হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (12028)


12028 - عن أبي هريرة قال: كان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم إذا نزل منزلا، نظروا أعظم شجرة يرونها، فجعلوها للنبي صلى الله عليه وسلم، فينزل تحتها وينزل أصحابه بعد ذلك في ظل الشجر،
فبينما هو نازل تحت شجرة، وقد علق السيف عليها، إذ جاء أعرابي، فأخذ السيف من الشجرة، ثم دنا من النبي صلى الله عليه وسلم وهو نائم فأيقظه. فقال: يا محمد من يمنعك مني الليلة؟ فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"اللَّه" فأنزل اللَّه: {يَاأَيُّهَا الرَّسُولُ بَلِّغْ مَا أُنْزِلَ إِلَيْكَ مِنْ رَبِّكَ وَإِنْ لَمْ تَفْعَلْ فَمَا بَلَّغْتَ رِسَالَتَهُ وَاللَّهُ يَعْصِمُكَ مِنَ النَّاسِ}.

حسن: رواه ابن حبان في صحيحه كما في موارد الظمآن (1739) عن عبد اللَّه بن محمد الأزدي، حدّثنا إسحاق بن إبراهيم الحنظلي، أنبأنا مؤمّل بن إسماعيل، حدّثنا حماد بن سلمة، حدّثنا محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكره.

وإسناده حسن فيه مؤمّل بن إسماعيل؛ وهو سيء الحفظ، ويحسن حديثه إذا توبع، وقد تابعه آدم، عن حماد بن سلمة عند ابن مردويه كما في تفسير ابن كثير (3/ 155).

تنبيه: هذا الحديث لم أجده في النسخة المطبوعة من"صحيح ابن حبان بترتيب ابن بلبان"، وهو موجود في أصل"صحيح ابن حبان"، لأن الحافظ ابن حجر أيضًا ذكره في"إتحاف المهرة" (20667) كما ذكره الهيثمي في"الموارد".

وفي معناه ما روي عن جعدة بن خالد الصّمة الجُشمي قال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم ورأى رجلًا سمينا، فجعل النبي صلى الله عليه وسلم يومئ إلى بطنه بيده، ويقول:"لو كان هذا في غير هذا، لكان خيرًا لك". قال: وأتي النبي صلى الله عليه وسلم برجل، فقالوا: هذا أراد أن يقتلك. فقال له النبي صلى الله عليه وسلم:"لم تُرَع، لم تُرَع، ولو أردت ذلك، لم يسلطك اللَّه عليّ".

رواه أحمد (15868)، والطبراني في الكبير (2/ 284)، والحاكم (4/ 121 - 122)، والبيهقي في شعب الإيمان (5279، 5278) كلهم من طرق عن شعبة قال: سمعت أبا إسرائيل، قال: سمعت جعدة فذكره. واللفظ لأحمد. وبعضهم اقتصر على الجزء الأول فقط. وقال الحاكم:"صحيح الإسناد".

قلت: أبو إسرائيل الجُشمي مولى جعدة الجُشمي، اسمه شعيب لم يرو عنه سوى شعبة. ولم يوثقه أحد إِلَّا أن ابن حبان ذكره في ثقاته، لذا قال ابن حجر في التقريب:"مقبول" أي عند المتابعة، ولم أجد له متابعا.

وأما قول الهيثمي في"المجمع" (8/ 226 - 227):"رجاله رجال الصحيح، غير أبي إسرائيل الجُشمي وهو ثقة"، فهو اعتماد منه على توثيق ابن حبان.



آمَنَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ وَعَمِلَ صَالِحًا فَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ (69)}

وقوله: {وَمَا أُنْزِلَ إِلَيْكُمْ مِنْ رَبِّكُمْ} أي القرآن.

وقوله: {إِنَّ الَّذِينَ آمَنُوا} هم مسلمون.

وقوله: {وَالَّذِينَ هَادُوا} هم اليهود.

وقوله: {وَالصَّابِئُونَ} هم طائفة من المجوس من الفرس وغيرهم، كان لهم كتاب فضيّعوه، وكانوا يقولون:"لا إله إلّا اللَّه". ولكنهم لم يؤمنوا بالنبي صلى الله عليه وسلم، وكانوا يرون أن العمل الصالح ينفعهم في الآخرة، ولكن العمل الصالح في نظر الإسلام ما كان موافقًا للشريعة المحمدية بعد إرسال آخر الرسل محمد بن عبد اللَّه صلى الله عليه وسلم، فهؤلاء المؤمنون بالنبي صلى الله عليه وسلم، واليهود والصابئون والنصارى إذا آمنوا باللَّه الواحد، لا شريك له، وآمنوا باليوم الآخر وهو يوم المعاد يوم الجزاء، وعملوا وفق شريعة النبي صلى الله عليه وسلم مؤمنين به، فهؤلاء لا خوف عليهم في يوم المعاد، ولا هم يحزنون.

وقيل: إن اليهود والنصارى والصابئين الذين كانوا مؤمنين بأنبيائهم قبل بعثة النبي صلى الله عليه وسلم كاليهود الذين آمنوا بموسى عليه السلام. وعملوا وفق شريعته، والنصارى الذين آمنوا بالمسيح عليه السلام، وعملوا وفق تعاليمه، والصائبين الذين كانوا آمنوا بنبيهم في زمانه، لا خوف عليهم ولا هم يحزنون. وأما الآن فلا بد من الإيمان بالنبي صلى الله عليه وسلم آخر الأنبياء والرسل، ولا نجاة لهم بدون الإيمان به.

وقوله: {وَالصَّابِئُونَ} بالرفع وحقه النصب، ولكن لما طال الفصل حسن العطف بالرفع.



قوله: {وَأُمُّهُ صِدِّيقَةٌ} أي مصدقة لما جاء به المسيح عليه السلام ومؤمنة به.

وقد دلّت الآية بأن مريم ليست بنبية وقد زعمت بعض الفرق الإسلامية بنبوتها ونبوة سارة أم إسماعيل، ونبوة أم موسى. والصحيح الذي عليه جمهور أهل السنة، هو أن اللَّه لم يبعث نبيًا إلّا من الرجال لقوله تعالى: {وَمَا أَرْسَلْنَا مِنْ قَبْلِكَ إِلَّا رِجَالًا نُوحِي إِلَيْهِمْ مِنْ أَهْلِ الْقُرَى} [سورة يوسف: 109].



ورواية سفيان الثوري عن علي بن بذيمة، عن أبي عبيدة، عن النبي صلى الله عليه وسلم عند الترمذيّ وابن ماجه بالأرقام المكررة، وابن جرير في تفسيره (8/ 590).

ورواه أبو داود (4337)، عن خلف بن هشام، حدّثنا أبو شهاب الحناط، عن العلاء بن المسيب، عن عمرو بن مرة، عن سالم، عن أبي عبيدة، عن ابن مسعود، عن النبى صلى الله عليه وسلم بنحوه. وزاد:"أو ليضربن اللَّه بقلوب بعضكم على بعض، ثم ليلعنّكم كما لعنهم".

قال أبو داود:"رواه المحاربي، عن العلاء بن المسيب، عن عبد اللَّه بن عمرو بن مرة، عن سالم الأفطس، عن أبي عبيدة، عن عبد اللَّه. ورواه خالد الطحان، عن العلاء، عن عمرو بن مرة، عن أبي عبيدة" انتهى، أي مرسلًا.

ورُوي هذا الحديث عن أبي عبيدة، عن أبي موسى، رواه خالد بن عبد اللَّه الواسطي، عن العلاء بن المسيب، عن عمرو بن مرة، عن أبي عبيدة، عن أبي موسى، عن النبي صلى الله عليه وسلم فذكر نحوه.

وسأل ابن أبي حاتم أباه عن هذا الحديث كما في العلل (1801): فقال:"لا أعرف هذا الحديث من حديث عمرو بن مرة، وإنما رواه علي بن بذيمة، عن أبي عبيدة، عن عبد اللَّه، عن النبي صلى الله عليه وسلم.

وهذا الذي رجّحه أيضًا الدارقطني في العلل (5/




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন কোনো স্থানে অবতরণ করতেন, তখন লোকেরা তাদের চোখে পড়া সবচেয়ে বড় গাছটি দেখত এবং সেটিকে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের জন্য নির্দিষ্ট করত। অতঃপর তিনি সেটির নিচে অবতরণ করতেন, আর তাঁর সাহাবীগণ এরপরে গাছের ছায়ায় অবস্থান করতেন।
একবার তিনি একটি গাছের নিচে অবস্থান করছিলেন এবং তাঁর তরবারিটি গাছের সাথে ঝুলানো ছিল। এমন সময় এক বেদুইন এসে গাছ থেকে তরবারিটি নিয়ে নিল। অতঃপর সে ঘুমন্ত অবস্থায় থাকা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকটবর্তী হলো এবং তাঁকে জাগিয়ে তুলল। সে বলল: হে মুহাম্মাদ! আজ রাতে কে তোমাকে আমার থেকে রক্ষা করবে? নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "আল্লাহ।" (তখনই) আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: {হে রাসূল! আপনার রবের পক্ষ থেকে আপনার প্রতি যা নাযিল করা হয়েছে তা পৌঁছে দিন। যদি আপনি তা না করেন, তবে আপনি তাঁর রিসালাত (বার্তা) পৌঁছালেন না। আর আল্লাহ আপনাকে মানুষ থেকে রক্ষা করবেন।}









আল-জামি` আল-কামিল (12029)


12029 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لو تابعني عشرة من اليهود، لم يبق على ظهرها يهودي إِلَّا أسلم".

متفق عليه: رواه البخاريّ في مناقب الأنصار (3941)، ومسلم في صفة القيامة والجنة والنار (2793)، كلاهما من طريق قرة (وهو ابن خالد السدوسي)، حدّثنا محمد (وهو ابن سيرين)، عن أبي هريرة، قال: فذكره. واللفظ لمسلم.

ورواه أحمد (8555) من طريق أبي هلال قال: حدّثنا محمد بن سيرين به، وفيه:"لو آمن بي عشرة من أحبار اليهود، لآمن بي كل يهودي على وجه الأرض".

والمراد بالعشرة هنا: رؤوسهم، فلو آمن هؤلاء لآمن اليهود جميعًا على وجه الأرض، لأنهم
تبع لرؤوسائهم، وإلّا فقد آمن به أكثر من عشرة وكان أشهرهم عبد اللَّه بن سلّام.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি দশজন ইয়াহুদী আমার অনুসরণ করত (বা আমার প্রতি ঈমান আনত), তবে পৃথিবীর পৃষ্ঠে এমন কোনো ইয়াহুদী অবশিষ্ট থাকত না, যে ইসলাম গ্রহণ করত না।"









আল-জামি` আল-কামিল (12030)


12030 - عن سلمان قال:"لَمَّا قَدِمَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم الْمَدِينَةَ صَنَعْتُ طَعَامًا، فَجِئْتُ بِهِ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم، فَقَال:"مَا هَذَا يَا سَلْمَانُ؟". قُلْتُ:"صَدَقَةٌ"، فَقَال لأَصْحَابِهِ:"كُلُوا"، وَلَمْ يَأْكُلْ، ثُمَّ إِنِّي رَجَعْتُ حَتَّى جَمَعْتُ طَعَامًا، فَأَتَيْتُهُ بِهِ، فَقَال:"مَا هَذَا يَا سَلْمَانُ؟". قُلْتُ:"هَدِيَّةٌ"، فَضَرَبَ بِيَدِهِ فَأَكَلَ، وَقَال لأَصْحَابِهِ:"كُلُوا". قُلْتُ:"يَا رَسُول اللَّهِ، أَخْبِرْنِي عَنِ النَّصَارَى؟" قَال:"لا خَيْرَ فِيهِمْ وَلا فِيمَنْ أَحَبَّهُمْ"، فَقُمْتُ وَأَنَا مُثْقَلٌ، فَأَنْزَل اللَّهُ عز وجل: {لَتَجِدَنَّ أَشَدَّ النَّاسِ عَدَاوَةً لِلَّذِينَ آمَنُوا الْيَهُودَ وَالَّذِينَ أَشْرَكُوا} حَتَّى بَلَغَ {تَرَى أَعْيُنَهُمْ تَفِيضُ مِنَ الدَّمْعِ}، فَأَرْسَلَ إِلَيَّ رَسُول اللَّهِ صلى الله عليه وسلم، فَقَال لِي:"يَا سَلْمَانُ إِنَّ أَصْحَابَكَ هَؤُلاءِ الَّذِينَ ذَكَرَ اللَّهُ".

صحيح: رواه الطبرانيّ في الكبير (6/ 305)، عن الحسن بن حرير الصوري، ثنا زكريا بن نافع الأرسوقي، ثنا السري بن يحيى، عن سليمان التيمي، عن أبي عثمان النهدي، عن سلمان فذكره.

وإسناده صحيح. وله طرق أخرى غير أن ما ذكرته هو أصحها.

تنبيه: سقط من الإسناد"عن أبي عثمان النهدي" كما هو ظاهر من ترجمة الطبرانيّ.

وهؤلاء القسيسيون والرهبان كانوا من أتباع أريانوس المصري الذي ظهر في القرن الثالث الميلادي، ودعا إلى نبوة المسيح عليه السلام، وأنكر ألوهيته فعُذِّب هو وأصحابه، وبقي بعض أتباعهم فأدركوا عهد النبي صلى الله عليه وسلم فآمنوا به. ولعل النجاشي ملك الحبشة كان من أتباعه أيضًا سرًا، وأنه لم يظهر ذلك خوفا من جمهور النصارى الذين كانوا على مذهب بولس، ولذا جعل القرآن والإنجيل من مشكاة واحدة، مع أن الأناجيل الموجودة لا تُنكر ألوهية المسيح، ولعله اطلع أيضًا على إنجيل برناباس الذي اكتشف قبل حكمه بخمسين سنة، وفيه إنكار لألوهية المسيح، وإثبات لنبوته، وبشارات بنبوة محمد صلى الله عليه وسلم. فقوله:"من مشكاة واحدة" يرجع إلى القرآن وإنجيل برناباس أو ما تحمله من أفكار أريانوس.




সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মদিনায় আগমন করলেন, আমি কিছু খাবার তৈরি করলাম এবং তা নিয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আসলাম। তিনি বললেন, "হে সালমান, এটা কী?" আমি বললাম, "এটা সদকা (দান)।" তখন তিনি তাঁর সাহাবিদের বললেন, "তোমরা খাও," কিন্তু তিনি নিজে খেলেন না।

এরপর আমি ফিরে গেলাম এবং আবারও কিছু খাবার সংগ্রহ করলাম এবং তা নিয়ে তাঁর কাছে আসলাম। তিনি বললেন, "হে সালমান, এটা কী?" আমি বললাম, "এটা হাদিয়া (উপহার)।" তখন তিনি হাত বাড়িয়ে খেলেন এবং তাঁর সাহাবিদেরও বললেন, "তোমরা খাও।"

আমি বললাম, "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আমাকে খ্রিস্টানদের সম্পর্কে অবহিত করুন।" তিনি বললেন, "তাদের মাঝে কোনো কল্যাণ নেই, আর যে তাদের ভালোবাসে, তার মাঝেও কোনো কল্যাণ নেই।"

আমি ভারাক্রান্ত অবস্থায় উঠে দাঁড়ালাম, তখন আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: "যারা ঈমান এনেছে, তাদের প্রতি শত্রুতায় কঠোরতম হিসেবে তুমি অবশ্যই পাবে ইহুদিদেরকে এবং মুশরিকদেরকে..." (সূরা মায়িদাহ ৫:৮২-এর অংশ) যতক্ষণ না আল্লাহ বললেন, "...তুমি দেখতে পাবে তাদের চোখ অশ্রুতে ভিজে যাচ্ছে।" (৫:৮৩-এর অংশ)

এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাছে লোক পাঠালেন এবং আমাকে বললেন, "হে সালমান, আল্লাহ যাদের কথা উল্লেখ করেছেন, তারা হলো তোমার এই সাথীরা (যাদের সম্পর্কে তুমি জিজ্ঞেস করেছিলে)।"









আল-জামি` আল-কামিল (12031)


12031 - عن عبد اللَّه بن الزبير قال:"نزلت هذه الآية في النجاشي، وفي أصحابه {وَإِذَا سَمِعُوا مَا أُنْزِلَ إِلَى الرَّسُولِ تَرَى أَعْيُنَهُمْ تَفِيضُ مِنَ الدَّمْعِ مِمَّا عَرَفُوا مِنَ الْحَقِّ يَقُولُونَ رَبَّنَا آمَنَّا فَاكْتُبْنَا مَعَ الشَّاهِدِينَ}.

حسن: رواه النسائيّ في الكبرى (11148)، وابن أبي حاتم في تفسيره (4/ 1185)، وابن جرير في تفسيره (8/ 602) كلهم من حديث عمر بن علي بن مقدّم، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عبد اللَّه بن الزبير فذكره.

وإسناده حسن من أجل عمر بن علي بن مقدم؛ فإنه حسن الحديث إلّا أنه رمي بالتدليس.
والآثار المروية في هذا الباب تقوي هذا الحديث.

قال ابن إسحاق:"سألت الزهري عن الآيات: {ذَلِكَ بِأَنَّ مِنْهُمْ قِسِّيسِينَ وَرُهْبَانًا وَأَنَّهُمْ لَا يَسْتَكْبِرُونَ (82) وَإِذَا سَمِعُوا مَا أُنْزِلَ إِلَى الرَّسُولِ تَرَى أَعْيُنَهُمْ تَفِيضُ مِنَ الدَّمْعِ} قال:"ما زلت أسمع علماءنا يقولون: نزلت في النجاشي وأصحابه". سيرة ابن هشام (1/ 39




আব্দুল্লাহ ইবন আয-যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এই আয়াতটি নাজাশী (বাদশাহ) এবং তাঁর সঙ্গীদের সম্পর্কে অবতীর্ণ হয়েছে: "আর যখন তারা রাসূলের প্রতি যা নাযিল হয়েছে তা শুনতে পায়, তখন তারা সত্যকে উপলব্ধি করার কারণে তাদের চোখ অশ্রুতে টলমল করতে থাকে। তারা বলে: হে আমাদের রব, আমরা ঈমান আনলাম। অতএব আপনি আমাদের সাক্ষ্যদাতাদের অন্তর্ভুক্ত করুন।"









আল-জামি` আল-কামিল (12032)


12032 - عن عبد اللَّه بن مسعود قال: كنا نغزوا مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، ليس لنا نساء، فقلنا: ألا نستخصي؟ فنهانا عن ذلك، ثم رخّص لنا أن ننكح المرأة بالثوب إلي أجل. ثم قرأ عبد اللَّه: {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تُحَرِّمُوا طَيِّبَاتِ مَا أَحَلَّ اللَّهُ لَكُمْ وَلَا تَعْتَدُوا إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ الْمُعْتَدِينَ (87)}.

متفق عليه: رواه البخاريّ في التفسير (4615)، ومسلم في النكاح (1404) كلاهما من طريق إسماعيل بن أبي خالد، عن قيس، عن عبد اللَّه قال: فذكره. واللفظ لمسلم ولفظ البخاريّ نحوه.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে যুদ্ধে অংশ নিতাম, কিন্তু আমাদের সাথে কোনো স্ত্রী ছিল না। তাই আমরা বললাম, আমরা কি নিজেদেরকে খাসী (পুরুষত্বহীন) করে ফেলব না? তখন তিনি আমাদেরকে তা থেকে নিষেধ করলেন। এরপর তিনি আমাদেরকে সামান্য কাপড়ের বিনিময়ে একটি নির্দিষ্ট মেয়াদের জন্য নারীদের বিবাহ করার অনুমতি দিলেন। অতঃপর আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এই আয়াতটি তিলাওয়াত করলেন: "হে মুমিনগণ! আল্লাহ তোমাদের জন্য যে সকল পবিত্র বস্তু হালাল করেছেন, সেগুলোকে হারাম করো না এবং সীমা লঙ্ঘন করো না। নিশ্চয় আল্লাহ সীমা লঙ্ঘনকারীদেরকে ভালোবাসেন না।"









আল-জামি` আল-কামিল (12033)


12033 - عن ابن عباس قوله: {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تُحَرِّمُوا طَيِّبَاتِ مَا أَحَلَّ اللَّهُ لَكُمْ} قال: هم رهطٌ من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، قالوا: نقطَعُ مذاكيرَنا، ونترك شهوات الدنيا، ونسيح في الأرض كما تفعل الرهبان، فبلغ ذلك النبيَّ صلى الله عليه وسلم، فأرسل إليهم، فذكر ذلك لهم فقالوا: نعم، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لكنيّ أصوم وأفطر، وأصلِّي وأنام، وأنكح النساء، فمن أخذ بسنتي فهو مني، ومن لم يأخذ بسنتي فليس مِني".

حسن: رواه ابن جرير الطبريّ في تفسيره (8/ 611) عن المثنى، ثنا عبد اللَّه بن صالح، قال: ثني معاوية بن صالح، عن علي بن أبي طلحة، عن ابن عباس فذكره.

ورواه ابن أبي حاتم في تفسيره (5/ 1187)، عن أبيه، ثنا أبو صالح كاتب الليث (وهو عبد اللَّه ابن صالح) به.

وإسناده حسن من أجل عبد اللَّه بن صالح؛ فإنه مختلف فيه، غير أنه حسن الحديث إذا كان له أصل.

وأما ما روي عن عبد اللَّه بن مسعود: أن رجلًا أتى النبي صلى الله عليه وسلم، فقال: يا رسول اللَّه، إني إذا أصبت اللحم انتشرت للنساء، وأخذتني شهوتي، فحرمت علي اللحم. فأنزل اللَّه {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ
آمَنُوا لَا تُحَرِّمُوا طَيِّبَاتِ مَا أَحَلَّ اللَّهُ لَكُمْ وَلَا تَعْتَدُوا إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ الْمُعْتَدِينَ (87)} فهو ضعيف.

رواه الترمذيّ (3054)، وابن أبي حاتم في تفسيره (4/ 1184)، وابن جرير الطبريّ في تفسيره (8/ 613)، كلهم من حديث عثمان بن سعد، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.

وقال الترمذيّ: هذا حديث حسن غريب، وروى بعضهم عن عثمان بن سعد مرسلًا ليس فيه"عن ابن عباس". ورواه خالد الحذّاء، عن عكرمة مرسلًا". اهـ

قلت: مع إرساله ووقفه فيه عثمان بن سعد الكاتب أبو بكر البصري، ضعيف عند جمهور أهل العلم وإن كان ابن عدي حسن الرأي فيه فقال:"هو حسن الحديث"، والقول قول الجمهور، وبه قال الحافظ في التقريب"ضعيف".

قلت: وهو كما قال، فقد رواه ابن جرير الطبريّ من أوجه عن خالد الحذّاء، عن عكرمة قال: كان أناس من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم همّوا بالخصاء، وترك اللحم والنساء، فنزلت هذه الآية: {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تُحَرِّمُوا طَيِّبَاتِ مَا أَحَلَّ اللَّهُ لَكُمْ وَلَا تَعْتَدُوا إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ الْمُعْتَدِينَ}.

وهذا أصح؛ فإن خالد الحذّاء من الثقات الضابطين بخلاف عثمان بن سعيد؛ فإنه ضعيف.

وقال مسروق: أتى عبد اللَّه بضرع، فقال للقوم: أدنو، فأخذوا يطعمونه. وكان رجل منهم في ناحية، فقال عبد اللَّه: أدن، فقال: إني لا أريده. فقال: لم؟ قال: لأني حرمت الضرع. فقال عبد اللَّه: هذا من خطوات الشيطان. وتلا قوله تعالى: {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تُحَرِّمُوا طَيِّبَاتِ مَا أَحَلَّ اللَّهُ لَكُمْ وَلَا تَعْتَدُوا إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ الْمُعْتَدِينَ} أدن، فكل، وكفر عن يمينك، فإن هذا من خطوات الشيطان.

رواه الحاكم (2/ 313 - 314) من طريق منصور، عن أبي الضحى، عن مسروق. وقال:"صحيح على شرط الشيخين".

ذهب الإمام أحمد وغيره إلى أنّ مَنْ حرّم مأكلا، أو مشربا، أو شيئًا من الأشياء، فإنه يجب عليه بذلك كفارة يمين؛ لعموم قوله تعالى كما في الآية التي بعدها. {لَا يُؤَاخِذُكُمُ اللَّهُ بِاللَّغْوِ فِي أَيْمَانِكُمْ. . .} ولأثر ابن مسعود وغيره.

وذهب الشافعي وغيره إلى أن من حرم مأكلا أو ملبسا أو شيئًا ما عدا النساء، أنه لا يحرم عليه، ولا كفارة عليه أيضًا، لأنّ مَن حرّم اللحم على نفسه، لم يأمره النبي صلى الله عليه وسلم بكفارة.

قلت: لعل ذلك لم ينقل، لأن كفارة اليمين معروفة في كتاب اللَّه وسنة رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم.



قوله: {أَوْ} للتخيير، بدون خلاف؛ فإن اللَّه بدأ بالأيسر فالأسهل. وروي عن ابن عباس قال: لما نزلت آية الكفارات، قال حذيفة: يا رسول اللَّه: نحن بالخيار؟ قال:"أنت بالخيار، إن شئت أعتقت، وإن شئت كسوت، وإن شئت أطعمت، فمن لم يجد فصيام ثلاثة أيام متتابعات" إِلَّا أنه لم يصح.

وقوله: {أَوْ تَحْرِيرُ رَقَبَةٍ} أخذ أبو حنيفة بإطلاقها، فقال: تجزئ الكافرة كما تجزئ المؤمنة.

وقيّد الشافعي وغيره بالمؤمنة. وأخذوا تقييدها بالإيمان من كفارة القتل.

وقوله: {فَصِيَامُ ثَلَاثَةِ أَيَّامٍ} الآية مطلقة ليس فيها كون الصيام متتابعا. وبه قال مالك والشافعي وغيرهما. ومن ذهب إلى التتابع، أخذ بقراءة ابن مسعود {فصيام ثلاثة أيام متتابعات} إلّا أنها قراءة شاذة غير متواترة. والغالب أنه من تفسير ابن مسعود.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর বাণী: "হে মুমিনগণ, তোমরা আল্লাহ তোমাদের জন্য যে সকল পবিত্র বস্তু হালাল করেছেন, সেগুলোকে হারাম করো না" (সূরা মায়িদাহ ৫:৮৭) এর ব্যাখ্যায় তিনি বলেন, এই আয়াতটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীদের একটি দলকে উদ্দেশ্য করে নাযিল হয়েছে। তারা (ঐ সাহাবীরা) বলেছিলেন: আমরা নিজেদের পুরুষাঙ্গ কেটে ফেলব, দুনিয়ার ভোগ-বিলাসিতা ত্যাগ করব, এবং সংসারত্যাগী সন্ন্যাসীদের মতো পৃথিবীতে ঘুরে বেড়াব (ভ্রমণ করব)। এই খবর নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট পৌঁছালে তিনি তাদের কাছে লোক পাঠালেন এবং তাদের সাথে এ বিষয়ে আলোচনা করলেন। তারা (সাহাবীরা) বললেন: হ্যাঁ (আমরা এই সংকল্প করেছি)। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কিন্তু আমি রোযা রাখি এবং (আবার) তা ভঙ্গও করি; আমি সালাত আদায় করি এবং ঘুমাই; এবং আমি নারীদের বিবাহ করি। সুতরাং যে আমার সুন্নাত অনুসরণ করবে, সে আমার অন্তর্ভুক্ত। আর যে আমার সুন্নাত অনুসরণ করবে না, সে আমার অন্তর্ভুক্ত নয়।"

হাসান (উত্তম): এটি ইবনু জারীর আত-তাবারী তার তাফসীরে (৮/৬১১) আল-মুসান্না, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু সালিহ, তিনি মু‘আবিয়া ইবনু সালিহ, তিনি আলী ইবনু আবী তালহা, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে বর্ণনা করেছেন।

এটি ইবনু আবী হাতিম তার তাফসীরে (৫/১১৮৭) তার পিতা, তিনি আবূ সালিহ কাতিব আল-লাইস (ইনি আব্দুল্লাহ ইবনু সালিহ), তার সূত্রে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।

এর সনদ আব্দুল্লাহ ইবনু সালিহর কারণে হাসান (উত্তম)। কারণ তার ব্যাপারে মতভেদ আছে, তবে তার বর্ণনার যদি কোনো মূল (সমর্থনকারী বর্ণনা) থাকে তবে তার হাদীস হাসান হিসেবে বিবেচিত হয়।

আর আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে যা বর্ণিত হয়েছে যে, জনৈক ব্যক্তি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আমি যখন গোশত খাই, তখন আমি নারীদের প্রতি আকৃষ্ট হয়ে পড়ি এবং আমার কামনা বেড়ে যায়। তাই আমি নিজের উপর গোশত হারাম করে নিয়েছি। তখন আল্লাহ তা‘আলা অবতীর্ণ করেন: "হে মুমিনগণ, তোমরা আল্লাহ তোমাদের জন্য যে সকল পবিত্র বস্তু হালাল করেছেন, সেগুলোকে হারাম করো না এবং সীমালঙ্ঘন করো না। নিশ্চয় আল্লাহ সীমালঙ্ঘনকারীদের পছন্দ করেন না" (সূরা মায়িদাহ ৫:৮৭)। এই বর্ণনাটি দুর্বল (দাঈফ)।

এটি তিরমিযী (৩০৫৪), ইবনু আবী হাতিম তার তাফসীরে (৪/১১৮৪), ইবনু জারীর আত-তাবারী তার তাফসীরে (৮/৬১৩) বর্ণনা করেছেন। সবাই উসমান ইবনু সা‘দ, তিনি ইকরিমা, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে বর্ণনা করেছেন।

ইমাম তিরমিযী বলেন: এই হাদীসটি হাসান গারীব (উত্তম ও একক)। কেউ কেউ উসমান ইবনু সা‘দ থেকে মুরসালরূপে (সাহাবীর নাম উল্লেখ না করে) বর্ণনা করেছেন, যেখানে 'ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে' এই অংশটি নেই। আর এটি খালিদ আল-হাযযা‘, তিনি ইকরিমা থেকে মুরসালরূপে বর্ণনা করেছেন। সমাপ্ত।

আমি বলি: এই বর্ণনাটি মুরসাল (বিচ্ছিন্ন) ও মাউকূফ (সাহাবীর উক্তি হিসেবে সীমিত) হওয়া সত্ত্বেও এতে উসমান ইবনু সা‘দ আল-কাতিব আবূ বকর আল-বাসরী রয়েছেন, যাকে জমহূর (অধিকাংশ) আলেম দুর্বল বলে মত দিয়েছেন। যদিও ইবনু আদী তার সম্পর্কে ভালো ধারণা পোষণ করে বলেছেন: "তিনি হাসানুল হাদীস (উত্তম হাদীসের অধিকারী)", তবে জমহূরের মতই গ্রহণযোগ্য। এই মতটিই আল-হাফিয 'আত-তাকরীব' গ্রন্থে গ্রহণ করে তাকে 'দাঈফ' (দুর্বল) বলেছেন।

আমি বলি: এটি তেমনই, যেমন তিনি (আল-হাফিয) বলেছেন। কারণ ইবনু জারীর আত-তাবারী একাধিক সূত্রে খালিদ আল-হাযযা‘, তিনি ইকরিমা থেকে বর্ণনা করেছেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কতিপয় সাহাবী খাসী হওয়া, গোশত ও নারী বর্জন করার ইচ্ছা করেছিলেন। তখন এই আয়াতটি নাযিল হয়: "হে মুমিনগণ, তোমরা আল্লাহ তোমাদের জন্য যে সকল পবিত্র বস্তু হালাল করেছেন, সেগুলোকে হারাম করো না এবং সীমালঙ্ঘন করো না। নিশ্চয় আল্লাহ সীমালঙ্ঘনকারীদের পছন্দ করেন না।"

আর এই বর্ণনাটিই অধিক সহীহ (বিশুদ্ধ); কারণ খালিদ আল-হাযযা‘ হলেন নির্ভরযোগ্য ও নিখুঁত বর্ণনাকারীদের অন্তর্ভুক্ত, পক্ষান্তরে উসমান ইবনু সা‘ঈদ দুর্বল।

আর মাসরূক বলেছেন: আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে স্তনের গোশত (বা পশুর উডডার) আনা হলে তিনি উপস্থিত লোকদের বললেন: কাছে এসো। অতঃপর তারা তা খেতে শুরু করলেন। কিন্তু তাদের মধ্যে একজন লোক একপাশে বসে ছিল। আব্দুল্লাহ (ইবনু মাসঊদ) তাকে বললেন: কাছে এসো। সে বলল: আমি এটা চাই না। তিনি বললেন: কেন? সে বলল: কারণ আমি স্তনের গোশত নিজের উপর হারাম করে নিয়েছি। আব্দুল্লাহ (ইবনু মাসঊদ) তখন বললেন: এটা শয়তানের পদক্ষেপের অন্তর্ভুক্ত। এরপর তিনি আল্লাহ তা‘আলার এই বাণী তিলাওয়াত করলেন: "হে মুমিনগণ, তোমরা আল্লাহ তোমাদের জন্য যে সকল পবিত্র বস্তু হালাল করেছেন, সেগুলোকে হারাম করো না এবং সীমালঙ্ঘন করো না। নিশ্চয় আল্লাহ সীমালঙ্ঘনকারীদের পছন্দ করেন না।" কাছে এসো, খাও, এবং তোমার শপথের কাফফারা আদায় করো। কারণ এটা শয়তানের পদক্ষেপের অন্তর্ভুক্ত।

এটি আল-হাকিম (২/৩১৩-৩১৪) মানসূর, তিনি আবূদ দোহা, তিনি মাসরূক সূত্রে বর্ণনা করেছেন এবং বলেছেন: "এটি শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্ত অনুযায়ী সহীহ।"

ইমাম আহমাদ এবং অন্যান্য বিদ্বানগণ এই মত পোষণ করেন যে, কেউ যদি কোনো খাদ্য, পানীয় বা অন্য কোনো জিনিস নিজের উপর হারাম করে নেয়, তবে এর কারণে তার উপর শপথ ভঙ্গের কাফফারা আদায় করা আবশ্যক হবে; কারণ পরবর্তী আয়াতে আল্লাহ তা‘আলার সাধারণ উক্তি: "আল্লাহ তোমাদেরকে তোমাদের শপথের অনর্থক কথার জন্য দায়ী করবেন না..." এবং ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর আছার (উক্তি) ও অন্যান্য দলীলের কারণে।

আর ইমাম শাফেঈ এবং অন্যান্য বিদ্বানগণ এই মত পোষণ করেন যে, কেউ যদি নারী ব্যতীত কোনো খাদ্য, পোশাক বা অন্য কিছু নিজের উপর হারাম করে নেয়, তবে তা তার উপর হারাম হবে না এবং তার উপর কাফফারাও আবশ্যক হবে না। কারণ যে ব্যক্তি নিজের উপর গোশত হারাম করেছিল, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে কাফফারা আদায়ের নির্দেশ দেননি।

আমি বলি: সম্ভবত সেই নির্দেশ (কাফফারা আদায়ের নির্দেশ) বর্ণিত হয়নি, কারণ শপথের কাফফারা আল্লাহ তা‘আলার কিতাব ও রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সুন্নাত দ্বারা সুপরিচিত।

আল্লাহ তা‘আলার বাণী {أَوْ} (অথবা) শব্দটি কোনো মতভেদ ছাড়াই ইখতিয়ার (পছন্দ)-এর জন্য ব্যবহৃত হয়েছে; কারণ আল্লাহ সহজ থেকে সহজতর জিনিসের মাধ্যমে শুরু করেছেন। ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত আছে যে, যখন কাফফারার আয়াত নাযিল হলো, তখন হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমরা কি স্বাধীনভাবে যেকোনো একটি বেছে নিতে পারি? তিনি বললেন: "তুমি স্বাধীন, যদি চাও তবে গোলাম আজাদ করবে, যদি চাও তবে পোশাক দেবে, আর যদি চাও তবে খাদ্য দেবে। আর যে ব্যক্তি কোনোটিই পাবে না, সে একটানা তিনটি রোযা রাখবে।" তবে এই বর্ণনাটি সহীহ নয়।

আল্লাহ তা‘আলার বাণী: {أَوْ تَحْرِيرُ رَقَبَةٍ} (অথবা একজন দাস মুক্ত করা) প্রসঙ্গে আবূ হানীফা (রহ.) এর ব্যাপকতা গ্রহণ করেছেন এবং বলেছেন: মু’মিনের মতো কাফির (অমুসলিম) দাস মুক্ত করলেও কাফফারা আদায় হবে।

আর ইমাম শাফেঈ (রহ.) এবং অন্যান্যরা মু’মিন দাস মুক্ত করার শর্ত আরোপ করেছেন। তাঁরা হত্যার কাফফারা থেকে ঈমানের এই শর্তটি গ্রহণ করেছেন।

আল্লাহ তা‘আলার বাণী: {فَصِيَامُ ثَلَاثَةِ أَيَّامٍ} (অতঃপর তিন দিন সিয়াম পালন) আয়াতটি ব্যাপক, এতে লাগাতার (ক্রমাগত) রোযা রাখার শর্ত নেই। ইমাম মালিক, ইমাম শাফেঈ (রহ.) ও অন্যান্যরা এই মত দিয়েছেন। আর যারা লাগাতার রোযা রাখার পক্ষে গেছেন, তারা ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কিরাআত: {فصيام ثلاثة أيام متتابعات} (অতঃপর একটানা তিন দিন রোযা রাখা) দ্বারা প্রমাণ গ্রহণ করেছেন। কিন্তু এটি শা’য (বিরল) কিরাআত, যা মুতাওয়াতির (বহু সূত্রে বর্ণিত) নয়। আর সম্ভবত এটি ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর তাফসীর (ব্যাখ্যা) থেকেই এসেছে।









আল-জামি` আল-কামিল (12034)


12034 - عن عائشة: أنزلت هذه الآية: {لَا يُؤَاخِذُكُمُ اللَّهُ بِاللَّغْوِ فِي أَيْمَانِكُمْ} في قول الرجل: لا واللَّه، وبلى واللَّه.

صحيح: رواه البخاريّ في التفسير (4613) عن علي بن سلمة، حدّثنا مالك بن سُعَير، حدّثنا هشام، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এই আয়াতটি নাযিল হয়েছিল: {আল্লাহ তোমাদেরকে তোমাদের শপথের ক্ষেত্রে অনর্থক (কথাবার্তা) দ্বারা পাকড়াও করবেন না}— কোনো ব্যক্তির এই কথার ব্যাপারে: 'না, আল্লাহর কসম' এবং 'হ্যাঁ, আল্লাহর কসম'।









আল-জামি` আল-কামিল (12035)


12035 - عن عائشة أن أباها كان لا يحنث في يمين حتى أنزل اللَّه كفارة اليمين، قال أبو بكر: لا أرى يمينا أرى غيرها خيرًا منها، إلّا قبلت رخصة اللَّه وفعلت الّذي هو خير.

صحيح: رواه البخاريّ في التفسير (4614)، عن أحمد بن أبي رجاء، حدّثنا النضر، عن هشام قال: أخبرني أبي، عن عائشة. فذكرته.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর পিতা [আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)] কোনো শপথ ভঙ্গ করতেন না, যতক্ষণ না আল্লাহ কসমের কাফফারা নাযিল করলেন। আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমি এমন কোনো শপথ দেখি না, যার চেয়ে উত্তম কিছু দেখলে আমি আল্লাহর দেওয়া সহজতাকে গ্রহণ না করে এবং যা উত্তম, সেটাই না করে ক্ষান্ত হব।









আল-জামি` আল-কামিল (12036)


12036 - عن ابن عباس قال: كان الرجل يقوت أهله قوتا فيه سعة، وكان الرجل يقوت أهله قوتا فيه شدة. فنزلت: {مِنْ أَوْسَطِ مَا تُطْعِمُونَ أَهْلِيكُمْ أَوْ كِسْوَتُهُمْ}.

صحيح: رواه ابن ماجه (2113) عن محمد بن يحيى، قال: حدّثنا عبد الرحمن بن مهدي، قال: حدّثنا سفيان بن عيينة، عن سليمان بن أبي المغيرة، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس فذكره.

وإسناده صحيح، وقد صحّحه أيضًا البوصيري في زوائد ابن ماجه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কোনো ব্যক্তি তার পরিবারকে এমন খাবার খাওয়াতো যা ছিল স্বচ্ছলতাপূর্ণ, আবার কোনো ব্যক্তি তার পরিবারকে এমন খাবার খাওয়াতো যা ছিল কষ্টকর (স্বল্প মানের)। অতঃপর এই আয়াত নাযিল হলো: "{তোমরা তোমাদের পরিবারবর্গকে যে ধরনের খাবার দাও, তার মধ্যম মানের খাবার (খাওয়াবে) অথবা তাদের পরিধেয় বস্ত্র।}"









আল-জামি` আল-কামিল (12037)


12037 - عن ابن عمر قال: نزل تحريم الخمر، وإنّ في المدينة يومئذ لخمسة أشربة، ما
فيها شراب العنب.

صحيح: رواه البخاريّ في التفسير (4616)، عن إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا محمد بن بشر، حدّثنا عبد العزيز بن عمر بن عبد العزيز قال: حدثني نافع، عن ابن عمر قال: فذكره.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মদ্য (খামর) নিষিদ্ধ হওয়ার বিধান নাযিল হয়েছিল, তখন মদীনায় পাঁচ ধরনের পানীয় বিদ্যমান ছিল, যেগুলোর মধ্যে আঙ্গুরের শরাব (মদ) ছিল না।









আল-জামি` আল-কামিল (12038)


12038 - عن عَبْدِ الْعَزِيزِ بْنِ صُهَيْبٍ قَالَ: سَأَلُوا أَنَسَ بْنَ مَالِكٍ عَنِ الْفَضِيخِ، فَقَالَ: مَا كَانَتْ لَنَا خَمْرٌ غَيْرَ فَضِيخِكُمْ هًذَا الذي تُسَمُّونَهُ الْفَضِيخَ، إِنِّي لَقَائِمٌ أَسْقِيهَا أَبَا طَلْحَةَ وَأَبَا أَيُّوبَ وَرِجَالًا مِنْ أَصْحَابِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي بَيْتِنَا، إِذْ جَاءَ رَجُلٌ، فَقَالَ: هَلْ بَلَغَكُمُ الْخَبَرُ؟ قُلْنَا: لَا. قَالَ. فَإِنَّ الْخَمْرَ قَدْ حُرِّمَتْ. فَقَالَ: يَا أَنَسُ! أَرِقْ هَذِهِ الْقِلَالَ. قَالَ: فَمَا رَاجَعُوهَا وَلَا سَأَلُوا عَنْهَا بَعْدَ خَبَرِ الرَّجُلِ.

متفق عليه: رواه البخاريّ في التفسير (4617)، ومسلم في الأشربة (1980: 4) كلاهما من طريق ابن علية، أخبرنا عبد العزيز بن صهيب قال: فذكره. واللفظ لمسلم ولفظ البخاريّ نحوه.




আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তারা (লোকজন) তাঁকে ‘আল-ফাদীখ’ (এক ধরনের পানীয়) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করল। তখন তিনি বললেন: তোমরা যাকে ফাদীখ নামে অভিহিত করো, এই ফাদীখ ছাড়া আমাদের অন্য কোনো মদ ছিল না। আমি তখন আমাদের ঘরে আবূ তালহা, আবূ আইয়ুব এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কয়েকজন সাহাবীকে তা পান করাচ্ছিলাম, এমন সময় এক ব্যক্তি এসে বলল: তোমাদের কাছে কি খবর পৌঁছেছে? আমরা বললাম: না। সে বলল: নিশ্চয়ই মদ হারাম করা হয়েছে। তখন (উপস্থিতদের মধ্য থেকে কেউ) বলল: হে আনাস! এই পাত্রগুলো ঢেলে দাও। আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এরপর সেই লোকটির সংবাদ পাওয়ার পর তারা তা নিয়ে আর কোনো প্রশ্ন করেনি বা তা ফেরত নেওয়ার চেষ্টা করেনি।









আল-জামি` আল-কামিল (12039)


12039 - عن ابن عمر قال: سمعت عمر على منبر النبي صلى الله عليه وسلم يقول: أما بعد، أيها الناس إنه نزل تحريم الخمر، وهي من خمسة: من العنب والتمر والعسل والحنطة والشعير والخمر ما خامر العقل.

متفق عليه: رواه البخاريّ في التفسير (4619)، ومسلم في التفسير (3032: 33) كلاهما من طريق ابن إدريس، حدّثنا أبو حيان، عن الشعبي، عن ابن عمر قال: فذكره.

وزاد مسلم:"وثلاث، أيها الناس، وددت أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم كان عهد إلينا فيهن عهدا ننتهي إليه: الجد، والكلالة، وأبواب من أبواب الربا".

وقوله: {وَالْمَيْسِرُ} أي القمار، والنرد من القمار كما قال ابن عمر وغيره. وقال علي بن أبي طالب وغيره:"الشطرنج من القمار". ولذا ذهب أبو حنيفة ومالك وأحمد إلى تحريم الشطرنج. وكرهه الشافعي.

قال ابن عبد البر في التمهيد (13/ 175):"يحرم اللعب بالنرد جملة واحدة، لم يستثن وقتا من الأوقات، ولا حالا من الأحوال، فسواء شغل النرد عن الصلاة أو لم يشغل، أو ألهى عن ذلك ومثله أو لم يفعل ششِا من ذلك". اهـ. وقد جاء في الصحيح.




আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর মিম্বরে দাঁড়িয়ে বলতে শুনেছি: "আম্মা বা’দ (এরপর), হে লোক সকল! নিশ্চয় মদের (খামর-এর) নিষেধাজ্ঞা নাযিল হয়েছে। আর তা পাঁচটি বস্তু থেকে তৈরি হয়: আঙ্গুর, খেজুর, মধু, গম এবং যব। আর খামর (মদ) হলো তা-ই, যা জ্ঞান-বুদ্ধিকে আবৃত করে ফেলে (বিভ্রান্ত করে)।"

এবং ইমাম মুসলিম (রাহিমাহুল্লাহ) অতিরিক্ত বর্ণনা করেছেন: "হে লোক সকল! এমন তিনটি বিষয় রয়েছে, যার ব্যাপারে আমি আশা করেছিলাম যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাদের জন্য একটি চূড়ান্ত অঙ্গীকার (বা সিদ্ধান্ত) দিয়ে যেতেন, যা আমরা অনুসরণ করতে পারতাম: পিতামহ (উত্তরাধিকার), কালালা (মৃত ব্যক্তির নিঃসন্তান ও নিকটাত্মীয়হীন হওয়া) এবং সূদের (রিবা-এর) কিছু দিক।"

আর তাঁর বাণী: {ওয়াল-মায়সির} অর্থাৎ জুয়া (আল-কিমার)। আর ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও অন্যান্যদের মতে, পাশা (নার্দ) হলো জুয়ার অন্তর্ভুক্ত। আর আলী ইবনে আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও অন্যান্যরা বলেছেন: "দাবা (শতরঞ্জ) হলো জুয়ার অন্তর্ভুক্ত।" এ কারণেই আবু হানীফা, মালিক ও আহমাদ (রাহিমাহুল্লাহ) দাবাকে হারাম করার মত পোষণ করেন। আর ইমাম শাফেঈ (রাহিমাহুল্লাহ) এটিকে মাকরূহ মনে করতেন।

ইবনে আব্দুল বার (রাহিমাহুল্লাহ) 'আত-তামহীদ' (১৩/১৭৫)-এ বলেছেন: "পাশা (নার্দ) খেলা সর্বাবস্থায় হারাম; এর কোনো সময় বা অবস্থার ব্যতিক্রম নেই। পাশা খেলা নামায থেকে গাফিল করে দিক বা না দিক, অথবা এ ধরনের কোনো কিছু থেকে মনোযোগ সরিয়ে দিক বা না দিক, (তা খেলাই নিষিদ্ধ)।" আর এ বিষয়টি সহীহ গ্রন্থে এসেছে।









আল-জামি` আল-কামিল (12040)


12040 - عن بريدة بن الحصيب أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من لعب بالنردشير فكأنما صبغ يده في لحم خنزير ودمه".

صحيح: رواه مسلم في الشعر (2260) عن زهير بن حرب، حدّثنا عبد الرحمن بن مهدي، عن سفيان، عن علقمة بن مرثد، عن سليمان بن بريدة، عن أبيه أنّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: فذكره.

وفي معناه أحاديث أخرى إِلَّا أنّها لا تصح.
قوله:"النردشير" النرد اسم أعجمي، شير معناه الحلو، والنرد شير لعبة حلوة ذات صندوق وحجارة وفصين، تعتمد على الحظ، وتُنَقّل فيه الحجارة على حسب ما يأتي به الفَصُّ (الزهر). وتعرف عند العامة بالطاولة. يقال: لعب بالنرد."المعجم الوسيط".

وقال ابن عبد البر:"والنرد قطع ملونة تكون من خشب البقس، ومن عظم الفيل، ومن غير ذلك. وهو الذي يعرف بالطبل، ويعرف بالكعاب، ويعرف أيضًا بالأرن، ويعرف أيضًا بالنردشير". اهـ. التمهيد (13/ 175)




বুরাইদাহ ইবনুল হুসাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি নর্দশির খেলল, সে যেন তার হাত শূকরের মাংস ও রক্তে রঞ্জিত করল।"









আল-জামি` আল-কামিল (12041)


12041 - عن أنس قال كنت ساقي القوم في منزل أبي طلحة، وكان خمرهم يومئذ الفضيخ، فأمر رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم مناديا ينادي:"ألا إن الخمر قد حرمت". قال: فقال لي أبو طلحة: اخرج فأهرقها. فخرجت فهرقتها فجرت في سكك المدينة. فقال بعض القوم: قد قتل قوم وهي في بطونهم فأنزل اللَّه {لَيْسَ عَلَى الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ جُنَاحٌ فِيمَا طَعِمُوا} الآية.

متفق عليه: رواه البخاريّ في المظالم (2464)، ومسلم في الأشربة (1980) كلاهما من طريق حماد بن زيد، حدّثنا ثابت، عن أنس، فذكره. واللفظ للبخاري.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (আনাস) বলেন, আমি আবু তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ঘরে লোকদের পান করানোর দায়িত্বে ছিলাম, আর সেই দিন তাদের মদ ছিল 'ফাদীখ' (খেজুরের রসের তৈরি এক প্রকার মদ)। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একজন ঘোষককে আদেশ করলেন যেন সে ঘোষণা করে: "সাবধান! নিশ্চয়ই মদ হারাম করা হয়েছে।" তিনি (আনাস) বলেন, তখন আবু তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে বললেন: তুমি বের হও এবং তা ঢেলে দাও। আমি বের হলাম এবং তা ঢেলে দিলাম। ফলে মদিনার পথে পথে তা প্রবাহিত হলো। তখন কিছু লোক বললো: কিছু মানুষ তো এমন অবস্থায় মারা গেছে যখন মদ তাদের পেটে ছিল (অর্থাৎ হারাম হওয়ার আগে পান করেছিল)। তখন আল্লাহ তা'আলা এই আয়াত নাযিল করলেন: "যারা ঈমান এনেছে এবং সৎকর্ম করেছে, তারা অতীতে যা ভক্ষণ করেছে তার জন্য তাদের কোনো পাপ হবে না..." (সূরা মায়েদা, আয়াত ৯৩)।









আল-জামি` আল-কামিল (12042)


12042 - عن عبد اللَّه بن مسعود قال:"لما نزلت هذه الآية: {لَيْسَ عَلَى الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ جُنَاحٌ فِيمَا طَعِمُوا إِذَا مَا اتَّقَوْا وَآمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ ثُمَّ اتَّقَوْا وَآمَنُوا ثُمَّ اتَّقَوْا وَأَحْسَنُوا وَاللَّهُ يُحِبُّ الْمُحْسِنِينَ} قال لي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"قيل لي: أنت منهم".

صحيح: رواه مسلم في فضائل الصحابة (2459) من طرق عن علي بن مسهر، عن الأعمش، عن إبراهيم، عن علقمة، عن عبد اللَّه فذكره.

ورواه الطبرانيّ في الكبير (10/ 77)، والحاكم (4/ 143 - 144) كلاهما من طريق سليمان بن قرم، عن الأعمش، عن إبراهيم، عن علقمة، عن ابن مسعود قال:"لما نزلت تحريم الخمر قالت اليهود:"أليس إخوانكم الذين ماتوا، كانوا يشربونها؟ فأنزل اللَّه عز وجل: {لَيْسَ عَلَى الَّذِينَ آمَنُوا}
قال لي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"فقيل لي: إنّك منهم".

وسليمان بن قرم مختلف فيه. وكان الإمام أحمد حسن الرأي فيه إلّا أنه كان يرى أنه مفرط في التشييع، وقد خالف في بعض السياق وأصله ثابت.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন এই আয়াতটি নাযিল হলো: "যারা ঈমান এনেছে এবং সৎকর্ম করেছে, তারা অতীতে যা খেয়েছে, সে বিষয়ে তাদের কোনো পাপ হবে না— যদি তারা তাকওয়া অবলম্বন করে, ঈমান আনে ও সৎকর্ম করে, অতঃপর তারা তাকওয়া অবলম্বন করে ও ঈমান আনে, অতঃপর তারা তাকওয়া অবলম্বন করে ও ইহসান করে। আর আল্লাহ্ ইহসানকারীদের ভালোবাসেন।" (সূরা মায়েদা ৫:৯৩), তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন: "আমাকে বলা হয়েছে: তুমি তাদের (ইহসানকারীদের) অন্তর্ভুক্ত।"









আল-জামি` আল-কামিল (12043)


12043 - عن ابن عباس قال: قالوا: يا رسول اللَّه! أرأيت الذين ماتوا وهم يشربون الخمر، لما نزل تحريم الخمر فنزلت: {لَيْسَ عَلَى الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ جُنَاحٌ فِيمَا طَعِمُوا إِذَا مَا اتَّقَوْا وَآمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ}.

حسن: رواه الترمذيّ (3052)، وأحمد (2088)، وابن جرير (8/ 665)، وصحّحه الحاكم (4/ 143) كلهم من حديث إسرائيل، عن سماك، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.

وإسناده حسن من أجل الكلام في سماك بن حرب؛ فإنه كان يضطرب في روايته، عن عكرمة وهنا لم يضطرب لموافقة غيره.

وقال الترمذيّ:"هذا حديث حسن صحيح".

وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد".




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তারা (সাহাবীগণ) বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! মদ্যপান নিষিদ্ধকরণের (আয়াত) যখন নাযিল হলো, তখন যারা মদ্যপানরত অবস্থায় মারা গেছে, তাদের ব্যাপারে আপনার অভিমত কী? অতঃপর (এই আয়াতটি) নাযিল হয়: {যারা ঈমান এনেছে এবং সৎকর্ম করেছে, তারা অতীতে যা ভক্ষণ করেছে, তার জন্য তাদের কোনো অপরাধ হবে না, যদি তারা মুত্তাকী হয়, ঈমান আনে এবং সৎকর্ম করে}।









আল-জামি` আল-কামিল (12044)


12044 - عن جابر قال: صبّح أناس غداة أحد الخمر، فقتلوا من يومهم جميعًا شهداء، وذلك قبل تحريمها.

صحيح: رواه البخاريّ في التفسير (4618) عن صدقة بن الفضل، أخبرنا ابن عيينة، عن عمرو، عن جابر فذكره.

ورواه البزار في مسنده عن أحمد بن عبدة، حدّثنا سفيان، عن عمرو بن دينار، سمع جابر بن عبد اللَّه يقول: اصطبح ناس الخمر من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، ثم قتلوا شهداء يوم أحد. فقالت اليهود: فقد مات بعض الذين قتلوا وهي في بطونهم، فأنزل اللَّه: {لَيْسَ عَلَى الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ جُنَاحٌ فِيمَا طَعِمُوا}.

قال البزار:"هذا إسناد صحيح".

وقال ابن كثير:"ولكن في سياقه غرابة".

قلت: لأنّ تحريم الخمر تأخر عن أحد.

وروي عن البراء قال: مات رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم قبل أن تُحرَّم الخمر، فلما حرمت الخمر قال رجال: كيف بأصحابنا وقد ماتوا يشربون الخمر؟ فنزلت: {لَيْسَ عَلَى الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ جُنَاحٌ فِيمَا طَعِمُوا إِذَا مَا اتَّقَوْا وَآمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ}.

رواه الترمذيّ (3050) من طريق إسرائيل، وفي (3051) عن طريق شعبة، كلاهما عن أبي إسحاق، عن البراء، فذكره.
وصحّحه من كلا الطريقين.

وكذا أخرجه ابن جرير (8/ 667)، وابن أبي حاتم (4/ 1201)، وصحّحه ابن حبان (5350، 5351) كلهم من طريق شعبة به.

ولكن رواه أبو يعلى (1719، 1720) بإسنادين صحيحين عن شعبة، وزاد في آخره: قال شعبة: قلت: أسمعته من البراء. قال: لا.

فتبيّن أن بين أبي إسحاق والبراء واسطة ولم تعرف.

وفيه دلالة على أن أبا إسحاق دلّس في هذا السند، هذا هو التدليس القادح.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কিছু লোক উহুদ যুদ্ধের দিন ভোরবেলা মদ পান করল। অতঃপর সেদিনই তারা সকলে শহীদ হিসেবে নিহত হন। আর এটা ছিল (মদ) হারাম হওয়ার আগের ঘটনা।









আল-জামি` আল-কামিল (12045)


12045 - عن جابر بن عبد اللَّه يقول: بعثنا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ثلاث مائة راكب، أميرنا أبو عبيدة ابن الجراح نرصد عير قريش. فأقمنا بالساحل نصف شهر، فأصابنا جوع شديد حتى أكلنا الخبط. فسمي ذلك الجيش جيش الخبط. فألقى لنا البحر دابة يقال لها العنبر، فأكلنا منه نصف شهر، وادهنا من ودكه حتى ثابت إلينا أجسامنا، فأخذ أبو عبيدة ضلعا من أضلاعه، فنصبه فعمد إلى أطول رجل معه.

قال سفيان مرة: ضلعا من أضلاعه فنصبه وأخذ رجلًا وبعيرا فمر تحته، قال جابر: وكان رجل من القوم نحر ثلاث جزائر، ثم نحر ثلاث جزائر، ثم نحر ثلاث جزائر، ثم إن أبا عبيدة نهاه.

متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (4361)، ومسلم في الصيد (1935: 18) كلاهما من حديث سفيان قال: الذي حفظنا من عمرو بن دينار قال: سمعت جابر بن عبد اللَّه فذكره واللفظ للبخاري.

وروي عن أبي بكر الصديق قال:"كل دابة في البحر قد ذبحها اللَّه فكلها".

ولذا أباح جمهور أهل العلم من الصحابة والتابعين ومن بعدهم الطافي من السمك. وكرهه أبو حنيفة وأصحابه.




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে ৩০০ জন আরোহীর একটি বাহিনীতে প্রেরণ করলেন। আমাদের সেনাপতি ছিলেন আবূ উবাইদাহ ইবনুল জাররাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। আমরা কুরাইশের বাণিজ্য কাফেলার খোঁজ করছিলাম। আমরা উপকূল অঞ্চলে অর্ধ মাস অবস্থান করলাম এবং মারাত্মক ক্ষুধার সম্মুখীন হলাম, এমনকি আমরা গাছের পাতা ('খাবত') পর্যন্ত খেতে শুরু করলাম। ফলে সেই সেনাবাহিনীকে ‘জাইশুল খাবত’ (পাতার সেনাবাহিনী) নামে আখ্যায়িত করা হয়েছিল। তখন সমুদ্র আমাদের জন্য 'আম্বার' নামক একটি প্রাণী (মাছ) নিক্ষেপ করল। আমরা তা থেকে অর্ধ মাস খেলাম এবং এর চর্বি (তেল) আমাদের শরীরে মাখলাম, যতক্ষণ না আমাদের শরীর আবার সতেজ হলো। আবূ উবাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেটির একটি পাঁজর নিলেন এবং তা দাঁড় করালেন, তারপর তিনি তার সঙ্গীদের মধ্যে সবচেয়ে লম্বা লোকটির দিকে অগ্রসর হলেন।

সুফিয়ান একবার বর্ণনা করেছেন: তিনি (আবূ উবাইদাহ) সেটির একটি পাঁজর দাঁড় করালেন এবং একজন লোক ও একটি উট নিয়ে এসে সেটির নিচ দিয়ে হেঁটে গেলেন (অর্থাৎ পাঁজরটি এত উঁচু ছিল)। জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: সেই দলের একজন লোক তিনটি উট যবেহ করল, তারপর আবার তিনটি উট যবেহ করল, তারপর আবার তিনটি উট যবেহ করল। এরপর আবূ উবাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে নিষেধ করলেন।

মুত্তাফাকুন আলাইহি। ইমাম বুখারী এটি ‘আল-মাগাযী’তে (৪৩৬১) এবং ইমাম মুসলিম এটি ‘আস্-সাইদ’ অধ্যায়ে (১৯৩৫: ১৮) বর্ণনা করেছেন। উভয়ই সুফিয়ানের সূত্রে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: যা আমরা আমর ইবনে দীনার থেকে মুখস্থ করেছি, তিনি বলেন: আমি জাবির ইবনে আবদুল্লাহকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তা বর্ণনা করতে শুনেছি। শব্দগুলো বুখারীর।

আর আবূ বকর আস-সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন: "সমুদ্রের প্রতিটি প্রাণীকেই আল্লাহ্‌ যবেহ করে দিয়েছেন, সুতরাং তোমরা তা খাও।"

এই কারণেই সাহাবী, তাবেয়ী ও পরবর্তী যুগের অধিকাংশ আলেম ভাসমান মাছ (মৃত অবস্থায় ভেসে ওঠা মাছ) খাওয়া বৈধ বলেছেন। তবে আবূ হানীফা ও তাঁর সঙ্গীরা একে মাকরূহ (অপছন্দনীয়) মনে করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (12046)


12046 - عن عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ أَنَّ النَّاسَ سَأَلُوا نَبِيَّ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم حَتَّى أَحْفَوْهُ بِالْمَسْأَلَةِ، فَخَرَجَ ذَاتَ يَوْمٍ، فَصَعِدَ الْمِنْبَرَ، فَقَالَ:"سَلُونِي لَا تَسْأَلُونِي عَنْ شَيْءٍ إِلَّا بَيَّنْتُهُ لَكُمْ". فَلَمَّا سَمِعَ ذَلِك الْقَوْمُ أَرَمُّوا وَرَهِبُوا أَنْ يَكُونَ بَيْنَ يَدَيْ أَمْرٍ قَدْ حَضَرَ. قَالَ أَنَسٌ: فَجَعَلْتُ أَلْتَفِتُ يَمِينًا وَشِمَالًا، فَإِذَا كُلُّ رَجُلٍ لَافٌّ رَأْسَهُ فِى ثَوْبِهِ يَبْكِي، فَأَنْشَأَ رَجُلٌ مِنَ الْمَسْجِدِ، كَانَ يُلَاحَى، فَيُدْعَى لِغَيْرِ أَبِيهِ. فَقَالَ: يَا نَبِيَّ اللَّهِ مَنْ أَبِي؟ قَالَ:"أَبُوكَ حُذَافَةُ". ثُمَّ أَنْشَأَ عُمَرُ بْنُ الْخَطَّابِ. فَقَالَ: رَضِينَا بِاللَّهِ رَبًّا وَبِالإِسْلَامِ دِينًا وَبِمُحَمَّدٍ
رَسُولًا، عَائِذًا بِاللَّهِ مِنْ سُوءِ الْفِتَنِ. فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم:"لَمْ أَرَ كَالْيَوْمِ قَطُّ فِي الْخَيْرِ وَالشَّرِّ. إِنِّي صُوِّرَتْ لِيَ الْجَنَّةُ وَالنَّارُ، فَرَأَيْتُهُمَا دُونَ هَذَا الْحَائِطِ".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الدعوات (6362)، ومسلم في الفضائل (2359: 137) كلاهما من حديث هشام بن عروة، عن قتادة عن أنس فذكره. واللفظ لمسلم، ولفظ البخاريّ نحوه. وقال:"كان قتادة يذكر عند هذا الحديث هذه الآية: {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَسْأَلُوا عَنْ أَشْيَاءَ إِنْ تُبْدَ لَكُمْ تَسُؤْكُمْ}.

قوله:"احفوه بالمسألة" أي أكثروا في الإلحاح والمبالغة فيه. يقال: أحفى وألحف وألحّ بمعنى.

وقوله:"أرمّوا" أي سكتوا. وأصله من المرفة، وهي الشفة أي ضموا شفاهم بعضها على بعض، فلم يتكلموا.

وقوله:"يلاحى" الملاحة المخامصة والسباب.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, লোকেরা আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে অতিরিক্ত প্রশ্ন করতে শুরু করল, এমনকি তারা প্রশ্ন করে তাঁকে অতিষ্ঠ করে তুলল। একদিন তিনি বের হয়ে মিম্বরে আরোহণ করলেন এবং বললেন: "তোমরা আমাকে প্রশ্ন করো। তোমরা আমাকে এমন কোনো বিষয় সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করবে না, যার উত্তর আমি তোমাদের জন্য স্পষ্ট করে দেব না।" লোকেরা যখন এ কথা শুনল, তারা নীরব হয়ে গেল এবং তারা ভয় পেল যে হয়তো কোনো আসন্ন কঠিন পরিস্থিতির সম্মুখীন হতে হচ্ছে। আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি ডানে ও বামে তাকাতে লাগলাম, আর দেখলাম যে প্রত্যেক ব্যক্তিই তার মাথা কাপড়ের মধ্যে ঢুকিয়ে কাঁদছে। অতঃপর মসজিদের ভেতর থেকে এক ব্যক্তি উঠে দাঁড়াল, যার সাথে ঝগড়া হতো (বা যাকে কটূক্তি করা হতো) এবং তাকে তার বাবার বদলে অন্য নামে ডাকা হতো। সে বলল, হে আল্লাহর নবী! আমার পিতা কে? তিনি বললেন: "তোমার পিতা হুযাফা।" এরপর উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উঠে দাঁড়ালেন এবং বললেন: আমরা আল্লাহকে রব হিসেবে, ইসলামকে দীন হিসেবে এবং মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে রাসূল হিসেবে পেয়ে সন্তুষ্ট। আমরা খারাপ ফিতনা থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাই। তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আজকের দিনের মতো কল্যাণ ও অকল্যাণ আমি আর কখনও দেখিনি। আমার সামনে জান্নাত ও জাহান্নামকে তুলে ধরা হয়েছিল, অতঃপর আমি এই দেয়ালের আড়ালে সে দুটিকে দেখলাম।"









আল-জামি` আল-কামিল (12047)


12047 - عن عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ قَالَ: بَلَغَ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَنْ أَصْحَابِهِ شَيْءٌ، فَخَطَبَ، فَقَالَ:"عُرِضَتْ عَلَيَّ الْجَنَّةُ وَالنَّارُ، فَلَمْ أَرَ كَالْيَوْم فِي الْخَيْرِ وَالشَّرِّ، وَلَوْ تَعْلَمُونَ مَا أَعْلَمُ، لَضَحِكْتُمْ قَلِيلًا وَلَبَكَيْتُمْ كَثِيرًا". قَالَ: فَمَا أَتَى عَلَى أَصْحَابِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَوْمٌ أَشَدُّ مِنْهُ. قَالَ: غَطَّوْا رُءُوسَهُمْ وَلَهُمْ خَنِينٌ. قَالَ: فَقَامَ عُمَرُ، فَقَالَ: رَضِينَا بِاللَّهِ رَبًّا وَبِالإِسْلَامِ دِينًا وَبِمُحَمَّدٍ نَبِيًّا. قَالَ: فَقَامَ ذَاكَ الرَّجُلُ، فَقَالَ: مَنْ أَبِي؟ قَالَ:"أَبُوكَ فُلَانٌ". فَنَزَلَتْ {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَسْأَلُوا عَنْ أَشْيَاءَ إِنْ تُبْدَ لَكُمْ تَسُؤْكُمْ}.

متفق عليه: رواه البخاريّ في التفسير (4621)، ومسلم في الفضائل (2359: 134) كلاهما من طريق شعبة، عن موسى بن أنس، عن أنس، قال: فذكره. واللفظ لمسلم ولفظ البخاريّ مختصر.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট তাঁর সাহাবীদের সম্পর্কে কিছু খবর পৌঁছাল। অতঃপর তিনি ভাষণ দিলেন এবং বললেন: "আমার সামনে জান্নাত ও জাহান্নাম পেশ করা হয়েছে। কল্যাণ ও অকল্যাণের ক্ষেত্রে আজকের দিনের মতো (ভয়ঙ্কর দৃশ্য) আমি আর দেখিনি। আমি যা জানি, তা যদি তোমরা জানতে, তাহলে তোমরা কম হাসতে এবং বেশি কাঁদতে।"

তিনি (আনাস) বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীদের ওপর এর চেয়ে কঠিন দিন আর আসেনি। তিনি বলেন, (শোকে) তাঁরা নিজেদের মাথা ঢেকে নিলেন এবং তাঁদের কান্নার শব্দ শোনা যাচ্ছিল।

তিনি বলেন, এরপর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দাঁড়িয়ে গেলেন এবং বললেন: আমরা আল্লাহকে প্রতিপালক হিসেবে, ইসলামকে দীন (জীবনব্যবস্থা) হিসেবে এবং মুহাম্মাদকে নবী হিসেবে সন্তুষ্টচিত্তে গ্রহণ করলাম।

তিনি (আনাস) বলেন, এরপর সেই লোকটি দাঁড়িয়ে বলল: আমার পিতা কে? তিনি বললেন: "তোমার পিতা অমুক।"

অতঃপর এই আয়াতটি অবতীর্ণ হলো: "হে মুমিনগণ! এমন সব বিষয়ে প্রশ্ন করো না যা প্রকাশিত হলে তোমাদের খারাপ লাগবে।"