হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (1481)


1481 - عن أسماء بنت أبي بكر الصديق قالت: سألت امرأةٌ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم فقالت: يا رسول الله! أرأيتَ إحدانا إذا أصاب ثوبَها الدمُ من الحيضة، كيف تَصنَعُ؟ فقال
"لتَقرُصه، ثم لتَنضحه بماء، ثم لتُصَلِّي فيه".

متَّفقٌ عليه: رواه مالك في الطهارة (166 - رواية أبي مصعب الزهريّ) عن هشام بن عروة، عن فاطمة بنت المنذر بن الزبير (زوج هشام)، عن أسماء، فذكرت الحديث. ومن طريقه البخاري في الحيض (307) ومسلم في الطهارة (291).

وفي رواية عند البخاري (227):"تحتُّه ثم تقرصُه بالماء وتنضحه وتصلي فيه". ووقع في بعض الروايات أن السائلة هي أسماء نفسها.

تنبيه:

وأما ما رواه يحيى اللّيثي في موطئه (103) عن مالك، وزاد بن هشام بن عروة وفاطمة بنت المنذر"عن أبيه" فهو وهم منه. انظر: التمهيد (22/ 229).

قلت: وكذلك رواه غير مالك عن هشام منهم: حماد بن زيد، وابن عيينة، ويحيي القطان، ووكيع، وأبو أسامة، وأبو معاوية، ذكر ذلك ابن خزيمة في صحيحه (275).




আসমা বিনতে আবী বকর সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক মহিলা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করল এবং বলল, হে আল্লাহর রাসূল! আমাদের কারো কাপড়ে যদি হায়িযের (ঋতুস্রাবের) রক্ত লাগে, তবে সে কী করবে? তিনি বললেন, সে যেন তা (রক্তের স্থান) খুঁটে তুলে ফেলে, তারপর পানি দিয়ে তা ধুয়ে পরিষ্কার করে নেয়, এরপর সে তাতে সালাত আদায় করবে।









আল-জামি` আল-কামিল (1482)


1482 - عن عائشة قالت: كانت إحدانا تحيض، ثم تَقتَرِض الدمَ من ثوبها عند طُهرها، فتغسله وتنضحُ على سائره، ثم تصلي فيه.

وفي رواية: ما كان لإحدانا إلَّا ثوب واحد تحيض فيه؛ فإذا أصابه شيءٌ من دم قالت بريقها: فقصعته بظفرها.

صحيح: رواه البخاري في الحيض (308) من طريق عبد الرحمن بن القاسم، عن أبيه، عن عائشة … فذكرتِ الحديثَ. والرواية الثانية في الحيض أيضًا (312) من طريق ابن أبي نجيحٍ، عن مجاهدٍ، قال: قالت عائشة .. فذكرتِ الحديثَ.

وفي سنن أبي داود (358):"بلَّته بريقها، ثم قصعته بريقها".

والقصعة: شدة المضغ وضمّ بعض الأسنان إلى بعض.

وقولها:"تقترص الدم" أي: تغسله بأطراف أصابعها.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমাদের কারো ঋতুস্রাব হলে সে পবিত্র হওয়ার পর তার কাপড় থেকে রক্তের দাগ তুলে নিত। এরপর তা ধৌত করত এবং কাপড়ের বাকি অংশে পানি ছিটিয়ে দিত। অতঃপর সে তা পরিধান করে সালাত আদায় করত।

অন্য এক বর্ণনায় আছে, আমাদের কারো ঋতুস্রাবের সময় পরার জন্য একটিমাত্র কাপড়ই থাকত। যখন তাতে রক্তের সামান্য অংশ লেগে যেত, তখন সে তার লালা দিয়ে তা ভিজিয়ে দিত এবং নখ দিয়ে ঘষে তা তুলে নিত।









আল-জামি` আল-কামিল (1483)


1483 - عن أم قيس بنت محصن تقول: سألت النبي صلى الله عليه وسلم عن دم الحيض يكون في الثوب قال:"حُكِّيه بضِلَع واغسِليه بماء وسِدرٍ".

صحيح: رواه أبو داود (363) والنسائي (292) وابن ماجه (628) كلهم من طريق سفيان، عن ثابت بن هرمز أبي المِقدام، عن عدي بن دينار، عن أم قيس، فذكرت الحديث.

وإسناده صحيح. وثابت بن هرمز وثقه أحمد وابن معين. وعدي بن دينار وثقه النسائي، وهو مولى أم قيس بنت محصِن.

وصحّحه أيضًا ابن خزيمة (277) وابن حبان (1395) كلاهما من هذا الوجهِ. وقال ابن القطان
في بيان الوهم الإيهام 5/ 281:"هذا غاية في الصحة … ولا أعلم لهذا الإسناد علة".

والحكّ: هو الحتُّ في حديث أسماء السابق ذكره عند البخاري في الرواية الثانية، والمراد به: إزالة العين.

وأمَّا إذا غسلتِ المرأةُ الدم فلم يذهب فلتُغيره بصفرة ورسٍ، أو زعفران. كما قالت عائشةُ، وهو صحيح من قولها رواه الدارمي (1014) عن أبي النعمان، ثنا ثابت بن يزيد، ثنا عاصم، عن معاذة العدوية، عن عائشة فذكرته. وإسناده صحيح، وثابت هو الأحول من رجال الجماعة.

رواه أيضًا من طريق شعبة، عن يزيد الرِّشك قال: سمعتُ معاذة العدوية، عن عائشة قالت لها امرأة: الدمُ يكون في الثوب، فأغسله فلا يذهب فأقطعه؟ قالت: الماء طهور. وإسناده صحيح.

وأمَّا ما رواه أبو داود (357) من طريق أم الحسن - يعني جدة أبي بكر العدوي، عن معاذة قالت: سألتُ عائشة عن الحائض يُصيب ثوبها الدم قالت: تغسله، فإنَّ لم يذهب أثره فلتغيره بشيء من صفرة، قالت: ولقد كنت أحيض عند رسول الله صلى الله عليه وسلم ثلاث حيض جميعًا لا أغسل لي ثوبًا. ففيه أم الحسن لا تُعرف، كذا قال الذهبي والحافظ ابن حجر.




উম্মু কায়স বিনত মিহসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে কাপড়ের উপর লেগে থাকা হায়িযের রক্ত (মাসিকের রক্ত) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি বললেন: "তুমি তা একটি পাজরের হাড় দিয়ে ঘষে তুলে ফেলো এবং পানি ও বরই পাতা (সিদর) দিয়ে ধুয়ে নাও।"









আল-জামি` আল-কামিল (1484)


1484 - عن ميمونة أنها كانت تكون حائضًا لا تصلي، وهي مفترشة بحذاء مسجد رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو يصلي على خمرته، إذا سجد أصابني بعض ثوبه.

متفق عليه: رواه البخاري في الحيض (333) ومسلم في الصلاة (513) كلاهما من طريق سليمان الشيباني، عن عبد الله بن شداد قال: سمعتُ خالتي ميمونةَ .. فذكرت الحديث. واللفظ للبخاري، ولفظ مسلم:"كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصلِّي وأنا حذاءه، وأنا حائض، وربما أصابني ثوبه إذا سجد".




মায়মূনাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ঋতুমতী থাকা অবস্থায় সালাত আদায় করতেন না। তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মসজিদের পাশে শুয়ে থাকতেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর জায়নামাজের (খুমরাহর) উপর সালাত আদায় করতেন, যখন তিনি সিজদা করতেন, তখন তাঁর কাপড়ের কিছু অংশ আমার গায়ে লাগত।









আল-জামি` আল-কামিল (1485)


1485 - عن عائشة قالت: كان النبي صلى الله عليه وسلم يُصلِّي من الليل وأنا إلى جنبه، وأنا حائضٌ، وعليَّ مِرطٌ، وعليه بعضه إلى جنبه.

صحيح: رواه مسلم في الصلاة (514) من حديث وكيع، ثنا طلحة بن يحيى، عن عبيد الله بن عبد الله، عن عائشة، فذكرت الحديث.

والمِرط: كِساء. وفيه جواز الصلاة في ثوبٍ بعضه على المصلِّي وبعضه على حائض أو غيرها.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাতের সালাত আদায় করতেন, আর আমি ছিলাম তাঁর পাশে, আমি ছিলাম ঋতুবতী। আমার উপর ছিল একটি চাদর (মিরট), যার কিছু অংশ তাঁর দিকে তাঁর পাশেও ছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (1486)


1486 - عن معاوية بن أبي سفيان أنه سأل أخته أم حبيبة زوج النبي صلى الله عليه وسلم هل كان النبي صلى الله عليه وسلم يصلي في الثوب الذي يجامعها فيه؟ فقال: نعم، إذا لم ير فيه أذىً.

صحيح: رواه أبو داود (366) والنسائي (294) وابن ماجه (540) كلهم من طريق الليث بن
سعد، عن يزيد بن أبي حبيب، عن سُوَيد بن قيس، عن معاوية بن خُديج، عن معاوية بن أبي سفيان، فذكر الحديث.

رجاله ثقات وإسناده صحيح. وفيه ثلاثة من الصحابة: معاوية بن خُديج، ومعاوية بن أبي سفيان، وأم حبيبة أم المؤمنين رضي الله عنهم أجمعين.

وقد صحّحه أيضًا ابن خزيمة (776) وابن حبان (2331) كلاهما من هذا الوجهِ.




মু'আবিয়া ইবনু আবী সুফইয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর বোন উম্মু হাবীবাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে, যিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর স্ত্রী ছিলেন, জিজ্ঞাসা করলেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কি সেই কাপড়ে সালাত (নামায) আদায় করতেন, যা পরিধান করে তিনি তার সাথে সহবাস করতেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ, যদি তাতে কোনো প্রকার অপবিত্রতা (বা ময়লা) দেখা না যেত।









আল-জামি` আল-কামিল (1487)


1487 - عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم لا يصلي في شُعُرنا، أو في لُحفِنا.

صحيح: رواه أبو داود (367) والترمذي (600) والنسائي (5366) كلهم من طريق أشعث بن عبد الملك، عن محمد بن سيرين، عن عبد الله بن شقيق، عن عائشة، واللفظ لأبي داود، ولفظ الترمذي:"لا يصلي في لُحف نسائه"، ولفظ النسائي:"لا يصلي في لُحفنا"، قال سفيان بن حبيب:"ملاحفنا". وإسناده صحيح.

ورواه أيضًا أبو داود (368) من وجه آخر عن حماد (بن زيد)، عن هشام بن حسَّان القُردوسي)، عن ابن سيرين، عن عائشة أن النبي صلى الله عليه وسلم كان لا يصلِّي في ملاحفِنا.

قال حماد (بن زيد): وسمعت سعيد بن أبي صدقة قال: سألت محمدًا عنه، فلم يحدثني. وقال: سمعته منذ زمان، ولا أدري ممن سمعته، ولا أدري أسمعته من ثبت أو لا، فسلوا عنه. كذا قال.

وأشعث بن عبد الملك ثقة، وإنه بين الواسطة بين محمد بن سيرين وعائشة بأنه عبد الله بن شقيق، والمتيقن لا يترك بالتردد.

ولذا قال الترمذي: حسن صحيح.

وقال الدارقطني: القول قول أشعث. أي: في وصله عن ابن سيرين.

قال الترمذي: وقد رُوِي عن النبي صلى الله عليه وسلم رخصةٌ في ذلك.

وهو في الباب الذي قبله.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের 'শূর' (চুল ঢাকার কাপড়)-এ অথবা আমাদের 'লুহফ' (মোটা চাদর/কম্বল)-এ সালাত আদায় করতেন না।









আল-জামি` আল-কামিল (1488)


1488 - عن عائشة قالت: كنت أشرب وأنا حائض، ثم أناولُه النبي صلى الله عليه وسلم، فيضع فاه على موضع فيّ فيشربُ، وأتعرّقَ وأنا حائض، ثم أناوله النبي صلى الله عليه وسلم فيضع فاه على موضع فِيّ.

صحيح: رواه مسلم في الحيض (300) من طريق المِقدام بن شريحٍ عن أبيه، عن عائشة .. فذكرته.

وفي سنن أبي داود (259):"كنت أتعرّق العظم وأنا حائض فأعطيه النبي صلى الله عليه وسلم، فيضع فمه في
الموضع الذي فيه وضعته".

والعظم العراق: بما عليه من اللحم، تريد إنِّي كنت أنتهشه وآخذ ما عليه من اللحم. قال الخطابي.

جاء في حاشية النسخة الهندية:"قولها: (أتعرق) - بفتح العين وسكون الراء - أي: آخذ اللحم من العرق بأسناني، وهو عظم أُخذ معظم اللحم منه، وبقيت عليه بقية".




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি ঋতুমতী অবস্থায় পান করতাম, এরপর তা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দিতাম। তিনি আমার মুখের স্থানে তাঁর মুখ স্থাপন করে পান করতেন। আর আমি ঋতুমতী অবস্থায় (হাড়ের) মাংস চিবিয়ে নিতাম, এরপর তা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দিতাম। তিনি আমার মুখের স্থানে তাঁর মুখ স্থাপন করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1489)


1489 - عن عبد الله بن سعد: قال سألت النبي صلى الله عليه وسلم عن مؤاكلة الحائض فقال:"واكِلها".

حسن: رواه أبو داود (212) والترمذي (133) وابن ماجه (651) كلهم من حديث العلاء بن الحارث، عن حرام بن حكيم، عن عمه عبد الله بن سعد، فذكر الحديث. وهذا لفظ الترمذي وابن ماجه. وقال الترمذي: حسن غريب.

أمَّا أبو داود؛ ففيه: عن عمِّهِ أنَّه سألَ رسول الله صلى الله عليه وسلم: ما يحلُّ لي مِن امرأتي وهي حائضٌ؟ فقال:"لك ما فوق الإزار" وذكر مؤاكلة الحائض أيضًا .. وساق الحديثَ. انتهى. وإسناده حسن، رجاله ثقات غير حرام بن حكيم؛ فوثّقه العجلي والدارقطني، وضعَّفه غيره، غير أنه لا ينزل عن درجة"صدوق" ولا يرتقي عنها. وأمَّا الحافظ فقال: ثقة.




আব্দুল্লাহ ইবনে সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ঋতুমতী মহিলার সাথে একত্রে আহার করা সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি বললেন: ‘তার সাথে আহার করো।’









আল-জামি` আল-কামিল (1490)


1490 - عن زينب بنت أم سلمة، أنَّ أم سلمة حدثتها قالت: بينا أنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم مضطجعة في خميصة إذ حِضتُ، فانسلَلتُ فأخذت ثياب حِيضتي، قال:"أنُفِست؟" قلت: نعم، فدعاني فاضطجعت معه في الخَميلة.

متَّفقٌ عليه: رواه البخاري في الحيض (298) واللفظ له، ومسلم في الحيض (296) كلاهما من حديث هشام الدستوائي، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن أن زينب بنت أم سلمة، فذكرت الحديث.

وفي رواية ابن ماجه (637) من وجه آخر عن أبي سلمة، عن أم سلمة قالت: فقال لي رسول الله: تعالي فادخُلي معي في اللِّحاف".

قال البوصيري في الزوائد: إسناده صحيح ورجاله ثقات.

قوله: في خميصة - بفتح الخاء المعجمة وبالصاد المهملة - كساء أسود له أعلام يكون من صوف وغيره.

والخميلة: ثوب له خمل، أي: هدب.




উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে একটি 'খামীসাহ' (পশমের কালো পোশাক) পরিহিত অবস্থায় শুয়ে ছিলাম, এমন সময় আমার মাসিক শুরু হলো। তাই আমি নিঃশব্দে সরে গেলাম এবং আমার মাসিকের কাপড় নিয়ে নিলাম। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: "তোমার কি রক্তক্ষরণ (মাসিক) শুরু হয়েছে?" আমি বললাম: "হ্যাঁ।" অতঃপর তিনি আমাকে ডাকলেন এবং আমি তাঁর সাথে একই 'খামিলাহ' (পশমের কম্বল)-এর নিচে শুয়ে পড়লাম।









আল-জামি` আল-কামিল (1491)


1491 - عن ميمونة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يضطجع معي وأنا حائض، وبيني وبينه ثوب.

صحيح: رواه مسلم في الحيض (295) من طريق ابن وهبٍ، أخبرني مخرمة، عن أبيه، عن
كريب مولى ابن عبَّاسٍ، قال: سمعت ميمونة .. فذكرت الحديثَ.




মায়মূনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার সাথে শুইতেন যখন আমি ঋতুবতী থাকতাম, আর আমার ও তাঁর মাঝে একটি কাপড় থাকত।









আল-জামি` আল-কামিল (1492)


1492 - عن عائشة قالت: كنت أنا ورسول الله صلى الله عليه وسلم نبيت في الشِّعار الواحد وأنا حائض طامث، فإن أصابه مني شيءٌ غسل مكانه، ولم يَعدُه، ثم صلَّى فيه، وإن أصاب - تعني ثوبه - منه شيءٌ غسل مكانه ولم يَعدُه، ثم صلَّى فيه.

حسن رواه أبو داود (269) واللفظ له، والنسائي (284، 372) كلاهما من طريق يحيي (وهو ابن سعيد)، عن جابر بن صُبح قال: سمعت حِلاسًا الهجري قال: سمعتُ عائشة، فذكرت الحديث.

وفي لفظ النسائي:"ثم يعود؛ فإن أصابه مني شيءٌ فعل مثل ذلك، ولم يَعدُه وصلّى فيه".

وهذا إسناد حسن؛ فإن فيه جابر بن صُبح الراسبي أبا بشر البصري، قال فيه الحافظ:"صدوق". وقد وثَّقه ابن معين والنسائي وغيرهما.

وأمَّا حِلاس الهَجَري - وهو ابن عمرو البصري - فهو تابعي ثقة، وكان يرسل عن عمر وعثمان وعلي.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একই চাদরের নিচে রাত্রি যাপন করতাম যখন আমি ঋতুমতী (হায়েযগ্রস্তা) থাকতাম। যদি আমার থেকে কোনো কিছু তাঁর গায়ে লাগত, তাহলে তিনি সেই স্থানটি ধুয়ে নিতেন এবং এর অতিরিক্ত কিছু করতেন না, অতঃপর তিনি তা নিয়েই সালাত আদায় করতেন। আর যদি কোনো কিছু তাঁর কাপড়ের ওপর লাগত, তবে তিনি শুধু সেই স্থানটুকু ধুয়ে নিতেন এবং এর অতিরিক্ত কিছু করতেন না, অতঃপর তিনি তা নিয়েই সালাত আদায় করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1493)


1493 - عن أبي ميسرة، قال: قالت أم المؤمنين: كنت أتزر وأنا حائض، ثم أدخل مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في لحافه.

صحيح: رواه الدارمي (1088)، والبيهقي (1/ 314) كلاهما من طريق شعبة، عن أبي إسحاق، عن أبي ميسرة قال: فذكره.

وإسناده صحيح، وأبو ميسرة هو عمرو بن شرحبيل الهمداني.




উম্মুল মু'মিনীন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি ঋতুমতী অবস্থায় ইজার পরিধান করতাম, এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে তাঁর চাদরের ভেতরে প্রবেশ করতাম।









আল-জামি` আল-কামিল (1494)


1494 - عن عائشة قالت: كانت إحدانا إذا كانت حائضًا فأراد رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يباشرها أمرها أن تتّزر في فور حَيضتِها، ثم يُباشرها قالت: وأيكم يملِكُ إربَه كما كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يملك إربَه.

متفق عليه: رواه البخاري في الحيض (302) ومسلم في الحيض (293) كلاهما من طريق علي بن مسهر، قال: أخبرنا أبو إسحاق - وهو الشيباني - عن عبد الرحمن بن الأسود، عن أبيه، عن عائشة فذكرت.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমাদের মধ্যে কেউ যখন ঋতুবতী হতো এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার সাথে (চাদরের ওপরে) ঘনিষ্ঠ হতে চাইতেন, তখন তিনি তাকে নির্দেশ দিতেন যে সে যেন তার ঋতুস্রাবের প্রথম অবস্থায় একটি ইযার (লুঙ্গি বা কাপড়) পরিধান করে নেয়, এরপর তিনি তার সাথে ঘনিষ্ঠ হতেন। তিনি (আয়িশা) বললেন: তোমাদের মধ্যে কে এমন আছে যে নিজের প্রবৃত্তিকে নিয়ন্ত্রণ করতে পারে, যেমন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজের প্রবৃত্তিকে নিয়ন্ত্রণ করতেন?









আল-জামি` আল-কামিল (1495)


1495 - عن ميمونة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا أراد أن يباشر امرأة من نسائه أمرها فاتَّزرت وهي حائض.

متفق عليه: رواه البخاري في الحيض (303) ومسلم في الحيض (294) كلاهما من حديث الشيباني، عن عبد الله بن شدّاد، قال: سمعت ميمونة قالت. وفي رواية مسلم: كان يُباشر نساءَه فوق الإزار وهن حُيّض.




মায়মূনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন তাঁর স্ত্রীদের কারো সাথে মুবাশারাহ (নিকটবর্তী হওয়া) করতে চাইতেন, তখন তিনি তাকে নির্দেশ দিতেন যেন সে ঋতুবতী অবস্থায় ইযার (লুঙ্গি/নিম্নাংশের পোশাক) পরিধান করে নেয়।

সহীহ মুসলিমের এক বর্ণনায় আছে: তিনি তাঁর ঋতুবতী স্ত্রীদের সাথে ইযারের ওপর দিয়ে মেলামেশা করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1496)


1496 - عن أنس أن اليهودَ كانوا إذا حاضت المرأةُ فيهم لم يؤاكِلُوها ولم يُجامِعوهنّ في البيوت، فسأل أصحابُ النبي صلى الله عليه وسلم النبي، فأنزل الله تعالى: {وَيَسْأَلُونَكَ عَنِ الْمَحِيضِ قُلْ هُوَ أَذًى فَاعْتَزِلُوا النِّسَاءَ فِي الْمَحِيضِ} إلى آخر الآية [البقرة: 222] فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اصنعوا كل شيء إلا النكاح". فبلغ ذلك اليهودَ فقالوا: ما يريد هذا الرجل أن يَدَعَ من أمرنا شيئًا إلَّا خالَفَنا فيه. فجاء أسَيدُ بن حُضَير وعبّادُ بن بِشر فقالا: يا رسول الله! إن اليهودَ تقول: كذا وكذا؛ أفلا نُجامِعهنَّ؟ فتَغيَّر وجهُ رسول الله صلى الله عليه وسلم حتى ظننّا أن قد وَجَدَ عليهما، فخَرَجا فاستقبلهما هديَّةٌ من لَبَنٍ إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فأرسل في آثارهما فسقاهما، فَعَرفا أن لم يَجِد عليهما.

صحيح: رواه مسلم في الحيض (302) من طريق ابن مهدي، حدَّثنا حمَّاد بن سلمة، ثنا ثابت، عن أنسٍ .. فذكره.

والنكاح بمعنى الجماع كما جاء التصريح في سنن النسائي (1/ 152).

ومن شاهده حديث عبد الله بن سعد الأنصاري في سنن أبي داود (212): سأل رسول الله صلى الله عليه وسلم: ما يحلّ لي من امرأتي وهي حائض؟ فقال:"لك ما فوق الإزار"، وذكر أيضًا مؤاكلةَ الحائضِ والوضوء من المذي. انظر:"باب الوضوء من المذي"، و"باب مؤاكلة الحائض". وانظر للمزيد:"المنة الكبرى" (1/ 217).




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইহুদিদের মধ্যে কোনো নারী যখন ঋতুমতী হতেন, তখন তারা তার সাথে খেতেন না এবং একই ঘরে তার সাথে সহবাস করতেন না। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবাগণ নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করলেন। তখন আল্লাহ তাআলা অবতীর্ণ করলেন: "আর তারা তোমাকে জিজ্ঞেস করে হায়েয (ঋতুস্রাব) সম্পর্কে। বলে দাও: তা কষ্টদায়ক। সুতরাং তোমরা হায়েয অবস্থায় স্ত্রীদের থেকে দূরে থাকো..." (সূরা বাকারা: ২২২) আয়াতের শেষ পর্যন্ত। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সহবাস ব্যতীত তোমরা সবকিছুই করো।" এই কথা ইহুদিদের কাছে পৌঁছালে তারা বলল: এই লোকটি আমাদের কোনো কিছুই ছাড়তে চায় না, শুধু আমাদের বিরোধিতা করে। তখন উসাইদ ইবনু হুযাইর ও আব্বাদ ইবনু বিশর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আসলেন এবং বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! ইহুদিরা তো এমন এমন কথা বলছে; তাহলে কি আমরা তাদের (স্ত্রীদের সাথে) সহবাস করা থেকে বিরত থাকব? এতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চেহারা মুবারক পরিবর্তিত হয়ে গেল, এমনকি আমরা মনে করলাম যে তিনি তাদের উপর অসন্তুষ্ট হয়েছেন। তারা দু’জন বেরিয়ে গেলেন। এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য আসা কিছু দুধের হাদিয়া তাদের সামনে পড়ল। অতঃপর তিনি তাদের দু’জনের সন্ধানে লোক পাঠালেন এবং তাদের দু’জনকে সেই দুধ পান করালেন। তখন তারা বুঝতে পারলেন যে তিনি তাদের উপর অসন্তুষ্ট হননি।









আল-জামি` আল-কামিল (1497)


1497 - عن عكرمة، عن بعض أزواج النبي صلى الله عليه وسلم أن النبي صلى الله عليه وسلم كان إذا أراد من الحائض شيئًا ألقي على فرجها ثوبًا.

صحيح: رواه أبو داود (272) قال: حدَّثنا موسى بن إسماعيل: ثنا حماد عن أيوب، عن عكرمة … فذكر مثله. وإسناده صحيح.

انظر أيضًا: حديث عبد الله بن سعد الأنصاري في"باب الوضوء من المذي".

وأما الحديث المشهور عن ابن عباس في الذي يأتي امرأته وهي حائض قال: يتصدق بدينار أو نصف دينار، (سنن أبي داود: 264) فهو معلول، والصواب أنه موقوف على ابن عباس.

وكذلك حديث عمر بن الخطاب أنه وقع على امرأته وهي حائض، فأتى النبي صلى الله عليه وسلم فأمره أن يتصدق بخُمس دينار أو بنصف دينار، فهو معلول أيضًا.

انظر تفصيل ذلك في"المنة الكبرى" (1/ 218).




নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কোনো এক স্ত্রী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন ঋতুবতী স্ত্রীর নিকট থেকে কিছু কামনা করতেন, তখন তিনি তার লজ্জাস্থানের উপর একটি কাপড় ফেলে দিতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1498)


1498 - عن عائشة أنها قالت: كنت أرجِّل رأس رسول الله صلى الله عليه وسلم وأنا حائض.

وفي رواية عن عروة أنه سئل: أتخدمني الحائضُ أو تدنو مني المرأةُ وهي جنب؟ فقال عروة: كلُّ ذلك عليَّ هيِّنٌ، وكلُّ ذلك تخدمني، وليس على أحد في ذلك بأس؛ أخبرتني عائشة أنها كانت تُرجِّلُ - تعني - رأسَ رسول الله صلى الله عليه وسلم وهي حائض، ورسولُ الله صلى الله عليه وسلم حينئذ مجاور في المسجد، يُدني لها رأسَه وهي في حُجرتِها، فترجِّلُه وهي حائض.

متَّفقٌ عليه: أخرج الرواية الأُولى مالك في الطهارة (102) عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، ومن طريقه البخاري في الحيض (295)، ورواه مسلم في الحيض (297) من حديث أبي خيثمة، عن هشام به، وفيه: يُدني إليَّ رأسَه وأنا في حُجرتي؛ فأُرَجِّلُ رأسه وأنا حائض. والرواية الثانية أخرجها البخاري (296). وفي رواية: أنها كانت ترجّل النبي صلى الله عليه وسلم وهي حائض، وهو مُعتكِفٌ في المسجد، وهي في حجرتها؛ يناولها رأسه. وسيأتي في كتاب الصوم، باب الاعتكاف.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি ঋতুমতী অবস্থায় আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মাথা আঁচড়ে দিতাম।

অন্য এক বর্ণনায় উরওয়াহ থেকে বর্ণিত, তাঁকে জিজ্ঞাসা করা হলো: ঋতুমতী কি আমার খেদমত করতে পারে অথবা নাপাক (জানাবাত অবস্থায় থাকা) মহিলা কি আমার কাছে আসতে পারে? উরওয়াহ বললেন: এ সবই আমার কাছে সহজ এবং তারা সবাই আমার খেদমত করে থাকে। এতে কারো কোনো দোষ নেই। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে জানিয়েছেন যে, তিনি ঋতুমতী অবস্থায় আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মাথা আঁচড়ে দিতেন। আর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন মসজিদে ই'তিকাফের উদ্দেশ্যে অবস্থান করছিলেন। তিনি তাঁর মাথাটি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দিকে এগিয়ে দিতেন যখন তিনি তাঁর হুজরায় (কক্ষে) অবস্থান করতেন। অতঃপর আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ঋতুমতী অবস্থায় তা (মাথা) আঁচড়ে দিতেন।

অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: তিনি (আয়িশা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মাথা আঁচড়ে দিতেন যখন তিনি ঋতুমতী ছিলেন এবং তিনি মসজিদে ই'তিকাফে ছিলেন, আর আয়িশা তাঁর হুজরায় (কক্ষে) ছিলেন; তিনি তাঁর মাথাটি আয়িশার দিকে বাড়িয়ে দিতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1499)


1499 - عن عائشة قالت: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم:"نَاوِليني الخُمرةَ" من المسجد. قالت قلت: إنِّي حائض، قال:"إن حَيضتَكِ ليست في يدك".

صحيح: رواه مسلم في الحيض (298) من حديث الأعمش، عن ثابت بن عبيد، عنِ القاسم بن محمد، عن عائشة .. فذكرته.

قولها:"من المسجد" قال أبو العباس القرطبي في المفهم (1/ 558):"وقد اختُلف في هذا المجرور الذي هو"من المسجد" بماذا يتعلّق؟ فعلّقه طائفة بـ"ناوليني" واستدلوا به على جواز دخول الحائض المسجد للحاجة تعرض لها … وعلقته طائفة أخرى بقولها:"قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم من المسجد: ناوليني الخمرة على التقديم والتأخير، وعليه المشهور من مذاهب العلماء، أنها لا تدخل المسجد لا مقيمة ولا عابرة …". قلت: والتفسير الثاني يدل عليه حديث أبي هريرة الآتي.

أي: أن النبي صلى الله عليه وسلم قال لها ذلك من المسجد لتُنَاوِله إياها من خارج المسجد، لا أن النبي صلى الله عليه وسلم -
أمرها أن تُخرجها من المسجد؛ لأنه صلى الله عليه وسلم كان معتكفا، وكانت عائشة في حُجرتها وهي حائض؛ لقوله:"إن حيضَتك ليست في يدكِ"، فإنما خافت من إدخال يدها المسجد. ولو كان أمرها بدخول المسجد لم يكن لتخصيص اليد معنى. انتهى. قاله القاضي عياض.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন, "মসজিদ থেকে আমাকে খুমরা (ছোট মাদুর) এগিয়ে দাও।" তিনি বলেন, আমি বললাম, "আমি তো ঋতুমতী।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "নিশ্চয়ই তোমার ঋতুস্রাব তোমার হাতে নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (1500)


1500 - عن أبي هريرة قال: بينما رسول الله صلى الله عليه وسلم في المسجد فقال:"يا عائشة! نَاوِلِيني الثوبَ". فقالت: إنِّي حائض، فقال:"إن حَيضَتكَ ليست في يدك". فناولته.

صحيح: رواه مسلم في الحيض (299) من طريق يحيى بن سعيد، عن يزيد بن كيسان، عن أبي حازمٍ، عن أبي هريرة .. فذكر الحديث.

قوله:"إن حيضتك" - بفتح الحاء كما قال المحدثون، قال الخطابي: الصواب بالكسر، أي: الهيئة والحالة، وصوَّب القاضي عياض ما قاله المحدثون بخلاف حديث أم سلمة"فأخذتُ ثيابَ حِيضتي"؛ فإنَّ الصواب فيه الكسر. انتهى.

وفي الباب عن عائشة قالت: جاء رسول الله صلى الله عليه وسلم ووجوه بيوت أصحابه شارعةٌ في المسجد فقال:"وجِّهُوا هذه البيوتَ عن المسجد"، ثم دخل النبي صلى الله عليه وسلم ولم يصنع القوم شيئًا؛ رجاء أن تنزل فيهم رخصة، فخرج إليهم بعدُ فقال:"وَجِّهُوا هذه البيوتَ عن المسجد؛ فإني لا أحِلُّ المسجدَ الحائض ولا جنب".

رواه أبو داود (232) قال: حدَّثنا مسدد، ثنا عبد الواحد بن زياد، ثنا أفلت بن خليفة، قال: حدثتني جسرة بنت دجاجة، قالت: سمعت عائشة، فذكرت الحديث. وصححه ابن خزيمة (1327).

وقال الخطابي: وقد ضعَّفوا هذا الحديث، وقالوا: إن (أفلت) راويه مجهول، لا يصح الاحتجاج بحديثه".

قلت: كذا قال في أفلت، وقد قال فيه الإمام أحمد: ما أرى به بأسًا.

وقال أبو حاتم: شيخ، وقال الدارقطني: صالح. ولذا جعله الحافظ في مرتبة"صدوق". ولكن شيخته جسرة بنت دجاجة لم أجد من يعتمد على توثيقه غير العجلي وابن حبان. ولذا قال فيها الحافظ:"مقبولة" أي عند المتابعة، ولم أجد لها متابعة فهي لينة الحديث. قال البخاريّ:"عندها عجائب"، وقال البيهقي في"المعرفة":"إنّ هذا الحديث ليس بالقوي"، وقال في السنن (2/ 443):"إن صح فمحمول في الجنب على المكث فيه دون العبور بدليل الكتاب".

وكذلك حديث أم سلمة:"إن المسجد لا يحل لجنب ولا لحائض" رواه ابن ماجه (645) قال: حدَّثنا أبو بكر بن أبي شيبة ومحمد بن يحيى، قالا: حدَّثنا أبو نعيم، ثنا ابن أبي غَنِيَّة، عن أبي الخطاب الهجري، عن محدوج الذُّهلي، عن جسرة قالت: أخبرتني أمُّ سلمة قالت: دخل رسول الله صلى الله عليه وسلم صرْحة هذا المسجد فنادى بأعلى صوته، فذكرت الحديث. وفيه علتان:
أحداهما: أبو الخطاب؛ فإنه مجهول.

والثانية: محدوج الذُّهلي؛ فهو مجهول أيضًا؛ وقد تفرد بالرواية عنه أبو الخطاب الهجري.

وفي الإسناد علة أُخرى، وهي أن أفلت بن خليفة رواه عن جسرة، عن عائشة، كما سبق.

ورواه ابن أبي غنية، عن أبي الخطاب، عن محدوج الذُّهلي، عن جسرة، عن أم سلمة؛ فالذي يظهر أن مصدر الحديث واحد. وقد أشار إلى هذا ابن أبي حاتم في"العلل" (1/ 99) فقال:"قال أبو زرعة: يقولون عن جسرة، عن أم سلمة، والصحيح عن عائشة"، وهذا يدل على أن الرواة لم يضبطوا، كما أنهم زادوا في لفظ الحديث:"إلَّا للنبي وأزواجه وعلي وفاطمة بنت محمد". ذكره ابن أبي حاتم في علله. وهذه الزيادة كما قال الحافظ ابن القيم وغيره موضوعة.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মসজিদে ছিলেন, তখন তিনি বললেন: "হে আয়িশা! আমাকে কাপড়টি দাও।" তখন তিনি (আয়িশা) বললেন, "আমি তো ঋতুমতী।" তিনি বললেন: "তোমার ঋতুস্রাব তো তোমার হাতে নেই।" অতঃপর তিনি (আয়িশা) তাঁকে কাপড়টি দিলেন।