হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (1308)


1308 - عن أبي هريرة قال: لقيني رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وأنا جنب، فأخذ بيدي فمشيتُ معه حتى قعد، فانسللت فأتيت الرحل فاغتسلت، ثم جئت وهو قاعد، فقال:"أين كنت يا أبا هريرة؟"، فقلت له، فقال:"سبحان اللَّه يا أبا هريرة! إن المؤمن لا ينجُس".

متفق عليه: رواه البخاري (285)، واللّفظ له، ومسلم في الحيض (371)، كلاهما عن أبي رافع، عن أبي هريرة فذكر الحديث.




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার সাথে এমন অবস্থায় দেখা করলেন যখন আমি জুনুবী (নাপাক) ছিলাম। তিনি আমার হাত ধরলেন এবং আমি তাঁর সাথে হাঁটতে লাগলাম যতক্ষণ না তিনি বসে পড়লেন। তখন আমি আস্তে সরে পড়লাম এবং আমার বাসস্থানে এসে গোসল করলাম। এরপর আমি এলাম, আর তিনি তখনও বসে ছিলেন। তিনি বললেন, "হে আবূ হুরাইরাহ! তুমি কোথায় ছিলে?" আমি তাঁকে কারণ জানালাম। তিনি বললেন, "সুবহানাল্লাহ, হে আবূ হুরাইরাহ! নিশ্চয়ই মু'মিন অপবিত্র হয় না।"









আল-জামি` আল-কামিল (1309)


1309 - عن حذيفة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لقيه وهو جنب، فحاد عنه، فاغتسل، ثم جاء فقال: كنت جُنبًا، قال صلى الله عليه وسلم:"إن المسلم لا ينجس".

صحيح: رواه مسلم في الحيض (372). عن أبي بكر بن أبي شيبة وأبي كريب قالا: حدّثنا وكيع، عن مِسْعَرٍ، عن وَاصِل، عن أبي وائل، عن حذيفة فذكر الحديث.




হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাথে সাক্ষাৎ করলেন এমন অবস্থায় যখন তিনি জুনুবী ছিলেন। তখন তিনি (হুযাইফা) তাঁর থেকে দূরে সরে গেলেন, গোসল করলেন, অতঃপর ফিরে এসে বললেন: "আমি জুনুবী ছিলাম।" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই মুসলিম কখনও নাপাক হয় না।"









আল-জামি` আল-কামিল (1310)


1310 - عن عبد اللَّه بن زيد قال: أتى رسولُ اللَّه صلى الله عليه وسلم، فأخرجنا له ماءً في تَوْرٍ من صُفْر، فتوضأ، فغسل وجهه ثلاثا، ويديه مرتين مرتين، ومسح برأسه فأقبل به وأدبر، وغسل رجليه.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الوضوء (197) ومسلم في الطهارة (235: 18) كلاهما من
حديث عبد اللَّه بن زيد بن عاصم، واللّفظ للبخاريّ، وهذا مختصر من حديث طويل في صفة وضوء النبي صلى الله عليه وسلم. انظر: كتاب الوضوء.

والصُّفْر هو: النحاس. والتور -بفتح المثناة-: شبه الطست، وقيل: هو الطست.

وفي الباب عن زينب بنت جحش أنه كان لها مِخْضب من صُفر، قالت: كنتُ أُرَجَّل رأس رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فيه.

رواه ابن ماجه (472) قال: حدّثنا يعقوب بن حميد بن كاسب، ثنا عبد العزيز بن محمد الدراوردي، عن عبيد اللَّه بن عمر، عن إبراهيم بن محمد بن عبد اللَّه بن جحش، عن أبيه، عن زينب بنت جحش، فذكر الحديث.

قال البوصيري في زوائده: إسناده صحيح، ورجاله ثقات.

قُلت: ليس كما قال؛ فإنّ عبد العزيز بن محمد الدّراورديّ يغلط في أحاديث عبد اللَّه بن عمر العمريّ المكبّر الضّعيف، فيجعلها عن عبيد اللَّه بن عمر المصغّر الثّقة، قال الإمام أحمد: ربما قلب حديث عبد اللَّه بن عمر يرويها عن عبد اللَّه بن عمر.

وقال أيضًا: ما حدّث عن عبيد اللَّه بن عمر فهو عن عبد اللَّه بن عمر.

وقال النسائي: حديثه عن عبيد اللَّه منكر.

وهذا هو الصّحيح فإنّ هذا الحديث هو عن عبد اللَّه بن عمر العمري، رواه الإمام أحمد (26852) عن حماد بن خالد، عنه، عن إبراهيم بن محمد، عن أبيه، عن زينب بنت جحش، فذكرتْ نحوه.

قال الدّارقطنيّ في العلل 15/ 382: لا أعلم رواه عن عبيد اللَّه غير الدراورديّ. ثم ذكر الاختلاف فيه على الدراوردي، وعلي عبد اللَّه بن عمر العمريّ ثم قال: والحديث شديد الاضطراب. اهـ.




আব্দুল্লাহ ইবন যায়িদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আগমন করলেন। তখন আমরা তাঁর জন্য পিতলের একটি 'তওর' (পাত্র বিশেষ)-এ পানি বের করে আনলাম। অতঃপর তিনি উযু করলেন। তিনি তাঁর মুখমণ্ডল তিনবার ধুলেন, তাঁর দুই হাত দুইবার করে ধুলেন, আর তাঁর মাথা মাসাহ করলেন— তিনি তা সামনে থেকে পিছনে এবং পিছন থেকে সামনে নিলেন, এবং তাঁর দুই পা ধুলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1311)


1311 - عن أبي هريرة أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إذا شرب الكلب في إناء أحدكم فليغسله سبع مرات".

متفق عليه: رواه مالك في الطهارة (35) عن أبي الزّناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة فذكر الحديث.

ومن طريقه البخاري في الوضوء (172) ومسلم في الطهارة (279).

وفي رواية عند مسلم من طريق علي بن مسهر، نا الأعمش، عن أبي رزين وأبي صالح، عن أبي هريرة"فليرقه"، ورواه من طريق إسماعيل بن زكريا، عن الأعمش بهذا الإسناد، ولم يقل:"فليرقه".

قال النسائي (1/ 53): لا أعلم أحدا تابع عَلِيَّ بن مسهر على قوله:"فليرقه".
وفي رواية عنده -أي عند مسلم-:"أُولاهُنَّ بالتراب".

وفي رواية عند أبي داود (73) من طريق محمد بن سيرين، عن أبي هريرة مثله، وزاد:"السابعة بالتراب"، قال أبو داود: وأما أبو صالح وأبو رزين والأعرج وثابت الأحنف وهمام بن منبه وأبو السدي عبد الرحمن رووه عن أبي هريرة ولم يذكروا التراب. فيكون ذكر التراب في المرة السابعة شاذا، والمحفوظ:"أولاهن"، وهو الذي رواه مسلم من طريق محمد بن سيرين، فالظاهر أن الذي زاده يكون من بعده. وانظر للمزيد:"المنة الكبرى" (1/ 237).




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি তোমাদের কারো পাত্রে কুকুর পান করে, তবে সে যেন তা সাতবার ধৌত করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1312)


1312 - عن عبد اللَّه بنُ المُغفَّل قال: أمر رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بقتل الكلاب، ثم قال:"ما بالُهم وبالُ الكلاب؟"، ثم رخَّصَ في كلب الصيدِ وكلب الغَنَم، وقال:"إذا وَلَغَ الكلبُ في الإناءِ فاغْسِلُوه سبعَ مرات، وعَفِّرُوه الثامنةَ في التراب".

وفي رواية: ورخص في كلب الغنم والصيد والزرع.

صحيح: رواه مسلم في الطهارة (280). من طريق شعبة، عن أبي التيَّاح. سمع مُطَرِّفَ بن عبد اللَّه يحدث عن ابن المُغَفَّل فذكر الحديث.

قوله (عَفِّروه): من العَفَر -بفتحتين- وهو وجه الأرض، ويطلق على التراب، وعفرت الإناء عفرا: دلكته بالعفر.




আব্দুল্লাহ ইবনু মুগাফফাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুকুর হত্যা করার নির্দেশ দিয়েছিলেন। এরপর তিনি বললেন: "তাদের (মানুষের) এবং কুকুরের কী হয়েছে?" এরপর তিনি শিকারের কুকুর ও পালের (মেষ/বকরীর) কুকুরের অনুমতি দিলেন। আর তিনি বললেন: "যখন কুকুর কোনো পাত্রে মুখ দেবে (জিহ্বা দেবে), তখন তোমরা তা সাতবার ধৌত করবে এবং অষ্টমবারে মাটি দ্বারা মেজে পরিষ্কার করবে।"

অপর এক বর্ণনায়: তিনি পালের কুকুর, শিকারের কুকুর এবং শস্যক্ষেত্রের কুকুরের অনুমতি দিয়েছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1313)


1313 - عن عمران بن حصين، قال:"شربنا ونحن أربعون رجلًا عِطاشٌ، من مزادة امرأة مشركةٍ، وغسَّلنا صاحبنا (الجنب)".

متفق عليه: رواه البخاريّ في المناقب (3571)، ومسلمٌ في المساجدِ (682)، كلاهما من حديث سلْم بن زريرٍ، قال: سمعت أبا رجاء العُطاردي، قال: حدَّثنا عمران بن حصين. . فذكر الحديث، في حديثٍ طويلٍ، سيأتي بتمامه في دلائل النبوَّةِ.

وأمّا المشهور في كتب الفقهِ، وكتب الحديث الجامعة لأدلَّة الأحكام، كالمنتقى لمجد الدين ابن تيمية، والمحرر لابن عبد الهادي، وبلوغ المرام للحافظ ابن حجر: أنّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم وأصحابه توضَّؤوا من مَزادة امرأةٍ مشركة. فلم أجده بهذا اللفظِ، والظاهر أنَّهم أخذوا بالمعنى. .

وقوله:"المزادة" بفتح الميم والزاي: قِربة كبيرة، يزاد فيها جلدٌ من غيرها.

أمَّا بقيَّة أحاديثِ الأواني من الذهب والفضَّة وغيرهما، فستأتي في كتاب الأطعمة والأشربة -إن شاء اللَّه تعالى-.




ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা পান করেছিলাম, যখন আমরা চল্লিশ জন লোক পিপাসার্ত ছিলাম, একজন মুশরিক মহিলার মশক (পানির থলি) থেকে; এবং আমরা আমাদের সাথীকে (যার উপর গোসল ফরজ ছিল) গোসল করালাম।









আল-জামি` আল-কামিল (1314)


1314 - عن حُميدة بنت أبي عُبَيدة بن فروة، عن خالتها كَبْشةَ بنت كعب بن مالك، وكانت تحت ابن أبي قتادة الأنصاري، أنها أخبرتْها أن أبا قتادةَ دخل عليها فسَكَبتُ
له وضوءًا، فجاءت هِرّةٌ لتشرب منه، فأصغى لها الإناء حتى شربتْ، قالت كَبْشةُ: فرآني أنظر إليه، فقال: أتَعْجَبين يا ابنةَ أخي؟ قالت: فقلت: نعم، فقال: إن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إنها ليستْ بنجسٍ؛ إنما هي من الطوافين عليكم أو الطوافات".

حسن: رواه مالك في الطهارة (13) عن إسحاق بن عبد اللَّه بن أبي طلحة، عن حُميدة بنت أبي عبيدة، فذكرت الحديث.

وعن مالك رواه أبو داود (75) والترمذي (92) والنسائي (68) وابن ماجه (367).

قال الترمذيّ:"حسن صحيح".

قلت: رجاله ثقات، رجال الشيخين غير حُميدة بنت أبي عُبيدة ذكرها ابن حبان في الثقات، وتصحيح الترمذيّ للحديث دليل على توثيقه إياها، ونقل الحافظ في التلخيص تصحيحه أيضًا عن البخاري والدارقطني والعقيلي.

قال البيهقي (1/ 245) قال أبو عيسى: سألت محمدًا يعني البخاري عن هذا الحديث فقال: جوَّد مالك بن أنس هذا الحديث، وروايته أصح من رواية غيره.

قال البيهقي: وقد رواه حسين المعلم بقريب من رواية مالك، ثم رواه من طريقه ومن طريق همام بن يحيى كلاهما عن إسحاق بن عبد اللَّه بن أبي طلحة، عن أم يحيى، عن خالتها بنت كعب (وكانت عند عبد اللَّه بن أبي قتادة) فذكر الحديث. وذكر له طرقًا أخرى ثم قال: وكل ذلك شاهد لصحة رواية مالك. انتهى.

قلت: ورواه أيضًا ابن خزيمة في صحيحه (104)، وابن حبان (1299)، والحاكم في المستدرك (1/ 160) من طريق مالك.

قال الحاكم:"صحيح لم يخرجاه، على أنهما على ما أصَّلاه في تركه غير أنهما قد شهدا جميعًا لمالك بن أنس أنه الحكم في حديث المدنيين، وهذا الحديث مما صحّحه مالك، واحتج به في الموطأ". انتهى.

وللحديث شاهد عن عائشة رواه أبو داود وابن ماجه والدارقطني والبيهقي وغيرهم إلا أنه لا يخلو طريق منها من ضعيف أو مجهول.

هذا هو الصحيح الثابت في طهارة سؤر الهِرّة.

وأما ما روي عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم:"يُغسل الإناء إذا ولغ الكلب فيه سبع مرات، وإذا ولغت الهرُ غُسل مرة" فهو ضعيف؛ فإن ذكر ولوغ الهِرّ موقوف على أبي هريرة، فقد رواه أبو داود (72) عن مسدد، عن المغيرة بن سليمان، (ح) وعن محمد بن عبيد، ثنا حماد بن زيد، جميعًا عن أيوب، عن محمد بن سيرين، عن أبي هريرة، ولم يرفعاه، وزاد:"وإذا ولغ الهر غسل مرة"، وذلك بعد أن رواه عن أحمد بن يونس، ثنا زائدة في حديث هشام، عن محمد بن سيرين، عنه مرفوعا في
ولوغ الكلب في إناء أحدكم، كما رواه مسلم وغيره، وسبق ذلك في الباب الذي قبل هذا.

ورواه الترمذيّ (91) عن سوّار بن عبد اللَّه العنبري، ثنا المعتمر بن سليمان، به مرفوعا، وقال: ورُوِي هذا الحديث من غير وجه عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم نحو هذا، ولم يذكر فيه:"إذا ولغتْ فيه الهرةُ غُسِل مرةً".

وقال البيهقي في"معرفة السنن والآثار" (1/ 311) بعد أن أخرج الحديث من طريق أبي داود، عن مسدد:"وأما حديث محمد بن سيرين، عن أبي هريرة:"إذا ولغ الهر غسل مرة" فقد أدرجه بعض الرواة في حديثه عن النبي صلى الله عليه وسلم في ولوغ الكلب، ووهموا فيه، والصحيح أنه في ولوغ الكلب مرفوع، وفي الهر موقوف".




আবু কাতাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, হুমাইদাহ বিনতে আবি উবাইদাহ বিন ফারওয়া তাঁর খালা কাবশাহ বিনতে কা’ব ইবনে মালিক (যিনি আবু কাতাদাহ আল-আনসারীর পুত্রের স্ত্রী ছিলেন) থেকে বর্ণনা করেছেন যে, কাবশাহ তাঁকে জানিয়েছেন যে, একদা আবু কাতাদাহ তাঁর কাছে এলেন। তিনি (কাবশাহ) তাঁর জন্য অযুর পানি ঢেলে দিলেন। অতঃপর একটি বিড়াল সেই পানি পান করার জন্য এলো। তিনি বিড়ালটির জন্য পাত্রটি ঝুঁকিয়ে ধরলেন, যাতে সেটি পান করতে পারে। কাবশাহ বলেন: তিনি আমাকে তাঁর দিকে তাকিয়ে থাকতে দেখলেন। তিনি বললেন, "ওহে ভাতিজি, তুমি কি অবাক হচ্ছো?" কাবশাহ বলেন: আমি বললাম, "হ্যাঁ।" তখন তিনি বললেন, "নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: 'এটি (বিড়াল) অপবিত্র নয়। নিশ্চয়ই এটি তোমাদের আশেপাশে ঘোরাফেরা করা প্রাণীসমূহের অন্তর্ভুক্ত।'"









আল-জামি` আল-কামিল (1315)


1315 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"الفطرة خمس، أو خمس من الفطرة: الختان، والاستحداد، وتقليم الأظفار، ونتف الإبط، وقص الشارب".

متفق عليه: رواه البخاريّ في اللباس (5889، 5891، 6297) ومسلم في الطهارة (257). كلاهما من حديث ابن شهاب، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة فذكر الحديث.

وقوله:"الاستحداد" معناه حلق العانة، وسُمِّي استحدادًا لاستعمال الحديدة. وهي الموسى.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ফিতরাতের (স্বভাবগত পবিত্রতার) কাজ হলো পাঁচটি, অথবা পাঁচটি বিষয় ফিতরাতের অন্তর্ভুক্ত: খতনা করা, ইস্তিহদাদ (নাভির নিচে লোম পরিষ্কার করা), নখ কাটা, বগলের লোম উপড়ে ফেলা এবং গোঁফ খাটো করা।"









আল-জামি` আল-কামিল (1316)


1316 - عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"خالفوا المشركين؛ وفِّروا اللِّحَى، واحفوا الشوارب".

وكان ابن عمر إذا حجّ أو اعتمر قبض على لحيته، فما فضل أخذه.

وفي رواية:"أنهكوا الشوارب، وأعفوا اللحى".

متفق عليه: رواه البخاريّ في اللباس (5892، 5893) واللّفظ له، ومسلم في الطهارة (259) وفيه:"أحفوا الشوارب، وأعفوا اللحى" وفي لفظ:"أحفوا الشوارب، وأوفوا اللحى"، وفي لفظ عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه أمر بإحفاء الشوارب وإعفاء اللحية.

ولم يذكر مسلم أن ابن عمر إذا حجّ أو اعتمر قبض على لحيته فما زاد أخذه.

رواه البخاري بالإسناد السابق.

وأخرجه أيضًا مالك في الموطأ في الحج (187) عن نافع، أن عبد اللَّه بن عمر كان إذا حلق في حج أو عمرةٍ أخذ من لحيته وشاربه.

وإحفاء الشارب معناه: أن يؤخذ منه حتى يحفى ويرق، وقد يكون أيضًا معناه: الاستقصاء في أخذه، من قولك: (أحفيت في المسألة) إذا استقصيت فيها، أفاده الخطابي.

وسوف يأتي من حديث أبي هريرة:"جزُّوا الشوارب". والجزُّ هو قطع الصوف من الخروف،
ولا يكون فيه الاستقصاء، أو الاستئصال؛ ولذا ذهب كثير من السلف إلى منع الحلق والاستئصال منهم الإمام مالك، كان يرى تأديب من حلقه. فالمختار هو القص حتى يبدو طرف الشفة، أو الإحفاء. وقد قيل للإمام أحمد: ترى للرجل يأخذ شاربه ويحفيه، أم كيف يأخذه؟ قال: إن أحفاه فلا بأس، وإن أخذه قصًّا فلا بأس.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তোমরা মুশরিকদের বিরোধিতা করো; দাড়ি পূর্ণ রাখো এবং গোঁফ ছোট করো (বা কামিয়ে ফেলো)।"

আর ইবনু উমর যখন হজ বা ওমরাহ করতেন, তখন তিনি তার দাড়ি মুষ্টিবদ্ধ করে ধরতেন এবং মুষ্টির অতিরিক্ত অংশ কেটে নিতেন।

অপর এক বর্ণনায় এসেছে: "তোমরা গোঁফ খুব বেশি ছোট করো (বা ছেঁটে ফেলো) এবং দাড়ি ছেড়ে দাও (লম্বা রাখো)।"

হাদিসটি মুত্তাফাকুন আলাইহি। এটি বুখারী (৫892, ৫893) ও মুসলিম (২৫৯) বর্ণনা করেছেন। মুসলিমের এক বর্ণনায় রয়েছে: "তোমরা গোঁফ ছোট করো এবং দাড়ি ছেড়ে দাও।" অপর এক বর্ণনায় রয়েছে: "তোমরা গোঁফ ছোট করো এবং দাড়ি পূর্ণ রাখো।" এবং এক বর্ণনায় নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম গোঁফ ছোট করা এবং দাড়ি ছেড়ে দেওয়ার নির্দেশ দিয়েছেন।

তবে মুসলিম এই বিষয়টি উল্লেখ করেননি যে, ইবনু উমর যখন হজ বা ওমরাহ করতেন, তখন তিনি তার দাড়ি মুষ্টিবদ্ধ করে ধরতেন এবং যা বেশি হতো তা কেটে নিতেন।

ইমাম মালিকও তাঁর মুওয়াত্ত্বা গ্রন্থে (হজ ১৮৭) নাফে' থেকে বর্ণনা করেছেন যে, আব্দুল্লাহ ইবনু উমর হজ বা ওমরাহর জন্য মাথা মুণ্ডন করার সময় তাঁর দাড়ি ও গোঁফ থেকে কিছু অংশ কেটে নিতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1317)


1317 - عن عائشة قالت: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"عشْر من الفطرة: قص الشارب، وإعفاء اللحية، والسواك، واستنشاق الماء، وقص الأظفار، وغسل البراجم، ونتف الإبط، وحلق العانة، وانتقاص الماء".

قال زكريا: قال مصعب: ونسيتُ العاشرة، إلا أن تكون المضمضة.

زاد ابن قتيبة: قال وكيع: انقاص الماء يعني الاستنجاء.

صحيح: رواه مسلم في الطهارة (261). من حديث وكيع، عن زكريا بن أبي زائدة، عن مصعب بن شيبة، عن طلق بن حبيب، عن عبد اللَّه بن الزبير، عن عائشة فذكرت الحديث.

قلت: هذا الحديث أخرجه أيضًا أحمد (6/ 137) وأصحاب السنن: أبو داود (53) والترمذي (2906) وابن ماجه (293) والنسائي (5040) وقال النسائي بعد أن أخرج الحديث عن إسحاق بن إبراهيم، عن وكيع به مثله. ثم رواه من طريق المعتمر بن سليمان التيمي، عن أبيه سليمان التيمي قال: سمعتُ طلقًا يذكر عشرة من الفطرة، وكذلك رواه من طريق أبي عوانة، عن أبي بشر جعفر بن إياس عن طلق بن حبيب قال: عشرة من السنة ثم قال: حديث سليمان التيمي وجعفر بن إياس أشبه بالصواب من حديث مصعب بن شيبة. ومصعب بن شيبة منكر الحديث". انتهى.

وممن تكلم في هذا الحديث أيضًا الدارقطني في العلل 14/ 89 فرجَّح رواية سليمان التيمي وجعفر بن إياس على رواية مصعب بن شيبة قائلًا: هما أثبت من مصعب بن شيبة، وأصح حديثًا.

ونقل عن أحمد أنه قال: معصب بن شيبة أحاديثه مناكير منها: عشرة من الفطرة.

قال تقي الدين ابن دقيق العيد في الإمام: ولم يلتفت مسلم إلى هذه العلة، لأن مصعبًا عنده ثقة، والثقة إذا وصل حديثًا يقدم وصله على الإرسال". انظر:"نصب الراية" (1/ 76).

وزاد السيوطي في تعليقه على سنن النسائي بعد أن نقل قول تقي الدين. قال: وقد يقال في تقوية رواية مصعب أن تثبته في الفرق بين ما حفظه، وبين ما شك فيه جهة مقوية لعدم الغفلة، ومن لا يُتَّهم بالكذب، إذا ظهر منه ما يدل على التثبت قَوِيتْ روايتُه. وأيضًا لروايته شاهدٌ صحيح مرفوع في كثير من هذا العدد من حديث أبي هريرة أخرجه الشيخان. انتهى.

وقوله:"البراجم" جمع برُجمة، وهي عقد الأصابع ومفاصلها كلها.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "দশটি বিষয় ফিতরাতের (স্বাভাবিক প্রকৃতির) অন্তর্ভুক্ত: গোঁফ খাটো করা, দাড়ি লম্বা রাখা (ছাড় দেওয়া), মিসওয়াক করা, নাকে পানি দেওয়া, নখ কাটা, আঙুলের গিঁটগুলো (ব্রাজিম) ধৌত করা, বগলের চুল উপড়ে ফেলা, নাভির নিচের চুল মুণ্ডন করা, এবং পানি দ্বারা পবিত্রতা অর্জন করা।"

যাকারিয়া বলেন, মুসআব বলেছেন: আমি দশম বিষয়টি ভুলে গিয়েছি, সম্ভবত তা হলো কুলি করা (মজমজাহ)।

ইবনু কুতাইবাহ অতিরিক্ত বর্ণনা করেন যে, ওয়াকী’ বলেছেন: ইনতিকাসুল মা (পানি দ্বারা পবিত্রতা অর্জন করা) মানে হলো ইস্তিঞ্জা (শৌচকার্য)।









আল-জামি` আল-কামিল (1318)


1318 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"جُزّوا الشواربَ وأرخُوا اللِّحى؛
خالِفُوا المجوس".

صحيح: رواه مسلم في الطهارة (260). من حديث العلاء بن عبد الرحمن بن يعقوب مولى الحُرَقَةِ، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكر الحديث.

وقوله:"أرخوا" و"أعفوا" و"أوفوا" معناها: توفيرها.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “তোমরা গোঁফ ছোট করো এবং দাড়ি বড় করো; তোমরা অগ্নি উপাসকদের (মাগিয়ানদের) বিরোধিতা করো।”









আল-জামি` আল-কামিল (1319)


1319 - عن أنس قال: وُقِّت لنا في قص الشارب، وتقليم الأظفار، ونتف الإبط، وحلق العانة؛ أن لا تترك أكثر من أربعين يومًا.

صحيح: رواه مسلم في الطهارة (258)، من حديث أبي عمران الجونيِّ، عن أنس فذكر الحديث. وحكمه مرفوع، وقد جاء التصريح بذلك في رواية أبي داود (4200) بقوله:"وقَّتَ لنا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم. . .".




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, মোচ ছোট করা, নখ কাটা, বগলের লোম উপড়ানো এবং নাভির নিচের লোম পরিষ্কার করার জন্য আমাদের সময় নির্ধারণ করে দেওয়া হয়েছিল যে, এগুলো যেন চল্লিশ দিনের বেশি ছাড়া না হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (1320)


1320 - عن المغيرة بن شعبة، قال: ضِفتُ النبي -وفي رواية بالنبي صلى الله عليه وسلم ذات ليلةٍ، فأمر بجنبٍ فشُوي. قال: فأخذ الشفرة، فجعل يجزُّ لي بها منه. قال: فجاء بلالٌ يؤْذِنه بالصلاة، فألقى الشفرة، وقال:"ما له؟ تربت يداه!" قال المغيرة: وكان شاربي وفَي فقصَّه لي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم على سواكٍ، أو قال:"أقصُّه لك على سواك".

حسن: رواه أبو داود (188) والترمذي في الشمائل (159) كلاهما من طريق مسعر، عن أبي صخر جامع بن شداد، عن المغيرة بن عبد اللَّه (اليشكري) عن المغيرة بن شعبة فذكر الحديث. واللّفظ لأبي داود، ولفظ الترمذيّ مختصر، ومن هذا الطريق رواه أيضًا الإمام أحمد (18212). وإسناده حسنٌ؛ لأجل المغيرة بن عبد اللَّه اليشكري؛ فهو حسن الحديث، وانظر المزيد من التفصيل في كتاب الوضوء، باب ترك الوضوء مما مسَّته النّار.




মুগীরাহ ইবনু শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক রাতে আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মেহমান হলাম—অন্য বর্ণনায় রয়েছে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট। তিনি (খাদ্যের জন্য) একটি পশুর পার্শ্বদেশ (গোশত) ভাজার নির্দেশ দিলেন। তিনি (মুগীরাহ) বলেন: এরপর তিনি ছুরি নিলেন এবং তা দিয়ে আমার জন্য তা থেকে কেটে কেটে দিতে লাগলেন। মুগীরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এ সময় বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আসলেন, তাঁকে সালাতের খবর দিতে। তখন তিনি ছুরিটি ফেলে দিলেন এবং বললেন: "তার কী হলো? তার দু'হাত ধুলায় ধূসরিত হোক!" মুগীরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমার গোঁফ বড় ছিল। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি মিসওয়াকের উপরে রেখে আমার জন্য তা ছোট করে দিলেন। অথবা তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি তোমার জন্য একটি মিসওয়াকের উপরে তা ছোট করে দেব।"









আল-জামি` আল-কামিল (1321)


1321 - عن زيد بن أرقم، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من لم يأخذ شاربه فليس منَّا".

صحيح: رواه الترمذيّ (2761) والنسائي (13) كلاهما من طريق يوسف بن صهيب، عن حبيب بن يسار، عن زيد بن أرقم فذكر مثله.

قال الترمذيّ:"حسن صحيح".

قلت: وهو كما قال؛ فإنّ رجاله ثقات، وإسناده صحيح، وقد جاء في بعض الروايات ذكر أبي رملة، وهو عبد اللَّه بن أبي أمامة الحارثي المدني بين حبيب بن يسار وبين زيد بن أرقم، فهو من المزيد في متَّصل الأسانيد.

وأمّا ما رُوي عن ابن عباس قال: كان النبيُّ صلى الله عليه وسلم يقصُّ، أو يأخذ من شاربه، وكان إبراهيم خليل الرحمن يفعله. فهو ضعيف، رواه الترمذيّ (2760) من طريق سماك، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكر مثله. وسماك هو ابن حرب بن أوس الكوفي، وهو"صدوق" لكن في روايته عن عكرمة
مضطربٌ، وقد تغيَّر بأخرة فكان ربَّما يتلقَّن، ولم أقف على من تابعه على روايته هذه. انظر بقية الأحاديث في كتاب الأدب واللباس.




যায়িদ ইবনে আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি তার গোঁফ ছাঁটে না (বা ছোট করে না), সে আমাদের অন্তর্ভুক্ত নয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (1322)


1322 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"اختتن إبراهيم عليه السلام وهو ابن ثمانين سنةً بالقدُّومِ".

متفق عليه: رواه البخاريّ في أحاديث الأنبياء (3356) ومسلم في كتاب الفضائل (2370) كلاهما عن قتيبة بن سعيد، حدَّثنا مغيرة بن عبد الرحمن القرشي، عن أبي الزّناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة فذكر مثله.

وقوله:"بالقدُّوم" بالمشدَّدة في هذه الرواية. وفي رواية أخرى: عن شعيب بن أبي حمزة، عن أبي الزّناد:"بالقَدُوم" مخفَّفةٌ. رواه البخاري (6298) عن أبي اليمان، عن شعيب بن أبي حمزة به.

والقدوم مخففًا اسم موضع بالشام، وبالتشديد: اسم للآلة وهو الفأس، والظاهر أنّ المقصود به إنّما هو الآلة، وهو الذي رجَّحه ابن القيم وغيره.

وحديث الباب لا يعارضه ما رُوي في بعض الأحاديث بأنَّه عليه السلام اختتن وهو ابن مائة وعشرين سنةً؛ فإنّه معلولٌ، رواه يحيى بن سعيد، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة قوله. والمرفوع رواه أبو أويس وهو عبد اللَّه بن عبد اللَّه المدني، عن أبي الزّناد، فخالف المغيرةَ بن شعبة، وشعيبَ ابن أبي حمزة في روايتهما عن أبي الزّناد كما مضى. وروايتُهما أولى من رواية أبي أويس. وأبو أويس وإن كان من رجال مسلم إلَّا أنّه اختلفت فيه الرواية عن ابن معين؛ ففي رواية الدوري: في حديثه ضَعفٌ. ورُوِي عنه توثيقه. انظر للمزيد:"تحفة الودود بأحكام المولود" (96 - 98).

وأمّا توقيت الختان فلم يثبت فيه شيءٌ، إلَّا أنَّ وجوبه يكون عند البلوغ لأنّه حينئذٍ تجب عليه العبادات. وقد سئل ابن عباس: مثل من أنت حين قُبض النبي صلى الله عليه وسلم؟ فقال:"أنا يومئذٍ مختونٌ". قال:"وكانوا لا يختنون الرجل حتى يُدرك". رواه البخاريّ في الاستئذان (6299).

واختُلف في سنِّ ابن عباس عند وفاة رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم: فقال الزبير والواقدي: وُلد في الشِّعب قبل خروج بني هاشم منه قبل الهجرة بثلاث سنين، وتوفي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وله ثلاث عشرة سنة. وقيل غير ذلك.

قال الحافظ ابن القيم: والذي عليه أكثر أهل السير والأخبار: أنّ سِنَّه كان يوم وفاة رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ثلاث عشرة سنة.

وأحاديث هذا الباب والذي قبله تدلُّ على أن الختان من سنن الفطرة وهو من شعائر الإسلام فلا ينبغي التهاون بها، وعلى الأولياء أن يبادروا إلى ختان صبيانهم قبل دخولهم في سن البلوغ.

أما إن أسلم مجوسيّ أو نصرانيّ فلا يؤمر بالختان لأنه ليس من شروط صحة دخوله في
الإسلام، ولكن إن تيسّر له ذلك بدون مشقة تتعلق بالمجتمع الذي يعيش فيه مثل المجتمع الإسلامي فليختتن، أما إذا كان في مجتمع كافر ويخشى إن اختتن أن يلحقه ضرر منهم فلا يختتن.

وقد سئلت اللجنة الدائمة: هل الختان شرط من شروط صحة الإسلام؟ فأجابت بقولها:"الختان من سنن الفطرة، في حق الرجال وفي حق النساء، وينبغي للدعاة إلى اللَّه سبحانه الإغضاء عن الكلام في الختان عند دعوة الكفار إلى الإسلام، إذا كان ذلك ينفره من الدخول في الإسلام، فإن الإسلام والعبادة تصح من غير المختون، وبعدما يستقر الإسلام في قلبه يشعر بمشروعية الختان" اهـ. (فتاوى اللجنة الدائمة 5/ 135، 136).

انظر مزيدًا من التفصيل في"المنة الكبرى" (7/ 389 - 393).

وأمّا ما رُوي عن جابر: أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عقَّ عن الحسن والحسين وختنهما لسبعة أيام؛ فهو ضعيف. رواه الطبراني في الأوسط (6704) والصغير (891) عن محمد بن أحمد بن الوليد البغدادي، قال: حدّثنا محمد بن أبي السري العسقلاني، قال: حدَّثنا الوليد بن مسلم، قال: حدّثنا زهير بن محمد، عن محمد بن المنكدر، عن جابرٍ فذكر مثله.

قال الطبراني:"لم يقل في هذا الحديث أحد من الرواة:"وختنهما لسبعة أيام إلَّا زهير بن محمد".

وقال الهيثمي في"المجمع" (4/ 59): رواه الطبراني في الصغيرة والكبير باختصار الختان، وفيه محمد بن أبي السري، وثّقه ابن حبان وغيره، وفيه لين".

قلت: محمد بن أبي السري هو: ابن المتوكل بن عبد الرحمن الهاشمي مولاهم، العسقلاني المعروف بابن أبي السري، وثّقه ابن معين. وقال أبو حاتم: ليِّن الحديث. وقال ابن عدي: كثير الغلط. وفي التقريب:"صدوق عارف له أوهام كثيرة".

ومن هذا الوجه رواه ابن عدي في الكامل (3/ 1075) في ترجمة زهير بن محمد الخراساني، عن الحسن بن سفيان، حدثني محمد بن المتوكل (وهو ابن أبي السري) به مثله. وعنه البيهقي (8/ 324).

قال ابن عدي:"لا أعلم رواه عن الوليد غير محمد بن المتوكل، وهو محمد بن أبي السري". وظهر من قول الطبراني وابن عدي أنّ قوله:"وختنهما لسبعة أيام" منكرٌ؛ لأنّه تفرّد به محمد بن أبي السري، ولم يتابعه أحد على هذه الزيادة.

وفي الإسناد أيضًا زهير بن محمد الخراساني، سكن الشام ثمَّ الحجاز، رواية أهل الشام عنه غير مستقيمة، فضُعِّف بسببها. وقد ضعّفه النسائي وغيره. قال أبو حاتم: حدّث بالشام من حفظه فكثر غلطه.

قلت: والوليد بن مسلم الراوي عنه من الشاميين، فلعلَّ هذا مما غلط فيه زهير بن محمد.

وكذلك لا يصح ما رُوي عن ابن عباس موقوفًا عليه:"سبعة من السنة في الصبي يوم السابع: يُسمى، ويُختتن، ويُماط عنه الأذى، وتثقب أذنه، ويُعقُّ عنه، ويُحلق رأسه، ويُلطَّخ بدم عقيقته،
ويُتصدَّق بوزن شعره في رأسه ذهبًا أو فضة". رواه الطبراني في الأوسط -مجمع البحرين- (1913)؛ فإنّ في إسناده روَّاد بن الجراح مختلَف فيه؛ فمشاه ابن معين وأحمد وأبو حاتم، وقال الدارقطني: متروك. وقال ابن عدي:"عامة ما يرويه لا يُتابعه النّاس عليه، وكان شيخًا صالحًا". وفي"التقريب":"صدوقٌ اختلط بآخره فتُرك".

قال ابن المنذر:"ليس في هذا الباب نهي يثبت، وليس لوقوع الختان خبر يرجع إليه، ولا سنة تستعمل، فالأشياء على الإباحة، ولا يجوز حظر شيءٍ منها إلَّا بحجَّةٍ، ولا نعلم مع من منع أن يختن الصبي لسبعة أيام حجَّةً". انتهى من"تحفة المودود بأحكام المولود" (113).

وكذلك لا يصح ما رُوي عن ابن جريج قال: أُخبرتُ عن عُثيم بن كليب، عن أبيه، عن جدِّه، أنّه جاء إلى النبيِّ صلى الله عليه وسلم فقال: قد أسلمتُ. فقال له النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"ألقِ عنك شعر الكفر". يقول: احلق. قال: وأخبرني آخر أنّ النبي صلى الله عليه وسلم قال لآخر معه:"ألق عنك شعر الكفر واختتن". فإنّه ضعيفٌ، رواه أبو داود (356) عن مخلد بن خالد، حدّثنا عبد الرزاق، أخبرنا ابن جريج، قال: فذكر مثله.

والحديث في مصنَّف عبد الرزاق (9835) وعنه رواه الإمام أحمد (15432).

وعُثيم بن كُلَيب -بضم العين- هو عُثيم بن كثير بن كليب الحضرمي، ويقال: الجهني، وقد نُسب إلى جده، هو وأبوه مجهولان، كما أنّ الواسطة بين ابن جريج وبين عثيم غير معروف.

وقال ابن عدي في"الكامل":"وهذا الذي قاله ابن جريج في هذا الإسناد: وأُخبرتُ عنه، عن عثيم بن كُليب، إنّما حدّثه إبراهيم بن أبي يحيى، فكنَّى عن اسمه".

وإبراهيم بن محمد أبي يحيى الأسلمي ضعيف جدًّا جدًّا، وقد كذَّبه مالك وغيره.

قال أبو الحسن ابن القطّان الفاسي:"هذا إسناد غاية في الضعف، مع الانقطاع الذي في قول ابن جريج:"أُخبرت". وذلك أنّ عثيم بن كليب وأباه وجدَّه مجهولون"."بيان الوهم والإيهام" (3/ 43).

قلت: إن ثبت كون جده صحابيًا فجهالته لا تضر، وقد ذكره ابن حجر في القسم الأول من حرف الكاف في الإصابة. واللَّه أعلم.

وأخرجه ابن قانع في ترجمة كلاب (942) من وجهٍ آخر عن محمد بن زياد الزيادي، نا إبراهيم ابن أبي يحيى، عن غُنيم بن كثير بن كلاب، عن أبيه، عن جدِّه، أنّه قدم على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقال له:"أحلق شعر الكفر عنك".

ولم يذكر:"اختتن". وفيه:"غُنَيم" وهو تصحيف.

والصّواب"عُثيم" كما في سائر مصادر التخريج، وكذلك جاء ضبطه في الإكمال لابن ماكولا.

وأخرجه أيضًا ابن قانع في ترجمة كليب الجهني (931) من وجه آخر عن كثير بن كليب، عن أبيه فذكر الحديث، ولم يذكر فيه:"واختتن".
وترجمة الحافظ في"الإصابة" في الكنى (4/ 167): أبو كليب وقال: جد عثيم بن كليب. وعثيم نسب إلى جده، وإنّما هو: عثيم بن كثير بن كليب، والصحبة لجده كليب. وروايته في سنن أبي داود. واللَّه تعالى أعلم بالصواب.

وكذلك لا يصح ما رُوي عن أبي أيوب:"أربع من سنن المرسلين: الحياء، والتعطُّر، والسواك، والنكاح". فإنّه ضعيفٌ أيضًا، رواه الترمذيّ (1080) عن سفيان بن وكيع، حدّثنا حفص ابن غياث، عن الحجاج، عن مكحول، عن أبي الشمال، عن أبي أيوب فذكر مثله، إلَّا أنّ فيه:"الحياء" بدلا من"الختان". قال الترمذيّ:"حسن غريب. وروى هذا الحديث هُشيم ومحمد بن يزيد الواسطي وأبو معاوية وغير واحد، عن الحجاج، عن مكحول، عن أبي أيوب، ولم يذكروا فيه:"عن أبي الشمال" والأول أصحُّ".

قلت: وأخرجه الإمام أحمد (5/ 420) كالثاني عن يزيد، ثنا الحجاج بن أرطاة، عن مكحول قال: قال أبو أيوب فذكر مثله. وهذا مرسلٌ.

قال الدارقطني في"العلل" (6/ 123):"هذا الاختلاف من الحجاج بن أرطاة؛ فإنّه كثير الوهم".

ولذا تكلم النّاس في تحسين الترمذيّ لهذا الحديث؛ فإن الحجاج بن أرطاة ضعيف، وأبو الشمال مجهول، سئل عنه أبو زرعة فقال:"لا أعرفه إلا في هذا الحديث، ولا أعرف اسمه". وضعّفه أيضًا النووي في"شرح المهذّب" (1/ 339).

تنبيهٌ: وقع في بعض نسخ سنن الترمذيّ:"الختان" بالخاء والنون، وقال بعضهم:"الحناء" بالحاء والنون، وهذه كلُّها مصحَّفة، وإنّما هو:"الحياء" بالياء كما في مسند الإمام أحمد وغيره.

وكذلك لا يصح أيضًا ما رُوي من ختان النساء عن أم عطية الأنصارية، أن امرأة كانت تختن بالمدينة فقال لها النبي صلى الله عليه وسلم:"لا تُنهكي، فإنّ ذلك أحظى للمرأة، وأحبُّ إلى البعلِ". رواه أبو داود (5271) عن سليمان بن عبد الرحمن الدمشقي، وعبد الوهاب بن عبد الرحيم الأشجعي، قالا: حدّثنا مروان، حدّثنا محمد بن حسان -قال عبد الوهاب: - الكوفي، عن عبد الملك بن عُمير، عن أم عطية فذكرت مثله.

قال أبو داود:"رُوي عن عبيد اللَّه بن عَمرو، عن عبد الملك بمعناه وإسناده".

قال أبو داود:"ليس هذا بالقوي، وقد رُوي مرسلًا".

قال أبو داود:"ومحمد بن حسان مجهولٌ، وهذا الحديث ضعيفٌ" انتهى.

وضعَّفه أيضًا النووي في"الخلاصة" (117).

وقوله:"لا تُنهكي" معناه: لا تُبالغي في الخفض. والنهك: المبالغة في الضرب، والقطع، والشتم. وجاء في رواية أخرى:"أشِمِّي ولا تنهكي".

قال الحافظ ابن القيم:"وفي الحديث ما يدل على الأمر بالإقلال من القطع؛ فإنَّ قوله:"أشِمِّي
ولا تنهكي" أي اتركي الموضع أشم. والأشم: المرتفع". (تحفة المودود (191)).

وللحديث إسناد آخر رواه ابن عدي في"الكامل" (3/ 1083) من طريق زائدة بن أبي الرقاد، ثنا ثابت، عن أنس، أنّ النبي صلى الله عليه وسلم قال لأم عطية:"إذا خفضتِ فأشمي، ولا تنهكي؛ فإنَّه أسرى للوجه، وأحظى عند الزوج".

قال ابن عدي:"هذا يرويه عن ثابتٍ زائدةُ بن أبي الرقاد، ولا أعلم يرويه غيره، وزائدة بن أبي الرقاد له أحاديث حسان، يروي عنه المقدمي، والقواريري، ومحمد بن سلام، وغيرهم، وهي أحاديث إفرادات، وفي بعض أحاديثه ما يُنكر".

وروى الحاكم 3/ 525 من طريق هلال بن العلاء الرقي، عن أبيه، عن عبيد اللَّه بن عمرو، عن زيد بن أبي أنيسة، عن عبد الملك بن عُمير، عن الضحاك بن قيس، قال:"كان بالمدينة امرأة يقال لها أم عطية، تخفض النساء، فقال لها رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"اخفضي ولا تُنهِكي؛ فإنّه أنضر للوجه، وأحظى عند الزوج". والعلاء أبو محمد الرقي، قال فيه الحافظ:"فيه لين" ونقل في التهذيب كلام أهل العلم فيه يظهر منه أنَّه ضعيفٌ جدًّا، بل متَّهم؛ وقد ذكره سبط بن العجمي في"الكشف الحثيث عمَّن رُمِي بوضع الحديث".

قلت: وفي إسناده الضّحاك بن قيس، جزم ابن معين، والخطيب وغيرهما أنه غير الفهريّ الصّحابي الصّغير، فإذا كان كذلك فهو مجهول لا يعرف، وهذه علّة أخرى، واللَّه أعلم.

ورُوي عن عبد اللَّه بن عمر مرفوعًا:"يا نساء الأنصار! اختضبن غمسًا، واخفضن، ولا تنهكن، فإنّه أحظى عند أزواجكن، وإياكنَّ وكفران النعم".

رواه البزار في"البحر الزّخار" (6178)، وفي إسناده مندل بن علي العنزي، وهو ضعيف. ورواه ابن عدي في"الكامل" (3/ 900) وفي إسناده خالد بن عمرو القرشي، وهو أضعف من مندل. انظر"التلخيص الحبير" (4/ 83).

وقال ابن عدي:"وخالد بن عمرو هذا له غير ما ذكرت من الحديث عن من يحدث عنهم، وكلها أو عامتها موضوعة، وهو بين الأمر في الضعفاء".

ورُوي أيضًا عن علي بن أبي طالب وغيره ولا يثبت.

وكذلك لا يصح ما رُوي مرفوعًا:"الختان سنة في الرجال، مكرمة في النساء". رواه الإمام أحمد (20719) عن سريج، حدَّثنا عبَّاد -يعني ابن العوام-، عن الحجاج، عن أبي المليح بن أسامة، عن أبيه، مرفوعًا.

وأبو المليح اسمه: عامر، وقيل: زيد، وقيل: زياد. ثقة. روى له الجماعة. والحجاج هو ابن أرطاة، مدلس، وقد عنعن.

واضطرب فيه حجّاج، فرواه هكذا تارة، وتارة رواه بزيادة"شداد بن أوس" بعد والد أبي المليح،
كما رواه الطبراني في"الكبير" (7/ 329 - 330). وتارة رواه عن مكحول، عن أبي أيوب. أخرجه الإمام أحمد، وذكره ابن أبي حاتم في"العلل" (2/ 247)، وحكي عن أبيه أنَّه خطأ من حجاج، أو الراوي عنه، وهو عبد الواحد بن زياد. وقال البيهقي: (8/ 235):"وهو ضعيف منقطع".

وقال ابن عبد البر: وهذا الحديث يدور على حجاج بن أرطاة. وليس ممن يُحتجُّ بما انفرد به"."التمهيد" (21/ 59).

وقال الحافظ ابن الملقن في"البدر المنير" (8/ 743):"هذا الحديث ضعيفٌ مرَّة، وهو مروي من طرق".

وله طريق آخر غير طريق الحجاج، رواه الطبراني في"الكبير" (11/ 233) والبيهقي: (8/ 324 - 325) عن عبدان بن أحمد، ثنا أيوب بن محمد الوزان، ثنا الوليد بن الوليد، ثنا ابن ثوبان، عن محمد بن عجلان، عن عكرمة، عن ابن عباس مرفوعًا:"الختان سنة للرجال، مكرمة للنساء". قال البيهقي:"هذا إسناد ضعيف، والمحفوظ موقوفٌ. ثمَّ رواه من وجهٍ آخر مرقوفًا على ابن عباسٍ.

وقال ابن القيم:"هذا الحديث يُروى عن ابن عباس بإسناد ضعيف، والمحفوظ أنَّه موقوف عليه، ويروى أيضًا عن الحجاج بن أرطاة، وهو ممن لا يُحتجُّ به … ذكر ذلك كلَّه البيهقي". انتهى.

انظر"تحفة المودود" (108). و"المنة الكبرى" (7/ 397 - 398).

وأمَّا كلام أهل العلم في حكم الختان للرجال؛ فذهب جمهور العلماء منهم: مالك، والشافعي، وأحمد، إلى أنَّه واجب، وشدَّد فيه مالك فقال:"من لم يختتن لم تجز إمامته، ولم تقبل صلاته".

وقال أبو حنيفة وأصحابه، وبعض أصحاب الإمام أحمد: إنَّه سنَّة. وكذلك نقل القاضي عياض عن مالكٍ أيضًا وعامَّة العلماء.

وأمَّا حكم ختان النساء؛ فجمهور العلماء ذهبوا إلى أنَّه سنَّة في النساء غير واجب إلا من جعل الأوامر الشرعية سواء للرجال والنساء مثل الصلاة والزكاة والصيام وغيرها. وأما الأحاديث فلم يسلم شيء منها من علة.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “ইবরাহীম (আঃ) যখন আশি বছরের ছিলেন, তখন তিনি 'কুদ্দুম' (নামক যন্ত্র) দ্বারা খতনা করেছিলেন।”









আল-জামি` আল-কামিল (1323)


1323 - عن عائشة قالت: كان النبي صلى الله عليه وسلم يذكر الله على كل أحيانه.

صحيح: رواه مسلم في الحيض (373). من حديث ابن أبي زائدة، عن أبيه، عن خالد بن سلمة، عن البَهِيَّ، عن عروة، عن عائشة فذكرت الحديث.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সকল অবস্থাতেই আল্লাহর যিকির (স্মরণ) করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1324)


1324 - عن عمرو بن حزم، قال: كان في كتاب رسول الله صلى الله عليه وسلم: ولا يمسُّ القرآن إلّا طاهر".
صحيح وجادة: رواه مالك في كتاب القرآن (1) عن عبد الله بن أبي بكر بن عمرو بن حزم، أنّ في الكتاب الذي كتبه رسول الله صلى الله عليه وسلم لعمرو بن حزم كان فيه (فذكر الحديث).

وكذلك رواه عبد الرزاق (1328)، والدارقطني (435)، والبيهقي (1/ 87) كلهم من حديث معمر، عن عبد الله بن أبي بكر، عن أبيه، قال: كان في كتاب النبيّ صلى الله عليه وسلم لعمرو بن حزم (فذكر مثله).

وهذا مرسل فإن عبد الله بن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حزم يرويه عن أبيه، وهو أبو بكر، وعن جدّه وهو محمد بن عمرو بن حزم.

ومحمد بن عمرو بن حزم الأنصاري أبو عبد الملك المدني، له رؤية وليس له سماع إلا من الصّحابة؛ ولذا قال الدارقطني:"هو مرسل ورواته ثقات".

وقد روي موصولًا، وسيأتي تفصيله في كتاب الزّكاة.

قال ابن عبد البر:"لا خلاف عن مالك في إرسال هذا الحديث، وقد رُوي مسندًا من وجه صالح، وهو كتاب مشهور عند أهل السير، معروف عند أهل العلم معرفة يستغنى بها في شهرتها عن الإسناد".

قلت: ويشهد له الأحاديث الآتية في الباب، وإن كان أحد منها لا يخلو من ضعف.

ومنها ما رُوي عن حكيم بن حزام، أنّ النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"لا تمسَّ القرآن إلّا وأنت طاهر".

رواه الطبرانيّ في الكبير (3/ 229) عن بكر بن مقبل البصري، ثنا إسماعيل بن إبراهيم صاحب القُوهي، قال: سمعت أبي، ثنا سويد أبو حاتم، ثنا مطر الورّاق، عن حسان بن بلال، عن حكيم بن حزام، قال: لما بعثني رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى اليمن، قال (فذكر الحديث).

ورواه الدّارقطني (440)، وصحّحه الحاكم (3/ 485) كلاهما من طريق إسماعيل بن إبراهيم، بإسناده، مثله. وقال الحاكم: هذا حديث صحيح الإسناد ولم يخرجاه.

وفيه سويد أبو حاتم الجحدريّ الحباط، واسم أبي حاتم: إبراهيم، مختلف فيه، فقال أبو زرعة: ليس بالقوي، وقال النسائي: ضعيف، وأفحش القول فيه ابن حبان، ولكن قال ابن معين: أرجو أن لا بأس به، وقال الحافظ في التقريب:"صدوق سيء الحفظ له أغلاط". وحسّن الحازميّ إسناده، كما نقله في"التلخيص".

وشيخه مطر الوراق، مختلف فيه أيضًا قضعّفه النّسائيّ وابن سعد، ومشّاه الآخرون إلّا حديثه عن عطاء ففيه ضعف، كما في"التقريب" وقال:"صدوق كثير الخطأ".

وقد نقل بعض العلماء عن الدارقطني أنه قال:"كلّهم ثقات".

إلّا أني لم أقف على قوله هذا في كتابه"السنن".

فتحسين الحازمي له وجه، وإن كانت النّفس لا تطمئن إلى تحسينه.

وفي الباب أيضًا ما رُوي عن ابن عمر مرفوعًا:"لا يمس القرآن إلّا طاهر". رواه الطبرانيّ في الكبير (13217)، وفي الصغير (1162)، والدارقطني (437)، وعنه البيهقي في"السنن الكبرى" (1/ 88)،
وفي"الخلافات" (298)، والجوزجاني في"الأباطيل" (1/ 371 - 372)، كلّهم من حديث سعيد بن محمد بن ثواب، حدثنا أبو عاصم، أخبرنا ابن جريج، عن سليمان بن موسى، قال: سمعت سالمًا يحدّث عن أبيه، قال (فذكر الحديث).

وسليمان بن موسى وهو الأشدق مختلف فيه، فقال البخاري: عنده مناكير، وقال النسائي: ليس بالقوي في الحديث، ووثقه يحيى بن معين، ودحيم، والترمذي، وابن عدي وغيرهم فهو"صدوق في حديثه بعض لين" كما في التقريب.

وقال الحافظ في التلخيص (1/ 131): إسناده لا بأس به، ذكر الأثرم أنّ أحمد احتجّ به". وقال الهيثميّ أيضًا في"المجمع" (1/ 276):"رواه الطبراني في الكبير والصغير ورجاله موثقون".

وقال الجوزجانيّ في الأباطيل (1/ 372):"هذا حديث مشهور حسن".

وفي الباب أيضًا عن عثمان بن أبي العاص مرفوعًا:"لا تمسَّ القرآن إلّا وأنت طاهر". رواه الطبراني في الكبير (9/ 33) عن أحمد بن عمرو الخلال المكيّ، ثنا يعقوب بن حميد، ثنا هشام بن سليمان، عن إسماعيل بن رافع، عن محمد بن سعيد بن عبد الملك، عن المغيرة بن شعبة، عن عثمان بن أبي العاص، فذكر حديثًا طويلًا في زكاة الماشية وغيرها، وفيها الجزء المذكور.

وذكره الزّيلعيّ في"نصب الرّاية" (1/ 198).

وأورده الهيثمي في"المجمع" (1/ 277) وقال:"فيه إسماعيل بن رافع ضعّفه يحيى بن معين والنسائي، وقال البخاري: ثقة مأمون".

وقال أيضًا (3/ 74):"فيه هشام بن سليمان، وقد ضعّفه جماعة من الأئمّة، ووثّقه البخاريّ.

ولكن قال الحافظ في التلخيص (1/ 131):"في رواية الطبراني من لا يعرف".

وقال"ورواه ابن أبي داود في المصاحف (738)، وفيه انقطاع".

قلت: لأنه من رواية القاسم بن برزة، عن عثمان بن أبي العاص قال: كان فيما عهد إليَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تمس المصحف، وأنت غير طاهر".

والقاسم لم يدرك عثمان، والراوي عنه إسماعيل بن مسلم المكي ضعيف، تركهـ بعضهم.

وخلاصة القول في هذا الباب: إنّ الحديث صحيح وجادة، وأحاديث الباب تقوّي هذه الوجادة، والنّفس تطمئن إلى صحة مثل هذا الحديث، وقد قال به عدد من الصحابة والتابعين والأئمّة المهديين بعدهم.

قال مصعب بن سعد بن أبي وقاص:"كنت أمسك المصحف على سعد بن أبي وقاص، فاحتككتُ.

فقال سعد: لعلّك مسستَ ذكركَ؟ قلت: نعم. فقال: قم فتوضأ. فقمتُ فتوضّأت ثم رجعت".

رواه مالك في الطهارة (59) عن إسماعيل بن محمد بن سعد بن أبي وقاص، عن مصعب بن سعد بن أبي وقاص. وإسناده صحيح.
وقد كره سالم وعطاء وطاوس والقاسم وعامر الشعبي القراءة في المصحف على غير وضوء. ذكره الجوزجاني في الأباطيل (1/ 373).

وقال ابن عبد البر في الاستذكار (8/ 10 - 11):"وأجمع فقهاء الأمصار الذين تدور عليهم الفتوى وعلى أصحابهم بأن المصحف لا يمسه إلا الطّاهر، وهو قول مالك والشافعي وأبي حنيفة وأصحابهم، والثوري، والأوزاعي، وأحمد بن حنبل، وإسحاق بن راهويه، وأبي ثور، وأبي عبيد، وهؤلاء أئمّة الرّأي والحديث في أعصارهم. ورُوي ذلك عن سعد بن أبي وقاص وعبد الله بن عمر وطاوس والحسن والشعبي والقاسم بن محمد وعطاء، وهؤلاء من أئمّة التابعين بالمدينة ومكة واليمن والكوفة والبصرة.

قال إسحاق بن راهويه:"لا يقرأ أحدٌ في المصحف إلّا هو متوضّئ، وليس ذلك لقول الله عز وجل: {لَا يَمَسُّهُ إِلَّا الْمُطَهَّرُونَ} [سورة الواقعة: 79]، ولكن لقول رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا يمس القرآن إلّا طاهر". انتهى ما في الاستذكار.

وأجاز قومٌ مسّ المصحف على غير وضوء مستدلين بقول النّبيّ صلى الله عليه وسلم:"المؤمن لا ينجس" وهو متفق عليه.

وحملوا النّهي في حديث الباب على الجنب والحائض، وقولهَ تعالى: {لَا يَمَسُّهُ إِلَّا الْمُطَهَّرُونَ} بأنه كتاب الله الذي في السماء لا يمسه إلا الملائكة المطّهرون.

قال البغوي في شرح السنة (2/ 48):"وجوّز الحَكَم وحماد وأبو حنيفة حمله ومسّه. وقال أبو حنيفة: لا يمس الموضع المكتوب".

وروى عبد الرزّاق (1347) عن شيخ من أهل مكة، قال: سمعت سفيان العصفريّ يقول:"رأيت سعيد بن جبير بال ثم غسل وجهه، ثم أخذ المصحف فقرأ فيه".

قال أبو بكر (هو عبد الرزّاق): وسمعته من مروان بن معاوية الفزاريّ. انتهى.

قلت: ومروان بن معاوية كوفيٌّ سكن مكة، فلعلّ عبد الرزاق ما عرفه أوّلًا، ثم تبيّن له أنه هو والإسناد متصل.

ورواه ابن أبي داود في كتاب المصاحف (760) عن عبد الله بن بشار، قال: نا يحيى (بن سعيد القطان)، نا أبو الورقاء (وهو سفيان بن زياد العصفريّ)، قال: سمعت سعيد بن جبير، فذكر مثله.

وروى أيضًا بإسناده الشعبيّ قال: منّ المصحف ما لم تكن جنبًا. انتهى.

وممن ذهب إلى هذا ابن عباس، والضّحاك، وغيرهما كما ذكره الشّوكانيّ في نيل الأوطار (1/ 316)، ولعل قول أبي حنيفة والشعبي وغيرهما الذين ذكرهم ابن عبد البر يحمل على الجنب والحائض، والله أعلم بالصّواب.

وأما قراءة القرآن للجنب والحائض بدون مسّ المصحف فقد روي عن ابن عمر مرفوعا:"لا
يقرأ القرآن الجنبُ ولا الحائض" فهو ضعيف، أخرجه الترمذي (131) وابن ماجه (595) كلاهما من طريق إسماعيل بن عياش، عن موسى بن عقبة، عن نافع، عن ابن عمر، فذكر الحديث.

قال الترمذي:"لا نعلمه يُرْوَى عن ابن عمر إلا من هذا الوجه".

قلت: في الإسناد إسماعيل بن عياش، وهو منكر الحديث عن أهل الحجاز، كما قال البخاري. وقال الإمام أحمد: هذا حديث يتفرد به إسماعيل بن عياش، وروايته عن أهل الحجاز ضعيفة لا يحتج به.

وقال ابن أبي حاتم في عِلله (1/ 49): سمعت أبي، وذكر حديث إسماعيل بن عياش هذا، فقال: خطأ، إنما هو قول ابن عمر. انتهي.

وللحديث طرق أخرى ذكرها الدارقطني في"العلل" (1/ 117)، إلا أنها كلها ضعيفة لا تقوم بها حجة.

وكذلك ما روي عن جابر بن عبد الله مرفوعا:"لا يقرأ الحائض ولا النفساء من القرآن شيئًا" فهو أيضًا ضعيف، رواه الدارقطني (2/ 87) من طريق محمد بن الفضل، عن أبيه، عن طاوس، عن جابر، فذكر الحديث.

ومحمد بن الفضل ضعيف جدا، رواه ابن عدي في الكامل وأعله بمحمد بن الفضل، وأغلظ في تضعيفه عن البخاري والنسائي وأحمد وابن معين.

ورواه الدارقطني أيضًا (1/ 121) موقوفا على جابر، وفيه ابن أبي أنيسة، ضعيف.

وكذلك ما روي عن علي قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقرئنا القرآن على كل حال، ما لم يكن جنبا".

رواه أصحاب السنن: أبو داود (229) والترمذي (1/ 214) واللفظ له، والنسائي (266) وابن ماجه (594) كلهم من طريق عمرو بن مرة، عن عبد الله بن سَلِمة، عن علي بن أبي طالب، قال الترمذي: حسن صحيح.

قلت: والصواب أنه ضعيف؛ لأن مداره على عبد الله بن سلمة.

قال المنذري: ذكر أبو بكر البزار أنه لا يُروى عن عَليّ إلا من حديث عمرو بن مرة، عن عبد الله بن سلمة. وحكى البخاري عن عمرو بن مرة: كان عبد الله - يعني ابن سلمة - يحدثنا، فنعرف وننكر، وكان قد كبر، ولا يتابع على حديثه. وذكر الشافعي هذا الحديث وقال: لم يكن أهل الحديث يثبتونه.

قال البيهقي: وإنما نوقف الشافعي في ثبوت هذا الحديث لأن مداره على عبد الله بن سلمة الكوفي، وكان قد كبر وأنكر من حديثه وعقله بعض النكرة، وإنما رَوَى هذا الحديث بعدما كَبِر، قاله شعبة. هذا آخر كلامه.

وقوله"ليس الجنابة" معناه: غير الجنابة.
قال الخطابي: كان الإمام أحمد يرخص للجنب أن يقرأ الآية ونحوها، وكان يوهن حديث عليّ هذا، ويضعف أمر عبد الله بن سلمة، وكذلك قال مالك في الجنب: إنه يقرأ الآية ونحوها، وقد حكي عنه أنه قال: تقرأ الحائض ولا يقرأ الجنب؛ لأن الحائض إذا لم تقرأ نسبت القرآن؛ لأن أيام الحيض تتطاول، ومدة الجنابة لا تطول. وروي عن ابن المسيب وعكرمة أنهما لا يريان بأسا بقراءة الجنب القرآن. وأكثر العلماء على تحريمه. انتهى كلامه.

وقال الترمذي عقب حديث ابن عمر -"لا تقرأ الحائض ولا الجنب شيئًا من القرآن" -: هو قول أكثر أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم والتابعين ومن بعدهم، مثل سفيان الثوري وابن المبارك والشافعي وأحمد وإسحاق. قالوا: لا تقرأ الحائض ولا الجنب من القرآن شيئًا، إلا طرف الآية والحرف ونحو ذلك، ورخصوا للجنب والحائض في التسبيح والتهليل. انتهى.

وهذا الذي جرى عليه أهل العلم فمنعوا للحائض أن تقرأ القرآن إلا لحاجة.

وقد سئل فضيلة الشيخ العثيمين رحمه الله عن قراءة القرآن للحائض فأجازها عند الحاجة، منها: الأوراد كآية الكرسي والآيتين الآخرتين من سورة البقرة، وقل هو الله أحد، والمعوذات، وغيرها مما ورد من الأوراد.

ومن الحاجة: أن تخاف نسيانه فتقرأه ولا بأس.

ومن الحاجة: أن تكون معلِّمة تعلِّمُ القرآن ولو كانت حائضًا ولا بأس.

ومن الحاجة: أن تكون متعلَّمة فتُسْمعُ القرآن معلمتها.




আমর ইবনে হাযম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর লিখিত দলিলে ছিল: "পবিত্র ব্যক্তি ছাড়া কেউ যেন কুরআন স্পর্শ না করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1325)


1325 - عن أبي جحيفة يقول: خرج علينا رسول الله صلى الله عليه وسلم بالهاجرة، فأُتِي بوَضُوء فتوضأ، فجعل الناس يأخذون من فضل وَضوئه، فيتمسحون به، فصلى النبي صلى الله عليه وسلم الظهر ركعتين، والعصر ركعتين، وبين يديه عنزة.

متفق عليه: رواه البخاري في الوضوء (187)، وبوّب بقوله:"استعمال فضل وَضوء الناس".

من حديث شعبة قال: ثنا الحكم، قال: سمعتُ أبا جحيفة فذكره.

وفي رواية عند البخاري في الصلاة (376) ومسلم في الصلاة (503) من طريق عُمر بن أبي زائدة، عن عون بن أبي جُحيفة أن أباه قال:"رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم في قبة حمراء من أدم، ورأيت بلالًا أخذ وضوء رسول الله صلى الله عليه وسلم، ورأيت الناس يبتدرون ذلك الوضوء؛ فمن أصاب منه شيئًا تمسّح به، ومن لم يُصب منه شيئًا أخذ من بلل يد صاحبه، ثم رأيت بلالا أخذ عنزة فركزها، وخرج النبي صلى الله عليه وسلم في حلة حمراء مشمِّرا، صلى إلى العنزة بالناس ركعتين، ورأيت الناس والدواب يمرون بين يدي العنزة".
قوله:"مُثَمِّرًا" رافعًا ثوبه إلى أنصاف ساقيه، كما جاء في رواية عند مسلم: كأني أنظر إلى بياض ساقيه.




আবু জুহাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: দ্বিপ্রহরের সময় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিকট বের হলেন। এরপর তাঁর জন্য ওযূর পানি আনা হলো। তিনি ওযূ করলেন। তখন লোকজন তাঁর ওযূর অবশিষ্ট পানি নিতে লাগল এবং তা দ্বারা শরীর মুছে নিতে লাগল। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যোহরের সালাত দুই রাকাত এবং আসরের সালাত দুই রাকাত আদায় করলেন। আর তাঁর সামনে একটি ‘আনazah’ (বর্শা বা লাঠি) ছিল।

অন্য এক বর্ণনায় তাঁর পিতা (আবু জুহাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)) বলেছেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে চামড়ার তৈরি লাল রঙের একটি তাঁবুর মধ্যে দেখেছি। আমি বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কেও দেখলাম, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওযূর পানি নিলেন। আমি দেখলাম লোকজন সেই ওযূর পানি নেওয়ার জন্য দ্রুত ছুটছে; ফলে যে ব্যক্তি কিছুটা পেল, সে তা দ্বারা শরীর মুছে নিলো। আর যে কিছুই পেল না, সে তার সঙ্গীর হাতের আর্দ্রতা (ভিজে ভাব) নিয়ে নিলো। এরপর আমি দেখলাম বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একটি আনazah (বর্শা) নিয়ে সেটি মাটিতে গেঁথে দিলেন। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) লাল ডোরাকাটা চাদর পরিহিত অবস্থায়, কাপড় গুটিয়ে (পায়ের নলার অর্ধেক পর্যন্ত তুলে) বের হলেন এবং আনazah-কে সুতরা (আড়াল) বানিয়ে লোকজনকে নিয়ে দুই রাকাত সালাত আদায় করলেন। আর আমি দেখলাম মানুষ ও চতুষ্পদ জন্তুগুলো আনazah-এর সামনে দিয়ে অতিক্রম করছে।









আল-জামি` আল-কামিল (1326)


1326 - عن ابن شهاب قال: أخبرني محمود بن الربيع - قال: وهو الذي مجَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم في وجهه وهو غلام من بئرهم -، وقال عروة: عن المِسْور وغيره - يصدق كل واحد منهما صاحبه -: وإذا توضأ النبي صلى الله عليه وسلم كادوا يقتّتلون على وَضوئه.

صحيح: رواه البخاري في الوضوء (189). من طريق صالح بن كيسان، عن ابن شهاب فذكر مثله.

وقوله: قال عروة عن المِسْوَر وغيره - قالوا: الضمير في غيره يعود إلى مروان لما رواه البخاري في الشروط (2731) مطولًا عن عبد الرزاق، قال: أخبرنا معمر، قال: أخبرني الزهري، قال: أخبرني عروة بن الزبير، عن المِسْوَر بن مخرمة، ومروان - يصدق كل واحد منهما حديث صاحبه -، قالا: فذكر قصة خروج النبي صلى الله عليه وسلم زمن الحديبية وفيه:"وإذا توضأ كادوا يقتتلون على وَضُوئه وسيأتي الحديث بكامله في الجهاد.




মাহমূদ ইবনুর রাবী‘ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইবনু শিহাব (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: মাহমূদ ইবনুর রাবী‘ আমাকে অবহিত করেছেন—আর তিনি সেই ব্যক্তি, যাঁর মুখে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁদের কূপ থেকে পানি নিয়ে ছিটিয়ে দিয়েছিলেন, যখন তিনি বালক ছিলেন। আর উরওয়াহ (রাহিমাহুল্লাহ) মিসওয়ার ও অন্যান্যের সূত্রে বর্ণনা করেছেন—তাদের প্রত্যেকেই তাদের সাথীর বর্ণনাকে সমর্থন করত—: আর যখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম উযূ (ওযু) করতেন, তখন তাঁর উযূর (ব্যবহৃত) পানির জন্য তারা প্রায় যুদ্ধ করার উপক্রম করত।









আল-জামি` আল-কামিল (1327)


1327 - عن السائب بن يزيد قال: ذهبَتْ بي خالتي إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقالت: يا رسول الله! ابن أختي وَقِعٌ، فمسح رأسي ودعا لي بالبركة، ثم توضأ فشربت من وَضُوئه، ثم قمت خلف ظهره، فنظرت إلى خاتم النبوة بين كتفيه مثل زِرَّ الحَجَلة.

متفق عليه: رواه البخاري في الوضوء (190) ومسلم في الفضائل (2345)، كلاهما من طريق حاتم بن إسماعيل، عن الجعد، قال: سمعت السائب بن يزيد .. فذكره الحديث. وسيعاد الحديث في صفة النبي صلى الله عليه وسلم.

وقوله:"وقِع" - بكسر القاف والتنوين - في رواية مسلم: وجع. وهو وجع في القدمين.

وقوله:"زِرَّ الحَجَلة: بكسر الزاي وتشديد الراء، والحجلة - بفتح المهملة والجيم، واحدة الحجال -: وهي البيوت تزين بالثياب والأسِرَّة والستور، لها عرى وأزرار، وقيل: المراد بالحجلة الطير، وهو اليعقوب، يقال للأنثى منه: حجلة. وعلى هذا فالمراد بزرّها: بيضها. ويؤيده أن في حديث آخر:"مثل بيضة الحمامة".

انظر:"الفتح" (1/ 296).




সা'ইব ইবনু ইয়াযীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার খালা আমাকে নিয়ে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গেলেন। তিনি বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার ভাগিনা অসুস্থ। তখন তিনি আমার মাথায় হাত বুলিয়ে দিলেন এবং আমার জন্য বরকতের দুআ করলেন। এরপর তিনি উযূ (ওযু) করলেন। আমি তাঁর উযূর অবশিষ্ট পানি পান করলাম। অতঃপর আমি তাঁর পেছনে দাঁড়ালাম এবং তাঁর দুই কাঁধের মাঝখানে নবুয়তের মোহর (খাতামুন নুবুওয়াহ) দেখলাম, যা ছিল হাজলাহ-এর বোতামের মতো।