আল-জামি` আল-কামিল
1368 - عن سلمة بن قيس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا توضأت فانْتَثِر، وإذا استجمرت فأوتِر".
صحيح: رواه الترمذي (27) والنسائي (89) وابن ماجه (406) كلهم من حديث منصور، عن هلال بن يساف، عن سلمة بن قيس به. ورجاله ثقات، وصحَّحه ابن حبَّان (1436).
ومنصور هو ابن المعتمِر بن عبد الله السهمي أبو عثَّاب - بمثلثة ثقيلة ثم موحدة - الكوفي، قال أبو حاتم: ثقة. وقال العجلي: كوفي ثقة ثبت في الحديث، كان أثبت أهل الكوفة، وكأنَّ حديثه القِدْحُ لا يختلف فيه أحد، متعبد رجل صالح، أُكره على القضاء شهرين، وكان فيه تشيع قليل ولم يكن يغالي، وهو من رجال الجماعة.
قال الترمذي: حديث سلمة بن قيس حديث حسن صحيح.
قوله"فانتثر" أي: أدخل الماء في الأنف ثم ادفعه ليخرج ما فيه، والنثرة: الخيشوم.
وفي الباب حديث عبد الله بن زيد بن عاصم في صفة وضوء النبي صلى الله عليه وسلم. وحديث عاصم بن لقيط بن صَبِرة في باب تخليل الأصابع في الوضوء.
সালামাহ ইবনু ক্বাইস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমরা উযু করবে, তখন (নাকে পানি দিয়ে) নাসিকা ঝেড়ে ফেলো। আর যখন তোমরা ইস্তিঞ্জা (ঢিলা) ব্যবহার করবে, তখন বেজোড় সংখ্যায় করো।"
1369 - عن سلمان الفارسي أنَّه: قيل له: قد علَّمكم نبيُّكم كلَّ شيءٍ حتى الخِراءة؟ قال: فقال: أجل! لقد نهانا أن نستقبل القبلة بغائط، أو بول، أو أن نستنجي باليمين، أو أن نستنجي بأقل من ثلاثة أحجار، أو أن نستنجي برجيع أو بعظم.
صحيح: رواه مسلم في الطهارة (262) من طريق الأعمش، عن إبراهيم، عن عبد الرحمن بن يزيد، عن سلمان .. فذكر الحديث.
وفي رواية: قال بعض المشركين وهم يستهزئون: إني أرى صاحبكم يعلمكم كل شيء، حتى الخِراءة! فقال: أجل! ثم ذكر الحديث.
والخراءة: قال الخطابي: مكسورة الخاء ممدودة الألف: التخلي والقعود للحاجة، قال: وأكثر الرواة يفتحون الخاء، ولا يمدون الألف.
وقال الجوهري في الصحاح:"الخَراءة" بالفتح والمد.
সালমান আল-ফারসী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে জিজ্ঞেস করা হলো: তোমাদের নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি তোমাদেরকে সবকিছুই শিক্ষা দিয়েছেন, এমনকি পায়খানার পদ্ধতি পর্যন্ত? তিনি বললেন: হ্যাঁ! তিনি আমাদেরকে নিষেধ করেছেন যে, আমরা যেন মল-মূত্র ত্যাগের সময় কিবলাকে সামনে না করি, অথবা যেন ডান হাত দ্বারা ইসতিনজা (শৌচকার্য) না করি, অথবা যেন তিনটির কম পাথর দ্বারা ইসতিনজা না করি, অথবা যেন গোবর বা হাড় দ্বারা ইসতিনজা না করি।
1370 - عن عبد الله بن أبي قتادة، عن أبيه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا شرب أحدكم فلا يتنفَّس في الإناء، وإذا أتي أحدكم الخلاء فلا يمسَّ ذكره بيمينه، ولا يتمسح بيمينه".
متفق عليه: رواه البخاري في الوضوء (153) ومسلم في الطهارة (267) كلاهما من طريق يحيى بن أبي كثير، عن عبد الله بن أبي قتادة به مثله.
وفي رواية عند مسلم:"وأن يستطيب بيمينه".
وقوله"ولا يتمسح بيمينه" أي: لا يستنجي.
আবু কাতাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের কেউ পান করলে সে যেন পাত্রের মধ্যে শ্বাস-প্রশ্বাস না ফেলে। আর তোমাদের কেউ যখন শৌচাগারে যায়, সে যেন তার পুরুষাঙ্গ ডান হাত দিয়ে স্পর্শ না করে এবং ডান হাত দিয়ে যেন শৌচকার্য না করে।"
1371 - عن حفصة زوج النبي صلى الله عليه وسلم أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يجعل يمينه لطعامه وشرابه وثيابه، ويجعل شماله لما سوى ذلك.
حسن: رواه أبو داود (32) عن محمد بن آدم بن سليمان المصيصي، حدثنا ابن أبي زائدة، قال: حدثني أبو أيوب - يعني الإفريقي - عن عاصم، عن المسيب بن رافع ومعبد، أن حارثة بن وهب الخزاعي قال: حدثتني حفصة، فذكرته.
وصحَّحه ابن حبان (5227) والحاكم (4/ 109)، وقال:"هذا حديث صحيح، ولم يخرجاه". وتعقَّبه الذهبي فقال:"في سنده مجهولٌ". ولم يتبين لي من المراد به في قوله هذا؟ فإنَّ رجاله كلهم
معروفون، من ثقة إلى صدوق، غير أبي أيوب الإفريقي - وهو عبد الله بن علي الإفريقي، فإن أبا زرعة ليَّنه فقال:"في حديثه نكارة، ليس بالمتين". ولكن قال ابن معين:"ليس به بأس". فمثله لا ينزل حديثه عن درجة الحسن إذا لم يخالف.
وعاصم هو: ابن بهدلة أبو بكر المقرئ، صدوق له أوهام.
وأما ما روي عن عائشة رضي الله عنها قالت: كانت يد رسول الله صلى الله عليه وسلم اليُمني لطهوره وطعامه، وكانت يده اليُسرى لخلائه، وما كان من أذىً.
فهو منقطع رواه أبو داود (33) قال: حدثنا أبو توبة الربيع بن نافع، حدثني عيسى بن يونس، عن ابن أبي عروبة، عن أبي معشر، عن إبراهيم، عنها.
أبو معشر، وهو: زياد بن كليب الحنظلي، تكلم فيه أبو حاتم، ووثقه غيره.
وإبراهيم هو: ابن يزيد النخعي الفقه لم يسمع من عائشة، لأنه ولد عام 46 هـ وماتت عائشة عام 57 هـ على الصحيح.
হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর ডান হাতকে খাবার, পানীয় এবং পোশাকের জন্য ব্যবহার করতেন এবং তাঁর বাম হাতকে এর বাইরে অন্যান্য কাজের জন্য ব্যবহার করতেন।
1372 - عن عبد الله بن مسعود قال: أتى النبيُّ صلى الله عليه وسلم الغائطَ، فأمرني أن آتيه بثلاثة أحجارٍ، فوجدت حجرين، والتمست الثالثَ فلم أجده، فأخذت روثة فأتيته بها، فأخذ الحجرين وألقى الروثة، وقال:"هذا رِكس".
صحيح: رواه البخاري في الوضوء (156)، عن أبي نعيم، قال: حدَّثنا زهير، عن أبي إسحاق، قال: ليس أبو عبيدة ذكره ولكن عبد الرحمن بن الأسود، عن أبيه، أنَّه سمع عبد الله يقول: فذكر الحديث.
قال البخاري: وقال إبراهيم بن يوسف: عن أبيه، عن أبي إسحاق: حدَّثني عبد الرحمن. انتهى.
قوله (رِكس): هي في لغة (رجس) بالجيم، وهو النجس، قال أبو عبيد: هو شبيه بالرجيع، يقال: ركستُ الشيء وأركستُه: إذا رددته. وقال النسائي (42): الركس: طعام الجن.
وفي رواية عند النسائي (39):"نهى أن يستطيب أحدكم بعظم أو روث".
وفي إسناده أبو عثمان بن سَنَّة الخُزاعي الراوي عن ابن مسعود،"مقبول" لأنه توبع.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শৌচাগারে গেলেন। এরপর তিনি আমাকে তিনটি পাথর নিয়ে আসতে আদেশ দিলেন। আমি দুটি পাথর খুঁজে পেলাম এবং তৃতীয়টি খুঁজতে লাগলাম, কিন্তু তা পেলাম না। তাই আমি একটি শুকনো গোবর নিয়ে তাঁর কাছে আসলাম। তিনি দুটি পাথর নিলেন এবং গোবরটি ফেলে দিলেন, আর বললেন: "এটা রিকস।"
1373 - عن علقمة قال: سألت ابن مسعود فقلت: هل شهد أحدٌ منكم مع رسول الله صلى الله عليه وسلم ليلة الجنِّ؟ قال: لا. ولكنّا كُنَّا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم ذات ليلةٍ، ففقدناه، فالتمسناه في الأودية والشعاب، فقلنا: استطير، أو اغتيل! قال: فبتنا بِشر ليلة بات بها قومٌ. فلما أصبحنا إذا هو جاءٍ من قِبَل حراء. قال: فقلنا: يا رسول الله! فقدناك فطلبناك فلم نجدك فبتنا بِشر ليلة بات بها قومٌ. فقال:"أتاني داعي الجنِّ، فذهبت معه،
فقرأت عليهم القرآن". قال: فانطلَقَ بنا فأرانا آثارهم وآثار نيرانهم. وسألوه الزاد. فقال:"لَكم كلُّ عظمٍ ذُكر اسم الله عليه يقع في أيديكم أوفر ما يكون لحمًا. وكلُّ بعرة علفٌ لدوابكم". فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"فلا تستنجوا بهما؛ فإنَّهما طعام إخوانكم".
صحيح: رواه مسلم في الصلاة (450)، عن محمد بن المثنى، حدَّثنا عبد الأعلى، عن داود، عن عامر، قال: سألت علقمة: هل كان ابن مسعود شهد مع رسول الله صلى الله عليه وسلم ليلة الجنِّ؟ قال: فقال علقمة .. فذكر مثله.
ورواه من رواية إسماعيل بن إبراهيم ابن علية عن داود بن أبي هند بهذا الإسناد إلى قوله:"وآثار نيرانهم".
قال الشعبي:"وسألوه الزاد، وكانوا من جن الجزيرة، إلى آخر الحديث، من قول الشعبي مفصلًا من حديث عبد الله".
وساقه من وجه آخر (151) عن داود بن أبي هند، عن الشعبي، عن علقمة، عن عبد الله، عن النبي صلى الله عليه وسلم إلى قوله:"وآثار نيرانهم" ولم يذكر ما بعده.
قال الدارقطني:"يرويه داود بن أبي هند، عن الشعبي، عن علقمة، عن عبد الله، رواه عنه جماعة من الكوفيين والبصريين، فأما البصريون: فجعلوا قوله:"وسألوه الزاد" إلى آخر الحديث من قول الشعبي مرسلًا، وأما يحيى بن أبي زائدة وغيره من الكوفيين فأدرجوه في حديث ابن مسعود عن النبي صلى الله عليه وسلم، والصحيح: قول من فصله، فإنه من كلام الشعبي مرسلًا".
والحديث رواه الترمذي (18) عن هناد، حدثنا حفص بن غياث، عن داود بن أبي هند، عن الشعبي، عن علقمة، عن عبد الله بن مسعود قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تستنجوا بالروث ولا بالعظام، فإنه زاد إخوانكم من الجن".
قال:"وقد روي هذا الحديث إسماعيل بن إبراهيم وغيره، عن داود بن أبي هند، عن الشعبي، عن علقمة، عن عبد الله أنه كان مع النبي صلى الله عليه وسلم ليلة الجن"، الحديث بطوله، فقال الشعبي: إن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا تستنجوا بالروث ولا بالعظام، فإنه زاد إخوانكم من الجن".
وقال:"وكأن رواية إسماعيل أصح من رواية حفص بن غياث".
قلت: وقد رجح مسلم رواية عبد الأعلى، عن داود، على رواية إسماعيل ابن علية وغيره لأنه صدر الحديث برواية عبد الأعلى، ثم قول الدارقطني، والصحيح من قول الشعبي، فإن الشعبي لا يقول مثل هذا من عند نفسه، فإنه لا بد قد وقف على المرفوع إلا أنه اختصر المسند، فيكون قوله في حكم المرفوع، فرجع الأمر إلى ترجيح ما رواه مسلم مرفوعًا.
ولحديث ابن مسعود طرق أخرى مرفوعة تقوي ما ذهب إليه مسلم، وسيأتي ذكر بعضها في
كتاب بدء الخلق.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আলকামা বলেন, আমি ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম: তোমাদের মধ্যে কেউ কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে জ্বীনের রাতে উপস্থিত ছিল? তিনি বললেন: না। কিন্তু এক রাতে আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলাম, তখন আমরা তাঁকে খুঁজে পাচ্ছিলাম না। আমরা তাঁকে উপত্যকা ও গিরিপথসমূহে খুঁজে ফিরলাম। আমরা বললাম: তাঁকে হয়তো বা জিনে উঠিয়ে নিয়ে গেছে, অথবা তাঁকে হত্যা করা হয়েছে! তিনি বললেন: এরপর আমরা খুব খারাপ অবস্থায় রাত কাটালাম, যেমন খারাপ রাতে কোনো কাওম রাত কাটাতে পারে। যখন সকাল হলো, তিনি হেরা পাহাড়ের দিক থেকে আসলেন। তখন আমরা বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আমরা আপনাকে খুঁজে পাচ্ছিলাম না এবং আপনাকে অনেক খুঁজেছি, কিন্তু পাইনি। আর আমরা খুবই খারাপ রাতে রাত কাটালাম। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “আমার নিকট জ্বীনের একজন আহ্বানকারী এসেছিল, তাই আমি তার সাথে গিয়েছিলাম এবং আমি তাদের সামনে কুরআন তিলাওয়াত করেছিলাম।” তিনি (ইবনে মাসঊদ) বললেন: এরপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিয়ে গেলেন এবং তাদের (জ্বীনদের) পদচিহ্ন ও তাদের আগুনের চিহ্ন দেখালেন। আর তারা তাঁর নিকট খাবার চাইল। তখন তিনি বললেন: “আল্লাহর নাম নেওয়া হয়েছে এমন প্রতিটি হাড় তোমাদের জন্য, যা তোমাদের হাতে পড়বে তা হবে সর্বাধিক মাংসে পূর্ণ। আর প্রতিটি গোবর বা শুকনো বিষ্ঠা তোমাদের জন্তুদের জন্য খাদ্য।” রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “সুতরাং তোমরা ঐ দু'টি দিয়ে ইস্তিঞ্জা করো না; কেননা এগুলি তোমাদের ভাইদের (জ্বীনদের) খাদ্য।”
1374 - عن أبي هريرة قال: اتبعتُ النبي صلى الله عليه وسلم وخرج لحاجته، فكان لا يلتفتُ، فدنوتُ منه، فقال:"ابغني أحجارا أستنفضُ بها - أو نحوه - ولا تأْتِني بعظم ولا روث". فأتيته بأحجار بطرف ثيابي فوضعتُها إلى جنْبه وأعرضتُ عنه، فلما قضى أتْبعَه بهِنَّ.
صحيح: رواه البخاري في كتاب الطهارة مختصرًا (155)، ورواه في كتاب المناقب، باب ذكر الجن (3860)، من طريق عمرو بن يحيى بن سعيد، قال: أخبرني جدِّي، (أي سعيد بن عمرو بن سعيد بن أبي العاص) عن أبي هريرة. وفيه قال أبو هريرة: فقلت: ما بال العظم والروثة؟ فقال:"هما طعام الجن، وإنه أتاني وفد من جن نصيبين، ونعم الجن، فسألوني الزاد، فدعوت الله أن لا يمروا بعظْم ولا بروثةٍ إلا وجدوا عليها طعامًا".
وزاد الدارقطني (1/ 56) بإسناد آخر عن أبي حازم، عن أبي هريرة: أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم نهى أن يستنجى بعظم أو روثٍ، وقال:"إنَّهما لا يُطهِّران". وقال عقبه الدارقطني:"إسناده صحيح".
لكن تكلّم ابن عدي في أحد رواته، وهو سلمة بن رجاء الذي يروي عن الحسن بن فرات، عن أبيه، عن أبي حازم به. قال ابن عدي:"لا أعلم رواه عن فرات غير ابنه الحسن، وعن الحسن سلمة بن رجاء، ولسلمة بن رجاء غير ما ذكرت من الحديث، وأحاديثه أفراد وغرائب، ويحدِّث عن قومٍ بأحاديث لا يُتابع عليها". انتهى
وقوله"أستنفض بها" من الاستنفاض، وهو إزالة الأذى والاستنجاء، وأصل النفض: الحركة والإزالة، (نفضتُ الثوب) إذا أزَلتَ غباره عنه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের অনুসরণ করলাম। তিনি তাঁর প্রাকৃতিক প্রয়োজন পূরণের জন্য বের হলেন। তিনি (পেছনে) ফিরে তাকাচ্ছিলেন না। আমি তাঁর কাছে গেলাম। তখন তিনি বললেন: "আমার জন্য কিছু পাথর খুঁজে আনো, যা দিয়ে আমি পরিষ্কার হতে পারি – অথবা অনুরূপ কিছু – কিন্তু আমার কাছে কোনো হাড্ডি বা গোবর এনো না।" অতঃপর আমি আমার কাপড়ের কোণায় করে কিছু পাথর এনে তাঁর পাশে রাখলাম এবং তাঁর থেকে মুখ ফিরিয়ে নিলাম। যখন তিনি (প্রয়োজন) সেরে নিলেন, তখন তিনি সেগুলো দ্বারা (শৌচকার্য) করলেন।
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি জিজ্ঞাসা করলাম: "হাড্ডি ও গোবরে কী হলো (কেন নিষেধ করলেন)?" তিনি বললেন: "এগুলো হলো জিনদের খাদ্য। একবার নসীবাইনের উত্তম জিনদের একটি প্রতিনিধিদল আমার কাছে এসেছিল। তারা আমার কাছে খাদ্য চেয়েছিল। তখন আমি আল্লাহর কাছে দু'আ করলাম যে, তারা যেন কোনো হাড্ডি বা গোবরের কাছ দিয়ে না যায়, কিন্তু তার উপর যেন খাবার খুঁজে পায়।"
ইমাম দারাকুতনী (রাহিমাহুল্লাহ) অন্য এক সূত্রে আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাড্ডি বা গোবর দ্বারা ইস্তিঞ্জা (শৌচকার্য) করতে নিষেধ করেছেন এবং বলেছেন: "নিশ্চয়ই এই দুটো পবিত্র করে না।"
1375 - عن جابر بن عبد الله قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يُتمسَّح بعظمٍ أو بيعرٍ.
صحيح: رواه مسلم في الطهارة (263) عن أبي الزبير أنه سمع جابرا يقول، فذكر الحديث.
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম হাড় অথবা গোবর দিয়ে পবিত্রতা অর্জন করতে নিষেধ করেছেন।
1376 - عن شيبان القِتْباني أن مسلمة بن مُخَلَّد استعمل رُويفع بن ثابت على أسفل الأرض، قال شيبان: فسرنا معه من كُوم شريك إلى عَلْقَماءَ، أو من علقماءَ إلى كوم شريك - يريد عِلْقَام - فقال رويفع: إن كان أحدنا في زمن رسول الله صلى الله عليه وسلم ليأخذ نِضْوَ أخيه على أن له النصف مما يغنم ولنا النصف، وإن كان أحدنا ليطير له النصل والريش، وللآخر القدح، ثم قال: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يا رُويفع! لعل الحياة ستطول بك بعدي، فأَخبرِ الناس أنه من عقد لحيته، أو تقلد وَتَرًا، أو استنجي برجيع دابة أو عظمٍ فإن محمدا منه بريء".
حسن: أخرجه أبو داود (36) عن عَيَّاش بن عباس القِتْباني، أن شُيَيْم بن بَيْتان أخبره، عن شَيبان القِتْباني، فذكر الحديث.
وشيبان - وهو ابن أمية، يكنى أبا حذيفة، كما قال أبو داود وسكت عنه - وقال الحافظ في التقريب:"مجهول"، وقال في تهذيب التهذيب:"روى عنه شُيَيم بن بيتان وبكر بن سوادة".
وعلى هذا فهو على شرط ابن حبان، إلا أنه لم يذكره في الثقات على قاعدته في توثيق المجاهيل، كما لم يذكره أيضًا في المجروحين.
ولكن رواه النسائي (5067) عن عياش بن عباس القتباني، أن شُيَيم بن بينان حدثه أنه سمع رويفع بن ثابت يقول، فذكر الجزء المرفوع.
وشُيَيْم بن بيتان قد صحّ سماعه من رويفع، ووثقه ابن معين وغيره، فصحّ الإسناد بدون شيبان القتباني، فلعله سمع منه أولًا، ثم سمع من رويفع مباشرة، إلا أن البزار قال في"مسنده":"شُيَيْم غير مشهور" ذكره الحافظ في تهذيب التهذيب في ترجمته.
ثم روى أبو داود رواية ثانية من حديث عبد الله بن عمرو، قال: حدثنا يزيد بن خالد، ثنا مفضل عن عيّاش، أن شُيَيْم بن بيتان أخبره بهذا الحديث أيضًا عن أبي سالم الجيشاني، عن عبد الله بن عمرو، يذكر ذلك وهو معه مرابطٌ بِحصن باب أليون.
وقد حكم بعض أهل العلم على الحديث بالاضطراب؛ لأجل الخلاف في الإسناد؛ فإنه مرة جُعل الحديث من مسند رويفع بن ثابت، وأخرى من مسند عبد الله بن عمرو، ثم الراوي عن رويفع مرة شيبان بن أمية، وأخرى شُيَيْم بن بيتان.
ويمكن دفع هذا الاضطراب بأن يجعل الحديث من مسندي رويفع وعبد الله، ثم أن شُيَيْم سمع أولًا من شيبان فروى عنه عن رويفع، ثم سمع مباشرة عن رويفع فروى عنه، كما في رواية النسائي، وأحمد (4/ 108).
فإن شُيَيْم ثقة لا يحكم عليه بالاضطراب ما أمكن الجمع.
ضبط الأسماء وشرح الأماكن:
- حصن أليون: على جبل بالفسطاط. قاله أبو داود.
- القِتْباني - بكسر القاف وسكون المثناة الفرقانية ونون - نسبة إلى قتبان بن رومان.
- شُيَيْم - بضم أوله وفتح تحتانيته وسكون مثلها مصغرا، وقيل: بكسر أوله، ابن بيتان، بلفظ تثنية بيت.
- ومُخلَّد - على وزن محمد - ومسلمة بن مخلد الأنصاري الزرقي، كان واليا على مصر أيام معاوية، قال البخاري: كان له صحبة، مات سنة 62 هـ، وكانت ولايته على مصر وإفريقية ست عشرة سنة.
- وقوله (استعمل) أي: جعل رويفع بن ثابت عاملًا وأميرًا على أسفل الأرض، أي: أرض مصر، وهو الوجه البحري، وقيل: الغربي.
- كُوم شريك: وشريك هو ابن سمي المرادي الغطيفي، صحابي، شهد فتح مصر، وإنما
أضيف له كوم إذ إن عمرو بن العاص لما سار لفتح الإسكندرية، وشريك على مقدمته خرج عليهم جمع عظيم من الروم، فخافهم على أصحابه، فلجأ إلى الكوم ودافعهم، وهو في طريق الإسكندرية.
- علقماء - بفتح العين وسكون اللام ثم القاف مفتوحة - موضع من أسفل ديار مصر.
- وقوله (أو من علقماء إلى كوم شريك): هذا شك من شيبان، والمراد به: أنّ ابتداء السير كان من كوم شريك أو من علقماء، وعلى كل تقدير فمن أحد الموضعين كان ابتداء السير، وإلى الآخر انتهاؤه.
- قوله (يريد علقام): وهو موضع آخر غير علقماء، ويقال له: كوم علقام.
- والنضو: البعير المهزول، يقال: بعير نضو، وناقة نضو ونضوة، وهو الذي أنفاه العمل وهزله الكدّ والجهد. وفي هذا حجة لمن أجاز أن يعطي الرجل فرسه أو بعيره على شطر ما يصيبه المستأجر من الغنيمة.
- وقوله (وإن كان أحدنا ليطير له النصل) أي: يصيبه في القسمة، يقال: (طار لفلان النصف، ولفلان الثلث) إذا وقع له ذلك في القسمة.
- والقدح: خشب السهم قبل أن يراش ويركب فيه النصل.
وغرض رويفع رضي الله عنه من هذا الكلام بيان حال ابتداء الإسلام بأنه كان إذ ذاك خفيفا، وفيه إعلام بأنه كان قديم الإسلام
- وقوله صلى الله عليه وسلم:"أخبر الناس أنه من عقد لحيته" قال الخطابي: يفسر ذلك على وجهين: أحدهما: ما كانوا يفعلونه من ذلك في الحروب؛ كانوا في الجاهلية يعقدون لحاهم، وذلك من زيّ الأعاجم، يفتلونها ويعقدونها.
وقيل معناه: معالجة الشعر ليتعقد ويتجعد، وذلك من فعل أهل التوضيع والتأنيث. انتهى.
- وقوله عليه الصلاة السلام:"أو تقلد وَتَرًا" وهو: خيط فيه تعويذ، أو خرزات لدفع العين، والحفظ عن الآفات، كانوا يعلقونها على رقبة الولد والفرس، فأبطل النبي صلى الله عليه وسلم ذلك من فعلهم ونهاهم عنه.
وقال أبو عبيدة: الأشبه أنه نهى عن تقليد الخيل أوتار القسي، نُهُوا عن ذلك إما لاعتقادهم أن تقليدها بذلك يدفع عنها العين، أو مخافة اختناقها به، لا سيما عند شدة الركض، بدليل ما روي أنه صلى الله عليه وسلم أمر بقطع الأوتار عن أعناق الخيل.
- وقوله:"فإن محمدًا منه بريء" من باب الوعيد والمبالغة في الزجر الشديد.
রুইফা‘ বিন সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, শায়বান আল-কিত্ববানী থেকে বর্ণিত যে, মাসলামাহ ইবনে মুখাল্লাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রুইফা‘ বিন সাবিতকে নিম্ন অঞ্চলের শাসক হিসেবে নিযুক্ত করেন। শায়বান বলেন: আমরা তাঁর সাথে কুম শারিক থেকে আলক্বামা পর্যন্ত, অথবা আলক্বামা থেকে কুম শারিক পর্যন্ত—অর্থাৎ আলক্বামের দিকে—সফর করেছিলাম। অতঃপর রুইফা‘ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর যুগে আমাদের কেউ কেউ তার অপর ভাইয়ের দুর্বল উট নিত এই শর্তে যে, যুদ্ধে যা গনীমত পাওয়া যেত তার অর্ধেক সে পেত এবং বাকি অর্ধেক আমরা পেতাম। আর আমাদের কেউ কেউ (বণ্টনে) তীরফলক ও পালক পেত, এবং অন্যজন পেত তীরের কাষ্ঠখণ্ড। এরপর তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে বলেছেন: “হে রুইফা‘! সম্ভবত আমার পরে তোমার জীবন দীর্ঘ হবে। অতএব তুমি লোকদের জানিয়ে দাও যে, যে ব্যক্তি তার দাড়িকে পেঁচিয়ে রাখল (বা বাঁধল), অথবা যে তাগা বা ধনুকের রজ্জু পরিধান করল, অথবা যে কোনো পশুর গোবর বা হাড় দিয়ে ইস্তিনজা করল, তবে মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার থেকে মুক্ত।”
1377 - عن أنس بن مالك يقول: كان النبي صلى الله عليه وسلم إذا خرج لحاجته أجيء أنا وغلام معنا
إداوة من ماء. يعني يستنجي به.
متفق عليه: رواه البخاري في الوضوء (150) واللفظ له، ومسلم في الطهارة (271) كلاهما من طريق شعبة عن أبي معاذ - وهو عطاء بن أبي ميمونة - أنه سمع أنس بن مالك يقول، فذكر الحديث. ولفظ مسلم: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يدخل الخلاءَ، فأحمل أنا وغلام نحوي إداوةً من ماءٍ وعَنَزةً، فيستنجي بالماء.
وفي حديث غير شعبة عند مسلم: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم دخل حائطا، وتبعه غلام معه ميضأةً، هو أصغرنا، فوضعها عند سِدْرةٍ، فقضى رسول الله صلى الله عليه وسلم حاجته، فخرج علينا وقد استنجى بالماء. وفي رواية عنده: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يتبرز لحاجته، فآتيه بالماء فيتغسَّلُ به.
شرح المفردات:
"عنَزة" يعني عصا طويلة في أسفلها زجّ، ويقال رمح صغير.
"ميضأة" هو الإناء الذي يتوضأ به كالركوة والإبريق وشبههما.
"سِدرة" شجرة النبق.
"يتبرز" معناه يأتي البراز، وهو المكان الواسع الطاهر من الأرض؛ ليخلو لحاجته ويبعد عن أعين الناظرين.
"فيتغسَّلُ به" معناه يستنجي به، ويغسل محل الاستنجاء.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন প্রয়োজন সারতে যেতেন, তখন আমি এবং আমাদের সঙ্গে থাকা একটি বালক পানির একটি পাত্র (ইদাওয়াহ) নিয়ে আসতাম। অর্থাৎ তিনি তা দ্বারা ইসতিনজা (পবিত্রতা অর্জন) করতেন।
1378 - عن عائشة قالت: مُرْنَ أزواجَكنَّ أن يستطيبوا بالماء؛ فإني - أسْتَحْيِيهم منه، فإن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يفعلُه.
صحيح: رواه الترمذي (19) والنسائي (46) كلاهما عن قتيبة، قال: حدثنا أبو عوانة، عن قتادة، عن معاذة، عنها.
قال الترمذي:"حسن صحيح". وصححه أيضًا ابن حبان (1443).
قلت: وهو كما قال؛ فإن إسناده صحيح.
أبو عوانة هو: وضاح بن عبد الله اليشكري، مشهور بكنيته، ثقة ثبت.
ومعاذة هي: بنت عبد الله العدوية أم الصهباء البصرية، ثقة فاضلة.
وقولها:"كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يفعله" أي: فهو أولى وأحسن، ولم يرد أن الاكتفاء بالأحجار لا يجوز، وكانت رضي الله عنها تستحيي أن تأمر الرجال بذلك فأوعزت إلى النساء أن يأمرن أزواجهن أن يستنجوا بالماء
وأما ما روي عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"نزلت في أهل قُباء: {فِيهِ رِجَالٌ يُحِبُّونَ أَنْ يَتَطَهَّرُوا وَاللَّهُ يُحِبُّ الْمُطَّهِّرِينَ} [سورة التوبة 108] قال: كانوا يستنجون بالماء؛ فنزلت فيهم هذه
الآية" فهو حديث ضعيف، رواه أبو داود (44) والترمذي (3100) وابن ماجه (357) كلهم من طريق معاوية بن هشام، عن يونس بن الحارث، عن إبراهيم بن أبي ميمونة، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.
قال الترمذي: غريب من هذا الوجه.
قلت: فيه علتان: يونس بن الحارث الثقفي الطائفي ضعيف، وإبراهيم بن أبي ميمونة مجهول الحال. انظر للمزيد:"المنة الكبري" (1/ 91).
ومنها حديث عُويم بن ساعدة بمعناه وفيه ضعف، وسيأتي تخريجه كاملًا في كتاب التفسير إن شاء الله تعالى.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তোমরা তোমাদের স্বামীদের আদেশ করো যেন তারা পানি দ্বারা ইস্তিঞ্জা (শৌচকার্য) করে; কারণ আমি তাদের এ বিষয়ে বলতে লজ্জা বোধ করি। নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এটি করতেন।
1379 - عن عائشة أن أزواج النبي صلى الله عليه وسلم كنّ يخرجن بالليل إذا تبرَّزْن إلى المناصِع - وهو صَعيد أفْيَحُ - فكان عمر يقول للنبي صلى الله عليه وسلم: احجُبْ نساءَك، فلم يكن رسول الله صلى الله عليه وسلم يفعل، فخرجت سَودةُ بن زَمْعة زوج النبي صلى الله عليه وسلم ليلةً من الليالي عِشاءً، وكانت امرأةً طويلةً، فناداها عمر: ألا قد عرفناكِ يا سَودةُ! حِرصًا على أن يُنْزلَ الحجابُ؛ فأنزل الله آية الحجاب.
متفق عليه: رواه البخاري في الوضوء (146) ومسلم في السلام (2170/ 18) كلاهما من حديث ابن شهاب، عن عروة، عن عائشة فذكرت الحديث.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর স্ত্রীগণ রাতে প্রাকৃতিক প্রয়োজন সারতে মানাসি নামক স্থানে যেতেন—যা ছিল এক প্রশস্ত উন্মুক্ত স্থান। তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে বলতেন: আপনার স্ত্রীদেরকে পর্দার ব্যবস্থা করুন। কিন্তু রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তা করতেন না। এরপর এক রাতে ইশার সময় নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর স্ত্রী সাওদা বিনত যাম‘আ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বের হলেন। তিনি ছিলেন দীর্ঘাঙ্গী মহিলা। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন তাঁকে ডেকে বললেন: হে সাওদা, আমরা তোমাকে চিনে ফেলেছি! (তিনি এমনটি বলেছিলেন) এ কারণে যে, যেন পর্দার আয়াত নাযিল হয়। ফলে আল্লাহ পর্দার আয়াত নাযিল করলেন।
1380 - عن عائشة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"قد أُذِن أن تخرجْنَ في حاجتكن". قال هشام: يعني البراز.
متفق عليه: رواه البخاري في الوضوء (147) هكذا مختصرا عن زكريا قال: حدثنا أبو أسامة، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، فذكرت الحديث. ورواه في التفسير (4795) مفصلا بالإسناد السابق، - وزكريا هو: ابن يحيى - قالت فيه عائشة: خرجَتْ سودة بعد ما ضُرب الحجابُ لحاجتها، وكانت امرأة جسيمة لا تخفى على من يعرفها، فرآها عمر بن الخطاب فقال: يا سَودة! أما والله! ما تَخْفَينَ علينا؛ فانظري كيف تَخْرُجين، قالت: فانكفأتْ راجعة، ورسول الله صلى الله عليه وسلم في بيتي، وإنه ليتعشَّى وفي يده عَرُقٌ، فدخلت فقالت: يا رسول الله! إني خرجتُ لبعض حاجتي، فقال لي عمر كذا وكذا، قالت: فأوحى الله إليه، ثم رفع عنه، وإن العرْق في يده ما وضعه، فقال:"إنه قد أُذِن لكُنّ أن تخرجْن لحاجتكنّ".
ورواه أيضًا مسلم في السلام (2170/ 17) عن أبي بكر بن أبي شيبة وأبي كريب قالا: حدثنا أبو أسامة به مثله، وفيه:"وكانت امرأة جسيمة تفرعُ النساء جسمًا". ومعني تفرع: تطول؛ يقال:
فرعتُ القومَ، أي: طُلتُهم. والعَرْق: هو العظم الذي عليه بقية لحم.
وظاهر رواية هشام يخالف رواية ابن شهاب؛ فإن في رواية هشام وقعت القصة بعد نزول الحجاب، وفي رواية ابن شهاب قبل نزول الحجاب، فالجواب: لعل القصة وقعت مرتين لغرضين مختلفين، رواهما عروةُ في مجلسين مختلفين، فروى كل من هشام وابن شهاب ما سمع منه.
وقوله صلى الله عليه وسلم:"إنه قد أُذن لكنَّ أن تخرجْنَ لحاجتكنّ" أي: لم يفرض بناء الكنف في البيوت حتى يُمنعن من الخروج؛ لأن الخروج لحاجة الإنسان لا يحتاج إلى الإذن، فلما بُنيت الكُنُفُ في البيوت مُنِعن من الخروج إلا لحاجة؛ ففي حديث عبد الله بن عمر:"ارتقيت فوق ظهر يت حفصة لبعض حاجتي فرأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقضي حاجته مستدبر القبلة ومستقبل الشام" دليل على بناء الأخلية في البيوت.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন পর্দার বিধান নাযিল হলো, তখন সাওদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর প্রয়োজনে বাইরে গেলেন। তিনি ছিলেন দীর্ঘদেহী মহিলা, ফলে যারা তাঁকে চিনত তাদের থেকে লুকানো তাঁর পক্ষে সম্ভব ছিল না। উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে দেখে বললেন, “হে সাওদা! আল্লাহর কসম! আপনি আমাদের থেকে লুকাবেন না; সুতরাং দেখুন, আপনি কীভাবে বের হচ্ছেন।”
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তখন সাওদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ফিরে এলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন আমার ঘরে রাতের খাবার খাচ্ছিলেন এবং তাঁর হাতে ছিল একটি ‘আরক্ব’ (মাংসযুক্ত হাড়)। সাওদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ঘরে প্রবেশ করে বললেন, “হে আল্লাহর রাসূল! আমি আমার কোনো প্রয়োজনে বাইরে গিয়েছিলাম, তখন উমার আমাকে এমন এমন কথা বলেছেন।”
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, অতঃপর তাঁর প্রতি অহী নাযিল হলো। যখন অহীর অবস্থা দূর হলো, তখনো তাঁর হাতে সেই ‘আরক্ব’ (মাংসযুক্ত হাড়) ছিল, তিনি তা নিচে রাখেননি। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তোমাদের প্রয়োজনে (প্রাকৃতিক ডাকে সাড়া দিতে) বাইরে যাওয়ার অনুমতি দেওয়া হয়েছে।”
1381 - عن المغيرة بن شعبة أن النبي صلى الله عليه وسلم كان إذا ذهب المذهب أبعد.
حسن: رواه أبو داود (1) والترمذي (20) والنسائي (17) وابن ماجه (331) كلّهم من طريق محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن المغيرة بن شعبة به.
وزاد النّسائي: فذهب لحاجته وهو في بعض أسفاره فقال:"ائتني بوضوء" فأتيته بوضوء، فتوضأ ومسح على الخفين. قال الترمذي: حسن صحيح.
وصححه ابن خزيمة (50) والحاكم (1/ 140) فأخرجاه من طريق محمد بن عمرو به قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".
قلت: رجاله ثقات غير محمد بن عمرو بن علقمة الليثي أبي عبد الله المدني أحد أئمة الحديث، وثَّقه النسائي، وروى له مسلم متابعة، فهو لا ينزل عن درجة الحسن. وأمَّا الجوزجاني فقال: ليس بالقويِّ.
وقوله (كان إذا ذهب المذهب) - بفتح الميم والهاء بينهما ذال معجمة ساكنة، مفعل من الذهاب - قال أبو عبيدة وغيره: هو اسم لموضعِ التغوَّطِ، يقال له المذهب والخلاء والمَرْقَق والمِرْحاض."شرح السيوطي للنسائي".
মুগীরাহ ইবনু শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন প্রাকৃতিক প্রয়োজন মেটানোর জন্য যেতেন, তখন তিনি অনেক দূরে চলে যেতেন।
1382 - عن عبد الرحمن بن أبي قُراد قال: خرجت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى الخلاء، وكان إذا أراد الحاجة أبعد.
صحيح: رواه النسائي (16) وابن ماجه (334) كلاهما من طريق يحيي بن سعيد القطان، عن أبي جعفر عمير بن يزيد الخَطْمي، عن عُمارة بن خزيمة والحارث بن فُضيل، عن عبد الرحمن بن أبي قُراد.
وفي سنن ابن ماجه: قال عبد الرحمن بن أبي قُراد: حججتُ مع النبي صلى الله عليه وسلم فذهب لحاجته فأبعد. قلت: إسناده صحيح. وصححه أيضًا ابن خزيمة (51).
আব্দুল রহমান ইবনে আবি কুরাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে খোলা ময়দানে বের হলাম, আর যখন তিনি প্রাকৃতিক প্রয়োজন পূরণের ইচ্ছা করতেন, তখন তিনি অনেক দূরে চলে যেতেন।
1383 - عن ابن عمر، قال: كان النبيُّ صلى الله عليه وسلم يذهب لحاجته إلى المُغَمِّس. قال نافعٌ:
نحوًا من ميلين من مكَّةَ.
صحيح: رواه أبو يعلى (5600)، والطبراني في"المعجم الكبير" (12/ 451). و"الأوسط" (5/ 469) من طرق، عن سعيد بن أبي مريم، قال أخبرنا نافع بن عمر الجمحي، عن عمرو بن دينار، عن ابن عمر، فذكر مثله. ومن هذا الوجه أخرجه السراج في مسنده (17) وإسناده صحيح.
قال الطبراني في"الأوسط":"لم يرو هذا الحديث عن عمرو بن دينار إلَّا نافع بن عمر، تفرَّد به ابن أبي مريم".
قلت: نافع بن عمر هو: الجمحي المكي ثقة ثبت.
وابن أبي مريم هو: سعيد بن الحكم بن محمد بن سالم بن أبي مريم الجُمحي بالولاء أبو محمد المصري، ثقة ثبت أيضًا. وكلاهما من رجال الجماعة.
قال الهيثمي في"المجمع" (1/ 203):"رواه أبو يعلى والطبراني في الكبير والأوسط، ورجاله ثقات من أهل الصحيح".
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর প্রয়োজন পূরণের জন্য মুগাম্মিস নামক স্থানে যেতেন। নাফে’ বলেন: তা মক্কা থেকে প্রায় দুই মাইল দূরে অবস্থিত।
1384 - عن جابر بن عبد الله: أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم كان إذا أراد البراز انطلق حتَّى لا يراه أحد حسن: رواه أبو داود (2) وابن ماجه (334) كلاهما من طريق إسماعيل بن عبد الملك، عن أبي الزبير، عن جابر بن عبد الله فذكر مثله. واللفظ لأبي داود. ولفظ ابن ماجه: قال:"خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في سفر، وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم لا يأتي البراز حتَّى يتغيَّبَ فلا يُري".
وإسناده حسن من أجل إسماعيل بن عبد الله فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا كان لحديثه أصول ثابتة. وهذا منه.
জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন শৌচকার্য করার ইচ্ছা করতেন, তখন তিনি এত দূরে চলে যেতেন, যেন কেউ তাঁকে দেখতে না পায়।
1385 - عن عائشة قالت: من حدّثكم أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يبول قائما فلا تصدقوه؛ ما كان يبول إلا قاعدا.
حسن: رواه الترمذي (12) والنسائي (29) وابن ماجه (307) كلهم من طريق شريك، عن المقدام بن شريح، عن أبيه، عن عائشة به.
قال الترمذي:"حديث عائشة أحسن شيء في الباب وأصحّ".
إلا أنه لم يحكم عليه بالصّحة ولا بالحسن، وإنما قال:"أحسن شيء في الباب وأصحّ" بمقابل حديث عمر قال:"رآني النبي صلى الله عليه وسلم وأنا أبول قائما فقال:"يا عمر! لا تَبُلْ قائما"، قال: فما بُلتُ قائما". قال الترمذي:"إنما رفع هذا الحديث عبد الكريم بن أبي المخارق، وهو ضعيف عند أهل الحديث، ضعّفه أيوب السختياني وتكلم فيه" انتهي.
قلت: وحديث عمر هذا أخرجه أيضًا ابن ماجه (1/ 112) من طريق عبد الكريم بن أبي
المخارق، إلا أنه قال: عبد الكريم بن أبي أمية. والصواب: أبو أمية كنية عبد الكريم.
قال البوصيري في الزوائد:"عبد الكريم متفق على تضعيفه، وقد تفرد بهذا الخبر".
وكذلك لا يصحّ ما روي عن جابر بن عبد الله قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يبول قائمًا. رواه ابن ماجه (309) من طريق عدي بن الفضل، عن علي بن الحكم، عن أبي نضرة، عن جابر بن عبد الله، فذكر مثله. إسناده ضعيف جدًّا؛ فإنّ عديّ بن الفضل التيمي أبو حاتم البصري متروك كما قال أبو حاتم، وترك أبو زرعة حديثه، وضعَّفه ابن معين والنسائي وغيرهما، وليس له في الكتب الستّة إلَّا هذا الحديث وحده رواه ابن ماجه.
وأما حديث عائشة ففي إسناده شريك، وهو ابن عبد الله النخعي الكوفي القاضي، قال فيه ابن معين: ثقة يغلط. وقال يعقوب بن سفيان: ثقة سيئ الحفظ. وفي التقريب: صدوق يخطئ كثيرا، تغير حفظه منذ ولي قضاء الكوفة.
قلت: ولكنه لم ينفرد؛ فقد رواه أحمد (6/ 136) والحاكم (1/ 181) والبيهقي (1/ 101) من طرق عن سفيان، عن المقدام بن شريح به. وصححه ابن حبان (1430) والحاكم، وقال:"صحيح على شرط الشيخين"
قلت: لم يخرج البخاري للمقدام بن شريح وأبيه.
وبقية رجال حديث عائشة ثقات.
ومعنى النهي عن البول قائما قال الترمذي:"على التأديب لا على التحريم، وقد رُوي عن عبد الله بن مسعود قال: إن من الجفاء أن تبول وأنت قائم" انتهى.
إلا أن حديث عائشة لا يعارض حديث حذيفة؛ فإنها أخبرت بما علمت، والرجل أعلم بهذا منها، كما قال سفيان الثوري ذكره ابن ماجه. وقال: قال أحمد بن عبد الرحمن، وكان من شأن العرب البول قائما، ألا تراه في حديث عبد الرحمن بن حسنة يقول: قعد يبول كما تبول المرأة.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যে ব্যক্তি তোমাদেরকে বলে যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়িয়ে পেশাব করতেন, তোমরা তাকে বিশ্বাস করো না; তিনি বসে ছাড়া কখনো পেশাব করতেন না।
1386 - عن حذيفة قال: كنت مع النبي صلى الله عليه وسلم فانتهى إلى سُباط قوم، فبال قائما، فتنحّيتُ، فقال:"ادنُه"، فدنوتُ حتى قمت عند عقبيه، فتوضأ، فمسح على خفيه.
متفق عليه: رواه البخاري في الوضوء (224، 225) من طريق شعبة، ومسلم في الطهارة (273) من طريق أبي خثيمة - كلاهما عن الأعمش، عن أبي وائل، عن حذيفة فذكر مثله واللفظ المسلم، وأما البخاري فلم يذكر"فمسح على خفيه". هذا هو الصحيح من حديث حذيفة.
وأما ما رواه ابن ماجه (306) من طريق شعبة، عن عاصم، عن أبي وائل، عن المغيرة بن شعبة"أن النبي صلى الله عليه وسلم أتي سباط قوم فبال قائمًا: فقال شعبة: قال عاصم يومئذ: وهذا الأعمش يرويه عن أبي وائل، عن
حذيفة - يعني كما قال الأعمش، فتابع منصور الأعمش على روايته عن أبي وائل، عن حذيفة.
فظهر خطأ عاصم في رواية هذا الحديث، عن أبي وائل، عن المغيرة بن شعبة. وقد رجَّح الترمذي رواية أبي وائل عن حذيفة، على روايته عن المغيرة. قال الحافظ في"الفتح" (1/ 329):"وهو كما قال، وإن جنح ابن خزيمة إلى تصحيح الروايتين لكون حماد بن أبي سليمان وافق عاصمًا على قوله"عن المغيرة"، فجاز أن يكون أبو وائل سمعه منهما، فيصح القولان معًا، لكن من حيث الترجيح رواية الأعمش ومنصور لاتفاقهما أصح من رواية عاصم وحماد لكونهما في حفظهما مقال" إنتهي.
وقوله (بال قائما) الأصل من عادة النبي صلى الله عليه وسلم وهديه أنه كان يبول قاعدا، فلعله بال قائما لبيان الجواز لما أمن من إصابته رشاشة البول؛ لأن السباطة كانت رخوة، فلا يرتد البول إلى البائل.
وسُباطة القوم: هي ملقى القمامة والتراب ونحوه.
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলাম। অতঃপর তিনি একটি কওমের আবর্জনার স্তূপের কাছে গেলেন এবং দাঁড়িয়ে পেশাব করলেন। তখন আমি দূরে সরে গেলাম। তিনি বললেন, "কাছে এসো।" আমি তাঁর কাছে গেলাম, এমনকি তাঁর দুই গোড়ালির পেছনে দাঁড়ালাম। অতঃপর তিনি ওযু করলেন এবং তাঁর মোজা (খুফ্ফাইন)-এর উপর মাসাহ করলেন।
1387 - عن أبي أيوب الأنصاري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا أتي أحدكم الغائط؛ فلا يستقبل القبلة ولا يولِّها ظهره؛ شرِّقوا أو غرِّبوا".
متفق عليه: رواه البخاري في الوضوء (144) ومسلم في الطهارة (264) كلاهما من طريق الزهري، عن عطاء بن يزيد الليثي، عن أبي أيوب الأنصاري. قال أبو أيوب: فقدمنا الشام فوجدنا مراحيض قد بنيت قبل القبلة، فننحرف عنها، ونستغفر الله.
وفي رواية عند مالك في القبلة (1) قال أبو أيوب الأنصاري وهو بمصر: والله! ما أدري كيف أصنع بهذا الكراييس، وقد قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا ذهب أحدكم الغائط أو البول، فلا يستقبل القبلة ولا يستدبرها بفرجه".
ولا منافاة بين الأمرين؛ لأنه يمكن أنه وقع له هذا في البلدين معا.
والكراييس: بياءين، وهي: الكنف، واحدها كرياس، وهو الذي يكون مشرفا على سطح بقناة من الأرض، فإذا كان أسفل فليس بكرياس، وسمي به لما تعلق به من الأقذار ويتكرس، ككرس الدمن. ومن أهل اللغة من جعله بالنون: الكرناس.
আবূ আইয়ুব আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যখন তোমাদের কেউ শৌচকার্যের জন্য যায়, তখন সে যেন ক্বিবলাকে তার সামনেও না রাখে এবং তার দিকে পিঠও না ফিরায়; তোমরা পূর্ব দিকে মুখ করো অথবা পশ্চিম দিকে।"
হাদীসটি মুত্তাফাকুন আলাইহি (ঐকমত্য): এটি বুখারী ‘ওযু’ অধ্যায়ে (১৪৪) এবং মুসলিম ‘পবিত্রতা’ অধ্যায়ে (২৬৪) বর্ণনা করেছেন। উভয়ই যুহরী, আত্বা ইবনু ইয়াযীদ আল-লায়সী, আবূ আইয়ুব আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন।
আবূ আইয়ূব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমরা শামে (সিরিয়ায়) পৌঁছলাম এবং দেখতে পেলাম কিছু শৌচাগার ক্বিবলামুখী করে তৈরি করা হয়েছে। ফলে আমরা সে দিক থেকে ফিরে যেতাম এবং আল্লাহর কাছে ক্ষমা প্রার্থনা করতাম।
মালিকের কিতাব ‘আল-ক্বিবলা’ (১)-এর এক বর্ণনায় আছে, আবূ আইয়ুব আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মিসরে থাকাকালে বললেন: আল্লাহর কসম! আমি জানি না এই ক্বারাঈস (শৌচাগার)-এর সাথে আমি কী করব, অথচ রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যখন তোমাদের কেউ শৌচকার্য বা পেশাবের জন্য যায়, তখন সে যেন ক্বিবলাকে তার সামনেও না রাখে এবং তার লজ্জাস্থান দ্বারা তার দিকে পিঠও না ফিরায়।"
উভয় নির্দেশের মধ্যে কোনো বিরোধ নেই; কারণ সম্ভবত এই বিষয়টি (ক্বিবলামুখী শৌচাগার) তার ক্ষেত্রে উভয় শহরেই ঘটেছিল।
আর 'আল-ক্বারাঈস' (الكراييس) শব্দটি দুটি ইয়া (ي)-সহ লেখা হয়, এবং এটি হলো শৌচাগার বা পায়খানা, যার একবচন হলো 'ক্বিরিয়াস' (كرياس)। এটি হলো এমন স্থান যা ভূপৃষ্ঠ থেকে কোনো নল বা নালার উপর নির্মিত হয়। যদি এটি নিচে তৈরি হয়, তবে তা ক্বিরিয়াস নয়। এই নামে এর নামকরণের কারণ হলো এর সাথে সংযুক্ত ময়লা যা স্তূপীকৃত হয় (يتكرس), যেমন গোবরের স্তূপ। ভাষা বিশেষজ্ঞদের মধ্যে কেউ কেউ এটিকে নূন (ن) দ্বারা 'আল-ক্বারনাস' (الكرناس) হিসেবেও উল্লেখ করেছেন।
