হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (1461)


1461 - عن أبي السمح قال: كنتُ أخدم النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم، فكان إذا أراد أن يغتسلَ قال:"ولِّني". فأوَلِّيه قفايّ، وأنشر الثوبَ، فأستره به.

حسن: رواه أبو داود (376) والنسائي (224) وابن ماجة (613) واللّفظ له كلّهم من طريق عبد الرحمن بن مهديّ، حَدَّثَنِي يحيى بن وليد، حَدَّثَنِي مُحِلُّ بن خليفة، حَدَّثَنِي أبو السمح فذكر الحديث، ورواه أبو داود وغيره مع زيادة:"فأُتِيَ بِحَسَن أَوْ حُسَين رضي الله عنهما فبال على صدره؛ فجئت أغسله فقال:"يُغْسلُ من بولِ الجارية، ويُرشُّ من بول الغلام". انظر: كتاب الطهارة، باب بول الطفل الرضيع.




আবু আস-সামহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর খেদমত করতাম। তিনি যখন গোসল করতে চাইতেন, তখন বলতেন, "আমার দিক থেকে মুখ ফিরিয়ে নাও।" তখন আমি তাঁর দিক থেকে আমার পিঠ ঘুরিয়ে দিতাম এবং কাপড় বিছিয়ে তাঁকে আড়াল করতাম।

(তিনি আরও বলেন): অতঃপর হাসান অথবা হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে তাঁর কাছে আনা হলো। সে (শিশু) তাঁর বুকের উপর পেশাব করে দিল। আমি তা ধৌত করার জন্য আসলাম, তখন তিনি বললেন: "মেয়ে শিশুর পেশাব ধৌত করতে হয়, আর ছেলে শিশুর পেশাবে শুধু পানি ছিটিয়ে দিলেই যথেষ্ট।"









আল-জামি` আল-কামিল (1462)


1462 - عن أبي المَليح قال: دخل نسوةٌ من أهل الشام على عائشة فقالت: ممن أنتُنَّ؟ قلن: من أهل الشام، قالت: لعلكنَّ من الكُورة التي تدخل نساؤها الحمامات؟ قُلن: نعم، قالت: أما إني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ما من امرأةٍ تخلع ثيابها في غير بيتها إِلَّا هَتَكَتْ ما بينها وبين الله تعالى".

صحيح: رواه أبو داود (4010) والتِّرمذيّ (2803) وابن ماجة (3750) كلّهم من طرق عن منصور، قال سمعتُ سالم بن أبي الجعد، يحدث عن أبي المليح الهذلي فذكر مثله. واللّفظ لأبي داود.

قال الترمذيّ:"حسن".

وإسناده صحيح، ومن هذا الوجه أخرجه الإمام أحمد (25407)، 25408)، والحاكم (4/ 288) وسكت عليه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু আল-মালিহ বলেন: একবার সিরিয়ার কিছু মহিলা তাঁর কাছে আসলে তিনি তাদের জিজ্ঞেস করলেন: তোমরা কোথাকার অধিবাসী? তারা বলল: আমরা সিরিয়ার অধিবাসী। তিনি বললেন: সম্ভবত তোমরা সেই অঞ্চলের, যেখানকার মহিলারা জনসমাগমপূর্ণ গোসলখানায় প্রবেশ করে? তারা বলল: হ্যাঁ। তিনি বললেন: শোনো! আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: ‘‘যে নারী তার নিজের ঘরের বাইরে কাপড় খোলে, সে আল্লাহ তা‘আলা ও তার মাঝে থাকা পর্দা ছিঁড়ে ফেলল।’’









আল-জামি` আল-কামিল (1463)


1463 - عن أم الدّرداء أنها حدَّثتْ أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم لقيها يومًا فقال:"من أين جئتِ يا أم الدّرداء؟" فقالت: من الحمَّام فقال لها رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما من امرأة تنزع ثيابها إِلَّا هَتَكَتْ ما بينها وبين الله من سِتر".

حسن: رواه الإمام أحمد (27041) والطَّبرانيّ في الكبير (24/ 652) كلاهما من طريق عبد الله بن وهب، قال: أخبرني حيوة بن شريح، قال: حَدَّثَنِي أبو صخر أنَّ يُحَنِّس أبا موسى حدَّثه، أنَّ أم الدّرداء حدثته فذكر الحديث.

قال الهيثميّ في"المجمع" (1/ 277): رواه أحمد والطَّبرانيّ بأسانيد ورجال أحدها رجال الصَّحيح".

وهذا الحديث من الأحاديث التي أوردها ابن الجوزي في"العلل المتناهية" (1/ 341) وحكم
عليه بالبطلان، بناءً على أنَّ في الإِسناد أبا صخرٍ، واسمه: حميد بن زياد، ضعَّفه يحيى، وبناءً على نفي وجود الحمام في زمن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فأجاب عنه الحافظ في"القول المسدد" (الحديث 14)، قائلًا: فقد تكون أطلقتْ لفظَ الحمام على مطلق ما يقع الاستحمام به، لا أنه الحمام المعروف الآن، وقد ورد ذكر الحمام في عدة أحاديث غير هذه".

قلت: أمَّا أبو صخر، وهو حميد بن زياد الخرَّاط؛ فقد وثَّقه الدارقطنيّ، وقال الإمام أحمد، وابن معين في رواية: لا بأس به، والخلاصة أنَّه حسن الحديث.

وسقط هذا الحديث من نسخة"الترغيب والترهيب" للحافظ المنذريّ، فاستدركه العلامة الألباني رحمه الله تعالى في"صحيح الترغيب والترهيب" (162) من هامش نسخة الظاهرية مقابل حديث أبي المليح، وحكم عليه بالصحة.




উম্মু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বর্ণনা করেছেন যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একদিন তার সাথে দেখা করে জিজ্ঞাসা করলেন: "হে উম্মু দারদা, তুমি কোথা থেকে এসেছ?" তিনি বললেন: হাম্মাম (গোসলখানা) থেকে। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "যে নারীই তার কাপড় খোলে (জনসাধারণের সামনে বা পরপুরুষের উপস্থিতিতে, নিজের ঘর ব্যতীত), আল্লাহ্‌র সাথে তার যে পর্দা রয়েছে, তা সে ছিন্ন করে দেয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (1464)


1464 - عن جابر، عن النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قال:"من كان يؤمن بالله واليوم الآخر فلا يدخل الحمام بغير إزار، ومن كان يؤمن بالله واليوم الآخر فلا يُدخل حليلته الحمام، ومن كان يؤمن بالله واليوم الآخر فلا يجلس على مائدة يُدار عليها بالخمر".

حسن: رواه الترمذيّ (2801) عن القاسم بن دينار الكوفيّ، حَدَّثَنَا مصعب بن المقدام، عن الحسن بن صالح، عن ليث بن أبي سُليم، عن عطاء، عن جابر فذكره.

قال الترمذيّ:"حسن غريب، لا نعرفه من حديث طاوس عن جابر إِلَّا من هذا الوجه. قال محمد بن إسماعيل: ليث بن أبي سُلَيم صدوق وربَّما يهم في الشيء. وقال محمد بن إسماعيل: قال أحمد بن حنبل: ليث لا يُفرح بحديثه، كان ليث يرفع أشياء لا يرفعها غيره؛ فلذلك ضعَّفوه". انتهى.

قلت: ورواه الإمام أحمد (14651) من طريق ابن لهيعة، عن أبي الزُّبير، عن جابر، وزاد في آخره:"ومن كان يؤمن بالله واليوم الآخر فلا يخلونَّ بامرأةٍ ليس معها ذو محرم منها؛ فإنَّ ثالثهما الشّيطان".

وابن لهيعة فيه كلام معروف، لكنه توبع.

رواه النسائيّ (400) وابن خزيمة (249) والحاكم (1/ 162) كلّهم من طريق أبي الزُّبير، عن جابر مختصرًا:"من كان يؤمن بالله واليوم الآخر فلا يدخل الحمام إِلَّا بمئزرٍ". وقال الحاكم:"صحيحٌ على شرط الشّيخين".

ورُوي نحوه عن عبد الله بن عمرو مرفوعًا:"تُفتح لكم أرض الأعاجم، وستجدون فيها بيوتًا يقال لها: الحمامات، فلا يدخلها الرجال إِلَّا بإزارٍ، وامنعوا النساء أن يدخلنها إِلَّا مريضة أو نُفساء" رواه أبو داود (4011) وابن ماجة (3748) كلاهما من طريق عبد الرحمن بن زياد بن أنعم الأفريقيّ، عن عبد الرحمن بن رافع، عن عبد الله بن عمرو فذكر الحديث. وعبد الرحمن بن زياد ضعيف، وشيخه عبد الرحمن بن رافع هو التنوخي قاضي إفريقيا قال البخاريّ:"في أحاديثه مناكير". وأطلق عليه الحافظ لفظ:"ضعيف".
وفي الباب أيضًا عن عائشة عند أبي داود (4009) والتِّرمذيّ (2802) وفيه أبو عذرة، لا يُعرف. وقال الترمذيّ: إسناده ليس بذاك القائم.

وعن أبي أيوب الأنصاري عند ابن حبان (5568) وفيه مجاهيل.

وعن ابن عباس، رواه البزّار (كشف الأستار - 319). والصواب أنَّه مرسلٌ.

وعن عمر بن الخطّاب عند الإمام أحمد (125) وفيه قام الأجناد لا يُعرف.

وعن أبي سعيد الخدريّ، رواه البزّار (كشف الأستار - 318) وفيه عليّ بن يزيد الألهاني ضعيف.

وفي الباب أحاديث أخرى أوردها الحافظ المنذري في"الترغيب والترهيب" ولم يصح منها إِلَّا ما ذكرتُ.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি আল্লাহ ও শেষ দিনের প্রতি ঈমান রাখে, সে যেন ইজার (লুঙ্গি) ছাড়া গোসলখানায় (হাম্মামে) প্রবেশ না করে। আর যে ব্যক্তি আল্লাহ ও শেষ দিনের প্রতি ঈমান রাখে, সে যেন তার স্ত্রীকে গোসলখানায় প্রবেশ না করায়। আর যে ব্যক্তি আল্লাহ ও শেষ দিনের প্রতি ঈমান রাখে, সে যেন এমন দস্তরখানে না বসে, যেখানে মদ পরিবেশন করা হয়।”









আল-জামি` আল-কামিল (1465)


1465 - عن أبي هريرة عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال: كانت بنو إسرائيل يَغْتَسِلُون عُراةً ينظر بعضُهم إلى بعض، وكان موسى يغتسلُ وحده، فقالوا: والله! ما يمنع موسى أن يغتسلَ معنا إِلَّا أنه آدر، فذهب مرةً يغتسلُ فوضع ثوبَه على حجرٍ، ففرَّ الحجرُ بثوبه، فخرج موسى في إثره يقول: ثوبي يا حجر! حتَّى نظرتْ بنو إسرائيل إلى موسى فقالوا: والله! ما بموسي من بأس. وأخذ ثوبه فطفِق بالحجر ضربًا.

قال أبو هريرة: والله! إنه لنَدَبٌ بالحجر ستة أو سبعة ضربًا بالحجر.

متفق عليه: أخرجه البخاريّ في الغسل (278) واللّفظ له، ومسلم في الحيض (339) كلاهما من طريق عبد الرزّاق، عن معمر، عن همام بن منبه، عن أبي هريرة، فذكر مثله.

قوله:"آدر" - بهمزة ممدودة، ثم دال مهملة مفتوحة - قال أهل اللغة: هو عظيم الخصيتين.

وقوله:"ندب" - بفتح النون والدال - وهو الأثر.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: বনী ইসরাঈলের লোকেরা উলঙ্গ হয়ে একে অপরের দিকে তাকিয়ে গোসল করত। আর মূসা (আঃ) একাকী গোসল করতেন। তখন তারা বলল: আল্লাহর কসম! মূসা শুধু এ কারণেই আমাদের সাথে গোসল করা থেকে বিরত থাকে যে, সে 'আদার' (অণ্ডকোষ স্ফীতি রোগ) আক্রান্ত।
একবার মূসা (আঃ) গোসল করতে গিয়ে একটি পাথরের উপর তার কাপড় রাখলেন। তখন পাথরটি কাপড় নিয়ে পালিয়ে গেল। মূসা (আঃ) তার পিছু পিছু এই বলতে বের হলেন, "আমার কাপড়, হে পাথর!" অবশেষে বনী ইসরাঈলের লোকেরা মূসা (আঃ)-কে দেখল এবং বলল: আল্লাহর কসম! মূসার শরীরে কোনো সমস্যা নেই। এরপর তিনি তার কাপড় নিলেন এবং পাথরটিকে আঘাত করতে লাগলেন।

আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আল্লাহর কসম! পাথরটিতে ছয়টি বা সাতটি আঘাতের চিহ্ন লেগেছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (1466)


1466 - عن أبي هريرة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"بينا أيوب يَغْتَسِلُ عريانًا فخرّ عليه جرادٌ من ذهب، فجعل أيوب يَحْتَثي في ثوبه، فناداه ربُّه: يا أيوب! ألم أكن أغْنيتُك عما ترى؟ قال: بلى وعزتِك! ولكن لا غني بي عن بركتك".

صحيح: رواه البخاريّ في الغسل (279) بالإسناد السابق.

قال النوويّ:"وأمّا كشف الرّجل عورته في حال الخلوة لا يراه آدميّ، فإن كان لحاجة جاز، وإن كان لغير حاجة ففيه خلاف العلماء في كراهته وتحريمه، والأصح عندنا أنه حرام".




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যখন আয়ূব (আঃ) উলঙ্গ অবস্থায় গোসল করছিলেন, তখন তাঁর উপর সোনার পঙ্গপাল পড়তে শুরু করল। আয়ূব (আঃ) তখন তা মুঠো ভরে তাঁর কাপড়ে ভরতে লাগলেন। তখন তাঁর রব তাঁকে ডেকে বললেন, "হে আয়ূব! আমি কি তোমাকে যা দেখছো তা থেকে যথেষ্ট পরিমাণ সম্পদ দান করিনি?" তিনি বললেন, "হ্যাঁ, আপনার ইজ্জতের কসম! কিন্তু আমি আপনার বরকত থেকে অমুখাপেক্ষী হতে পারি না।"









আল-জামি` আল-কামিল (1467)


1467 - عن عمرو بن دينار قال: سمعتُ جابر بن عبد الله يحدّث أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان ينقُلُ معهم الحجارةَ للكعبة وعليه إزازُه، فقال له العباسُ عمُّه: يا ابن أخيّ! لو
حَلَلْتَ إزارَك فجعلته على مَنكبَيك دون الحجارة؟ قال: فحلَّه فجعله على منْكِبَيه، فسقط مغشيًا عليه، فما رُئي بعد ذلك عريانًا صلى الله عليه وسلم.

متفق عليه: البخاريّ في الصّلاة (364) واللّفظ له، ومسلم في الحيض (340) كلاهما من طريق رَوْحِ بن عُبادة، حَدَّثَنَا زكريا بن إسحاق، حَدَّثَنَا عمرو بن دينار به مثله.

وفي رواية عندهما البخاريّ (1582، 3829): فخرَّ إلى الأرض وطَمَحَتْ عيناهُ إلى السَّماء فقال:"إزاري" فشدَّه عليه. وفي رواية:"إزاري! إزاري!".

والقصة وقعت قبل البعثة، ورواية جابر لها من مراسيل الصّحابة، والعلماء متفقون على قبول مراسيل الصّحابة، وعليه بنى الشيخان مذهبَهما في صحيحيهما. وجابر إما سمع ذلك من النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أو من بعض من حضر ذلك من الصّحابة.

يقول الحافظ ابن حجر:"والذي يظهر أنه العباس، وحدَّث به عن العباس أيضًا ابنه عبد الله". الفتح (1/ 474).

وقوله:"طَمَحَتْ" - بفتح الطاء والميم - أي: ارتفعتْ.

وفي الحديث بيان بعض ما أكرم الله سبحانه وتعالى به رسول الله صلى الله عليه وسلم، أنه جعله مصونًا محميًا في صغره عن القبائح وأخلاق الجاهليّة. قاله النوويّ.




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁদের সাথে কা'বার জন্য পাথর বহন করছিলেন এবং তাঁর পরিধানে ছিল ইযার (লুঙ্গি)। তখন তাঁর চাচা আব্বাস তাঁকে বললেন, হে ভাতিজা! যদি তুমি তোমার লুঙ্গিটি খুলে তা পাথরের নিচে না রেখে তোমার কাঁধের উপর রাখতে? বর্ণনাকারী বলেন, অতঃপর তিনি তা খুললেন এবং কাঁধের উপর রাখলেন, তখন তিনি অজ্ঞান হয়ে পড়ে গেলেন। এরপর থেকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে আর কখনো বিবস্ত্র অবস্থায় দেখা যায়নি।

[বুখারী ও মুসলিমের অপর এক বর্ণনায় এসেছে: তিনি মাটিতে লুটিয়ে পড়লেন এবং তাঁর চোখ আকাশের দিকে স্থির হলো। তিনি বললেন, "আমার লুঙ্গি!" অতঃপর তিনি তা শক্ত করে পরিধান করলেন। অন্য এক বর্ণনায় এসেছে, "আমার লুঙ্গি! আমার লুঙ্গি!"]









আল-জামি` আল-কামিল (1468)


1468 - عن المسور بن مَخْرَمةَ قال: أقبلتُ بحجرٍ أَحْمِلُه ثقيلٍ، وعليَّ إزارٌ خَفِيفٌ، قال: فانحلَّ إزاري ومعي الحجرُ، ولم أستطع أن أضعه حتَّى بلغتُ به إلى موضعه، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ارجع إلى ثوبك فخذه، ولا تَمْشُوا عُراةً".

صحيح: رواه مسلم في الحيض (341) عن سعيد بن يحيى الأُمويّ، حَدَّثَنِي أبيّ، حَدَّثَنَا عثمان بن حكيم بن عَبَّاد بن"حُنيفٍ الأنصاريّ، أخبرني أبو أمامة بن سَهْل بن حُنيف، عن المِسْور بن مَخْرَمة، فذكر الحديث.

وفي سنن أبي داود (4016) عن إسماعيل بن إبراهيم، عن يح بن سعيد به: حملتُ حجرًا ثقِيلًا، فبينما أمشي سَقَط عني - يعني ثوبي - فذكر بقية الحديث مثله.




মিসওয়ার ইবনু মাখরামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন, আমি একটি ভারী পাথর বহন করে আনছিলাম। আমার পরনে ছিল একটি হালকা তহবন্দ (ইযার)। তিনি বলেন, (পাথর বহনের সময়) আমার তহবন্দটি খুলে গেল, অথচ পাথরটি তখনও আমার হাতে ছিল। সেটিকে এর গন্তব্যে পৌঁছানো পর্যন্ত আমি নিচে রাখতে পারিনি। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তুমি তোমার কাপড়ের কাছে ফিরে যাও এবং তা উঠিয়ে নাও। আর তোমরা উলঙ্গ হয়ে হাঁটাচলা করবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (1469)


1469 - عن بَهَزِ بن حكيمٍ، عن أبيه، عن جده قال: قلتُ يا رسول الله! عَوراتُنا ما نأتي منها وما نَذَر؟ قال:"احْفَظْ عَوْرتَك إِلَّا مِن زوجتِك، أو ما ملكتْ يمينُك"، قال: قلت يا رسول الله! إذا كان القوم بعضهم في بَعْضٍ؟ قال:"إنِ استطعتَ أن لا برينَّها أحدٌ فلا يرينَّها"، قال: قلت يا رسول الله! إذا كان أحدُنا خاليًا؟ قال:"الله أحق أن يُسْتَحْيى منه من الناس".

حسن: رواه أبو داود (4017) والتِّرمذيّ (2769) وابن ماجة (1920) كلّهم من طريق بهز بن
حكيم به مثله.

قال الترمذيّ: حديث حسن، وجدٌّ بَهز اسمه: مُعاوية بن حَيدة القُشيريّ، وقد روى الجريريُ عن حكيم بن معاوية، وهو والد بهز. انتهي.

قلت: وهو كما قال؛ فإن بهز بن حكيم صدوق، وبقية رجال الإسناد كلُّهم ثقات.




মু'আবিয়া ইবনু হায়দাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমি জিজ্ঞেস করলাম, 'হে আল্লাহর রাসূল! আমাদের গোপন স্থানগুলো, এর মধ্যে কতটুকু আমরা আবরণ করব এবং কতটুকু ছেড়ে দেব (প্রকাশ করব)?' তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি তোমার লজ্জাস্থান আবৃত রাখো, তবে তোমার স্ত্রী অথবা তোমার অধিকারভুক্ত দাসী ব্যতীত।" তিনি বললেন: আমি জিজ্ঞেস করলাম, 'হে আল্লাহর রাসূল! যখন লোকেরা একে অপরের সাথে একত্রে থাকবে (তখন কী করণীয়)?' তিনি বললেন: "যদি তুমি সক্ষম হও যে, কেউ যেন তা না দেখে, তাহলে কেউ যেন তা না দেখে।" তিনি বললেন: আমি জিজ্ঞেস করলাম, 'হে আল্লাহর রাসূল! যখন আমাদের কেউ একাকী থাকে (তখন কী করণীয়)?' তিনি বললেন: "আল্লাহ্ই অধিক হকদার যে, মানুষ অপেক্ষা তাঁকে বেশি লজ্জা করা হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1470)


1470 - عن عبد الله بن الحارث بن جَزءٍ الزبيدي أنه مرَّ وصاحب له بأيمن وفتية من قريش قد حلوا أُزرهم، فجعلوها مخاريق يجلدون بها، وهم عراة، قال عبد الله: فلمّا مررنا بهم قالوا: إن هؤلاء قسيسون فدعوهم، ثم إن رسول الله صلى الله عليه وسلم خرج عليهم، فلمّا أبصروه تبددوا، فرجع رسول الله صلى الله عليه وسلم مغضبا، حتَّى دخل وكنت أنا وراء الحجرة، فسمعته يقول:"سبحان الله، لا من الله استحيوا، ولا من رسوله استتروا" وأم أيمن عنده تقول: استغفر لهم يا رسول الله، قال عبد الله: فَبِلأْيٍ ما استغفر لهم.

صحيح: رواه أحمد (17711)، وأبو يعلى (1540) كلاهما عن هارون بن معروف، حَدَّثَنَا عبد الله بن وهب، حَدَّثَنَا عمرو (هو ابن الحارث المصري)، أن سليمان بن زياد الحضرمي حدثه، أن عبد الله بن الحارث بن جزء حدثه فذكره. وإسناده صحيح.

قوله:"مخاريق" جمع مخراق وهو ثوب يُلفُّ ويضرب به الصبيان بعضهم بعضًا.

وقوله:"تبددوا" أي تفرقوا.

وقوله:"فبلأي" بفتح اللام بعدها همزة ساكنة وبعدها ياء، والباء جارة أي: بعد مشقة وجهد.




আব্দুল্লাহ ইবনু আল-হারিছ ইবনু জায (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি এবং তাঁর এক সঙ্গী আইমান ও কুরাইশের কিছু যুবকের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, যারা তাদের লুঙ্গি খুলে ফেলেছিল এবং সেগুলো দিয়ে কাপড়ের চাবুক তৈরি করে আঘাত করছিল। আর তারা ছিল উলঙ্গ। আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, যখন আমরা তাদের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলাম, তখন তারা বলল: এরা হলো পাদ্রি, এদেরকে ছেড়ে দাও। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের কাছে এলেন। যখন তারা তাঁকে দেখতে পেল, তারা ছত্রভঙ্গ হয়ে গেল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাগান্বিত অবস্থায় ফিরে গেলেন এবং (ঘরের) ভেতরে প্রবেশ করলেন। আমি ছিলাম হুজরার (কক্ষ) পেছনে। আমি তাঁকে বলতে শুনলাম: "সুবহানাল্লাহ! তারা আল্লাহ্‌র সামনেও লজ্জা পেল না, আর তাঁর রাসূলের কাছ থেকেও নিজেদের গোপন করল না!" আর উম্মে আইমান তাঁর কাছেই ছিলেন। তিনি বলছিলেন: ইয়া রাসূলুল্লাহ! আপনি তাদের জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করুন। আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর বহু কষ্ট ও প্রচেষ্টার পর তিনি তাদের জন্য ক্ষমা চাইলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1471)


1471 - عن أبي سعيد الخدريّ أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا يَنْظُرُ الرّجل إلى عورة الرَّجُل، ولا المرأةُ إلى عَورةِ المرأة، ولا يُفْضِي الرّجلُ إلى الرّجلِ في ثوبٍ واحدٍ، ولا تُفْضِي المرأةُ إلى المرأةِ في الثوبِ الواحدِ".

وفي رواية:"عُرية الرّجل، وعُرية المرأة" مكان (عورة).

صحيح: رواه مسلم في الحيض (338) من طريق زيد بن أسلم، عن عبد الرحمن بن أبي سعيدٍ الخدريّ، عن أبيه فذكر الحديث.




আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: কোনো পুরুষ যেন অন্য পুরুষের সতর (গোপনীয় অঙ্গ) এর দিকে তাকায় না এবং কোনো নারী যেন অন্য নারীর সতরের দিকে তাকায় না। আর কোনো পুরুষ যেন একই কাপড়ের ভেতর অন্য কোনো পুরুষের সাথে (পাশাপাশি) শুয়ে না থাকে, এবং কোনো নারী যেন একই কাপড়ের ভেতর অন্য কোনো নারীর সাথে (পাশাপাশি) শুয়ে না থাকে।









আল-জামি` আল-কামিল (1472)


1472 - عن أنسٍ، أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم كان يَطوف على نِسائِه بغسلٍ واحدٍ.
صحيح: رواه مسلم في الحيض (309) من طريق شعبة، عن هشام بن زيد، عن أنس، فذكر الحديث.

وهشام بن زيد: هو ابن أنس بن مالكٍ الأنصاري.

وأمَّا البخاري؛ فبوَّب في كتاب الغسل:"من دار على نسائه في غسلٍ واحدٍ، وأخرج فيه حديث أنسٍ، قال: كان النبيُّ صلى الله عليه وسلم يدور على نسائه في الساعة الواحدة من الليل والنهار، وهنَّ إحدى عشرة قال (أي قتادة): قلت لأنسٍ: أوَ كان يُطيقه؟ قال: كنَّا نتحدَّث أنَّه أعطي قوَّة ثلاثين، وقال سعيد، عن قتادة: إنَّ أنسًا حدَّثهم: تِسعُ نسوة.

رواه البخاري من طريق محمد بن بشَّار، قال: حدَّثنا معاذ بن هشام، قال: حدَّثني أبي، عن قتادة، قال: حدَّثنا أنس بن مالك.

فاستنبط البخاري من قوله:"يدور على نسائه" أي: بغسلٍ واحدٍ؛ لأنَّ هذا هو الصحيح، وإن لم يُخرجه. ولم يثبت أنَّه اغتسل عند كلِّ واحدةٍ منهنَّ.

وأمَّا ما رُوي عن أبي رافع أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم، طاف ذات يوم على نسائه يغتسل عند هذه، وعند هذه. قال: فقلت له: يا رسول الله! ألا تجعله غُسلًا واحدًا؟ فقال:"هذا أزكى وأطيب وأطهر" ففيه من لا يُعرف.

رواه أبو داود (219) وابن ماجه (590) كلاهما من حديث حمَّاد، عن عبد الرحمن بن أبي رافع، عن عمَّته سلمي، عن أبي رافع فذكر مثله.

وحمَّاد هو ابن سلمة. ومن طريقه رواه أيضًا الإمام أحمد (23862).

وطعن فيه أبو داود فقال:"وحديث أنس أصحُّ من هذا".

قلت: وهو كما قال؛ فإنَّ عبد الرحمن بن أبي رافع لم يذكروا في الرواة عنه سوى حمَّاد بن سلمة؛ ولذا قال فيه الحافظ في التقريب:"مقبول" أي إذا توبع، ولكنَّه لم يُتابعه أحد فهو"ليِّن الحديث"، وكذلك عمَّتُه سلمى، قال فيها الحافظ:"مقبولة". وقال ابن القطَّان:"لا تُعرف".

فمن رأى أنَّ فيه مخالفة لحديث صحيح وهو حديث أنس، حكم عليه بالنكارة. ومن مشّاه جمع بينهما فقال: هو محمول على أنَّه فعل الأمرين في وقتين مختلفين. قاله النووي. وقال القرطبي:"يجوز الجمع بين الزوجات والسراري في غسل واحدٍ، وعليه جماعة السلف والخلف، وإن كان الغسل بعد كل وطءٍ أكمل وأفضل".




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক গোসল দ্বারাই তাঁর স্ত্রীদের কাছে যেতেন (বা প্রদক্ষিণ করতেন)।

(সহীহ: হাদীসটি ইমাম মুসলিম হাইয অধ্যায়ে (৩০৯) শু’বাহ এর সূত্রে, তিনি হিশাম ইবনু যায়দ এর সূত্রে, তিনি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন।)। হিশাম ইবনু যায়দ হলেন আনাস ইবনু মালিক আল-আনসারীর পুত্র।

আর ইমাম বুখারী ‘গোসল’ অধ্যায়ে এই শিরোনাম দিয়েছেন: "من دار على نسائه في غسلٍ واحدٍ" (যে ব্যক্তি এক গোসলে তার স্ত্রীদের কাছে গেল)। তিনি এতে আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটি এনেছেন। তিনি (আনাস) বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাত বা দিনের এক ঘণ্টার মধ্যে তাঁর এগারোজন স্ত্রীর কাছে যেতেন। (বর্ণনাকারী কাতাদা বলেন): আমি আনাসকে জিজ্ঞেস করলাম: তিনি কি এতে সক্ষম হতেন? তিনি বললেন: আমরা বলাবলি করতাম যে তাঁকে ত্রিশজনের শক্তি দেওয়া হয়েছিল। সাঈদ (রাহিমাহুল্লাহ) কাতাদা (রাহিমাহুল্লাহ)-এর সূত্রে বলেন, আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের কাছে নয়জন স্ত্রীর কথা বর্ণনা করেছেন।

ইমাম বুখারী মুহাম্মাদ ইবনু বাশশার এর সূত্রে, তিনি মুয়ায ইবনু হিশাম এর সূত্রে, তিনি তাঁর পিতা, তিনি কাতাদা, তিনি আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে হাদীসটি বর্ণনা করেছেন।

সুতরাং ইমাম বুখারী নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এই কথা: "يدور على نسائه" (তিনি তাঁর স্ত্রীদের কাছে যেতেন) থেকে এই সিদ্ধান্ত নিয়েছেন যে, তিনি এক গোসল দ্বারাই যেতেন। কেননা এটাই হলো সহীহ মত, যদিও তিনি সরাসরি (এক গোসলের) কথা বর্ণনা করেননি। এই মর্মে কোনো প্রমাণ পাওয়া যায় না যে তিনি স্ত্রীদের প্রত্যেকের কাছে যাওয়ার পর আলাদা করে গোসল করতেন।

পক্ষান্তরে, আবু রাফে’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে যা বর্ণিত হয়েছে যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একদিন তাঁর স্ত্রীদের কাছে গিয়ে এদের কাছেও গোসল করতেন এবং ওদের কাছেও গোসল করতেন। তিনি (আবু রাফে’) বলেন: আমি তাঁকে বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! আপনি কি এটিকে এক গোসল বানাতে পারতেন না? তিনি বললেন: "এটি অধিক পবিত্র, অধিক উত্তম ও অধিক পরিষ্কার।"—এই হাদীসের সনদে এমন রাবী আছেন যাকে চেনা যায় না।

হাদীসটি আবু দাউদ (২১৭) এবং ইবনু মাজাহ (৫৯০) উভয়েই হাম্মাদ-এর সূত্রে, তিনি আব্দুর রহমান ইবনু আবি রাফে’-এর সূত্রে, তিনি তার ফুফু সালমা’র সূত্রে, তিনি আবু রাফে’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।

হাম্মাদ হলেন ইবনু সালামাহ। ইমাম আহমাদও তাঁর সূত্রে হাদীসটি বর্ণনা করেছেন (২৩৮৬২)।

ইমাম আবু দাউদ এই হাদীসের দুর্বলতা তুলে ধরে বলেছেন: "আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটি এই হাদীসের চেয়ে অধিক সহীহ।"

আমি (গ্রন্থকার) বলি: তিনি যেমন বলেছেন সেটাই সঠিক। কেননা আব্দুর রহমান ইবনু আবি রাফে’ থেকে হাম্মাদ ইবনু সালামাহ ব্যতীত অন্য কোনো বর্ণনাকারীর উল্লেখ নেই। এজন্য হাফিয ইবনু হাজার তাকরিব গ্রন্থে তাকে ‘মাকবুল’ (গ্রহণযোগ্য) বলেছেন, অর্থাৎ যদি তাকে অন্য কেউ সমর্থন করে। কিন্তু অন্য কেউ তাকে সমর্থন করেনি, ফলে সে ‘লায়্যিনুল হাদীস’ (দুর্বল বর্ণনাকারী)। অনুরূপ তার ফুফু সালমাকেও হাফিয ইবনু হাজার ‘মাকবুলা’ (গ্রহণযোগ্য) বলেছেন। আর ইবনুুল কাত্তান বলেছেন: "তাকে চেনা যায় না।"

সুতরাং, যারা এই হাদীসে সহীহ হাদীস—যা আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস—তার বিপরীত কিছু দেখেন, তারা এর উপর ‘মুনকার’ (অস্বীকৃত/খুব দুর্বল) হওয়ার হুকুম দিয়েছেন। আর যারা এর দুর্বলতা অগ্রাহ্য করেছেন, তারা উভয় হাদীসের মধ্যে সামঞ্জস্য বিধান করেছেন। তারা বলেছেন: এটি এমনভাবে ব্যাখ্যাযোগ্য যে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুই ধরনের কাজ দুই ভিন্ন সময়ে করেছেন। ইমাম নববী (রাহিমাহুল্লাহ) এই কথা বলেছেন। ইমাম কুরতুবী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: "এক গোসল দ্বারা একাধিক স্ত্রীর সাথে সহবাস করার পর গোসল করা বৈধ। সালাফ ও খালাফদের একটি দল এই মত পোষণ করেন, যদিও প্রত্যেক সহবাসের পর গোসল করাই অধিক পূর্ণাঙ্গ ও উত্তম।"









আল-জামি` আল-কামিল (1473)


1473 - عن عبد الله بن أبي قيس قال: سألت عائشة عن وتر رسول الله صلى الله عليه وسلم، فذكر الحديث قلت: كيف كان يصنعُ في الجنابة؟ أكان يغتسل قبل أن ينام، أم ينامُ قبل أن يغتسل؟ قالت: كل ذلك قد كان يفعلُ. ربما اغتسل فنام، وربما توضأ فنام.
قلت: الحمد لله الذي جعل في الأمر سعةً.

صحيح: رواه مسلم في الحيض (307) عن قتيبة بن سعيد، حدثنا الليث، عن معاوية بن صالح، عن عبد الله بن أبي قبر فذكر مثله. وسيأتي ذكر هذا الحديث في صلاة الليل وفي صلاة الوتر مُفَرَّقًا.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (আবদুল্লাহ ইবনু আবী কায়স বলেন:) আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বিতর সালাত সম্পর্কে আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করেছিলাম। তিনি (সম্পূর্ণ) হাদীসটি বর্ণনা করলেন। আমি বললাম: জানাবাতের (বড় নাপাকির) ক্ষেত্রে তিনি কেমন করতেন? তিনি কি ঘুমাবার আগে গোসল করতেন, নাকি গোসল করার আগে ঘুমাতেন? তিনি (আয়িশা) বললেন: তিনি এর সবটাই করতেন। কখনো তিনি গোসল করে ঘুমাতেন, আবার কখনো ওযু করে ঘুমাতেন। আমি বললাম: সকল প্রশংসা আল্লাহর, যিনি এই বিষয়ে প্রশস্ততা রেখেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1474)


1474 - عن غُضَيف بن الحارث قال: قلت لعائشة: أرأيتِ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يَغتَسِلُ من الجنابة في أوَّل اللَّيل أو في آخره؟ قالت: ربما اغتسلَ في أوَّلِ الليل، وربما اغتَسَلَ في آخره، قلت: الله أكبر! الحمد لله الذي جعل في الأمر سعةً. قلت: أرأيتِ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم كان يُوتِرُ أول الليلِ أم في آخره؟ قالت: ربما أوتَرَ في أولِ الليل، وربما أوتَرَ في آخره، قلت: الله أكبر! الحمدُ لله الذي جعلَ في الأمر سعةً. قلت: أرأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يجهر بالقرآن أم يُخفِتُ به؟ قالت: ربما جهرَ به، وربما خَفَتَ، قلت: الله أكبر! الحمد لله الذي جعل في الأمر سعة.

حسن: أبو داود (226) واللفظ له، والنسائي (222، 223) مقتصرا على الجزء الأول من الحديث، وهو ما يخص بالغسل، وابن ماجه (1354) مقتصرا على قراءة القرآن فقط، كلهم من طرق بُرد بن سِنان، عن عُبادة بن نُسيّ، عن غُضَيفِ بن الحارثِ، فذكر الحديث.

وغُضَيف بن الحارث السكوني الكندي، أثبت أبو حاتم وأبو زرعة أنَّ له صحبة، وقال ابن سعد والعجلي: تابعي من أهل الشام ثقة. ووثَّقه أيضًا الدارقطني وغيره.

وإسناده حسن من أجل بُرد بن سنان؛ فإنه صدوق، وبقية رجاله ثقات. وصحَّحه ابن حبَّان (2447) من هذا الوجهِ.

وفي الباب حديث أبي إسحاق عن الأسود بن يزيد، عن عائشة قالت: … ثم إن كانت له حاجة إلى أهله قضى حاجته ثم ينام. فإذا كان النداء الأول قام فاغتسل. رواه مسلم (739) وسيأتي ذكره في باب جواز النوم للجنب بدون وضوء (22) في كتاب الوضوء.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, গুদাইফ ইবনে হারিস বলেন, আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম: আপনি কি দেখেছেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জুনুবী অবস্থায় রাতের প্রথম ভাগে গোসল করতেন, নাকি শেষ ভাগে? তিনি (আয়িশা) বললেন: তিনি কখনো রাতের প্রথম ভাগে গোসল করতেন, আবার কখনো রাতের শেষ ভাগে গোসল করতেন। আমি বললাম: আল্লাহু আকবার! সকল প্রশংসা আল্লাহর, যিনি এই বিষয়ে প্রশস্ততা দান করেছেন।

আমি জিজ্ঞেস করলাম: আপনি কি দেখেছেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাতের প্রথম ভাগে বিতর পড়তেন, নাকি শেষ ভাগে? তিনি বললেন: তিনি কখনো রাতের প্রথম ভাগে বিতর পড়তেন, আবার কখনো রাতের শেষ ভাগে বিতর পড়তেন। আমি বললাম: আল্লাহু আকবার! সকল প্রশংসা আল্লাহর, যিনি এই বিষয়ে প্রশস্ততা দান করেছেন।

আমি জিজ্ঞেস করলাম: আপনি কি দেখেছেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (সালাতে) কুরআন উচ্চস্বরে পড়তেন, নাকি নিঃশব্দে? তিনি বললেন: তিনি কখনো উচ্চস্বরে পড়তেন, আবার কখনো নিঃশব্দে পড়তেন। আমি বললাম: আল্লাহু আকবার! সকল প্রশংসা আল্লাহর, যিনি এই বিষয়ে প্রশস্ততা দান করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1475)


1475 - عن أبي هريرة قال: أُقِيمت الصلاةُ وعُدِّلت الصفوفُ قيامًا، فخرج إلينا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فلما قام في مُصلاه ذكر أنه جُنُبٌ، فقال لنا:"مكانَكم".

ثم رجع فاغتَسلَ، ثم خرج إلينا ورأسُه يفطُر، فكبَّر وصَليَّنا معه.

وفي رواية: فعلنا الصفوف قبل أن يخرج.

متفق عليه: رواه البخاري في الغسل (275) واللفظ له، ومسلم في المساجد (605) كلاهما من طريق يونس، عن الزهري، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، فذكر الحديث. وفي رواية لمسلم:
قبل أن يُكَبِّر ذكر فانصرف".

هكذا رواه الزهري، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة.

هذا هو الصحيح أنه تذكَّر قبل أن يُكبِّر كما رواه يونس عن الزهري، وتابعه على ذلك عبد الأعلى، عن معمر، عن الزهري؛ والأوزاعي، عن الزهري، كما قال البخاري. وهؤلاء أوثق ممن قال: كبّر؛ ولذا قال بعض أهل العلم: قوله"كبّر" أي: أراد أن يكبِّر إلا أنه لم يكبِّر. وعليه يحمل قول ابن عبد البر بأن من قال: إنه كبَّر - زيادة حافظ يجب قبولها. كذا في الاستذكار (2/ 103) ومعناه: أراد أن يكبر.

وأما ما قاله أبو داود (1/ 160): ورواه أيوب وابن عون وهشام، عن محمد (ابن سيرين) عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"فكبّر ثم أومأ بيده إلى القوم أن اجلِسُوا، فذهب فاغتسل" فهو مرسل. وكذلك رواه مالك، عن إسماعيل بن أبي حكيم، عن عطاء بن يسار أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كبَّر في صلاة."الموطَّأ" (1/ 48 رقم 79).

وأما ما روي عن أبي بكرة أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم دخلَ في صلاةِ الفَجرِ فأومأ بيده أن مكانَكم، ثم جاء ورأسُه يَقطُر، فصلَّى بهم.

فهو معلول، رواه أبو داود (233، 234) قال: حدثنا موسى بن إسماعيل، ثنا حماد (بن سلمة)، عن زياد الأعلم، عن الحسن، عن أبي بكرة، فذكر الحديث. والحسن مرسل ومدلس، ولم أجد له تصريحا.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: সালাতের ইকামত দেওয়া হলো এবং আমরা দাঁড়িয়ে কাতার সোজা করলাম। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিকট বের হয়ে আসলেন। যখন তিনি তাঁর নামাযের স্থানে দাঁড়ালেন, তখন তাঁর স্মরণ হলো যে তিনি জুনুবী (অপবিত্র) অবস্থায় আছেন। তিনি আমাদেরকে বললেন: “তোমরা তোমাদের স্থানে থাকো।”

অতঃপর তিনি ফিরে গেলেন এবং গোসল করলেন। এরপর তিনি আমাদের নিকট আসলেন এমন অবস্থায় যে তাঁর মাথা থেকে (পানির কণা) ঝরছিল। তিনি তাকবীর বললেন এবং আমরা তাঁর সাথে নামায আদায় করলাম।

অন্য এক বর্ণনায় আছে: তিনি বের হওয়ার আগেই আমরা কাতার সোজা করে নিয়েছিলাম।

আর মুসলিমের এক বর্ণনায় আছে: তাকবীর বলার আগেই তিনি স্মরণ করলেন এবং ফিরে গেলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1476)


1476 - عن أبي هريرة قال: بعث النبي صلى الله عليه وسلم خيلًا قِبَل نجد، فجاءت برجلٍ من بني حَنيفة يقال له: ثُمامة بن أثال، فربطوه بسارية من سواري المسجد، فخرج إليه النَّبيُّ صلى الله عليه وسلم فقال:"أطلِقوا ثُمامة". فانطلق إلى نخل قريب من المسجد فاغتسلَ، ثم دخل المسجد فقال: أشهد أن لا إله إلا الله، وأن محمدًا رسولُ الله.

متفق عليه: أخرجه البخاري (462) مختصرًا هكذا في كتاب الصلاة، باب الاغتسال إذا أسلم، وربط الأسير في المسجد، ورواه مطولا في المغازي (4372) ومسلم في الجهاد (1764) كلاهما من طريق الليث بن سعد، عن سعيد المقبري، سمع أبا هريرة فذكره.

وسيأتي في كتاب الجهاد مطوّلًا.

وفي بعض الروايات أنه أسلم، فبعثه النبي صلى الله عليه وسلم إلى حائط بني طلحة، فأمره أن يغتسل، فاغتسل. رواه ابن خزيمة (1/ 125) من طريق عبد الرزاق، نا عبد الله وعبيد الله ابنا عمر، عن سعيد المقبري، عن أبي هريرة.
وعبد الله ضعيف ولكن تابعه أخوه عبيد الله، وهو ثقة.

فإما أن نُرجِّح روايةَ الشيخين، أو تجمع بينهما كما فعل البيهقي (1/ 171) قائلًا: يحتمل أن يكون أسلم عند النبي صلى الله عليه وسلم، ثم اغتسلَ ودخل المسجد فأظهر الشهادة.

وفيه إشارةٌ إلى أنَّ الغُسلَ كان بعد إسلامِه، كما في رواية ابن خزيمة.

انظر للمزيد:"المنة الكبرى" (1/ 196).




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নজদের দিকে একদল অশ্বারোহী পাঠালেন। তারা বনু হানিফা গোত্রের একজন লোককে নিয়ে আসল, যার নাম ছিল ছুমামা ইবনু উছাল। তারা তাকে মাসজিদের খুঁটিগুলোর একটির সাথে বেঁধে রাখল। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার নিকট গেলেন এবং বললেন: "তোমরা ছুমামাকে মুক্ত করে দাও।" তখন সে মাসজিদের নিকটবর্তী একটি খেজুর বাগানে গেল এবং গোসল করল। এরপর মাসজিদে প্রবেশ করে বলল: আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং মুহাম্মাদ আল্লাহর রাসূল।









আল-জামি` আল-কামিল (1477)


1477 - عن قيس بن عاصم قال: أتيتُ النَّبيَّ صلى الله عليه وسلم أُريدُ الإسلامَ، فأمرني أن أَغتَسِلَ بماءٍ وسِدرٍ.

صحيح: رواه أبو داود (355) والترمذي (605) والنسائي (188) كلهم من طريق سفيان، عن الأغر بن الصبّاح، عن خليفة بن حُصين، عن جده قيس بن عاصم. ورجاله ثقات.

وقال الترمذي: حسن لا نعرفه إلا من هذا الوجه. انتهى.

ورواه الإمام أحمد (20611)، والبيهقي (1/ 171).

وصحَّحه ابن خزيمة (254) وابن حبان (1240) كلهم من هذا الطريق.

غير أنَّ ابن القطان قال: حديثه عن جدّه مرسل، وإنما يروي عن أبيه، عن جده."بيان الوهم والإيهام" (2/ رقم 438).

وذلك بناء على ما رواه أبو علي بن السكن في كتابه السنن عن محمد بن يوسف (وهو الفربري)، عن البخاري، عن علي بن خشرم، عن وكيع، عن سفيان، عن الأغر، عن خليفة بن حصين، عن أبيه، عن جدّه قيس بن عاصم، فذكره.

قال أبو علي بن السّكن:"هكذا رواه وكيع مجوّدًا عن أبيه، عن جدّه. ويحيى بن سعيد وجماعة رووه عن سفيان، لم يذكروا أباه" انتهى كلام أبي علي.

قلت: هكذا رواه الإمام أحمد (20615) عن وكيع، حدّثنا سفيان، عن الأغر المنقريّ، عن خليفة بن حصين بن قيس بن عاصم، عن أبيه، عن جدّه، فذكر الحديث.

ولم ينفرد وكيع بهذا بل تابعه أيضًا قبيصة بن عقبة، عن سفيان.

ومن هذا الطريق رواه البيهقي (1/ 172) من طريق يعقوب بن سفيان وهو في تاريخه (1/ 396) عنه.

وقد جزم أبو حاتم في"العلل" (1/ 24) أن زيادة"أبيه" خطأ، أخطأ فيه قبيصة في هذا الحديث.

قلت: لم ينفرد قبيصة بهذه الزيادة فقد تابعه عليها أيضًا وكيع كما رأيت إلا أنه اختُلف عليه أيضًا فرواه البيهقي من طريقه بدون زيادة"عن أبيه" وقال:"رواه محمد بن كثير وجماعة إلّا أنّ أكثرهم قالوا: عن جدّه قيس بن عاصم. ورواه قبيصة بن عقبة فزاد في الإسناد" انتهى.

والظاهر أنه يصحح رواية الجماعة، والله تعالى أعلم.
وأمَّا ما رُوِي عن كُلَيب قال: أسلمت فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"ألق عنك شعر الكفر" وفي رواية"ألق عنك شعر الكفر واختتن" ففيه عُثيم بن كثير بن كليب، رواه أبو داود (356) من طريق ابن جريح، قال: أُخبرت، عن عُثَيم بن كليب، عن أبيه، عن جده، وعُثيم مجهول، والواسطة بين ابن جريج وغُثيم غير معلوم.

وكذلك ما رُويَ عن قتادة قال: أتيت النبي صلى الله عليه وسلم فقال لي:"يا قتادة! اغتسل بماء وسِدرٍ، واحلق عنك شعر الكفر" وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم يأمر من أسلم أن يختتن وإن كان ابن ثمانين.

قال الهيثمي في المجمع (1/ 283): رواه الطبراني في الكبير، ورجاله ثقات، ولكن قال الحافظ في"التلخيص" (4/ 618): إسناده ضعيف.

وكذلك ما رُوي عن واثلة بن الأسقع قال: لما أسلمت أتيت النبي صلى الله عليه وسلم فقال لي:"اغتسل بماء وسِدر، واحلق عنك شعر الكفر" رواه الحاكم في المستدرك (3/ 570) وقال الحافظ: إسناده ضعيف.

قلت: وهو كذلك؛ لأنَّ فيه معروفًا أبا الخطَّاب، وهو معروف بن عبد الله، أبو الخطَّاب الدمشقي، مولى واثلة بن الأسقع، ضعيف. قال ابن عدي: يروي عن واصلة أحاديث منكرةٌ وعامة ما يرويه لا يتابع عليه.




কায়েস ইবনে আসিম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ইসলাম গ্রহণ করার উদ্দেশ্যে আসলাম। অতঃপর তিনি আমাকে পানি ও কুল পাতা (বরই পাতা) দিয়ে গোসল করার নির্দেশ দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1478)


1478 - عن * *




১৪৭৮। ...থেকে বর্ণিত।









আল-জামি` আল-কামিল (1479)


1479 - عن معاذة قالت: سألتُ عائشةَ فقلت: ما بالُ الحائض تقضي الصومَ ولا تقضي الصلاةَ؟ فقالت: أحرورية أنتِ؟ قلت: لست بحرورية، ولكني أسأل، قالت: كان يصيبنا ذلك فنُؤمر بقضاء الصوم، ولا نؤمر بقضاء الصلاة.

متَّفقٌ عليه: رواه البخاري في الحيض (321) عن همام، عن قتادة قال: حدثتني معاذة أن امرأةٌ قالت لعائشة: أتجزي إحدانا صلاتَها إذا طهرت؟ فقالت: أحرورية أنتِ؟ كنَّا نحيضُ مع النبي صلى الله عليه وسلم فلا يأمرنا به. أو قالت: فلا نفعله. ورواه مسلم في الحيض (335) عن حماد، عن يزيد الرِّشك عن معاذة: أن امرأة سألت عائشة، فذكرت الحديث، وفيه:"قد كانت إحدانا تحيض على عهدِ رسول الله صلى الله عليه وسلم ثم لا تُؤمر بقضاء". وروى شعبة عن يزيد أن معاذة هي السائلة نفسها، وكذا رواه عاصم عن معاذة أنها هي السائلة، وكلها في صحيح مسلم.

وقولها:"أحرورية أنت؟" الحرورية: طائفة من الخوارج نزلوا قرية تسمى (حروراء) كان أول اجتماعهم وتعاهدهم فيها، وكانت عائشة قصدت من قولها:"أحرورية أنت؟" أي: أنت من طائفة الخوارج الذين يوجبون قضاء الصلاة على الحائض؟ فقالت:"لا، ولكني أسأل" أي: سؤالا مجردًا لطلب العلم لا للتعنت، كما لست أنا من الخوارج. فلما فهمتُ عائشةُ منها الرغبة في طلب العلم أجابت، واقتصرت في الجواب على الدليل دون التعليل.

وأمَّا توقيتُ أربعين يومًا للنُّفَساءِ؛ فلم يثبُت فيه حديثٌ يُعتمد عليهِ، وأحسنُ شيءٌ رُوِيَ في هذا البابِ هو حديثٌ أمِّ سلمةَ.




মু'আযা থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম, হায়েজ অবস্থায় স্ত্রীলোকের কী হয়েছে যে, সে রোযার কাযা করে কিন্তু নামাযের কাযা করে না? তিনি (আয়েশা) বললেন: তুমি কি হারুরিয়্যাহ? আমি বললাম: আমি হারুরিয়্যাহ নই, কিন্তু আমি (জানার জন্য) জিজ্ঞেস করছি। তিনি বললেন: আমাদেরও এই অবস্থা হতো (অর্থাৎ হায়েজ হতো)। তখন আমাদেরকে রোযার কাযা করার নির্দেশ দেওয়া হতো, কিন্তু নামাযের কাযা করার নির্দেশ দেওয়া হতো না। (মুত্তাফাকুন আলাইহি)









আল-জামি` আল-কামিল (1480)


1480 - عن أم سلمة قالت: كانت النُّفساءُ تَجلِسُ على عهدِ رسول الله صلى الله عليه وسلم أربعينَ يومًا، فكنَّا نَطلي وُجوهَنا بالورس منَ الكَلَفِ.

حسن: رواه أبو داود (311) والترمذي (139) وابن ماجه (648) كلهم من حديث علي بن عبد الأعلى، عن أبي سهل، عن مُسَّة الأزدية، عن أم سلمة، فذكرته.

قال الترمذي: هذا حديث غريب لا نعرفه إلَّا من حديث أبي سهل، عن مُسَّة عن أم سلمة، واسم أبي سهل: كثير بن زياد. قال محمد بن إسماعيل: علي بن عبد الأعلى ثقة، وأبو سهل ثقة،
ولم يعرف هذا الحديث إلَّا من حديث أبي سهل".

ورواه أيضًا أبو داود من وجه آخر من حديث عبد الله بن المبارك، عن يونس بن نافع، عن كثير بن زياد (وهو أبو سهل) قال: حدثتني الأزدية (يعني مُسّة) قالت: حججت فدخلت على أم سلمة فقلت: يا أم المؤمنين! إن سمرة بن جندب يأمر النساء يقضين صلاةَ المحيض، فقالت: لا يقضين، كانت المرأة من نساء النبي صلى الله عليه وسلم تقعد في النِّفاس أربعين ليلةٌ، لا يأمرها النبي صلى الله عليه وسلم بقضاء صلاة النِّفاس.

قال أبو داود: كثير بن زياد كنيتُه أبو سهل.

قلت: رجالُ هذا الإسناد ثقات غير مُسَّة - بضم أولها والتشديد - الأزدية، وكانت تكنى بأم بسة - بضم الموحدة وتشديد السين - اختلف فيها؛ فحسَّه النوويُّ في"الخُلاصةِ" (1/ 241)، وصحّحه الحاكمُ في"المستدرك" (1/ 175)، والحافظ ابن حجر في بلوغ المرام، وقد روي عنها جماعة منهم: كثير بن زياد، وأبو سهل، والحكم بن عتيبة، وزيد بن علي بن الحسين وغيرهم.

وقد ذهب أكثرُ أهل العلم إلى أنَّ أكثر الفاسي أربعون يومًا .. منهم عمر، وعثمان، وعائشة، وأمُّ سلمة، وعطاء، والثوري، وأحمد بن حنبل، ومالكٌ .. وغيرهم.

قال الترمذيُّ في سُننِه: وقد أجمع أصحاب النبيِّ صلى الله عليه وسلم، والتابعون، ومن بعدهم على أنَّ النساء تدعُ الصلاة أربعينَ يومًا، إلَّا أن ترى الطُهرَ قبل ذلكَ، فإنَّها تغتسِلُ وتُصلِّي .. انتهى.

وقد رُويَ التوقيتُ أيضًا عن عددٍ من الصحابة، منهم: أنس بن مالكٍ، أخرجه ابن ماجه (649)، وفيه سلام الطويل، وهو متروكُ، وعثمان بن أبي العاص، وعبد الله بن عمرو، وجابر، وعائشة، وأبي هريرة، وأبي الدرداء، وغيرهم .. وكلها معلولة. انظر السنن الكبرى" (1/ 343).

تنبيه:

وقد اغتررت بكلام البوصيري في حديث أنس بن مالك في زوائد ابن ماجه؛ فإنه قال:"إسناده صحيح ورجاله ثقات"، ثم تبين لي أن هذا من أوهامه؛ فإنَّ سلّام بن سليم أو سلم ليس هو أبا الأحوص الثقة كما ظنّ، وإنَّما هو الطويل كما أكّد ذلك ابن عدي في الكامل (1/ 301) وابن حبان في المجروحين (1/ 339) والدارقطني (1/ 220) والبيهقي (1/ 343) بأنه هو الطويل أبو سليمان المدائني، قال فيه أحمد: روى أحاديث منكرة. وقال ابن معين: ضعيف لا يكتب حديثه. وقال أبو حاتم: ضعيف الحديث تركوه. وقال النسائي: متروك.

فمن لديه"المنة الكبرى" (1/ 233) فليصحّح ذلك، ويجعله حديثًا ضعيفا.




উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে নিফাসওয়ালী (প্রসবোত্তর রক্তস্রাবে থাকা) নারীরা চল্লিশ দিন পর্যন্ত (নামাজ, রোজা ইত্যাদি থেকে) বিরত থাকত। আর আমরা মেছতা (ত্বকের কালো দাগ) দূর করার জন্য আমাদের মুখে ‘ওয়ারস’ মাখতাম।