আল-জামি` আল-কামিল
1488 - عن عائشة قالت: كنت أشرب وأنا حائض، ثم أناولُه النبي صلى الله عليه وسلم، فيضع فاه على موضع فيّ فيشربُ، وأتعرّقَ وأنا حائض، ثم أناوله النبي صلى الله عليه وسلم فيضع فاه على موضع فِيّ.
صحيح: رواه مسلم في الحيض (300) من طريق المِقدام بن شريحٍ عن أبيه، عن عائشة .. فذكرته.
وفي سنن أبي داود (259):"كنت أتعرّق العظم وأنا حائض فأعطيه النبي صلى الله عليه وسلم، فيضع فمه في
الموضع الذي فيه وضعته".
والعظم العراق: بما عليه من اللحم، تريد إنِّي كنت أنتهشه وآخذ ما عليه من اللحم. قال الخطابي.
جاء في حاشية النسخة الهندية:"قولها: (أتعرق) - بفتح العين وسكون الراء - أي: آخذ اللحم من العرق بأسناني، وهو عظم أُخذ معظم اللحم منه، وبقيت عليه بقية".
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি ঋতুমতী অবস্থায় পান করতাম, এরপর তা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দিতাম। তিনি আমার মুখের স্থানে তাঁর মুখ স্থাপন করে পান করতেন। আর আমি ঋতুমতী অবস্থায় (হাড়ের) মাংস চিবিয়ে নিতাম, এরপর তা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দিতাম। তিনি আমার মুখের স্থানে তাঁর মুখ স্থাপন করতেন।
1489 - عن عبد الله بن سعد: قال سألت النبي صلى الله عليه وسلم عن مؤاكلة الحائض فقال:"واكِلها".
حسن: رواه أبو داود (212) والترمذي (133) وابن ماجه (651) كلهم من حديث العلاء بن الحارث، عن حرام بن حكيم، عن عمه عبد الله بن سعد، فذكر الحديث. وهذا لفظ الترمذي وابن ماجه. وقال الترمذي: حسن غريب.
أمَّا أبو داود؛ ففيه: عن عمِّهِ أنَّه سألَ رسول الله صلى الله عليه وسلم: ما يحلُّ لي مِن امرأتي وهي حائضٌ؟ فقال:"لك ما فوق الإزار" وذكر مؤاكلة الحائض أيضًا .. وساق الحديثَ. انتهى. وإسناده حسن، رجاله ثقات غير حرام بن حكيم؛ فوثّقه العجلي والدارقطني، وضعَّفه غيره، غير أنه لا ينزل عن درجة"صدوق" ولا يرتقي عنها. وأمَّا الحافظ فقال: ثقة.
আব্দুল্লাহ ইবনে সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ঋতুমতী মহিলার সাথে একত্রে আহার করা সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি বললেন: ‘তার সাথে আহার করো।’
1490 - عن زينب بنت أم سلمة، أنَّ أم سلمة حدثتها قالت: بينا أنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم مضطجعة في خميصة إذ حِضتُ، فانسلَلتُ فأخذت ثياب حِيضتي، قال:"أنُفِست؟" قلت: نعم، فدعاني فاضطجعت معه في الخَميلة.
متَّفقٌ عليه: رواه البخاري في الحيض (298) واللفظ له، ومسلم في الحيض (296) كلاهما من حديث هشام الدستوائي، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن أن زينب بنت أم سلمة، فذكرت الحديث.
وفي رواية ابن ماجه (637) من وجه آخر عن أبي سلمة، عن أم سلمة قالت: فقال لي رسول الله: تعالي فادخُلي معي في اللِّحاف".
قال البوصيري في الزوائد: إسناده صحيح ورجاله ثقات.
قوله: في خميصة - بفتح الخاء المعجمة وبالصاد المهملة - كساء أسود له أعلام يكون من صوف وغيره.
والخميلة: ثوب له خمل، أي: هدب.
উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে একটি 'খামীসাহ' (পশমের কালো পোশাক) পরিহিত অবস্থায় শুয়ে ছিলাম, এমন সময় আমার মাসিক শুরু হলো। তাই আমি নিঃশব্দে সরে গেলাম এবং আমার মাসিকের কাপড় নিয়ে নিলাম। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: "তোমার কি রক্তক্ষরণ (মাসিক) শুরু হয়েছে?" আমি বললাম: "হ্যাঁ।" অতঃপর তিনি আমাকে ডাকলেন এবং আমি তাঁর সাথে একই 'খামিলাহ' (পশমের কম্বল)-এর নিচে শুয়ে পড়লাম।
1491 - عن ميمونة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يضطجع معي وأنا حائض، وبيني وبينه ثوب.
صحيح: رواه مسلم في الحيض (295) من طريق ابن وهبٍ، أخبرني مخرمة، عن أبيه، عن
كريب مولى ابن عبَّاسٍ، قال: سمعت ميمونة .. فذكرت الحديثَ.
মায়মূনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার সাথে শুইতেন যখন আমি ঋতুবতী থাকতাম, আর আমার ও তাঁর মাঝে একটি কাপড় থাকত।
1492 - عن عائشة قالت: كنت أنا ورسول الله صلى الله عليه وسلم نبيت في الشِّعار الواحد وأنا حائض طامث، فإن أصابه مني شيءٌ غسل مكانه، ولم يَعدُه، ثم صلَّى فيه، وإن أصاب - تعني ثوبه - منه شيءٌ غسل مكانه ولم يَعدُه، ثم صلَّى فيه.
حسن رواه أبو داود (269) واللفظ له، والنسائي (284، 372) كلاهما من طريق يحيي (وهو ابن سعيد)، عن جابر بن صُبح قال: سمعت حِلاسًا الهجري قال: سمعتُ عائشة، فذكرت الحديث.
وفي لفظ النسائي:"ثم يعود؛ فإن أصابه مني شيءٌ فعل مثل ذلك، ولم يَعدُه وصلّى فيه".
وهذا إسناد حسن؛ فإن فيه جابر بن صُبح الراسبي أبا بشر البصري، قال فيه الحافظ:"صدوق". وقد وثَّقه ابن معين والنسائي وغيرهما.
وأمَّا حِلاس الهَجَري - وهو ابن عمرو البصري - فهو تابعي ثقة، وكان يرسل عن عمر وعثمان وعلي.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একই চাদরের নিচে রাত্রি যাপন করতাম যখন আমি ঋতুমতী (হায়েযগ্রস্তা) থাকতাম। যদি আমার থেকে কোনো কিছু তাঁর গায়ে লাগত, তাহলে তিনি সেই স্থানটি ধুয়ে নিতেন এবং এর অতিরিক্ত কিছু করতেন না, অতঃপর তিনি তা নিয়েই সালাত আদায় করতেন। আর যদি কোনো কিছু তাঁর কাপড়ের ওপর লাগত, তবে তিনি শুধু সেই স্থানটুকু ধুয়ে নিতেন এবং এর অতিরিক্ত কিছু করতেন না, অতঃপর তিনি তা নিয়েই সালাত আদায় করতেন।
1493 - عن أبي ميسرة، قال: قالت أم المؤمنين: كنت أتزر وأنا حائض، ثم أدخل مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في لحافه.
صحيح: رواه الدارمي (1088)، والبيهقي (1/ 314) كلاهما من طريق شعبة، عن أبي إسحاق، عن أبي ميسرة قال: فذكره.
وإسناده صحيح، وأبو ميسرة هو عمرو بن شرحبيل الهمداني.
উম্মুল মু'মিনীন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি ঋতুমতী অবস্থায় ইজার পরিধান করতাম, এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে তাঁর চাদরের ভেতরে প্রবেশ করতাম।
1494 - عن عائشة قالت: كانت إحدانا إذا كانت حائضًا فأراد رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يباشرها أمرها أن تتّزر في فور حَيضتِها، ثم يُباشرها قالت: وأيكم يملِكُ إربَه كما كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يملك إربَه.
متفق عليه: رواه البخاري في الحيض (302) ومسلم في الحيض (293) كلاهما من طريق علي بن مسهر، قال: أخبرنا أبو إسحاق - وهو الشيباني - عن عبد الرحمن بن الأسود، عن أبيه، عن عائشة فذكرت.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমাদের মধ্যে কেউ যখন ঋতুবতী হতো এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার সাথে (চাদরের ওপরে) ঘনিষ্ঠ হতে চাইতেন, তখন তিনি তাকে নির্দেশ দিতেন যে সে যেন তার ঋতুস্রাবের প্রথম অবস্থায় একটি ইযার (লুঙ্গি বা কাপড়) পরিধান করে নেয়, এরপর তিনি তার সাথে ঘনিষ্ঠ হতেন। তিনি (আয়িশা) বললেন: তোমাদের মধ্যে কে এমন আছে যে নিজের প্রবৃত্তিকে নিয়ন্ত্রণ করতে পারে, যেমন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজের প্রবৃত্তিকে নিয়ন্ত্রণ করতেন?
1495 - عن ميمونة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا أراد أن يباشر امرأة من نسائه أمرها فاتَّزرت وهي حائض.
متفق عليه: رواه البخاري في الحيض (303) ومسلم في الحيض (294) كلاهما من حديث الشيباني، عن عبد الله بن شدّاد، قال: سمعت ميمونة قالت. وفي رواية مسلم: كان يُباشر نساءَه فوق الإزار وهن حُيّض.
মায়মূনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন তাঁর স্ত্রীদের কারো সাথে মুবাশারাহ (নিকটবর্তী হওয়া) করতে চাইতেন, তখন তিনি তাকে নির্দেশ দিতেন যেন সে ঋতুবতী অবস্থায় ইযার (লুঙ্গি/নিম্নাংশের পোশাক) পরিধান করে নেয়।
সহীহ মুসলিমের এক বর্ণনায় আছে: তিনি তাঁর ঋতুবতী স্ত্রীদের সাথে ইযারের ওপর দিয়ে মেলামেশা করতেন।
1496 - عن أنس أن اليهودَ كانوا إذا حاضت المرأةُ فيهم لم يؤاكِلُوها ولم يُجامِعوهنّ في البيوت، فسأل أصحابُ النبي صلى الله عليه وسلم النبي، فأنزل الله تعالى: {وَيَسْأَلُونَكَ عَنِ الْمَحِيضِ قُلْ هُوَ أَذًى فَاعْتَزِلُوا النِّسَاءَ فِي الْمَحِيضِ} إلى آخر الآية [البقرة: 222] فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اصنعوا كل شيء إلا النكاح". فبلغ ذلك اليهودَ فقالوا: ما يريد هذا الرجل أن يَدَعَ من أمرنا شيئًا إلَّا خالَفَنا فيه. فجاء أسَيدُ بن حُضَير وعبّادُ بن بِشر فقالا: يا رسول الله! إن اليهودَ تقول: كذا وكذا؛ أفلا نُجامِعهنَّ؟ فتَغيَّر وجهُ رسول الله صلى الله عليه وسلم حتى ظننّا أن قد وَجَدَ عليهما، فخَرَجا فاستقبلهما هديَّةٌ من لَبَنٍ إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فأرسل في آثارهما فسقاهما، فَعَرفا أن لم يَجِد عليهما.
صحيح: رواه مسلم في الحيض (302) من طريق ابن مهدي، حدَّثنا حمَّاد بن سلمة، ثنا ثابت، عن أنسٍ .. فذكره.
والنكاح بمعنى الجماع كما جاء التصريح في سنن النسائي (1/ 152).
ومن شاهده حديث عبد الله بن سعد الأنصاري في سنن أبي داود (212): سأل رسول الله صلى الله عليه وسلم: ما يحلّ لي من امرأتي وهي حائض؟ فقال:"لك ما فوق الإزار"، وذكر أيضًا مؤاكلةَ الحائضِ والوضوء من المذي. انظر:"باب الوضوء من المذي"، و"باب مؤاكلة الحائض". وانظر للمزيد:"المنة الكبرى" (1/ 217).
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইহুদিদের মধ্যে কোনো নারী যখন ঋতুমতী হতেন, তখন তারা তার সাথে খেতেন না এবং একই ঘরে তার সাথে সহবাস করতেন না। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবাগণ নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করলেন। তখন আল্লাহ তাআলা অবতীর্ণ করলেন: "আর তারা তোমাকে জিজ্ঞেস করে হায়েয (ঋতুস্রাব) সম্পর্কে। বলে দাও: তা কষ্টদায়ক। সুতরাং তোমরা হায়েয অবস্থায় স্ত্রীদের থেকে দূরে থাকো..." (সূরা বাকারা: ২২২) আয়াতের শেষ পর্যন্ত। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সহবাস ব্যতীত তোমরা সবকিছুই করো।" এই কথা ইহুদিদের কাছে পৌঁছালে তারা বলল: এই লোকটি আমাদের কোনো কিছুই ছাড়তে চায় না, শুধু আমাদের বিরোধিতা করে। তখন উসাইদ ইবনু হুযাইর ও আব্বাদ ইবনু বিশর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আসলেন এবং বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! ইহুদিরা তো এমন এমন কথা বলছে; তাহলে কি আমরা তাদের (স্ত্রীদের সাথে) সহবাস করা থেকে বিরত থাকব? এতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চেহারা মুবারক পরিবর্তিত হয়ে গেল, এমনকি আমরা মনে করলাম যে তিনি তাদের উপর অসন্তুষ্ট হয়েছেন। তারা দু’জন বেরিয়ে গেলেন। এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য আসা কিছু দুধের হাদিয়া তাদের সামনে পড়ল। অতঃপর তিনি তাদের দু’জনের সন্ধানে লোক পাঠালেন এবং তাদের দু’জনকে সেই দুধ পান করালেন। তখন তারা বুঝতে পারলেন যে তিনি তাদের উপর অসন্তুষ্ট হননি।
1497 - عن عكرمة، عن بعض أزواج النبي صلى الله عليه وسلم أن النبي صلى الله عليه وسلم كان إذا أراد من الحائض شيئًا ألقي على فرجها ثوبًا.
صحيح: رواه أبو داود (272) قال: حدَّثنا موسى بن إسماعيل: ثنا حماد عن أيوب، عن عكرمة … فذكر مثله. وإسناده صحيح.
انظر أيضًا: حديث عبد الله بن سعد الأنصاري في"باب الوضوء من المذي".
وأما الحديث المشهور عن ابن عباس في الذي يأتي امرأته وهي حائض قال: يتصدق بدينار أو نصف دينار، (سنن أبي داود: 264) فهو معلول، والصواب أنه موقوف على ابن عباس.
وكذلك حديث عمر بن الخطاب أنه وقع على امرأته وهي حائض، فأتى النبي صلى الله عليه وسلم فأمره أن يتصدق بخُمس دينار أو بنصف دينار، فهو معلول أيضًا.
انظر تفصيل ذلك في"المنة الكبرى" (1/ 218).
নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কোনো এক স্ত্রী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন ঋতুবতী স্ত্রীর নিকট থেকে কিছু কামনা করতেন, তখন তিনি তার লজ্জাস্থানের উপর একটি কাপড় ফেলে দিতেন।
1498 - عن عائشة أنها قالت: كنت أرجِّل رأس رسول الله صلى الله عليه وسلم وأنا حائض.
وفي رواية عن عروة أنه سئل: أتخدمني الحائضُ أو تدنو مني المرأةُ وهي جنب؟ فقال عروة: كلُّ ذلك عليَّ هيِّنٌ، وكلُّ ذلك تخدمني، وليس على أحد في ذلك بأس؛ أخبرتني عائشة أنها كانت تُرجِّلُ - تعني - رأسَ رسول الله صلى الله عليه وسلم وهي حائض، ورسولُ الله صلى الله عليه وسلم حينئذ مجاور في المسجد، يُدني لها رأسَه وهي في حُجرتِها، فترجِّلُه وهي حائض.
متَّفقٌ عليه: أخرج الرواية الأُولى مالك في الطهارة (102) عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، ومن طريقه البخاري في الحيض (295)، ورواه مسلم في الحيض (297) من حديث أبي خيثمة، عن هشام به، وفيه: يُدني إليَّ رأسَه وأنا في حُجرتي؛ فأُرَجِّلُ رأسه وأنا حائض. والرواية الثانية أخرجها البخاري (296). وفي رواية: أنها كانت ترجّل النبي صلى الله عليه وسلم وهي حائض، وهو مُعتكِفٌ في المسجد، وهي في حجرتها؛ يناولها رأسه. وسيأتي في كتاب الصوم، باب الاعتكاف.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি ঋতুমতী অবস্থায় আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মাথা আঁচড়ে দিতাম।
অন্য এক বর্ণনায় উরওয়াহ থেকে বর্ণিত, তাঁকে জিজ্ঞাসা করা হলো: ঋতুমতী কি আমার খেদমত করতে পারে অথবা নাপাক (জানাবাত অবস্থায় থাকা) মহিলা কি আমার কাছে আসতে পারে? উরওয়াহ বললেন: এ সবই আমার কাছে সহজ এবং তারা সবাই আমার খেদমত করে থাকে। এতে কারো কোনো দোষ নেই। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে জানিয়েছেন যে, তিনি ঋতুমতী অবস্থায় আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মাথা আঁচড়ে দিতেন। আর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন মসজিদে ই'তিকাফের উদ্দেশ্যে অবস্থান করছিলেন। তিনি তাঁর মাথাটি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দিকে এগিয়ে দিতেন যখন তিনি তাঁর হুজরায় (কক্ষে) অবস্থান করতেন। অতঃপর আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ঋতুমতী অবস্থায় তা (মাথা) আঁচড়ে দিতেন।
অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: তিনি (আয়িশা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মাথা আঁচড়ে দিতেন যখন তিনি ঋতুমতী ছিলেন এবং তিনি মসজিদে ই'তিকাফে ছিলেন, আর আয়িশা তাঁর হুজরায় (কক্ষে) ছিলেন; তিনি তাঁর মাথাটি আয়িশার দিকে বাড়িয়ে দিতেন।
1499 - عن عائشة قالت: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم:"نَاوِليني الخُمرةَ" من المسجد. قالت قلت: إنِّي حائض، قال:"إن حَيضتَكِ ليست في يدك".
صحيح: رواه مسلم في الحيض (298) من حديث الأعمش، عن ثابت بن عبيد، عنِ القاسم بن محمد، عن عائشة .. فذكرته.
قولها:"من المسجد" قال أبو العباس القرطبي في المفهم (1/ 558):"وقد اختُلف في هذا المجرور الذي هو"من المسجد" بماذا يتعلّق؟ فعلّقه طائفة بـ"ناوليني" واستدلوا به على جواز دخول الحائض المسجد للحاجة تعرض لها … وعلقته طائفة أخرى بقولها:"قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم من المسجد: ناوليني الخمرة على التقديم والتأخير، وعليه المشهور من مذاهب العلماء، أنها لا تدخل المسجد لا مقيمة ولا عابرة …". قلت: والتفسير الثاني يدل عليه حديث أبي هريرة الآتي.
أي: أن النبي صلى الله عليه وسلم قال لها ذلك من المسجد لتُنَاوِله إياها من خارج المسجد، لا أن النبي صلى الله عليه وسلم -
أمرها أن تُخرجها من المسجد؛ لأنه صلى الله عليه وسلم كان معتكفا، وكانت عائشة في حُجرتها وهي حائض؛ لقوله:"إن حيضَتك ليست في يدكِ"، فإنما خافت من إدخال يدها المسجد. ولو كان أمرها بدخول المسجد لم يكن لتخصيص اليد معنى. انتهى. قاله القاضي عياض.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন, "মসজিদ থেকে আমাকে খুমরা (ছোট মাদুর) এগিয়ে দাও।" তিনি বলেন, আমি বললাম, "আমি তো ঋতুমতী।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "নিশ্চয়ই তোমার ঋতুস্রাব তোমার হাতে নেই।"
1500 - عن أبي هريرة قال: بينما رسول الله صلى الله عليه وسلم في المسجد فقال:"يا عائشة! نَاوِلِيني الثوبَ". فقالت: إنِّي حائض، فقال:"إن حَيضَتكَ ليست في يدك". فناولته.
صحيح: رواه مسلم في الحيض (299) من طريق يحيى بن سعيد، عن يزيد بن كيسان، عن أبي حازمٍ، عن أبي هريرة .. فذكر الحديث.
قوله:"إن حيضتك" - بفتح الحاء كما قال المحدثون، قال الخطابي: الصواب بالكسر، أي: الهيئة والحالة، وصوَّب القاضي عياض ما قاله المحدثون بخلاف حديث أم سلمة"فأخذتُ ثيابَ حِيضتي"؛ فإنَّ الصواب فيه الكسر. انتهى.
وفي الباب عن عائشة قالت: جاء رسول الله صلى الله عليه وسلم ووجوه بيوت أصحابه شارعةٌ في المسجد فقال:"وجِّهُوا هذه البيوتَ عن المسجد"، ثم دخل النبي صلى الله عليه وسلم ولم يصنع القوم شيئًا؛ رجاء أن تنزل فيهم رخصة، فخرج إليهم بعدُ فقال:"وَجِّهُوا هذه البيوتَ عن المسجد؛ فإني لا أحِلُّ المسجدَ الحائض ولا جنب".
رواه أبو داود (232) قال: حدَّثنا مسدد، ثنا عبد الواحد بن زياد، ثنا أفلت بن خليفة، قال: حدثتني جسرة بنت دجاجة، قالت: سمعت عائشة، فذكرت الحديث. وصححه ابن خزيمة (1327).
وقال الخطابي: وقد ضعَّفوا هذا الحديث، وقالوا: إن (أفلت) راويه مجهول، لا يصح الاحتجاج بحديثه".
قلت: كذا قال في أفلت، وقد قال فيه الإمام أحمد: ما أرى به بأسًا.
وقال أبو حاتم: شيخ، وقال الدارقطني: صالح. ولذا جعله الحافظ في مرتبة"صدوق". ولكن شيخته جسرة بنت دجاجة لم أجد من يعتمد على توثيقه غير العجلي وابن حبان. ولذا قال فيها الحافظ:"مقبولة" أي عند المتابعة، ولم أجد لها متابعة فهي لينة الحديث. قال البخاريّ:"عندها عجائب"، وقال البيهقي في"المعرفة":"إنّ هذا الحديث ليس بالقوي"، وقال في السنن (2/ 443):"إن صح فمحمول في الجنب على المكث فيه دون العبور بدليل الكتاب".
وكذلك حديث أم سلمة:"إن المسجد لا يحل لجنب ولا لحائض" رواه ابن ماجه (645) قال: حدَّثنا أبو بكر بن أبي شيبة ومحمد بن يحيى، قالا: حدَّثنا أبو نعيم، ثنا ابن أبي غَنِيَّة، عن أبي الخطاب الهجري، عن محدوج الذُّهلي، عن جسرة قالت: أخبرتني أمُّ سلمة قالت: دخل رسول الله صلى الله عليه وسلم صرْحة هذا المسجد فنادى بأعلى صوته، فذكرت الحديث. وفيه علتان:
أحداهما: أبو الخطاب؛ فإنه مجهول.
والثانية: محدوج الذُّهلي؛ فهو مجهول أيضًا؛ وقد تفرد بالرواية عنه أبو الخطاب الهجري.
وفي الإسناد علة أُخرى، وهي أن أفلت بن خليفة رواه عن جسرة، عن عائشة، كما سبق.
ورواه ابن أبي غنية، عن أبي الخطاب، عن محدوج الذُّهلي، عن جسرة، عن أم سلمة؛ فالذي يظهر أن مصدر الحديث واحد. وقد أشار إلى هذا ابن أبي حاتم في"العلل" (1/ 99) فقال:"قال أبو زرعة: يقولون عن جسرة، عن أم سلمة، والصحيح عن عائشة"، وهذا يدل على أن الرواة لم يضبطوا، كما أنهم زادوا في لفظ الحديث:"إلَّا للنبي وأزواجه وعلي وفاطمة بنت محمد". ذكره ابن أبي حاتم في علله. وهذه الزيادة كما قال الحافظ ابن القيم وغيره موضوعة.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মসজিদে ছিলেন, তখন তিনি বললেন: "হে আয়িশা! আমাকে কাপড়টি দাও।" তখন তিনি (আয়িশা) বললেন, "আমি তো ঋতুমতী।" তিনি বললেন: "তোমার ঋতুস্রাব তো তোমার হাতে নেই।" অতঃপর তিনি (আয়িশা) তাঁকে কাপড়টি দিলেন।
1501 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من أتى حائضًا أو امرأةٌ في دبرها، أو كاهنًا، فقد كفر بما أنزل على محمد".
حسن: رواه أبو داود (3904) والترمذي (135) واللفظ له، وابن ماجه (1/ 209) كلهم من طريق حماد بن سلمة، عن حكيم الأثرم، عن أبي تميمة، عن أبي هريرة. وزاد أبو داود وابن ماجه بعد قوله:"كاهنا": فصدقه بما يقول".
قال الترمذي: لا نعرف هذا الحديث إلَّا من حديثِ حكيم الأثرم عن أبي تميمة، عن أبي هريرة، وضعَّف محمد (يعني البخاري) هذا الحديث من قبل إسناده، وأبو تميمة اسمه: طريف بن مجالد. انتهى.
قلت: إسناده حسن؛ فإن حكيم الأثرم حسن الحديث، وثقه ابن المديني، وأبو داود. وقال النسائي: لا بأس به.
وأبو تميمة اسمه: طريف بن مجالد من رجال البخاري، وثقه ابن معين. وقال ابن سعد: كان ثقة إن شاء الله تعالى. وقال الدارقطني: ثقة. وقال ابن عبد البر: هو ثقة حجة عند جميعهم.
وإنَّما ضعَّف البخاري هذا الحديث لسببين:
أحدهما: أن حكيمًا لا يتابع في حديثه، يعني هذا، وقد عرفت أن حكيمًا ثقةٌ، أو صدوقٌ فلا يضرّ عدم المتابعةِ له.
والثاني: أنه قال في"التاريخ الكبير" (4/ 67):"لا نعلم لأبي تميمة سماعًا من أبي هريرة".
وأبو تميمة ثقة غير مُدلِّس توفي عام (95، وقيل 97) ومات أبو هريرة عام (58)، والمعاصرة تكفي الثبوت اللقاء إذا لم يكن الرجل مدلِّسًا على رأي الجمهور.
وقد نقل المُناوي عن الحافظ العراقي أنه قال في"أماليه":"حديث صحيح". وعن الذهبي أنه قال:"إسناده قوي". وقال في الكاشف:"حكيم الأثرم صدوق".
وروى الحاكم في المستدرك (1/ 8) جزءًا من الحديث، وهو"من أتى كاهنا أو عرّافا فصدَّقه فيما يقول فقد كفر بما أنزل على محمد صلى الله عليه وسلم" من حديث الحارث بن أبي أسامة، ثنا روح بن عبادة، ثنا عوف، عن خلاس ومحمد، عن أبي هريرة. وقال: صحيح على شرطهما جميعًا من حديث ابن سيرين.
وهو كما قال، إلَّا أن خلاسًا لم يسمع من أبي هريرة، ولكنه تابعه محمد بن سيرين، وهذه المتابعة تقوي بما قبله.
وللحديث شواهد عن عمر بن الخطاب، وخزيمة بن ثابت، وعبد الله بن عمرو بن العاص، وعلي بن طلق، وابن عباس، وغيرهم، ومن أهل العلم من ذهب إلى ضعف الحديث من أجل متنه، بحجة أن إتيان الحائض، أو إتيان المرأة في دبرها ليس بكفر، فأجيب بأن معنى الحديث عند أهل العلم التغليظ لهذا العمل، لا التكفير به.
قال الترمذي عقب تخريج الحديث:"فلو كان إتيان الحائض كفرًا لم يؤمر فيه بالكفارة".
قلت: حديث الكفارة رواه أصحاب السنن عن ابن عباس وهو ضعيف.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি কোনো ঋতুবতী নারীর সাথে সহবাস করে, অথবা কোনো নারীর পায়ুপথে সহবাস করে, অথবা কোনো গণকের কাছে যায়, সে অবশ্যই মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর যা নাযিল করা হয়েছে, তার সাথে কুফরি করল।”
1502 - عن أم عطية قالت: كنّا لا نَعُدّ الكدرة والصفرةَ شيئًا.
صحيح: رواه البخاري في الحيض (326) عن قتيبة: ثنا إسماعيل، عن أيوب، عن محمد، عن أمِّ عطيَّة .. فذكرته.
وفي سنن أبي داود (307): كنا لا نعد الكُدرةَ والصفرةَ بعد الطهر شيئًا. وكانت أم عطية بايعت النبي صلى الله عليه وسلم.
وبه بوّب البخاري قائلًا: باب الصفرةِ والكُدرةِ في غير أيام الحيض.
ويعني بذلك أن الكدرة والصفرة في أيام الحيضٌ حيضٌ جمعًا بينه وبين قول عائشة: لا تَعجلنَ حتَّى ترين القَصَّةَ البيضاء. فإنَّ النساء كن يبعثن إلى عائشة بالدُّرجة فيها الكرسف، فيه الصفرةُ من
دمِ الحيضة، يسألنها عن الصلاة، فتقول لهن:"لا تعجلنَ حتَّى ترينَ القَصَّة البيضاء" تريد بذلك الطهر من الحيضة. رواه مالك في الطهارة (97) عن علقمة بن أبي علقمة، عن أمه مولاة عائشة، عنها. وأورده البخاري في كتاب الحيض، باب إقبال المحيض وإدباره. وفي سنده والدة علقمة، واسمها مرجانة، وهي"مقبولة".
والقَصَّة البيضاء - بفتح القاف وتشديد المهملة - هي: النورة، أي: تخرج القطنة بيضاء نقية لا يخالطها صفرةٌ. وفيه دلالة على أن الصفرة والكدرة في أيام الحيضِ حَيضٌ وفي أيام الطُّهرِ طهرٌ.
وقولها:"لا نعُدّ" أي: في زمن النبي صلى الله عليه وسلم؛ فيكون له حكم الرفع، وعلى هذا مشى البخاري، وإن لم يصرّح الصحابي بذكر زمن النبي صلى الله عليه وسلم، وخالفه البعض؛ فلم يجعل له حكمَ الرفع، كالخطيب.
وقولها:"الكدرة والصفرة" أي: الماء الذي تراه المرأة كالصديد يعلوه اصفرار.
وأم عطية: هي نُسيبة بنت كعب، وقيل: بنت الحارث الأنصارية، بايعت النبي صلى الله عليه وسلم، وكانت تغسل الميتات، وهي التي غسلت بنت رسول الله صلى الله عليه وسلم.
উম্মে আতিয়্যা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা ঘোলাটে (বাদামী) স্রাব এবং হলুদ বর্ণের স্রাবকে (হায়েযের) কোনো কিছুই মনে করতাম না।
1503 - عن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم أنها قالت: قالت فاطمة بنت أبي حُبَيش: يا رسول الله! إنِّي لا أطهر، أفأدع الصلاة؟ فقال لها رسول الله:"إنَّما ذلك عرق، وليست بالحَيضة؛ فإذا أقبلت الحَيضةُ فاتُركِي الصلاة، فإذا ذهب قدرُها فاغسِلي عن الدم وصلِّي".
متَّفقٌ عليه: رواه مالك في الطهارة (104) عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، ومن طريقه البخاري في الحيض (306) ومسلم في الحيض (333). ورواه البخاري أيضًا مختصرًا في الحيض (331) ولفظه:"إذا أقبلت الحيضة فدعي الصلاة، وإذا أدبرت فاغسلي عنك الدم وصلّي"، وهو مختصر من قصة فاطمة المذكورة.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, ফাতিমা বিনত আবি হুবাইশ (রাসূলাল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে) বলেছিলেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি কখনো পবিত্র হতে পারি না (অর্থাৎ আমার রক্তপাত বন্ধ হয় না), তাহলে কি আমি সালাত ছেড়ে দেব? তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "নিশ্চয়ই এটা হলো (শিরাগত) রক্ত, এটা হায়িয নয়। যখন হায়িযের সময় উপস্থিত হবে, তখন সালাত ছেড়ে দেবে। আর যখন তার সময়কাল চলে যাবে, তখন তুমি তোমার থেকে রক্ত ধুয়ে ফেলবে এবং সালাত আদায় করবে।"
1504 - عن أم سلمة زوج النبي صلى الله عليه وسلم أن امرأة كانت تُهراقُ الدماء في عهد رسول الله
صلى الله عليه وسلم، فاستفتت لها أمُّ سلمة رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"لتنظر إلى عددِ الليالي والأيام التي كانت تحيضُهُنّ من الشَّهر قبل أن يُصِيبَها الذي أصابها؛ فلتتركِ الصلاةَ قدرَ ذلك من الشهر، فإذا خلَّفت ذلك فلتغتَسِل، ثم لتستنفر بثوب، ثم لتصلي".
صحيح: رواه مالك في الطهارة (105) عن نافع، عن سليمان بن يسار، عن أم سلمة. ومن طريق مالك رواه أبو داود (274) والنسائي (355).
وتابعه عبيد الله بن عمر فرواه عن نافع به، رواه النسائي (354) وابن ماجه (326).
وأعله البيهقي بالانقطاع بعد أن روى الحديث من جهة الشافعي عن مالك:"لفظ حديث الشافعي هذا حديث مشهور، أودعه مالك بن أنس في الموطأ، وأخرجه أبو داود في كتاب السنن، إلَّا أن سليمان بن يسار لم يسمعه من أم سلمة". انتهى."السنن الكبرى" (1/ 333).
قلت: سليمان بن يسار ولد سنة 34، وماتت أمُّ سلمة سنة 64، وكان مُكاتبًا لها؛ فلا يبعد سماعه منها، وقد رَوَي عن ميمونة وعائشة وفاطمة بنت قيس وزيد بن ثابت وغيرهم من الصحابة، وكان أحد الفقهاء السبعة، وقد اعتمد روايته مالك في الموطأ، عن نافع، وكذلك رواه أيوب السخيتاني عن سليمان بن يسار كما رواه مالك عن نافع سواء.
وكون الليث بن سعد وصخر بن جويرية وعبيد الله بن عمر أدخلوا بين سليمان بن يسار وبين أم سلمة رجلًا، وأحاديث هؤلاء أخرجه أبو داود والبيهقي لا يضرّ ما رواه نافع وأيوب؛ لما في إسناد هؤلاء من اضطراب، كما أنه من المحتمل أنه سمع منها أوَّلًا بالواسطة، ثم سمع منها مباشرة؛ فروى على وجهين، وهو أمر سائغ في رواية الحديث، واعتماد الشافعي وأبي داود يُقوي هذا الجانب.
وفي حديث أيوب السختياني: إن المرأة التي استفتت لها أم سلمة عن استحاضها هي فاطمة بنت أبي حُبَيش المذكورة في حديث هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، على ما رواه مالك وغيره.
وحديث أيوب رواه أبو داود (278) من طريق وُهَيب، والحميدي في مسنده (1/ 144 رقم 302) قال: حدَّثنا سفيان، كلاهما عن أيوب السختياني، عن سليمان بن يسار، أنه سمعه يحدّث عن أم سلمة قالت: كانت فاطمة بنت أبي حُبَيش تستحاض، فسألت رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"إنه ليس بالحيضة، ولكنه عِرق" وأمرها أن تدع الصلاة قدر أَقرائها، أو قدر حيضتها، ثم تغتسل؛ فإن غلبها الدمُ استنفرت بثوب وصلَّت، لفظ الحميدي. ورواه ابن عبد البر من طريق محمد بن إسماعيل بن يوسف، عن الحميدي."الاستذكار" (3/ 235).
والاستثفار: أن يَشُدَّ ثوبًا تحتجز به، يُمسك موضع الدم ليمنع السيلان، وهو مأخوذ من الثفر.
উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যমানায় এক মহিলা (ইস্তিহাযার কারণে) রক্তক্ষরণজনিত সমস্যায় ভুগছিল। তখন উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার জন্য রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে ফতোয়া চাইলেন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে যেন সেই মাসটির দিন ও রাতের সংখ্যা গণনা করে, যেগুলোতে সে তার এই রোগ শুরু হওয়ার পূর্বে ঋতুমতী হত। অতঃপর সে যেন মাসের মধ্যে ততটুকু সময় সালাত (নামাজ) ছেড়ে দেয়। যখন এই সময় অতিবাহিত হয়ে যাবে, তখন সে যেন গোসল করে নেয়। এরপর সে যেন কাপড় দ্বারা রক্ত আটকিয়ে রাখে (নিজেদেরকে সুরক্ষিত করে নেয়)। অতঃপর সে যেন সালাত আদায় করে।"
1505 - عن عائشة قالت: استفتت أمُّ حبيبة بنت جحش - ختنةُ رسول الله صلى الله عليه وسلم، وكانت تحت عبد الرحمن بن عوف - رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالت: إنِّي أستحاض، فقال:"إنَّما ذلك عِرْق، فاغتسلي ثم صَلّي". فكانت تَغتَسِلُ عند كلِّ صلاةٍ.
قال الليث بن سعد: لم يذكر ابن شهاب الزهري أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أمر أمَّ حبيبةَ بنت جحش أن تغتسل عند كل صلاة، ولكنه شيءٌ فعلته هي.
وفي رواية: أُستحيضت سبع سنين، فاستفتت رسول الله صلى الله عليه وسلم في ذلك، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن هذه ليست بالحيضة، ولكن هذا عرق؛ فاغتسلي وصلِّي".
قالت عائشة: فكانت تغتسل في مِركن في حجرة أختها زينب بنت جحش حتَّى
تعلُو حمرةُ الدمِ الماءَ.
قال ابن شهاب: فحدّثت بذلك أبا بكر بن عبد الرحمن بن الحارث بن هشام فقال: يرحم الله هندًا! لو سمعت بهذه الفتية، والله! إن كانت لتبكي لأنها كانت لا تصلي.
وفي رواية: قال لها رسول الله صلى الله عليه وسلم:"امكثي قدر ما كانت تحبسك حيضتُكِ، ثم اغتسلي وصلِّي".
متَّفقٌ عليه: هذه الروايات كلها أخرجها مسلم في الحيض (334)، ورواه البخاري في الحيض (327) مختصرًا: أن أم حبيبة اُستحيضت سبع سنين، فسألت رسول الله صلى الله عليه وسلم عن ذلك، فأمرها أن تغتسل فقال:"هذا عرق"، فكانت تغتسل لكل صلاة.
وفي سنن أبي داود (381):"فأمرها أن تدع الصلاة أيام أقرائها".
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর শ্যালিকা উম্মু হাবীবা বিনত জাহশ—যিনি আবদুর রহমান ইবনু আউফের স্ত্রী ছিলেন—রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে ফতোয়া চাইলেন এবং বললেন, আমি ইস্তিহাদার রক্তে ভুগি (অবিরত রক্তস্রাব হয়)। তিনি (রাসূল) বললেন: "এটা আসলে একটি শিরা (থেকে নির্গত রক্ত), তাই গোসল করো, অতঃপর সালাত আদায় করো।" সুতরাং তিনি প্রত্যেক সালাতের জন্য গোসল করতেন।
লায়স ইবনু সা'দ বলেন: ইবনু শিহাব যুহরী এই কথা উল্লেখ করেননি যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উম্মু হাবীবা বিনত জাহশকে প্রত্যেক সালাতের জন্য গোসল করতে আদেশ দিয়েছিলেন; বরং এটা তিনি নিজেই করতেন।
অপর এক বর্ণনায় এসেছে: তিনি সাত বছর যাবত ইস্তিহাদার রক্তে ভুগছিলেন। অতঃপর তিনি এই বিষয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে ফতোয়া চাইলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এটা ঋতুস্রাব নয়, বরং এটা একটি শিরা (থেকে নির্গত রক্ত); অতএব গোসল করো এবং সালাত আদায় করো।"
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তিনি (উম্মু হাবীবা) তাঁর বোন যায়নাব বিনত জাহশের ঘরে একটি পাত্রে গোসল করতেন, এমনকি রক্তের লালিমা পানির উপরে ভেসে উঠত।
ইবনু শিহাব বলেন: আমি এই কথা আবূ বকর ইবনু আবদির রহমান ইবনুল হারিস ইবনু হিশামের কাছে বর্ণনা করলে তিনি বললেন: আল্লাহ হিন্দ-কে (উম্মু হাবীবা) রহম করুন! যদি তিনি এই ফতোয়া শুনতে পেতেন! আল্লাহর কসম, তিনি অবশ্যই কাঁদতেন, কারণ তিনি (এই অবস্থায়) সালাত আদায় করতেন না।
অপর এক বর্ণনায় (এসেছে), রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "যত দিন তোমার ঋতুস্রাব তোমাকে বিরত রাখত, তত দিন বিরত থাকো। অতঃপর গোসল করো এবং সালাত আদায় করো।"
মুত্তাফাকুন আলাইহি। এই সকল বর্ণনাগুলো মুসলিম 'হায়িয' অধ্যায়ে (৩৩৪) এবং বুখারী 'হায়িয' অধ্যায়ে (৩২৭) সংক্ষেপে বর্ণনা করেছেন: উম্মু হাবীবা সাত বছর ধরে ইস্তিহাদার রক্তে ভুগছিলেন। তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এ বিষয়ে জিজ্ঞাসা করলে তিনি তাঁকে গোসল করার নির্দেশ দেন এবং বলেন: "এটা একটি শিরা (থেকে নির্গত রক্ত)।" অতঃপর তিনি প্রত্যেক সালাতের জন্য গোসল করতেন। সুনানে আবূ দাঊদে (৩৮১) রয়েছে: "তিনি (রাসূল) তাঁকে ঋতুস্রাবের দিনগুলোতে সালাত ছেড়ে দিতে নির্দেশ দেন।"
1506 - عن عروة بن الزبير قال: حدثتني فاطمة بنت أبي حُبَيش أنها أمرت أسماءَ، أو أسماءُ حدثتني أنها أمرتها فاطمةُ بنت أبي حُبَيش أن تسأل رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأمرها أن تقعد الأيام التي كانت تقعد، ثم تغتسل.
حسن: رواه أبو داود (281) قال: حدَّثنا يوسف بن موسى، ثنا جرير، عن سهيل - يعني ابن أبي صالح - عن الزهري، عن عروة بن الزبير، فذكر الحديث.
وإسناده حسن ورجاله ثقات غير سهيل بن أبي صالح، إلَّا أنه صدوق، قال أبو حاتم: يكتب حديثه.
وأسماء هذه هي أسماء بنت عميس كما في رواية أبي داود (296).
إلَّا أن سياق هذا الحديث يختلف، وسيأتي.
ثم قال أبو داود: ورواه قتادة، عن عروة بن الزبير، عن زينب بنت أم سلمة، أن أم حبيبة بنت جحش اُستحيضت فأمرها النبي صلى الله عليه وسلم أن تدع الصلاة أيامَ أقرائها، ثم تغتسل وتُصلي.
قال أبو داود: لم يسمع قتادة من عروة شيئًا. وزاد ابن عيينة في حديث الزهري، عن عَمرة، عن عائشة أن أم حبيبة كانت تُستحاض، فسألتِ النبي صلى الله عليه وسلم فأمرها أن تدع الصلاة أيام أقرائها.
قال أبو داود: وهذا وهم من ابن عيينة، ليس هذا في حديث الحفاظ عن الزهري، إلَّا ما ذكر سهيل بن أبي صالح، وقد روى الحميدي هذا الحديث عن ابن عيينة لم يذكر فيه:"تدع الصلاة أيام أقرائها" انتهى.
قلت: ليس هناك فرق في معنى الحديث، وأما الفرق في ألفاظ الحديث، ولعل أبا داود قصد بذلك اهتمام المحدثين بضبط لفظ الحديث؛ يتضح ذلك جليًّا فيما ذكره أبو داود نفسه في الباب الذي يليه. انظر الحديث (285).
وأمَّا وطء الرجل زوجته المستحاضة فلم يثبت فيه شيءٌ مرفوعًا.
وما رواه أبو داود (309) من حديث عكرمة قال: كانت أم حبيبة تُستحاض، فكان زوجها يغشاها، وكذلك ما رواه أيضًا (310) من حديث عكرمة، عن حمنة بنت جحش أنها كانت مستحاضة، وكان زوجها يجامعها.
فقد قال المنذري:"في سماع عكرمة من أم حبيبة وحمنة نظر، وليس فيها ما يدل على سماعه منهما".
وكذلك قال البيهقي (1/ 351) عكرمة عن أم حبيبة منقطع.
وعلى تقدير سماعه منهما فإنَّ الحديث موقوف، وفي أحد طرقه مُعلَّى بن منصور، كان أحمد بن حنبل لا يروي عنه؛ لأنه ينظر في الرأي.
وعكرمة هو: أبو عبد الله البربري المدني مولى ابن عباس.
فمن أخذ بالحديث الموقوف جوّز غشيان المستحاضة؛ لأنها في حكم الطاهرات في أكثر الأحكام، وهو رأي الجمهور كالشافعي ومالك والثوري.
وقال أحمد: لا يأتيها إلَّا أن يطول ذلك بها، وفي رواية عنه: إلَّا إذا خاف زوجها العنت (الزنا).
ومن منع إتيان المستحاضة، علّل بالأذى الذي ذكره الله في إتيان الحائض في قوله: {وَيَسْأَلُونَكَ عَنِ الْمَحِيضِ قُلْ هُوَ أَذًى فَاعْتَزِلُوا النِّسَاءَ فِي الْمَحِيضِ}. [سورة البقرة: 222].
وممن منع إتيان المستحاضة عائشةُ، وإبراهيمُ النخعي، وابن سيرين وغيرهم
فائدة:
أسماء النساء المستحاضات في زمن النبي صلى الله عليه وسلم:
- زينب بنت جحش أم المؤمنين.
- سودة بنت زمعة أم المؤمنين.
- أم سلمة بنت أبي أمية، أم المؤمنين.
- حمنة بنت جحش.
- أم حبيبة بنت جحش.
- أسماء بنت جحش.
- فاطمة بنت أبي حُبَيش، واسم أبي حُبَيش: قيس.
- سهلة بنت سهيل.
- أسماء بنت مرثد.
- بادية بنت غيلان.
ফাতিমা বিনত আবী হুবাইশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে নির্দেশ দিয়েছিলেন—অথবা আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে (ফাতিমাকে) জানিয়েছিলেন যে, ফাতিমা তাঁকে (আসমাকে) নির্দেশ দিয়েছিলেন—তিনি যেন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করেন। অতঃপর তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফাতিমাকে নির্দেশ দিলেন যে, সে যেন (মাসিকের) যে ক'দিন বসে থাকত, সে ক'দিন (সালাত থেকে বিরত) থাকে, অতঃপর গোসল করে নেয়।
1507 - عن زينب بنت أبي سلمة أن امرأة كانت تُهراق الدم، وكانت تحت عبد الرحمن
ابن عوف! أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أمرها أن تغتسل عند كل صلاة وتصلي.
صحيح: رواه أبو داود (293) قال: حدَّثنا عبد الله بن عمرو بن أبي الحجاج أبو معمر، ثنا عبد الوارث، عن الحسين، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة قال: أخبرتني زينب بنت أبي سلمة، فذكرت الحديث.
وإسناده صحيح. والحسين هو ابن ذكوان المعلم ثقة؛ وثّقه ابن معين وأبو حاتم والنسائي والدارقطني وابن حبان وابن سعد والعجلي وغيرهم، وقال فيه يحيى بن سعيد القطان: فيه اضطراب.
ورواه أيضًا أبو داود فقال: وأخبرني - عطفا على قوله عن أبي سلمة، أي: قال يحيى بن أبي كثير وأخبرني - أبو سلمة أن أم بكر أخبرته أن عائشة قالت: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال في المرأة التي ترى ما يريبها بعد الطهر:"إنَّما هي" أو قال:"إنَّما هو عرق" أو قال:"عروق".
ورواه أيضًا ابن ماجه (646) والدارمي (935) بإسنادهما عن يحيى بن أبي كثير به نحوه. قال البوصيري في الزوائد: إسناده صحيح ورجاله ثقات.
قلت: ليس كما قال؛ فإنَّ فيه أم يكر، لم تلق عائشة وهي مجهولة.
ثم قال أبو داود: وفي حديث ابن عقيل الأمران جميعًا، وقال:"إن قويت فاغتسلي لكل صلاة، وإلا فاجمعي" كما قال القاسم في حديثه. وقد رُوي هذا القولُ عن سعيد بن جبير، عن علي وابن عباس رضي الله عنهما. انتهى.
যাইনাব বিনত আবি সালামা থেকে বর্ণিত, আব্দুর রহমান ইবন আউফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বিবাহে থাকা এক মহিলা প্রচুর রক্তপাতের (ইস্তিহাযা) শিকার হতেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে আদেশ করলেন যেন তিনি প্রত্যেক সালাতের পূর্বে গোসল করেন এবং সালাত আদায় করেন।
