسناده منقطع.
رواه الترمذي (3480)، وأبو يعلى (4690)، وابن عدي (2/ 815)، والحاكم (1/ 530) كلهم من طريق حبيب بن أبي ثابت، عن عروة، عن عائشة فذكرته.
وقال الترمذي:"هذا حديث غريب سمعت محمدا يقول: حبيب بن أبي ثابت لم يسمع من عروة بن الزبير شيئًا".
وكذا نفى سماعه منه أحمد وأبو حاتم وغيرهما.
وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد إن سلم سماع حبيب من عروة".
ولحديث عائشة هذا طرق أخرى أشد ضعفا من المذكور.
আব্দুল্লাহ ইবনু ইয়াযীদ আল-খাতমী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতেন: "হে আল্লাহ! আমাকে আপনার ভালোবাসা দান করুন এবং এমন কিছুর ভালোবাসা দিন, যার ভালোবাসা আপনার কাছে আমার জন্য কল্যাণকর। হে আল্লাহ! আপনি আমাকে আমার প্রিয় বস্তু থেকে যা কিছু দান করেছেন, তাকে আপনার প্রিয় কাজের জন্য আমার শক্তি হিসেবে পরিণত করুন। আর আমার প্রিয় বস্তু থেকে যা কিছু আপনি আমার থেকে দূরে সরিয়ে রেখেছেন, তাকে আপনার প্রিয় কাজের জন্য আমার অবকাশ হিসেবে পরিণত করুন।"
11154 - عن عائشة أن أبا بكر دخل على رسول الله صلى الله عليه وسلم فأراد أن يكلمه وعائشة تصلي فقال لها رسول الله صلى الله عليه وسلم:"عليك بالكوامل" أو كلمة أخرى فلما انصرفت عائشة سألته عن ذلك فقال لها قولي:"اللهم! إني أسألك من الخير كله عاجله وآجله ما علمت منه وما لم أعلم، وأعوذ بك من الشر كله عاجله وآجله ما علمت منه وما لم أعلم، وأسألك الجنة وما قرب إليها من قول أو عمل، وأعوذ بك من النار وما قرب إليها من قول أو عمل، وأسألك من الخير ما سألك عبدك ورسولك محمد صلى الله عليه وسلم، وأستعيذك مما استعاذك منه عبدك ورسولك محمد صلى الله عليه وسلم، وأسألك ما قضيت لي من أمر أن تجعل عاقبته رشدا".
صحيح: رواه أحمد (25137 - 25138) ومن طريقه صحّحه الحاكم (1/ 521 - 522) من رواية شعبة، عن جبر بن حبيب، عن أم كلثوم بنت أبي بكر، عن عائشة فذكرته.
ورواه ابن ماجه (3846)، وأحمد (25019) كلاهما من حديث عفان، عن حماد بن سلمة قال: أخبرنا جبر بن حبيب، عن أم كلثوم بنت أبي بكر، عن عائشة نحوه.
وإسناده صحيح. هكذا رواه شعبة وحماد بن سلمة عن جبر بن حبيب.
ورواه عنه غيرهما على وجوه أخرى غير أن الصحيح منها ما ذكرته كما نص على ذلك الدارقطني في العلل (14/ 245 - 246).
وبمعناه ما روي عن أبي أمامة قال: دعا رسول الله صلى الله عليه وسلم بدعاء كثير، لم نحفظ منه شيئا قلنا: يا رسول الله دعوت بدعاء كثير لم نحفظ منه شيئا فقال:"ألا أدلكم على ما يجمع ذلك كله نقول؟ اللهم إنا نسألك من خير ما سألك منه نبيك محمد، ونعوذ بك من شر ما استعاذ منه نبيك محمد، وأنت المستعان وعليك البلاغ، ولا حول ولا قوة إلا بالله".
رواه الترمذي (3521) عن محمد بن حاتم، حدثنا عمار بن محمد ابن أخت سفيان الثوري، عن ليث بن أبي سليم، عن عبد الرحمن بن سابط، عن أبي أمامة فذكره.
ورواه البخاري في الأدب المفرد (679)، والطبراني في الكبير (8/ 226) كلاهما من طريق المعتمر ابن سليمان، عن ليث، عن ثابت بن عجلان، عن القاسم أبي عبد الرحمن، عن أبي أمامة فذكره.
ومدار الإسنادين على ليث بن أبي سليم وقد اختلط فاضطرب حديثه ووقع الاضطراب في إسناد هذا الحديث كما ترى.
وعبد الرحمن بن سابط لم يسمع من أبي أمامة كما قال ابن معين.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশ করলেন এবং তিনি তাঁর সাথে কথা বলতে চাইলেন। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন সালাত আদায় করছিলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তোমার উপর কামিল (পূর্ণাঙ্গ) দু'আগুলো আবশ্যক," অথবা অনুরূপ কোনো কথা বললেন। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন সালাত শেষ করলেন, তখন তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এ ব্যাপারে জিজ্ঞেস করলেন। তিনি তাকে বললেন, তুমি বলো:
"হে আল্লাহ! আমি আপনার নিকট সকল প্রকার কল্যাণ চাই, যা অবিলম্বে আসে এবং যা বিলম্বিত, যা আমি জানি এবং যা আমি জানি না। আমি আপনার নিকট সকল প্রকার অকল্যাণ থেকে আশ্রয় চাই, যা অবিলম্বে আসে এবং যা বিলম্বিত, যা আমি জানি এবং যা আমি জানি না। আমি আপনার নিকট জান্নাত এবং এমন কথা বা কাজ চাই যা আমাকে জান্নাতের নিকটবর্তী করবে। আমি আপনার নিকট জাহান্নাম এবং এমন কথা বা কাজ থেকে আশ্রয় চাই যা আমাকে জাহান্নামের নিকটবর্তী করবে। আমি আপনার নিকট সেই কল্যাণ চাই যা আপনার বান্দা ও রাসূল মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আপনার নিকট চেয়েছিলেন। আর আমি আপনার নিকট সেই বিষয়গুলো থেকে আশ্রয় চাই যেগুলি থেকে আপনার বান্দা ও রাসূল মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আপনার নিকট আশ্রয় চেয়েছিলেন। আর আমি আপনার নিকট চাই যে আপনি আমার জন্য যা ফয়সালা করেছেন, তার পরিণাম যেন সঠিক পথে পরিচালিত করেন।"
11155 - عن شداد بن أوس قال: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يا شداد بن أوس إذا رأيت الناس قد اكتنزوا الذهب والفضة فاكنز هؤلاء الكلمات: اللهم! إني أسألك الثبات في الأمر، والعزيمة على الرشد وأسألك موجبات رحمتك وعزائم مغفرتك، وأسألك شكر نعمتك وحسن عبادتك، وأسألك قلبا سليما ولسانا صادقا، وأسألك خير ما تعلم، وأعوذ بك من شر ما تعلم، وأستغفرك لما تعلم إنك أنت علام الغيوب".
حسن: رواه الطبراني في الكبير (4/ 335 - 336)، والدعاء (631) من طريق سليمان بن عبد الرحمن، ثنا إسماعيل بن عياش، حدثني محمد بن يزيد الرحبي، عن أبي الأشعث الصنعاني، عن شداد بن أوس فذكره.
وإسناده حسن من أجل إسماعيل بن عياش فإنه صدوق في روايته عن أهل الشام، وهذه منها فإن محمد بن يزيد الرحبي شامي دمشقي، وهو أيضا حسن الحديث فقد روى عنه جماعة وذكره ابن حبان في الثقات (9/ 35)، وذكره أبو زرعة الدمشقي في"تسمية نفر ذوي إسناد وعلم" انظر: تاريخ دمشق (56/ 274 - 276).
ورواه الترمذي (3407) من طريق سفيان (هو الثوري) -وأحمد (17133) عن يزيد بن هارون- كلاهما عن أبي مسعود الجريري، عن أبي العلاء بن الشخير، عن رجل من بني حنظلة، عن شداد ابن أوس فذكر نحوه.
وفي لفظ أحمد:"وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم يعلمنا كلمات ندعو بهن في صلاتنا أو قال: في دبر صلاتنا" ثم ذكر الدعاء بنحوه.
وفي إسناده رجل من بني حنظلة كما عند الترمذي أو الحنظلي كما عند أحمد ولا مغايرة بينهما وهو مبهم لا يعرف.
ورواه النسائي (1304)، وابن حبان (1974) كلاهما من طريق حماد بن سلمة، عن سعيد الجريري، عن أبي العلاء، عن شداد بن أوس أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يقول في صلاته:"اللهم! إني أسألك … فذكر الحديث.
وفيه انقطاع أبو العلاء هو يزيد بن عبد الله بن الشخير وبينه وبين شداد بن أوس رجل من بني حنظلة. وحماد بن سلمة ممن روى عن الجريري قبل الاختلاط، وللحديث طرق أخرى لا تخلو من مقال.
শাদ্দাদ ইবনে আওস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন: "হে শাদ্দাদ ইবনে আওস! যখন তুমি দেখবে লোকেরা সোনা ও রূপা সঞ্চয় করছে, তখন তুমি এই বাক্যগুলো সঞ্চয় করো (বা মুখস্থ করো): 'হে আল্লাহ! আমি আপনার কাছে দ্বীনের ওপর স্থিরতা (অটলতা) এবং হেদায়াতের ওপর দৃঢ় সংকল্প প্রার্থনা করি। আমি আপনার কাছে আপনার রহমত লাভের উপকরণসমূহ এবং আপনার ক্ষমা লাভের সুদৃঢ় সংকল্প (বা অত্যাবশ্যকীয় বিষয়সমূহ) প্রার্থনা করি। আমি আপনার কাছে আপনার নিয়ামতসমূহের কৃতজ্ঞতা এবং আপনার উত্তম ইবাদত কামনা করি। আমি আপনার কাছে একটি নির্মল হৃদয় ও একটি সত্যবাদী জিহ্বা প্রার্থনা করি। আমি আপনার কাছে সেই কল্যাণ প্রার্থনা করি যা আপনি জানেন এবং আমি আপনার কাছে সেই অনিষ্ট থেকে আশ্রয় চাই যা আপনি জানেন। আর আপনি যা জানেন (আমার ত্রুটি) তার জন্য আপনার কাছে ক্ষমা প্রার্থনা করি। নিশ্চয়ই আপনিই অদৃশ্যের জ্ঞান রাখনেওয়ালা (সর্বজ্ঞ)।'"
11156 - عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"اللهم! أحسنت خَلقي فأحسن خُلقي".
صحيح: رواه أحمد (24392)، والبيهقي في الشعب (8184، 8185) كلاهما من طرق عن عاصم بن سليمان (وهو الأحول)، عن عبد الله بن الحارث، عن عائشة فذكرته.
وإسناده صحيح. وعبد الله بن الحارث هو أبو الوليد الأنصاري البصري.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতেন: "হে আল্লাহ! আপনি আমার সৃষ্টিকে সুন্দর করেছেন, তাই আমার চরিত্রকেও সুন্দর করে দিন।"
11157 - عن ابن مسعود أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يقول:"اللهم! أحسنت خَلقي فأحسن خُلقي".
حسن: رواه أحمد (3823)، والطيالسي (372)، والبيهقي في الشعب (8183)، وصحّحه ابن حبان (959) كلهم من طرق، عن عاصم بن سليمان الأحول، عن عوسجة بن الرماح، عن عبد الله ابن أبي الهذيل، عن عبد الله بن مسعود فذكره.
وإسناده حسن من أجل عوسجة بن الرماح فإنه حسن الحديث وثقه ابن معين وذكره ابن حبان في الثقات، وأما الدارقطني فقال: شبه المجهول لا يروي عنه غير عاصم لا يحتج به، ولكن يعتبر به.
وروي عن عاصم به موقوفا على ابن مسعود ورواة الرفع أكثر.
ورواه عاصم أيضا عن عبد الله بن الحارث عن عائشة كما تقدم.
فلعل الحديث كان عند عاصم بإسنادين والله أعلم.
وأما ما روي عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا نظر إلى وجهه في المِرآة قال:"الحمد لله، اللهم أحسنت خَلقي فأحسن خُلقي". فإسناده ضعيف جدا.
رواه أبو الشيخ في أخلاق النبي صلى الله عليه وسلم (148) من طريق أبان بن سفيان، عن أبي هلال -والبيهقي في الدعوات (489) من طريق مسلمة- كلاهما (أبو هلال، ومسلمة) عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة فذكرته.
وأبان بن سفيان متروك، ومسلمة هو ابن عُلي الخشني متروك أيضا.
ورُوي هذا الدعاء عند النظر في المِرآة من حديث علي بن أبي طالب، وابن عباس وأنس بن
مالك وكلها ضعيفة جدا.
ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতেন: “হে আল্লাহ! আপনি আমার সৃষ্টিকে সুন্দর করেছেন, তাই আমার চরিত্রকেও সুন্দর করে দিন।”
11158 - عن عبد الله بن مسعود أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يقول:"اللهم! أعني على ذكرك وشكرك وحسن عبادتك".
صحيح: رواه البزار (2075) عن عمرو بن عبد الله الأودي، قال: نا وكيع، عن إسرائيل، وأبيه، عن أبي إسحاق، عن أبي الأحوص، عن عبد الله -وهو ابن مسعود-، أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يقول: فذكره.
وقال:"وهذا الحديث لا نعلمه يروى عن عبد الله بهذا اللفظ إلا بهذا الإسناد".
قلت: إسناده صحيح، ورجاله كلهم ثقات.
وقال الهيثمي:"رجاله رجال الصحيح غير عمرو بن عبد الله الأودي وهو ثقة" (مجمع الزوائد 10/ 172).
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতেন: "হে আল্লাহ! আমাকে আপনার স্মরণ (জিকির), আপনার কৃতজ্ঞতা (শুকরিয়া) এবং আপনার উত্তমভাবে ইবাদত করার ব্যাপারে সাহায্য করুন।"
11159 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"أتحبون أن تجتهدوا في الدعاء؟ قولوا: اللهم! أعنا على شكرك وذكرك وحسن عبادتك".
صحيح: رواه أحمد (7982) قال: قرأت على أبي قرة الزبيدي موسى بن طارق، عن موسى - يعني ابن عقبة-، عن أبي صالح السمان وعطاء بن يسار -أو عن أحدهما-، عن أبي هريرة فذكره.
وإسناده صحيح، والتردد في الإسناد غير قادح فإن أبا صالح وعطاء بن يسار كلاهما ثقة.
وأما ما روي عن أبي هريرة قال: دعاء حفظته من رسول الله صلى الله عليه وسلم لا أدعه:"اللهم! اجعلني أعظم شكرك، وأكثر ذكرك، وأتبع نصيحتك، وأحفظ وصيتك" فإسناده ضعيف.
رواه الترمذي (3604/ 2)، وأحمد (8101)، والطيالسي (2676) كلهم من طرق، عن الفرج ابن فضالة، عن أبي سعيد -أو أبي سعد- عن أبي هريرة فذكره.
وإسناده ضعيف لضعف الفرج بن فضالة وقد اختلف عليه في اسم شيخه ونسبته وهو مجهول.
وقال الترمذي:"هذا حديث غريب".
وفي الباب عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم دعا سلمان الخير فقال:"إن نبي الله يريد أن يمنحك كلمات تسألهن الرحمن، وترغب إليه فيهن، وتدعو بهن في الليل والنهار قل: اللهم! إني أسألك صحة في إيمان، وإيمانا في خلق حسن، ونجاحا يتبعه فلاح، ورحمة منك، وعافية ومغفرة منك، ورضوانا".
رواه النسائي في عمل اليوم والليلة (21)، والحاكم (1/ 523) كلاهما من طريق عبد الله بن الوليد، عن عبد الله بن عبد الرحمن بن حجيرة، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكره.
وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد".
قلت: في سنده عبد الله بن الوليد وهو ابن قيس المصري روى عنه جمع وذكره ابن حبان في الثقات، وضعفه الدارقطني فقال:"لا يعتبر به".
وفي الباب عن أنس قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم يقول في دعائه:"يا ولي الإسلام وأهله ثبتني به حتى ألقاك".
رواه الطبراني في الأوسط (مجمع البحرين 4678) -ومن طريقه الضياء في المختارة (6/ 270) - وأبو يعلى (مطالب 2965) كلهم من طرق، عن أبي الواصل عبد الحميد بن واصل، عن أنس بن مالك فذكره. واللفظ للطبراني.
وقال الطبراني:"لا يروى عن أنس إلا بهذا الإسناد تفرد به أبو الواصل".
قلت: أبو الواصل عبد الحميد بن واصل لم يوثقه أحد إلا أن ابن حبان ذكره في ثقاته، وقد ذكر ابن حجر هذا الحديث في ترجمة عبد الواحد بن واصل أبي واصل، ونقل عن الأزدي تضعيفه. والظاهر أنهما واحد غلِطَ في اسمه أحد الرواة. والله أعلم.
وكذلك لا يصح ما روي عن عمر بن الخطاب قال: علمني رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"قل: اللهم! اجعل سريرتي خيرا من علانيتي، واجعل علانيتي صالحة، اللهم إني أسألك من صالح ما تؤتي الناس من المال والأهل والولد غير الضال ولا المضل".
رواه الترمذي (3586) عن محمد بن حميد حدثنا علي بن أبي بكر عن الجراح بن الضحاك الكندي عن أبي شيبة عن عبد الله بن عكيم عن عمر بن الخطاب فذكره.
وقال الترمذي:"هذا حديث غريب لا نعرفه إلا من هذا الوجه، وليس إسناده بالقوي".
قلت وهو كما قال فإن في إسناده أبو شيبة وهو مجهول، ويحتمل أن يكون أبو شيبة الواسطي واسمه عبد الرحمن بن إسحاق وهو ضعيف.
ومحمد بن حميد هو الرازي ضعيف أيضًا.
وكذلك لا يصح ما روي عن أبي هريرة: أن رجلا قال: يا رسول الله! سمعت دعاءك الليلة فكان الذي وصل إلي منه أنك لقول:"اللهم! اغفر لي ذنبي ووسع لي في رزقي وبارك لي فيما رزقتني قال فهل تراهن تركن شيئًا".
رواه الترمذي (3500) عن علي بن حجر، حدثنا عبد الحميد بن عمر الهلالي، عن سعيد بن إياس الجريري، عن أبي السليل، عن أبي هريرة فذكره.
وقال:"هذا حديث غريب، وأبو السليل اسمه ضريب بن نفير، ويقال: ابن نقير".
قلت: ضريب لم يسمع من أبي هريرة كما قال المزي.
وعبد الحميد بن عمر الهلالي كذا وقع عند الترمذي، وهو وهم كما قال المزي، والصواب أنه عبد الحميد بن الحسن الهلالي كما عند الطبراني في المعجم الصغير (1019)، وصعفه جمهور أهل العلم منهم أبو زرعة وأحمد وابن المديني، واختلف فيه قول ابن معين.
وخالفه شعبة فرواه عن أبي مسعود (وهو سعيد بن إياس الجريري) عن حميد بن القعقاع، عن رجل جعل يرصد نبي الله صلى الله عليه وسلم فذكره. أخرج حديثه أحمد (23114) عن محمد بن جعفر، عن شعبة به.
وقد اختلف فيه على شعبة أيضا لكن مدار روايته على حميد -أو عبيد- ابن القعقاع، وهو ممن لا يعرف حاله. انظر: تعجيل المنفعة (1/ 477). وبه أعله الهيثمي في المجمع (10/ 110).
ورُوي أيضا من حديث أبي موسى الأشعري نحوه، رواه أحمد (19574) من طريق أبي مجلز (هو لاحق بن حميد)، عن أبي موسى.
وفي سماع أبي مجلز من أبي موسى نظر، وإليه مال الحافظ ابن حجر في نتائج الأفكار (1/ 263).
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তোমরা কি দু'আর ক্ষেত্রে অধিক প্রচেষ্টা চালাতে পছন্দ করো? তোমরা বলো: 'হে আল্লাহ! আপনার শুকরিয়া জ্ঞাপন করতে, আপনাকে স্মরণ করতে এবং উত্তমরূপে আপনার ইবাদত করতে আমাদের সাহায্য করুন।'"
11160 - عن * *
১১১৬০ - সূত্রে * *।
11161 - عن سهل بن سعد قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إياكم ومحقرات الذنوب فإنما مثل محقرات الذنوب كقوم نزلوا بطن واد، فجاء ذا بعود، وجاء ذا بعود حتى أنضجوا خبزتهم، وإن محقرات الذنوب متى يؤخذ بها صاحبها تهلكه".
صحيح: رواه أحمد (22808) عن أنس بن عياض، حدثني أبو حازم، لا أعلمه إلا عن سهل ابن سعد قال فذكره.
وإسناده صحيح. وأنس بن عياض وشيخه من الثقات الضابطين، وهذا من ثلاثيات الإمام أحمد.
ومن هذا الطريق رواه أيضا الطبراني في الكبير (6/ 204)، والأوسط (7319)، والصغير (2/ 49)، والروياني في مسنده (1065)، والبغوي في شرح السنة (4203) إلا أن البغوي قال:"هذا الحديث رواه معمر، عن أبي إسحاق، عن عبد الرحمن بن يزيد، عن ابن مسعود موقوفا عليه".
قلت: لا يضر من رفعه لأنه من الثقات الضابطين كما قلت، فلعله رواه مرة موقوفا، وأخرى مرفوعا، والحكم لمن زاد.
সাহল ইবনু সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তোমরা ছোট ছোট গুনাহ থেকে সতর্ক থাকো। কারণ ছোট ছোট গুনাহের উদাহরণ হলো এমন একদল লোকের মতো যারা কোনো উপত্যকার অভ্যন্তরে যাত্রা বিরতি করলো, এরপর একজন একটি কাঠ নিয়ে এলো এবং আরেকজন একটি কাঠ নিয়ে এলো, এভাবে তারা তাদের রুটি সেঁকে নিলো। আর যখনই ছোট ছোট গুনাহের জন্য কোনো ব্যক্তিকে পাকড়াও করা হয়, তখন তা তাকে ধ্বংস করে দেয়।"
11162 - عن عائشة قالت: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يا عائشة! إياك ومحقرات الأعمال فإن لها من الله طالبا".
وفي رواية:"إياكم ومحقرات الذنوب".
صحيح: رواه ابن ماجه (4243)، وأحمد (24415)، والدارمي (2768)، والقضاعي في مسند الشهاب (955) كلهم من طريق سعيد بن مسلم بن بانك، قال: سمعت عامر بن عبد الله بن الزبير يقول: حدثني عوف بن الحارث، عن عائشة فذكرته. واللفظ لابن ماجه، والرواية الثانية عند الآخرين.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন: "হে আয়েশা! তুমি তুচ্ছ কাজগুলো (আমলগুলো) থেকে সাবধান থেকো, কারণ আল্লাহর পক্ষ থেকে এর জন্য হিসাব গ্রহণকারী (জবাবদিহিতার দাবিদার) রয়েছে।"
আর অন্য এক বর্ণনায় (এসেছে): "তোমরা তুচ্ছ পাপগুলো থেকে সাবধান থেকো।"
11163 - عن عبد الله بن مسعود، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إن الشيطان قد يئس أن تعبد الأصنام في أرض العرب، ولكنه سيرضى منكم بدون ذلك بالمحقرات، وهي: الموبقات يوم القيامة، اتقوا المظالم ما استطعتم، فإن العبد يجيء بالحسنات يوم القيامة يرى أنه ستنجيه، فما زال عبد يقوم فيقول: يا رب ظلمني عبدك مظلمة، فيقول: امحوا من حسناته، ما يزال كذلك، حتى ما يبقى له حسنة من الذنوب، وإن
مثل ذلك كسفر نزلوا بفلاة من الأرض، ليس معهم حطب، فتفرق القوم ليحتطبوا، فلم يلبثوا أن حطبوا، فأعظموا النار، وطبخوا ما أرادوا، وكذلك الذنوب".
حسن: رواه أبو يعلى (5122) عن محمد بن أبي بكر، حدثنا محمد بن دينار، عن إبراهيم الهجري، عن أبي الأحوص، عن عبد الله بن مسعود فذكره.
وإبراهيم الهجري وهو ابن مسلم ضعيف باتفاق أهل العلم ولكن قال ابن عدي:"ومع ضعفه يكتب حديثه، وهو عندي ممن لا يجوز الاحتجاج بحديثه" أي إذا انفرد. فقد رواه الإمام أحمد (3818) من وجه آخر عن قتادة، عن عبد ربه، عن أبي الأحوص، عن عبد الله بن مسعود بدون شك نحوه.
وعبد ربه هو ابن أبي يزيد لم يرو عنه سوى قتادة، وقال ابن المديني: مجهول.
ثم إن إبراهيم الهجري هذا روى عنه سفيان بن عيينة هذا الحديث. رواه الحميدي في مسنده (98) عنه نحوه، وسفيان بن عيينة يقول:"أتيت إبراهيم الهجري فدفع إلي عامة كتبه، فرحمت الشيخ، وأصلحت له كتابه قلت: هذا عن عبد الله، وهذا عن النبي صلى الله عليه وسلم، وهذا عن عمر". اهـ
قال الحافظ ابن حجر:"هذه القصة عن ابن عيينة تقتضي أن حديثه عنه صحيح لأنه إنما عيب عليه رفعه أحاديث موقوفة، وابن عيينة ذكر أنه ميّز حديث عبد الله من حديث النبي صلى الله عليه وسلم. تهذيب التهذيب (1/ 145).
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করেন, তিনি বলেছেন: নিশ্চয়ই শয়তান আরব ভূমিতে মূর্তি পূজিত হওয়ার ব্যাপারে হতাশ হয়ে গেছে। তবে সে এর চেয়ে কম বিষয়ে (ক্ষুদ্র পাপসমূহ দ্বারা) তোমাদের প্রতি সন্তুষ্ট হবে। আর এগুলিই হলো কিয়ামতের দিনের ধ্বংসকারী বিষয়। তোমরা তোমাদের সাধ্যমতো জুলুম করা থেকে বেঁচে থাকো। কেননা কোনো বান্দা যখন কিয়ামতের দিন এমনভাবে নেক আমল নিয়ে আসবে যে সে ভাববে এটিই তাকে নাজাত দেবে, তখন অন্য এক বান্দা উঠে বলবে: হে আমার রব, আপনার অমুক বান্দা আমার প্রতি জুলুম করেছে। তখন (আল্লাহ বলবেন:) তার নেক আমল থেকে মুছে দাও। এইভাবে চলতে থাকবে, এমনকি তার পাপের কারণে আর কোনো নেক আমলই অবশিষ্ট থাকবে না। এর উদাহরণ হলো এমন মুসাফিরদের মতো যারা কোনো জনমানবহীন প্রান্তরে নামল। তাদের কাছে কোনো জ্বালানি কাঠ নেই। তখন দলটি কাঠ সংগ্রহ করার জন্য চারদিকে ছড়িয়ে পড়ল। অল্প সময়ের মধ্যেই তারা কাঠ সংগ্রহ করে বিরাট আগুন জ্বালাল এবং যা ইচ্ছা রান্না করল। পাপসমূহের অবস্থাও ঠিক তাই।
11164 - عن أنس قال: إنكم لتعلمون أعمالا هي أدق في أعينكم من الشعر، إن كنا نعدها على عهد النبي صلى الله عليه وسلم من الموبقات.
قال أبو عبد الله (هو البخاري): يعني بذلك المهلكات.
صحيح: رواه البخاري في الرقاق (6492) عن أبي الوليد، حدثنا مهدي، عن غيلان، عن أنس فذكره.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তোমরা এমন সব কাজ করো, যা তোমাদের চোখে চুলের চেয়েও সূক্ষ্ম (তুচ্ছ), অথচ আমরা সেগুলোকে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে ধ্বংসাত্মক কাজসমূহের (আল-মুবিক্বাত) অন্তর্ভুক্ত বলে গণ্য করতাম। (আবু আব্দুল্লাহ [ইমাম বুখারী] বলেন: এর দ্বারা তিনি 'ধ্বংসকারী বিষয়াদি' বুঝিয়েছেন।)
11165 - عن أبي سعيد قال: إنكم لتعملون أعمالا هي أدق في أعينكم من الشعر كنا نعدها على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم من الموبقات.
حسن: رواه أحمد (10995) عن عبد الملك بن عمرو حدثنا عباد يعني ابن راشد عن داود بن أبي هند عن أبي نضرة عن أبي سعيد فذكره.
وإسناده حسن من أجل عباد بن راشد فإنه حسن الحديث.
আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তোমরা এমন সব কাজ করো যা তোমাদের চোখে চুলের চেয়েও সূক্ষ্ম (বা নগণ্য) মনে হয়। অথচ আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে সেগুলোকে ধ্বংসাত্মক (বা মহাপাপ) হিসেবে গণ্য করতাম।
11166 - عن عبادة بن قرص -أو قرط- قال: إنكم لتعملون اليوم أعمالا هي أدق في أعينكم من الشعر، كنا نعدها على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم من الموبقات.
فقلت (القائل هو حميد بن هلال) لأبي قتادة: فكيف لو أدرك زماننا هذا؟ فقال
أبو قتادة: لكان لذلك أَقْوَل.
صحيح: رواه أحمد (20751 - 20752)، والطيالسي (1450) كلاهما من طريق حميد بن هلال، حدثنا أبو قتادة العدوي، عن عبادة بن قرص -أو قرط- فذكره. وإسناده صحيح.
উবাদা ইবনু কুরস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তোমরা আজ এমনসব কাজ করো যা তোমাদের চোখে চুলের চাইতেও সূক্ষ্ম (তুচ্ছ)। অথচ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে আমরা এসব কাজকে ধ্বংসাত্মক পাপ (আল-মুবিকাত) বলে গণ্য করতাম।
আমি (হুমায়েদ ইবনু হিলাল) আবূ কাতাদাকে জিজ্ঞেস করলাম: যদি তিনি আমাদের এই সময় পেতেন, তাহলে কেমন হতো? আবূ কাতাদা বললেন: তাহলে তিনি এর চেয়েও জোরালো ভাষায় কথা বলতেন।
11167 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال وهو على المنبر:"ارحموا ترحموا، واغفروا يغفر الله لكم، ويل لأقماع القول، ويل للمصرين الذين يصرون على ما فعلوا وهم يعلمون".
حسن: رواه أحمد (6541 - 6542)، والبخاري في الأدب المفرد (380) كلاهما من طرق عن حريز (وهو ابن عثمان)، عن حبان بن زيد الشرعبي، عن عبد الله بن عمرو بن العاص فذكره.
وإسناده حسن من أجل حبان بن زيد الشرعبي فإنه حسن الحديث، ذكره ابن حبان في الثقات، وذكره الفسوي في ثقات التابعين من المصريين، وقال أبو داود: شيوخ حريز كلهم ثقات، فهو لا يقل عن درجة"صدوق".
وأما ما روي عن أبي بكر الصديق مرفوعا:"ما أصر من استغفر وإنْ عاد في اليوم سبعين مرة" فإسناده ضعيف.
رواه أبو داود (1514)، والترمذي (3559) كلاهما من طريق عثمان بن واقد، عن أبي نُصيرة، عن مولى لأبي بكر، عن أبي بكر الصديق فذكره.
وقال الترمذي:"وهذا حديث غريب إنما نعرفه من حديث أبي نُصيرة، وليس إسناده بالقوي".
قلت: أبو نُصيرة الراوي عن مولى أبي بكر اختلف فيه هل هو راو آخر غير أبي نصيرة الواسطي مسلم بن عبيد أو هما واحد؟ ففرق بينهما بعض أهل العلم منهم أبو أحمد الحاكم، وقال البزار: أبو نصيرة عن مولى أبي بكر مجهولان.
وذهب البخاري وأبو حاتم وغيرهما أن أبا نصيرة الراوي عن مولى أبي بكر هو الواسطي واسمه مسلم بن عبيد وهو حسن الحديث، وثقه أحمد، وقال ابن معين: صالح، وذكره ابن حبان في الثقات وقال: كان يخطئ على قلة روايته، وأما الأزدي فضعفه.
ومولى أبي بكر مجهول لا يعرف.
আব্দুল্লাহ ইবন আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মিম্বরে থাকা অবস্থায় বলেছেন: "তোমরা দয়া করো, তোমাদেরকে দয়া করা হবে। তোমরা ক্ষমা করো, আল্লাহ তোমাদের ক্ষমা করবেন। দুর্ভোগ সেইসব লোকের জন্য, যারা কেবল কথা শোনে (কিন্তু আমল করে না)। আর দুর্ভোগ তাদের জন্য, যারা জেনেশুনে তাদের কৃতকর্মের ওপর (পাপে) লেগে থাকে।"