আল-জামি` আল-কামিল
1328 - عن أبي موسى قال: كنت عند النبي صلى الله عليه وسلم، وهو نازل بالجعرانة بين مكة والمدينة، ومعه بلال، فأتى النبيَّ صلى الله عليه وسلم أعرابيَّ فقال: ألا تُنجز لي ما وعدتني، فقال له:"أبشر"، فقال: قد أكثرت عليّ من"أبشر"، فأقبل على أبي موسى وبلالٍ كهيئة الغضبان، فقال:"ردَّ البشري فاقبلا أنتما"، قالا: قبلنا، ثم دعا بقَدَحٍ فيه ماء، فغسل يديه ووجهه فيه، ومجَّ فيه، ثم قال:"اشربا منه، وأفرِغا على وجوهكما
ونحوركما وأبشرا"، فأخذا القدح، ففعلا، فنادت أم سلمة من وراء الستر: أن أفضلا لأمكما، فأفضلا لها منه طائفة.
متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (4328) وأخرجه في الوضوء (196) مختصرا، ومسلم في الفضائل (2497)، كلاهما من طريق أبي أسامة، عن يزيد بن عبد الله بن أبي بُردة، عن جدِّه أبي بردة، عن أبي موسى .. فذكره، واللفظ للبخاري، ولفظ مسلم نحوه.
আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ছিলাম। তখন তিনি মক্কা ও মদীনার মধ্যবর্তী স্থানে অবস্থিত জি‘ররানা নামক স্থানে অবস্থান করছিলেন। তাঁর সাথে বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও ছিলেন। অতঃপর এক বেদুঈন এসে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলল, আপনি আমার সাথে যে অঙ্গীকার করেছিলেন, তা কি পূর্ণ করবেন না? তিনি তাকে বললেন, “সুসংবাদ গ্রহণ করো।” সে বলল, আপনি আমার ওপর ‘সুসংবাদ গ্রহণ করো’ কথাটি অনেক বেশি প্রয়োগ করেছেন। তখন তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবূ মূসা ও বিলালের দিকে কিছুটা রাগান্বিতের মতো হয়ে মুখ ফিরালেন এবং বললেন, “তোমরা দুজন সুসংবাদটি ফিরিয়ে দাও এবং তোমরা দুজন তা গ্রহণ করো।” তাঁরা দু’জন বললেন, ‘আমরা তা গ্রহণ করলাম।’ অতঃপর তিনি এমন একটি পাত্র চাইলেন, যাতে পানি ছিল। তিনি তাতে তাঁর দু’হাত ও মুখমণ্ডল ধৌত করলেন এবং (মুখের পানি) তাতে কুলি করে দিলেন। এরপর তিনি বললেন, “তোমরা তা থেকে পান করো এবং তোমাদের চেহারা ও বক্ষদেশে ঢেলে নাও। আর সুসংবাদ গ্রহণ করো।” অতঃপর তাঁরা পাত্রটি নিলেন এবং তা-ই করলেন। তখন উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পর্দার আড়াল থেকে আওয়াজ দিয়ে বললেন, তোমাদের মায়ের জন্যও কিছুটা অবশিষ্ট রাখো। তখন তাঁরা তাঁর জন্য সেই পানি থেকে কিছুটা অবশিষ্ট রাখলেন।
1329 - عن جابر بن عبد الله قال: مرِضتُ مَرَضًا، فأتاني النبي صلى الله عليه وسلم يعُودني وأبو بكر، وهما ماشيان، فوجداني أُغمِي عَليَّ. فتوضأ النبي صلى الله عليه وسلم، ثم صبَّ وَضوءَه عليَّ.
متفق عليه: أخرجه البخاري في المرضى (5651) ومسلم في الفرائض (1616)، كلاهما من طريق سفيان، عن ابن المنكدر، سمع جابر بن عبد الله فذكر الحديث.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি একবার অসুস্থ হয়ে পড়লাম। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হেঁটে হেঁটে আমাকে দেখতে এলেন। তাঁরা আমাকে বেহুশ অবস্থায় পেলেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উযূ করলেন, অতঃপর তাঁর উযূর পানি আমার উপর ঢেলে দিলেন।
1330 - عن أبي حية قال: رأيتُ عليًّا توضأ ثلاثًا، ثم قام فشَرِب فضلَ وضوئه وقال: صنع رسولُ الله صلى الله عليه وسلم كما صنعتُ.
حسنٌ: رواه النسائي (136) من طريق شعبة، عن أبي إسحاق، عن أبي حية فذكر مثله. ورواه الترمذي (48) من طريق أبي الأحوص عن أبي إسحاق به.
وإسناده حسن، لأجل أبي حيَّة؛ فإنَّه"مقبول" كما في التقريب، إلَّا أنَّه قد توبع كما سيأتي في حديث عبد خير في باب صفة وضوء النبيِّ صلى الله عليه وسلم.
وسيتكرر هذا الحديث كاملًا في باب صفة وضوء النبي صلى الله عليه وسلم.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি (আলী) তিনবার করে ওযু করলেন। অতঃপর তিনি দাঁড়ালেন এবং তাঁর ওযুর অবশিষ্ট পানি পান করলেন। তিনি বললেন: আমি যেমনটি করলাম, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)ও ঠিক তেমনি করেছিলেন।
1331 - عن حميد الحميري قال: لقيت رجلا صحب النبي صلى الله عليه وسلم أربع سنين، كما صحبه أبو هريرة، قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن تغتسل المرأةُ بفضل الرجل، أو يغتسل الرجل بفضل المرأة.
صحيح: رواه أبو داود (81) والنسائي (238) كلاهما من طريق أبي عوانة، عن داود الأوْدي، عن حُميد بن عبد الرحمن قال، فذكر الحديث.
وإسناده صحيح، وداود بن عبد الله الأودي وإن لم يحتج به الشيخان لكنه ثقة؛ وثَّقه ابن معين وأحمد بن حنبل والنسائي.
إلا أن البيهقي قال: وهذا الحديث رواته ثقات إلا أن حُميدًا لم يُسمَّ الصحابي الذي حدَّثه، فهو بمعنى المرسل، إلا أنه مرسل جيد، لولا مخالفته الأحاديث الثابتة الموصولة قبله، وداود بن عبد الله الأودى لم يحتج به الشيخان البخاري ومسلم"."السنن الكبرى للبيهقي: 1/ 190.
وتعقبه الحافظ في"الفتح" (1/ 300) بعد أن قال: رجاله ثقات، ولم أقف لمن أعله على حجة
قوية، ودعوى البيهقي أنه في معنى المرسل مردودة، لأن إبهام الصحابي لا يضر، وقد صرَّح التابعي بأنه لقيه. ودعوى ابن حزم أن داود راويه عن حُميد بن عبد الرحمن هو: ابن يزيد الأودى. وهو ضعيف مردود. فإنه ابن عبد الله الأودى وهو ثقة. وقد صرّح أبو داود وغيره باسم أبيه. انتهى.
হুমাইদ আল-হিমইয়ারী থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন, আমি এমন একজন লোকের সাথে সাক্ষাৎ করেছিলাম, যিনি আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মতো চার বছর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহচর্য লাভ করেছিলেন। তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই মর্মে নিষেধ করেছেন যে, কোনো নারী যেন পুরুষের অবশিষ্ট পানি দ্বারা গোসল না করে, অথবা কোনো পুরুষ যেন নারীর অবশিষ্ট পানি দ্বারা গোসল না করে।
1332 - عن الحكم بن عمرو - وهو الأقرع - أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى أن يتوضأ الرجل بفضل طهور المرأة.
حسن: رواه أبو داود (82) والترمذي (64) والنسائي (343) وابن ماجه (373) كلهم من طريق أبي داود الطيالسي، عن شعبة، عن عاصم قال: سمعت أبا حاجب يحدث عن الحكم بن عمرو، فذكر مثله.
وزاد الترمذي: أو قال: بسؤرها. وقال الترمذي:"حديث حسن".
قلت: وإسناده حسن؛ لأن عاصم بن سليمان الأحول أبا عبد الرحمن البصري تكلم فيه القطان، ووثقه علي بن المديني وغيره، وقال أحمد: شيخ ثقة.
وفي رواية النسائي:"وليغترفا جميعًا".
والنهي محمول على التنزيه، وسيأتي معارض هذا الحديث. وهو أقوى.
وذهب البغوي إلى أنه منسوخ"شرح السنة" (1/ 28) وكذا قال البيهقي في"المعرفة" (1/ 497) انظر للمزيد:"المنة الكبرى"
হাকাম ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিষেধ করেছেন যে, কোনো পুরুষ যেন নারীর পবিত্রতা অর্জনের অবশিষ্ট পানি দ্বারা ওযু না করে।
1333 - عن عائشة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يَغْتَسِلُ من إناء - هو الفَرَقُ - من الجنابة.
وفي رواية قالت: كنت أغتسل أنا والنبي صلى الله عليه وسلم من إناء واحد من قدح، يقال له الفَرَقُ.
متفق عليه: الرواية الأولي رواها مالك في الطهارة (68) وعنه مسلم في الحيض (319) وسيأتي ذكرها في باب: القدر المستحب من الماء للغُسْل والوُضوء. والرواية الثانية أخرجها البخاري في الغسل (250) ومسلم في الحيض (319) كلاهما من طريق الزهري، عن عروة، عن عائشة، فذكرت الحديث. ثم روى مسلم من طرق أخرى عن عائشة ومنها قولها:"تختلف أيدينا فيه من الجنابة". ومنها قولها:"كنت أغتسلُ أنا ورسولُ الله صلى الله عليه وسلم من إناء - بيني وبينه - واحدٍ، فيُبادرني، حتى أقولَ: دع لي، دع لي، قالت: وهما جُنبان". وفي رواية عنده (320) عن أبي سلمة بن عبد الرحمن قال: دخلت على عائشة أنا وأخوها من الرضاعة، فسألَها عن غُسْل النبي صلى الله عليه وسلم من الجنابة؟ فدعتُ بإناءٍ قدرَ الصاعِ، فاغتسلتْ، وبيننا وبينها سِتر، وأفْرَغَتْ على رأسها ثلاثًا، قال: وكان أزواج النبي صلى الله عليه وسلم يأخذنَ من رؤوسِهن حتى تكون كالوفْرةِ"، وذكره أيضًا البخاري مختصرا (351). وفي رواية عنده (299):"كنت أغتسل أنا والنبي صلى الله عليه وسلم من إناء واحد، وكانا جنب".
والفَرَقُ - بفتح الراء وسكونها -: قدح بسعُ ستةَ عشر رطلا. وقال سفيان: والفَرَق ثلاثةُ آصع.
وقوله:"يأخذنَ من رؤوسهن حتى تكونَ كالوفرة" أي: يأخذنَ من شَعرِ رؤوسِهن ويُخففنَ من شعورهن حتى تكون كالوفرة، وهي من الشَّعر ما كان إلى الأذنين ولا يجاوزهما.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জানাবাতের (নাপাকি) কারণে একটি পাত্র দ্বারা গোসল করতেন—যা ছিল ‘ফারাক’ পরিমাণ।
অন্য এক বর্ণনায় তিনি বলেন: আমি এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জানাবাতের কারণে একটি পাত্র থেকে গোসল করতাম, যে পাত্রটিকে ‘ফারাক’ বলা হতো।
তাঁর থেকে অন্য বর্ণনায় আছে, তিনি বলেছেন: আমি ও রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি মাত্র পাত্র থেকে গোসল করতাম, [যেটি] আমার ও তাঁর মাঝে থাকত। তিনি আমার চেয়ে আগে বাড়িয়ে নিতেন, ফলে আমি বলতাম: আমাকেও দিন, আমাকেও দিন। তিনি বলেন: তখন তারা উভয়েই নাপাক (জুনুবী) ছিলেন। অন্য এক বর্ণনায় আছে: "জানাবাতের কারণে আমাদের হাত তাতে (ঐ পাত্রে) আসা-যাওয়া করত।"
(উল্লেখ্য, ‘ফারাক’ হলো তিন সা' পরিমাণ। আর সাহাবীগণ মাথা থেকে চুল ছেঁটে ফেলতেন যেন তা ‘ওয়াফরা’ (কানের লতি পর্যন্ত) হয়।)
1334 - عن أنس قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم، والمرأة من نسائه يُغْتَسِلانِ من إناءٍ واحدٍ. وزاد مسلم (أي ابن إبراهيم) ووهب، عن شعبة: من الجنابة.
صحيح: رواه البخاري في الغسل (264)، عن أبي الوليد (هو ابن جرير بن حازم)، قال: حدَّثنا شعبة، عن عبد الله بن عبد الله بن جبرٍ، قال: سمعت أنس بن مالكٍ يقول فذكر الحديث.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তাঁর স্ত্রীদের মধ্য থেকে একজন একই পাত্রের পানি দ্বারা জানাবাত (বড় নাপাকী) থেকে গোসল করতেন।
1335 - عن زينبَ بنت أم سلمة قالت: إن أمها أم سلمة حدَّثَهْا قالت: كانتْ هي ورسولُ الله صلى الله عليه وسلم يَغْتَسِلان في الإناء الواحدِ من الجنابة.
متفق عليه: أخرجه البخاري في الحيض (322)، ومسلم في الحيض (324)، كلاهما من طريق أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن زينب ابنة أبي سلمة، عن أمها فذكرت الحديث. وفيه قصَّة، انظر كتاب الحيض، باب الاضطجاع مع الحائض في لحافٍ واحدٍ.
উম্মু সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর কন্যা যাইনাব বিনত উম্মু সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন যে, তাঁর মা উম্মু সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বর্ণনা করেছেন: তিনি এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জানাবাত (বড় নাপাকি) থেকে একই পাত্রের পানি দিয়ে গোসল করতেন।
1336 - عن ابن عباس قال: أخبرتني ميمونة: أنها كانت تغتسل هي والنبيُّ صلى الله عليه وسلم في إناء واحد.
متفق عليه: رواه مسلم في الحيض (322) عن عمرو بن دينار، عن أبي الشعثاء، عن ابن عباس، فذكر مثله. وفي رواية عنده عن عمرو بن دينار، قال: أكبر علمي، والذي يخطر على بالي أن أبا الشعثاء أخبرني، أن ابن عباس أخبره أن رسولَ الله صلى الله عليه وسلم كان يغتسل بفَضْلِ ميمونة (323).
فجعل الحديث من مسند ابن عباس. ورواه البخاري في الغُسْل (253) عن ابن عباس أن النبي صلى الله عليه وسلم وميمونة كانا يغتسلان من إناء واحد؛ فجعل الحديث من مسند ابن عباس، هكذا رواه البخاري عن شيخه أبي نعيم قال: حدثنا ابن عيينة، عن عمرو بن دينار، عن جابر بن زيد، عن ابن عباس. ثم قال البخاري: كان ابن عيينة يقول أخيرًا:"عن ابن عباس عن ميمونة". والصحيح ما روى أبو نعيم.
وهذا يدل على تردّد ابن عيينة في كون الحديث من مسند ابن عباس، أم من مسند ميمونة، والنتيجة واحدة؛ فإن ابن عباس لا يطلع على النبي صلى الله عليه وسلم في حالة اغتساله مع ميمونة، فيدل على أنه أخذه عنها.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, মায়মূনাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে জানিয়েছেন যে, তিনি এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একই পাত্র থেকে (পানি নিয়ে) গোসল করতেন।
1337 - عن عبد الله بن عمر أنه كان يقول: كان الرجال والنساء يتوضَّؤُون في زمان النبي صلى الله عليه وسلم جميعًا.
صحيح: رواه مالك في الطهارة (15) عن نافع، عن عبد الله بن عمر فذكر مثله، وعنه البخاري في الوضوء (193).
وزاد أبو داود (79، 80):"من إناء واحد". وفي رواية:"نُدلي فيه أيدينا".
والصحابي إذا أضاف الفعل إلى زمن رسولِ الله صلى الله عليه وسلم يكون حكمهُ الرفع على القول الصحيح، وهو اختبار البخاري؛ ولذا أَخْرج هذا الحديثَ في صحيحه.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলতেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে পুরুষ ও নারীগণ একসাথে ওযু করতেন।
1338 - عن أم صُبَيَّة الجهنية قالت: اختلفت يدي ويد رسول الله صلى الله عليه وسلم في إناء واحد.
حسن: رواه الإمام أحمد (27067) عن عبد الرحمن بن مهدي، قال: حدَّثني خارجة بن الحارث، قال: حدَّثني سالم بن سَرْج، قال: سمعت أم صُبَيَّة الجُهنية .. فذكرت مثله. وإسناده حسن لأجل خارجة بن الحارث، وهو: ابن رافع بن مَكِيث الجُهَني، فإنَّه صدوق.
وهذا أصحُّ ما رُوِي به هذا الحديث. وأمَّا ما رواه أبو داود (78)، وابن ماجه (382) من طريق أسامة بن زيد، عن سالم أبي النعمان - هو ابن سرج، عن أمَّ صُبَيَّة .. فذكرت الحديث، ففيه أسامة ابن زيد، وهو الليثي، قال فيه النسائي: ليس بالقوي. إلَّا أنَّه توبع، وفي"التقريب":"صدوق بهم، غير أنَّه لم يهم في هذا الحديث؛ لمتابعة خارجة بن الحارث له.
وسالم بن سَرْج هو: أبو النعمان المدني، يقال له: ابن خَرَّبوذ - بفتح المعجمة، ثمَّ راء ثقيلة -، وهو مولي أمُّ صُبَيَّة.
وأمُّ صُبَيَّة هي: خولة بنت قيس، جدة خارجة بن الحارث، هكذا قال البخاري في الأدب المفرد (1054)، وأخرج الحديث عن إسماعيل بن أبي أويس، قال: حدثني خارجة بن الحارث، غير أنَّه لم يذكر فيه:"الوضوء" وإنما اكتفى بقوله:"اختلفت يدي ويد رسول الله صلى الله عليه وسلم في إناء واحد".
وبوَّب عليه: باب أكل الرجل مع امرأته. وأخرج فيه هذا الحديث، وحديث عائشة، قالت: كنت آكل مع النبي صلى الله عليه وسلم حيًا، فمرَّ عمر، فدعاه فأكل. فأصابت يده إصْبَعي فقال:"حَسَّن! لو أُطاعُ فيكُنَّ ما رأتكنَّ عينٌ. فنزل الحجاب" وكذلك وضوء النبي صلى الله عليه وسلم مع أم صبية كان قبل نزول الحجاب، والله أعلم.
وسيأتي هذا الحديث في كتاب الأدب.
تنبيهٌ هامٌّ: تحرَّفت أمُّ صُبَيَّة إلى"أمَّ حبيبة" في الأدب المفرد.
উম্মে সুবাইয়া আল-জুহানিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার হাত এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হাত একই পাত্রের মধ্যে পরস্পর মিলিত হয়েছিল।
1339 - عن أنس قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم إذا دخل الخلاء قال:"اللهم إني أعوذ بك من الخُبُث والخبائث".
متفق عليه: رواه البخاري في الوضوء (142) عن آدم قال: حدثنا شعبة، عن عبد العزيز بن صهيب قال: سمعت أنسا يقول .. فذكره.
قال البخاري: تابعه أبن عروة عن شعبة.
وقال غندر عن شعبة:"إذا أتى الخلاء".
وقال موسى عن حماد:"إذا دخل الخلاء".
وقال سعيد بن زيد: حدثنا عبد العزيز"إذا أراد أن يدخل" انتهى.
ورواه أيضًا مسلم في الحيض (375) من حديث حماد عن عبد العزيز بن صهيب مثله. ورواه أيضًا من حديث هشيم عن عبد العزيز، ولفظه:"إذا دخل الكنيف".
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন শৌচাগারে প্রবেশ করতেন, তখন তিনি বলতেন: "اللهم إني أعوذ بك من الخُبُث والخبائث" (অর্থাৎ, হে আল্লাহ! আমি আপনার কাছে পুরুষ শয়তান ও নারী শয়তান থেকে আশ্রয় চাই)।
1340 - عن زيد بن أرقم، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إن هذه الحُشوش مُحْتَضَرة، فإذا أتى أحدُكم الخلاءَ فليقل: أعوذ بالله من الخُبُث والخبائث".
صحيح: رواه أبو داود (6) وابن ماجه (296) كلاهما من طريق شعبة، عن قتادة، عن النضر بن أنس، عن يزيد بن أرقم، فذكر مثله. وصحَّحه ابن خزيمة (69) وابن حبان (1408)، والحاكم (1/ 187) كلُّهم من هذا الوجه.
ورواه أيضًا ابن ماجه من وجه آخر، من حديث سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن القاسم بن عوف الشيباني، عن زيد بن أرقم، فذكر الحديث.
وإسناده صحيح، وقتادة رواه من وجهن، وكلاهما صحيح.
وإلى هذا أشار البخاري بقوله:"يحتمل أن يكون قتادة روى عنهما جميعًا" نقله الترمذي عنه في جامعه (1/ 11).
وأما قول الترمذي:"حديث زيد بن أرقم في إسناده اضطراب، روى هشام الدستوائي وسعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، فقال سعيد: عن القاسم بن عوف الشيباني، عن زيد بن أرقم، وقال هشام: عن قتادة، عن زيد بن أرقم، ورواه شعبة ومعمر، عن قتادة، عن النضر بن أنس، فقال شعبة: عن زيد بن أرقم، وقال معمر: عن النضر بن أنس، عن أبيه، عن النبي صلى الله عليه وسلم، ثم ذكر قول البخاري".
قلت: ما ذكره الترمذي بقوله:"في إسناده اضطراب" ليس بصحيح؛ لاحتمال ما ذكره البخاري؛ فإن الاضطراب هو ما لا يمكن فيه الجمع بين الروايات المختلفة، فإذا أمكن الجمع انتفى الاضطراب.
وأما رواية معمر - وهو ابن راشد - فهي وهم، كما ذكره البيهقي في سننه (1/ 96) عن أحمد؛ فهي لا تستحق أن تعارض الروايات الصحيحة.
والحشوش: الكنف، وأصل الحش: جماعة النخل الكثيفة، وكانوا يقضون حوائجهم إليها قبل أن يتخذوا الكُنُف في البيوت.
وفيه لغتان: (حَشٌّ) و (حُشٌّ).
ومعنى (محتضرة) أي: تحضرها الشياطين. أفاده الخطابي.
أصحّ ما في الباب هذان الحديثان فقط.
وأما ما رُوي عن علي بن أبي طالب:"ستر ما بين أعين الجن وعورات بني آدم إذا دخل أحدهم
الخلاء أن يقول: بسم الله" رواه الترمذي (606) وابن ماجه (297)، كلاهما عن محمد بن حميد، قال: حدثنا الحكم بن بشير بن سلمان، قال: حدَّثنا خلَّاد الصفَّار، عن الحكم النصري، عن أبي إسحاق، عن أبي جُحيفة، عن علي بن أبي طالب .. فذكره. فهو ضعيف؛ فإن فيه محمد بن حميد الرازي ضعيف، والحكم بن عبد الله النصري مجهول، وأبو إسحاق مدلس ومختلط؛ ولذا قال الترمذي: إسناده ليس بذاك القوي، وقال: وروي عن أنس عن النبي صلى الله عليه وسلم أشياء في هذا.
قلت: أخرجه ابن عدي وابن السني وغيرهما، وفيه رجال ضعفاء.
وفي الباب أيضًا عن ابن مسعود وأبي سعيد، ولكن كلها ضعيفة.
যায়েদ ইবনে আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই এই পায়খানা বা শৌচাগারগুলো (শয়তানদের) উপস্থিতির জায়গা। তাই যখন তোমাদের কেউ শৌচাগারে যায়, তখন সে যেন বলে: 'আমি আল্লাহর কাছে খবীস জিন ও খবীসা জিনীদের অনিষ্ট থেকে আশ্রয় চাই' (আউযু বিল্লাহি মিনাল খুবুছি ওয়াল খাবা-ইছ)।"
1341 - عن عائشة قالت: إن النبي صلى الله عليه وسلم كان إذا خرج من الغائط قال:"غفرانك".
حسن: رواه أبو داود (30) والترمذي (7) وابن ماجه (300) كلهم من طريق إسرائيل بن يونس، عن يوسف بن أبي بردة، عن أبيه، عن عائشة.
قال الترمذي:"حسن غريب، لا نعرفه إلا من حديث إسرائيل عن يوسف بن أبي بردة". وقال أيضًا:"ولا نعرف في هذا الباب إلا حديث عائشة عن النبي صلى الله عليه وسلم".
وإسناده حسن من أجل يوسف بن أبي بردة، ليس بذاك المشهور ولم يعرف فيه جرح وقد وثّقه العجلي وابن حبان.
وصحّح حديثه النّووي في الأذكار، والحافظ في نتائج الأفكار (1/ 214).
ووثقه أيضًا الذّهبي في الكاشف، فهو في أقل أحواله لا ينزل عن درجة"صدوق" وإن قال الحافظ ابن حجر في التقريب:"مقبول".
وقد صحّحه أيضًا ابن خزيمة (90)، وابن حبان (1444)، والحاكم (1/ 158)، كلّهم من هذا الوجه. قال الحاكم:"هذا حديث صحيح، فإنَّ يوسف بن أبي بردة من ثقات آل أبي موسى، ولم نجد أحدًا يطعن فيه، وقد ذكر سماع أبيه من عائشة رضي الله عنها ..
وأما قول الترمذي: إنه غريب؛ فلأجل انفراد إسرائيل به، وإسرائيل ثقة.
وقوله"غفرانك" أي: أسألك غفرانك.
قال الخطابي:"وقيل في تأويل ذلك وفي تعقيبه الخروج من الخلاء بهذا الدعاء قولان: أحدهما: أنه استغفر من تركهـ ذكر الله تعالى مدة لبثه على الخلاء، وكان لا يهجر ذكر الله إلا عند الحاجة، فكأنه رأى هجران الذكر في تلك الحالة تقصيرًا، وعدّه على نفسه ذنبًا، فتداركهـ بالاستغفار.
وقيل: معناه التوبة من تقصيره في شكر النعمة التي أنعم الله تعالى بها عليه، فأطعمه ثم هضمه، ثم سهل خروج الأذى منه، فرأى شكره قاصرا عن بلوغ حق هذه النعم، ففزع إلى الاستغفار منه" انتهى.
ولم يثبت في هذا الباب إلا حديث عائشة.
قال أبو حاتم الرازي: أصحّ ما في الباب حديث عائشة.
قلت: وهو كما قال، وأما حديث مالك بن أنس عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه إذا خرج من الخلاء قال:"الحمد لله الذي أذهب عنّي الأذى وعافاني" رواه ابن ماجه (301) من طريق إسماعيل بن مسلم، عن الحسن وقتادة، عن أنس.
فقد قال البوصيري في الزوائد: إسماعيل بن مسلم متفق على تضعيفه، والحديث بهذا اللفظ غير ثابت. انتهى.
قلت: إسماعيل بن مسلم هو: المكي أبو إسحاق، كان من البصرة، ثم سكن مكة، قال ابن معين: ليس بشيء، وقال أبو حاتم وأبو زرعة: ضعيف الحديث، وقال النسائي: متروك.
وفي الباب أيضًا حديث أبي ذر، أخرجه ابن السني (21)، وفيه من لا يعرف، وحديث عبد الله بن عمر قال المنذري في مختصر سنن أبي داود: هذه الأحاديث أسانيدها ضعيفة، ولهذا قال أبو حاتم الرازي: أصح ما فيه حديث عائشة. انتهى
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন শৌচাগার থেকে বের হতেন, তখন তিনি বলতেন: "গূফরানাকা" (আমি আপনার কাছে ক্ষমা প্রার্থনা করছি)।
1342 - عن عبد الله بن أرقم أنه كان يؤمُّ أصحابه، فحضرت الصلاة يومًا، فذهب لحاجته ثم رجع، فقال: إني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إذا أراد أحدكم الغائط فليبدأ به قبل الصلاة".
صحيح: رواه مالك في قصر الصلاة في السفر (49) عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عبد الله بن الأرقم، فذكر الحديث.
وفي السنن:"إذا أراد أحدكم الغائط، وأقيمت الصلاة، فليبدأ به"؛ أبو داود (88) والترمذي (142) والنسائي (2/ 110) وابن ماجه (616) كلهم من طريق هشام بن عروة به، قال الترمذي:"حدث عبد الله بن أرقم حسن صحيح". وصحَّحه أيضًا ابن خزيمة (932)، وابن حبان (2071)، والحاكم (1/ 168) كلهم من هذا الوجه. وقال الحاكم: صحيح على شرط الشيخين.
আব্দুল্লাহ ইবনে আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর সাথীদের ইমামতি করতেন। একদিন নামাযের সময় উপস্থিত হলে তিনি তাঁর প্রাকৃতিক প্রয়োজনে গেলেন এবং ফিরে এসে বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "যখন তোমাদের কেউ শৌচকার্য (প্রাকৃতিক প্রয়োজন) সম্পন্ন করার ইচ্ছা করে, তখন সে যেন নামাযের আগে তা দিয়ে শুরু করে।"
1343 - عن عائشة قالت: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا صلاة بحضرة الطعام، ولا وهو يُدافعه الأخْبثان".
صحيح: رواه مسلم في كتاب المساجد (560) عن يعقوب بن مجاهد، عن ابن أبي عتيق، قال: تحدثتُ أنا والقاسم عند عائشة حديثًا. وكان القاسم رجلًا لحَّانةً. وكان لأم ولد. فقالت له عائشة: ما لك لا تَحَدَّثُ كما يتحدثُ ابن أخي هذا؟ أَمَا إنِّي قد علمتُ من أين أُتِيت. هذا أدَّيته أُمُّه وأنت أدَّبتك أُمُّك. قال: فغضب القاسم وأضَبَّ عليها. فلما رأى مائدة عائشة قد أُتي بها قام.
قالت: أين؟ قال: أصلَّي. قالت: اجْلِسْ. قال: إنِّي أُصلَّي. قالت: اجْلِسْ غُدَرُ. إني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول. فذكرت الحديث.
ورواه أبو حَزْرة القاصُّ عن عبد الله بن أبي عتيق، عنها، عن النبي صلى الله عليه وسلم بمثله. وقوله:"لحانة" أي: كثير اللحن في كلامه.
قولُها:"اجلس غُدَر" بمعني غادر، ويقال في أسلوب النداء: فحسب يا غُدر للواحد، ويا آل غُدَر للجمع. والغَدْرُ تركُ الوفاء، وإنما قالت له: غُدر لأنَّه مأمور باحترامها لأنها أم المؤمنين، وعمته، وأكبر منه، وناصحة له، ومُؤدِّبة.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "খাদ্য উপস্থিত থাকা অবস্থায় কোনো সালাত নেই, এবং সালাত নেই এমন অবস্থায় যখন কেউ দুটি অমেধ্য বস্তুকে (প্রস্রাব ও পায়খানা) প্রতিহত করতে থাকে।"
(এই হাদীসের বর্ণনাসূত্রে আরও এসেছে যে) ইবনু আবী আতিক বলেন: আমি এবং কাসিম আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে একটি বিষয়ে আলাপ করছিলাম। কাসিম এমন একজন লোক ছিলেন, যিনি তাঁর কথায় ভুল করতেন (لحَّانة)। তিনি ছিলেন উম্মু ওয়ালাদের (দাসী) পুত্র। তখন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: কী হলো তোমার, তুমি তোমার এই ভাতিজার মতো করে কথা বলছো না কেন? আমি অবশ্যই জানি যে, তুমি কোত্থেকে এমন হচ্ছ। একে (ভাতিজাকে) তার মা ভালোভাবে শিখিয়েছেন, আর তোমাকে শিখিয়েছেন তোমার মা (দাসী)। বর্ণনাকারী বলেন: এতে কাসিম রাগান্বিত হলেন এবং আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর প্রতি কিছুটা বিরক্ত হলেন। যখন তিনি দেখলেন যে আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খাবারের দস্তরখান আনা হয়েছে, তখন তিনি উঠে দাঁড়ালেন। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: কোথায় যাচ্ছো? তিনি বললেন: আমি সালাত আদায় করব। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: বসো। কাসিম বললেন: আমি সালাত আদায় করব। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: বসো, হে বিশ্বাসঘাতক (গুদর)! আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি (এই বলে তিনি উক্ত হাদীসটি উল্লেখ করলেন)।
1344 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا يقوم أحدكم إلى الصلاة وبه أذى".
صحيح: رواه ابن ماجه (618) عن أبي بكر بن أبي شيبة، وهو في مصنفه (2/ 422) ثنا أبو أسامة، عن إدريس الأوْدي، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.
وصححه ابن حبان، فأخرجه في صحيحه (2072) من طريق إدريس بن يزيد الأودي به، ولفظه:"لا يُصلَّ أحدكم وهو يُدافِعه الأخبثان".
قال البوصيري في زوائد ابن ماجه: رجال إسناده ثقات.
قلت: وهو كما قال. وأبو أسامة هو: حماد بن أسامة القرشي مولاهم الكوفي، مشهور بكنيته، ثقة ثبت ربما دلس، كما قال الحافظ.
وإدريس هو ابن يزيد بن عبد الرحمن الأودي الزعافري، وثَّقه ابن معين والنسائي.
والحديث في مصنف ابن أبي شيبة (2/ 422).
وقوله"أذى" أي: حاجة للبول والبراز. كما جاء تفسيره في مسند الإمام أحمد (9697، 10094) من طريق دارد، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكر مثله. وقال في آخر الحديث: يعني البول والغائط إلا أن داود - وهو ابن يزيد بن عبد الرحمن الأودي ضعيف، ضعفَّه الإمام أحمد وأبو داود والنسائي وغيرهم.
أما ما روي عن أبي هريرة بلفظ:"لا يحل لرجل يؤمن بالله واليوم الآخر أن يصلي وهو حقِن حتى يتخفف …" رواه أبو داود (91)، قال: حدثنا محمود بن خالد السُلمي، قال: حدثنا أحمد بن علي، قال: حدثنا ثور، عن يزيد بن شُريح الحضّرمي، عن أبي حيّ المؤذَّن، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا يحل لرجل يؤمن بالله واليوم الآخر أن يصلي وهو حَقِن حتى يتخفَّف، ثم ساق نحوه. (أي نحو حديث ثوبان الذي ذكره أبو داود قبله، وهو):"ولا يحلّ لرجل يؤمن بالله واليوم الآخر أن يؤُمَّ قومًا إلا بإذنهم، ولا يختصّ نفسه بدعوةٍ دونهم؛ فإن فعل فقد خانهم".
ففيه يزيد بن شريح الحضرمي، ذكره ابن حبان في الثقات، وقال الدارقطني: يعتبر به. وجعله الحافظ في مرتبة"مقبول" أي: حيث يتابع، وقد توبع فيما سبق متابعة قاصرة في الجزء الأول من الحديث.
ورُوي أيضًا عن ثوبان مثله، رواه أبو داود (90) والترمذي (357) كلاهما من طريق إسماعيل بن عياش، وابن ماجه (619) من طريق بقية كلاهما عن حبيب بن صالح، عن يزيد بن شريح، عن أبي حي المؤذن، عن ثوبان، ولفظه:"ثلاث لا يحل لأحد أن يفعلهُنَّ: لا يؤُمّ رجلٌ قومًا فيخصّ نفسه بالدعاء دونهم؛ فإن فعل فقد خانهم، ولا ينظر في قعر بيت قبل أن يستأذن؛ فإن فعل فقد دخل، ولا يصلي وهو حقِن حتى ينخفَّف".
وإسماعيل وبقية ضعيفان، وشريح مقبول، إلا أن الترمذي حسّنه.
قال الترمذي: وفي الباب أيضًا عن أبي أمامة.
قلت: حديث أبي أمامة رواه ابن ماجه (617) قال: حدثنا بشر بن آدم، ثنا زيد بن الحباب، ثنا معاوية بن صالح، عن السفر بن نُسير، عن يزيد بن شريح، عن أبي أمامة: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهى أن يصلي الرجل وهو حاقن.
قال البوصيري في زوائده: إسناده ضعيف؛ لضعف السفر، وكذا بشر بن آدم.
قلت: وهذه الأحاديث الثلاثة تدور كلّها على يزيد بن شُريح وهو غير مشهور بالحفظ والعدالة إلّا ما ذكره ابن حبان وهو متساهل في توثيق المجاهيل، ومع ذلك رواه على عدّة وجوه مما يدل على عدم ضبطه ويوجب التّوقف في قبول حديثه.
وفي الجملة الأولى من متنه وهي قوله:"لا يؤمّ رجل قومًا فيخصّ نفسه بالدّعاء دونهم فإن فعل فقد خانهم" نكارة؛ لأنها مخالفة لهدي النبيّ صلى الله عليه وسلم الذي كان يدعو بالإفراد كقوله:"اللهم باعد بيني وبين خطاياي كما باعدت بين المشرق والمغرب" الحديث.
وبهذا الحديث استدل ابن خزيمة في صحيحه (3/ 63) على ردّ هذه الجملة من الحديث. وحديث الباب يحرم الصّلاة في حالة مدافعة الأخبثين.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের কেউ যেন এমন অবস্থায় সালাতে দাঁড়াবে না, যখন তার কষ্ট হয়।"
1345 - عن ابن عباس: أن النبي صلى الله عليه وسلم قام من الليل، فقضى حاجته، ثم غسل وجهه، ويديه، ثم نام.
متفق عليه: أخرجه البخاري (6316)، ومسلم (304)، كلاهما من طريق سفيان، عن سلمة بن كهيل، عن كريب، عن ابن عباس .. فذكر مثله. واللفظ لمسلم، أمَّا البخاري؛ فذكره في سياقٍ أطول، انظر كتاب الوضوء: باب أنَّ النوم ليس حدَثًا بل مَظِنَّة للحدث.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম রাতের বেলায় (ঘুম থেকে) উঠলেন, অতঃপর তিনি তাঁর প্রয়োজন (শারীরিক) সারলেন। এরপর তিনি তাঁর মুখমণ্ডল ও দুই হাত ধুলেন, অতঃপর ঘুমিয়ে পড়লেন।
1346 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لولا أن أشقّ على أمتي لأمرتهم بالسواك".
متفق عليه: رواه مالك في الطهارة (114)، عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة.
ورواه البخاري في الجمعة (887) ومسلم في الطهارة (252)، من طرق عن سفيان، عن أبي الزناد به. واللفظ لمالك في الموطَّإ، وعند البخاري ومسلم زيادة:"عند كل صلاة أو مع كل صلاة"، وفي النسائي وابن ماجه:"مع الوضوء عند كل صلاة"، وعند أحمد:"مع كل وضوء".
وسيأتي حديث أبي هريرة بزيادة تأخير العشاء إلى نصف اللَّيلِ في كتاب الصلاة، باب وقت صلاة العشاء.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যদি আমি আমার উম্মতের জন্য কষ্টকর মনে না করতাম, তবে অবশ্যই আমি তাদের মেসওয়াক করার নির্দেশ দিতাম।”
1347 - عن حذيفة بن اليمان قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم إذا قام من الليل يَشُوص فاه بالسواك.
متفق عليه: رواه البخاري في الوضوء (145) ومسلم في الطهارة (255). كلاهما من حديث جرير، عن منصور، عن أبي وائل، عن حذيفة فذكر الحديث. وفي رواية حصين بن عبد الرحمن، عن أبي وائل عند مسلم:"إذا قام ليتهجَّد يشوص فاه بالسواك". والشوص: هو دلك الأسنان بالسواك عَرْضًا.
হুযাইফা ইবনুল ইয়ামান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন রাতে (ঘুম থেকে) উঠতেন, তখন তিনি মিসওয়াক দ্বারা তাঁর মুখ পরিষ্কার করতেন।
