হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (1388)


1388 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إذا جلس أحدكم على حاجته فلا يستقبل القبلة ولا يستدبرها".

صحيح: رواه مسلم في الطهارة (265) مختصرا هكذا. من طريق سهيل، عن القعقاع بن حكيم، عن أبي صالح، عن أبي هريرة فذكره.

ورواه أبو داود (8) وابن ماجه (313) من طريق ابن عجلان، عن القعقاع بن حكيم مطولًا،
وفيه:"إنما أنا لكم بمنزلة الوالد؛ أعلمكم، فإذا أتي أحدكم الغائط فلا يستقبل القبلة ولا يتدبرها، ولا يستطيب بيمينه"، وكان يأمر بثلاثة أحجار، وينهى عن الروث والرِّمة. وأخرجه أيضًا النسائي مختصرًا.

وهذا إسناد حسن لأن فيه ابن عجلان وهو صدوقٌ.

والرِّمّة: العظام البالية.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই আমি তোমাদের জন্য পিতার মতন; আমি তোমাদের শিক্ষা দেই। অতএব, যখন তোমাদের কেউ শৌচাগারে যায়, তখন সে যেন ক্বিবলাকে মুখ না করে এবং পিঠও না করে, আর সে যেন তার ডান হাত দ্বারা ইস্তিঞ্জা না করে।" আর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তিনটি পাথর দ্বারা ইস্তিঞ্জা করার নির্দেশ দিতেন এবং গোবর ও পচা হাড় (ব্যবহার করতে) নিষেধ করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1389)


1389 - عن عبد الله بن الحارث بن جَزْءٍ الزبيدي يقول: أنا أول من سمع النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يبولن أحدكم مستقبل القبلة". وأنا أول من حدّث الناس بذلك.

صحيح: رواه ابن ماجه (317) قال: حدثنا محمد بن رمحٍ المصري، أنا الليث بن سعد، عن يزيد بن أبي حبيب، أنه سمع عبد الله بن الحارث بن جزء يقول، فذكر الحديث.

قال البوصيري في الزوائد: إسناده صحيح، وحكم بصحته ابن حبان والحاكم وأبو ذر الهروي وغيرهم، ولا أعرف له علة .. انتهى.

قلت: وهو كما قال، وقد رواه الإمام أحمد (17700) وغيره من طرق عن الليث بن سعد هكذا. ثم رواه من طريق آخر (17708) عن ابن لهيعة، عن عبيد الله بن المغيرة قال: أخبرني عبد الله بن الحارث بن جَزْءٍ الزبيدي قال: رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يبول مستقبل القبلة، وأنا أول من حدَّث الناس بذلك.

وهذا مما أخطأ فيه ابن لهيعة؛ فإن عبد الله بن الحارث يروي النهي عن استقبال القبلة لا العكس من فعل النبي صلى الله عليه وسلم بأنه كان يبول مستقبل القبلة.




আবদুল্লাহ ইবনু হারিস ইবনু জায আয-যুবায়দি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমিই প্রথম ব্যক্তি, যিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "তোমাদের কেউ যেন ক্বিবলামুখী হয়ে পেশাব না করে।" আর আমিই প্রথম ব্যক্তি, যিনি মানুষকে এ বিষয়ে হাদীস বর্ণনা করেছি।









আল-জামি` আল-কামিল (1390)


1390 - عن عبد الله بن عمر أنه كان يقول: إن ناسا يقولون: إذا قعدت على حاجتك فلا تستقبل القبلة ولا بيت المقدس، فقال عبد الله بن عمر: لقد ارتقيت يوما على ظهر بيتٍ لنا، فرأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم على لَبِنَتَيْن مستقبلا بيت المقدس لحاجته، وقال: لعلك من الذين يُصلّون على أوراكهم؟ فقلت: لا أدري والله!

قال مالك: يعني يصلِّي ولا يرتفع عن الأرض؛ يسجد وهو لاصِقٌ بالأرض.

متفق عليه: رواه مالك في القبلة (3) عن يحيى بن سعيد، عن محمد بن يحيى بن حَبْان، عن عمه واسع بن حَبّان، عن عبد الله بن عمر، فذكر الحديث. ورواه البخاري في الوضوء (145) عن عبد الله بن يوسف، عن مالك به مثله. ورواه مسلم في الطهارة (266) عن عبد الله بن مسلمة، ثنا سليمان بن بلال، عن يحيى بن سعيد، عن محمد بن يحيى، عن عمه واسع بن حَبّان قال:"كنت أصلي في المسجد وعبد الله بن عمر مُسند ظهره إلى القِبلة، فلما قضيت صلاتي انصرفت إليه من
شِقِّي، فقال عبد الله: يقول ناس: إذا قعدت للحاجة تكون لك، فلا تعقد مستقبل القبلة ولا بيت المقدس، قال عبد الله: ولقد رقيتُ على ظهر بيتٍ فرأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم قاعدا على لَبِنتين مستقبلا بيت المقدس لحاجته". وفي رواية عندهما - البخاري (148) ومسلم - عن عبيد الله بن عمر، عن محمد بن يحيى بن حَبّان به، وفيها:"ارتقيتُ فوق بيت حفصة لبعض حاجتي، فرأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقضي حاجته مستدبر القبلة مستقبل الشام".

وعبيد الله بن عمر هو ابن حفص بن عاصم بن عمر بن الخطاب، تابعي صغير من فقهاء أهل المدينة.

وقوله:"لعلّك من الذين يُصلون على أوراكهم!" أي: من يلصق بطنه بوركيه إذا سجد، وهو خلاف هيئة السجود المشروعة، وهي التجافي والتجنح. انظر ما ذكره الحافظ من مناسبة هذه الجملة بما قبله من الحديث.

وفي الحديث دليل على أن خروج النساء للبراز لم يستمرّ، ثم اتخذت الأخلية في البيوت.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলতেন: কিছু লোক বলে থাকে যে, তোমরা যখন প্রাকৃতিক প্রয়োজন সারতে বসো, তখন যেন কিবলা অথবা বায়তুল মুকাদ্দাসের দিকে মুখ না করো। আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমি একদিন আমাদের একটি ঘরের ছাদে উঠলাম। তখন আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তাঁর প্রাকৃতিক প্রয়োজনের জন্য দুটি ইটের উপর বসা অবস্থায় বায়তুল মুকাদ্দাসের দিকে মুখ করে থাকতে দেখলাম। এবং (তিনি আমাকে দেখে) বললেন, “সম্ভবত তুমি কি তাদের মধ্যে একজন, যারা নিজেদের উরুর উপর ভর দিয়ে সালাত আদায় করে?” আমি বললাম, আল্লাহর কসম, আমি জানি না!









আল-জামি` আল-কামিল (1391)


1391 - عن جابر بن عبد الله قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن نستقبل القبلة ببولٍ، فرأيته قبل أن يقبض بعام يستقبلها.

حسن: رواه أبو داود (13) والترمذي (9) وابن ماجه (325) كلهم عن محمد بن بشار، ثنا وهب بن جرير، ثنا أبي، قال: سمعتُ محمد بن إسحاق يحدث عن أبان بن صالح، عن مجاهد، عن جابر بن عبد الله به. وإسناده حسن لأجل محمد بن إسحاق وهو مدلس وقد صرَّح بالتحديث، وصححه أيضًا ابن خزيمة (58) فأخرجه عن محمد بن بشار به مثله. ورواه الدارقطني (1/ 58)، والحاكم (1/ 154) كلاهما من طريق يعقوب بن إبراهيم بن سعد، عن أبيه، عن ابن إسحاق به مثله. وقال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".

وقال الترمذي: حديث حسن غريب، وقد روي هذا الحديث ابن لهيعة، عن أبي الزبير، عن جابر، عن أبي قتادة: أنه رأى النبي صلى الله عليه وسلم يبول مستقبل القبلة، قال: حدثنا بذلك فتية، حدثنا ابن لهيعة. وحديث جابر عن النبي صلى الله عليه وسلم أصحّ من حديث ابن لهيعة" انتهي.

قلت: وهو كذلك؛ فإن ابن لهيعة ضعيف معروف، ولعله حسّن حديث جابر لأجل محمد بن إسحاق؛ فإنه صدوق، وأما تدليسه فزال لتصريحه بالتحديث.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পেশাব করার সময় কিবলামুখী হতে নিষেধ করেছেন। (কিন্তু) আমি তাঁকে তাঁর ইন্তেকালের এক বছর আগে কিবলামুখী হয়ে (পেশাব করতে) দেখেছি।









আল-জামি` আল-কামিল (1392)


1392 - عن مروان الأصفر قال: رأيت ابن عمر أناخ راحلته مستقبل القبلة، ثم جلس يبول إليها، فقلت: يا أبا عبد الرحمن! أليس قد نُهي عن هذا؟ قال: بلى، إنما نهي عن ذلك في الفضاء، فإذا كان بينك وبين القبلة شيء يسترك فلا بأس.

حسن: رواه أبو داود (11) عن محمد بن يحيى بن فارس، ثنا صفوان بن عيسى، عن الحسن ابن ذكوان، عن مروان الأصفر فذكره.

وإسناده حسن لأجل الكلام في الحسن بن ذكوان غير أنه حسن الحديث.
وصححه ابن خزيمة (60)، والحاكم (1/ 154) كلاهما، من طريق الحسن بن ذكوان به. قال الحاكم:"صحيح على شرط البخاري - وفي نسخة: على شرط مسلم -، وقد احتجَّ بالحسن بن ذكوان"، ورواه الدارقطني (1/ 58) وقال:"صحيحٌ رجاله كلُّهم ثقات".




মারওয়ান আল-আসফার থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি ইবনে উমরকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দেখলাম যে তিনি তাঁর উটনীকে কিবলামুখী করে বসালেন, অতঃপর তিনি সেদিকে মুখ করে বসে পেশাব করলেন। তখন আমি বললাম: হে আবূ আবদুর রহমান! এটা কি নিষিদ্ধ করা হয়নি? তিনি বললেন: হ্যাঁ, নিশ্চয় এটা শুধুমাত্র খোলা ময়দানে (ফাযা’তে) নিষিদ্ধ করা হয়েছে। কিন্তু যখন তোমার ও কিবলার মাঝে কোনো আড়ালকারী বস্তু থাকে, তখন কোনো সমস্যা নেই।









আল-জামি` আল-কামিল (1393)


1393 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من لم يستقبل القبلةَ، ولم يستدبرها في الغائط، كُتب له حسنةٌ، ومُحيَ عنه سيئةٌ".

حسن: رواه الطبراني في الأوسط (1343) قال: حدثنا أحمد، قال: حدثنا أحمد بن حرب الموصلي، قال: حدثنا القاسم بن يزيد الجَرْمي، عن إبراهيم بن طهمان، عن حسين المعلم، عن يحيي بن أبي كثير، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكر الحديث.

قال المنذري في"الترغيب" (1/ 136):"رواه الطبراني، ورواتُه رواة الصحيحة".

قلت: ليس كما قال فإن شيخ الطبراني، وشيخ شيخه ليسا من رجال الصحيح، فأجاد الهيثمي في"مجمع الزوائد" (1014) لما قال:"رواه الطبراني في الأوسط ورجاله رجال الصحيح إلا شيخ الطبراني وشيخ شيخه وهما ثقتان".

قلت: شيخ الطبراني هو: أحمد غير منسوب ولكن تعين بما ذكره قبله منسوبًا بأنه: أحمد بن محمد بن عبد الله بن صدقة وهو: أبو بكر البغدادي الإمام الحافظ توفي سنة 293. تاريخ بغداد (5/ 40) وشيخه أحمد بن حرب الموصلي الطائي من رجال التقريب"صدوق" روي له النسائي فقط. وبقية رجاله ثقات.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি শৌচাগারে কিবলার দিকে মুখ করে না এবং পিঠও দেয় না, তার জন্য একটি নেকি লেখা হয় এবং একটি গুনাহ মুছে দেওয়া হয়।”









আল-জামি` আল-কামিল (1394)


1394 - عن ابن عمر قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا أراد الحاجة تنحَّى، ولا يرفع ثيابه حتى يدنو من الأرض.

صحيح: رواه البيهقي في السنن الكبري" (1/ 96) عن أبي الحسن علي بن عبد الله الخسروجردي، أنا أبو بكر الإسماعيلي، ثنا عبد الله بن محمد بن مسلم من أصل كتابه، ثنا أحمد بن محمد بن أبي رجاء المصيمي - شيخ جليل - ثنا وكيع، ثنا الأعمش، عن القاسم بن محمد، عن ابن عمر فذكره. وهذا إسناد صحيح.

وأما ما رواه أبو داود (14) عن زهير بن حرب، حدثنا وكيع، عن الأعمش عن رجل، عن ابن عمر فذكر مثله. فقال أبو داود:"رواه عبد السلام بن حرب، عن الأعمش، عن أنس بن مالك، وهو ضعيف".

قلت: فيه علتان:
إحداهما: في الإسناد الأول رجل لم يّسم.

والثانية: في الإسناد الثاني فيه انقطاع، فإن الأعمش لم يسمع من أنس كما قال الترمذي (1/ 21 - 22) بعد أن رواه من طريق عبد السلام بن حرب، عن الأعمش، عن أنس، وقال: وروي وكيع وأبو يحيى الحماني، عن الأعمش، قال: قال ابن عمر فذكر حديثه وقال:"وكلا الحديثين مرسل، ويقال: لم يسمع الأعمش عن أنس، ولا من أحد من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم. وقد نظر إلى أنس بن مالك قال: رأيتُه يُصَلِّي فذكر عنه حكايةً في الصلاة". انتهى.

وكذلك ما روي عن جابر أن النبي صلى الله عليه وسلم كان إذا أراد الحاجة لم يرفع ثوبه حتى يدنو من الأرض. رواه الطبراني في الأوسط. وفيه الحسين بن عبد الله العجلي كان يضع الحديث كما قال الدارقطني"اللسان" (2/ 296) وقال الهيثمي في"المجمع" (1/ 206) الحسين بن عبد الله العجلي: كان يضع الحديث.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন প্রকৃতির ডাকে সাড়া দিতে চাইতেন, তখন (মানুষের দৃষ্টি থেকে) দূরে সরে যেতেন এবং মাটির কাছাকাছি না হওয়া পর্যন্ত নিজের কাপড় তুলতেন না।









আল-জামি` আল-কামিল (1395)


1395 - عن عائشة قالت: يقولون: إن النبي صلى الله عليه وسلم أوصى إلى عليّ، لقد دعا بالطست ليبول فيها، فانخنثتْ نفسه وما أشعر، فإلى من أوصي؟ ! .

صحيح: رواه النسائي (33) عن عمرو بن علي، أخبرنا أزهر، قال: أخبرنا ابن عون، عن إبراهيم، عن الأسود، عن عائشة فذكرت الحديث.

قال النسائي: أزهر هو ابن سعد السمان.

وأصله في الصّحيحين بدون قولها:"ليبول فيها، البخاريّ في المغازي (4459) عن عبد الله بن محمد، عن أزهر ولفظه: ذكر عند عائشة أن النبي صلى الله عليه وسلم أوصى إلى عليٍّ، فقالت: من قاله، لقد رأيت النبي صلى الله عليه وسلم وإني لمُسنِدَته إلى صدري، فدعا بالطست فانخنث، فمات فما شعرتُ، فكيف أوصى إلى عليٍّ؟

ورواه أيضًا هو في الوصايا (2741) ومسلم في الوصية (1636) كلاهما من طريق إسماعيل بن عليه، عن ابن عون، به مثله.

وقولها: انخنث - بالنون والخاء المعجمة ثم نون مثلثة، معناه كما في النهاية: انكسر وانثنى الاسترخاء أعضائه عند الموت.

وفي الباب ما رُوي عن حُكيمة بنت أُمَيْة بنت رُقَيْقة، عن أمِّها أنها قالت:"كان للنبي صلى الله عليه وسلم قَدَح من عيدان تحت سريره يبول فيه بالليل".

رواه أبو داود (24) والنسائيّ (32)، والطبراني في الكبير (24/ 189)، وابن حبان (1426)، والحاكم (1/ 167) وعنه البيهقي (1/ 99) كلّهم من حديث حجاج بن محمد، عن ابن جريح، عن حُكيمة بنت أميمة، عن أنها أميمة، فذكرته.
قال الحاكم: هذا حديث صحيح الإسناد، وسنّة غريبة، وأميمة بنت رقيقة صحابيّة مشهورة، مخرج حديثها في الوُحدان للأئمة، ولم يخرجاه".

قلت: فيه حُكيمة لم يوثقها غير ابن حبان (4/ 195)، ولم يذكر من الرّواة عنها غير ابن جريج، فهي مجهولة؛ ولذا ذكرها الذهبي في الميزان" في النسوة المجهولات، وقال الحافظ في التقريب:"لا تعرف" وكذلك قال ابن الملقن في"البدر المنير" (2/ 226).

وقد تعقّب ابن القطان في الوهم والإيهام (5/ 514) عبد الحق فيما نقله عن الدارقطني من قوله:"أنّ هذا الحديث يلحق بالصحيح - أو كلامًا هذا معناه بأن الدارقطني لم يقضي فيه بصحة ولا ضعف، والخبر متوقف الصحة على العلم بحال الراوية، فإن ثبتت ثقتها صحّت روايتها، وهي لم تثبت".

هذه خلاصة ما نقله المناوي في"فيض القدير" (5/ 178).

وفي"الوهم والإيهام": ثم ذكر الدارقطني في هذه الترجمة أميمة بنت رقيقة، روى عنها محمد بن المنكدر وابنتها حكيمة، ولم يزد على هذا ولا عيّن ما رويا عنها، ولا قضى لحكيمة بثقة ولا ضعف، ولا لشيء مما روت".

ونقل المناوي في"فيض القدير""من شهاب الدين صاحب كتاب"اقتفاء السنن": هذا الحديث لم يضعّفوه، وهو ضعيف، ففيه حكيمة، وفيها جهالة فإنه لم يرو عنها إلا ابن جريج ولم يذكرها ابن حبان في"الثقات"".

قلت: بل ذكرها ابن حبان في"الثقات" كما مضى، وروي لها في صحيحه ولم يذكر من الرّواة عنها غير ابن جريج.

ثم زاد الطبرانيّ:"فبال فيه، ثم جاء فأراده فإذا القدح ليس فيه شيء، فقال لامرأة يقال لها: بركة كانت تخدم أمّ حبيبة، جاءت بها من أرض الحبشة:"أين البول الذي كان في القدح؟". قالت: شربته! فقال: القد احتظت من النار بحظار". وهذه زيادة شاذة أو منكرة رواها شيخ الطبراني أحمد بن زياد الحذّاء الرّقي، عن حجاج بن محمد وهو الأعور المصيصيّ.

وأحمد بن زياد الحذّاء هذا لم أقف على من وثقه، وكان من كبار شيوخ الطبراني كما قال الذّهبي في تاريخ الإسلام (21/ 59) أي الكبار سنًّا لا علمًا ورتبة؛ فإنّ الحجاج بن محمد المصيصيّ توفي سنة (206 هـ) وكان قد تغيّر في آخر حياته حين رجع إلى بغداد، فالظاهر أنه أدركهـ في حال اختلاطه.

ثم رواه الطبراني (24/ 205 - 206) من وجه آخر عن حجاج بن محمد، بإسناده، وفيه: قالوا:

"شربته برّة خادم أمّ سلمة التي قدمت معها من أرض الحبشة .... وهذا كله يدل على أن حجاج بن محمد المصيصي روي هذه الزيادة في حال اختلاطه فلم يضبط اسم الخادم، ولا اسم المخدوم.

ولكن يعكّر على هذا أن هذه الزيادة رواها أيضًا يحيى بن معين عن الحجاج بن محمد. رواها
الطبرانيّ في الكبير (24/ 205 - 206) عن عبد الله بن أحمد بن حنبل، عنه. فلا أدري هل روي هو أيضًا هذا الحديث في حال اختلاطه أمّ قبله، ومن المعروف أنه كان مكثرًا عنه، كتب عنه نحو خمسين ألف حديث.

وكذلك لا يصح ما رُوي عن أمّ أيمن قالت: قام رسول الله صلى الله عليه وسلم من اللّيل إلى فخارة في جانب البيت فبال فيها، فقمت من الليل وأنا عطشانة فشربت ما فيها وأنا لا أشعر، فلما أصبح النبي صلى الله عليه وسلم قال:"يا أمّ أيمن، قومي فأهريقي ما في تلك الفخارة" قلت: قد واللهِ شربتُ ما فيها! قال: فضحك النبيّ صلى الله عليه وسلم حتى بدت نواجذه، ثم قال:"أما إنّك لا تتجعين بطنك أبدًا".

رواه الطبرانيّ في الكبير (25/ 89)، والحاكم في المستدرك (4/ 63) كلاهما من حديث شبابة بن سوار، حدّثني أبو مالك النخعيّ، عن الأسود بن قيس عن نبيح العنزي، عن أمّ أيمن، قالت (فذكرته). وسكت عليه الحاكم.

وقال الهيثمي في"المجمع" (8/ 271):"وفيه أبو مالك النخعيّ وهو ضعيف.

قلت: وهو كما قال، فإنّ أبا مالك النخعيّ وهو الواسطيّ، واسمه عبد الملك بن حسين، أهل العلم مطبقون على تضعيفه، وبه ضعفه ابن حجر في"التلخيص" (1/ 31) وزاد أن نبيحًا لم يلق أمّ أيمن.

ثم إن عبد الملك قد اضطرب في إسناد هذا الحديث، فمرة رواه كما مضى، وأخرى روى عن نافع بن عطاء، عن الوليد بن عبد الرحمن، عن أمّ أيمن.

ومن هذا الطريق رواه ابن السكن، قال الحافظ في الإصابة في ترجمة أمّ أيمن (4/ 433):"فيحتمل أن تكون قصة أخرى غير القصة التي اتفقت لبركة خادم أمّ حبية، ولكن ادّعى ابن السكن أنّ بركة خادم أمّ حبيبة كانت تكنى أيضًا أمّ أيمن أخذًا من هذا الحديث، والعلم عند الله" انتهى قول الحافظ.

قلت: ونافع بن عطاء هذا لم أعرف من هو؟ ولم يذكره المزّي في"تهذيب الكمال" في شيوخ عبد الملك بن الحسين أبي مالك النخعيّ، ولم يذكره ابن حبان في"الثقات" من يُسمّى بـ نافع بن عطاء. وكذلك أكد ذلك الحافظ ابن حجر في التهذيب (10/ 415) في ترجمة نافع عن عائشة.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: লোকেরা বলে যে, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ওসীয়ত করে গেছেন। অথচ তিনি পেশাব করার জন্য পাত্র আনতে বললেন, এরপর তাঁর প্রাণবায়ু বেরিয়ে গেল এবং আমি তা টেরও পাইনি। তাহলে তিনি কার কাছে ওসীয়ত করে গেলেন?!









আল-জামি` আল-কামিল (1396)


1396 - عن عبد الله بن سرجس، أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا يبولن أحدكم في الجحر، وإذا نمتم فأطفئوا السراج، فإن الفأرة تأخذ الفتيلة فتحرق أهل البيت، وأوكئوا الأسقية، وخمروا الشراب، وغلقوا الأبواب بالليل".

قالوا لقتادة: ما يكره من البول في الجحر؟ قال: يقال إنها مساكن الجن.

صحيح: رواه أحمد (20775)، والحاكم (1/ 186) كلاهما من طريق معاذ بن هشام، قال:
حدثنا أبي عن قتادة، عن عبد الله بن سرجس فذكره.

ورواه أبو داود (29)، والنسائي (34)، وابن الجارود (34) كلهم من طريق معاذ بن هشام به مقتصرا على النهي عن البول في الجحر.

وإسناده صحيح، قتادة سمع من عبد الله بن سرجس كما قال ابن المديني، وأبو زرعة، وأبو حاتم، وأحمد بن حنبل في رواية ابنه عبد الله.

قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين، فقد احتجا بجميع رواته".

وصححه أيضًا ابن خزيمة، وابن السكن فيما أفاده الحافظ ابن حجر في التلخيص الحبير (1/ 106). وأسند الحاكم عن ابن خزيمة أنه قال:"أنهي عن البول في الأجحرة لخبر عبد الله بن سرجس … فذكر الحديث وقول قتادة، وقال: ولست أبت القول أنها مساكن الجن؛ لأن هذا من قول قتادة".




আব্দুল্লাহ ইবনে সারজিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের কেউ যেন গর্তে পেশাব না করে। আর যখন তোমরা ঘুমাও, তখন বাতি নিভিয়ে দাও, কারণ ইঁদুর সলতে টেনে নিয়ে ঘরের লোকদের পুড়িয়ে দিতে পারে। আর মশকের মুখ বেঁধে রাখো, পানীয় ঢেকে রাখো এবং রাতের বেলায় দরজা বন্ধ করে দাও।"

তারা কাতাদাহকে জিজ্ঞেস করল: গর্তে পেশাব করা অপছন্দনীয় কেন? তিনি বললেন: বলা হয় যে, এগুলো জিনদের আবাসস্থল।









আল-জামি` আল-কামিল (1397)


1397 - عن أبي هريرة أنه سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يبولَنَّ أحدُكم في الماء الدائم الذي لا يجري، ثم يغتسل فيه".

متفق عليه: رواه البخاري في الوضوء (239) ومسلم في الطهارة (282) كلاهما من طرق، عن أبي هريرة. وفي رواية عند مسلم:"لا تَبُل في الماء الدائم الذي لا يجري ثم تغتسل منه". وزاد أبو داود (70): لولا تغتسل فيه من الجنابة".

وقوله (الماء الدائم) أي: الراكد، كما في رواية النسائي (1/ 49).




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: “তোমাদের কেউ যেন স্থির, প্রবহমান নয় এমন পানিতে পেশাব না করে, অতঃপর সেই পানি দিয়েই গোসল করে।”









আল-জামি` আল-কামিল (1398)


1398 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا يغتسلْ أحدكم في الماء الدائم وهو جُنُب". قالوا: كيف يفعل يا أبا هريرة؟ قال: يتناوله تناولا.

صحيح: رواه مسلم في الطهارة (283) من طرق، عن ابن وهب، عن عمرو بن الحارث، عن بكير بن الأشجّ، أن أبا السائب مولى هشام بن زُهرة حدَّثه، أنَّه سمع أبا هريرة يقول … فذكر مثله.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তোমাদের কেউ যেন জানাবত (নাপাকী) অবস্থায় বদ্ধ পানিতে গোসল না করে। তারা জিজ্ঞেস করল: হে আবূ হুরায়রা! তাহলে সে কী করবে? তিনি বললেন: সে যেন তা তুলে নেয়।









আল-জামি` আল-কামিল (1399)


1399 - عن أبي هريرة رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اتقوا اللَّعّانين". قيل وما اللَّعّانان يا رسول الله؟ قال:"الذي يتخَلَّى في طريق الناس أو في ظلِّهم.

صحيح: أخرجه مسلم في الطهارة (269). من طريق إسماعيل بن جعفر، أخبرني العلاء، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.

قوله:"اللعانين قال الخطابي:"المراد باللعانين: الأمرين الجالبين للّعن، الحاملين الناس عليه، والداعيين إليه، وذلك أنَّ من فعلهما شُيْم، ولُعِن. يعني: عادة الناس لعنه. فلما صارا سببًا لذلك أُضِيف اللعن إليهما". وقال:"المراد هنا بالظل، هو الظل الذي اتخذه الناس مقيلًا ومنزلًا ينزلونه، وليس كل ظل يحرم قضاء الحاجة تحته، فقد قضى النبي صلى الله عليه وسلم حاجته تحت حايش من
النخل، وهو - لا محالة - له ظل" انتهى.

ولحديث أبي هريرة شواهد من حديث ابن عباس ومعاذ بن جبل وجابر بن عبد الله وابن عمر وأبي ذر وغيرهم، ولكن لم يصح منها شيء.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা অভিশাপ আনয়নকারী দুটি কাজ থেকে বেঁচে থাকো।" জিজ্ঞেস করা হলো, হে আল্লাহর রাসূল! অভিশাপকারী দুটি কাজ কী কী? তিনি বললেন: "(তা হলো) যে ব্যক্তি মানুষের চলার পথে অথবা তাদের বিশ্রামের ছায়ায় পেশাব-পায়খানা করে।









আল-জামি` আল-কামিল (1400)


1400 - عن جابر، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه نهى أن يُبال في الماء الراكد.

صحيح: رواه مسلم في الطهارة (281). من طريق الليث، عن أبي الزبير، عن جابر فذكر الحديث.

وفي الباب روي عن عبد الله بن مغفل قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا يبولنَّ أحدكم في مُسْتَحَمِّه، ثم يغتسل فيه؛ فإن عامة الوسواس منه.

رواه أبو داود (27) والترمذي (21) والنسائي (36) وابن ماجه (304) وابن حبان (1255) والحاكم (1/ 167) كلهم من طريق أشعث بن عبد الله، عن الحسن، عن عبد الله بن مغفل، عن النبي صلى الله عليه وسلم، فذكره.

قال الترمذي: هذا حديث غريب، لا نعرفه مرفوعا إلا من حديث أشعث بن عبد الله" وهو كما قال.

فقد رواه غيره عن عبد الله بن مغفل موقوفا، رواه البيهقي (1/ 98)، كما أن فيه الحسن وهو البصري الإمام المعروف، مدلس، ولم أجد له تصريحا بالسماع، وإن كان قد نص أهل العلم على سماعه من عبد الله بن مغفل.

ويشهد لحديث عبد الله بن مغفل حديث حميد بن عبد الرحمن الحميري قال: لقيت رجلا صحب النبي صلى الله عليه وسلم كما صحبه أبو هريرة قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يمتشط أحدنا كلَّ يوم، أو يبول في مغتسله".

رواه أبو داود (28) والنسائي (238) كلاهما من طريق داود الأودي، عن حميد بن عبد الرحمن به.

هذا الحديث هو نفسه جاء ذكره في باب النهي عن الوضوء بفضل وضوء المرأة، كرّره أبو داود في موضعين، ولم يكرره النسائي؛ فإنه جمع في حديث واحد، ولفظه:"نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يمتشط أحدنا كل يوم، أو يول في مغتسله، أو يغتسل الرجل بفضل المرأة، والمرأة بفضل الرجل، وليغترفا جميعًا".

فائدة: قال ابن ماجه:"سمعت محمد بن يزيد يقول: سمعت علي بن محمد الطنافسي يقول:

إنما هذا في الحفيرة، فأما اليوم فلا، فمغتسلاتهم الجصُّ والصاروج والقير؛ فإذا بال فأرسل عليه

الماء، لا بأس به.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) স্থির (জমাবদ্ধ) পানিতে পেশাব করতে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1401)


1401 - عن ابن عباس قال: مرّ رسول الله صلى الله عليه وسلم على قبرين، فقال:"أما إنهما لَيُعذَّبان،
وما يُعَذَّبان في كبير، أمّا أحدهما فكان يمشي بالنميمة، وأمّا الآخر فكان لا يستر من بوله".

قال: فدعا بعسيب رطْبٍ فشقَّه باثنين، ثم غرس على هذا واحدًا، وعلى هذا واحدًا، ثم قال:"لعله يُخفَّفُ عنهما ما لم ييبسا".

وفي رواية:"وكان الآخر لا يستنزه عن البول، أو من البول".

متفق عليه: رواه البخاري في الوضوء (218) وفي الجنائر (1361) ومسلم في الطهارة (292) كلاهما من طريق الأعمش، قال: سمعت مجاهدًا يحدِّث عن طاوس، عن ابن عباس … فذكر الحديث. واللفظ لمسلم، وفي لفظ البخاري: ثم أخذ جريدة رطبة … وفيه أيضًا: قالوا: يا رسول الله! لم صنعت هذا؟ فقال:"لعله أن يخفَّف عنهما ما لم ييبسا".

وقد استنكر الخطّابيُّ وغيره وضع الناس الجريد ونحوه في القبر، عملًا بهذا الحديث. وعلَّل ذلك العلَّامة ابن بازٍ قائلًا:"لأنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم لم يفعله إلَّا في قبورٍ مخصوصةٍ اطلَّع على تعذيب أهلها، ولو كان مشروعًا لفعله في كلِّ القبور، وكبار الصحابة - كالخلفاء لم يفعلوه، وهم أعلم بالسنَّة". الحاشية على فتح الباري (1/ 330). انظر ما يستفاد من الحديث:"المنة الكبرى" (1/ 78).




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুটি কবরের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। তিনি বললেন, "শুনে রাখো, এদের দু'জনকে শাস্তি দেওয়া হচ্ছে, তবে কোনো গুরুতর (ব্যাপারের) জন্য তাদের শাস্তি দেওয়া হচ্ছে না। তাদের একজনের অভ্যাস ছিল সে চোগলখুরি করে বেড়াত, আর অন্যজন পেশাব থেকে নিজেকে আড়াল (বা পবিত্র) করত না।"
তিনি (ইবনে আব্বাস) বলেন, অতঃপর তিনি একটি কাঁচা খেজুরের ডাল চাইলেন এবং সেটিকে দু'ভাগ করলেন। এরপর তিনি একটি ডাল এক কবরের ওপর এবং অন্যটি আরেক কবরের ওপর গেঁথে দিলেন। এরপর বললেন, "সম্ভবত ডাল দুটি শুকিয়ে না যাওয়া পর্যন্ত তাদের শাস্তি লাঘব করা হবে।"
অন্য এক বর্ণনায় আছে, "অন্যজন পেশাবের ব্যাপারে পবিত্রতা (বা সতর্কতার) অবলম্বন করত না, বা পেশাব থেকে বাঁচত না।"









আল-জামি` আল-কামিল (1402)


1402 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم"أكثر عذاب القبر من البول.

صحيح: رواه ابن ماجه (348) عن أبي بكر بن أبي شيبة - وهو في مصنفه (1/ 122) قال: حدثنا عفان، قال: حدثنا أبو عوانة، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة فذكر الحديث. ورواه الدارقطني (1/ 128) وقال: صحيح، والحاكم (1/ 183) وقال: صحيح على شرط الشيخين ولا أعرف له علة، . وأورده البوصيري في زوائد ابن ماجه، وقال: هذا إسناد صحيح رجاله عن آخرهم محتج بهم في الصحيحين" وحكى الترمذي في العلل عن البخاري أنه قال: إنه حديث صحيح. وأما أبو حاتم فقال: حديث باطل يعني مرفوعا، العلل (1/ 366) قلت: هذا مثال الاختلاف أنظار العلماء.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন, কবরের অধিকাংশ শাস্তি প্রস্রাবের (ব্যাপারে সতর্কতা অবলম্বন না করার) কারণে হয়ে থাকে।









আল-জামি` আল-কামিল (1403)


1403 - عن أبي هريرة، قال: كنا نمشي مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، فمررنا على قبرين، فقام، فقمنا معه، فجعل لونه يتغير حتى رعد كُمُّ قميصه، فقلنا: ما لك يا نبي الله؟ قال: ما تسمعون ما أسمع؟ قلنا: وما ذاك يا نبي الله؟ قال:"هذان رجلان يعذبان في قبورهما عذابًا شديدًا في ذنبٍ هينٍ" قلنا: مِمَّ ذلك يا نبيَّ الله؟ قال:"كان أحدهما لا يستنزه من البول، وكان الآخر يؤذي الناس بلسانه، ويمشي بينهم بالنميمة" فدعا بجريدَتَيْن من جرائد النخل، فجعل في كل قبر واحدة، قلنا: وهل ينفعهما ذلك يا رسول الله؟ قال: نعم يخفف عنهما ما داما رَطْبَتَيْن".
صحيح: رواه ابن حبان (824) قال: أخبرنا أبو عروبة، قال: حدثنا محمد بن وهب بن أبي كريمة، قال: حدثنا محمد بن سلمة، عن أبي عبد الرحيم، قال: حدثني زيد بن أبي أُنْيْسة، عن المنهال بن عمرو، عن عبد الله بن الحارث، عن أبي هريرة فذكر الحديث.

ورجاله ثقات. أبو عروبة هو الحسين بن محمد بن أبي معشر الحراني حافظ مترجَم في"تذكرة الحفاظ" (2/ 774) وأبو عبد الرحيم هو: خالد بن يزيد، ويقال: ابن أبي يزيد الأموي مولاهم الحراني، ثقة من رجال مسلم.

وللحديث إسناد آخر رواه ابن أبي شيبة (3/ 376) وأحمد (9686) من طريق محمد بن عبيد، حدثنا يزيد بن كيسان، عن أبي حازم، عن أبي هريرة قال: مر رسول الله صلى الله عليه وسلم على قبر فوقف عليه، فقال:"إيتوني بجريدتين، فجعل أحداهما عند رأسه، والأخرى عند رجليه، فقيل له: يا رسول الله! أينفعه ذلك؟ فقال:"لعله يخفف عنه بعض عذاب القبر ما بقيت فيه ندوة".

وإسناده حسن لأجل يزيد بن كيسان فإنه مختلف فيه، والخلاصة أنه حسن الحديث. وهو من رجال مسلم. ولذا قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 57) رواه أحمد ورجاله رجال الصحيح".

قلت: ليس فيه ذكر السبب العذاب، فيحتمل أنه يعذب بسبب البول كما في الرواية السابقة، ويحتمل أن يكون السبب آخر، ولذا ذكروه في كتاب الجنائز، ولم يذكروه في كتاب الطهارة. وسأذكر بقية أحاديث عذاب القبر في كتاب الجنائز.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সাথে হাঁটছিলাম। তখন আমরা দু'টি কবরের পাশ দিয়ে অতিক্রম করলাম। তিনি দাঁড়িয়ে গেলেন, ফলে আমরাও তাঁর সাথে দাঁড়ালাম। তখন তাঁর চেহারার রং পরিবর্তিত হতে লাগল, এমনকি তাঁর জামার আস্তিন কাঁপতে শুরু করল। আমরা বললাম, হে আল্লাহর নবী! আপনার কী হয়েছে? তিনি বললেন, আমি যা শুনছি, তোমরা কি তা শুনছো না? আমরা বললাম, হে আল্লাহর নবী! তা কী? তিনি বললেন, "এই দুইজন লোককে তাদের কবরে কঠিন শাস্তি দেওয়া হচ্ছে একটি সামান্য পাপের কারণে।" আমরা বললাম, হে আল্লাহর নবী! সেই পাপটি কী? তিনি বললেন, "তাদের একজনের অভ্যাস ছিল যে সে পেশাব থেকে পবিত্রতা অর্জন করত না। আর অন্যজন নিজের জিভ দ্বারা মানুষকে কষ্ট দিত এবং তাদের মধ্যে চোগলখুরি করে বেড়াত।" এরপর তিনি খেজুর গাছের দু'টি ডাল আনালেন এবং প্রতিটি কবরে একটি করে গেঁথে দিলেন। আমরা বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! এটা কি তাদের কোনো উপকারে আসবে? তিনি বললেন, "হ্যাঁ, যতক্ষণ ডাল দুটি সতেজ থাকবে, ততক্ষণ তাদের ওপর থেকে আযাব হালকা করা হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1404)


1404 - عن أبي بكرة قال: بينما أنا أُماشي رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو آخذ بيدي، ورجل عن يساره، فإذا نحن بقبرين أمامنا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم"إنهما ليعذَّبان، وما يعذَّبان في كبير، وبلى، فأيكم يأتيني بجريدةٍ؟" فاستبقنا، فسبقتُه، فأتيتُه بجريدةٍ، فكسَرها نصفين، فألقى على ذا القبر قِطْعة، وعلى ذا القبر قِطْعة، وقال:"إنه يُهوَّنُ عليهما ما كانا رطْبتَين، وما يُعذَّبان إلا في البول والغيبة".

حسن: رواه أحمد (20373) عن أبي سعيد مولى بني هاشم، والبزَّار (3636)، من طريق مسلم بن إبراهيم، كلاهما - أعني أبا سعيد ومسلم بن إبراهيم - عن الأسود بن شيبان، عن بحر بن مَرَّار، عن عبد الرحمن بن أبي بكرة، عن أبي بكرة فذكره.

وهذا إسناد حسن متصل؛ فإن بحر بن مرَّار سمع عن جده عبد الرحمن بن أبي بكرة. وبحر بن مَرَّار تكلم فيه القطان فقال فيه: إنَّه خولط. إلَّا أنَّ ابن عديٍّ بعد أن أخرج الحديث المذكور وغيره من رواياته قال: لا أعرف له حديثًا منكرًا فأذكره، ولم أر أحدًا من المتقدِّمين ممَّن تكلَّم في الرجال ضعَّفه إلا يحيى القطَّان، ذكر أنَّه خولط. ومقدار ما له من الحديث لم أر فيه حديثًا منكرًا".

وهذا هو الصواب؛ فحديثه هذا لا بأس به في الشواهد.

ولا يُعكِّر على هذا الاختلافُ عليه، أعني به ما رواه ابن ماجه (349) من طريق وكيعٍ، وأبو
داود الطيالسي في مسنده (908) كلاهما عن الأسود بن شيبان، عن بحر بن مَرَّار، عن جدِّ أبيه أبي بكرة. ففيه انقطاع؛ لأنَّ بحرًا لم يسمع من أبي بكرة؛ ولذا صوّب الدارقطني في العلل (7/ 156) الرواية الموصولة، وقال أبو حاتم: هي أصحُّ."العلل" (1/




আবূ বাকরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে হাঁটছিলাম, আর তিনি আমার হাত ধরেছিলেন, এবং একজন লোক তাঁর বাম পাশে ছিল, হঠাৎ আমরা আমাদের সামনে দুটি কবরের কাছে পৌঁছলাম। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "নিশ্চয়ই এই দুজনকে শাস্তি দেওয়া হচ্ছে, তবে এমন কোনো বড়ো কারণে তাদের শাস্তি দেওয়া হচ্ছে না (যা থেকে বেঁচে থাকা কঠিন)। অবশ্য, তোমাদের মধ্যে কে আমার কাছে একটি খেজুর ডাল নিয়ে আসবে?" অতঃপর আমরা দৌড় প্রতিযোগিতা শুরু করলাম, আর আমি তাঁকে অতিক্রম করে এগিয়ে গেলাম এবং তাঁর কাছে একটি খেজুর ডাল নিয়ে এলাম। তিনি তা দু'ভাগে ভাঙলেন। তারপর তিনি এক কবরের উপর এক টুকরা এবং অন্য কবরের উপর আরেক টুকরা রাখলেন এবং বললেন: "যতক্ষণ এই ডাল দুটি সতেজ থাকবে, ততক্ষণ তাদের শাস্তি কিছুটা হালকা করা হবে। আর তাদের শাস্তি দেওয়া হচ্ছে কেবল পেশাবের কারণে এবং গীবতের কারণে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1405)


1405 - عن عائشة أنها قالت: أُتي رسول الله صلى الله عليه وسلم بصبي، فبال على ثوبه، فدعا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بماء فأتبعه إيّاه.

متفق عليه: رواه مالك في الطهارة (109) عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، فذكرت الحديث.

ورواه البخاري في الوضوء (222) عن عبد الله بن يوسف، عن مالك. وأما مسلم فرواه في الطهارة (286) من طريق جرير، عن هشام به، وفيه:"صبي يرضع .. فدعا بماء فصبه عليه" ..

وفي الصحيحين:"أتي بصبي فحنَّكهـ، فبال عليه".

ولمسلم:"أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يؤتى بالصبيان فيُبرّك عليهم ويحكهم، فأتي بصبي فبال عليه، فدعا بماء فأتبعه بوله ولم يغسله".




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট একটি শিশুকে আনা হলো। শিশুটি তাঁর কাপড়ে পেশাব করে দিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পানি আনালেন এবং পেশাবের স্থানটিতে তা ছড়িয়ে দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1406)


1406 - عن أم قيس بنت مِحْصَن أنها أتت بابن لها صغير لم يأكل الطعام إلى رسول الله، صلى الله عليه وسلم فأجلسه في حِجْره، فبال على ثوبه، فدعا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بماء، فَنَضَحَه ولم يَغْسِله.

متفق عليه: رواه مالك في الطهارة (110) عن ابن شهاب، عن عبيد الله بن عبد الله بن عُتْبة بن مسعود، عن أم قيس به.

ورواه البخاري في الوضوء (223) عن عبد الله بن يوسف، عن مالك به.

ورواه مسلم في الطهارة (287) عن محمد بن رمح، أخبرنا الليث، عن ابن شهاب به نحوه، وفي رواية عنده:"فدعا بماء فرشَّه"، وفي رواية:"فضحه على ثوبه ولم يغسله غَسْلًا"، وفي رواية: أن أمّ قيس بنت مِحْصَن كانت من المهاجرات الأُوَل اللَّاتي بايعن رسول الله صلى الله عليه وسلم، وهي أخت عُكاشة بن مِحْصَن أحد بني أسد بن خُزَيْمة، قال: أخبرتني أنها أتت رسول الله صلى الله عليه وسلم بابنٍ لها لم يبلغ أن يأكل الطعام.

والنضح: رشّ الماء على الشيء، ولا يبلغ الغسل.




উম্মে কায়স বিনতে মিহসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর একটি ছোট ছেলেকে নিয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসেছিলেন, ছেলেটি তখনও খাদ্য গ্রহণ শুরু করেনি। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে তাঁর কোলে বসালেন। তখন সে তাঁর কাপড়ে পেশাব করে দিল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পানি চাইলেন এবং তা (পেশাবের উপর) ছিটিয়ে দিলেন, কিন্তু তা ধৌত করলেন না।









আল-জামি` আল-কামিল (1407)


1407 - عن لُبابة بنت الحارث قالت: كان الحسين بن علي في حِجْر رسول الله صلى الله عليه وسلم فبال عليه، فقلت: الْبَسَ ثوبا وأعْطِني إزارك حتى أغسله، فقال:"إنما يغسل من بول الأنثى، ويُنْضح من بول الصبي".

حسن: رواه أبو داود (375) واللفظ له، وابن ماجه (522) كلاهما من طريق أبي الأحوص، عن سماك بن حرب، عن قابوس بن أبي المخارق، عن لُبابة بنت الحارث. وإسناده حسن،
ورجال إسناده ثقات غير سماك بن خرب؛ فإنه صدوق، وشيخه قابوس بن المخارق الشيباني الكوفي قال فيه النسائي: ليس به بأس. وذكره ابن حبان في الثقات. وقد ثبت لقاؤه بلُبابة بنت الحارث، وهي أم الفضل زوج العباس بن عبد المطلب، وأخت ميمونة بنت الحارث أمّ المؤمنين.

وأعلَّه البوصيري بالانقطاع بين قابوس وأم الفضل، والصواب أنه متصل؛ لأنه ثبت اللقاء بينهما. وصحَّحه ابن خزيمة (282)، والحاكم (1/ 166).




লুবাবাহ বিনত আল-হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একদিন হুসাইন ইবনু আলী রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কোলে ছিলেন, তখন সে তাঁর (রাসূলের) উপর পেশাব করে দিল। আমি বললাম: আপনি (অন্য) একটি কাপড় পরিধান করুন এবং আপনার (পেশাব লাগা) লুঙ্গিটি আমাকে দিন, যাতে আমি তা ধুয়ে দিতে পারি। তখন তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "মেয়ে শিশুর পেশাব অবশ্যই ধৌত করতে হয়, কিন্তু বালক শিশুর পেশাবের ওপর শুধু পানি ছিটালেই (তা পবিত্র হয়ে যায়)।"